ग्लोबल गांव और गायब होता ‘देश’: चंदन श्रीवास्तव

बौद्धिक-दरिद्रता के हिंदी-समय में ‘बौद्धिक’ सी लगने वाली सूचनाएं भी किस तरह आक्रान्त करती हैं यह देखना हो तो रणेंद्र के उपन्यासों यथा, ‘ग्लोबल गांव के देवता’ और ‘गायब होता देश’ के इर्द-गिर्द होने वाली बहुसंख्यक चर्चाओं को देख सकते हैं. चर्चाओं में उफान ऐसा है मानों रेणु के बाद ग्राम्य-अंचल की आत्मा को उकेरने वाला कोई उपन्यासकार हुआ तो बस रणेन्द्र और मैला आँचल के बाद अगर आंचलिकता की सतरंगी चूनर कहीं बुनी गई तो सिर्फ ‘ग्लोबल गांव के देवता में’। इन चर्चाओं के पीछे के मनोविज्ञान को भी समझने की जरुरत है. यह मनोविज्ञान ‘राजनीतिक सहानुभूति’ मात्र को कला का स्थानापन्न मानने का हामी है जबकि हिंदी कथा-साहित्य के एक मूर्धन्य और विश्वसनीय आलोचक सुरेंद्र चौधरी ने कहीं कहा है कि ‘राजनीति को आप सहानुभूति दें, इससे बेहतर ये है कि राजनीति को जीएं, जीने वाले चरित्र गढ़ें, जीने वाली परिस्थितियाँ तैयार करें.’ रणेंद्र संबंधी तमाम चर्चाओं से जो बाते सिरे से गायब दिखती है वे हैं, उपन्यास की बुनावट, आख्यान का निर्वाह और कहानीपन। चंदन श्रीवास्तव अपने इस आलेख में इन्हीं झोलों पर से पर्दा उठाने का काम करते हैं. उपन्यासकार जितनी मेहनत अपने लिपिक-व्यक्तित्व से करवाता है उसका दसवां भी कथा गढ़ने में मदद करने वाली कल्पना के तंतुओं से नहीं करवा पाता है. इन उपन्यासों में कल्पना के तंतुओं का सिरे से स्थगन दिखता है. पठार की किस्सागोई ‘पठार का धीरज’ की भी मांग करती है जबकि रणेन्द्र के दोनों उपन्यास ‘तुरंता-फुरंता’ हरकत से पीड़ित हैं। #तिरछीस्पेल्लिंग 

By उदय शंकर

By उदय शंकर

राजनीतिक नक्शे में गायब होता उपन्यास

By चंदन श्रीवास्तव

कथा को परखना हो तो बेहतर यही है कि नजर कथा पर हो ना कि कथाकार पर। कथाकार पर नजर टिकाकर कथा परखने की कई मुश्किलें हैं, जैसे कथाकार अज्ञात भी हो सकता है और अगर अज्ञात ना हो तो भी झंझट बनी रह सकती है बशर्ते अपने लिखे को लेकर उसका नजरिया हमारे पास मौजूद ना हो।  लेखक अज्ञात ना हो, लिखे को लेकर उसका नजरिया मालूम हो तो भी मुश्किल खत्म नहीं होती। एक कठिनाई तो यही देखने की आन खड़ी होती है कि अपनी लिखाई में कथाकार रचना विषयक अपनी दृष्टि को ठीक-ठीक पिरो पाया है कि नहीं और जो ठीक-ठीक अपनी रचना-दृष्टि को कथाकार कथा में पिरो पाया हो तो भी यह सवाल तो बना ही रहेगा कि खुद कथाकार की रचनादृष्टि को उसकी कथा के बारे में निर्णय देते हुए महत्वपूर्ण क्यों मानें ? लिहाजा, अच्छा तो यही होगा कि ‘ग्लोबल गांव के देवता’ या ‘गायब होता देश’ पढ़ते हुए आप रचनाकार रणेन्द्र को भुलाये रखें लेकिन ये उपन्यास और रणेन्द्र दोनों ऐसा होने नहीं देते। वजह, ‘ग्लोबल गांव के देवता ’ और ‘गायब होता देश’ की संज्ञानात्मक बनावट अपने रचनाकार रणेन्द्र के राजनीतिक मानस की बनावट से एकदम बंधी हुई है। चाहें तो कह लें कि इन उपन्यासों और उपन्यासकार की एक दलील यह भी है कि रचनाकार के राजनीतिक मानस को परखने के साथ उसकी रचना के औचित्य को भी परखना संभव हो जाता है।

