बूढ़ों का वसंत और लोलितागिरी: डॉ. विनय कुमार

सत्तर पार का एक बूढ़ा ‘सुपरस्टार’ है, उसे विश्वास है कि उसे सप्तर्षियों में से एक मान लिया गया है,सो मृत्यु उसे नहीं व्यापेगी।यह बूढ़ा हालांकि मुंह के भीतर नकली दाँत और माथे के ऊपर नकली केश लगाता है, जब तब बीमार पड़ते रहता है, तो भी सोलह साल की लड़की से प्रेम का नाटक करने के लिए हमेशा तैयार रहता है। बूढ़ा प्रयोगों का शौकीन है। उसे लगता है, प्रयोग करते रहने से आदमी हमेशा जवान बना रहता है। अपनी उम्र को जीत लेने का नाटक करते-करते इस बूढ़े ने साबित किया है कि सचमुच उम्र को जीता जा सकता है। वैसे अपनी उम्र को जीतने के लिए यह बूढ़ा एक खास किस्म का शहद भी खाता है। यह शहद पुणे के एक बाग़ में तैयार होता है। यह शहद या तो सिर्फ यह बूढ़ा खाता है या फिर मधुमक्खियों पर राज करने वाली रानी मधुमक्खी, बाकी जो कोई इस शहद को खाना चाहता हो उसे उस क्लब में शामिल होना पड़ेगा जो कि रानी मधुमक्खी का क्लब होता है। यह क्लब अकसर आईपीएल की टीमों के खरीदारों और उनके दोस्तों से बनता है। साठ पार कर चुका एक और बूढ़ा है। यह बूढ़ा ‘सर्वशक्तिमान’ है। इस बूढ़े के पास एक नुस्खा है। बूढ़ा रानी मधुमक्खी के क्लब में शामिल होने का नुस्खा बताता है। इस बूढ़े ने भी उम्र को जीत लिया है।यह बूढ़ा अपने शरीर को सोने से मढ़वा देना चाहता है। सोना मढ़वाये सूट को धारण करने वाला बूढ़ा अपने को रॉकस्टार कहलवाने का शौकीन है, उसे रॉकस्टार कहा भी जा रहा है। साठ साल के इस लोकतंत्र पर इक्कीसवीं सदी में बरस इक्कीसवे बरस की जवानी छा रही है। सारे बूढ़े जवान हो गये हैं, सारे बच्चे भी जवान हो गये हैं, और जो जवान हैं, उनसे कहा जा रहा है कि अब आप चिरयौवन की अनंत आकाशगंगा में टहल लगाने को तैयार हैं। यंगिस्तान कहलाने वाले इस देश में अब कोई नहीं मरता। यहां रोग-शोक-दुःख-मृत्यु कुछ भी नहीं है। यह सब उस दौर की बातें हैं जब ग्रोथ-रेट के साथ किसी पुछल्ले की तरह हिन्दू शब्द जुड़ा होता था। यह ‘हिन्दू’ शब्द उस युग की इकॉनॉमी में इस देश के आदमी को आदिमानव बताने के लिए प्रयोग किया जाता था। आदिमानव ने छलांग लगायी है, अब वह महामानव है या फिर महामानव बनने को तैयार खड़ा है। महामानवत्व के सुखसागर में डूबते उतराते इस माहौल में यह लेख कह रहा है कि भाई साहेब, ये तो एक रोग है…! यह तो सिर्फ एक भूमिका है, पृष्ठभूमि है..आख्यान आगे है। डॉ. विनय कुमार की लेखनी में नयापन क्या है? नयापन वही है जो हिंदी के समकालीन रचनात्मक परिदृश्य से गायब है। नई सूचनाएं, नए ज्ञान ताकि हम बाकी संसार के साथ कदमताल कर सकें! अंग्रेजी या विदेशी साहित्य-लेखन से सहज लोगों के लिए विनय कुमार का लेखन नया नहीं बल्कि एक तरह का दुहराव भी लग सकता है, लेकिन इसे एक तरह की शुरुआत माननी चाहिए। समकालीन हिंदी कथेत्तर गद्य हिंदी का सबसे गरीब संस्करण हो गया है। डॉ. विनय की पुस्तक ‘एक मनोचिकित्सक के नोट्स’ इस गरीबी को कुछ कम ही करता है। प्रस्तुत है इसी पुस्तक से छोटे-छोटे दो गद्यांश। @चंदन श्रीवास्तव 

