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स्त्रीविरोधी और दिशाहीन फिल्म है हाइवे: तत्याना षुर्लेई

इम्तियाज अली की  इस फ़िल्म में बहुत कमियाँ है। पहली कि शायद वह खुद नहीं जानता था कि उसकी फ़िल्म किसके बारे में होगी। क्या यह फ़िल्म एक अमीर, ऊबी हुई लड़की के बारे में है जिसको जीवन में थोड़ा सा एडवेंचर चाहिए और जिसके लिए दुनिया के बाकी लोग उसके नौकर जैसे होते हैं, क्या स्टॉकहॉम सिंड्रोम से पीड़ित व्यक्ति के बारे में है या एक ऐसी लड़की के बारे में है जो अचानक इस सच्चाई को ढूंढ लेती है कि उसको अपने झूठे परिवार की ज़रूरत नहीं है क्योंकि बाहर की दुनिया में ज्यादा अच्छे लोग रहते हैं।

Highway's Poster

Highway’s Poster

इम्तियाज अली की हाइवे  किसके बारे में है?

By तत्याना षुर्लेई

इम्तियाज अली की नयी और अत्यंत लोकप्रिय फ़िल्म हाइवे का मूल संदेश इसमें है कि उसकी नायिका, वीरा ‘खतरा/जोखिम’ से क्या समझती है। जवान लड़की अपने माँ-बाप द्वारा प्रवचित इस ज्ञान को नकारती है कि घर के बाहर की दुनिया लड़कियों के लिए बहुत खतरनाक है क्योंकि इस समय उसके लिए घर ही सबसे बड़ा खतरा है।

अली की फ़िल्म के समालोचक यह लिखकर उसको बड़ी दाद देते हैं कि आखिर पुरुष-प्रधान समाज से मुक्ति चाहने वाली नयी नायिकाएँ भारत में भी उत्पन्न हो गई हैं, जिनको हुक़्मऊदीली करने से डर नहीं है, जो उम्र में छोटी होने के बावजूद पूर्ण विकसित है। यह सब कुछ पढ़कर मैं खुद से पूछ रही हूँ कि मैंने वही फ़िल्म देखी या शायद कोई दूसरी; क्योंकि उपरोक्त दृष्टि से इस फिल्म को सिर्फ देखने में ही मैं असफल नहीं रही, बल्कि इसे देखकर मुझे लगता है कि जिस समय में महिलाओं के अधिकार के बारे में इतने सारे वाद-विवाद हो रहे हैं उस समय में यह फ़िल्म प्रतिक्रियावादी निष्कर्षों की शिकार लगती है और सब से खतरनाक बात यह कि कोई इस गलती को नहीं देखता है।

फ़िल्म की कहानी बहुत ही सरल है: वीरा बड़े घर की बेटी है और उसकी शादी होनेवाली है लेकिन वह ज़्यादा खुश नहीं लगती है। क्यों? कोई स्पष्ट कारण नहीं दिया जाता है, बस दर्शकों को मालूम हो जाता है कि उसको साँस लेने के लिए थोड़ी सी हवा चाहिए, थोड़ी सी शांति और आज़ादी भी। यह समझने वाली बात अवश्य है कि शादी की तैयारियों से वह थोड़ी सी थकी है लेकिन यह आज़ादी वाली इच्छा बिलकुल स्पष्ट नहीं है; ऐसा लगता है कि जैसे वीरा मध्ययुग में रहती है और उसके परिवार में अभी तक परदा-प्रथा का चलन है। नहीं तो वे कौन से कारण हैं कि इतने बड़े बाप की बेटी घर से बाहर नहीं निकल सकती है। हाँ, फ़िल्म की कहानी में यह स्पष्ट है कि वीरा आज़ाद लड़की है लेकिन उसकी आज़ादी की सीमाएँ भी बड़ी हैं। इतनी बड़ी कि वह अकेली कहीं नहीं जाती है, खुद गाड़ी नहीं चलाती है, साँस लेने के लिए भी लड़के के साथ बाहर निकलती है। लड़का अच्छी तरह जानता है कि आलीशान बंगलों से बाहर की दुनिया अमीर लोगों के लिए बहुत खतरनाक है – और कैसे न होगा? यही तो भारत है और सब को मालूम है कि यहाँ रात को क्या क्या होता है और वह भी तब जब जवान लड़की सड़क पर निकल आई हो, लेकिन वीरा साहसी और स्वतंत्र है न? समस्या यही है कि लड़के के साथ गाड़ी में बैठने के लिए ज़्यादा बहादुर होने की जरूरत नहीं है इसलिए पेट्रोल पम्प आने के बाद दुस्साहसिक अभियान (adventurous journey) की प्यासी वीरा गाड़ी से बाहर निकल जाती है। लड़का उसको वापस बुला रहा है लेकिन खुद नहीं निकलता है क्योंकि वह अच्छा लड़का है, नियमों को तोड़ने वाला नहीं है (क्या आजकल बड़े घर के लड़के भी परदों के पीछे बैठने लगे हैं?)। वीरा वापस आना नहीं चाहती है और इसी समय पेट्रोल पम्प लूटने आए डकैत उसका अपहरण कर लेते हैं। इतना सब कुछ हो जाने के बावजूद घर वापस आते ही वीरा अपने माँ-बाप को क्यों बोलती है कि घर के बाहर के खतरे के बारे में आप लोगों की बातें झूठी हैं? वह घर से निकली और उसका अपहरण हो गया। अनजान अत्याचारी पुरुषों ने उसे बार-बार पीटा और बाल पकड़कर अपने साथ दौड़ाया। क्या खतरे का यह रूप काफ़ी या अपमानजनक नहीं था? क्या औरतों के संदर्भ में घटित हिंसा का संबंध सिर्फ़ अस्मत से ही होता है, क्या हिंसा के बाकी रूप मामूली होते हैं? फ़िल्म के अधिकांश हिस्से में वीरा के चेहरे पर चोट के निशान दिखते हैं जो डकैतों के हिंसक व्यवहार को याद दिलाने के लिए काफी है, इसके बावजूद वह अपहरणकर्ता, महावीर उस लड़की को अपना रक्षक लगता है और वीरा उसके साथ रहना चाहती है।

