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निकानोर पार्रा उर्फ़ ‘जनता के धैर्य की ऐसी की तैसी’: रॉबर्तो बोलान्यो

रॉबर्तो बोलान्यो, मार्खेज के बाद का सबसे बड़ा अफसानानिगार, और आज की तारीख में उतना ही लोकप्रिय है. कवि के सच्चे अर्थों में वह निकानोर पार्रा को स्पेनिश/लातिनी अमरीकी संसार का एक मात्र महान कवि मानता था. यह अद्भुत संयोग है कि दोनों नोबेल पुरस्कार को डिजर्व करते थे और दोनों को नहीं मिला. पार्रा जीते-जी (क्योंकि शायद ही कोई कवि इतना जी पाया) लीजेंड की छवि को प्राप्त कर लिए थे और इसके लिए उन्हें काफी संघर्ष करना पड़ा, अगर वह सामान्य उम्र पाते तब उसकी लीजेंड छवि बोलान्यो की तरह ही मरने के बाद उभरती. जब बोलान्यो मरा तब पार्रा ने लिखा, “रॉबर्तो हमें पछाड़ गया/ चिली के लिए अभूतपूर्व क्षति/ मेरे स्वयं के लिए अभूतपूर्व क्षति/ हर किसी के लिए अभूतपूर्व क्षति/ शेष मौन हैं/ एक महान ह्रदय विस्फ़ोट कर गया/ मेरे प्यारे राजकुमार, शुभरात्री/ परियों के गान  का समवेत स्वर तुझे लेने बाहर आ गया है.

2003 के पहले से ही रॉबर्तो बोलान्यो निकानोर पार्रा को अपना गुरु मानते हुए उन्हें याद किया करता था, उनके बारे में बोलता था, लिखता था. यहाँ प्रस्तुत बोलान्यो के इस लेख को निकानोर पार्रा के लिए श्रद्धांजली स्वरुप पेश बहुतेरे लेखों में सबसे महत्वपूर्ण मान सकते हैं. इसके हिन्दी अनुवाद के लिए संतोष झा और उदय शंकर के हम आभारी हैं. #तिरछीस्पेल्लिंग

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रॉबर्तो बोलान्यो और निकानोर पार्रा 

निकानोर पार्रा के साथ आठ सेकंड

By रॉबर्तो बोलान्यो

निकानोर पार्रा की कविता के बारे में, इस नई शताब्दी में, मैं निश्चित तौर पर कह सकता हूँ कि यह टिकाऊ होगी। ज़ाहिर है कि यह कहने का कोई ख़ास अर्थ नहीं है; और इस बात से सबसे ज्यादा वाकिफ खुद पार्रा ही हैं। हालांकि, पार्रा की कविताओं का यह टिकाउपन होर्खे लुईस बोर्खेस, फ़ेसर वायेहो, लुईस सरनोदा और कुछ अन्य लोगों की कविताओं के साथ बरकरार रहेगा। लेकिन, हमें यह कहना पड़ेगा कि इससे बहुत ज़्यादा फ़र्क़ नहीं पड़ता है।

पार्रा के दांव, भविष्य की ओर फेंके गए उसके अन्वेषण को यहां समझना काफी जटिल काम है। यह उतना ही ओझलपूर्ण भी है। यह ओझलता गति की ओझलता है। हालांकि बोलता हुआ, अपनी भंगिमाओं को साधता हुआ वह अभिनेता रंगपटल पर पूरी तरह से दृश्यमान है। उसकी खूबी, उसके परिधान, उसके साथ आने वाले प्रतीक, जैसे फोड़े में प्रवाहित विद्युत्-तरंग: वह एक कवि है, जो कुर्सी पर बैठे-बैठे सो जाता है, एक कमांडर, जो क़ब्रिस्तान में खो जाता है, सम्मेलन का एक वक्ता, जो अपने बालों को हाथ से झटकते-झटकते उन्हें खींचने लग जाता है, अपने घुटनों पर टिका एक बहादुर आदमी, जो मूतने की हिम्मत करता है, एक तपस्वी, जो समय को बरसों-बरस गुज़रते देखता है, एक अभिभूत सांख्यिकीविद्; ये सारी छवियाँ दृश्यमान हैं। पार्रा को पढ़ने से पहले इस सवाल पर सोचना ज्यादती नहीं होगी, वही सवाल जो विटिंग्सटाइन हमसे और स्वयं से भी पूछता हैः क्या यह हाथ, एक हाथ है या यह हाथ नहीं है? (किसी के हाथ को देखते हुए यह सवाल पूछना चाहिए।)

