निकानोर पार्रा- मक्खियों का देवता : सोलेदाद मरामबियो

चिली के कवि निकानोर पार्रा, जिनकी मृत्यु 23 जनवरी 2018 में हुई, को याद करते हुए सोलेदाद मरामबियो जो कि स्वयं एक लेखिका एवं अनुवादक हैं, ने यह लेख लिखा है. पार्रा दक्षिण चिली में 103 साल पहले पैदा हुए और स्पैनिश भाषा और साहित्य के सबसे सशक्त स्वर बने. वह अकविता के जनक के रूप में जाने जाते हैं, अकविता अपनी बात कहने का वह तरीका है जो स्थापित साहित्यिक मानकों को तोड़ता है साथ ही कविता को रोजमर्रा की जिंदगी, आम बोलचाल की भाषा ओर पॉप कल्चर से जोड़कर नए तरीके से परिभाषित भी करता है. पार्रा एक गणितज्ञ और भौतिकविज्ञानी भी थे.

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Nicanor Parra. Photo by Javier Ignacio Acuña Ditze, 2014. Courtesy of Wikimedia Commons.

निकानोर पार्रा: मक्खियों का देवता

By सोलेदाद मरामबियो 

पार्रा की रचनाओं में अपने समय की सड़ांध और मृत्यबोध को उकेरा गया है, लेकिन यह बाद की बात है. निकानोर पार्रा की पहली किताब बेनाम गाने की किताब (Cancionero sin nombre,1937), फेडरिको गार्सिया लोर्का की शैली से प्रभावित थी. पार्रा की शुरूआती कविताओं में इस स्पैनिश कवि का लय और ताल, साथ ही ग्रामीण परिवेश और दृश्यों की छाप दिखाई पड़ती है. लेकिन जिस ग्रामीण परिवेश का चित्रण लोर्का करता था वह पार्रा के परिवेश से कई मायनों में अलग था. लोर्का का संगीत भले ही उसकी रचनाओं में मौजूद था लेकिन पार्रा की रचनाएँ नितांत ‘चिली’ (चिलियन) थीं, संगीत में तैरने वाले उसके शब्द अलग थे. यह अंतर आप तभी समझ सकते हैं जब आपके पास पार्रा जैसी ही संवेदनशीलता हो, आप उसके ही जूते पहनकर, उसके जाने पहचाने रास्तों पर चहलकदमी किये हों. जल्द ही पार्रा को लोर्कायी लय और ताल से घुटन महसूस होने लगी और उसने इसे त्याग दिया. अतियथार्थवाद, व्हिटमैनियन छंदमुक्ति और काफ्का की अंतर्दृष्टियों को लेकर पार्रा ने अपने लेखन में प्रयोग जारी रखा. ये सारे प्रयोग 1954 में लिखी उसकी किताब कवितायें और अकवितायें (Poemas y Antipoemas)  में एक दूसरे से टकराते हुए दिखते हैं. इसी किताब में मृत्युबोध का संत्रास और सड़ांध उसके विषय बनते हैं.

पार्रा की कवितायें और अकवितायें के प्रकाशित होने के चार साल पहले, पाब्लो नेरुदा की कैंटो जनरल (Canto General) प्रकाशित हुई थी. दरअसल यह किताब अमेरिकी इतिहास का महाकाव्यीय गायन थी. चिली और लातिन-अमरीकी पाठकों के लिए यह महत्वपूर्ण क्षण था. इस समय तक पाब्लो नेरुदा का कद स्पैनिश साहित्यिक समाज में पितातुल्य हो चुका था. कैंटो जनरल में नेरुदा पारंपरिक कविता के छंद को तोड़ कर गद्य की भाषा के करीब आने और सरल भाषा का प्रयोग करने की कोशिश कर रहे थे. पार्रा की विरासत को आसानी से समझने के लिए, ज़रूरी है कि हम पहले नेरुदा को समझें. यह व्यक्तिगत प्रतिद्वंदिता की बात नहीं है क्योंकि नेरुदा पार्रा के अकविता के शुरूआती समर्थकों में से थे. बल्कि बात यह है कि कविता और उसके अवयवों के बारे में हम क्या समझते हैं. इन बिन्दुओं पर नेरुदा और पार्रा एक दूसरे की विपरीत दिशाओं में चलते हैं. यह कहा जा सकता है कि पार्रा इन विषयों पर ज्यादा स्पष्ट था.

नेरुदा ने सरल भाषा में लिखने की कोशिश की, लेकिन उसकी कैंटो जनरल  स्वयं आडम्बरपूर्ण थी. यह किताब लगभग पैगंबरी अंदाज़ में अमरीकी इतिहास (उत्तरी एवं दक्षिणी अमरीका) के पांच सौ सालों का ब्यौरा देती है, जहाँ वह लिखता है कि, “मैं यहाँ कहानी सुनाने आया हूँ|’’ नेरुदा की आवाज़ पैगंबरी भी थी और काव्यात्मक भी. उसके अनुसार उसकी आवाज, सबकी आवाज थी. पार्रा केवल पार्रा रहना चाहता था और आम लोगों से बात करना चाहता था. नेरुदा के कैंटो जनरल  में महाकाव्यात्मक दृश्यों की भरमार है जहाँ वह महाद्वीप के लोगों और उनके भीषण दुखों का वर्णन करता है. वहीं पार्रा अपनी बॉक्सर जैसी चपटी नाक, झड़ते बाल और उन कबूतरों के बारे में लिखता है जो मक्खियों को खा रहे हैं, इसके पहले कबूतरों का चित्रण कविताओं में अनंत की तरफ़ उड़ते हुए पक्षी के रूप में किया जाता रहा है. अपने लेखन द्वारा पार्रा ने कविता में भद्देपन, गंदगी, मटमैले जूतों को चित्रित किया. वह गरीबों की, भीड़ की अभिव्यक्ति नहीं बनना चाहता था बल्कि वह उनमें से ही एक बनना चाहता था. इसलिए उसके शब्द आम थे, उसके परिदृश्य और कथानक ऐसे थे जो आपको किसी भी रास्ते के चौराहे पर, पार्कों में, गंदी चादरों के बीच, रोजमर्रा की जिंदगी के तहों में मिल जायेंगे|

कविताएं और अकविताएं की कविता पाठकों को चेतावनी (Warning to the Reader) को पढ़कर हम पार्रा के रचनाकर्म को समग्रता में समझ सकते हैं. इस कविता में पार्रा पाठकों को सचेत करता है कि वह अपने लेखन से पैदा हुए असहजता का उत्तर नहीं देगा. वह यह भी बताता है कि उसकी कविता में पाठक ‘इन्द्रधनुष’ या ‘दर्द’ जैसे शब्द नहीं पायेंगे. ये शब्द अनुपस्थित हो सकते हैं, हालाँकि मैंने तथ्यात्मक जांच तो नहीं की, लेकिन उसकी रचनाओं में दर्द मौजूद है. ये दर्द उसके चुटकलों के बीच, आम बातचीत में तैरता रहता है. पार्रा का ‘दर्द’ रोजमर्रा की जिंदगी से उपजा हुआ दर्द है- थकान, ग़रीबी, इर्ष्या, अधूरा प्यार, सतही प्यार, मृत्यु और इन सब की विसंगति और असहजता. पार्रा को उन लोगों से उबासी महसूस होती है जो यह सोचते हैं कि कविता दरअसल बड़े-बड़े विषयों और बड़ी-बड़ी बातों के लिए होती है. उसने स्पैनिश भाषा की कविता को आधुनिक बनाने के साथ ही इसकी दुरुहता को दूर करते हुए अधिक व्यापक बनाया. वह लेखन में क्रांति लाना चाहता था, वह साहित्यिक समाज के पवित्र गायों (sacred cows) द्वारा पैदा किये गए मक्खन-काव्य (fat poetry) के खिलाफ़ था. विडंबना यह है कि आज पार्रा खुद एक पवित्र गाय (sacred cow) बन गया है, लेकिन हम उसे एक ऐसे गाय के रूप में देख सकते हैं जो अपने तबेले को छोड़कर पोलिश जंगलों में एक जंगली बाइसन के साथ रहने के लिए आ गया है. पार्रानुमा गाय जंगली रास्तों पर दूर निकल गया है, जिसका बहुतों ने अनुगमन किया.

संतियागो के प्रधान गिरिजाघर (कैथ्रेडल) में अंतिम संस्कार के समय पादरी (प्रिस्टस) उसकी आखिरी इच्छा पूरी नहीं करना चाहता था. पार्रा चाहता था कि चिली की शानदार लोक गायिका विओलेता, जो कि उसकी अपनी बहन थी, के गीतों के साथ उसकी विदाई की जाय. पादरी का कहना था कि वियोलेटा के गीत ऐसे पवित्र स्थल पर नहीं गाये जा सकते. उसी वक्त पार्रा की एक बेटी ने पादरी से माइक्रोफ़ोन को छीनते हुए वहां पर उपस्थित लोगों को यह बात बताई और कहा कि वियोलेता का गीत यदि नहीं होगा तो उनका परिवार पार्रा के पार्थिव शरीर को वहां से लेकर चला जायेगा. थोड़ी देर में ही चर्च के स्पीकरों से शुक्रिया जिन्दगी! (Gracias a la vida) का स्वर गूंजने लगा. इस गीत के बजने के साथ ही वहां का परिवेश कविता, नृत्य और आम जिंदगी के दृश्यों के साथ भर गया. पार्रा ने अपने लेखन द्वारा इस भनभनाहट को अंदर आने दिया, जिसके लिए हम उसके शुक्रगुजार हैं.

सोलेदाद मरामबियो चिली (संतियागो) की लेखिका एवं अनुवादक हैं. अगली डक्लिंग प्रेस से उनकी दो किताबें अभी हाल में ही दो भाषाओं में प्रकाशित हुई हैं. इनका काम समय-समय पर ग्रांटा, जम्प्स्टर जैसी पत्रिकाओं में प्रकाशित होते रहा है. 2016 तक ब्रूतस एवितोरस  (Brutas Editoras) की संपादक रह चुकी हैं. पिछले साल उनको अपने पहले उपन्यास को पूरा करने के लिए चिली के नेशनल कौंसिल फॉर द आर्ट्स एंड कल्चर की तरफ से अनुदान प्राप्त हुआ है.

इसके हिंदी अनुवाद के लिए तिरछीस्पेल्लिंग जेएनयू के शोधार्थी रविरंजन सिंह का आभारी है. रविरंजन मूलतः हिंदी नाटक और भक्ति काव्य संसार के दरम्यान सक्रीय रहते हैं.  raviranjansingh.pbh@gmail.com  के माध्यम से आप इन्हें संपर्क कर सकते हैं.

इस लेख का मूल वर्ड्स विदाउट बॉर्डर्स पर देख सकते हैं. वहीं से इसे साभार लिया गया है.

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मुक्तिबोध के बहाने रचना और आलोचना के अंतर्संबंधों की पड़ताल: प्रो.राजकुमार

मुक्तिबोध के बहाने प्रो. राजकुमार एक बहस की धारावाहिकता में गहरे विश्वास के साथ उतरे हैं. इस सीरिज का पहला  और दूसरा लेख  आप पढ़ चुके हैं, तीसरा यहाँ प्रस्तुत है.

दूसरा लेख इस मायने में विशेष रहा कि सोशल साइट्स पर  इससे संदर्भित  विषद  प्रतिक्रियाएं  देखने  को  मिलीं. लेकिन ज्यादातर प्रतिक्रयाएं  अवांतर प्रसंगों  में उलझी  रहीं. और लेख की  मूल  आत्मा से बहस को भटकाने की कोशिश की  गयी. प्रो.राजकुमार  की यह विशेषता  है कि  अवांतर प्रसंगों में उलझने  के बजाय  अपनी  निरंतरता / धारावाहिकता कायम रखते हैं.  उम्मीद  है कि  यह सीरिज लम्बी चलेगी. #तिरछीस्पेल्लिंग 

Muktibodh By Haripal Tyagi

Muktibodh By Haripal Tyagi

आलोचना और रचना

By प्रो.राजकुमार

हिन्दी में आलोचना को परजीवी कहने का चलन रहा है। इधर कुछ ‘सर्जनात्मक‘ किस्म के ‘आलोचकों’ ने आलोचना को परजीवी के कहने के बजाय प्राध्यापकीय कहना शुरू कर दिया है। आलोचना अच्छी या बुरी तो हो सकती है और होती भी है; जैसे रचना अच्छी या बुरी हो सकती है, होती है, लेकिन प्राध्यापकीय आलोचना किस बला का नाम है? ‘जिसे प्राध्यापक लिखे वह प्राध्यापकीय आलोचना’!

रामचन्द्र शुक्ल, हजारी प्रसाद द्विवेदी, रामविलास शर्मा और नामवर सिंह- हिन्दी के चार बड़े आलोचक और चारों के चारों प्राध्यापक! हिन्दी आलोचना के इतिहास की इनके बिना कल्पना ही नहीं की जा सकती। हिन्दी ही नहीं, समूची दुनिया में आलोचना, समाज विज्ञान और विज्ञान के इतिहास की कल्पना विश्वविद्यालय के बिना असंभव है। लेकिन ये सारा ज्ञान-विज्ञान और साहित्य-सिद्धान्त इन सर्जनात्मक आलोचकों की दृष्टि में प्राध्यापकीय होने के कारण त्याज्य है।

हिन्दी में यह धारणा बद्धमूल रही है कि आलोचना दोयम दर्जे का काम है। अस्ल चीज है रचना। रचना मौलिक सृजन है और आलोचना उस पर आश्रित परजीवी, जिसकी हैसियत लाल बुझक्कड़ से अधिक नहीं।

आधुनिक आलोचना की जिस ढब पर शुरुआत हुई, उससे इस धारणा को बल भी मिला। परजीवी की छवि से मुक्ति पाने की छटपटाहट में आलोचक का नया रूप सामने आया जिसे अंग्रेजी में ‘स्कॉलर क्रिटिक’ कहा गया है। स्कॉलर क्रिटिक की छवि अपने यहाँ हजारी प्रसाद द्विवेदी पर बहुत सटीक बैठती है। मध्यकालीन संस्कृति और बौद्धिक परम्परा के गम्भीर अध्येता जिन्होंने आधुनिक रचनात्मकता पर बहुत कम लिखा। स्कॉलर क्रिटिक की परम्परा का विकास आगे चलकर संस्कृति के आलोचक के रूप में हुआ। सांस्कृतिक आलोचक के अध्ययन का दायरा साहित्य तक सीमित नहीं रह गया। वह समूची संस्कृति का आलोचक बन गया। साहित्य संस्कृति का पर्याय नहीं है, संस्कृति का एक हिस्सा है। सांस्कृतिक आलोचना समग्र सांस्कृतिक गतिविधि के परिप्रेक्ष्य में ही संस्कृति के इस साहित्य वाले हिस्से का अध्ययन करती है। सांस्कृतिक आलोचना की सार्थकता का विश्लेषण करते हुए टेरी इगल्टन ने तो साहित्य के विभागों का नाम ही सांस्कृतिक-अध्ययन विभाग रख देने की सलाह दी थी। सांस्कृतिक आलोचना उस दौर की उपज थी, जब सिद्धान्त-निर्माण का बोलबाला था, हर छोटा-बड़ा आलोचक थियरी बनाने में लगा था। थियरी ज्ञान मीमांसा और सत्तामीमांसा के एक अंग के रूप में साहित्य और संस्कृति का अध्ययन करती थी। थियरी की बाढ़ अब उतर चुकी है और साहित्य की सापेक्ष स्वायत्तता और स्वकीयता को नये सिरे से समझने की कोशिश चल पड़ी है, किन्तु इस समूचे घटनाक्रम से यह अभिज्ञान तो हो ही गया कि साहित्य को ज्ञानमीमांसा और सत्तामीमांसा के परिप्रेक्ष्य में ही ठीक से समझा जा सकता है। मुक्तिबोध के शब्दों में कहें तो साहित्य-समीक्षा सभ्यता-समीक्षा भी है। सभ्यता-समीक्षा के दायित्व से सम्पृक्त होकर ही साहित्य-समीक्षा सार्थक हो सकती है। यह कहना ठीक नहीं होगा कि मुक्तिबोध से पहले साहित्य-समीक्षा के इस गुरुतर दायित्व का एहसास हिन्दी में किसी को था ही नहीं। किन्तु मुक्तिबोध को इस बात का श्रेय अवश्य दिया जाना चाहिए कि उन्होनें साहित्य-समीक्षा को सही मायने में सभ्यता-समीक्षा के रूप में विकसित और स्थापित किया। यह काम उन्होंने उस समय किया जब साहित्य में आधुनिकतावाद का बोलबाला था और उसकी स्वायत्तता का बढ़ चढ़कर बखान किया जा रहा था। यह वही समय था जब पुराने ढंग की ‘मार्क्सवादी आलोचना’ साहित्य की स्वायत्तता के तर्क का ठीक-ठीक जवाब नहीं दे पा रही थी। लेकिन मुक्तिबोध के आलोचनात्मक लेखन पर बात आगे बढ़ाने से पहले रचना और आलोचना के सम्बन्ध को लेकर जो चर्चा शुरू हुई थी, उस पर दोबारा लौटें।

उल्लेखनीय है कि सॉस्यूर के भाषा-विषयक चिन्तन से प्रेरित संरचनावाद ने साहित्यिक आलोचना को एक मुकम्मल शास्त्र में तब्दील करने की कोशिश की और इस प्रक्रिया में साहित्य के मूलभूत नियमों को खोज निकालने का दावा किया। आलोचना को परजीवीपन से ऊपर उठाकर विज्ञान के समकक्ष खड़ा कर देने की मुहिम से पहले नॉर्थाप फ्राई अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘एनॉटमी ऑफ़ क्रिटिसिज्म’ में ऐसा उद्यम कर चुके थे। फ्राई के विचार रचना और आलोचना के अंतर्संबंधों को समझने की दृष्टि से महत्वपूर्ण है, इसलिए उनकी संक्षेप में चर्चा अप्रासंगिक न होगी।

यह धारणा, कि रचनाकार ही रचना के साथ ‘न्याय‘ कर सकता है, मानकर चलती है कि आलोचक परजीवी है, जबकि सच्चाई यह है कि आलोचना एक स्वतंत्र विद्या है जो साहित्य का अध्ययन करती है, जैसे विज्ञान वस्तु जगत अध्ययन करता है। आलोचना के अपने नियम कायदे और सिद्धान्त हैं। फ्राई के अनुसार रचनाकर-आलोचक के लिए अपनी रचनात्मक अभिरूचि से ऊपर उठ पाना प्रायः असंभव होता है। छोटे-मोटे लोगों की तो बात ही क्या टी.एस. इलियट जैसे प्रतिभाशाली व्यक्तित्व का भी आलोचनात्मक विवेक काफी कुछ उनकी रचनात्मक अभिरूचि से निर्धारित दिखता है। रचनाकार का अपने और दूसरों के बारे में लेखन दिलचस्प तो हो सकता है लेकिन उसे अन्तिम और आधिकारिक लेखन नहीं कहा जा सकता। अक्सर रचनाकार अपने लेखन के भी ख़राब आलोचक साबित हुए हैं। प्रमाण स्वरूप अनेकों उदाहरण दिये जा सकते हैं। फ्राई के मुताबिक ‘जब रचनाकार आलोचक की तरह बोलने लगता है तब वह आलोचना नहीं, दस्तावेज़ निर्मित करता है। इस दस्तावेज़ का आलोचक द्वारा परीक्षण अपेक्षित होता है। सामान्य रूप से यह माना जाता है कि रचयिता के मुक़ाबले आलोचक रचना के महत्व का बेहतर निर्णायक होता है। यह धारणा चली आ रही है कि आलोचक को रचना का अन्तिम निर्णायक मानना हास्यास्पद है, जबकि व्यवहार में यह स्पष्ट है कि वही (आलोचक) रचना का अन्तिम निर्णायक होता है। इसका कारण निश्चयात्मक (Assertive) लेखन और साहित्यिक लेखन में विभेद न कर पाने की असमर्थता है। वर्णानात्मक-निश्चयात्मक लेखन की उत्पत्ति सक्रिय इच्छा-शक्ति और सचेत मस्तिष्क से होती है और ऐसा लेखन मुख्य रूप से कुछ ‘कहने‘ से ताल्लुक़ रखता है।

जैसा कि पहले कहा गया, फ्राई के बाद संरचनावाद आया। संरचनावाद ने साहित्य के मूलभूत सिद्धान्तों, रूढ़ियों, और परम्पराओं को खोज निकालने का दावा किया। आलोचना शास्त्र बन गई, बल्कि जोनाथन कूलर के शब्दों में कहें तो काव्यशास्त्र, संरचनावादी काव्यशास्त्र। और फिर आया उत्तर संरचनावाद, उसने इस तरह के शास्त्र-सिद्धान्त निर्माण की संभावना को सिरे से खारिज कर दिया, लेखन की परम्परागत कसौटियों और श्रेणी विभाजन को तोड़ दिया, और विधाओं की मर्यादा और स्वायत्तता को मानने से इन्कार कर दिया। साहित्य की साहित्यकता का बखान जिन गुणों के आधार पर किया जाता था, वे सभी गुण, विश्लेषण करने पर पता चला, गैर साहित्यिक लेखन में भी मौजूद हैं। निष्कर्ष यह निकला कि साहित्यिक लेखन में ऐसा कोई आभ्यन्तिरक गुण नहीं जो गैर साहित्यिक लेखन में मौजूद न हो। दोनों में फर्क सिर्फ प्रकार्य (Function) और रूढ़ि से पैदा होता है। तात्विक और आधारभूत भिन्नता वस्तुतः सांस्कृतिक निर्मिती है और उसे विखण्डित करने की ज़रूरत है। फिर क्या था स्त्री-पुरूष (प्रकृति-संस्कृति) की तरह रचना और आलोचना की द्विआधारी अवधारणा को भी खण्डित करने की आवश्यकता महसूस हुई। इहाब हसन ने अपनी पुस्तक ‘पैराक्रिट्सिज्म’ में इस जरूरत को पूरा कर दिया। हसन ने दिखाया कि रचना और आलोचना में कोई तात्विक और आधारभूत अन्तर नहीं है। जो अन्तर है वह सांस्कृतिक निर्मित है और उसे तोड़ देने में ही दोनों का भला है।

‘आलोचना भी रचना है कहने में रचना की श्रेष्ठता कायम रहती है, जैसे झाँसी की रानी को मर्दानी कहने में मर्द की श्रेष्ठता कायम रहती है। उत्तर संरचनावाद में श्रेष्ठता के इस तात्विक और बुनियादी आधार को विखण्डित कर अस्मिता और विधा की स्वायत्तता को ही समस्याग्रस्त बना देता है। यहाँ भिन्नता का महत्व है लेकिन यह भिन्नता तात्विक और बुनियादी किस्म की नहीं है। इस भिन्नता के आधार पर किसी को हीन या श्रेष्ठ नहीं ठहराया जा सकता है।

अब न तो व्यक्ति की स्वायत्तता का कोई पैरोकार बचा है और न ही कला और साहित्य का। ये सभी पाठ (Text) हैं और ये पाठ परस्पर सम्बद्ध (Intertextual) हैं। परस्पर सम्बद्धता का मतलब है कि कोई भी पाठ पूर्णतः मौलिक नहीं है, दूसरे पाठ से जुड़ा हुआ उस पर निर्भर है। इसका निहितार्थ यह भी है कि सभी पाठ बराबर हैं। लब्बोलुआब यह कि रचना और आलोचना के बीच खड़ी दीवार ढह चुकी है। रचना आलोचनात्मक हो गई है और आलोचना रचनात्मक।

यह एहसास भले ही नया हो किन्तु सच्चाई यही है कि श्रेष्ठ आलोचना और रचना में ऐसा आत्यान्तिक भेद कभी था ही नहीं। मुक्तिबोध एक ऐसे लेखक हैं जिनका लेखन रचना और आलोचना के बीच की पारस्परिक सीमाबद्धता को लगातार समस्याग्रस्त बनाता है। उनकी कविताएँ, कहानियाँ और लेख विधाओं के पारम्परिक चौखटे में फिट नहीं बैठते। कविता में वे थीसिस लिखते हैं और उनके लेखों में ऐसे टुकड़े ख़ूब मिल जायेंगे जिन्हे मज़े से कविता में खपाया जा सकता हैं। उनकी कहानियाँ ऐसी हैं जिनमें रेखाचित्र, लोक-नीति-कथा और निबन्ध के गुण घुले-मिले हैं। ‘एक साहित्यिक की डायरी’ को क्या कहेंगे? रचना या आलोचना? मुक्तिबोध पारम्परिक किस्म के आलोचक नहीं हैं। वस्तुतः आलोचना उनके सम्पूर्ण लेखन का अभिन्न हिस्सा है, कोई आपदधर्म नहीं। कुछ लोग सोचते हैं कि अपने विरोधियों और साहित्य के दरोगा अर्थात् आलोचकों को जवाब देने के लिए उन्होंने आलोचना को आपद् धर्म के रूप में चुना। इस बात में आंशिक सच्चाई हो सकती है किन्तु उन्हें ध्यान से पढे़ं तो यह बात समझ में आ जाती है कि उनका लगभग समूचा लेखन ही बहस मुबाहिसे से बना है। यह बहस विरोधियों से ही नहीं होती, विरोधियों से भी ज्यादा स्वयं से होती है। इसलिए आलोचना उनके लेखन का आपदधर्म नहीं स्वधर्म है। उनका रचनात्मक लेखन भी एक प्रकार की आलोचना है, सभ्यता-समीक्षा है। कविता में थीसिस लिखने की उनकी प्रतिश्रुति का मतलब हैः कविता में सभ्यता-समीक्षा लिखना।

