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पेरूमल मुरुगन और वन पार्ट वुमन: प्रणय कृष्ण

मुरुगन ने किसी प्रथा पर कोई मूल्य निर्णय नहीं दिया है, अच्छा या बुरा नहीं कहा है, उन्होंने सिर्फ एक कोमल कहानी कही है जो एक समाज में जन्मी है. उस समाज की कुछ प्रथाएं और मान्यताएं हैं जो उस समाज में जी रहे लोगों के जीवन से लिपटी हैं, उन्हें कोई कथाकार, इतिहास-लेखक या नृतत्वशास्त्री कृत्रिम ढंग से काट कर अलग नहीं कर सकता. ऐसा करना खुद को झूठा साबित करना है, कला और समाज दोनों से गद्दारी है. मुरुगन ने ऐसा करने से इनकार किया है, लेखक की मृत्यु की कीमत चुका कर भी. लेकिन पाठकों और जागरूक नागरिकों का प्यार उन्हें वापस लौटा लाएगा. ज़रूर ही लौटा लाएगा. #लेखक _80236804_modhorupaganfinalcurved

तमिल लेखक पेरूमल मुरुगन पुनरुज्जीवित होंगे

By प्रणय कृष्ण

तमिल लेखक पेरूमल मुरुगन ने १४ जनवरी को फेसबुक पर लिखा, लेखक पेरूमल मुरुगन मर गया. वह भगवान नहीं है, लिहाजा वह खुद को पुनरुज्जीवित नहीं कर सकता. वह पुनर्जन्म में भी विश्वास नहीं करता. आगे से, पेरूमल मुरुगन सिर्फ एक अध्यापक के बतौर ज़िंदा रहेगा, जो वह हरदम रहा है.” अब तक मुरुगन के खिलाफ धर्म और जाति के स्वयंभू ठेकेदारों से लेकर उनकी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के हक़ में आवाज़ उठाने वाले लोगों ने लाखों शब्द व्यय किए होंगे, लेकिन लेखक की पीड़ित अंतरात्मा की यह तीन पंक्तियां सब पर भारी हैं. लेखक मर गया, लेकिन २०१५ के हिन्दुस्तान के राज और समाज की हिंसक दयनीयता जी रही है. मुरुगन का वक्तव्य ऐसे वक्त पर टिप्पणी है जिसमें जनता की वंचनाओं और हाहाकार को एक सामूहिक पागलपन की ओर मोड़ देने की पुरजोर कोशिशें हो रही हैं. अतीत की रमणीय कपोल-कल्पनाओं और भविष्य के मादक सपनों की गरज के बीच आज के भारत की कराह सुनाई देनी बंद होती जा रही है. वे सारे परदे जिनपर चित्र और चलचित्र दिखाई देते हैं और वे सारे यंत्र-तंत्र जिनसे आवाजें सुनी जाती है, झपट लिए गए हैं. मानव विकास सूचकांक में दुनिया के १३५वें पायदान पर खड़े भारत की वर्तमान वास्तविकता, वास्तविक अतीत तथा यथार्थपरक भविष्य के चित्र और स्वर अदृश्य और गूंगे बनाए जा रहे हैं.

आस्था में चार साल की देरी से आए उबाल के तहत मुरुगन के जिस उपन्यास को पिछले दिसंबर महीने से   निशाना बनाया गया है, वह २०१० में प्रकाशित हुआ था जिसका अंग्रेज़ी अनुवाद ‘वन पार्ट वुमन’ के नाम से २०१३ में पेंग्विन से छप कर आया. रोचक यह है कि इस उपन्यास में न तो ईशनिंदा है और न ही किसी धर्म या उसकी प्रथाओं का विरोध. उपन्यासकार ने उनपर व्यंग्य भी नहीं किया है, न कोई भंडाफोड़ किया है. उपन्यास का संवेदनात्मक उद्देश्य ही अलग है. मुरुगन की इतिहास-दृष्टि और सामाजिक चेतना मिथकों और आस्थाओं में लिपटे जीवन की वास्तविक धड़कनों और मर्म को इस उपन्यास में प्रत्यक्ष कर देती है, उनके दुश्मनों की निगाह में यही उनका अपराध है. उन्हें मुरुगन की कथा-सृष्टि भी सच की तरह डराती है. सच से ऐसा डर ही उन्हें सामाजिक सच्चाइयों के हर अनुसंधान या साहित्यिक पुनर्रचना को आस्था की तोपों से मार गिराने का अभ्यस्त बनाता है. सत्य से सत्ता का युद्ध बड़ा पुराना है, लेकिन हम जिस २०१५ के भारत में रह रहे हैं, वहां सच के आखेटक पहले से अधिक मूर्ख, किन्तु प्रशिक्षित हैं.

घटनाएं

२७ दिसंबर, २०१४ के ‘द हिन्दू’ अखबार के अनुसार तिरुचेंगोडे नगर की आर.एस.एस. इकाई के अध्यक्ष महालिंगम ने २६ दिसंबर के दिन ५० से अधिक लोगों का जुलूस निकाला और मुरुगन के इस उपन्यास की प्रतियां जलाई. भाजपा, आर.एस.एस. तथा कुछ अन्य हिंदूवादी संगठनों ने लेखक की गिरफ्तारी की मांग भी की (हालांकि अब जबकि लेखक के समर्थन में भी आवाजें तेज़ हो रही हैं, ये संगठन समूचे घटनाक्रम में अपनी भूमिका नकार रहे हैं). इसी रिपोर्ट के मुताबिक़ बीस दिन पहले से मुरुगन को धमकियां मिल रही थीं. बाद में उपन्यास के विरोधस्वरूप शहर बंद भी कराया गया. १२ जनवरी को नमक्कल के जिला प्रशासन ने लेखक को उनके विरोधियों के साथ शान्ति वार्ता के लिए बुलाया. यहाँ प्रशासन ने मुरुगन को ‘बिनाशर्त माफी’ माँगने, अगले संस्करण में उपन्यास में वर्णित स्थानों का नाम बदलने और उसके ‘आपत्तिजनक अंशों’ को हटाने, वर्तमान संस्करण की अनबिकी प्रतियों को बाज़ार से वापस लेने और भविष्य में ऐसी कोई हरकत न करने का वचन देने संबंधी हलफनामे पर दबाव देकर दस्तखत कराया. इस प्रकार सरकारी देख-रेख में संविधान की धारा १९(१)(ए) की धज्जियां उड़ाई गयीं. ध्यान रहे मुरुगन जिस अंचल के लेखक हैं, उसी अंचल के एक सपूत थे ‘पेरियार’. जातिप्रथा-विरोधी, अंधश्रद्धा-विरोधी, सेक्युलर और नास्तिक ‘पेरियार’ की कर्मभूमि पर एक लेखक के साथ यह सब कुछ होना भारी विडम्बना है. द्रविड़ आन्दोलन के साथ पेरियार की विरासत जुडी हुई है, लेकिन उसी आन्दोलन से निकली एक पार्टी तमिलनाडू की सत्ताधारी पार्टी है और दूसरी मुख्य विपक्षी पार्टी. सत्ताधारी पार्टी की भूमिका नमक्कल प्रशासन की  हरकतों से ज़ाहिर है और विपक्षी पार्टी की भूमिका इस प्रकरण पर उसकी चुप्पी से. ( मामला तूल पकड़ने पर इस पार्टी ने लेखक के पक्ष में एक-दो बयान जारी करके छुट्टी पा ली है) अनेक लेखकों ने ठीक ही लक्ष्य किया है यह प्रकरण द्रविड़ पार्टियों की पस्ती के दौर में हिंदुत्व की ताकतों द्वारा तमिलनाडू में पाँव पसारने की कवायद का सूचक है. एक जागरूक नागरिक के रूप में मुरुगन अपने इलाके में शिक्षा की दुकानदारी के खिलाफ लिखते रहे हैं और पर्यावरण की धज्जियां उड़ानेवालों के खिलाफ भी. यह सारे निहित स्वार्थ भी उनके खिलाफ परदे के पीछे सक्रिय हैं.

४८ वर्षीय मुरुगन नमक्कल में शासकीय कला विद्यालय में तमिल पढ़ाते हैं. उन्होंने अबतक ३५ पुस्तकें लिखीं है जिनमें ७ उपन्यास और तमिलनाडू के कोंगू (पश्चिम) क्षेत्र की बोलियों का शब्दकोष भी शामिल है.

उपन्यास का कथानक

यह उपन्यास कोंगू अंचल के जन-जीवन का अत्यंत संवेदनशील चित्र प्रस्तुत करता है. इस अंचल के जंगल, पहाड़, वनस्पति, पशु-पक्षी, मेले, नृत्य, संगीत, खेल-तमाशे, हाट-बाज़ार, खान-पान, पहनावा, देवस्थान और उनसे जुडी आस्थाएं, लोकविश्वास और किसान जीवन को कथा में जीवंत इसीलिए किया जा पाया है कि उपन्यासकार उस अंचल का मार्मिक जानकार ही नहीं, गंभीर अध्येता भी है.

उपन्यास के इसी आंचलिक परिवेश में निस्संतान किसान दंपत्ति पोन्ना(पत्नी) और काली(पति) की कोमल कथा प्रवाहित है. दोनों एक दूसरे को बेहद प्यार करते हैं. लेकिन उनके paraparpapअकुंठ प्यार पर निस्संतान होने का ग्रहण लग जाता है. रिश्तेदारों, दोस्तों और पड़ोसियों के ताने पोन्ना को ज़्यादा सुनने पड़ते है. तीज-त्यौहार और मांगलिक अवसरों पर कर्मकांडों के वक्त ‘बाँझ स्त्री’ के प्रति अपमानजनक व्यवहार के चलते वह धीरे-धीरे अपने घर की चहारदीवारी में सिमटती चली जाती है. काली को भी समय समय पर किसी न किसे प्रकरण में लज्जित होना पड़ता है. उसका भी सामाजिक जीवन सीमित होता जाता है. उसकी नपुंसकता की चर्चाएँ भी होती हैं. निस्संतान दंपत्ति की संपत्ति पर रिश्ते-नातेदारों ही नहीं, पड़ोसियों की भी निगाह है. काली को उसकी मां और दादी दूसरा विवाह करने की सलाह देती हैं. इस प्रस्ताव पर पोन्ना के मां- बाप को भी कोई ऐतराज़ नहीं है, वे इतने में ही संतुष्ट हैं कि दूसरी स्त्री के साथ उनकी बेटी भी उसी घर में रहे, निकाली न जाए. पोन्ना और काली भी कभी कभी एक दूसरे का मन टोहने या चिढाने के लिए आपस में दूसरे विवाह की बात करते हैं. पोन्ना सदैव ही भारी मन से ही सही, यह कहती है कि काली की खुशी के लिए वह इसके लिए भी तैयार है. वास्तव में दोनो ही एक दूसरे से इतना प्यार करते हैं कि मन बांटने के लिए इस प्रस्ताव पर चाहे जो चर्चा करते हों, उसकी वास्तविक संभावना को कभी मन में स्वीकार नहीं करते. काली की मां और दादी उनके परिवार पर देवी -देवताओं का श्राप मानती हैं. निर्वंश होने के श्राप से मुक्ति के लिए काली और पोन्ना वर्षानुवर्ष न जाने कितने देवी-देवताओं, मंदिरों-मठों का चक्कर लगाकर, न जाने कितनी पूजा-पाठ, व्रत-अनुष्ठान करके थक चुके हैं. काली की मां और दादी के पास परिवार पर श्राप के अलग अलग किस्से हैं. वे हर किस्से के अनुरूप श्रापमुक्ति के उपाय करते हैं. पाठक इन किस्सों में उस अंचल के तमाम सामाजिक संबंधों की भी झांकी पाता है. ये किस्से अलग-अलग जातियों के बीच, अलग अलग तबकों के बीच, आदिवासियों और गैर-आदिवासियों के बीच, स्त्री और पुरुष के बीच, औपनिवेशिक समय में अंग्रेजों और देशियों के बीच, मनुष्य और देवता के बीच संबंधों की झलक दिखलाते है. ये किस्से उस अंचल के ऐतिहासिक-सामाजिक जीवन की मिथकीय अभिव्यक्तियाँ हैं. ऐसे किस्सों और लोकविश्वासों को पिरोने और अंचल के जीवंत नृवंशीय चलचित्र प्रस्तुत करने का हुनर मुरुगन अपने अनेक उपन्यासों में पहले भी दिखला चुके हैं. अपने अंचल के प्रति गंभीर ऐतिहासिक दायित्व का निर्वाह करते हुए उन्होंने अतीत के लेखकों द्वारा उस अंचल पर लिखी गई चीज़ों की खोज की और उन्हें दो खण्डों में प्रकाशित किया. उन्होंने टी.ए. मुथूसामी कोनार द्वारा इस अंचल पर लिखे इतिहास-ग्रन्थ जिसे लुप्त मान लिया गया था, उसे खोजकर पुनर्प्रकाशित कराया. ( देखें ए.आर. वेंकट चेलापति का लेख, ‘द हिंदु’, १२ जनवरी)

       एक भरा-पूरा, सुन्दर और संतुष्ट वैवाहिक जीवन सामाजिक मान्यताओं के चलते किस तरह अवसादग्रस्त होता है, लेकिन अवसाद के आगे पराजय नहीं मानता, इसे मुरुगन ने बहुत कोमल और संवेदनशील रंग-रेखाओं में अंकित किया है. काली और पोन्ना का निश्छल और उन्मुक्त प्यार समाज की मान्यताओं के टकराकर कैसे कैसे अंतर्द्वंद्वों से गुज़रता है, उसके सूक्ष्म से सूक्ष्म कंपन को उपन्यासकार की लेखनी पकड़ लेती है. वे तत्व जो इन पात्रों के मन की सुन्दर गहराइयों में लेखक की उंगली पकड़ कर उतरने की जगह उन सुन्दर उँगलियों को ही तोड़ देने को पुरुषार्थ समझे बैठे हैं, उनका कलेजा सचमुच काठ का बना है. उपन्यास का अंत ट्रैजिक है. काली के दूसरे विवाह के प्रस्ताव और श्रापमुक्ति के सभी उपाय विफल होने पर पोन्ना और काली दोनों की मांएं एक अलग योजना बनाती हैं. अर्द्धनारीश्वर के स्थानीय मंदिर में हर साल तमिल वैकासी महीने ( मई-जून) में १४ दिन का मेला लगता है. चौथे दिन पहाड़ों से देवता उतरते हैं और उनकी रथ की सवारी अगले दस दिन निकलती रहती है, अंतिम दिन वे वापस चले जाते हैं. अंतिम दिन मेले में भारी भीड़ होती है और माना जाता है कि इस दिन मेले में उपस्थित सभी पुरुष देवता होते हैं. निस्संतान स्त्रियों के लिए यह दिन भाग्यशाली होता है, जहां वे किसी देवता से समागम कर संतान-प्राप्ति कर सकती हैं. ऐसी संतानें देवता का प्रसाद या देव-संतानें मानी जाती हैं. काली की मां इस दिन पोन्ना को मेले में भेजे जाने के लिए काली को सहमत नहीं कर पाती. एक साल बीत जाता है. अगले साल मेला शुरू होने के समय काली का साला मुथु (जो उसका बाल-सखा भी है) बहन-बहनोई को इसके लिए राजी करने उनके घर आता है. मंदिर पोन्ना के घर से नज़दीक है. हर साल मेले के समय काली पोन्ना को लेकर अपने ससुराल जाया करता था और वहीं से वे मेला घूमने जाते थे. ऐसे में मुथु के आग्रह पर काली पोन्ना को तत्काल उसके साथ भेजने को राजी हो जाता है और खुद मेले के १४वे दिन आने का वादा करता है. लेकिन पोन्ना को देव-समागम के लिए भेजे जाने से वह इनकार कर देता है. मुथु बहन से झूठ बोलता है कि बहनोई काली ने इस बात की अनुमति दे दी है. पोन्ना को इसकी तस्दीक खुद काली से करने का वक्त नहीं मिलता, फिर भाई की बात पर अविश्वास का कोई कारण नहीं था क्योंकि काली और मुथु साले-बहनोई ही नहीं बाल-सखा भी थे. एक नाटकीय घटनाक्रम में चौदहवें दिन काली के ससुराल पहुँचाने के बाद मुथु सदा की तरह काली को लेकर खाने-पीने, मौज-मस्ती करने घर से खूब दूर ले जाता है, ताकि अगली सुबह तक दोनों लौट न पाएं. उधर पोन्ना के मां-बाप उसे लेकर बैलगाड़ी में मेले की ओर चल देते है. काली और मुथु दूरस्थ स्थान पर खाने-पीने के बाद सो जाते हैं. लेकिन काली की नींद आधी रात के बाद खुल जाती है. वह वापस ससुराल की ओर चल पड़ता है. भोर में वहां पहुँच कर जब उसे ताला जडा मिलता है, तो उस पर वज्रपात सा होता है. उसकी भावनाएं पछाड़ खाकर गिरती हैं. उसे लगता है कि पोन्ना ने उसके साथ धोखा किया है. यहीं उपन्यास ख़त्म होता है.

ट्रेजेडी का भाव सघन इसलिए होता है कि दरअसल किसी ने किसी को धोखा नहीं दिया. मुथु, काली की माँ, उसके सास-ससुर- सभी काली और पोन्ना का दुःख दूर करना चाहते हैं. मुथु ने इसी खातिर बहन से झूठ बोला. पोन्ना मेले में जाने को खुद तत्पर नहीं है. वह काली को खुश देखना चाहती है, उसके किए बड़ा से बड़ा त्याग करने को तैयार है, ऐसे में उसकी रजामंदी जानकार वह मेले में जाने को तैयार होती है. यह निश्छल भावनाओं की ऐसी दुनिया है जहां हरेक व्यक्ति जो कर रहा है वह दूसरे की खुशी के लिए कर रहा है, लेकिन परिणाम वह निकलता है जो किसी ने न चाहा था. मेले की भीड़ में ‘देवता’ से उसकी भेंट सुगम हो सके, इसके लिए पोन्ना को अकेला छोड़ जब उसकी माँ गायब हो जाती है, तब के बाद का वर्णन उपन्यासकार की सामर्थ्य का सबसे ताकतवर साक्ष्य है. पोन्ना की मार्फ़त पाठक तमाम स्थानीय सांस्कृतिक कला-रूपों, नाटकों और रिवाजों की दृश्यावली से गुज़रता है, लेकिन सबसे बड़ा नाटक तो पोन्ना के मानसपटल पर अभिनीत हो रहा है. भारी भीड़ में अकेले होने के भय से शुरू करके अपरिचितों के बीच अनाम होने की खुशी तक उसके मन में अनेक भाव आते और जाते हैं. परिचय की दुनिया की हर नज़र उसे छेदती थी, क्योंकि वह निस्संतान थी. मेले में भीड़ का हिस्सा होकर वह ऐसी हर नज़र से आज़ाद थी, जहां न वह किसी को जानती थी और न कोई उसे. लेकिन अवचेतन के सह-सम्बन्ध और संस्कार उसकी निगहबानी बदस्तूर कर रहे थे. जब भी कोई ‘देवता’ उसकी ओर रुख करता, उसके और अपरिचित देवता के बीच काली का चेहरा परिचिति या स्मृति की छाया सा झिलमिला उठाता, क्योंकि पति से भी ज़्यादा काली वह व्यक्ति है जिससे वह सबसे ज़्यादा प्यार करती है. एक छोटे से स्वप्न-दृश्य में बचपन के प्यार का एक चेहरा भी कौंधता है. यह कोई नैतिक द्वंद्व नहीं है. काली के विपरीत पोन्ना के मन में इस प्रथा पर आस्था का कोई संकट नहीं है. काली की खुशी के लिए और अपने जानते में उसकी ‘अनुमति’ से ही वह ‘देवता’ की खोज में आई है, लेकिन क्या एक क्षण को भी काली को भूले बगैर ‘देवता’ से मिलन संभव हो पाएगा? इस द्वंद्व को उपन्यासकार ने चेतन और अचेतन के बीच, परिचित और अनजाने के बीच, सम्बन्ध-भावना और स्वातंत्र्य-कामना के बीच, मानवीय भाव-यंत्र और देवत्व के तसव्वुर के बीच – एक साथ अनेक स्तरों पर अभूतपूर्व संवेदनशीलता से अंकित किया है. अंततः पोन्ना इस द्वंद्व से पार जाती है, इसका संकेत करके उपन्यासकार आगे बढ़ जाता है. समागम का दृश्य उपस्थित करने और पाठक को गुदगुदाने की उसकी कोई इच्छा ही नहीं है.    

कहानी का अंत नहीं हुआ, लौटेगा कहनेवाला

  उपन्यास के अंतिम दृश्य में काली को तड़पता देख पाठक की उत्कंठा बढ़नी स्वाभाविक है, लेकिन उपन्यास ख़त्म हो जाता है. पाठक के ज़ेहन में ढेरों सवाल हैं? क्या पोन्ना और काली का सम्बन्ध-विच्छेद हो जाएगा? क्या काली यह जान कर कि पोन्ना को उसकी ‘अनुमति’ की झूठी जानकारी थी, उसे अपना लेगा? क्या पोन्ना यह जानकार कि उससे झूठ बोला गया था, अपराधबोध या आत्महंता भाव से ग्रस्त हो जाएगी? ऐसे में अपने माँ-बाप और भाई के प्रति उसका क्या रुख होगा? यदि वह अपने माँ-बाप और भाई को क्षोभ में त्याग दे और काली उसे फिर से न अपनाए, तो वह कहाँ जाएगी? यदि उसे देव-संतान होती है, तो उस संतान का भविष्य क्या है? श्री चेलापति ने अपने लेख में लिखा है कि ढेरों पाठकों ने लेखक को पोन्ना और काली की आगे की कहानी बताने के लिए अनेक पत्र लिखे. जवाब में लेखक ने उपन्यास को आगे के दो खण्डों में जारी रखने का वादा किया है, दोनों खण्डों के शीर्षक भी बताए हैं. मुरुगन को यह वादा निभाना ही पडेगा. लेखक की मृत्यु की घोषणा के बावजूद उसे खुद को पुनरुज्जीवित करना होगा. पाठक ज़रूर उन ताकतों से लड़ेंगे और जीतेंगे जो कि लेखक के पुनरुज्जीवन में बाधा हैं.

मुरुगन के लेखक को मार देनेवाली ताकतों को इस उपन्यास की मूल संवेदना से कुछ लेना लादना नहीं है. उनके लिए निस्संतान स्त्रियों द्वारा एक स्थानविशेष के मंदिर के मेले में आपसी सहमति से विवाह-बाह्य, धर्मानुमोदित और सामाजिक स्वीकृति प्राप्त यौन-सम्बन्ध बनाने की प्रथा का उपन्यास में कथात्मक विनियोग ‘आपत्तिजनक’ है. इसे वे धर्मविरुद्ध, स्त्रियों की मर्यादा के विरुद्ध और उस इलाके के लिए अपमानजनक मानते हैं. क्या उपन्यासकार ने इस प्रथा की वकालत की है या उसका अनुमोदन किया है? ज़ाहिर है ‘नहीं’. कहानी की तर्क-योजना और संवेदनात्मक  उद्देश्य में उक्त प्रथा की हिमायत या आलोचना का कोई काम ही नहीं है. लेकिन ज़रा प्राचीन ग्रंथों पर नज़र डालें और देखें कि ‘नियोग’ की प्रथा को कितने धर्मशास्त्रों की सम्मति प्राप्त थी. भारतरत्न पंडित पांडुरंग वामन काणे ने गौतम, वसिष्ठ, बौधायन, याज्ञवल्क्य, नारद, कौटिल्य आदि धर्मसूत्रकारों की सम्मतियों उद्धृत की है तथा महाभारत के आदिपर्व, अनुशासनपर्व और शांतिपर्व में नियोग के उदाहरणों और संकेतों की चर्चा की है. (धर्मशास्त्र का इतिहास-प्रथम भाग) मुरुगन की पुस्तक जलानेवाले तत्व इन धर्मसूत्रों और महाभारत के बारे में क्या ख्याल रखते हैं? शास्त्र और लोक की बात छोड़ भी दें, तो क्या मानवशास्त्र का अध्ययन यह नहीं बताता कि ऐसी प्रथाएं लगभग सभी प्राक-आधुनिक समाजों में रही आई हैं? यह भी कि आधुनिक समय में भी तमाम प्राक-आधुनिक प्रथाएं रूप बदलकर क्या अपनी निरंतरता नहीं बनाए रखतीं? मुरुगन ने किसी प्रथा पर कोई मूल्य निर्णय नहीं दिया है, अच्छा या बुरा नहीं कहा है, उन्होंने सिर्फ एक कोमल कहानी कही है जो एक समाज में जन्मी है. उस समाज की कुछ प्रथाएं और मान्यताएं हैं जो उस समाज में जी रहे लोगों के जीवन से लिपटी हैं, उन्हें कोई कथाकार, इतिहास-लेखक या नृतत्वशास्त्री कृत्रिम ढंग से काट कर अलग नहीं कर सकता. ऐसा करना खुद को झूठा साबित करना है, कला और समाज दोनों से गद्दारी है. मुरुगन ने ऐसा करने से इनकार किया है, लेखक की मृत्यु की कीमत चुका कर भी. लेकिन पाठकों और जागरूक नागरिकों का प्यार उन्हें वापस लौटा लाएगा. ज़रूर ही लौटा लाएगा.

प्रणय कृष्ण

प्रणय कृष्ण

इलाहाबाद युनिवर्सिटी और जेएनयू से अध्‍ययन. प्रखर हिंदी आलोचक. जन संस्‍कृति मंच के महासचिव. देवीशंकर अवस्‍थी सम्‍मान  से सम्मानित .

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लोकप्रियतावाद और सेंसरशिप बनाम कलाभिव्यक्ति और सहिष्णुता. वक्रतुंड महाकाय…

By मार्तंड प्रगल्भ

बहस-मुहाबसों और वाम-राजनीति के लिए जाने जाने वाले जे.एन.यु  परिसर की एक सांस्कृतिक-संध्या आज-कल चर्चा का विषय बनी हुई है. इस चर्चा ने कुछ महत्वपूर्ण और मौजूं सवालों को केंद्र में लाया है. उन सवालों से उलझने के पहले हम उस खास सांस्कृतिक-संध्या और और उस खास घटना का ज़िक्र करना चाहेंगे जिसने मौजूदा विवाद को जन्म दिया है.

          बात पहली मई की है. पहली मई यानी मजदूर-दिवस की है. इस मजदूर दिवस के दिन जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय छात्र-संघ की ओर से पाकिस्तान के वामपंथी सांस्कृतिक संगठन ‘लाल बैंड’ को आमंत्रित किया गया था, जिसने इस खास कार्यक्रम के लिए ही अपनी भारत-यात्रा को मई की दूसरी तारीख तक बढ़ा दिया था.वरना वो तो पहले ही पाकिस्तान लौट गए होते. साथ में जनसंस्कृति मंच के सांस्कृतिक संगठन ‘हिरावल’ को भी पटना से खास तौर पर बुलाया गया था और जिसने फैज़ अहमद फैज़ की मशहूर नज़्म ‘इन्तिसाब’ से इस शाम का आगाज़ करना था.  तयशुदा ढंग से ही कार्यक्रम शुरू हुआ. और इन्तिसाब के बाद मुक्तिबोध की ‘अँधेरे में’ का एक हिस्सा ‘ओ मेरे आदर्शवादी मन’ ,वीरेन डंगवाल की ‘हमारा समाज’ और ‘विश्व के बाज़ार की खिल्ली उडाता’ ,गोरख के नवगीत को समर्पित दिनेश कुमार शुक्ल की ‘जाग मेरे मनमछंदर’ तक आते आते ‘हिरावल’ ने संगीत की एक प्रतिसंस्कृति में श्रोताओं को गहरे उतार दिया. और ऎसी स्थिति में यह एकदम स्वाभाविक था कि श्रोताओं की मांग पर  छात्र-संघ को ‘हिरावल’ से गोरख के गीत ‘जनता की आवे पलटनिया’ गाने की अपील करनी पडी. जिन लोगों को जे.एन.यु. की छात्र राजनीति से थोडा भी साबका है वो जानते हैं कि यह गीत जे.एन.यु में कितना ‘लोकप्रिय’ है और इसकी लोकप्रियता में आन्दोलनों के दौरान गीत के सामूहिक गायन और ‘हिरावल’ का उस गायन की प्रेरणा में कितना योगदान है.  ‘जनता की आवे पलटनिया’ के साथ ‘हिरावल’ मंच से विदा लेता है और ‘लाल’ के तैमूर रहमान एक छोटे से परिचय के बाद त्रिथा को मंच पर आमंत्रित करते हैं. कोई नहीं जानता था ये त्रिथा कौन है और न ही कार्यक्रम के पहले लाल ने ‘छात्र-संघ’ को इसके बारे में कोई सूचना ही दी थी. जबकी खुद तैमूर शाम के दो घंटे उस मुक्ताकाशी मंच पर पहले ही साउंड वैगेरह की जांच कर के गए थे. इस औचक आमंत्रण से दर्शकों को एक झटका तो लगा ही था. उस गायिका के बारे में खुद तैमूर भी कुछ नहीं जानते थे सिवाय इसके कि उसके बैंड ने उन्हें दिल्ली में हुए इस शो के लिए साजो सामान मुहैय्या किया था. बहरहाल ये जे.एन.यु था जिसने इस अचकचाहट से निकल कर उस गायिका की सधी आवाज़ और रागों के उसके प्रयोग को सुना. शुद्ध रागों के प्रयोग तक श्रोताओं ने उसकी तालियाँ बजा कर सराहना भी की. लेकिन बात तब बिगड गयी जब अपने तीसरे नम्बर के रूप में उसने ‘गणेश वन्दना’ आरम्भ किया. इस गाने के साथ श्रोताओं की ओर से इसे न सुनाने और लाल को आने की  मांग शुरू हो गयी. तत्काल छात्र-संघ ने तैमूर से संपर्क किया और बताया कि यह एक धार्मिक वन्दना है और इस मंच के लिए अनुपयुक्त है. मंच के पीछे से तैमूर और छात्र-संघ अध्यक्षा ने गाने को रोकने का संकेत भी किया लेकिन  शायद त्रिथा इधर देख नहीं पायी और मजबूरन अध्यक्षा को मंच पे जा के त्रिथा से गाना रोकने की अपील करनी पडी. तुरंत तैमूर ने भी इसे गंभीर मानते हुए मंच पर जाकर बहुत हलके ढंग से शुरू किया… ‘आइये अब कुछ समाजवादी दुनिया के बारे में बात करें’!

बहस के केंद्र में यही अंतिम घटना है. इस घटना की आलोचना करते हुए अपूर्वानंद ने और साथी मीरा ने इसे क्रमशः ‘कलाभिव्यक्ति की हत्या’ और  ‘अविश्वसनीय असहिष्णुता’ एवं ‘लोकप्रियता और उपेक्षा के मेलजोल से लगने वाला सेंसरशिप’ कहा है. अपूर्वानंद की आलोचना और उसकी भाषा निहायत ही गैरजिम्मेदाराना और जे.एन.यु. की वाम राजनीति की और प्रकांतर से दुनिया भर के मेहनतकशों के पक्ष में खड़े होने वाली कला की उपेक्षा करने वाली थी. छात्र-संघ के  इस आयोजन और उस आयोजन में शामिल श्रोताओं के बारे में अपूर्वानंद की टिप्पणी और उसकी भाषा पर गौर करें- “निश्चय ही त्रिथा को यह प्रसंग या तो पता न होगा या वे इसे भूल गईं जब मई दिवस पर जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय में  एक वामपंथी छात्र संगठन द्वारा आयोजित एक संगीत संध्या में मंच पर वे  अनामंत्रित गाने चली गईं. एक तो वे स्वयं अनपेक्षित , अतः किंचित अस्वस्तिकर उपस्थिति थीं , दूसरे आयोजकों और श्रोताओं  को, जो मई दिवस पर संघर्ष और क्रान्ति के जुझारू गीत सुन कर अपने शरीर के भीतर जोश  भरने आये थे इसकी आशंका थी कि वे इस पवित्र अवसर पर जाने  क्या गा देंगी.” ऐसा लगता है कि बाकी लोग जो वहाँ पहुंचे थे वो क्रान्ति के जुझारू गीतों से शरीर में जोश भरने आये थे और अपूर्वानंद गणेश वन्दना या हनुमान चालीसा या महादेव मन्त्र या दुर्गा मन्त्र सुनने!! और ताज्जुब नहीं कि गणेश से लेकर देवी और महादेव के मिथक किसी समय गैरब्राह्मणीय और जनजातीय या ‘अनार्य’(!)व्युत्पत्ति वाले ही हैं! आगे उन्होंने हिरावल के सादे ढंग से पेश किये गए गीतों के बारे में लिखा “ अपने सादा अंदाज में उन्होंने जो सुनाया ,वह वहां इकट्ठा जन समुदाय की इच्छाओं के मुताबिक़ ही था”. क्या थी वहाँ इकट्ठे जनसमुदाय की इच्छा? हिरावल के गीतों में व्यक्त होती चेतना अगर सर्वहारा चेतना के साथ थी और उसे समृद्ध करने वाली थी तो यह तो तय है कि वहाँ उपस्थित जनसमुदाय मई दिवस के दिन जिस संगीत के लिए एकत्रित हुआ था वह कला और संस्कृति के वर्गीय सौंदर्यबोध और उसकी सापेक्ष स्वायत्तता से वाकिफ था. और यही कारण है कि त्रिथा के पहले दो नंबरों को उचित सम्मान भी मिला. आखिर ‘वक्रतुंड महाकाय’ के गाते ही यह जनसमुदाय क्यों विरोध करने लगा? विरोध करने लगा क्योंकि वर्ग-विभाजित समाज में समाज की अभिव्यक्ति जब कला और संस्कृति में होती है तो वह भी वर्गीय प्रभुत्व के दायरे से मुक्त नहीं होती. वर्चस्वशील संस्कृति की अभिव्यक्ति का नकार क्या कला-अभिव्यक्ति की हत्या है? फिर कलाभिव्यक्ति या कला की स्वतन्त्रता का क्या अभिप्राय है? क्या कला की स्वतन्त्रता से लेकर व्यक्ति-स्वातंत्र्य के नारे हमें शीतयुद्धकालीन अमेरिकी विचारधारा की याद नहीं दिलाते. और तब क्या इस कलाभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता का अर्थ हमें ज्यादा करीब से समझ नहीं आने लगता. और इसी बात को अपूर्वानंद बड़े नैतिक ताकत के साथ आज व्यक्त कर रहे हैं. क्या यह इतिहास के दुहराव का प्रहसन है! और हद तो तब है जब इसकी तुलना वह मकबूल फ़िदा हुसैन और रामानुजम की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रा के प्रसंग से करते हैं!

          कलाभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता के पैरोकारों को कलाभिव्यक्ति और कला में निहित प्रगतिशील तत्त्वों को नज़रंदाज़ नहीं करना चाहिए. खुद कला के भीतर नवोन्मेष कला को नवीन बनाता है. और इस नवोन्मेष में उस समय और समाज की सच्चाई को ज्यादा बेहतर अभिव्यक्ति मिलती है. और हमें इस अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के लिए आखिरी लम्हे तक लड़ना चाहिए. परन्तु क्या ‘वक्रतुंड महाकाय’ का वह गायन इनमें से कोई भी काम कर रहा था? और अगर नहीं तो सचेतन जनसमुदाय की इच्छा को छात्र-संघ, जो खुद ही उस चेतना की भौतिक अभिव्यक्ति है, को अगर पूरा करता है तो इसको स्वतंत्रता की अभिव्यक्ति की ‘सामूहिक हत्या’ जैसे चालबाजी भरे शब्दों से संबोधित करना क्या कहा जाएगा!

          बुर्जुआ उदारवादी पदावली में सोचने वाले अपूर्वानंद जैसे गैरावयाविक बुद्धिजीवी कैसे खुद उसी उदारवादी प्रोपगैंडा के शिकार हो जाते हैं , यह उसका सटीक प्रमाण है. यह बुर्जुआ-उदारवादी ‘स्वतन्त्रता’ कितनी आवाजों की खामोशी को ढंकने की साजिश है इसे विस्तार से बताने की ज़रूरत नहीं है. इस स्वतन्त्रता को पुष्ट करने के लिए ऐसे बुद्धिजीवी इतिहास की गैरैतिहासिक व्याख्याओं का भी सहारा लेते हैं. और गणपति गायन की तुलना सूफी और संत गीतों से करते हैं. क्या कबीर और फरीद के जिन गीतों को हम सराहते हैं उसमे और गणपति गायन में कोई फर्क नहीं? क्या ‘गणपति वन्दना’ जैसी वन्दनाओं के मूल्यों के खिलाफ ही कबीर खड़े नहीं थे? और यह भी नहीं है कि सूफियों और संतों के धार्मिक और रहस्यवादी पदों का विरोध नहीं किया जाए. हम तो सर्वहारा की मुक्ति चेतना को इससे नहीं आंकते. लेकिन अगर आज भी कबीरादि के पद प्रासंगिक हैं तो इसलिए कि वह सर्वहारा के मुक्ति के पक्ष में अपना योगदान दे रहे हैं. क्या गणेश-वन्दना की भी प्रासंगिकता ऎसी ही है?

          इस बूर्ज्वा उदारवादी चिंतन ने मार्क्स को भी अपने तई उपयोग किया है. और इसका भी गैरसंदर्भित प्रयास अपूर्वानंद के यहाँ मिलता है जब बिलावजह अपने तर्कों में जोर लाने के लिए ई.प.एम(१८४४ की आर्थिक और दार्शनिक पांडुलिपि) को उद्धृत करते हैं. उनका मानना है कि पूँजीवाद में श्रम और श्रम के अलगाव को जे.एन यु. के छात्र न तो महसूस करते हैं और न ही वो श्रमिक वर्ग की विचारधारा को समझते हैं. असल में जैसा वो खुद हैं वैसा ही दूसरों को भी मानते हैं. एक गैर आवाविक बुद्धिजीवी जो फिलहाल कम्युनिस्ट विरोधी है. मैं नहीं मानता कि जे.एन.यु के सभी छात्र श्रमिक वर्ग की विचारधारा को आभ्यंत्रीकृत कर चुके हैं . लेकिन अगर वर्त्तमान छात्र-संघ उनकी संभावित चेतना का मूर्त रूप है और जिसे हम गर्व से कहते हैं, तो कम्युनिस्ट छात्र-आंदोलन के इस ‘हिरावल’ को बदनाम करने की कोशिश क्या कही जाएगी! और इस बदनामी में वो सब लोग भी निशाने पर हैं जो इस दिल्ली शहर के भीतर एक सही कम्युनिस्ट राजनीति के लिए समर्पित हैं. और जो अपूर्वानंद की तरह कला की जनवादिता को केवल जनता की रची कला मानने के संकीर्णतावाद को नहीं मानते. तब  बेचारे ‘मुक्तिबोधों’ का क्या होगा! और तो और श्रमिक वर्ग को भी अपूर्वानंद की खास काट की दृष्टि औद्योगिक क्रांति के वक्त पश्चिम में बनते नए श्रमिक वर्ग के चरित्र में थिर करती जान पड़ती हैं. उनके लिए न तो विश्विद्यालय के छात्र श्रमिक वर्ग से खुद को जोड़ सकते हैं  और न वैश्विक बाज़ार की मार से विलगित आत्म वाली किसी बैंड की गायिका.और दरअसल उस गीत का रोका जाना एक खास मौके पर था, एक खास समझदारी से था और यह मानते हुए था कि कला के उत्पादन में रत कोई कलाकार जब प्रभुत्वशाली वर्गों की कला को अनजाने ही व्यक्त करने लगे तो उसको रोका जाए.

          साथी मीरा का आलेख एक वाजिब चिंता के साथ विस्थापित(dislocated) विमर्श की भाषा में फंस गया है. यह एक वाजिब चिंता का बुर्जुआ विमर्श की भाषा के हाथों मिली चुनौती के सामने असहाय महसूस करना है. और इससे उबरने का एक मात्र रास्ता कला और राजनीति के रिश्तों की सही मार्क्सवादी-लेनिनवादी व्याख्या में ही है. उसका मानना है कि गीत को रोके जाने की यह घटना कला की उपेक्षा और लोकप्रियतावाद के सहारे सेंसरशिप का पक्ष लेती है. दरअसल बुर्जुआ लोकतंत्र के भीतर हम कम्युनिस्ट जब सेंसरशिप का विरोध करते हैं और ऐसा लगातार करना होता है, तब हम यह भूल जाते हैं कि किसी सेंसरशिप का हम विरोध क्यूँ करते हैं. हम दरअसल उस बहुसंख्यक आबादी की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का पक्ष लेते हुए बुर्जुआ उदारवादी लोकतंत्र का विरोध करते होते हैं. और अगर ऐसा नहीं है तो फिर हम क्यूँ जे.एन.यु. के भीतर इंदिरा गांधी ,मनमोहन सिंह और रिचर्ड बाउचेर से लेकर योगी आदित्यनाथ की अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता की हत्या करते! उस वक्त भी दक्षिणपंथी तर्क इसे  ‘सेंसरशिप’ ही  कहता है. और लोकप्रियता(poupularism) क्या सिर्फ पूंजी और बाज़ार का तर्क है? क्या हिटलर के फासिस्म के खिलाफ लोकप्रिय-मोर्चा कायम करने की मांग एक खास किस्म का पोपुलरिस्म था? उसी तरह सहिष्णुता की संवैधानिक और बुर्जुआ व्याख्याएं हमें इसे और ऐसे ही अन्य शब्दों को समझने की आलोचकीय क्षमता से महरूम करता है. क्या सहिष्णुता वर्ग-विभाजित समाज में, जाति विभाजित समाज में , लिंग विभाजित समाज में प्रभुत्व की स्वीकृति का माध्यम नहीं बन जाता. और हम कम्युनिस्ट जब सहिष्णुता की बात करते हैं तो इस बुर्जुआ लोकतंत्र को उसी की भाषा में चुनौती देते हैं , उन्हीं के नैतिक मूल्यों की बात करते हुए उन्हें बेनकाब करते हैं. और यह भी जानते हैं कि इतिहास के किसी क्षण में यह बुर्जुआ शब्द और मूल्य भी प्रगतिशील था. पर शब्द जब स्थान और काल का भेद भूल जाते हैं तो उसका क्रांतिकारी सार प्रभुत्व की विचारधारा का वाहक हो जाता है.

हमने ऊपर देखा कि उस खास जनसमुदाय की चेतना को गणेश वन्दना के गायन के गैरालोचकीय नकार के रूप में देखना दुखद है. और दुखद है कि इस घटना के कारण यह मानना कि देश भर के भीतर निरोधक कानूनों और दमनकारी कारवाईयों के विरोध करने की जे.एन.यु.एस.यु. की ऑथरिटी को धक्का लगेगा. क्या जे.एन.यु.एस.यु. अपनी संघर्ष और अपने विरोध की ऑथरिटी बुर्जुआ उदारवाद के निरपेक्ष मान लिए गए मूल्यों से ग्रहण करता है? नहीं हम विरोध की ऑथरिटी देश और दुनियाभर के शोषित और चुप करा दिये गए जनता से ग्रहण करते हैं. और इसी ऑथरिटी के सहारे उस दिन ऎसी घटना हुई थी.

          साथी मीरा के इतिहास की समझदारी की हम बहुत इज्जत करते हैं और इसलिए उस वक़्त हमें बड़ा झटका लगा जब इतिहास में मिथकों की व्युत्पत्ति और उनके वर्तमान राजनीतिक अर्थों के सन्दर्भ को उसने गलत तरीके से व्याख्यायित किया. यह सच है कि गणेश और बहुत सारे मिथकों की व्युत्त्पत्ति किसी कबीले या गण या आदिवासी समूहों से सम्बंधित हैं. वृन्दावन विहारी के रसिक गोपाल का मिथ भी तो गैर ब्राह्मणीय परम्परा से ही आया है. और अगर हजारी प्रसाद द्विवेदी की माने तो आज का हमारा सौंदर्यबोध जिन मूल्यों से बना है  उनमें अधिकाँश आर्येतर या गैर ब्राह्मणीय है. तो क्या हम उन सब को कला में आज भी वैसे ही स्वीकार करते जाएँ? क्या गणपति के चरित्र से महाराष्ट्र के मनसे और बाल ठाकरे की विचारधारा का कोई लेना देना नहीं है? या इस चरित्र का उपयोग करके जिन शोषणों को अंजाम दिया गया है उसे भूल जाएँ? और क्या आदिवासी और लोक से आने मात्र के कारण कोई मिथ या मूल्य स्वं ही प्रगतिशील हो जाता है? क्या लोक और आदिवासी समूहों के बारे में एक खास किस्म की शुद्धतावादी और प्रगतिशील रूमानियत का विरोध ज़रूरी नहीं? क्या गणेश वन्दना आदिवासी व्युत्पत्ति मात्र से प्रगतिशील हो जाती है? क्या आदिवासी व्युत्पत्ति परक मिथकों की पूजा करके दलित राजनीति का एक हिस्सा सचमुच मुक्ति की लड़ाई में प्रगतिशील भूमिका अदा कर रहा है? क्या व्युत्पति के कारणों की पड़ताल करने वाला इतिहास ज़रूरी है कि इतिहासवादी(historicists) हो जाए? और इसे संस्कृत भाषा के गैरज़रूरी नुक्ते से भी जोडने की कोई ज़रूरत नहीं है. और ना ही भगत सिंह या चे के प्रतीकों के पूंजीवादी दक्षिणपंथी अप्प्रोप्रियेशन की तुलना धार्मिक मिथकों से की जानी चाहिए. और मई दिवस के मौके पर जे.एन.यु  जैसी जगह पर धार्मिक प्रतीक और मिथकों की व्युत्पत्ति परक व्याख्यायों को समझते हुए इसका विरोध ज़रूरी है. और ज़रूरी है एक ऐसे स्पेस को ज्यादा क्रान्तिधर्मी बनाना जिसे वर्षों के अथक प्रयास से छात्र राजनीति ने जे.एन.यु. में हासिल किया है.

          मान लीजिए त्रिथा के गायन के विषय के बारे में पहले से पता होता तो क्या उस मंच पे उसे आने दिया जाता? क्या जे.एन.यु.एस.यु के मंच से कोई अनजान नौजवान रामचरितमानस का पाठ करने की इच्छा व्यक्त करे तो हम उसे मौक़ा देंगे? क्या कला की अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता के नाम पर राहुल गांधी या नरेन्द्र मोदी को भाषण देने की स्वतन्त्रता उस मंच से देंगे? क्या राष्ट्रीय स्वम्सेवक संघ के किसी सदस्य को हम आने देंगे ? और क्या ऐसा जिस दिन होगा हम इस छात्र संघ को सचमुच समर्थन देंगे? साथी मीरा खुद इस छात्र-संघ में थीं और सचमुच उन्होंने ऐसा फैसला नहीं लिया था कभी. उनको भी पता है कि छात्र-संघ का ये मंच कैसे धीरे-धीरे और भी ज्यादा व्यापक जनसमुदाय की वास्तविक मुक्ति से खुद को जोडता जा रहा है या जोडने की कोशिश कर रहा है. हम मुक्ति का स्वप्न देखते हैं. बुर्जुआ स्वतन्त्रताओं से आगे स्वतन्त्रता का, मुक्ति का. मार्क्स के शब्दों में कहें तो हमें सिर्फ बहुवचन में ही अच्छी लगने वाली “स्वतन्त्रता” पसंद नहीं…सीमित ‘स्वतंत्रताओं’ के क्षितिज ‘स्वतन्त्रता’ के लिए कितने खतरनाक हैं, यह बड़े ऐतिहासिक दायरे में साबित हो गया है.(कार्ल मार्क्स , “प्रेस की स्वतन्त्रता पर विवाद”, संकलित रचनाएँ वोल.१ मोस्को १९७५, पृष्ठ-१७८) और स्वंत्रता का मतलब है सर्वहारा की स्वंत्रता, जिसके सहारे ही सम्पूर्ण मुक्ति संभव है. और इस बार मई दिवस इसी मुक्ति के संगीत के लिए था.

 मार्तंड प्रगल्भ जे.एन.यू. के भारतीय भाषा केंद्र में पी.एच.डी. के लिए शोधरत    हैं.

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