दोनों उपन्यासों के रचना-संदर्भ के रुप में रणेन्द्र के राजनीतिक मानस की बनावट को समझने के लिए एक पत्रिका में प्रकाशित उनके साक्षात्कार की पंक्तियां सहायक हो सकती हैं। तहलका पत्रिका ने 31 मार्च 2014 के अंक में रणेन्द्र से प्रश्न किया कि ‘आज आदिवासी समाज के संकट और उनकेसंघर्ष देश के व्यापक समाज के संकट और संघर्षों के प्रतिनिधि लगते हैं, ऐसा क्यों ? रणेन्द्र को इस प्रश्न के उत्तर में अर्थशास्त्री अमित भादुड़ी का एक पद ‘विकास का आतंकवाद’ याद आया और ‘विकास के आतंकवाद’ की अपनी व्याख्या में उन्होंने जो कहा उसका सार-संक्षेप यह कि आजादी के तुरंत बाद नेहरू-महालानोबिस मॉडल की विशालकाय परियोजनाएं आधुनिक तीर्थस्थल बन कर अवतरित हुईं। इस विकास की बलिवेदी पर जिस समुदाय ने सबसे ज्यादा शहादतें दीं वह आदिवासी समुदाय था.1991 के बाद विकास की गति बहुत ज्यादा तेज हो गई है. वैश्वीकृत बाजार में मध्यवर्ग की घोषणाएं आसमान छू रही हैं। अतः सारा लौह अयस्क, बॉक्साइट, तांबा, यूरेनियम आज ही चाहिए. नतीजतन 1991 ईस्वी के पहले कंपनियों को निर्गत खनन पट्टों की संख्या कुछ सौ थी वह बढ़कर आज कुछ हजार हो गई है।  रणेन्द्र को लगता है कि “जितने मेमोरेंडम ऑफ अंडरस्टेंडिंग झारखंड, छत्तीसगढ़, उड़ीसा, मध्य प्रदेश, कर्नाटक आदि राज्यों में हुए हैं, अगर वे जमीन पर उतर गए तो विस्थापन नहीं विपदा आ जाएगी, एक जलजला आ जाएगा।”

‘विकास के आतंकवाद’ के कल और आज में रणेन्द्र फर्क करते हैं। उन्हें लगता है कि जब तक बड़े बांधों, कारखानों, खनन परिसरों के लिए आदिवासी इलाकों में जमीनें जबरिया छीनी जा रही थीं तो मुख्यधारा को कोई फर्क नहीं पड़ रहा था लेकिन “आज तो रियल एस्टेट का दिल भी ‘मोर-मोर’ मांग रहा है. सरकारें स्पेशल इकोनॉमिक जोन के लिए जमीनें अधिगृहीत कर रही हैं और उसे रियल एस्टेट इकोनॉमिक जोन को हस्तांतरित कर रही हैं। न जाने कितने हजार बहुफसली सिंचित कृषि भूमि इस ‘विकास के आतंकवाद’ की अजगरी आंत मे समा गई है और कितनी और निगली जानी बाकी हैं। अब जाकर मुख्यधारा को लघु-सीमांत किसानों का जीवन-आधार, भूख के विस्तार, खेत के जबरिया छीने जाने की पीड़ा की गहराई का अहसास हो रहा है. इन्हीं कारणों से आदिवासी इलाके का संकट और संघर्ष व्यापक समाज के संकट और संघर्ष का प्रतिनिधि बनता लगने लगा है।”

दोनों उपन्यास विकास के आतंकवाद की रणेन्द्र की इस व्याख्या के अनुकूल लिखे गये हैं। यों ‘ग्लोबल गांव के देवता ’ के परिचय के रुप में जिल्द पर छपी पंक्तियों को पढ़कर लग सकता है कि उपन्यास सिर्फ आग और धातु की खोज करनेवाली, धातु पिघलाकर उसे आकार देनेवाली कारीगर असुर जाति के “जीवन का संतप्त सारांश” है क्योंकि उसे “सभ्यता, संस्कृति, मिथक और मनुष्यता सबने मारा है” लेकिन उपन्यास के आखिर के पन्नों पर यह बात बिल्कुल जाहिर हो जाती है कि रचनाकार की मंशा असुर जनजाति के इस ‘शोक-संतप्त सारांश’ को ‘व्यापक समाज के संकट और संघर्ष का प्रतिनिधि’  बनाकर पेश करने की है। उपन्यास के आखिर के पन्नों पर दो मुख्य किरदार इस बात से सहमत हैं कि “ग्लोबल गांव के आकाशचारी देवता और राष्ट्र राज्य दोनों एक दूसरे से घुलमिल गये हैं। दोनों को अलगाना अब मुश्किल है..सामान्य तौर पर इन आकाशचारी देवताओं को जब अपने आकाशमार्ग से या सेटेलाइट की आंखों से छत्तीसगढ़, उड़ीसा, मध्यप्रदेश, झारखंड आदि राज्यों की खनिज संपदा, जंगल या अन्य संसाधन दिखते हैं तो उन्हें लगता है कि अरे, इन पर तो हक हमारा है। उन्हें मालूम है कि राष्ट्र-राज्य तो वे ही हैं, तो हक तो उनका ही हुआ। सो इन खनिजों पर, जंगल में, घूमते हुए लंगोट पहने असुर-बिरजिया, उरांव-मुंडा, आदिवासी, दलित-सदान दिखते हैं तो उन्हें बहुत कोफ्त होती है। वे इन कीड़ों-मकोड़ों से जल्द निजात पाना चाहते हैं। तब इन इलाकों में झाड़ू लगाने का काम शुरु होता है।”