Sugar Daddy (1976)-Poster

Sugar Daddy (1968)-Poster


By डॉ. विनय कुमार

 चीनी कम होने की निःशब्दता

 
चीनी कम

मादरे-वतन में अगर मनमोहनॉमिक्स की इन्द्रधनुषी छटा का नूर न होता तो हमें ‘प्रिविलेज्ड बूढ़ों के वसंत’ और ‘लोलितागिरी’ पर चर्चा की जरुरत महसूस न होती… ‘निःशब्द’ और ‘चीनी कम’ पर चर्चाएँ कहाँ हो रही हैं? क्या उस भारत में जो अनुसरण करता है या उस छोटे भारत में जो नेतृत्व करता है. जो भारत ‘भूख-भय-भ्रष्टाचार’ की मार से खुद ‘निःशब्द’ है और जिसकी किस्मत में यूँही ‘चीनी कम’ है उसे यह विलासितापूर्ण सहूलियत कहाँ कि प्रेम और विवाह की तरह-तरह की रेसिपि को चटखारे लेकर पढ़े. वृद्ध और युवती के प्रेम, साहचर्य और विवाह का मुद्दा गर्म हो रहा है या गरमाया जा रहा है? सोचने की बात है. सोचने का फैशन न रहने के बावजूद इस पर सोचने की जरुरत है.

वृद्ध का युवती से विवाह भारत के लिए कोई नई बात नहीं है. दक्षिणभोगी नीतिकार कह गए ‘वीरभोग्या वसुंधरा’ और सेनाओं के सहारे वीरता सिद्ध करने वाले सत्तावान हत्यारों को भोग का सिद्धांत मिल गया. महलों के भीतर रानियों के मोहल्ले से लेकर नगर तक बसने लगे. जरा सोचकर देखिये कि कृष्ण की साथ हजार रानियों का खर्चा कैसे चलता होगा. सिर्फ इच्छा की पूर्ति के लिए कृष्ण को प्रजा से कितना वसूलना पड़ता होगा. सत्ता और धन की गोटियों से खेला जाने वाले यह खेल नन्द और यशोदा की विरासत के बूते तो कतई संभव न था.

अब इस मुद्दे को स्त्रियों की दृष्टि से देखें. तरह-तरह के स्वाभाविक और आरोपित सीमाओं के बावजूद स्त्रियाँ सभ्यता-यात्रा में बराबर की भागीदार रही हैं. कल से आज तक जीवन और वर्चस्व की लड़ाइयों में वे अपनी तरह से शरीक रही हैं. हल और हथियार भले ही कम उठाती रही हैं, मगर श्रम के स्वेद और युद्धों के आँसूं और रक्त से कम नहीं भींगती रही हैं. नर और मादा की तरह जंगलों में भटकती मानवजाति ने जब ‘घर’ बनाया तो उनकी भूमिका इस कदर बदली कि उनका मनोविज्ञान पुरुषों से काफी अलग हो गया. घर और तन से चिपके बच्चों ने उन्हें सुरक्षा की आवश्यकता का पाठ पढ़ाया. अन्न और मांस कमाकर लौटे पुरुष को जब भूख और थकान से राहत मिलने लगी तो वह स्त्री को पहले ‘जरुरत’ फिर ‘जायदाद’ की तरह प्यार करने लगा. परिणाम यह हुआ कि स्त्रियाँ ‘कृपाकांक्षिणी’ और ‘सुरक्षाकामिनी’ हो गईं. शायद यही कारण है कि स्त्रियाँ पुरुषों की उम्र से अधिक उनकी सामर्थ्य को अहमियत देने लगीं.

स्त्री के मनोविज्ञान की इस विशिष्ट पहचान के पक्ष में सबसे बड़ा जैविक प्रमाण (बायोलॉजिकल एविडेंस) यह है कि स्त्रियों की यौनिक उत्तेजना का सबलतम कारक है—पुरुष प्रदत्त देखभाल और सुरक्षा. याद करें प्रकाश झा की फिल्म ‘दिल क्या करे’. इस फिल्म की नायिका चलती ट्रेन में बलात्कार की कोशिश करने वाले गुंडों से बचाने वाले अजनबी को थोड़ी ही देर के बाद बेहद ‘निःशब्द’ तरीके से अपनी देह सौंप देती है और यात्रा के अंत में अजनबी के प्रति आँखों से आभार प्रकट करते हुए विदा हो जाती है. इतना कुछ हो जाने के बावजूद अजनबियत बरकरार रहती है. ऐसा क्यों? क्योंकि सिलसिले खतरनाक भी हो सकते हैं. अजनबियत अपने आप में एक सुरक्षा कवच है. इस प्रसंग को सुरक्षा के प्रति स्त्री के मनोवैज्ञानिक (सायकोबायोलॉजिकल) प्रतिक्रिया के रूप में देखें.

