Om-Dar- Ba-Dar: Excerpts Of Original Script

८०९० के दशक में सिनेमा की मुख्या धारा और सामानांतर सिनेमा से अलग भी एक धारा का एक अपना रसूख़ थायह अलग बात है कि तब इसका बोलबाला अकादमिक दायरों में  ही ज्यादा था। मणि कौलकुमार साहनी के साथसाथ कमल स्वरुप इस धारा के प्रतिनिधि फ़िल्मकार थे।  वैकल्पिक और सामाजिकसंचार साधनों और डिजिटल के इस जमाने में ये निर्देशक फिर से प्रासंगिक हो उठे हैं। संघर्षशील युवाओं के बीच गजब की लोकप्रियता हासिल करने वाले कमल  स्वरूप की  कल्ट फिल्म  ओम दर बदर इधर फिर से जी उठी हैं। अभी हाल ही में एनएफडीसी  ने  इसे डिजिटली  संरक्षित कर एक  एक बड़ा काम किया है। यह कदम एक महान फिल्म को जीवनदान देने जैसा है।  डिजिटली संरक्षित होते ही इसने अपने कमाल दिखाने शुरू कर दिये हैं। पीवीआर ने  इसे  17 जनवरी, 2014 से  पूरे देश में  प्रदर्शित करने  का फैसला किया है।  

आज व्यावसायीक और तथाकथिक सामानांतर फिल्मों का भेद जब अपनी समाप्ति के कगार पर पहुँच चुका हैतब कमल स्वरूप और इनकी कल्ट फिल्म  ओम दर बदर  की विगत महत्ता और योगदान पुनर्समीक्षा की मांग करता है।  इसी कड़ी में यहाँ  ‘ओम दर बदर ‘ की मूल पटकथा के कुछ हिस्से आपसे साझा किया जा रहा है। 

ओम दर बदर पोस्टर

ओम दर बदर पोस्टर

सीन नं. 28: इन्टीरियर/एक्सटीरियर:

                बाबूजी का ग़रीब घर/गली, सुबह  बारिश की पहली हवा  बाबूजी, गायत्री,   छोटा ओम।

                {आंगन में गायत्री पंखों के सामने बैठकर बाल सुखा रही थी। -फिर गंघी करने लगी। बाल झटकी – आइने के सामने खड़ी होकर सफेद बाल ढूंढने लगी। तोड़कर अंगुली में लपेटा – आंगन में फेंका तो धूप आई – जाकर धूप में खड़ी हुई।}

                {अपने कमरे में बाबूजी खाट पर अख़बार ओढ़े सो रहे थे। दीवार पर एक छिपकली थी।}

गायत्री: ओम ! स्कूल कब जायेगा?

                {ओम अंदर कमरे में बैठा भूगोल के नक्शे में बनी नदी में रंग भर रहा था।

ओम: छुट्टी है।

                {गायत्री का कंघी करता हुआ हाथ रुक गया}

गायत्री: क्यों ?

ओम: बरसात होगी।

गायत्री: क्यों ?

ओम: तू कंघी जो कर रही है।

                {बरसात के पहले वाली हवा चली। कैलेन्डर फड़फड़ाने लगे। बाबूजी की बनाई जन्म-पत्रियाँ हवा में उड़ीं। हवा का रुका हुआ झोंका छूट कर उथल-पुथल मचाने लगा। गायत्री – समेटने लगी।

 

सीन नं. 29: एक्सटीरियर:

                {शहर में तूफान के पहले वाला अंधड़ा छाया। साइकिलें हवा में उड़ीं। पेड़ उखड़े। सड़क पर पागल औरत हँसने लगी।}

सीन नं. 30: 28 के समान।

                {ओम शान से आसमान की तरफ देख रहा था। आसमान गरजा तो दीवार की छिपकली बाबूजी के मुंह पर रखे अख़बार पर गिरी। बुरी ख़बरें थीं। बाबूजी डरकर उठ बैठे। पांव में जूते पहले से पहने हुए थे। हाथ बनाई छोटी प्रश्न कुंडलियां हवा में उड़ रही थीं। एक ख़ास चीज़ ढूंढने लगे। अलमारी, तकिये सब छान मारे। आंगन में कुंडलियों के दो राकेट बने हुए थे। खोलकर देखा।