और, उपन्यास की जिद है कि झाड़ू लगाने के काम के महाविस्तार को पाठक पूरे देश में फैला हुआ देखे। अपनी जिद के अनुकूल उपन्यास आखिर के पन्नों पर “अख़बार और पत्रिकाओं की इस तरह की खबरें” सिलेसिलेवार बताता चलता है कि “छत्तीसगढ़ के रायगढ़ जिले से होकर बहने वाली एक बड़ी नदी शिवनाथ एक इंडस्ट्री समूह को बेंच दी गयी थी। कई गांवों के लोग, मवेशी, चिरई-चुनमुन, खेत-बघार सब पानी के लिए छछन रहे थे। बोन्दा टीकरा गांव के लोग राजधानी में जाकर अनशन पर बैठे..।” इसके तुरंत बाद उपन्यास में याद दिलाया जाता है कि “मणिपुर की राजधानी इम्फाल से मात्र पन्द्रह किलोमीटर दूर मलोम कस्बे की पिता इरोम नन्दा, मां इरोम सखी की 34 वर्षीया बेटी इरोम शर्मिला, सशस्त्रबल के विशेषाधिकार कानून के विरोध में पिछले लगभग सात वर्षों से आमरण अनशन पर हैं….केरल की सी के जानू, वन विभाग की जिद के कारण तिरपन हजार बेघर आदिवासी परिवारों की लड़ाई की अगुआ, वायन्द जिले के गैरमजरुआ जमीन पर बसने की बात सोचते-सोचते पुलिसिया बर्बरता का शिकार होती है…. महाराष्ट्र कोंकण में बघर तेरह हजार आदिवासी परिवारों की लड़ाई लड़ती सुरेखा दलवी, मध्यप्रदेश रीवां जिले में संघर्ष करती दुवसिया देवी, छिन्दवाड़ा गोंड गांव की दयाबाई..किसकी किसकी कथा कही जाय और कितनी कही जाय। ”

यों तो संघर्षों के इस सिलसिले को उपन्यास में यह बताने के लिए दर्ज किया गया है कि “शायद स्त्री ही स्त्री की व्यथा समझती है” तो भी उपन्यास के आखिर में आयी इन पंक्तियों को चूंकि असुर जनजाति के अस्तित्व को बचाने के लिए संघर्ष करते पात्र (ललिता) की जबानी कहलवाया गया है इसलिए यह निष्कर्ष निकालना बेजा ना होगा कि उपन्यास की इच्छा असुर जनजाति के संघर्ष को ‘व्यापक समाज के संकट और संघर्ष का प्रतिनिधि’ मानकर पेश करने की है।

इस बात के संकेत ऊपर उद्धृत रणेन्द्र के साक्षात्कार में भी हैं। मसलन रणेन्द्र को यह तो लगता है कि “आदिवासी, दलित, स्त्री, पिछड़े मुसलमान आदि हाशियाकृत समुदायों अस्मिताओं की अपनी विशिष्ट समस्याएं रही हैं. वे अलग से रेखांकित किए जाने की प्रतीक्षा कर रही थीं पर कई कारणों से उपेक्षित रहीं” लेकिन साथ में वे यह भी जोड़ते हैं कि “अस्मितावादी आंदोलन कोई निश्छल भाव से चलने वाला आंदोलन नहीं है. वैश्विक पूंजीवादी राजनीति उसके पीछे खड़ी है” जिसे ‘सर्वहारा के महाआख्यान’ के खिलाफ खड़ा करने के लिए काफी समर्थ और प्रतिबद्ध विचारक-दार्शनिक मिले। रणेन्द्र को अस्मितावादी आंदोलन ‘अन्य’ या ‘अदर्स’ की पहचान और उसके खिलाफ सैद्धांतिक दर्शन गढ़कर “पूरी ताकत और घृणा” के साथ चलाया जाने वाला अभियान प्रतीत होता है जो कि अंतत “होलोकॉस्ट की ओर” ही ले जाती है। उनका प्रश्न यह है कि “वंचित-शोषित-हाशियाकृत तबकों को अपनी विशिष्ट समस्याओं के रेखांकन के बाद संघर्ष के लिए इकट्ठा एक मंच पर न जुटने दिया जाए तो लाभ किसे है?” अचरज नहीं कि जिस उपन्यास की शुरुआत “बदहाल ज़िंदगी गुज़ारती संस्कृतविहीन, भाषाविहीन, साहित्यविहीन, धर्मविहीन” असुर जनजाति के लिए इस पीड़ा से होती है- “छाती ठोंक ठोंककर अपने को अत्यन्त सहिष्णु और उदार करनेवाली हिन्दुस्तानी संस्कृति ने असुरों के लिए इतनी जगह भी नहीं छोड़ी थी। वे उनके लिए बस मिथकों में शेष थे। कोई साहित्य नहीं, कोई इतिहास नहीं, कोई अजायबघर नहीं। विनाश की कहानियों के कहीं कोई संकेत्र मात्र भी नहीं’ वही उपन्यास अपने आखिर में जिस प्रश्न पर आकर अटकता है वह प्रश्न असुर संज्ञा का लोप कुछ इस भंगिमा के साथ करता है- “क्या मृत्यु का भी कोई आकर्षण है? या नियत पराजय भी आमंत्रित करती है? मैं सोचता रहता। फिर क्यों, न केवल कीकट प्रदेश के बरवे जिले में बल्कि देशके कई-कई राज्यों में हाशिया पर पड़े समुदाय संघर्षरत थे। क्या सभी अपनी अपूर्ण मृत्यु की और बढ़ रहे थे। मेरे अख़बार, पत्र-पत्रिकाएं इस तरह की कई खबरें मुझ तक पहुंचा रही थीं।”