इसलिए मेरा खयाल है कि मुक्तिबोध के आलोचनात्मक लेखन की चर्चा करते समय हमें सिर्फ उनके ‘आलोचनात्मक लेखन’ पर ध्यान नहीं देना चाहिए क्योंकि उनके ‘आलोचनात्मक चिन्तन’ के कई मोती उनकी रचनाओं में डूबे हुए हैं। मैं उनके आलोचनात्मक चिन्तन के कुछ ऐसे ही पक्षों का यहाँ उल्लेख करना चाहूँगा। मैं जानता हूँ कि यह काम आसान नहीं है फिर भी कुछेक प्रसंग आपके समक्ष रखता हूँ।

अक्सर कहा जाता है कि रचना का मर्म तो रचनाकार ही जानता है। इसलिए यदि रचना का ‘असली’ अर्थ जानना है तो रचनाकार से पूछो। आलोचक तो बाहरी व्यक्ति है वह रचना के साथ न्याय नहीं कर सकता। यह बात भी सिद्ध हो चुकी है कि लेखक अपनी रचना (कहानी, कविता, उपन्यास, आलोचना…) का अन्तिम और अधिकारिक व्याख्याकार नहीं हो सकता। क्योंकि, रचना केवल वही नहीं कहती जो लेखक कहलाना चाहता है, बहुत कुछ ऐसा भी कहती है जो वह नहीं कहलाना चाहता। यही नहीं, रचना का अर्थ पाठक और संदर्भ बदलने के साथ बदल जाता है। वस्तुतः रचना जन्म लेने के बाद रचनाकार से स्वतंत्र हो जाती है और सामाजिक जीवन का हिस्सा बन जाती है। सामाजिक जीवन को प्रभावित करती है और सामाजिक जीवन से प्रभावित होती है। कालजयी रचनाओं की जीवन-यात्रा लम्बी होती है। मामूली रचनाएं अपने रचयिता से विलग होने के बाद शीघ्र ही कालकवलित हो जाती हैं क्योंकि उनमें बदलते हुए संदर्भ में पुनर्नवता की संभावना नहीं होती। जिसे अपनी सामर्थ्य पर भरोसा नहीं होता वह रचना को सीने से चिपकाए ‘असली’ अर्थ न समझ पाने के लिए पाठकों-आलोचकों को कोसता रहता है। आलोचना को प्राध्यापकीय कहकर गरियाने वाले ज्यादातर स्वनामधन्य रचनाकार इसी कोटि में आते हैं। मुक्तिबोध को अपनी रचनात्मक सामर्थ्य पर भरोसा था। इसीलिए वे मानते हैं कि कविता पूर्ण हो जाने के बाद कवि से स्वतंत्र जीवन जीने लगती हैः

नहीं होती, कहीं भी ख़त्म कविता नही होती

कि वह आवेग त्वरित काल यात्री है।

व मैं उसका नहीं कर्ता,

पिता-धाता

कि वह कभी दुहिता नहीं होती,

परम स्वाधीन है वह विश्वशास्त्री है।

गहन-गम्भीर छाया आगमिष्यत् की

लिए, वह जनचरित्री है।

नये अनुभव व संवेदन

नये अध्याय-प्रकरण जुड़

तुम्हारे कारणों से जगमगाती है

व मेरे कारणों से सकुच जाती है।

कहने की आवश्यकता नहीं कि कविता (रचना) रचयिता से मुक्त होकर अपना भावी जीवन प्रारम्भ करती है और फिर उसमें नये अनुभव एवं संवेदन जुड़ते चले जाते हैं। जिस रचना में ऐसी सामर्थ्य होती है वही कालजयी कहलाती है; बाकी रचनाएं रचनाकार के साथ ही कालकवलित हो जाती है।

रचना जन्म के बाद रचनाकार से स्वाधीन हो जाती है, यह बात समझाने के लिए शायद ज़्यादा मशक्कत की जरूरत नही; लेकिन इसी से जुड़ा हुआ सवाल है, रचनाकार और रचना के सम्बन्ध का। यह सवाल ज़्यादा उलझा हुआ है और इसका संतोषजनक समाधान खोज निकालना आसान नहीं। उल्लेखनीय है कि मुक्तिबोध के समय में भी इस सवाल पर बहस हुई थी। अज्ञेय ने इलियट के वज़न पर भोक्तामन और सृष्टा-मन तथा जीवनाभूति और सौंदर्यानुभूति में विभेद किया था। मुक्तिबोध ने इस अवधारणा का ज़ोरदार खण्डन करते हुए भोक्ता-मन एवं स्रष्टा-मन के ऐक्य पर ज़ोर दिया था। ऐक्य का विशद विश्लेषण करते हुए उन्होंने सौन्दर्यानुभूति को जीवनानुभूति से गुणात्मक रूप से भिन्न माना। इस बात का निहितार्थ यह है कि रचना को जीवन का ‘बाइप्रोडक्ट’ नहीं कहा जा सकता। रचना और रचनाकार के बीच कोई प्रत्यक्ष, पारदर्शी और निष्क्रिय सम्बन्ध नहीं होता। रचना प्रक्रिया के मुक्तिबोध द्वारा किये गये विश्लेषण से इस बात की पुष्टि होती है। वस्तुतः रचना एक सचेत कर्म है और रचना के दौरान रचनाकार अपनी सोच के मुताबिक अनुभव को काटने-छाँटने एवं सम्पादित करने के लिए ‘स्वतंत्र’ होता है। किंतु यह स्वतंत्रता भी सापेक्षिक ही है। क्योंकि रचनाकार की स्वतंत्रता को सामाजिक स्थिति, अवचेतन, जड़ीभूत सौंदर्याभिरूचि जैसे कई कारण जाने-अनजाने प्रभावित करते हैं। फिलहाल इस तफ़सील में न जाकर सिर्फ़ भाषा चरित्र के बारे में बात करते हैं। औसत समझ के विपरीत भाषा आइने की तरह कोई पारदर्शी और निष्क्रिय माध्यम नहीं है जिसके आर-पार देखा जा सके। भाषा एक स्वायत्त संकेतप्रणाली है, जिसके अपने नियम-कायदे हैं। जीवन-जगत् का बोध भाषा में ही संभव होता है। इसका मतलब यह है कि भाषा सिर्फ़ साधन नही है, उसके बिना बाहर जीवन-जगत् का बोध संभव ही नही। जीवन-जगत् का बोध भाषा के रास्ते से गुज़रता है। और चूँकि भाषा दर्पण की तरह कोई निष्क्रिय पारदर्शी माध्यम नही है, भाषा अपना खेल दिखाती है। फ़ैज के शब्दों में कहें तो ‘बात बदल-बदल जाती है।’ कहना चाहते हैं कुछ और कह जाते हैं कुछ और।

भाषा का यह खेल जीवन-जगत् के बोध के समय ही नहीं, रचना-प्रक्रिया के दौरान भी चलता रहता है। यही नहीं जब रचना पूर्ण हो जाने पर पाठक से रूबरू होती है तब भी भाषा का यह खेल जारी रहता है। यही कारण है कि अलग-अलग देशकाल के पाठक/आलोचक एक ही रचना का अर्थ अलग-अलग ढंग से करते हैं। यदि ऊपर कही गयी बातें सही हैं तो फिर यह मानना पड़ेगा कि रचना रचनाकार के जीवन की प्रत्यक्ष और पारदर्शी अभिव्यक्ति नहीं है। मुक्तिबोध के शब्दों में सौन्दर्यानुभूति जीवनानुभूमति से गुणात्मक रूप से भिन्न चीज है; पूर्णतया पृथक न सही, किन्तु प्रतिरूप भी नहीं। सौन्दर्यानुभूति को जीवनानुभूति से गुणात्मक रूप से भिन्न बताने के बाद मुक्तिबोध को लगा कि कई दफा रचनाकार सिर्फ स्वाँग भरता है, वास्तव में वैसी अनुभूति उसके जीवन में होती नहीं। जैसे अभिनेता पात्रों का अभिनय करता है वैसे वह सिर्फ अभिनय कर रहा होता है। नयी कविता में ऐसा स्वाँग खूब दिखायी पड़ता है। मुक्तिबोध ने लिखा है कि महादेवी वर्मा की कविताओं में दुख की भरमार है लेकिन महादेवी ने स्वयं स्वीकार किया है कि उनका जीवन वैसा दुखमय नहीं था जैसा कि उनकी कविताएं पढ़ने पर प्रतीत होता है।

उल्लेखनीय है कि रोलां बार्थ भी लेखन को स्वांग ही मानते हैं, भले ही इस शब्द का इस्तेमाल न करते हों। उन्होंने ब्रेख्त के नाट्य-सिद्धान्त का उल्लेख करते हुए लिखा है कि जैसे ब्रेख्त के यहाँ अभिनेता, जिस पात्र का अभिनय करता है, उससे तादात्म्य स्थापित नहीं करता, वैसे ही ब्रेख्तियन अंदाज में अपने बारे में बोलता हूँ। यहाँ बोलने (लिखने वाले) ‘मैं’ और वास्तविक ‘मैं’ में दूरी बनी रहती है; ‘उसे जीने के बजाय दिखाता हूँ।’ लेखन इमेज सिस्टम का प्रदर्शन है। अपने काल्पनिक आत्म से दूरी बनाए रखते हुए और साथ ही अन्य के परिपे्रक्ष्य से उसका निरीक्षण करते हुए उसकी विभिन्न भूमिकाओं का डिमान्स्ट्रेशन या रिहर्सल है। जरूरत के मुताबिक लगाया गया मुखौटा है। जाहिर है कि मुक्तिबोध लेखन को स्वांग मानने के हिमायती नहीं, बल्कि लेखन और जीवन में एकता के पक्षधर थे। फिर भी वे किसी स्थायी, स्वायत्त, आत्मपूर्ण और सुसमन्वित व्यक्ति-अस्मिता की अवधारणा को भी स्वीकार नहीं करते। जबकि अज्ञेय ‘नदी का द्वीप’ में इसके ठीक विपरीत, एक स्वायत्त, आत्मपूर्ण एवं स्थायी व्यक्ति-अस्मिता की अवधारणा पेश करते हैं। उत्तर आधुनिक सिद्धान्तकार व्यक्ति-अस्मिता की ऐसी अवधारणा को तो मिथ या फिक्शन मानते ही हैं, फ्रेडरिक जेम्सन जैसा वामपंथी विचारक भी उनकी इस बात के लिए तारीफ़ करता है कि उन्होंने आत्म-पूर्ण समन्वित आत्म की अवधारणा को छिन्न-भिन्न कर दिया। मुक्तिबोध के यहाँ आत्म की अस्मिता स्वयं-सम्पूर्ण और स्थिर नहीं है, बल्कि बाहरी दबाव और भीतरी (परस्पर विरोधी) आग्रहों से लगातार संशय-ग्रस्त, अनिर्णीत, विरोधाभासी और परिवर्तनशील है। परम अभियक्ति या अरूण कमल की तलाश तो निरन्तर है, लेकिन झूठे समन्वय या शिलीभूत सामंजस्य के मर्म को भी वे बख़ूबी समझते हैं। मुक्तिबोध की कविता लगातार यह दिखाती है कि व्यक्ति की अस्मिता ‘नदी के द्वीप’ की तरह स्थिर नहीं होती। जैसे विचारधारा के भीतर से एक प्रच्छन्न विचारधारा झाँकती दिखाई पड़ती है, वैसे ही एक व्यक्ति के भीतर एक और व्यक्ति की मौजूदगी का एहसास होता रहता है। इन दोनों के बीच अनवरत संवाद चलता रहता है। यह संवाद अस्मिता के किसी स्वायत्त-आत्मपूर्ण (नदी का द्वीप जैसी) अवधारणा को नकारता है। मुक्तिबोध के यहाँ अस्मिता की अवधारणा जिस रूप में आती है, कई मायनों में वह जूलिया क्रिस्तेवा की ‘threshold’ की अवधारणा से मिलती जुलती है। उल्लेखनीय है कि क्रिस्तेवा के यहाँ चेतन और अवचेतन के बीच चौहद्दी लगातार बदलती रहती है, क्योंकि इनके बीच निरन्तर संवाद चलता रहता है। अस्मिता का कोई भी रूप अन्तिम और पूर्ण नहीं होता। पूर्णता स्वप्न में तो संभव है लेकिन यथार्थ में नहीं, मुक्तिबोध यह समझते थे।

यदि अस्मिता का कोई भी रूप पूर्ण और अन्तिम नहीं है तो उसमें सकारात्मक और नकारात्मक परिवर्तन भी संभव हैं। यही कारण है कि कल तक आग उगलने वाले मृत ज्वालामुखी बन जाते हैं और रावण के घर पानी भरने लगते हैं। कोई ज़रूरी नहीं कि रचनाकार अपने इस रूप को रचना में प्रस्तुत करे ही। अनुभव, संवेदना और कल्पना का सहारा लेकर वह स्वांग भी भर सकता है। मार्सेल प्रूस्त ने लिखा है कि पुस्तक में सामने आने वाला व्यक्तित्व और सामाजिक जीवन में दिखाई पड़ने वाला व्यक्तित्व अलग-अलग होते हैं। इलियट के कथन से हम वाकिफ़ ही हैं, उसे दोहराने की ज़रूरत नहीं। अब जबकि आत्मकथा को भी लेखक के जीवन की सीधी पुनर्प्रस्तुति मानने के बजाय लेखक के जीवन का सृजित गल्प माना जा रहा है, रचना को लेखक के जीवन का पर्याय मानने का कोई तुक नहीं। यह ठीक है कि कुछ रचनाकारों के जीवन और रचना में पर्याप्त समानता दिख सकती है, किंतु सर्वत्र ऐसा हो, यह ज़रूरी नहीं। लेखन एक विशिष्ट लीला कर्म हैं, रचनाकार के सम्पूर्ण व्यक्तिगत सामाजिक जीवन का लेखा-जोखा नहीं। लेखन और रचनाकार के जीवन में संगति की अपेक्षा एक आदर्श के रूप में ठीक है, लेकिन अक्सर ऐसी संगति होती नहीं है। आलोक धन्वा या वी.एस. नयपाल अपवाद नहीं है; बात सिर्फ़ यह है कि उनके जीवन की कुछ बातें सामने आ गयीं, और हम छाती पीटने लगे। चोरी तो ज़्यादातर लोग करते हैं लेकिन चोर वही कहलाता है जो चोरी करते पकड़ा जाय और जिसे सज़ा मिले। इसलिए बेहतर यही होगा कि रचनाकार की रचना और जीवन दोनों को देखा जाय। लेकिन मुसीबत यह है कि रचनाकार का जीवन, विशेष रूप से व्यक्तिगत जीवन, पाठक की पहुँच से बाहर है। वह तो उतना ही देख सकता है जितना दिखाने के लिए लेखक तैयार हो। वैसे इस मामले में वी.एस.नयपाल की दाद देनी पड़ेगी। उन्होंने माना है कि लेखक के जीवन की पड़ताल करने की चाहत बिल्कुल वैध है। उन्होंने कहा है कि लेखक के जीवन का व्योरा अन्ततः लेखक की पुस्तक से बेहतर साहित्यिक कृति साबित हो सकता और अपने समय के सांस्कृतिक ऐतिहासिक पक्ष को ज्यादा गहराई से आलोकित कर सकता है। इसलिए यदि मुक्तिबोध दिमागी गुहांधकार में झाँकने की कोशिश करते थे और बाह्य संघर्ष के साथ-साथ आत्म संघर्ष पर इतना जोर देते थे, तो क्या ग़लत करते थे, अब तक के अनुभव ने हमें यही सिखाया है कि मानव-मस्तिष्क बहुत जटिल है और तर्क-विवेक को अक्सर चकमा दे जाता है। वह सामाजिक-आर्थिक स्थितियों से निरपेक्ष नही है, लेकिन उसे सामाजिक-आर्थिक स्थितियों में निःशेष (Reduce) भी नहीं किया जा सकता।

देखिये बात कहाँ से कहाँ पहुँच गई। क्या लिखने चला था और क्या लिख गया! अभी तो लगता है कि सिर्फ़ भूमिका ही बनी है। जो बातें लिखना चाहता था वे तो रह ही गईं।

राजकुमार जी

प्रो॰राजकुमार

शोर-शराबे से दूर अध्ययन-अध्यापन में मग्न रहने  वाले युवा-तुर्क हिन्दी आलोचक। भक्ति साहित्य, हिन्दी नवजागरण, आधुनिकता, आधुनिक साहित्य, प्रेमचंद, हिन्दी कहानी इत्यादि पर लगातार लेखन। किताबों में जैसी रुचि इनकी  है,  वह अन्यत्र दुर्लभ ही हो गई है। फिलहाल, बी॰एच॰यू॰ के हिन्दी विभाग में प्राध्यापक।इनसे dr.kumar.raj@gmail.com पर संपर्क संभव।

 

Padmaavat- Bhansali’s version of Veera Rasa: Tatiana Szurlej

Based on the Malik Muhammad Jayasi’s epic poem, the new film of Sanjay Leela Bhansali, Padmaavat is a glorious tale of courageous people, for whom the honour is more important than death. In contrast to The Cloud Door (1994, Mani Kaul) – the previous adaptation of the poem, which concentrated mainly on the erotic aspect of love between a beautiful princess and a king from the far away kingdom, and as such which shows the beauty of the shringara, the Bhansali’s version of the story is a pure example of the classical veera rasa. #Author

When the medium becomes controversy

By  Tatiana Szurlej

Even though she is not a Rajput princess, Padmavati seems to understand the Rajput’s ethos more than the first wife of Ratan Singh, who doesn’t seem to be an important part of his life. It is then the second queen, who prepares her husband for the battle, who saves king’s life and who finally decides to die in the fire in sake of not only her honour, but the honour of her husband and the whole clan. The viewer may wonder why the brave king Ratan Singh did not kill his enemy, when he had a chance, or why he remains extremely fair, even after realising that his opponent is an evil person, who will do everything to win. The answer is simple – because the hero of the epic story does not do anything which should become a flaw on his honour. The main problem with the Padmaavat controversy lays in the fact that some people try to see a historical account in it, instead of immersing themselves in a world of epic tales in which queens are extremely beautiful and noble, kings brave and honourable, and enemies ready to start a war to win a woman, whom they had never seen. It is not a coincidence that filmmakers refer to the Ramayana and Mahabharata in their film. If we don’t question the fact that Hanuman, who was able to burn the whole Lanka left Sita there instead of saving her for Rama, or that Pandavas had to kill Kauravas in the fratricidal war, why do we treat the story presented by Bhansali as a historical account? Of course, it is always hard not to compare the story, whose heroes are the historical figures with real events, and not to accuse the filmmaker of inaccuracies, but the very way in which the story of Queen Padmavati is presented on the screen should be enough for everybody to believe that the director was never interested in historical facts. It could be perhaps easier for the audience to accept the film if Bhansali decides to bring some unusual elements of the poem of Jayasi to his work, which, like the talking parrot would make the film less “real”, and easier to accept without comparing it to historical texts.

Like in many stories of a similar genre, the division between the good and evil is quite simple in the film. The spectators follow the presented events from the Rajput’s point of view, Alauddin Khilji is then no more than a barbaric villain for them. This fact is announced already almost at the beginning of the film, in the scene of the Khilji’s dance during his wedding, in which the hero shows a palm with a blood mark on it as a clear sign of his wickedness. Interestingly, a similar gesture appears in a scene of a ghoomar dance performed by the Queen Padmavati, whose palm adorned with henna looks exactly like the one of Sultan. From this small but evident announcement the viewer knows whose struggle will be presented on the screen. Even if Sultan meets the King on the battlefield, the real war takes place between him and Padmavati, and they are the protagonists of the film.

The savagery of the Sultan is visible in almost every aspect of his life, from his debauchery, through his cruelty till very clothes he wears, food he chooses and the way he eats. Comparing to him, Ratan Singh appears as a righteous king and a well-mannered man. Alauddin Khilji is dangerous and unpredictable, Ratan Singh noble. Since it is always difficult to play a flawless person, it is then no surprise in the fact that the most interesting hero, and the best performance of the film is the creation of Alauddin Khilji. However, even if his task was more difficult, Shahid Kapoor could still make more effort and bring some life to his Ratan Singh, whose greatness should appear in something more than just speeches about the Rajput’s honour. In fact, it is hard to believe in love between Padmavati and Ratan Singh, not only because there is no much chemistry between Deepika Padukone and Shahid Kapoor, but first of all because we don’t know much about the King’s personality, and he remains just a paper character. On the contrary, in spite of his cruelty, and madness, there is still a strange charm in the character of Alauddin Khilji, who except of being the most evil character of the film is at the same time the most funny one, however never becoming ridiculous. Shahid Kapoor tried probably not to copy the creation of Ranveer Singh, but he seems completely lost, without any idea how to build his character on the screen to make him memorable.

Bhansali explores artistically the fact that most of viewers of his film are familiar with the presented story, and know the end of the tale. This approach is visible especially in an intensive presence of fire on the screen, attracting attention of the audience especially in those scenes, which take place in Chittor, but not only there. Apart of the final sequence of the Queen’s jauhar, there are few other scenes in which the fire is not a merely more or less visible background, but a significant element, being a kind of dialogue with the audience, and it’s knowledge of the end of the story. One of such scenes is the one in which Alauddin Khilji burns historical notes which don’t mention his name. That moment seems to be just an another act of madness of the Sultan, but confronted with the final death of Queen Padmavati shows that apart of the power of destroy, the fire can also create a legend.

The structure of the film consists many opposites, which show not only the difference between two fighting worlds representing good and evil, but which also interestingly reflect each other. Apart of the mentioned two scenes with dancing heroes, and the interpretation of the power of fire, the biggest contrast between two enemies is highlighted by the use of colour, with the main difference between the golden, sunny world of Rajputs with green, cold, dark kingdom of the Sultan. Bhansali develops here his earlier idea of almost monochromatic sets, which perfectly reflect the colour of the desert, and subsequent fire, but which are also a perfect background for a very significant red elements, which symbolise passion, and courage. The red colour is similarly contrasted with the cold greenness of the Sultan’s environment, but this time it becomes darker, representing destroy, and death. Similarly with red, the pink colour of the powder which Padmavati applies on the feet of her husband during the Holi festival symbolise love and devotion, while the pink colour of the lotus in hands of Allauddin reflects mainly his defeat. However, one of the most interesting parallel presented in the film is the similarity between Padmavati and Malik Kafur. The Sultan’s intensive relation with Malik Kafur, and his devotion to his master is similar to the relation of Padmavati and Ratan Singh, who, as already mentioned seems to forget about his first wife after second marriage. Similarly, the Sultan doesn’t seem to think much about his wife, not only because of his obsession about Padmavati, but first of all because of Malik Kafur, who is more than a slave to him. The passion of Malik Kafur is visible especially in the love song he sings for his master, in which Alauddin Khilji is clearly shown as an object of the sexual desire. Moreover, Malik Kafur is so sure about his special status, that he is not jealous about Padmavati. Knowing that winning the woman won’t change the feeling of Sultan towards him, he helps his master to win the battle with the King.

The most intriguing element of the film is a very fresh way in which the filmmakers show Padmavati on the screen. Unlike in most Indian films, in Padmaavat it is not the heroine, whose sensual dance brings excitement to the audience. Apart from the very calm and a rather static ghoomar dance, the Queen does not dance, nor does any other woman in the film. On the contrary, the character, who brings the biggest excitement by the physical beauty of his dancing body is Alauddin Khilji, who appears not only in a very suggestive dance in the mentioned song …, but also in a demonic performance in …. song. The wild masculine dance of warriors in the … song is similar to the one of Bajirao Mastani, but this time the performance is not a happy dance of glory, but the scary dance of upcoming destroy, becoming almost a new version of the cosmic tandava dance.