बाबूजी: ओम, तू कमरे में आया था।

ओम: न। 

बाबूजी: तो रॉकेट कौन उड़ा रहा था।

ओम: रूस और अमेरिका।

बाबूजी: गायत्री, दो कुंडलियां नहीं मिल रहीं, हवा में तो नहीं उड़ीं।

                {गुलशन नंदा के उपन्यास में रखी कुंडलियां निकालकर बाबूजी को दी}

गायत्री: मैं पढ़ रही थी।

बाबूजी:     तीस की बीस कर रहा हूं। एक साल के दस मिलेंगे। ख़िज़ाब है।

गायत्री: छि: ! घुट घुट के मरेगी वो। -मेरे भी तो बाल सफेद हो रहे हैं।

बाबूजी: तो चली जा जहां तू समझती है हमेशा: जि़न्दा रहेगी।

                {गायत्री अपमानित होकर अपनी खटिया के किनारे पर जा बैठी। दरवाज़े से गली दिखती थी। वो बाहर गली में निकली। कुछ दूर पहुंचते ही बारिश की पहली बौछार गिरी। बचने को भागी।}

सीन नं. 31: एक्सटीरियर:

                झील में नौका विहार, चांदनी रात, ठंड,   लाल रूमाल डाले आवारा     छोरा और हिप्पन छोरी।

                {लाल रूमाल और काला चश्मा पहने आवारा छोरा और हिप्पन छोरी नाव चला रहे थे}

छोरा: जानती हो प्यार किसे कहते हैं: {ल व्ह} एल.ओ.वी.ई.! लव, लेक ऑफ सॉरो- ओ, ओसियन ऑफ़ टीयर्स- वी, वैली ऑफ डैथ- ई, एण्ड आफ लाईफ। प्यार कोई बाजारू – चीज़ नहीं है जो अमेरिका में बिके।

                {नाव दूर जाकर पानी में डूब गई}

सीन नं. 32: इन्टीरियर/एक्सटीरियर:

                पिक्चर हाल, दिन, बारि गायत्री, जगदीश, दर्शक

                {अन्धेरी में गायत्री को लगा कई जन उसे घूर रहे हैं। जगदीष की नजर की पकड़। जगदीष पर्दे की ओर देखने लगा। वो भी अकेला था। पिक्चर छूटी। भीड़ दरवाजे की तरफ बढ़ने लगी। जगदीश सामने खड़ा था – हकला कर बोला – ‘‘आई लव यू’’ और तेज़ी से पलटकर भागा। गायत्री हक्की बक्की रह गई। भीड़ दरवाज़े के बाहर छूटी तो सीढि़यां उतरते हुए, फुल साइज़ मिरर में अपने को कइयों के बीच अकेला पाई।

सीन नं. 33: एक्सटीरियर:

                सुनसान सड़क, बारि के बाद दोपहर, जगदीश,  गायत्री, ऑटोरिक्शा

                {बारिश के बाद सड़क के दोनों ओर पेड़ धूप में सूख रहे थे। गायत्री अकेली, उदास घर की ओर जा रही थी एक ऑटोरिक्शा कान के पास से सनसनाता हुआ गुजर गया। छाती पर हाथ गया तो चुन्नी गायब।}

          ऑटोरिक्शा – कुश्ती लड़ेगी…….

                { ऑटोरिक्शा के बाहर लाल चुन्नी हवा में लहराई}

                इसके पहले कि चुन्नी जमीन पर गिरती, जगदीश ने साईकल पर बैठे-बैठे चुन्नी को नीचे गिरने से बचा लिया। साईकल पर बैठे-बैठे चुन्नी गायत्री को लौटाई।

जगदीश: आई एम सॉरी। पर कुसूर आपका भी है।

गायत्री: अकेली थी इसलिये।

जगदीश: अकेला मैं भी हूँ।

                {कुछ दूर तक दोनों के बीच तनाव बना रहा। जगदीश ने चुनौती देकर पूछा}

जगदीश: उचक कर कैरियर पर चढ़ सकती हैं आप। लिफ्ट दे रहा हूँ।

                {गायत्री उचक कर बैठ गई। जगदीश के हाथों में हैंडल कांपा। गायत्री मुस्कुराई। साईकल डबल बोझ से चरमरा कर चली।}

सीन नं. 34: एक्सटीरियर:

                बाबूजी के घर की छत और गली, शाम बारि के बाद, जगदीश और गायत्री

                {जगदीश ने गायत्री को घर के बाहर उतारा।}

जगदीश: माय सेल्फ जगदीश, फराम झुमरी तलैया।

                {गायत्री ने छत से जगदीश को जाते हुए देखा जगदीश सामने से आती हुई साईकिल से टकरा कर गिर पड़ा। गायत्री खिलखिलाती हुई सीढि़यों से आंगन में उतरी। ठोकर लगी। वहीं बैठकर सोच में डूब गई।

सीन नं. 35: इन्टीरियर/एक्सटीरियर:

                बाबूजी का घरपिछवाड़े की गली, दोपहर बारिके बाद, जगदीश,  गायत्री

                {गायत्री ने रेडियो पर स्टेशन ढूंढा,  फिर मोढ़े पर बैठ कर आंगन में गायत्री मशीन वाली सुई से कपड़े पर तोता बना रही थी। सामने गली से धोबी अपने गधे के साथ गुजरा। फिर पोस्ट मैन आया।

पोस्टमैन: गायत्री संकर केयर आफ बी संकर-

                {चिट्ठी खोल कर पढ़ने ही वाली थी कि रेडियो पर अपना नाम सुना।}

रेडियो प्रोग्राम:

          और ये खत है इस प्रोग्राम को बेहद चाहने वाले, झुमरी तलैया के जगदीश साहब का – लिखा है कि आज से झुमरी तलैया की बजाय उन्हें अजमेर का माना जाये – लीजिये मान लिया – जगदीष साहब आपने पता तो बदल लिया लेकन आपका मनपसंद गीत पिछले आठ साल से नहीं बदला- आपका फरमाइशी गीत हाजिर है- और हमेशा की तरह इसी गाने को सुनना चाहते हैं- अजमेर से ही जगदीश, गायत्री, ओम, टिंकू, झिंकू, पिंकी, डॉली और उनके मम्मी डैडी-

                {गाना शुरू हुआ। गायत्री ने चिट्ठी पढ़ी}

चिट्ठी: आवाज़ की दुनिया के दोस्तों। मैंने कभी ख्वाब में भी नहीं सोचा था कि फरमाइशी प्रोग्राम में मेरे नाम के साथ जुड़ी लड़की पिक्चर हॉल में मिलेगी। क्या पता इन फरमाइशी प्रोग्राम में जुड़े नामों का सम्बन्ध जन्म-जनमान्तर का हो। कहां मैं झुमरी तलैया और तुम अजमेर….खिड़की खोलो तो मैं दिखूं…………।

                {गायत्री ने खिड़की खोली तो दिल धड़का। नाले के उस पार जगदीश साईकिल की घंटी बजाकर हंस रहा था। गायत्री खिड़की की ओट में हो ली। चिट्ठी को आगे पढ़ा।

चिट्ठी: मेरी साईकिल का ख्याल रखना

                                                तुम्हारा जे.

                {फिर से खिड़की से झांका तो केवल साईकिल खड़ी थी। गायत्री खिड़की से साईकिल का ख्याल रखने लगी।}

कमल स्वरूप

कमल स्वरूप

कमल स्वरुप फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टिट्यूट पुणे के1974 के स्नातक हैं। घासीराम कोतवाल(1976),अरविन्द देसाई की अजीब दास्तान (1978), गाँधी(1982), सलीम लंगड़े पर मत रो (1989),सिद्धेश्वरी (1989)जैसी फिल्मों में सहायक निर्देशकसंवाद लेखकप्रोडक्शन डिजाइनर और शोधार्थी के बतौर इनका रचनात्मक सहयोग रहा है। बतौर निर्देशकनिर्माता कमल स्वरुप ने अभी तक सिर्फ एक फिल्म बनाई है– ओम दर बदर(1988), भारतीय उपमहाद्वीप में अपनी तरह की एक मात्र कल्ट फिल्मफिल्म फेयर पुरस्कार से पुरस्कृत। ओम दर बदर के अलावे कुछ डाक्यूमेंटरी फिल्में भी।  दादा साहेब फाल्के और भारतीय फिल्मइतिहास  के अद्भुत अध्य्येता। दादा साहब फाल्के का महावृतांत  ‘ट्रेसिंग  फाल्के ‘ के नाम से प्रकाशित । इसी साल दादा साहेब फाल्के  रचित एक नाटक  से प्रेरित  डॉक्यूड्रामा  ‘रंगभूमि ‘ का निर्माण।    

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