कथा के निभाव के हिसाब से सोचें तो दरअसल इस उपन्यास की दिक्कत भी यही है कि वह शुरु तो होती है “असुर समुदाय की गाथा पूरी प्रामाणिकता व संवेदनशीलता के साथ” बताने के वादे से लेकिन उपन्यासकार ने अपने में कथा के लिए जो राजनीतिक नक्शा तैयार कर रहा है, वह नक्शा इस वादे को पूरा नहीं होने देता। अपने नक्शे के अनुकूल असुर जनजाति के “संतप्त  सारांश” को चूंकि उसे देश के “कई-कई राज्यों में, हाशिए पर पड़े समुदाय” की संघर्ष-गाथा के रुप में भी पेश करना है, सो उपन्यास को शुरुआत से ही एक हड़बड़ी घेर लेती है। सौ पृष्ठों के कलेवर में कथा किसी बुलेट-ट्रेन सी भागती है, कथा को अपनी मंजिल का पता जो है। मंजिल की ओर बुलेट-रफ्तार से भाग रही कथा रास्ते में पड़ने वाले किसी भी ठौर-ठीहे को नजदीक से देखने के लिए उतरने का अवकाश नहीं देती। पाठक कथा के किसी भी अंश पर ठहरे इससे पहले ही कथा का कोई और अंश उसकी आंखों के आगे आ जाता है। यह तेज-रफ्तारी उपन्यास के किसी ब्यौरे को साहित्य के अंश में नहीं बदलने देती और पूरा उपन्यास रचनात्मक तनाव को ना साध पाने के कारण ना तो असुर जनजाति की संवेदनशील कथा बन पाता है ना ही इस कथा को “व्यापक समाज  के  संघर्ष और संकट का प्रतिनिधि”  बना पाता है।

मिसाल के लिए हम यही सवाल करें कि ‘ग्लोबल गांव के देवता ’ असुर समुदाय की भाषा-संस्कृति-धर्म के बारे में पाठक को जिस तरह सूचित करती है? यह प्रश्न पूछा जा सकता है क्योंकि ग्लोबल गांव के देवता की एक टेक है कि ‘मुख्यधारा पूरा निगल जाने में ही विश्वास करती है’ और इसने असुर समुदाय को ‘संस्कृतविहीन, भाषाविहीन, साहित्यविहीन, धर्मविहीन’ बना दिया है। इस प्रश्न का उत्तर उपन्यास में किसी कथा के रुप में हमारे सामने नहीं आता बल्कि इसे एक नृशास्त्रीय या फिर ऐतिहासिक ब्यौरे के रुप में पेश किया गया है। स्कूल टीचर के रुप में असुर जनजाति के एक इलाके में पदस्थापित कथा के नायक को असुर जनजाति का एक पढ़ा-लिखा सदस्य रुमझुम मित्र-भाव से बताता है कि “हम असुर लोग मोटा-मोटी तीन भाग में बंटे हैं.. बीर असुर, अगरिया असुर और बिरिजिया असुर। हालांकि बीर यहां बहादुर के सेंस में नहीं आया  बल्कि जंगल के अर्थ में आया है। लेकिन प्राचीन असरिया बेलीलोन सभ्यता में असुर का अर्थ बलवान पुरुष ही होता है। अपने यहां भी सायणाचार्य असुरों को बलवान प्रज्ञावान शत्रुओं का नाश करने वाला और प्राणदाता पुकारते हैं। ऋग्वेद के प्रारंभ के लगभग डेढ़ सौ श्लोकों में असुर देवताओं के रुप में हैं। मित्र, वरुण, अग्नि, रुद्र, सभी असुर ही पुकारे जा रहे हैं. बाद में यह अर्थ बदलने लगता है और असुर दानव के रुप में पुकारे जाने लगते हैं। ”

“अंगिरा या अंगिरस ऋषि  और अगरिया में एकापन भी ध्यान खींचता है।.. अंगिरा ऋषि भी अपने को आग से उत्पन्न बताते है और अगरियों की भी पैदाइश आग ही से हुई है। यह अंगिरा ही हैं जिन्होंने सबसे पहले आग की खोज की थी। आग की खोज और देवताओं से लड़ाई की कहानी कई जगह प्रचलित है। ग्रीक कथाओं में भी प्रमथ्यू स्वर्ग से आग चुराकर लाता है तो देवता उसे सज़ा देते हैं।सींगबोंगा, सुर देवताओं द्वारा असुरों को सज़ा देने की कथा प्रचलित है किन्तु यह सुर-असुर लड़ाई एक जटिल पहेली है। कभी हमलोग स्थिर में बैठकर इसे सुलझायेंगे। क्या यह पाषाणकालीन लोगों का धातु पिघलाने वाले लोगों से संघर्ष था? सुर में ‘सु’ शामिल है जिसका अर्थ उत्पादन होता है, इसलिए क्या जंगलों को काटकर उत्पादन यानि खेती करने वालों और सखुआ पेड़ के कोयले पर आश्रित लोहा पिघलाने वालों के बीच की लड़ाई है… ”