अगर स्वतंत्रता पूर्व के भारत की बात करें तो मुग्धाओं के प्रेम की सुविधा सामंतों, सेठों और वाग्वीर ज्ञानिओं के ही भाग्य में थी. लोकतांत्रिक भारत में इसमें ‘प्रिविलेज्ड क्लास’ के नेता और आला अफसर भी शामिल हो गए. अब जबकि उदारीकरण की मीठी छुरी से अच्छी-बुरी पुरानी मान्यताएं हँस-रोकर हलाल हो रही हैं, एक नए सोशल आर्डर को मान्यता दिलाने की कोशिश सर उठा रही हैं. एक फिल्म में सुबह की दौड़ लगाते हुए अमिताभ आते हैं ‘जब तक जाँ में है जाँ तब तक रहे जवां, रोज सुबह से माँगें नई-नई खुशियाँ.’ इस फिल्म में बुढ़ाते जाने के बावजूद वे विवाह नहीं करते. मगर उदार भारत में शताब्दी के महानायक कामनाओं के नदी में ‘निःशब्द’ बहते नज़र आए. ‘निःशब्द’ में थोडा अपराधबोध हुआ और ख्याल-ए-ख़ुदकुशी से उबरे तो तय किया कि तीस पार की कुड़ी से कुड़माई की जाये. इस ढीठ बदलाव के मनोविज्ञान की व्याख्या वैश्वीकरण और उदारीकरण की रोशनी में ही संभव है.

जब पश्चिम में औद्योगिक क्रान्ति हुई तो सत्ता और अर्थ के समीकरण बदले. पुराने सामन्तों और सेठों की जगह उद्यम से उभरे नवधनाढ्यों ने ली. उद्योगों ने पूंजी के नए पहाड़ बनाए, ऐश्वर्य और सुख की नई परिभाषाएँ विकसित कीं और एकदम नए किस्म की कुलीनों की जमात खाड़ी की. उद्यम और उत्पादन बहादुरों की जमात पूंजी के नशे में ‘जब तक है जाँ तब तक लुटें मजा’ की राह पर चल पड़ी. तबसे आज तक यूरोप और उसके सारे उपनिवेश में ‘एन्जॉय योर सेल्फ’ का नारा गूंज रहा है. भोग के प्रयोग ने स्त्रियों के सामने भी यह विकल्प प्रस्तुत किया कि वे चाहें तो अमीर बूढ़ों की सहचरी बन सकती हैं. धन और सत्ता का सुख किसे नहीं चाहिए. स्त्रियाँ अपवाद नहीं हैं. उनमें से कुछ को लगा कि अमीर बूढ़ों के प्रति आकर्षित होना एक सुरक्षित, आरामदेह और शक्ति एवं ऐश्वर्य प्रदान करने वाला बेहतर विकल्प है. यहीं से खड़ी हुई प्रिविलेज्ड प्रेमियों की एक नई जमात. अमेरिका में इस जमात को ‘शुगर डैडीज’ कहा जाता है. अब तो आप मानेगें कि बूढ़ों का यह वसंत ‘ग्लोबलाइजेशन का बाई प्रोडक्ट’ है और उसे फैशन शो की तरह प्रायोजित किया जा रहा है, भारत के नए उद्यम-वीरों के लिए. कुल मिलाकर वृद्ध-युवती साहचर्य का यह फैशन पूंजी के पहाड़ों से उठने वाली पुरानी पछुआ हवा का यह पुरवैया झोंका है.

जो पश्चिम में हो चूका वह भारत में हो रहा है. मगर जो जो भारत में हो रहा है वह पश्चिम में नहीं हो रहा है. पश्चिम में स्त्री-पुरुष संबंधों के समीकरण बदल गये हैं. वहाँ स्त्री सशक्तिकरण का दौर सफल हो चुका है. काफी तादात में स्त्रियाँ ज्ञान, धन, शासन-सत्ता की स्वामिनी हो चुकी हैं. नई रायशुमारियाँ बताती हैं कि अब समृद्ध और सत्तावान प्रौढ़ाएँ भींगती मसों के युवक से प्रेम और विवाह करने लगी हैं. आज नहीं तो कल भारत में यह हो सकता है. ‘चीनी कम’ की सफलता की कामना करने वाले शुगर डैडीज सोच लें.

