अब्बा (बांग्ला कहानी): नवारुण भट्टाचार्य, अनुवाद- मिता दास

नवारुण की इस कहानी को पढ़ते हुए स्पैनिश के महान साहित्यकार रोबर्टो बोलानो का एक कथन याद आता है.  किसी दोस्त ने उनके एक अप्रकाशित उपन्यास के बारे में पूछा – उसमें बच्चा मरता है कि नहीं! बोलानो का उत्तर था -किसी भी लेखक को अपनी किताब में बच्चों की हत्या नहीं करनी चाहिए. नवारुण की बेवाकी, गद्य के साथ बर्ताव, हाशिए की जिन्दगी से जो लगाव है, और यह सब जब एक सहजता के अनौपचारिक शिल्प में ढलता है तो रोबर्टो बोलानो का याद आना लाजिमी हो जाता है. खैर, पढ़िए यह कहानी.

By Banksy

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By नवारुण भट्टाचार्य

जिन लोगों ने दंगा किया उनमें सदाशिव भी शामिल था यह कहना ठीक नहीं होगा, और नहीं था यह भी कैसे कह सकते हैं। ऑफिस के लोग, उनकी बीवियां भी, तो गाड़ी में चढ़कर दुकान लूटने गए थे। क्या पुलिस ने दंगा नहीं करवाया? और वहीं हो गया झमेला। किसने किया और किसने नहीं किया उनको ढूंढना-छांटना बड़ा ही दुश्कर हो उठा था। पर हां, दंगेबाजों में सदाशिव को पकड़ लिए जाने पर भी यह मानना ही पड़ेगा कि वह ऐवेंइ (यूं ही) है।

 कुछ माह पहले अन्य पड़ोसियों की देखा-देखी वह भी कहीं से एक त्रिशूल उठा लाया था घर, तब सदाशिव की मां ने कहा, क्या करेगा इसे लेकर? झगड़ा-झंझट होगा तो सभी लोग दल के संग मिलकर चूहा मारने जाएंगे। तो तू क्या करेगा? मैं भी जाऊंगा। सदाशिव की मां तब और भी कई बातें करना चाहती थी, बात जबान पर आ चुकी थी पर सदाशिव ने कितनी देशी पी रखी थी वह समझ ही नहीं पाई इस वजह से उसने बात आगे ही नहीं बढ़ाई।

सदाशिव की एक टांग जरा पतली और थोड़ी टेढ़ी थी। वैसे वह बहुत दुबला और ठिगना भी था। जैसा भी हो, उस शाम को रोटी और पानी पी कर सदाशिव सो गया था तब उसकी मां ने त्रिशूल को हिलाडुला कर देखा, तो देखती क्या है कि यह तो बिलकुल ही फालतू माल है। सोते हुए सदाशिव की जेब से मां ने एक सिगरेट का पैकेट निकला जिसमें कुछ कटोरियों के अलावा अधजली बीड़ी और दो साबुत बीड़ी मिली। एक बीड़ी सुलगा ली थी सदाशिव की मां ने।

सोने और न सोने के बीच सदाशिव की मां को दूर से एक आवाज लय में सुनाई देती। कहीं तो… इस घनी रात में मीटिंग हो रही है। चिल्ला-चिल्लाकर कोई तो भाषण दे रहा है। इतनी रात में भी भला कोई मीटिंग करता है? सुनने वाला कोई रहता है क्या भला? असल में वह कोई मीटिंग थी ही नहीं। चौरस्ते के मोड़ पर एक सफेद एम्बेसेडर कार खड़ी थी और उसके पिछले दरवाजे को खोल दो माइक के चोंगे बाहर निकल आए थे, और भाषण बज रहा था एक कैसेट में। और जो लोग इसे बजा रहे थे वे लोग नीची आवाज में आपस में बातें कर रहे थे और साथ-साथ पान मसाला खा रहे थे। उनमें से एक ने सफारी सूट पहना था बाकी के तीनों ने पजामा-कुरता पहन रखा था।

ड्राइवर फुटपाथ पर बैठा ऊंघ रहा था, इससे पहले भी उन्होंने तीन और मुहल्लों में गाड़ी रोककर भाषण बजाया था। सभी जगह आधे-आधे घंटे तक यही कैसेट बज रहा था। अभी और भी दो मुहल्लों में उसे यही भाषण आधे-आधे घंटे और बजाना है। कैसेट को एक स्टूडियो में तैयार किया गया था, एक दम पेशेवरों के कायदे सरीखा। कहीं-कहीं आवेग की खातिर वाद्य यंत्र भी बज उठता, कहीं-कहीं आर्तनाद और कभी-कभी विद्रूप का स्वर तीव्र हो उठता हंसी का एक शोर भी। जब यह भाषण चल रहा था एक पुलिस वैन चक्कर मार कर चली गई। सफारी सूट पहने व्यक्ति ने उस वक्त आकाश की तरफ मुंह उठाकर एक पान मसाले का पूरा पैकेट निगल लिया।