असुर जनजाति के बारे में उपन्यास में दर्ज इस ब्यौरे को कौन सी बात साहित्य में तब्दील करती है ? चूंकि रणेन्द्र स्वयं भी झारखंड एन्साइक्लोपीडिया(चार खंड) का संपादन कर चुके हैं इसलिए उनसे बेहतर कौन जानता होगा कि असुर जनजाति के बारे में ये सूचनायें समाज-विज्ञान की किताबों में सहज ही उपलब्ध हैं। असुर जनजाति के समाज-वैज्ञानिक ब्यौरे को कथा के किसी पात्र से कहलवा देने भर से वह ब्यौरा साहित्य नहीं बन जाता। साहित्य तो तब बनता जब “मित्र, वरुण, अग्नि, रुद्र, सभी असुर”  पुकारे जाने वाली सत्ताओं के बरक्स असुरों के “दानव के रुप में पुकारे” जाने के बीच जो अर्थ-परिवर्तन या कह लें सत्ता-परिवर्तन घटित होता है इसे उपन्यासकार अपनी कल्पना के जोर से एक जीवंत कथा के रुप में ढालता। असुर जनजाति से संबंधित समाज-विज्ञान के ब्यौरों में ऐसी संभावनाएं पूरमपूर हैं। मिसाल के लिए, वेरियर एल्विन की पुस्तक ‘द अगरिया’ को ही देखा जा सकता है। शरत् चंद्र राय इस पुस्तक की भूमिका में लिखते हैं कि अगरिया जनजाति के मिथकों का अध्ययन बड़ा मनोग्राही है। जनाब अल्विन ने दिखाया है कि कैसे अगरिया समाज के धार्मिक और आर्थिक संरचना तथा सामाजिक संबंधों की बुनियाद मिथक हैं। जीवन और प्रकृति से संबंधित जिन विचारों की भावराशि ने अगरिया-मानस पर अपनी छाप छोड़ी है, उन विचारों का खुलासा इन मिथकों से होता है..। ” अगर कोई समाज-विज्ञानी रणेन्द्र से बहुत पहले असुर जनजाति की एक शाखा अगरिया के धार्मिक-सामाजिक-आर्थिक जीवन-यापन और जीवन तथा प्रकृति विषयक उसके भावराशि का निर्माण में मिथकों की इतनी महत्वपूर्ण भूमिका रेखांकित कर गया है तो फिर ऐसी कौन-सी रचनात्मक बाधा थी जिसने ‘ग्लोबल गांव के देवता’ को अपना घोषित लक्ष्य( असुर जनजाति की प्रामाणिक व संवेदनशील तथा संतप्त गाथा) पूरा करने के लिए इन मिथकों के सहारे अपना आख्यान तैयार करने से रोक दिया ?

ब्यौरे को साहित्य में तब्दील ना कर पाने की एक और मिसाल गौरतलब है। कथा का नायक अपने घर से ढाई तीन सौ किलोमीटर दूर बरबे जिलाके प्रखंड कोयलाबीघा का भंवरापाट में पहाड़ के ऊपर जंगलों के बीच बने आवासीय विद्यालय में नौकरी के लिए पहुंचता है तो मध्यवर्गीय जरुरतों को पूरा करने वाली सुविधाओं से एकदम ही वीरान उस जगह पर उसकी दशा “कब खूँटा उखाड़ूं और भाग निकलूं” की है। लेकिन बाद को उसकी मनोदशा कुछ ऐसे बदलती है-“रहते रहते अपना भौंरापाट स्कूल मुझे अच्छा लगने लगा था। हेडमिस्ट्रेस और टीचर्स अच्छी लगने लगी थीं, और क्लास की बच्चियां अच्छी लगने लगी थीं। साहूजी किरानी की थोड़ी बहुत चालाकी अच्छी लगने लगी। एतवारी तो अच्छी थी ही, उसका आदमी गंदूर भी अच्छा लगने लगा। “कब खूँटा उखाड़ूं और भाग निकलूं” से सबकुछ ‘अच्छा” लगने  की दशा में आये नायक से उम्मीद की जा सकती है कि अब वह असुर जनजाति के रोजमर्रा को नजदीक से देखने की स्थिति में होगा और आत्मीयता की आँख से उस समाज की बातें बता पाएगा। लेकिन नायक की आत्मीय आंखें असुर जनजाति की रोजमर्रा की जिन्दगी के बारे में जो ब्यौरे पाठक को बताती हैं वे ब्यौरे विशिष्टता से खाली हैं, कह लें कि थोड़े से हेरफेर के साथ उन ब्यौरों को किसी भी जनजाति पर फिट किया जा सकता है। जैसे, नायक भंवरापाट में रहते-रहते सबकुछ अच्छा लगने की अपनी मनोदशा में पाठक को बताता है कि “ बैगा-पुजार पाहन, पर्व-त्यौहार, नक्षत्र- काल देख सरना-स्थल पर पूजापाठ करते। पाट देवता, सरना माई, महादनिया महादेव, सिंगबोंगा गांव घर पर प्रसन्न रहते। खेत-खलिहान, गाय-गोरु, बाल-बच्चा, परिवार-टोला सबका कुशल-मंगल हो, यही हर पूजा की कामना होती। गांव के सीमान के देव, दरहा की पूजा कर गांव निश्चिंत होकर सोता..।” नायक की नजर गांव से हटकर घरों के अंदर जाती है तब भी वह इतना ही बता पाता है कि “ बाहर की दीवारों को बड़े जतन से महिलायें लीपती थीं। महिलायें इस समाज में सियानी कहलाती थीं जनानी नहीं। जनानी शब्द कहीं ना कहीं केवल जनन, जन्म देने की प्रक्रिया तक उन्हें संकुचित करता जबकि सियानी शब्द उनकी विशेष समझदारी, सयानेपन को इंगित करता मालूम होता। सियानीमन, महिला लोगों को यह पता रहता था कि घर लीपने वाली काली, पीली सफेद मिट्टियां कहां मिलती हैं, किस टांड़ में, किस दोन में..।” दीवारों को लीपने की पूरी प्रक्रिया के साथ अगर उपन्यास का यह भावपूर्ण हिस्सा जोड़ दें कि “हमारा पूरा ब्रह्नांड हमारी अपनी आकाशगंगा और पूरे कायनात की लाखों करोड़ों अकाशगंगाओं के अनंत ब्रह्रांड सबके सब किसी स्त्री की हथेलियों से घूमेड़ लेकर आदि अनंत काल से नाचते जा रहे हैं” तो भी इस ब्यौरे से असुर जनजाति की स्त्रियों के रोजमर्रा के किसी अदेखे सुख-दुःख की कथा इस ब्यौरे से नहीं निकलती।

