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दलित साहित्य का सौंदर्यशास्त्र उर्फ़ अंध-श्रद्धा के राज में समीक्षा का निर्वासन: उस्मान खान

डॉ. अंबेडकर ने सौंदर्यशास्त्र पर सीधे कलम चलाई है, ऐसा हमें ज्ञात नहीं, लेकिन जॉन ड्यूई ने सौंदर्यशास्त्र पर लिखा है। वाल्मीकि जी का सौंदर्यशास्त्र चाहे अनुभव की द्वंद्वात्मकता की उपेक्षा करे, ड्यूई ऐसा नहीं करते। उनकी पुस्तक ‘आर्ट एज़ एक्सपीरिएन्स’[4] १९३४ में प्रकाशित हुई थी। उनके अनुसार, अनुभव स्थानीय-माहौल में कार्य करते हुए अर्जित किए जाते हैं, ये अनुभव स्थानीय-संस्कृति में निर्मित सामुदायिक अनुभव होते हैं। उनके अनुसार ये समुदाय निरंतर टकराव में रहते हैं। वे खंडित और यांत्रिक अनुभव से जन्य कला को असौंदर्य कहते हैं, सुव्यवस्थित पूर्ण अनुभव को ही वे अनुभव मानते हैं। वे कला को उत्पादक/कलाकार का पक्ष मानते हैं और सौंदर्य को उपभोक्ता/सामाजिक का। निश्चित ही कलाकृति का उपभोक्ता केवल उदासीन ग्राहक नहीं होता, वह अपने रिस्पांस से कलाकृति को विभिन्न अर्थ देता है। उनके अनुसार कलाकार एक व्यक्ति की तरह अपने स्थानीय माहौल में कार्य करते हुए अनुभव अर्जित करता है, कला इन अनुभवों का विशेष रूप है। कलाकार के अनुभव विशिष्ट होते जाते हैं, लेकिन सामान्य अनुभवों से एकदम अलग वे नहीं होते। ड्यूई के अनुसार सोचना भी सुंदर होता है। वाल्मीकि जी ने अपने सौंदर्यशास्त्र में, यदि वह डॉ. अंबेडकर के दर्शन से निर्मित हुआ है, अनुभव के सौंदर्य पर सोचने का कष्ट नहीं उठाया।   #लेखक 

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Courtesy:  kractivist.wordpress.com/

                    

‘दलित साहित्य का सौंदर्यशास्त्र’ : वाद-विवाद-संवाद[1]

By उस्मान खान

                              फ़रियाद की कोई लै नहीं है,

                              नाला पाबंद-ए-नै नहीं है।[2]

दलित-साहित्य आंदोलनधर्मी-बहसधर्मी है। सन २००१ में प्रकाशित ओमप्रकाश वाल्मीकि की पुस्तक ‘दलित साहित्य का सौंदर्यशास्त्र’ दलित-साहित्य की बहसों को समेटने और अंबेडकरवाद को दलित साहित्य के सौंदर्यशास्त्र का केंद्र बनाने का प्रयास है। दलित-साहित्य के सौंदर्यशास्त्र या समीक्षाशास्त्र के निर्माण का यह प्रयास दलित-साहित्य की परिपक्वता और दलित-बहस की अपरिपक्वता दोनों को सामने लाता है।

वाल्मीकि जी अपने सौंदर्यशास्त्र का आधार डॉ. अंबेडकर के जीवन-संघर्षों और विचारों को बताते हैं। डॉ. अंबेडकर का सम्पूर्ण जीवन अगर किसी एक सामान्य कार्य में पूर्ण होता है, तो वह है छुआछूत और जाति-व्यवस्था का विरोध। उन्होंने उच्च-शिक्षा प्राप्त की, बहिष्कृत हितकारिणी सभा का निर्माण किया, मुकनायक, बहिष्कृत भारत और इक्वालिटी जनता जैसे पत्र निकाले, गाँधीवादी राजनीति पर प्रश्न-चिह्न लगाए, महाड़ सत्याग्रह किया, मनुस्मृति जलाई, जाति-प्रश्न को राजनीति का प्रश्न बनाया, कालाराम मंदिर में प्रवेश का प्रयास किया, इंडिपेंडेंट लेबर पार्टी बनाई, कांग्रेस मंत्रिमंडल में शामिल हुए, बौद्ध हुए, शेड्यूल्ड कास्ट्स फेडरेशन का निर्माण किया। यथा, उनका जीवन-संघर्ष किसी सीधी लकीर की तरह नहीं है, उसमें पर्याप्त पेंच हैं। उनके विचार जाति-व्यवस्था से मुक्ति की राजनीति के सापेक्ष तैयार होते जाते हैं। बने-बनाए ढाँचे में नहीं अनुभव, प्रयोग और व्यवहार के आधार पर बदलते हुए। एक तीखा भाव जो नहीं बदलता, वह है – जाति-भेद का बीजनाश। इस अर्थ में डॉ. अंबेडकर किसी वाद के अनुसरणकर्ता या निर्माता नहीं हैं, अपने गुरु जॉन ड्यूई की तरह अनुभवों से शिक्षा पाते हुए, किसी भी प्रकार की हिंसा से बचते हुए, वे जाति-व्यवस्था के उद्भव, विकास और नाश का अपना सिद्धान्त विकसित करते जाते हैं। अपनी राजनीति के लिए तात्कालिक लाभ प्राप्त करने के प्रक्रम में वे किन्हीं निश्चित आचार-विचार पर टीके नहीं रहते, वे मुख्यतः भौतिक-विकास का पूंजीवादी और आध्यात्मिक विकास का धार्मिक मार्ग सुझाते हैं। वे व्यवहारवाद के आधार पर संघर्ष करते जाते हैं, इन संघर्षों का अंतिम प्रयोग बौद्ध-धर्म अपनाना था और इस संभावना से इन्कार नहीं किया जा सकता कि वे आगे भी नए प्रयोग करने से हिचकते नहीं।

उनके जीवन-संघर्ष और चिंतन-मनन से जो दर्शन प्राप्त होता है उसे परिणामवाद, व्यवहारवाद या अनुभववाद कहा जा सकता है। जॉन ड्यूई से अलग उन्होंने अपनी विशेष समस्या के संबंध में इस दर्शन का प्रयोग और विकास किया। जहाँ ड्यूई अमेरिका की उभरती पूंजीवादी-साम्राज्यवादी-संसदीय-व्यवस्था में कार्यरत थे, वहीं डॉ. अंबेडकर सामंती-पूंजीवादी उपनिवेशी भारत में। उत्तर-उपनिवेशी भारत में डॉ. अंबेडकर की राजनीति का दूसरा रूप दिखाई देता है – तेलंगाना के जन-संहार का विरोध न करना, बौद्ध-धर्म को अपनाना और शेड्यूल्ड कास्ट्स फेडरेशन का निर्माण करना आदि। वे कभी भारत में लोकतन्त्र के विकास और नागरिक-समाज के निर्माण के प्रति आशावान दिखते हैं, तो कभी उनका मोहभंग प्रकट होता है। सिद्धांतों की व्यवस्था उनके चिंतन में नहीं है। वे अपने जीवन-संघर्ष में भी स्थिति-सापेक्ष कोई भी कार्य करते दिखते हैं। हिंसा का पक्ष लेते भी उन्हें देखा जा सकता है। वे मार्क्स के विचारों को जाने बिना ही उनके प्रति घृणा और तिरस्कार प्रदर्शित करते हैं, बौद्ध-धर्म को जाति-व्यवस्था ही नहीं, सम्पूर्ण मानवता की सभी समस्याओं का हल बताते हुए वे मार्क्सवाद को (बिना ठीक से जाने-समझे ही) खारिज कर देते हैं।[3] अवसरानुकूल स्वीकार और त्याग की यह प्रक्रिया चलती रहती है। बौद्ध-धर्म के स्वीकार से जाति-व्यवस्था या उत्पीड़न का अंत संभव नहीं, इतिहास और वर्तमान दोनों इसका सबूत देते खड़े हैं। क्या म्याम्मार और श्रीलंका में बौद्ध-धर्म प्रभावी नहीं, क्या वहाँ सभी प्रकार का उत्पीड़न समाप्त हो चुका है, सभी लोग सुखी हैं, करुणा और मैत्री आधारित जीवन जी रहे हैं?

अंबेडकरवादी राजनीति डॉ. अंबेडकर को फरिश्ता, मसीहा, देवता की तरह प्रस्तुत करती है, इससे डॉ. अंबेडकर एक ऐसे व्यक्तित्त्व के रूप में उभरते हैं, जिनकी जय की जा सकती है या मूर्ति तोड़ी जा सकती है, लेकिन जिनसे संवाद नहीं स्थापित किया जा सकता। उत्तर-उपनिवेशी भारत में अंबेडकरवादी राजनीति कई धाराओं और उप-धाराओं में बंटती चली गई। मुख्यधारा एकालापी या असंवादी है। इस धारा के बौद्धिक डॉ. अंबेडकर को भगवान नहीं, तो उससे कम भी नहीं मानते। वे किसी भी तरह डॉ. अंबेडकर को विश्व का महानतम बौद्धिक सिद्ध करना और मनवाना चाहते हैं। बौद्धिक को बौद्धिक कहने में या क्रांतिकारी को क्रांतिकारी कहने में कोई हर्ज नहीं, लेकिन किसी के जीवन और विचारों का सुव्यवस्थित अध्ययन किए बिना क्या यह उचित है कि हम उसे कुछ कहें? वाल्मीकि जी डॉ. अंबेडकर के जीवन और विचारों को पूर्णता में नहीं देखते। उन्हें सर्वदर्शी सर्वज्ञाता की तरह से प्रस्तुत करने के अतिरिक्त उनके सौंदर्यशास्त्र में डॉ. अंबेडकर के व्यक्तित्त्व और दर्शन के बारे में कोई सही जानकारी नहीं मिलती। अंध-श्रद्धा के राज में समीक्षा निर्वासित रहती है।

निश्चित ही, डॉ. अंबेडकर बौद्ध-धर्म का विशेष उपयोग करते हैं, बौद्ध-दर्शन से अधिक वे बौद्ध-संगठन पर ध्यान देते हैं, उनके बुद्ध आधुनिक राजनैतिक बुद्ध हैं। भारत में जाति-व्यवस्था की समाप्ति के संघर्ष में विकसित हुआ उनका व्यवहारवादी-दर्शन विशिष्ट होकर भी व्यवहारवाद के सामान्य सिद्धांतों से विचलित नहीं होता। इस अर्थ में वे ड्यूई के सच्चे शिष्य हैं। बुद्ध के अनित्यवाद पर वे विशेष ध्यान नहीं देते। वाल्मीकि जी ने भी यही रास्ता पकड़ा है।

