Archive for the tag “Sanjeev Kumar”

दंगा भेजियो मौला! उर्फ़ भारतीय मुसलमानों की नियति: संजीव कुमार

कोई तो वजह रही होगी कि अनिल यादव के संकलन ‘नगरवधुएं अख़बार नहीं पढ़तीं’ (2011, अंतिका प्रकाशन, ग़ाजि़याबाद) से पहली बार गुज़रते हुए ‘दंगा भेजियो मौला!’ कहानी पढ़ने से रह गयी! जहां तक याद आता है, कहानी का पहला पृष्ठ पढ़ने के बाद उसे छोड़ दिया था। संभव है, ‘लोककवि का बिरहा’ और ‘नगरवधुएं अख़बार नहीं पढ़तीं’ जैसी चर्चित कहानियों ने, जिनका नाम पहले से सुना हुआ था, पूरा ध्यान अपनी ओर खींच लिया हो और इपंले (इन पंक्तियों के लेखक) को आश्वस्त कर दिया हो कि जब हमें पढ़ ही लिया तो और क्या रक्खा है?

लेकिन यही कुल वजह नहीं रही होगी। पहला पृष्ठ पढ़ने के बाद कहानी छोड़ी गयी, इससे लगता है कि मुख्य कारण कहीं और है। पाठक-पंछी आया तो… पर फंसा नहीं! वह पास आता ही नहीं तो बात और थी। इससे क्या यह निष्कर्ष नहीं निकलता कि दाने बिखेरने और जाल बिछाने में कहानीकार की ओर से कहीं चूक रह गयी?… जी हां, बहुत घटिया रूपक है।[1] पर आप भी समझते हैं, यहां आशय बस इतना है कि कहानी अगर अपनी शुरुआत से ही पाठक को बांध नहीं लेती तो यह कहानीकार के सामर्थ्य की न्यूनता का प्रमाण है! वह कहानी ही क्या जो पढ़ते चले जाने को बाध्य न कर दे!..

यक़ीन मानिए, कुछ समय पहले तक इपंले ऐसा ही मानता था, पर ‘दंगा भेजियो मौला!’ जैसी कहानियों ने बताया कि ऐसा मानने में कितनी समस्याएं हैं। इपंले जब पाठक को पंछी और पाठ की शुरुआत को दाना बताता है तो वह इस हक़ीक़त पर पर्दा डाल देता है कि पाठकीय योग्यता भी अलग-अलग तरह की होती है। जब वह कहता है कि ‘अपनी शुरुआत से ही जो पाठक को बांध न ले…’ वगैरह, तो वह निहित रूप में स्वयं को एक आदर्श पाठक बता रहा होता है, जिसकी कसौटी पर कहानी की सम्मोहन-क्षमता को कस कर उसके बारे में वस्तुनिष्ठता का दावा करनेवाला एक फ़ैसला सुनाया जा सकता है। जबकि सचाई यह है कि वह ख़ास तरह की शक्तियों और सीमाओं से युक्त पाठक है और कहानी के साथ न बंध पाना, उसे छोड़ कर आगे बढ़ जाना, हो सकता है, कहानी की नहीं, बतौर पाठक खुद उसकी सीमाओं का निदर्शन हो। शब्द जिन भावों/अनुभवों/स्मृतियों को कुरेदना चाहते हैं, हो सकता है, वे इस ‘ख़ास’ पाठक के भीतर नगण्य वा नदारद हों। फिर कुरेदने की कला कितनी भी समर्थ हो, इस पाठक के पक्ष में उससे निकलेगा क्या? इस तरह जो अयोग्यता पाठक की है, उसे उलट कर कहानी और कहानीकार की अयोग्यता बता दिया जाता है। इसे कहते हैं, नाच न जाने, आंगन टेढ़ा! #लेखक

Snapshot from Goodnight Mommy (2015)

Snapshot from Goodnight Mommy (2015)

 

दंगे में आएंगे

By संजीव कुमार

‘दंगा भेजियो मौला!’ कहानी एक दृश्य से शुरू होती है। यह ऐसा दृश्य है जिसकी अपने मन के पटल पर पुनर्रचना कर पाना सीमित अनुभव वाले इपंले सरीखे एक मध्यवर्गीय के लिए थोड़ा मुश्किल है। सिनेमा तो है नहीं कि दृश्य बना-बनाया मिल जाए! कहानी के पाठक को शब्दों से निकाल कर दृश्य की पुनर्रचना करनी होती है और इस काम में उसके अपने अनुभव और स्मृतियों का योगदान होता है। इसीलिए बहुत चित्रात्मक और बिंबधर्मी वर्णन-विवरण भी अलग-अलग पाठक के मन में अलग-अलग बिंब निर्मित करते हैं। साहित्यिक कृतियों के फि़ल्मांतरण के खि़लाफ़ यह एक मज़बूत तर्क रहा है कि इससे अनंत संभावनाओं का निशेध होकर कृति एक निश्चित दृश्यावली में रूढ़/फि़क्स हो जाती है। इस तर्क से बहस हो सकती है, पर वह अभी छेड़नी नहीं है। कहना बस इतना है कि जब हम कहानी के दृश्य की बात करते हैं तो वहां पाठक भी सक्रिय भूमिका में होता है – उसके मन में दृश्य का उभरना जितना शब्दों को बरतने के कहानीकार के कौशल पर निर्भर करता है, उतना ही उसके अपने अनुभव-स्मृतियों की थाती तथा उसी से जुड़ी, शब्दों को दृश्यांतरित करने की योग्यता पर भी।

लगता है, पहली बार ‘दंगा भेजियो मौला!’ पढ़ते हुए इसी थाती और योग्यता पर मामला अटक गया था। इपंले दृश्य को अपने अंदर क़ायदे से रच नहीं पाया, इसीलिए तल्लीनता बनी नहीं और कहानी छूट गयी।

तो ऐसा क्या है इस दृश्य में?

असल में, वह जो भी है, सिर्फ़ इस दृश्य में नहीं, पूरी कहानी में है। ऐसी नारकीय स्थिति और देश तथा समाज के घूरे पर फेंक दिये जाने की नियति, जिसकी कल्पना भी सीमित मध्यवर्गीय अनुभव वाले व्यक्ति के लिए कठिन है। अभी, इस कहानी को पूरा पढ़ चुके होने के बाद भी, मैं उस मुहल्ले की एक आधी-अधूरी तस्वीर ही अपने मन में बना पाता हूं जो पूरे शहर के बरसाती पानी और सीवर लाइनों के उफन कर उल्टी दिशा में बहने से निकले मल-मूत्र की झील बना हुआ है और लंबे समय आधी-आधी मंजि़ल तक इस पानी में डूबे रहनेवाले मकान अक्सर ईंटों के बीच की मिट्टी के गल जाने से भहरा कर गिर पड़ते हैं और उनकी छतों पर खेलते बच्चों की लाशें थोड़ी देर बाद फूल कर उस बजबजाती झील की सतह पर उतरा जाती हैं। मेरे कोश में ऐसे स्मृति-चित्र ही बहुत कम हैं जिन्हें कहानीकार के शब्द कुरेद सकें और जिनकी मदद से मैं ‘अनायास’ अपने अन्दर इस दृश्य को रच सकूं। नहीं हैं, ऐसा तो नहीं कहा जा सकता, पर निस्संदेह कम और कमज़ोर हैं। इसीलिए शब्दों को अपने भीतर दृश्यांतरित करना नामुमकिन नहीं, पर मुश्किल है। मुश्किल से हर पाठक भागता है। सो इपंले भी पहली बार भाग खड़ा हुआ।

पर अच्छी रचना की यह विषेशता होती है कि अगर आप उसके साथ थोड़ी मुश्किल उठाने को तैयार हो जाएं तो वह आपको देश-दुनिया, समाज और राजनीति, मन और भावलोक के किसी ऐसे अज्ञात-अल्पज्ञात हिस्से में ले जाती है जहां से आप अधिक अनुभवी, अधिक परिपक्व होकर लौटते हैं। पाठानुभव जीवनानुभव की कमी को पूरा करने लगता है। ‘दंगा भेजियो मौला!’ ऐसी ही रचना है।

कहानी आपको मुसलमान बुनकरों के एक मुहल्ले में ले जाती है जो नदी के किनारे शहर के निचले हिस्से में बसा है – एक ‘लो लैंड’ जो हर साल महीने-डेढ़ महीने के लिए शहर भर के बरसाती पानी और सीवर से निकले गू-मूत की सड़ती झील में तब्दील हो जाता है और उसके हटने के बाद हैजा, डायरिया जैसी बीमारियां हमला कर देती हैं। हर साल कई महीने इन मुसीबतों से लड़ने के बाद ही वहां सामान्य जि़ंदगी बहाल हो पाती है। महान भारतीय राष्ट्र-राज्य के भीतर एक पराये राष्ट्र की तरह बरता जानेवाला यह मुहल्ला, मोमिनपुरा, अपनी बदहाली के लिए सिर्फ़ घृणा, उपेक्षा और उपहास का विषय है। राज्यतंत्र भी उसकी बदहाली को कम करने के लिए आगे नहीं आता, अलबत्ता बढ़ाने के लिए आता है। ‘हाथ में जल लेकर गंगा-जमुनी तहज़ीब का हवाला देने के दिन कब के लद चुके’ हैं। मोमिनपुरा के बाशिंदे दंगापीडि़त नहीं हैं, पर उनके साथ जो हो रहा है, वह किसी दंगे से कम नहीं:

दंगा तो हो ही रहा है।… सरकार ने अफ़सरों को इधर आने से मना कर दिया है। डॉक्टरों ने इलाज से मुंह फेर लिया है। जो पंप यहां लगने चाहिए, उन्हें नदी में लगाकर पानी इधर फेंका जा रहा है। करघे सड़ चुके हैं, घर ढह रहे हैं, बच्चे चूहों की तरह डूब कर मर रहे हैं। सबको इसी तरह बिना एक भी गोली-छुरा चलाए मार डाला जाएगा। जो बेघर-बेरोज़गार बचेंगे, वे बीमार होकर लाईलाज मरेंगे।’

यों तो मोमिनपुरा का हर साल यही हाल होता है, पर इस साल यह सड़ती झील हटने का नाम नहीं ले रही। पाकिस्तान और डल झील जैसे नामों से नवाज़े जानेवाले इस इलाक़े में ‘म्यूनिसिपैलिटी ने इस साल पानी निकासी के लिए एक भी पंप नहीं लगाया। अफ़सरों ने लिख कर दे दिया, सारे पंप ख़राब हैं, मरम्मत के लिए पैसा नहीं है, सरकार पैसा भेजेगी तो पानी निकाला जाएगा। लोक निर्माण विभाग ने घोषित कर दिया कि हाईवे की पुलिया से हर साल की तरह अगर पानी की निकासी की गई तो जर्जर सड़क टूट सकती है और शहर का संपर्क बाक़ी जगहों से कट सकता है। आपदा राहत विभाग ने ऐलान कर दिया कि यह बाढ़ नहीं, मामूली जलभराव है, इसलिए कुछ करने का प्रश्न ही नहीं पैदा होता।… अस्पतालों ने मोमिनपुरा के मरीजों की भर्ती करने से मना कर दिया कि जगह नहीं है और संक्रमण से पूरे शहर में महामारी का ख़तरा है। पावरलूम की मशीनें और मकानों का मलबा ख़रीदने के लिए कबाड़ी फेरे लगाने लगे। पानी में डूबे मकानों का तय-तोड़ होने लगा। रियल इस्टेट के दलाल समझा रहे थे कि हर साल तबाही लाने वाली ज़मीन से मुसलमान औने-पौने में जितनी जल्दी पिंड छुड़ा लें उतना अच्छा।…