कुछ लोग बोलते हैं कि फ़िल्म स्टॉकहॉम सिंड्रोम के बारे में है और इसलिए वीरा का व्यवहार थोड़ा सा अजीब लग सकता है लेकिन बात यह है कि मुझे इस स्टॉकहॉम सिंड्रोम में विश्वास भी नहीं है। फ़िल्म में एक बहुत महत्त्वपूर्ण दृश्य है जब वीरा अपहरणकर्ताओं के चंगुल से भागना चाहती है लेकिन शोर हो जाने के कारण जल्दी पकड़ी जाती है। महावीर लड़की को भागने की सज़ा देता है और इसके बाद लड़की को कहता है कि भाग जाओ। वह अच्छी तरह जानता है कि वह वापस आ जाएगी। हाँ, यही सच है क्योंकि यहाँ रूपक के बतौर फिल्म को देखना एक भयंकर भूल होगी। क्यों? क्योंकि इसमें फ़िर से अच्छी तरह दिखाया जाता है कि बाहर की दुनिया लड़कियों के लिए खतरनाक है। वीरा बाहर निकल जाती है लेकिन वहाँ कोई मदद करनेवाला नहीं है और औरत को हमेशा किसी की मदद चाहिए। वह उतनी ही स्वतंत्र हो सकती है जितनी अनुमति उसके साथ वाला पुरुष उसे देगा। पहला निष्क्रमण एक पुरुष के साथ हुआ और दुसरा महाभिनिष्क्रमण भी पुरुषों की सहायता के बिना संभव नहीं हो सकता है। इसी कारण वीरा वापस आ जाती है और यह कदम उसकी अधीनता का सबसे बड़ा सबूत दे जाती है। इसलिए मेरी समझ में यह नहीं आता कि इस दृश्य को देखकर लोग कैसे विश्वास कर सकते हैं कि यह फ़िल्म एक ज़ोरदार और आज़ाद ख्याल की एक महिला के बारे में है और वीरा के वापस आने के बाद, महावीर की व्यंग्यपूर्ण टीका-टिप्पणी सुनकर सिनेमाघर में बैठे हुए लोग हँस कैसे सकते हैं?

 दर्शकों को जल्द ही पता चलता है कि वीरा का बचपन बहुत ही दमघोंटू घटनाओं के बीच बीता है। उसका अंकल उसे बचपन से ही मोलेस्ट (यौन हिंसा/छेड़-छाड़) करता आया है। वीरा ने अपनी माँ को सब कुछ बताया लेकिन माँ ने मदद करने के बजाय बेटी को ही चुप रहने को कहा। शायद इसीलिए जब महावीर उसको अपने ही आदमी से बचाता है (जो वीरा के साथ ज़ोर-जबर्दस्ती करने की कोशिश करता है) तब वीरा अचानक बदल जाती है। महावीर का यह छोटा व्यावसायिक-कर्तव्य (जिसका संबंध अपहरण उद्योग की नैतिकता से भी है) उसके लिए ही काफ़ी है, इसके बाद लड़की का डर अपने आप गायब हो जाता है और वीरा अपहरणकर्ताओं से बातचीत करनी शुरू कर देती है। उसके लिए यह काफ़ी है कि वे लोग उसकी अस्मत लूटनेवाले नहीं हैं और जो आदमी अस्मत की लूटपाट नहीं करता है, वह अपहरण करने, थप्पड़ मारने या बाल खींचने के बावजूद अच्छा है।  इसलिए वीरा निश्चय करती है कि वह उन लोगों के साथ जाएगी। उसको पता नहीं है कि वे कहाँ जा रहे हैं, वह ट्रक के पीछे बंद हो जाती है, ज्यादा कुछ भी नहीं देख सकती है लेकिन फिर भी, न जाने क्यों आज़ाद महसूस करती है। वह न वापस आना चाहती है और न ही मंज़िल पर पहुँचना – उसको बस, रास्ता, फ़िल्म के टाइटल वाला हाइवे पसंद है जिसका स्पष्ट मतलब यह है कि जब से वीरा को पता चला कि जो लोग उसके साथ हैं वे उसकी अस्मत लूटने वाले नहीं हैं, अच्छे लोग हैं, बस यही सब उसके लिए एक साहस बन जाता है।

फ़िल्म के शुरुआती अंश के दृश्य उदासीन और डार्क है लेकिन जब से वीरा के विचार में यात्रा ज़्यादा खतरनाक नहीं है, तब से फ़िल्म में ज़्यादा रंग और प्रकाश, गाने और सरसो के फूलों के खेत भी आते हैं। लेकिन स्टॉकहॉम सिंड्रोम कहाँ चला गया? मुझे लगा कि एक जटिल प्रेम संबंध देखूँगी जिसमें एक जवान लड़की खतरनाक आदमियों की रखैल बनना चाहती है लेकिन फ़िल्म एक बिगड़ैल लड़की के बारे में है जो दो आदमियों की लाड़ली गुड़िया बन जाती है और उनके साथ घूमती है। हाँ, एक आदमी थोड़ा सा सनकी और खतरनाक लगता है लेकिन दूसरा अच्छा अंकल जैसा है। वीरा खुद भी बदल जाती है और पश्चिमी कपड़े देशी में बदल जाते हैं। लेकिन यहाँ भी उसका व्यवहार ज़्यादा स्वभाविक नहीं है, टुरिस्ट जैसा है– उसको पता नहीं है कि वह भारत के किस प्रदेश में है, दूसरी भाषा के अक्षर नहीं पहचानती है, गरीबों के घर और छोटे-छोटे गंदे सड़क उसको ज्यादा अच्छे लगते हैं, एक डिस्को गाना बजाकर आदमियों के सामने नाचती है। इन सब का मतलब यही हो सकता है कि वह अच्छी तरह जानती है कि उसके साथ कुछ भी बुरा नहीं होगा या इतनी वेबकूफ़ है कि अपराधियों के साथ सफ़र करते हुये भी खतरों से अनजान है। कहने का मतलब कि यह जो भी है लेकिन स्टॉकहॉम सिंड्रोम नहीं है। फ़िल्म की सबसे बड़ी कमजोरी यह है कि उसके पात्रों का मनोवैज्ञानिक चित्रण बहुत ही सतही है।

फ़िल्मवालों ने ब्यूटी ऐन्ड दी बीस्ट के आदिरूप से प्रेरणा ले लिया है। लड़की जवान, सुंदर और मासूम है और आदमी हिंसक, तीखा और खतरनाक। लेकिन इतना नहीं। महावीर वीरा को ज़बरदस्ती अपने पास रखता है लेकिन लड़की अच्छी तरह जानती है कि बीस्ट के अंदर एक खूबसूरत और अच्छा राजकुमार बंद है। वीरा से बातचीत करने का महावीर का तरीका अच्छा नहीं है लेकिन लड़की बार-बार उसके संपर्क में आने की कोशिश करती है, यह जानकर कि अंदर से वह ज़रूर बहुत अच्छा आदमी है। वह ऐसा क्यों करती है? इसलिए नहीं कि वह महावीर से भावनात्मक रूप से जुड़ी हुयी है, लगता है कि वह अपने सफ़र को खत्म करना नहीं चाहती है और सफ़र के लिए आदमी की ज़रूरत है। वीरा अच्छी तरह जानती है कि अपहरण के कारण महावीर का जीवन खतरे में है और यह भी अच्छी तरह जानती है कि ऐसे किसी अवश्यंभावी आपदा के बाद खुद उसे कुछ नहीं होगा क्योंकि वह बस पीड़िता है, इसके बावजूद वह महावीर को जाने नहीं देती है और वे दोनों पहाड़ जाते हैं। इस नयी जगह में भी लड़की का व्यवहार टुरिस्ट जैसा है जो झोपड़ी में रहने के खेल से खुश है। शायद इस मामले में भी वह फिर से इतनी भोली थी कि सचमुच उसको लगने लगा कि महावीर को अब कुछ नहीं होगा। महावीर की मौत के बाद, एक अनूठे और बहुत अच्छे दृश्य में उसका सच्चा दुख प्रकट होता है, यह जानकर कि यह सब कुछ उसकी गलती थी या शायद वह सचमुच अपहृत होकर खुश थी और अगर खुश थी तो बस इसलिए कि महावीर नौकर की तरह वह सब कुछ करता था, जो वह चाहती थी।