निःशब्द

हमारे समय में शहरी और कस्बाई भारत में प्रेम पर चर्चा कोई अजूबा नहीं है. महामायावी मीडिया की कृपा से हम तरह-तरह के प्रेम पर होने वाली तरह-तरह की चर्चाओं के अनिवार्य घेरे में हैं. मोनिका-क्लिंटन और जूली-मटुकनाथ जैसी कथाएँ चाट मसाले की तरह हमरे खाने की प्लेटों में अनिवार्य रूप से छिड़की जा रही है और चूँकि हम भूखे नहीं रह सकते इसीलिए उसे चखने को विवश हैं. प्रेम का हो या न हो यह ‘प्रेम’ के अहर्निश उच्चारण से उठने वाले शोर का समय अवश्य है और ऐसे समय में आई है एक फिल्म ‘निःशब्द’. एक ‘टीन’ (युवती) और एक वक्त की मार से छीजे हुए ‘टिन’ (वृद्ध) की प्रेमकथा को लेकर.

इस फिल्म के पहले इस पर चर्चाएँ आईं और खूब आईं, जिनका लब्बोलुआब यह था कि भारत बदल रहा है- इंडिया प्वायज्ड टु बिकम बोल्ड एंड ब्यूटीफुल, देखो तो सही क्या मणिकांचन संयोग है- ओल्ड बिग बी और कमसिन ब्यूटीफुल जिया. सुपरस्टार की लोलितागिरी. जिया देखोगे तो जिया धड़क-धड़क जाएगा. तो ‘निःशब्द’ से पहले आई शब्दों की भीड़ इश्तेहार की तख्तियां उठाये. और जब फिल्म आई तो आई और आकर चली गयी. पटना में मटुक-जूली का तड़का भी भीड़ न बटोर पाया.

दरअसल ‘निःशब्द’ आकर्षण और प्रेम से अधिक त्रासदियों की कथा है. नायिका खंडित परिवार से आती है. पिताओं से भरे समाज में वह पिता के प्रेम से वंचित है. यह अभाव उसके मनोयौनिक (सायकोसेक्सुअल) विकास में अपनी भूमिका निभाता है. चूँकि किसी चीज की इच्छा उसकी कमी से ही पैदा होती है इसलिए उसके अचेतन में पितृपुरुष के लिए चाह का मौजूद होना कोई अजूबा नहीं. यहाँ प्रश्न उठता है कि उसने सहेली के पिता को पिता की तरह क्यों नहीं चाहा. ऐसा इसलिए कि वह पिता-पुत्री के संबंधों के व्याकरण से अनभिज्ञ थी. हर शिशु नर या मादा पैदा होता है. संबंधों की समझ तो परिवार और परिवेश के साथ ‘इंटरएक्शन’ से विकसित होती है. नायिका की समस्या यह है कि जब संयोग उसे अबाधित एकांत में नायक को समझने का अवसर प्रदान करता है और उसके अचेतन में पितृपुरुष को पाने की इच्छा सिर उठाती है तो वह स्वयं को एक पुत्री की तरह अभिव्यक्त नहीं कर पाती क्योंकि उसे वह मनोवैज्ञानिक भाषा ही नहीं पता जिसमें एक पुत्री अपने पिता से बात करती है. उसकी इच्छा उसके बचपन के अभाव से उठती है, मगर व्यक्त होती है युवा भाषा में. यह त्रासदी नहीं तो और क्या है! नायक अपनी तरह की त्रासदी का शिकार है, विवाहित होकर दाम्पत्य प्रेम से वंचित. दाम्पत्य की विडंबना यह है कि वह प्रेमहीन होकर भी संतानवान हो सकता है. नायक तृप्त पिता है मगर एक अतृप्त पुरुष. फिल्म में संयोग उसके अतृप्त पुरुष का कद इतना बढ़ा देता है कि पिता बौना हो जाता है. अतृप्त पुरुष की भाषा के शोर में पिता की भाषा खो जाती है. अगर सही-गलत के पारंपरिक और समाजसम्मत नजरिये से सोचें तो यह दायित्व नायक का ही था कि वह नायिका के हित में सही भाषा में बात करता. क्योंकि नायिका भले ही पुत्री की भाषा नहीं जानती थी, नायक तो पिता की भाषा जानता था. वह निःशब्द की ‘जिया’ के मोह को गुड्डी की ‘जया’ के मोह की तरह भंग कर सकता था. मगर इच्छाओं को बहकाते-दहकाते ग्लोबलाइज्ड समाज में यही, शायद यही हो सकता था. यह त्रासदी नहीं तो और क्या है?