In all that innovative and bold elements presented by Bhansali in his movie the most surprising is the fact, that it is not the homoeroticism (which usually is a problematic theme in Indian cinema), not the new kind of the item object, not even some historical inaccuracies which are the most controversial ones, but the honour of the Queen, which according to the protestants was abused. The clue scene which can explain this objection is the one, which causes all the tragic events, and the final death of the King and Queen. The King’s guru … is caught while he peeps to the King and his wife. The crime is so great that he is banished from the kingdom, because watching the private life of the Queen is a huge crime and sin, and nobody should dare to do that. Interestingly, in a reflected scene, Malik Kafur caught on a similar act is not punished by the Sultan, which shows not only the fact that Sultan doesn’t think about the honour of women, but which also shows his status. The audience receives then a clear message that watching Queen Padmavati is a sinful act. Still, what does the audience do while watching the film? Exactly the same – we all see scenes we should not participate in, as the cinema itself is nothing more than a pleasure of watching somebody’s secrets. The protestants are then just victims of the medium, which power they discovered. We may then say that Padmaavat is a great victory of the cinema, which proved that even today, with all media which surround us it can have such an impact on the audience, that it starts to feel guilty after watching the forbidden world of parda on the screen. The filmmakers carefully inform the audience that they don’t intend to hurt anybody’s feelings, but they can’t do anything with the basic role of the cinema which is to give a pleasure of the forbidden world. However it is worth also to mention all disclaimers which appear before the film. It seems that even after more than a hundred years of the cinema, the viewers are still so naive that it is necessary to remind them that they don’t watch the true. We find then an information here that the film does not encourage Sati. Well, that should be obvious for every sensitive person, but if it’s not, then maybe the audience should be informed as well that the film does not encourage asking for the enemy’s head, starting a war because of a woman or a bigamy. As already explained on the beginning, the film is a heroic tale about the glorious past in which there lived kings who had more than one wife, beheading enemy was a natural behaviour, and jauhar was an act of courage. And all that is presented with a great care and sensibility being, like most films of Sanjay Leela Bhansali a beautiful and breath-taking spectacle.

 

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Tatiana Szurlej

Tatiana Szurlej is a famous Indologist from Poland. She is a film critic and writes for many popular Indian magazines and blogs. She is a PhD from Poland’s Jagiellonian University on the topic The courtesan figure in Indian popular cinema: Tradition, Stereotype, Manipulation. Currently, she teaches at the European Study Institute, Manipal University, Karnataka.

मुक्तिबोध के बहाने ‘परंपरा के आहत नैरन्तर्य’ पर एक बहस: प्रो.राजकुमार

मुक्तिबोध के बहाने प्रो. राजकुमार एक बहस की धारावाहिकता में गहरे विश्वास के साथ उतरे हैं. इस सीरिज का पहला लेख आप पढ़ चुके हैं.

मुख्य शीर्षक में ‘परंपरा का आहत नैरन्तर्य’ पद हिंदी के विद्वान आलोचक सुरेन्द्र चौधरी के यहां से लिया गया है. अभी तक सुरेन्द्र चौधरी हिंदी के अंतिम आलोचक रहे हैं जिन्होंने परम्परा की निरंतरता में उत्पन्न हुए व्यवधान को व्यापक फलक पर विवेचित करने के प्रयास किए हैं. और, यह भी कम आश्चर्य की बात नहीं कि टूट की दोनों शिराओं के मध्य मुक्तिबोध को स्थित करने के प्रयास किए हैं. सुरेन्द्र चौधरी के बाद प्रो. राजकुमार के यहां वही चिंता फिर से सामने आती है. राजकुमार जी हिंदी के एकाध समकालीन आलोचकों में हैं जिनके यहां विमर्श की एक नितांत सुदृढ़ और स्पष्ट भाषा है. प्रो. राजकुमार साहित्य के ककहरा सिखाने वाले संदर्भों को छोड़ते चलते हैं और उथले उद्धरणों, भूमिकाओं से लदी-फदी फूहड़ आलोचना के बरअक्स सभ्यता, परंपरा, संस्कृति के व्यापक वितान की आलोचना-धरा पर नज़र आते हैं. स्याही इसी विश्वास से पन्ने पर झरती है कि लम्बी बहस की तैयारी है. यह विश्वास बहुत दिन बाद समकालीन हिंदी आलोचना में किसी के पास दिखा है. यह विश्वास रामविलास शर्मा के बाद सिर्फ सुरेन्द्र चौधरी के पास ही अभी तक सुरक्षित था. सुरेन्द्र चौधरी के दो उद्धरणों के साथ, प्रो. राजकुमार की इस बहस से खुद को साझा कीजिये, और उम्मीद है कि यह बहस यहां नहीं, तो कहीं भी लम्बी चलनी चाहिए. #तिरछीस्पेलिंग

…रचना और वातावरण की संगति ही केवल आहत होती हुई नहीं मालूम पड़ती, रचनात्मक परिस्थिति का नैरन्तर्य भी टूटता हुआ मालूम पड़ता है. …इस आहत नैरन्तर्य को, ‘discontinues को पहचाना मुक्तिबोध ने. अपनी रचनात्मक संवेदना में इसे मूर्त करते हुए उन्होंने ‘विपात्र’ और ‘क्लाड इथर्ली’ जैसी रचनायें लिखीं. #सुरेन्द्र चौधरी, 1971

पश्चिमी साहित्य में रूपक का उपयोग ऐतिहासिक समय का नाश करने और उसे ‘समय के रूपक’ से बदलने के लिए किया गया है. इसके विपरीत मुक्तिबोध ने रूपक की दूर-दृष्टि का, अन्यापदेश की दृष्टि का उपयोग  ऐतिहासिक  समय की जटिलता को मूर्त करने के लिए किया. # सुरेन्द्र चौधरी, 1980

Muktibodh By Haripal Tyagi

Muktibodh By Haripal Tyagi

जिसके आगे राह नहीं

By प्रो.राजकुमार 

जड़ीभूत सौन्दर्याभिरुचि की बात मुझे समकालीन कविता ही नहीं, समकालीन साहित्य और समकालीन सामाजिक विमर्शों पर नये सिरे से सोचने और विचारने के लिए प्रेरित करती हैं। मुझे जहाँ तक ध्यान आता है, मुक्तिबोध ने जड़ीभूत सौन्दर्याभिरुचि की बात की है। सभी जानते हैं कि मुक्तिबोध का संघर्ष, जिसको वे प्रायः आत्मसंघर्ष ही कहना पसन्द करते थे, दो तरफा था। जिसको हम यथार्थवादी-प्रगतिशील-मार्क्सवादी धारा कहते हैं, उससे मुक्तिबोध असंतुष्ट थे। उन्होंने अपने लेखन में बार-बार इसका उल्लेख किया है लेकिन साथ ही साथ, मुक्तिबोध का संघर्ष उस दूसरी परम्परा से भी था जिसके वाहक के रूप में हम लोग हिन्दी में, और किसी का नाम न भी लें, तो अज्ञेय का नाम लेते हैं। संक्षेप में, मुक्तिबोध आधुनिकतावादी साहित्यिक धारा या चिन्तन-परम्परा से भी संतुष्ट नहीं थे। सोचने वाली बात ये है, कि अगर मुक्तिबोध यथार्थवादी धारा और आधुनिकतावादी धारा दोनों से असंतुष्ट थे तो आखिर वो कर क्या रहे थे। मैं यह बात जोर देकर कहना चाहता हूँ कि मुक्तिबोध ने अपने वैचारिक लेखन में भले ही स्पष्ट रूप से यह बात न लिखी हो, लेकिन अपने रचनात्मक लेखन में, मेरा संकेत उनकी कहानियों और कविताओं की ओर है, वे एक तीसरी धारा निकालने की कोशिश करते हैं। इसे सुविधा की दृष्टि से मैं भारतीय परम्परा या सभ्यता की धारा कहना पसंद करूंगा।

यह दिलचस्प है कि भारतीयता की बात, भारतीय परम्परा की बात उस जमाने में वे लोग करते थे जिनको हम आधुनिकतावादी-प्रयोगवादी या नयी कवितावादी आलोचक/रचनाकार कहते हैं। ऐसे रचनाकारों में अज्ञेय का नाम तो आता ही है, बाद में निर्मल वर्मा का नाम भी जुड़ जाता है। आप याद करें, उस दौर में भारत की बात करना, भारतीय सभ्यता की बात करना, भारतीय परम्परा की बात करना एक अपराध जैसा था। बहुत आसानी से ऐसी बातें करने वाले को अतीतजीवी या साम्प्रदायिक घोषित कर दिया जाता था। उस दौर में मुक्तिबोध ने अपनी रचनाओं में भारतीय परम्परा को नये सिरे से पुर्ननवता देने की कोशिश की। इसीलिए मुझे लगता है कि मुक्तिबोध की चिन्ता यह थी कि साहित्य और कला की भारतीय परम्परा को आगे बढ़ाया जाय और उसमें हमारे औपनिवेशिक इतिहास की वजह से जो व्यवधान आया है, जो व्यतिक्रम आया है, जो टूटन पैदा हुई है, उसकी यथासंभव भरपाई की जाय। उस दौर में ऐसी कोशिश सम्भवतः सिर्फ मुक्तिबोध कर रहे थे। ये अजीब विडम्बना है कि भारतीयता की बात अज्ञेय ने बहुत की है, उसके बाद निर्मल वर्मा ने भी की है, लेकिन रचनात्मक स्तर पर न तो इनकी कहानियों में और न ही उपन्यासों में, भारतीय साहित्य-परम्परा से जुड़ने का गम्भीर प्रयास दिखाई पड़ता है। वैचारिक स्तर पर जरूर ये उसकी चर्चा करते हैं। वैसे ये भी अपने आप में छोटी बात नहीं है। लेकिन रचनात्मक स्तर पर अगर देखें तो सम्भवतःमुक्तिबोध उस दौर में अकेले हैं जो इन दोनों छोरों से जूझते हुए साहित्य और कला की भारतीय परम्परा से अपना सम्बन्ध जोड़ते हैं, और उसी के अनुरूप अपनी रचनात्मकता का विकास करते हैं। अस्सी के दशक में लैटिन अमेरिकन लेखकों के प्रभाव-विस्तार के साथ, और फिर ग्रैबियल गार्सिया मार्केज के उपन्यास को नोबल प्राइज मिलने के बाद इस प्रकार की रचनात्मकता की विस्तार से चर्चा होने लगी और नाम दिया गया कि ये जादुई यथार्थवाद है। मैं मुक्तिबोध के लेखन के संदर्भ में उस जादुई यथार्थवाद को लागू करने का कोई प्रस्ताव नहीं कर रहा हँू। लेकिन ये जरूर कहना चाहता हँू कि मुक्तिबोध ने, पूरे तौर से न सही, फिर भी साहित्य और कला की एक भारतीय दृष्टि विकसित करने का उस दौर में प्रयास किया था, जब दुनिया में जादुई यथार्थवाद जैसी कोई चीज नहीं थी।

आज के संदर्भ में जब हम जड़ रुचियों के दायरे और आज के साहित्य की बात करते हैं तो मुझे हैरत होती है कि बात सिर्फ जड़ अभिरुचियों तक क्यों सीमित रह जाती है। कविताओं का जो समकालीन स्वरूप है, उसके बारे में विचार करने के लिए हम क्यों तैयार नहीं होते। क्या आप ये मान कर चल रहे हैं कि रूचियाँ विकसित हो जायेंगी तो कविता का आयतन अपने आप विस्तृत हो जाएगा। कविता या साहित्य क्या आज की रुचियों का बाई प्रोडक्ट है? रुचियाँ ही सबकुछ हैं और कविता तो उसको भरने वाला झोला है! अगर साहित्य और कलाओं कि यही समझ है, तो मुझे लगता है कि यह गम्भीर चिन्ता का विषय है। साहित्य और कला के रूप ऐसे नहीं चलते हैं और न विकसित होते हैं। दुनिया में कहीं भी आप देख लीजिए साहित्य और कलाओं का रूप झोले की तरह नहीं है। साहित्य और कलाओं के रूप अलग-अलग सभ्यताएँ लम्बे समय में अर्जित, विकसित और समृद्ध करती हैं। एक तरह से साहित्य और कला के रूप शार्टहैण्ड या संस्कृतियों के मेमोरी बैंक के रूप में काम करते हैं। और इसीलिए न तो उनको इतनी आसानी से छोड़ा जा सकता है और न किसी दूसरी सभ्यता के साहित्य और कला-रूप को टेक्नोलाॅजी की तरह आयात किया जा सकता है। साहित्य और कलाओं का आदान-प्रदान टेक्नोलाॅजी और अर्थव्यवस्थाओं के आदान-प्रदान जैसा नहीं है। क्या हम इसके बारे में विचार करने के लिए तैयार हैं?

हमारे यहाँ साहित्य और कला के रूपों का जिस प्रकार से विकास हुआ, उस पर भी नये सिरे से विचार करने की जरूरत है। क्योंकि साहित्य और कलाएँ और इनके विकसित होने वाले रूप सिर्फ रूप नहीं होते हैं, वो कहीं न कहीं बहुत गहरे स्तर पर अपनी सभ्यता की बहुत बुनियादी स्मृतियों को भी संजोते और सरंक्षित करते हैं। इसी वजह से जब हम इन रूपों में रचना करते हैं तो बृहत्तर समाज के साथ तादात्म्य और सम्बन्ध आसानी से स्थापित हो जाता है। क्या हम यह मानना चाहेंगे कि आज के दौर में साहित्य की बहुत सारी विधाएँ और विशेष रूप से कविता, एक गहरे संकट के दौर से गुजर रही हैं। क्या ये सच नही है कि हिन्दी जगत से एक ईंट उठाते ही चार-पाँच उदीयमान कवि बिलबिलाते हुए निकल आतेे हैं! कवियों की भरमार है और आप ये न सोचें कि मैं उनके महत्व को नहीं समझ रहा। मैं इन कवियों के महत्व को स्वीकार करने वालों में सबसे आगे हूँ लेकिन मेरा प्रश्न ये है कि जिस रूप में आज कविता लिखी जा रही है, उसका इतिहास-भूगोल क्या है? वो कितने लोगों तक पहुँचती है? अगर मैं आपको चिढ़ाने के अंदाज में कहूँ  कि हिन्दी कविता के पाठक कम और कवि ज्यादा हैं, हो सकता है, आप आपत्ति करें। लेकिन शायद इसमें सच्चाई है। हिन्दी कविता की किताबें कितनी बिकती हैं? इस पर भी विचार करना चाहिये। हिन्दी के कितने प्रकाशक हिन्दी कविता की पुस्तकें छापने के लिए तैयार हैं और अगर नहीं तैयार हैं, तो क्या कारण हैं। वैसे तो ये बात सारे अनुशासनों पर लागू होती है, लेकिन हमारा सम्बन्ध मुख्य रूप से साहित्य से है, कविता से है; इसलिए हम इसी की चर्चा करेंगे। खासतौर से 19वींशताब्दी  के  बाद,  बीसवीं  शताब्दी  और इक्कीसवीं  शताब्दी  में  हिन्दी  कविता  का  जिसरूप में विकास हुआ, क्या उस पर हम नये सिरे से विचार करना चाहते हैं? या आजभी हम इतने आत्ममुग्ध हैं कि जैसे सब कुछ ठीक-ठाक है, कोई समस्या नहीं है, औरजो  समस्या  की  बात  करता  है,  करता रहे,  उसकी  बात  पर  ध्यान  नहीं  देना  चाहिए।आप याद कीजिए कि रामचन्द्र शुक्ल ने ठाकुर जगमोहन सिंह के उपन्यास के सम्बन्धमें लिखा था कि ये अंग्रेजी ढंग का नाॅवेल नहीं है। मुझे ये चीज बड़ी महत्वपूर्ण लगतीहै  और  इस  पर  मैं लम्बी बहस के  लिए तैयार  हूँ कवियों  से  या  किसी  से  भी।

उन्नीसवीं शताब्दी के अन्तिम दशकों के उपरान्त, भारतेन्दु के बाद, हिन्दी में जितनी भी साहित्यिक विधाएँ हैं, उनका विकास अंग्रेजी ढंग पर ही हुआ है। ये बात सिर्फ उपन्यास पर लागू होती हो, ऐसा नहीं है। कविता से लेकर कहानी, निबन्ध सभी पर ये बात लागू होती है। ये अकारण नहीं है। उसका एक अपना संदर्भ है। आप जानते हैं कि आधुनिक हिन्दी साहित्य के रचयिता, श्रोता और पाठक ज्यादातर ऐसे लोग रहे हैं, जिनका अंग्रेजों द्वारा स्थापित विश्वविद्यालयों से सम्बन्ध रहा है। या तो वे विश्वविद्यालय में रहे हैं या उन्होंने विश्वविद्यालय से शिक्षा प्राप्त की है। अंग्रेजों द्वारा स्थापित विश्वविद्यालयों में जिस ढंग के साहित्य को माॅडल के रूप में पेश किया गया और जिसके वजन पर हमारे यहाँ बाद में साहित्य लिखा गया, वो थोड़े बहुत हेर-फेर, बदलाव, के बावजूद अंग्रेजी ढंग का साहित्य है। रंगरोगन भले ही भारतीय लगे। क्या इक्कीसवीं शताब्दी के दूसरे दशक में अंग्रेजी ढंग के इस साहित्य पर हमें नये सिरे से विचार नहीं करना चाहिये? जनता के नाम पर या मजदूर-किसान के नाम पर कविता लिखी जा रही है। आप जानते हैं कि वह कहाँ पहुंच रही है और कौन उसको समझ रहा है, उसका दायरा कितना है! मैं इसलिए यह कह रहा हूँ  कि अगर उससे पहले के साहित्यिक परिदृश्य पर आप विचार करें, कविता के इतिहास पर विचार करें तो बड़ा अलग परिदृश्य दिखाई देगा। कविता का अपने यहाँ संगीत से बहुत गहरा सम्बन्ध रहा है। संगीत से ही नहीं, उसका सम्बन्ध नृत्य और नाट्य से भी रहा है। कविता केवल पढ़ने की चीज अपने यहाँ नहीं थी। किन्तु अगर ‘आधुनिक’ हिन्दी कविता पर ध्यान दें तो नई कविता तक आते-आते आप छन्द भी छोड़ देते हैं। अगर ये अंग्रेजी ढंग की कविता नहीं है, तो क्या है? फ्री वर्स अगर पश्चिम में लिखा गया है तो आप भी फ्री वर्स में लिख रहे हैं।

कविता का पूरा का पूरा जो फार्म है, वो अपनी काव्य परम्परा से कुछ भी नहीं लेता है, जो लेता है, वो बहुत ही नगण्य है, वो सिर्फ एक तरह की औपचारिकता है।. दूसरा तरीका ये हो सकता था कि आप भारतीय परम्परा में पहले से चले आ रहे साहित्य और कला रूपों को विकसित करते और बदले हुए सन्दर्भ में जरूरत के हिसाब से पश्चिमी साहित्यिक-सांस्कृतिक परम्परा से भी कुछ बातों को अपना लेते। हिन्दी की जातीय परम्परा को विकसित करने का संभवतः यह ज्यादा बेहतर और अपनी परम्परा से जुड़ा हुआ तरीका होता। अगर आप सही मायने में समकालीन कविता की समस्या पर विचार कर रहे हैं तो आपको इस पहलू पर भी ध्यान देना चाहिये। उसकी तमाम उल्लेखनीय उपलब्धियाँ हैं। मैं उन्हें जानता हूँ और नाम गिना सकता हूँ। कुछ अपवाद हैं, जिन्होंने इस ढाँचे को तोड़कर अलग ढंग से लिखने की कोशिश की है, लेकिन वो अपवाद ही हैं। मुख्य रूप से आज भी कविता का जो स्वरूप हमारे यहाँ चल रहा है, वो वही है जिसका निर्माण नई कविता के दौर में हुआ था। भंगिमाएँ अलग हो सकती है, कोई अपने को प्रगतिवादी कह सकता है, उसमें प्रगतिशीलता की छौंक लगा सकता है, कोई स्वयं को प्रयोगवादी कह सकता है। लेकिन नयी कविता के समय से चले आ रहे शिल्प-विधान से हटकर प्रयोग करने का साहस मुझे कहीं दिखाई नहीं पड़ता। एक बने बनाये फार्म में कविता लिख ली जाय, कविता बना ली जाय, यही अपने आप में लक्ष्य है। और जब तक यह ढंग चलता रहेगा, तब तक मुझे नहीं लगता कि उस दायरे का विस्तार होगा जिसे जड़ अभिरुचियों का दायरा कहा जा रहा है। चाहे जितना क्रान्तिकारी कन्टेन्ट आप उसमें भर दें, जब तक उसके फार्म में बदलाव नहीं लाते, तब तक उसका दायरा नहीं बढ़ने वाला। आप कहते रहिए अमुक के लिए है ये रचना, लेकिन आप जानते हैं कि वो उसको पढ़-समझ नहीं सकता।

मैं एक और बात कहना चाहता हूँ और उसे आधुनिकताप्रसूत दूसरे अनुशासनों पर भी आप लागू कर सकते हैं। 19वीं शताब्दी में भारतेन्दु के साथ हिन्दी साहित्य में एक बड़ा परिवर्तन होता है। वो परिवर्तन ये है कि साहित्य का एक सामाजिक उद्देश्य होना चाहिए। वही साहित्य श्रेष्ठ है जो उस समय के निर्धारित सामाजिक उद्देश्य के अनुरूप है उसका पूरक है, उसकी मदद करता है। छायावाद अपवाद है, किन्तु फिलहाल उस विस्तार में जाना जरूरी नहीं। आधुनिकता के आगमन के साथ साहित्य को किसी न किसी उद्देश्य के अधीन रखकर देखने की प्रवृत्ति चल पड़ी। साहित्य ‘इस’ उद्देश्य के अनुरूप है, तो ठीक है, लेकिन उससे विरुद्ध, या उससे अलग है तो फिर वह जड़ अभिरुचियों के अन्तर्गत आ जाएगा। जैसे एक समय तक प्रेम पर कविता लिखना उचित नहीं माना जाता था। जैसे एक जमाने में शतरंज खेलना सामन्ती व्यवस्था की पतनशीलता का पर्याय मान लिया गया था। क्या आज भी ऐसा सोच सकते हैं कि शतरंज खेलने में या सितार बजाने में यदि किसी को सुख मिलता है, भले ही दुनिया के तमाम छल-छद्म में शामिल न हो तो फिर वह पतनशील है, क्योंकि ‘समाज’ से विमुख है। क्या असामाजिक कहकर उसकी आलोचना होनी चाहिए! लेकिन आप जाानते हैं कि ये हुआ है। साहित्य को जब आप किसी विचार या विचारधारा के अधीन कर देते हैं, तब उसी के अनुरूप यह निर्धारित करने लगते हैं कि कौन सी रुचि जड़ है और कौन सी रुचि खुली हुई है, उन्मुक्त है। इसीलिए इस पर भी विचार करना चाहिए कि जड़ रुचियों से आशय क्या है? क्या आप साहित्य को किसी विचारधारा के प्रस्तोता के रूप में देखते हैं, जो विचारधारात्मक ज्ञान को एक तरह के कला माध्यम में डालकर पेश करता है? या आप उसकी कोई स्वतंत्र भूमिका भी देखते हैं, जहाँ वो अपने समय के ज्ञान को विचार के स्तर पर भी समृद्ध करता है, उसको चुनौती देता है या उसमें कुछ जोड़ता है। जड़ अभिरुचियों के सन्दर्भ में भी ये एक विचारणीय विषय है कि ये अभिरुचियाँ बनती कैसे हैं; कैसे तय होता है कि कौन सी अभिरुचियाँ जड़ हैं, कौन सी अभिरुचियाँ जड़ नहीं हैं। ध्यान रहे ंकि साहित्य, कला और ज्ञान की दुनिया ऐसी है, जहाँ सच और गलत का निर्धारण बहुमत से नहीं होता। अल्पमत यहाँ सही हो सकता है और बहुमत गलत।

मध्यकाल में साहित्य की भाषा बदल जाने के बावजूद अपनी पूर्व परम्परा से सम्बन्ध विच्छेद नहीं होता। जबकि ‘आधुनिक युग’ में हिन्दी की कथित जातीय परम्परा का विकास जिस रूप में हुआ, उसका सम्बन्ध ठिकाने से न तो शास्त्रीय परम्परा से कायम हुआ, न लोक परम्परा से। समूची मध्यकालीन कविता का संगीत से अभिन्न सम्बन्ध होता था और उसकी व्याप्ति का एक बड़ा कारण ये था कि उसका गायन/पाठ होता था। आधुनिक हिन्दी कविता की विडम्बना ये है कि उसका कोई जातीय संगीत विकसित नहीं हो सका, जबकि उसी की सहोदर उर्दू का ग़जल और कव्वाली के रूप में जातीय संगीत बन गया। इसी वजह से उर्दू कविता की लोकप्रियता सिर्फ उर्दू पढ़ने और लिखने वालों तक सीमित नहीं रही। यह अकारण नहीं है कि उर्दू के अच्छे से अच्छे कवि मुशायरों में शिरकत करते हैं और बड़ी संख्या में लोग उनको सुनने के लिए पहुँचते हैं। पूर्वी अंग की गायकी की बुनियाद पर क्या हिन्दी का जातीय संगीत विकसित किया जा सकता था? लोकप्रिय संस्कृति से जुड़े रूपों की पूरी तरह से उपेक्षा करके भी क्या किसी भाषा की कविता वृहत्तर समुदाय तक पहुंच सकती है?हिन्दी  में  तो  आलम  ये  रहा  है कि जिस  किसी की  कविता लोकप्रिय  हुई,  उसे  दोयमदर्जे  का  कवि  ठहरा  दिया  गया। दिनकर  और  बच्चन  जैसे कवियों  को हिन्दी में इसीलिए श्रेष्ठ कवियों की श्रेणी में नहीं रखा जाता। अंग्रेजी ढंग के साहित्य का भारतमें  जो  हाल है, सो है  ही, पश्चिम में  भी  इसके पाठक  और  श्रोता  बहुत  कम  बचे हैं। बाॅब  डिलन को गत वर्ष नोबेल  पुरस्कार  देकर कविता  के  लगातार  संकुचित  हो रहे दायरे को बढ़ाने की कोशिश की गयी। वे मूलतः ऐसे गीतकार और गायक है, जिनको सुनने और पसंद करने वालों की संख्या बहुत ज्यादा है। क्या हिन्दी जगत को भी लगातार कम होते जा रहे पाठक-श्रोता समुदाय के मद्देनजर साहित्यिक विधाओं के चले आ रहे स्वरूप के बारे में नये सिरे से नहीं सोचना चाहिए?

