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‘संपूर्ण क्रांति’ और ‘रेलगाड़ी’ के बीच जरुरी अन्तर को ‘बाग़-ए-बेदिल’ में खोजता हमारे जमाने का एक ‘मीर’: चंदन श्रीवास्तव

शराबी की अद्भुत सूक्तियां लिखने वाले कृष्ण कल्पित जी , सद्य प्रकाशित काव्य-संकलन ‘बाग़-ए-बेदिल’ कारण इधर घनघोर चर्चा के केंद्र बने हुए हैं. बहुतेरे लोगों ने उनकी पूर्व-पंक्तियाँ के आधार पर ही मान लिया था कि वे अब प्रकाश में नहीं आयेंगें। शराबी की सूक्तियां नामक कितबिया में वे पहले ही लिख गए थे- कभी प्रकाश में नहीं आता शराबी/ अंधेरे में धीरे धीरे/ विलीन हो जाता है. कविता के प्रति जैसा समर्पण/लगाव इस शराबी के पास है वैसा रेअर ही देखने को मिलता है. और यह रेअरनेस ही वह जिजीविषा है जो उन्हें बार-बार प्रकाश में लाता है. बाग़-ए-बेदिल वाला प्रकाश तो इतना तेज है कि बहुतेरों की आँखें चौंधिया गयी हैं और बहुतेरे ऐसे हैं जो इस तेज में भी बारीकियां पढ़ रहे हैं.

‘बाग़-ए-बेदिल’ पर जे.एन.यू में आयोजित संगोष्ठी में चन्दन श्रीवास्तव एक वक्ता के बतौर आमंत्रित थे. इस संगोष्ठी में उनके कविता-कर्म को गम्भीरता से लेने की जरुरत महसूस की गयी. चन्दन श्रीवास्तव का यह यह लेख इसी प्रक्रिया की शुरूआती कड़ी है. बाग़-ए-बेदिल और कृष्ण कल्पित के कवि-व्यक्तित्व के ऊपर आगे भी लेख दिए जायेंगे।  

बाग़-ए-बेदिल

बाग़-ए-बेदिल

By  चंदन श्रीवास्तव

विश्वविद्यालयी दिनों की ट्रेनिंग की वजह से तबीयत कुछ ऐसी हो चली है कि लफ्ज किताब सुनते ही मन में एक रटी-रटायी पंक्ति गूंजने लगती है- आखिर! इस किताब की पॉलिटिक्स क्या है ? हैरत नहीं कि किताब बाग़-ए-बेदिल हाथ आई तो ऐसा ही हुआ। किताब भारी-भरकम है, आकार से भी और आवाज से भी। अदबी मुआमले की समझ के मामले में अपनी औकात देखी तो भार उठाने की हिम्मत नहीं हुई। सोचा, चलो किसी और के लिखे से काम चलाते हैं। और इसी फिराक में नजर अटकी बाग़ ए बेदिल पर कवि अरुणकमल की टिप्पणी के एक टुकड़े पर कि – “ कल्पित ने अतीत को वर्तमान में ढाल दिया है और वर्तमान को अतीत में ढालकर उसे व्यतीत होने से रोका है, इसलिए हर कविता कई कालों में प्रवाहित होती है। ” कहते हैं बदलाव सृष्टि का नियम है। अपनी इतिहास-प्रदत्त स्थिति के कारण आप उससे सहमत-असहमत हो सकते हैं। सो, अरुणकमल की पंक्ति को पढ़कर लगा कृष्ण कल्पित की कोशिश समय के अनवरत घूमते पहिए को थाम लेने की है। लगा, कृष्ण कल्पित अपने खास समय के भीतर बदलाव के किसी रंग-ढंग से असहमत हैं और ‘कविता के कुरुक्षेत्र’ में उस बदलाव पर जीत हासिल करने के लिए उतरे हैं।

लेकिन, कृष्ण कल्पित का अपने कवि और कविता के बारे में ख्याल ऐसा निष्कर्ष निकालने से रोकता है। अपने कवि-कर्म को लेकर कल्पित साहब का कहना है कि -“ ये कवितायें एक उपेक्षित और दीवार से लगा दिए गए कवि की प्रति-कवितायें हैं।”  और “ इन कविताओं में शब्दों का आयुधों और अस्त्र-शस्त्रों की तरह उपयोग आत्म-रक्षार्थ ही हुआ है..किसी दुश्मन, किसी भूखंड, या कीर्ति को विजित करने के लिए नहीं। हर कवि को अपने लिए एक कवच का निर्माण करना पड़ता है और कविता-साधना तो निश्चय ही किसी निरंतर युद्ध से कम नहीं..। ” आगे परंपरा का निजी-पाठ करते हुए उन्होंने यह भी जोड़ा है कि-“प्रागैतिहासिक काल से ही कविता से तीर-तमंचों का काम लिया जाता रहा है- आत्मरक्षार्थ या मानवता की रक्षा के लिए। ” इस शुरुआती (इस वजह से कच्चे और अधबने) पाठ में अगले अनुच्छेदों तक कोशिश करुंगा कि बाग़-ए-बेदिल को कृष्ण कल्पित के आत्म-वक्तव्य के प्रति ईमानदार रहते हुए पढ़ने की कोशिश करुं और इस निष्कर्ष निकालने की हिम्मत जुटा सकूं कि अतीत को वर्तमान में ढालना या फिर वर्तमान को अतीत में ढालकर उसे व्यतीत होने से रोकना कल्पित की कविता की पॉलिटिक्स के भीतर एक प्रक्रिया है, परिणति कत्तई नहीं।

बाग़ ए बेदिल के अपने पाठ की शुरुआत इस प्रश्न से करें – कृष्ण कल्पित को क्यों लगता है कि उनकी कवितायें एक उपेक्षित और दीवार से लगा दिए गए कवि की प्रति-कवितायें हैं? अपनी भारी-भरकम काया में सैकड़ों कविताओं को समेटने वाली इस किताब का उत्तर होगा एक शिकायत या कह लें फरियाद की शक्ल में सामने आयेगा-

उस देश में जेबकतरों की तरह कवियों ने भी अपने इलाके बांट रखे थेमी लार्ड।

वहां गिरहकटोंपिंडारियों मवालियों कबाड़ियों और हलकटों को कवि कहने का रिवाज थाहुजूर।

औरकवियों से उस देश में अपराधियों का सा सलूक किया जाता थामहोदय!…

कबाड़ीपन और कवि-कर्म के बीच का भेद क्योंकर मिट रहा है ? बाग़-ए-बेदिल का उत्तर है-

‘ यह विचार विपथता इसलिए थी,

कि वह उस जनपद का नहींदस जनपथ का कवि थासार्त्र !