यही है वह मुसलसल, बिना असलहे और बिना शोर-शराबे के चलता दंगा जो शासन-प्रशासन से लेकर शहर की जनता तक एक महामारी की शक्ल में फैले सांप्रदायिक मिज़ाज की अभिव्यक्ति है। अपने मुहल्ले की बदहाली को कम करने की जद्दोजहद में लगे मोमिनपुरा की क्रिकेट टीम के लड़के जब अपनी हर तरह की कोशिश से बेज़ार हो जाते हैं, तब यह ज़हरबुझा सच उनकी रगों में दौड़ जाता है कि न सिर्फ़ एक दंगा लगातार जारी है, बल्कि वह आमने-सामने वाले दंगे से ज़्यादा क्रूर और ख़तरनाक है, क्योंकि आमने-सामने की मारकाट वाले दंगे में कम-से-कम शासन-प्रशासन को इधर का रुख करना पड़ता है। दंगा इस बदहाली से बेहतर इस मायने में ठहरता है कि तब हाकिमों की ओर से, नेताओं और सामाजिक कार्यकर्ताओं की ओर से थोड़ी मदद मिल जाती है। थके-हारे, हताश और मायूस ये ग्यारह खिलाड़ी एक जुमे को फ़जर की नमाज़ के वक़्त सिज़दा कर एक ही दुआ मांगते हैं: ‘दंगा भेजियो मोरे मौला, वरना हम सब इस नर्क में सड़ कर मर जाएंगे। गू-मूत में लिथड़ कर मरने की जि़ल्लत से बेहतर है कि ख़ून में डूब कर मरें।’ और ‘दो दिन बाद मोमिनपुरा में भरते पानी के दबाव से हाई-वे की पुलिया टूट गई। काली झील कई जगहों से सड़क तोड़ कर उफनाती हुई पास के मोहल्लों और गांवों के खेतों में बह चली। घंटे-घडि़याल-शंखों का समवेत शोर बर्दाश्त के बाहर हो गया।… प्रभातफेरी करनेवालों की अगुवाई में शहर और गांवों से निकले जत्थे मोमिनपुरा पर चढ़ दौड़े। सीवर के बजबजाते पानी में हिंदू और मुसलमान गुत्थमगुत्था हो गये। अल्लाह ने हताश लड़कों की दुआ कबूल कर ली थी।’

इतना विचलित कर देनेवाली और इतने बड़े फलक पर अपनी रौशनी फेंकनेवाली कहानियां पिछले सालों में गिनती की लिखी गई होंगी। भारत के उदारीकरण के साथ-साथ राज्य की मशीनरी से लेकर जनता के एक बड़े हिस्से तक का जो सांप्रदायीकरण हुआ है, या कहें कि इन सभी ठिकानों पर दबे पड़े बहुसंख्यावादी सांप्रदायिक विष-बीज को जिस तरह पनपने, फूलने-फलने का मौक़ा मिला है- जिसके आलोक में ही नरेंद्र मोदी और भाजपा के उभार जैसी परिघटना की व्याख्या हो सकती है – उसकी यह प्रतिनिधि कहानी है। प्रभात पटनायक इसे आज़ादी की लड़ाई से विरासत में मिले साम्राज्यवादविरोधी समावेशी राष्ट्रवाद से बूर्जुआ राष्ट्रवाद की ओर संक्रमण का नतीजा मानते हैं जो कि नवउदारवादी दौर की लाक्षणिक विषेशता है (देखें, ‘विश्वीकरण का दौर और राष्ट्रवाद की दो अवधारणाएं’, लोकलहर, 15-21 जून 2015)। उनके अनुसार, राष्ट्रवाद के इन दो रूपों में अंतर करना इसलिए ज़रूरी है कि इसके बग़ैर हम एक युगांतकारी संक्रमण को समझ नहीं सकते। पहले वाले के लिए मुक्ति की धारणा अहम थी और वह तीसरी दुनिया के अन्य मुक्ति आंदोलनों के साथ एकजुटता पर बल देता था, जबकि दूसरा वाला देश की अंतरराष्ट्रीय ताक़त और औक़ात को बढ़ाने पर बल देता है। पहला वाला जनता को ग़रीबी, भूख, कंगाली से उबारने का लक्ष्य निर्धारित करता था, जबकि दूसरा वाला जीडीपी की देवमूर्ति बनाकर उसे पूजता है और उसके लिए किसानों को बेदख़ल करना, मज़दूरों के अधिकारों में कटौती करना, ग़रीबों के कल्याण की योजनाओं को ख़त्म करना – ऐसी किसी भी चीज़ को जायज़ ठहराता है। लेकिन नवउदारवादी प्रतिज्ञाओं पर खरा उतरनेवाला, राष्ट्रवाद के पहले से दूसरे रूप की ओर यह संक्रमण, जैसा कि प्रभात पटनायक लिखते हैं-

आसान नहीं था। इसलिए भारत जैसे देश में पूंजीवादी राष्ट्रवाद के अपने संपूर्ण रूप में उभरने की एक ज़रूरी शर्त यह है कि वह कोई अतिरिक्त सहारा पकड़ ले। सांप्रदायिक फ़ासीवाद उसका ऐसा ही सहारा है। एक ऐसे समाज में जिसने साम्राज्यवादविरोधी राष्ट्रवाद की मज़बूत उपस्थिति को देखा हो, यूरोपीय ढंग का उत्तर-वेस्टफेलियाई राष्ट्रवाद गढ़ा जाए, इसके लिए एक ख़ास ‘प्रतिक्रांति’ की ज़रूरत होती है, जिसे सबसे अच्छी तरह से ऐसी ताक़तें ही ला सकती हैं जो शुरू से ही साम्राज्यवादविरोधी राष्ट्रवाद के खि़लाफ़ रही हों यानी ‘सांप्रदायिकता’ की, ‘सांप्रदायिक फ़ासीवाद’ की ताक़तें। इसलिए साम्राज्यवादविरोधी राष्ट्रवाद की राख पर बूर्जआ राष्ट्रवाद के फलने-फूलने के लिए विडंबनापूर्ण तरीक़े से सांप्रदायिक फ़ासीवादी ताक़तों का हस्तक्षेप ज़रूरी है। यही भारत में हो रहा है।

यह लेख इसी साल के जून महीने का है और यह मूलतः केंद्र में एक सांप्रदायिक फ़ासीवादी सरकार के आने की व्याख्या करता है, पर यह स्पष्ट है कि यहां जिस प्रक्रिया की बात की गयी है, उसका आग़ाज़ इस मुल्क में उदारीकरण की शुरुआत के साथ हुआ था। 2003 में छपी ‘दंगा भेजियो मौला!’ इसी प्रक्रिया की एक विचलित कर देनेवाली सामाजिक अभिव्यक्ति का चित्र है। मोमिनपुरा स्वर्ग तो कभी न था, पर अब उसे मुकम्मल नर्क बनाने और बनाये रखने में जैसे सारी ताक़तें लगी हुई हैं। बहुसंख्यक सांप्रदायिकता बेहद मुखर और कारगर हो चली है। कहानी इसके कई-कई ब्यौरे देती है, जिनकी विषेशता है कि वे चीज़ों को एक स्थिति के रूप में नहीं, एक घटना-विकास के रूप में, बनते-बढ़ते रुझान के रूप में पेश करते हैं, और उनका निचोड़ इस मार्मिक वाक्य में सिमट जाता हैः

आचमन करने और हाथ में जल लेकर गंगा-जमुनी तहज़ीब का हवाला देने के दिन कब के लद चुके थे। यह शहर अब इस पानी और बस्ती दोनों से छुटकारा पाना चाहता था।

कहानी को पढ़ कर ख़त्म करते हुए आप महसूस करते हैं कि आपने किसी एक शहर के मुसलमानों की नहीं, समग्रता में भारतीय मुसलमान की गति और नियति का साक्षात्कार किया है। मोमिनपुरा या ऐसी किसी भी बस्ती को ‘पाकिस्तान’, ‘मिनी पाकिस्तान’ कहना तो एक क्रूर सांप्रदायिक मज़ाक है, पर मोमिनपुरा जिस शहर का हिस्सा है, वह ‘मिनी हिंदुस्तान’ ज़रूर है – पूरे मुल्क का एक स्याह रूपक – जहां ‘नियम और अनुशासन के साथ हर सुबह और गगनभेदी होती जा रही घंटे-घडि़याल और शंख की ध्वनियों’ के बीच एक मुसलमान बस्ती ‘पवित्र शहर का कमोड’ बने रहने को अभिशप्त है और पूरा शहर उससे छुटकारा पा लेने को आतुर, जिसके लिए ज़रूरी है कि उसके अभिशाप को और गाढ़ा किया जाए। धीमे ज़हर की मौत मरता यह भारतीय मुसलमान किसी भी कोने से मदद की उम्मीद नहीं कर सकता। राज्य और तमाम दूसरी एजेंसियों की थोड़ी भी नज़रे इनायत वह तभी हासिल कर सकता है जब इस धीमे ज़हर की जगह एक विस्फोटक तरीक़े से क़ानून और व्यवस्था की समस्या उठ खड़ी हो। इसीलिए विडंबनापूर्ण ढंग से वह दंगे की कामना करता है।

यहां ऐजाज़ अहमद का एक प्रकाशित व्याख्यान, ‘कम्यूनलिज़्म: चेंजिंग फॉर्मस् ऐंड फार्च्यूनस्’ (दि माक्र्सिस्ट, अप्रैल-जून 2013), याद आता है जहां वे यह बताते हुए, कि पूंजीवाद का हिंस्र लुटेरापन भारत में जाति संरचनाओं और सांप्रदायिक टकरावों के चलते हमेशा से पर्याप्त मुखर रहा है, कहते हैं: ‘ऐसी प्रवृत्तियां नवउदारवादी अतिवाद की शुरुआत से पहले थोड़े नियंत्रण में थीं; अब ऐसे अधिकतर नियंत्रणों को तिलांजलि दे दी गयी है और राज्य, कमोबेश अनिच्छापूर्वक, तभी हस्तक्षेप करता है जब कोई सांप्रदायिक दंगा हो जिसे कि सारतः एक क़ानून और व्यवस्था संबंधी समस्या के रूप में देखा जाता है।’ ‘दंगा भेजियो मौला!’ में मोमिनपुरा की क्रिकेट टीम के लड़के मदद की गुहार लगाने हर जगह जाते हैं, कोई सीधे मुंह बात नहीं करता और तब उन्हें भी समझ आ जाता है कि ये तभी आएंगे जब दंगा होगाः

देर रात गए जब वे अपनी साईकिलें नाव पर लाद कर घरों की ओर लौटते, अंधेरी छतों से आवाज़ें आतीं, ‘‘क्या यासीन मियां, वे लोग कब आएंगे?’’