मैं खुद से पूछता हूं कि पार्रा की वह किताब कौन लिखेगा, जिसके बारे में उसने सोचा और कभी नहीं लिखाः यातनाशिविर-दर-यातनाशिविर, जंग-दर-जंग के विस्तृत आख्यान अथवा रुदाली से भरा द्वितीय विश्व युद्ध का इतिहास; एक कविता जो नेरुदा के कैंटो जनरल के ठीक विपरीत हो। नेरुदा के कैंटो जनरल के ठीक विपरीत वाली कविता की किताब से केवल एक हिस्सा ही पार्रा अपने नाम सुरक्षित कर सके और वह है, मॅनीफेस्टो। इसी मॅनीफेस्टो में वह अपने काव्यात्मक सौंदर्यबोध को प्रस्तुत करता है, हालांकि पार्रा को जब भी जरुरत महसूस हुयी उसने उस सौंदर्यबोध को ख़ुद ही अनदेखा किया। क्योंकि सौंदर्यबोध सच्चे लेखकों के गुहांधकार पर हल्की रौशनी डालता है और एक अस्पष्ट विचार बनाने में मदद करता है; और  अक्सरहां यह संभव भी नहीं हो पाता क्योंकि जोखिम और संकट की ठोस जमीन उभर आने के समय यह लगभग बेकार का अभ्यास बन जाता है।

युवाओं को पार्रा के अनुयायी बनने दीजिए। केवल युवा ही बहादुर होते हैं, उन्हीं की आत्माओं में पवित्रता है। इसके बावजूद, पार्रा जवानी के जोश या होश खोने की कविता नहीं लिखता है, वह पवित्रता के बारे में नहीं लिखता है। वह तो पीड़ा और एकांत के बारे में, निरर्थक और अनिवार्य चुनौतियों के बारे में, आदिवासियों की तरह बिखर जाने को अभिशप्त शब्दों के बारे में लिखता है। पार्रा ऐसे लिखता है जैसे वह कल बिजली के तार को पकड़कर झूलने जा रहा है। जहां तक मुझे याद है, मैक्सिकन कवि मारियो सैंटियागो ही एकमात्र व्यक्ति था जिसने पार्रा की रचनाओं का विषद अध्ययन किया था। हममें से बाक़़ी लोगों ने केवल एक स्याह पुच्छल तारे को देखा है। किसी उत्कृष्ट कृति की पहली अनिवार्यता है, किसी की नज़र की तपिश महसूस किये बिना गुज़र जाना।

एक कवि की यात्रा में ऐसे क्षण आते हैं, जब उसके पास खुद को सुधारते रहने के सिवा कोई दूसरा विकल्प नहीं बचता है। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि वह कवि,  गोन्ज़़ालो दे बर्थ्यो को मुंहज़बानी सुनाने में सक्षम है या वह हेप्टा-सिलेबल्स और गार्थिलासो के 11-सिलेबल् छंदों को किसी के बनिस्पत ज़्यादा अच्छी तरह जानता है। इन सब के बावजूद जीवन में ऐसे क्षण आते हैं, जब केवल एक चीज करने को बचती है और वह यह कि ख़ुद को अतल खाई में झोंक देना है या चिली के संभ्रांत घरानों के सामने नंगे खड़े हो जाना है। बेशक, उसे यह पता होना चाहिए कि सामने आने वाले भयंकर नतीजों का सामना कैसे करें। किसी उत्कृष्ट कृति की पहली अनिवार्यता है, किसी की नज़र की तपिश महसूस किये बिना गुज़र जाना।

एक राजनीतिक टिपण्णी:

पार्रा ज़िन्दा बने रहने में सक्षम है। इसमें ऐसी कोई बड़ी या महान बात नहीं है, लेकिन बात तो है। दक्षिणपंथ की तरफ स्पष्ट झुकाव रखने वाला चिली का वामपंथ उसे हरा नहीं पाया, न ही नव-नाज़ी और चिली का भ्रामक दक्षिणपंथ ही उसका कुछ बिगाड़ पाया। हाल ही में अघोषित मिलीभगत से अंजाम दिए गए दमन और नरसंहार को अपवाद मान लें तो लातिन अमरीकी स्टालिनवाद भी उसे पराजित न कर सका, न ही वैश्वीकृत हो चुका लातिन अमरीकी दक्षिणपंथ। अमरीकी विश्वविद्यालय के कैंपसों के तुच्छ (मीडियाकर) लातिन अमरीकी प्रोफेसर उसे शिकस्त नहीं दे पाए, न ही सैंटियागो के गांवों में भटकने वाले जॉम्बिज़। यहां तक कि पार्रा के चेले भी पार्रा को मात देने में कामयाब नहीं हो सके। इन सबके बावजूद और अपने अति-उत्साह में ही सही मैं कहूँगा कि न सिर्फ पार्रा बल्कि उसके भाई-बहन, प्रसिद्धि की चरम पर विराजमान उसकी बहन वायलेता और उसके विद्रोही माता-पिता सभी ने कविता की सार्वकालिक सर्वश्रेष्ठ महत्वाकांक्षाओं में से एक को अपने-अपने व्यवहार में अपनाया है, और वह है, जनता के धैर्य की ऐसी की तैसी।

“सितारे (स्टार्स) कैंसर का इलाज करने में सक्षम हैं, यह एक ग़लतफ़हमी है”, “तुम बंदूक की बात करते हो, मैं याद दिलाना चाहता हूँ कि आत्मा अमर है” अव्यवस्थित ढंग से चुनी गईं ये काव्य-पंक्तियाँ पार्रा की हैं। वह एक फ़कीर की तरह सच्चा है, और हम, कौन जियेगा और कौन मर गया की परवाह किये बिना, चलते चले जा सकते हैं । पार्रा एक मूर्तिकार और विज़ुअल आर्टिस्ट भी है, इसके बावजूद मैं यह याद दिलाता चलूँ कि ऐसे स्पष्टीकरण निहायत बेहूदा हैं। पार्रा एक साहित्यिक आलोचक भी है। उसने चिली के पूरे साहित्यिक इतिहास को एक बार तीन छंदों में समेट दिया: “चिली के महान कवि चार/ तीन हैं:/ एलोन्सो दे अर्थिया और रुबेन दारियो।’’

जैसा कि कथा-साहित्य में हम पहले से ही देख रहे हैं, 21 वीं सदी के आरंभिक वर्षों की कविता एक हाइब्रिड कविता होगी। नए औपचारिक झटकों की ओर संभवतः हम बढ़ भी चुके हैं लेकिन भयावह सुस्ती से लैस। उस अनिश्चित भविष्य में हमारे बच्चे एक कवि, जो कि कुर्सी पर बैठे-बैठे सो जाता है, के ऑपरेटिंग टेबल पर हुए वैचारिक मुठभेड़ पर चिंतन करेंगे और, रेगिस्तान के उस काले पक्षी पर भी विचार करेंगे, जिसका चारा ऊंट की देह से खून चूसने वाला परजीवी हैं। अपने जीवन के अंतिम क्षणों में किसी समय ब्रेटन ने बताया था कि अवैध और गुप्त कारवाईयों के लिए सर्रियलिज़्म की कितनी आवश्यकता है, ताकि शहरों के नालों और पुस्तकालयों को शरणगाह बनाया जा सके। यह कह चुकने के बावजूद दुबारा इस विषय को उसने अपना शरण नहीं बनाया। यह किसने कहा इससे आज कोई फ़र्क नहीं पड़ता है: वह वक़्त कभी नहीं आएगा, जब आतिश-ए-लब ख़ामोश रहे।

 

यह लेख रॉबर्तो बोलान्यो के लेखों, निबंधों और भाषणों के संकलन की पुस्तक के अंग्रेजी अनुवाद Between Parentheses: Essays, Articles and Speeches, 1998-2003  से लिया गया है.

हिंदी अनुवाद: संतोष झा और उदय शंकर

संतोष झा, हिरावल, पटना से सम्बद्ध मशहूर संस्कृति कर्मी, नाट्यकर्मी और अद्भुत संगीतकार हैं, साहित्य में रूचिवश उन्होंने यह अनुवाद किया है. इनसे आप hirawal@gmail.com के द्वारा संपर्क कर सकते हैं.

उदय शंकर जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय ,नयी दिल्ली से डॉक्टरेट हैं. हिंदी के शोधार्थी और आलोचक हैं. हिंदी के महत्वपूर्ण आलोचक  सुरेंद्र चौधरी की रचनाओं को तीन जिल्दों में संपादित किया है. इनसे  udayshankar151@gmail.com पर बात की जा सकती है.