राजकुमार जी

प्रो॰राजकुमार

शोर-शराबे से दूर अध्ययन-अध्यापन में मग्न रहने  वाले युवा-तुर्क हिन्दी आलोचक। भक्ति साहित्य, हिन्दी नवजागरण, आधुनिकता, आधुनिक साहित्य, प्रेमचंद, हिन्दी कहानी इत्यादि पर लगातार लेखन। किताबों में जैसी रुचि इनकी  है,  वह अन्यत्र दुर्लभ ही हो गई है। फिलहाल, बी॰एच॰यू॰ के हिन्दी विभाग में प्राध्यापक।इनसे dr.kumar.raj@gmail.com पर संपर्क संभव। 

मुक्तिबोध के बहाने साहित्य-संस्कृति पर एक बहस: डॉ. राजकुमार

पश्चिमी विचारों के बढ़ते वर्चस्व के बावजूद उन्नीसवीं शताब्दी में ‘अन्धेर नगरी’ जैसे नाटकों, बीसवीं सदी में हबीब तनवीर के नाटकों, विजय तेन्दुलकर के ‘घासीराम कोतवाल’, गिरीश कर्नाड के ‘नागमण्डलम’ और ‘हयवदन’ जैसे नाटकों; विजयदान देथा की कहानियों और मुक्तिबोध की कहानियों और कविताओं में भारतीय परम्परा के सहज विकास के साक्ष्य मिल जाते हैं। ये सूची और भी लम्बी हो सकती है लेकिन ऊपर गिनाए गये नामों के सहारे हिन्दी की जातीय परम्परा ही नहीं, भारतीय साहित्य की जातीय परम्परा के विकास की वैकल्पिक अवधारणा प्रस्तुत की जा सकती है। कहने की आवश्यकता नहीं कि हिन्दी की जातीय परम्परा की वैकल्पिक अवधारणा विकसित करने में मुक्तिबोध के रचनात्मक और वैचारिक लेखन की भूमिका बहुत ही महत्वपूर्ण हो सकती है। #लेखक 

Muktibodh By Haripal Tyagi

Muktibodh By Haripal Tyagi

रूप की संस्कृति और मुक्तिबोध

By डॉ. राजकुमार

1.

कोई भी कार्य ठीक से पूरा करने के लिए एक संस्कृति की आवश्यकता होती है। अंग्रेजी में इसे वर्क कल्चर कहते हैं और इसका काम चलाऊ अनुवाद कार्य-संस्कृति हो सकता है। कार्य-संस्कृति के अभाव में ठिकाने से कोई भी काम कर पाना मुश्किल हो जाता है। कार्य-संस्कृति सिर्फ कानून, कायदों के औपचारिक ज्ञान और उन्हें व्यवहार में लागू करने से नहीं बनती। जब तक किसी बाहरी दबाव या डर के बिना हम स्वतः अपने दायित्त्व का निर्वाह नहीं करने लगते, तब तक यह नहीं माना जा सकता कि सही मायने में हमने एक कार्यसंस्कृति विकसित कर ली है। असल में कार्य संस्कृति एक संस्कार की तरह हमारे व्यक्तित्व में व्याप्त हो जाती है, जिसका कई बार हमें, सचेत रूप में, अहसास भी नहीं होता। यदि समकालीन भारत में ज्यादातर लोग अपने दायित्त्व का निर्वाह नहीं करते या सिर्फ मजबूरी में या भयवश अपनी जिम्मेदारी पूरी करते हैं तो इसका मतलब ये है कि हम कार्य-संस्कृति विकसित करने में असफल रहे हैं। एक सार्थक कार्य-संस्कृति का विकास किसी भी समाज को बेहतर ढंग से संचालित करने के लिए जरूरी है।

कार्य-संस्कृति की तरह साहित्य और कलाओं की भी संस्कृति होती है। साहित्यिक संस्कृति के अभाव में अच्छे और बेहतर साहित्य का सृजन असम्भव नहीं तो मुश्किल जरूर हो जाता है। साहित्यिक संस्कृति का सम्बन्ध सिर्फ समकालीन साहित्यिक संस्कृति से नहीं होता; समकालीन साहित्यिक संस्कृति भी वास्तव में किसी सभ्यता के समूचे साहित्यिक इतिहास को आत्मसात् करने पर बनती है। सार्थक साहित्य के रूप में पहचान उसी लेखन की बनती है जिसे अपनी सभ्यता के सांस्कृतिक इतिहास से उत्तीर्ण होकर लिखा जाता है। साहित्यिक लेखन मूलतः सांस्कृतिक कर्म है। इस सांस्कृतिक कर्म का एक राजनीतिक सन्दर्भ भी बन जाता है। लेकिन इसे राजनीतिक कर्म में निःशेष नहीं किया जा सकता है। माक्र्सवादी विचारधारा के हिमायती होने के बावजूद मुक्तिबोध के साहित्यिक लेखन का गहरा सरोकार भारतीय सांस्कृतिक परम्परा से रहा है। इसीलिए निराला के बजाय उनका तादात्म्य जयशंकर प्रसाद से बनता है। ‘तुलसीदास’ और ‘राम की शक्ति पूजा’ जैसी कविताएँ लिखने के बावजूद निराला की रचनाओं में सांस्कृतिक-बोध प्रसाद की रचनाओं की तरह अनुस्यूत नहीं है।

कोई भी सभ्यता अपने सुदीर्घ सांस्कृतिक जीवन के दौरान साहित्य और कला के विविध रूपों या विधाओं का विकास करती है। इन विधाओं/रूपों की अपनी बुनियादी संरचना होती है। इस बुनियादी संरचना का एक व्याकरण होता है। उस विधा में जो भी सार्थक बदलाव आते हैं, वे इस व्याकरण के अधीन संभव होते हैं। विजातीय प्रभाव भी इस व्याकरण के अधीन रूपान्तरित होकर रचना में आते रहते हैं। आरम्भिक आधुनिक दौर में संगीत, साहित्य, नृत्य, स्थापत्य, चित्रकला आदि के क्षेत्र में जो भी बदलाव आये, वे इसी तरह आए। इसीलिए विजातीय तत्त्वों को आत्मसात कर लेने के बावजूद जातीय परम्परा की निरन्तरता बनी रही।

साहित्य और कला के जातीय रूप जड़ नहीं होते। पहले से चली आ रही परम्परा से ही उनका विकास होता है। कोई रूप स्थिर होने से पहले कई स्रोतों से बहुत सारी चीजें आत्मसात करता है। जैसे कत्थक नृत्य के जिस रूप से आज हम परिचित हैं, वह रूप एक दिन में नहीं, धीरे-धीरे अस्तित्त्व में आया। एक बार जब कोई रूप पूर्णता प्राप्त कर लेता है तो उसका स्वरूप स्थिर हो जाता है। वह स्वायत्तता अर्जित कर लेता है। उसकी एक बुनियादी संरचना निर्मित हो जाती है। ये संरचना एक प्रकार के व्याकरण के अधीन कार्य करने लगती है। फिर इस व्याकरण में कोई बुनियादी बदलाव करना मुश्किल हो जाता है। इस रूप/विधा या माध्यम में काम करने वाला रचनाकार तभी सफल होता है, जब उस विधा के व्याकरण को समझकर सक्रिय होता है। इसके बावजूद, किसी विधा के अन्दर ऐसी गुंजाइश रहती है कि उसमें कुछ नया उन्मेष किया जा सके। उदाहरण के लिए गजल विधा का प्रयोग प्रायः प्रेम सम्बन्धी अनुभूतियों की अभिव्यक्ति के लिए किया जाता रहा है। किन्तु गजल में प्रेम की केन्द्रीयता को स्वीकार करते हुए भी सार्थक नवोन्मेष सम्भव है। फ़ैज अहमद फ़ैज की गजलें इस बात का साक्ष्य प्रस्तुत करती हैं कि प्रेम की केन्द्रीयता को स्वीकार करने के बावजूद उसमें क्रान्तिकारी और प्रगतिशील तेवर पैदा किये जा सकते हैं। किन्तु यदि गजल की विधा में वीर रस या समाज सुधार सम्बन्धी बातें डालने की कोशिश की जाए तो ये स्वरूप उसे धारण नहीं कर पाएगा। एक अच्छा रचनाकार वो है जो अपने माध्यम के प्रति संवेदनशील है; जो ये जानता है कि सुई से तलवार का काम नहीं लिया जा सकता और न ही तलवार से सुई का।

ये सही है कि नये युग की अनुभूतियों को साकार करने और नये विषयों को साहित्य और कला के माध्यमों में रचने हेतु नई विधाओं या रूपों का विकास होता है, किन्तु नई विधाएँ या नये रूप भी अपनी पूर्व परम्परा से ही निकलते हैं। उनका व्याकरण पूर्व प्रचलित रूपों से थोड़ा अलग तो होता है, लेकिन उनसे निरपेक्ष नहीं होता। इसीलिए उसे जातीय परम्परा के विकास के रूप में देखा जाता है। जैसे ध्रुपद गायन परम्परा का विकास ख्याल गायकी के रूप में हुआ और फिर ख्याल गायकी की परम्परा से आगे पूर्वी गायकी का विकास हुआ। पूरबी अंग की गायकी में लोक परम्परा में पहले से मौजूद होरी, चैती, दादरा, कजरी इत्यादि रूपों का उपशास्त्रीय गायन के रूप में उन्नयन होता है। इसी तरह रवीन्द्र संगीत का विकास हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत परम्परा और बांग्ला की बाउल गायन की लोक परम्परा से जुड़कर हुआ। रवीन्द्र संगीत कोे पश्चिमी संगीत परम्परा के कुछ तत्त्वों का भी समावेश है। रवीन्द्र संगीत को इसीलिए संगीत की जातीय परम्परा के सहज विकास के रूप में देखा जाता है। इसके बावजूद उसका बुनियादी स्वभाव भारतीय संगीत परम्परा से निर्मित है। इसके विपरीत जहाँ पश्चिमी संगीत की नियामक भूमिका होगी, वहाँ भारतीय संगीत परम्परा से कुछ तत्व ले लेने के बावजूद भी उसका स्वभाव जातीय/भारतीय नहीं रहेगा। भले ही उसकी भाषा और रंग-रोगन भारतीय क्यों न हो। गाँधी ने कई बातें पश्चिमी परम्परा से लीं, फिर भी उनके चिन्तन का स्वभाव भारतीय बना रहा, क्योंकि उन्होंने पश्चिमी विचारों को भारतीय चिन्तन परम्परा के व्याकरण में आत्मसात कर लिया। इसके उल्टी बात उन विचारकों की है जिन्होंने भारतीय चिन्तन परम्परा को पश्चिमी परम्परा में आत्मसात करने की कोशिश की।

उन्नीसवीं सदी में औपनिवेशिक आधुनिकता के आगमन के साथ भारतीय नवजागरण की चर्चा आरम्भ होती है। भारतीय नवजागरण के दौरान ज्ञान, साहित्य और कला की पहले से चली आ रही बुनियादी संरचना को त्यागकर पश्चिमी संरचनाओं को अपना लिया जाता है। इसे पैराडाइम शिफ्ट कहा गया। पश्चिमी पैराडाइम के निकष पर भारतीय सभ्यता की साहित्यिक, सांस्कृतिक और ज्ञान सम्बन्धी परम्पराओं को नापा जाने लगा। पश्चिमी पैराडाइम को ही थोड़ा-बहुत बदलकर भारतीय यथार्थ को बोधगम्य बनाने के लिए इस्तेमाल किया जाने लगा। पश्चिमी साहित्यिक तथा कलात्मक रूपों में भारतीय यथार्थ-बोध को ढालकर अभिव्यक्त किया जाने लगा। रामविलास शर्मा ने इसे हिन्दी की जातीय परम्परा के विकास के रूप में समादृत किया है। अंग्रेजी के विद्वान आलोचक होमी भाभा ने इसे ‘मिमिक्री’ और ‘हाइब्रिडिटी’ की संज्ञा दी है। किन्तु न तो इसे हिन्दी की जातीय परम्परा का विकास कहा जा सकता है और न ही इसकी व्याख्या ‘हाइब्रिडिटी’ के रूप में की जा सकती है। आरम्भिक आधुनिक दौर में हुए बदलाव की व्याख्या अवश्य हिन्दी की जातीय परम्परा के विकास के रूप में की जा सकती है क्योंकि उस दौर में पश्चिमी एशिया और अरब से आये प्रभाव को पहले से चले आ रहे साहित्यिक-सांस्कृतिक रूपों के व्याकरण के अधीन आत्मसात कर लिया गया। किन्तु उन्नीसवीं सदी में ऐसा नही हुआ। पहले से चले आ रहे साहित्यिक-सांस्कृतिक रूपों को त्यागकर पश्चिमी साहित्यिक-सांस्कृतिक रूपों को अपना लिया गया और फिर इन पश्चिमी साहित्यिक-सांस्कृतिक रूपों में ‘भारतीय यथार्थ’ ठँूसने की कोशिश की जाने लगी। साहित्यिक सांस्कृतिक विधाओं की परिकल्पना डिब्बे के रूप में किए बिना साहित्यिक सांस्कृतिक रूपों और अन्तर्वस्तु (यथार्थ) में पूर्ण पार्थक्य स्वीकार कर पाना संभव न था। साहित्यिक-सांस्कृतिक रूप वास्तव में ‘रूप’ नहीं होते। वे किसी संस्कृति को बोधगम्य बनाने वाले मंत्र की तरह होते हैं जिनके बिना उस संस्कृति का बोध ही असंभव हो जाता है। किसी सभ्यता की धड़कन उसके सुदीर्घ सांस्कृतिक इतिहास के दौरान विकसित साहित्यिक-सांस्कृतिक रूपों में अवतरित होती है। टेक्नाॅलजी का एक सभ्यता से दूसरी सभ्यता में स्थानान्तरण आसान होता है, किन्तु साहित्यिक-सांस्कृतिक रूपों को एक जगह से निकालकर दूसरी जगह रोपना आसान नहीं होता।

भाषा का स्वभाव किसी डिब्बे की तरह नही, जिसमें कुछ भी डाला जा सके। भाषा दर्पण की तरह भी नहीं, जो यथार्थ को प्रतिबिम्बित करे। भाषा कोई पारदर्शी माध्यम भी नहीं, जिसके आर-पार देखा जा सके। भाषा यथार्थ को प्रतिबिम्बित नही करती, बल्कि एक संसार रचती है। यह संसार यथार्थ से मिलता-जुलता हो सकता है और पूरी तरह काल्पनिक भी। संसार रचने की सामथ्र्य भाषा में है। इसका मतलब यह है कि भाषा अपने ढंग से, अपनी शर्तों पर एक संसार रचती है। आप भाषा में जो बतलाना चाहते हैं, वह बात भाषा में वैसे ही नहीं आती, जैसे आप चाहते हैं। बात बदल-बदल जाती है। मुक्तिबोध ने कला के तीन क्षण में इस प्रसंग की विस्तार से चर्चा की है। फ़ैज ने इसी बात को अपने अन्दाज में इस तरह कहा है:

                                दिल से तो हर मुआमला करके चले थे साफ हम।

                                कहने में उनके सामने बात बदल-बदल गयी।।

2.

 हिन्दी की जातीय परम्परा की सबसे ज्यादा चर्चा रामविलास शर्मा ने की। रामविलास शर्मा ने भारतेन्दु युग के साथ विकसित होने वाले समूचे आधुनिक हिन्दी साहित्य की व्याख्या हिन्दी की जातीय परम्परा के सहज विकास के रूप में की है। रामविलास शर्मा ने हिन्दी की जातीय परम्परा की जिस तरह व्याख्या की है, वह मुख्यतः अन्तर्वस्तु प्रधान है। अन्तर्वस्तु केन्द्रित समझ से सामाजिक परिवर्तन के कारणों की व्याख्या की जा सकती है। लेकिन साहित्य और कला के विभिन्न रूपों में घटित होने वाले परिवर्तन की सन्तोषजनक व्याख्या नहीं की जा सकती। क्योंकि साहित्यिक और कलात्मक रूपों की एक विशिष्ट संरचना होती है और उनमें जो भी बदलाव आते हैं, वे बदलाव प्रायः उस संरचना के अन्दर से निकलते हैं। ये मानना गलत है कि साहित्यिक या कलात्मक रूप सामाजिक परिवर्तनों को यथावत् प्रतिबिम्बित करते हैं। सामाजिक परिवर्तन का एहसास साहित्यिक-कलात्मक रचनाओं से होता जरूर है। लेकिन ये एहसास साहित्य और कला के विभिन्न माध्यम् अपनी शर्तों पर, माध्यम के स्वभाव के अनुरूप ही कराते हैं। इनका वैशिष्ट भी यही है। इसीलिए संगीत सुनने और कविता पढ़ने/सुनने से हमें जो अनुभूति होती है, वह अनुभूति समाज-विज्ञान पढ़ने से होने वाले अनुभूति से भिन्न होती है।

हिन्दी की जातीय परम्परा की कोई भी सार्थक चर्चा साहित्य या कला के ‘माध्यम’ को छोड़कर सम्भव नहीं। साहित्य और कलाओं के प्रभाव का निर्धारण भी मुख्य रूप से माध्यम विशेष में अर्जित की गयी दक्षता से होता है। ये प्रभाव सिर्फ अन्तर्वस्तु से निर्धारित/तय नहीं होता।

मुक्तिबोध सम्भवतः हिन्दी के उन विरल लेखकों में से हैं, जिनका सांस्कृतिक बोध बहुत ही गहरा है। सही मायने में सृजनात्मक सांस्कृतिक बोध स्थूल नहीं, बहुत सूक्ष्म होता है; और विचार नहीं, संस्कार की तरह रचनात्मकता के विभिन्न आयामों में रूपायित होता है।

मुक्तिबोध का रचना संसार हमें इसलिए प्रभावशाली लगता है क्योंकि उन्होंने भारतीय सभ्यता के सांस्कृतिक बोध को संवेदना के स्तर पर अनुभव किया और फिर अपनी कृतियों में इस अनुभूति को सृजित किया। विचारणीय प्रश्न ये है कि जब सर्वत्र यथार्थवाद का बोलबाला था, मुक्तिबोध ने अपनी रचनात्मकता अभिव्यक्ति के लिए ऐसे रूप की खोज की जिसका सम्बन्ध न तो यथार्थवाद से और न ही आधुनिकतावाद से बनता है। असल में मुक्तिबोध का जैसा रचनात्मक व्यक्तित्व था, उसकी अभिव्यक्ति यथार्थवादी शिल्प में सम्भव नहीं थी। उसकी अभिव्यक्ति आधुनिकतावादी शिल्प में भी संभव नहीं थी। ये बात अलग है कि मुक्तिबोध की रचनात्मक अभिव्यक्ति की संगति यथार्थवादी शिल्प के बजाय आधुनिकतावादी शिल्प से ज्यादा बनती है। फिर भी उसकी सन्तोषजनक व्याख्या आधुनिकतावादी सैद्धान्तिकी के सहारे सम्भव नहीं। मुक्तिबोध की रचनात्मकता का बहुत गहरा सम्बन्ध भारत की पूर्व औपनिवेशिक सांस्कृतिक परम्परा से है। उसी की बुनियाद पर वे आधुनिकतावादी और यथार्थवादी सैद्धान्तिकी का अतिक्रमण करते हैं। भले ही मुक्तिबोध ने बहुत सोच-समझकर ऐसा न किया हो, लेकिन उनकी कविताओं और कहानियों के विन्यास के आधार पर ऐसा अवश्य कहा जा सकता है कि उनकी रचनात्मकता न तो आधुनिकतावाद के साँचे में फिट होती है, न यथार्थवाद के साँचे में।

3.