डॉ. अंबेडकर ने सौंदर्यशास्त्र पर सीधे कलम चलाई है, ऐसा हमें ज्ञात नहीं, लेकिन जॉन ड्यूई ने सौंदर्यशास्त्र पर लिखा है। वाल्मीकि जी का सौंदर्यशास्त्र चाहे अनुभव की द्वंद्वात्मकता की उपेक्षा करे, ड्यूई ऐसा नहीं करते। उनकी पुस्तक ‘आर्ट एज़ एक्सपीरिएन्स’[4] १९३४ में प्रकाशित हुई थी। उनके अनुसार, अनुभव स्थानीय-माहौल में कार्य करते हुए अर्जित किए जाते हैं, ये अनुभव स्थानीय-संस्कृति में निर्मित सामुदायिक अनुभव होते हैं। उनके अनुसार ये समुदाय निरंतर टकराव में रहते हैं। वे खंडित और यांत्रिक अनुभव से जन्य कला को असौंदर्य कहते हैं, सुव्यवस्थित पूर्ण अनुभव को ही वे अनुभव मानते हैं। वे कला को उत्पादक/कलाकार का पक्ष मानते हैं और सौंदर्य को उपभोक्ता/सामाजिक का। निश्चित ही कलाकृति का उपभोक्ता केवल उदासीन ग्राहक नहीं होता, वह अपने रिस्पांस से कलाकृति को विभिन्न अर्थ देता है। उनके अनुसार कलाकार एक व्यक्ति की तरह अपने स्थानीय माहौल में कार्य करते हुए अनुभव अर्जित करता है, कला इन अनुभवों का विशेष रूप है। कलाकार के अनुभव विशिष्ट होते जाते हैं, लेकिन सामान्य अनुभवों से एकदम अलग वे नहीं होते। ड्यूई के अनुसार सोचना भी सुंदर होता है। वाल्मीकि जी ने अपने सौंदर्यशास्त्र में, यदि वह डॉ. अंबेडकर के दर्शन से निर्मित हुआ है, अनुभव के सौंदर्य पर सोचने का कष्ट नहीं उठाया। उनको यही कह देना काफी लगा – ‘एक दलित जिस उत्पीड़न को भोगकर दुख, वेदना से साक्षात्कार करता है, वह आनंददायक कैसे हो सकता है?’[5] (५०)

पीड़ा से आनंद नहीं उपजता, इस मान्यता के साथ वाल्मीकि जी अपने सौंदर्य-चिंतन में आनंद के पक्ष को नकारते हैं। निश्चित ही, आनंद के पक्ष को सीमित अर्थों में ग्रहण करने से ऐसी मान्यता निर्मित हुई है। आनंद का पक्ष केवल मनोरंजन से नहीं जुड़ा है, अरस्तू द्वारा प्रस्तावित विरेचन से भी सम्बद्ध है। कलाकृति के उपभोग से सम्बद्ध है। सौंदर्यशास्त्र के निर्माण में पहला प्रश्न साधारणीकरण का ही रहा आया है। वाल्मीकि जी इस प्रश्न से पल्ला झाड़ लेते हैं या उपरोक्त प्रश्न उठाकर उस पहले प्रश्न को खारिज मान लेते हैं। पाठक/दर्शक/श्रोता कलाकृति में वर्णित भाव-विचार-अनुभव को अपने भाव-विचार-अनुभव से अनुकूलित करता है, इस प्रक्रिया में अपनी पीड़ा के लिए दवाई पाता है। जिस तरह घाव पर मरहम लगाने से घायल को लाभ मिलता है, उसी तरह पीड़ा के अनुभव पढ़ना पाठक के मन-मस्तिष्क के घावों को, जो उसकी अपनी पीड़ा के अनुभव हैं, भरता है। इसका अर्थ फिर यह नहीं कि पाठक को दूसरे की पीड़ा के अनुभव पढ़कर राहत मिलती है, नहीं, बल्कि उसको अपनी पीड़ा के अनुभव पर सोचने-समझने में सहयोग मिलता है, साथ ही पीड़ा के सामूहिक अनुभव पर सोचने-समझने में भी वह अधिक सक्षम हो पाता है। इससे वह अपनी व समाज की पीड़ा को समाप्त करने की प्रेरणा भी पाता है। यह समझ और प्रेरणा अनुभवों की पूर्णता और संतुष्टि को जन्म देती है, जो पाठक के लिए कलाकृति का भिन्न अर्थ निर्मित करती है। जहाँ ऐसा नहीं होता, वहाँ पाठक के लिए कृति अपूर्ण और असंतुष्टिकर होती है, उसकी सौंदर्य-पीपासा शांत नहीं होती।

कला को एक माध्यम की तरह देखने से यह दृष्टि पैदा होती है कि कला का उद्देश्य केवल शिक्षा देना है, कला को स्वयंपूर्ण मान लेने पर यह दृष्टि पैदा होती है कि कला का उद्देश्य केवल आनंद या मनोरंजन है। ये दोनों ही दृष्टियाँ अधूरी हैं और कला में फाँक पैदा करती हैं। शिक्षा और आनंद का जितना बेहतर संतुलन कोई कलाकृति स्थापित कर पाती है, उतनी ही सुंदर वह कही जाती है – एक स्वयंपूर्ण-माध्यम । लेकिन कला का उद्देश्य यहीं तक सीमित नहीं है, कला का अंतिम उद्देश्य सत्य को पुनर्प्रस्तुत करना है, वास्तविकता का कलात्मक प्रकाशन करना है। वाल्मीकि जी अपने सौंदर्यशास्त्र में कला को एक माध्यम, वह भी सीमित, मानते दिखते हैं। निश्चित ही, वे बाज़ार-केन्द्रित कला-उत्पादन के विरोध में और विचारधारा-केन्द्रित कला-उत्पादन के पक्ष में हैं, लेकिन सत्य और सुंदर की पूर्णता की उपेक्षा करते हैं।

अपनी पुस्तक में उन्होंने ड्यूई द्वारा किए गए विषय और अंतर्वस्तु के भेद की चर्चा की है, लेकिन वे यह नहीं बताते कि अंतर्वस्तु से ड्यूई का अर्थ साहित्यिकता से ही है, शायद इससे वे अपनी इस मान्यता को तुष्ट करना चाहते हैं कि अंतर्वस्तु ही प्रमुख है, रूप नहीं। जबकि ड्यूई के लिए रूप का महत्त्व कम नहीं। फिर वाल्मीकि जी कला की सामान्य अंतर्वस्तु संबंधी ड्यूई के विचार पर भी नहीं सोचते, इसीके परिणामस्वरूप वे दलित-साहित्य और अनुभव की अंबेडकरवादी अनन्यता पर ज़ोर देकर उसकी महत्ता स्थापित करते दिखते हैं। वैज्ञानिक जागरण के अभाव में सौंदर्यशास्त्र का निर्माण किस तरह होता है, इसे समझने के लिए वाल्मीकि जी का सौंदर्यशास्त्र एक उत्तम उदाहरण है। डॉ. अंबेडकर के विचारों और साहित्य दोनों के संबंध में उनका विवेचन धार्मिक-आस्थामय है, दर्शन और विज्ञान से वे दूर हैं। कहीं इसलिए तो नहीं कि दर्शन और विज्ञान धर्म पर संदेह और धर्म के नकार का प्रस्ताव भी रखते हैं!

अंबेडकरवाद विचार, आंदोलन और प्रकार्य की दृष्टि से एक जटिल विचारधारा है। हिन्दी-क्षेत्र में भी दलित-आंदोलन के निर्माण में और प्रकारांतर से दलित-साहित्य के निर्माण में अंबेडकरवाद के प्रचार-प्रसार की मुख्य भूमिका रही है। ८० के दशक में विशेषकर पश्चिमी उत्तरप्रदेश में, अनुसूचित-जाति के सामाजिक राजनैतिक संगठनों के निर्माण, प्रचार-प्रसार और चुनावी विजयों के साथ ही साथ, हिन्दी-दलित-साहित्यिकों के आंदोलन का भी प्रारम्भ होता है। अनुसूचित-जाति के शिक्षित-जन अंबेडकरवाद और वाया अंबेडकरवाद, बौद्ध-धर्म की ओर मुड़ते हैं। ९० के दशक में दलितों की आत्मकथाएँ सामने आने लगती हैं, जो हिन्दी-साहित्य के इतिहास की अभूतपूर्व घटना है। ओमप्रकाश वाल्मीकि, मलखान सिंह, मोहनदास नैमिशराय, कौशल्या बैसन्त्री, सुशीला टाकभौरे दलित-साहित्यिकों की सूची बढ़ती जाती है। वाल्मीकि जी का कहना ठीक है कि सिद्धों, संतों और दलित-साहित्य के विचारों में मूलभूत अंतर है, तब भी हिन्दी-साहित्य के इतिहास में और किसी धारा से इसकी सादृश्यता नहीं खोजी जा सकती। स्वयं वे भी घुम-घूमकर वहीं पहुँचते हैं।

उत्तर-उपनिवेशी भारत में समाज के लोकतांत्रिकरण और पूंजीवादी प्रसार ने भारत की सदियों पुरानी ग्रामीण-व्यवस्था का अधिकाधिक विखंडन किया, साथ ही अनुसूचित-जाति के एक हिस्से की राजनैतिक-आर्थिक उन्नति ने उनके अपने बौद्धिकों के निर्माण में आधारभूत भूमिका निभाई। यह बौद्धिक-वर्ग अंबेडकरवाद का निर्माता बना। अनुसूचित-जाति का यह वर्ग हिन्दी-दलित-साहित्य को जन्म देने वाला भी बना। महाराष्ट्र में दलित-साहित्यिकों के उभार और हिन्दी-क्षेत्र में – विशेषकर पश्चिमी उत्तर-प्रदेश में – कांशीराम और मायावती के बहुजन-आंदोलन और फुले-अंबेडकर-विचार के प्रचार-प्रसार ने हिन्दी-दलित-साहित्य के निर्माण की तात्कालिक भूमिका तैयार की। आज भी, दलित-आंदोलनों के निरंतर प्रचार-प्रसार के बाद भी, दलित-साहित्यिक हिन्दी-क्षेत्र में पूरी तरह सामने नहीं आ पाए हैं। अब भी दलितों के लिए कलम पकड़ना मुश्किल है। दलित शायद निर्बाध घोड़ी चढ़ने भी लग जाएँ, लेकिन ज्ञान-शक्ति अर्जित किए बिना किसी उत्पीड़ित-वर्ग की मुक्ति संभव नहीं, दलितों को भी इस शक्ति को अधिकाधिक सँजोना होगा, अन्यथा विडम्बना बनी रहेगी –

                              बेटा है बजरंगी दल में

                              बाप बना है भगवाधारी

                              भैया हिन्दू परिषद में है

                              बीजेपी में महतारी

                              मंदिर-मस्जिद में गोली

                              इनके कंधे चलती है।

                              यह दलितों की बस्ती है।[6]