भारतीय सिनेमा ऐसी कहानियों को दिखा चुका है जिनमें औरत को अपने अपहरणकर्ता से प्यार हो जाता है और इतिहास में भी ऐसी बहुत सी कहानियाँ हैं जिनमें औरत अपने अपहरणकर्ता से शादी कर लेती है और वापस आना नहीं चाहती है। इन फिल्मों और कहानियों से यहाँ अंतर यह है कि वीरा महावीर से शादी करना नहीं चाहती है – वह उसके लिए बस एक दुस्साहसिक-अभियान (adventurous journey) था। लड़की का परिवार उसको वापस स्वीकर करता है, होनेवाला पति रिश्ता तोड़ना नहीं चाहता है। सब कुछ ठीक है लेकिन वीरा फ़िर से भागना चाहती है; अंकल के बारे में सच्चाई-वमन, चिल्लाना उसके लिए काफी नहीं है। अंततः पता नहीं चलता कि परिवार वालों ने वीरा के आरोपों का विश्वास किया कि नहीं या मान्सून वेडिंग के परिवार की तरह अश्लील अंकल से रिश्ता तोड़ लिया। लगता है कि ऐसा कुछ नहीं हुआ, इसलिए वीरा वापस पहाड़ आती है लेकिन अपने सपने की झोपड़ी के लिए नहीं बल्कि इससे ज़्यादा सुविधा-सम्पन्न और बड़े घर में रहने। उस घर को देखकर लगता है कि अमीर बाप से भी रिश्ता तोड़ना असंभव था क्योंकि जिस लड़की को किसी पुरुष की मदद नहीं मिलती है, उसके लिए बाहर की दुनिया बहुत खतरनाक है।

इम्तियाज अली की फ़िल्म में बहुत कमियाँ है। पहली कि शायद वह खुद नहीं जानता था कि उसकी फ़िल्म किसके बारे में होगी। यह फ़िल्म न एक अमीर, ऊबी हुई लड़की के बारे में है जिसको जीवन में थोड़ा सा एडवेंचर चाहिए था और जिसके लिए दुनिया के बाकी लोग उसके नौकर जैसे होते हैं, न स्टॉकहॉम सिंड्रोम से पीड़ित व्यक्ति के बारे में है और न ही एक ऐसी लड़की के बारे में है जो अचानक इस सच्चाई को ढूंढ लेती है कि उसको अपने झूठे परिवार की ज़रूरत नहीं है क्योंकि बाहर की दुनिया में ज्यादा अच्छे लोग रहते हैं। जो भी है, नायिका के “विद्रोही” व्यक्तित्व के अतिरिक्त पता नहीं क्यों फ़िल्म महावीर के वंचित/दमित बचपन को और उसके अपने माँ से मज़बूत रिश्ते को दिखाने की कोशिश करती है– उन सब दृश्यों की ज़रूरत नहीं थी, छोटी लड़की के फ़्लैशबैक वाले दृश्य के साथ, क्योंकि सस्ता और सतही मेलोड्रामा के अलावा उनका कोई इस्तेमाल नहीं है। लगता है कि सच्चे विद्रोही और आज़ादी का थोड़ा सा और इंतज़ार करना पड़ेगा। दुख की बात यह है कि हाइवे के लोकप्रियता का अर्थ यह नहीं है कि दर्शक विद्रोही नायिका को देखने के लिए तैयार है बल्कि वे हँसते-हँसते एक अविकसित, नासमझ  लड़की के खेल को उतना ही देखते हैं जितना उसके आसपास के पुरुषों ने उसको खेलने दिया।

तत्याना षुर्लेई

तत्याना षुर्लेई

तत्याना षुर्लेई एक Indologist और फिल्म-आलोचक हैं। हंस, पहल, अकार आदि हिन्दी पत्रिकाओं के लिए लिखती रही हैं। फिलहाल पोलैंड के शहर क्राकोव स्थित Jagiellonian University में The Courtesan Figure in the Iconography on Indian Popular Cinema:Tradition, Stereotype, Manipulation.  नामक विषय पर पीएचडी के लिए शोधरत हैं। उनसे tatiana.szurlej@gmail.com पर संपर्क संभव है।

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फिल्मी जादू, फिल्मी धोखा, फिल्मी वास्तविकता -तत्याना षुर्लेई

By तत्याना षुर्लेई

सौ साल के बाद भारतीय सिनेमा अपने बारे में क्या कहता है!!