अगर भारतेन्दु युग से आधुनिक हिन्दी की शुरूआत मानी जाए, तो फिर यह भी मानना पड़ेगा कि आधुनिक युग की शुरूआत के साथ ही रूप और अन्तर्वस्तु का पार्थक्य स्वीकार कर लिया गया। रूप और अन्तर्वस्तु का पार्थक्य स्वीकार करने से आशय यह है कि रूप की परिकल्पना एक तटस्थ अवधारणा के रूप में की जाने लगी, जिसमें सुविधानुसार कोई भी अन्तर्वस्तु डाली जा सकती है। इस बात को ज्यादा सरल तरीके से कहें तो रूप की परिकल्पना एक डिब्बे के रूप में की गयी, जिसमें जरूरत के हिसाब से कुछ भी डाला जा सकता है।

आधुनिकताजन्य चेतना के प्रचार-प्रसार के सम्बन्ध में भारतेन्दु ने लिखा है, ‘‘मैंने यह सोचा है कि जातीय संगीत की छोटी-छोटी पुस्तकें बनें और वे सारे देश, गाँव गाँव, में साधारण लोगों में प्रचार की जायँ। यह सब लोग जानते हैं कि जो बात साधारण लोगों में फैलेगी उसी का प्रचार सार्वदेशिक होगा और यह भी विदित है कि जितना ग्रामगीत शीघ्र फैलते हैं और जितना काव्य को संगीत द्वारा सुनकर चित्त पर प्रभाव होता है उतना साधारण शिक्षा से नहीं होता। इससे साधारण लोगों के चित्त पर भी इन बातों का अंकुर जमाने को इस प्रकार से जो संगीत फैलाया जाय तो बहुत कुछ संस्कार बदल जाने की आशा है। … इस हेतु ऐसे गीत बहुत छोटे छोटे छंदों में और साधारण भाषा में बनैं, वरंच गवाँरी भाषाओं में और स्त्रियों की भाषा में विशेष हों। कजली, ठुमरी, खेमटा, कँहरवा, अद्धा, चैती, होली, साँझी, लंबे, लावनी, जाँते के गीत, बिरहा, चनैनी, गजल इत्यादि ग्रामगीतों में इनका प्रचार हो और सब देश की भाषाओं में इसी अनुसार हो।’’

भारतेन्दु के उपर्युक्त कथन से इस बात की पुष्टि होती है कि रूप की परिकल्पना अन्तर्वस्तु निरपेक्ष सत्ता के रूप में की जाने लगी।

इससे पहले रूप और अन्तर्वस्तु की परिकल्पना परस्पर निरपेक्ष सत्ता के रूप में नहीं की जाती थी। जैसे हिन्दुस्तानी संगीत परम्परा में ये बताया गया है कि अमुक राग अमुक समय पर गाया जाना चाहिए। इसका मतलब यह है कि एक समय विशेष की संवेदना एक राग विशेष में ही रूपायित हो सकती है। अर्थात् राग के स्वभाव का सम्बन्ध प्रहर विशेष के अनुरूप बनता है। समय और राग के सम्बन्ध की पहचान का विस्तार षड्ऋतुवर्णन और फिर बारहमासा गायन की लोकपरम्परा में दिखायी देता है। यदि चैबीस घण्टे के चक्र में रागों का समय निर्धारित किया गया है, तो बारहमासे को साल के बारह महीनों के चक्र में स्थापित किया गया है। ये माना गया कि हर महीने का स्वभाव अलग है। किसी माह या ऋतु के स्वभाव के अनुरूप ही उस माह या ऋतु में गाये जाने वाले गीत की धुन विकसित की गयी। उदाहरण के तौर पर फागुन माह में गाये जाने वाले गीत ‘होरी’ की धुन और सावन महीने में गाये जाने वाले गीत कजरी की धुन अलग है। इसका मतलब ये है कि धुन सिर्फ रूप नहीं है, जिसमें कैसा भी गीत गाया जा सकता है। चैती की धुन में होरी नहीं गा सकते और होरी की धुन में चैती गाने पर अटपटा लगेगा। इस तरह धुन और गीत परस्पर इस तरह मिल जाते हैं कि इनमें से किसी को मात्र ‘रूप’ नहीं कहा जा सकता। धुन भी अंतर्वस्तु है और गीत भी अन्तर्वस्तु है। यह भी कहा जा सकता है कि रूप और अन्तर्वस्तु इस तरह एकाकार हो जाते हैं कि ये कहना न तो सम्भव है और न तो उचित है कि क्या रूप है और क्या अन्तर्वस्तु। कुन्तक ने इस स्थिति को ‘निरस्त सकल अवयव’ कहा है। कुन्तक का आशय यह है कि रचना में प्रयुक्त विभिन्न अवयवों की स्वतंत्र सत्ता समाप्त हो जाती है। ठीक इसी तरह गीत और धुन का स्वतंत्र अस्तित्व समाप्त हो जाता है। जो प्रभाव है वह इनके एक हो जाने से उत्पन्न होने वाला प्रभाव है।

ऊपर के विवेचन से ये बात समझने में मदद मिल सकती है कि रूप की परिकल्पना समय और विषयवस्तु से निरपेक्ष नहीं होती। एक रूप में जो चाहें, वो मनमाफिक नहीं भरा जा सकता। जैसे कजरी की धुन में परिवार नियोजन का महत्त्व गाया जाने लगे तो उसका प्रभाव बहुत संतोषजनक नहीं होगा। इसका एक निहितार्थ ये भी है कि रूप अपने स्वभाव के अनुरूप अन्तर्वस्तु को ही स्वीकार करता है। रूप के स्वभाव के विपरीत जब भी कुछ डालने की चेष्टा की जाती है, उसके सार्थक और टिकाऊ परिणाम नहीं निकलते। प्रसिद्ध चिन्तक हेडेन व्हाइट ने इसीलिए ‘कंटेंट आॅफ दि फार्म’ की चर्चा की है। ‘कंटेंट आफ दि फार्म’ से आशय यह है कि सामान्य समझ के विपरीत रूप यह निर्धारित करता है कि उसमें कैसी अन्तर्वस्तु रखी जा सकती है। रूप से अन्तर्वस्तु निर्धारित होती है। अन्तर्वस्तु से रूप नहीं।

पहचान/अस्मिता को रेखांकित करने वाली चीज रूप है, न कि अन्तर्वस्तु। पहले तो यही देखा जाएगा कि आप सुर में गा सकते हैं या नहीं। किसी गायक की पहचान इस बात से होगी कि उसे रागों का ज्ञान है या नहीं और वह राग में गा सकता है या नहीं। गायक राग में क्या गाता है, गीत के विषय या बोल क्या हैं, ये बातें काफी हद तक उस राग की प्रकृति से निर्धारित होंगी। ये बात साहित्य पर भी लागू होती है।

अभी तक कही गयी बातें अगर ठीक हैं, तो फिर रूप और अन्तर्वस्तु सम्बन्धी उस समझ पर नये सिरे से विचार करना चाहिए, जिसकी शुरूआत हिन्दी में भारतेन्दु के साथ होती है। यह सही है कि समूचे आधुनिक हिन्दी साहित्य में विषयवस्तु को केन्द्रीय मानकर रूप और अन्तर्वस्तु के सम्बन्ध पर चर्चा हुई। व्यवहार में भी इस पर इसी रूप में अमल किया गया। यहाँ तक कि प्रयोगवादी-आधुनिकतावादी रचनाकारों ने भी रूप के महत्त्व और उसके सांस्कृतिक संदर्भ को नजरअंदाज करने की गलती की। अंग्रेजी ढंग का नाॅवेल या कविता लिखने वालों में केवल यथार्थवादी-प्रगतिवादी रचनाकार ही नहीं आते, प्रयोगवादी-आधुनिकतावादी रचनाकारों ने भी अंग्रेजी ढंग के रूप-विन्यास में ही अपनी ज्यादातर रचनाएँ लिखी हैं। प्रयोगवादी-आधुनिकतावादी रचनाकार रूप की चिन्ता तो खूब करते हैं, लेकिन ये बात भुला देते हैं कि जिस रूप में वो रचना कर रहे हैं, उस रूप का सम्बन्ध पश्चिमी साहित्यिक-सांस्कृतिक परम्परा से है। पश्चिमी साहित्यिक-सांस्कृतिक परम्परा की कोख से जन्मे रूप में अव्वल तो भारतीय अन्तर्वस्तु आ नहीं सकती और अगर वो ठीक से उस ‘रूप’ में समा जा रही है तो उसे भारतीय अन्तर्वस्तु कहना ही संदेहास्पद होगा। ये जरूर कह सकते हैं कि रूप और अन्तर्वस्तु दोनों पश्चिमी हैं ! लेकिन फिर ये सवाल उठेगा कि गैर-पश्चिमी भाषा और साहित्यिक-सांस्कृतिक संदर्भ में ऐसी रचना की क्या संगति बनेगी, जिसका रूप और अंतर्वस्तु दोनों पश्चिमी है।

जैसाकि पहले कहा गया, इस प्रश्न का एक उत्तर होमी भाभा के यहाँ मिलता है, जहाँ वे इस स्थिति को वर्णसंकरता के रूप में व्याख्यायित करते हैं। ये न तो पूरी तरह पश्चिमी, और न पूरी तरह भारतीय रूप और संवेदना है, क्योंकि पश्चिम के सम्पर्क में आने के बाद समूचा साहित्यिक-सांस्कृतिक संदर्भ ही वर्णसंकर हो गया है। वास्तविकता तो ये है कि जिसे वर्णसंकरता की स्थिति कहा गया है, वो वास्तव में वर्णसंकरता की स्थिति है नहीं। यहाँ सब कुछ पश्चिम का ही है, सिर्फ रंगरोगन और भाषा भारतीय है। वर्ण संकरता की स्थिति तब उत्पन्न होती है, जब दोनों पक्षों की भूमिका बराबरी की होती है। ये अकारण नहीं है कि इस कथित वर्णसंकरता ने किसी बड़े वैचारिक एवं रचनात्मक उन्मेष को जन्म नहीं दिया। वर्णसंकरता की ये अवधारणा इससे पहले इतिहासकारों द्वारा प्रयुक्त भारतीय नवजागरण की अवधारणा की तरह ही बहुत उर्वर साबित नहीं हुई। क्योंकि पराधीनता के दौरान पश्चिम से जो भी संवाद हुआ, वो ग़ैर बराबरी के स्तर पर हुआ और इस संवाद में पश्चिम की हर क्षेत्र में नियामक और केन्द्रीय भूमिका स्वीकार करते हुए उसका भारतीय संस्करण गढ़ने की कोशिश की गयी। इसलिए इस स्थिति को वर्णसंकरता की अवधारणा के जरिये व्याख्यायित करने के बजाय ‘डिराइवेटिव डिस्कोर्स’ के रूप में व्याख्यायित करना ज्यादा सटीक होगा। डिराइवेटिव डिस्कोर्स की अवधारणा का इस्तेमाल पार्थ चटर्जी ने अपनी पुस्तक में राष्ट्रवादी चिन्तन को व्याख्यायित करने के संदर्भ में किया है। इस सोच में ये बात शामिल है कि मूल और नियामक चिन्तन तो पश्चिम का है, और राष्ट्रीय चिन्तन के रूप में जो कुछ लिखा-पढ़ा गया है, वो पश्चिमी चिन्तन से ही निकला है। इस विमर्श में भारतीय राष्ट्रीय चिन्तन की स्वायत्तता स्वीकार करने के बावजूद पश्चिमी चिन्तन की केन्द्रीयता बनी रहती है। क्या यही बात प्रयोगवादी-आधुनिकतावादी-यथार्थवादी रचनाकारों के साहित्यिक अवदान के बारे में भी कही जा सकती है! क्या उनके अवदान की व्याख्या डिराइवेटिव डिस्कोर्स के रूप में करना उचित नहीं होगा?

ये तो नही कहा जा सकता कि हिन्दी की जातीय परम्परा का उन्नीसवीं सदी के बाद विकास ही नहीं हुआ। लेकिन ये जरूर कहा जा सकता है कि हिन्दी की जातीय परम्परा के सहज विकास के रूप में समादृत किये जाने वाले बीसवीं शताब्दी के साहित्य का स्वरूप जातीय कम और पश्चिमी ज्यादा है। असल में, जैसे-जैसे जातीय परम्परा के संस्कार कमजोर कमजोर पड़ते गये, वैसे-वैसे पश्चिमी विचारों का प्रभाव बढ़ता गया। किन्तु पुराने संस्कार इतने आसानी से छूटते नहीं। पश्चिमी विचारों के बढ़ते वर्चस्व के बावजूद उन्नीसवीं शताब्दी में ‘अन्धेर नगरी’ जैसे नाटकों, बीसवीं सदी में हबीब तनवीर के नाटकों, विजय तेन्दुलकर के ‘घासीराम कोतवाल’, गिरीश कर्नाड के ‘नागमण्डलम’ और ‘हयवदन’ जैसे नाटकों; विजयदान देथा की कहानियों और मुक्तिबोध की कहानियों और कविताओं में भारतीय परम्परा के सहज विकास के साक्ष्य मिल जाते हैं। ये सूची और भी लम्बी हो सकती है लेकिन ऊपर गिनाए गये नामों के सहारे हिन्दी की जातीय परम्परा ही नहीं, भारतीय साहित्य की जातीय परम्परा के विकास की वैकल्पिक अवधारणा प्रस्तुत की जा सकती है। कहने की आवश्यकता नहीं कि हिन्दी की जातीय परम्परा की वैकल्पिक अवधारणा विकसित करने में मुक्तिबोध के रचनात्मक और वैचारिक लेखन की भूमिका बहुत ही महत्वपूर्ण हो सकती है।

राजकुमार जी

प्रो॰राजकुमार

शोर-शराबे से दूर अध्ययन-अध्यापन में मग्न रहने  वाले युवा-तुर्क हिन्दी आलोचक। भक्ति साहित्य, हिन्दी नवजागरण, आधुनिकता, आधुनिक साहित्य, प्रेमचंद, हिन्दी कहानी इत्यादि पर लगातार लेखन। किताबों में जैसी रुचि इनकी  है,  वह अन्यत्र दुर्लभ ही हो गई है। फिलहाल, बी॰एच॰यू॰ के हिन्दी विभाग में प्राध्यापक।इनसे dr.kumar.raj@gmail.com पर संपर्क संभव। 

 

साभार – कथादेश 

जारी….

 

जाने दो वह कवि कल्पित था : अविनाश मिश्र

कभी निराला के लिए नागार्जुन ने लिखा था : ‘‘उसे मरने दिया हमने रह गया छुट कर पवन/ अब भले ही याद में करते रहें सौ-सौ हवन।’’ यह लिखाई बताती है कि हिंदी साहित्य में मरण का बहुत माहात्म्य है, यह ज्ञानरंजन भी बहुत पूर्व में कह चुके हैं। मुझे यह कहना भला तो नहीं लग रहा है, लेकिन मुझे लगता है कि कृष्ण कल्पित के जीते-जी शायद उन्हें वह प्रतिष्ठा नहीं मिलेगी जिसके वह हकदार हैं। आज हिंदी साहित्य में कृष्ण कल्पित का मौखिक और कुटिल विरोध उनके लिखित विरोध से कई गुना बढ़ चुका है। उन पर हो रहे आक्रमण कभी निराला पर हुए आक्रमणों की याद दिलाते हैं। इस तरह देखें तो हिंदी कविता और आवारगी की ही नहीं कृष्ण कल्पित अपमान की परंपरा को भी आगे बढ़ा रहे हैं। इस अपमान में भी आनंद की तलाश उनकी सहज-वृत्ति है। इसके लिए वह जिस सिद्ध ‘विट’ तक जाते हैं, वह एक साथ उनके कुछ मित्रों और कई शत्रुओं का निर्माण करती है। इन शत्रुओं में औसत कवि-कवयित्री, फूहड़ लेखक-लेखिकाएं, मतिमंद और माफिया आलोचक, अर्थपिशाच प्रकाशक, काहिल प्राध्यापक और उनके निकम्मे शोधार्थी, मानसिक रूप से दिवालिए पत्रकार, चालू और हद दर्जे के बेवकूफ टिप्पणीकार, भ्रमरवृत्तिदक्ष दलाल और प्रतिभा-प्रभावशून्य युवक-युवतियां शामिल हैं। इस पर सोचा जाना चाहिए कि आखिर एक कवि इतने सारे मूर्त शत्रुओं के बीच रहकर कैसे काम करता है. #लेखक 

परंपरा का आवारापन

कृष्ण कल्पित की कविता-सृष्टि पर एकाग्र

 

By  अविनाश मिश्र  

‘‘आलोचक कवि हो यह जरूरी नहीं, लेकिन कवि का आलोचक होना अपरिहार्य है!’’

यह कहने वाले समकालीन हिंदी कविता के सबसे आवारा कवि कृष्ण कल्पित कवियों में सबसे बड़े शराबी और शराबियों में सबसे बड़े कवि हैं। एक आलोचनात्मक आलेख के लिहाज से यह शुरुआत कुछ अजीब और भारहीन लग सकती है, लेकिन मैं चाहता हूं कि जैसे कृष्ण कल्पित (कृ.क.) को कविता नसीब हुई है, वैसे ही मुझे उनकी कविता की आलोचना नसीब हो।

इस आलोचना के केंद्र में वे असर हैं जो मेरे उत्साह में मुझ तक विष्णु खरे के जरिए, विष्णु खरे तक मुक्तिबोध के जरिए, मुक्तिबोध तक निराला के जरिए, निराला तक कबीर के जरिए, कबीर तक बाणभट्ट के जरिए और बाणभट्ट तक वाल्मीकि के जरिए आए। लेकिन कहां ये तेजस्वी और पराक्रमी कवि-आलोचक और कहां अत्यंत अल्प बौद्धिकता वाला मैं! मुझे यह बहुत अच्छी तरह मालूम है कि जिस परंपरा में कृ.क. आवारगी करते रहे हैं, उसमें मेरी गति बहुत क्षीण है। इस गति के बावजूद मैं कृ.क. की कविता-सृष्टि पर एकाग्र होकर कुछ कहने का प्रयत्न कर रहा हूं और इस सिलसिले में विष्णु खरे की एक कविता ‘कूकर’ मेरे साथ चलने लगी है।

हिंदी कविता संसार में एक लंबे समय तक कृ.क. के नाम के आगे गलत या प्रश्न का निशान लगाया जाता रहा है, लेकिन अब यह एक तथ्य और सच्चाई मालूम पड़ती है कि कृ.क. पूरब की कविता की पूरी परंपरा को देखने वाले अपनी और अपने से ठीक पूर्व की पीढ़ी में एकमात्र आवारा कवि हैं। अपने नियमों से ही अपना खेल खेलते हुए वह कविता की दुनिया में किसी और के खेल में शामिल होने वाले बेवकूफों, कायरों और शोहदों में नहीं हैं और उनसे दूर भी रहे हैं।

दिशाओं में गर्क हो जाने की ख्वाहिश रखने वाले वह उन कवियों में से हैं जिन्होंने अपने शुरुआती रियाज को भी शाया करवाया है। इस रियाज को अगर रियाज ही माना जाए, तब हिंदी कविता की मुख्यधारा में सही मायनों में कृ.क. का काव्य-प्रवेश साल 1990 में आए ‘बढ़ई का बेटा’ से होता है। इस संग्रह की आखिरी कविता कवियों के मुख्यधारा तक आने, उसमें भटकने, खटने और खो-खप जाने को बयां करती है :

बहुत दूर से चलकर दिल्ली आते हैं कवि

भोजपुर से मारवाड़ से संथाल परगना से मालवा से

छत्तीसगढ़ से पहाड़ से और पंजाब से चलकर

दिल्ली आते हैं कवि

जैसे कामगार आते हैं छैनी-हथौड़ा लेकर

रोजी-रोटी की तलाश में

[ कवियों की कहानी ]

 

इस काव्य-प्रवेश से एक दशक पूर्व ‘भीड़ से गुजरते हुए’ के गीतों से पहले एक भूमिका में कवि ने दर्ज किया :

अभी मैं हांफ रहा हूं

मुझे सुनने को आतुर लोगों

अभी मैं हांफ रहा हूं

जब मैं हांफने की

पूरी यात्रा तय कर लूंगा

तब मैं पूरी कथा कहूंगा

कृ.क. के कवि के इस शाया रियाज में रेतीली स्थानीयता की विसंगतियां थीं, प्रेमानुभव थे और ‘दर्द जितना भी मिला, प्यास बनकर पी गए’ वाली रूमानियत और शहादत थी। इसमें लोक-संवेदना और विस्थापन की मार थी। लय से लगाव और छंद का ज्ञान साथ लिए इस रियाज में एक अनूठा कथा-तत्व था, इसलिए इसे कथा-गीत कहकर भी पुकारा गया :

राजा रानी प्रजा मंत्री बेटा इकलौता

एक कहानी सुनी थी जिसका अंत नहीं होता

इस रियाज ने एक आवारागर्द अक्ल रखने वाले कृ.क. की कवि-छवि का बहुत दूर तक नुकसान किया। इसने हिंदी कविता की व्यावहारिक राजनीति को यह छूट दी कि वह कृ.क. के कवि के इर्द-गिर्द प्रश्नवाचकता का वृत्त निर्मित करे और इसे बहुत दूर तक विस्फारित कर सके। इस वृत्त में ‘कैद’ कवि का काव्य-संघर्ष इसलिए बहुत उल्लेख्य है क्योंकि उसकी कविता पहले गीत की रूढ़ संवेदना से बाहर आई, फिर आठवें दशक के फॉरमूलों से और फिर नवें दशक के नक्शे से भी। इस प्रकार एक सीधी गति में सफर करते हुए कृ.क. की कविता आज सारे दायरों को ध्वस्त कर अपना एक अलग देश बना चुकी है और यह कहना सुखद है कि छूट चुके मरहलों से उसके रिश्ते अब भी अच्छे हैं।

प्रस्तुत सामयिकता में कृ.क. की कविताएं अभ्यस्त मुहावरों और काव्य-समझ की कविताएं नहीं हैं। इस वक्त हिंदी में कविता के जितने भी सांचे हैं — प्रतिबद्ध कविता, वैचारिक कविता, सैद्धांतिक कविता, राजनीतिक कविता, क्रांतिकारी कविता, ऐतिहासिक कविता, वैश्विक कविता, आंचलिक कविता, प्राकृतिक कविता, सांस्कृतिक कविता, लोक कविता, ग्रामीण कविता, कस्बाई कविता, नागर कविता, पर्वतीय कविता, स्त्रीवादी कविता, दलित कविता, आदिवासी कविता, अल्पसंख्यक कविता, सर्वहारा कविता, तात्कालिक कविता, समयातीत कविता, आवश्यकतावादी कविता, आशावादी कविता, निराशावादी कविता, इच्छावादी कविता, चालू कविता, जड़ कविता, स्मृत्यात्मक कविता, गत्यात्मक कविता, रत्यात्मक कविता, काव्यात्मक कविता, गद्य कविता, ठोस कविता, तरल कविता, मुश्किल कविता, सरल कविता, अगड़ी कविता, पिछड़ी कविता, आधुनिक कविता, उत्तर आधुनिक कविता, गंभीर कविता, लोकप्रिय कविता, जन कविता, बौद्धिक कविता — उनमें से किसी एक में कृ.क. की कविता को नहीं रखा जा सकता। इस कविता-समय में इन काव्य-प्रकारों और प्रवृत्तियों के बीच इस प्रकार कृ.क. की कविता एक ‘आवारा कविता’ नजर आती है। आवारगी सदा से समय में तिरस्कृत रही आई है। यह अलग बात है :

पुरस्कृत कवियों से कविता दूर चली जाती है

कविता तिरस्कृत कवियों पर रीझती है

[ कविता-रहस्य, 25:1 ]

 

आवारा कविता अपने आस-पास को बहुत सजगता और ईमानदारी से देखती है, लेकिन वह अपने समय में बहुत अकेली भी पड़ जाती है और इसलिए ही वह परंपरा से संबद्ध होती है। इस प्रकार की कविता में एक खास किस्म का देहातीपन और बेबाकी होती है, और उसका कहना-बोलना अक्सर किसी सच्चे-निहंग पागलपन की याद दिलाता है। यहां यह भी बताते हुए आगे बढ़ना चाहिए कि किसी गैर-मार्क्सवादी कवि की कविता को सीधे मनुष्य से प्रतिबद्ध बता देने वाले समीक्षात्मक-आलोचनात्मक प्रयत्न मार्क्सवादी आलोचना के कूपाकाश में प्राय: बहुत नवीन और अलग समझे जाते रहे हैं। लेकिन किसी विचार या राजनीति से प्रतिबद्ध होने बावजूद कविता — अगर वह कविता है — तो अनिवार्यतः — प्रथमतः और अंततः — मनुष्य से ही प्रतिबद्ध होगी, इसलिए किसी कवि की कविता का मनुष्य से प्रतिबद्ध होना या बने रहना कोई नई और अनूठी बात नहीं है। नयापन और वैशिष्ट्य तो इसमें है कि कवि अपनी प्रतिबद्धता को बयां कैसे कर रहा है, और यह भी मैं कोई नई बात नहीं कह रहा हूं, बस इस प्रसंग में इस जरूरी बात को दुहरा भर रहा हूं। इस अर्थ में देखें तो कृ.क. का कवि एक शास्त्रकार भी है। वह माफिया आलोचकों को पहचानता है और उसकी कविता कातिलों का कातिल होने की बराबर कोशिश करती है। आस-पास को कभी ओझल न करने वाली मानवीय दृष्टि के साथ दृढ़ यह कविता बंकिमता को बचाती है और परंपरा में आवारगी करते हुए कथित आधुनिकता और उत्तर-आधुनिकता दोनों से ही परहेज बरतती है। यह इस यकीन के साथ व्यक्त होती है कि एक नए कवि में सारे पुराने कवि शामिल होते हैं। यह जरी-गोटेदार भाषा से दूरी बनाकर करुणा और क्रोध से संभव हुई वाग्मिता को प्रश्रय देती है। तत्कालप्रिय प्रवचनात्मकता से प्राप्त वैचारिक प्रतिबद्धता-पक्षधरता से बचती हुई यह लोगों के बीच, लोगों का होने की कोशिश करती है और इस कोशिश में जनप्रिय और बदनाम साथ-साथ होती है।

कविता में क्या हो, क्या न हो, क्या कहा जाए, क्या न कहा जाए, कैसे कहा जाए, कैसे न कहा जाए… यह सब हिंदी कविता में गई सदी के सातवें दशक में ही पूर्णरूपेण तय और स्पष्ट हो गया था। कुछेक अपवादों को छोड़ दें तो आज करीब-करीब सारे नए-पुराने कवि इस स्पष्टता के साथ ही लिख रहे हैं। कृ.क. इन अपवादों में से ही एक या कहें इन अपवादों में भी एक अपवाद हैं। कविता और कवि-व्यक्तित्व दोनों ही कृ.क. के पास है। निराला और राजकमल चौधरी के बाद यह संयोग कृ.क. के रूप में हिंदी में कई दशकों के बाद घट रहा है। यह यों ही नहीं है कि आज हिंदी साहित्य (हिं.सा.) के सारे संगठित तत्व और शक्तियां कृ.क. पर क्रुद्ध और इसलिए उनके विरुद्ध हैं। अद्भुत आकर्षक आवारगी से भरा हुआ कृ.क. का व्यक्तित्व और उसका कवित्व हिं.सा. के जड़, संकीर्ण और अदूरदर्शी आलोचकों के बीच उभरा है। यह भी कह सकते हैं कि कृ.क. जैसे कवि के लिए यह समय पूरी तरह मुफीद नहीं रहा आया। कृ.क. कविता में और कविता से अलग भी प्राय: बहुत मूल्यवान बातें कहते हैं, लेकिन कभी-कभी उनमें व्यावहारिक संचार का बहुत अभाव होता है। इस अभाव को अपना अपमान समझ हिं.सा. की व्यावहारिक राजनीति उनसे एक शत्रु की तरह बर्ताव करती है। यह बर्ताव तत्काल भले ही कुछ बर्बाद करता दिखे, लेकिन बहुत दूर तक इसकी कोई गति नजर नहीं आती, क्योंकि कृ.क. के पास भविष्य कविता के रूप में सुरक्षित है और इस दृश्य में भी यह कृ.क के सौभाग्य का तेवर नहीं तो और क्या है कि उनके और उनके कवित्व के प्रति अनुराग रखने वाले बढ़ते ही जा रहे हैं। उनके पक्ष में नजर आने वाले ऐसे उदीयमान व्यक्तित्वों की कोई कमी नहीं है जिनसे कल हिंदी धन्य होगी। यहां वरिष्ठ कवियों के बहाने युवा कवियों को संबोधित कृ.क. की ये कविता-पंक्तियां दृष्टव्य हैं :