ओमप्रकाश वाल्मीकि दलित-साहित्य को अंबेडकरवाद से किसी तरह बाहर नहीं मानते, यही कारण है कि वे दलित-साहित्य की अंबेडकर-पूर्व की रचनाओं को विशेष महत्त्व नहीं देते। उनकी दृष्टि में जो अंबेडकरवाद की चेतना से पूर्ण नहीं, वह दलित-साहित्य नहीं। अपने सौंदर्यशास्त्र में वे दो बातों पर ज़ोर देते हैं – पहली कि अनुसूचित-जाति द्वारा लिखा गया साहित्य ही दलित-साहित्य है, दूसरी कि अंबेडकरवाद की चेतना के बिना दलित-साहित्य नहीं रचा जा सकता। कुल मिलाकर यह कि अनुसूचित-जाति के अंबेडकरवादी व्यक्ति का साहित्य ही दलित-साहित्य है। उनके लिए दलित-साहित्य की प्रामाणिकता अंबेडकरवादी होने पर टिकी है, ना कि सिर्फ़ दलित होने पर। आश्चर्य नहीं, उनके लिए बुद्ध, सिद्ध, संत, फुले (पेरियार) आदि डॉ. अंबेडकर के निर्माण में समाहित हो जाते हैं।

वाल्मीकि जी के अनुसार बाबा साहब डॉ. भीमराव अंबेडकर दलित-साहित्य के केंद्रीय प्रेरणा-स्रोत हैं और दलित-साहित्य की धार्मिक, दार्शनिक, सांस्कृतिक, राजनैतिक और आर्थिक मान्यताएँ वही हैं, जो अंबेडकरवाद की हैं। लेकिन इन मान्यताओं को केवल प्रकट किया गया है और इन पर आत्म-सत्यापन की मोहर लगा दी गई है। यानी इन मान्यताओं और दलित-साहित्य के अंतर्संबंधों पर विचार नहीं किया गया है। डॉ. अंबेडकर की आर्थिक मान्यताओं पर लिखते हुए उन्होंने ‘अछूत  कौन और कैसे?’ पर आधारित सभ्यता की व्याख्या प्रस्तुत करना ही काफ़ी समझा है। क्या यह व्याख्या भौतिक-इतिहास पर आधारित है? क्या इससे दलित-साहित्य की आर्थिक मान्यताएँ स्पष्ट हो जाती हैं? इस व्याख्या को क्यों सही माना जाए, इसके पीछे कोई तर्क उन्होंने नहीं दिया। ऐसा क्यों? कहीं इसलिए तो नहीं कि इस संबंध में डॉ. अंबेडकर स्वयं सशंकित थे, इसलिए वे भी बिना प्रमाण ही इसे मान लेने की बात कहते हैं – ‘हमारे पास इस बात का कोई प्रमाण नहीं है कि ये छितरे हुए आदमी बौद्ध थे। किन्तु किसी प्रमाण की आवश्यकता भी नहीं है, जबकि उस समय अधिकांश हिन्दू बौद्ध ही थे। हम मान लेते हैं कि वे बौद्ध ही थे।‘[7] हमारे पास प्रमाण नहीं है, लेकिन हम मान लेते हैं, क्या यह वैज्ञानिक-दृष्टि है? डॉ. अंबेडकर ने स्वयं अर्थशास्त्र पर कलम चलाई है, वाल्मीकि जी को आर्थिक मान्यताओं पर बात करते हुए डॉ. अंबेडकर के अपने अर्थशास्त्र को सामने रखना था। अगर वाल्मीकि जी श्रम के शोषण का विचार सामने रखते, तो दलितों के शोषण का (आर्थिक ही सही!) पक्ष अधिक उजागर हो पाता और इस संबंध में डॉ. अंबेडकर के विचार भी अधिक स्पष्ट हो पाते। दलित-साहित्य में वर्णित श्रम के शोषण को समझने में भी पाठक को मदद मिलती। इसी तरह दलित-साहित्य की धार्मिक, सांस्कृतिक मान्यताओं पर लिखते हुए वे कहते हैं कि दलित-साहित्य अंधश्रद्धा, आस्था की जगह विश्लेषण तथा ऐतिहासिक और सामाजिक परिप्रेक्ष्य पर ध्यान देता है, और अंत में बौद्ध-धर्म की दीक्षा लेते समय डॉ. अंबेडकर द्वारा की गई २२ प्रतिज्ञाओं को इसका आधार बताते हैं। एक तरफ़ वे कबीर की अध्यात्मिकता की आलोचना करते हैं और दूसरी तरफ़ डॉ. अंबेडकर की अध्यात्मिकता का पक्ष लेते हैं। क्या इसे संगत माना जा सकता है? कभी वे धर्म को हानिकारक बताते हैं, तो कभी स्वयं दलित-साहित्य की धार्मिक मान्यताएँ बताने लगते हैं। क्या धार्मिक हुए बिना दलित-साहित्य नहीं लिखा जा सकता? वाल्मीकि जी दलित-साहित्य के हर पहलू को डॉ. अंबेडकर से जोड़ते हैं, इससे उनके सौंदर्यशास्त्र में कई असंगतियाँ और भ्रांत धारणाएँ उत्पन्न हुई हैं। वे दलित-चेतना के १३ बिन्दुओं में वैज्ञानिक-दृष्टि को भी शामिल करते हैं, लेकिन दलित-साहित्य के सौंदर्यशास्त्र के निर्माण में वैज्ञानिक-दृष्टि का प्रयोग करते नहीं दिखते। वे लिखते हैं –

‘दलित-साहित्य ‘आशय’ को महत्त्व देता है। अभिव्यक्ति और शिल्प दूसरे स्थान पर आता है। जीवन-अनुभवों की प्रामाणिकता ‘आशय’ को अर्थ-गंभीर बनाती है। यह अर्थ-गाम्भीर्य डॉ. अंबेडकर-दर्शन के विचार तत्त्व पर आधारित होना चाहिए। इसीलिए दलित साहित्य के सौंदर्यशास्त्र का स्वरूप पारंपरिक सौंदर्यशास्त्र से भिन्न है।‘[8]

यहाँ अभिव्यक्ति को सीमित अर्थों में समझा गया है। ड्यूई के अनुसार कलाकार के संपीड़ित या दबाए गए अनुभवों का किसी माध्यम से प्रकट होना अभिव्यक्ति है। उनके अनुसार कला अभिव्यक्त वस्तु है। यह शिल्प या रूप का मामला नहीं, बल्कि सामाजिक यथार्थ में अस्तित्त्व की दखल को, पीड़ा के अनुभव को पुनर्प्रस्तुत करने का कार्य है, एक ऐसा कार्य जो स्वयं सामाजिक यथार्थ में एक दखल बन जाता है। साथ ही वाल्मीकि जी ने अपनी पुस्तक में ‘अंबेडकर-दर्शन के विचार तत्त्व’ के बारे में जो लिखा है, वह भी सम्यक-दृष्टिपूर्ण नहीं कहा जा सकता, वह डॉ. अंबेडकर के विचारों के विश्लेषण-संश्लेषण से अधिक अंबेडकरवादी (बहुजनवादी) आंदोलन द्वारा निर्मित-प्रसारित भावुक-श्रद्धापूर्ण विवेचना है। वे लिखते हैं – ‘दलित साहित्य का वैचारिक आधार डॉ. अंबेडकर का जीवन-संघर्ष एवं ज्योतिबा फुले और बुद्ध का दर्शन उसकी दार्शनिकता का आधार है।‘[9]

लेकिन पूरी पुस्तक में फुले और बुद्ध के विचारों को डॉ. अंबेडकर के विचारों से अलग नहीं किया गया, साथ ही फुले और बुद्ध के अपने दर्शन को डॉ. अंबेडकर के जीवन-संघर्ष से भी नहीं जोड़ा गया। बुद्ध, सिद्ध, कबीर, रैदास, फुले और अंबेडकर सभी को नई दलित-राजनीति – अंबेडकरवाद – की दृष्टि से देखा गया है। बुद्ध के अनीश्वरवाद और अनात्मवाद को – अनित्यवाद की बुद्धवादी व्याख्या को – अनुभववाद में सीमित नहीं किया जा सकता। डॉ. अंबेडकर के बुद्ध विशिष्ट हैं – सर्वज्ञ-सर्वदर्शी भी और आधुनिक राजनैतिक भी – दलितों की भौतिक और आध्यात्मिक समस्याओं का एकमात्र समाधान। बौद्ध-दर्शन अनित्यवाद को अपनी विचारधारा या दर्शन का मूल-तत्त्व मानता है, अंबेडकरवादी-दर्शन अनुभववाद को। वाल्मीकि जी ने बुद्ध, बौद्ध-धर्म, फुले, डॉ. अंबेडकर और अंबेडकरवादी आंदोलन की एक खास छवि निर्मित की है, जिसके आधार पर उनका अंबेडकरवाद तैयार हुआ है, जो कि उनके सौंदर्यशास्त्र का आधार है। यह छवि भौतिक इतिहास के नकार और वास्तविकता के एक अंश के स्वीकार से निर्मित हुई है। भारत का और प्रकारांतर से वर्ण-जाति-धर्म-व्यवस्था का भौतिक इतिहास और यथार्थ की पूर्णता उनके सौंदर्यशास्त्र में उपेक्षित रह गई है। डॉ. अंबेडकर के विचारों को भी पूर्णता में देखने से बचा गया है। वाल्मीकि जी द्वारा दलित-साहित्य में अंबेडकरवादी होने पर ही अधिक ज़ोर दिया गया है। इससे दलित-साहित्य के विस्तार की समीक्षा तो बाधित हुई ही है, साथ ही डॉ. अंबेडकर के विचारों तथा छायावाद और प्रगतिवाद (प्रकारांतर से दक्षिणपंथ और वामपंथ) की सम्यक-आलोचना भी नहीं हो पाई है। अंबेडकरवाद को भी जिस तरह प्रस्तुत किया गया है, वह दलित-साहित्य-समीक्षा के लिए उपयुक्त नहीं, उसमें मुक्ति कम बंधन अधिक है। निश्चित ही, अंबेडकरवाद को समझे बिना दलित-साहित्य की समीक्षा नहीं की जा सकती, तब भी यह याद रखना चाहिए कि अंबेडकरवाद के कई प्रकार हैं, वाल्मीकि जी ने अपने सौंदर्यशास्त्र में मुख्यधारा के अंबेडकरवाद को प्रस्तुत किया है, जो सोचने से अधिक मानने पर ज़ोर देता है, जो सम्पूर्ण दलित-साहित्य को स्वीकार करने में भी समर्थ नहीं, फिर सम्पूर्ण-निम्न-वर्ग तो उनके विवेचन से बाहर ही रह जाता है।

