‘रईस’ की तुलना में ‘काबिल’ अच्छी फिल्म है: तत्याना षुर्लेई

 

“रईस” की तुलना में मैं “काबिल” की ओर हूँ. यह फ़िल्म “रईस” से अच्छी इसलिए है कि “काबिल” यह दिखावा नहीं करता है कि वह कुछ नया और आर्टिस्टिक दिखानेवाला है. दोनों फिल्मों को देखकर फिर से यह दोहराना पड़ेगा कि अगर किसी को बारीक सिनेमा बनाना नहीं आता है तो उसे मुख्यधारा में ही रहना चाहिए. मुख्यधारा और मनोरंजन कोई कमतर जगह नहीं है और ऐसी फिल्मों की बड़ी ज़रुरत है. “काबिल” में कुछ न कुछ कमियां तो हैं लेकिन “रईस” से अच्छी इसलिए लगती है कि यह अपने दर्शकों के प्रति फेयर और फ्रैंक है. इसका ट्रेलर भी किसी को धोखा नहीं देता है. सब को पता है कि यह मनोरंजन के लिए बनी एक व्यावसायिक फ़िल्म है और जिसकी कहानी उम्मीद के मुताबिक ही है. #लेखक

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काबिल  पोस्टर

काबिल: मनोरंजन कोई बुरी बात नहीं है

By तत्याना षुर्लेई

फ़िल्म की कहानी रोमांटिक और मासूम प्यार से शुरू होती है, फिर इसमें दारुण दुःख पहुंचाने वाली क्रूरता, हिंसा और अन्याय आते हैं, और अंततः राहत देनेवाला बदला. फ़िल्म का नायक, रोहन भटनागर (ऋतिक रोशन) एक अँधा जवान आदमी है जो एक सुन्दर लड़की, सुप्रिया (यमी गौतम) से प्यार और शादी करता है. सिनेमा में दिखने वाले विकलांग लोगों में अक्सर किसी एक कमी की जगह उन्हें कई असाधारण क्षमताएं दी जाती हैं (न सिर्फ भारतीय फिल्मों में – ऐसा स्टीरियोटाइप दुनिया की बहुत सारी फिल्मों में प्रभुत्व रखता है). रोहन भी इसी तरह का आदमी है – उसको दिखाई नहीं देता है लेकिन इस विकलांगता के प्रतिउत्तर में वह दुसरे लोगों की आवाज़ों को अच्छी तरह नक़ल करता है. रोहन कार्टून का डबिंग करता है और इस काम में इतना प्रतिभावान है कि अकेले ही फ़िल्म के सारे नायकों की अलग-अलग आवाजें देता है. उसकी यह योग्यता बाद में बदला लेने वाले दृश्यों में उनकी बहुत मदद करेगा.

आसपास में रहनेवाले दो अपराधी, अमित (रोहित रॉय) और उसका दोस्त माधव (रोनित रॉय) बार-बार रोहन और सुप्रिया की ख़ुशी के आड़े आते हैं. इनके लिए इस जोड़ी की विकलांगता मजाक उड़ानेवाली बात है. एक दिन वे छेड़-छाड़ से आगे चले जाते हैं और सुप्रिया का बलात्कार करते हैं. अमित का भाई शहर का बड़ा आदमी है इसलिए वह आसानी से भ्रष्ट पुलिस को अपने पक्ष में कर लेता है. भ्रष्ट पुलिस हिंदी सिनेमा का सब से पसंदीदा टॉपिक है जिससे फिल्मवाले अभी तक थके नहीं हैं. लेकिन विषयों का दुहराव और दर्शकों के उम्मीदों पर खरा उतरने वाला प्लॉट मुख्यधारा की सिनेमा के सबसे जरुरी हिस्से हैं.

अपनी पत्नी की मौत के बाद, यह देखकर कि पुलिस कुछ नहीं करेगा, रोहन खुद बदला लेता है और भ्रष्ट पुलिस इंस्पेक्टर से जीतता है. यह प्लॉट बहुत टिपिकल और आसान है – ऐसी फिल्में तो बार-बार बनती हैं, फिर भी हमेशा की तरह वे अपने दर्शकों को अंत में बड़ी राहत देती हैं. “काबिल” में नयी बात यह है कि फ़िल्म की कहानी एक ही तरह के दो दृश्यों से अच्छी तरह खेलती है. उदहारण के लिए रोहन की पत्नी के बलात्कार के केस में इंस्पेक्टर बार-बार बोलता है कि सबूत के बिना वह कुछ नहीं कर सकता है, लेकिन बाद में, बदले वाले दृश्य में, फ़िल्म का नायक भी पुलिस से अपने क्राइम के सारे सबूत छुपाता है. सुप्रिया ने फँसी लगा ली तो रोहन ने माधव को भी फांसी पर लटकाया. सुप्रिया का बलात्कार करने से पहले उसको बिस्तर से बांधा और उसके मुँह में कपड़ा लगाया गया था ताकि वह कुछ बोल न सके, तो ऐसी ही स्थिति लेटाकर अमित की भी हत्या होती है. इस तरह के अलग-अलग आइने में प्रतिबिंबित होने वाले दृश्यों की तरह सारी उल्टी परछाईयाँ फ़िल्म में दिखाई गईं हैं.

रुसी लेखक, अन्तोन चेखव ने एक बार लिखा की नाटक के शुरू में दर्शकों को अगर दीवार में लटकी बन्दुक दिखाई देती है तो इसका मतलब यह है कि कहानी में इसका इस्तेमाल जरुरी है. “काबिल” में इस नियम का प्रयोग बहुत हुआ है. लगभग हर छोटे दृश्य, जैसे साईकिल वाला, या रोहन का पत्नी को घड़ी गिफ्ट करना इत्यादि. पहले तो इन सब का कोई बड़ा मतलब नहीं दिखता है, लेकिन बाद में ये सारे दृश्य वापस आते हैं और नायक अपने बदले वाले दृश्य में इन सब का कोई न कोई प्रयोग करता है.

सबसे अच्छी बात यह है कि मुख्यधारा की दूसरी फिल्मों के विपरीत “काबिल” में जब भी  किसी ऑब्जेक्ट का दुबारा इस्तेमाल है तो दर्शकों को याद दिलानेवाला बोरिंग फ्लैशबैक या ऑफ-स्क्रीन से झुंझला देने वाली आवाजें नहीं आती हैं (बस फ़िल्म के अंत में अंधे लोगों के बारे में रोहन के शब्द दोबारा आए हैं). साथ ही साथ “काबिल” अपने दर्शकों की बुद्धिमत्ता का सम्मान करता है जो कि पॉपुलर फिल्मों में अक्सर नहीं होता है.

ऋतिक रोशन ने “काबिल” से पहले भी विकलांग आदमी का अभिनय किया है. मगर इस बार उसने अच्छी तरह से अपने सबसे बड़े हुनर को अपने नायक की विकलांगता से जोड़ दिया है. ऋतिक का सब से बड़ा कौशल उसका नाच है जो इस बार ड्रीम सीक्वेंस का हिस्सा नहीं है. डांस स्कूल के सीन में ऋतिक फिर से दर्शकों को यह दिखाता है कि वह बॉलीवुड का सब अच्छा डांसर है. पुराने थिएटर में लड़ाई के सीन में नायक के अंधापन के साथ अँधेरा का भी दिलचस्प इस्तेमाल है. यह जरुर है कि नायक का कौशल कभी-कभी कुछ ज़्यादा ही दिखाया गया है जो कि विकलांग आदमी में नहीं होते हैं.

अंधे लोगों की ज़िन्दगी में जो कुछ भी अजीब चीजें, हरकतें सामान्यतः दिखती हैं, फिल्मवालों ने भरसक कोशिश की है कि उनकी व्याख्या प्रस्तुत की जाएँ. शादी की रात, नायक और नायिका के कमरे में जली हुई सारी मोमबत्तियाँ, जो ट्रेलर में भी दिखाई गईं हैं, किसी को अजीब लग सकती हैं. इसीलिए फ़िल्म में उसकी व्याख्या है कि वे क्यों आईं! यहाँ मोमबत्ती फ़िल्म में चेखव वाली चीज़ बन गयी. दिलचस्प बात यह भी है कि इस फ़िल्म में ऋतिक रोशन की दूसरी फिल्मों से अलग दर्शकों को उसके दोनों अंगूठे पुरे समय दिखाई देते हैं. यह निशान कोई विकलांगता नहीं है, बल्कि नायक के भाग्यशाली होने की निशानी है, फिर भी अपनी पुरानी फिल्मों में ऋतिक इसे छुपाता था. चूँकि “काबिल” सामन्य लोगों से अलग दिखने वाले लोगों के शांति से जीने के अधिकार और उनके प्रति होने वाले भेद-भाव के बारे में फ़िल्म है, इसीलिए दूसरों से अपनी भिन्नता दिखाना विकलांगता के पक्ष में एक मज़बूत आवाज़ है. विकलांग नायक का अभिनय करना और खुद दूसरों से कुछ अलग होना अलग-अलग बातें हैं और यहाँ ऋतिक ने फिर से अपनी एक और खासियत का अच्छा इस्तेमाल किया.

फ़िल्म में कमियां ज़रूर हैं और उनमें सब से बड़ी शायद फ़िल्म का आइटम नंबर है. इसकी ज़रुरत बिलकुल नहीं थी, क्योंकि यह गाना और परफॉरमेंस अच्छा नहीं हैं. शायद फिल्मवाले आगे आने वाली अपने नायक की अलग-अलग लड़ाइयों से पहले दर्शकों को थोडा-सा आराम देना चाहते थे, फिर भी अगर ज़रुरत थी तो इसे ज़्यादा अच्छी तरह से करना चाहिए था. सुप्रिया का भूत वाला आईडिया भी ज़्यादा अच्छा नहीं था, इससे फ़िल्म बस ज़्यादा दयनीय बन जाती. नायिका की मौत और उससे पहले उसके प्रति घटित अपराध ही इतने कष्टप्रद हैं कि इससे ज़्यादा कुछ डालने की जरुरत नहीं थी.

फ़िल्म में एक चिंताजनक बात माधव की बहन के प्रति रोहन का व्यवहार है. माधव और उसका दोस्त अमित जब सुप्रिया को छेड़ते थे तो रोहन को मालूम था कि यह महसूस करना कितना कष्टप्रद है. फिर भी अपने बदले वाले क्षण में रोहन माधव की बहन को छेड़ता है. यह ज़रूर है कि रोहन का व्यवहार उतना ख़राब नहीं है जितना अमित और माधव का था. वह बस अमित की आवाज़ का नक़ल करता है और यह दिखाने की कोशिश करता है कि यह सब बुराइयाँ अमित ही करता है. लेकिन, बाद में वह माधव को स्पष्ट करता है कि यह आईडिया उसे यह महसूस करवाने के लिए था कि जब कोई तुम्हारी प्यारी बहन को छेड़ता है तो तुम्हें कैसा लगता है. इस तरह की सोच पूरी दुनिया में बहुत पॉपुलर है– जब एक आदमी दुसरे आदमी की औरत से बदतमीजी करता है तो बदले में उसकी औरत से भी यही बदतमीजी करनी चाहिए. जबकि दोनों मामलों में औरतें एक तरह से बेकसूर होती हैं. इसीलिए आदमियों के झगड़े में उनको घसीटने और दंडित करने का यह आईडिया बहुत खतरनाक है.

अगर फ़िल्म में एक छोटा-सा स्पष्टीकरण यह होता कि अपराधी क्यों यह सब अपराध करते हैं तो यह भी कहानी के लिए और भी अच्छा होता, और आखिर में इतनी लड़ाइयों के बाद नायक के चेहरे पर ज़्यादा निशान दिखने चाहिए थे. मेनस्ट्रीम सिनेमा का हीरो सुपर हीरो की तरह होता है लेकिन फिर भी इतनी पिटाई के बाद हीरो के चेहरे में भी कोई न कोई चोट तो आता ही है. इन कमियों के बावजूद “काबिल” वीकेंड के शाम के लिए बहुत अच्छी फ़िल्म है जिसे देखते समय दर्शक रो सकते हैं, हंस सकते हैं और अंत में राहत महसूस कर सकते हैं.

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तत्याना षुर्लेई पोलैंड की रहने वाली हैं, एक इंडोलॉजिस्ट (भारतीय उपमहाद्वीपीय भाषा और संस्कृति की जानकार)  और फिल्म आलोचक हैं. हिंदी की मशहूर पत्रिकाओं और ब्लॉग्स के लिए लिखती रही हैं. पोलैंड के शहर क्राकोव स्थित जेगिलोनियन विश्वविद्यालय से “द कोर्टसन फिगर इन इंडियन पॉपुलर सिनेमा: ‘ट्रेडिशन, स्टीरियोटाइप, मैनिपुलेशन” नामक विषय पर पीएचडी हैं. वर्तमान में मनिपाल विश्वविद्यालय, कर्नाटक के यूरोपीय अध्ययन संस्थान में पढ़ाती हैं.

सीरिया को यहाँ से देखो: माने मकर्तच्यान

सीरिया के बारे में एक भारतीय के रूप में हमें कुछ नहीं पता है. हम भारतीय सचमुच के भारतीय रह नहीं गए हैं. जिनके कारण हमें भारतीय तमगे से नवाजा जाता है वह एलिट भारतीयता है. जिसकी जडें इंग्लैंड,अमेरिका और यूरोप से जुड़ी हैं. यही जडें भारतीय मानस का विश्वबोध विकसित करने में सबसे ज्यादा रोल अदा करती हैं. यह अकारण नहीं हैं कि दक्षिणपंथी ताकतों से लेकर वामपंथी  तक सीरिया के बारे में एकमय राय रखती हैं. सीरिया को यहाँ से देखो मतलब पूरब के नजरिये से देखने का मतलब क्या होता है, इस आर्टिकल से समझा जा सकता है.

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Bulent Kilic/Agence France-Presse — Getty Images

सीरिया में शतरंज

By माने मकर्तच्यान

सीरिया

यह नाम आज दुनिया के कोने-कोने में चर्चा में है. वर्षों से राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय  मीडिया की मुख्य ख़बरों में सीरिया का नाम उछलता रहा है. मध्य एशिया के इस मुल्क की ज़मीन किन शक्तियों के बीच संघर्ष का केंद्र बनी है और सीरिया में हो रही घटनाएँ क्यों विश्व की राजनीति का भविष्य तय करने वाली हैं – इस पेचीदगी को समझने का प्रयास करते हैं.

नक्शे पर सीरिया को देखें तो पाते हैं कि यह देश पूर्वी गोलार्द्ध पर और विभिन्न संस्कृतियों के केंद्र में स्थित है. उत्तर में आर्मीनियाई तोरोस पर्वतमाला ने मध्य पूर्वी के इस देश को माइनर एशिया से पृथक कर दिया है. पश्चिम में भूमध्य सागर तटीय क्षेत्र, पूर्व में मेसोपोटामिया और दक्षिण में अरब रेगिस्तान से यह मुल्क घिरा हुआ है. राजनीतिक मानचित्र के अनुसार पश्चिम में लेबनान, उत्तर में तुर्की, पूर्व में इराक, दक्षिण में जॉर्डन और पश्चिम दक्षिण में इजरायल से उसकी सीमाएं बांधते हैं. आज का सीरियाई अरब गणतंत्र मात्र 70 साल पुराना है लेकिन सीरियाई सभ्यता का आरंभ लगभग 6000 ई.पू. माना जाता है. इसके प्रमाण वहां विश्व प्राचीनतम शहरों जैसे एब्ला, मारी, उगारित आदि में देखने को मिलते हैं. इसकी राजधानी दमिश्क पृथ्वी पर निरंतरता में बसे हुए सबसे पुराने नगरों में से एक है. इस शहर का प्रारंभिक उल्लेख 15वीं शताब्दी ई.पू. मिस्र के फ़िरौन तुतमोस तृतीय के भौगोलिक नक्शे में पाया जाता है. पहाड़ों से घिरे तथा जीवन के लिए आवश्यक जल स्रोत बराडा नदी के नज़दीक होने के कारण इसकी अवस्थिति सामरिक और नागरिक दोनों ही दृष्टियों से महत्वपूर्ण है. देश का व्यापारिक महत्व रखनेवाला दूसरा शहर अल्लेपो है जो कि उतना ही प्राचीन है.

हज़ारों सालों से व्यापारिक, आर्थिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक और सामरिक चौराहे पर स्थित यह भूखंड शुरु से ही विश्व की विभिन्न शक्तियों से प्रभावित और नियंत्रित होता रहा है. यहीं से विश्व के सभी छोटे-बड़े विजेता गुज़रे हैं. अकाडिनी-सुमेरों से लेकर हित्तियों, मिस्र के फ़िरौन, अश्शूर और आक्मेनिड फ़ारसियों तक यहां आए. सिकंदर के बाद 87 ई.पू. में आर्मीनियाई राजा तिग्रान के साम्राज्य में सीरिया का मिल जाना और आगे 64 ई.पू में रोमन साम्राज्य का इस पर कब्ज़ा हो जाना उल्लेखनीय घटनाएं हैं. इसके उपरांत समय समय पर सेल्जुक तुर्क, क्रूसेडर्स, मंगोल, मिस्र के मामलुक अन्य जातियां यहां तबाही मचाकर गुज़र चुकी हैं.

सीरिया 16वीं सदी से अगली 4 सदियों तक उस्मान तुर्कों के अधीन रहा. 1918 में प्रथम विश्व युद्ध में उस्मानी साम्राज्य की हार के बाद सीरिया एक स्वतंत्र राज्य बनने की उम्मीद में था कि फ्रांस व् ब्रिटेन ने मध्यपूर्व का आपस में बंटवारा कर लिया. सीरिया फ्रांस के नियंत्रण में आ गया. सन् 1920 में हाशमी परिवार के फ़ैज़ल प्रथम के अंतर्गत सीरिया कुछ महीनों के लिए स्वतंत्र राज्य बनकर उभरा. 1936 के सितंबर में सीरिया और फ्रांस के बीच सीरिया की स्वतंत्रता को लेकर एक मसविदे पर दस्तख़त हुए और हाशिम अल-अतास्सी को सीरियाई आधुनिक गणराज्य के प्रथम राष्ट्रपति के रूप में चयनित करने की योजना बनी. हालांकि यह संधि अस्तित्व में कभी नहीं आई क्योंकि फ्रेंच विधानमंडल इस करार की पुष्टि से मुकर गया. सीरियाई राष्ट्रवादियों और अंग्रेज़ों के सतत दबाव में अप्रैल,1946 में फ्रांस को अपनी सेना सीरिया से हटा लेने पर मजबूर होना पड़ा और अंततः उन्होंने सीरियन रिपब्लिकन सरकार के हाथ में देश की सत्ता सौंप दी.

वर्तमान राष्ट्रपति बशर अल-असद के पिता हाफ़िज अल-असद का जन्म निर्धन परिवार में हुआ था. विद्यार्थी रहते हुए ही वे बाथ पार्टी से जुड़ गए थे. आगे चलकर वे सीरियन एयर फोर्स में लेफ़्टिनेंट बन गए. 1963 के सीरिया में तख़्तापलट के उपरांत बाथिस्ट सेना का पुरे सीरिया पर नियंत्रण हो गया और उससे जुड़े हाफ़िज अल-असद सीरियन एयर फोर्स के कमांडर नियुक्त कर दिए गए. 1966 में एक और तख़्तापलट के उपरांत वे रक्षा मंत्री बना दिए गए और अपने देश की राजनीति में बहुत लोकोप्रिय होते चले गए. यही वजह थी कि जब उन्होंने समस्त सीरियन सेना के अध्यक्ष सालाह जदीद को निकाल बाहर किया तो कोई हाय-तौबा नहीं मची. 1970 में वे सीरिया के प्रधानमंत्री बन गए और 71 में राष्ट्रपति पद के लिए चुन लिए गए. उसी अप्रैल में मिस्र के अनवर सादात, लीबिया के मुअम्मर गद्दाफ़ी के साथ हाफ़िज असद ने ‘फेडरेशन ऑफ अरब रिपब्लिक्स’ नाम का संघ बनाने की चेष्टा की. यह समझौता विश्व राजनीति में एक बहुत ही मजबूत गठबंधन का रूप ले सकता था. इस विचार का इन तीनों मुल्कों की जनता में जबरदस्त स्वागत भी हुआ किन्तु यह संघ मात्र पांच वर्षों तक ही चल पाया. और इन तीनों मुल्कों में अनेक मुद्दों पर कभी भी पूरी तरह सहमती नहीं बन पाई. 1982 में हम्मा शहर की घेरेबंदी और विरोधी मुस्लिम ब्रडरहुड के उदय के बीच हम्मा के चालीस हज़ार नागरिकों की हत्या का आरोप भी हाफ़िज असद पर लगा. 1983 के नवंबर में हाफ़िज को हृदयघात हुआ. उसी समय उसके भाई रिफ़ात अल-असद जो तब सीरियन सेना के प्रमुख हुआ करते थे, ने हाफ़िज का तख़्तापलट करने की नाकाम कोशिश की. 1994 में हाफ़िज के सबसे बड़े बेटे की कार दुर्घटना में हुई मौत के उपरांत हाफ़िज अधिक बीमार रहने लगे. इन्हीं परिस्थितियों में 1994 में हाफ़िज के छोटे बेटे बशर अल-असद को सीरिया की राजनीति में लाया गया. जून 2000 में हाफ़िज असद की मृत्यु हो गई किन्तु उसके पहले ही उन्होंने सेना एवं उच्च पदाधिकारियों का समर्थन बशर के पक्ष में सुरक्षित कर लिया था. सत्तांतरण निर्विघ्न रूप से हो गया. असद ने पहले बाथ पार्टी का नेतृत्व संभाला और फिर सीरिया के राष्ट्रपति निर्वाचित कर लिए गए. लेबनान के 2005 के ‘सीडर रिवोल्यूशन’ के बाद वहां की सीरियाई समर्थन वाली सरकार का पतन हो गया और सीरियन सेना को वहां से हटना पड़ा. इससे बशर की साख़ को काफ़ी बट्टा लगा किन्तु फिर भी वह 2007 में दुबारा राष्ट्रपति चुन लिए गए.

अल्पसंख्यक अलावित (शिया मुसलमानों की एक धारा) के प्रभुत्व वाली इस सरकार के अंतर्गत सीरिया आदर्श मुल्क नहीं है, ख़ासकर नागरिक-मानवाधिकारों और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के मामलों में. बावजूद इसके यह अरब दुनिया में एक मात्र बचा हुआ स्वतंत्र धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र है. तुर्की और सऊदी अरब के मानवाधिकार-हनन के सामने सीरिया अभी भी शरीफ़ दिखता है. इसके लोकप्रिय, साम्राज्यवाद विरोधी और धर्मनिरपेक्ष सोच का आधार वहां की बाथ पार्टी (सीरियाई सरकार) की नीतियों से प्रेरित है, जिसमें मुस्लिम, ईसाई और द्रूज तीनों ही धर्मों के लोग शामिल हैं. मिस्र और ट्यूनीशिया के विपरीत, सीरिया में राष्ट्रपति बशर अल-असद को बड़ा जनसमर्थन प्राप्त है.

हालांकि हाल के वर्षों में बढ़ती बेरोज़गारी, सामाजिक स्तर और स्थितियों में गिरावट आई है और यह अकारण नहीं है कि वहां बड़े पैमाने पर विरोध प्रकट होते रहे हैं. विशेष रूप से 2006 में अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष के निर्देश पर मितव्ययिता, वेतन वृद्धि पर रोक, वित्तीय प्रणाली की नियंत्रण मुक्ति, व्यापारिक कानूनों में ‘सुधार’ और निजीकरण जैसी औषधियां पिला देने के उपरांत.

2010 में ह्यूमन राइट्स वॉच के अनुसार मानवाधिकारों के मामलों में सीरिया ‘दुनिया के सबसे ख़राब देशों में था’. सीरियाई अधिकारियों पर लोकतंत्र का ध्वंस करने, मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को गिरफ़्तार करने, वेबसाइटों पर रोक लगाने, ब्लॉगर्स को हिरासत में लेने और यात्रा पर प्रतिबंध लगाने जैसे अनेक आरोप लगाये गए. सीरिया के संविधान में लैंगिक समानता का अधिकार है किन्तु आलोचकों का कहना है कि व्यक्तिगत कानून और दंडसंहिता स्त्रियों के अधिकारों को सुरक्षित नहीं रख पाते. यही नहीं, वह पुरुषवादी ’प्रतिष्ठाजन्य हत्याओं’ के प्रति भी नर्म है।

2010 में ही मध्य-पश्चिमी एशिया एवं उत्तरी अफ्रीका में श्रृखंलाबद्ध विरोध-प्रदर्शन का दौर आरंभ हुआ जिसे अरब स्प्रिंग या अरब जागृति नाम से जाना जाता है. ‘अरब स्प्रिंग’ क्रान्ति ने अरब जगत के साथ-साथ समूचे विश्व को हिलाकर रख दिया था. इसकी शुरुआत ट्यूनीशिया में 17 दिसंबर,2010 को मोहम्मद बउजिजी- एक फेरीवाले के आत्मदाह से हुई थी. इस क्रांति की लपटें अल्जीरिया, मिस्र, जॉर्डन, यमन तथा अरब लीग व् इसके आसपास के क्षेत्रों में फैल गई. सीरिया भी उससे अछुता न रहा.

सीरियाई गृह युद्ध

सीरियाई गृहयुद्ध जॉर्डन की सीमा पर सटे एक छोटे से शहर दारा से शुरू हुआ. 17 मार्च,2011 को बशर अल-असद के त्यागपत्र की मांग को लेकर लोग सड़कों पर उतर आए. सीरिया का यह तथाकथित ‘शांतिपूर्ण’ विरोध-प्रदर्शन सीरियन सेना द्वारा बलपूर्वक दबा दिया गया. उसी जुलाई में सेना से टूटे हुए समूहों ने ‘मुक्त सीरियन सना’ के गठन की घोषणा की.

9 नवंबर,2011 तक संयुक्त राष्ट्र के मुताबिक राष्ट्रपति बशर अल-असद के ख़िलाफ़ विद्रोह के दौरान 3500 से अधिक मौतें हुई, जिसमें से 250 से अधिक सिर्फ़ 2 साल तक के बच्चे थे. कहा जाता है कि अनेक अल्पव्यस्क लड़कों के साथ सुरक्षाबल के अधिकारियों ने सामूहिक बलात्कार भी किया. विरोध की लपटें तेजी से चारों ओर फैल गईं.

अगस्त 2013 में असद सरकार पर अपने नागरिकों के ख़िलाफ़ रासायनिक हथियार इस्तेमाल करने का आरोप लगा. जून में ही व्हाइट होउस ने घोषित किया था कि अमेरिका को इस बात का विश्वास है कि असद ने राष्ट्रपति पद की सीमाओं का उल्लंघन करते हुए अप्रैल में अपनी निरीह जनता पर रासायनिक हथियारों का प्रयोग किया है. हालांकि इस बात का कोई पुख़्ता सबूत वे अब तक नहीं दे पाए हैं. अमेरिकी विदेश सचिव जॉन केरी ने दावा किया कि उनकी यह जानकारी अखंडनीय है. यह भी कहा “दुनिया किसी मुगालते में न रहे, और उन तमाम लोगों पर हर हाल में जिम्मेदारी तय की जाएगी जिन लोगों ने विश्व की सबसे निरीह जनता पर जघन्यतम हथियारों का इस्तेमाल किया है कि इस दुनिया में कुछ भी और नहीं है जो इससे अधिक गंभीर हो!”

बशर अल-असद के इस संभावित अमानवीय कृत्य पर किसी भी तरह की नरमी न बरतते हुए भी यह कहना आवश्यक है कि सीरिया पर 12,192, इराक पर 12,095, अफ़गानिस्तान पर 1,337 बम गिराने वाले और इराक में यूनाइटेड नेशनस असिस्टेंस मिशन फॉर इराक की रिपोर्ट के मुताबिक 2016 में अकेले इराक में 19,266 नागरिकों को बमबारी से मार देने वाले ‘शांति दूत’ और नोबल पुरस्कार विजेता बराक ओबामा और उनके प्रशासन के मुंह से यह उक्ति अशोभनीय लगती है.

बहरहाल, अमेरिका में इज़रायल के तत्कालीन राजदूत माइकल ओरेन ने वॉल स्ट्रीट जर्नल में तब साहित्यिक अंदाज़ में लिखा था कि “असद ने अपनी स्वतंत्रता मांगती जनता पर जो हिंसक हमला किया है वह इज़रायल के इस भय की पुष्टि करता है कि सीरिया के जिस शैतान को हम जान गए हैं वह उस शैतान से भी बदतर है जिसे हम अब तक नहीं जानते”. मई,2011 तक इज़रायल के शीर्ष अधिकारियों- प्रधानमंत्री, रक्षा मंत्री, विदेश मंत्री और राष्ट्रपति सबने सार्वजनिक रूप से घोषित कर दिया था कि वे असद का पतन देखने को आतुर थे. यह उन्होंने ओबामा की ऐसी ही घोषणा के तीन माह पूर्व कर लिया था. तब से सीरिया फिर एक बड़ी त्रासदी झेल रहा है.

किसकी किससे है लड़ाई ?

मुख्य रूप से सीरिया में चार भिन्न संगठनों के बीच युद्ध चला है. सीरियाई सरकार जिसमें अलावितों का बहुमत है. विरोधी दलों जिसमें सुन्नी मुसलमानों का बहुमत है, आइ.एस.आइ.एल या दाएश जो भी कह लें जो सलाफ़ी और वहाबी पंथ को मानने वाले सुन्नी हैं और कुरदीश रोजावा जो आम तौर पर शिया हैं. राष्ट्रपति असद के नियंत्रण में मुख्य रूप से सीरिया का पश्चिमी भाग और तटीय क्षेत्र है. इनका युद्ध सीधे तौर पर आइ.एस.आइ.एल और उन विपक्षी दलों के साथ है, जिसके अनेक घटकों ने मिलकर खुद को मुक्त सीरियन सेना की संज्ञा दे रखी थी. इस सेना का 2012 में एक दूसरे से मतभेद रखते अनेक खण्डों में विभाजन हो गया जिसका एक हिस्सा अतिवादी इस्लामिक संगठनों जैसे कि अल नुसरा/अल कायदा के साथ हो लिया और अन्य हिस्से बिना कट्टर जेहादी बनें असद के ख़िलाफ़ लड़ते रहे.

इस्लामिक स्टेट ऑफ इराक (आइ.एस.आइ.) के नेता अबू बक्र अल-बग़दादी ने अप्रैल 2013 में सीरिया में अल कायदा समर्थित आतंकवादी समूह में जो कि खुद को जबत अल नुसरा या नुसरा फ्रंट कहते हैं, का विलय किया और खुद को आइ.एस.आइ. के बजाय आइ.एस.आइ.एल (इस्लामिक स्टेट इन इराक एंड द लेवांत) या आइसिस कहने की घोषणा कर दी. हालांकि अल नुसरा फ्रंट के नेता अबू मुहम्मद अल-जव्लानी ने विलय के दावे का खंडन किया था. वैसे एक ही अतिवादी धारा के इन गुटों में विलय होना या न होना बाकियों के लिए कोई ख़ास मायने नहीं रखता है.

इस्लामी राज्य आज विश्व शांति के लिए ख़तरा माना जाता है.आइसिस तीन साल में इराक के बाद अपने आतंकी शिंकजे को सीरिया में फैला लिए और 29 जून,2014 को इस्लामी ख़लीफ़ाई साम्राज्य के निर्माण की घोषणा कर दी तथा विश्व के अनुमानित 1.5 अरब मुसलमानों को भी इस साम्राज्य का सदस्य बता दिया. आइसिस के ख़िलाफ़ कोई एक संयुक्त मोर्चा नहीं लड़ रहा है. रूसी वायु सेना समर्थित सीरियन सरकारी सेना, अमेरिका के नेतृत्व में पाश्चात्य गठबंधन, साथ ही कुर्द, लेबनान, इराक आर इरान के शियाई ताकतें आइसिस नामक भयानक बीमारी के ख़िलाफ़ लड़ रहे हैं. हालांकि पश्चिमी गठबंधन की यह नूरा कुश्ती है या सचमुच की लड़ाई यह भविष्य ही बतायेगा.

गौरतलब है कि जहां आइसिस का प्रभुत्व फैला वहां आतंक मचाना और सैकड़ों हज़ारों आम नागरिकों का कत्ल करना तो सामान्य बात थी. असंख्य युद्ध अपराध तथा विशेष रूप से अल्पसंख्यक येज़ीदियों और कुर्दों का नरसंहार भी किया गया. जनवरी, 2014 से लेकर 25 अप्रैल 2015 तक सिर्फ़ इराक में 28,34,676 लोग विस्थापित कर दिए गए जिसमें बच्चों की संख्या 13 लाख थी. इस्लामिक स्टेट के धर्म-पिता और उनकी ही तरह सलाफ़ी धर्म को मानने वाले सऊदी अरब का मानवाधिकारों का ट्रैक रिकॉर्ड भी घिनौना रहा है किन्तु अमेरिका जैसे उनके मित्र राष्ट्रों को उसपर किसी भी प्रकार की आपत्ति नहीं होती.

बहरहाल सीरिया का उत्तरी भाग रोजावा के नियंत्रण में है, जिसकी कमान कुर्दों की जनतांत्रिक संघ ईकाई वाई.पी.जी.के हाथ में है. गृहयुद्ध के दौरान असद सरकार ने अपनी सेना को रोजावा से हटा लिया था तबसे वहां आइसिस व विद्रोहियों के ख़िलाफ़ स्थानीय कुर्द लड़ाकुओं का युद्ध ज़ारी है. आज के दिन रोजावा और असद सरकार के बीच संबंध एक दूसरे के अस्तित्व के लिए ख़तरनाक नहीं रह गए हैं.

सीरिया और उसके विशाल पड़ोसी राज्य तुर्की के बीच संबंध तनावपूर्ण रहे हैं. इसका मुख्य कारण सीरिया की ओर से कुर्दिश स्वायत्त राज्य की स्थापना का समर्थन और तुर्की बांधों की समस्या है, जो सीरिया के लिए पानी की आपूर्ति में बाधा पहुंचाते हैं. इस गृहयुद्ध के दौरान तुर्की ने सीरियाई सरकार के विद्रोही दलों तथा आइसिस का भी बड़े पैमाने पर समर्थन किया और रोजावा की स्वायत्तता के खि़लाफ़ रहा.

पर इन सबसे बढ़कर बाहरी ताकतों का भिन्न स्तरों पर हस्तक्षेप बेहद महत्वपूर्ण है. सीरिया को लेकर संयुक्त राष्ट्र के वीटो शक्तियों के बीच दो समूहों में बंटवारा हो गया, एक पश्चिमी-अमेरिका के नेतृत्व में ब्रिटेन, फ्रांस, यमन, संयुक्त अरब अमीरात, कतर और 2016 के दिसंबर तक तुर्की सहित का गठबंधन और दूसरा पूर्वी -रूस, सीरिया, चीन, इरान का गठबंधन.

अमेरिका के नेतृत्व में पश्चिमी गठबंधन असद की सरकार को गिराने हेतु आइसिस व विद्रोहियों या विपक्षी दलों का समर्थन और प्रशिक्षण प्रत्यक्ष-परोक्ष रूप से करता रहा जबकि रूस और चीन युद्ध में असद सरकार के समर्थन में खड़े रहे.

15-16 नवम्बर,2015 को जी20 समिट में पुतिन के बयान ने सीरिया के इस गृह युद्ध की शक्ल ही बदल डाली. रूस के राष्ट्रपति ने तुर्की और अमेरिका के गठबंधन पर प्रहार करते हुए कहा कि आइसिस की आमदनी तेल और पट्रोलियम उत्पादों के अवैध व्यापार से होती है. प्रतिदिन तुर्की से इराक तक अंतहीन ट्रकों की शृंखला का खुलासा करने वाले उपग्रह चित्रों के माध्यम से अपनी बात की पुख़्ता करते हुए पुतिन ने कहा कि आइसिस की भिन्न-भिन्न इकाइयों का वित्तपोषण करने वाली ताकतों में 40 देश और उसी जी20 के कुछ सदस्य भी शामिल हैं. साथ ही यह भी कहा कि आइसिस को जड़ से तब तक ख़त्म करने में सफ़ल नहीं होंगे जब तक उनके आर्थिक स्रोतों को काट न दिया जाएं.

30 सितम्बर,2015 को सीरिया की सरकार के अनुरोध पर रूसी वायु सेना सीरिया में घुस गई. सीरियाइ सेना रूस की मदद से न सिर्फ आइसिस के विस्तार को रोकने में सफ़ल हुई, बल्कि उन्हें भारी नुक्सान भी पहुँचाया. तब से अब तक आइसिस ने 4600 वर्गमील भू-भाग और अपने 35,000 लड़ाकुओं को खो दिया है. सीरियाई सेना स्थानीय नागरिक सेनाओं के साथ मिलकर 586 शहरों व् गांवों को आइसिस से मुक्त करा चुकी है.

अगस्त, 2014 में ओबामा की आइसिस के ख़िलाफ़ बमबारी की घोषणा से उनकी विश्व भर में प्रशंसा हुई किन्तु सवाल यह उठता है आइसिस से चल रही इस लड़ाई में अमेरिका तीन सालों से कर क्या रहा था? अमेरिका का खुफिया तंत्र और सैन्य तंत्र अपने जानते दोहरी चाल खेल रहे है. एक तरफ तो आइसिस को हथियारों, प्रशिक्षण और सामरिक साधनों से लैस कर रहे हैं और दूसरी तरफ़ विद्रोही दलों को सीरियन आर्मी तथा आइसिस से लड़ने का प्रशिक्षण भी दे रहे हैं. अमेरिका असद को हटाना चाहता है और आइसिस भी यही चाहता है. चाणक्य की उक्ति ‘शत्रु का शत्रु मित्र’ के अनुसार असद को गिराने में अमेरिका और आइसिस मित्र हो जाते हैं. आइसिस से कोई प्यार न रखते हुए भी चूँकि असद को गिराना अमेरिका की पहली प्राथमिकता है तो आइसिस के साथ वन-नाईट स्टैंड की तर्ज पर हमबिस्तर होने में उन्हें कोई गुरेज नहीं होता. ख़ैर, दो नावों पर सवार होने का नतीजा क्या हो सकता है यह बार-बार भुगतने के बावजूद अमेरिका सीखने को तैयार नहीं दिखता. यह मानना भी संभव नहीं है कि अमेरिकी कांग्रेस और पेंटागन में समन्वय टूट चूका है और दोनों मुक्त रूप से अलग अलग नीतियों पर चल रहे हैं.

सीरियाई युद्ध कैसे उभरा?

सीरियाई युद्ध को समझने के लिए उसकी शुरुआत कहां से हुई और कैसे हुई समझना आवश्यक है. विश्वभर में लोगों को प्राप्त जानकारियां मुख्यधारा के माध्यमों द्वारा प्रचारित ख़बरों के ऊपर टिकी हुई है, जबकि अनेक सूत्रों से यह पता चलता है कि दारा से शुरू हुआ सीरियाई गृहयुद्ध मोसाद (इज़रायल खुफ़िया एजेंसी) और पश्चिमी शक्तियों द्वारा इस्लामी आतंकवादियों को स्थापित करने की एक सोची समझी योजना थी.

पहला महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि पश्चिमी मीडिया द्वारा सामने लाई गई यह ख़बर कि दारा आन्दोलनकारियों पर सीरियाई पुलिस और सशस्त्र बलों ने अंधाधुंध फायरिंग की और निहत्थे ’लोकतंत्र समर्थक’ प्रदर्शनकारियों की हत्याएं की और यह सही भी था किन्तु जिस बात का उल्लेख करना पश्चिमी मीडिया सुविधानुसार भूल गया, वह यह था कि प्रदर्शनकारियों में आतंकवादी निशानेबाज़ और हथियारबंद योद्धा भी थे, जो सोची-समझी रणनीति के तहत सुरक्षा बलों और प्रदर्शनकारियों दोनों पर गोलियां बरसा रहे थे. यह इस बात से भी साबित होता है कि दारा में मरने वालों में पुलिसकर्मियों की संख्या प्रदर्शनकारियों की तुलना में अधिक थी. और यह ख़बर कोई और नहीं, इज़रायल नेशनल न्यूज़ रिपोर्ट ने प्रसारित की थी, जो कि किसी भी हालत में दमिश्क के पक्ष में प्रचार नहीं करते. इससे यह स्पष्ट होता है कि दारा के आन्दोलन में पुलिसबल शुरुआत में बुरी तरह सशत्र जिहादियों द्वारा घिर गया था, न कि शांत आंदोलनकारियों पर गोलियां बरसा रहा था.

दूसरा महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि दारा के आन्दोलन में बाहरी शक्तियों की संलिप्तता का अंदाजा इस बात से भी लगता है कि यह सारा आन्दोलन दमिश्क या अलेप्पो में, जो कि प्रतिपक्ष के गढ़ हुआ करते थे, से न होकर जॉर्डन की सीमा पर स्थित दारा में हुआ. इन्टरनेट पर उपलब्ध अनेक औपचारिक सूत्रों के अनुसार (अल जजीरा और सी.एन.एन समेत) सीरियाई रेबेल्स को सीआईए द्वारा बड़े पैमाने हथियार उपलब्ध कराए गए थे और यह वर्षों तक जॉर्डन व् तुर्की की सीमा से होता रहा.

 ‘प्रोजेक्ट फॉर दी इन्वेस्टीगेशन ऑफ करप्शन एंड आर्गनाइज़्ड क्राइम’ (ओ.सी.सी.आर.पी) के जुलाई,2016 की रिपोर्ट के अनुसार युक्रेन, बोस्निया, बल्गेरिया, क्रोएशिया, चेक गणराज्य, मोंटेनेग्रो, स्लोवाकिया, सर्बिया और रोमानिया जैसे यूरोपीय देशों ने सैकड़ों टन की संख्या में राइफलों, मोर्टारों, रॉकेट लंचेर्स, टैंक रोधी हथियारों तथा भारी मशीनगनों को जिसकी कुल कीमत 12 लाख यूरो भी (वास्तविक आंकडें भविष्य बताएगा), सऊदी अरब और जॉर्डन व् तुर्की के जरिए सीरियाई लड़ाकुओं और आतंकवादियों के हाथ में थमा दिया. यद्यपि यू.एस. का बराबर कहना यह रहा है कि वे सिर्फ़ सीरियन लड़ाकुओं को चुन चुनकर प्रशिक्षित करते थे, आइसिस को नहीं. पर तथ्यों का कुछ और ही कहना है.

प्रसिद्ध मानवाधिकार समूह एमनेस्टी इंटरनेशनल द्वारा प्रकाशित 44 पृष्ठ के रिपोर्ट के मुताबिक आइसिस के पास अमेरिका-निर्मित भारी शस्त्रागार पाया गया था (जिसकी घोषणा रूस के रक्षा अधिकारियों ने भी बारंबार की है), जो कि इराकी सेना व उन्हीं सीरियन लड़ाकुओं से आइसिस को प्राप्त हुआ था. आइसिस के कब्ज़े में पाए गए हथियारों व गोला-बारूद का ज़खीरा ‘अंततः इस बात को दर्शाता है कि इराक में दशकों तक ग़ैर ज़िम्मेदारी से हथियार सप्लाई किए गए और अमेरिका के नेतृत्व में अधिकृत प्रशासन हथियारों के वितरण तथा स्टॉक को सुरक्षित रूप से प्रबंधन करने में नाकाम रहा.” अमेरिका और उसके गठबंधन में अन्य आपूर्तिकर्ता देशों की सोची-समझी साज़िश के तहत लापरवाही से, गै़र ज़िम्मेदारी या ‘जान बूझकर’ आइसिस के आतंकवादियों को हथियार पकड़ा दिए, यह बहस का मुद्दा है.

इज़रायली खुफिया सूत्रों (देखें देबका, 14अगस्त, 2011) तक ने इसको छिपाया नहीं हैः “शुरुआत से ही नाटो और तुर्की के हाई कमान द्वारा इस्लामी ‘स्वतंत्रता सेनानियों’ को  प्रशिक्षित और हथियारबंद किया गया. अफगान-सोवियत युद्ध से बचे हज़ारों मुजाहिदीनों को सी.आई.ए के इस धर्मयुद्ध में नियुक्त किया गया. इस पूरी योजना को सऊदी अरब और कतर का सक्रिय समर्थन प्राप्त था. आगे चलकर यह तथाकथित इस्लामी स्वतंत्रता सेनानी अल-नुसरा और आइसिस में समन्वित हो गए.” अपनी नाक बचाने के लिए अमेरिका अब चाहे स्वतंत्रता सेनानी जैसी पावन-सी संज्ञाएँ गढ़ता रहे, पर तथ्य यह है कि अमेरिका अपनी समस्त मूर्खताओं समेत अल-नुसरा और आइसिस का पोषण कर रहा था.

पुरस्कृत लेखक मिख़ाइल चोसुदोव्स्की, जो कि ओटावा विश्वविद्यालय में अर्थशास्त्र के प्रोफे़सर रह चुके हैं, और वर्तमान में वैश्वीकरण संबंधी अनुसंधान केंद्र के निदेशक हैं, के अनुसार सीरिया में विरोध प्रदर्शन का ढांचा लीबिया में ही बनाया गया था. “पूर्वी लीबिया में ‘लीबिया इस्लामिक लड़ाकू समूहों’ को ब्रिटिश एमआइ6 और सी.आई.ए का समर्थन पहले से ही प्राप्त था. सीरिया में मीडिया के झूठ और जालसाजी से निर्मित विरोध प्रदर्शन का उद्देश्य धर्मनिरपेक्ष मुल्क को कमज़ोर करना था और मानवोचित उद्देश्य के नाम पर अपनी ग़ैर कानूनी दखलंदाज़ी को ‘संयुक्त राष्ट्र’ से हरी झंडी दिलवाना था”.

तीसरा उल्लेखनीय तथ्य यह है कि जब ओबामा से पूछा गया था कि आइसिस सशक्त बनता जा रहा है तो ओबामा ने उत्तर इस विश्वास के साथ दिया था कि मानो आइसिस पूरी तरह उनके ही नियंत्रण में हो. “मुझे नहीं लगता कि वे कुछ अधिक ताकतवर हो रहे हैं. शुरू से ही हमारा उद्देश्य उन पर नियंत्रण रखना रहा है और हम इसमें सफ़ल रहे हैं….इराक में उनकी बढ़त नहीं हुई है. सीरिया में भी वे बस आयेंगे (असद का अंत कर?) और चले जाएंगे.”

एक तरफ़ अमेरिका का राष्ट्रपति कहता है कि उन्हें नहीं लगता कि आइसिस की बढ़त हुई है और दूसरी तरफ़ उसी अमेरिका का विदेश सचिव स्वीकार करता है कि आइसिस की वृद्धि हुई थी पर उसे रोकने की योजना भी न थी. विकिलीक्स ने हाल ही में संयुक्त राष्ट्र महासभा में सितम्बर,2016 को हुई गुप्त बैठक की रिकॉर्डिंग ज़ारी कर दी है. इसमें अचंभित कर देने वाले तथ्य उभरकर सामने आए हैं. बैठक में अमेरिका के विदेश सचिव जॉन केरी ने सीरियाई सरकार के विद्रोही प्रतिनिधियों को कहा कि उन्हें इस बात का ज़रा भी अंदाज़ा नहीं था कि असद अमेरिका के सामने घुटने टेकने के बजाय रूस के पास चला जाएगा- ‘हम जानते थे कि आइसिस की बढ़त हो रही है…हम देख रहे थे…हमने देखा कि यह बड़ी शक्ति के रूप में उभर रहा है और हमें लगा कि असद पर इससे बेतरह दबाव बनेगा और वह हमसे हमारी शर्तों पर समझौता करने पर मज़बूर हो जाएगा लेकिन ऐसा करने के बजाय उसने पुतिन से समर्थन मांग लिया…हमने सीरिया में बल प्रयोग का तर्क खो दिया’.

यदि अमेरिका को सच में आइसिस के पांव कांटने होते तो जून, 2014 में सीरिया से इराक तक ख़ाली रेगिस्तान के बीच से गुजरने वाले आइसिस के सिलसिलेवार टोयोटा ट्रकों के काफ़िलों को बमबारी से उड़ा न डालते? सीरिया के रेगिस्तान जैसा खुला क्षेत्र तो अमेरिका के प्रतिष्ठित जेट लड़ाकू विमानों (एफ़15, एफ22 रेप्टर, एफ6) के लिए सैन्य दृष्टि से गुड़ियों का खेल होता. यही नहीं, 2015 के अक्टूबर में रूसी और अमेरिकी वायु सेनाओं के बीच सीरिया में आपातकालीन स्थिति के दौरान उड़ान पथों को लेकर मार्गदर्शित करने, बमबारी और अन्य गतिविधियों पर हुए समझौते के तहत रूसी वायु सेना को सटीक जानकारी देने के बजाय पश्चिमी गठबंधन की ओर से भ्रमित तथा दुर्व्यवहार करने के अनेक आरोप लगे हैं. इनमें एक आरोप यह था कि अमेरिकी विमान अपनी उड़ान के स्तर से लगभग एक किलोमीटर (0.62 मील) नीचे जाकर रुसी एस.यू 35 लड़ाकू जेट के मार्ग में बाधा पहुंचाते थे. अमेरिकी सैन्य अधिकारियों ने इस पर रुसी अधिकारियों से माफ़ी भी मांगी थी. इससे भी भयानक घटना 17सितंबर को घटी जब देर एज़-ज़ोर में पश्चिमी गठबंधन द्वारा रूसी विमानों को लक्ष्य से गुमराह कर दिए जाने के बाद किए गए उनके हमले में 62 सीरियन सैनिक मारे गए और 100 घायल हुए. हमले से 2 महीने बाद पेंटागन ने लिखित रूप में स्वीकारा कि घटना “खेदजनक त्रुटि” थी. अमेरिका की अत्याधुनिक व् श्रेष्ठतम सैन्य मशीनरी की ऐसी बेहूदा हरकतों पर वहां के रक्षा सचिव को शर्म से डूब मरना चाहिए था.

सीरियाई गृह युद्ध के कारणों में से सबसे मज़बूत और महत्वपूर्ण कयास यह है कि यह सारा खेल तब शुरू हुआ था जब सन् 2000 में अमेरिका समर्थक कतर ने सऊदी अरब, जॉर्डन, सीरिया और तुर्की के जरिए यूरोप तक प्राकृतिक गैस पहुँचाने वाले दस बिलियन डॉलर, 1500 कि.मी. पाइपलाइन के निर्माण करने की घोषणा की. वहां ईरान की भी पाइपलाइन के निर्माण की योजनाएं थीं जो कि इराक और सीरिया के बीच से निकलने वाली थी और रूस को इस पर कोई आपत्ति नहीं थी. रूस ने कतर और तुर्की पाइपलाइन की योजना को अपने अस्तित्व को ख़तरे में डालने वाली नाटो की साजिश बताया. यूक्रेन में 2014 के विद्रोह के पीछे भी यही साजिश थी जहां से रूस के 80% गैस का रास्ता गुजरता था और जिस पर नाटो की निगाहें टिकी हुई थी. युक्रेनियन युद्ध के ठीक पहले अमेरिकी उपराष्ट्रपति बायडेन के पुत्र, केरी परिवार यूक्रेन के सबसे बड़े नेचरल गैस के प्रोडूसर बोर्ड में शामिल कर लिए गए, क्रांति हुई और आख़िर नाटो अपने मिशन में कामयाब हुआ. विकिलीक्स द्वारा हिलरी क्लिंटन के गुप्त कागजों के खुलासे से यह भी स्पष्ट होता है कि लीबिया और सीरिया में यह सारा षड्यंत्र इसलिए भी रचा गया है क्योंकि वे अमेरिकी डॉलर से नाता तोड़ने और पश्चिमी केंद्रीय बैंकिंग के एकाधिकार से मुक्त होना चाहते थे.

बहरहाल, सीरिया के इस युद्ध में रूसी और अमेरिकी सैन्य बलों के बीच कोई सीधा संघर्ष नहीं है. यह तो एक परोक्ष युद्ध है जिसमें पश्चिमी शक्तियों समर्थित विद्रोही दल और उन्हीं शक्तियों द्वारा पोषित आइसिस रूस समर्थित सीरियाई सरकार के ख़िलाफ़ लड़ रहे हैं. इसका जीता जागता उदाहरण अलेप्पो है.

मीडिया का षड्यंत्र

सीरिया के अति प्राचीन और व्यापारिक दृष्टि से महत्वपूर्ण अलेप्पो शहर को आइसिस से मुक्त कराने की लड़ाई यहाँ उल्लेखनीय है. यह आइसिस की रीढ़ तोड़ देने वाली लड़ाई थी, साथ ही साथ ज़ियोनिस्ट ताकतों के इशारों पर नाचती पश्चिमी मीडिया के विद्रूप चेहरा का पर्दाफ़ाश भी कर दिया. एक-एक करके सी.एन.एन., बी.बी.सी., अल जज़ीरा और तमाम मुख्यधारा के मीडिया के नकाब उतर गए. इसमें ट्विटर और फे़सबूक पर सक्रिय एजेंटों की भी पोल खुल गई.

युद्ध की विषम परिस्थितियों में, जहां बिजली आपूर्ति जैसी समस्याएँ आम बात हैं, वहां चंद ‘मासूम नागरिक’ इंटरनेट सुविधा से परिपूर्ण, दुनिया को सीरियाई सेना और रूस की क्रूरता का ‘आंखों देखा हाल’ दुनिया को दिखाने का कर्तव्य निभा रहे थे. ‘यह मेरा अंतिम विडियो है’…‘अलेप्पो में लोग भाग रहे हैं’…‘कोई अब बचा नहीं, सब मर गए हैं’ आदि आदि हैश-टैग करते पोस्टों को लाखों फे़सबूक व् ट्विटर के योद्धाओं ने मीडिया के हाथों की कठपुतली बनकर उनके झूठ और अफ़वाहों को अंतिम सत्य मान लिया और आगे प्रसारित भी किया. इस पूरी प्रक्रिया में आइसिस नाम का उल्लेख ऐसे नदारद था जैसे इस नाम का कोई संगठन कभी रहा ही न हो. नतीजा यह निकला कि सीरियन व रूसी सेना विश्व भर में निंदनीय बन गई. इतना बड़ा मिथ्या-प्रचार अभियान इस युद्ध में पहली बार देखा गया.

यह बात बिल्कुल सही है कि हर युद्ध में कोलैटरल डैमेज भी होता है और आम नागरिक भी मारे जाते हैं. ऐसा हम प्रथम और द्वितीय महायुद्धों जिसमें हिरोशिमा व नागासाकी भी शामिल हैं, से लेकर इराक और अफगानिस्तान के युद्धों में देख चुके हैं जहाँ विपक्षी लड़ाकुओं के अलावा लाखों की संख्या में निरीह नागरिक मारे गए. और ऐसा कुछ अलेप्पो में भी हुआ होगा किन्तु यह विश्वास कर लेना कि रूस की बमबारी में तो निरीह जनता मारी जाती हैं जबकि अमेरिकी बमबारी में एक ही घर में बैठे सिर्फ़ सक्रिय आतंकवादी मारे जाते हैं और आम जन का बाल भी बांका नहीं होता यह नितांत हास्यास्पद विचार है. किसी भी प्रकार की मानवीय क्षति हमारे वक्त की बड़ी त्रासदी है किन्तु युद्ध में किसी के लिए भी इससे पूरी तरह बचना असंभव है.

तथ्य यह भी बताते हैं कि 16 दिसंबर,2016 को फ्रेंच स्वतंत्र मीडिया एजेंसी ( वोल्टेयरनेट.ओर्ग) की ख़बर के मुताबिक सीरियन विशेष बलों द्वारा अलेप्पो शहर के एक बंकर में 14 नाटो अधिकारी जिंदा पकड़े गए थे. सीरिया के नामी सांसद व् अलेप्पो चैम्बर ऑफ कॉमर्स के निदेशक फ़ारेज शहाबी ने अपने फ़ेसबूक पेज पर पकड़े गए अधिकारियों के नाम व् राष्ट्रीयता को भी साझा किया था, जिसमें 8 सऊदी अरब के अधिकारी थे, एक अमेरिका, एक तुर्क, एक इज़रायली, एक कतर, एक जॉर्डन और एक मोरोको का था. 19 दिसंबर को संयुक्त राष्ट्र में सीरियाई राजदूत बशर जा़फ़री ने इस ख़बर की अधिकारिक रूप से घोषणा भी की थी. यद्यपि कई सूत्रों के अनुसार पश्चिमी गठबंधन के अधिकारियों की संख्या उससे भी अधिक थी- 22 अमेरिकन, 16 एमआई, 6 ब्रिटिश एजेंट्स, 21 फ्रेंच, 7 इज़राइली, 62 तुर्की यानि लगभग 150 ऑफ़िसर और सेना प्रशिक्षक आइसिस के संग अलेप्पो की बमबारी में फंस गए थे. इससे पूर्व रूस क्रूज मिसाइल ’कैलिबर’ के हमले से 30 इजराइली व् पश्चिमी देशों के सैन्य सलाहकारों की मौत की ख़बर भी प्रसारित की गई थी और यदि यह सच है तो अपने एजेंट्स को वहां से बचाने के उद्देश से अमेरिका के विदेश सचिव केरी की चिंता वाजिब थी और मास्को से सैन्य अभियान को स्थगित करने का आग्रह भी स्पष्ट हो जाता है. सवाल यह उठता है कि आख़िर पश्चिमी गठबंधन के यह अधिकारी आइसिस के नियंत्रण वाले अलेप्पो में कर क्या रहे थे ? जबकि सीरियाई सरकार ने उन्हें कोई आमंत्रण दिया भी नहीं था.

इन परिस्थितियों में यह संदेह भी पैदा होता है कि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षापरिषद् द्वारा अलेप्पो में सात दिन के लिए मानवीय सहायता हेतु युद्धविराम का प्रस्ताव कहीं ‘अपने’ लोगों को बचाने का प्रयास तो नहीं था? बहरहाल रूस और चीन ने इसका विरोध किया था और इसे पारित नहीं होने दिया था. रूस का मानना था कि इस तरह के अल्पकालिक विराम से आतंकवादी हथियारों का पुनर्संग्रहण कर ताकत इकठ्ठा कर सकते हैं और यह किसी भी हालत में वे नहीं होने देंगे.

अलेप्पो में हुए इस भीषण युद्ध के दौरान रूस ने जिस प्रकार आम जन के बीच सहायता पहुंचाई वह उल्लेखनीय है. अलेप्पो के नागरिकों को शहर से बाहर सुरक्षित जगहों पर पहुँचाने और उन्हें यथासंभव चिकित्सकीय व् अन्य सुविधाएं देने के अलावा सीरियन सेना के विरुद्ध लड़ रही मुक्त सीरियन सेना के 6000 से अधिक लड़ाकुओं को भी जो हथियार डालने को राज़ी हो गए थे, उन्हें अपने परिवार सहित अलेप्पो और इड्लिब शहरों के बीच बने विशेष ‘कॉरिडोर’ से सुरक्षित जगह पर पहुंचाया दिया गया. यह पूरी घटना न सिर्फ़ रूसी वायु सेना व् असंख्य ड्रोनों की निगरानी में हुई बल्कि रूसी रक्षा मंत्रालय के वेबसाइट से लेकर रशियन टुडे के फ़ेसबूक पृष्ठ पर लाइव प्रसारित की जा रही थी. निस्संदेह रूसी प्रचारतंत्र भी सिर्फ़ अपने अच्छे कृत्यों का प्रचार प्रदर्शन अपने पक्ष को मज़बूत करने के लिए कर रहा होगा.

इस तथ्य का यहां उल्लेख अनुचित नहीं होगा कि रूस और सीरिया के साथ साथ अलेप्पो में आइसिस पर जीत का श्रेय ईरान को भी जाता है. सीरियाई कुर्दों का आइसिस के ख़िलाफ़ जंग में ईरानी सैन्य सलाहकारों ने मदद ही नहीं प्रशिक्षण भी दिया था.

बहरहाल युद्ध अभी पूरी तरह से ख़त्म नहीं हुआ है और न ही निकट भविष्य में शांति बहाल होने की संभावनाएं दिख रही हैं. किंतु अब तक के इस युद्ध का यह नतीजा अवश्य निकला है कि अलेप्पो में आइसिस के पतन के उपरांत चमत्कारिक रूप से एरडोगन का हृदय परिवर्तन हो गया है और वे रूस और ईरान के साथ तालमेल बिठाने में लग गए हैं.

इसी क्रम में रूस-ईरान-तुर्की की 27 दिसंबर की बैठक से पूर्व 19 दिसंबर को तुर्की की राजधानी अंकारा के एक संग्रहालय में चित्र-प्रदर्शनी के दौरान रूस के राजदूत आंद्रेई कार्लोव की हत्या कर दी गई. हत्या को लेकर अनेक कयास लगाए जा रहे हैं जिसमें यह भी है कि पश्चिमी गठबंधन की यह कोशिश थी कि तुर्की के साथ रूस का समझौता टूट जाए.

फिलहाल रूस-ईरान-तुर्की के बीच समझौते के तहत सीरिया में अधिकारिक रूप से संघर्ष विराम ज़ारी है. अमेरिका सहित अन्य पश्चिमी शक्तियां भी आश्चर्यचकित रूप से चुप हैं. हालांकि हाल ही में अमेरिका के रक्षा सचिव एश कार्टर ने अपने ब्यान में यह घोषित कर दिया है कि “अमेरिका आइसिस से अकेले लड़ रहा है और रूस ने सीरिया में कुछ भी नहीं किया है. सवाल यह उठता है कि जब रूस ने सीरिया में कुछ भी नहीं किया है (अच्छा या बुरा) तो फिर विश्व भर में उसकी निंदा क्यों करवाई जा रही थी? इन सब बातों से साफ़ पता चलता है कि अब तक विश्व में स्वयंभू रहा अमेरिका युद्ध में असद की सफलता और विश्व राजनीति में रूस की बढ़ती प्रभुता से कितना बौखलाया हुआ है.

हंस के दिसंबर,2015 के संपादकीय में उठाया गया सवाल आज भी उतना ही प्रासंगिक है -“..अफ्रीका, मध्य-पूर्व एशिया, पश्चिमी जगत और इज़रायल के बनते-बिगड़ते समीकरणों, कूटनीतिक पेचीदगियों और जटिल अंतर्राष्ट्रीय संबंधों के बीच एक बड़ा प्रश्न अनुत्तरित रह जाता है. विश्व भर में एक सार्वभौमिक नियम है कि हत्या के लिए हथियार उपलब्ध कराने वाला, प्रशिक्षण और साधन प्रदान करने वाला भी बराबर का दोषी होता है. आइसिस को तो उसके किए की सजा मिलने जा रही है किंतु पश्चिम के इन प्रभुओं को, सऊदी राजशाही को, कतर, तुर्की और इज़रायल को उनके किए की सज़ा कब मिलेगी? यह बड़ा सवाल है.”

ख़ैर, अमेरिकी राष्ट्रपति पद पर एक अल्पशिक्षित बड़बोले और नितांत अभद्र इस नारंगी से जीव के आगमन के साथ ही शांति नोबल पुरुस्कार विजेता ओबामा को अपने किए लाखों वधों की जवाबदेही से छुटकारा मिल जाएगा. आज अचानक ‘ग्लैडिएटर’ फिल्म का एक संवाद याद आ गया – जब रोम का एक सीनेटर अपने क्रूर सम्राट कमोडस के लिए कहता है कि “सम्राट अच्छी तरह जानता है कि रोम क्या है. रोम महज एक भीड़ है. उनको जादू दिखाओ- वे चमत्कृत हो जाते हैं. सम्राट उनके लिए बड़े पैमाने पर मौत लाएगा जिसके लिए वे उसे बेपनाह प्यार करेंगे”.

14859701_1474274785922952_6659694896302909380_oमाने मकर्तच्यान, जेएनयू में शोधरत इंडोलॉजी की छात्रा हैं. आर्मेनिया से आती हैं और वैश्विक गतिविधिओं पर पैनी नज़र रखती हैं. आप उनसे  mane.nare@gmail.com पर संपर्क कर सकते हैं.

साभार- हंस, फ़रवरी, 2016

A journey in the Eastern Himalaya: Anil Yadav

“The mountains lands, and the Himalaya in particular, are visited by travelers, explorers, climbers, naturalist, pilgrims. These are who people who are evanescent, who come and go and vanish, occasionally giving us their impressions in the books and journals which describe their personal experiences, but they tell us little or nothing about the people who eke out a living on hostile mountain slopes. only a very few people have left enduring and insightful records of their experiences.”#Ruskin Bond
And Anil Yadav is one such traveler, not just a tourist, who brings forth an experience of that untouched, unseen, unheard quarters of Himalayas, that a very few of us have a chance of experiencing, in our whole lifetimes. A journey in the Eastern Himalaya, part of a larger account of travels in northeast India.

himalaya

Himalayan: Adventures, Meditation and Life

On to Namdapha and Tawang

By Anil Yadav

My new-found brother Rupah-da turned me over to Nature’s Beckon in front of the Tinsukhia Railway Station. When the Tata 407 mini-bus finally left—after having waited interminably for flustered passengers arriving from god knows where—fowl stuffed into a wicker-basket underneath a seat cackled. There was a sack of potatoes with a hole in it; potatoes popped out and rolled about on the floor. We were eighteen passengers in all, including a ten-year-old, travelling with a group of experts who worked for Nature’s Beckon, an NGO working to build environmental awareness. Our destination: the jungles of Namdapha on the Changlang plateau in Arunachal Pradesh—Namdapha is the highest peak in the region. These jungles, abutting Burma, rise up from swampy wetlands in the plains to snow-covered mountains and spread over an area of 2,000 square kilometres. There is such geographic diversity here that multiple seasons co-exist over contiguous territory. From the jhapi hats, binoculars, packets of crisps and the keen desire to hear the opinions of strangers on the varieties of forests found in different geographical regions of the world, it was clear everyone had done their homework well.

The young director of Nature’s Beckon, Soumyadeep, tried to lighten the atmosphere with timely jokes and tales of travels in the wild but his narration was stolid, and his manner that of a tour guide in a hurry. No tales were told him in reply. A freshly minted young journalist, Pem Thi Gohain, launched an interrogation: What was my salary break-up at the paper I worked for; and who was the editor brilliant enough to send me on this assignment? I distanced myself from him by speaking in English and by shrinking into myself and looking out the window, pretending to be absorbed in the landscape. It was impossible to tell any more lies.

A tyre punctured in Digboi. The diver propped the vehicle on a makeshift jack built out of a pile of bricks and stood on the side of the road, thumbing down trucks to borrow a tyre-iron from. This was going to take a while and I left for a short walkabout in town. Digboi is full of oil-wells; neighbourhoods are named after the bends in the roads next to which they stand. Small hills are dotted with bungalows from the British era. Each bungalow once occupied by a single British family is now shared by many households. Digboi is a sleepy town; one where from the looks of things a heavy breakfast is all that is needed to send one back to bed.

We left and soon after the driver stopped in Margherita. While the rest of us ate, he went off to have the puncture repaired. Santwana Bharali, aka Poppy, was our tour coordinator. She had an MSc in Botany; her cheeks dimpled prettily when she smiled. On of our co-passengers was a psychology nut.According to him, Poppy had followed the driver to the puncture-repair shop only because she wanted to see the tyre-tube fill up with air and become tumescent. I concurred. But when she opened her purse and paid the mechanic, I silently chided the influence of Freud on the manner in which I had agreed with his assessment of Poppy. Archana Niyog, another co-passenger, was what you might call a homely girl; she was serving food to her fellow passengers, urging each to eat some more.

 The large yellow signboard which marks the beginning of the Stilwell Road flashed past us near the railway crossing in Lido. The road, built during the Second World War at enormous cost in terms of the lives of soldiers and labourers, begins in Jairampur in Arunachal Pradesh, enters Burma, spans Kachin territory and terminates in the Kunming province of China. One of the longstanding demands in the region is the reopening of the Stilwell Road so that trade may flourish, but our relations with China remain rocky.

Lido is a vast colliery. Coal dust rained upon me from impossibly tall heaps in a black billowing mist. It is the practice of open-cast mining which gives the town its mysterious, suspicious air.

The olive-green of battle fatigues became increasingly more concentrated once we entered Arunachal Pradesh. A state of high alertness has become the norm in the state after 1962 when China defeated India in war. We were stopped at every checkpoint for interrogation and for our permits to be examined; it was night by the time we were done. When twilight fell everyone looked up at the sky in complete silence. Perhaps its colour reflected their most inward moods. Afterwards, everyone dozed. Red points of light flickered deep within the forests. To avoid the telltale thwack-thwack of axe on tree trunk, a small hole is drilled and a fire set within. The embers smoulder for many days before the tree finally comes crashing down. In many places forests were being burned down to make way for jhum cultivation. Those fires were much more widespread and malignant. Only two per cent of land in the state is under permanent cultivation; either as small terraced fields or as bigger plots in the lowlands.

The bus entered one of the gates to Namdapha. A shaggy animal bolted across the front of the truck and was spot-lit by its headlamps. Eyes opened wide, shoulder joined shoulder in anticipation and heads came together as everyone peered out the windows. Poppy quacked in a sleep-laden voice ‘Porcupine! Porcupine! I know very well that was a porcupine.’

The hedgehog vanished under the bushes on the side of the road. The ten-year-old found his long-awaited opportunity to lay hands upon his father’s binoculars—so what if it was dark? The mini-bus halted near a waterfall. The air was rank with the odour of swamp deer, of which there must have been a herd nearby. Jain-ul-Abedeen, aka Benu Daku, is an experienced hunter who quit his hereditary profession to become an environmentalist. He said, snorting, ‘They are foolish animals. Once spooked by torches they can’t run. Hunters get them easy.’

It was a four-kilometre hike from the waterfall to the resthouse. Bags on backs, we trooped into the darkness in single file, our path lighted by torches. The drone of crickets vibrated through the forest. On our left was a deep gorge at the bottom of which rushed the Dihang River. The pauses in between the crump-crump of footsteps were defeaning in their silence. In those moments it was easy to imagine the act of measuring time as a joke which man plays to keep himself deluded. Elephant dung, a deer’s hoofprints, tyre marks became mysteries to be deciphered at leisure. Benu shone his light into the gorge, looking for something. He stopped, then said sotto voce, ‘There might be a tigress nearby.’

A commotion followed, which crumpled up our single file and transformed it into a huddle. The effect of torch-light on tigers was discussed in whispers, with books being quoted and their publishers and prices mentioned. This was a serious moment but something seemed out of joint. I don’t know why a thought occurred to me: ‘This is a new profession for Benu. He and Soumyadeep are injecting a dose of excitement into these middle-class nature-lovers so their trip becomes memorable.’

As soon as we reached the rest house, the sweat-soaked trekkers called out to their gods and collapsed, using their backpacks as cushions upon which to straighten their strained backs. Bricks were collected, makeshift stoves hurriedly set up, and rice put on to boil. A safe corner for the women to sleep in was scouted. A whistle went off shrilly and at length; everyone gathered round and the experts answered questions on Namdapha in the dim light of a kerosene lantern.

The tiger and three species of leopard inhabit Namdapha: the common leopard, the clouded leopard and the rare snow leopard. The red panda is also to be found here.

The Namdapha Tiger Reserve was set up because this area is the perfect habitat for felines: it has flowing water, shade and abundant prey. These make up the ideal environmental cycle.

Some creatures such as the flying squirrel, the white hornbill and the howler monkey make the reserve their home because of geographical features which are unique to the area.

Chakma refugees from Bangladesh have been rehabilitated in the Gandhi Gram village located inside the forest. They hunt and eat elephants. Hunting has put the elephant population under stress.

 Lisu refugees from Burma live in the jungle, too. They are skilled at hunting tigers.

Tiger-bone liquor is much in demand in China. Tiger whiskers are used to manufacture sex toys.

The wide expanse of the jungle is manned by just thirteen employees who can’t even manage to shut all the gates of the reserve. There is no electricity and all the drinking water must be brought from the Noa-Dihing River…

After these stark truths were underlined in many different ways, the dancing flames reflected on the walls took on a new meaning. The deep silence of the forest invaded our tired minds. The whistle went off again, shrill and long; rice and flat-bean curry was served. Later, everyone pitched in to wash the dishes in candlelight. Soon I could hear snores.

It was raining in the morning. Binoculars and cameras jumped out of their carrying cases and kept waiting for a long time. Later, we were ferried across the Noa-Dihing in two batches under a steady drizzle. Vimal Gogoi and Mridul Phukan identified birds and animals from their calls. The deep silence of the forest made itself felt once more. In a crowd, one loses the ability to feel because each is trying frantically to communicate something or the other and this takes up all our attention. However, walking underneath the dripping forest canopy on the thick carpet of fallen leaves and sodden mulch, I felt regret: This place had everything but that which I find in a tree standing alone on the side of a road, it couldn’t give me.

Poppy showed us a twig on which grew a layer of what looked like white mould. She said, ‘Look, there is no pollution here. This lichen is proof.’ She picked up a berry from the ground and said in chaste Assamese, ‘The pahu eats the flesh of this fruit and the porcupine its pit. In this manner they help propagate these seeds all over the forest.’

‘This pahu, is it a bird?’ She laughed. I understood I had made yet another mistake in wringing meaning from the Assamese language.

‘Pahu is not a bird. Pahu is Assamese for deer.’ Archana corrected me.

We had climbed from a height of forty metres to two hundred and fifty metres over rocky, uneven terrain. Thin red leeches swarmed up our shoes. They soon began to crawl into our socks and everyone started to look for salt—the best antidote for leeches—which we had all forgotten to bring. Tikendrajit, from Barpeta, had long been scratching his head. A leech had fastened itself to his scalp and was turgid with blood. I pulled it off.

A tribal, Lat Gam Singpho, was accompanying our party as guide. Using his dao he cut green cane into strips and and fashioned himself a hat. When everyone crowded around demanding a hat, he made one for each. A lengthy photo session ensued. The hats which adorned the people’s heads deranged the balance of chemicals within their brains. They capered about spouting gibberish: ‘He hai hua, chi chai chung!’ In those green-cane hats they had found an excuse to express their truest, innermost reactions to the Singpho’s illiteracy and backwardness. Later, all the men took turns to wield the keen Singpho dao on the surrounding trees.

The sun came out in the afternoon and the forest took on new colours. We heard the cracking of bamboo. A small herd of elephants was crashing through, though we saw them only in our imaginations. A sudden shower drenched us in the evening and we didn’t need the services of a boat to cross the Noa-Dihing on our way back. Many other environmentalists came to us at night and—eating chicken curry and rice—gave us much useful information on crocodiles, hornbills and elephants. In one later session, people narrated their experiences of the jungle. Someone was terrified by the sight of an elephant brought up close by his binoculars, another slyly transformed anecdote into personal experience. Archana told us the heartrending story of the death of a calving cow and her attachment to the orphaned calf. Soumyadeep often dreamt of wild elephants surrounding him and of a forest-goddess who would come to his rescue. Lat Gam Singpho, who now lived in the forest, had once been ward boy in a hospital. He had a remarkable story to tell.

‘I can face down a tiger with a dao in hand but ghosts scare me to death. There were some doctors in the hospital who conspired so I would lose my job. They put a new shirt on a corpse and propped it against the wall. A burning cigarette was wedged between its fingers, some loose change was inits pocket and a dao slung from a belt at its waist. The corpse was pointed out to me from afar and I was sent to summon it. When he didn’t hear my calls I put a hand on his shoulder and then took off running. That day, for the first time in my life, I drank a boiling cup of tea in one breath.’

This was the first true story of a tribal wandering about in a jungle of dead souls.

Amid the marathon of snoring, the ten-year-old snuggled up to me and demanded a story. He seemed unhappy and was unable to sleep. I scoured all the corners of my memory but found no tale suitable for a young child—all my stories were rated ‘A’. I first felt a surge of self-pity, then came a glimmer of self-realization: As a child, I would doubt every story I heard. And because I kept neglecting them, kept hating them, they had evaporated from memory. The child said to me, ‘Let’s go for a stroll outside. Maybe you will remember one.’

Outside the resthouse, a furry creature floated across the milky-white beam cast by the flashlight, followed by another—a pair of flying squirrels were playing catch. An entire team of experts tramping about all day hadn’t been able to spot even one. A thin membrane connects the fore and hind legs of the rodent on both sides. Using tree branches as a runway, it gathers speed and launches itself. The membrane fills up with air and the squirrel glides from tree to tree.

My work had been made easy. I adorned the boy’s shoulder with the cloak of a forest-god, slung a Singpho dao around his waist and put him on the back of a flying squirrel. Now he could himself describe the mysteries of the jungles to me.

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The first batch of one thousand plastic replicas of hornbill beaks had arrived from Delhi which had been distributed in the Nyishi villages around Namdapha. Lat Gam Singpho had a question for Bharat Sundaram, project officer with the Asian Elephant Research and Conservation Centre, Bangalore: ‘Will elephants made out of plastic be distributed among the Chakma refugees living in the west of Namdapha?’ The Chakmas hunt elephants with poisoned arrows. It takes them half an hour to bring down an animal but preparation for the hunt lasts many days.

Young Bharat Sundaram was then on a trek in the Northeast, accompanied by porters laden with provisions and tents. He was tracking footprints and sampling elephant dung to determine their numbers. A nationwide elephant census was underway. The Northeast was a special zone where the very existence of elephants was under threat in many areas; many of their old stomping grounds and corridors of passage had been wiped out. However, it was the hornbill Bharat was interested in because of those traits in the bird which are only expected of humans. Bharat had photographed a Rufous-headed Hornbill in Namdapha. This species of hornbill had never been spotted in India and the event was being treated as a new find.

The hornbill is a colourful, beautiful bird with an extraordinarily large beak. When the female lays eggs, she takes maternity leave of four months. The young emerge from the nest only once they are able to fly. During this time the male guards the nest. He brings food for his wife and children. Some species of hornbill form cooperative societies. Many pairs get together to hatch eggs and to look after the brooding mothers. Pairs mate for life, and remain faithful to each other.

The beauty of the hornbill is its curse. Nagas use their feathers to adorn their headdresses. Many tribes of Arunachal Pradesh, including the Nyishi, use hornbill beaks as ornaments on their crowns. They stalk the male as it returns to the nest with food for its brooding mate and kill it. The flesh of the hornbill and oil extracted from its fat are considered aphrodisiac. Unani hakims, wandering ayurvedic vaids who examine people on roadsides in full view of curious gawkers, quacks of all varieties possess hornbill beaks with which they lure the loveless and the superstitious. This bird is rapidly dwindling in numbers; it is a rare sight even in dense forests.

Forest officers and the World Wildlife Trust of India jointly came up with the idea of plastic beak replicas after a great deal of thought. The beaks distributed in the Nyishi villages had been manufactured in Delhi on order. Each had cost 15 rupees to make. Since one can’t make money off hornbills, they were being distributed gratis. The officers and the NGOs were certain that the tribals would reconcile these plastic toys with their religious beliefs and stop hunting the hornbill. Some organizations felt that plastic is harmful to the environment and the tribals should be given wooden beaks. Even better, they should be trained to carve beaks so that they could find employment.

Some people in the villages had accepted the plastic beaks, but the ones with the original article made fun of them. Now the danger was that the remaining hornbills in the forest would also be wiped out due to this conflict between the villagers. This was why Lat Gam Singpho wanted to pose his question to Bharat Sundaram.

Bharat had also visited Gandhi Gram, the furthest village on India’s frontier, in the far south of Namdapha. Lisu refugees from Burma have been settled there. Anyone who visits with kerosene and sugar is welcomed in the village as an honoured guest. The nearest weekly market is a three-day walk each way. They barter goods with local fish which they hunt with an anesthetic. The Lisu examine the moss growing on rocks standing in the river. From the marks made on the moss by the fishes’ mouth as they graze upon them, they gauge the size of the fish. They then take the leaves of a particular tree which has narcotic properties, grind them and stir the paste into the water. The drugged fish belly-up on the surface. They were not for sale but, yes, they could be bartered for kerosene.

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The Apatani tribe was yet to come across that important invention known as the wheel in the year Kuru Hasang was born in the Ziro valley. Still, the Apatani are considered to be the most modern among the tribes of Arunachal for having innovated the concepts of fixed—non-jhum—cultivation and irrigation. When Hasang was admitted to the Army School, Bhubaneshwar, in 1963 his father ritually sacrificed an egg on the village border before letting him go out into the limitless, unknown world. Within five years of leaving his village, Hasang was commissioned into the Air Force and became a fighter pilot and flew MIGs. He came back to his village in Arunachal in 1978—once the state was formally formed—having retired as Flight Lieutenant, to try his hand at politics. When I was travelling in the area, the middle-aged Kuru Hasang, after having lost multiple elections, was the chief secretary of the Arunachal Pradesh Congress Committee. His wife ran a medical store in the Hapoli neighbourhood of Ziro.

Many tribes of Arunachal Pradesh, including the Nocte, the Khampti, the Nyishi and the Tagin, have their own tarnished heroes who, because of coincidences, have managed to cram many lives into one. They have vaulted distances which takes the rest of humanity many thousands of years to trudge over. More than sixty tribes live in Arunachal and there are more than fifty known languages. Yet the written history of the area is merely three hundred years old. Every old officer who served in the area has a story which begins: ‘When we first came here, accustomed as we were to the sensations which nudity arouses, we wouldn’t even look at the tribals. And, when we began to look at them, what happened was…’

The state of Arunachal has itself similarly launched headlong into democracy. Before Independence, the region was officially known as ‘Tribal Area’. A few British surveyors would travel in the area accompanied by armed battalions, scouting for opportunities to build roads and lay down railway lines. They wanted to extend trade possibilities for East India Company further into countries in the east. In 1954 the Kameng, Siang, Subansiri, Lohit, Tirap and Tuensang divisions was combined into the North East Frontier Agency (NEFA) which was administered by the Foreign Ministry for a long time. After 1972 Tuensang went to Nagaland and the rest of the divisions coalesced into Arunachal Pradesh. Post 1962, after the debacle with China, the Central government invested blindly in roads and communication networks, and the investment shows. A population of merely nine lakh lives in an area of 78,000 square kilometres but telephone poles stand tall in every jungle. The Army regularly flies sorties from bases in Siliguri and Dibrugarh, ferrying rations, political leaders, officers and soldiers—an exercise that costs an average of 4 crore rupees per day. There are close to one hundred helipads in the state. In all of India, the maximum number of mishaps—mainly due to helicopters losing their way in fog and crashing—in which ministers, chief ministers and pilots have lost their lives have occurred in Arunachal.

I wanted to visit Hapoli and meet Kuru Sangma and his wife. The idea was to conduct a long interview on his memories of the time when he came back to Ziro on his first furlough from the Air Force. But I got distracted and reached Tawang instead.

That day in Bhalukpong, the remains of a poet interred within the soul of a Mahayani Buddhist monk decided to draw breath. All he said was: ‘Tawang will have played for two hours in the light of the new sun by the time dawn breaks over the rest of the world.’ I also had the names of lamas given to me by friends in Benares, those who had gone to Sarnath to study theology and who now lived in monasteries in Arunachal. So, naturally, I set out on a very long, serpentine road which was shrouded in fog and which threaded through a desert of snow and ice. I have never seen more shades of blue in the sky since.

Before Bomdila, I could never have imagined that a Tata Sumo, grinding along in the first and second gears, can be like a faithful horse which responds to its rider’s most urgent wishes, his most fleeting whims. It takes a special set of ears to drive on these remote mountains; ears which can discern the whispers, wails and sobs of an engine underneath its overpowering roar. And it takes a special kind of sensitivity which detaches the accelerator and the brake from the car, makes them part of the driver’s being and transmutes the smallest tremor, the least vibration, instantaneously into crystal-clear thought. It is not without reason that in the couplets and verses inscribed on windscreens and bumpers—usually dismissed as slight and even cheap—the vehicle is often cast in the role of lover or mistress. At their base is the living, breathing relationship between man and machine, and their pact to live and die as one.

Descending from the 6,000-feet-high Nechi Phu pass, many a time I would visualize the Tata Sumo drifting down the gorge like an unmoored kite and children standing at the bottom of the valley, waving, imagining it to be a helicopter. At each instance I would stare hard at the driver: Was I projecting my innermost fear and influencing him in any way? But he was in deep trance. Lost in a time and space where passengers had no existence any longer.

From Bomdila (8,500 feet) an infinite variety of clouds billow and play. Fog descends without warning and obscures the world; when it parts the dazzling Himalaya stands tall and close. Bomdila is the district headquarters of West Kameng district, home to the Monpa, Sherdukpen, Aka, Mijia and Bugun tribes. The dogs of Bomdila are infamous—they roam about on sub-zero nights and can easily take down a man and feed on his flesh. There is an abundance of flora. Some quite lucrative. A truckload of Taxus baccata—from which the anti-cancer chemical Taxol is extracted and exported to Europedelivered to Guwahati fetches enough money to buy a brand-new truck chassis.

There was an old man in Bomdila market who said to me in the manner of one demonstrating an invisible monument: ‘The Chinese had marched down to here during the war.’

I found a place to bed down in a slate-roofed dhaba in the Dirang valley. A wild wind sprang up and whistled as night descended; the temperature dropped sharply and it was difficult to keep one’s feet in that gale outside. I piled two quilts over my sleeping bag but the cold bore into my bones. The mistress of the dhaba allowed me to move my sleeping bag close to the fireplace but before going to bed issued strict instructions to her terrifying mastiff: ‘Keep sharp; no one should go outside!’ I’d make a move to walk out, driven by the desire to view the silvery Himalaya in moonlight, but the dog would bristle, bare its teeth and growl imperiously: ‘A fleeting glimpse, cooling balm to the eyes; or your life. Make up your mind about what you want.’ I’d resign myself and come back to my sleeping bag.

In the morning I made my way to a gompa—established by the Buddhist guru Padmasambhav in the eighth century inside an ancient fort, the Dirang dzong—to look for Lama Nawang Lamsang. In this area, which seems more Tibet than India, Padmasambhav is known as Lopon Rimpoche. Young novice monks were seated in the sanctum sanctorum of that small gompa, reading from ancient scriptures. An elderly monk informed me that monk Lamsang was travelling outside the Dirang valley. After a moment’s thought he opened a battered tin box, took out a very old piece of stone and placing it on my palm, said, ‘This is the heart of a demon which was killed here. After it was killed, the Mon people converted to Buddhism.’

‘How did its heart turn to stone?’

‘What then, if not a stone… It was a demon!’

Now there was no reason for me to doubt that symbol of the victory of Buddhism.

As one travels from Dirang towards Sela Pass, the vegetation thins out, disappears and is replaced by snow-topped granite mountains and in a very few places by densely growing grass which appear soft as mattresses. Hidden in dense fog, Army trucks scream and wail their way up in an ant-crawl; grazing yaks occasionally heave into view; the lack of oxygen makes breathing difficult. The Sela (14,000 feet) is the second-highest motorable pass in the world. These winding high roads, made possible by the prowess of the Border Roads Organization, resemble kite cord wound around one’s fingers and then carelessly tossed aside. To the left, immediately after the Sela gate, was a lake which had frozen inwards from its shores. In the middle was clear blue water which seemed to reflect the universe itself. Some fresh Army recruits were playing with snowballs and taking pictures. From the window of a small, stone-hut teashop near the gate I could see valleys shimmering through gaps in the layers of cloud which covered them. A family made its living from the shop, selling tea to tourists and soldiers. Looking out at the soldiers, the tea-maker said sagely even as vapour billowed from his mouth, ‘The more difficult a place is to reach, the more its beauty is enhanced… But for how long?’

The most reassuring sight in this bleak, mountain desert were the white flags which flapped restlessly in the icy wind. This is a custom in these parts: Whenever one asks for something from the gods he erects a white flag. Perhaps he lives with the conviction that his prayer will some day ride the winds to its intended address.

The driver slipped into a trance once more as the descent commenced. It had rained recently. The water dripping off the rocks and boulders on the sides of the road had pooled in the middle and frozen over, creating strange shapes—mostly in the shape of daggers. Greenery made an appearance after Jaswantgarh. In Jang we stopped in an old Monpa house where a bottle of rum stood next to a kettle of water bubbling on a wood fire. A cat was perched on a stool next to the stove to keep count of the pegs consumed. The valleys which endured the relentless assault of the wind sighed and moaned. The owner of the establishment sat outside; she was convinced that life-threatening cold is enough to ensure honesty.

We caught occasional glimpses of the golden roofs of the Tawang Monastery—one of the most important and famous centres of Mahayana Buddhism—in the falling twilight as our vehicle rounded corners; the Collector had already been contacted and a grand suite booked in the Circuit House.

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Gulping pure mountain air in the pauses afforded to me by my lungs which struggled in the thin air, I reached the monastery in the afternoon, looking for a Sarnath-returned lama. The prayer-wheel mounted on the front gate was freezing. Teenaged monks were sitting in the lawn in front of the prayer hall, eating porridge. The prayer-flag towering above them was straining in the wind, blowing with sufficient force to sway the sixty-foot pole to which the flag was attached. Behind them was the Tawang Monastery museum. Among the exhibits were an enormous elephant tusk, ancient musical instruments, monks’ belongings, and human skulls covered over with gold and silver leaf and exquisitely carved. There was also a library which included silk-wrapped religious manuscripts seven centuries old. The prayer-hall was awash in the glow of a statue of Buddha that had been brought from Tibet three hundred years earlier. On the walls were murals depicting tantric scenes.

There used to be many legends about how such a massive statue reached Tawang. About half a century earlier, when a strong earthquake jolted the region, the statue split and many new stories added to the legends and fed into them. In 1997, His Holiness Dalai Lama visited Tawang Monastery; under his orders, skilled sculptors were called in from Nepal to restore the Buddha statue. During the restoration, certain documents were recovered from the belly of the statue; from them it was learnt that different parts of Buddha’s body were interred separately in southern Tibet by followers of the Gelugpa sect, which had been brought there on horseback.

I asked the lama in-charge of the museum why so many skulls were displayed. He pointed out Panden Lhamo, the guardian deity and protectoress of Tibet, in a mural and said, ‘Earlier, lamas used them to offer liquor to the deities during tantric worship; but Pepsi or Coke is offered nowadays.’

‘Where do you get that from?’

‘From the general store in the bazaar, of course!’ the lama said, staring at me in astonishment.

After the Potala Palace in Lhasa, Tawang is the oldest monastery in the Mahayana tradition which was established in the seventeenth century by Merag Lama Lodre Gyatso. He is said to have been inspired and guided by his horse to do so. In the Tibetan language, Tawang means ‘chosen by a horse’. Tawang is world famous as a centre of Tantric worship; seventeen monasteries fall under its direct administration. Until not very long ago, collectors from Tibet used to come to the villages in Tawang to collect land tax. For China, Tawang is northern Tibet. It was on this basis that when Arunachal Pradesh became a state in the Indian union, China registered an official protest about India’s claim on certain parts of the area.

That evening in the bazaar I met a red-robed monk astride a motorcycle. He told me that Jaspinder Narula, a Bollywood playback singer of Punjabi origin, would be performing at the Buddha Purnima festival. Udit Narayan—another Bollywood playback singer—had already performed once. He also told me that the actors Shahrukh Khan and Madhuri Dixit had shot scenes for the movie Koyla here.

I asked the monk, ‘Why is multinational Pepsi offered to the gods instead of homebrew?’

He winked, and looking like a man enjoying himself, replied, ‘Buddhism is also a multinational religion, where’s the problem!’

15800097_10210018296288017_8723673239759262081_oAnil Yadav is a vagabond writer and journalist. His book include a collection of short stories Nagar Vadhuyen Akhbar Nahin Padhatin, collection of articles, essays, memoirs and journalistic writings Sonam Gupta Bewafa Nahi Hai and the acclaimed travelogue Woh Bhi Koi Desh Hai Maharaj!  

And this Himalaya’s experiences excerpted here from Himalaya: Adventures, Meditation, Life; An Anthology Edited by Ruskin Bond and Namita Gokhle and published by Speaking Tiger, New Delhi, 2016.  

Dear PM sir, rabi acreage actually fell and not increased !

As opposed to what has been said officially about the positive impact of demonetisation (note ban) on rabi sowing, acreage actually declined in 2016-17 as compared to a normal year. Let us see why this has been so. 

 

Acreage under rabi crops declined in 2016-17 as compared to 2013-14

By Shambhu Ghatak

As opposed to what has been said officially about the positive impact of demonetisation (note ban) on rabi sowing, acreage actually declined in 2016-17 as compared to a normal year. Let us see why this has been so.

On New Year’s Eve, Prime Minister Narendra Modi while addressing the nation post-demonetisation, among other things, said:

“…Friends in the last few weeks, an impression was sought to be created that the agriculture sector has been destroyed. Farmers themselves have given a fitting reply to those who were doing so. Rabi sowing is up by 6 per cent compared to last year. Fertilizer offtake is up by 9 per cent. During this period, the Government has taken care to ensure that farmers do not suffer for want of access to seeds, fertilisers and credit. Now, we have taken some more decisions in the interest of farmers…”.

In short, the PM in his speech tried to convince the people of India that demonetisation had no adverse impact on agricultural production, and gross area sown under rabi crops actually soared up in 2016-17 vis-à-vis last agricultural year. This was possible due to a number of steps undertaken by the government in the period spanning demonetisation (i.e. 8 November, 2016 – 30 December, 2016), said the PM.table-1-gross-sown-area-under-rabi-crops

Source: Economic Survey 2015-16 Statistical Appendix, please click here to access, http://indiabudget.nic.in/es2015-16/estat1.pdf

* Press release: Rabi Crops Sowing Crosses 628 Lakh Hectare, Press Information Bureau, Ministry of Agriculture, 20 January, 2017, please click here to access, http://pib.nic.in/newsite/PrintRelease.aspx?relid=157556

Note: Data on gross sown area under various rabi crops from 2012-13 to 2014-15 has been taken from Economic Survey 2015-16

Based on preliminary reports received from the states by the Ministry of Agriculture and Farmers Welfare as on 20 January, 2017, one could say that the acreage under rabi crops grew from 59.2 million hectares in 2015-16 to 62.8 million hectares in 2016-17 i.e. by 6.1 percent. This is exactly what PM Modi had indicated in his New Year’s Eve speech.

However, if experts are to be believed, then we cannot compare acreage under rabi crops in 2016-17 with that of the previous two years i.e. 2014-15 and 2015-16 during which drought was faced by most Indian states as a result of scanty monsoon rainfall.

Since 2016-17 has been a normal year in terms of monsoon rainfall, so the acreage under rabi crops should ideally be compared with that of a previous normal year — in this case 2013-14.

The gross sown area under rabi crops declined by almost 2.5 percent between 2013-14 and 2016-17 i.e. from 64.4 million hectares to 62.8 million hectares. From table 1 one gets that although acreage under wheat and pulses increased between 2013-14 and 2016-17, the same under rice, coarse cereals and oilseeds declined.

It is worth noting that for the country as a whole, rainfall during the southwest monsoon season (June-September) as a percentage of long period average (LPA) was 92 percent in 2012, 106 percent in 2013, 88 percent in 2014, 86 percent in 2015 and 97 percent in 2016, as per various reports from the India Meteorological Department (IMD).chart-1-foodgrain-production-in-various-years

Source:  First Advance Estimates of Production of Foodgrains for 2016-17 (as on 22 September, 2016), Agricultural Statistics Division, please click here to access,

http://eands.dacnet.nic.in/Advance_Estimate/Advance_Estimate_Eng.pdf

The first advance estimates of foodgrain production for 2016-17, which was released on 22 September, 2016 by the Ministry of Agriculture and Farmers Welfare shows that the kharif foodgrain production has been higher in 2016-17 (i.e. 135.03 million tonnes) as compared to that of corresponding season of the previous four years (see Chart-1). However, the advance estimates of foodgrain production during rabi for the present year is going to be released in February i.e. after the presentation of Union Budget 2017-18. In such a scenario, it is too early to say that demonetisation did not impact rabi sowing adversely.

As per the Arthapedia, www.arthapedia.in [a portal to explain the concepts used in economic policy domain in India, which is managed by the officers of Indian Economic Service (IES)], in an agricultural year (July-June) the Ministry of Agriculture and Farmers Welfare releases four advance estimates, followed by the final estimates of production of major agricultural crops in the country.

The Arthapedia website informs us that the first advance estimates are released in September when kharif sowing is generally over, and it covers only kharif crops. The second advance estimates are released in February next year when rabi sowing is over. The second advance estimates covering kharif as well as rabi crops take into account firmed up figures on kharif area coverage along with available data on crop cutting experiments for yield assessment of kharif crops and tentative figures on area coverage of rabi crops. The third advance estimates incorporating revised data on area coverage for rabi crops and better yield estimates of kharif crops are released in April-May. The fourth advance estimates are released in July-August and by this time fully firmed up data on area as well as yield of kharif crops and rabi crops are expected to be available with the states.

 

References:

Press release: Rabi Crops Sowing Crosses 628 Lakh Hectare, Press Information Bureau, Ministry of Agriculture, 20 January, 2017, please click here to access, http://pib.nic.in/newsite/PrintRelease.aspx?relid=157556

PM’s address to the nation on the eve of New Year 2017, 31 December, 2016, please click here to access, www.pmindia.gov.in/en/news_updates/pms-address-to-the-nation-on-the-eve-of-new-year-2017/?comment=disable

Economic Survey 2015-16 Statistical Appendix, please click here to access, http://indiabudget.nic.in/es2015-16/estat1.pdf

First Advance Estimates of Production of Foodgrains for 2016-17 (as on 22 September, 2016), Agricultural Statistics Division, please click here to access, http://eands.dacnet.nic.in/Advance_Estimate/Advance_Estimate_Eng.pdf

2016 Southwest Monsoon end of season report, India Meteorological Department, please click here to access,

http://reliefweb.int/sites/reliefweb.int/files/resources/20161010_pr_60.pdf

2015 Southwest Monsoon end of season report, India Meteorological Department, please click here to access,

http://www.imdpune.gov.in/Links/endofseasonreport_2015.pdf

2014 Southwest Monsoon end of season report for the state of Uttar Pradesh, India Meteorological Department, please click here to access,

http://amssdelhi.gov.in/Nigam/MCLUCKNOW/Uploads/monsoon_report.pdf

2013 Southwest Monsoon end of season report, India Meteorological Department, please click here to access,

http://www.indiaenvironmentportal.org.in/files/file/endofseasonreport2013-2.pdf

2012 Southwest Monsoon end of season report, India Meteorological Department, please click here to access,

http://www.indiaenvironmentportal.org.in/files/file/endofseasonreport.pdf

Cropping seasons of India- Kharif & Rabi, Arthapedia, please click here to access, www.arthapedia.in/index.php%3Ftitle%3DCropping_seasons_of_India-_Kharif_%2526_Rabi

The mystery of agricultural growth -Himanshu, Livemint.com, 8 December, 2016, please click here to access, http://www.livemint.com/Opinion/on308TI8YoOW5Xlr7YGryJ/The-mystery-of-agricultural-growth.html

Shambhu Ghatak , presently involved with Inclusive Media for Change at CSDS. New Delhi. You can contact him through shambhughatak@gmail.com.

मोहनदास अब महात्मा था: कृष्ण कल्पित

मोहनदास अब महात्मा था

By कृष्ण कल्पित

1.

रेलगाड़ी के तीसरे-दर्ज़े से भारत-दर्शन के दौरान मोहनदास ने वस्त्र त्याग दिये थे.

अब मोहनदास सिर्फ़ लँगोटी वाला नँगा-फ़क़ीर था और मोहनदास को महात्मा पहली बार कवीन्द्र-रवींद्र ने कहा.

मोहनदास की हैसियत अब किसी सितारे-हिन्द जैसी थी और उसे सत्याग्रह, नमक बनाने, सविनय अवज्ञा, जेल जाने के अलावा पोस्टकार्ड लिखने, यंग-इंडिया अख़बार के लिये लेख-सम्पादकीय लिखने के साथ बकरी को चारा खिलाने, जूते गांठने जैसे अन्य काम भी करने होते थे.

राजनीति और धर्म के अलावा महात्मा को अब साहित्य-संगीत-संस्कृति के मामलों में भी हस्तक्षेप करना पड़ता था और इसी क्रम में वे बच्चन की ‘मधुशाला’, उग्र के उपन्यास ‘चॉकलेट’ को क्लीन-चिट दे चुके थे और निराला जैसे महारथी उन्हें ‘बापू, तुम यदि मुर्गी खाते’ जैसी कविताओं के जरिये उकसाने की असफल कोशिश कर चुके थे.

युवा सितार-वादक विलायत खान भी गाँधी को अपना सितार सुनाना चाहते थे उन्होंने पत्र लिखा तो गाँधी ने उन्हें सेवाग्राम बुलाया.

विलायत खान लम्बी यात्रा के बाद सेवाग्राम आश्रम पहुंचे तो देखा गांधी बकरियों को चारा खिला रहे थे यह सुबह की बात थी थोड़ी देर के बाद गाँधी आश्रम के दालान में रखे चरखे पर बैठ गये और विलायत खान से कहा – सुनाओ!

गाँधी चरखा चलाने लगे घरर घरर की ध्वनि वातावरण में गूंजने लगी.

युवा विलायत खान असमंजस में थे और सोच रहे थे कि इस महात्मा को संगीत सुनने की तमीज़ तक नहीं है.

फिर अनमने ढंग से सितार बजाने लगे महात्मा का चरखा भी चालू था घरर घरर घरर घरर…

विलायत खान अपनी आत्मकथा में लिखते हैं कि थोड़ी देर बाद लगा जैसे महात्मा का चरखा मेरे सितार की संगत कर रहा है या मेरा सितार महात्मा के चरखे की संगत कर रहा है!

चरखा और सितार दोनों एकाकार थे और यह जुगलबंदी कोई एक घण्टा तक चली वातावरण स्तब्ध था और गांधीजी की बकरियाँ अपने कान हिला-हिला कर इस जुगलबन्दी का आनन्द ले रहीं थीं.

विलायत खान आगे लिखते हैं कि सितार और चरखे की वह जुगलबंदी एक दिव्य-अनुभूति थी और ऐसा लग रहा था जैसे सितार सूत कात रहा हो और चरखे से संगीत निसृत हो रहा हो !

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2.

दिल्ली में वह मावठ का दिन था

३० जनवरी, १९४८ को दोपहर ३ बजे के आसपास महात्मा गाँधी हरिजन-बस्ती से लौटकर जब बिड़ला-हॉउस आये तब भी हल्की बूंदा-बांदी हो रही थी.

लँगोटी वाला नँगा फ़क़ीर थोड़ा थक गया था, इसलिये चरखा कातने बैठ गया. थोड़ी देर बाद जब संध्या-प्रार्थना का समय हुआ तो गाँधी प्रार्थना-स्थल की तरफ़ बढ़े,

कि अचानक उनके सामने हॉलीवुड सिनेमा के अभिनेता जैसा सुंदर एक युवक सामने आया जिसने पतलून और क़मीज़ पहन रखी थी.

नाथूराम गोडसे नामक उस युवक ने गाँधी को नमस्कार किया, प्रत्युत्तर में महात्मा गाँधी अपने हाथ जोड़ ही रहे थे कि उस सुदर्शन युवक ने विद्युत-गति से अपनी पतलून से Bereta M 1934 semi-autometic Pistol निकाली और

धाँय धाँय धाँय…

शाम के ५ बजकर १७ मिनट हुये थे नँगा-फ़क़ीर अब भू-लुंठित था हर तरफ़ हाहाकार कोलाहल कोहराम मच गया और हत्यारा दबोच लिया गया.

महात्मा की उस दिन की प्रार्थना अधूरी रही.

आज़ादी के बाद मची मारकाट साम्प्रदायिक दंगों और नेहरू-मण्डली की हरक़तों से महात्मा गाँधी निराश हो चले थे.

क्या उस दिन वे ईश्वर से अपनी मृत्यु की प्रार्थना करने जा रहे थे जो प्रार्थना के पूर्व ही स्वीकार हो गयी थी !

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कृष्ण कल्पित

अपने तरह का अकेला-बेबाक और विवादित कवि । कृष्ण कल्पित का जन्म 30 अक्टूबर, 1957 को रेगिस्तान के एक कस्बे फतेहपुर शेखावटी में हुआ। अब तक कविता की तीन किताबें और मीडिया पर समीक्षा की एक किताब छप चुकी है। एक शराबी की सूक्तियां  के लिए खासे चर्चित। ऋत्विक घटक के जीवन पर एक पेड की कहानी नाम से एक वृत्तचित्र भी बना चुके हैं।  अभी  हाल ही में बाग़-ए-बेदिल नाम से  एक विलक्षण  और विशाल  काव्य-संकलन  के साथ-साथ ‘कविता-रहस्य ‘ नामक पुस्तक प्रकाशित । 

Vidrohi, A Ghost of Julius Caesar: Pallavi Paul

To speak about a dead man, is  a peculiar thing . Even more so when he happens to be a poet. And not just a poet but an infamous one .  But I am still going to try. In doing this there are many instincts that I have tried to confront. His several and often violent outbursts, the many conjectures about his relationship with his family, his ill concealed need for attention, the useful anger of some of his poems (for it is mostly an insult for an artist to be overtly useful to some), the presence of only mothers and sisters and not of fallen, promiscuous women in his world – are perhaps enough to cut him to size. To cull from his memory every iota of nostalgia, tenderness or empathy.Or worse – make every obituary of him into a defense. I do not wish to defend Vidrohi, because defending the dead is an unadventurous thing. The dangerous and the disruptive have to be recast in retrospect- to fit into the respectability of death. @Author

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Ramashankar Yadav ‘Vidrohi’

Vidrohi: A Ghost of Julius Caesar

By Pallavi Paul

Not all of Vidrohi’spoems may have been equally wonderful, his personal life may not have been an illustration of his political beliefs, he may have had  an uncritical relationship to a political moment – but one thing is for certain. Vidrohi was never tied to respectability. Infact he was never going to die. In my conversations with him, Vidrohi had often spoken about his death. We had revisited the scenario over and over again. Like a dream or a film – it had a grand setting. He had told us “Now that you are recording me, I  know that I will say goodbye in the most glorious way possible. Very few people can say that about their death, while they are still alive.” On another day he had said to us, “As my fame has increased, so have the dangers. Now what I  need is guarantee. Your records are guarantee against that largest threat of being killed. I say to my enemies, that if you want to kill me – then shoot me in the eyes. Because I  will keep staring back at you till my last breath. Your records will help me stare back at them even after I am gone.” In his imagination Vidrohi was not just going to die, he would have to be killed, so the news of his death seemed a bit strange.

I would also use the word strange for the way he and I got to know each other. While now I call myself a filmmaker with some confidence in public settings, in 2012 this was not the case. I was not really a bonafide ‘political artist’, deserving of any attention from a poet like Vidrohi who by his own admission had risen to status of the Ghost of Julius Caesar. Added to this, my first meeting with him was disastrous. The meeting time was decided for  2pm on a Monday in the winter of 2011 on JNU Campus. This was in the midst of a crisis in my M.Phil. dissertation – so it almost escaped my mind. I finally made it an hour late to see Vidrohi waiting on a bench outside Brahmaputra hostel. As he saw me approaching, his face tightened and he said, I normally never wait for people. Of course many months later in another moment he went on to tell me – record hone ki itna ichchha hai ki agar koi aadhi raat ko ped par tang ke bhi record karna chahe to ham uske saath chal dete hain. Bas ek shart hai ki wah apni line ka hi aadmi ho na ki kisi vipreet line ka.   Already nervous for being an hour late without any good reason, as I set up the shot and started recording him talking about his poem “Nani”, I was horrified to see that the camera was dying. Behind the lens, as I struggled to look composed while feeling for a spare battery in my bag- Vidrohi stopped. He paused for a bit and went on say – Tum late aayin, phir camera bhit heek se tyaar kar ke nahi layin – yeh sahi nahi hai, lekin hum artist log aise hi hote hain. Agar ek afsar ki tarah sab time to time karne lage, to hum mein aur usmein farak kya reh jayega. Agli baar jab poori tayaari ho to mujhe bataa dena, main mil jaunga”   This was in some ways my first education in how an artist should be dealt with. How belief and conviction in artistic work can be held irrespective of their flawed performance on the scale of the norms of sociability.

Of course I was to realize that vidrohi was going to far exceed to me in that department, because for every other date after that I waited and waited and waited for him to turn up and was never once allowed to complain about it.

Like Alok Dhanwa ( another infamous poet says in one of his poems

Titled Chowk

उन स्त्रियों का वैभव मेरे साथ रहा

जिन्‍होंने मुझे चौक पार करना सिखाया।

मेरे मोहल्‍ले की थीं वे
हर सुबह काम पर जाती थीं
मेरा स्‍कूल उनके रास्‍ते में पड़ता था
माँ मुझे उनके हवाले कर देती थीं
छुट्टी होने पर मैं उनका इन्‍तज़ार करता था
उन्‍होंने मुझे इन्‍तज़ार करना सिखाया

Vidrohi ne mujhe intezaar karna sikhaaya. Lekin ek baat jo hemeshaa se hamaare beech mein spasht thi ki yehi ntezaar Vidrohi ka nahit ha, balki ek kavita ka tha. Aur kavitaaon ki manmaani sehna aur unka intezaar karna seekhna behad zaroori hai.

Vidrohi taught me another thing without knowing it of course  – to be wary of false humility. To get caught in the web of appearing self effacing while hanging onto the egotistical conception of artist. The biggest danger of this is that the poet has to forfeit the possibility of being a magician. What a drab insufferable thing a humble magician would be. To help strike a reasonable balance between a self obsessed delusional (often male) artist and a playful magician –I turn to Eduardo Galeano who in his book Days and Night of Love and War says –

I don’t share the attitude of those writers who claim for themselves divine privileges not grated to ordinary mortals, Nor of those who beat their breasts as they clamor for public pardon for having lived a life devoted to serving a useless vocation. Neither so godly and nor so contemptible. Literature as a form of action is not invested with supernatural powers, but the write may become something of a magician, if he or she procures through a literary work, the survival of significant experiences or individuals.   

 Vidrohionce told me about how was forcibly made in to a magician. Born left handed he said “ Maar maar ke seedhe haath se salaam karna sikhaaya gaya, maar maar ke seedhe haath se khaana sikhaaya gaya, maar maar ke seedhe haath se likhna sikhaaya gaya. Iska ek fayda hua. Ab ham saare kaam dono haath se karne lage, yeh ek tarah ka jaadoo tha.”

What made our friendship interesting was that  as time went by the film I was making about him started to morph into films that were going to feature him but weren’t going to be about him. He became a kind of link between other poets from other epochs.  In a book titled after Lorca , poet Jack Spicer writes  letters to Garcia Lorca, nearly twenty years after Lorca’s passing. The letters written the fashion of urgent impassioned enquires, became a site for me to see whether the images from Vidrohi’s world could help Lorca write back to Jack. When I broke this to Vidrohi – he seemed only momentarily disappointed. But soon took it as challenge to wrestle with two dead poets for film time. He said “Chaloismeinekbaat to sahihaiki tum mujhe Lorca kishrenimeindekhrahi ho, magardekhna jab film ban jayegi to sab vidrohikikavitako hi pehchanenge”

Interestingly the introduction of this around which the films were coming to be structured  book was  written by the  Dead Lorca.

He says –

When Mr. Spicer began sending letters to me a few

months ago, I recognized immediately the “ programmatic letter” – the letter one poet

writes to another not in any effort to communicate with him, but rather as a young man

whispers his secrets to a scarecrow, knowing that his young lady is in the distance

listening. The young lady in this case may be a Muse, but the scarecrow nevertheless

quite naturally resents the confidences.

In my encounters with Vidrohi I was very much the scarecrow that Lorca feels Spicer  makes him out to be, the one who is not the object of communication but merely a conduit. So in some ways the films I made with Vidrohi can be thought of as a story of two over smart people using one another as conduits- while trying to  justify their actions as art.

The last time I  metVidrohiji was almost two years back. He had called me from someone’s phone at JNU. and asked me to come and see him. I hadpromised  that I would , but couldn’t  make it. He did not remind me. A week after the day we were supposed to meet I went looking for him, I couldn’t find him. Someone told me that they had seen Vidrohiji leaving the campus some time ago. I couldn’t call any number to tell him that I had come. Our meeting was deferred, but i didn’t know for how long.

Always surrounded by students, comrades and opponents, he probably would have not even thought of me in his last moments. I will, however,  always regret that i was in another city, unable to bid farewell, unable to see him shout slogans at his last protest march, unable to see him shine with pride as students would implore him to say one of his poems. “Vidrohiji please, the one about your grandmother in Mohenjodaro. The one where you speak about yourself as a bomb, the one about the barricade.” He would always take those opportunities and speak of them as gifts.

Today as I try and make sense of his absence, I am happy that he circulates all around us in all kinds of records. He desire to stare back into the eyes of those who try and silence voices of dissent, stays alive in those records. I am happy that his prophecy about his death being glorious and not going unnoticed has come true.  As I think about his passing repeatedly, I break into a smile thinking that his ambition in death was to become the “left handed  ghost of Julius Caesar” . Finally, what I am happy about is that he will never die again.

Lal Salaam Vidhrohiji

I will miss you.

Pallavi Paul is a film researcher and video artist based out of New Delhi. A graduate of AJK MCRC, New Delhi. she is currently a PhD student at the School of Arts and Aesthetics, JNU

नींबू पानी पैसा : शंकर हल्दर

यह स्तम्भ  (घुसपैठिये)दिल्ली और आसपास की कामगार बस्तियों के तरुण-युवा लेखकों की प्रतिनिधि रचनाएं आप तक पहुंचाएगा. ये लेखक और इनका लेखन बने-बनाए खांचों में नहीं समाते. ‘घुसपैठिये’ स्तम्भ के लेखक अभी-अभी जवान हुए हैं या हो रहे हैं. एकाध को छोड़कर इसके सभी संभावित लेखकों की उम्र २0 वर्ष के अंदर ही है। लेकिन इन सब में कुछ सामान्य विशेषताएँ भी हैं. सभी की आर्थिक-सामाजिक पृष्ठभूमि लगभग समान हैं। इससे भी बड़ी विशेषता यह है कि इनके लिए बचपन की किताबें कागजों से उतनी नहीं बनती हैं जितनी उनके संघर्ष, मोहल्लों, माहौल और जगह से बनती हैं. उनकी लिखाई में वे जगहें आपको सुरक्षित मिलेंगी। आप शायद महसूस करें कि साहित्य के उत्पादक और उपभोक्ता, अभिलेखन/रिकाॅर्डिंग और सृजन, कि़स्सा और तथ्य के बीच के अंतर यहाँ धुंधले पड़ जाते हैं साहित्य के सुरक्षित-आरक्षित डिब्बे में घुस आये इन घुसपैठियों को आप कैसे बरतेंगे, यह आप ही को तय करना है.

बाल दिवस के अवसर पर प्रस्तुत  हैं, शंकर हल्दर की कहानी ‘नींबू पानी पैसा’.

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नींबू पानी पैसा

 BY शंकर हल्दर  

पाँच साल हो गए पर कर्ज अभी तक दूर नहीं हुआ, राम चाचा की यह चिंता हर रोज़ उनकी लुंगी उतार देती है। इसी चिंता के साथ एक दिन वे मंदिर जाते हैं और भगवान से बोलते हैं, ‘हे भगवान तू मेरा कर्जा दूर कर दे मैं तेरे को एक नहीं एक हजार नारियल चढ़ाऊँगा; पर तेरे मंदिर में तो इतनी जगह ही नहीं! इसलिए मैं आपको नींबू-पानी चढ़ाऊंगा। गंगाजल या नारियल तो सभी चढ़ाते ही हैं।’

भगवान चिल्ला कर बोले, ‘चुप हो जा मानव! सब हमारी पूजा करते हैं, हमे प्यार करते हैं, गंगाजल चढ़ाते हैं और तू नींबू-पानी चढ़ाएगा? हम तुझे श्राप दे देंगे!’ ‘अरे नहीं भगवान नहीं, मेरे पास पहले से ही बहुत साँप है कल ही मुझे एक अनाकोंडा ने काट लिया था।’ ‘अरे बुद्धू, मैं श्राप बोल रहा हूँ श्राप, कभी लंबा न हो पाओ वैसा वाला श्राप दे देंगे।’ भगवान फिर से चिल्लाये।

राम चाचा बोले, ‘भगवान ये कौन-सा साँप हैं? कोई नयी कंपनी का साँप है क्या?’ ‘अरे मूर्ख, श्राप, श्राप.. जो एक ऋषि ने हनुमान को दिया था।’ ‘अरे नहीं, भगवान मुझे वह वाला श्राप नहीं देना, आप जो कहोगे मैं वही करूंगा।’ ‘पहले वादा कर! तू कभी भी हम पर नींबू-पानी नहीं चढ़ाएगा।’ भगवान बोले।

राम चाचा भगवान को टोक कर फिर से बोले, ‘नींबू-पानी की जगह क्या चढाऊं?’ ‘अब तू हमें गंगाजल चढ़ाएगा और नारियल की जगह कहीं नारियल का छिलका मत चढ़ा दियो, वरना हम तुझे श्राप दे देंगे। अब बोल, तेरी इच्छा क्या है?’ ‘भगवान मुझ पर बहुत कर्ज़ है।’ भगवान बीच में ही टोक कर बोले, ‘अरे तू खुद ही दुनिया पर कर्ज़ है, तेरे पे क्या कर्ज़ होगा? चल बोल।’ राम चाचा ने वही बात फिर से दोहरायी, ‘भगवान मुझ पर बहुत कर्ज़ है, इसलिए मुझे पैसे चाहिए। आप हमारी कॉलोनी में एक दिन के लिए पैसों की बारिश करवा दो।’

भगवान ने राम चाचा की यह इच्छा पूरी कर दी। घर के बाहर से अचानक आवाज़ आई, ‘राम चाचा बाहर आ कर देखो, पैसो की बारिश हो रही है।’  बाहर सच में पैसो की बारिश हो रही है। उनकी खुशी का ठिकाना नहीं रहा। वे सबके साथ गरबा डांस करने लगते हैं पर डांस करते-करते उनकी लुंगी फट जाती है। छत पर एक झण्डा लगा था। वे उसी झंडे को लुंगी बना लेते हैं।

राम चाचा नीचे आकर पैसे लपेटने लगे तभी एक अम्मा बोली, ‘अरे राम, लुंगी की जगह यह झण्डा क्यों पहन लिया? देश भक्त बन रहे हो क्या?’ तभी एक बुढ़िया बोली, ‘अरे छोड़, जो कभी राम भक्त नहीं बना वह देश भक्त कैसे बनेगा? बॉर्डर पर जाते ही इसके पैर कांपने लगेंगे। आज से इसे हम राम की जगह इंडियन लुंगी मैन बुलाएँगे।’ ‘अरे बुढ़िया चुप, ज्यादा बचर-बचर नहीं करो, वर्ना हम सब कुछ भुला कर कोई क्राइम कर देंगे। और अम्मा, तुम एक दिन की मेहमान हो इसीलिए अपना एक दिन तो सही से गुजारो; वरना हम अभी ही तेरा स्वर्गवास करा देते हैं। पैसों की इतनी अच्छी बारिश करवायी है, लूटना है तो पैसा लूटो ना, हमारी इज्जत काहे लूटती हो? अगर फिर से बचर-बचर की तो सड़े हुए टमाटर की चटनी में तुम दोनों को फ़ेक देंगे।’

कॉलोनी के सभी लोग पैसे लूट रहे थे। बाल्टी में, बर्तन में, चादर में। अपनी कागज की बोरी लिए राम चाचा भी आ गए और उसमें पैसे इकट्ठे करने लगे। वे पैसे इकट्ठे करते-करते थक गए। उन्होंने देखा कि हरीलाल की पोटली पैसों से भर गयी है। राम चाचा हरीलाल से बोले कि ‘अरे हरीलाल, जल्दी जा कर देख! तेरी बीबी चने का आटा खा कर मर गयी है।’  ‘मेरी बीबी चने का आटा खाकर कैसे मर सकती है?’ हरी लाल ने पूछा। ‘अरे धरती पर बोझ बनी तेरी बीवी ने उस चने का आटा खा लिया था जिसमें चूहे ने मूत रखा था और उस चूहे को डायबिटिज थी।’ हरीलाल पैसों की अपनी पोटली छोड़ सांढ़ की तरह घर की ओर भागा। घर जाकर देखता है तो उसकी बीवी छुपम-छुपाई की खेल रही है। हरीलाल को राम चाचा पर बहुत गुस्सा आया।

हरीलाल राम चाचा के पास भागता है पर हरी लाल का रास्ता काटने के बजाय एक काली बिल्ली हरीलाल को ही काट लेती है। तब तक राम चाचा पैसों की पोटली ले कर नौ-दो-ग्यारह हो चुके होते हैं।

राम चाचा चौक पर जाते हैं। वहां उन्हे गज़ब का नज़ारा दिखता है। चौक पर बस भीड़ ही भीड़ है। लोग पैसों के लिए लोग लड़-झगड़ रहे हैं। लोग जानवरों की तरह पैसे लूट रहे थे, सारी गाड़ियां जाम हो गयी थीं। बस वाला ड्राईवर तो पागल ही हो गया था, उसने अपनी कमीज खोल कर उसमें पैसे इकट्ठे करने लगा।

एक पेड़ पर हजार-हजार के दो नोट लटके हुए हैं और रुपयो को लेने के लिए एक आदमी पेड़ चढ़ता है लेकिन दूसरा आदमी उसकी पैंट खींच कर नीचे गिरा देता है। एक टीन वाले घर के ऊपर हजार का एक नोट है। एक हाथी जैसा आदमी उस छत चढ़ता है। उसका पैर फिसल जाता है और उसके गले की हड्डी टूट जाती है।

मीडिया भी आ जाती है। मीडिया की लड़की कैमरे में बोलने लगी, ‘आप देख सकते हैं इधर का नज़ारा, बस इसी कॉलोनी में पैसों की बारिश हो रही है और इन पैसों को लूटने के लिए लोग पागल हुए जा रहे हैं। क्या यह सच  है या एक चमत्कार? वह लड़की एक आदमी से पूछती है, ‘ये पैसे लुटते हुए आपको कैसा महसूस हो रहा है? पैसों की यह बारिश कैसे हो रही है?’

राम चाचा अपने दोस्त तिहाई लाल के साथ खड़े यह सब देख रहे थे, ‘टीवी पर मुझे जाना चाहिए था लेकिन यह मुच्छड़ बोल रहा है। मेहनत करें हम और अंडा खाए फकीर।… अरे तिहाई लाल, तू पैसे नहीं लूट रहा है।’ तिहाई लाल बोला, ‘ओये तू पैसे लूटने की बात कर रहा है? वहाँ मेरे बीबी बिजली के खंबे की तार से फेवीकोल की तरह चिपकी पड़ी है और स्पाइडर मैन की तरह जाल बुन कर पैसे लूट रही है और किसी को भी खंभे पर चढ़ने नहीं दे रही है।’

‘कैसे? बिजली के खंभे पर कैसे किसी को चढ़ने नहीं दे रही है? राम चाचा पूछे। ‘अरे जिस मोजे को मैंने चार साल से नहीं धोया, उसी मोजे को मेरी बीबी ने कमर में बाँध रखा है।’ ‘लगता है तेरी बीबी आज स्पाइडर मैन का रिकार्ड तोड़ देगी!’ ‘अरे, स्पाइडर मैन का रिकार्ड बना ही कब था? जो मेरी बीबी उसे तोड़ देगी? तिहाई लाल बोला। ‘अरे तूने ‘स्पायडर मैन टू’ नहीं देखी क्या? आखिरी सीन में जब वह ट्रेन रोकता है तो उसकी चड्डी खुल जाती है।’ ‘तो इसमें रिकार्ड क्या है?’ तिहाई लाल ने आश्चर्य व्यक्त किया। ‘रिकार्ड है, स्पाइडर मैन ने चड्डी खोलने का रिकार्ड बनाया है।’ ‘चल ये सब छोड़, क्या तू जानता है कि मेरी छत इतनी बड़ी है कि उस पर पैसों का हिमालय पर्वत बन चुका है। मुझे तो नेशनल बैंक का एवार्ड मिलना चाहिए। लेकिन तुम तो लोगों के पैसों की पोटलियाँ चुरा रहा है? क्या मैंने तुझे इसी दिन के लिए पाला था? तिहाई लाल बोला ने ताना मारा।

‘अरे तूने मुझे कहाँ पाला है? मुझे तो अमेरिकन कुत्ते ने पाला था और उस एहसान का कर्ज मैं अभी तलक चुका रहा हूँ।’ तिहाई लाल ने पूछा, ‘कैसे?’ ‘अरे क्या तुझे याद नहीं जब तेरे अमेरिकन कुत्ते की नई-नई शादी हुई थी तो वह मेरी लूँगी चुरा कर भाग गया था। बदले में मैंने उसकी बीबी की पाँच रूपये वाली साड़ी फाड़ दी थी, बाद मे पता चला कि वह पाँच रुपये की नहीं पाँच हजार की थी। उस साड़ी का कर्ज मैं अभी तक चुका रहा हूँ।’

तिहाई लाल बोला, ‘माफ करना मैंने तेरे लाल जख्म को फिर से हरा कर दिया। चल यह सब छोड़, पैसे की बारिश की खुशी में आज मैंने एक शानदार पार्टी रखी है। तू जरूर अईयो। डिनर में बम के पकौड़े, सीमेंट की दाल और मिर्च के रसगुल्ले हैं।’ राम चाचा बोले, ‘ठीक है। मैं जरूर आऊँगा।

राम चाचा के पास पैसों की तीन पोटलियाँ जमा हो गई थी। जमीन पर सिर्फ सिक्के पड़े थे। नोट का नामोनिशान नहीं था। मंदिर के छत के ऊपर हजार-हजार के बहुत सारे नोट गिरे थे। राम चाचा मंदिर की छत पर चढ़ गए और जैसे ही नोट उठाया, भगवान की आवाज आई, ‘अबे मानव रुक जा, भगवान का पैसा चुराता है? तूझे श्राप दे दूँगा!’ राम चाचा बोले, ‘आप भी न भगवान… कितनी बार बोलूं कि मेरे पास पहले से ही बहुत साँप हैं, कल ही मुझे एक अजगर ने काट लिया था।’ भगवान बोले, ‘पर मानव, तूने तो मुझे बोला था कि एनाकोंडा ने काटा है।’ ‘हाँ एनाकोंडा ही था, बस उसका सर नेम अजगर था। मेरी चेककप रिपोर्ट में लिखा था।’ ‘ठीक है ठीक है। पर मंदिर से पैसा मत चुरा वरना तूझे श्राप दे देंगे।’ राम चाचा अब चिल्ला कर बोले, ‘भगवान, समझते नहीं हो और जज्बाती हो जाते हो। सुबह-शाम उतारता हूँ आरती, फिर बोलते हो, अच्छी नहीं है अगरबत्ती।’

भगवान बोले, ‘अरे दुनिया के आठवें अजूबे, तूझसे तो बोलना ही बेकार है। पर अगर तूने मंदिर से पैसा उठाया तो हम तुझे दण्ड देंगे।’ ‘तो फिर मैं पैसे कहाँ से लूँ? जमीन पर सिर्फ सिक्के पड़े हैं। अपनी शादी में क्या मैं सिक्के इस्तेमाल करूंगा? पंडित दक्षिणा माँगेगा तो क्या मै पंडित को दक्षिण अमेरिका भेज दूँगा?’ राम चाचा एक सांस में भी बोल गए। भगवान बोले, ‘पर तेरी तो शादी हो चुकी थी न? और तेरी बीबी मर भी गई है!’ ‘वह मेरे बीबी ही थी, एक दिन ढोकला खा ली और मर गई।’ ‘कैसे?’ ‘अरे उस ढोकले को बिल्ली ने आँख मारी थी।’ ‘और वह दूसरी कौन है? जो नर्क में सजा काट रही है।’

राम चाचा बोले, ‘वह मेरी दूसरी बीबी है, उसे मच्छरों से नफरत होने लगी थी। एक दिन एक मच्छर उसके मुंह में सुसु करके भाग गया, उसे मलेरिया हो गया और वह भी गुजर गई।’ भगवान बोले, ‘पापी, तू उसका श्राद्ध करने के बजाय यहाँ पैसों की बारिश में नाच रहा है। मैं अभी बारिश बंद कर देता हूँ।’

 ‘भगवान, नहीं-नहीं, पैसो की बारिश बंद मत करो। मैं उन दोनों का श्राद्ध कर दूँगा।’ यह कह वे घर की ओर चल पड़े, रास्ते में जहाँ पर भी पैसे दिखते जेबों में भर लेते। तभी उन्हें बहुत ज़ोर की बाथरूम लग जाती है। भागते हुए घर जाते हैं। पर घर के सामने हरीलाल खड़ा रहता है। ‘तुम्हारी इतनी हिम्मत कि मुझसे झूठ बोलो? अब तो मैं तुम्हें छोडूंगा नहीं।’ राम चाचा बोले, ‘पहले पकड़ तो सही!’ ‘क्या कहा?’ ‘अरे हरी लाल, भड़क मत, अपनी पोटली ले और मुझे जाने दे!’ लेकिन हरीलाल ने राम चाचा की हड्डी-पसली तोड़ डाली और राम चाचा की पोटली भी छीन लिया।

राम चाचा को काफी चोट आई। इंडियन लूँगी फट कर सिर्फ लंगोटी रह गई। बिना कपड़ों के उन्हें कुछ भी अच्छा नही लग रहा था। इसलिए अपनी दादी का घाघरा-चोली पहन लिए। बाथरूम गए तो देखा कि वहाँ पर 500 का नोट पड़ा है। लैट्रिन में हाथ डालकर कर पैसा उठा लिया। जैसे ही घर से बाहर निकले तो सभी लोग हंसने लगे। ‘यह क्या? घाघरा-चोली क्यों पहन रखा है? चाची की याद आ गई क्या?’ लोगों की बातें राम चाचा को मिर्ची की तरह लगी। बीबी के बक्से में रखी साड़ी पहन कर फिर से बाहर आ गए। अब वे साड़ी के आँचल में पैसे बटोरने लगे।

राम चाचा की गली मे ही चिंटूलाल, पिंटूलाल मिले। चिंटूलाल बोला, ‘अरे राम चाची झाड़ू लगा रही हो क्या?’ ‘मैं चाची नहीं, चाचा हूँ।’ ‘तो चाची की साड़ी क्यों पहन रखी है?’ ‘यह तो 3015 का फैशन है, तुम क्या जानो इस फैशन को।’

तभी गली के सारे लोग भागते हुए दिखे तो राम चाचा ने पूछा, ‘चिंटूलाल, ये सब भाग क्यों रहे हैं?’ ‘उधर रंगीला पागल होकर टीवी टावर पर चढ़ गया है।’ सभी लोग रंगीला को देखने चले गए। इतने में रानी मौसी गली से आती हुई दिखाई दी, जिसके कंधे में पैसे से भरी थैली लटक रही थी। यह देख राम चाचा का मन ललच गया। वे उसकी थैली छीनने लगे। रानी मौसी चिलल्लाने लगी, ‘बचाओ-बचाओ….।’ पर लोग तो रंगीला को देखने गए थे। रानी मौसी कहने लगी, ‘अरे राम हमें मत छेड़ो वरना हम अपनी बड़ी बहन से शिकायत कर देंगे। वह पीट-पीट कर करेली की चटनी बना देगी।’ ‘हाँ हाँ, वह तो जापान से जूडो कराटे सीख कर आई है ना, मैं तो सिर्फ आपका हालचाल पूछ रहा हूँ। आपके बच्चे ठीक ठाक हैं न? आप तो यूंही भड़क गयी। अरे, आप तो बहुत अच्छा गाना गाती हैं।’ ‘तुम्हें गाने की पड़ी है, वहाँ रंगीला टावर पर चढ़ कर मरने वाला है।’ ‘अरे वह तो हर दूसरे दिन मरने का बहाना करता रहता है। आज ज्यादा पी लिया होगा।’ अपनी थैली से पैसे निकालते हुए रानी मौसी बोली, ‘पैसा लोगे क्या?’ राम चाचा अपनी साड़ी के पल्लू को फैलाते हुए बोले, ‘देख, मैंने भी पैसे लूटे हैं।’

रानी मौसी चली जाती है, राम चाचा सोचते हैं कि चलो, बहुत पैसे जमा हो गए, अब घर चलते हैं। राम चाचा रात भर खूब सोचते हैं। अब तो मेरे पास पैसों की बहुत सारे पोटलियाँ हो गई हैं, आधे पैसों से अपनी पत्नियों का श्राद्ध करूंगा और आधे से अपना कर्जा दूँगा। बाकी पैसे से मैं एक अच्छी लूँगी सिलवाऊंगा। यही सब सोचते हुए राम चाचा सो गए।

अगली सुबह राम चाचा उठते ही पहले मंदिर जाते हैं। राम चाचा मंदिर पहुँचते ही भगवान प्रकट होकर बोले, ‘अरे मूर्ख मानव, पुरुष होकर नारियों का वस्त्र पहनता है। घर जा, पहले ढंग के वस्त्र पहन कर आ।’ राम चाचा भागते हुए घर आए और इंडियन लूँगी खोजने लगे। राम चाचा ने अपनी फटी हुई इंडियन लूँगी को ही पहन लिया और सोचने लगे कि भगवान पर कुछ चढ़ाना भी तो होगा। चलो नींबू-पानी ले लेता हूँ। अपनी फटी हुई इंडियन लूँगी पहन और हाथ में नींबू-पानी का ग्लास ले मंदिर की ओर चल पड़े। राम चाचा ने जैसे ही शिवलिंग पर नींबू-पानी चढ़ाया तभी भगवान प्रकट होकर बोले, ‘मानव तेरा यह दु:साहस? कल ही तुझे चेतावनी दी थी कि मुझे नींबू-पानी पसंद नहीं है, उसके बावजूद तू नींबू-पानी लाया है।’

राम चाचा बोले, ‘अरे भगवान, मेरी पड़ोसन गंगा का मोटर खराब हो गया है इसलिए उसने जल नहीं दिया और इस नींबू-पानी मे मैंने घी और शक्कर डाला है, बहुत अच्छा है, पीकर तो देखो।’ भगवान बोले, ‘अरे मानव हम नदी वाले गंगाजल की बात कर रहे हैं। तेरी गंगा की नहीं, अपनी गंगा की। जा मानव, हम तूझे श्राप देते हैं कि कल पैसों की जो बारिश हुयी है, वे सारे पैसे गायब हो जाएंगे।’

सुनते ही राम चाचा की लूँगी ऊतर गई और हाथ से नींबू-पानी का ग्लास छूट गया। वे घर की तरफ भागे। घर जाकर देखे तो पोटलियाँ पड़ी थीं लेकिन पैसे गायब थे। फिर अपनी पड़ोस वाली गंगा से पूछा, ‘अरे गंगा, कल तूने जो पैसे लूटे थे वे पैसे कहा हैं? गंगा ने कहा, ‘अंदर पोटली में। ‘तो जाओ अंदर, देखो पैसे हैं या मेरी तरह ही गायब तो नहीं हो गये हैं?’ गंगा ने अंदर जाकर देखा कि पोटली खुली पड़ी थी और सारे पैसे गायब थे। गंगा शोर मचाते हुए बाहर आकर बोली, ‘मेरे भी सारे पैसे गायब हैं।’

राम चाचा ने देखा कि तिहाई लाल भागते हुए आ रहा है, पास आकर हाँफते हुए बोला, ‘पता है, मेरे पैसों का हिमालय पर्वत गायब हो गया है। अब मुझे नेशनल बैंक का एवार्ड नहीं मिलेगा।’ इतने में अम्मा फूट-फूट कर रोते हुए आई। राम चाचा ने पूछा, ‘अब क्यों रो रही हो?’ अम्मा बोली, ‘कल हमरा बेटवा नाले मे छलांग मार-मार कर जो पैसे लूटे थे वे सब गायब हो गये हैं।

सभी के पैसे गायब हो गए थे। राम चाचा यही सोच रहे थे कि अब तो मेरा कर्ज भी दूर नही हो पाएगा। मेरी बीबी उधर श्राद्ध के लिए तड़पती रहेगी और इधर मै तड़पता रहूँगा।

शंकर हल्दर

शंकर हल्दर

जन्म- 09/03/2003. पिछले तीन सालों से अंकुर किताबघर के नियमित रियाजकर्ता. किसी भी पत्र-पत्रिका में प्रकाशित होने वाली पहली रचना. पता: बी-458, सावदा-घेवरा जे.जे. कॉलोनी, दिल्ली- 110081. मोबाइल न. 9654653124.

साभार: हंस, जनवरी, 2016

 

आत्महंता की डायरी और बेकशिंस्कि का घर: मग्दालेना जेबाउकोव्स्का

बीसवीं-इक्कीसवीं सदी के विश्वस्तरीय, चर्चित, पोलिश चित्रकार ज़्जिसुअव बेकशिंस्कि का जीवन उनकी कृतियों की तरह ही सर्रियलिस्ट-स्पर्श लिए हुए अविश्वसनीय जान पड़ता है. उन्नीस सौ अंठानवे में उनकी पत्नी की मृत्यु की होती है. उन्नीस सौ निन्यानवे के क्रिसमस की पूर्वसंध्या के अवसर पर उनका इकलौता पुत्र तोमष, जो कि बहुत ही लोकप्रिय रेडियो उद्घोषक, संगीत-पत्रकार और अनुवादक था, आत्महत्या कर लेता है. सत्रह बार चाक़ू से गोदा गया बेक्शिन्स्कि का मृत शरीर इक्कीस फ़रवरी, दो हजार पाँच को उनके ही फ्लैट में पाया जाता है. यह धत् कर्म उनके ही केयरटेकर के नाबालिग पुत्र द्वारा किया गया था. मग्दालेना जेबाउकोव्स्का ने अपनी पुस्तक बेक्शिन्स्कि: एक दोहरी तस्वीर‘ (The Beksinskis: Double Portrait[i]) में बखूबी इन दृश्यों को जगह दी है. पोलिश इंडोलॉजिस्ट तत्याना षुर्लेई ने इसी किताब के शुरूआती हिस्से को यहाँ अनुदित की है.

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बेकशिंस्कि के परिवार के चित्र

By मग्दालेना जेबाउकोव्स्का 

आत्महंता की डायरी और बेकशिंस्कि का घर

एक चिट्ठी 

प्रिय एवा! एक बुरी खबर है। तोमेक[ii] मर गया। क्रिसमस की पूर्व संध्या पर उसने आत्महत्या कर ली और क्रिसमस के दोपहर, करीब तीन बजे मुझे उसकी लाश मिली। मैं पहले ही तुमको इस संबंध में लिख चुका हूँ कि अगस्त या इससे पहले से ही रेड अलर्ट था, और अब इस तरह इसकी समाप्ति हुयी।

अभियोजन पक्ष के कार्यालय के समक्ष जाने से पहले ही मैंने सारे भौतिक सबूतों को छुपा दिया है। क्योंकि, कागज़ के एक टुकड़े पर तोमेक ने लिखा कि मेरे लिए कंप्यूटर में एक चिट्ठी और डिक्टाफोन में एक मैसेज है।  डॉक्टर के आने से पहले ही मैंने कॉपी को सुरक्षित रख कंप्यूटर से चिट्ठी को हटाया, फिर कागज़ के टुकड़े और डिक्टाफोन को जेब में छुपाया। क्योंकि, मुझे डर था कि पुलिस सब कुछ अपने कब्जे में ले लेगा और बाद में अलग-अलग अंजान लोग इसे सुनेंगे, पढ़ेंगे और इसके बारे में पीएचडी लिखेंगे। मुझे लगता है कि मैंने जो किया अच्छा किया। हालांकि, पुलिस और अभियोजन पक्ष वाली औरत यह समझ नहीं सकती थी कि उसने क्यों कोई चिट्ठी नहीं छोड़ा। उन लोगों के बीच सब से बड़ा शक इसी एक बात से पैदा हुआ।

वास्तव में, इस चिट्ठी से मुझे अधिक वस्तुगत जानकारी मिली। जैसे कि, किसको क्या देना चाहिए और कौन-से काम पुरे करने हैं। मैं यह चिट्ठी उनको दिखा सकता था, लेकिन इसे पढ़ने के लिए मेरे पास समय नहीं था। और, टेप इतना व्यक्तिगत था कि इसे सिर्फ मैंने सुना, शायद एक और बार सुनकर इसको नष्ट करूंगा, जैसी उसकी इच्छा थी। उसकी यह भी प्रार्थना थी कि उसकी टेप वाली डायरी को (सुनने या न सुनने के बाद), जिसमें बहुत सारे टेप हैं, भी नष्ट करूँ।

जोशा की मौत के बाद, पहली बार मुझे एक अजीब-सी खुशी का अहसास हुआ कि यह सब होने के पहले ही वह मर गई, क्योंकि यह उसके लिए असहनीय होता। मैं ज़्यादा सहनशील हूँ, वैसे भी अंत में यहाँ किसी का रहना जरुरी है।

सिर्फ़ मुझे मालूम था कि तोमेक के लिए जीवन मुश्किल था। अहंवादी और अहंकारी होने के बावजूद, कोई अपनी नियति खुद नहीं चुनता। लेकिन, मुझे लगता है कि यह जो कुछ भी हुआ, अच्छा हुआ।

टेप पर दर्ज उसका अंतिम संदेश यही था कि जिस दुनिया में उसको जीना पड़ता है इससे वह कितना निराश है। उसे हमेशा एक अलग दुनिया चाहिए थी, जहां के नियम सीधे होते हैं, दोस्ती हमेशा सही होती है या ऐसा कुछ…।

इस मैसेज का अंत लगभग इस तरह था, “मैं जानता हूँ कि मेरी दुनिया कल्पना की दुनिया है, लेकिन उन इकतालीस सालों में मैं भी शायद एक कल्पना था। मैं कल्पना की दुनिया में जा रहा हूँ, क्योंकि मैं सिर्फ़ वहाँ ही खुश रह सकता हूँ। हाथ जोड़कर तुमसे विनती करता हूँ कि मुझे जगाना मत।”

उसने याकूब की सीढ़ी वाला टीशर्ट पहना था, और मुझे नहीं मालूम कि इसका कोई प्रतीकात्मक अर्थ था या नहीं!

उसे डर था कि नींद की गोलियां जब तक उसे मारेगी, उससे पहले मैं आ जाऊंगा! इसलिए, उसने टेप के संदेश में कहा कि तेईस दिसम्बर से उसने कुछ नहीं खाया है ताकि गोलियां जल्दी से अपना काम करें, और गोलियों के डिब्बे को बाहर के कूड़ेदान में फेंका ताकि डॉक्टर को पता न चल सके  कि उसने क्या खाया है!

वह तेईस तारीख की शाम को ही यह करना चाहता था। लेकिन, उसे याद आया कि वह हर शुक्रवार को घर आकर अखबार में छपे टीवी-कार्यक्रम के विवरणों में से पसंदीदा फिल्मों को चिन्हित करता है। ताकि, बाद में उसे देख सके और इसके लिए प्रसारण के समय उन्हें रिकॉर्ड करना चाहिए। वह जानता था कि इस दिन अगर वह नहीं आएगा तो मैं परेशान होकर चेक करूंगा कि क्या हुआ। इसलिए चौबीस दिसम्बर को दोपहर दो बजे मेरे पास आ गया और ऐसी फिल्मों को मार्क किया जो सिर्फ उसके लिए दिलचस्प हो सकती थीं, क्योंकि मुझे वेस्टर्न पसंद नहीं हैं। यह सब कुछ मुझे दिलासा देने के लिए था ताकि मैं कुछ अनुमान न करने लगूँ, और सच में उसका यह प्रयास सफल हुआ।

गोलियाँ खाने के बाद रिकॉर्ड हुए टेप से पता चला कि उसने गोलियों को चौबीस तारीख को दोपहर के तीन बजकर पाँच मिनट पर खाया। मैं चौबीस घंटे बाद वहाँ पहुँचा। वहाँ पहुँचने से पहले मैं कुछ परेशान था क्योंकि उसकी अच्छी दोस्त, अनया ओर्तोदोक्स[iii] ने फोन की और बतायी कि जब वह मेरे घर से अपने घर वापस गया था तभी अनया ने तोमेक से बात की थी और उसे लगा कि तोमेक की तबियत ठीक नहीं है। इसलिए वह बोली कि मैं उसके पास जाऊँ या उसको अपने यहाँ बुलाऊँ।

चूँकि, तोमेक ने मुझसे कहा था कि बीमार होने की वजह से वह दो दिनों के लिए फोन को स्विच ऑफ करेगा, ताकि उसकी तबीयत में सुधार हो। शुरू में मुझे लगा कि सच में उसने यह किया। अनया से बातचीत करने के बाद मैंने तोमेक को फोन किया लेकिन सिर्फ ऑटोमेटिक और रिकॉर्ड स्वर ही सुनाई देते थे, उसका मोबाइल फोन बंद था। मैं वहाँ गया और बार-बार दरवाजे की घंटी बजाता रहा। अब मुझे याद नहीं है, लेकिन यह शायद दोपहर चार बजकर पचास मिनट या पाँच बजकर दस मिनट था। उसने दरवाजा नहीं खोला और मेरे पास चाभी नहीं थी (अगले दिन मुझे पता चला कि उसने मेरे घर में अपनी चाभियों को दिनुव[iv] से खरीदी गयी एक चीनी मिट्टी के गमले में रखा है, अन्य दूसरी चीजों के नीचे) तो मैंने सोचा कि उसने नींद की गोली खाकर और कानों में इअरफ़ोन लगा सो रहा है। दरवाजे तोड़ना मैंने ज़रूरी नहीं समझा। दूसरे दिन मुझे उसकी चाभियाँ मिली और जब मैं तोमेक के पास पहुंचा तो वह बहुत समय से मरा हुआ था। हाँ, ऐसा ही था। ठीक है, अगर तुमको कुछ और जानना चाहिए तो लिखो! सभी को नमस्कार।

ज़्जिसुअव।

वारसा: रविवार, 26 दिसम्बर, 1999, दोपहर 4:07।

***

घर

हर किसी को यह घर धोखा देता था, जो उसे पूरी तरह जानने और समझने की कोशिश करता था। उसने किसी को भी घर की पूरी तस्वीर उतारने की अनुमति नहीं दी। सिर्फ अहाते की ओर से अंदर प्रवेश पाने वाली टूटी हुई सीढ़ियों की, या बगीचे की ओर से झाड़ियों के बीच से ऊँचे उठे हुए सड़े बरामदे की, या एक दीवार पर लकड़ी के हिले हुए रेलिंग की और उपेक्षित अहाते की ही, जहाँ ऊँची छत वाला एक छोटा कुआँ था, तस्वीर खींचना संभव था। एसेनबह की दवाई की दुकान के पीछे छुपा यह घर सड़क से दिखाई नहीं देता था और पेड़ों के पीछे होने के कारण पुओव्येत्स्कि नदी की ओर से भी दिखाई नहीं देता था। शुरू-शुरू में यह घर बॉयलर के वर्कशॉप होने के रहस्य की रक्षा करता था।

हेनरिक वनिएक, ज़्जिसुअव बेकशिंस्कि का दोस्त, को यकीन है कि यह घर, बीच में एक छोटे अहाते के साथ, एक वर्ग की संकल्पना पर आधृत है; जिसमें बाहर से कोई सीधा प्रवेश-द्वार नहीं था। इसे देखकर उसे एन्फ़िलैड की याद आती है जिसमें एक कमरे से दूसरे कमरे तक जाने का रास्ता घुमावदार होता है।

लेकिन यह असम्भव है क्योंकि लकड़ी का यह घर, जिसके छत धातु के प्लेटों से बने थे, अन्य इमारतों के बगल में U आकार में खड़ा था। जो, सामने या अन्दर से एक मंजिली हवेली जैसा था और ऊपर-ऊपर से देखने पर किसी ग्रामीण घर जैसा आभासित होता था।

अतिथियों को यह घर अव्यवस्थित लगता था। मेहमान अंधेरे गलियारे में पहुँचते ही जगह और समय के बारे में भूल जाते थे। लोग स्टूडियो से बाथरूम जाना चाहते थे तो बरामदे में पहुँचते थे। बच्चे के कमरे में जाना चाहते थे और ज़ोफ़िया के कमरे में पहुँच जाते थे। रसोईघर से कोठार जाने या तोमष के कमरे से स्तनिसुआवा दादी के कमरे जाने की प्रक्रिया अक्सर घर के सभी सदस्यों को परेशान करती थी। स्टूडियो के दरवाजे को ढूँढने की प्रक्रिया में अचानक एक आलमारी सामने आ जाती थी, जिसमें प्लास्टर की ढेर सारी खोपड़ियाँ होती थीं।

बाथरूम जाने के रास्ते को ज़्जिसुअव ने छोटी-छोटी बल्बों से सजाया था, रात के समय यह सजावट मदद करने की बजाय परेशानी का सबब बन जाती थी। एक बार बेकशिंस्कि ने वनिएक को बताया कि गलियारे में लगे बल्ब उसके सपनों के जटिल मामले का एक हिस्सा है।

घर के लिए नवीनीकरण कोई मतलब नहीं रखता था, जैसे, दीवारों को अंदर और बाहर से रंगना, बरामदे के टूटे हुए रेलिंग को ठीक करना। घर को इसकी परवाह नहीं थी कि लिविंग रूम को स्टूडियो, और बेडरूम को तोड़कर दो नए कमरे बना दिए गए थे, दूर के कमरों में किरायेदार रहते थे। धीरे-धीरे झड़ते प्लास्टर के कारण दीवारें अपनी नंगी होती लकड़ियों को गोचर करती हुयीं घर की अगोचरता को लगभग नष्ट कर रही थीं।

सनोक शहर के इसी घर में बेकशिंस्कि परिवार की पाँच पीढ़ियाँ रहती थीं। सिर्फ सड़क के नाम अलग-अलग थे। गलिसिया (ऑस्ट्रियन-हंगरियन कब्जे के समय) के ज़माने में  सड़क का नाम ‘ल्वोव्सका’ था, दूसरे गणतन्त्र में ‘यागिएलोनियन’ हो गया, इसी तरह जर्मनी के कब्जे के समय इसका नाम ‘एडोल्फ हिटलर मार्ग’ और साम्यवादी ज़माने में ‘श्वियेरचेव्स्कि[v] मार्ग’।

बेकशिंस्कि परिवार का घर अब नहीं है। बीसवीं शताब्दी के सत्तर के दशक के अंत में उसे नष्ट कर दिया गया।

बेकशिंस्कि परिवार भी अब नहीं है। परिवार के अंतिम सदस्य ज़्जिसुअव की 2005 में हत्या कर दी गयी।

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Tatiana Szurlej

अनुवादक तत्याना षुर्लेई ,  एक  Indologist और फिल्म-आलोचक हैं। हंस, पाखी, पहल, अकार आदि हिंदी-पत्रिकाओं के लिए लिखती रही हैं। पोलैंड के शहर क्राकोव स्थित Jagiellonian University से  ‘The Courtesan Figure in Indian Popular Cinema : Tradition, Stereotype, Manipulation’ विषय पर पीएचडी की हैं। इनसे  tatiana.szurlej@gmail.com पर संपर्क संभव है.

 

[i] Magdalena Grzebałkowska, Beksińscy. Portret podwójny, Wydawnictwo Znak, Kraków 2014

[ii] पोलिश भाषा में लोगों के मूल नाम के अलग-अलग प्रकार हो सकते हैं जिनका इस्तेमाल परिवार या दोस्तों से किया जाता है। इसलिए मूल नाम तोमष (Tomasz) से तोमेक (Tomek) या तोमेचेक (Tomeczek) के प्रकार होते हैं, ज़ोफ़िया (Zofia) से ज़ोशा (Zosia), ज़्जिसउअव (Zdzisław) से ज़्जिसेक (Zdzisek), आदि।

[iii] अनया ओर्तोदोक्स (Anja Orthodox) क्लोस्तेर्केलर (Closterkeller) नाम के पोलिश बैंड की गायिका है।

[iv] दिनुव (Dynów) दक्षिण-पूर्व पोलैंड का छोटा शहर है।

[v] जनरल करोल श्वियेरचेव्स्कि (Karol Świerczewski) रेड आर्मी और पोलिश आर्मी का सैनिक, कम्युनिस्ट कार्यकर्ता।

Something deeply disturbing about Bob Dylan: Sandip K Luis

After the announcement of noble literature award to Bob Dylan in 2016, there has been a hue and cry among the intelligentsia both in praise and criticism of it. It is being argued by the ‘for Dylan’ group that the noble literature award to Dylan symbolizes the ‘return of sixties’, while its critic held the point that it is being ‘romantic’ by those who unconsciously trying to bring sixties in to the mainstream. However, it should be noted that Dylan became famous for his participation and songs in civil rights and anti war  movements in America.

Joan Baez and Bob Dylan

Joan Baez and Bob Dylan

Noble laureate Dylan and Return of Sixties?  

By Sandip K Luis

Yes, there is something deeply disturbing about Bob Dylan’s bagging of the literature-Nobel, that too for “having created new poetic expressions within the great American song tradition”. I hardly know anything about “THE great American song tradition”, but I am pretty sure that such nationalistic justifications – let alone mere claim of ‘new expressions WITHIN’ – cannot be the central concerns here (if that is the case then I expect the same in judging scientific contributions as well).

The radical intellectuals everywhere are more than happy because Dylan is not simply anyone who just fought for civil rights and the peace of humanity, but the very icon, perhaps ‘the icon’, of that golden era of youth counterculture and agitations called “The Sixties”. Yes, I am also very much for civil rights and the global peace, but wait dear; we are not discussing the Peace-Nobel here, right? That will amount to an insult of comparing Dylan with Obama.

If it is for the ‘literary’ contributions of Dylan, that too by surpassing the more identifiable literary personalities like Murakami or Ngugi Thiongo (well, “Times they are a-changin”), I want to know what is really ‘literary’ in him. To admit the truth, I have hardly bothered to listen to Dylan, finding his lyrics, along with the music, too cheesy optimistic and slick minded. But when it is all about the Sixties its “flower-power”, what else you expect?

If one is seriously concerned about the real literal quality of the Sixties-music, then there is only one option left; Dylan’s one and only rival, LEONARD COHEN. But Cohen, with the dim-lit interior of his prayer-like-songs scripted through years of labour, uttered in haunting whispers and sardonic sniggers, is not ‘political’ or ‘popular’ like that of his friendly-adversary Dylan (this is even true in the case of Cohen’s seemingly ‘political’, but not very ‘popular’, songs like ‘The Partisan’ or ‘Democracy’). To religiously enter his shadowy world and to bear the weight of his words, you have to undo yourself like him.

But knowing very well that nothing can satisfy this nihilistic soul, who hauntingly said that ‘the crumbs of love you offer me are the crumbs I left behind’ (‘Avalanche’), my point is not at all that the Nobel should have given to Cohen – after all, c’mon, it just the Nobel. Rather it is a Cohenian view, with all its cynicism and contempt, on Dylan’s recognition, if not his literary or musical merits. The point is simple. Everywhere people are excited about “the Return of the Sixites” in art, culture and politics (justifications vary from the ‘Kiss of Love’ wave in India to the ‘Spring Revolutions’ in the Middle East). But by giving the Nobel to ‘The Icon of the Sixites’; one thing is assured for sure. The Sixties can no longer be a subculture to worth its name, not simply because it is now revered at par with Obama’s contributions to the global peace, but more because of the following reason. The integration of the Sixties to the mainstream and its equation with the American culture are now perfectly complete with Dylan’s Nobel.

But nihilism is nothing but the hope unalloyed. Perhaps this might also be an occasion to hope and work for a ‘Sixties’ we never had; a ‘Sixties with Leonard Cohen’. Hence his song: “Now the wheels of heaven stop / you feel the devil’s riding crop / Get ready for the future: it is MURDER…” (‘The Future’ by L. Cohen)

Sandip K. Luis is pursuing his PhD from SAA, JNU, New Delhi

Satyajit Ray Interviews Andrzej Wajda: A Tribute to Wajda

During the Film Festival in Delhi (1965), we (Film Fare) invited Satyajit Ray to interview Polish Director Andrej Wajda. Although Ray was the interviewer, Wazda occasionally came up with the question as the conversation veered round to technique. The interview was, therefore, an exchange of ideas between two great directors. Well-known Polish critic B. Michalech acted as interpreter.

Satyajit Ray With Wajda

Satyajit Ray Interviews Andrzej Wajda

 

Ray- what are you working on now, Mr. Wajda?

Wajda- Going slow actually. I’m engaged at the moment in making a historical film. Not quite my cup of tea, though.

Ray- Why, then are you making it?

Wajda- Well, it’s based on a very popular book, well known in Poland, very dear to poles. After three years of waiting, doing nothing, I feel the need to be in touch with my audience again.

Ray- Oh yes, I understand that. Was “Generation” your first film?

Wajda- My first independent film. I mean, made entirely by me: my very first feature film.

Ray- I saw it in Venice, out of competition. Wonderful, I thought.

Wajda- Now, Mr. Ray, I have a question for you.

Ray- Out with it.

Wajda- You being the… well, the best known and the most brilliant director of Indian films, do you think it is possible, I mean in the future, taking a long perspective, to make films independently, films like the ones you made without the support, the strong support of some national organisation like State.

Ray- Well, I make my films without the support of any national organisation. There is no question of such support the way I make films. They are financed by private producers and distributors. As for my first film “Pather Panchali,” of course, I started with my own money, and then because funds run out, we had shelved it and actually thought of giving it up. And then somebody who had some influence with Government, persuaded them to take it up and they took it up. I mean the West Bengal Government.

Wajda- My question, I’m afraid, is more delicate. You see, for us you are the only man who is practising a sort of an excellent national cinema, truly national, and therefore I put it to you: Do you think that the way you are doing it this sort of cinema can develop in India- not only a cinema which Indian in name but which is practically a sort of national cinema?

Ray- Well, theoretically it is possible. I mean just the way I make films it is possible for another person to make films. You need first of all a man with the same sort of urge and with a certain degree of talent, also a certain degree of tenacity.

Wajda- Obstinacy…

Ray- Obstinacy, yes. Let’s put it this way. There is no bar, of course, if his films succeed. But supposing he makes one film, and if that is a failure at the box office- it may be an artistic success- and if he keeps on making failure financially, then it is difficult for him to make any headway, because after all, he depends on the producers, his backers, his distributors.

Wajda- But do you think there are a group of men in India, in any centre, who try to make the sort of films you have been making?

Ray- Well, I can speak about my own home state, Bengal. There are a number of young directors who engaged after “Pather Panchali”. Because I was new director and my films was a success, some distributors who had not backed young people, new people, before, now began backing them, and some of them have been reasonably successful. Oh, yes, there is such a young group in Bengal. Some haven’t succeeded as well as others, so they have to wait long for another contract. But there is backing for at least some people. There isn’t a big a big movement yet, not really, but there are people who are wanting to back them. It’s a healthy sign.

Wajda- Yes, but is the state itself interested in encouraging this sort of good and important- I mean socially and artistically important-productions? Does the state have an interest in encouraging such productions?

Ray- The state itself is not in a position to directly encourage them. Now we have this President’s Award in India which is an all India thing. Awards are supposed to be given to significant films. But of course they are chosen by committee all of whose members may not be experts, you see. Well, Government also gives a cash prize and a medal, and if the film gets a prize, it can get better distribution if it can be revived. On the strength of the prize, it can have a fresh start, you know.

Also there was some talk of forming a financial corporation which would be backing certain scripts which were thought suitable, but it hasn’t so far worked…but it’s in the air. It’s being considered. May I put a question to you? How many films have you made so far-five, six?

Wajda- Ten.

Ray- Let’s see… “Generation,” “Kanal,” “Ashes and Dimonds,” “Lotna,” “Samson”…

Wajda- “Sorcerers”… another made in Siberia- “Lady Macbeth of Minsk.” Then, of course, a sketch for a French film…

Ray- Oh yes, yes….

Wajda- “Lost on the Frontiers” which was a very nice sketch but I am sorry now that this subject has been put into a new film, because it is the subject of an old film. And then the film I am making now is in two parts… I mean from the production point of view it is even more than two films.

Ray- Only one film was in colour….or were there others?

Wajda- Only one… “Lotna.”

Ray- Do you like working in colour?

Wajda- It is certainly very interesting but one is handicapped by poor quality of laboratories in Poland and then not only the labs, but also the quality of the colours themselves. One can never foresee if it will work or not. So I am a little afraid of colour at this stage. Maybe because I am an artist, I am more sensitive to colour. For normal colour production, we may be all right. But my requirements are not so easily satisfied.

Ray- Well, it is more or less the same with me. I have made one colour film. Of course this was special because it was all outdoors, all location. But I was worried because processing facilities were not adequate in India and it had all to be processed not in Calcutta but in Bombay. But I was quite surprised with the results which wouldn’t have been as good had we shot in studio. We don’t have the lights, etc. But outdoors was a different matter. And I had this special kind of a story- I wrote the story specially for the films.

Wajda- Reverting to colour. We have another difficulty. In our climate the differences in colour during the day are enormous, unlike India where you have approximately the same intensity of light the whole day.

Ray- Now in Delhi? (Laughter)

Wajda- Yes. We have in Poland, during the day, ten or even twenty colour changes.

Meeting Contingencies

Ray- Well! I will tell you how we shot the film in Darjeeling, way up in the hills. I knew there would be differences in colour because there would be clouds, there would be mist, there would be sun, there would be morning and evening. The shooting had to meet all contingencies. It was a two-hour-long story, two hours continuous, unbroken time you see…I had scenes, mist scenes and cloudy scenes and sunny and shadowy scenes. We’d be shooting a sunny scene-and then the mist would come and we would all run with the camera and take another part of another scene. That’s how it was shot.

In a way it was easy because there was no chance of costume involved. Everything happened within the radius of, say, one square  mile. As soon as we felt there were clouds coming up, we changed, folded up there, and went over the next spot for that part of the scene. And so on.

Wajda- Weather back home is so capricious. A solution would be to use several cameras simultaneously as some time, Kurosawa does in black and white. Yes, because the difference between one take and another can be sometimes quite terrible. It’ is necessary to eliminate then afterwards. Eight or ten cameras very well placed, in a carefully thought out way, could well be the solution for a good colour film.

Ray- Tell me, Mr. Wajda, do you always make films of your own choice? I mean your own subject, your own cast and everything. You have complete freedom, I suppose?

Wajda- The initiative is mine. But after the script has been chosen and accepted by me, the last word is a committee’s which has to approve of it. In a way, I have complete freedom, although someone else has the last word. This is understandable because the state being the producer has at one stage to interfere and to say yes or no. But once production starts, I am complete master. There is no interference. I may even change a lot of things, departing from the original script. Ray- Can you really?

Wajda- Yes. From the script, from the approved script, I can change a sequence here, an entire scene there…

Ray- And they see the finished film?

Wajda- The committee does, yes. But of course when the film is finished the situation is much better because the money has been expended (laughter). This is more serious, so practically nobody interferes then.

 Ray- Have you ever had to completely abandon an idea because it wasn’t approved?

Wajda- Yes, some of them. For the ten films I have made in my career. I had 35 scripts. In a way I suppose I have more experience in making scripts (laughter) than of actually making films. But not all of them, of course, have been abandoned because the committee didn’t approve of them. Some I abandoned myself. Unfortunately in Poland we do not have professional script-writers and sometimes one comes across a very good idea which cannot be well expressed in a script.

Ray- Yes.

Wajda- …And therefore I do the scripting myself, though I am not always satisfied with my own work. Sometimes is happens that the script is not bad, the idea is good, but still there is a lack of good actors for some particular characters. Here again we are handicapped because we do not have good professional film actors, only theatre actors playing in films. And always the choice is limited and then everything depends on the goodwill of an actor or of a theatre. In Warsaw, for instance, there are 20 dramatic theatres. And Warsaw is not a very big town, about a million of population.

Ray- How many takes do you shoot normally? I often have to do with just one. It’s a question of raw stock-which is rationed here.

Wajda- We try to adopt the same method. Of course, one has to have a certain idea of the shape the film is going to take. But there is a certain pleasure in shooting much more than the final requirements. The pleasure of making a film is repeated thrice-firstly, when you are writing the script; secondly, when you are editing it.

Ray- Yes. Even if you shooting with a clear cut idea in your mind, at the cutting stage there are always small things you can do.

Wajda- Right.

Ray- It is not rigid, never rigid, particularly in dialogue scenes.

Wajda- I agree.

Ray- When you are cutting back and forth you can do a lot and you can control and modify the acting.

Wajda- Yes.

Ray- So there is still a lot left, but again here in Bengal we have to be very disciplined because we can’t be spending too much. That would be disastrous. Ours is a small market.

Wajda- But you have never used some popular stars of India?

Ray- I have not used the biggest stars, but one of them whom I introduced for the first times is now a very big star, but he is still making films for me. Another I introduced has now gone to Bombay; she too is now a big star. It’s like you see. As soon as they begin acquiring mannerism, I am a little afraid of using them.

Wajda- Now may I ask you about rehearsals? I have a double technique. For young inexperienced actors, I usually do not rehearse very much because here the only thing which matters is a certain —

Ray- A certain freshness, exactly…

Wajda- But for experienced actors, rehearsals are good. For the young actor who lacks the technique it is very difficult to get a good performance during rehearsal and to continue it when shooting.

Rehearsing Without Props

Ray- Do you find, as I do sometimes, that it is a difficult to rehearse a film scene as a stage scene in a drawing room…you know, I find that unless I am surrounded with the right props on the set I can’t rehears, I get no inspiration.

Wajda- This sort of rehearsal, if you call it rehearsal, with the actors is very useful in the beginning. More in the nature of a free discussion with the actors.

Ray- Yes.

Wajda- Just to reconstruct some characters, indicate the general line they are following. But then, of course I feel it is not useful, it is not effective, except maybe for a film which is entirely based on dialogue, which is quite a different thing.

Ray- Yes, particularly if you are planning fairly long takes where the actors have sustain the scene, it can be quite a problem.

Wajda- Yes, but so long as the actors are not in costume and in the place where the shooting is going to be done, they are for the director a little dead, a little…(Laughter).

Ray- Exactly… It’s the same with me. That’s why I put the question.

Wajda- You see, there is a very natural interaction of all the elements on the set.

Ray- Exactly. Do you agree with, for instance, Antonioni, when he says that an actor is nothing but a puppet in the director’s hands? That the actor will have to do exactly as he says, he shouldn’t be given any initiative of his own?

Wajda- I am sharply against it.

Ray- Ah, yes. You know of course that Antonioni said this…

Wajda- Yes, yes, of course…

Ray- I think Antonioni lies when he says that.

Wajda (laughing)Maybe Antonioni thinks he can influence actors because his principal actress is his wife and therefore he has a very strong influence on her. If one were to make a film in this way one would be tapping only half the possibilities of a good performance. The actor’s own interpretation of the character gives fullness to his performance. I suppose to call actors puppets is a reaction against the star system. Films are made to suit stars. Of course, sometimes it works as in the cases of Paul Newman and Marlon Brando. All the films they have made are made round them, and still it works.

Ray- Yes it’s like a concerto.

Wajda- But I myself am interested in making this sort of film.

Ray- Because the artists get an excessive prominence, it is not part of general pattern. They stick out, you see….

Published in Film Fare, 1965

 

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