अंधेरे में लड़के एक-दूसरे को लाचारी से ताकते रहते और नाव चुपचाप आगे बढ़ती रहती। टीम के लड़के दौड़ते रहे, लोग टरकाते रहे और बस्ती पूछती रही। एक रात बढि़याते पानी ने घर लौटते लड़कों से कहा, ‘‘बेटा, अब वे लोग नहीं आएंगे।’’

‘‘काहे?’’ यासीन ने पूछा।

‘‘तजुरबे की बात है, उस दुनिया के लोग यहां सिर्फ़ दो बखत आते हैं। या दंगे में या इलेक्शन में। ग़लतफ़हमी में न रहना कि वे यहां आकर तुम्हारे बदन से गू-मूत पोंछ कर तुम लोगों को दूल्हा बना देंगे।’’

अगले दिन यासीन ने दांत भींचकर हर रात सैकड़ों आवाज़ों में पूछे जानेवाले उस एक सवाल का जवाब नाव पर सफ़ेद पेंट से लिख दिया, ‘‘दंगे में आएंगे।’’ ताकि हर बार जवाब देना न पड़े।

ऐजाज़ अहमद की बात से यहां एक फर्क है। ऐजाज़ नवउदारवादी दौर में राज्य के चरित्र के बदलाव की ही बात करते हैं, पर ‘दंगा भेजियो मौला!’ कई दूसरी एजेंसियों को भी समेटती हुई एक अधिक जटिल तस्वीर सामने रखती है। मदद मांगने निकले लड़के ‘पहले उन नेताओं, समाज सेवियों और अख़बार वालों के पास गये जो दो बरस पहले हुए दंगे के दौरान बस्ती में आए थे और उन्होंने उनके बुजुर्गों को पुरसा दिया था। वे सभी गरदनें हिलाते रहे लेकिन झांकने नहीं आए। फिर वे सभी पार्टियों के नेताजियों, सरकारी अफ़सरों, स्वयंसेवी संगठनों के भाइजियों और मीडिया के भाईजानों के पास गए।’ सबने उन्हें टरका दिया। यहां मामला सिर्फ़ सामाजिक सरोकारों को बलाए-ताक़ रख चुके, जातिवाद और सांप्रदायिकता को नियंत्रित करने की ओर से उदासीन-अनिच्छुक नवउदारवादी राज्य का नहीं है; मामला एक ऐसे सर्वव्यापी नकारात्मक बदलाव का है जिसमें उम्मीद के सभी ठिकाने ध्वस्त हो गये हैं।

ऐसा पहले नहीं था। परिस्थितियां विपरीत थीं, पर इस क़दर नहीं। इसीलिए मोमिनपुरा के लोग शुरू में उम्मीद लगाए रहते हैं। वे समझ नहीं पाते कि आखि़र इस बार पानी का दायरा फैलता ही क्यों जा रहा है और क्यों उनकी मदद से हर किसी ने हाथ खींच लिये हैं। बढ़ता पानी अपनी ‘डभ्भक-डभ्भाक’ आवाज़ में उनसे कुछ कहता है, पर वे समझते नहीं। यह बदले हुए समय को पहचानने में हुई चूक है। उम्मीद के तिनके को कौन छोड़ना चाहता है? आखि़रकार क्रिकेट टीम के लड़के धीरे-धीरे पानी की बात समझने लगते हैं। क्रिकेट टीम के लड़के ही क्यों? क्योंकि वे ही हैं जिन्होंने मल्लाहों के नाव देने से मना कर देने के बाद कहीं से एक नाव का जुगाड़ किया है और मुहल्ले की हाड़ी-बीमारी-मौत जैसी हर मुसीबत में आपात सेवा देने से लेकर मदद की गुहार लगाने की दौड़-धूप तक का सारा काम करते हुए एक बड़े कैनवास पर चीज़ों को रखने-देखने-आंकने की स्थिति में हैं। पानी के साथ उनकी बातचीत को कहानीकार ने एक युक्ति के रूप में इस्तेमाल किया है। यह, दरअसल, गहरी हताशा के क्षणों में सच तक ले जानेवाला आत्मालाप और आत्ममंथन है। इसी मंथन से गुज़रते हुए बिखरे-बिखरे सारे तथ्य एक साथ इकट्ठा होते हैं और उनके बीच से सत्य सहसा फूट पड़ता है, जैसे जिग्सॉ पज़ल के सारे टुकड़े सही ठिकानों पर जुड़ गये हों। पानी की बात समझ कर, यानी तमाम टुकड़ों के जुड़ने से बनी मुकम्मल तस्वीर को देख कर, लड़के ‘दंगा भेजियो मोरे मौला’ की दुआ मांगते हैं और उनकी दुआ कबूल होती है।

‘अल्लाह ने लड़कों की दुआ कबूल कर ली थी’ – कहानी के इस आखि़री वाक्य से लगता है कि लड़के निष्क्रिय याचक भर हैं, पर इससे ठीक पहले के वाक्यों में कहानी सांकेतिक रूप से उनकी सक्रियता की ओर इशारा करती है। ‘दो दिन बाद मोमिनपुरा में भरते पानी के दबाव से हाई-वे की पुलिया टूट गयी।’ भरते पानी का दबाव मोमिनपुरा के वाशिंदों के बढ़ते असंतोष के दबाव का संकेत बन कर आया है। इसका मतलब, पुलिया टूटी नहीं, तोड़ी गयी। यह पुलिया ही थी जिससे होकर हर साल पानी को निकास मिलता था, पर इस साल प्रशासन ने किसी-न-किसी बहाने से इस काम को रोक रखा है। गू-मूत में लिथड़ कर मरते ये घिरे हुए लोग अंततः घिराव को तोड़ देते हैं। ‘घंटे-घडि़याल-शंखों का समवेत शोर बर्दाश्त के बाहर हो गया’ – यह वाक्य पुलिया टूटने की सूचना के बाद का है, पर यह कथाकाल में भी बाद का माना जाए, यह ज़रूरी नहीं। इसे पुलिया तोड़ दिये जाने की पृष्ठभूमि के रूप में भी पढ़ सकते हैं। बर्दाश्त के बाहर हो जाना इस शोर के एकाएक बहुत बढ़ जाने का अर्थ भी देता है – अपने अभिशाप से लड़ते मुसलमानों के खि़लाफ़ साम्प्रदायिक हिंदुओं की जंग का ऐलान – और मोमिनपुरा के बर्दाश्त की सीमा टूटने का अर्थ भी देता है, यानी दूसरी तरफ़ के बढ़ते हुए शक्ति-प्रदर्शन के खि़लाफ़ मुसलमानों की ओर से एक बड़ा इंकार।

ऐसी सांकेतिकता और मितकथन इस कहानी की बड़ी ताक़त है। अनिल यादव के पास बहुत लंबी-लंबी कहानियां भी हैं, जिनके मुक़ाबले ‘दंगा भेजियो मौला!’ बिल्कुल शास्त्रीय अर्थों में ‘शॉर्ट स्टोरी’ है। डिमाई आकार के लगभग छह पृष्ठ। इस मझोले आकार में एक बड़ी बात को रखने की कला जैसी इस कहानी में है, वैसी खुद अनिल अपनी दूसरी कहानियों में अर्जित नहीं कर पाए हैं। पढ़ते हुए आप महसूस करते हैं कि वाचक ज़रूरी ब्यौरे देने में कोई कटौती नहीं कर रहा, लेकिन अपने वर्णनों-विवरणों में कहीं रमने को राज़ी नहीं है; जिस स्याह यथार्थ को वह उकेर रहा है, उसमें रमना एक अपराध है। वेदना में व्यक्ति या तो प्रलाप करता है, या बहुत कम बोल कर काम चलाता है। ‘दंगा भेजियो मौला!’ कम बोलनेवाली कहानी है। लगभग स्तब्ध अभिव्यक्ति जैसा ढब, भाषा की ख़पत में कोई शाहख़र्ची और इत्मीनान नहीं, एकदम ज़रूरत और भावनाओं के गहरे दबाव से निकले शब्द, और उतना ही कहकर आगे बढ़ जाना जितना कहकर लगा कि बात पूरी हो गयी। ऐसा अनुपात-बोध इधर की कहानियों में विरल है। कहानीकार कहीं भी विमर्श को वाचाल ढंग से पेश करने या आरोपित करने को समुत्सुक नहीं है। विरले ही कहीं ‘अभिमत’ के रूप में कोई बात कही गयी है; प्रस्तुति का अधिकांश ‘तथ्य-कथन’ की शक्ल में है। ‘तथ्य’ के पीछे ‘अभिमत’ का बल होता है, या कहें कि तथ्यों के चयन-संयोजन में अभिमत व्यंजित होता है, यह बात अलग है।

कहानी अपनी पूरी संरचना में सुसंगत है। यहां कुछ भी अलग नहीं छिटकता – न दृश्य, न ब्यौरे, न भाषा, न कथा-युक्तियां। इनमें से कोई अपने लिए नहीं है, सभी एक-दूसरे के लिए हैं। भारतीय मुसलमान की जिस अंधकारपूर्ण नियति को कहानीकार सामने रखना चाहता है, वह इस सुसंगत संरचना के कारण एक समग्र प्रभाव के रूप में उभरती है। कहानीकार की ख़ासियत है कि वह अपने सघन गद्य के बीच एकाएक कोई बहुत काव्यात्मक बिंब या उक्ति ला सकता है और बिना उसके आकर्षण में फंसे आगे निकल सकता है। ‘नाव दिन भर बस्ती के दुख ढोती रही’, ‘पानी में डूबे घरों में उन बच्चों की मांओं की सिसकियों की तरह कुप्पियां भभक रही थीं’, ‘…जीवन अचानक शहर की बुनकर बस्ती की खड़कताल से बिदक कर बाढ़ में डूबे, अंधियारे कछारी गांव की चाल चलने लगता’ – ऐसी काव्यात्मक उक्तियां उसके यहां कब आकर बिना कोई अतिरिक्त अवधान पाए निकल जाती हैं, पता भी नहीं चलता। वे गद्य की लय में एकरस हैं। इसीलिए वे अपना अलग वजूद जतलाने की बजाय पिघल कर एक पूरी मनःस्थिति की निर्मिति में शामिल हो जाती हैं। इसी मनःस्थिति के सघन रचाव का परिणाम है कि पानी से बातचीत जैसी ग़ैर-यथार्थवादी युक्ति भी बहुत चुपके से आकर कहानी में घुलमिल जाती है और आपको उसके अनोखेपन का अलग से अहसास नहीं होता। प्रकृति के साथ मनुष्य की बातचीत निविड़ अकेलेपन और गहरी वेदना का चिरपरिचित साक्ष्य रहा है। ‘मेघदूत’ के यक्ष और सूरदास की गोपियों को याद कीजिए। ‘दंगा भेजियो मौला!’ में यह एक समुदाय का अकेलापन है, जिसमें प्रकृति से कुछ कहना-सुनना एक सहज व्यापार की तरह लगता है। पर यह यक्ष और गोपियों के जैसा नहीं है, जिसमें अपने भीतर इकट्ठा भावनाओं का गुबार बाहर निकाल देने के लिए एक संबोध्य ढूंढ़ लिया गया है। कहानी पढ़ते हुए आप अनुभव कर सकते हैं कि यह कहा-सुनी उन पात्रों के भीतर की है और इसी मंथन से किसी विकट सत्य को प्रकट होना है। मोमिनपुरा क्रिकेट क्लब के कुछ लड़के हमेशा नाव पर ही रहने लगे हैं, ताकि रात में गिरनेवाले मकान में फंसे लोगों की जान बचाने के लिए हमेशा तैयार मिलें। ‘दिन बीतने के साथ बदबूदार हवा के झोंकों से नाव झील पर डोलती रही, तीन तरफ़ से बस्ती को घेरे कालोनियों की रोशनियां काले पानी पर नाचती रहीं, हर रात बढ़ते पानी के साथ बादलों से झांकते तारों समेत आसमान और क़रीब आता रहा। सावन बीता, भादों की फुहार में भींगते शहर से घिरे दंड-द्वीप पर अकेली नाव में रहते काफ़ी दिन बीत गए और तब लड़कों के आगे रहस्य खुलने लगे।… पानी, हवा, घंटे-घडि़याल, मर कर उतराते जानवर, गिरते मकान, रोशनियों का नाच, सितारे और चींडियों के झुंड – सभी कुछ न कुछ कह रहे थे। एक रात जब पूरी टीम बादलों भरे आसमान में आंखें गड़ाए प्रभात-फेरी का इंतज़ार कर रही थी, पानी बहुत धीमे से बुदबुदाया, ‘‘दंगा तो हो ही रहा है।’’

एक समूह/समुदाय का भयावह अकेलापन, उस अकेलेपन में चलनेवाला आत्ममंथन और उस आत्ममंथन से उपजा एक सच जो आसपास की हर शै के परस्पर संबंध से निकलनेवाला अर्थ है – इसे इतने संयम और सांकेतिक लाघव के साथ व्यक्त कर पाना हर कहानीकार के बस की बात नहीं हैं।

पीछे संरचना की सुसंगतता की बात की गयी। वह घटकों के अचूक संष्लेश में ही नहीं, कहानी की शुरुआत और अंत की सधी हुई योजना में भी है। कहानी एक दृश्य से शुरू होती है और एक दृश्य के साथ ख़त्म होती है; बीच का लगभग पूरा हिस्सा परिदृश्य का विस्तार है। जिस जगह जाकर वह ख़त्म होती है, वहां आप कहानी का बाक़ायदा अंत होना महसूस करते हैं। यह उन कहानियां की तरह नहीं है जो अपनी तमाम खूबियों के बावजूद अंत की ओर अधर में लटक जाती हैं। उनके उदाहरण फिर कभी। कोई कहानी अपनी पूरी बनावट से अंत संबंधी कैसी अपेक्षाएं जगाती है, और किस तरह की कहानियों में कोई ‘अंत’ ज़रूरी होता है, किनमें नहीं, इस पर भी फिर कभी। फिलहाल इतना ही कि ‘दंगा भेजियो मौला!’ को पढ़ते हुए आप एक बाक़ायदा अंत की अपेक्षा करते हैं और कहानी इस अपेक्षा को पूरा करती है। अनिल यादव की ही ‘लोककवि का बिरहा’ या ‘आर जे साहब का रेडियो’ जैसी कहानियों को पढ़ें तो स्पष्ट हो जाएगा कि कहानी की पूरी उठान से जगनेवाली अपेक्षा के मुक़ाबले कमज़ोर अंत का क्या मतलब होता है; जैसे अपनी दौड़ शानदार ढंग से पूरा करता कोई धावक फि़निश लाइन से ठीक पहले लड़खड़ा कर बैठ जाए!