संत-प्रेरणा दलित-साहित्य में महत्त्वपूर्ण स्थान रखती है। वाल्मीकि जी के लिए भी बुद्ध, कबीर आदि नायक हैं, लेकिन डॉ. अंबेडकर के अधिनायकत्त्व में ही। उनके सौंदर्यशास्त्र में डॉ. अंबेडकर को उपास्य बनाने की प्रेरणा सर्वत्र व्याप्त है। डॉ. अंबेडकर के विचारों की सर्वोच्चता सिद्ध करने में ही पुस्तक का अधिक भाग चला गया है। बुद्ध आदि के विचारों के स्वतंत्र अस्तित्त्व की उपेक्षा वाल्मीकि जी के सौंदर्यशास्त्र में प्रकट है। इसी कारण दलित-साहित्य की विरासत को उनका सौंदर्यशास्त्र उचित महत्त्व नहीं देता, जैसे इससे दलित-साहित्य की शुद्धता (अंबेडकरवाद) नष्ट हो जाएगी। वे दलित-साहित्य के विस्तार को भी उचित महत्त्व नहीं देते, जैसे इससे अंबेडकरवाद दूषित हो जाएगा। लेकिन दलित-साहित्य की विरासत और विस्तार को समुचित महत्त्व दिए बिना उसका प्रासंगिक सौंदर्यशास्त्र नहीं निर्मित किया जा सकता। वाल्मीकि जी के डॉ. अंबेडकर अपने में बंद हैं – वे आत्मालाप करते दिखते हैं, संलाप नहीं। ना वे बुद्ध से संवाद कर पाते हैं, ना फुले से और ना ही मार्क्स से।

डॉ. अंबेडकर ने मार्क्स के विचारों के अध्ययन-मनन के अभाव में उनके बारे में कई असंगत स्थापनाएँ प्रस्तुत की हैं। वाल्मीकि जी ने इस संबंध में अलग दृष्टि अपनाई है। वे बुद्ध, मार्क्स और अंबेडकर तीनों को शोषण के विरुद्ध मुक्ति का मार्ग तैयार करने वाला कहते हैं। उनके अनुसार भारत के साम्यवादी नेतृत्त्व और मार्क्सवादी विचारकों ने वर्ग और वर्ण को एक ही मान लिया, इसमें उनके ‘संस्कारों’ या उत्पीड़क-अनुभवों का प्रमुख योगदान रहा, जिससे दलित-मुक्ति के संबंध में उनकी दोहरी मानसिकता का निर्माण हुआ। यहाँ यह ध्यान रखना चाहिए कि वर्ग और वर्ण में भेद होते हुए भी दोनों अंतर्ग्रथित हैं और वाल्मीकि जी दोनों को पूर्णतः अलग मानते दिखते हैं। वे वर्ण-आधारित विश्लेषण को ही सही मानते लगते हैं, और जो कोई वर्ग की बात करता है, उसे वे वर्ण को समझने में असमर्थ बताने लगते हैं। उनका कहना गलत नहीं कि साम्यवादी नेतृत्त्व और मार्क्सवादी विचारकों का उच्च-वर्ग दलित-उत्पीड़न की तीव्रता को समझ नहीं पाया। ऐसे मार्क्सवादियों को वे मार्क्सवाद का मुखौटा लगाए ब्राह्मणवादी कहते हैं। निश्चित ही, ऐसे नेताओं और बौद्धिकों ने मार्क्स के विचारों को भोंथरा ही अधिक किया। मार्क्स के विचारों से प्रेरित लेकिन गंभीर स्व-परिवर्तन में असमर्थ व्यक्तियों के कारण यह विडंबनात्मक स्थिति पैदा हुई। मार्क्सवादियों में कथनी-करनी का अंतर पैदा होने लगा। इससे उत्पन्न अंतर्विरोधों ने साम्यवादी आंदोलन में विखंडन की प्रक्रिया प्रारम्भ की, जो अब तक चल रही है। पर विखंडन की इस प्रक्रिया में भारत के साम्यवादी नेतृत्त्व और मार्क्सवादी विचारकों में ऐसे व्यक्तित्त्व आसानी से खोजे जा सकते हैं, जिन्होंने निम्न-वर्ग और उत्पीड़ित वर्ग के लिए सैद्धान्तिक हथियारों का ही निर्माण नहीं किया बल्कि हथियारों से सिद्धान्त भी रचे। मार्क्सवाद अकादमियों और विश्व-विद्यालयों में पलने वाला वाद नहीं है, वह सम्पूर्ण विश्व के निम्न-वर्ग की मुक्ति की इच्छा की तीव्रता और विद्रोह का सिद्धान्त है। वाल्मीकि जी मार्क्स के विचारों पर चर्चा नहीं करते, लेकिन उन्हें भी अपने देवताओं में जगह दे देते हैं। मार्क्स के विचारों को जाने-समझे बिना ही उनका त्याग या स्वीकार दोनों ही का कोई अर्थ नहीं। वे भी प्रकारांतर से वही काम करते दिखते हैं, जो डॉ. अंबेडकर ने किया था, हालाँकि उनका प्रश्न जायज़ है – ‘शोषणविहीन समाज की परिकल्पना को साकार करने के लिए मार्क्सवादी विचारक ‘वर्ग’ के साथ ‘वर्ण’ को अपनी लड़ाई का लक्ष्य बनाने में ढुलमुल क्यों हैं?’[10]

लेकिन इस प्रश्न को उलटकर भी पूछा जा सकता है कि शोषणविहीन समाज की परिकल्पना को साकार करने के लिए अंबेडकरवादी विचारक ‘वर्ण’ के साथ ‘वर्ग’ को अपनी लड़ाई का लक्ष्य बनाने में ढुलमुल क्यों हैं? या वे वर्ग-विहीन समाज के लिए छिड़ी हुई लड़ाई में सचेत-सक्रिय सहयोग कर रहे हैं? कहीं वे भी दोहरी मानसिकता का शिकार तो नहीं!

सामाजिक-यथार्थ और समूहगत अनुभव का संतुलन दलित-साहित्य के समीक्षाशास्त्र का प्रमुख प्रतिमान है, पर वाल्मीकि जी ने इस पर ठीक से ध्यान नहीं दिया। उनका अनुभव पर इतना ज़ोर है कि सामाजिक-यथार्थ फिसलता जाता है। समूहगत या जाति/समुदायगत अनुभव सामाजिक-यथार्थ का एक खंड है, निश्चित ही, पूर्ण यथार्थ उसके बिना संभव नहीं, लेकिन वह पूर्ण यथार्थ भी नहीं। हमे कहना होगा कि सामाजिक यथार्थ पूरे समाज का यथार्थ है और दलित-साहित्य में वर्णित यथार्थ प्रायः समूह-विशेष का यथार्थ है। दलित-साहित्य में प्रायः समाज के अनुभव नहीं, व्यक्ति के अनुभव प्रस्तुत किए गए हैं। पूर्ण नहीं आंशिक सत्य पर ज़ोर दिया गया है। आश्चर्य नहीं, नव-उदारवादी नीतियों, उपभोक्तावादी-सभ्यता, फासीवादी राजनीति और प्रकृति के विनाश के प्रति अंबेडकरवादी आंदोलन की तरह ही दलित-साहित्य प्रायः उदासीन है। जबकि नई स्थितियाँ अंबेडकरवाद को चुनौती देती खड़ी हैं, इन चुनौतियों के प्रति भय या उपेक्षा का भाव रखना दलित-साहित्य और समीक्षा के लिए भी घातक सिद्ध होगा।

जो समीक्षक डॉ. अंबेडकर के संघर्ष और समीक्षा से प्रेरणा लेते हैं, उन्हें नया भगवान बनाकर दलितों की मुक्ति का स्वप्न देख रहे हैं, तो वे उसी जाल में फँस रहे हैं, जिसमें बुद्ध, सरह, कबीर आदि के अनुसरणकर्ता फँसे थे। भारत का इतिहास साक्षी है कि नया ईश्वर, नया धर्म, नया पुराण, नए भजन रचकर जाति-भेद को समाप्त नहीं किया जा सकता। अनुसूचित-जाति में विश्लेषण-संश्लेषण और योजना-निर्माण की क्षमता का विकास किए बिना अनुसूचित-जाति की मुक्ति संभव नहीं और साथ ही भारत की समाज-व्यवस्था में बदलाव संभव नहीं। दलितों के वैज्ञानिक जागरण के बिना दलित-साहित्य का सौंदर्यशास्त्र भी अधूरा ही रहेगा।

लोकायत से लेकर अंबेडकरवाद तक निम्न-वर्ग और उत्पीड़ित-वर्ग की मुक्ति के कई भारतीय-मार्ग रहे हैं, पर सभी ईश्वरवाद, धर्मवाद, पुराणवाद द्वारा ढँक दिए गए। अगर आज भी उत्पीड़ित-वर्ग इन चोंचलों को नहीं समझ पा रहा है, तो इसमें मुख्य रूप से उनके नाम पर राजनीति करने वाले संगठनों और नेतृत्त्व का दोष है। क्रांतिकारी शिक्षा के अभाव में निम्न-वर्ग और उत्पीड़ित-वर्ग के व्यक्ति सामाजिक-यथार्थ की आंशिक व्याख्या में ही सफल हो पाते हैं। यह व्याख्या प्रायः निज-अनुभव और मुख्य-धारा के प्रभाव में विकसित होती है। सामाजिक-यथार्थ की पूर्णता उनके समक्ष प्रकट नहीं हो पाती, और मुक्ति की उनकी खोज प्रायः नए ईश्वर के निर्माण में समाप्त होती है। नेता देवता की तरह हो जाते हैं, भक्त उनका यशोगान करते हैं – निम्न और उत्पीड़ित वर्ग आधुनिक स्थितियों की चमत्कारी दुनिया बना लेता है – मुक्ति का आधुनिक धार्मिक मार्ग, लेकिन न उत्पीड़न रुकता है न अपमान। विचार भोंथरे निकलते हैं, नेता बुज़दिल। उत्पीड़ित-वर्ग का न भौतिक विकास हो पाता है न आत्मिक। आने वाली पीढ़ी देखती है – नया ईश्वर, नए देवता, नया धर्म – लेकिन आत्मविश्वास और साहस का अभाव, समुचित शिक्षा और आनंद का अभाव। विडम्बना और निराशा का एकछत्र राज। कवि रोष प्रकट करता है –

मगर / अब तक तो / यही दिखाई दिया है / कि हमारे संगठनों के / लगभग सारे रहनुमा / वैचारिकता से / नपुंसक हैं / साहस से खाली हैं / इच्छा शक्ति से / बंजर और बाँझ हैं / और / अपने ही / कीचड़ में लथपथ रहकर / अचंभों में / मरने वाले / आत्मघाती जानवर हैं।[11]