सदाशिव ने सोचा था शराब से काफी नशा चढ़ेगा, घर पर ही बैठकर आधी बोतल गटक गया था। सिर्फ पचास ही रुपए मां को पकड़ाए थे और बाकी के ढाई सौ अपने पास रख लिए थे। इनसे काफी दिन उसका काम चल ही जाएगा। इस बीच शंकर, कांजी, भाजो सभी दल-सा बना कर आए और सदाशिव को खींचकर बाहर निकाला। दल बनाकर सभी ट्रक पर चढ़ कर गए, डाई किया हुआ गैस सिलिंडर लेकर। उनके संग थी तलवार, रॉड, छुरी, सींक, एसिड और पेट्रोल बम। सदाशिव ने कमरे के कोने में टिकाया हुआ त्रिशूल उठा लिया। गंदे पजामे की डोर (नाड़ा) कसकर बांध ली और फिर उसे मोड़कर ऊपर उठा लिया एवं इस बीच सदाशिव कोई बात नहीं करता है बस सिर्फ धुनकी में अनर्थक चीत्कार कर उठता था।

यह मिजाज मगर काफी संक्रामक था। और भी अनेक जिनके बदन उसके जैसे ही पतले दुबले, उठाईगिरे की तरह जो किसी भी तरफ के नहीं होते बस चीख उठते हैं अकारण ही। सदाशिव जैसे सभी उस वक्त एक-एक जोश-मशीन थे। आंनदी मुखड़े वाला यह गैंग कुछ दूर जा दाएं ही मोड़ पर ठिठक गया था। मैला टी-शर्ट और बदरंग-सा ट्रैक सूट जिसे उलटकर पहने हुआ था। चेहरा सिनेमा के फटे पोस्टर के टुकड़े से ढंका हुआ और उस पर रख दी गई थी एक पूरी ईंट। इसलिए कि अगर जोर की हवा चले भी तो पोस्टर उड़कर उसके कुचले चेहरे को बेनकाब न कर दे। भाजो ने मृत देह की पेंट के जेब में हाथ डाल कर एक रुमाल जैसा ही कोई कपड़े का टुकड़ा निकाल कर फेंक दिया।

कुछ देर चुप रहने के बाद फिर वे चलने लगे, लंगड़ा होने के कारन सदाशिव पिछड़ रहा था, सामने से एक ट्रक आया। ड्राइवर की सीट की ऊपरी छत में जो लोग सर ऊंचा किए बैठे थे उनके हाथों में तलवार, बरछा लिए उन्मत्त नाचते और बदला लेने के स्लोगन सुर मिलकर गा रहे थे। ट्रक के भीतर अलमारी, रैक, सुलाकर रखा गया रेफ्रिजरेटर, टीवी, सूटकेस बर्तन-भांडे, परदे, स्कूटर, आईना, राॅड आइरन से बनी चेयर रखी थी। ट्रक को आते देख सदाशिव और अन्य लोग रास्ते के दोनों किनारे होकर उसके लिए जगह बना देते हैं। ट्रक गति बढ़ा देता है। सदाशिव का दल एक बार फिर जोर से जय जयकार कर उठा, और दौड़ने भी लगा। सदाशिव नहीं दौड़ता, इसलिए पीछे रह जाता। तब वह त्रिशूल अपनी लाठी बना लेता है। रास्ते में ढंग-ढंग की आवाजें आनी शुरू हो जाती हैं।

सदाशिव उनके पीछे-पीछे जब रीगल के गेट पर पहुंचा तो देखता है कि वे लोग बाहर ही खड़े हैं जिन्होंने आग लगाई थी, जिन्होंने खून किया था और बलात्कार भी उन्होंने ही किया था पर अब उन लुटेरे लोगों को घुसने ही नहीं दिया जा रहा है और बाउंड्री वाल के भीतर दो फ्लैट जल रहे हैं धू-धूकर। आग के लपटों के बीच टूटने-फूटने की आवाज, दरवाजों का टूटना। खिड़कियों का पल्ला खुलकर ग्रिल से अलग हो गया। सदाशिव कुछ देर खड़े रहकर देखता रहा आग का तांडव और धुएं का गोल-गोल हो ऊपर को उठना। अंदर एक गाड़ी में आग भी लगी हुई थी। इस अपार्टमेंट में वह एक बार ही आया था। पीछे की ओर थोड़ी-सी खुली जमीन है वहीं के झाड़-जंगल काटने का काम मिला था भाग्येश को और वह उसी के संग यहां आया था। पीछे एक गेट भी था, वहीं काम करने वालों के लिए एस्बेस्टस लगी छत वाले लगे-लगे तीन कमरे थे। लगता है वहां उतनी लूटपाट नहीं मची, पीछे के गेट से वहां जाने पर शायद कुछ मिल ही जाए?