अगर मिथकों पर रत्ती भर भी यकीन करें तो मानना होगा कि भारत शांतनु और ययाति का देश है. स्मरण है कि कमसिन कायालोलुप राजाओं की वासना की वासना को सैद्धांतिक आधार प्रदान करने के लिए लोभी शास्त्रकारों ने सोलह की उम्र को अक्षत सौन्दर्य के भोग का प्रवेशद्वार घोषित कर दिया था. ‘स्वीट सिक्सटीन’ का जूमला तो बहुत बाद की चीज है. आज चिकित्सा विज्ञान सोलह की उम्र को मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण से अपरिपक्व मानता है. सोलह और अठारह में फासला ही कितना है. ‘निःशब्द’ के बहाने से ही सही, यहाँ यह कहना होगा कि अठारह वर्षीय युवती के लिए साठ वर्ष के पुरुष के मन में उमड़ा प्रेम उस कंगन की तरह होता है, जिसके सहारे वह पंचतंत्र के बूढ़े शेर की तरह अपने शिकार को फंसाने की कोशिश करता है. मीडिया और जूली को मटुक जी भी ‘निःशब्द’ के नायक की तरह अपने दाम्पत्य-जीवन को असफल बताते हैं. यहाँ उनसे यह पूछना दिलचस्प होगा कि जूलिगिरी उनकी आदत तो नहीं.

‘सठियाना’ एक फब्ती भर नहीं है. बढ़ती उम्र के लोगों की रक्त-नलिकाएं संकरी हो जाती हैं, इस कारन मस्तिष्क में रक्त-संचार कम हो जाता है. कभी-कभी मस्तिष्क में फैली रक्त-नलिकाओं में थक्का बन जाता है और मस्तिष्क के किसी ख़ास हिस्से को रक्त मिलना बंद हो जाता है. अगर यह दुर्घटना मस्तिष्क के ‘फ्रंटल लोब’ नामका हिस्से में घटित होती है, तो ग्रसित व्यक्ति वर्जनाहीन/अनैतिक व्यवहार कर सकता है. ‘जूलियों’ को ‘मटुकों’ से प्यार करने के पहले उनके मस्तिष्क का सीटी स्कैन कराकर देख लेना चाहिए कि ‘फ्रंटल लोब’ सिकुड़ तो नहीं रहा. सनद रहे की छाती में धडकने वाला दिल एक पम्पिंग सेट-भर है, वह दिल जो भावनाओं का केंद्र है, उसका निवास मस्तिष्क में ही होता है.

…साठ और अठारह का अंतराल सिर्फ उम्र का अंतराल नहीं होता, यह उर्जा, क्षमता और भविष्य का अंतराल भी होता है. टेस्टोस्टेरोन नामक पुरुष हार्मोन पच्चीस वर्ष में अपने शिखर पर होता है जबकि साठ वर्ष की उम्र में घाटी में घसीटता दीखता है. प्लैटोनिक प्रेम तो हार्मोन के मदद के बगैर भी शिखर पर पहुँच सकता है, मगर प्लैटोनिक फेज ख़त्म होने के बाद क्या- क्या होगा- यह भी सोचना चाहिए. अब आयें भविष्य पर.

अठारह की उम्र के भविष्य का अर्थ है सुबह के आठ आठ बजे और साठ का समय है शाम के पांच बजे. साठ वाला डूब जाएगा अठारह वाली के दिन कैसे कटेंगें! इसे भी सोचा जाना चाहिए!

vinay kumar

डॉ. विनय कुमार मनोवेद माइंड हॉस्पिटल, पटना में मनोचिकित्सक हैं.  हिंदी साहित्य से लेकर साहित्येत्तर सांस्कृतिक रुचियों तक को बहुत नजदीक से परखते हैं. नॉन फिक्शनल हिंदी की अकाल वेला में अद्भुत चमक के अधिकारी हैं. हाल ही आई पुस्तक ‘एक मनोचिकित्सक के नोट्स’ से खासे चर्चित. उनसे dr.vinaykr@gmail.com पर संपर्क संभव है. 

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