मार्क्सवादी हों या अंबेडकरवादी, इस बात को समझा जाना चाहिए कि जिस तरह कर्मरहित चिंतन व्यर्थ है, उसी तरह चिंतनरहित कर्म भी व्यर्थ है। मीडिया और प्रबंधन उत्पीड़ितों को सोचने-समझने से रोकने का ही काम करते आए हैं। शोषक और शोषितों के, उत्पीड़क और उत्पीड़ितों के सदियों के संघर्ष से यह अनिवार्य सीख मिलती है कि शोषितों-उत्पीड़ितों के स्वयंबुद्ध हुए बिना किसी भी सामाजिक-व्यवस्था में कोई भी वास्तविक बदलाव असंभव है। संपूर्ण-निम्न-वर्ग की मुक्ति के बिना किसी क्षेत्र या सामाजिक-वर्ग की मुक्ति भी संभव नहीं। भावुक-श्रद्धा नहीं, क्रांतिकारी शिक्षा ही यह काम कर सकती है।

आत्मकथा दलित-साहित्य की विशेष विधा है। ओमप्रकाश वाल्मीकि ने स्वयं भी आत्मकथा लिखी है और अपने सौंदर्यशास्त्र में भी दलित-साहित्य में आत्मकथा के विशेष महत्त्व को स्वीकार किया है। दलित-आत्मकथा दलित-अनुभव का प्रामाणिक दस्तावेज़ सामाजिक यथार्थ की सापेक्षिकता में ही है, उससे अलग वह अस्तित्त्व में भी नहीं आ सकती थी, और उसकी समीक्षा भी सामाजिक यथार्थ के पक्ष के संतुलन में ही हो सकती है। सामाजिक यथार्थ अनुभव को जन्म देता है, न कि इसका उलट। ओमप्रकाश वाल्मीकि सामाजिक यथार्थ की उपेक्षा पर एक पक्षीय (अंबेडकरवादी) अनुभव के साहित्य के रूप में दलित-साहित्य को स्थापित करते हैं, लेकिन उनकी आत्मकथा, कविताएं और कहानियाँ इस स्थापना का विरोध आप हैं।

समाज और व्यक्ति की पारस्परिकता में अनुभव निर्मित होते हैं, वाल्मीकि जी का सौंदर्यशास्त्र इस मूलभूत बात की उपेक्षा कर अनुभव के स्वामित्व को ही महत्त्वपूर्ण मानता है। फिर अनुभव के स्वामित्व की विविधता भी वे स्वीकार नहीं कर पाते, अंबेडकरवादी अनुभव ही उनके लिए दलित-अनुभव है। निश्चित ही, दलित-अनुभव सामाजिक यथार्थ में एक दलित-व्यक्ति के हस्तक्षेप को प्रस्तुत करता है और दलित-साहित्य दलित-अनुभव के सत्य का प्रकाशन करता है, लेकिन वाल्मीकि जी के अनुभव क्या कौशल्या बैसंत्री के अनुभवों से सादृश्यता दिखलाते हुए भी अलग नहीं हैं? वाल्मीकि जी दलित-आत्मकथाओं के अंतर्संबंधों की भी उपेक्षा करते हैं। आज दलित-साहित्य के विस्तार के साथ हिन्दी में दलित-आत्मकथाओं में भी शुभवृद्धि हुई है, तब भी अभी वह बहुत कम है। आत्मकथा आमतौर पर बुढ़ापे में लिखी जाती है और दलित-साहित्य अभी मुख्यतः युवाओं के हाथ में है। अभी हज़ारों दलित-आत्मकथाओं की भूमिका बन रही है। इन भविष्य की आत्मकथाओं की संगति में इन प्रारम्भिक आत्मकथाओं को और बेहतर समझा जा सकेगा। दलित-आत्मकथाओं और स्व-कथनों ने भारत के निम्न-वर्ग के दलित-अनुभवों को दर्ज कर अभूतपूर्व कार्य किया है। स्व-कथा नहीं, तो स्व-कथन के माध्यम से ही, लेकिन अन्य उत्पीड़ित वर्गों को भी इस कार्य में सहयोग के लिए आगे आना चाहिए। भारत के अन्य उत्पीड़ित-वर्गों के लिए दलित-साहित्य प्रेरणा और बहस का स्रोत है।

कुछ समीक्षक डॉ. अंबेडकर को पूंजीवाद और ब्राह्मणवाद के विरोधी के रूप में प्रस्तुत करने पर ज़ोर देते हैं, जबकि डॉ. अंबेडकर की चिंता और चिंतन का मुख्य विषय पूंजीवाद-विरोध नहीं रहा। अंबेडकरवादी आंदोलन भी पूंजीवाद का सचेत-सक्रिय विरोधी नहीं है। अगर हम डॉ. अंबेडकर के जीवन और विचारों का भावुक-श्रद्धापूर्ण अनुशीलन भर न करें और अंबेडकरवादी आंदोलनों के ज़मीनी कार्यों को देखें, तो हमें ज्ञात होगा कि भारत में ब्राह्मणवाद-विरोधी चेतना के निर्माण में जितना सहयोग डॉ. अंबेडकर और अंबेडकरवाद का है, उतना किसी वामपंथी-संगठन का नहीं, साथ ही यह भी कि पूंजीवाद-विरोधी चेतना के निर्माण में डॉ. अंबेडकर के विचारों और अंबेडकरवादी-संगठनों का सहयोग न के बराबर है। पूंजीवाद और ब्राह्मणवाद  के संयोजित रूप का विरोध अंबेडकरवादी और मार्क्सवादी आंदोलन की नई दिशा है। ऐसे प्रयास अभी अपने प्रारम्भिक दौर में हैं।

भारत का पूंजीवाद विशिष्ट है, वह विभिन्न जातियों-जनजातियों-समुदायों से निर्मित, एक बहुराष्ट्रीय सामाजिक-संरचना में कार्यरत है। भारत में पूंजीवाद उपनिवेशी-शक्तियों, स्थानीय भू-स्वामियों और व्यापारियों के संयोग से निर्मित हुआ है। उच्च-वर्ग की सहभागिता के बिना उपनिवेश का निर्माण असंभव था। यहाँ यह नहीं भूलना चाहिए कि वर्तमान भारत का एक बड़ा भाग कभी सीधे उपनिवेश के अंतर्गत नहीं रहा। भारत का समाज उत्तर-उपनिवेशी-काल में भी पारंपरिक उच्च-वर्ग के नियंत्रण में ही विकसित होता रहा है। पारंपरिक बौद्धिक ही उत्तर-उपनिवेशी भारत में शासक-वर्ग के रूप में उभरे। यह वर्ग ही पूंजीवाद का लाभ लेने में सक्षम था और है, वह अपने रहते उत्पीड़ित-वर्गों को स्वतन्त्रता या लोकतन्त्र का लाभ नहीं लेने देगा, इसी कारण उत्पीड़ित-वर्गों की मुक्ति पूंजीवाद के नाश से सीधे सम्बद्ध  है। भारत के पारंपरिक उच्च-वर्ग के आचार-विचार ही मुख्य-धारा के आचार-विचार हैं। वर्तमान भारत की समाज-व्यवस्था भी इन्हीं पारंपरिक उत्पीड़क-वर्ग के पूँजीपतियों के अधीन है। भारत में पूंजीवाद, फूले से लेकर अंबेडकर के समय तक, वह भी सीमित अर्थों में, दलितों के लिए उपहार था। लेकिन पूंजीवाद के अपने हित थे, जो दलितों के हित के विपरीत थे और हैं, इसी कारण भारत में विकसित पूंजीवादी-साम्राज्यवादी-संसदीय-प्रणाली अनुसूचित-जाति के लिए सुविधा नहीं दुविधा बनती गई। संविधान भारत के निम्न-वर्ग और उच्च-वर्ग के बीच एक ऐसे समझौते के रूप में उभरा, जिसे बोटी देकर बकरा लेना कहा जा सकता है। डॉ. अंबेडकर ने इस स्थिति के संबंध में अपने विचारों को १९५५ में बी.बी.सी. को दिए एक साक्षात्कार में रखा है। वे कहते हैं कि हमारे देश में एक ऐसी सामाजिक संरचना है, जो संसदीय प्रणाली के साथ पूरी तरह असंगत है।[12] उनके अनुसार भारत की आज़ादी के बाद विकसित हो रहा लोकतन्त्र ‘अछूतों’ की मुक्ति में विशेष सहयोगी नहीं हो पाएगा। वे संसदीय-चुनावों में जीत-हार, भाषण और लोकतन्त्र के भरोसे बैठे रहने की बजाय, दलित-मुक्ति के लिए ठोस कार्यक्रम/योजना और संस्थाओं/संगठनों के निर्माण की वकालत करते हैं।

भारत भर के शोषण-उत्पीड़न-विरोधी आंदोलनों का संयोजन और निम्न-वर्ग की एकजुटता इतनी आसान नहीं। भारत के निम्न-वर्ग के खाते में निरंतर विजय दर्ज करते जाने वाली विचारधारा, आंदोलन और नेतृत्त्व अभी तक विकसित नहीं हो सका है। मिज़ोरम और राजस्थान की, कश्मीर और केरल की सामाजिक-व्यवस्था और निम्न-वर्ग की चेतना और संगठन का स्तर एक-से नहीं है, यद्यपि पूरे भारत में शोषण-उत्पीड़न का कारोबार जारी है, पूंजीवाद हावी है। निम्न-वर्ग के पास विचारधारा के नाम पर देसी कट्टे हैं, और शत्रु एके-47 लिए खड़ा है।

हिन्दी-दलित-साहित्य और अंबेडकरवाद नाभिनालबद्ध हैं, लेकिन अंबेडकरवादी आंदोलन की सीमा को दलित-साहित्य की सीमा नहीं माना जा सकता। डॉ. अंबेडकर के विचारों को सभी दलित-साहित्यिकों पर भी नहीं थोपा जा सकता। आज डॉ. अंबेडकर के विचारों और अंबेडकरवादी आंदोलनों को पूर्णता में परखने की ज़रूरत है, साथ ही बुद्ध या कबीर या फुले या पेरियार या अयंकाली के कार्यों-विचारों को डॉ. अंबेडकर के मातहत करने से बचने की भी। दलित-साहित्य का सौंदर्यशास्त्र भौतिक इतिहास के नकार और सामाजिक यथार्थ की उपेक्षा पर नहीं तैयार हो सकता।

बुद्धवाद हो, मार्क्सवाद हो या अंबेडकरवाद, जो निम्न-वर्ग और उत्पीड़ित-वर्ग को बौद्धिक और आत्मिक रूप से नेताओं और विचारकों पर आश्रित रखना चाहता है, वह उनका हितैषी नहीं हो सकता। दलित-आत्मकथाएँ भारत में क्रांतिकारी शिक्षा की आधार पाठ्य-वस्तु है। दलित-साहित्य – विशेषकर आत्मकथा – और समीक्षा ने मेरे सामने जिस दुनिया को खोल दिया है, वह भूख, पीड़ा, रोष, आशा और बहस की दुनिया है। यह दुनिया चीख-चीख कर कह रही है – हमें न नए पवित्र (ब्राह्मण) चाहिए, न नए ‘अछूत’ (दलित), हमें न नए पूंजीपति चाहिए, न नए मज़दूर, हमें ख़ुशी और सम्मान का जीवन चाहिए, हम शोषण, उत्पीड़न और अपमान की समाज-व्यवस्था का विनाश करके ही दम लेंगे – ‘हमारी दासता का सफर / तुम्हारे जन्म से शुरू होता है / और इसका अंत भी / तुम्हारे अंत के साथ होगा।‘[13]

usman khanउस्मान ख़ान समकालीन हिंदी साहित्य के अलहदा युवा कवि-कथाकार-आलोचक हैंचर्चाओं और पुरस्कारों की भीड़ से अलहदा… छपाऊ मानसिकता से भी अलहदा... जे.एन.यूके हिंदी विभाग से मालवा के लोकसाहित्य पर पीएचडीइनसे usmanjnu@gmail.com पर संपर्क कर सकते हैं.

 

सन्दर्भ: 

[1]  संदर्भ-सूची में आवश्यक संदर्भ ही दिए गए हैं, जबकि विचार कई संदर्भों से लिए गए हैं।

[2]  पूरी ग़ज़ल इस लिंक पर पढ़ें – https://www.rekhta.org/ghazals/fariyaad-kii-koii-lai-nahiin-hai-mirza-ghalib-ghazals?lang=hi

[3]  अधिक जानकारी के लिए देखें – रंगनायकम्मा, ‘जाति’ प्रश्न के समाधान के लिए बुद्ध काफ़ी नहीं, अंबेडकर भी काफ़ी नहीं, मार्क्स ज़रूरी है, राहुल फाउंडेशन, २००८

[4]  जॉन ड्यूई, आर्ट एज़ एक्सपेरियंस, द बर्कले पब्लिशिंग ग्रुप, पेंग्विन ग्रुप, २००५

[5]  ओमप्रकाश वाल्मीकि, दलित साहित्य का सौंदर्यशास्त्र, राधाकृष्ण प्रकाशन, २०१४, पृ.-५०

[6]   पूरी कविता इस लिंक पर पढ़ें – https://aavazdo.wordpress.com/2017/10/01/ये-दलितो-की-बस्ती-है/

[7]  डॉ. भीमराव अंबेडकर, अछूत कौन और कैसे, अनुवादक – भदंत आनंद कौसल्यायन, गौतम बूक डिपो, प्रथम प्रकाशन, १९४९, पृ.-८८। ‘सौंदर्यशास्त्र’ में पुस्तक का नाम ‘शूद्र कौन और कैसे?’ छपा है।

[8]   ओमप्रकाश वाल्मीकि, उपरोक्त, पृ.-५०

[9]   ओमप्रकाश वाल्मीकि, उपरोक्त, पृ.-५३

[10]  ओमप्रकाश वाल्मीकि, उपरोक्त, पृ.-९७

[11]  बजरंग बिहारी तिवारी, दलित साहित्य : एक अंतर्यात्रा, नवारुण प्रकाशन, २०१५, पृ.-५८ से उद्धृत। निश्चित ही, ‘नपुंसक’ और ‘बांझ’ जैसे शब्द खलते हैं, लेकिन आशय स्पष्ट है।

[12]   पूरा साक्षात्कार इस लिंक पर देख-सुन सकते हैं – https://www.youtube.com/watch?v=4RcGJtl2nhE

[13]  बजरंग बिहारी तिवारी, उपरोक्त, पृ.-७३ से उद्धृत

दलित विमर्श: सिर्फ अपनी मुक्ति की सोच से उत्पीडि़त समाजों-समुदायों की मुक्ति नहीं हो सकती: वीर भारत तलवार

प्रोफेसर वीर भारत तलवार, हिन्दी के उन चंद आलोचकों में अग्रगण्य हैं, जो सामाजिक-सांस्कृतिक सरोकारों से एक जेनुइन जुड़ाव रखते हैं। हिन्दी की जोड़-तोड़ और छद्म-पूजनपंथी संस्कृति से दूर यह आलोचक आज लोगों के लिए आकर्षण का कारण इसीलिए भी बना है कि दिल्ली में समूहिक बलात्कार की घटनाओं ने इस आलोचक को इतना विचलित कर दिया है कि  वे इधर लगातार अस्मिता-प्रश्नों पर नए सिरे से विचार कर रहे हैं। हिन्दी में जो तीन मूल अस्मिता-विमर्श चलते हैं- दलित-स्त्री-आदिवासी विमर्श, उस पर उन्होंने विस्तार से विचार किया है। हमारी योजना है कि उन तीनों विमर्शों को धारावाहिक रूप में आपके समक्ष प्रस्तुत करूँ।

By वीर भारत तलवार
हमारे देश में इस समय ये जो तीन विमर्श चल रहे हैं। इनमें सबसे जो कारगर और प्रभावशाली विमर्श है, वह तो दलित विमर्श ही है। वो सचमुच एक ऐसा विमर्श है जिसकी एक वास्तविक सत्ता बन चुकी है। और इस विमर्श का महत्व भी बहुत है। इस विमर्श ने हमारे देश में, समाज में एक ऐसे सवाल को खड़ा किया जिस सवाल को लेकर बड़े-बड़े महात्मा आज तक आते रहे और अपनी सारी सदाशयता और अपनी इच्छाओं के बावजूद कुछ नहीं कर सके। वो है जाति का सवाल। जाति का सवाल जिसको लोहिया जी कहते थे कि कोढ़ है इस समाज का, एक ऐसी निराधार अवधारणा है जिसका कोई आधार नहीं है, कोई विवेक सम्मत तर्क नहीं है जिसके पीछे। एक अहंकारपूर्ण मिथ्या चेतना है वो। लेकिन उस चेतना से प्रेरित होकर करोड़ों लोग अपना जीवन जीते हैं, उसमें आस्था रखते हुए। और उस आस्था से प्रेरित होकर दूसरों की जान ले लेते हैं, हत्या करते हैं, हिंसा करते हैं। ऐसी निराधार विवेकहीन अहंकारपूर्ण मान्यता पर पहली बार कारगर ढंग से इस देश में सवाल खड़ा किया दलित विमर्श ने, जिसका श्रेय है बाबा साहब डॉक्टर अंबेडकर को। और ज्योतिबा फुले और सावित्री बाई को। ज्योतिबा फुले का साथ सावित्री बाई का नाम मैं साथ-साथ लेना चाहता हूं, क्योंकि उन्होंने जो कुछ किया, एक साथ मिलके किया। वो सिर्फ ज्योति बा फुले का ही योगदान नहीं था, उसमें सावित्रीबाई का योगदान शामिल है। इसलिए उसे स्वीकार करना चाहिए, जैसे आप मार्क्स-ऐंगल्स बोलते हैं, ऐसे ही ज्योतिबा फुले और सावित्री बाई जो हिंदुस्तान के मेरी नजर में पहले आधुनिक स्त्री-पुरुष थे। उनके संबंध स्त्री-पुरुषों के दृष्टिकोण से एक आदर्श संबंध थे। और जब हम स्त्री-पुरुष के आधुनिक संबंधों के बारे में विचार करते हैं तो हम ज्योति बा फुले और सावित्री बाई की मिसाल सामने रख सकते हैं।

courtesy- google image

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तो दलित विमर्श ने सबसे महत्वपूर्ण काम किया कि इस देश में जाति के सवाल को इस तरह से खड़ा कर दिया कि उसे कोई भी नजरअंदाज नहीं कर सकता। उससे आंखें नहीं चुरा सकते, उसका जवाब दिए बिना आप आगे नहीं बढ़ सकते। ये बहुत असाधारण बात हुई है। युगांतरकारी बात हुई है। ये दलित जाति का सवाल जो है, आज हमारे देश में देशज आधुनिकता की कसौटी बन चुका है। मॉडर्न आदमी, आधुनिक व्यक्ति कौन है, कल तक हमारे पास इसकी कोई कसौटी नहीं थी, हम पश्चिम की मुताबिक ढलने को ही मॉडेरनिटी समझते थे। लेकिन आज इस देश में एक कसौटी है हमारे पास, जाति प्रथा में विश्वास करते हुए कोई आधुनिक नहीं हो सकता। आप चाहे बाकी कितनी बातें करें, बहुत महीन काटते रहिए आप, लेकिन अगर आप जाति में विश्वास करते हैं, तो आपका सारा पिछड़ापन, आपकी सारी जहालत सामने आ जाएगी। तो ये हमारी देशज आधुनिकता की सबसे बड़ी कसौटी आज बन चुकी है, जिसने जाति प्रथा को निस्सार घोषित कर दिया है। जाति प्रथा खत्म हो चुकी है, ऐसा नहीं है। लेकिन उसी रास्ते पर है वो। और इस दलित विमर्श का बहुत बड़ा योगदान है हिंदी समाज में। और इसके साथ ही दलित विमर्श ने एक और काम किया और उसका भी श्रेय डॉ. अंबेडकर को है, धर्म की आलोचना। जिस धर्म की आलोचना करने वाले कल तक नास्तिक कहलाते थे, और वेदों में सबसे बड़ा पाप नास्तिकता है। और आर्य समाज के इतने बड़े सुधारक थे, दयानंद सरस्वती, जातिप्रथा के भी खिलाफ थे, लेकिन वे भी नास्तिक व्यक्ति को देशनिकाला देने की बात कहते थे। तो जिस देश में धर्म की आस्था पर सवाल करना मुश्किल था, वहां उस देश में धर्म की इतनी विस्तार से आलोचना डॉ.अंबेडकर ने की, जिसको लेकर दलित विमर्श जो हैं, आगे बढ़ा है। ये एक दूसरी विडंबना है कि डॉ. अंबेडकर की विचारधारा के लोगों पर प्रभाव के बावजूद अधिकांश दलित समाज अभी अंधविश्वासों में जी रहा है और धर्म की बहुत सारी कुरितियों में फंसा हुआ है। लेकिन उससे लड़ने का रास्ता भी इसी दलित विमर्श के भीतर है, डॉ. अंबेडकर की विचारधारा के अंदर है। इसके अलावा साहित्य में जो दलित विमर्श हिंदी में हुआ है, मैं दूसरी भाषाओं के विमर्शों के बारे में इतना नहीं जानता हूं। सिर्फ सूचनाएं हैं, वो भी हमारे बजरंग बिहारी तिवारी जी जो इतना अच्छा काम कर रहे हैं, पूरे हिंदुस्तान के विभिन्न प्रदेशों के दलित विमर्श का एक तुलनात्मक अध्ययन वो कर रहे हैं जो हिंदुस्तान में किसी बहुत बड़ी संस्था का काम है। वो अकेले दम पर कर रहे हैं। तो उनके लेखों को जरूर पढ़ना चाहिए उससे कई महत्वपूर्ण उपयोगी जानकारी मिलती है।
तो ये जो दलित साहित्य ने हिंदी में एक और काम किया कि जो हमारी साहित्यिक परंपरा थी, जो कि मुख्य रूप से द्विज आलोचकों की ही बनाई हुई थी। द्विज आलोचकों का उसमें होना बहुत स्वाभाविक है, इसलिए कि इस देश में शिक्षा पर उन्हीं का अधिकार था, जाहिर है कि साहित्य हो, विज्ञान हो, जो भी हो, वो चाहे मार्क्सवाद  और कम्युनिज्म ही क्यों न हो, उसमें द्विज लोग ही सबसे पहले आगे रहते, ये एक स्वाभाविक सी बात थी। तो वो जो परंपरा है जिस पर उनके द्विज संस्कार भी बहुत हावी हैं, उनके द्विज पूर्वाग्रह भी बहुत हावी हैं, और हिंदी साहित्य के बहुत सारी विद्यार्थी इन बातों को जानते हैं, उस परंपरा पर, उस इतिहास पर, उसमें जो मूल्यांकन का क्रम है, उसमें जो जगहें तय हैं साहित्यकारों की, कवियों की, लेखकों की, उस पर दलित साहित्य ने सर्वाधिक सवाल खड़े किए। और ये सवाल किसी हिंदी के आलोचक की तरह से नहीं खड़े किए। उन्होंने  ऐसी भाषा में खड़े किए कि लोग तिलमिला उठे और उसका जवाब देते हुए बना नहीं, तो खीज गए लोग और उनको लगा कि ये तो गाली गलौज की भाषा बोल रहे हैं। मैं ये नहीं कहता कि सारी की सारी आलोचना उनकी वाजिब है और मान ली जानी चाहिए, लेकिन उन्होंने ये सवाल बड़े कारगर तरीके से खड़े किए और हिंदी साहित्य में पहली बार एक खलबली मच गई। जो काम मार्क्सवादी आलोचकों को करना चाहिए था और जिसमें वो चूक गए थे, ऐसे बहुत से सार्थक सवालों को दलित आलोचकों ने, साहित्यकारों ने हिंदी में खड़ा किया। चाहे कबीर को लेके हो, हजारी प्रसाद द्विवेदी को लेके हो, तुलसीदास को, प्रेमचंद को, निराला को, बहुत सी निरर्थक भी बात हो सकती है, लेकिन बहुत से सार्थक सवाल भी उन्होंने खड़े किए और अब आप उससे आंख नहीं चुरा सकते हैं। दलित विमर्श के कारण आज हिंदी में दलित लेखकों की एक स्थिति बनी है जो पहले नहीं थी। दलित लेखकों के किसी हद तक संगठन बने हैं। और किसी हद तक वे एक आवाज बने हैं, जिसको सुना जाता है, जिसको सुनना पड़ता है। दलित विमर्श का हिंदी में बहुत बड़ा योगदान है। इस दलित विमर्श की सफलता तो आप इससे देखिए, कि आज दलित साहित्य को कितना बड़ा बाजार उपलब्ध है, उसके प्रकाशक को, उसके साहित्य को, जो किसी और साहित्य को उपलब्ध नहीं है। दलित लेखकों को छापने के लिए बड़े-बड़े प्रकाशक बड़ी तत्परता से तैयार हो जाते हैं। और उनकी किताबें बाजार में खूब बिकती हैं, कई-कई संस्करण निकल जाते हैं। ये हिंदी में दलित विमर्श की एक सफलता है। दूसरे प्रदेशों के दलित विमर्श की तुलना में हिंदी का दलित विमर्श कैसा है, बहुत सारी बातें नहीं कह सकता मैं। लेकिन जो थोड़ी बहुत सूचनाएं मिली हैं, तमिल, तेलगु, मराठी वगैरह को देखते हुए, तो उससे तो यही लगता है कि हिंदी में उनकी तुलना में दलित साहित्य अभी भी सीमित दायरे में है। और उसका एक उदाहरण यही है कि आज भी हिंदी में यही सवाल दलित विमर्श में महत्वपूर्ण बना हुआ है कि दलित साहित्य कौन लिख सकता है? वो सिर्फ दलित ही लिख सकते हैं या गैरदलित भी लिख सकते हैं। मैं भी एक समय में इसका बड़ा समर्थक रहा कि दलित ही दलित साहित्य लिख सकता है, पर मुझे अब इसमें शंका होती है। मैं समझता हूं कि किसको हम दलित साहित्य कहेंगे, उसका एक आब्जेक्टिव कैरिटेरिया होना चाहिए। न कि आप जाति का पता लगाकर ये पता लगाएंगे कि वो दलित साहित्य है या नहीं। दलित साहित्य किसे माना जाए और किसे नहीं माना जाए, इसकी कुछ वस्तुगत कसौटियां बननी चाहिए। इसके कुछ मापदंड निर्धारित होने चाहिए। और उन्हीं के आधार पर ये तय होना चाहिए कि ये दलित साहित्य है, इस प्रकार के सैद्धांतिकरण में कोई दिलचस्पी दलित लेखक नहीं रखते हैं। इसका कारण क्या है? बहुत से कारण हो सकते हैं। उसमें से एक कारण दलित साहित्य के अपने बाजार को सुरक्षित रखना भी हो सकता है। पर वो एक कारण हो सकता है। दूसरे कारण तो विचारधारात्मक ही हो सकते हैं। लेकिन इस सवाल पर सोचने की जरूरत है। और यही कारण है कि दलित साहित्य के मूल्यांकन के लिए दलित लेखक पूरी तरह से गैर-दलित द्विज आलोचकों की ओर देखते हैं। वो इसी की वजह से है। दलित साहित्य में उपन्यास लिखे जा रहे हैं, कविताएं, कहानियां लिखी जा रही हैं, पर आलोचना का, खासकर दलित साहित्य की आलोचना का उस प्रकार से विकास नहीं हो रहा है। उसके लिए वो फिर उन्हीं लोगों को देखते हैं, जिनसे वो बहुत सहमत नहीं है या जिनको विरोधी समझते हैं। इसका कारण यही है क्योंकि हमारे पास दलित साहित्य को निर्धारित करने वाले मापदंड नहीं हैं। दलित साहित्य का सौंदर्य किस बात में है, उसकी भाषा की ताकत किस बात में है, एक दलित साहित्य की रचना में किस तत्व पर जोर दिया जाना चाहिए? ये सारे सवाल आज के दलित साहित्यकारों की चिंता के विषय नहीं बने हैं। और इसीलिए दलित साहित्य में आलोचना का कोई विकास नहीं हुआ है। जो गैरदलित लेखक हैं, वे दलित साहित्य नहीं लिख सकते हैं। इसलिए नहीं लिख सकते हैं, क्योंकि उनके अनुभवों की एक सीमा है।उन्हें दलित जीवन का वो अनुभव नहीं है। वे सहानुभूति रख सकते हैं, सहानुभूति के साथ साहित्य लिख सकते हैं। ये बात तो दलित लेखक के साथ भी लागू हो सकती है कि अगर वो ऐसे विषय पर लिखना चाहे, युद्ध के विषय पर, और वो स्वयं युद्ध में कभी न गया हो, तो यह उस पर भी लागू होती है। लेकिन देखना यह चाहिए कि जो व्यक्ति उन अनुभवों को हासिल करता है और करने के बाद लिखता है। मुल्कराज आनंद ने ‘अछूत’ उपन्यास लिखा है, बहुत महत्वपूर्ण उपन्यास है। हिंदी में एक लेखक है- मदन दीक्षित, मोरी की ईंट उनका बहुत ही महत्वपूर्ण उपन्यास है, सफाई कर्मचारियों के समाज पर लिखा गया, उतना अच्छा दूसरा कोई उपन्यास नहीं मिलेगा आपको। इतने भीतर के अनुभवों को हासिल करके उन्होंने ये लिखा, लेकिन चूंकि दलित साहित्य की कोई वस्तुगत कसौटी निर्धारित नहीं है, इसलिए उस उपन्यास पर चुप्पी साध ली जाती है, उसके महत्व को स्वीकार नहीं किया जाता, उस पर चुप हो जाते हैं लोग।