पता नहीं, इपंले कह पाया या नहीं, पर वह कहना यही चाहता था कि अगर शुरुआत से ही कोई कहानी आपको गिरफ़्त में नहीं ले लेती, तो यह पाठक के रूप में आपकी अयोग्यता की निशानी भी हो सकती है और अगर आप थोड़ी मुश्किल उठाने को तैयार हो जाएं, तो अपनी इस अयोग्यता से उबरा भी जा सकता है।

[1] यों तो हर रूपक में बात को भटका कर अनजान दिशाओं की ओर ले जाने का दुर्गुण होता है, पर यह तो और भी दुष्ट है। दुष्ट माने दोषपूर्ण, जैसे शास्त्रों में वर्णित ‘दुष्ट काव्य’। पाठक अगर पंछी है और कहानीकार बहेलिया, तो पठन का सुख पाठ की गिरफ़्त में आने से पहले तक ही समझना चाहिए। गिरफ़्त में आने के बाद सुख का क्या मतलब? यानी इस रूपक की मानें तो पढ़ना एक सज़ा है (और वह असंगति अलंकार भी यहां कारगर नहीं कि ‘मज़ा इसमें इतना मगर किसलिए है’)! इसीलिए कहा, बहुत घटिया रूपक है। इसे थोड़ा ज़्यादा बोलने की इजाज़त दें तो कमबख़्त अनाप-शनाप बकने लगेगा।

संजीव कुमार

संजीव कुमार

संजीव कुमार। युवा आलोचक और कहानीकार। ‘जैनेन्द्र और अज्ञेयः सृजन का सैद्धांतिक नेपथ्य’ पुस्तक के लिए देवीशंकर अवस्थी सम्मान। दिल्ली विश्विद्यालय के देशबंधु कॉलेज में  प्राध्यापक। इनसे sanjusanjeev67@gmail.com पर संपर्क सम्भव है।

साभार- हंस, सितम्बर, 2015

Advertisements

भीष्म साहनी की कहानी-(अ)कला: संजीव कुमार

हिंदी कहानी के आन्दोलन ने जहाँ एक और पुरानी जड़ता को तोड़कर नयी ज़मीन तैयार की, वहीँ उसमें कभी मूर्खतापूर्ण और कभी षड्यंत्रपूर्ण चयनवाद भी उभरा. हिंदी के कई महत्वपूर्ण कहानी लेखक इस चयनवाद के शिकार हुए. ऐसे आन्दोलनों के शिकार भीष्म साहनी  भी हुए. यह चयनवादी आलोचना उनकी भी थी जो अपने को प्रगतिशील और जनवादी सिद्ध करने के लिए कुछ भी कर रहे थे.  इस चयनवाद के शिकार भीष्म साहनी जी अकेले नहीं हुए. कई दूसरे महत्वपूर्ण हिंदी कथा लेखक और कवि या तो पीढ़ियों के अंतराल के नाम पर आधुनिक न रहे या फिर उनके सामाजिक संघर्ष को क्रांतिकारी  तत्त्वों में शामिल न किया गया. यह अवश्य ही दुर्भाग्यपूर्ण परिस्थिति थी जिसके विरुद्ध आज भी संघर्ष करने की आवश्यकता बनी हुयी है. खासकर तब; जबकि क्रांतिकारिता की व्याख्या सामाजिक परिवर्तन के दूसरे छोर पर जा रही है…. फिट्गेराल्ड ने कभी कहा था, ‘मैं अपने समकालीनों के साथ नहीं होना चाहता, क्योंकि मेरी नियति भविष्य के कूड़ेदान में नहीं होगी.’ भीष्म साहनी अपने समय के साथ हो सकते हैं, अपने समकालीन लेखकों के साथ नहीं…. ऐसा नहीं है कि भीष्म साहनी जी अपनी कहानियों के कलात्मक रूपगठन के प्रति असचेष्ट हों. वे इस दिशा में यशपाल की उस शैली का थोड़ा अभ्यास किया मालूम पड़ते हैं जो प्रतिमुखता का एक नाटकीय चरम बिंदु पूरे घटनाक्रम के भीतर से खड़ा कर लेती है और हमें अभिभूत करती है… आधुनिकतावादी लेखकों ने कथानक को प्रायः व्यर्थ बना दिया है. हिंदी में प्रेमचंद-यशपाल से लेकर भीष्म साहनी और अमरकांत-रेणु ने उनकी पुनः प्रतिष्ठा के लिए संघर्ष किया है. भीष्म जी की तमाम कहानियों की रूप-रचना में एक कथानक होता है, एक भरी-पूरी कहानी होती है, जिसमें अकेला चरित्र अपनी भीतरी परिस्थितियों में कम होता है. एक पूरा व्यापाररत समुदाय उनके साथ दिखता है. ..कहानीपन की रक्षा का संघर्ष कहानी की रचनात्मक पहचान के लिए आवश्यक हो गया है. आज की अधिकांश कहानियों में हलचल तो बहुत होती है, पर अंतर्वस्तु में एक रिक्तता-सी लगती है.  # सुरेन्द्र चौधरी (‘हिंदी कहानी : रचना  और परिस्थिति ‘ में संकलित  ‘भीष्म  साहनी : नए  राष्ट्रीय बोध के अन्वेषक ‘ लेख से )  

फोटो- त्रिभुवन तिवारी, आउटलुक से साभार

फोटो- त्रिभुवन तिवारी, आउटलुक से साभार

   

By संजीव कुमार

यह थोड़ा अजीब तो है, पर क्या करें, कि कहानीकार भीष्म साहनी के बारे में सोचते हुए बरबस ‘मोहन जोशी हाजि़र हों’ और ‘तमस’ वाले अभिनेता भीष्म साहनी याद आ जाते हैं। दोनों जगह उनका किरदार ऐसा था जिसमें आविष्ट नाटकीयता वाले क्षणों की पर्याप्त गुंजाइश थी, पर भीष्म जी के अभिनय ने उन क्षणों को असाधारण तरीक़े से उभारने में कोई दिलचस्पी नहीं दिखायी। उसे किसी चिह्नित की जाने योग्य नाटकीयता के हवालेे नहीं किया। बस, जीवन के सहज प्रवाह का थोड़ा असहज हो जाना ही चिह्नित हो पाया। लगा, हम सामान्य दिनचर्या में आए हुए कुछ व्यतिक्रमों से रू-ब-रू हैं, उन व्यतिक्रमों के प्रति अतिरिक्त रूप से संवेदनशील बनानेवाली अभिनय-कला से नहीं। मानो हम बिना किसी नाटकीयता के प्रत्यक्ष जीवन की सादगी का साक्षात्कार कर रहे हों, उस जीवन की कलात्मक पुनर्रचना का नहीं।

कहानीकार भीष्म साहनी भी ऐसे ही हैं। उनकी कहानियां कथा-स्थितियों और पाठक के बीच किसी कहानीकार की मध्यस्थता का अहसास नहीं होने देतीं। बेहद सीधे-सादे तरीक़े से वे कहानी कहते चले जाते हैं। कहीं कोई चमकता हुआ वाक्य नहीं, कोई ऐसी साहित्यिक हिकमत नहीं जिसे देखकर आप ‘वाह’ कह उठें, कहीं किसी प्रसंग को थम-ठहर कर अलग से उभारने का जतन नहीं। आचार्य रामचंद्र शुक्ल होते तो शायद कहते कि इन्हें जीवन के मार्मिक स्थलों की पहचान नहीं है, इसलिए उन जगहों पर ठहर कर धैर्य से रमते नहीं हैं। पर मार्मिक स्थलों की पहचान का यह सूत्र तुलसीदास पर, या पुरानी/प्रचलित कथा को उपजीव्य बनानेवाले किसी भी रचनाकार पर तो लागू हो सकता है, भीष्म जी पर लागू नहीं हो सकता। तुलसी के पास कथा पहले से थी, विमर्श और वक्रता ही अपनी थी। उन्हेें एक पूर्वप्रचलित कथा में धैर्यपूर्ण ट्रीटमेंट की मांग करनेवाले मार्मिक स्थलों की पहचान करनी थी। भीष्म जी के पास कथा – यानी घटनाओं का कंकाल – और विमर्श, दोनों अपना है। उन्हें किसी पहले की कथा में ख़ास अपनी वक्रता पैदा नहीं करनी है। उनका कौशल उपजीव्य कथा की घटना-शृंखला में मार्मिक स्थलों की पहचान कर उसका सधे हाथों से ट्रीटमेंट करने में नहीं, स्वयं ऐसे स्थलों की कल्पना-उद्भावना करने में निहित है – ऐसी कथा-स्थितियों की उद्भावना जहां पात्र और परिस्थितियों के घात-प्रतिघात से जीवन का कोई मार्मिक पक्ष, कोई दबा हुआ आशय, कोई पहचाना किंतु अनपहचाना-सा सत्य बेसाख़्ता उभर आये।… और इस काम में भीष्म साहनी माहिर हैं। शायद इसी महारत केे चलते उनमें सीधेे-सादे ढंग से कहानी कह जानेे का दुर्लभ-सा आत्मविष्वास है।

भीष्म जी की इस विशेषता को नामवर सिंह ने अचूक ढंग सेे पहचाना था। ‘कहानी नयी कहानी’ में कहानी की संरचना को लेकर जगह-जगह अनेक सूत्र देते हुए जिस सूत्र के उदाहरण के रूप में उन्होंने भीष्म साहनी का उल्लेख किया है, उसे याद कीजिए। सजीव बिंब, सांकेतिकता, ‘आधारभूत विचार का द्रवीभूत होकर संपूर्ण कहानी के शरीर में भर उठना’, वातावरण-निर्माण, टेक्स्चर – इन सबकी चर्चा करते हुए भीष्म साहनी की कहानियां उदाहरण नहीं बनी हैं। वे उदाहरण बनी हैं इस सूत्र का: ‘‘कहानी जीवन के टुकड़े में निहित ‘अंतर्विरोध’, ‘द्वंद्व’, ‘संक्रांति’ अथवा ‘क्राइसिस’ को पकड़ने की कोशिश करती है और ठीक ढंग से पकड़ में आ जाने पर यह खंडगत अंतर्विरोध ही वृहद् अंतर्विरोध के किसी-न-किसी पहलू का आभास दे जाता है।… यह एक विरोधाभास है कि कहानी जैसा एकान्वित शिल्प अंतर्विरोध पर निर्भर होता है। नये कहानीकारों में भीष्म साहनी में एक ही साथ इन दोनों विशेषताओं का सर्वोत्तम सामंजस्य मिलता है। इस दृष्टि से भीष्म साहनी सबसे सफल कहानीकार हैं।’’ इसके बाद वे ‘चीफ़ की दावत’ का सधा हुआ विश्लेषण करते हैं और बताते हैं कि किस तरह कहानी की मां केवल एक चरित्र नहीं रह जाती, संपूर्ण प्राचीन का प्रतीक बन जाती है। और किस प्रकार ‘एक समर्थ कहानीकार जीवन की छोटी-से-छोटी घटना में अर्थ के स्तर-स्तर उद्घाटित करता हुआ उसकी व्याप्ति को मानवीय सत्य की सीमा तक पहुंचा देता है।’