भूल की थी सदाशिव ने, इधर मांस जलने की बू आ रही थी, तोड़-फोड़ भी हुई थी। पुराने टायर को जलाकर मृत देह में आग लगाई गई थी, चप्पल उलटी पड़ी थी। गेट भी खुला था। शायद कुछ लोग इस ओर से भाग खड़े हुए थे। भीतर आग जल रही थी और अधजला कैलेंडर भी दिख रहा था। दरवाजे से चेहरा घुसाकर देखा था सदाशिव ने, गरम लावे जैसा था भीतर। दरवाजा टूटकर गिर गया था और उसके नीचे से एक हाथ बाहर की ओर निकल आया था। भीतर घुस कर अगर कुछ हिलाया-डुलाया जाए तो शायद कुछ मिल भी सकता है पर साहस नहीं कर पाया सदाशिव।

उसी वक्त भीतर से डरकर सांस लेने की या सांस रोकने की कोशिश करने की अस्वाभाविक आवाज से डरकर पीछे पलट कर सदाशिव ने देखा था। नहीं, कोई भी नहीं है। कुछ नहीं सिर्फ दूरी पर घर जलने की अजब-सी आवाज भर थी। शाम का उजाला रोज ही की तरह कम हो रहा था। अब लगता है कुछ और जलने को बाकी नहीं बचा था। किन्तु सदाशिव ने जो आवाज सुनी थी क्या वह गलत थी? थोड़ा डर भी लग रहा था सदाशिव को। तभी सदाशिव त्रिशूल हाथ में लिए बोल उठा था- कौन?

कोई जवाब नहीं मिला।

…कोई है? इसका भी जवाब नहीं आता। शरीर थर-थर कांपने लगा सदाशिव का। त्रिशूल को वह अच्छी तरह से जकड़ लिया। सदाशिव एक बारगी सोच बैठा कि उसने वो आवाज गलत सुनी थी। किन्तु क्या वह गलत था! दरवाजे के नीचे से जो एक हाथ बाहर निकला दिखाई दे रहा था क्या वह जीवित है? कराह रहा है? पर दरवाजे को हटाना उसके बस की बात नहीं।

सावधान! मेरे हाथ में किन्तु त्रिशूल है, छेद डालूंगा!

इस पर भी कोई आवाज वापस नहीं आई। दिन के वक्त का उजाला खत्म होने को था और सदाशिव ने महसूस किया कि सब कुछ कैसे जीवंत हो उठा। अंधकार घिरने से पहले सब कुछ कैसे हिल-डुलकर स्पष्ट हो उठता है। कुछ ही दूरी पर जमीन के ही ऊंचाई का एक चहबच्चा (जमा पानी) था। सदाशिव ने त्रिशूल को बरछे की तरह ऊंचा उठा लिया और चहबच्चे की ओर बढ़ा, सिर्फ काई का ही दाग दिखा, पानी नहीं के बराबर। उसके अंदर एक कोने से पीठ टिकाए, कच्छा पहने हुए एक छोटा-सा लड़का, सर मुंडा हुआ और सर पर फोड़ा, बच्चा सदाशिव को देख कर उठ खड़ा हुआ। सदाशिव त्रिशूल को ऊंचाकर खड़ा हो गया जैसे वह त्रिशूल घोंप देगा अभी, बच्चा चुपचाप-सा खड़ा था।

सदाशिव को देख उसका मुंह खुला का खुला रह गया। एक लम्हे के गुजर जाने के बाद सदाशिव का खुद ब खुद त्रिशूल वाला हाथ नीचे हो गया। उजाला भी अब सिमट चुका था। वह समझ चुका था की सदाशिव उसे नहीं मारेगा। और अगर मारेगा भी तो इस वक्त तो बिलकुल भी नहीं। वह वापस बैठ गया, कच्छा फिर भीगने लगा। सदाशिव भी समझ गया कि वह अब बच्चे को नहीं मार पाएगा। नशा कब का हिरन हो चुका था। अबकी सदाशिव त्रिशूल रखकर पसर गया था। सदाशिव ने एक बीड़ी सुलगा ली। उसने सोच लिया की वह बीड़ी पीकर उठेगा और चला जाएगा। अगर बच्चे को नहीं मार पाया तो कम से कम चहबच्चे के पानी में ज्वलंत बीड़ी का आखरी टुकड़ा फेंक ही सकता है।