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निकानोर पार्रा- मक्खियों का देवता : सोलेदाद मरामबियो

चिली के कवि निकानोर पार्रा, जिनकी मृत्यु 23 जनवरी 2018 में हुई, को याद करते हुए सोलेदाद मरामबियो जो कि स्वयं एक लेखिका एवं अनुवादक हैं, ने यह लेख लिखा है. पार्रा दक्षिण चिली में 103 साल पहले पैदा हुए और स्पैनिश भाषा और साहित्य के सबसे सशक्त स्वर बने. वह अकविता के जनक के रूप में जाने जाते हैं, अकविता अपनी बात कहने का वह तरीका है जो स्थापित साहित्यिक मानकों को तोड़ता है साथ ही कविता को रोजमर्रा की जिंदगी, आम बोलचाल की भाषा ओर पॉप कल्चर से जोड़कर नए तरीके से परिभाषित भी करता है. पार्रा एक गणितज्ञ और भौतिकविज्ञानी भी थे.

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Nicanor Parra. Photo by Javier Ignacio Acuña Ditze, 2014. Courtesy of Wikimedia Commons.

निकानोर पार्रा: मक्खियों का देवता

By सोलेदाद मरामबियो 

पार्रा की रचनाओं में अपने समय की सड़ांध और मृत्यबोध को उकेरा गया है, लेकिन यह बाद की बात है. निकानोर पार्रा की पहली किताब बेनाम गाने की किताब (Cancionero sin nombre,1937), फेडरिको गार्सिया लोर्का की शैली से प्रभावित थी. पार्रा की शुरूआती कविताओं में इस स्पैनिश कवि का लय और ताल, साथ ही ग्रामीण परिवेश और दृश्यों की छाप दिखाई पड़ती है. लेकिन जिस ग्रामीण परिवेश का चित्रण लोर्का करता था वह पार्रा के परिवेश से कई मायनों में अलग था. लोर्का का संगीत भले ही उसकी रचनाओं में मौजूद था लेकिन पार्रा की रचनाएँ नितांत ‘चिली’ (चिलियन) थीं, संगीत में तैरने वाले उसके शब्द अलग थे. यह अंतर आप तभी समझ सकते हैं जब आपके पास पार्रा जैसी ही संवेदनशीलता हो, आप उसके ही जूते पहनकर, उसके जाने पहचाने रास्तों पर चहलकदमी किये हों. जल्द ही पार्रा को लोर्कायी लय और ताल से घुटन महसूस होने लगी और उसने इसे त्याग दिया. अतियथार्थवाद, व्हिटमैनियन छंदमुक्ति और काफ्का की अंतर्दृष्टियों को लेकर पार्रा ने अपने लेखन में प्रयोग जारी रखा. ये सारे प्रयोग 1954 में लिखी उसकी किताब कवितायें और अकवितायें (Poemas y Antipoemas)  में एक दूसरे से टकराते हुए दिखते हैं. इसी किताब में मृत्युबोध का संत्रास और सड़ांध उसके विषय बनते हैं.

पार्रा की कवितायें और अकवितायें के प्रकाशित होने के चार साल पहले, पाब्लो नेरुदा की कैंटो जनरल (Canto General) प्रकाशित हुई थी. दरअसल यह किताब अमेरिकी इतिहास का महाकाव्यीय गायन थी. चिली और लातिन-अमरीकी पाठकों के लिए यह महत्वपूर्ण क्षण था. इस समय तक पाब्लो नेरुदा का कद स्पैनिश साहित्यिक समाज में पितातुल्य हो चुका था. कैंटो जनरल में नेरुदा पारंपरिक कविता के छंद को तोड़ कर गद्य की भाषा के करीब आने और सरल भाषा का प्रयोग करने की कोशिश कर रहे थे. पार्रा की विरासत को आसानी से समझने के लिए, ज़रूरी है कि हम पहले नेरुदा को समझें. यह व्यक्तिगत प्रतिद्वंदिता की बात नहीं है क्योंकि नेरुदा पार्रा के अकविता के शुरूआती समर्थकों में से थे. बल्कि बात यह है कि कविता और उसके अवयवों के बारे में हम क्या समझते हैं. इन बिन्दुओं पर नेरुदा और पार्रा एक दूसरे की विपरीत दिशाओं में चलते हैं. यह कहा जा सकता है कि पार्रा इन विषयों पर ज्यादा स्पष्ट था.

नेरुदा ने सरल भाषा में लिखने की कोशिश की, लेकिन उसकी कैंटो जनरल  स्वयं आडम्बरपूर्ण थी. यह किताब लगभग पैगंबरी अंदाज़ में अमरीकी इतिहास (उत्तरी एवं दक्षिणी अमरीका) के पांच सौ सालों का ब्यौरा देती है, जहाँ वह लिखता है कि, “मैं यहाँ कहानी सुनाने आया हूँ|’’ नेरुदा की आवाज़ पैगंबरी भी थी और काव्यात्मक भी. उसके अनुसार उसकी आवाज, सबकी आवाज थी. पार्रा केवल पार्रा रहना चाहता था और आम लोगों से बात करना चाहता था. नेरुदा के कैंटो जनरल  में महाकाव्यात्मक दृश्यों की भरमार है जहाँ वह महाद्वीप के लोगों और उनके भीषण दुखों का वर्णन करता है. वहीं पार्रा अपनी बॉक्सर जैसी चपटी नाक, झड़ते बाल और उन कबूतरों के बारे में लिखता है जो मक्खियों को खा रहे हैं, इसके पहले कबूतरों का चित्रण कविताओं में अनंत की तरफ़ उड़ते हुए पक्षी के रूप में किया जाता रहा है. अपने लेखन द्वारा पार्रा ने कविता में भद्देपन, गंदगी, मटमैले जूतों को चित्रित किया. वह गरीबों की, भीड़ की अभिव्यक्ति नहीं बनना चाहता था बल्कि वह उनमें से ही एक बनना चाहता था. इसलिए उसके शब्द आम थे, उसके परिदृश्य और कथानक ऐसे थे जो आपको किसी भी रास्ते के चौराहे पर, पार्कों में, गंदी चादरों के बीच, रोजमर्रा की जिंदगी के तहों में मिल जायेंगे|

कविताएं और अकविताएं की कविता पाठकों को चेतावनी (Warning to the Reader) को पढ़कर हम पार्रा के रचनाकर्म को समग्रता में समझ सकते हैं. इस कविता में पार्रा पाठकों को सचेत करता है कि वह अपने लेखन से पैदा हुए असहजता का उत्तर नहीं देगा. वह यह भी बताता है कि उसकी कविता में पाठक ‘इन्द्रधनुष’ या ‘दर्द’ जैसे शब्द नहीं पायेंगे. ये शब्द अनुपस्थित हो सकते हैं, हालाँकि मैंने तथ्यात्मक जांच तो नहीं की, लेकिन उसकी रचनाओं में दर्द मौजूद है. ये दर्द उसके चुटकलों के बीच, आम बातचीत में तैरता रहता है. पार्रा का ‘दर्द’ रोजमर्रा की जिंदगी से उपजा हुआ दर्द है- थकान, ग़रीबी, इर्ष्या, अधूरा प्यार, सतही प्यार, मृत्यु और इन सब की विसंगति और असहजता. पार्रा को उन लोगों से उबासी महसूस होती है जो यह सोचते हैं कि कविता दरअसल बड़े-बड़े विषयों और बड़ी-बड़ी बातों के लिए होती है. उसने स्पैनिश भाषा की कविता को आधुनिक बनाने के साथ ही इसकी दुरुहता को दूर करते हुए अधिक व्यापक बनाया. वह लेखन में क्रांति लाना चाहता था, वह साहित्यिक समाज के पवित्र गायों (sacred cows) द्वारा पैदा किये गए मक्खन-काव्य (fat poetry) के खिलाफ़ था. विडंबना यह है कि आज पार्रा खुद एक पवित्र गाय (sacred cow) बन गया है, लेकिन हम उसे एक ऐसे गाय के रूप में देख सकते हैं जो अपने तबेले को छोड़कर पोलिश जंगलों में एक जंगली बाइसन के साथ रहने के लिए आ गया है. पार्रानुमा गाय जंगली रास्तों पर दूर निकल गया है, जिसका बहुतों ने अनुगमन किया.