यह अकारण नहीं है कि जीवन के टुकड़े में निहित अंतर्विरोध, द्वंद्व, क्राइसिस आदि को पकड़ने के उदाहरण के रूप में ही भीष्म जी याद आये, सजीव बिंब या वातावरण-निर्माण या ‘संगीत का-सा प्रभाव उत्पन्न करने’ का सामथ्र्य आदि के उदाहरण के रूप में नहीं। प्रतीक की बात ज़रूर की गई है (‘संपूर्ण प्राचीन का प्रतीक’), पर यह सायास नियोजित प्रतीक के अर्थ में नहीं है, जैसा राजेंद्र यादव या मोहन राकेश के यहां मिलता है। मोहन राकेश की ‘एक और जि़ंदगी’ में कोर्टरूम के भीतर पंखे से कटकर नीचे गिरे पक्षी का प्रतीक एक सजग सहित्यिक युक्ति है जो तलाक लेते पति-पत्नी के बच्चे की लहूलुहान आत्मा का प्रतीकार्थ व्यक्त करने के लिए प्रयुक्त हुई है। ‘चीफ़ की दावत’ की मां को ऐसी साहित्यिक युक्ति केे अर्थ में प्रतीक नहीं कहा गया है। इसीलिए मां प्रतीक ‘है’ नहीं, प्रतीक ‘बन जाती है’। प्रतीक ‘बन जाना’, दरअसल, पठन के स्तर पर उपलब्ध की गई व्यंजना या ध्वनि है, जो इसीलिए संभव हुई है कि कहानीकार ने एक अंतर्विरोध से जुड़ी विडंबना को सफ़ाई से पकड़नेवाली कथा-स्थिति निर्मित की है। कोई आष्चर्य नहीं कि मां के प्रतीक बन जाने की बात कहते हुए नामवर सिंह को काव्यशास्त्र में वर्णित व्यंजना की याद आई: ‘‘काव्यशास्त्र के आचार्यों ने मुख्यार्थ के भीतर से जो अर्थ की व्यंजना कराई है, वह भी इसी का रूप है। जीवन का सत्य इसी तरह खंड के भीतर से, किंतु उसे खंडित करता हुआ पूर्ण की ओर संकेेत करता है; खंड की सीमा को तोड़कर पूर्ण में मिलता है, मुख्यार्थ को बाधित करके रसमय अर्थ को व्यंजित करता है…।’’

मुख्यार्थ से आगे जाकर व्यंजित होनेवाला अर्थ (मुख्यार्थ कोे बाधित करके नहीं, मुख्यार्थ-बाध लक्षणा का लक्षण है; इस बात पर नामवर जी के नंबर कट सकते हैं), खंड की सीमा को तोड़कर पूर्ण में मिलता जीवन-सत्य – भीष्म जी की कहानियों की यह विशेषता उन्हें सीधा-सादा नहीं रहने देती, अंदाज़े-बयां में वे जितनी भी सीधी-सादी लगें। इसीलिए कहा है, दिल को देखो, चेहरा न देखो…। वस्तुतः अंदाज़े-बयां की सादगी और कहानी विधा की अपनी आकारिक सीमाओं के साथ भीष्म जी जितनी बड़ी वास्तविकताओं की ओर संकेत कर पाते हैं, वही उनके महत्व का आधार है। उनकी यादगार कहानियां – ‘चीफ़ की दावत’, ‘वाड्.चू’, ‘ओ हरामज़ादेे’, ‘अमृतसर आ गया है’, ‘अहम् ब्रह्मास्मि’ आदि – इसीलिए यादगार हैं। ‘वाड्.चू’ का उदाहरण लें। किसी भावुक कर देनेवाले संस्मरण की तरह प्रतीत होती यह कहानी आपको अचूक ढंग से यह अहसास कराती है कि व्यक्तिगत स्तर पर अपने दौर से विदाई ले लेना किसी के लिए संभव नहीं। आपका दौर आपका पीछा नहीं छोड़ता। वाड्.चू पुरानी पोथियों में ही घुसा रहता है, महाप्राण बुद्ध के प्रति एक भावुक लगाव में सिमटा। उसे न नेहरू से मतलब है, न चाउ एन लाई से। उसके अंदर मातृभूमि को लेकर कोई नाॅस्टैल्जिक भाव नहीं है, भले ही कहानी के प्रथम पुरुष वाचक को यह लगता रहा हो कि एक बार अपनी ज़मीन पर लौटने के बाद दुबारा भारत आना उसके लिए भावनात्मक कारणों से संभव नहीं होगा। वाड्.चू के साथ ऐसा कुछ नहीं होता। वह चीन जाता है और दुबारा अतीत की उन्हीं पोथियों में शरण पाने के लिए भारत लौट आता है। लेकिन दोनों जगह वह राज्यतंत्र की निगाह में संदिग्ध है। कोई यह मानने को तैयार नहीं कि वह किसी राज्यतंत्र के लिए हानिरहित एक अतीतजीवी प्राणी है। उसका दौर उसका पीछा करता रहता है और जब पीछा करना छोड़ता है, तब तक वाड्.चू का सर्वस्व लुट चुका होता है। अपने आसपास जितना अतीत उसने इकट्ठा कर रखा था, पांडुलिपियों और नोट्स की शक्ल में, जो उसकी दृष्टि में अत्यंत मूल्यवान था, छिन्न-भिन्न हो जाता है। वाड्.चू का जीवन सारहीन, बेमानी-सा हो जाता है और कुछ समय बाद उसकी मृत्यु हो जाती है। मानो एक ख़ास तरह के पर्यावरण में ही जी पानेवाले प्राणी से उसका पर्यावरण छीन लिया गया हो।

क्या वाड्.चू की त्रासदी को एक व्यक्ति की बदकि़स्मती के रूप में पढ़ा जा सकता है? निस्संदेह, पढ़ा तो जा ही सकता है, पर यह भी निष्चित है कि एक चरित्र और उसके साथ परिस्थितियों के इस घात-प्रतिघात की योजना भीष्म जी ने इतने संकरे पठन के लिए नहीं की है। अनैतिहासिक और समय-निरपेक्ष होकर जिया नहीं जा सकता, यह कठोर सचाई वाड्.चू की त्रासदी में व्यंजित होती है और यह व्यंजना व्यक्तियों से आगे वर्गों, समुदायों और राष्ट्रों पर भी लागू होती है। ‘खंड की सीमा को तोड़कर पूर्ण में मिलता जीवन-सत्य’ यही है जिसको साधने में यह सीधी-सादी कहानी कामयाब है। और इसे साधने के लिए भीष्म जी किसी ऐसी हिकमत का प्रयोग नहीं करते जिसे मैं थोड़े मज़ाकिया लहज़े में ‘सफऱ्ेस टेंशन’ कहना पसंद करता हूं। वे कोई ऐसा वाक्य नहीं लिखते जो आपको अर्थ की किसी विशेष दिशा की ओर ढुलकाने का ज़रिया बन जाए। बावजूद इसके अभिधा से आगे व्यंग्यार्थ की ओर आपकी यात्रा अनिवार्य हो जाती है, क्योंकि कहानी अपने वाक्यों से नहीं, वाक़यों से वह ध्वनि पैदा करने में समर्थ है।

इस रूप में गहरी अर्थ-व्यंजनाओं से भरी कथा-स्थितियों की कल्पना करना ही कहानीकार के तौर पर भीष्म साहनी का स्व-भाव है। शैली-शिल्प में नयापन या अतिरिक्त आकर्षण पैदा करना उनका स्व-भाव नहीं है, इसीलिए जहां वे इसकी कोशिश करते भी हैं, वहां उन्हें कोई सफलता नहीं मिलती। ‘वाड्.चू’ में ही देखें तो पहले वाक्य के साथ भीष्म जी ने एक चैंकाऊ कि़स्म की शुरुआत करने की कोशिश की है: ‘तभी वाड्.चू आता दिखाई पड़ा।’ लेकिन यह ‘तभी’ बिल्कुल जमता नहीं, क्योंकि वह अपना औचित्य सिद्ध नहीं कर पाता। शैली का चैंकाऊपन कतई प्रति-उत्पादक हो जाता है। इसी तरह ‘चीलें’ कहानी में वे चील का जो प्रतीक खड़ा करने की कोशिश करते हैं, वह ख़ासा निष्प्रभावी है। दरअसल, कहानियां उनके भीतर इस तरह के वातावरणधर्मी प्रयोगों के रूप में जन्म नहीं लेती हैं। नयी कहानी में स्त्री-पुरुष-संबंधों वाले कथ्य और प्रतीकात्मक-सांकेतिक शैली-शिल्प-विधान को जो महत्व मिला था, उसने शायद धक्का देकर भीष्म जी को ऐसी कहानी लिखने के लिए प्रेरित किया। वे अपनी प्रकृति से मूड/मनःस्थिति को आधार बनानेवाले कहानीकार हैं नहीं, जैसे कि वे ‘चीलें’ में दिखना चाहते हैं।

पर इसका यह भी मतलब नहीं कि मनोविज्ञान पर उनकी पकड़ मूड/मनःस्थिति को आधार बनानेवालों के मुक़ाबले कहीं भी कमतर है। यह कहते हुए मुझे ‘चीफ़ की दावत’ समेत भीष्म जी की कितनी ही कहानियां याद आ रही हैं, पर जि़क्र सिर्फ़ ‘अहम् ब्रह्मास्मि’ का करूंगा जिसका पाठ अभी मेरी मेज़ पर नहीं है और जिसे पढ़े हुए भी लगभग तीस साल गुज़र चुके हैं। उसका मुख्य पात्र अंग्रेज़ीयत से बहुत प्रभावित है। उसे अंग्रेज़ों की सभी चीज़ें बड़ी अच्छी लगती हैं। एक बार वह कहानी के ‘मैं’ से कहता है कि देखो, अहम् ब्रह्मास्मि का जो अंग्रेज़ी अनुवाद है, वह कितना सुंदर है, ‘आई ऐम द डिवाइन फ़्लेम’। और ऐसा कहते हुए उसके चेहरे पर एक अजीब तरह का दिव्य भाव उभर आता है। फिर कहानी में एक प्रसंग आता है जिसमें एक सिनेमा हाॅल के यूरिनर से अंग्रेज़ उसे धक्के मारकर हटा देते हैं, क्योंकि वह – एक काला देसी आदमी – उन्हें इंतज़ार करवा रहा है। इस घटना के बाद जब कहानी का प्रथम पुरुष वाचक उसके घर पहुंचता है तो कमरे में न पाकर उसे ढूंढ़ता हुआ छत पर जाता है। वहां देखता है कि वह आंखें मूंदे हुए ध्यानस्थ बैठा है और बुदबुदा रहा है, ‘आई ऐम द डिवाइन फ़्लेम… आई ऐम द डिवाइन फ़्लेम’। वाचक को लगता है कि वह मंत्र बुदबुदाता हुआ सतह से दो इंच ऊपर उठ गया है।

