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मास्टर स्टोरी राइटर थे अमरकांत: रविभूषण

 ‘हत्यारे’ और ‘बुड़ान’  इन दोनों कहानियों पर अत्यंत संक्षेप में मैं कहूं कि हत्यारे और बुड़ान के रचनाकाल में लगभग तीस वर्ष का अंतर है और बुड़ान 1991 या 1992 में लिखी गई थी। हत्यारे जब लिखी गई थी तब देश के प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू थे। बुड़ान जब लिखी गई तब प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव थे और मनमोहन सिंह की नई अर्थनीति आ चुकी थी। और जब हम इन दोनों कहानियों पर बात कर रहे हैं तो हमारे देश के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह हैं। इन दोनों कहानियों में दो-दो पात्र हैं। हत्यारे में पात्र का कहीं कोई नाम नहीं है। अगर हम इसी बिंदु को केंद्र में रख कर बात करें कि दोनों पात्रों के नाम अमरकांत ने क्यों नहीं दिए, ये अनाम क्यों है; क्योंकि जब हम नाम दे देते हैं तो वह अपने वजूद में आ जाता है और यदि नाम नहीं देते हैं तो उसका भी एक वजूद होता है लेकिन वह विस्तृत होता है। ‘बुड़ान’ कहानी की दादी सरकार और सरपंच को सरापती है। हत्यारे कहानी में अमरकांत ने सरापा तो कहीं नहीं है लेकिन इतनी सारी चीजें हमारे सामने इकट्ठी रख दी हैं कि हमें लगता है कि कुछ भी छूटता नहीं है। दोनों कहानियां आकार में छोटी हैं और यह बतलाती हैं सब कुछ या बहुत कुछ डूब रहा है। यह ‘रामदास’ वाली कविता हमारे मित्र महेश कटारे जी ने पढ़ी। जो हत्यारे पर लिखी गई थी। अब आप देखिए एक कहानी में हत्या की संस्कृति है और दूसरी कहानी में विकास की संस्कृति है। तो ‘हत्या’ और ‘विकास’ के इस आपसी सम्बन्ध पर भी विचार करने की आवश्यकता है। हत्यारे के दोनों पात्र लुम्पेन हैं और बुड़ान के दोनों पात्रों में सम्भावनाएं हैं। ये बाद में चलकर प्रगतिशील भी हो सकते हैं और लुम्पेन भी हो सकते हैं और महेश कटारे जी ने ठीक ही कहा कि दोनों कहानियों की भाषा सहज और सम्प्रेषणीय है। कहानी-भाषा में एक प्रवाह है और एक जीवंतता है. जो  हत्यारे में कुछ अधिक है। हत्यारे पर मार्तण्ड ने बहुत गंभीर बातें कही हैं। कल बहुत कम समय में मैंने ‘रोड टू सर्फडम’ की चर्चा की थी, जिसका उल्लेख करते हुए उन्होंने प्रश्न किया कि क्या अर्थशास्त्र के डिस्पिलिन से साहित्य को समझना सम्भव है? इस पर मेरा कहना है कि नहीं, हम ऐसा नहीं मानते। कोई भी नहीं मानता। हम जब कल अपनी बात कह रहे थे तो आज के समय पर फोकस कर रहे थे और समयाभाव के कारण आज के समय को भी हमने सही ढंग से रेखांकित नहीं किया था। उसके बाद हम दूसरी चीजों पर आ गए। हमारा कहना केवल इतना ही था कि भारत का जो समय है और पूरे विश्व का जो समय है, इसकी शुरुआत हम वहीं से मानते हैं। संक्षेप में मैं यह कह दूं कि जब हायक ने ‘रोड टू सर्फडम’ (गुलामी का रास्ता) लिखी तब द्वितीय विश्वयुद्ध समाप्त हो रहा था। विश्व बैंक और अंतर्राष्ट्रीय मुद्राकोष का जन्म हो रहा था। अमेरिका को द्वितीय विश्वयुद्ध से कोई नुकसान नहीं पहुँचा था। उसके बाद विश्वबैंक और अंतर्राष्ट्रीय मुद्राकोष की स्थापना के बाद और जब पचास के दशक में बहुत सारे देश स्वतंत्र होने लगे थे -क्या अफ्रीकी, क्या एशियाई और दूसरे देश- तब नई आर्थिक नीतियां चलने लगीं और अमेरिका पूरी तरह से अपने वजूद में आ गया। उसके साथ ही कोल्डवार को भी हम देखें। उसके साथ सत्तर के दशक में जब डालर को सोने से डी-लिंक्ड किया गया उसको देखें। हम उसके बाद सत्तर के दशक में मार्गरेट थैचर और रोनाल्ड रीगन को देखें जहां से थैचरिज्म और रीडनामिक्स शुरु होता है और थैचर ने यह कहा था कि समाज, समाज क्या है! समाज का कोई अस्तित्व नहीं है! और आप सब जानते हैं कि मार्गरेट थैचर के निधन के बाद इंग्लैंड में लोगों ने कहा कि डायन मर गई है। आप देखें कि ये राजनेता हायक और मिल्टन फ्रीडमैन जैसे अर्थशास्त्रियों को कितना सर पर उठाकर रखते थे। मार्गरेट थैचर के हाथ में किताब होती थी हायक की और उनके जो इंटरव्यू हैं, पत्राचार हैं उनमें रोनाल्ड रीगन किस तरह से मिल्टन फ्रीडमैन को महत्त्व दिया करते थे वह देखिए। यह देखने की कोशिश कीजिए कि शिकागो स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स अपने वजूद में कैसे आया और आज भारत के रिजर्व बैंक का जो गवर्नर है ‘रघुराम राजन’ उनके वाशिंगटन के दफ्तर में हायक और रोनाल्ड रीगन की तस्वीरें मौजूद हैं/थी। वह अमरीकी नागरिक हैं। आज भारत के रिजर्व बैंक के गवर्नर हैं। क्यों 1967 से ही इकोनॉमिक्स में नोबेल पुरस्कार दिया जाना आरम्भ हुआ। इस खेल को, तमाशे को, तिकड़मों को और साजिशों को द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद यदि हम देखने की कोशिश करते हैं। तो सवाल का जबाब मिल जाता है. और जैसा कि मशहूर अफ्रीकी उपन्यासकार चिनुआ चेबे ने कहा है कि ‘उपन्यासकार को एक अध्यापक के रूप में होना चाहिए।’ मेरा सवाल दूसरा है और वह सवाल यह है कि एक औपनिवेशिक देश में जिसको एक आधी-अधूरी ही राजनीतिक स्वतंत्रता प्राप्त हो जाती है। उसके बाद उसके सामने किस प्रकार की सामाजिक समस्याएं उत्पन्न हो जाती हैं। न्युगी व थ्योंगो ने जो एक लेक्चर दिया था, जिसका समकालीन तीसरी दुनिया में एक अच्छा-खासा अनुवाद आनंद स्वरूप वर्मा ने किया है, उसको देखिए और तब ऐजुकेशन-यूनिवर्सिटी के फील्ड में और बौद्धिक जगत् में जो चीजें चलती हैं और हमारे मानस को जिस तरह अनुकूलित किया जा रहा है,  उसे देखने की कोशिश करें। यह इसलिए भी कि विकास की जो अवधारणा है वह पूरी तरह से आर्थिक विकास से जुड़ जाती है। इसलिए वह मनमोहन सिंह की इकोनॉमिक्स हो या नरेन्द्र मोदी की इकोनॉमिक्स हो, किसी से कोई फर्क नहीं पड़ता क्योंकि सारा मामला पूरी तरह से कारपोरेट से ही जुड़ रहा है। इसलिए मैं केवल यह कह रहा था कि आज क्या भाषा, क्या कला, क्या साहित्य, क्या संस्कृति, क्या उत्तर-आधुनिकतावाद, क्या उत्तर संरचनावाद, ’70 के दशक के बाद से आने वाले नए-नए थ्योरीज- इन सारी चीजों पर हम यदि समग्रता में विचार करने की कोशिश करते हैं तो हमें यह पता चल जाता है कि जो अर्थनीति है और जो राजनीति है इनसे इनका जो लगाव, जुड़ाव या झुकाव है वह किस प्रकार है या नहीं है। हम चीजों को आज खण्डित रूप में नहीं देख सकते और इसके लिए हम कहानी में भी चलेंगे। # लेखक

अपनी पत्‍नी के साथ अमरकांत

अपनी पत्‍नी के साथ अमरकांत

BY  रविभूषण

‘हत्यारे’ कहानी पर मार्तण्ड ने बहुत अच्छे ढंग से हिंदी के चार कथालोचकों की चर्चा की और यह बतलाया कि विश्वनाथ त्रिपाठी ने कहा है कि अमरकांत कहानी हत्यारे में ये जो दो लुम्पेन पात्र हैं संघर्ष नहीं करते। आखिर ये लुम्पेन कैरेक्टर आते कहां से हैं। लुम्पेन इकोनॉमी पर जो सबसे अच्छी किताब लिखी है वह सुनीति कुमार घोष ने लिखी है और यह जो लुम्पेन बुर्जुआजी है, यह जो लुम्पेन इकोनॉमी चलती है इससे लुम्पेन पात्रों का कोई सम्बन्ध बनता है या नहीं बनता है। और नेहरू के समय में लुम्पेन पूंजी आज की तरह तो दौड़ नहीं रही थी लेकिन वह थी कि नहीं थी। वह फ्रीडम मूवमेन्ट में थी कि नहीं थी. सुनीति कुमार घोष ने पूरे फ्रीडम मूवमेन्ट के दौरान बीस-तीस से लेकर बाद के दशकों तक इस लुम्पेन कैपटिलिज्म पर बहुत अच्छे ढंग से विचार किया है। अब अगर अमरकांत के पात्र संघर्ष नहीं करते हैं तो क्यों नहीं करते? लुम्पेन हैं, लुम्पेन कैसे संघर्ष करेंगे! यह कथालोचक सोच रहा है। यह ठीक ही कहा गया कि (अमरकांत की कथायात्रा में) यह एक ब्रेक है। मार्तण्ड ने यह अच्छी बात कही कि जो अकहानी है और जो नई कहानी है उसके संधि स्थल पर यह कहानी पूरी तरह से खड़ी है और ’60 के दशक में ही जब अकविता, अकहानी वगैरह का जो दौर चला था और फैशन जब आया था इसमें (हत्यारे में) कुछ लोग उसकी शिनाख्त कर सकते हैं. हत्यारे कहानी में ऐसे कुछ शब्दों, ऐसे कुछ वाक्यों से संकेत निकाले जा सकते है और कह सकते हैं कि बाद में इसको विकसित करते हुए एक दूसरी दिशा में अकहानी के कथाकारों ने जाने की कोशिश की। हिंदी के किसी भी कथालोचक ने, मार्तण्ड ने अभी चार का उल्लेख किया, अमरकांत के संदर्भ में मुक्तिबोध का उल्लेख नहीं किया है। मार्तण्ड ने भी विजयमोहन सिंह का उल्लेख नहीं किया। विजयमोहन सिंह शायद हिंदी के पहले आलोचक हैं जिसने अमरकांत की कहानियों पर विचार करते हुए मुक्तिबोध का दो-तीन बार उल्लेख किया है। लेकिन विजयमोहन केवल उतना ही जिक्र करते हैं. विश्वनाथ त्रिपाठी इतना ही कहते हैं कि अमरकांत के पात्र संघर्ष नहीं करते और राजेन्द्र यादव कहते हैं मनुष्य के अस्तित्व की लड़ाई महत्त्वपूर्ण है; तो खुद राजेन्द्र यादव का जो कथा संसार है और उनका जो चिंतन जगत् है उसकी छायाएं उनकी आलोचनात्मक टिप्पणियों पर कैसे पड़ती हैं उसका मैं यहां जिक्र नहीं करूंगा। यह अलग से विचारणीय है। सुरेन्द्र चौधरी जब कहते हैं कि हत्या नहीं होती तो यह महत्त्वपूर्ण कहानी होती. इसमें अतिनाटकीयता है। परंतु नई कहानी के दौर के और बाद के समय के हिंदी के जितने भी कथालोचक हैं उन्होंने जब हत्यारे कहानी पर कहीं कम, कहीं अधिक जो  भी विचार किया है उन सब को हम ध्यान में रख करके देखें कि इसमें अति नाटकीयता की बात सुरेन्द्र चौधरी भी करते हैं। विजयमोहन भी करते हैं और नामवर यह ठीक ही कहते हैं कि हत्या नहीं होती तो कहानी महत्त्वपूर्ण नहीं होती। लेकिन हिंदी का कोई कथालोचक हत्यारे कहानी के रेशे-रेशे को अलगाते हुए और उसे एक दूसरे से जोड़ते हुए किसी नतीजे पर पहुँचता हुआ मुझे दिखाई नहीं पड़ा है। मार्तण्ड ने ठीक कहा कि खल’नायक लुम्पेन पेटी बुर्जुआ है। मेरा कहना यही है कि लुम्पेन पेटी बुर्जुआ को हम लुम्पेन कैपटिलिज्म से जोड़ सकते हैं या नहीं। हत्यारे कहानी में भले इसकी पूरी चर्चा नहीं हुई हो लेकिन आप यदि यह देखें हत्यारे कहानी में क्या नहीं है। एक मुकम्मल रचना है यह। हिंदी आलोचना के साथ एक सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि जब हम कहानी पर विचार करते हैं तो केवल कहानियां हमारी आंखों के सामने होती हैं। जब कविता पर विचार करते हैं तो कविता हमारे सामने होती है। जब उपन्यास या अन्य साहित्य रूपों पर विचार करते हैं तो वह साहित्य रूप ही हमारे समक्ष प्रमुख रूप से उपस्थित हो जाता है। हम रचनाओं से निकलते और बहते हुए समय को देखने की कोशिश नहीं करते और पचास के दशक के बाद की स्थितियों को देखें तो हम कहीं न कहीं ‘अंधेरे में’ और ‘हत्यारे’ को एक साथ रखकर पाठ करने की आवश्यकता समझते हैं।

हत्यारे कहानी में ये जो दो लुम्पेन पात्र हैं ये कहां खड़े हैं- पहले पान की दुकान पर उसके बाद सड़क पर चलते हुए। शहर तो है ही। बुक स्टॉल- जहां पर एक युवती मैगजीन खरीद रही है और ये भी मैगजीन के पन्ने उलट रहे हैं। बाजार, रेस्तरां ये सब स्थान अलग-अलग दिखाई पड़ेंगे लेकिन मेरा मानना है कि इन स्थानों की प्रकृति पर विचार होना चाहिए। किसी आलोचक ने इन पर ध्यान नहीं दिया है। यह कहानी ऊपर से भले ऐसी लगती हो कि यह हत्यारे की कहानी है। दो लुम्पेन की कहानी है। पर मुझे ऐसा लगता है कि देश उस समय जो था, उससे जुड़ी जो चिंताएं हैं यह उन चिंताओं की कहानी है। इसमें क्या नहीं है! हम कहेंगे बड़ी सावधानी के साथ या बड़ी चतुराई के साथ (यह कहानी लिखी गई है) क्योंकि कहानी की पृष्ठ संख्या अधिक नहीं है। अगर दो-तीन बार ही कोई पाठ कर ले तो इसमें सब कुछ प्रत्यक्ष हो जाता है। इसमें नेहरू हैं। देश के अन्य नेता हैं। गांधी हैं। मंत्री हैं। होम मिनस्टर की चर्चा है। ब्लाकों के सरकारी कर्मचारी हैं। पूंजीपति, मंत्रियों और अफसरों के षडयंत्र की चर्चा है। देश की प्राइम मिनिस्ट्री की बात है। देश से आगे बढ़ करके विश्वशांति की बात कही गई है। अमेरिका के प्रेसिडेंट कैनेडी की चर्चा है। अमेरिका-रूस के सम्बन्ध की चर्चा है। जिसमें हम कोल्डवार को देख सकते हैं, वर्ल्ड पॉलिटिक्स को देख सकते हैं। उस समय का जो द्विध्रुवीय विश्व (बाइपोलर वर्ल्ड) है उसको देख सकते हैं और अभी जब हम इस कहानी पर बात कर रहे हैं तो इस एक ध्रुवीय विश्व अर्थात् यूनीपोलर वर्ल्ड में हम इस कहानी पर बात कर रहे हैं। इसमें एक पात्र जब कहता है कि ‘कल मुझको भी अमेरिका के प्रेसिडेंट केनेडी का तार मिला था।…मुझको अमेरिका बुला रहा है।…मैंने भी क़ुबूल कर दिया है कि मैं राष्ट्रीय विचारों का युवक हूं मैं अभी नहीं आ सकता।’ क्या खिल्ली उड़ाई है अमरकांत ने। तीन पंचवर्षीय योजनाएं हो चुकी थीं इस कहानी के लेखन से पहले। केंद्र में कांग्रेस की सरकार थी। हिंदी आलोचना तो ऐसा नहीं करती लेकिन उसे ऐसा करना चाहिए कि जो पंचवर्षीय योजनाएं हैं (चीजों को) उसके साथ भी रख करके विचार करना चाहिए क्योंकि केदारनाथ अग्रवाल ने और नागार्जुन जैसे बड़े कवियों ने भी पंचवर्षीय योजनाओं पर कविता की कुछ पंक्तियां दर्ज की हैं। आजादी के बाद आजादी में जो कुछ भी जैसा भी राष्ट्रप्रेम था उसकी पूरी कहानी खिल्ली उड़ाती हुई प्रतीत होती है। एक ओर खिल्ली है और दूसरी और पान की गिलौरी है। सिगरेट का धुआं है। इन दोनों पात्रों को अलग से देखने की जरूरत नहीं है। सड़क के दोनों ओर भव्य दुकानें हैं। बाजार की चहलकदमी है। नेहरू युग में कोई माल (शापिंग माल) नहीं था। ये दोनों वहां से गुजरते हैं। ‘वे अक्सर अपने दाएं और बाएं अत्यधिक नाराजगी से घूरते थे’- यह कहानी का वाक्य है। दाएं भी और बाएं भी। क्यों अंधायुग में प्रहरी दाएं और बाएं चलता है? मैं मानता हूं यह ‘राइट एण्ड लेफ्ट पॉलिटिक्स’ है। कहानी वही नहीं होती जो कहानी वर्णन करती हुई प्रतीत होती है। वह अपने भीतर बहुत सारे संकेतों को शामिल किए हुए होती है। यह पाठक के ऊपर निर्भर करता है, यह कथालोचक के ऊपर निर्भर करता है कि उन संकेतों को पकड़े। उन संकेतों को खोलने की कोशिश करे। तो यह जो पंक्ति है उसे आप देखिए, ‘वे अक्सर अपने दाएं और बाएं अत्यधिक नाराजगी से घूरते थे।’ इसमें एक-एक शब्द कसा हुआ है। चुस्त है कविता की तरह। हमें स्वतंत्र भारत में इसकी (राइट एण्ड लेफ्ट पॉलिटिक्स की) पड़ताल करनी होगी। तब इस कहानी का असली रूप हमारे सामने स्पष्ट हो सकेगा। आश्चर्य की बात है कि मार्तण्ड का भी ध्यान इधर नहीं गया और हिंदी के किसी कथालोचक का भी नहीं कि इसमें शिक्षा जगत्- यूनीवर्सिटी भी इसमें शामिल है। अंग्रेजी का हेड प्रोफेसर दीक्षित यहां मौजूद है। जो चंद्रा को फंसाने की कोशिश कर रहा है। वह बहुत साधारण छात्रा थी उसे उसने टॉप करा दिया। तो यहां पूरा एजुकेशन सिस्टम भी है। जिस समाज में एजुकेशन ऐसा होगा वहां लुम्पेन होंगे कि नहीं होंगे, भारतवर्ष के प्रत्येक विश्वविद्यालय शिनाख्त की जानी चाहिए कि वहां दो-चार ही सही लुम्पेन कैरेक्टर्स हमें नजर आते हैं या नहीं। मार्तण्ड ने बहुत अच्छी बात कही कि गोरा गुरु है सांवला शिष्य है। सांवले ने गोरे से कहा कि तुम ‘हरामी-उल-मुल्क’ के शहंशाह हो। ये जो गुस्सा है, ये जो क्रोध है अमरकांत के यहां जो व्यंग्य में झलकता है वह यहां कहीं-कहीं बेलौस ढंग से नजर आता है। इंग्लिश डिपार्टमेन्ट के हेड प्रोफेसर दीक्षित की बात हमने की। कहानी में यह उल्लेख है कि वह अफसरों और मंत्रियों की चापलूसी करता था। ’60 के दशक के आरम्भिक वर्षों में अफसरों और मंत्रियों की चापलूसी करने वाले कॉलेज और यूनीवर्सिटी के लेक्चरान, रीडरान और प्राफेसरान और आज के समय में उनकी संख्या कितनी बढ़ गई है यह सभी लोग जानते हैं। यहां अवश्य यूनीवर्सिटी के कुछ प्रोफेसरान और छात्र मौजूद होंगे। बड़ी बात यह है कि हम इन सबको अलग-अलग करके नहीं देख सकते। ये ऐजुकेशन सिस्टम, ये सोशल सिस्टम, ये पॉलिटिकल सिस्टम सारे सिस्टम एक दूसरे से जुड़े हुए हैं और हत्यारे कहानी उस समय की भारत वर्ष की व्यवस्था पर पूर्ण रूप से प्रहार करती है। और आज जब इतने वर्षों बाद, लगभग 50 वर्षों बाद इस कहानी का पाठ करते हैं तो हम क्या देखते हैं? हम कहां फंसे हैं? किस भंवर में फंसे हैं हम? इस कहानी में लास्की की चर्चा होती है। एक जमाने में लास्की की किताब, अभी भी कुछ लोग उलट लेते होंगे पॉलिटिकल साइन्स वाले, ‘ग्रामर आफ पॉलिटिक्स’ आदि की धूम मची हुई थी। क्यों होती है लास्की की किताब की चर्चा! अमरकांत ऐसे ही कर देते हैं! आप जो पॉलिटिकल थ्योरीज वहां से ला रहे हो- यह उस पर एक तरह से व्यंग्य है।…ये नामावली प्रस्तुत करना, ये बड़े-बड़े लोग जिन्होंने फूको की पांच किताबें नहीं पढ़ी हैं वे आज फूको, देरिदा वगैरह की बातें करते हैं। यह हिंदी की कहानी है और हिंदी का जो शिक्षित वर्ग है उसकी एकदम खिल्ली उड़ाता हुआ चलता है लेखक, इसलिए यहां लास्की भी मौजूद है। कहानी का आरम्भ होता है क्वार की एक शाम से। भाषा की दृष्टि से देखिए जहां तुलनाएं की गई हैं। एक-एक वाक्य इतना कसा हुआ, मुहावरे की शक्ल ले लेता है। हमारे साथी कैलास बनवासी अभी बोल रहे थे कि जो सरलता है यह छत्तीसगढ़वासियों की विशेषता है। एक अफ्रीकी कथाकार ने लिखा है वहां के लोगों को उद्धृत करते हुए कि गोरे हमारे यहां रात्रि भोजन के लिए आए। उन्होंने रात्रि का भोजन किया और वे हमारा सब कुछ ले गए। चिनुआ चेबे ने यू.आर. अनंतमूर्ति से बात करते हुए एक इंटरव्यू में यह कहा था कि अफ्रीकियों की जो सबसे बड़ी खासियत है वह उनकी सरलता ही है। वह उनकी सज्जनता ही है। यह सरलता और सज्जनता किसी काम की नहीं है। मुझे तो ऐसा लगता है कि जिस तरह कफन कहानी प्रेमचंद की कहानियों में एक अलग किस्म की कहानी है। उसी तरह से अमरकांत की हत्यारे कहानी एक अलग किस्म की कहानी है और यहां किसी ने बताया भी कफन के साथ में ऊपरी धरातल पर ही नहीं कुछ भीतरी धरातल पर इसकी बात की जानी चाहिए। तब हम 1936, 1964 और 2013 में इसको पकड़ सकते हैं। गोरा कहता है,‘मैं सिद्धांतों का आदमी हूं। नेहरू को ट्रंक काल करके आ रहा हूं।’ यह कहा जा सकता है कि ये पात्र कुछ मनोवैज्ञानिक ग्रंथियों से ग्रस्त हैं लेकिन ऐसी बात नहीं है। ये खिल्ली उड़ाते हैं- ‘नेहरू मेरा हाथ पकड़कर रोने लगा। बोला, आज देश भारी संकट से गुजर रहा है। सभी नेता और मंत्री बेईमान और संकीर्ण विचारों के हैं। जो ईमानदार हैं उनके पास अपना दिमाग नहीं है। मेरी लीडरशिप भी कमजोर है। मेरे अफसर मुझको धोखा देते हैं। जनता की भलाई के लिए मैंने पांच साला योजनाएं शुरु कीं, लेकिन ब्लाकों के सरकारी कर्मचारी अपने घरों को भरने में लगे हैं।’ यहां पांच साला योजना की जो चर्चा है वह पूरी तरह से इकोनामी पॉलिसी के तहत है। इतने घोटाले जो दो वर्ष पहले हमें देखने को मिले हैं ये अचानक नहीं हुए हैं। इसकी एक अनवरत श्रृंखला है जो नेहरूवियन पीरियड से हमें देखने को मिलती है। जो संसद में फिरोज गांधी के सवालों से लेकर के आज तक चली आई है। ‘लेकिन मैं उनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं कर सकता!’ यह नेहरू बोलते हैं। नेहरू के समय की समस्त पॉलिसियों पर यह कहानी एक तरह से पुनर्विचार करने के लिए हमें आमंत्रित करती हैं। ‘उसने (नेहरू ने) अंत में कहा- देश को अब केवल आपका ही सहारा है।’ पूरा देश आज लुम्पेन से भरा हुआ है। शायद ही कोई ऐसी पार्टी हो जिसमें लुम्पेन नहीं हों। विचित्र स्थिति है। लुम्पेन कैपिटल जिस तरह से प्रवाहित हो रही है उसमें सब कुछ लुम्पेन हो गया है। सब कुछ उनके हाथ में है। तो क्या इण्डियन डेमोक्रेसी लुम्पेन डेमोक्रेसी है! अनेक सवाल हैं। जो इस कहानी को पढ़ते हुए स्वतंत्र भारत पर गंभीरतापूर्वक विचार करने को हमें आमंत्रित करते हैं। ‘मैं सिद्धांतों का आदमी हूं। नेहरू को ट्रंक काल करके आ रहा हूं।’ सिद्धांत गायब हो गए। नेहरू का जो भी समाजवादी सिद्धांत था वह 37-38 के बाद ही कमजोर होने लगा था और 40 के बाद एक तरह से समाप्त होने लगा था क्योंकि सिद्धांत जितना महत्त्वपूर्ण होता है उससे कहीं ज्यादा महत्त्वपूर्ण होता है- आचरण और व्यवहार। जब सिद्धांत हमारे आचरण में ढलता नहीं, सांसें नहीं लेता तब वह सिद्धांत किताबों में पूरी तरह से सोया हुआ रहता है। यह हमारे कर्म होते हैं जिनसे वह सिद्धांत जीवित होता है। इसलिए यहां पर एक सैद्धांतिक प्रश्न की ओर भी संकेत है. लुम्पेन कह रहा है, ‘मैं सिद्धांतों का आदमी हूं…देश की प्राइम मिस्टरी मुझे मंजूर नहीं। मेरे सामने तो बहुत बड़े-बड़े सवाल हैं। सबसे पहले तो मुझे विश्वशांति कायम करनी है।’ क्या यह कहानी शांति के पक्ष में है। ‘दोनों दांत खोल कर हंसने लगे।’ यहां क्रियाएं देखिए! गति देखिए! दोनों की चाल देखिए! कहानी  की भाषा में एक-एक वाक्य, उनके शब्द विन्यास को पकड़ने की भी यदि हम कोशिश करें (तब इस कहानी को हम सही ढंग से समझ सकते हैं)। ‘अमेरिका के प्रेसीडेंट कैनेडी का एक तार मिला था।’ क्यों अमेरिका के प्रेसिडेंट की चर्चा है इसमें। दूसरे किसी देश के प्रेसिडेंट की चर्चा क्यों नहीं है। यह ऊपरी तौर पर सभी जानते हैं कि नेहरू के समय में भारतवर्ष का जो फॉरेन रिलेशन था, ये कहानी उस फारेन रिलेशन पर हमें थोड़ा सोचने को मजबूर करती है। वह (भारत) सोवियत रूस के साथ था लेकिन अमरीका के साथ भी चीजें चल रही थी। 47-48 लेकर 62-64 तक और उसके बाद तक देखें कि सारी चीजें आरम्भ हो चुकी थीं। कहानी तत्कालीन अमेरिका-रूस संबंधों को लेकर कोल्डवार की भी चर्चा करती है। इन्हीं वजहों से यह कहानी बहुत व्यापक फलक लिए हुए है। साठ के दशक के उत्तरी कहानीकारों की जो चर्चा होती है; नयी कहानी के दौर के सारे कहानीकारों को आप सामने रख लें, उनकी कहानियों को देखें मुझे नहीं लगता कि इतने व्यापक विश्वफलक को लेकर के कहीं चर्चा हुई हो। यह तो हमको खोलना है कहानीकार तो डिटेल्स में जाएगा नहीं। उपन्यासकार डिटेल्स में जा सकता है, कहानीकार नहीं जा सकता। सांवला कहता है, ‘उसने (कैनेडी ने) लिखा है…आप आ जाएंगे तो अमेरिका निश्चित रूप से रूस को युद्ध में हरा देगा।… मैंने भी क़ुबूल कर दिया है कि मैं राष्ट्रीय विचारों का युवक हूं और इस घोर संकट के समय किसी भी हालत में अपने देश को छोड़कर किसी दूसरी जगह नहीं जा सकता!’ आज अपने देश को छोड़ करके हमारी औलादें, हमारी संताने किस प्रकार से चली गई हैं इसे हम देख सकते हैं। अमरकांत यह पहचान रहे थे और  आने वाले समय की भी पहचान इस कहानी में मौजूद है। पात्रों का जो पहनावा है वह, इनकी जो चाल-ढाल है वह, जूते हैं वह, इनके कमीज के ऊपर के खुले हुए जो दो बटन हैं वह, वहां से निकली हुई जो छातियां हैं वह- इस सारे दृश्य को देंखें…एक वाक्य देखिए, ‘उनकी आंखें सिकुड़ गईं, होठों में दृढ़ता आ गई और गर्दन तन गई।…फिर दोनों ने एक-एक सिगरेट सुलगाई और अंत में शंटिंग करने वाले रेल के इंजिन की तरह लापरवाही से धुंआ छोड़ते हुए वहां से चलते बने।’ ये छात्राओं की ओर घूरते हैं। इनसे किसी नैतिकता की उम्मीद नहीं की जा सकती। अब कुछ अनैतिक हो चुका है। स्वतंत्र भारत एक बड़े अर्थ में अनैतिक भारत बन रहा है। कहानीकार की चिंता यही है। गोरा एक लड़की के बारे में कहता है, ‘उस लौंडिया को पहचान रहे हो?’ और जो प्रोफेसर दीक्षित है उसने अपने छात्रों से किताबें लिखवाई हैं और अपने नाम से छपवायी हैं। इस कहानी को लेकर अलग से अगर एक विश्वविद्यालयी शिक्षा का पाठ किया जाए तो यह हम समझते हैं कि आज के समय में यह ज्यादा जरूरी होगा। ‘वह मामूली स्टूडेंट थी, लेकिन मैंने ही उसको टॉप कराया।’ यह कौन कह रहा है? यह प्रोफेसर दीक्षित कहानी के गोरे पात्र से कह रहा है। किससे कह रहा है किस चरित्र से कह रहा है यह यहां विचारणीय है। प्रोफेसर दीक्षित के संपर्क में कोई बुद्धिजीवी नहीं है और प्रोफ़ेसर दीक्षित का केवल यह उद्देश्य है कि वह चंद्रा जो है वह हमारी होनी चाहिए। ‘मैंने उससे कई बार कहा कि तुमको दो वर्ष में ही डॉक्टरेट दिला दूंगा।’ हिंदुस्तान की किसी भी यूनीवर्सिटी की पी.एच.डी. थीसिस लिख कर मिलने वाली डॉक्टरेट पर हम इससे विचार कर सकते हैं। प्रो. दीक्षित कहता है, ‘मैंने हर दर्जे के लिए पाठ्य-पुस्तकें और कुंजियां लिखकर जो लाखों रूपये कमाएं हैं, उनको चंद्रा के चरणों पर न्योछावर करने को तैयार हूं।’  और इसी क्रम में गोरा प्रोफ़ेसर से डरने के सवाल पर कहता है कि ‘सारा देश जिसकी पूजा करता है वह उस पिद्दी से डरेगा।’ सोचिए जरा, लुम्पेन की पूजा कर रहा है सारा देश। गोरा प्रोफ़ेसर से कहता है, ‘तुमने अनगिनत लड़कियों की जिन्दगी इसी तरह चौपट की है…मुझे बाध्य होकर देश की शिक्षा पद्धति में आमूल परिवर्तन करना पड़ेगा। अब आप देखिए कोठारी कमीशन कब आया। इस कहानी के बाद ही या शायद इसी कहानी के आस-पास कोठारी कमीशन आया था। कोठारी कमीशन ने जो प्रस्ताव रखा था या जो चीजें सामने रखी थी उस पर कितना विचार हुआ। (भारतीय शिक्षा आयोग या कोठारी आयोग का गठन 14 जुलाई,1964 में हुआ था. इसमें विश्वविद्यालयी स्वायत्तता पर बल दिया गया था और शिक्षा को सामाजिक, आर्थिक एवं सांस्कृतिक परिवर्तनों के लिए शक्तिशाली माध्यम के रूप में विकसित करने की अनुशंसा की गई थी।) इस तरह की बहुत बाते हैं इस कहानी में। शिक्षा पद्धति में आमूल परिवर्तन की बात लुम्पेन बोल रहा है। उसकी बात ऐसी है जो हंसी में उड़ा दी जा सकती है। लेकिन उसकी बात हंसी में उड़ाने के लिए नहीं है। गम्भीरतापूर्वक सोचने के लिए है और कहानीकार ने एक ऐसी भाषा का चयन किया है जिसमें लोगों को थोड़ा आनंद महसूस हो और उसके भीतर जो गंभीर चीजें मौजूद हैं वे भी स्पष्ट होती चलें। सत्य और अहिंसा, जिसकी बात इस देश में आज भी की जाती है, उसी जमाने में अमरकांत ने सामने रखा था- ‘मैं सत्य और अहिंसा के देश का रहने वाला हूं और मेरे सेवाएं सदा निःस्वार्थ होती हैं।’ झूठ, हिंदुस्तान में जितना भी झूठ चल रहा है। जितनी मक्कारी चल रही है और जितनी अधिक हिंसा चल रही है प्रत्येक स्तर पर राज्य के स्तर से लेकर अनेक स्तरों पर आज हम उसे देखें और यही आज का समय है। आज का समय कल के समय से विच्छिन्न नहीं है। आज का समय कल के समय का एक अगला चरण है। यह अगला चरण है, इसे विकसित चरण नहीं कहेंगे। यह जिस रूप में चल रहा था वही आज भी है और सबसे बड़ा सवाल तो यह है कि एक नवऔपनिवेशिक देश में जो तमाम परतंत्रताओं घिरा हुआ है। जिसमें लूट धोखाधड़ी, झूठ, दंगा-फसाद सारी चीजें चल रही हैं उस नवऔपनिवेशिक देश में कथाकार की और उपन्यासकार की भूमिका क्या होती है- यह इस कहानी को देखा कर पता चलता है. हत्यारे कहानी में बाजार की चर्चा है, ‘उन्होंने बाजार के दो और चक्कर लगाए।…सभी दुकानें रंग-बिरंगी रोशनियों से जगमगा कर रहस्यमय स्वप्नलोक की तरह प्रतीत हो रही थीं।’ बाजार का यथार्थ से ही कोई सम्बन्ध नहीं है। इस कहानी में देश के चहुँमुखी विकास और विश्वशांति की स्थापना की भी बात है। कहानी का एक पात्र कहता है, ‘तुमको होम मिनिस्टर बना देंगे।’ किसी को कैसे मिनिस्टर बनाया जाता है यह उस पर टिप्पणी है। काबिलियत से कोई मिनिस्टर नहीं बनता। हिंदुस्तान में एक से एक शिक्षाविद् मौजूद हैं लेकिन शिक्षा मंत्रालय चाहे वह प्रांतीय सरकार का हो या केंद्र की सरकार का हो आप  वहां किसको देखेंगे। कहानी के अंत में दोनों पात्र एक कमजोर तबके की औरत के पास पहुँचते हैं। वहां उसका भोग करते हैं। उसे पैसा नहीं देते और वहां से भाग जाते हैं यह कहते हुए कि ‘आर्थिक और सामाजिक क्रांति करने का समय आ गया है।’ यह औरत कौन है! आपको यह इंडीविजुअल लग सकती है। पर हमें यह इंडीविजुअल नहीं लगती है। जैसे हमें बुधिया एक ‘इंडीविजुअल कैरेक्टर’ नहीं लगती कफन कहानी में। जिस तरह हमें गोदान की धनिया भी एक ‘इंडीविजुअल कैरेक्टर’ नहीं लगती है। यह सुन कर हो सकता है कि आप नाखुश हों कि इनमें (बुधिया और धनिया जैसे चरित्रों में) भारत माता की झलक मिलती है जब ये चरित्र पूरी तरह से एक देश की बहुत बड़ी जनसंख्या के एक सिंबल के रूप में उपस्थित होते हैं। जिसे कि आप भोग रहे हैं। यह भोगवाद आज बहुत विकृत रूप में बढ़ गया है। यहां केवल एक स्त्री नहीं है। इसका स्त्री पाठ नहीं किया जा सकता। इस स्त्री का एक सामाजिक पाठ (ही) किया जा सकता है। ये जो भोगने की आदत है, संस्कार है जो लुम्पेन में थी वह आज कहीं पढ़े-लिखों में भी है. कहानी में दोनों लुम्पेन युवकों का पीछा करने वालों में से एक फुर्तीबाज व्यक्ति तीर की तरह आता है और उसे चाकू मार दिया गया। उन दो लुम्पेन पात्रों को रोका नहीं जा सका। भारतवर्ष में लुम्पेन को रोका नहीं गया है। किसी सरकार ने लुम्पेन को नहीं रोका है। सबने समान रूप से बढ़ावा दिया है। उसे रोकने वाली जो शक्ति है, घायल होती है। उसे चाकू मार दिया जाता है। उसकी हत्या कर दी जाती है। तो ये कथा-कौशल है। कहानी-कला है जिसमें इतनी बारीकी के साथ, इतनी सघनता के साथ और इतनी कलात्मकता के साथ अमरकांत हमारे समक्ष अनेक अर्थ-छवियों को रखते हुए हमारे समक्ष प्रस्तुत करते हैं। यह उनकी कहानी-कला का विरल उन्मेष है। क्या कारण है कि हिंदी के कहानी आलोचक आज भी ‘दोपहर का भोजन’, ‘डिप्टी कलेक्टरी’ और ‘जिन्दगी और जोंक’ इस तरह की कहानी की चर्चा करते हैं और ‘हत्यारे’ की चर्चा नहीं करते; क्योंकि यहां एक पूरा सिस्टम है और हम सिस्टम पर निशाना नहीं लगाना चाहते। हम सिस्टम पर कुछ बोलना नहीं चाहते। क्योंकि हम सिस्टम पर बोलेंगे तो जाहिर है कि सिस्टम हमको तिरछी निगाह से देखेगा। अमरकांत इस सिस्टम को उस समय सही-सही देखने की कोशिश ही नहीं करते हैं, हमें भी बताते हैं और यह मास्टर स्टोरी राइटर का कमाल हुआ करता है कि उसके पात्र अगर संघर्षशील नहीं बताए जाते तो भी वह उन स्थितियों को, घटनाओं को, चरित्रों को कैसे अपने पाठकों के समक्ष प्रस्तुत कर देता है और पाठकों के मानस को स्वयं स्वतंत्र निर्णय लेने के लिए बाध्य कर देता है। विवश कर देता है क्योंकि हम यदि कहेंगे कि संघर्ष करो तो इस कहने मात्र से स्थितियां ठीक नहीं हो जाएंगी। एक रचनाकार ही दूसरे के मानस को रचनाशील बना देता है और तब ये सारी चीजें एक जगह इकट्ठा करके अमरकांत हमें सोचने विचारने का मौका देते हैं। अगर उन्होंने मौका नहीं दिया होता तो 2013 में ये कहानी चर्चा में क्यों आती।

(जन संस्कृति मंच के कथा समूह के प्रथम आयोजन ‘कथा मंच’ के तृतीय सत्र में आलोचक रविभूषण द्वारा ‘अमरकांत की कहानी हत्यारे और आज का समय तथा पूरन हार्डी की कहानी बुड़ान’ पर इलाहाबाद में दिनांक 22 दिसंबर, 2013 को दिया गया अध्यक्षीय वक्तव्य। लिप्यावतरण- श्रीकांत पाण्डेय।)

रजुआ और लतिका: अमरकांत को याद करते हुए

1st July 1925--17th Feb 2014

1st July 1925–17th Feb 2014

By सुरेन्द्र चौधरी 

तमाम कुशलता के बावजूद ‘परिंदे’ जैनेन्द्र का अतिक्रमण नहीं करती थी. इतना अवश्य था कि लतिका का पिंजरा बड़ा हो गया था, मगर कैच २२ वह तब भी नहीं न बन पाया था. फिर भी नई स्थितियों में स्त्री की यह नियति एक paradox खड़ा करती थी! लतिका को पिंजरे से ज्यादा उसका अपना नैतिक आवेश बाँधता था- इसी बिंदु पर उसकी पहली और आखिरी पहचान संभव है. उसका रक्षा-कवच ही उसका पिंजरा है, जो एक छाया बनकर उसे घेरता है, न स्वयं मिटता है और न उसे मुक्त करता है! कहानी के गुंजलक में एक पारदर्शी मन की यातनाएँ इन्हीं निर्विरोध क्षणों में उसे घेरती हैं.

‘परिंदे’ का डा. मुखर्जी कहता है, ‘वैसे हम सबकी अपनी-अपनी जिद होती है, कोई छोड़ देता है, कुछ लोग आखिर तक उससे छिपकर रहते हैं… कभी-कभी मैं सोचता हूँ मिस लतिका, किसी चीज को न जानना यदि गलत है तो जानबूझ कर न भूल पाना, हमेशा जोंक की तरह चिपके रहना, यह भी गलत है.’ और इस कथन के साथ एक कहानी मेरे दिमाग में कौंधती है, अमरकांत की कहानी ‘जिन्दगी और जोंक’. यह सरल योग-पद नहीं है, यह मैं जानता हूँ. दोनों की जमीन अलग है. समतल पर संक्रमण आसान होता है. मगर जिंदगियाँ सम-असम-तल पर विभाजित हैं, फिर भी मानसिक यात्रा में उन्हें लांघना संभव है. जीवन अपने लिए कैसे-कैसे हेतु गढ़ लेता है! बौद्धिक-अबौद्धिक!! रजुआ के लिए उसका अतीत रायपुर का बरई होने तक सीमित है. अपने नाम की याद उसे आती भी है तो इसी प्रसंग में, जब वह अपनी मौत की खबर गाँव भेजना चाहता है और जब वह अपने जिन्दा होने की खबर गाँव भेजता है. इसके सिवा वह पूर्णतः अतीत-मुक्त है. मगर वर्तमान! अपने वर्तमान के साथ उसकी लड़ाई निरंतर जारी है. एक बलवती जीवनेच्छा उसे परिचालित करती है. इसी में उसकी सारी अपेक्षाएं सीमित हैं- भूख भी, प्रेम भी, परिहास भी!!! आत्मदया के लिए उस अभागे के पास न चेतना है और न अवकाश ही. एक विडम्बना की तरह है उसका अस्तित्व. फिर भी जिन्दा है, जिन्दगी से उसे मोह है. इस मरजीवा पात्र को भूतनाथ की तरह हर बार लेखक अपने तिलिस्म से जिन्दा बाहर आता देखता है. जिन्दगी के साथ उसकी ऐय्यारी दिलचस्प है, मानव इच्छा का विस्तार है.

सुरेन्द्र चौधरी के लेख ‘उत्तरशती की कथा-यात्रा’ का एक अंश
सुरेन्द्र चौधरी, हिंदी कहानी: रचना और परिस्थिति, अंतिका प्रकाशन, गाजियाबाद, २००९, पृष्ठ.२६-२७

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