जिसकी एक भी पंक्ति नहीं बची

उसके पास सर्वाधिक तमगे बचे हुए हैं

 

[ वरिष्ठ कवियो ]

एक योग्य कवि की लंबी उपेक्षा उसको पराक्रमी बनाती चली जाती है। इस पराक्रम से उसके प्रशंसकों का एक अलग समुदाय निर्मित होता है और उसके समर्थकों की एक अलग श्रेणी… ‘निराला की साहित्य साधना’ को यहां याद करते चलिए। दुरभिसंधियां युक्तियां बन जाती हैं, लेकिन एक वैविध्यपूर्ण कवि-व्यक्तित्व खुद को कभी संघर्ष से वंचित नहीं करता। कुंठाएं उसे दबोचने की कोशिश करती हैं, लेकिन वह आत्म-विश्वास को संभाले रखता है। कृ.क. के यहां ये विशेषताएं नजर आती हैं। उन्होंने शिल्प से आक्रांत और शब्द से आडंबर किए बगैर हिंदी कविता में एक असंतुलन उत्पन्न किया है। इस असंतुलन ने तमाम ‘विशिष्ट कवियों’ को असुरक्षा में डाल दिया है। अब स्थिति यह है कि सांस्कृतिक रूप से सत्तावान तंत्र और संरचनाएं कृ.क. की प्रत्येक पंक्ति से भयभीत रहती हैं। इस तंत्र और इन संरचनाओं ने वर्षों तक उनके कवि को खत्म करने के यत्न किए, लेकिन ‘अपने होने को प्रकाशित करने’ के नए माध्यमों के उदय के बाद आज कृ.क. हिंदी के सबसे चर्चित कवियों में से एक होकर उभरे हैं। उन्होंने एक काव्यात्मक न्याय के लिए प्रचलनों के बीतने की प्रतीक्षा की है। उनकी प्रतीक्षा समाप्त नहीं हुई है, लेकिन उन्हें कुछ राहत है क्योंकि मौजूदा हिं.सा. में उनके प्रकट-अप्रकट ‘प्रॉपर प्रशंसक’ अभी हिंदी के किसी भी दूसरे कवि से ज्यादा भासते हैं। उनकी कविता के प्रेमियों की दर्ज-बेदर्ज और लिखित-वाचिक प्रतिक्रियाएं हिंदी कविता संसार में उनके कवि के ‘अन्यत्व’ को पुख्ता करती हैं। उनके इस उदय और उभार ने तमाम चिढ़े हुए, अयोग्य, औसत और जलनशील तत्वों को उनके खिलाफ भी सक्रिय कर दिया है। इसके साथ ही उनके उन शत्रुओं का यहां क्या ही उल्लेख किया जाए जिनका प्रज्ञा-क्षेत्र ही बाधित है और जिनका पूरा व्यक्तित्व और लेखन कृ.क. के शाश्वत किए-धरे के आगे बहुत संक्षिप्त और सस्ता लगता है। कृ.क. जिस शैली और शाला से खुद को जोड़ते हैं, वहां यश के साथ अपयश मुफ्त मिलता है और इसलिए उनके अपयश से ‘यश’ कमाने वालों की भीड़ भी इधर बहुत भारी हो गई है। इस भीड़ में अधिकांश ऐसे हैं जो ‘भीड़’ को ‘भीर’ और ‘भारी’ को ‘भाड़ी’ लिखते हैं।

कभी निराला के लिए नागार्जुन ने लिखा था : ‘‘उसे मरने दिया हमने रह गया छुट कर पवन/ अब भले ही याद में करते रहें सौ-सौ हवन।’’ यह लिखाई बताती है कि हिं.सा. में मरण का बहुत माहात्म्य है, यह ज्ञानरंजन भी बहुत पूर्व में कह चुके हैं। मुझे यह कहना भला तो नहीं लग रहा है, लेकिन मुझे लगता है कि कृ.क. के जीते-जी शायद उन्हें वह प्रतिष्ठा नहीं मिलेगी जिसके वह हकदार हैं। आज हिं.सा. में कृ.क. का मौखिक और कुटिल विरोध उनके लिखित विरोध से कई गुना बढ़ चुका है। उन पर हो रहे आक्रमण कभी निराला पर हुए आक्रमणों की याद दिलाते हैं। इस तरह देखें तो हिंदी कविता और आवारगी की ही नहीं कृ.क. अपमान की परंपरा को भी आगे बढ़ा रहे हैं। इस अपमान में भी आनंद की तलाश उनकी सहज-वृत्ति है। इसके लिए वह जिस सिद्ध ‘विट’ तक जाते हैं, वह एक साथ उनके कुछ मित्रों और कई शत्रुओं का निर्माण करती है। इन शत्रुओं में औसत कवि-कवयित्री, फूहड़ लेखक-लेखिकाएं, मतिमंद और माफिया आलोचक, अर्थपिशाच प्रकाशक, काहिल प्राध्यापक और उनके निकम्मे शोधार्थी, मानसिक रूप से दिवालिए पत्रकार, चालू और हद दर्जे के बेवकूफ टिप्पणीकार, भ्रमरवृत्तिदक्ष दलाल और प्रतिभा-प्रभावशून्य युवक-युवतियां शामिल हैं। इस पर सोचा जाना चाहिए कि आखिर एक कवि इतने सारे मूर्त शत्रुओं के बीच रहकर कैसे काम करता है :

जनवरी बलात्कार के लिये मुफीद महीना है

फरवरी में किसी का भी कत्ल किया जा सकता है

मार्च लड़कियों के घर से भागने का मौसम है

अप्रैल में किया गया अपहरण फलदायक होता है

मई में सामूहिक हत्याकांड अच्छे से किया जा सकता है

जून के महीने में दलितों के घर लहककर जलते हैं

जुलाई में मुसलमानों को मारा जा सकता है

अगस्त में तो बच्चे मरते ही हैं

सितंबर में किसान चाहें तो पेड़ों से लटक सकते हैं

अक्टूबर में डिफाल्टर देश छोड़कर भाग सकते हैं

नवंबर गोरक्षकों के लिए आरक्षित है

वे किसी भी निरपराध नागरिक को सरे-आम मार सकते हैं

दिसंबर में आप आंसू बहा सकते हैं

प्रायश्चित कर सकते हैं

और अगर चाहें तो कृष्ण कल्पित के विरुद्ध विज्ञप्ति जारी कर सकते हैं!

 

[ नया बारामासा ]

 

बुरी खबर और भयावह यथार्थ को कविता में लाने के लिए कृ.क. कविता को किसी अपराध की तरह संभव करते हैं। अन्याय, शोषण और गैर-बराबरी के विरुद्ध लड़ने का उनका तरीका एक ‘नैतिक कवि’ का तरीका नहीं भी लग सकता है। इस लड़ाई में वह ‘राजनीतिक रूप से गलत’ भी नजर आ सकते हैं, लेकिन उनका पक्ष और स्थिति बहुत स्पष्ट है। दरअसल, वह बहुत तत्कालप्रिय ढंग से उम्मीद और नाउम्मीदी में होना नहीं जानते हैं और न ही वह अपने कवि और कविता और कथ्य की शर्त पर सबको खुश रखना चाहते हैं। वह उस प्रतिबद्धता से खुद को अलग करते चलते हैं, जिसका दांव पर कुछ भी नहीं लगा होता :

वह दिन जरूर आएगा जब मुझे मार गिराया जाएगा

 

मेरा जीवन हत्यारों का चूका हुआ निशाना है!

[ चूका हुआ निशाना ]

 

कृ.क. की अब तक प्रकाशित कविता-सृष्टि में यह बात बहुत स्पष्ट नजर आती है कि वह एक साथ साहित्यिक और सामाजिक कवि हैं। इस दर्जा साहित्यिक कवि कि समाज उन्हें पढ़-सुनकर बहुत सहजता से साहित्यिक हो सकता है। यह एक जनकवि के होने की अलामत है। एक जनकवि खुद को और जन के दुख को सुनाना जानता है। इस जिक्र में यह कहने में कोई हर्ज नहीं है कि मौजूदा दौर में सही मायनों में हिंदी में जनकवि होने की विशेषता सिर्फ कृ.क. में ही दृश्य होती है। यह हमारी भाषा और उसमें कविता का दुर्भाग्य है कि कृ.क. की काव्य-प्रतिभा के साथ-साथ उनकी इस विशेषता के साथ भी न्याय नहीं हुआ। उनकी इस क्षमता को पहचानकर भी नजरअंदाज किया गया। बौद्धिकों और जनता दोनों को ही आकर्षित करने वाली कृ.क. की कविताओं में वे सारे अवयव हैं जो एक जनकवि का निर्माण करते हैं। हिंदी की औसतताओं के कौआरोर में उनकी कविता महज किताबी नहीं है। वह यात्राएं करना जानती है, खुद को गाना और कंठ में बसना भी। यह कविता जन को संस्कारित करने की काबिलियत रखती है, लेकिन इसे प्रशंसक मिलते हैं, जन नहीं मिलते, पाठक मिलते हैं, वे आलोचक नहीं मिलते जो इस कविता को जन के बीच प्रतिष्ठित कर सकें। यहां सार्त्र को याद कीजिए जिन्होंने कहा था कि मेरे पास पाठक हैं, लेकिन मुझे जनता चाहिए।

लड़कपन से ही कवि-कर्म में संलग्न कृ.क. के कवि के निर्माण में तुलसी, सूर, मीरा, कबीर की तरह ही मीर, ग़ालिब, ज़ौक़, नज़ीर और हाफ़िज़, बेदिल, शेखसादी और कालिदास, भवभूति, भर्तृहरि और खुसरो का योगदान है। यह स्वयं कवि ने स्वीकारा है और यह भी कि उसकी हिंदी में उर्दू सहज रूप से विद्यमान रहती है। कृ.क. हिंदी नहीं हिंदवी का कवि कहलाना पसंद करते हैं। हिंदवी वह है जिसमें मीर लिखते थे।

आलोचना और प्रशंसा दोनों से ही अब तक आहत नहीं हुए कृ.क. वरिष्ठों में सबसे युवा हैं और युवाओं में सबसे वरिष्ठ, स्वीकृतों में वह सबसे बहिष्कृत हैं और बहिष्कृतों में सबसे स्वीकृत। वह मुक्त वैभव में छंद हैं और छंद वैभव में मुक्त। जहां सब मुखर हैं, वहां वह चुप हैं और जहां सब चुप हैं, वहां वह मुखर। वह कवियों की जमीन जानते हैं और जमीन की कविता भी। भुला दिए गए शब्दों को वे जमा करते हैं और घिसे हुए शब्दों को हटाते रहते हैं। उनके शब्दों में दृश्य हैं, लेकिन फिल्म बनाने की एक धुंधली-सी इच्छा बहुत बार मन में जगने के बावजूद वह आज तक एक भी फिल्म नहीं बना पाए हैं। बचपन से लेकर अब तक के बहुत सारे ऐसे दृश्य उनकी आंखों के सामने से गुजरे हैं, जब उन्हें लगा है कि एक फिल्म बनानी चाहिए। कस्बे के घर के आंगन में गोबर से लिपे हुए चूल्हे को फूंक मारकर सुलगाती हुई दादी की आंखों से निकलते हुए आंसू, अपने लंबे कानों को जोर-जोर से हिलाकर तितर-बितर करती हुई काले छबकों वाली बकरी और चटख-चटख करती हुई लकड़ियां— यह सब देखकर पहली बार उन्हें लगा था कि केवल दृश्यों के माध्यम से भी कुछ रचा जा सकता है। यह बहुत पुरानी बात है, जब उनके पिता होर्डिंग्स बनाया करते थे और उनसे रंगों की पुताई करवाते थे। चाक्षुष सौंदर्य और मानवीय क्रियाओं से भरे-पूरे ऐसे न जाने कितने दृश्यों का एक अंतहीन और अटूट सिलसिला यहां तक चला आया है। कुछ रचने की इस आरंभिक अकुलाहट ने ही उन्हें कवि-कर्म में प्रवृत्त किया। यहां पूर्व में दर्ज उनके रियाज, काव्य-प्रवेश और काव्य-विकास को याद करें तो उनकी कविताएं सिनेमा से जुड़े उनके स्वप्न और उनकी आकांक्षा का प्रतिफलन लगती हैं :

कभी-कभी यह सोचकर घबरा जाता हूं कि अचानक फिल्म बनाने की सुविधाएं पा गया तो क्या करूंगा? फिल्म बनाने से पहले पांच-दस हजार फुट कच्ची फिल्म बिगाड़नी चाहिए। अब तक बिगाड़ देनी चाहिए थी। पहली बार में पांच-सौ फुट में से साढ़े चार सौ फुट फिल्म सही निकाल पाना कितना मुश्किल होगा। लेकिन अगर ऐसा हुआ भी तो क्या इस बात का डर, तनाव और एक किस्म का निजी आतंक भी मेरी रचनात्मकता का हिस्सा नहीं रहेगा? इस ‘अभाव’ को भी तो रचनात्मकता में बदला जा सकता है।

[ पसरी हुए रेत पर ]

अभाव को रचनात्मकता में बदलती हुई कृ.क. की कवि-छवि में कुछ पुराने शब्द, कुछ भावनाएं और कुछ अनगढ़पन सदा नजर आता रहा है। कमजोर जिंदगी के बयान छुपाने की कोशिश उनकी कविता ने अब तक नहीं की है :

नई दिल्ली के कवियो!

चाहे जितनी कमजोर दिखे मैं अपनी कविता नहीं बदलूंगा

 

[ दिल्ली के कवि ]

 

ऊपर उद्धृत पंक्तियां साल 1987 में हुई कृ.क. की एक कविता से हैं। वह बार-बार दिल्ली में आते और बार-बार दिल्ली से जाते रहे हैं। साल 1988 में हुई उनकी एक और कविता में इस बीच के ब्यौरे कुछ यों सामने आते हैं :

कुछ कवि हो गए मशहूर कुछ काल-कवलित

कुछ ने ढूंढ़ लिए दूसरे धंधे मसलन शेयर बाजार

 

कुछ डूबे हुए हैं प्रेम में कुछ घृणा में

 

कुछ ने ले लिया संन्यास कुछ ने गाड़ी

 

कुछ लिखने लगे कहानी कुछ फलादेश

 

इनके बीच एक कवि है जिसे अभी याद हैं

पिछली लड़ाई में मारे गए साथियों के नाम

उसके पास अभी है एक नक्शा!

[ नक्शा ]

‘नक्शा’ आलोकधन्वा को समर्पित है, लेकिन इसमें कृ.क. का सफर भी साफ नजर आता है। इस नजर आने में बहुत दूर-दूर से चलकर दिल्ली आती हुई रेलगाड़ियां हैं जिनमें कवि हैं — दुनिया की सबसे पुरानी कला के मजदूर — अपने अभावों, पुकारों और तकलीफों के साथ। वे ऋतु कोई भी हो शोक में डूबे हुए हैं — आंसुओं को रोकने की कला सीखते हुए — देश की अलग-अलग दिशाओं से आए हुए वे दिल्ली की अलग-अलग दिशाओं में भटक रहे हैं, उन्हें कोई काम नहीं मिल रहा है :

वे जिंदा रहने को आते हैं दिल्ली और मारे जाते हैं

भूख से बेकारी से उपेक्षा से मरते हैं वे

[ कवियों की कहानी ]

एक कवि गोरख पांडे की याद में लिखी गई यह ‘कवियों की कहानी’ एक दूसरे कवि कृ.क. ने लिखी है यह सोचकर :

होती है हर एक कवि की अपनी एक कहानी

जिसे लिखता है एक दूसरा कवि

 

इस साहित्यिक और बौद्धिक वातावरण को बहुत करीब से देखते हुए कृ.क. की और हिंदी की उम्र में धीमे-धीमे चलते हुए वह वक्त नजदीक आ गया, जब उन्होंने इस वातावरण के विरोधी कवि के रूप अपनी काव्य-भाषा और शैली के लिए नए आयाम पाने का संघर्ष प्रारंभ किया। पूरब की पूरी कविता और काव्य-शास्त्र की पूरी परंपरा में आवाजाही और उससे मुठभेड़ करते हुए कृ.क. की उम्र में वे वर्ष भी आए, जब वह समकालीन हिंदी कविता के लिए बिल्कुल बेगाने हो गए :

इस जरीगोटेदार भाषा के बांदी समय में

कौन समझेगा कि मुझ पगलैट को तो

अपने ही खोजे शब्दों के बदरंग चिथड़े प्यारे हैं

 

[ शब्दों के चिथड़े ]

कृ.क. ने मध्यकाल की मीरा की कविता और जीवन को केंद्र में रखते हुए ‘कोई अछूता सबद’ में हिंदी में लोकप्रिय हुए तत्कालीन स्त्री-विमर्श को समझने की कोशिश की :

तुम जो पहनाओगे पहनूंगी

जो खिलाओगे खाऊंगी

तुम जहां कहोगे वहां बैठ जाऊंगी

कहोगे तो बिक जाऊंगी बाजार में

[ ढलती रात में ]

संसार एक नई शताब्दी से परिचित हो चुका था, लेकिन हिंदी कविता संसार कृ.क. से अब तलक एक अपरिचित की तरह बर्ताव कर रहा था। उनकी आवारगी बढ़ती जा रही थी और आवारा पंक्तियां और सूक्तियां उन पर आयद हो रही थीं और वह उन्हें इस उम्मीद में प्रकाशित करवाते जा रहे थे कि शायद वे एक रोज मानवता के काम आएंगी :

कभी प्रकाश में नहीं आता शराबी

 

अंधेरे में धीरे-धीरे विलीन हो जाता है

[ एक शराबी की सूक्तियां, 35 ]

 

कृ.क. की एक कहानी ‘शराबघर’ के नायक की मरने की इच्छा शराब पीने के बाद अधिक प्रबल हो उठती है। वह एक रोज अपनी मृत्यु संबंधी सारी कविताओं को एक डायरी में उतारता है और डायरी के पहले पृष्ठ पर लिखता है :

‘मैं मरना चाहता हूं।’

 

लेकिन वह मरा नहीं, वह आज तक शराबघरों में भटक रहा है। उसकी सूक्तियों को जानने वालों की संख्या बढ़ती चली जा रही है, लेकिन अभी भी उसे जानने वाले बहुत कम हैं।

‘एक शराबी की सूक्तियां’ को कृ.क. ने अपना ‘मुक्तिप्रसंग’ कहा है और राजकमल चौधरी ने ‘मुक्तिप्रसंग’ को अपना वर्तमान :

‘‘…मैं अपने अतीत में राजकमल चौधरी नहीं था। भविष्य में यह प्रश्नवाचक व्यक्ति और इस व्यक्ति की उत्तर-क्रियाएं बने रहना मेरे लिए संभव नहीं है। क्योंकि, मैं केवल अपने वर्तमान में जीवित रहता हूं। …अतएव, ‘मुक्तिप्रसंग’ मेरा वर्तमान है। …मृत्यु की सहज स्वीकृति से देह की सीमाओं, संगतियों और अनिवार्यताओं से मुक्त हुआ जा सकता है। …ऑपरेशन थिएटर की सफेद टेबल पर संज्ञाहीन होते हुए, मैंने ऐसा अनुभव किया है। मैंने अनुभव किया है कि स्वयं को और अपने अहं को मुक्त किया जा सकता है। …इस अनुभव के साथ ही, दो समानधर्मा शब्द जिजीविषा और मुमुक्षा इस कविता के मूलगत कारण हैं। …सती-वर्तमान के अग्निजर्जर शव को अपने कंधों पर, मैं शिव की तरह धारण करता हूं। मैं इस शव के गर्भ में हूं, और यह शव मेरे कंधों पर है। इसकी विकृति, वीभत्सता और दुर्गंधियों में मुझे जीवित रहना ही पड़ेगा। जीवित ही नहीं, मुक्त और स्वाधीन भी रहना होगा।’’

 

राजकमल चौधरी को यहां उद्धृत करने की जरूरत इसलिए महसूस हुई ताकि यह कहा जा सके कि कृ.क. की प्रत्येक प्रकाशित कृति कृ.क. का ‘मुक्तिप्रसंग’ ही प्रतीत होती है। उनकी प्रत्येक कृति उनकी पूर्व और आगामी कृतियों से मुक्त और स्वाधीन है। बहरहाल, लोक के अवलोकन और अर्थ के आरोह-अवरोह और मिजाजे-सुखन की अच्छी तरह शिनाख्त करने में व्यस्त उनकी आवारगी के नए-नए रंग एक के बाद एक हिंदी कविता संसार के मुंह पर खुलने लगे। उनकी कविता का वह बंद दरवाजा जिसे हिंदी साहित्य के समकालीन बौद्धिक वातावरण में कोई खटखटा नहीं रहा था, उन्होंने उसे खुद ही खोल दिया और बाद इसके इस वातावरण में बेचैनियां, सरगोशियां, गलतफहमियां फलने-फूलने-फैलने लगीं। बेइंसाफी के यथार्थ में कृ.क. बहुत बेपरवाह नजर आए और उनकी कविता पूर्व-अपूर्व कवियों के नक्षत्र-मंडल को तहस-नहस करने के इरादे से परंपरा में कुछ इस प्रकार धंसी कि सूक्ति, संदेश, अफवाह, अधूरा वाक्य, चेतावनी, धमकी, शास्त्र, इतिहास, कथा और नामालूम क्या-क्या हो गई :

 

विलग होते ही

बिखर जाएगी कलाकृति!

 

[ एक शराबी की सूक्तियां, 78 ]

नगर ढिंढोरा पीटता फिरता हूं हर राह

रोज रात को नौ बजे करता हूं आगाह

 

[ बाग़-ए-बेदिल, पृष्ठ-41 ]

 

कल्पितजी को हो गया काव्य-शास्त्र से प्यार

देखो क्या अंजाम हो भवसागर या पार!   