बाग़-ए-बेदिल की कविता विपथता का कारण विपर्यय में खोजती है। ‘ जनपद ’( याद करें पुराने वक्तों के महाजनपदों को, देश से राष्ट्र बनने की हिंसक प्रक्रिया को, मेट्रोपॉलिटनी सार्वभौमिकता से स्थानीयता को बचाये रखने की जुगत को) और ‘दस जनपथ ’( 10 डाऊनिंग स्ट्रीट से निकले लोकतंत्र/आधुनिकता की भारतीय अनुकृति का नया संस्करण) के बीच का विपर्यय। जिससे अपेक्षा थी कि ‘उस जनपद का कवि’होकर रहेगा वह ‘दस जनपथ का कवि’ जिस समय के भीतर बनने को बाध्य हुआ उस समय के लक्षण क्या हैं ? वह समय कौन-सा है जिसमें कवि हलकट बनने को बाध्य और आतुर एक साथ है? बाग़-ए-बेदिल का उत्तर है-

जेपी, लोकतंत्र की आँख से ढलका हुआ आंसू था,

जो अब सूख चला हैपार्थ।

कि जनता आती है’ वाले विशाल मैदान में,

अब बाजीगर और रंडियां घूमते हैं।

दरअस्ल संपूर्ण क्रांति अब एक रेलगाड़ी का नाम हैसार्त्र!

और, ऐसे समय में क्या अघट घट रहा है ?

बाग़-ए-बेदिल की मानें तो-

ब्राह्नणों की फौज से जब घिर गई मायावती,

देख लेना एक दिन उसको बना देंगे सती।

बीवियां फिरती हैं दुनिया भर में कत्थक नाचतीं,

और, भारत मां तुम्हारे घर में बर्तन मांजती,

बुझ गये दीपक तो क्या आओ उतारें आरती,

वाजपेयी को मिला सम्मान भारत-भारती।

एक ऐसे समय में जब मर्यादाओं का भयंकर उलटफेर आंखों के आगे हो, कविता और कबाड़ का, कवि और गिरहकट का अंतर समाप्त हो रहा हो, तो कृष्ण कल्पित के अपने ही शब्दों में मानवता के रक्षार्थ कविता और कवि को क्या करना चाहिए? दूसरे शब्दों में, जब व्यवस्था अपने बाशिन्दों को विज्ञापनी भाषा में समझा रही हो कि दरअसल क्रांति एक रेलगाड़ी का ही नाम है और वह इस तरह कि तुम अपने जनपद से चलकर दस जनपथ और दस जनपथ(और उसके पसारे) से निकलकर अपने जनपद के भीतर अबाध आवाजाही कर सकते हो, और इस तरह, मानवीय मुक्ति के एक नये आख्यान में प्रवेश कर सकते हो, तो कविता, व्यवस्था की इस भाषा के काट में क्या करे ? किन शब्दों से बने कौन-से आयुध लाये ? इस प्रश्न का उत्तर खोजने चलें तो एक रास्ता खुलता है जिसपर चलकर आप कह सकें कि अतीत को वर्तमान में ढालना और वर्तमान को अतीत में ढालकर उसे व्यतीत होने से रोकना दरअसल कृष्ण कल्पित की कविता के लिए एक प्रक्रिया है और परिणति है उस भाषा को हासिल करने की कोशिश करना जो मुक्ति की प्रचलित भाषा की काट में खड़ी हो।

कल्पित इस भाषा को खोजने के लिए बार-बार अतीत की कविता के उस्तादों के पास लौटते हैं। चाहें तो कह लें, शेखावटी, जयपुर, पटना जैसे ‘उस जनपद’ का अपना घर “लुटियन दिल्ली” के जोर से लुट जाने का गम गलत करने के लिए किसी पीर-फकीर-शायर की मजार पर बैठना चाहते हैं। वहां झरने वाली निबौलियों को उठाकर पूरे हिन्दुस्तान की कविता की रिवायत के भीतर बे दर-ओ-दीवार का एक घर बसाना चाहते हैं। उन्हें उम्मीद, वहां से प्रचलित भाषा की काट करने वाली एक भाषा मिल सकेगी।यही वजह रही होगी जो पुस्तक के शीर्षक में आया शब्द बेदिल किताब के हर्फों में एक कहानी लेकर जिन्दा होता है। कहानी कविता के भेष में कुछ यों है कि-

औरंगजेब के बड़े बेटे आजमशाह ने,

बेदिल आजीमाबादी/देहलवी को मिलने के लिए बुलाया

तो बेदिल ने यह मिसरा लिख भेजापार्थ!

दुनिया अगर देहेन्द न जुम्बम ज जाए खीश- मन बस्ता अम हिनाए-किनायत ब जाये खीश

( दुनिया भी अगर दे दो तब भी मैं अपनी जगह से नहीं हिलूंगा क्योंकि मैंने अपने पांवों में सब्र की मेहंदी लगा ली है)

कविता के भीतर इस कथा की पुनर्वासी करके कल्पित एक साथ कई काम करते हैं। एक तो वे आपके मन के भीतर पैठी ऐसी ही अनेक कथाओं के लिए राह खोलते हैं। इस कथा को पढ़कर बिरला ही होगा जिसके मुंह पर यह पंक्ति ना आ जाये- आवत जात पनहिया टूटी बिसर गयोहरिनाम- संतन को कहा सिकरी सो काम। किसी को मिर्जा गालिब का यह शेर भी याद आ सकता है- हजार कस्द करता हूं इस जा से कहीं और जाने का- दिल कहता है तू जा मैं नहीं जाने का। और, बेतरतरीबी के तर्क से मन के किसी कोने में बैठा ‘अंगद का पाँव’ भी याद आ सकता है। तेजरफ्तारी अगर आज के जीवन और जगत को परिभाषित करने वाली वर्चस्वकारी भाषा है तो फिर कृष्ण कल्पित कविता के उस्तादों के पास जाकर वहां से उनके ठहराव ढूंढ़ लाते हैं।जो कोई बेदिल की तरह सब्र की मेहँदी लगाकर ठहरा है, कोई किसी भक्तकवि की तरह रामकथा में रमने की वजह से ठहरा है तो कोई गालिब की तरह नये-पुराने पस-ओ-पेश में पड़कर ठहरा हुआ है। ठहराव का अपना निजी ठौर खोज सकें- इसके लिए कृष्ण कल्पित की कविता कथाओं या कह लें काव्य-पंक्तियों की एक झनकार(शुक्लजी के शब्दों में कहें तो अर्थ और प्रसंग का गर्भत्व) रचती है। कल्पित की कविताओं(बाग़-ए-बेदिल में) के शब्द और पंक्तियां ‘अर्थ’ और ‘प्रसंग’खोजने के क्रम जब ‘आखर’ तलाशती हैं तो एक पूरा सिलसिला कायम हो जाता है, पूरब की कविता के रुप-शिल्प, कथ्य और वस्तु को सुनने-सुनाने का। कवि अपनी तरफ आखर और अरथ की पूरी परंपरा सौंपने को उत्सुक है ताकि पाठक नये सिरे से रचने और लड़ने के लिए तैयार हो सकें।

