चॉकलेटी समय में एक गुलमिर्च: चंदन श्रीवास्तव

दो दिन पहले ही किसी एक अनाम/रहस्मय कथाकार का एक पोस्ट लगाया था- एक मिट्टी दो पौधे: मेघना राव उर्फ गोदावरियम्मा और अमेरिका यादव. इस कथा-अंश को प्राप्त करने की प्रक्रिया के बारे में भी आपको अवगत कराया था. हिंदी का औसत बौद्धिक-समाज (क्रांतिकारी/गैर क्रांतिकारी तमाम) एक अवसरवादी समाज है ,  हमारी इस मान्यता को चन्दन श्रीवास्तव ने ध्वस्त किया है.  उन्होंने बिना इस बात की परवाह किये कि यह रचना किसकी है, किसकी हो सकती , एक बेवाक टिपण्णी भेजी है. हिंदी समाज अब कयास भी लगाने को तैयार नहीं है, उसे किसी का नाम चाहिए ताकि हमारा एक-एक शब्द-वाणी बिना सटीक निशाने के जाया न हो, बिना चापलूसी के तर हुए वापस न आये. हमारा मानना है कि चंदन श्रीवास्तव हिंदी बौद्धिक-वृत्त के उन कुछ चुनिंदा लोगों में से हैं, जिन्होंने अवसरवादी/चेला-चुहुलवादी चकल्लसों के विपरीत अपनी एक नियति तय की है. उनकी आंखें सही अर्थों में पुस्तक पगी हैं,  पुस्तकों से आँखों के पगने का मतलब धूर्त, यारबाजी से तरबतर बौद्धिक ऐय्यारियाँ नहीं होती हैं. चन्दन श्रीवास्तव का लेखन और व्यवहार अक्सर इसे साबित करता है. तिरछीस्पेल्लिंग उनके इस स्टैंड और बौद्धिक त्वरा को लेकर अक्सर आभारी रहेगा. 

ब्रूनो द्यूमों निर्देशित एक धारावाहिक का दृश्य

ब्रूनो द्यूमों निर्देशित एक धारावाहिक का दृश्य

By चंदन श्रीवास्तव 

हिन्दी में साहित्य के स्पेस को पत्रकारिता ने हथिया लिया है। पत्रकारों को कहा जाता है, ऐसी भाषा लिखो कि उसे चबाना नहीं पड़े, मुंह में पड़े और घुल जाये। साहित्यकार से कहा जाता है- पत्रकारों वाली भाषा लिखो क्योंकि पत्रकारिता बढ़ रही है, उस सरीखी भाषा लिखने से साहित्य भी बढ़ेगा, फले-फूलेगा। कुल मिलाकर साहित्य और पत्रकारिता नाम के भाषाई उपक्रम के लिए जोर मुंह में जाते ही घुल जाने वाली भाषा पर होता है..गोया भाषा ना हुई, चॉकलेट हुई!

साहित्य की भाषा पर पड़ते इस दबाव ने साहित्य से विचारशीलता को खत्म किया है.. चॉकलेट तैयार करने की कला खूब परवान चढ़ रही है..ब्लॉग और फेसबुक सरीखे मर्तबान आ गये हैं, चॉकलेट वहां रोज धरे और सजाये जा रहे हैं..इंटरनेट गजब का कारखाना है, चॉकलेट-कर्म में इसने कमाल का इजाफा किया है..

‘तिरछी’ पर लगा यह पोस्ट चॉकलेट चुभलाने की अभ्यस्त होती जा रही हिन्दी की जीभ पर गुलमिर्च रखती है..यह हिन्दी साहित्य के भीतर विचारशीलता की वापसी का उपक्रम है और मजा देखिए कि लेखक ने यह किया है पत्रकारिता(जिन्हें इस शब्द से परहेज है वे यहां मीडिया पढें) की भाषा में ही। सहारा लिया है ईमेल का और सजाया है उसे ब्लॉग के मर्तबान में ही..लेकिन घर में घुसकर, घरऊ बनकर पूरे घर को बदलने की कोशिश है यह…

पहली ही पंक्ति देखिए– “र्स्टेशन शहर के पिछवाड़े है जहां टैक्सी, आटो और रिक्शा स्टैंड है, गांव की तरफ एक छोटा सा बाजार है जहां मिठाई के मर्तबानों, यहां तक की तीखी पकौड़ियों और लोगों के सिरों तक पर गहरे कत्थई हड्डे मंडराते रहते हैं, उन्हें देखते हुए लगता है जैसे भुने हुए चने के दानों को पंख लग गए हों.”