 

[ कविता-रहस्य, 24:6 ]

 

मैं अपने दोनों हाथ ऊपर उठाकर एक बार फिर कहता हूं :

यह महादेश चल नहीं सकता

 

[ हिंदनामा : एक महादेश का महाकाव्य, 52 ]

…यह कोई शिगूफा नहीं मेरा शिकस्ता दिल ही है जो इतिहास की अब तक की कारगुजारियों पर शर्मसार है जिसका हिंदी अर्थ लज्जित बताया गया है जिसके लिए मैं शर्मिंदा हूं और इसके लिए फिर लज्जित होता हूं कि मुझे अब तक क्यों नहीं पता था कि मांस के शोरबे को संस्कृत में यूष कहा जाता है शोरिश विप्लव होता है 1857 जैसा धूल उड़ाता हुआ एक कोलाहल और इस समय मैं जो उर्दू-हिंदी शब्दकोश पढ़ रहा हूं जिसके सारे शब्द कुचले और सताए हुए लोगों की तरह जीवित हैं…

 

[ रेख़ते के बीज : उर्दू-हिंदी शब्दकोश पर एक लंबा पर अधूरा वाक्य ]

कविता लिखना अपराध है

किसी खास मकसद के लिए किया गया जुर्म


कविता पुरस्कृत होने की कला नहीं सजायाफ्ता होने की छटपटाहट है

जो सभागारों में सिसक रहे हैं वे कवि नहीं हैं

कवि वे हैं जो रूमाल से अपना चेहरा छिपाए संसार से छुपते फिरते हैं


[ कविता के विरुद्ध ]

कृ.क. की कविता-सृष्टि से प्रस्तुत इन उद्धरणों के उजाले में यहां यह भी ध्यान देने योग्य है कि काव्य-स्फीतियों और विस्फोटों के आगे नतमस्तक हिं.सा. की मुख्यधारा की कविता में जिस वस्तु को कविता-संग्रह कहकर पुकारा जाता है, ऐसी एक भी वस्तु साल 1990 के बाद से कृ.क. की अब तक सामने नहीं आई है। लगभग तीन-साढ़े तीन दशक प्राचीन कृ.क. की कविता-सृष्टि में कविता-संग्रह इन पंक्तियों के लिखे जाने तक सिर्फ एक ही है— ‘बढ़ई का बेटा’। इस दरमियान उन्होंने अपनी विवादास्पदता के अंतरालों में ‘रेख़ते के बीज’, ‘साइकिल की कहानी’, ‘अकेला नहीं सोया’, ‘कविता के विरुद्ध’, ‘खाली पोस्टकार्ड’, ‘मीठा प्याज’, ‘वापस जाने वाली रेलगाड़ी’, ‘राख उड़ाने वाली दिशा में’, ‘वरिष्ठ कवियो’, ‘अपना नाप’, ‘पानी’, ‘एक कवि की आत्मकथा’, ‘नया बारामासा’, ‘एक अधूरा उपन्यास’, ‘अफीम का पानी’, ‘प्रसिद्ध’, ‘खून के धब्बे’, ‘नया प्रेम’, ‘चूका हुआ निशाना’ जैसी चर्चित पर असंकलित कविताएं लिखने के अलावा जो कुछ भी लिखा है — वह संग्रह के लिहाज से नहीं — किताब की तरह लिखा है। यह गौरतलब है कि कृ.क. की किताबें एक जिल्द में प्रकाशित होने से पूर्व ही प्रकाशित हो रहती हैं। उनकी कविताएं उनकी तरह ही बिखरी हुई हैं। वे उन सारी जगहों पर बिखर गई हैं, जहां वे प्रकाशित हो सकती हैं। एक विकास-क्रम में बिखरना और निखरना… कृ.क. की कविता-सृष्टि के दो संयुक्त-तत्व हैं। समय से और समकालीनता से सताए हुए कृ.क. इस लोक के तमाम स्मृत-विस्मृत कवियों के कुल के हैं। आवारापन में वह बुद्ध के कुल के हैं। फक्कड़पन में वह कबीर और मीरा के कुल हैं। संस्कृत में वह भर्तृहरि, बाणभट्ट और राजशेखर के कुल के हैं। उर्दू में वह मजाज़ और मंटो के कुल के हैं। हिंदी में वह निराला, उग्र, भुवनेश्वर और राजकमल चौधरी के कुल के हैं।

कृ.क. की कविता-सृष्टि का काव्य-पुरुष प्रचलन के विपर्यय में और प्रयोग के पक्ष में सतत सक्रिय, रचनात्मक, सांसारिक और विवादात्मक रहा है। उनके काव्य-पुरुष के इस संघर्ष को समझने के लिए ‘बाग़-ए-बेदिल’ की स्थापना बहुत काम आ सकती है। यह स्थापना उनके लेखे उनकी एक लिखी जा रही पुस्तक ‘आवारगी का काव्यशास्त्र’ का प्रथम अध्याय है। यह अध्याय एक रचयिता की आवारगी का अनूठा विश्लेषण है। राजशेखर की ‘काव्य-मीमांसा’ के एक श्लोक के आश्रय से यहां स्पष्ट होता है कि आवारगी से जांघें दृढ़ हो जाती हैं। आत्मा भी मजबूत और फलग्राही हो जाती है और उसके सारे पाप पथ पर ही थक कर नष्ट हो जाते हैं। दो हजार पन्नों की सामग्री को संपादित करने के बाद पांच सौ बारह पन्नों में समाए ‘बाग़-ए-बेदिल’ के जिल्दबंद होने से पहले इस किताब के कुछ और नाम भी थे — ‘समकालीन संदेश रासक’, ‘शैतान के श्लोक’ और ‘पार्थ और सार्त्र’ — लेकिन पक्की स्याही से छपने के बाद अब इसका सिर्फ एक नाम है— ‘बाग़-ए-बेदिल’। समकालीन हिं.सा. की व्यावहारिक राजनीति में एक अज्ञात-अनाम-अजनबी कवि की तरह व्यवहृत कृ.क. ने इस किताब को यह सोचकर शाया करवाया कि यूरोपीय, मुगल, गॉथिक और आधुनिक शिल्प की समकालीन हिंदी कविता की इमारतों के बीच, ‘बाग़-ए-बेदिल’ के ये खंडहर शायद बुरे नहीं लगेंगे :

‘कद्र जैसी मेरे शे’रों की अमीरों में हुई,

वैसी ही उनकी भी होगी मेरे दीवान के बीच!’

 

इसी तरह ‘बाग़-ए-बेदिल’ में भी आपको

नकली कवियों

मंदबुद्धि संपादकों

डॉनों

मठाधीशों

गॉडफादरों इत्यादि

कुलीन कातिलों का चेहरा दिखाई पड़ेगा पार्थ!

 

पढ़ते

सुनते

देखते रहिएगा—

 

कल्ब-ए-कबीर और कला कातिलों की जंग का

यह हैरतअंगेज जासूसी काव्य!

 

[ कला कातिल-2 ]

‘बाग़-ए-बेदिल’ हिंदी साहित्य के एक विशेष कालखंड का व्यंजनात्मक इतिहास है। विलुप्त काव्य-पंक्तियों, धुनों, लयों, छंदों का पुनर्वास करती हुई यह कृति एक वाचिक वैभव का लिखित पाठ है। आक्रामकता और आत्ममुग्धता से लबालब ‘बाग़-ए-बेदिल’ के बारे में समादृत कवि अरुण कमल का यह कथन उद्धृत करने योग्य है : ‘‘कौन-सा ऐसा समकालीन है जिसके तरकश में इतने छंद हैं, इतने पुष्प-बाण? आवाज और स्वर के इतने घुमाव, इतने घूर्ण, इतने भंवर, इतनी रंगभरी अनुकृतियां हैं। कई बार तो इनमें से कुछ पदों को पढ़कर मैं ढूंढ़ता हुआ क्षेमेंद्र या राजशेखर या मीर या शाद तक पहुंचा। ये कविताएं हमारे अपने ही पते हैं खोए हुए, उन घरों के पते, जहां हम पिछली सांसें छोड़ आए हैं। इन्हें पढ़कर लगता है कि हिंदी कवि के पास खुद अपनी कितनी बड़ी और चौड़े पाट वाली परंपरा है।’’

इस सबके बावजूद यह हाल है कि क्या कहा जाए… हिंदी संसार में यों लगता है जैसे शत्रुओं की तो छोड़िए कोई शुभचिंतक मित्र भी पूरा का पूरा कृ.क. का अपना नहीं। कृ.क. का जिक्र आने पर वे या तो चुप रहते हैं या आधे दिल से विहंस कर पैरवी करते हैं या बात बदलने का यत्न। एक अक्षय परंपरा में आवारा भटकने के लिए कृ.क. अकेले कर दिए गए हैं, लेकिन वह इस तरह के पहले और अकेले कवि नहीं हैं। उन जैसे कवियों को इसलिए एक और मन मिलता है— कभी न थकने वाला। मन जो हवाओं-सा तेज नहीं, लेकिन जानता है कि उसे उड़ना ही है— एक जारी कवि-समय में अपने काव्य-पथ और समानधर्माओं की तलाश में। मैं इस आलोचना को यहां खत्म नहीं कर रहा हूं, बस कुछ वक्त के लिए रोक रहा हूं, यह सोचकर :

समझदार था मूरख भी था

दीवाना भी वह किंचित था

 

अश्रु आंख में और हृदय में

युगों-युगों का दुख संचित था

उसकी कही हुई बातों में

आखर कम अरथ अमित था

 

जाने दो वह कवि कल्पित था!    

***

 

संदर्भ :

प्रस्तुत आलेख में कृष्ण कल्पित की अब तक प्रकाशित कविता और कविता से संबंधित छह किताबों — राजस्थान साहित्य अकादेमी से प्रकाशित ‘भीड़ से गुजरते हुए’ (1980), रचना प्रकाशन, जयपुर से प्रकाशित ‘बढ़ई का बेटा’ (1990), कलमकार प्रकाशन, जयपुर से प्रकाशित ‘कोई अछूता सबद’ (2003), अंतिका प्रकाशन, गाजियाबाद से प्रकाशित ‘बाग़-ए-बेदिल’ (2013), दखल प्रकाशन, दिल्ली से प्रकाशित ‘एक शराबी की सूक्तियां’ (2015) और बोधि प्रकाशन, जयपुर से प्रकाशित ‘कविता-रहस्य’ (2015) — को आधार बनाया गया है। इसके अतिरिक्त जिल्दबंद होने से पूर्व ही सोशल नेटवर्किंग साइट ‘फेसबुक’ पर स्वयं कवि के द्वारा ही प्रकाशित ‘हिंदनामा : एक महादेश का महाकाव्य’ को भी पाठ में लिया गया है। कवि की फेसबुक टाइमलाइन के साथ इंटरनेट की दुनिया में यत्र-तत्र बिखरी कविताओं को भी प्रयोग में लिया गया है। ‘जनसत्ता’, ‘संबोधन’, ‘जलसा’, ‘पाखी’ और ‘इंडिया टुडे साहित्य वार्षिकी’ जैसे पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित कवि के काम और कविताओं पर भी नजर मारी गई है और टेलीविजन और सिनेमा को केंद्र में रखकर लिखे गए लेखों-टिप्पणियों की कलमकार प्रकाशन, जयपुर से प्रकाशित किताब ‘छोटा परदा बड़ा परदा’ पर भी। निराला के लिए नागार्जुन द्वारा लिखी गई पंक्तियां यात्री प्रकाशन से प्रकाशित निराला पर केंद्रित नागार्जुन की किताब ‘एक व्यक्ति : एक युग’ (1992) के समर्पण-पृष्ठ से हैं। राजकमल चौधरी का कथ्य देवशंकर नवीन के संपादन में वाणी प्रकाशन से आए उनकी कविताओं के एक चयन ‘ऑडिट रिपोर्ट’ (2006) में शामिल लंबी कविता ‘मुक्तिप्रसंग’ से पहले दी गई टिप्पणी से लिया गया है। अरुण कमल को उद्धृत करने के लिए ‘बाग़-ए-बेदिल’ के आखिरी पन्ने को धैर्य से पढ़ा गया है। प्रस्तुत आलेख की शुरुआत और आखिरी अनुच्छेद पर विष्णु खरे की कविता ‘कूकर’ की छायाएं हैं, कहीं-कहीं इस कविता की कुछ पंक्तियां जस की तस, कहीं कुछ बदलकर ले ली गई हैं। इसके लिए विष्णु खरे के प्रति आलेखकार कृतज्ञ है।

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साभार: पहल 110

 

आभासी पटल (सोशल साइट्स) के बाहर ‘कुंठित मन’ की ‘निर्लज्ज अभिव्यक्तियाँ’ कितनी अमानवीय होती हैं, वह जानी-पहचानी है. अविनाश के पास ‘कूटनीति’ की भाषा नहीं है, जिसका सबसे सजग इस्तेमाल आभासी लोक-वृत्त के दायरे में किया जाता है. जिस दिन उसके पास यह आ जायेगी, वह ख़त्म हो जाएगा.  यह आभासी-व्यवहार और कुछ नहीं, बल्कि हाल-चाल, दुआ-सलाम की भाषा को पाने का ही करतब है. यह भाषा आदमी को दलाल, अवसरवादी, व्यवसायी बना सकती है लेकिन रचनाकार नहीं. यह ‘सर्वधर्म-समभाव’ की सबसे उपजाऊ जमीन है. जहाँ भाषा गूगल-ट्रांसलेट हो जाती है. अविनाश से संपर्क -स्थापित हेतु  darasaldelhi@gmail.com का इस्तेमाल कर सकते हैं.

चेतावनी और प्रश्नपत्र : निकानोर पार्रा

नेरुदा एक कवि के रूप में  स्थापित हो चुके थे और मेधा से लैस भी थे, तभी उन्हें भान हुआ कि पाठक-श्रोता के रूप में उन्हें एक बड़ी जनता मिल सकती है, इसलिए वे कम्युनिस्ट हो गए. कम्युनिस्ट तो वे हो गए लेकिन उनसे कविता छूट गयी, इसके बावजूद वे देश-दुनिया में लोकप्रिय हो उठे. उन्होंने वही किया, जो वे चाहते थे. किन्तु मैं कहना चाहता हूँ कि बाज़ मक्खियों से नहीं लड़ता है. अपनी प्रसिद्धि के चरम पर जब बाज़ मक्खियों के साथ नाचना शुरू कर दे तो वह विदूषक बन जाता है. वे स्पीलबर्ग जैसे बड़े व्यापारी बन गए! सिनेमा के एक व्यक्तित्व के रूप में स्पीलबर्ग बड़े ही प्रतिभावान आदमी थे, लेकिन क्या हुआ? बहुत, बहुत बड़ा व्यापार. अब वह एक बाज़ है जो मक्खियों के साथ नाचता है.

अब निकानोर पार्रा मेरा मास्टर है. जब नेरुदा एक बड़े कवि और एक रोमांटिक कम्युनिस्ट थे, तब वह एक अकवि (एंटी पोएट्री) था. लोगों को उसने सच्ची कविताओं से वाबस्ता कराया, वह सचमुच में एक मजेदार आदमी था. वह मेरा मास्टर था, मैं उसे एक कवि की तरह प्यार देता था. जब मैं ‘एंडलेस पोएट्री’ शूट कर रहा था तब वे सौ साल के हो चुके थे. मैं उनसे मिलने गया, वे सौ साल के हैं, सौ साल के. प्रखर मेधा से लैस आज भी वे जिंदा हैं, और हमेशा की तरह कुछ कठिनाइयों के बीच अपना काम कर रहे हैं. वे एक इंसान हैं, निपट इंसान, जिनसे मैंने बात की है. अपनी फिल्म में मैंने खुद भी सौ साल के एक बुड्ढे की भूमिका की है. मैं उन्हें देखने गया और कहा, “एक सौ साल का आदमी मुझसे क्या कहना चाहेगा?” वे बोले, “बूढ़ा होना कोई अपमान नहीं हैं. तुम अपने पैसे खोते हो, अपनी यौवन-महिमा के गुणगान से निजात पाते हो; धन-यौन-लिप्सा से मुक्त हो जाते हो. इस तरह तुम सबकुछ खोकर फतिंगे में तब्दील हो जाते हो.”   # अलेखान्द्रो  जोदरोवस्की

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Snap Shot – Persona (1966)

 

चेतावनी

By निकानोर पार्रा

अगले आदेश तक 

आग लगने पर

लिफ्ट का नहीं

सीढ़ियों का इस्तेमाल करें

अगले आदेश तक

ट्रेन में धुम्रपान न करें
गंदगी न फैलाएं

शौच न करें

रेडियो न सुनें

अगले आदेश तक

हर उपयोग के बाद

टॉयलेट को फ्लश करें

ट्रेन जब प्लेटफ़ॉर्म पर हो

तब शौच न करें

बगल के सहयात्री से लेकर

धार्मिक सैनिकों तक के प्रति अपनी राय रखें

जैसे, दुनिया के मजदूरों एक हो,

हमारे पास खोने को कुछ नहीं है (धत्)

हमारा जीवन तो परम पिता परमेश्वर, ईसा मसीह
और पवित्र आत्मा का महिमागान है आदि

अगले आदेश तक

इंसान एक रचयिता की संपन्न कृति है (धत्),

इंसानों के कुछ अपरिहार्य अधिकार हैं

उनमें से कुछ इस प्रकार हैं:

जीने की आज़ादी और खुश रहने के तरीके की खोज

वैसे ही जैसे दो जोड़ दो चार होता है

यह अंतिम है लेकिन कम नहीं

इन सच्चाइयों को वैसे भी

हम हमेशा से स्वयंसिद्ध मानते आये हैं

 

प्रश्नपत्र

अकवि क्या है:

वह, जो ताबूत और अस्थि-कलश की दलाली करता है?

एक जनरल, जो खुद के बारे में ही निश्चित नहीं है?

एक पादरी, जिसे किसी चीज पर  आस्था नहीं है?

एक सैलानी, जिसके लिए हर चीज अजीब है; वृद्धावस्था और मृत्यु भी?

एक वक्ता, जिस पर आप विश्वास नहीं कर सकते?

खड़ी-चट्टान की कोर पर खड़ी एक नर्तकी ?

एक आत्ममुग्ध, जो हर किसी से प्यार करता है?

एक जोकर, जो गाल बजाता है

और बेवज़ह यूँ ही बुरा बनता है ?

एक कवि जो कुर्सी पर सोता है?

आधुनिक समय का एक कीमियागर?

एक आरामतलब क्रांतिकारी?

एक पेटी-बुर्जुआ?

एक जालसाज?

एक ईश्वर?

एक मासूम?

सैंटियागो, चिली का एक किसान?

सही उत्तर को रेखांकित करें.

अकविता क्या है:

चाय की प्याली में एक तूफ़ान?

चट्टान पर बर्फ का एक धब्बा?

मानव-मल से ऊपर तक भरा एक पतीला,

जैसा कि फादर साल्वेतियेरा मानता है?

एक आइना, जो झूठ नहीं बोलता?

लेखक-संगठन के अध्यक्ष के गाल पर पड़ा एक तमाचा?

(ईश्वर उनके आत्मा की रक्षा करे!)

युवा कवियों को एक चेतावनी?

जेट-चालित एक ताबूत?

एक ताबूत, जो वायुमंडलीय दायरे से बाहर परिक्रमा करता है?

एक ताबूत, जो कि केरोसिन से चलता है?

एक शवदाह-गृह, जहाँ कोई शव नहीं है?

सही उत्तर के सामने X चिन्हित करें.

उदय शंकर द्वारा अनुदित ये कवितायें  क्रमशः मिलर विलियम्स और  टी विग्नेसन  के अंग्रेजी  अनुवाद पर आधृत हैं.

Labour of Love, an Unpaid Internship: Dhiraj K. Nite

A popular perception of love, courtship and dating regardsits existence as an elemental feature of the human world since time immemorial.The book under discussion traces the roots of dating and its evolution in American society from the early decades of the twentieth-century up to the present. #Author

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Book Cover & Author

Sensual ,Emotional and Material Substance of Love

By Dhiraj K. Nite

‘What is love?’ has received commentaries in several scholarly works. It is an intimate feeling and relationship between couples is what the popular opinion makes it look like. Weigel interrogates the naturalness that characterises this popular belief and proposes a social constructivist viewpoint. She maintains that love is ‘opening and merging of your own life with the lives of others. It is a process of change which involves acts of care you extend to whomever you choose for however long your relationships lasts (pp. 262-6).’ Hence, it is a ‘labour of love’ at one and the same time. Her viewpoint rejects Sigmund Freud’s (1915) idea that love is a derivate of sexual longing, that is, the function of libido (innate sexual force). It remains aloof from Erich Fromm’s (1956) conceptualisation that love derives from the need to return to the mother from whom we have been shorn off by birth, and Margaret Mahler’s (1975) belief that love represents a rapprochement with the mother from whom we have recently learned to separate. Her notion of ‘labour of love’ extrapolates to the understanding of love offered by a psychologist, Donald Nathanson, in 1992. Love is an expression of the combination of innate ‘attachment affect’ on one side and ‘inter-affectivity’ (interpersonal experience and involvement) on the other, maintains Nathanson. Weigel’s work lays down a history of inter-affectivity, with her approach of dialectical materialism.

The crucial components of love between couples are care/emotional involvement as well as physical intimacy. This book suggests that finding love by dating developed from the turn of the twentieth-century and the early decades of the twentieth-century (p. 5). Soon, dating became the most precious form of ‘labour of love’ – an ‘unpaid internship’. It slowly replaced the family and community controlled courtship, called chaperoned courtship. The old ‘calling’ ritual of courtship made men into agents in pursuit, while women the object of desire. Dating undid the clear lines between the world of men and women and took courtship out of the private spheres. It transformed control over the process from the older generation to the younger ones, from groups to the individual. It was a product of urban society, It was a product of urban society, the women performing wage-labour, and a sexual revolt by the educated youth.

The increase in the number of persons passing out of high schools from the 1910s and colleges from the 1930s dramatically altered the ritual of dating. It now began at early age. The moralist school authority merely regulated and oversaw the code of dating culture. The right to freedom of choice was asserted within the economy of consumerism on one side and the civil right movements on the other in the 1960s-70s. These developments and assertion of freedom obliterated the shyness associated with physical intimacy with someone before marriage. Teenage sex soared from the 1950s.

The shift from calling ritual of courtship to public dating was never smooth. The moralist regarded it as obscene, licentious and depraved. The police sought to subdue the young women and men, who explored dating and were declared adrift; the moral policing against daters currently seen in India just reminds us what the rebellious youth in dating encountered a century ago in the USA. Dating developed as emotional labour and became eroticised as well as commodified from the 1920s. Bars, pubs, restaurants and dance halls were the early social media and platforms brought into prominence by the phenomenon of dating. The book, however, falls short of a full-bodied exploration of what accounted for a welcome change in the perception the moralists of public dating.

Dating parted away with courtship towards the latter part of the twentieth-century. The sexual revolution fully succeeded against the prostitution-anxious moralist by the 1960s. Now it was presumed to be a right to love without outside interference. This generation described that no desire could be unnatural. They viewed it as legitimate to have no rules in this regard. However, many of them – barring the hippies – also created aculture of steadies, a kind of serial, monogamous intimacy. The popular perception of the growth in promiscuity is unfounded. Steadies were guided by their concerns for social security against the backdrop of economic instability in the 1930s, subsequent turbulence and the shortage of men caused by the World War II, fears of miscegenation and the threat of apocalyptic nuclear war in the 1950s-60s. Steadies are also credited with having invented the breakup. Most steadies would let relationships run their course. Then they would break up. The dating script gave way to partying and hanging out in large mixed age settings. The emotional aspect of intimacy drastically waned: Previously, a series of daters could lead to physical intimacy and emotional commitment. Now the order was reversed, and sexual activity came first and feeling was emotionally emptied. The reader is left to speculate the reasons responsible for this critical, though intangible, change.

The dating ritual, at last, gave way to the hook-up culture of the late twentieth-century. Love and physical intimacy parted away. Dating, if at all, and intimacy have now been treated as forms of recreation. The new technology of birth control, such as condom and pill has made possible to treat sex as harmless fun. Methods of contraception such as the revolutionary ‘pill’ when it appeared in the 1960s, made it possible to disentangle the effects of unprotected sexual intercourse from its weighty consequences, viz. an unplanned pregnancy.This coincided with the women’s effort at the right to work outside, the inability of men to financially commit to a regular family in the midst of stagnant or falling real wages paid to the non-executive class from the 1970s onwards. In an unequal and financially unstable society, free love began to look a lot like freedom from love, argues Weigel (153). The new digital dating industry has developed to cater to the busy ‘yuppies’ (young urban professionals) looking for emotionless sex; these yuppies also reveal a condition of sociopathy and psychopathy unable to have the feelings, observes Weigel moralistically. There are sex workers to make feelings ‘economically productive/exchangeable’. However,computer erotica (cyber-sex and cyber dater) has become a popular and safer alternative to real, interpersonal involvement in a world where the HIV is deadlier than computer viruses. The shortage of time and therefore inability to invest in the relationship has surfaced as an issue. Precarity and overwork are taking atoll on dating and emotion in the era of informatisation, informalisation and casualization. Here one is reminded of the work of McGregor (2011).

Women have been faced with a demandingly difficult scenario. They also had to date with an eye on the biological clock, thus having to synchronise their efforts at planning a career, marriage, family and home life. With the help of Harmon stimulation drugs, some of them are dating on ‘borrowed time’ as well. The women working in and as the executive class are keeping an eye on the technology, such as egg freezing encouraged by corporations; this is positioned as a benefit for their female employees, intended to overcome gender inequality in corporate work places. However, most women confronted with the inadequacy of maternity and parental leave and child care supports, find every other alternative stressful and uncertain.This condition of life is not a matter of individual behavioural adjustment. Love,with labour as its attendant prerequisite on one side, and the sources of the anxiety, uncertainty, loneliness and casual sex on the other, reflect the power of social forces that shape every other aspect of our lives, argues Weigel emphatically (261).Here, Weigel’s argument is grounded in dialectical historical materialism. It eschews from drawing any intersectionality with the Foucault’s (1976/2008) paradigm of the politics of pleasure and body, which is rooted in the nexus of power and knowledge. Did the ‘labour of love’ have any effect on the political economy, given the former’s dialectical link with the latter? In what sense have the Occupy Wall Street Movement and the politics for 99 percent (the commoners) and not just one percent (the super rich), as these being seen since 2011, also been connected with the stressful condition of ‘labour of love’? Such a question still awaits a new researcher.