यह कथा-सार मैं तीस साल पहले, अपनी किशोेरावस्था मेें पढ़े हुए पाठ केे आधार पर बता रहा हूं। मुमकिन है, इसमें मेरा कुछ अपना भी जुड़ गया हो। पर कहानी की मुख्य विडंबना निभ्र्रांत है। और कहने की ज़रूरत नहीं कि वह हीनता-ग्रंथि की गहरी मनोवैज्ञानिक पकड़ पर टिकी है। मनोवैज्ञानिक पकड़ के इसी अर्थ में ‘अमृतसर आ गया है’ या ‘ओ हरामज़ादे’ भी मुख्यतः मनोविज्ञान की कहानियां हैं, भले ही कहानीकार घटनाओं की जगह मनःस्थितियों के रचाव में दिलचस्पी लेता न दिखाई दे।

कुल मिलाकर, भीष्म साहनी की अनेक कहानियां कहानी विधा की शक्ति का उदाहरण हैं। जिन लोगों को यह लगता था कि इस छोटे आकार की विधा में बड़ी बात को समेटने का माद्दा ही नहीं है, उन्हें खरा उत्तर देनेवाली कहानियों में भीष्म जी की कई कहानियां शामिल हैं। सबसे बड़ी बात कि यह माद्दा कथा-कथन की सादगी और भरपूर पठनीयता को बनाये रखते हुए हासिल किया गया है। कहानीकार बनने के इच्छुक किसी नये लेखक को अगर यह आत्मविश्वास अर्जित करना हो कि वह भी कहानियां लिख सकता/सकती है तो उसे भीष्म जी की कहानियां अवश्य पढ़नी चाहिए।

संजीव कुमार

संजीव कुमार

संजीव कुमार। युवा आलोचक और कहानीकार। ‘जैनेन्द्र और अज्ञेयः सृजन का सैद्धांतिक नेपथ्य’ पुस्तक के लिए देवीशंकर अवस्थी सम्मान। दिल्ली विश्विद्यालय के देशबंधु कॉलेज में  प्राध्यापक। इनसे sanjusanjeev67@gmail.com पर संपर्क सम्भव है।

सहमत (सफ़दर हाशमी मेमोरियल ट्रस्ट) द्वारा प्रकाशित भीष्म साहनी पर केंद्रित पुस्तिका से साभार

बत्रा जी का शिक्षा बचाओ आंदोलन या ‘मस्तिष्क में सड़ांध’: संजीव कुमार

हिंदुत्ववादियों को अपनी बौद्धिक दरिद्रता के चलते (ये) ऊटपटांग बातें पूरी तरह दुरुस्त भी लगती हैं, साथ ही, उन्हें यह भी पता है कि उन्हें किन लोगों को संबोधित करते हुए उनके अज्ञान का लाभ उठाना है। शिक्षा, और उसमें भी इतिहास की शिक्षा, इसीलिए उनके निशाने पर रहती है कि इससे ऐसे लोगों की तादाद के बढ़ते जानेे का वास्तविक ख़तरा है जिन्हें उनकी बातें बेसिर-पैर की नज़र आएंगी। ग़ौरतलब है कि ये हिंदुत्ववादी विचारक (?!) कभी किसी बौद्धिक मंच पर बहसों में शामिल नहीं होते। वे उन जगहों पर जाते भी हैं तो तोड़-फोड़ या नारेबाज़ी की कार्रवाई को अंजाम देने। हां, टेलीविज़न चैनलों की बहसों में कई बार अवश्य शामिल होते हैं जहां उन्हें पता होता है कि तर्क-विवेक-सम्मत प्रतिपादन के लिए अपेक्षित धैर्य की गुंजाइश बहुत कम है और प्रदर्शनकारी कला के उपयोग की गुंजाइश बहुत ज़्यादा। ये मुख्यतः गाज-फेन उगलनेवाली बहसें होती हैं जिनमें बौद्धिक दरिद्रता को गाज-फेन के भीतर छिपा देने की सहूलियत पर्याप्त मात्रा में रहती है।  #लेखक 

This is the enemy

This is the enemy

किसकी मजाल है जो शिक्षा को बचा ले ‘शिक्षा बचाओ आंदोलन’ से

By संजीव कुमार

बातों के सिर-पैर प्राणियों के सिर-पैर की तरह नहीं होते कि उनका होना या न होना नंगी आंखों से दिख जाए।

अभी जब इपंले (इन पंक्तियों का लेखक) यह लेख लिखने बैठा है, उसके सामने विश्व हिंदू परिषद् के श्री जुगल किशोर का एक ताज़ातरीन साक्षात्कार है। श्री जुगल किशोर हिंदुओं की ‘घर वापसी’ की मुहिम के संयोजक हैं और उनका साक्षात्कार 15 दिसंबर 2014 के ‘द इकोनाॅमिक टाइम्स’ में छपा है। इसमें वे फ़रमाते हैं, ‘वेदों में मैला ढोने की प्रथा और लोगों के बहिष्कार (आशय अस्पृश्यता से है) का कोई उल्लेख नहीं है। अगर आप इन समुदायों को निकट से देखें तो उनके गोत्र सोलंकी, चौहान, सिसोदिया, राठौर आदि हैं। कारण यह कि वे पराजित राजपूत हैं जिन्हें इस्लाम न अपनाने के लिए दंडित किया गया। वे निम्न में भी निम्नतम बना दिये गये। दूसरे हिंदुओं को उनका सामाजिक बहिष्कार करने पर बाध्य किया गया। अब नरेंद्रभाई मैला ढोने की प्रथा को ख़त्म करने और मुग़ल परंपरा का अंत करने का प्रयास कर रहे हैं।’

वेदों के बाद सीधा मुग़ल काल में छलांग लगा देना, बीच में ‘गीता’ और ‘मनुस्मृति’ और इस तरह के दशाधिक पाठों तथा उनमें प्रतिबिंबित होती सामाजिक व्यवस्था को गोल कर देना, अस्पृश्यता को मुग़लों द्वारा स्थापित परंपरा बताना! – ज़ाहिर है, श्री जुगल किशोर की बातों का कोई सिर-पैर नहीं है। फिर इस तरह की बातें इतने आत्मविश्वास के साथ कैसे कही जाती हैं? दो ही कारण हो सकते हैंः या तो कहनेवाले को खुद ही यह दिखाई न दे कि उसकी बातें बेसिर-पैर की हैं, या फिर उसे यह भरोसा हो कि वह जिन लोगों तक अपनी बात पहुंचाना चाहता है, उनके पास सिर-पैैर की इस अनुपस्थिति को देखने वाली निगाह नहीं है।

इपंले को लगता है कि मामला ‘या तो, या फिर’ वाला नहीं है। दोनों कारण साथ-साथ काम कर रहे हैं। हिंदुत्ववादियों को अपनी बौद्धिक दरिद्रता के चलते ये ऊटपटांग बातें पूरी तरह दुरुस्त भी लगती हैं, साथ ही, उन्हें यह भी पता है कि उन्हें किन लोगों को संबोधित करते हुए उनके अज्ञान का लाभ उठाना है। शिक्षा, और उसमें भी इतिहास की शिक्षा, इसीलिए उनके निशाने पर रहती है कि इससे ऐसे लोगों की तादाद के बढ़ते जानेे का वास्तविक ख़तरा है जिन्हें उनकी बातें बेसिर-पैर की नज़र आएंगी। ग़ौरतलब है कि ये हिंदुत्ववादी विचारक (?!) कभी किसी बौद्धिक मंच पर बहसों में शामिल नहीं होते। वे उन जगहों पर जाते भी हैं तो तोड़-फोड़ या नारेबाज़ी की कार्रवाई को अंजाम देने। हां, टेलीविज़न चैनलों की बहसों में कई बार अवश्य शामिल होते हैं जहां उन्हें पता होता है कि तर्क-विवेक-सम्मत प्रतिपादन के लिए अपेक्षित धैर्य की गुंजाइश बहुत कम है और प्रदर्शनकारी कला के उपयोग की गुंजाइश बहुत ज़्यादा। ये मुख्यतः गाज-फेन उगलनेवाली बहसें होती हैं जिनमें बौद्धिक दरिद्रता को गाज-फेन के भीतर छिपा देने की सहूलियत पर्याप्त मात्रा में रहती है।

कोई चाहे तो कह सकता है कि बौद्धिक क्षमता की पहचान करानेवाले मानक दरअसल ऐसी निर्मितियां हैं जो आधुनिकता की पश्चिमी परियोजना द्वारा हमारे ऊपर थोप दी गयी हैं। यह बौद्धिक कर्म के आधुनिकता-निर्मित ढांचे का असर है जिसके चलते एक ख़ास प्रविधि का पालन करनेवाला, तार्किक-वैज्ञानिक चिंतन के मुहावरों में बंधा लेखन ही हमारे लिए उत्तम बौद्धिकता की निशानी होता है। जिन विचारकों में ग़ैरमिलावटी भारतीयता बची हुई है, उनके यहां यह निशानी न मिले, यह स्वाभाविक है। वस्तुतः उनके यहां ठेठ भारतीय कि़स्म की बौद्धिकता है जिसे पश्चिमी आधुनिकता ने, और इसीलिए हम जैसे जड़ों से कटे लोगों ने, बौद्धिकता मानने से इंकार कर दिया है।

यह उत्तरआधुनिक दलील प्रथमदृष्ट्या बहुत ग़लत नहीं लगती। पर शिक्षा-संस्कृति के मोर्चे पर संघ की अगुवाई करनेवालों को पढ़ें तो इस दलील की कमज़ोरी दयनीय ढंग से उजागर होने लगती है। वहां बौद्धिक कर्म के उन सदियों पुराने उसूलों का भी कोेई पालन नहीं मिलता जिनका स्वयं प्राचीन भारतीय पांडित्य-परंपरा में सख़्ती से पालन किया गया है। इसका एक अद्भुत नमूना है, दीनानाथ बत्रा की किताब ‘भारतीय शिक्षा का स्वरूप’। यह किताब अक्तूबर महीने की 29 तारीख़ को एक भव्य समारोह में वेंकैया नायडू के हाथों लोकार्पित हुई जिसमें श्री नायडू ने इस किताब की, और साथ ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की ओर से शिक्षा-संस्कृति के मोर्चे पर काम करनेवाले समर्पित प्रचारक बत्रा जी की भूरि-भूरि प्रशंसा की।

किताब पर आने से पहले आदरणीय दीनानाथ बत्रा के महत्व को रेखांकित करना ज़रूरी है। शिक्षा बचाओ आंदोलन की अगुवाई करते हुए 2014 में वेंडी डाॅनीगर की किताब ‘द हिंदूज़: ऐन आॅल्टरनेटिव हिस्ट्री’ को लुगदी करवाने में कामयाबी हासिल कर वे चर्चा में आये थे। वैसे वे काफ़ी समय से संघ के शिक्षा-नीति-निर्धारकों में रहे हैं और राजग-1 के दौरान 2001 में एन.सी.ई.आर.टी. के सलाहकार के तौर पर उन्होंने उस समिति का नेतृत्व किया था जिसने इतिहास की किताबों में से हिंदू राष्ट्रवादियों को ठेस पहुंचानेवाले हिस्सों को निकाल बाहर करने के काम को अंजाम दिया। शिक्षा के भारतीयकरण और उसमें मूल्य-शिक्षा के समावेश के उद्देश्य से बत्रा जी ने नौ पाठ्यपुस्तकें भी लिखीं, जिनका गुजराती में अनुवाद कर गुजरात सरकार ने अपने 42000 विद्यालयों में उन्हें पढ़ाना अनिवार्य किया है। इनमें ‘तेजोमय भारत’ और ‘प्रेरणादीप 1’ ‘प्रेरणादीप 2’ जैसी किताबें हैं जिनमें विद्यार्थियों के लिए परोसी गयी सामग्री काफ़ी चर्चा में रही है। मसलन, ‘तेजोमय भारत’ में महाभारत की कथा के आधार पर प्राचीन भारत में स्टेम सेल रिसर्च होने, टेलीविज़न के होने, अनश्व रथ के नाम से मोटरकार की मौजूदगी इत्यादि की जानकारी दी गयी है। ‘प्रेरणादीप’ के अलग-अलग भागों में स्पष्ट नस्लवादी मिज़ाज वाली ‘शिक्षाप्रद’ कहानियां हैं। गुजरात के निवर्तमान मुख्यमंत्री और देश के वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्वयं इन किताबों के महत्व पर प्रकाश डाला है और भारतीय शिक्षा के उद्धार की मुहिम में बत्रा जी के महती योगदान को एकाधिक अवसरों पर स्वीकार किया है।