भारतीय और पश्चिमी सिनेमा में सिद्धांततः कोई बड़ा अंतर नहीं है। दुनिया के हर कोने में सिनेमा का जन्म एक ही चीज के लिए हुआ है- मनोरंजन के लिए। चलती हुई तस्वीरें, जो दुनिया के चित्र खींचने के लिए खोजी गयी, जल्द ही नयी-नयी कहानियाँ बुनने-कहने का बहुत अच्छा औजार बन गयी। भारतीय और पश्चिमी सिनेमा के इतिहास के बीच एक बड़ा अंतर सिनेमा के जन्म के साल को लेकर है। पश्चिम में सिनेमा के सौ साल के वर्षगाँठ की गणना पहली फिल्म दिखाने के बाद से ही हो गयी, जो की एक डाक्यूमेंट्री थी,  यही गणना भारत में पहली काल्पनिक कहानी दिखाने के बाद से होती है। इसका मतलब यह है कि भारतीय सिनेमा अपने दर्शकों के लिए सब से पहले एक मजेदार झूठ है, जिसके लिए वास्तव से बिलकुल अलग दुनिया दिखाना उसका पहला कर्तव्य है। जैसे मैं लिख चुकी हूँ, ‘चलती हुई तस्वीरें या सपनों का कारखानाः सिनेमा क्या है?’ लेख में मैंने बताया था, पश्चिम के लिए, जिनके लिए सिनेमा प्लेटो (Plato का गुफा होता है। उनके लिए फिल्म की दुनिया वास्तव से थोड़ी बेकार होती है। तथापि भारतीय, ‘जिनके लिए वास्तव सिर्फ माया होता है’, सिनेमा में सच ढूँढ़ते हैं। जो भी कारण हो इस साल सिनेमा के वर्षगाँठ को मनाने का, कुछ सारकथन कहने के लिए भारतीय सिनेमा का यह सौंवा साल एक बहुत ही अच्छा मौका है। सिनेमा का त्योहार और शताब्दी-वर्ष ऐसे ही मौके हैं जिनके बहाने सौ साल के निष्पादनों के बारे में सोचने की जरूरत है। पर सिर्फ इन्हीं बारे में नहीं, सिनेमा के भविष्य के बारे में भी। सिनेमा ही बार-बार नहीं बदला है, सारा समय ही बदल रहा है – न सिर्फ नए-नए आविष्कारों के साथ, जिनकी मदद से वह चलता है, बल्कि अपने नए-नए दर्शकों की सहायता से भी, जो कभी भी कुछ नया और अक्सर साहसिक भी देखने के लिए तैयार रहते हैं। लगता है कि सिनेमा आजकल खुद अपने विकास के बारे में सोच रहा है और अपने दर्शकों पर हुए प्रभाव के बारे में भी। सिनेमा का इतिहास लंबा नहीं है लेकिन जो है वह बहुत ही विविधतापूर्ण है इसलिए यह कोई संयोग नहीं है कि सौ साल की वर्षगाँठ के करीब कई ऐसी फिल्में बनाई र्गइं जो अपने बारे में कुछ महत्त्वपूर्ण बातें कहना चाहती हैं।roadmovie

अपने बारे में बताना कोई नई चीज नहीं है – पश्चिम में ही नहीं, भारतीय सिनेमा में भी। फिर भी, आजकल इस विषय को हम पिछले सालों के मुकाबले से ज्यादा देख सकते हैं। आत्मालाप सिनेमा के शुरू में काल्पनिक विषयों के साथ पैदा हुआ लेकिन सच यह है कि इसका विकास आधुनिक समय से संबंधित है। पुराने जमाने में इस पर इतना ध्यान नहीं दिया जा रहा था, क्योंकि एक प्रकार का आत्मालाप सिनेमा के आसपास कहीं हमेशा मौजूद रहता था। शायद सिनेमा के शुरू में आत्मालाप के लिए इसलिए स्थान नहीं था कि इतिहास लंबा न होने के कारण किसी सारकथन की जरूरत नहीं थी। आत्मालाप अलग-अलग रूपों में होता है और इसका अच्छा इस्तेमाल सिर्फ अग्रणी सिनेमा जान-बूझकर कर रहा था। शेष सिनेमा को हमेशा यह बात अच्छी तरह मालूम थी कि उसके द्वारा बनाई हुईं फिल्मों की दुनिया को यथार्थ से अलग नहीं होना चाहिए। इसलिए इन दोनों दुनियाओं के अंतर, जो कभी-कभी होता था, और इनके बीच में जो उसका हस्तक्षेप किया जा रहा था, इसे हमेशा छुपाने की कोशिश की जाती थी। दर्शकों को देखी हुई दुनिया वास्तविक लगती है लेकिन इस वास्तव में कोई न कोई धोखा तो होता ही है। और इस धोखे के मदद से देखी हुई इमारत कभी सिर्फ स्टुडियो में बनाई हुई एक दीवार का टुकड़ा है और कोई सच्ची जगह नहीं है – जैसे पोलैंड के पहाड़ कुणाल कोहली की ‘फना’ में कश्मीर में बदल गए या संजय लीला भंसाली की ‘हम दिल के चुके सनम’ में बुदापेस्त को इटली के एक शहर की भूमिका निभानी पड़ी। उन फिल्मों में ऐसी ही स्थिति होती है जो सिर्फ फिल्मों के बारे में एक कहानी दिखाते हैं और उनकी सच्चाई भी अधूरी होती है। वे कभी कुछ ज्यादा दिखाते हैं लेकिन उतना नहीं और अपने बारे में एक प्रकार के धोखे में रखते हैं। भारतीय सिनेमा के इतिहास में ऐसी फिल्मों की बहुतायत है पर इनमें से तीन मुझे दिलचस्प लगती हैं – देव बेनेगल की ‘रोड मूवी’, पुनीत मल्होत्रा की ‘आइ हेट लव स्टोरीज’ और मिलान लूथरा की ‘डर्टी पिक्चर’। इस चुनाव का पहला कारण यह है कि तीनों फिल्में सौवीं वर्षगाँठ के आसपास बनाई गई हैं (2009, 2010 और 2011 में), तीनो फिल्में सिनेमा के बारे में है और हर एक में दिखाया हुआ सिनेमा कुछ अलग है। इसमें आश्चर्यचकित होने की कोई बात नहीं है – इसलिए कि हर व्यक्ति के लिए सिनेमा कुछ अलग है। किसी को कोई फिल्म अच्छी लगती है, तो किसी को कोई और निर्देशक या अभिनेता पसंद है। इसलिए यह कहना बहुत मुश्किल है कि सिनेमा में सबसे महत्त्वपूर्ण क्या है और फिल्मों का सौ साल में कैसा विकास हुआ। तथापि संभवतः इन तीन फिल्मों के मदद से हमको पता चल जाएगा कि फिल्मों के विचार में भारतीय सिनेमा में सबसे महत्त्वपूर्ण क्या है।

सिनेमा के शुरू में किसी को विश्वास नहीं था कि यह नया आविष्कार, जो चलती हुई तस्वीरें दिखा सकता है, इतना प्रचलित हो जाएगा कि दुनिया के सारे कोनों में पहुँच जाएगा। आज इसमें कोई शक नहीं है कि सिनेमा के बिना हमारी जिंदगी कुछ अधूरी लगती है। दुनिया में शायद कई लोग ऐसे मिल जाएंगे जिन्होंने कभी कोई अखबार या किताब नहीं पढ़ी हो, लेकिन ऐसा व्यक्ति ढूँढ़ना बहुत मुश्किल है जिसने कभी कोई फिल्म नहीं देखी हो। फिर भी शुरू में, जब सिनेमा का विकास मेलों में सस्ते सर्कस के तंबुओं में हो रहा था, पढ़े-लिखे लोग सिर्फ चोरी-चुपके फिल्में देखते थे। पोलैंड के फिल्म सिद्धांतकार करोल इजिकोवस्की (Karol Irzykovsky) ने इस समय पर लिखा था कि सभी लोग फिल्में देखने जाते हैं, लेकिन इसके बारे में बात करने में उनको शर्म आती है। क्यों? इसलिए कि इस समय के सिनेमा के दर्शक सीधे-सादे, अनपढ़ लोग थे जो फिल्मों की मदद से अपने दुख-निराशा को कुछ समय के लिए भूल सकते थे। असल में फिल्मों की शुरुआत ऐसी अद्भुत स्थिति ढ़ूँढने से ही संबंधित है जो वास्तविक दुनिया में कभी नहीं मिलती है। भारत में फिल्मों के जनक दादा साहेब फाल्के और यूरोप में जॉर्ज मेलिएस ऐसे ही जादूगर थे जिन्होंने अपनी फिल्में बड़े-बड़े सपनों की तरह बनाईं। ऐसे सपने जहाँ सच्चा प्यार होता है, सत्य हमेशा जीतता है, लोग चांद के पास जा सकते हैं और लोगों की मदद करने के लिए भगवान जमीन पर आते हैं।

देव बेनेगल की फिल्म देखते हुए ऐसा लगता है जैसे आप सिनेमा के दर्शकों के बीच पहुँच जाते हैं, जैसे सिनेमा के दर्शक ही विषय हैं। ‘रोड मूवी‘ का नायक, जिसका नाम विष्णु है, रेगिस्तान में ट्रक चलाता है। वह जानता है कि उसकी गाड़ी एक गतिशील सिनेमा है लेकिन यह उसके लिए इतना महत्त्वपूर्ण नहीं है। विष्णु के पास आईपॉड है, मोबाइल फोन भी है; घर पर उसके पास कंप्यूटर होगा और उसमें होगी दुनिया की सारी फिल्में। ऐसा पुराना और बेकार सिनेमा उसको शायद थोड़ा हास्यास्पद भी लगता है लेकिन विष्णु का विचार बदलेगा जब वह रेगिस्तान में रहनेवाले लोगों से मिलेगा। उन लोगों से जिनका हर दिन का काम पानी ढूँढ़ना है। विष्णु अपनी गाड़ी की खिड़की से और फिल्म के दर्शक अपनी जगहों से गाँव वालों के थके हुए चेहरे देख सकते हैं। जब नायक के रास्ते में मेला ढूँढ़ने वाला अजनबी आदमी आता है, तो विष्णु को उस आदमी के मदद से पता चलता है कि उसकी पुरानी फिल्में कुछ समय के लिए गरीब लोगों के जीवन को बदल सकती हैं। सब चेहरे जो पहले उदास और थके थे अब बिल्कुल अलग लगते हैं। फिल्म का जादू सब लोगों को प्रभावित करता है।

फिल्म के सबसे सुंदर दृश्य में बूढ़े आदमी की मेले के बारे में भविष्यवाणी सच हो जाती है और जिस जगह पर ट्रक फिल्मों को दिखाने के लिए तैयार है, वहाँ मेला का रेला भी आता है। रेगिस्तान का यह मेला एक बड़ी मरीचिका का रूप ले लेता है, पता नहीं यह सच है या विष्णु और उसके दोस्त नशे में और शायद प्यास से बेहोश हैं। मेला रेगिस्तान में रहने वालों का एक बड़ा सपना है जिसकी शुरुआत विष्णु की फिल्मों ने की है। रूसी दर्शनशास्त्री मिखाइल बाख्तिन (Mikhail Bakhtin) ने मध्ययुगीन यूरोप के कार्निवाल के बारे में लिखते समय अनुभव किया कि बड़े त्योहारों-महोत्सवों के समय रोजमर्रा के सारे नियम-कायदों की हालत पतली हो जाती हैं। साहित्य और फिल्म भी कभी-कभी इसी स्थिति का, इस नियमबदल का इस्तेमाल करते हैं। जिससे इनकी दुनिया की हालत भी उलटी हो जाती है, जैसे  रोड मूवी में। पागल रंगरेलियों की शुरुआत तो सिनेमा से होती है लेकिन बाख्तिन  वाले आनंदोत्सव की तरह सुबह को खत्म नहीं हो जाती है, सिनेमा और मेले के कारण सब लोग बदलते हैं। गाँव वाले ही नहीं, रेगिस्तान वाले डाकू भी। वे अपराधी, जिनके कारण बाकी लोगों के पास पानी नहीं है आनंदोत्सव के समय में जानवरों से मनुष्य हो जाते हैं। जब तक विष्णु का ट्रक रेगिस्तान पर चलेगा और अपनी फिल्में दिखाएगा, तब तक मेला चलता ही रहेगा। आनंदोत्सव के बाद शायद डाकू फिर से जानवर बन जाएँगे, पुलिस किसी को भी मार देगी, लेकिन मेले के अंत से पहले, फिल्मों के जादू के कारण, सब कुछ ‘उल्टा’ और सुरक्षित है।road movie 2

पढ़े-लिखे लोगों को शायद सामान्य सिनेमा में यह बात अच्छी नहीं लगती है कि फिल्मों के जादू के कारण सभी दर्शकों का व्यवहार कभी-कभी बच्चों का जैसा होता है। सामान्य सिनेमा अपने दर्शकों के भावों से अच्छी तरह खेलता है इसलिए फिल्म देखने के समय जोर से हँसना या रोना बहुत आसान होता है। सभी तरह की फिल्मों के दर्शकों को सिर्फ मनोरंजन चाहिए जोकि हर व्यक्ति के लिए अलग हो सकता है। जैसा कि मैंने जिक्र किया है, किसी को रोना अच्छा लगता है तो किसी को हँसना और किसी को डरना भी सबसे अच्छा लग सकता है। और सिनेमा के पास इन सारे दर्शकों के लिए कुछ न कुछ दिलचस्प है ही। तथापि इसी समय पर ज्यादा लोग बोलेंगे कि सिनेमा उनके लिए सिर्फ कला है और बड़े-बड़े निर्देशकों की फिल्मों के अलावा वे कुछ सामान्य नहीं देखते हैं। ऐसा क्यों होता है? क्या इसमें शर्म की बात है कि कभी-कभी हम सबको सामान्य फिल्म की सरल कहानी की जरूरत होती है? आजकल की स्थिति करोल इजिकोवस्की के समय से कुछ अलग है। आज फिल्मों को देखने में कोई शर्म नहीं है – सिर्फ सामान्य फिल्म के अलावा। शायद समस्या यह है कि पढ़े-लिखे दर्शकों को मालूम होता है कि फिल्म की कहानी एक झूठ है, फिर भी यह झूठ उनको इतना धोखा दे सकता है कि वे भी साधारण दर्शकों की तरह आसानी से रोते हैं और डरते हैं कि नायक मर जाएगा।

फिल्म का जादू यह भी है कि बहुत लोग मानते हैं कि पर्दे पर देखी हुई कहानी सच होती है, और अगर नहीं मानते हैं तो देखते समय इसके बारे में अचेत हो जाते हैं क्योंकि फिल्म बहुत अच्छी तरह वास्तविकता को धोखा दे सकती है। फ्रांस के फिल्म सिद्धांतकार, आंद्रे बाजें (Andre Bazin) ने लिखा कि अपने दर्शकों के लिए फिल्म एक खिड़की की तरह होती है, ऐसी खिड़की जिसे खोलने के बाद बाहर की दुनिया दिखाई जा रही हो। इसलिए दर्शकों को लगता है कि फिल्म की कहानी सच है और इसलिए भी आंद्रे बाजें के लिए सबसे अच्छी फिल्में वही थीं जिनकी दुनिया वास्तव से उतनी अलग नहीं थी। लेकिन यह दुनिया कभी कुछ और भी है जो वास्तविकता से अलग होती है। फिर भी दर्शकों के लिए इसमें और यथार्थ में कोई अंतर नहीं है और स्वप्न-चित्र देखने के समय वह उसी तरह प्रतिक्रिया दर्शाता है जैसी यथार्थवादी फिल्म देखने के समय। एक अन्य फिल्म सिद्धांतकार एडगर मोरें (Edgar Morin) ने इसके बारे में लिखा। उसके विचार में ऐसी प्रतिक्रिया इसलिए होती है कि कोई भी फिल्म देखने के समय लोग उसके नायक को अपना परिवर्तित रूप समझते हैं। तथापि इसके लिए एक चीज की जरूरत है – खिड़की पर देखी हुई दुनिया में रहने वालों को पता चलना नहीं चाहिए कि उनको कोई देख रहा है। और यह बात सिनेमा और उसके दर्शकों के लिए भी बहुत महत्त्वपूर्ण है।

फिल्म के दर्शकों को सबसे अधिक मजा झाँकने में आता है। सिनेमा घर के अँधेरे में बैठे हुए लोग एक-दूसरे को नहीं देख सकते हैं, लेकिन वास्तविक दुनिया के लोगों से अदृश्य होकर फिल्म के नायकों की जीवन में घुस जाते हैं। फिल्मों के दर्शक खुद से देखे हुए लोगों के सारे रहस्यों के बारे में जानते हैं, और फिल्म देखते समय यह सब जान लेना सबसे मजेदार क्षण होता है। इसलिए हर सामान्य सिनेमा में सबसे पहले एक नियम की बहुत बड़ी जरूरत है। फिल्म की कहानी के नायकों को ऐसा व्यवहार करना चाहिए जैसे उनको मालूम नहीं था कि उनको कोई देख रहा है। हर फिल्म के अभिनेता-अभिनेत्री को मालूम है कि उनकी फिल्में लोगों के मनोरंजन के लिए बनाई जाती हैं, लेकिन इस जानकरी को पर्दे पर दिखाना फिल्म का सबसे बड़ा पाप है। साथ ही, जब कोई फिल्म अपने बारे में कुछ बताना चाहती है, तब भी यह नियम महत्त्वपूर्ण है, इसलिए ऐसी स्थिति वहाँ ज्यादा प्रचलित है जहाँ फिल्म की दुनिया यथार्थ से दूर नहीं है और दर्शकों को वास्तविक लगती है। ऐसे ही एक पाप का बहुत अच्छा उदाहरण मनोज कुमार की फिल्म ‘पूरब और पश्चिम’ है। फिल्म के शुरू के दृश्य में जब फिल्म का नायक भारत लंदन जाता है तो वह ऑर्फन नाम के हिप्पी से मिलता है, और यह लड़का जब अपने अजीब नाम के बारे में बोलता है तब सीधे कैमरा की तरफ देखता है। उसकी इस भंगिमा को देखकर ऐसा लगता है जैसे वह भारत से नहीं, दर्शकों से बात करना चाहता है। और अगर वह दर्शकों से बात कर सकता है तो इसका मतलब यह भी है कि उसको पता है कि कोई उसे देख रहा है और सारे दृश्य का मतलब यह है कि पर्दे पर चल रही कहानी सच नहीं है। सब भ्रम बर्बाद हो जाता है। कोई निर्देशक अवश्य ही इस भंगिमा का बहुत अच्छा इस्तेमाल कर सकता है, और कभी-कभी इसकी जरूरत भी होती है, जैसे कि डरावनी फिल्मों में। वहाँ जब कोई राक्षस या किसी तरह का विरूप प्राणी सीधे दर्शक की ओर देखता है तो डर से मिलने वाले मनोरंजन में इजाफा हो जाता है क्योंकि इस भंगिमा का मतलब कोई चेतावनी है और दर्शक को लगता है कि अगला बलि-पशु वह हो सकता है।

झाँकने से मजा लेने (दर्शनरति) के बारे में मनोविश्लेषण का सिद्धांत, जिसका जिक्र लउरा मल्वे (Laura Mulvey) ने किया है, डर्टी पिक्चर में अच्छी तरह दिखाई दिया। फिल्म की नायिका, जिसका नाम रेशमा है, अभिनेत्री बनना चाहती है और इसके लिए सब कुछ करने को तैयार है। अभिनेत्री होने के बदले में रेशमा, जिसका नया नाम सिल्क है, नाचती हुई ऐसी लड़की बन जाती है जिसके नृत्य में बहुत ही साहसिक रत्यात्मक मुद्राओं की जरूरत होती है। वह अपनी ख्याति से बहुत खुश है लेकिन इस तरह की ख्याति वास्तव में बहुत कड़वी होती है। अफसोस की बात यह है कि सिल्क और उस प्रकार की सारी औरतों की ऐसी ख्याति सच्ची ख्याति न होकर भी सिनेमा के लिए कोई नई चीज नहीं है। मनोविश्लेषण के आधार पर लउरा मल्वे ने न सिर्फ देखने से आने वाले मजे के बारे में लिखा बल्कि उस शक्ति के बारे में भी लिखा जो देखने से पैदा होती है। कैमरे की आँखें पुरुष की आँखें होती हैं इसलिए औरत का शरीर सिनेमा में महज देखने की वस्तु है। औरत को कुछ करना नहीं चाहिए, सिर्फ अच्छी तरह दिखाई देना चाहिए। भारतीय सिनेमा यह रत्यात्मक मजा भी अपने दर्शकों को देता है, अपनी नायिकाओं को देखने की अनुमाति देता है। यहाँ भी सिनेमाघर के अँधेरे में बैठे हुए आदमी को लगता है कि उसे कुछ ऐसा देखना है जो सभी लोगों के लिए नहीं है, जिसे सामान्य जीवन में देखना अनैतिक है। और कोई नाचती हुई औरत अगर कभी सीधे कैमरे की ओर देखेगी तो इस बार यह कोई फिल्म का पाप नहीं होगा क्योंकि सिनेमाघर में बैठा हुआ हर आदमी सोचेगा कि पर्दे पर दिख रही लड़की सिर्फ उसके लिए नाच रही है। झाँकने से मिलने वाले मनोरंजन का स्थानांतरण हो जाएगा और हर आदमी यह सोच सकेगा कि वह शो का एक हिस्सा है और उसमें भी कामविषयक शक्ति है।the-dirty-picture-wallpaper-06

स्त्री-शरीर को दिखाने का उपक्रम सबसे अच्छी तरह गानों में संभव है। पश्चिम के लोगों को ज्यादातर भारतीय फिल्मों में मौजूद गानों की इतनी उपस्थिति बड़ी अजीब लगती है क्योंकि खास तौर से यूरोप में सांगीतिक फिल्में कभी इतनी लोकप्रिय नहीं थीं, और जो सांगीतिक फिल्में थीं भी, उनकी दुनिया भारतीय फिल्मों से अलग होती थी। यूरोप की अधिकांश सांगीतिक फिल्में किसी न किसी संगीत-नाट्य प्रदर्शन के बारे में होती हैं, संगीत की उपस्थिति ‘तार्किक’ होती हैं, इसलिए फिल्मों का ऐसा नुस्खा, जहाँ हर कहानी में गानों की जरूरत है, पश्चिमी दर्शकों के लिए अस्वीकार्य है। वे लोग नहीं जानते हैं कि कामविषयक मजे के लिए गानों की कितनी बड़ी जरूरत है! पुराने जमाने से ही फिल्मों की अलग, कभी-कभी बहुत दिलचस्प योजनाएँ होती थीं औरतों के शरीर दिखाने के लिए। भारतीय सिनेमा के इतिहास में कभी-कभी ऐसे निर्देशक भी हुए जो नायिकाओं के शरीर को दिखाने के मामले में गानों के मुहताज नहीं थे – और उनमें सबसे प्रसिद्ध नाम शायद राज कपूर का था। उसकी ‘बॉबी’ एक नई और चुस्त कहानी थी लेकिन कुछ दर्शकों को वह सिर्फ डिंपल कपाडिया की बिकनी के कारण अच्छी लगती थी। तथापि कभी औरत का शरीर दिखाना फिल्म को कुछ नुकसान भी पहुँचा सकता है। शेखर कपूर की बैंडिट क्वीन एक बहुत महत्त्वपूर्ण फिल्म थी जो स्त्री-हिंसा को सबको दिखाना चाहती थी। अफ्सोस की बात यह है कि ज्यादा दर्शक सिर्फ सीमा बिस्वास के नंगे शरीर को देखने के लिए सिनेमाघर आ जाते थे और फिल्म जिसका विरोध करना चाहती थी उसने यही सब दर्शकों को दिया। ज्यादा फिल्में सतर्कतापूर्वक अलग-अलग तरीके ढूँढ़ती हैं जो शरीर दिखाने के लिए सबसे उचित हों। सबसे आसान तरीका है वेश्या को नायिका बनाना क्योंकि वेश्याओं के साथ सब कुछ करना उचित है। निस्सन्देह सभी नायिकाएँ वेश्या नहीं हो सकती हैं इसलिए कई फिल्मों में मोहिनी आ गई जोकि बहुत अच्छी योजना थी। इस तरह फिल्म की नायिका बहुत भोली, अच्छी लड़की हो सकती थी लेकिन नायक दूसरी औरत को भी पसंद था जो अच्छी थी पर सुंदर और खतरनाक थी, शराब और सिगरेट पीती थी और नाइट क्लबों में नाचती थी। इस योजना से आइटम नंबर पैदा हुआ जो कामविषयक मजे के लिए भारतीय फिल्मों का शायद सबसे अच्छा आविष्कार भी था। आइटम नंबर वाली औरतें सिर्फ देखने के लिए होती हैं और फिल्म की कहानी से उनका कोई संबंध नहीं होता है। वे शुद्ध मजे के लिए उतारी जाती हैं। नायिका का इस तरह नाचना हमेशा अनुचित था, पर कभी-कभी इसकी जरूरत भी थी इसलिए ड्रीम सिक्वेंस बन गया। इसकी मदद से दर्शक वह सब कुछ देख पाता है जो सिनेमाघर में आकर देखना चाहता है, और नायिका की इज्जत भी सुरक्षित रहती है क्योंकि हर ऐसा दृश्य सिर्फ सपना होता है।The Dirty Picture

डर्टी पिक्चर स्त्री-शरीर को सिनेमा में देखने-दिखाने की योजना को अच्छी तरह निभाती है। डर्टी पिक्चर एक ऐसी स्त्री की कहानी है जो फिल्मों में नाचने का काम करती है, अपने शरीर की खूबसूरती के बल पर दिनों-दिन सफलता की बुलंदियों पर चढ़ती जाती है। लेकिन बढ़ती उम्र की तो शरीर की ‘खूबसूरती’ से जैसे दुश्मनी है। इस तरह एक दिन वह खुद को पराजित महसूस करती है, ठगी सी महसूस करती है। लेकिन यह विडंबना भी दर्शकों के देखने के नजरिए में कोई बदलाब नहीं ला सका। इस फिल्म की कहानी दो स्तरों पर चल रही है। एक स्तर सिल्क का जीवन और उसकी अश्लील फिल्में हैं, दूसरा यह फिल्म है जो सिल्क के बारे में बता रही है। सिल्क के फिल्मों के गानों के हिस्से को देखकर दर्शक बहुत उत्तेजित होते हैं। हम सिनेमाघर में बैठे पुरुषों के चेहरों पर एक खास किस्म की लालसा देख सकते हैं। लेकिन इसी समय डर्टी पिक्चर में दर्शकों के लिए भी वही मजा है और सिनेमाघर के अँधेरे में बैठे दर्शकों के चेहरे पर वही लालसा फिर से वापस आ जाएगी। यह फिल्म एक भोली-भाली नायिका के बारे में है जिसको फिल्मी पेशे ने नष्ट कर दिया। जब तक जवानी और सुंदरता थी, तब तक सारे सपने पूरे लगते थे लेकिन जब जवानी चली गई और शरीर उतना खूबसुरत नहीं रह गया, तब सिल्क ने देखा कि वह सिर्फ शरीर थी। फिल्म वालों के लिए सुंदर शरीर में रहती हुई औरत को ढूँढ़ना महत्त्वपूर्ण नहीं था क्योंकि दर्शकों के लिए सुंदर शरीर ही काफी है। देखने की, झाँकने की इच्छा कितनी मजबूत होती है हम इस फिल्म के ड्रीम सिक्वेंस में भी देख सकते हैं। इसमें सिल्क अपनी फिल्म की नायिका है और उसे अपने शरीर को पहले सी दिखाने की जरूरत नहीं है, लेकिन पता चलता है कि नायिका की यह भूमिका भी उसे इसीलिए प्रदान की गई है कि वह देह-प्रदर्शन की योग्यता रखती है।

भारतीय फिल्में नायिका की इज्जत के बारे में सोचकर भी ड्रीम सिक्वेंस की मदद से इस इज्जत को नष्ट करती हैं। भोग की इच्छा, दर्शनरति की इच्छा इज्जत से बड़ी है और फिल्में अपने दर्शकों पर  निर्भर हैं। अगर कोई सिनेमाघर नहीं आएगा फिल्म देखने के लिए तो नई फिल्में बनाने के लिए पैसा भी नहीं होगा। इसलिए सामान्य फिल्में अपने दर्शकों को वह देती हैं जो उनको सबसे अच्छा लगता है। निस्संदेह, इसका मतलब यह नहीं है कि जिन लोगों के लिए फिल्म में झाँकने का मजा सबसे महत्त्वपूर्ण है वे सब के सब कोई  विकृत लोग हैं। फिर भी, ऐसी स्थिति, जब किसी के लिए फिल्म का सबसे महत्त्वपूर्ण क्षण नंगे शरीर से संबंधित है, खतरनाक हो सकती है। इसलिए मुझे अच्छा लगता है कि आधुनिक फिल्मों में आइटम नंबर धीरे-धीरे गायब हो जाता है और आज की अभिनेत्रियों की साहसिकता नंगे शरीर को दिखाने से नहीं, कहानी के व्यक्तित्व से संबंधित होती है।

अधुनिक दर्शकों की दुनिया फिल्मों से संबंधित है। एक तरफ, फिल्मों की मदद से वे वास्तविकता को भूलना चाहते हैं तो दूसरी तरफ, आज के लोगों की वास्तविकता फिल्म की वास्तविकता है। आइ हेट लव स्टोरीज में ऐसी ही स्थिति है। फिल्म का नायक, जिसका नाम जय है, प्यार से नफरत करता है। ऐसा वह फिल्म स्टुडियो में काम करने के कारण ही सोचता है क्योंकि फिल्में अपने दर्शकों को झूठ दिखाती हैं। जय को अपना विचार बदलना पड़ता है जब धीरे-धीरे उसे पता चलता है कि उसकी जिंदगी में भी कुछ ऐसी चीजें हैं जो फिल्मों से मिलती-जुलती हैं। फिल्म के अंत में एक मजेदार दृश्य में जय सिनेमाघर में आता है और हाथ में फूल पकड़कर अपनी प्रेमिका  को बुलाता है। इसी समय उसको पता चलता है कि पर्दे का नायक यही कर रहा है। संयोग है? नहीं। बहुत फिल्में देखने के बाद ढेर सारे लोग अक्सर बिना किसी इरादे के अपना जीवन फिल्मी बनाने की कोशिश करते हैं। फिल्म में देखी हुई रोमांस वाली छवि अच्छी लगी तो लोग इसे दुहराएँगे, कभी कुछ कहने के लिए फिल्मी संवादों का इस्तेमाल करेंगे क्योंकि उनको लगता है कि शायद उनकी कहानी के अंत में भी वही होगा जो फिल्म के अंत में हुआ। I_Hate_Love_Stories_Movie_BollywoodSargam_talking_491333

आई हेट लव स्टोरीज की मदद से हम भारतीय फिल्मों के भविष्य के बारे में भी सोच सकते हैं। यह फिल्म फिल्म-निर्माण के बारे में है और इसमें उन फिल्मों का जिक्र है जो प्रेम कहानियों के लिए चर्चित रही हैं। फिल्म का निर्माता करन जोहर है जो अपने फिल्मों में स्टार अभिनेताओं के साथ काम करता था जबकि इस फिल्म में उस तरह से स्टार कोई नहीं है – स्टार फिल्म के मुख्य-पात्र के सपने में आता है। एक दृश्य में जब सेट पर गाने की शुटिंग की जा रही है, नायक और नायिका को देखकर मुख्य पात्र सपने में खुद को गाते हुए देख रहा है। गाता हुआ जय और उसकी प्रेमिका वैसी ही दिखाई देती है जैसी करन जोहर की फिल्मों के सारे नायक और नायिकाएँ। लेकिन अंतर यह है कि इस फिल्म का नायक शहरुख खान नहीं है और फिल्म भी थोड़ी सी अलग है। मेरे विचार में यह गाना परिवर्तनों का रूपक है। अब नए-नए अभिनेताओं का समय आ गया है और नई फिल्मों का भी। ऐसी फिल्मों का समय जिसकी नायिका अपने होने वाले पति को छोड़ सकती है – इसलिए नहीं कि वह बुरा है या उसने कुछ उसको किया, वरन इसलिए कि उसकी जिंदगी में कोई नया आ गया है। नए-नए दर्शकों को नई कहानियाँ चाहिए और ऐसा परिवर्तन स्वाभाविक है। फिल्म में शायद सब कुछ हो चुका है और कुछ नया हो नहीं सकता है लेकिन आज भी टीवी या कंप्यूटर जैसे व्यसन के सारे आविष्कारों और इसके विकास के बावजूद फिल्म की जरूरत है और बनी रहेगी। फिल्मों की कला दूसरे कलाओं से जल्दी पुरानी हो जाती है इसलिए नहीं कि नए आविष्कारों से उसका गहरा संबंध है – सबसे पहले इसलिए कि फिल्म खुद के इरादों के दर्शक को पैदा करती है और इसके बाद उसको कहानी देती है। इसके कारण संग्राम देखने के बाद लोगों को विश्वास था कि अशोक कुमार वास्तव में पुलिस वालों को मार देंगे, अमिताभ बच्चन एक कॉमिक्स में सुपर-हीरो बन गए या प्राण के जमाने में कोई माँ अपने बेटे को प्राण का नाम देना नहीं चाहती थी। ‘आई हेट लव स्टोरीज’ के एक दृश्य में ‘रोड मूवी’ की तस्वीर दिखाई देती है जो कि सिनेमा का सबसे अच्छा सारकथन है। फिल्में अलग होती हैं जैसे उनके दर्शक, लेकिन एक चीज वही है जो शुरू में भी थी: अंधेरे में इंतजार करने का यह अद्भुत अहसास दुनिया के सब कोने में एक जैसा है और मुझे आशा है कि यह कभी नहीं बदलेगा।

पहल-91 से साभार

Tatiana szurlejतत्याना षुर्लेई लोकप्रिय हिंदी सिनेमा की शोधार्थी और समीक्षक के रूप में पोलैंड में ख्यात। सिनेमा विषयक तीन लेख हिंदी में लिख  चुकी हैं। इन्होंने  यह लेख विशेष रूप से पहल-91 के लिए लिखा है। केन्द्रीय हिंदी संसथान, आगरा से हिंदी का प्रशिक्षण। फिलहाल पोलैंड के शहर क्राकोव सिथत Jagiellonian University में The Courtesan Figure in the Iconography on Indian Popular Cinema:Tradition, Stereotype, Manipulation. नामक विषय पर पीएचडी के लिए शोधरत हैं। इनसे  tatianaszurlej@yahoo.com पर संपर्क सम्भव है।

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