There are some glaring oversights in the overall narrative of this book. Out of the two components of love – care / emotional ties and intimacy – the feature of the former remains in the shape of some interspersed observations, waiting for an analytical scheme. The discussion on what effect the socio-cultural identities of persons have on ‘labour of love’ is confined to the passing observations on the fear of miscegenation shared by the white Americans and the difficulty of family building faced by the poor black Americans. The shades of inter-racial dating (Indian readers may see it with relation to inter caste and inter religious relationships) would add significant complication to this neat narrative of dating and class. Similarly, the scope of ‘labour of love’ is limited primarily to the phase in life cycle before marriage. The subsequent phase of life cycle rests on another order of ‘labour of love’. A reader is left to satisfy this curiosity through other research works, which will surely benefit from Weigel’s approach and its current lucid exposition.

A Book Review:

Moira Weigel, Labour of Love: The Invention of Dating.New York: Farrar, Straus and Giroux Publisher, 2016. ISBN: 9780374713133.

Reference:

Foucault, Michel.The History of Sexuality, Vol. I. (Translated by Robert Hurley),Australia: Penguin Group, 2008/1976.

Freud, Sigmund. Instincts and Their Vicissitudes.In The standard edition of the complete psychological works of Sigmund Freud. Vol. 12, pp. 159-204, New York: Norton, 1915.

Froom, Erich. The Art of Living: An enquiry into the nature of love, New York: Harper & Row, 1956.

Mahlaer, Margaret, Fred Pine and Annie Bergman.The Psychological Birth of the Human Infant, New York: Basic Books, 1975.

McGregor, Sheila.‘Sexuality, Alienation and Capitalism’,International Socialism, Issue No. 130, 11 April 2011.

Nathanson, Donald L. Shame and Pride: Affect, Sex and the Birth of the Self, 1994/1992.

Dhiraj k Nite

 

Dr. Dhiraj Kumar Nite, A Social Scientist, University of Johannesburg, Ambedkar Univeristy, Delhi. You can contact him through  dhirajnite@gmail.com

To the Children of Bodoland: Mandeep Boro

Children of Bodoland. I have been asked to write an article. The invitation I received is in Bodo. I am not sure if I am supposed to write it in Bodo. And I am not very sure about the topic either. The last time I wrote in our language was seventeen years ago. So I will take the liberty to write it in English. And on the topic I have always wanted to talk about. It is not that I don’t love our mother tongue. Yes, I do. I still speak, read, write in Bodo. My article is exclusively for the children of Bodoland and it is directed towards them. I also write it in English in order to reach a larger audience. Do not think that writing in English will make me a less Bodo. So then children listen to me. I will begin it with my life story. # Author

Children of Bodoland

Photo- Mandeep Boro

To the Children of Bodoland

By Mandeep Boro

(i)

I was born in a village. When I was small, I attended the primary school in our village but not for very long time. Nevertheless, I have some vivid memories of my schooldays. The first thing I remember is teachers. Two teachers. There were only two teachers in the school and they used to handle all the four different standards at the same time. If one of the teachers taught one standard, he would ask children of other standards to play in the field. I remember playing happily with my friends there when others were reading, writing and doing their sums. That was in the late eighties. A few days ago my brother called me and somehow I don’t know why during our conversation but I asked him about the school in our village. What about the school in our village? He said. I inquired him if there had been new appointments. He replied in negative. There has been no appointment so far and even today only two teachers teach and they handle all the four classes.

Now when I look back, I realize that my parents somehow foresaw this problem and I feel that it is precisely for this reason they put me in a private school far away from home and thus I arrived to study in a small town. I will name this town T. I remember I cried a lot on the first day they lodged me in my uncle’s residence. It sounds funny. But I swear, I did scream and cry a lot that day. I even punched my hands, stamped my feet, kicked about my legs in the air. However, as days passed by I got accustomed to the new environment and I no longer felt homesick. I guess people get used to things with time. Besides, my father visited me every month. I also went home during summer and winter breaks. And of course during long holidays. If not for schooling there, I do not know where I would stand today. So thanks to my parents.  The school was just a walkable distance from my uncle’s place. After studying eleven long years in the school, I matriculated in the year two thousand.

Then I went on to study in college. I will call this college C. C is considered to be the topmost and oldest college of our state. It is located in the city. Oldest, I know for sure, it is. Top? Maybe. I don’t know. I only have bad experiences to tell about. But let me tell you first how I enrolled to study there. Well, just after the matriculation result some people visited our house and told my parents that they should send their son to study there. My marks were good enough to get me admission. And I should choose science stream. Yes, that’s what they told. My parents who do not have formal education believed them as they always did and thus I became part of the college. The result is … I flunked terribly. I fell down straight from seventy five point six to fifty three point four percent. No. It was not just me. I saw many students particularly coming from far-flung tribal areas failing there. But I think I was the definitive of all the losers for I lost two academic years successively.

Much later I realized that I never had the knack of studying science. I was never meant to be a doctor, engineer or scientist. When I was in high school I used to write poems. Maybe they were not really poems. But I would say that they certainly dealt with my emotions, thoughts and I would publish them in newspapers. Let me call these newspapers AT and TS which are printed even today. I also published in other fortnightly magazines. Every Sunday I would eagerly buy copies of AT and TS each to see if they had included my poems in their supplements. I would be very happy if I saw them and that constantly motivated me to write a lot. By the time I was doing plus two I had about forty newspaper cut outs of my so called poems. But the fall was hard. Really hard. It hit me so hard that I no longer endured people who discoursed on students’ performances in exams and measured their intelligence with percentile. Gradually I lost interest in translating my feelings into poems and then one day I threw my diary in the mighty river that flows right through the heart of our state and I stopped writing completely. And that’s the reason why I don’t write poems today. About the newspaper cut outs of my poems. I don’t have them with me. I gifted or gave them to my friends, girlfriends. I wish I had kept some of them to show you today!

 Engineering and medicine were the only two career options left for us to choose during our time. Although I studied science I had no interest in it at all. I always wanted to do something different in life. But I was not sure what it was. What I wanted to do. But something the mainstream did not do. That was certain. Many things have changed by now and it’s been more than two decades I have been living outside the state. I am not sure if parents and guardians in our place still compel their children to opt for science to become doctors and engineers. The period after plus two exams was the most turbulent in my life. I appeared in numerous engineering entrance tests but only to flunk terribly and lose again another academic year. Then came the year two thousand and four. It was from then on there was no looking back. That year I qualified for studying an undergraduate program in one of the public universities in the national capital of our country. Thanks to scholarship I accomplished graduate program and went on to do further studies. Today I teach in a university. But that’s not the end. I still have to write, publish papers in scopus indexed journals every year and present them in conferences. The moment I don’t, I’m out of the race.

            (ii)

Well, you have heard about my story. But that’s not really important. That’s not really the point I want to make. The point I want to make is this and you should all listen to it carefully.

Yes, children of Bodoland. You’re all living in terrible time. To be honest it is worse than the eighties and nineties when demand for separate statehood and insurgency were at their peak. No doubt those were violent decades and the movement for separate homeland saw many precious lives lost. However, back then we did not have unscrupulous leaders. Even if we had, they were few in numbers, they were not as corrupt and fraudulent as the present ones. Today we are ruled by people who equate development with monetary power and mere infrastructure. No. Development is not all that. It does not begin from there. It starts from the mindset. Otherwise, we would not be surrounded by politicians who justify that accepting bribe is right. Corruption would not be so rampant.

The place where you come from, where we all come from and got by chance is in ruins. It is in utter disorder. And there seems to be no way out. I came across some remarks last year underscoring that the council is a dead body and its elected members are vultures eagerly waiting to feed upon it. Another read that it is like an ATM machine. Only those who possess card can withdraw money. But why compare them with vultures? At least vultures feed on the carcasses of dead animals and help prevent the spread of diseases. They scavenge and keep the environment clean. On the contrary, I don’t see a single political soul from our community who is genuinely interested in solving the problems that plague our society without extracting personal benefits first. What I hear today is that certificates are being issued to non indigenous people in exchange of under the table dealings. What I read today is that huge chunks of lands are given away to some particular trust to conduct their murky business deals in the name of progress and development of our region while, I am told, lakhs of people displaced during the conflicts still live in relief camps. What I see today is that resources are wasted to organize private events while local artistes move from pillar to post looking for fund to finish their project. Bravo, what a society we have built!

For society to progress invest heavily in education and health. Do not give freebies. Freebies do not address the root cause of the problem and solve poverty. Do not build free huts. Rather create jobs. Create opportunities. Let them earn and build their house with their own hands. But no. Our politicians distribute scooters free of charge to meritorious students. Why don’t they distribute books instead? Why don’t they bear their cost of higher education? Why don’t they build hostels for students who come from economically weak background? Is it because they are scared of knowledge? Hence children of Bodoland do not be lured by such freebies and false promises. For anything that comes free does not really have importance and value in life. When I was young and before the creation of the council I heard people expressing dissatisfaction against the state government for stepmotherly treatment. They moaned that the state government neglected us, our region, the place where we live. Now we look down upon each other. We don’t even care how schools in villages function. If possible, we will be at it again. What? Start fratricidal war. Kill each other like in the mid nineties. Turn this place into slaughterhouse.

The conditions of schools in villages are dreadfully the same today. In fact, they have become worse in the case of certain schools for teachers with different medium background are appointed. How will those teachers teach in a language all Greek to them? How will students learn? The future of the students is at stake. Their destiny is played. Who is responsible? I don’t need to tell you. The journey or the road that you all have to travel is long and tough one. When I was young, I never wanted to leave home. I never wanted to leave our place. I thought I could do something different without ever having to leave. However, circumstances made me leave and I moved in search of better future. It will be the same for you. But it is not going to be easy. The world has moved on. It has become ever more competitive. The metropolises do not need people from our region to do the job of security guards. There are plenty of folks to perform such work. So aim, aspire high. Work hard. The only way you will be able to succeed in the world. The easy way which is easy money will not help you. Aim low, travel, take up low paid menial jobs, you will get killed in train journey when you go home. Nobody will speak for you then. Not even our own brothers and sisters. Yes. Don’t laugh. It has happened. This year an eighteen year old girl from our community who used to work as domestic help in a metropolis jumped down to death from the eleventh floor. We do not know why she jumped, if there was any foul play, if the culprit was booked and punished.

Easy money, by which I mean money earned through easy ways, the ways you are already aware of and familiar with, may seem tempting and may lighten the burden of life for some time. However, in the long run it will only ruin you as it leads to unhappiness. So do not follow the path set by the corrupt and the big shots. Do not be dragged down by the insanity and selfish motives of the few. Do not give in to the provocation of the rowdies and the goons. There is no peace. That’s a lie. Do not believe them. In the end it is hard work, achievement, what you do that will bring glory and recognition to society and not the other way round. There is no progress and development in our place. What is there, what exists is reality, the harsh reality. Every day people get killed and they have to struggle to get even their smallest job done. Do not repeat the crimes committed against you. Do not payback in the same coin, evil for evil. Do not be hoodwinked. Do not be bought by their money power. Bodoland is a distant dream. Enough bloodshed and sacrifices have been made for this cause. If you want to contribute to society, work hard, educate yourselves and others. I see hope neither in the youth nor in the leaders of all sorts and colors of our community but you.

 

12510518_1512506989044300_948686182943659765_nMandeep Boro is born and brought up in Assam. He recieved his PhD from JNU. At present he teaches Spanish in a university in South India. You can Contact him through mandeepboro@hotmail.com.

‘हिंदी मीडियम’ यानी अपने स्वनिर्मित इमेज के चमकीले नक़ल: तत्याना षुर्लेई

साकेत चौधरी ने अपनी इस नयी फ़िल्म में एस्पायरिंग मिडिल क्लास को दिखाया है. यह तबका भारतीय सिनेमा में शायद सब से कम दिखने वाला तबका है. “हिंदी मीडियम” (2017) एक नवधनाढ्य दंपति की कहानी है, ऐसे चरित्र ज़्यादातर सिर्फ झलक दिखाने के लिए हिंदी फिल्मों में आते थे (जैसे “कल हो ना हो” में रोहित पटेल का बाप था) और अपने गंवारपन से किसी भी तरह के मनोरंजन/फूहड़पन के बहाने बनकर रह जाते थे. चौधरी भी इसी तरीके से अपने चरित्र को सामने लाता है. फ़िल्म का पहला हिस्सा कहानी से ज़्यादा, मनोरंचक रेखाचित्रों का एक संग्रह लगता है. फिर भी, फ़िल्म के ये हास्यप्रद दृश्य ज़्यादा थकाऊ नहीं हैं और इस विशवास से लैश दर्शकों के लिए कि उन्हें पता है कि फ़िल्म किसके बारे में होगी, अचानक से दो ट्विस्टेड प्लाट ऐसे आते हैं जो आश्चर्यचकित कर देते हैं.  #लेखिका 

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Poster

“हिंदी मीडियम”: यानी हम सब नक़ल हैं!

By तत्याना षुर्लेई

हिंदुस्तान में पॉपुलर रही फिल्मों के लिए पश्चिम में होने वाली सबसे बड़ी आलोचना यही है कि ये वास्तविकताओं से दूर होती हैं. साथ ही साथ ‘भारतीय विषयों’ पर पश्चिम में बनने वाली फिल्में या फिर विदेशी बाजारों के लिए भारत में बनी फिल्में आम भारतीय लोगों को पसंद नहीं आती है, क्योंकि उनमें सिर्फ गरीबी और एक तरह भिन्नता (otherness) का चित्रण होता है. हिन्दुस्तान के बारें ऐसे विषय पश्चिमी फिल्म जगत में बहुत बिकाऊ हैं.

वहीं दूसरी तरफ, जो लोग गरीबी और अमीरी के बीच में पड़े हुए हैं, उन पर ज़्यादा ध्यान नहीं दिया जाता है. कभी-कभी कोई न कोई अपवाद है, ऐसे अपवाद विकास बह्ल की “क्वीन” की नायिका, रानी मेहरा है जो अपरिष्कृत ज़रूर है लेकिन असाधारण भी. एस्पायरिंग मिडिल क्लास के लिए सिनेमा की कहानियों में ही सिर्फ जगह का अभाव नहीं है, बल्कि शायद भारतीय समाज का भी यही यथार्थ है. यह समाज जहाँ आभिजात्य लोगों के समूह के प्रति बहुत ज़्यादा चापलूस और भक्ति की मुद्रा दिखता है, वहीं दूसरी ओर सब से गरीब और हाशिये के लोगों की रक्षा के लिए नियम-कानून बनाने का ढोंग भी करता है.

फ़िल्म की कहानी में यह स्पष्ट है कि मुख्य चरित्र पैसे वाला तो है लेकिन संस्कृति-शून्य (uncultured) अनाड़ी भी है. उसकी स्थिति समाज के एक बाहरी व्यक्ति के रूप में है और कभी-कभी वह गरीब बस्तियों में रहने वालों से खुद को ज़्यादा मुश्किल में पाता है. क्योंकि, उसकी रक्षा के लिए यहाँ कोई स्पष्ट विधान नहीं है और समाज की भंगिमा भी आदरपूर्ण नहीं है. ऐसे आदमी अपने पैसों की मदद से वहाँ तक तो पहुँच सकता है जहाँ दरिद्र लोग कभी नहीं जा पायेंगे, लेकिन इसकी भी अपनी विडम्बनायें हैं. यह फिल्म ऐसी विडम्बनाओं को उभारने का काम करती है.

यद्यपि यह भी सच है कि ऐसे अनाड़ी लोग जब अभिजात्य लोगों (elites) के स्तर पर पहुंचेंगे, तो वे सिर्फ एक धोखेबाज़ ही बने रहेंगे. उन्हें इस बात का ध्यान हमेशा रखना पड़ेगा कि आसपास के लोगों को कभी पता न चल सके कि उसकी जडें कहाँ हैं. यही कारण है कि आज भी भारत में कई काम ऐसे होते हैं जिनको करना अपमानजनक माना जाता है, इसीलिए यहाँ हर किसी के लिए पहले से ही भविष्य (नियति) तय है और समाज में उसका स्थान (स्टेटस) भी. ऐसे में अभिजात्य वाली ऊँचाई चढ़ना बहुत मुश्किल काम है.

फ़िल्म का नायक, राज (इरफ़ान खान) कपड़ों का एक अमीर दुकानदार है. वह किसी न रूप में अपनी दुकान के कपड़ों से मिलता-जुलता है. उसकी दुकान में बड़े-बड़े मॉडल्स, स्टार और डिजाईनर के नक़ल मिलते हैं. ये नक़ल अपने मूल से ज़्यादा चमकीले, रंग-बिरंगे और भड़कीले लगते हैं, फिर भी ये नक़ल वाले कपड़े पुरानी दिल्ली में रहनेवाली औरतों को अच्छे लगते हैं.

अपने ग्राहकों की तरह, जो रंगीन पत्रिकाओं में दर्ज कपड़ों के नकली और सस्ते संस्करण खरीदती हैं, फ़िल्म का नायक भी अपनी ज़िन्दगी से बहुत खुश है और उसको किसी और चीज की ज़रुरत नहीं है. लेकिन, उसकी पत्नी, मीता (सबा कमर) राज से कुछ अलग है. मीता अभिजात्य, सोफिस्टिकेटेड समाज का हिस्सा बनना चाहती है, वह मानती है कि बड़े लोगों के संपर्क से उसकी बेटी का भविष्य अच्छा होगा.

इन सबमें सबसे महत्त्वपूर्ण बात बच्ची को एक अच्छे स्कूल में भेजना है. इसलिए वह निराश माँ अपने पति को चांदनी चौक से वसंत विहार शिफ्ट होने और वहाँ रहनेवाले लोगों से दोस्ती करने के लिए बोलती है, क्योंकि यह कंपनी उसे अपनी  बेटी के लिए ज़्यादा उचित लगती  है.

राज और मीता वसंत विहार शिफ्ट हो जाते हैं, लेकिन यहीं पता चलता है कि सुन्दर घर में रहने मात्र से आप अपनी ‘कमजोरियों’ को नहीं छुपा सकते हैं. अंग्रेजी बोलनेवाले सोसाइटी को भी समझ में आ जाता है कि राज और मीता उनसे कुछ अलग हैं और ये हमारी नक़ल करने की कोशिश में हैं.  जाहिर है कि सोफिस्टिकेटेड समाज  के प्रतिष्ठित स्कूल में बच्ची को प्रवेश नहीं मिलता है. तब दोनों, नायक और नायिका गरीबों के बच्चों के लिए मिलने वाले आरक्षण की मदद से अपनी बेटी को अच्छे स्कूल में भेजने की कोशिश करते हैं. इसके लिए वे फिर वसंत विहार से दूसरी जगह शिफ्ट करते हैं और एक बहुत गरीब इलाके में रहने लगते हैं और इस तरह यहाँ फिर से दूसरे लोगों की नक़ल बन जाते हैं, लेकिन इस बार गरीबों की.

यह बहुत स्पष्ट है कि दूसरा नाटक पहले से ज़्यादा अच्छा है, गरीब इलाके में रहनेवाले लोग राज और मीता को वसंत विहार वालों की तुलना में आसानी से अपनाते हैं. इसके अतिरिक्त, इस बार लगता है कि दोनों, नायक और नायिका, आसपास के लोगों को थोड़ा कम धोखा देते हैं. पहले वाले नाटक में राज और मीता का चमकीला लालित्य (नकली भव्यता) और सामाजिक मेल-जोल के समय उनके द्वारा की गयी गलतियाँ बहुत ज्यादा ही दिखाई देती थीं, लेकिन दूसरे नाटक के समय गरीबों के साथ रहना उनके लिए ज़्यादा आसान लगता है.

ऐसा लगता है कि इस बार नायक और नायिका ऐसी जगह  रहते हैं जो गरीब लोगों की जगह होने के बावजूद उनके पुराने घर से मिलते-जुलते हैं, जहाँ उनके लिए एडजस्ट करना ज्यादा आसान है, लेकिन ऐसा नहीं है. इस नए इलाके में भी राज और मीता गरीब लोगों को धोखा देते हैं. अंतर बस यह है कि पिछली बार आसपास के लोग उनको नीचली नजर से देखते थे और इस बार, गरीबों लोगों से इनको आदर मिलता है. इससे उनका आत्मविश्वास बढ़ जाता है और वे खुद को आदरणीय मानने लगते हैं. इस बार उन्हें अपने किये की चिंता करने की जरुरत नहीं है, वे यहाँ कम गलतियां करते हैं. यहाँ आकर धीरे-धीरे उनका व्यवहार बदल जाता है. उनके कपड़ों का स्टाइल, जिसे पहले-पहल उन्हें सीखना पड़ा, अब नेचुरल लगता है और अमीर इलाके में फिर से वापसी  होने के बाद भी उनका आत्मविश्वास गायब नहीं होता है. प्रतिष्ठित (prestigious) स्कूल के बच्चों के अमीर अभिवावकों के सामने राज को अब अपनी कमज़ोर अंग्रेजी का इस्तेमाल करने से भी बिलकुल डर नहीं है.

भाषा का मामला फ़िल्म में बहुत महत्त्वपूर्ण है. राज सही ही बोलता है कि अगर फ्रेंच या जर्मन को अच्छी अंग्रेजी नहीं आती है तो भी भारतीय लोगों का उनके प्रति आदर कम नहीं होता है. लेकिन खुद भारतीय ही दूसरे भारतीय को अंग्रेजी जानने और न जानने के आधार पर उसकी सामाजिक हैसियत तय कर देते हैं. फिर भी, “हिंदी मीडियम” “इंग्लिश विंग्लिश” (गौरी शिंदे, २०१२) जैसी फ़िल्म नहीं है, यह फिल्म अंग्रेजी के प्रति भारतीय लोगों के अजीब रवैये के साथ-साथ धोखा देने की ज़रुरत और जुगाड़ की प्रवृति के बारे में है.

फ़िल्म का शुरूआती हिस्सा एस्पायरिंग मिडिल क्लास के बहिष्कार (exclusion) की कहानी लगती है, लेकिन बाद में यह गरीबों की झूठी रक्षा और उनके अधिकारों के हनन के बारे में एक नैतिक आख्यान बन जाती है. यह कहना मुश्किल है कि अचानक से आने वाले इस परिवर्तन के कारण क्या हैं? शायद फिल्मवालों को अचानक यह लगा कि वे गरीब लोगों को मिलने वाली सुख-सुविधाओं को नहीं बल्कि मिडिल क्लास की चीड़-फाड़ (operation) दिखाना चाहते हैं. हालाँकि यह परिवर्तन फ़िल्म की कमी बिलकुल नहीं है, उल्टे, स्कूल में राज के फाइनल स्पीच के बाद अमीर-अभिजात्य श्रोताओं का व्यवहार (स्टैंडिंग ओवेशन की कमी)  कहानी का एक मानीखेज केंद्र बन जाता है.

इसने हर दर्शक को यह समझाया कि हम सब लोगों को अपने-अपने जीवन में कुछ छोटे-छोटे नाटक, नक़ल करने हैं, आसपास के लोगों के लिए अपने व्यक्तित्व (image) को खुद ही गढ़ना है. हम सिर्फ अपने घर या परिवार के पास ही ‘सच्चा हम’ हो सकते हैं क्योंकि सिर्फ हमारे अपने लोग ही इस नाटक की सच्चाई जानते हैं या वे खुद भी इस नाटक के हिस्से  हैं.

इस तरह का एप्रोच राज द्वारा नागिन के बारे में एक टीवी सीरियल देखने वाले सीन में स्पष्ट है. यह सीन स्पष्टतः इरफ़ान खान की बाहियात फ़िल्म, और इरफ़ान खान जैसे अभिनेताओं के लिए शर्मनाक भी, “हिस्स्स” (जेनिफर लिंच, २०१०) से संबंधित है. हमें इरफ़ान खान की सिर्फ अच्छी फिल्में देखने की आदत है इसलिए हम यह मानना ही नहीं चाहते हैं कि उसने “हिस्स्स” जैसी फ़िल्म में भी एक्टिंग किया है. वास्तव में हम सभी कभी न कभी अपने स्वनिर्मित इमेज के चमकीले नक़ल होते हैं.

407990_4198265689669_2114788963_nतत्याना षुर्लेई पोलैंड की रहने वाली हैं, एक इंडोलॉजिस्ट (भारतीय उपमहाद्वीपीय भाषा और संस्कृति की जानकार)  और फिल्म आलोचक हैं. हिंदी की मशहूर पत्रिकाओं और ब्लॉग्स के लिए लिखती रही हैं. पोलैंड के शहर क्राकोव स्थित जेगिलोनियन विश्वविद्यालय से “द कोर्टसन फिगर इन इंडियन पॉपुलर सिनेमा: ‘ट्रेडिशन, स्टीरियोटाइप, मैनिपुलेशन” नामक विषय पर पीएचडी हैं. वर्तमान में मनिपाल विश्वविद्यालय, कर्नाटक के यूरोपीय अध्ययन संस्थान में पढ़ाती हैं. 

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