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दलित विमर्श की जो सीमाएं हिंदी में दिखाई देती हैं उसमें एक बड़ा महत्वपूर्ण सवाल है कि देश की जो बाकी परिस्थितियां हैं, जो परिवर्तन हो रहे हैं देश में, जो आंदोलन हो रहे हैं देश में, उनके बारे में दलित विमर्श का क्या दृष्टिकोण है? इराक युद्ध है, अफगानिस्तान युद्ध है, भूमंडलीकरण है, बाजारवाद है, बहुराष्ट्रीय कंपनियों का दबदबा है, इन सबके बारे में दलित विमर्श का कोई दृष्टिकोण होगा या नहीं होगा? ये सवाल अभी तक अनुत्तरित है। और इससे भी बड़ा सवाल है कि दलित विमर्श में जो जाति का प्रश्न है, उसका दलित के जीवन के आर्थिक प्रश्न से क्या संबंध है? जाति के प्रश्न का वर्ग के प्रश्न से क्या संबंध है? अभी भी इसको खुलकर और एक स्थापित तथ्य की तरह से स्वीकार नहीं किया गया है। ये कहा गया है कि सामाजिक बेइज्जती मूल समस्या है दलित विमर्श की, गरीबी नहीं। सामाजिक बेइज्जती अखरती है, गरीबी नहीं। गरीब ब्राह्मण की बेइज्जती नहीं होती है, दलित की होती है। ये तर्क बिल्कुल सही है। हिंदुस्तान में जाति प्रथा के आधार पर शोषण की प्रणाली हिंदुस्तान की एक ऐसी मौलिक विशेषता है, जो हमारे जानते और किसी समाज में नहीं दिखाई देती। और यही कारण है कि मार्क्सवाद जो पूरे विश्व के मेहनतकश लोगों के लिए एक मुक्तिकामी दर्शन है और आज भी है, उस मार्क्सवाद को जब हम भारत में  लागू करने की कोशिश करते हैं, तो उसमें ये दलित प्रश्न बाहर रह जाता है। क्योंकि मार्क्सवाद में इसका कोई विवेचन नहीं है। मार्क्सवाद की इस कमी को अंबेडकर के बिना पूरा कर नहीं सकते। हिंदुस्तान में उत्पादन में अतिरिक्त मूल्य के आधार पर होने वाले शोषण के अलावा हिंदुस्तान में शोषण की एक अपनी देशज प्रणाली रही है, जो धर्म, संस्कृति और समाज के आधार पर खड़ी की गई है। उसमें आर्थिक शोषण भी है। और ये जो शोषण की प्रणाली है इसे सबसे पहले बहुत विस्तार के साथ ज्योतिबा फुले ने दिखाया था। ज्योति बा फुले का एक नाटक है- तृतीय रत्न, आज के हर नागरिक को ये नाटक पढ़ना चाहिए। ये नाटक ‘तृतीय रत्न’ और उनकी किताब ‘गुलामगिरी’- ये दो किताबें ऐसी हैं, जो हमें बताती हैं, कि ये जाति के आधार पर शोषण की जो प्रणाली है, जिसे हम ब्राह्मणवाद का नाम देते हैं, ये ऐज ए सिस्टम कैसे काम करता है, ये फंक्शन कैसे करता है, ये सिस्टम है क्या, ये पहली बार ज्योतिबा फुले ने बताया। और अंबेडकर दूसरे व्यक्ति हैं, जिन्होंने इस चीज को एक शास्त्र तक पहुंचा दिया। वैज्ञानिक विवेचन जो समाजवाद के विभिन्न विचारों को लेकर मार्क्स ने किया, एक वैज्ञानिक समाजवाद का दर्शन रखा, वो काम हिंदुस्तान में जाति को लेकर जो शोषण का जो पूरा तंत्र है, उसको अंबेडकर ने सबसे वैज्ञानिक रूप में पेश किया। और इस संदर्भ में भारतीय परिस्थितियों में ये ज्योतिबा फुले और अंबेडकर मार्क्स के जैसे ही हैं हमारे लिए, ये हमें समझ लेना चाहिए। हिंदुस्तान में मार्क्सवादी आधार पर क्रांति करने के लिए फुले और अंबेडकर की विचारधारा को शामिल करके, जोड़कर ही हम आगे बढ़ सकते हैं, इस चीज को बहुत से मार्क्सवादी स्वीकार करने लगे हैं, महसूस करते हैं, लेकिन जो ऑफिसयल मार्क्सिज़्म है, उसमें वो चीज अभी भी आई नहीं है और वो बहुत सारे वैचारिक उहापोह में हैं कि इसको कैसे शामिल किया जाए? जब मार्क्स अपनी विचारधारा के विकास के लिए हेगल जैसे सामंतों के पुरोहित प्रोफेसर से, राज्य के अपने आदमी से उसके दर्शन की विशिष्टताओं को ले सकते थे कि हमारा दर्शन पूर्ण हो, तो हम अंबेडकर और फुले से क्यों नहीं ले सकते? जबकि अंबेडकर और फुले की तो वर्गीय स्थिति वैसी नहीं है, जैसी हिगेल के थी। उनकी तुलना में ये बहुत प्रगतिशील लोग हैं।
तो मित्रो, जाति और वर्ग का सवाल हिंदुस्तान में सामाजिक परिवर्तन के लिए बहुत अहम सवाल है। ये मैं इसलिए कह रहा हूं, क्योंकि जिस तरह अंबेडकर को छोड़कर हिंदुस्तान में सामाजिक परिवर्तन नहीं किया जा सकता, उसी तरह से मैं इतनी ही कड़वी सच्चाई है कि हिंदुस्तान में सामाजिक परिवर्तन करने के लिए सिर्फ अंबेडकर काफी नहीं होंगे, उनसे आगे जाना होगा। और वो आगे जो हम जाएंगे, उसमें मार्क्सवाद हमारी बहुत मदद करता है। देखिए ज्ञान का जो विकास होता है, वो कैसे होता है? ज्ञान कोई एक बनी बनाई स्थिर चीज नहीं है, कि किताबों में बंद कर दिया गया है और ज्ञान उतना ही रहेगा, ऐसा नहीं है। ज्ञान का विकास विभिन्न स्रोतों से होता है। समाज के सामने जो समस्याएं खड़ी होती हैं, उनको समझने के लिए होता है, उन समस्याओं का हल करने के लिए होता है। हिंदुस्तान में अगर हम क्रांति करना चाहते हैं, हम एक समतामूलक समाज कायम करना चाहते हैं तो हमें अंबेडकर और ज्योतिबा फुले और मार्क्स- तीनों के महत्व को समझना होगा, इस वैचारिक विकास को हमें करना होगा, वर्ना हम हिंदुस्तान को नहीं बदल सकते। हम एक समतामूलक समाज नहीं कायम कर सकते।दलित की जो सामाजिक बेइज्जती है, उसके आर्थिक स्रोत भी होते हैं। उसकी जो आर्थिक विवशता है, उसके पास कुछ भी नहीं है। अंबेडकर ने इसी चीज की ओर तो ध्यान खींचा हमारा कि मध्यकाल के संत लोगों ने  लिखा कि ईश्वर के बनाए हुए सब बंदे हैं इसलिए सब बराबर हैं। पर सवाल ईश्वर के बनाए हुए बंदों की समानता का नहीं है। सवाल इस समाज में कायम भौतिक असमानता का है। एक दलित को उन सारे अधिकारों से, संपत्ति के अधिकारों से वंचित करके रखा गया है, सवाल उसके मानवाधिकारों का है। सवाल उसके लोकतांत्रिक-नागरिक अधिकारों का है, सवाल समाज के उत्पादन में उसके हिस्से का है। और ये जो वो वंचित है सब चीजों से, यह भी उसकी सामाजिक बेइज्जती का एक स्रोत है बहुत बड़ा। जिस दलित के पास कुछ भी नहीं होगा, उसकी तो सामाजिक बेइज्जती हर तरह से होगी। जब तक वो आर्थिक रूप से मजबूत नहीं होगा, उसकी आर्थिक मुक्ति नहीं होगी। जब तक एक शोषित वर्ग के रूप में वह मुक्त नहीं होगा, तब तक उसकी बेइज्जती खत्म नहीं होगी। और यहाँ मार्क्स  की  जरूरत हमें पड़ेगी।

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एक आखिरी जो सवाल मैं उठाना चाहता हूँ, इस पर हिंदी का दलित विमर्श नहीं ध्यान देता है । किसी भी उत्पीडि़त समुदाय की मुक्ति के लिए यह बहुत महत्वपूर्ण सवाल है कि दूसरे उत्पीडि़त समाजों की मुक्ति के बारे में वो क्या सोचता है? कोई भी उत्पीडि़त समाज अगर सिर्फ अपनी मुक्ति के बारे में सोचता है, वो कभी मुक्त नहीं हो सकता, जब तक कि वो दूसरे उत्पीडि़त समाजों की मुक्ति के बारे में भी न सोचे, उनके प्रति एक सही रवैया न रखे, उनके साथ मिलकर चलने को तैयार न हो। ये पांडिचेरी में प्रोफेसर हैं मुरुशेखर साहब, कई लोगों ने उनके एक नाटक की चर्चा की है, बलि का बकरा, तमिल के अच्छे, बहुत अच्छे लेखक हैं, नाटक लिखते हैं- बलि का बकरा। देवी का रथ जो खींचा जाता है वर्ष में एक बार, गांव में ब्राह्मणों के द्वारा, तो उसको खींचते हुए रस्सी टूट गई, रस्सा टूट गया, तो देवी को बहुत कोप आया। देवी अब श्राप देती इस गांव को। तो उससे कैसे बचा जाए? ब्राह्मणों की सभा होती है, तो उस सभा में ये तय होता है, कि देवी के कोप से बचने के लिए, देवी को प्रसन्न करने के लिए अब एक बलि उसको देनी जरूरी है। किसकी बलि दी जाए? सारे ब्राह्मण पीछे हट जाते हैं, छुप जाते हैं। अंत में एक दलित युवक को खोज लिया जाता है इस बलि के लिए। और उस दलित युवक को पकड़ के लाया जाता है कि चलो तुमको गांव के लिए बलि होना है, तभी देवी शांत होंगी। वो मजबूर आदमी, उसका अपने जीवन पर कोई अधिकार नहीं। उसकी पत्नी रोती-कलपती पीछे आती है, कि मेरे पति को छोड़ दो, बहुत कुछ कहती है, लेकिन ब्राह्मणों का दिल नहीं पसीजता है। लेकिन उसके पति के दिमाग में एक बात आती है, वो कहता है, दलित ही की बलि देनी है न, ठीक है, ये मेरी पत्नी है, मैं बोलता हूं इसकी बलि दे दो। मुझे जाने दो। जिस व्यक्ति का अपने जीवन पर कोई अधिकार नहीं है, वह दूसरे के जीवन पर इतना अधिकार जमा रहा है, कि उसकी बलि दे दो!ये जो दूसरा व्यक्ति है, स़्त्री, दलित-स्त्री, इसकी आवाज हमारा दलित विमर्श उसी तरह से नहीं उठाता है। वो उसे इनकार तो नहीं करते हैं, लेकिन वो बहुत कम्फर्टेबुल भी फील नहीं करते। असुविधा महसूस करते हैं। और इसीलिए ये दलित स्त्री विमर्श की आवाज उठेगी। तो दलित समाज, दलित विमर्श अगर दलित स्त्री की मुक्ति के सवाल पर नहीं सोचेगा, उस सवाल को मान्यता नहीं देगा, तो वह अपनी भी मुक्ति नहीं कर सकता। और दुर्भाग्य से हिंदी दलित विमर्श में ये घटना वास्तविक रूप से घटी है कि दलित विमर्श की एक धारा, इतनी स्त्री विरोधी हो चुकी है वो धारा कि मैं समझता हूं कि वो दलित समाज की मुक्ति से भी बहुत दूर हो चुकी। अंबेडकर इतने महत्वपूर्ण व्यक्ति थे, उन्होंने स्त्रियों के सवाल पर बहुत लिखा, फुले ने बहुत लिखा, शाहू ने बहुत लिखा, पेरियार ने बहुत लिखा, मैंने किसी दलित लेखक को नहीं देखा कि उनके साहित्य का विवेचन करे स्त्री के प्रश्न पर। इसलिए स्त्रियों को यह सवाल अलग से उठाना पड़ रहा है। इतनी सी बातें तो मैं दलित विमर्श के बारे में कहना चाहता था।
प्रो.वीर भारत तलवार

प्रो.वीर भारत तलवार

प्रो.  वीर भारत तलवार,  प्रख्यात हिन्दी आलोचक, जेएनयू में प्राध्यापक। उनसे virbharattalwar@gmail.com पर संपर्क संभव है। 
हैदराबाद में दिये गए व्याख्यान का पहला अंश। शेष अगले किश्तों में। 
साभार समकालीन जनमत 

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