संतियागो के प्रधान गिरिजाघर (कैथ्रेडल) में अंतिम संस्कार के समय पादरी (प्रिस्टस) उसकी आखिरी इच्छा पूरी नहीं करना चाहता था. पार्रा चाहता था कि चिली की शानदार लोक गायिका विओलेता, जो कि उसकी अपनी बहन थी, के गीतों के साथ उसकी विदाई की जाय. पादरी का कहना था कि वियोलेटा के गीत ऐसे पवित्र स्थल पर नहीं गाये जा सकते. उसी वक्त पार्रा की एक बेटी ने पादरी से माइक्रोफ़ोन को छीनते हुए वहां पर उपस्थित लोगों को यह बात बताई और कहा कि वियोलेता का गीत यदि नहीं होगा तो उनका परिवार पार्रा के पार्थिव शरीर को वहां से लेकर चला जायेगा. थोड़ी देर में ही चर्च के स्पीकरों से शुक्रिया जिन्दगी! (Gracias a la vida) का स्वर गूंजने लगा. इस गीत के बजने के साथ ही वहां का परिवेश कविता, नृत्य और आम जिंदगी के दृश्यों के साथ भर गया. पार्रा ने अपने लेखन द्वारा इस भनभनाहट को अंदर आने दिया, जिसके लिए हम उसके शुक्रगुजार हैं.

सोलेदाद मरामबियो चिली (संतियागो) की लेखिका एवं अनुवादक हैं. अगली डक्लिंग प्रेस से उनकी दो किताबें अभी हाल में ही दो भाषाओं में प्रकाशित हुई हैं. इनका काम समय-समय पर ग्रांटा, जम्प्स्टर जैसी पत्रिकाओं में प्रकाशित होते रहा है. 2016 तक ब्रूतस एवितोरस  (Brutas Editoras) की संपादक रह चुकी हैं. पिछले साल उनको अपने पहले उपन्यास को पूरा करने के लिए चिली के नेशनल कौंसिल फॉर द आर्ट्स एंड कल्चर की तरफ से अनुदान प्राप्त हुआ है.

इसके हिंदी अनुवाद के लिए तिरछीस्पेल्लिंग जेएनयू के शोधार्थी रविरंजन सिंह का आभारी है. रविरंजन मूलतः हिंदी नाटक और भक्ति काव्य संसार के दरम्यान सक्रीय रहते हैं.  raviranjansingh.pbh@gmail.com  के माध्यम से आप इन्हें संपर्क कर सकते हैं.

इस लेख का मूल वर्ड्स विदाउट बॉर्डर्स पर देख सकते हैं. वहीं से इसे साभार लिया गया है.

चेतावनी और प्रश्नपत्र : निकानोर पार्रा

नेरुदा एक कवि के रूप में  स्थापित हो चुके थे और मेधा से लैस भी थे, तभी उन्हें भान हुआ कि पाठक-श्रोता के रूप में उन्हें एक बड़ी जनता मिल सकती है, इसलिए वे कम्युनिस्ट हो गए. कम्युनिस्ट तो वे हो गए लेकिन उनसे कविता छूट गयी, इसके बावजूद वे देश-दुनिया में लोकप्रिय हो उठे. उन्होंने वही किया, जो वे चाहते थे. किन्तु मैं कहना चाहता हूँ कि बाज़ मक्खियों से नहीं लड़ता है. अपनी प्रसिद्धि के चरम पर जब बाज़ मक्खियों के साथ नाचना शुरू कर दे तो वह विदूषक बन जाता है. वे स्पीलबर्ग जैसे बड़े व्यापारी बन गए! सिनेमा के एक व्यक्तित्व के रूप में स्पीलबर्ग बड़े ही प्रतिभावान आदमी थे, लेकिन क्या हुआ? बहुत, बहुत बड़ा व्यापार. अब वह एक बाज़ है जो मक्खियों के साथ नाचता है.