 पर सदाशिव ने देखा कि जितनी देर वह बीड़ी के कश ले रहा था और उस बच्चे के बारे में सोच रहा था। वह बच्चा अब धीरे-धीरे उसके भीतर घर करने लगा था। जरूरत क्या है… उसके बारे में सोचने की? कितने ही तो रोज मर रहे हैं? और उधर देखो दरवाजे के नीचे से किस तरह एक हाथ बाहर निकल आया है। शायद कोई जल रहा हो, और वे जो भाग खड़े हुए हैं शायद उन्हें भी यहीं- कहीं आस पास के रास्तों में ही पकड़ लिया गया हो।

 फिर से झमेले में फंस गया सदाशिव, पर बच्चे को मृत लोगों की कतार में नहीं रख पा रहा था। अगर वह लंगड़ाते हुए बाहर निकल कर चला भी जाए तो कोई कुछ कहने वाला भी नहीं। किन्तु सदाशिव के चले जाने के बाद और भी अंधेरा बढ़ जाएगा और वह बच्चा भीगी ईंटों के बीच चहबच्चे में गीला ही बैठा रहेगा। कब तक…? क्या उठ कर बाहर आएगा…? पता नहीं कर पाया सदाशिव, पर उसने एक बात अच्छी तरह से जान ली थी कि जो लोग बाहर इंतजार कर रहे हैं- उन्हें यह बच्चा नहीं मिलेगा। दिन का उजाला खत्म हो जाएगा। चहबच्चे के भीतर अंधेरा, तसले में सड़ा हुआ पानी और भीतर कोने में सिमट कर सर में फोड़े वाला बच्चा…।

-ऐ! उठकर आ! अंधकार कोई जवाब नहीं देता।

मैं कुछ नहीं करूंगा। डर मत! उठकर आ।

अंधकार में पानी कुछ हिल उठता है।

हाथ को पकड़! पकड़ कर बाहर आ।

छोटे से हाथ ने सदाशिव के हाथ को थाम लिया। सदाशिव ने बच्चे को हाथ पकड़ कर बाहर निकल लिया। और फिर उसके गले को, हड्डियों को, धुकधुक करते हृदय को, छाती, कमर, पैर सब को हाथों से झाड़ कर देखने लगा। पहने हुए कच्छे से पानी टपक रहा था पैरों से होकर, हवा लगने से बच्चे को ठंड लग रही थी, वह कांप रहा था। सदाशिव को छोटे-छोटे दांतों की किटकिट सुनाई देती है। वह बच्चे को सीने से लगा लेता है। खुद के हाथों से उसके बदन को सहलाते हुए सेंकता है। बच्चा उसकी छाती में अंधकार में अंधकार बन बैठा रहता है। धुकपुक-धुकपुक करता रहता है दिल। बच्चा जोर-जोर से सांस लेता है और फिर सिमट जाता है। सदाशिव जोर से उसे जकड़ लेता है। छोटी-छोटी उंगलियां, छोटे-छोटे नाखून सदाशिव महसूस करता है। वह उसे नोंचता है और फिर थककर अलग हो जाता है।

 सदाशिव का बायां पैर पतला-सा है और लंगघता भी है। वह अपने दाएं कंधे पर बच्चे को लादकर बाएं हाथ में त्रिशूल पकड़े हुए अंधेरे में ही पीछे के गेट से बाहर आ जाता है। अब एक ट्रक उसे लगा कि गेट पर आया हुआ है। वहीं सब भीड़ बनाकर खड़े हैं। लगता है और भी माल लादा जाएगा या फिर लाश। गले रेते हुए औरतें या नोंचकर या बींधकर मारे हुए पुरुष। शायद उन्होंने सदाशिव को ज्यादा तवज्जो नहीं दी। या फिर त्रिशूल ने ही उनकी नजर को बांध लिया था।

 घर में अंधेरा उतर आया था, पता नहीं कितना बजा होगा उस वक्त घर पर, आग बुझ चुकी थी। तभी बेसमेंट या किचन में या किसी कोने में प्रचंड आवाज के साथ विस्फोट हुआ और एक गैस सिलिण्डर फट गया। सब हड़बड़ा उठे, सदाशिव भी। बच्चा भी चैंक उठा। आग की झलक देख डर से ताक रहा था और चीखा सहमकर।बड़बड़ाया- अब्बा!

उन्होंने भी चीख सुनी थी।

साभार- समकालीन जनमत, दिसंबर, 2014 

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