फिलहाल इस एक वाक्य पर सोचें. पोस्ट किए गए कथा-अंश की बनावट में यह वाक्य क्यों महत्वपूर्ण है, इसपर यहां नहीं लिखकर फिलहाल इतना ही सोचना ठीक होगा कि यह एक वाक्य वाक्य चॉकलेटी वृतांतों के विरुद्ध कैसे विचारशीलता को खड़ा करता है, आत्ममुग्ध होने पर विवश करते मीडियाई उपकरणों के बरक्स कैसे आत्म के संघटन का प्रयत्न करता है..

यह वाक्य कुछ-कुछ वैसा ही जैसे कोई कैमरा लेकर चले और पूर्वापर क्रम से ठौर-ठिकानों का भूगोल दिखाये—- शहर..शहर के पिछवाड़े स्टेशन..टैक्सी ऑटो और रिक्शा-स्टैंड… फिर छोटा सा बाजार और बाजार के पार गांव..गांव के संकेत के रुप में बाजार का ठहराव एक दुकान पर..दुकान में मिठाई के मर्तबान..और फिर यहां रंगों का संयोजन— कत्थई हड्डा–भुने हुए चने के दानों को जैसे पंख लगे हों.. और हड्डे का अर्थ विस्तार कुछ ऐसे— ‘तीखी पकौड़ियों पर ही नहीं बल्कि लोगों के सर तक पर मंडराते हैं…’

सिर पर मंडराना एक मुहावरा है- आसन्न खतरे की सूचना..कायदे से हड्डे को मिठाई पर मंडराना था..वह तीखी पकौड़ियों पर ही नहीं बल्कि लोगों के सर पर भी मंडरा रहा है..उसकी शक्ल कैसी है? ऐसी कि जैसे भुने हुए चने को पंख लग गये हैं..एक बार फिर से मुहावरा..(गौर यह भी करें कि मुहावरे झमाके से नहीं, आहिस्ते से आ रहे हैं, बिना किसी पूर्व सूचना के और ऐसा खास मकसद से हो रहा है, लेकिन इस पर अभी नहीं..).

क्या यहां खड़ा हुआ यह पूरा चित्र गांव में समाती जा रही भूख की सूचना है, ग्रामवासिनी भारतमाता की संतानों के क्षुधातुर होते जाने की सूचना..? क्या यह पूरा चित्र इस बात की पेशबन्दी है कि भूख(विपन्नता) से बिलबिलाकर कुछ विप्लवी निकलेंगे(कथा में आया पीलिया का मारा छात्र अमेरिका यादव)?..क्या यह चित्र इस बात की सूचना है कि “रूरल मार्केट को विजिट कर लोगों को कंपनी के उत्पादों से परिचित” कराने का उद्देश्य पूरा करने के लिए “कम्पेन टीम के लड़के रेकी” करके लौट चुके हैं और दरअसल रेकी वाले लड़के और उनसे लगा-बंधा पूरा इंतजाम(प्रबंधन) ही वह हड्डा है जो पूरे रुरल को मार्केट बनाकर उसपर मंडरा रहा है? या, फिर यह चित्र कथा में आगे आने वाले एक और चित्र की सूचना है..इस बात की सूचना कि इदरीस की दुकान पर मेघना राव नाम की एक मिठाई बैठेगी..सौन्दर्य लोलुप पुरुषों का वहां नागिन डांस होगा..मेघना राव नाम की मिठाई पर अमेरिका यादव नाम का हड्डा मंडराएगा, हड्डे के डंक के रुप में एक गोली चलेगी ?

कैमरे से फिल्माने चलेंगे तो परस्पर संबद्ध ये बातें उसकी पकड़ से बाहर निकल जायेंगी..वह एक चित्र-परिवेश खड़ा करके इतनी बातों को बांध नहीं सकता..कुछ चीजों को सिर्फ कलम पकड़ सकती है। मतलब, पहला काम तो लेखक ने छपे हुए शब्द की स्वायत्तता के कोण से किया। चलंत-चित्र की भाषा के दबदबे के आगे झुका नहीं, छवियां बनायी जरुर मगर उतनी और वैसी ही जितनी और जैसे से वह अपना मनचीता अर्थ-आग्रह खड़ा कर सके.