अब निकानोर पार्रा मेरा मास्टर है. जब नेरुदा एक बड़े कवि और एक रोमांटिक कम्युनिस्ट थे, तब वह एक अकवि (एंटी पोएट्री) था. लोगों को उसने सच्ची कविताओं से वाबस्ता कराया, वह सचमुच में एक मजेदार आदमी था. वह मेरा मास्टर था, मैं उसे एक कवि की तरह प्यार देता था. जब मैं ‘एंडलेस पोएट्री’ शूट कर रहा था तब वे सौ साल के हो चुके थे. मैं उनसे मिलने गया, वे सौ साल के हैं, सौ साल के. प्रखर मेधा से लैस आज भी वे जिंदा हैं, और हमेशा की तरह कुछ कठिनाइयों के बीच अपना काम कर रहे हैं. वे एक इंसान हैं, निपट इंसान, जिनसे मैंने बात की है. अपनी फिल्म में मैंने खुद भी सौ साल के एक बुड्ढे की भूमिका की है. मैं उन्हें देखने गया और कहा, “एक सौ साल का आदमी मुझसे क्या कहना चाहेगा?” वे बोले, “बूढ़ा होना कोई अपमान नहीं हैं. तुम अपने पैसे खोते हो, अपनी यौवन-महिमा के गुणगान से निजात पाते हो; धन-यौन-लिप्सा से मुक्त हो जाते हो. इस तरह तुम सबकुछ खोकर फतिंगे में तब्दील हो जाते हो.”   # अलेखान्द्रो  जोदरोवस्की

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Snap Shot – Persona (1966)

 

चेतावनी

By निकानोर पार्रा

अगले आदेश तक 

आग लगने पर

लिफ्ट का नहीं

सीढ़ियों का इस्तेमाल करें

अगले आदेश तक

ट्रेन में धुम्रपान न करें
गंदगी न फैलाएं

शौच न करें

रेडियो न सुनें

अगले आदेश तक

हर उपयोग के बाद

टॉयलेट को फ्लश करें

ट्रेन जब प्लेटफ़ॉर्म पर हो

तब शौच न करें

बगल के सहयात्री से लेकर

धार्मिक सैनिकों तक के प्रति अपनी राय रखें

जैसे, दुनिया के मजदूरों एक हो,

हमारे पास खोने को कुछ नहीं है (धत्)

हमारा जीवन तो परम पिता परमेश्वर, ईसा मसीह
और पवित्र आत्मा का महिमागान है आदि

अगले आदेश तक

इंसान एक रचयिता की संपन्न कृति है (धत्),

इंसानों के कुछ अपरिहार्य अधिकार हैं

उनमें से कुछ इस प्रकार हैं:

जीने की आज़ादी और खुश रहने के तरीके की खोज

वैसे ही जैसे दो जोड़ दो चार होता है

यह अंतिम है लेकिन कम नहीं

इन सच्चाइयों को वैसे भी

हम हमेशा से स्वयंसिद्ध मानते आये हैं

 

प्रश्नपत्र

अकवि क्या है:

वह, जो ताबूत और अस्थि-कलश की दलाली करता है?

एक जनरल, जो खुद के बारे में ही निश्चित नहीं है?

एक पादरी, जिसे किसी चीज पर  आस्था नहीं है?

एक सैलानी, जिसके लिए हर चीज अजीब है; वृद्धावस्था और मृत्यु भी?

एक वक्ता, जिस पर आप विश्वास नहीं कर सकते?

खड़ी-चट्टान की कोर पर खड़ी एक नर्तकी ?

एक आत्ममुग्ध, जो हर किसी से प्यार करता है?

एक जोकर, जो गाल बजाता है

और बेवज़ह यूँ ही बुरा बनता है ?

एक कवि जो कुर्सी पर सोता है?

आधुनिक समय का एक कीमियागर?

एक आरामतलब क्रांतिकारी?

एक पेटी-बुर्जुआ?

एक जालसाज?

एक ईश्वर?

एक मासूम?

सैंटियागो, चिली का एक किसान?

सही उत्तर को रेखांकित करें.

अकविता क्या है:

चाय की प्याली में एक तूफ़ान?

चट्टान पर बर्फ का एक धब्बा?

मानव-मल से ऊपर तक भरा एक पतीला,

जैसा कि फादर साल्वेतियेरा मानता है?

एक आइना, जो झूठ नहीं बोलता?

लेखक-संगठन के अध्यक्ष के गाल पर पड़ा एक तमाचा?

(ईश्वर उनके आत्मा की रक्षा करे!)

युवा कवियों को एक चेतावनी?

जेट-चालित एक ताबूत?

एक ताबूत, जो वायुमंडलीय दायरे से बाहर परिक्रमा करता है?

एक ताबूत, जो कि केरोसिन से चलता है?

एक शवदाह-गृह, जहाँ कोई शव नहीं है?

सही उत्तर के सामने X चिन्हित करें.

उदय शंकर द्वारा अनुदित ये कवितायें  क्रमशः मिलर विलियम्स और  टी विग्नेसन  के अंग्रेजी  अनुवाद पर आधृत हैं.

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