‘ग्लोबल गांव के देवता’ असुर जनजाति की शोक-संतप्त कथा कहने के वादे से शुरु होती है और आखिर को एक अर्जी में बदल जाती है, एक ऐसी अर्जी जिसका फैसला उपन्यासकार के अनुसार इतिहास-धारा कब का सुना चुकी है। उदाहरण के तौर पर उपन्यास के आखिर का वह अंश देखा जा सकता है जो प्रधानमंत्री को लिखी एक चिट्ठी के रुप में दर्ज है- “हमारे पूर्वजों ने जंगलों की रक्षा करने की ठानी तो उन्हें राक्षस कहा गया, खेती के फैलाव के लिए जंगल के काटने जलाने का विरोध किया तो दुष्ट दैत्य कहलाये। उनपर आक्रमण हुआ और लगातार खदेड़ा गया।… लेकिन बीसवीं सदी की हार हमारी असुर जाति की अपने पूरे इतिहास में सबसे बड़ी हार थी। इस बार कथा-कहानी वाले सिंगबोंगा ने नहीं टाटा जैसे कंपनियों ने हमारा नाश किया।..बाक्साइट के वैध-अवैध खदान, विशालकाय अजगर की तरह हमारी जमीन को निगलता बढ़ता आ रहा है। हमारी बेटियां और हमारी भूमि हमारे हाथों से निकलती जा रही हैं।.. हम असुर अब सिर्फ आठ नौ हजार ही बचे हैं। हम बहुत डरे हुए हैं.। हम खत्म नहीं होना चाहते।” और उपन्यास में इस चिट्ठी के ठीक आठ पन्नों बाद एक प्रवचननुमा फैसला दर्ज है- “राज्य राष्ट्र की हिंसा का कोई जवाब ही नहीं हो सकता।.. राज्य की नींव में ही केवल हिंसा की ईंटे नहीं लगी हैं बल्कि उसके महल की हिंसा ईंटों से ही चिनाई हुई है।यही एकमात्र संस्था है जिसने हिंसा को भी सांस्थानिक रुप दिया है। उसकी सेना, सशस्त्र बल, पुलिस, सब सैद्धांतिक तौर पर हिंसा के लिए ही प्रशिक्षित हैं..। ”

‘गायब होता देश’  का प्रकाशन-वर्ष(2014) ‘ग्लोबल गांव के देवता से पाँच साल बाद का है। इन पाँच साल में उपन्यासकार ना तो अपनी कथा-भूमि बदल पाया है ना ही कथा को अपने राजनीतिक नक्शे में फिट करने का आग्रह।  कथाभूमि और राजनीतिक आग्रह का एका दोनों उपन्यासों में इतना गहरा है कि ‘गायब होता देश’  को ‘ग्लोबल गांव के देवता’ के विस्तार के रुप में पढ़ा जा सकता है। इस उपन्यास के आरंभ में एक ‘सोना लेकन दिसुम’ नाम का स्वर्ग है और इस स्वर्ग के नष्ट होने से उपजा शोक है।‘ग्लोबल गांव के देवता की तरह ‘गायब होता देश’  में भी स्वर्ग को नष्ट करने वाला राष्ट्र-राज्य ही है, ऐसा राष्ट्र-राज्य जिसने वैश्विक पूंजी से हाथ मिला लिया है। उपन्यास में स्वर्ग इस रुप में आता है- “सोने के कणों से जगमगाती स्वर्णकिरण स्वर्णरेखा, हीरों की कौंध से चौंधियाती शंखनदी, सफेद हाथी श्यामचंद्र और सबसे बढ़कर हरे सोने, शाल-सखुआ के वन, यही था मुंडाओं का सोना लेकन दिसुम। ”

यह स्वर्ग नष्ट हुआ क्योंकि “ इंसान थोड़ा ज्यादा समझदार हो गया। उसने बंदरगाह बनाने, रेल की पटरियां बिछाने, फर्नीचर बनाने मकान बनाने केलिए अंधाधुन्ध कटाई शुरु की। मरांग बुरुबोंगा की छाती की हर अमूल्य निधि धातु-आयस्क उसे आज ही अभी ही चाहिए था। नहीं तो उसे पिछड़ जाने का भय था।इन्हीं जरुरतों से ज्यादा समझदार इंसानों की अंधाधुन्ध उड़ान के उठे गुब्बार बवंडर में सोना लेकन दिसुम गायब होता जा रहा था। ”

सोना लेकन दिसुम के गायब होने का एक साक्षी पत्रकार किशन विद्रोही है और उपन्यास का आरंभ किशन विद्रोही की हत्या की खबर से होता है,, एक ऐसी हत्या जिसकी गुत्थी का सुलझना शेष है “क्योंकि ना तो कोई चैनल ना कोई अखबार पूरी गारंटी से कहने को तैयार था कि हत्या हुई है।” पाठक शुरुआती पन्नों पर किशन विद्रोही के बारे में जान पाता है कि वह “ भूमिहीन मजदूरों द्वारा मठ की जमीन को जोतने के संघर्ष में शामिल ” था और उसे तब लोकनायक जेपी का आशीर्वाद भी हासिल हुआ था। विद्रोही की हत्या की गुत्थी सुलझाने के क्रम में प्रशिक्षु पत्रकार राकेश को डायरी, जेरॉक्स और अखबार के जो पन्ने हासिल होते हैं। इन पन्नों से किशन विद्रोही की त्रासदी की कथा की शुरुआत होती है, यही त्रासदी उपन्यास में ‘सोना लेकन दिसुम’ के गायब होते जाने की तफ्सील भी है।

तफ्सील यों है कि किशनपुर एक्सप्रेस के पत्रकार के रुप में परमवीर चक्र प्राप्त परमेश्वर पाहन की हत्या/मुठभेड़ की गुत्थी सुलझाने के लिए किशन विद्रोही हीराहोतु जाता है और इसी क्रम में उस पर अखबार के प्रबंधन का दबाव बनता है कि वह ऐसी खबरों को ज्यादा तवज्जो नहीं दे। उसे बदलने का उपदेश मिलता है कि ‘केके बदलो यार। समय के साथ कदम से कदम मिलाकर चलना ही बुद्धिमानी है। प्रोफेशनल लाइफ में अड़ियलपन से काम नहीं चलता। आगे दूर तक देखिए। स्थानीयता में मत उलझिए। राष्ट्रीय दृष्टि से परिघटनाओं का विश्लेषण कीजिए।‘और यह भी कि “पाठक गरीबी, बदहाली,भूख, बेकारी, विस्थापन, आदिवासी-दलितों की कहानियां पढ़-पढ़कर बोर हो गया है। ”

किशन विद्रोही के माध्यम से उपन्यासकार वंचितों की व्यथा-कथा की खोज खबर देने क्रम में यह बताता प्रतीत होता है कि आदिवासियों का संघर्ष कुछ वैसा ही है जैसा कि भारतीय जनता का ब्रितानी साम्राज्यवाद से था- “लग ही नहीं रहा था कि 2000 ईस्वी में हो। लग रहा था कि 13 फरवरी 1832 हो। कप्तान इंपे की बंदूकें गोलियां बरसा रही हों। वीर बुधु भगत के साथ-साथ पूरा सिलगई शहीद हुए जा रहा हो या 9 जनवरी 1900 हो और सईल रकब पर मुंडाओं की बैठकी पर गोलियां बरसायी जा रही हों। गोलियां चल रही थीं जिंदा हंसते गाते इंसान शहीद हुए जा रहे थे।”

इस स्थिति के बरक्स आदिवासियों का संघर्ष किस मुकाम पर है ? उपन्यास आदिवासियों के संघर्ष की व्याख्या के लिए कुछ फार्मूलों की सहायता लेता है जैसे यह कि आदिवासी, आखिर को आदिवासी भर कहां हैं वे तो अगल-अलग पहचानों में बंटे हैं इसलिए उनका संघर्ष टुकड़ों में बंटा है और असफल होने को अभिशप्त है- “अब सौंसार आदिवासी हैं तो का, वीरेन तो मुंडा है,हम संताल हैं,उरांव हैं, खड़िया हैं, खेरवार हैं, लोहरा हैं, हम काहे को उसको लीडर मानें। हम सौंसार हैं तो मिशन लोग के साथ नयं बैठेंगे।” आदिवासी समाज के एका के अभाव की व्याख्या में उपन्यासकार आर्थिक आधार तलाशता है – “दूसरे ही दिन सोलह फ्लैट के लिए बत्तीस ग्राहक। सबके सब आदिवासी साहब सूबा लोग..ऐसन लंबी-लंबी गाड़ी सब में एतना ट्रायबल अफसर एके साथ पहली बार देख रहे थे। सौ किलो- सवा सौ किलो के भी साहब। सरनेम है तिग्गा, तिर्की, खलको, लकड़ा बाकिर कुठुख(उरांव जनजाति की भाषा) में गोठियाने लगे तो लगा सब मुंह फाड़ के भकुआ टाईप देखने..।बाबा! हम तो सोचते थे कि हमहीं पुराना पापी हैं। समाज के गद्दार..खाली नामे भर के आदिवासी है ई लोग बाबा। कल रिजर्वेशन खत्म कर दीजिए तो अपना के आदिवासी कहने में भी शरमाएगा ई लोग। ” उपन्यास के इस अंश पर पहुंचकर पाठक को तहलका पत्रिका में प्रकाशित रणेन्द्र के साक्षात्कार की इन पंक्तियों की याद आ जाय तो क्या अचरज- “वंचित-शोषित-हाशियाकृत तबकों को अपनी विशिष्ट समस्याओं के रेखांकन के बाद संघर्ष के लिए इकट्ठा एक मंच पर न जुटने दिया जाए तो लाभ किसे है ? ” सो, ‘गायब होता देश’ में भी उपन्यासकार की जिद आदिवासियों के संघर्ष को एक व्यापक संघर्ष के हिस्से के रुप में देखने की है और ठीक इसी वजह से उपन्यास आदिवासी जन-जीवन के बारे में कुछ भी ऐसा नहीं बता पाता जो खनन, भूमि-अधिग्रहण या फिर मानवाधिकारों केमुद्दे पर सक्रिय स्वयंसेवी संस्थाओं के प्रकाशनों अथवा आंदोलनधर्मी अखबारों/पत्रिकाओं में ना मिलता हो।

हद तो यह है कि उपन्यासकार आदिवासी जन-जीवन के संघर्ष में ऐतिहासिक निरंतरता दिखाने के लिए जिस जादुई लोक ‘लेमुरिया’ की रचना करता है, उस लेमुरिया के वासी अपने आचारण में या तो वैदिक ऋषियों की छायाप्रति लगते हैं या फिर देश की आजादी के वक्त के मध्यवर्ग की आचार-संहिता के एक वाक्य- ‘सादा जीवन उच्च विचार’ के अनुयायी। आदिवासियों की आदिभूमि लेमुरिया को उपन्यास के तर्क से एक मध्यवर्गीय प्रातमिकताओं को तरजीह देने वाले राष्ट्र-राज्य का एक प्रतिस्थापन्न होना चाहिए था लेकिन लेमुरिया मध्यवर्गीय राष्ट्र-राज्य की एक प्रतिलिपि बनकर रह जाता है। उसमें मध्यवर्गीय राष्ट्रराज्य की सारी चाहनाएं मौजूद हैं। सादा जीवन है, उच्च विचार है, संपदा का संरक्षण और संवर्धन है और इन सबसे बढ़कर है लेमुरिया का उपयोगितावादी ज्ञान-विज्ञान। मिसाल के लिए उपन्यास के इस अंश को देखा जा सकता है-  “सोमेश्वर मामू तो पंडित हैं, वो तो पूरी लंबी-चौड़ी कहानी सुनाने लगेगा लेमुरिया का। कैसे मुंडा लोगों का मूल स्थान समुद्र में समा गया और हमलोगों के पूर्वजों का ढेर ज्ञान भी बिला गया। नयं तो केतना ज्ञानी थे मुंडा लोग।धरती माता, सरना माई, सिंगबोंगा से जो भी सीखा था उसे संजो कर रखे थे। सबकी इज्जत करना,सम्मान करना, कम से कम में संतोष करना और ज्ञान बढ़ाना यही जिंदगी का मकसद था लेमुरिया मुंडाओं का। लेकिन ताकत इक्कठ्ठा करने वाले, धन इक्टठा करने वाले उन्हें अपना दुश्मन मानते थे।… उनकी दूसरी कोशिश थी कि सारे ज्ञान को क्रिस्टल मणि का रुप दे दिया जाय और उन्हें हीरों के रुप में धरती के अंदर छुपा दिया जाय और पानी डूब से बचने का सबसे बड़ा उपाय हमारे पूर्वजों ने किया कि धरती के ऊर्जा केंद्र से दूसरे ऊर्जा केंद्रों के बीच भूमिगत सुरंगे बनायी..।”

यों तो रणेन्द्र ने तहलका पत्रिका के साक्षात्कार में अपनी मजबूरी बतायी थी कि “मेरा जो अनुभव संसार है वह मुख्य रूप से आदिवासी समाज का ही है। यहां समस्याएं इतनी जटिल, जीवन इतना कठिन, दबाव इतना चौतरफा है कि इन्हें चाहकर भी किसी दूसरी विधा में नहीं अंटा सकते ” लेकिन ‘ग्लोबल गांव के देवता’ या फिर ‘गायब होता देश’ नाम के उपन्यास में जो वे अंटा पाये हैं वह आदिवासी समाज की समस्याओं की जटिलता नहीं बल्कि उसकी एक सरलीकृत झांकी भर है, ऐसी झांकी जो कहीं अर्जी, कहीं प्रवचन तो कहीं सपाट फैसले पर आकर रुक जाती है।

चन्दन श्रीवास्तव

चन्दन श्रीवास्तव

चन्दन श्रीवास्तव,  मूलतया छपरा(बिहार) के निवासी, पिछले पंद्रह सालों से दिल्ली में। पहले आईआईएमसी और फिर जेएनयू में पढ़ाई। “उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध में हिन्दी लोकवृत्त का निर्माण” शीर्षक से पीएचडी के बाद दिल्ली के कॉलेजों में छिटपुट अध्यापन, फिर टीवी चैनल की नौकरी और अब विकासशील समाज अध्ययन पीठ (सीएसडीएस) की एक परियोजना इंक्लूसिव मीडिया फॉर चेंज से जुड़े हैं। इनसे  chandan@csds.in पर संपर्क संभव है। 

प्रतिमान पत्रिका में प्रकाशन के लिए स्वीकृत

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