इन बातों से समझा जा सकता है कि राजग-2 में शिक्षा के स्तर पर जो कुछ होने जा रहा है – और ज़ाहिर है कि बहुत कुछ होने जा रहा है – उसमें दीनानाथ बत्रा नेतृत्वकारी भूमिका में रहेंगे। ऐसे व्यक्ति के विचारों को सीधे उसकी पुस्तक से हासिल करने में किसकी दिलचस्पी नहीं होगी! लिहाज़, इपंले प्रभात प्रकाशन से साढ़े तीन सौ रुपये में उनकी किताब ख़रीद लाया और यद्यपि उसे पढ़ना असंभवप्राय था, उसने पढ़ने की कोशिश में कोई कसर नहीं रखी। इस कोशिश के दौरान जो अनुभव हुए, उनका सारांश आगे दिया जाता है।

अगर आप आजकल के बाबाओं को प्रामाणिक भारतीयता का सबसे ठोस उदाहरण मानते हों, तो बत्रा जी की यह किताब भारतीयता से ओतप्रोत है। इसकी अंतर्वस्तु और शैली, दोनों बाबाओं के प्रवचन जैसी है। इसमें न किसी उद्धरण का स्रोत बताने की ज़हमत उठाई गयी है, न किसी तथ्य को प्रमाणपुष्ट करने की। (वह सब बत्रा जी कह रहे हैं, यही क्या काफ़ी नहीं है!) उद्धृत किये गये लोगों का पूरा परिदृश्य इतना वैविध्यपूर्ण है कि आप दंग रह जाएंगे। यहां श्री मां, साईं बाबा, एकनाथ जी, स्वामी रंगनाथन, मां शारदा इत्यादि से लेकर विक्टर ह्यूगो, स्वामी विवेकानंद, रामकृष्ण परमहंस, महात्मा गांधी, बिनोवा भावे, गिजुभाई, दीनदयाल उपाध्याय, श्री गोलवलकर, डाॅ. कोठारी, डाॅ. राधाकृष्णन और पता नहीं कौन-कौन से विचारक मौजूद हैं और ऐसा लगता है कि इन सबने मिल कर कुछ एक जैसी ही बातें कही हैं। उद्धरणों के साथ कहीं भी संदर्भ नहीं बताया गया है, पर वह उतनी चिंताजनक बात नहीं। चिंताजनक यह है कि पढ़ कर कई बार संदेह होता है कि लेखक अपने ही शब्दों पर उद्धरण चिह्न ठोंक कर उन्हें किसी नामी-गिरामी के हवाले किये दे रहा है। पृष्ठ 177 पर स्वामी विवेकानंद का एक उद्धरण हैः ‘‘समझ के बिना कोरा ज्ञान मस्तिष्क में पड़ा सड़ांध पैदा करता है। प्रेम के ढाई अक्षर आत्मसात करने से जीवन सफल तथा धन्य हो जाता है।’’ फिर 186 पर विवेकानंद का उद्धरण हैः ‘‘शिक्षा जानकारियों का ढेर नहीं, जो मस्तिष्क में पड़ा रहकर सड़ांध पैदा करता है। ज्ञान के चार अक्षर भी यदि हम जीवन में आत्मसात कर लें तो हमारा जीवन सफल हो जाए।’’ चूंकि दोनों उद्धरणों का स्रोत नहीं बताया गया है, इसलिए प्रामाणिकता जांची नहीं जा सकती, पर यह अनुमान लगाया जा सकता है कि ‘मस्तिष्क’, ‘सड़ांध’, ‘अक्षर’, ‘जीवन’, ‘आत्मसात’ और ‘सफल’ जैसे शब्दों को दुहराते हुए, और ‘प्रेम के ढाई अक्षर’ तथा ‘ज्ञान के चार अक्षर’ का अंतर बरत कर, दो जगह दो बातें स्वामी विवेकानंद ने नहीं कही होंगी। यह बत्रा जी की अपनी मेधा से निकले हुए सूत्र ही हो सकते हैं जिन्हें अधिक वज़न देने के लिए उन्होंने विवेकानंद के नाम कर दिया है। यह बात तब और पुष्ट होती है जब आप पाते हैं कि पृष्ठ 17 पर लेखक बिना किसी को उद्धृत किये यह बात कह रहा हैः ‘‘शिक्षा जानकारियों का ढेर नहीं है, जो मस्तिष्क में पड़ी रहकर सड़ांध पैदा करती है।’’ फिर पृ. 205 पर उसके अपने शब्दः ‘‘शिक्षा कोरा अक्षर-ज्ञान नहीं है, जो मस्तिष्क में पड़ा सड़ांध पैदा करता है।’’ और तो और, इसी पुस्तक में बत्रा जी की जो कविताएं संकलित हैं, उनमें भी यह रचनात्मक सूत्रीकरण मिलता है, जिससे यह अंतिम रूप से सिद्ध हो जाता है कि विवेकानंद को इसका श्रेय उन्होंने महज़ उदारतावश दे दिया था। कविता पंक्ति हैः ‘यदा-कदा मास्टरजी आते हैं, मस्तिष्क में ढूंसते हैं अक्षरज्ञान / वह वहां सदा सड़ांध पैदा करता है, नहीं है यह अनुभूत ज्ञान।’

ग़रज़ कि सड़ांध ने बत्रा जी के शिक्षा-चिंतन पर लगभग क़ब्ज़ा जमा लिया है। यह स्वामी विवेकानंद के चिंतन से आया हुआ शब्द है, ऐसा मानने को जी नहीं करता, पर जांच कैसे हो!

पृष्ठ 186 पर डाॅ. राधाकृष्णन को लेखक ने अंग्रेज़ी में उद्धृत किया हैः “Stagnation is death and motion is life”। यही वाक्य इसी तरह पृष्ठ 177 पर लेखक की अपनी बात के रूप में है। अब चूंकि राधाकृष्णन स्वयं बत्रा जी के जीवनकाल में रहे हैं, इसलिए यह भी नहीं कहा जा सकता कि बत्रा जी के रूप में उनका पुनर्जन्म हुआ है और दोनों एक ही व्यक्ति हैं!

किताब में आये सभी उद्धरणों का हाल ऐसा ही है। कुछ नमूने देखें:

पूर्व राष्ट्रपति ए.पी.जे. अब्दुल कलाम ने लिखा है-

जब हृदय में शुद्धता हो, तो चरित्र में सुंदरता आ जाती है,

यदि चरित्र सुंदर हो तो, परिवार में समरसता होती है। -पृ. 32

श्रीमां का कहना है- ‘‘जो व्यक्ति लक्ष्यविहीन है, वह सुखविहीन तथा श्रीविहीन है।’’ -पृ. 107

ऐसे व्यक्तियों के संबंध में स्वामी रामतीर्थ ने कहा है-

“He has the strength of ten, because his heart is pure. -पृ. 183

मैक्समूलर ने लिखा था- “We have conquered India once we shall conquer it again through Education.” (उद्धरण यथावत) -पृ. 218

यूसुफ अली की पुस्तक, जिसमें उसने महिलाओं/बालिकाओं की शिक्षा के संबंध में जो विचार लिखे हैं, वे विचार करने योग्य हैं। उसका कथन है कि जब तक लड़कियों की शिक्षा में सुधार नहीं होता, तब तक भारत की स्थिति में सुधार की संभावना बहुत ही कम है।  -पृ. 43

ऐसे उद्धरणों से पूरी किताब भरी पड़ी है। बात किसी भी स्तर की हो, उसे किसी-न-किसी के उद्धरण से पुष्ट किया गया है। लेखक को यह भले ही न पता हो कि संदर्भ-सहित उद्धरण किस तरह दिये जाते हैं, यह अवश्य पता है कि अपनी हर बात को किसी और के हवाले से पुष्ट करते चलना एक प्रतिष्ठाप्राप्त अकादमिक पद्धति है। इस पद्धति का उपयोग करने के लिए सचमुच जो श्रम करना पड़ता है, उसकी क्षमता और अवकाश न भी हो तो क्या फ़कऱ् पड़ता है? अपनी ओर से वाक्य बनाओ और उसे किसी के हवाले कर दो! जहां कोई बड़ा नाम ध्यान न आए, वहां ‘एक शिक्षाविद् का मत’ बताकर काम चला लो (पृ.23)। इसी पृष्ठ पर किन्हीं राडन और सर आपर्सीनन को भी उद्धृत किया गया है जिनके बारे में कुछ पूछते हुए भी इपंले को डर लगता है कि कहीं लोग पलटकर यह न कह बैठें कि अरे, इन्हें नहीं जानते, कैसे अनपढ़ हो? इसलिए इपंले यह क़यास लगाने की गुस्ताख़ी नहीं करेगा कि ये नाम काल्पनिक भी हो सकते हैं। हां, यह कहने की गुस्ताख़ी ज़रूर करेगा कि यह जो कोई विदेशी या ख्रिस्तान है राडन नाम का, उसने शिक्षा का ‘उद्देश्य व्यक्ति का परम्ब्रह्म में विलय प्राप्त करना’ तो नहीं ही बताया होगा, जैसा कि उसके नाम से उद्धृत कथन में बताया गया है। लिहाज़ा, या तो राडन का नाम काल्पनिक है या फिर उसका कथन। शायद इसीलिए अपनी कल्पना को और कष्ट न देकर बत्रा जी ने उसी पृष्ठ पर अन्यत्र ‘एक शिक्षाविद्’ से काम चला लिया है।

चूंकि इस तरह के उद्धरणों की प्रामाणिकता को जांचने का कोई तरीका नहीं है, इसलिए बत्रा जी यहां बाइज़्ज़त न सही, संदेह का लाभ पाकर निकल जाते हैं; फंसते वहां हैं जहां सचमुच किसी प्रसिद्ध कथन या काव्यांश को उद्धृत कर बैठते हैं। ‘कामायनी’ की पंक्तियों का उन्होंने क्या हाल किया है, देखिये:

‘‘ज्ञान भिन्न, क्रिया भिन्न,

और इच्छा क्यों पूरी हो मन की।

यदि एक-दूसरे से ना मिल सकें,

तो विडंबना है जीवन की।’’   -पृ.127

प्रसाद जी के साथ एक ही बार ऐसा बरताव करके वे संतुष्ट नहीं हुए। दुबारा-तिबारा भी किया। पृ. 186 और फिर पृ. 220 पर यह छंद इस रूप में उद्धृत है:

‘‘ज्ञान-भिन्न क्रिया कुछ और,

इच्छा क्यों पूरी हो मन की,

एक-दूसरे से न मिल सकें,

तो विडंबना है जीवन की।’’

इसी तरह एक छोटी-सी कहानी रचते हुए लेखक ने लक्ष्मण और उनकी पत्नी उर्मिला के बारे में लिखा है, ‘‘लक्ष्मण जब वनवास जाने लगे थे तो उन्होंने कहा था कि मैं श्रीराम के साथ जा रहा हूं, यह नहीं कहा कि मैं कब लौटूंगा। उर्मिला ने अपनी एक सखी से यह शिकायत की थी कि सखि, वे मुझसे कहके जाते।’’ (पृ. 269) याद कीजिए कि ‘सखि, वे मुझसे कह कर जाते’ मैथली शरण गुप्त की पंक्ति है जो उनकी कविता में गौतम बुद्ध की पत्नी यशोधरा का कथन है।