आखिर को एक बात दो शब्द “पार्थ” और “सार्त्र” पर। बाग ए बेदिल की कविता का स्थापत्य इन दो शब्दों के बिना संभव नहीं। जैसे कबीर की कविता में संबोध्य का चयन(साधो, संत, पांड़े/बांभन) के अनुकूल कविता की वस्तु बदलती है, साथी ही इन शब्दों के आने के साथ मानो विषय की घोषणा हो जाती है, ठीक उसी तरह कृष्ण कल्पित के बाग़-ए-बेदिल में ‘पार्थ’ और ‘सार्त्र’ कविता की बनावट के दो पाट हैं, और अपने नाम के अनुकूल वस्तु को धारण करते हैं। पार्थ, कुरुक्षेत्र यानि भावी महाविनाश की आशंका के बीच किंकर्तव्यविमूढ़ खड़ा पात्र है, कृष्ण उसे कर्तव्य का उपदेश देते हैं- युद्धस्व..। आशंका सार्त्र के साथ भी है। दो विश्वयुद्धों के बीच खड़ा एक चिन्तक जिसकी आंखों के आगे आधुनिकता या कह लें तर्कबुद्धि पर आधारित राज्यसत्ता/विज्ञान/उद्योग का चरित्र उजागर हुआ और आधुनिकता प्रदत्त मानव-मुक्ति का आख्यान हिरोशिमा पर परमाणु बम के धमाके के साथ दम तोड़ गया। पार्थ के सामने अपने समय की मर्यादाओं के भंग होने का संकट खड़ा हुआ था तो सार्त्र के सामने नई मर्यादाओं के भंग होने का संकट, वे मर्यादाएं जिनका वादा था- हमारे चौखटे में रहो, मुक्ति हो जाओगे । आधुनिक और प्राचीन, दोनों ने मुक्ति शब्द के साथ छल किया- इस बात के दो गवाह कृष्ण कल्पित की कविता में‘पार्थ’ और ‘सार्त्र’ हैं। दोनों को हाजिर-नाजिर जान, बाग़-ए-बेदिल कभी पीड़ा, कभी व्यंग्य, कभी पुकार तो कभी ललकार और कई बार हिकारत के स्वर में बोलती है।

जाहिर है, ग्लोबल गांव होने की जिद में पड़ी दुनिया के विस्थापितों/ शापितों की जगतपीड़ा और आत्मपीड़ा में नाभिनाल रिश्ता बैठाने को बेचैन यह यायावर कवि कृष्ण कल्पित अपने ठौर के तौर पर पार्थ और सार्थ को ही चुन सकता था।

चन्दन श्रीवास्तव

चन्दन श्रीवास्तव

चन्दन श्रीवास्तव,  मूलतया छपरा(बिहार) के निवासी, पिछले पंद्रह सालों से दिल्ली में। पहले आईआईएमसी और फिर जेएनयू में पढ़ाई। “उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध में हिन्दी लोकवृत्त का निर्माण” शीर्षक से पीएचडी के बाद दिल्ली के कॉलेजों में छिटपुट अध्यापन, फिर टीवी चैनल की नौकरी और अब विकासशील समाज अध्ययन पीठ(सीएसडीएस) की एक परियोजना इंक्लूसिव मीडिया फॉर चेंज से जुड़े हैं। इनसे  chandan@csds.in पर संपर्क संभव है। 

( यह कृष्ण कल्पित को समझने की शुरुआती कोशिश है. लिखने वाले ने ना तो उनकी सारी रचनाओं का पाठ किया है और ना ही पढ़ी हुई कविताओं पर पर्याप्त समय देकर सोचा है। अगर बेतरतीबी के भीतर से कोई तरतीब बन सकती हो तो इस कोशिश को भी इसी रुप में देखा जाय)

बाग़-ए-बेदिल, अंतिका प्रकाशन , प्रकाशन वर्ष : 2013, पृ. सं: 512, मूल्‍य : HB 850/-, PB 450/- 
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समकालीन कविता का आत्मसंघर्ष: सुधीर रंजन सिंह

By सुधीर रंजन सिंह 

(इस आलेख को भारत भवन में प्रस्तुत करने को लेकर मुझे एक अत्यंत आत्मीय और अग्रज कवि से तीखे विवाद और आत्मसंघर्ष से गुज़रना पड़ा है। मैं कभी किसी राजनीतिक संस्था या लेखक संगठन का सदस्य नहीं रहा। मैं कवि और आलोचक हूँ। कदाचित अस्वीकृत। स्वीकृति की शर्तें पूरी करने में मैं अपने को अयोग्य अनुभव करता हूँ। मंच और संस्थाओं से संवाद के स्तर पर मेरा सम्बन्ध रहा है। इसके लिए भी मैंने खुद होकर विशेष प्रयास नहीं किया। आलोचनात्मक लेखन प्रायः मैंने अपनी अकादमिक आवश्यकताओं  के अधीन किया है। आमंत्रण अथवा आग्रह पर कुछ ही लेखन किए हैं। अवसर ही कम थे। दूसरे स्तर पर, अपने लोगों से सीखने में मैं कभी पीछे नहीं रहा। यह प्रक्रिया है, जिसका लाभ मुझसे दूसरों ने भी लिया होगा। मेरा अनुभव है कि मेरी बातों का जिन लोगों ने लाभ लिया, मंच पर खड़े होने की दशा में उन्होंने मेरी तरफ पीठ कर ली।
मंचों की पीठ मेरी ओर अधिक रही। प्रतिबद्धता की पीठ भी मेरी ओर रही। विरोधियों का सामना करते हुए यह बात होती तो मैं इसे भी सह लेता। उनके साथ तो सामंजस्य के कीर्तिमान स्थापित किए गए। कॅरियर की दुनिया में, चाहे वह साहित्य से सम्बन्धित क्यों न हो, कोई सचमुच शत्रु नहीं होता और सच्चा मित्र भी शायद ही कोई होता है। सच यही है कि सत्ता संरचना से बाहर कोई नहीं है, और इसका पापबोध भी नहीं है। सामंजस्य को रणनीति की संज्ञा दी जाती है। लेकिन उनका यह सोचना कहाँ तक ठीक है कि दूसरे हमेशा  बिना हथियार और रणनीति के अपने पापबोध में अलग-थलग पड़े रहें?
मित्र की मर्जी के विरुद्ध मैंने यह आलेख प्रस्तुत किया, निश्चित  ही यह अपराध मुझसे हुआ है। इसे लेकर मैं यही अनुभव करता हूँ, भर्तृहरि का श्लोक है- ‘‘बौद्धरो मत्सरग्रस्ताः प्रभवः स्मयदूषिताः। अबोधोपहताष्चान्ये जीर्णमंङ्गे सुभाषितम्।।’’ इसकी अनुरचना मेरे द्वारा की गई है- ‘‘जाऊँ, किसे सुनाऊँ/ ठहरे जो विज्ञ विषारद/ रोग डाह का उन्हें लगा है/ कुबेर बड़े कि अधिकारी जो/ रहते ऐंठे-ऐंठे हैं/ जनगण है अपना/ समझ उतना पाए न वह/ छीज जातीं बातें अच्छी/ देह के भीतर।’’)

 लाँग नाइन्टीज़: अनेकान्त काल

विषय है मानवीय मूल्य और समकालीन हिन्दी कविता का आत्मसंघर्ष। यहाँ विशेषण के रूप में आया मानवीय स्वयं मूल्य है, और जहाँ तक मुझे ध्यान है कविता के सन्दर्भ में मानवीय मूल्य को आगे करके कोई बहस नहीं चली है। हिन्दी में नई कविता के सिद्धान्तकारों के द्वारा प्रचलित पद है- मानव मूल्य। यह बहस के लिए तब बड़ा विषय हुआ करता था और उसके पीछे एक उद्देश्य था। साहित्यिक बहसों के पीछे उद्देश्य प्रायः राजनीतिक ही हुआ करते हैं। मानव मूल्य पर विचार के साथ भी यह था। मुझे थोड़ी देर के लिए उस प्रसंग में जाने की इजाजत दें। उसके बाद मैं समकालीन कविता के आत्मसंघर्ष पर जिरह की इजाजत चाहूँगा। अन्त में यदि सम्भव हुआ तो मानवीय मूल्य पर अपनी बात समाप्त करूँगा।

धर्मवीर भारती की एक पुस्तक का नाम है- मानव मूल्य और साहित्य। भारती नई कविता के प्रमुख कवियों में से हैं, लेकिन नई कविता के प्रमुख सिद्धान्तकार थे लक्ष्मीकांत वर्मा और विजय देवनारायण साही। लक्ष्मीकांत वर्मा की पुस्तक नई कवित के प्रतिमान, जो बहस की दृष्टि से उस ज़माने में पर्याप्त महत्त्व की थी, में एक लेख है- मानव विशिष्टता और आत्मविश्वास के आधारमानव विशिष्टता से लक्ष्मीकांत वर्मा का आशय मानव मूल्य ही था। यह 1957 की पुस्तक है। इससे पहले 1948 से 1956 के बीच जयशंकर प्रसाद से पद उधार लेकर लघुमानव की धारणा को आगे किया गया था, जिसका विकास विजय देवनारायण साही के प्रसिद्ध विवादित लेख लघुमानव के बहाने हिन्दी कविता पर बातचीत में हुआ। उसमें लघुमानव को मानव मूल्य का सैद्धान्तिक आधार दिया गया और छायावाद से लेकर अज्ञेय तक की कविता पर विचारोत्तेजक टिप्पणी की गई। बाद में लक्ष्मीकांत वर्मा ने साही के प्रयास को नई कवितावादी सूत्र के रूप में सामने रखा मानव मूल्यों के सन्दर्भ में लघु-मानव की कल्पना नामक लेख में। इस प्रकार, ‘मानव मूल्य पद अथवा अवधारणा नई कविता द्वारा प्रचलित है। उसी की शब्दावली में कहें तो यह नई कविता के सहचिन्तन की उपलब्धि है। यह अच्छी बात है कि नई कविता में सामूहिक चिन्तन था, जो आज प्रायः दुर्लभ हो गया है। उस सामूहिक चिन्तन का दोष यह था, मुक्तिबोध की शब्दावली में कहें, उसने एक क्लोज्ड सिस्टम बना लिया था, जिससे संघर्ष की आवश्यकता थी, और जिसे मुक्तिबोध ने आत्मसंघर्ष की संज्ञा दी थी – नई कविता का आत्मसंघर्ष। आज हम समकालीन कविता के आत्मसंघर्ष पर बात कर रहे हैं तो उस आत्मसंघर्ष को भी याद किया जाना चाहिएजिसे मुक्तिबोध ने नई कविता के सन्दर्भ में आवश्यक समझा था। उनकी यह बात यहाँ याद करने योग्य है, ‘‘नई कविता में स्वयं कई भावधाराएँ हैं, एक भाव-धारा नहीं। इनमें से एक भाव-धारा में प्रगतिशील तत्त्व पर्याप्त है।  समीक्षा होना बहुत आवश्यक है। मेरा अपना मत है, आगे चलकर नई कविता में प्रगतिशील तत्त्व और भी बढ़ते जाएँगे, और वह मानवता के अधिकाधिक समीप आएगी।’’1

आगे चलकर नई कविता में प्रगतिशील तत्त्व तो नहीं बढ़े- नई कविता ही नहीं रही- लेकिन प्रगतिशील कविता का जो अगला विस्तार हुआ, उसमें नई कविता के तत्त्व अवश्य बढ़ गए। यह एक हद तक ज़रूरी भी था। नई कविता में नएपन पर जो जोर था, उसका मूल्य है। उसके कुछ दीग़र मूल्यों से असहमति की गुंजाइश है। मुक्तिबोध का आत्मसंघर्ष उसी गुंजाइश को दर्शाता है। उनके यहाँ मानवता का प्रयोग नई कविता के सहचिन्तन के परिणाम के रूप में आने वाला मानव मूल्य के अर्थ में नहीं हुआ है। नई कविता में मानव मूल्य को अर्थ दिया गया था- अनुभूति की प्रामाणिकता, ‘अनुभूति की ईमानदारी आदि। इस अर्थ में खोट नहीं है, खोट है इसकी ऐतिहासिक नियति में। नई कविता से पहले यूरोप में आवाँगार्द कला में प्रामाणिक अनुभव को पकड़ने का सराहनीय प्रयास हुआ था, लेकिन बाद में वही प्रामाणिक अनुभव शीतयुद्ध की राजनीति की विचारधारा बना, जिसका शिकार नई कविता भी हुई। उसके प्रति मुक्तिबोध ने सावधान किया था। उनके शब्द हैं, ‘नई कविता के बुर्ज से शीतयुद्ध की गोलन्दाजी हो रही है। यह आकस्मिक नहीं है कि मुक्तिबोध ने अनुभूति की प्रामाणिकता के वज़न पर जीवनानुभूति पद को आगे किया। जीवनानुभूति में मानवता का पक्ष प्रबल है। आज हम कह सकते हैं कि जीवनानुभूति की धारणा कविता के सन्दर्भ में पर्याप्त नहीं है, लेकिन उसकी ऐतिहासिक आवश्यकता से इनकार नहीं कर सकते हैं। उसमें शीतयुद्ध की गोलन्दाजी के विरुद्ध जीवनानुभूति के ज़रिए मानवता के अधिकाधिक समीप जाने की चेष्टा की गई है।

शीतयुद्ध 1986-’87 में समाप्त हो गया। आज यह बहस बेकार है कि शीतयुद्ध का खलनायक अमरीका था या अमरीका और रूस दोनों देश। सिर्फ़ यही कहा जा सकता था कि द्विधु्रवीय व्यवस्था से विश्वव्यापी संकट पैदा हो गया था। शीतयुद्ध की समाप्ति के पाँच साल बाद सोवियत-कम्यून भी समाप्त हो गये और  नई विश्व-व्यवस्था आई। इस बात को बीस साल हो गए हैं। आज इस गोष्ठी के माध्यम से कविता के सन्दर्भ में मानव मूल्य का प्रश्न उठाया गया है तो इसकी प्रासंगिकता को समझना हमारे लिए ज़रूरी है। नई कविता की वापसी तो सम्भव नहीं है, लेकिन मुझे लगता है कि नई कविता की जो राजनीति थी, जिससे मुक्तिबोध ने अगाह किया था, उसी तरह की समझ की वापसी हो रही है।

90 के बाद का समय हमारा जीवन काल है- हमारा यानी सामान्य रूप से स्वाधीनता के आसपास जनमे लोगों से लेकर युवतम पीढ़ी का। इनमें संवेदना अथवा चेतना के धरातल पर मैं बहुत भेद नहीं करना चाहता। समसामयिक होने के नाते लोगों के पूर्वग्रह काम कर सकते हैं। समकालीनता के साथ यह बात प्रायः होती ही है। वर्तमान मतभेद की भूमि न हो, तो वह कितनी बेजान चीज़ होगी, इसका अनुमान किया जा सकता है। इसके बावजूद, वर्तमान की वास्तविक विशिष्टताओं का शरसन्धान कठिन होता है। इसके लिए बहुत बड़ी बहस की आवश्यकता है। वर्तमान के अन्तर्विरोध आखिर हमारे ही अन्तर्विरोध होते हैं, जिन्हें समझने के लिए समसामयिक ऐतिहासिक यथार्थ को कठोर आत्मचेतना के स्तर पर पहचानने की आवश्यकता होती है।

समकालीनता पर कच्ची-पक्की बहसें हमेशा चलती रहती हैं। कविता के सन्दर्भ में कई उल्लेखनीय बहसें हुई हैं। अभी-अभी एकांत श्रीवास्तव ने वागर्थ का अंक निकाला है- हिन्दी कविता: 80 के बाद (लाँग नइान्टीज़)। उसमें दस लोगों ने बहस में भाग लिया है। लाँग नाइन्टीज़ की अवधारणा बद्रीनारायण की है। 2008 में देखने को मिली द लाँग नाइन्टीज़: समय को समझने का एक विनम्र प्रस्ताव शीर्षक से। उसी की कड़ी है फटी हुई जीभ की दास्तान नामक लेख जो 2009 में छपा था। वह विचारोत्तेजक मामला है, जिस पर मैंने थोड़ा-सा लिखा है जो आलोचना के नए अंक में छपा है। आज की बहस में भी मैं लाँग नाइन्टीज़ से जुड़ी कुछ बातें कहने की इजाजत चाहूँगा।

लाँग नाइन्टीज़ के पहले राजेश जोशी और विजय कुमार आलोचना के मंच से समकालीनता और कविता विषय को बहस के लिए आगे कर चुके थे। बाद में राजेश जोशी ने अपनी दूसरी नोटबुक वाली किताब का नाम ही रखा- समकालीनता और साहित्य। उसमें समकालीनता और कविता लेख में मेरी धारणा का उल्लेख किया गया है, जो मैंने एरिक हॉब्सबॉम की ‘शॉर्ट सेंचुरी के वज़न पर रखी थी- हमारे अपने सन्दर्भ में 19वीं शताब्दी की शुरूआत 1857 के विद्रोह से और 20वीं शताब्दी की शुरूआत 1947 में मिली आज़ादी से मानी जानी चाहिए। राजेश जोशी ने अपनी सुविधा के अनुसार मेरी उस बात को छोड़ दिया कि हमारे सन्दर्भ में 20वीं शताब्दी लगभग असमाप्त है। समाप्ति के कुछ चिह्न बाबरी मस्जिद के ध्वंस और उसके बाद की कुछ घटनाओं में अवश्य दिखते हैं। लेकिन हम 21वीं शताब्दी में आ गए हैं, कि इसे लेकर मेरे मन में दुविधा है। सूचना-प्रौद्योगिकी के विस्तार के लिहाज से यह आप कह सकते हैं कि हम लगभग 21वीं शताब्दी में आ गए हैं।

यह हमारा जीवन काल है। जब तक हम जि़न्दा हैं इसे समझने के लिए बार-बार नए सिरे से प्रयास की आवश्यकता होगी। और यह कोई प्रलय-काल नहीं है। वे बहुत-सी आशाएँ जो मनुष्य ने कल्पित की थीं, इस काल में फली-फूल रही हैं। एक स्वप्नहीनता के बावजूद। यह बात कविता में भी है। कविता का अर्थ होता है स्वप्नहीनता के विरुद्ध होना, भविष्य की ओर देखना। ब्रेख्त की मशहूर कविता है आने वाली पीढि़यों से, जो इस बेचैनी के साथ शुरू होती है- सचमुच, मैं एक अँधेरे वक्त़ में जी रहा हूँ!यह उस वक्त़ की कविता है जब द्वितीय विश्वयुद्ध का आग़ाज़ हो चुका था। मानवता भीषण ख़तरे में पड़ गई थी। यह कवि के लिए घोर आत्मसंघर्ष का दौर था, जिसमें वह अपनी कमियों को भी टटोलता है। सबने पढ़ी होगी यह कविता। कविता समाप्त होती है-

पर तुम, जब वह वक्त आए

आदमी आदमी का मददगार हो

याद करना हमें

कुछ समझदारी के साथ।

वह वक्त़ आए, कविता इसी के लिए लिखी जाती है। इसी बात में कवि की समकालीनता, आत्मसंघर्ष और भविष्य में उसका जीवन है। यही मानवीय मूल्य भी है। मानवीय मूल्य सत्य के अन्वेषण में है। सत्य वही नहीं जो हम देखते हैं, बड़ा सत्य वह है जो हम चाहते हैं। सवाल यह है कि हम चाहते क्या हैं और कितनी ताकत के साथ चाहते हैं। बहुत ऊर्जा चाहिए। बहुत ताकत चाहिए। बहुत सावधानी भी चाहिए। लेकिन विगत के उद्यमों, चाहे वे आसन्न विगत के क्या न हों, को झुठलाने और नकारने की आवश्यकता नहीं पड़नी चाहिए। पुराने के बीच से ही नया फूटता है। नए के भीतर से दूसरा नया फूटेगा। पुराना फ़ैशन की तरह कभी न लौटे, लेकिन उसका अद्भुत अपनी जगह ज़रूर बना रहेगा, और उसमें झाँकने की भी आवश्यकता बनी रहेगी।

समकालीन कवि वह है जो अपने को पूर्ववर्तियों की वैचारिक मान्यताओं की कड़ी के रूप में देखता है। वह केवल वास्तविकता की ओर उन्मुख नहीं है। वास्तविकता को वह आत्मचेतना के स्तर पर रचने का प्रयास करता है, जिसमें भविष्य और उसके रास्ते संकेतित होते हैं। यह काम चुपचाप चलता है, बहुत बोलकर नहीं। कविता की यही प्रकृति है। कवि के आत्मसंघर्ष की यह प्रकृति है। कवि वास्तविकता का हिस्सा मात्र नहीं होता। वह वास्तविकता के विरुद्ध एकांत की रचना करता है,और एकांत जिस चुप्पी की रचना करता है उसमें अनन्त का स्फोट होता है। दूसरे शब्दों में, भविष्य का स्फोट होता है।

प्रश्न है हमारा समय क्या है? हमारे समय की कविता कैसी है? बद्री हमारे समय को लाँग नाइन्टीज़ नाम देते हैं। लाँग नाइन्टीज़ यानी हॉब्सबॉम की ‘शॉर्ट सेंचुरी के बाद का समय, जिसमें पुराना समाप्त हो चुका, लेकिन नए का स्वप्न साफ नहीं है। लाँग नाइन्टीज़ पद में, इस तरह समाजवाद के भविष्य के प्रति निराशा दिखाई देती है। निराशा उचित है। लेकिन उस निराशा के उत्तर में इधर-उधर से लाए गए वैचारिक संस्रोतों में जो चमक और ऊर्जा देखी गई है, और जिस तरह पूर्व पीढ़ी के कृतित्व पर शरसन्धान किया गया है, वह आत्मश्लाघापूर्ण विच्छेद की ऊँचाई पर है। किसान, मजदूर और प्रोलेटेरियत आन्दोलनांे के बरक्स उपेक्षित एवं दलित, महिला एवं सबाल्टर्न प्रतिरोध बद्री के अनुसार ’90 के बाद की विशेषता है। (वागर्थ-209/34) इससे सहमत होने की गुंजाइश मेरी समझ से कम बनती है। ये बातें बहुत पहले पैदा हो गई थीं। हॉब्सबॉम की पुस्तक एज़ ऑफ एक्सट्रिम्स के शुरू में लोगों की नज़र में बीसवीं शताब्दी क्या है शीर्षक के अन्तर्गत कुछ टिप्पणियाँ शामिल की गईं हैं। नोबेल पुरस्कार से सम्मानित रीता लेवी मोंतेलसिनी की टिप्पणी है, ‘‘सभी बातों के बावजूद इस शताब्दी में अच्छे से अधिक अच्छे के लिए क्रांतियाँ हुई हैं… चैथी सत्ता का उदय और सदियों से दमित नारी का उत्थान।’’ यह बात यूरोप की तुलना में भारत में कम हुई थी, लेकिन हुई थी। कविता में भी ’90 से पहले यह दिखाई पड़ती है। रघुवीर सहाय में स्त्री प्रश्न खूब है। मंगलेश, अरुण कमल, राजेश जोशी और उदयप्रकाश में भी है। यह अलग बात है कि इन कवियों ने इसे अलगा कर दिखाने की कोशिश नहीं की, और पिछले दौर में कवयित्रियों का अभाव रहा। अच्छी बात है कि बद्री ने अपने पूर्व के कुछ कवियों को, जिसमें राजेश और अरुण हैं, सरलीकरण की प्रवृत्ति से बाहर रखकर देखा है, लेकिन इसके लिए उन्हें ’90 का ऋणी बना दिया है। बड़ी चीज़ नब्बे है; जैसे पहले छायावाद के विरुद्ध बड़ी चीज़ नई कविता थी। नयी कविता छायावादी संस्कार की शत्रु थी; ’90 परवर्ती प्रगतिशील संस्कार का किंचित शत्रु हुआ।

प्रगतिशील कविता, अपने सफल-असफल दावों में, मानवता के लिए संश्लिष्ट विश्वदृष्टि अर्जित करने का प्रयास करती है। विश्वदृष्टि का अर्थ विचारधारा अथवा माक्र्सवादी दृष्टि नहीं। विश्वदृष्टि का सम्बन्ध साहित्य से है, वह साहित्य से उद्भूत होने वाली चीज़ है। नई कविता भी विश्वदृष्टि अर्जित करने का प्रयास करती है। अज्ञेय के यहाँ यह बात है। प्रगतिशील कविता और नई कविता, दोनों आधारभूत विभिन्नताओं को टटोलने का प्रयास करती हैं। दोनों अपने-अपने स्तर पर एक जगह आकर मिलने का भी प्रयास करती हैं। शमशेर और मुक्तिबोध, दोनों इस बात के उदाहरण हैं। अच्छी बात थी कि इन कवियों में जीत की तमन्ना थी तो असफलता का इतिहास रचने का साहस था, जो बाद में कम दिखाई पड़ता है। आज सफलता के लिए जोड़-तोड़ कितना बढ़ा है, बद्रीनारायण को भी मालूम है।

बद्रीनारायण ने जितने समकालीन प्रतिरोध गिनाए हैं, उनमें से एक है सबाल्टर्न। यह भी ’90 की कोई संवृत्ति नहीं है। दूसरी बात, जैसे आवाँगार्द की कला में बाद में आकर्षण नहीं बचा था, वही बात सबाल्टर्न के साथ है। सबाल्टर्न लोग त्रासदी के प्रसन्न-चित्त आख्याता बन गए, सांस्कृतिक प्रभुत्व (कल्चरल हिगेमनी) तोड़ना उनके एजेंडे में नहीं रहा। आज जब मजदूरों, किसानों, निम्न बुर्जुआ का लोकप्रिय गठबंधन, जिसे जनता कहा जाता है, गायब हो रहा है, सबाल्टर्न पर फ्रेडरिक जैम्सन की उत्तर आधुनिकता के विमर्षों पर यह टिप्पणी सही बैठती है।

इसके लिए फ्रायड के स्वप्न विश्लेषण के रूपक का इस्तेमाल किया गया है। संभवतः सब बातों के बावजूद यह नई कहानी नहीं है। फ्रायड के उस आनन्द को याद करें जो उन्हें एक अस्पष्ट आदिवासी संस्कृति की खोज से प्राप्त हुआ था। स्वप्न विश्लेषण की अनेक परम्पराओं में से सिर्फ़ यह खोज उनकी अवधारणा के काम की थी कि सभी स्वप्नों के सेक्स सम्बन्धी छुपे अर्थ होते हैं- केवल सेक्स सम्बन्धी स्वप्नों के, जिसके कुछ और ही अर्थ होते हैं। यही बात उत्तर आधुनिक बहसों पर भी लागू होती है। जिस विराजनीतिक नौकरशाही से यह संवाद स्थापित करता है, वहाँ समस्त सांस्कृतिक लगने वाली बातें राजनीतिक नीतिशिक्षण का प्रतीकात्मक रूप निकालती हैं- सिवाय एकमात्र स्पष्ट राजनीतिक स्वर के जो पुनः राजनीति से संस्कृति में घुसपैठ का लक्ष्य रखता है।2

    बद्रीनारायण ने ’90 के दशक में उभरे कवियों में सामान्य सम्बन्ध-सूत्र की दृष्टि से स्थानीयता अथवा लोक को जो महत्त्व दिया है वह तब तक फ्रायडीय आनन्द से आगे की कहानी नहीं बन सकता, जब तक कि उसकी आधारभूत विभिन्नता किसी संश्लिष्ट और मूलगामी विश्वदृष्टि पर आकर नहीं मिलती। कम-से-कम दबाव पैदा करने की षक्ति तो उसमें होनी ही चाहिए। मैं यह नहीं कहता कि आज की कविता में यह बात एकदम नहीं है; लेकिन स्थानीयता अथवा लोक के नाम पर विराजनीतिक नौकरशाही से सामंजस्य बैठाने और सत्ता संरचना में अपने को खपा देने का भी काम कम नहीं हुआ है। संभव है कि इस कहानी के हम भी किरदार और पवित्र पापी हों। इस बात से कविता के आत्मसंघर्ष का गहरा सम्बन्ध है।

    फूको प्रतिपादित करते हैं सत्ता सर्वत्र है। कोई भी ऐसा स्थान नहीं है, जहाँ से प्रतिरोध को सत्ता से अलगाया जा सके। जो विरोध में खड़ा है वह वास्तव में दूसरे प्रकार की सत्ता है। साहित्य अथवा कविता प्रतिरोध की सत्ता के रूप में भी इसका अपवाद नहीं है। इसलिए पूर्व पीढ़ी को कोसना और अपनी पीठ थपथपाना ठीक नहीं है। इस रास्ते हम समकाल के ही बन्दी हो जाते हैं। ठीक काम यह है कि हम समसामयिक ऐतिहासिक यथार्थ और उसकी चुनौतियों से आत्मचेतना के स्तर पर टकराते रहें। इसे सच्ची रचनाशीलता कही जा सकती है। इससे नए रास्ते निकलेंगे, नई युगचेतना निर्मित होगी। परिवर्तनकारी समय (पद बद्री का) की रचना भी इसी रास्ते होगी। भारत माता ग्राम-वासिनी, जो लाँग नाइन्टीज़ के सम्पादकीय में एकांत श्रीवास्तव ने उत्साह में जो कहा है, भावना के स्तर पर मैं उनकी बात की इज्जत करता हूँ, लेकिन उसमें निहित नाॅस्टैलिजिया और रूमानियत से बात नहीं बनेगी। कई-कई विषय और भावधाराओं की ज़रूरत है। समकालीन कविता के आत्मसंघर्ष में केवल गाँव और कस्बा शामिल नहीं हैं। विगत की तुलना में उसके क्षेत्र में कई गुना विषय बढ़ गए हैं। काव्य-वस्तु के विकास के लिए भी संघर्ष करना है, जो इस सूचना प्रौद्योगिकी युग में कई गुना कठिन हो गया है। काव्य-विषय की दृष्टि से हमें भारी कठिनाइयों का सामना करना पड़ सकता है। सूचना प्रौद्योगिकी की पहुँच कवि-चेतना को मात कर देती है। उससे सीखने और टकराने, दोनों की ज़रूरत है। हम सूचना और संचार प्रविधियों की अर्थव्यवस्था में आ चुके हैं। इसकी नई उत्पादन विधि, डी. फोरे की मानें तो, साॅफ्टवेयर के विकास को भी पार कर जाएगी, किस हद तक, उसे अभी समझा नहीं जा सकता है।3 इस तरह कवि-कर्म कठिन से कठिनतर होता जाएगा। ऐसे में, हमारी अन्तःप्रेरणाएँ ही सबसे अधिक काम आएँगी। दूसरी बात, सूचना प्रौद्योगिकी भी विषय है। बड़ा विषय है। जैसे पहले औद्योगिक क्रान्ति और मजदूरों के आन्दोलन बड़े विषय थे।

    हमारे समकालीन कवि दो प्रकार के हैं। एक वे हैं जो अपनी रचना और उसके विषयों को लेकर बहुत मुखर हैं। उन्हें अपने को मनवाने की चिन्ता अधिक रहती है। समझौताविहीन स्तर पर और बेहतरी की दिशा में या कहें प्रगति की मंशा से यदि किसी में यह है, उसे भी आत्मसंघर्ष के रूप में मंजूर किया जाना चाहिए। दूसरे वे हैं जो अपने कवि होने के प्रति संकोच का भाव रखते हैं। उनका आत्मसंघर्ष कठिन है। उनमें अन्तःप्रेरणाएँ अधिक सक्रिय रहती हैं, लेकिन उन्हें समझने में कवि अपने को असमर्थ महसूस करता है। जब कवि ही नहीं समझ पाता तो दूसरों के लिए समझना मुश्किल काम होगा ही। इस मुश्किल के भीतर कवि के आत्मसंघर्ष को समझने और इसी दृष्टि से उसे महत्त्व दिए जाने की आवश्यकता है। आज कवि बहुत हैं, लेकिन इस मुश्किल के भीतर ऊँचाई पाने वाले कवि बहुत कम हैं। जो हैं उन्हें आगे रखकर देखने की ज़रूरत है। आत्मसंघर्ष वाली बात ठीक-ठीक तभी समझ में आ सकती है।

    अन्तःप्रेरणा- जिसे पुराने लोग कारयित्री प्रतिभा कहते थे। यह उत्पाद्य प्रतिभा है। प्रतिभा कहने से भी काम चल सकता है। इसमें अनुभूति, जीवनानुभूति और कलात्मक अनुभूति, सभी बातें शामिल हो जाती हैं। यह सदैव बेहतरी अथवा अच्छाई की दिशा में सक्रिय रहती है। इसे मान लेने के बावजूद, जैसा कि मैं समझता हूँ, अन्तःप्रेरणा वह स्पेस है जहाँ अच्छाई और बुराई को बराबर का दर्जा प्राप्त होता है। अन्तःप्रेरणा में हम एक वस्तु को दूसरी वस्तु को विकल्प के रूप में नहीं देखते, उनसे चेतनागत सम्बन्ध अथवा विषेष प्रकार का तादात्म्य स्थापित करते हैं। सम्बन्ध की प्रकृति अथवा वह विषेष प्रकार क्या है, यह महत्त्वपूर्ण है। अन्तःप्रेरणा की क्रियाओं में अच्छा और बुरा दोनों समान महत्त्व रखते हैं। इस सम्बन्ध में फूको का एक कथन याद आता है, ‘‘मैं नहीं कहता कि सभी चीज़ें बुरी हैं, लेकिन वे सभी चीज़ें खतरनाक हैं जो ठीक-ठीक बुरी के समान नहीं हैं।’’4

    एक साक्षात्कार में यह बात आई है। और मैं जब यह पढ़ रहा था तो अचानक मुझे रामचरितमानस का अन्तिम दोहा याद आया-

कामहि नारि पिआरी जिमि लोभहि प्रिय जिमि दाम।

तिमि  रघुनाथ  निरंतर  प्रिय  लागहु  मोहि राम।

    मैंने शुरू में कहा था कि अंत में मानवीय मूल्य पर भी एकाध बात करूँगा। कामपिपासा और लोभ बुराई है, अमानवीय है। तुलसी ने अपनी भक्ति को उसके समकक्ष रखा। बुराई में जितनी शक्ति होती है, वह भक्ति को प्राप्त हो, भाव यह है। भक्ति को पाने के लिए उस पर बुराई को उत्प्रेक्षित करना पड़ा। मानवीय मूल्य तो ठीक है, लेकिन जो संसार है उसमें मानवीय-अमानवीय, अच्छा-बुरा, सब कुछ है- सुगुन छीर अवगुन जल ताता; मिलइ रचइ परपंच विधाता।

    अन्तःप्रेरणा के क्षेत्र में अन्तर्बाधा के लिए स्थान नहीं है। लेखक के नाते हम जानते हैं कि मूल्य अन्तिम नहीं होते। सात्र्र का यह कथन महत्त्वपूर्ण है, ‘‘मानवता को अभी निर्धारित होना बाकी है।’’ यही समझ हमें फासीवादी होने से बचाती है और आत्मसंघर्ष के लिए युक्ति प्रदान करती है।

    एक साथ कई विषयों से गुज़रना और उनसे जुड़े प्रश्नों पर बात करना कठिनाई पैदा करता है। यह दौर ही ऐसा है- अनेक विषयों और प्रश्नों से घिरा। इस अर्थ में मैं मानता हूँ कि नौवाँ दशक और उसके बाद का समय अलग से दिखाई देता है। लेकिन इसे लाँग नाइन्टीज़ ही कहा जाए, इसे लेकर मेरे मन में दुविधा है। बद्रीनारायण की इस बात से मैं सहमत हूँ कि नब्बे के दशक के पूर्व की कविता में जा वैचारिक संस्रोत काम कर रहे थे, वे बाद में कमजोर पड़ गए या अपर्याप्त साबित हुए। हमारे समय में अनेकान्त का महत्त्व है। हम किसी भी बुनियादी विषय पर एकमत होने की स्थिति में पहले की तुलना में बहुत कम हैं। दूसरी ओर, दूसरों की तरफ से प्रस्तावित विषय और विचार के प्रति हम पहले की तरह द्वेषी नहीं हैं। हम अकेला विकल्प हैं, यह बात अब नहीं रही। हमारा विवाद सबसे है और अपने आपसे भी है, जो जीवन और रचनाशीलता दोनों में मायने पैदा कर रहा है। लेकिन जिस दुनिया में हम जी रहे हैं उसमें ख़तरे भी कई गुना बढ़ गए हैं, उसमें हार जाने का डर विगत की तुलना में बढ़ गया है। यह एक ऐसा क्षण अथवा विन्दु है जो हमें इस समझ पर कायम होने के लिए विवश करता है कि पिछले दर्शन का महत्त्व है, लेकिन उसमें ज़रूरी संशोधन और नये अध्याय जोड़ने की ज़रूरत पड़ेगी। अभी तो हमें यही पता नहीं है कि हम कहाँ जा रहे हैं। यह अनेकान्त काल है। लेकिन रचनाशीलता के लिए, तमाम मुश्किलों के बावजूद, यही ऊर्वर काल है। हमें अपना काम करते हुए इस उम्मीद पर अपने को कायम रखने की ज़रूरत है, जो ब्रेख्त की उद्धृत पंक्तियों में है, ‘…जब वह वक्त आए/ आदमी-आदमी का मददगार हो/ याद रखना हमें/ कुछ समझदारी के साथ। जब वह वक्त़ आएगा तो बे्रख्त के साथ शायद हमें भी कुछ समझदारी के साथ थोड़ा याद रखा जाए। आमीन!

 सन्दर्भ:

(1) मुक्तिबोध रचनावली-5/334 (पे.बै.).

(2) फ्रेडरिक जैम्सन, पोस्ट मार्डनिज़्म ऑर द कल्चरल लॉजिक  ऑफ लेट कैपिटलिज़्म, पृ.-64.

(3) प्रसन्न कुमार चैधरी की पाण्डुलिपि अतिक्रमण की अन्तर्यात्रा से साभार.

(4) फूको रीडर, पॉल  रेबिनो (सम्पादक), पृ.-343.

 भारत भवन में 21.12.2012 को पढ़ा गया आलेख। कुछ अंश नहीं पढ़े गए। संशोधित।

sudhir ranjan singh

sudhir ranjan singh

हिन्दी के आलोचक। काव्य संकलन ‘और कुछ नहीं तो’ और आलोचना की पुस्तक ‘हिन्दी समुदाय और राष्ट्रवाद’ प्रकाशित। एक कविता संकलन और आलोचना की दो पुस्तकें शीद्घ्र प्रकाश्य। भोपाल के शासकीय महाविद्यालय में प्राध्यापन।

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