छवि छुपाती है। एक ऐसे दौर में जब सारा कुछ HD फार्मेट में देखा जा रहा..जिस दौर की सबसे बड़ी समस्या चेहरे के पिम्पल्स हैं, जहां जोर ‘स्कॉर’ छुपाने और अपने भीतर के ‘स्टार’ को दिखाने पर है..(एक विज्ञापन में लड़की कहती है, प्लीज मेरे पिक्स अपलोड मत करना, लड़की हाई डिफिनिशन और मेगापिक्सल की ताकत जानती है) .. जब सबकुछ माइक्रोस्कोपिक डेप्थ और टेलिस्कोपिक लेंग्थ में दिखाया जा रहा है ताकि आपकी आंखों से छुपाने के लिए कुछ भी ना रहे( एक विज्ञापन की लाइन है—‘जब छुपाने के लिए कुछ भी नहीं’) , तब भी बहुत कुछ छुपा हुआ है, छुपाया जा रहा है और यह छुपाना अपने आप में आपराधिक है—- दूसरा काम लेखक ने यह खोजने- दिखाने का किया है। जो चीजें इतनी ज्यादा नजर आती हैं कि फिर उनके भीतर का चौंकाऊपन चूक जाता है और ठीक इसी कारण कारण दृश्य बनने की उनके भीतर योग्यता तक नहीं रह जाती, लेखक ने ऐसी चीजों को दृश्यमान किया है, उन्हें चौंकाऊ बनाया है, कह लें जिसे मुर्दा मान लिया गया था उसे जिन्दा किया है। ऐसी चीजों पर छपे निशानों को खोजा है लेखक ने।

यह काम कथा के पहले वाक्य से शुरु हो जाता है.और लगातार चलता है.(इसकी एक चुभती हुई मिसाल है वह पंक्ति जो ‘मिस नार्थ ऑफ फन रिपब्लिक’ प्रतियोगिता के बारे में एक पात्र के जबान से फिसलती है– “गलत है, सरे नौ से गलत भाईजान, इतनी दूर से ककड़ी की बतिया जैसी लड़कियों के रोएं दिखाई दे रहे हैं, वे ठीक से जवान नहीं हो पाई हैं, जरूर उनके वालिदैन ने उमर का गलत सर्टिफिकेट दिया होगा.”)

चीजों को गौर से देखिए, उसपर सिर्फ अपने समय की ही छाप नहीं होती बल्कि अपने समय के छाप के विरोध में भी एक छाप होती है. चीजें अपने स्वभाव के विरुद्ध होने से इनकार करती हैं. शायद यह बताने की कथा-युक्ति है यह।

लेकिन अभी इतना ही… क्योंकि शायद यह कथा किसी भावी उपन्यास का अंशमात्र है

(पुनश्च—सरसरी निगाह से पढ़ा तो भी यह अटका कि कुछ वाक्य विचार का बोझ नहीं संभाल पाये हैं, सो विचार-भार से उनका व्याकरण लचक रहा है. कहीं-कहीं अगले वाक्य में जाने की हड़बड़ी है. इस फेर में अर्थ का संघनन बाधित हो रहा है. मैं मानकर चल रहा हूं, कथाकार कथा कहने का उस्ताद है और पत्रकारिता के अदब में खूब गहरे पगा हुआ, सो, वह अपने इदरीस भाई की कैंची लेकर जरुरी कतर ब्यौंत करके फाइनल प्रिन्ट मंजर-ए-आम करेगा. रफ कट देखकर फिलहाल के चलन के हिसाब से यह फिल्मी गाना याद आ रहा– जब रात है ऐसी मतवाली तो सुब्ह का आलम क्या होगा)

चन्दन श्रीवास्तव

चन्दन श्रीवास्तव

चन्दन श्रीवास्तव,  मूलतया छपरा(बिहार) के निवासी, पिछले पंद्रह सालों से दिल्ली में। पहले आईआईएमसी और फिर जेएनयू में पढ़ाई। “उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध में हिन्दी लोकवृत्त का निर्माण” शीर्षक से पीएचडी के बाद दिल्ली के कॉलेजों में छिटपुट अध्यापन, फिर टीवी चैनल की नौकरी और अब विकासशील समाज अध्ययन पीठ(सीएसडीएस) की एक परियोजना इंक्लूसिव मीडिया फॉर चेंज से जुड़े हैं। इनसे  chandan@csds.in पर संपर्क संभव है। 

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