पश्चिमी विद्वत्ता की बराबरी में दिखने की ग़रज़ से बत्रा जी पूरी किताब में लगातार अंग्रेज़ी में कुछ-कुछ कहते चलते हैं। पढ़ते हुए काशीनाथ सिंह की कहानी ‘संकट’ याद आती है जिसमें फ़ौज से छुट्टी पर आया हुआ राधो अपने दोस्तों के साथ बातें करते हुए हास्यास्पद ढंग से अंग्रेज़ी का प्रयोग करता चलता है। कुछ नमूनेे देखिएः

Keep your mind on things that you want and off the things that you don’t want. (27)

Our mind is videographer and tape recorder. (27)

In the words of Swamiji The sutras apply to and cover each and every chapter of each and every branch of mathematics (Arithmetic’s) Algebra,Geometry, Trigonometry, astronomy, Calculus etc. (49) (उद्धरण यथावत)

We are the trustee of the wealth. (122)

Read, chew and digest. (176)

All for one and one for all is our song. (188)

ये वाक्य अचानक हिंदी के बीच टपक पड़े हैं और उद्धरणों के रूप में नहीं हैं। ऐसे उदाहरण अनगिनत हैं। प्रो. कपिल कपूर ने किताब का प्राक्कथन लिखते हुए ठीक ही कहा है, ‘सबसे पहले इस पर ध्यान दिया जाना चाहिए कि हिंदी में पुस्तक रचना का श्री बत्राजी का फ़ैसला सिद्धांतों के आधार पर लिया गया है। आजकल शिक्षित भारतीयों के बीच अंग्रेज़ी के प्रति दासता की मनोवृत्ति मौजूद है। हर कोई इस उम्मीद में अंग्रेज़ी में लिखना चाहता है कि शिक्षित लोग पर उसका रोब पड़ेगा…।’ बत्रा जी को पढ़ते हुए समझा जा सकता है कि किस तरह उनका अद्भुत अंग्रेज़ी ज्ञान उन्हें बार-बार उस ज़बान की ओर धकेलता है, पर सिद्धांतों के आधार पर लिए गए फ़ैसले के चलते ही वे हिंदी में लिखते जाते हैं। कहीं-कहीं अंग्रेज़ी में कुछ कह भी जाते हैं, तो निश्चय ही ऐसा वे इस उम्मीद के साथ नहीं करते होंगे कि ‘शिक्षित लोगों पर उसका रोब पड़ेगा’। प्रो. कपिल कपूर का कहना बिल्कुल दुरुस्त है। अनुमान लगाया जा सकता है कि ऐसा वे, काशीनाथ सिंह के राधो की तरह, अशिक्षितों पर रोब ग़ालिब करने के उद्देश्य से करते होंगे।

ग़लत-सही उद्धरणों और अंग्रेज़ी वाक्यों वाली यह बाबासुलभ शैली भी क्षम्य होती, अगर कम-से-कम सुसंबद्ध तरीके से अपनी बात कहने का गुर ही बाबाओं से ले लिया गया होता। बत्रा जी की मुश्किल यह है कि प्रवचन और लेखन का यह बुनियादी सिद्धांत भी उनके यहां मात खा जाता है। वे अपनी जैसी-तैसी स्थापनाओं को बस जैसे-तैसे स्थापित करते चले जाते हैं। किताब के पहले ही अध्याय को देखें तो उसका शीर्षक है, ‘भारतीय शिक्षा का स्वरूप’, पर पूरे अध्याय में इस स्वरूप को लेकर शायद ही कोई बात कही गयी है। असंबद्ध अनुच्छेदों में तरह-तरह की बातें कहता हुआ लेखक शिक्षासंबंधी सरकारी तंत्र के ढांचे पर विचार व्यक्त करने लगता है और फिर अचानक, बिना किसी बुद्धिगम्य कारण के, ‘गांधी के शिक्षा संबंधी विचार’ उपशीर्षक के अंतर्गत अपनी समझ के अनुसार उनके विचारों को बिंदुवार रखने लगता है। इसी तरह एक जगह शिक्षा के अधिकार को लेकर नेशनल सैंपल सर्वे की कुछ बातों को बिंदुवार रखते हुए एक बिंदु यह भी दिया गया हैः ‘हम कहते हैं – सा विद्या या विमुक्तये, अब तो कहा जाता है – सा विद्या या नियुक्तये’ (पृ. 201)। पढ़ कर दिमाग़ चकरा जाता है कि आखि़र नेशनल सैंपल सर्वे वालों को क्या हो गया कि ‘30 प्रतिशत विद्यालयों के पास भवन नहीं हैं’ जैसी बातें बताते-बताते संस्कृत की शब्दक्रीड़ा में लग गए!

ऐसी असंबद्धता के उदाहरण किताब में शुरू से आखि़र तक मिलते हैं। वस्तुतः इसे पुस्तक का एक गुण नहीं, बल्कि अंगी गुण कहना चाहिए। विचार जैसे भी हों, उन्हें विचार के रूप में सिलसिलेवार रखने की एक लेखक से जो अपेक्षा की जाती है, बत्रा जी उसकी जमकर उपेक्षा करते हैं और शायद इसके अलावा उनके पास कोई चारा भी नहीं है।

असंबद्धता के इस अंगी गुण के बीच बत्रा जी के शिक्षा-चिंतन की जो कुछ मूल्यवान बातें पकड़ में आती हैं, उन्हें इस प्रकार सूत्रबद्ध किया जा सकता है:

  • शिक्षा का उद्देश्य है, ‘बुद्धि और हृदय का संतुलित समुत्कर्ष करना, फुरतीले शरीर में व्यवहारशील मस्तिष्क रखना तथा आवश्यक ज्ञान प्राप्त कर अपने व्यक्तिगत तथा पारिवारिक जीवन को सुख-संपन्न बनाकर मोक्ष को प्राप्त करना’ (पृ. 24)।
  • माक्र्स, मैकाले और मैक्समूलर – ‘इन तीन मक्कारों ने हमारी शिक्षा, संस्कृति और इतिहास को विकृत किया, इन्होंने हमारे गौरव को विदेशी कर्णधारों के नाम के साथ जोड़कर हमारे स्वर्ण पृष्ठों पर कालिख लगाने का काम किया’ (पृ. 50)।
  • ‘स्वतंत्र भारत में सबसे अधिक अन्याय जिस विषय के साथ हुआ है, वह है इतिहास। इतिहास-लेखन के लिए एनसीईआरटी द्वारा जो मार्गदर्शन के निर्देश दिए गए हैं, उससे इस विषय का विकृत स्वरूप हमारे सम्मुख आएगा। देश की एकता को प्रोत्साहन देने का यह अप्राकृतिक प्रयास सफल नहीं हो सकेगा।’ (पृ. 138)
  •  आदर्श बालक की संकल्पना को साकार करने के लिए नमस्कार मुद्रा, मौन, ओंकार उच्चारण, प्राणायाम, ब्रह्मनाद, गायत्री मंत्र एवं शांति पाठ का अभ्यास, यज्ञ-हवन, प्रातःस्मरण, योगाभ्यास, यम-नियम आदि का पालन, उन्हें गीता, रामायण का पाठ और भावार्थ बताना – ये सब आवश्यक कार्यक्रम हैं। (देेखिए, ‘आदर्श बालक की संकल्पना’ शीर्षक अध्याय)
  • ‘राष्ट्रीय शिक्षा नीति के संबंध में विचार करते हुए संस्कृति, राष्ट्र, संप्रदाय, धर्म, पंथनिरपेक्षता, शिक्षा, आचार्य, विद्यालय, पाठ्यक्रम, परीक्षा आदि शब्दों के ठीक अर्थ तथा इनसे जुड़े भावों को यदि देश की मिट्टी के साथ नहीं जोड़ा गया तो कोई भी शिक्षा योजना राष्ट्रीय नहीं हो सकती और इसका परिणाम होगा भारत में अभारत के चिह्न।’ (पृ. 205)
  • शिक्षा का अटूट संबंध संस्कृति और राष्ट्र से है। हमारे देश में कहा-सुना जाता है कि भारतीय संस्कृति मिलीजुली (कंपोजिट) है। वास्तविकता यह है कि संस्कृति अलग-अलग हिस्सों से नहीं बनती। संस्कृति गंगा की धारा के समान है। संस्कृति में नए तत्व आते हैं, परंतु उनका पृथक् कोई अस्तित्व नहीं रहता। भारत की संस्कृति कहने का अर्थ हिंदू संस्कृति लगाया जाता है और यह उचित भी है। संकोच या प्रयोजनवश इस तथ्य को स्वीकार न करने केे बड़े घातक परिणाम हुए हैं।’ (पृ. 204-5)
  •  ‘जाति, रंग, प्रदेश, धर्म अथवा भाषा के आधार पर किसी व्यक्ति तथा व्यक्ति समूह को विशेष सुविधाएं अथवा अधिकार देने की प्रथा बंद की जाए।’ (पृ. 206)

इन बातों की व्याख्या करने और इनकी शक्तियां-सीमाएं बताने की हिमाकत कौन करे! क्या यह बताने की ज़रूरत है कि ये सारी बातें मोहन भागवत की इस घोषणा, कि ‘इस देश में सभी हिंदू हैं’ और एक साध्वी के इस अविस्मरणीय वाक्य, कि जो रामज़ादे नहीं हैं वे ………..ज़ादे हैं, का शिक्षा के क्षेत्र में अनुवाद हैं?

बत्रा जी ने किताब के आखि़री हिस्से में शिक्षासंबंधी अपनी कुछ कविताएं और कहानियां भी संकलित कर दी हैं। प्राक्कथन-लेखक प्रो. कपिल कपूर का मानना है कि ये ‘सभी कविताएं मन को द्रवीभूत करती हैं तथा प्रभावशाली हैं।’ ऐसी प्रभावशाली कविता का एक नमूना देखिएः

‘जहां रहते वहां पड़ोसी तो हैं, पड़ोसीपन है कहां?

लड़ते-झगड़ते, गाली-गलौज, शांति रहती है कहां?

विद्यालय तो गली-गली में हैं, विद्या का आलय है कहां?

कक्षा में विद्यार्थी तो हैं, अध्यापक पता नहीं हैं कहां?

अफ़सोस कि जिस तरह भारतीय शिक्षा व्यवस्था बत्रा जी के बताये रास्ते पर नहीं चल रही, उसी तरह हिंदी कविता भी उनके जैसी काव्यकला के नमूने पेश नहीं कर पा रही। कहां हैं हिंदी के पास कथ्य और शिल्प में ऐसी अनोखी कविताएं?

याद रखें कि दीनानाथ बत्रा जी इस समय संघ परिवार के सबसे कद्दावर शिक्षा-चिंतक हैं। ‘शिक्षा बचाओ आंदोलन’ और ‘शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास’ उन्हीं के नेतृत्व में चल रहे हैं। अगर और किसी वजह से नहीं, तो सिर्फ़ बत्रा जी की इस किताब को देखकर ही कोई भी शिक्षित व्यक्ति समझ सकता है कि आज शिक्षा को सबसेे पहले इसी शिक्षा बचाओ आंदोलन सेे बचाने की ज़रूरत है।

संजीव कुमार

संजीव कुमार

संजीव कुमार। युवा आलोचक और कहानीकार। ‘जैनेन्द्र और अज्ञेयः सृजन का सैद्धांतिक नेपथ्य’ पुस्तक के लिए देवीशंकर अवस्थी सम्मान। दिल्ली विश्विद्यालय के देशबंधु कॉलेज में  प्राध्यापक। इनसे sanjusanjeev67@gmail.com पर संपर्क सम्भव है।

हंस, जनवरी, 2015 से साभार 

Post Navigation

%d bloggers like this: