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हिन्दी नवजागरण की परिकल्पना पर पुनर्विचार की जरूरत : राजकुमार

हिन्दी नवजागरण की अवधारणा ज्ञान के विशेष पैराडाइम के अन्तर्गत, जिसे सुविधा के लिए औपनिवेशिक आधुनिकता का पैराडाइम कह सकते हैं, गढ़ी गयी थी। आधुनिकता की ज्ञानमीमांसा के निकष पर ही समस्याएँ चिन्हित की गयीं और उसी के अनुरूप समाधान सुझाए गए। इक्कीसवीं सदी तक आते-आते ज्ञान का यह पैराडाइम बदल गया। पैराडाइम बदलते ही समस्याओं की पहचान और उनके समाधान के स्वरूप में भी बदलाव आ गया। उन्नीसवीं सदी में जन्मी विचारधाराओं को यथावत दुहराकर न तो आज की समस्याओं की सम्यक् पहचान संभव है और न ही उनका समाधान। इसलिए हिन्दी नवजागरण की परिकल्पना और उसके द्वारा सुझाए गए विकल्पों पर नये सिरे से विचार करने की जरूरत है। क्योंकि पुराने पैराडाइम के तहत दिये गये जो उत्तर पहले सही लगते थे, वे अब कारगर नहीं लगते। इसी परिप्रेक्ष्य में हिन्दी नवजागरण की अवधारणा और उससे जुड़ी समस्याओं को नये सिरे से समझने की शुरूआती कोशिश इस लेख में की गयी है।   # लेखक

सहमत से साभार-संपादित

सहमत से साभार-संपादित

By राजकुमार

1857 के विद्रोह में मध्यवर्ग और व्यवसायियों/उद्यमियों की भूमिका प्रायः नगण्य रही है। किन्तु विद्रोह के बाद घटित होने वाले नवजागरण और राष्ट्रीय आन्दोलन में इन्हीं दो वर्गों की केन्द्रीय भूमिका रही। नवजागरण और राष्ट्रीय आन्दोलन में नेतृत्व इन्हीं दो वर्गों के हाथ में रहा। 1857 के विद्रोह और परवर्ती नवजागरण के चरित्र में जो अन्तर दिखायी पड़ता है, उसकी व्याख्या इनके वर्ग-चरित्र में आये बदलाव के सहारे की जा सकती है। इसी कारण नवजागरण कालीन चिन्तकों के दृष्टिकोण में अंग्रेजी राज के प्रति एक खास तरह की दुविधा दिखायी पड़ती है। वे अंग्रेजी राज की तारीफ करते हैं किन्तु साथ ही कुछ मुद्दों पर उसकी आलोचना भी करते हैं। इस दुविधा को इतिहासकार सुधीर चन्द्र ने अपनी पुस्तक आप्रेसिव प्रेजेण्ट में ‘एम्बीवैलेन्स’ का नाम दिया है। ‘एम्बीवैलेन्स’ का हिन्दी में ‘आविकर्षण’ के रूप में अनुवाद किया गया है। नवजागरण कालीन चिन्तकों में राष्ट्रभक्ति-राजभक्ति, स्त्रियों की स्वाधीनता और मुसलमानों को लेकर दुविधा दिखायी पड़ती है। ऐसा आविकर्षण केवल हिन्दी नवजागरण तक सीमित नही है, दूसरी भाषाओं के नवजागरण में भी इन मुद्दों को लेकर ऐसा ही आविकर्षण मौजूद है।

इतिहासकार रंजीत गुहा ने अपनी पुस्तक ‘सम एलीमेंट्री ऐस्पेक्ट्स  ऑफ पीजेंट इनसर्जेन्सी इन कॉलोनियल इंडिया’ में लिखा है कि 57 के विद्रोहियों के दृष्टिकोण में अंग्रेजी राज के प्रति एक सचेत शत्रुता का भाव था। वे अंग्रेजी राज को उखाड़कर अपना शासन कायम करना चाहते थे और अंग्रेजी राज की किसी भी सकारात्मक भूमिका को स्वीकार नहीं करते थे। पुरुषोत्तम अग्रवाल ने अपने एक निबंध ‘1857 और हिन्दी नवजागरण’ में भारतेन्दु युगीन हिन्दी नवजागरण के चिन्तकों के दृष्टिकोण और 57 के विद्रोहियों के दृष्टिकोण में दिखायी देने वाले अन्तर की विस्तार से चर्चा की है। वे रामविलास शर्मा के इस तर्क से सहमत नहीं हो पाते कि भारतेन्दु युग हिन्दी नवजागरण का दूसरा चरण है। उल्लेखनीय है कि रामविलास शर्मा 1857 के विद्रोह को हिन्दी नवजागरण का प्रथम चरण मानते हैं और भारतेन्दु युग को उसकी निरन्तरता में दूसरा चरण। लेकिन जैसाकि ऊपर कहा गया, हिन्दी नवजागरण को 1857 के विद्रोह की निरन्तरता में देखना सही नहीं है। 1857 के विद्रोह और हिन्दी नवजागरण के बीच अंग्रेजी शासन के प्रति दृष्टिकोण में आये अन्तर के साक्ष्य पर 57 और भारतेन्दु युग के बीच निरन्तरता से ज्यादा विच्छिन्नता के तत्व परिलक्षित होते हैं।

भारतेन्दु युगीन हिन्दी नवजागरण की एक बड़ी समस्या यह है कि इसमें कथित उर्दू परम्परा में लिखे गये साहित्य की चर्चा ही सिरे से गायब है। हिन्दी नवजागरण की शुरूआत ही भारतेन्दु के इस कथन से मानी गयी है कि 1873 में हिन्दी नये चाल में ढली। उर्दू को आप हिन्दी की शैली मानें या उसकी परिकल्पना को ही अस्वीकार करें, लेकिन सच्चाई है कि हिन्दी के नये चाल में ढलने से पहले उर्दू में साहित्य लिखने का सिलसिला शुरू हो चुका था। इसलिए फारसी लिपि या उर्दू में फारसी-अरबी के शब्दों को जबर्दस्ती ठुँसने की आलोचना करने के बावजूद हिन्दी जाति के नवजागरण की चर्चा से उर्दू में लिखे गये साहित्य को आप बाहर नहीं कर सकते। ऐसा करने से  उसकी साम्प्रदायिक परिणति की सम्भावनाएँ बढ़ जाती हैं और अन्ततः वही हुआ भी। मुख्य बात यह है हिन्दी क्षेत्र की व्यापकता और भाषायी जटिलता के कारण यहाँ ऐसी स्थितियाँ उत्पन्न हुईं कि तेलगू, बांग्ला या मराठी की तरह हिन्दी का कोई एक रूप सुनिश्चित करना और बाकी रूपों को बाहर कर देना सभी को स्वीकार्य निर्णय नहीं बन पाया। फारसी और फिर उर्दू की परम्परा के विकास के कारण हिन्दी के ही कई रजिस्टर बन गये। कई बार तो एक ही समय में अलग-अलग परम्परा से जुड़े लोग इन रजिस्टरों का अलग-अलग ढंग से उपयोग करते दिखायी पड़ते हैं। समस्या तब उत्पन्न होती है जब हम इनमें से किसी एक रूप के आधार पर हिन्दी का स्वरूप स्थिर करने की कोशिश करते हैं। हिन्दी, हिन्दुस्तानी और उर्दू के बीच खींचतान के समूचे इतिहास को इसी परिप्रेक्ष्य में समझना चाहिए। भारतेन्दु युगीन हिन्दी नवजागरण की समस्या यह है कि उसने हिन्दी का एक सही रूप तय कर बाकी रूपों को प्रकारान्तर से अवैध घोषित कर दिया और उनके बारे में किसी भी प्रकार के चिन्तन-अध्ययन का ही निषेध कर दिया। उर्दू परम्परा में लिखे गये साहित्य को हिन्दी नवजागरण के दायरे से बाहर कर देने के बावजूद भारतेन्दु को इस बात का एहसास था कि उर्दू शायरी की परम्परा से भिन्न खड़ी बोली हिन्दी में कविता लिख पाना आसान नहीं होगा। विद्वानों को इस बात पर विचार करना चाहिए कि हिन्दी को उर्दू से अलगाने के बावजूद स्वयं भारतेन्दु उर्दू में रसा नाम से कविता क्यों लिखते थे। यही नहीं, इस बात पर भी नये सिरे से विचार किया जाना चाहिए कि नयी चाल की हिन्दी के समर्थक भारतेन्दु अपनी ज्यादातर कविताएँ ब्रज भाषा में क्यों लिखते हैं। खड़ी बोली में तो उन्होंने ‘अमीर खुसरों के वजन पर सिर्फ मुकरिया ही लिखी। एक खास तरह की हिन्दी की वकालत करने के बावजूद भारतेन्दु के लेखन में उर्दू और ब्रज भाषा की उपस्थिति बहुत ही महत्वपूर्ण है। यदि गम्भीरता से विचार किया जाये तो इससे हिन्दी क्षेत्र के भाषायी मानचित्र की जटिलता को समझने में मदद मिल सकती है।

असल में भारतेन्दु संक्रमण कालीन दौर के रचनाकार-चिन्तक हैं, जहाँ कई तरह के विचार और प्रभाव तो सक्रिय है लेकिन इनमें से किसी को निर्णायक बढ़त हासिल नहीं हुई है। भारतेन्दु के रचनात्मक व्यक्तित्व में कई धाराएँ-उपधाराएँ सक्रिय दिखायी पड़ती हैं। इसीलिए उर्दू और ब्रज भाषा की साहित्यिक परम्परा के प्रति कम से कम रचनात्मक स्तर पर उनके यहाँ कुछ गुंजाइश बची हुई है।

किन्तु द्विवेदी युग तक आते-आते अंग्रेजी शिक्षा के प्रचार-प्रसार के परिणामस्वरूप भारत के तत्कालीन चिन्तक इस नतीजे पर पहँुचे कि भारत की पराधीनता का मुख्य कारण ये है कि यहाँ पश्चिमी ढंग के राष्ट्रवाद का विकास नहीं हो पाया। भारत की मुक्ति और एक स्वाधीन राष्ट्र के रूप में उसके विकास के लिए उसे पश्चिमी राष्ट्रों के वजन पर पुनर्गठित करना होगा। अब इस बात का कोई विशेष महत्व नहीं रह गया कि भारतीय सभ्यता में स्वाभाविक रूप से विकसित होने वाली प्रवृत्तियों को केन्द्र में रखकर ‘आधुनिक’ भारत की परिकल्पना की जाए। इसके बजाय सारा जोर इस ओर चला गया कि भारतीय सभ्यता की उन विशेषताओं को चिन्हित किया जाए, जिन्हें खींच-खाँच कर पश्चिमी राष्ट्रवाद के साँचे में फिट किया जा सके।

द्विवेदी जी समेत उस समय के बुद्धिजीवियों को ये बात सालने लगी कि राष्ट्रभाषा के बिना राष्ट्रवाद की परिकल्पना कैसे संभव होगी। भारत पश्चिमी राष्ट्रों से इस मायने में भिन्न था कि यहाँ कई भाषाएँ बोली जाती थीं। किन्तु सबसे ज्यादा लोगों द्वारा बोली जाने वाली भाषा के रूप में हिन्दी को खड़ा कर राष्ट्रभाषा बनने के उसके दावे को मजबूत करने के लिए ऐसी हिन्दी की परिकल्पना की गयी, जिसमें हिन्दी के विविध रूपों और तथाकथित जनपदीय भाषाओं/ बोलियों के लिए कोई जगह नहीं बची। इसका परिणाम ये हुआ कि भारतीय सभ्यता में भाषाओं के विकास और उनके पारस्परिक सम्बन्ध को या तो नजरअन्दाज कर दिया गया या उसको समझने का विवेक ही नहीं उत्पन्न हो पाया। यदि समूचे भारत के भाषायी मानचित्र की चर्चा न भी की जाय तो भी इस तथ्य से इनकार नहीं किया जा सकता कि हिन्दी प्रदेश में एक ही समय में अलग-अलग कार्यों के लिए और कभी-कभी एक ही कार्य के लिए हिन्दी के भिन्न-भिन्न ‘रजिस्टर’ का इस्तेमाल होता रहा है। हिन्दी प्रदेश का भाषायी स्वरूप हमेशा बहुभाषी रहा है। भाषायी स्वरूप को लेकर असहमतियाँ हो सकती हैं और होनी भी चाहिए, लेकिन उनके अस्तित्व को ही दरकिनार कर गढ़ी गई हिन्दी नवजागरण की कोई भी परिकल्पना, नेक इरादों के बावजूद, आत्मघाती और अन्ततः साम्प्रदायिक होने के लिए अभिशप्त है।

किसी एक भाषायी रजिस्टर पर केन्द्रित हिन्दी की परिकल्पना से जितनी समस्याएँ सुलझती हैं उससे ज्यादा समस्या पैदा हो जाती है। हिन्दी प्रदेश के भाषायी मानचित्र को जनपदीय बोलियों और राष्ट्रीय भाषा के द्वि-आधारी विरुद्धों में रखकर देखने से उत्तर भारतीय भाषाओं के अन्तर्सम्बन्ध को समझने-समझाने की अभी तक जो कोशिश होती आयी है, उस पर पुनर्विचार करने की जरूरत है। असल में उत्तर भारतीय भाषाओं को किसी अन्य प्रसंग में लिखे गए ए.के. रामानुजन के वक्तव्य को किंचित परिवर्तित करते हुए कहें तो, एक ही सातत्य या स्पेक्ट्रम के क्रमशः परिवर्तित होते हुए हिस्से के रूप में देखा जाना चाहिए। कई बार इसका एक छोर दूसरे छोर से काफी अलग लगता है, लेकिन है वो उसी स्पेक्ट्रम का हिस्सा। इस स्पेक्ट्रम में दिखायी पड़ने वाले भाषायी परिवर्तन को चोटियों और घाटियों के रूपक के जरिये व्याख्यायित कर सकते हैं। चोटियाँ इस स्पेक्ट्रम के वो बिन्दु हैं, जहाँ उनका अन्तर आत्यन्तिक रूप में दिखाई पड़ता है और घाटियाँ वह स्थल हैं, जहाँ ये तीक्ष्णता क्रमशः ढलान पर उतरते हुए एक दूसरी भाषायी चोटी की ओर चढ़ने लगती है। ये भाषायी घाटियाँ ऐसे  पाॅकेट हैं, जहाँ एक भाषा या बोली का रजिस्टर धीरे-धीरे दूसरी भाषा के रजिस्टर में तब्दील होने लगता है। मनुष्य के शरीर में फैली हुई नसों की तरह ये भाषाएँ परस्पर जुड़ जाती हैं। इनकी सीमाएँ धँुधली, अस्पष्ट और खुली हुई हैं। इसीलिए इन भाषाओं/बोलियों के रजिस्टर दूसरी बोली या भाषा से, आधुनिक युग से पहले तक, जुड़े हुए दिखायी पड़ते हैं। राजनीतिक-आर्थिक सांस्कृतिक कारणों से इनमें से किसी एक भाषायी रजिस्टर का दायरा बढ़ जाता है और उसे ही कुछ लोग भाषा या राष्ट्र की भाषा के रूप में पुरस्कृत करने लगते हैं। इसमें भी कोई हर्ज नहीं, लेकिन समस्या तब पैदा होती है जब किसी भाषायी रजिस्टर विशेष को राष्ट्र की भाषा के रूप पुरस्कृत करने की प्रक्रिया में अन्य भाषायी रजिस्टरों को जनपदीय बोली के रूप में अवमूल्यित या तिरस्कृत कर दिया जाता है। यहाँ तक कि उन्हें साहित्य और कला की भाषा के रूप में भी आगे जारी रखने के औचित्य का निषेध कर दिया जाता है। यदि हम भाषा और बोली के युग्म में हिन्दी प्रदेश की भाषायी प्रकृति पर विचार करने के बजाय उनके अन्तर्सम्बन्ध के नैरूतर्य पर विचार करें तो हम उन गलतियों को दोहराने से बच सकते हैं, जिनका सामना हिन्दी जाति की एक भाषा खड़ी करने के यांत्रिक रवैये के कारण अभी तक हम करते रहे हैं। उत्तर भारत की भाषाओं/ बोलियों में नैरन्तर्य का एक बड़ा प्रमाण ये है कि क्रिया रूपों अथवा उच्चारण में कुछ अन्तर के बावजूद इनके शब्द भण्डार में कोई विशेष अन्तर नहीं है।

ये सही है कि अठारहवीं शताब्दी में हिन्दी के उस भाषायी रजिस्टर में जिसे आज उर्दू कहते हैं, बोल-चाल के शब्दों को निकालकर फारसी और अरबी के शब्दों की खूब भर्ती की गई। नतीजा ये हुआ कि इस परम्परा में लिखे गये साहित्य का दायरा अरबी-फारसी जानने वाले कुछ अभिजनों तक ही सीमित हो गया और यहाँ की लोक भाषाओं से उसका सम्बन्ध कमजोर पड़ गया। इस प्रवृत्ति की आलोचना करना तो ठीक था, लेकिन इस परम्परा में लिखे गए साहित्य की उपलब्धियों का सिरे से निषेध कर ‘नए चाल में ढली’ हिन्दी में साहित्य लिखने और उसे इस परम्परा से अलग दिखाने के लिए जैसा साहित्य लिखा गया, उसमें इस परम्परा की साहित्यिक उपलब्धियों से कुछ भी न ग्रहण करने का भाव ज्यादा था।

यदि भारतेन्दु युग में उर्दू की परम्परा से नई हिन्दी का सम्बन्ध-विच्छेद हुआ तो द्विवेदी युग की उपलब्धि ये है कि इस दौर में ब्रजभाषा की परम्परा से भी उसे काट दिया गया। रीति विरोधी अभियान चलाकर ये सिद्ध करने का प्रयास किया गया कि ब्रजभाषा में आधुनिक युग की संवेदना वहन करने की सामथ्र्य नहीं है। ब्रजभाषा में तो पतनशील सामंती मानसिकता की कामुक शंृगारिक कविताएँ ही लिखी जा सकती हैं। रीतिकालीन शृंगारिक कविताओं को ही नहीं, स्त्री लोकगीतों को भी विक्टोरियन नैतिकता के प्रभाव में अश्लील घोषित कर दिया गया जबकि इतिहास यह है कि आधुनिक योरोपीय भाषाओं में भी अपनी क्लासिक साहित्य और ज्ञान को आत्मसात कर कुछ-कुछ वैसा ही साहित्य लिखा गया था जैसा रीतिकालीन कविताओं में दिखाई पड़ता है इस बात को पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया गया कि सूर, मीरा से लेकर न जाने कितने भक्त कवियों ने इसी भाषा में कविताएँ लिखी हैं। रीतिकालीन दौर में भी शंृगारिक कविताएँ लिखने वाले कवियों से ज्यादा ऐसे कवियों की संख्या है, जिन्होंने भक्ति-प्रधान कविताएँ लिखी हैं। यही नहीं, कथित रीतिकाल के दौर में ही 60 से भी अधिक संख्या में वीरकाव्य-लिखे गए हैं। दैनंदिन जीवन से सम्बन्धित समस्याओं पर लिखी गई कविताओं के साथ-साथ नीतिपरक कविताएँ भी इस दौर में कम नहीं लिखी गईं। स्वयं भारतेन्दु हरिश्चन्द्र, नरोत्तमदास और जगन्नाथ दास ‘रत्नाकर’ जैसे आधुनिक दौर के कवियों के यहाँ भी वैसी कविताएँ नहीं मिलतीं, जिनका रीति-विरोधी अभियान के नाम पर विरोध किया गया। असल में उर्दू के दावे को खारिज करना तो आसान था, लेकिन उर्दू के दावे को खारिज करने के बाद ब्रजभाषा के दावे को खारिज करना बहुत मुश्किल था। साहित्यिक उपलब्धि की दृष्टि से तो खड़ी बोली कहीं से ब्रज भाषा के सामने खड़ी ही नहीं होती। उर्दू को दरकिनार करने के बाद साहित्य की भाषा के रूप में व्यापकता और विस्तार की दृष्टि से भी ब्रजभाषा का दायरा खड़ी बोली के मुकाबले बहुत विस्तृत था। गुजरात से लेकर बंगाल तक ब्रजभाषा में साहित्य लिखने की परम्परा दिखायी पड़ती है। खड़ी बोली के पक्ष में दूसरा तर्क ये दिया गया कि ब्रजभाषा में गद्य का पर्याप्त विकास नहीं हुआ, लेकिन यदि उर्दू परम्परा के विकास को हिन्दी से अलग कर दें, तो उस समय तक हिन्दी में ही गद्य का कौन सा विकास दिखाया जा सकता था। ये सही है कि फोर्ट विलियम काॅलेज, ईसाई मिशनरियों और अन्य लोगों के सहयोग से उन्नीसवीं शताब्दी में हिन्दी गद्य का तेजी से विकास हुआ। जो शोध हुए हैं, उनके आधार पर ये कहना भी पूरी तरह सही नहीं है कि ब्रजभाषा में गद्य का विकास ही नहीं हुआ। सबसे पुराने व्याकरण और शब्दकोश ब्रजभाषा के ही बनाये गये और अनेक संस्कृत ग्रन्थों का ब्रजभाषा-गद्य में अनुवाद किया गया। इन सारे तथ्यों पर ध्यान देने के बाद ये बात समझ में आती हैं कि रीतिविरोधी अभियान के नाम पर वास्तव में ब्रजभाषा के साहित्यिक-वैचारिक अवदान का निषेध किया जा रहा था।

चूँकि हिन्दी नवजागरण की अवधारणा किसी न किसी रूप में आधुनिकता के प्रोजेक्ट के साये में विकसित हो रही थी और इस प्रोजेक्ट के मुताबिक पहले से चली आ रही सांस्कृतिक और वैचारिक परम्पराएँ व्यर्थ और पिछड़ी हुई मान ली गई थीं, इसलिए आधुनिकता के प्रोजेक्ट को हिन्दी में उतारने के लिए हिन्दी का ऐसा रजिस्टर ज्यादा उपयुक्त लगा, जिस पर परम्परा का कोई बोझ ही नहीं था। खड़ी बोली में आधुनिक युग से पहले साहित्यिक-वैचारिक लेखन की कोई उल्लेखनीय परम्परा नहीं थी, इसलिए उसमें पूर्व परम्परा से सम्बन्ध-विच्छेद करने की कोई जरूरत ही नहीं थी। परम्परा की चिन्ता किये बिना, जो चाहें, जैसे चाहें, लिख सकते थे। उल्लेखनीय है कि मुगलकाल में उर्दू का विकास भी कुछ इसी तरह हुआ था। प्रसिद्ध इतिहासकार मुजफ्फर आलम ने अपने एक लेख में लिखा है कि उर्दू में लेखन के पीछे दो शर्तें लगाई गई थीं, पहली यह कि इसकी लिपि फारसी होगी, दूसरी यह कि बोल-चाल की भाषा में शब्द न उपलब्ध होने पर फारसी या अरबी से शब्द लिये जायेंगे। खड़ी बोली उर्दू में बिल्कुल नये सिरे से साहित्य लिखना ब्रज-भाषा की तुलना में इसलिए आसान था, क्योंकि ब्रजभाषा में साहित्य की एक पूर्व परम्परा थी, जबकि खड़ी बोली में साहित्य लिखने की कोई उल्लेखनीय परम्परा नहीं थी। खड़ी बोली उर्दू की तरह ही खड़ी बोली हिन्दी में जिस तरह के साहित्य-लेखन की शुरूआत हुई, उसका न तो उर्दू की परम्परा से, न ब्रजभाषा की परम्परा से कोई उल्लेखनीय सम्बन्ध दिखायी पड़ता है। लोकसाहित्य की परम्परा से सम्बन्ध स्थापित करने का तो खयाल भी नहीं आता। परम्परा से विच्छेद या परम्परा से मुक्ति के इन दोनों उदाहरणों की विशद चर्चा तो यहाँ संभव नहीं है, फिर भी खड़ी बोली हिन्दी में लिखे गए आधुनिक साहित्य पर दो चार बातें करना बेहद जरूरी है।

रामविलास शर्मा ने लिखा है कि हिन्दी नवजागरण में अंग्रेजी शिक्षा और पश्चिमी ज्ञान की कोई उल्लेखनीय भूमिका नहीं रही। थोड़ी रियायत देते हुए उन्होंने ये जरूर जोड़ दिया है कि अंग्रेजी साहित्य की मानवतावादी और प्रगतिशील परम्परा भी रही है और उससे सीखने में कोई हर्ज नहीं। लेकिन आधुनिक हिन्दी साहित्य की गम्भीरता से पड़ताल करने पर ये बात स्पष्ट हो जाती है कि उसकी मूल प्रेरणा और आदर्श अंग्रेजी साहित्य ही रहा है। ज्यादातर आधुनिक हिन्दी साहित्य पश्चिम से प्रेरणा लेते हुए और उसी के मानदण्ड पर लिखा गया है। कहने वाले चाहें तो कह सकते हैं कि ये अंग्रेजी साहित्य की नकल है। लेकिन अंग्रेजी के प्रसिद्ध उत्तर औपनिवेशिक चिंतक होमी भाभा ने नकल में भी अकल की बात करते हुए मिमिक्री और हाइब्रिडिटी (संकरता) के सिद्धान्तों के सहारे औपनिवेशिक देशों में लिखे गए साहित्य के महत्व का बहुत जोर-शोर से प्रतिपादन कहते हुए इस प्रकार के साहित्य की उपनिवेशवाद-विरोधी भूमिका को रेखांकित करने का गंभीर प्रयास किया है। होमी भाभा के इस तर्क को सामान्य रूप से आज भी दोहराया जा रहा है। लेकिन वास्तव में ये एक पैराडाइम शिफ्ट था। प्रसिद्ध इतिहासकार रणजीत गुहा के अनुसार पैराइाइम के इस युद्ध में पश्चिम की विजय हुई; अद्भुत पर अनुभूति की विजय हुई। विद्वानों ने रणजीत गुहा के इस तर्क की आलोचना करते हुए दिखाया है कि पश्चिम के विपरीत भारतीय यथार्थवादी उपन्यास विस्मय, फैन्टेसी और काव्यत्व से पूर्णतः विच्छिन्न नहीं थे। इसलिए ये कहना सही नहीं है कि इस पैराडाइम शिफ्ट के कारण पहले से चली आ रही भारतीय साहित्यिक परम्परा का पूरी तरह निषेध हो गया। ये तर्क सही है, पर असल बात ये है कि इस पैराडाइम शिफ्ट के बाद साहित्य, संस्कृति और ज्ञान-विज्ञान की बुनियाद आधुनिकता की ज्ञानमीमांसा पर टिक जाती है और भारतीय ज्ञानमीमांसा की परम्परा का इस्तेमाल सिर्फ खाली जगहों को भरने के लिए, एक ऐसा संस्करण तैयार करने के लिए किया जाता है, जिसकी पैकेजिंग भारत में की गई हो। इसे कुछ इस तरह समझना चाहिए, जैसे उत्पादन भले ही भारत में हो रहा हो लेकिन उसकी टेक्नाॅलजी पश्चिम से ली गई हो। इसी तर्क को आगे बढ़ाते हुए कहना चाहिए कि लिखा भले ही भारतीय भाषाओं में जा रहा है, लेकिन उसका विन्यास और उसकी अन्तर्दृष्टि पश्चिम से ली गई है। भारतीय भाषाओं में लिखने से कोई साहित्य भारतीय नहीं हो जाता और न ही भारतीय भाषाओं में चिन्तन करने से कोई चिन्तन भारतीय हो जाता है।

उत्तर औपनिवेशिक चिन्तकों द्वारा तैयार माॅडल के विकल्प के रूप में मैं एक दूसरे किस्म के माॅडल का प्रस्ताव करने की जुर्रत कर रहा हँू। थोड़ी देर के लिए कल्पना कीजिए कि भारतीय ज्ञानमीमांसा और साहित्यिक परम्परा की नियामक भूमिका को स्वीकार करते हुए आधुनिकता की ज्ञानमीमांसा से भी हमने कुछ तत्व लिये होते तो उसकी सूरत और सीरत कुछ और होती। राजनीतिक और सामाजिक चिन्तन के क्षेत्र में गाँधी ने और काव्य के क्षेत्र में कुछ ऐसी ही कोशिश रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने की थी। किन्तु ये इकलौती कोशिशें थीं और परवर्ती चिन्तकों और रचनाकारों ने इन्हें परम्परावादी, रहस्यवादी कहकर नकार दिया। परिणाम ये हुआ कि साहित्य, संस्कृति और ज्ञान के क्षेत्र में जो भी चिन्तन हुआ उसकी नियामक प्रेरणा पश्चिमी आधुनिकता की ज्ञानमीमांसा से तय होती रही। हिन्दी में तो सामान्य रूप से आज जैसी स्थिति है, वो और भी विडम्बनापूर्ण है। यहाँ तो उस ज्ञान को, जिसका विकास पश्चिम में 30-40 के दशक में हुआ था, आज भी भारतीय चिन्तन के रूप में पूरे भक्तिभाव से दोहराया जा रहा है। जबकि पश्चिम में भी इस ज्ञान को अब कोई तवज्जो नहीं दे रहा। इसीलिए आधुनिक युग में भारतीय भाषाओं में जो साहित्य लिखा गया है, उसमें ज्यादा ऐसा नहीं है, जिसे सही मायने में भारतीय साहित्य कहा जा सके। जो है, वह पश्चिमी आधुनिकता के सर्वव्यापी प्रभाव के बावजूद है।

यह अकारण नहीं है कि यद्यपि आधुनिक हिन्दी साहित्यिक चिन्तन में भक्ति आन्दोलन के महत्व का बढ़चढ़कर बखान किया जाता है, किन्तु विरली ही कोई ऐसी रचना होगी, जिसे पढ़कर लगे कि ये रचना भक्ति संवेदना से गुजकर लिखी गई है। परम्परा का किताबी ढंग से बखान तो खूब किया गया, लेकिन परम्परा से रचनात्मक स्तर पर कुछ भी सीखने और ग्रहण करने के चिन्ह कुछ ही रचनाओं में दिखाई पड़ते हैं। मतलब बिल्कुल साफ है, परम्परा का गुणगान कीजिए और कुछ भी लिखते समय उसे भूल जाइए। कुछ विद्वान गरीबी, भूखमरी, किसान, मजदूर जैसे विषयों पर लिखी गई रचनाओं के आधार पर ये सिद्ध करने की कोशिश करते हैं कि इसकी प्रेरणा भक्तिकालीन साहित्य से आई है। अब उन्हें कौन समझाए कि भक्ति काव्य-संवेदना से उसका कोई सम्बन्ध नहीं है। इस प्रकार के विषयों पर लिखी गई रचनाओं का प्रेरणास्रोत पश्चिमी चिन्तन और यथार्थवादी साहित्यिक परम्परा है। भक्ति आन्दोलन न भी होता तो भी इन विषयों पर इसी ढंग से लिखा जाता। दूसरे देशों में, जहाँ भक्ति साहित्य जैसी कोई परम्परा नहीं है, इन विषयों पर थोड़े-बहुत हेर-फेर के साथ इसी ढंग से लिखा गया है। इन विषयों पर लिखी गई रचनाओं को देखने से शायद ही कहीं ऐसी प्रतीति होती हो कि उन्हें भारतीय सांस्कृतिक एवं बौद्धिक परम्परा को आत्मसात करके लिखा गया है। परम्परा के मूल्यांकन से समृद्ध रचनाएँ हिन्दी में ज्यादा नहीं हैं। कुल मिलाकर भारतेन्दु की कुछ रचनाओं, प्रेमचन्द और रेणु के कथा-साहित्य, प्रसाद और मुक्तिबोध की कविताओं के अतिरिक्त कौन सी ऐसी रचनाएँ हैं, जिन्हें भारतीय परम्परा के बीच से निकली हुई रचनाओं के रूप में चिन्हित किया जा सके। विडम्बना ये है कि आधुनिक साहित्य में जहाँ भक्ति साहित्य का सचमुच असर दिखाई पड़ता है, उसे रहस्यवादी कह कर खारिज कर दिया जाता है। इसका सटीक उदाहरण है कि भक्ति काल का सबसे अधिक गुणगान करने वाले रामविलास शर्मा ने मुक्तिबोध की कविताओं को रहस्यवादी कहकर खारिज कर दिया। जबकि उनकी कविता के टेक्स्चर में संत साहित्य की संवेदना की गहरी छाप है। हबीब तनवीर और विजयदान देथा की रचनाओं के बारे में जरूर ऐसा कहा जा सकता है कि वे भारतीय साहित्यिक परम्परा से अनुस्यूत और उसे आगे बढ़ाने वाली रचनाएँ हैं, लेकिन उन पर विचार करने के लिए एक स्वतंत्र लेख की दरकार होगी।

उल्लेखनीय है कि प्रगतिशील लेखक संघ (1936) के पहले घोषणा-पत्र में भक्तिकालीन साहित्य को पलायन का साहित्य कह कर खारिज कर दिया गया था। प्रेमचन्द ने इस अधिवेशन के बहुप्रशंसित अध्यक्षीय भाषण में आधुनिक युग से पहले के समूचे साहित्य को मौजमस्ती और मनबहलाव का साहित्य करार दिया था। बाद में परम्परा के मूल्यांकन के प्रसंग में भले ही उस गलती को दुरुस्त कर लिया गया हो लेकिन रचनात्मक लेखन और वैचारिक चिन्तन के क्षेत्र में परम्परा के सकारात्मक मूल्यांकन से कुछ भी ग्रहण करने की जहमत उठाने के निशान विरले ही दिखाई पड़ते हैं।

पश्चिम में आधुनिकता के अभ्युदय के साथ साहित्य और कलाओं को आधुनिकता के प्रोजेक्ट के सहायक के रूप में देखने की प्रवृत्ति जोर पकड़ने लगी और उन्नीसवीं शताब्दी में यथार्थवाद के अभ्युदय के साथ अपने चरमोत्कर्ष पर पहुँच गई। उल्लेखनीय है कि पश्चिम में समाज विज्ञान का विकास विज्ञान की पद्धति की बुनियाद पर हुआ था और इसीलिए समाज का अध्ययन करने वाले शास्त्रों को ‘समाज विज्ञान’ के रूप में प्रतिष्ठित करने पर जोर दिया गया। एंगेल्स ने तो माक्र्स के चिन्तन का महत्व प्रतिपादित करते हुए स्पष्ट रूप से लिखा कि जैसे डार्विन ने प्रजातियों के विकास के नियम खोज निकाले वैसे ही माक्र्स ने समाज के विकास के नियम खोज लिये। यही कारण है कि लम्बे समय तक माक्र्सवाद को समाज के विकास के नियमों की पहचान कराने वाला विज्ञान कहा जाता रहा। फिलहाल इस बहस के विस्तार में जाने की जरूरत नहीं है, संप्रति विचारणीय मुद्दा ये है कि साहित्य और कलाओं को आधुनिकता के प्रोजेक्ट के अधीन कर देने की परिणति क्या हुई? प्रेमचन्द द्वारा प्रगतिशील लेखक संघ के पहले अध्यक्षीय भाषण ‘साहित्य का उद्देश्य’ की चर्चा हम पहले कर चुके हैं, इसी क्रम में प्रेमचन्द की उस प्रसिद्ध और बार-बार दोहराई जाने वाली उक्ति के उल्लेख के जरिये हम अपने तर्क को आगे बढ़ाना चाहेंगे। प्रेमचन्द ने कहा था, ‘साहित्य देशभक्ति और राजनीति के पीछे चलने वाली सच्चाई नहीं, बल्कि उनके आगे मशाल दिखाती हुई चलने वाली सच्चाई है।’ प्रेमचन्द के इस वक्तव्य पर थोड़ा रुककर विचार करें तो ये स्पष्ट हो जाएगा कि प्रेमचन्द यहाँ पर साहित्य के महत्व का जिस प्रकार प्रतिपादन कर रहे हैं, उससे राजनीतिक चिन्तन की केन्द्रीयता का निषेध नहीं होता। यहाँ राजनीतिक चिन्तन के सर्वोपरि महत्व को स्वीकार करते हुए उसी दायरे में और उसी कसौटी पर साहित्य के महत्व को राजनीतिक चिन्तन से भी आगे के कदम के रूप में रेखांकित किया गया है। प्रेमचन्द अक्सर कहते भी थे कि जो काम गाँधी राजनीति में कर रहे हैं, वही काम वो साहित्य के दायरे में कर रहे हैं। कहने की जरूरत नहीं होनी चाहिए कि यहाँ साहित्य के महत्व का प्रतिपादन राजनीतिक प्रोजेक्ट के अधीन ही है, भले ही उसे राजनीति के आगे-आगे चलने वाली मशाल ही क्यों न कहा गया हो। रामचन्द्र शुक्ल ने भी अपने प्रिय कवि तुलसीदास के साहित्य के मार्फत साधनावस्था के जिस साहित्य को सर्वोत्कृष्ट घोषित किया और जो पहली नजर में ठेठ भारतीय निकष जान पड़ता है, वास्तव में आधुनिकता के विमर्श से बहुत गहरे प्रभावित निकष है। इसलिए यह अकारण नहीं है कि आधुनिक साहित्य के मूल्यांकन के प्रसंग में वे ठाकुर जगमोहन सिंह के उपन्यास ‘श्यामास्वप्न’ के बजाय लाला श्रीनिवासदास के ‘परीक्षागुरु’ को तरजीह देते हैं, क्योंकि वह अंगे्रजी ढंग का नावेल है। इससे यह बात खुलकर सामने आ जाती है कि सब कुछ के बावजूद आधुनिक हिन्दी साहित्य अन्ततः अंग्रेजी ढंग का ही साहित्य है। यह बिल्कुल संभव है कि रामचन्द्र शुक्ल ने जानबूझकर और सचेत रूप से ऐसा न किया हो। लेकिन, जैसा कि कहा जाता है, जादू वही जो सिर चढ़कर बोले; ये आधुनिकता का जादू है, जो हिन्दी के लेखकों-आलोचकों के सिर चढ़कर बोल रहा है। फिर चाहे वो रामचन्द्र शुक्ल हों, महावीर प्रसाद द्विवेदी हों या प्रेमचन्द ही क्यों न हों। महावीर प्रसाद द्विवेदी ने तो साहित्य को ‘ज्ञानराशि का संचित कोश’ कह कर साहित्य को आधुनिकता के प्रोजेक्ट के अधीन करने की पहले से चली आ रही प्रक्रिया को जैसे उसकी तार्किक परिणति तक पहँुचा दिया। रामचन्द्र शुक्ल ने द्विवेदी जी के साहित्य-विवेक पर सही टिप्पणी की है: 1)‘कवि और कविता कैसा गम्भीर विषय है, कहने की आवश्यकता नहीं। पर इस विषय की बहुत मोटी-मोटी बातें बहुत मोटे तौर पर कही गयी हैं। ….2) द्विवेदी जी के लेखों को पढ़ने से ऐसा जान पड़ता है कि लेखक बहुत मोटी अक्ल के पाठकों के लिए लिख रहा है। एक-एक सीधी बात कुछ हेरफेर -कहीं-कहीं केवल शब्दों के ही- साथ पाँच-छह वाक्यों में कही हुई मिलती है।…3) इन पुस्तकों को एक मुहल्ले में फैली बातों से दूसरे मुहल्ले वालों को कुछ परिचित कराने के प्रयत्न के रूप में समझना चाहिए।’ साहित्य की बुनियादी भूमिका के इस अवमूल्यन का परिणाम ये हुआ कि वह आधुनिकता के विमर्श के इर्द-गिर्द घूमने लगा, कभी उसके पीछे-पीछे तो कभी, प्रेमचन्द के कथन के वजन पर कहें तो, उसके आगे-आगे।

मनुष्य के सामाजिक जीवन को नितान्त भौतिक समृद्धि के परिप्रेक्ष्य में परिभाषित करने का परिणाम ये हुआ कि जीवन के वे आयाम, जिनकी सिर्फ भौतिक सन्दर्भों में व्याख्या एक सीमा के बाद संभव नहीं है, लेकिन जो भौतिक उपलब्धि से कम महत्वपूर्ण नहीं हैं, हमारे चिन्तन की परिधि से ही बाहर चले गए। भावनाओं, संवेदनाओं और मानवीय जीवन की अस्तित्वमूलक चिन्ताएँ और मानवीय अस्तित्व की सार्थकता की वे परिकल्पनाएँ, जो भौतिक उपलब्धि से आगे जाती हैं, का भी इस राजनीतिक विमर्श में अवमूल्यन हो गया। यहाँ पर ये ध्यान दिलाने की जरूरत है कि भारतीय चिन्तन परम्परा में मानवीय जीवन के अस्तित्व की सार्थकता को कभी भी सिर्फ भौतिक उपलब्धियों के निकष पर तौलने की कोशिश नहीं की गई थी। बहुत पीछे न भी जाएँ तो भक्तिकालीन साहित्य की बुनियादी संवेदना के सहारे भी इसे समझा और समझाया जा सकता है। असल में साहित्य, संगीत और कलाएँ मनुष्य की संवेदना के उन आयामों को जागृत, उद्दीप्त और समृद्ध करती हैं, जहाँ तक आधुनिकता के ‘एक आयामी’ विमर्श से पैदा होने वाला समाज विज्ञान पहुँच ही नहीं सकता। साहित्य, संगीत और कलाएँ मानवीय अस्तित्व की सार्थकता के उन आयामों को रचती रही हैं, जिनकी चिन्ता आधुनिकता के विमर्श में कम ही दिखाई पड़ती हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि वे मानवीय अस्तित्व की सार्थकता को सिर्फ भौतिक उपलब्धि के निकष पर परिभाषित करने की प्रक्रिया का अतिक्रमण करती हैं। ऐसा नहीं है कि साहित्य और कलाएँ भौतिक समृद्धि, गैर-बराबरी और किसी भी प्रकार के भेदभाव और शोषण को पूरी तरह से नजर अंदाज करती हैं, लेकिन यह जरूर है कि वे भौतिक समृद्धि को मानवीय अस्तित्व की सार्थकता के एकमात्र निकष के रूप में देखने के विमर्श में ढलने से इनकार करती हैं। इसके बजाय वे मानवीय अस्तित्व की सार्थकता के उन आयामों (कल्पित या वास्तविक) को रचती हैं, जिनके सामने भौतिक समृद्धि का पैमाना फीका लगने लगता है।

इतिहासकार ज्ञानेन्द्र पाण्डेय ने अपने लेख ‘गैरियत का गद्य’ में लिखा है कि मनुष्य के आत्यन्तिक दुखों को इतिहास के दायरे में दर्ज कर पाना नामुनकिन है। सुख-दुख, हर्ष-विषाद की आत्यन्तिक मनःस्थितियों के आयाम जिस तरह साहित्य, संगीत तथा कलाओं में आते हैं, वे समाज विज्ञान के विषयों में उस तरह से आ ही नहीं सकते। विडम्बना ये है कि आधुनिकता के साथ पैदा होने वाले समाज विज्ञान के इर्द-गिर्द मंडराने वाला साहित्य अपनी उस बुनियादी भूमिका को चाहे-अनचाहे अप्रासंगिक मानकर छोड़ देता है, जहाँ तक समाज विज्ञान के किसी विषय के लिए पहुँच पाना ही मुश्किल है। उर्दू के कवि मोमिन की एक पंक्ति है, ‘तुम मेरे पास होते हो, गोया जब कोई दूसरा नहीं होता।’ इसी पंक्ति के वजन पर, चाहें तो, कह सकते हैं कि साहित्य और कलाएँ वहाँ भी मनुष्य के पास होती हैं, जहाँ ज्ञान-विज्ञान के दूसरे अनुशासन पहुँच  ही नहीं पाते।

यह अकारण नहीं है कि पहले स्वच्छन्दतावादी और फिर आधुनिकतावादी साहित्य और कलाओं में आधुनिकता के इस ‘एक आयामी’ विमर्श से बाहर निकलने की एक लहूलुहान जद्दोजहद दिखाई पड़ती है। ये सही है कि आधुनिकता के इस लौहपाश से बाहर निकलने में आधुनिक साहित्य और कलाएँ सफल नहीं हुईं, लेकिन इससे उनकी कोशिश का महत्व कम नहीं हो जाता।

महावीर प्रसाद द्विवेदी ने साहित्य को ज्ञानराशि का संचित कोश मानकर और कविता तथा गद्य के अन्तर को मिटाकर और चाहे-अनचाहे साहित्य को पूर्व औपनिवेशिक परम्परा से काटकर जिस प्रकार के साहित्यिक लेखन को पुरस्कृत किया, उसके आदर्श कवि मैथिली शरण गुप्त ही हो सकते थे। मैथिली शरण गुप्त की कविता को देखकर लगता है कि जैसे समूची भारतीय परम्परा में उनसे पहले कोई कवि ही नहीं हुआ और वे पहले व्यक्ति हैं, जिन्होंने कविता लिखने का बीड़ा उठाया है। संवेदनात्मक दृष्टि से कुछ नैतिक आग्रहों के पद्य में अनुवाद के अतिरिक्त शायद ही ऐसा कुछ हो, जिसके लिए उनकी कविता को पढ़ना जरूरी लगे। समूची भारतीय काव्य परम्परा में कविता की दुनिया कभी भी इतनी इकहरी और एकायामी नहीं रही, जितनी मैथिली शरण गुप्त की कविताओं में दिखाई पड़ती है। स्वाभाविक ही था कि छायावादी काव्य में इस एकायामी इतिवृत्तात्मकता से असंतोष फूट पड़ता। लेकिन जैसा पहले भी उल्लेख किया जा चुका है कि ज्यादातर आधुनिक साहित्य का विकास अंग्रेजी शिक्षा प्राप्त व्यक्तियों द्वारा, अंग्रेजों द्वारा स्थापित शिक्षा केन्द्रों यानी विश्वविद्यालयों के परिसर में हुआ। इसीलिए छायावादी कविता में कृत्रिम कल्पनाशीलता तो खूब है, लेकिन वैसी कल्पनाशीलता बहुत कम है, जिनका जन्म एक गहरी बेचैनी से होता है और जिसके साक्ष्य कबीर, जायसी, सूर, मीरा और यहाँ तक कि तुलसीदास के साहित्य में दिखाई पड़ते हैं।

यह अकारण नहीं है कि समूचे प्रगतिवादी, यथार्थवादी और यहाँ तक कि आधुनिकतावादी साहित्य में भी गहरी सांस्कृतिक बेचैनी और उहापोह के ऐसे निशान कम ही दिखाई पड़ते, जिनसे ये प्रतीत हो कि ये समूचा साहित्य भारतीय सभ्यता की उस सुदीर्घ परम्परा में लिखा गया है, जिसमें सब कुछ बुरा ही नहीं है, बहुत कुछ अच्छा भी है।

अन्त में ये कहना अनुचित नहीं होगा कि सही मायने में भारतीय साहित्य में नवजागरण तो तब होगा जब हम आधुनिकता से पहले की साहित्यिक और ज्ञान परम्परा से तथा लोक परम्परा से, आधुनिकता के निकष को अन्तिम सच न मानते हुए, नए सिरे से संवाद स्थापित करेंगे।

प्रो॰राजकुमार

प्रो॰राजकुमार

प्रो॰ राजकुमार।  शोर-शराबे से दूर अध्ययन-अध्यापन में मग्न रहने  वाले युवा-तुर्क हिन्दी आलोचक। भक्ति साहित्य, हिन्दी नवजागरण, आधुनिकता, आधुनिक साहित्य, प्रेमचंद, हिन्दी कहानी इत्यादि पर लगातार लेखन।  किताबों में जैसी रुचि इनकी  है,  वह अन्यत्र दुर्लभ ही हो गई है। फिलहाल, बी॰एच॰यू॰ के हिन्दी विभाग में प्राध्यापक।इनसे dr.kumar.raj@gmail.com पर संपर्क संभव। 

साभार- नया ज्ञानोदय 

जातीय गठन का प्रश्न और रामविलास शर्मा: प्रणयकृष्ण

(2012-2013 रामविलास शर्मा का जन्म-शताब्दी वर्ष है। रामविलास शर्मा के ऊपर अपना व्याख्यान देते हुये वीर भारत तलवार ने कहा है कि रामविलास शर्मा की मृत्यु ने हिन्दी मीडिया को झकझोर कर के रख दिया था। वे बोलते हैं-“रामविलास जी की मृत्यु के बाद जो हिन्दी अखबार प्रकाशित हुए, उन सबों ने मुख्य पृष्ठ पर उनकी मृत्यु के समाचार को प्रमुखता से जगह दी।…बड़ी-बड़ी सुर्खियां लगाईं। ऐसा कि 11 सितंबर को वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर जो हमला हुआ था, उसकी भी सुर्खियां ऐसी न थी। हिन्दी के किसी अन्य साहित्यकार को यह यह सम्मान प्राप्त नहीं है। ।…मुझे  नहीं लगता कि पूरे हिन्दी साहित्य में भारतेन्दु की मृत्यु के बाद किसी और की मृत्यु के समाचार को इतनी प्रमुखता मिली होगी जितनी रामविलास जी की। ” इससे हम रामविलास शर्मा की लोकप्रियता और उनके जाने से हुए क्षति दोनों का अंदाजा लगा सकते हैं।  तेज-तर्रार युवा आलोचक प्रणय कृष्ण इस इस जन्म-शताब्दी वर्ष के बहाने लगातार रामविलास शर्मा पर लिख-बोल रहे हैं। उनके दो लेख हम पहले भी प्रकाशित कर चुके हैं(पूर्व प्रकाशित दोनों लेख इस प्रकार हैं-अपने अपने रामविलास- प्रणय कृष्ण और उपनिवेशवाद / साम्राज्यवाद कभी प्रगतिशील नहीं होता (रामविलास शर्मा की याद )। प्रस्तुत है उनका यह तीसरा लेख।)

निराला और रामविलास शर्मा

निराला और रामविलास शर्मा

By  प्रणयकृष्ण 

‘भाषा और समाज’ नामक पुस्तक में ‘जातीय निर्माण के उपकरण’ शीर्षक अध्याय में रामविलास जी ने लिखा, ” आधुनिक जातियों के निर्माण के लिए सामान्य भाषा, सामान्य प्रदेश, सामान्य आर्थिक जीवन और सामान्य संस्कृति आवश्यक तत्व माने गए हैं”, यही स्टालिन की प्रस्थापना है. रामविलास जी इसकी व्याख्या करते हुए महत्वपूर्ण बात यह कहते हैं कि जिन तत्वों से जन का निर्माण होता है, उन्हीं से सामंतयुगीन लघु जाति का और पूंजीवादी महाजाति का निर्माण होता है. पार्थ चटर्जी ने १९७५ में प्रकाशित ‘बंगाल: एक जातीयता का उदय और विकास’ (सोशल साइंटिस्ट, खंड चार, अंक १), शीर्षक अपने एक लेख की पाद टिप्पणी में लिखा है कि उपरोक्त विशेषताएं जिन्हें स्टालिन ने दुर्भाग्य से आधुनिक राष्ट्र अथवा जाति (रामविलास जी  के शब्दों में ‘महाजाति’ की विशेषताएं बताया है, वे सही अर्थों में ‘जातीयताओं’ (लघुजातियों) पर ही लागू होतीं हैं. इसके चलते खुद स्टालिन के विवेचन में तमाम तरह की अवधारणात्मक दिक्कतें पैदा हुई हैं. रामविलास जी काफी पहले यानी ‘भाषा और समाज’ नामक पुस्तक में १९६१ में प्रकारांतर से यही  कह रहे हैं, अंतर यह है कि वे  यह मानते हैं कि  सामान्य भाषा, प्रदेश, आर्थिक जीवन और संस्कृति जातीय निर्माण की हर अवस्था में पाए जाने वाले उपकरण हैं लेकिन हर अवस्था में इनके गुण और परिमाण में अंतर होता है.  स्टालिन के यहाँ तो जातीय निर्माण की अनेक काल-क्रमिक अवस्थाएं हैं ही नहीं. जन, लघुजाति और महाजाति, ये तीनों ही संज्ञाएँ मेरी समझ में आधुनिक राष्ट्र-राज्य से अलग हैं. राष्ट्र राज्यों का गठन पश्चिमी योरप में पूंजी के युग की परिघटना है. उदीयमान पूंजीपति वर्ग के नेतृत्व में  राष्ट्रीय आन्दोलन के ज़रिए संपन्न की गई पूंजीवादी क्रांतियों ने सामंतवाद को समाप्त कर राष्ट्र राज्यों की स्थापना की. यह राष्ट्रीय आन्दोलन पूंजीपति वर्ग द्वारा क्षेत्रीय स्तर पर सुपरिभाषित घरेलू बाज़ार और राजसत्ता पर कब्ज़े की मांग से पैदा हुआ था.  मुश्किल यह हुई  है कि स्टालिन ने इस आधुनिक पूंजीवादी राष्ट्र की विशेषताएं वे बताई जो उसके अस्तित्व में आने से पहले ही दुनिया भर की तमाम जातीयताओं में विद्यमान थीं. आधुनिक राष्ट्र और जातीयताओं के बीच जो अंतर स्टालिन से पहले के मार्क्सवादी चिंतन में (एंगेल्स, मार्क्स, लेनिन के यहाँ) कमोबेश स्पष्ट था, भले ही अंग्रेज़ी शब्द  ‘नेशन’ कई बार जातीयता (नेशनैलटी) के अर्थ में प्रयुक्त होता हो, स्टालिन के विवेचन में गड्ड- मड्ड हो जाता है. जातीयताओं और राष्ट्र में अंतर यह नहीं है कि जातीयताएं सिर्फ  प्राक-पूंजीवादी, प्राक-आधुनिक सामाजिक गठन का रूप हैं और राष्ट्र आधुनिक.
राष्ट्र-राज्य  निश्चय ही आधुनिक और पूंजीवादी परिघटना है, लेकिन जातीयताएं आधुनिक और पूंजीवादी दौर में भी परिवर्तित रूप में बनी रहती हैं. कुछ जातियां अपने पूंजीपति वर्ग के नेतृत्व में आधुनिक राष्ट्र राज्यों में तब्दील हो जाती हैं . दूसरी ओर, बहुजातीय राष्ट्र राज्य, चाहे वे बुर्जुआ क्रान्ति के ज़रिए योरपीय देशों (पूर्वी ही नहीं, पश्चिमी भी) में अस्तित्व में आए हों  अथवा तीसरी दुनिया के भारत जैसे देश जहां साम्राज्यवाद-विरोधी लड़ाई के ज़रिए वे अस्तित्व में आए हों, सभी जगह उनके भीतर राष्ट्रीय स्तर के पूंजीपति वर्ग के उदय हो जाने के बाद भी जातीयताएं आधुनिक रूप ग्रहण करके बनी रही हैं. बावजूद इसके कि उनमें से हरेक का स्वतन्त्र, संप्रभु राज्य नहीं होता. पिछले कई दशकों का दुनिया का इतिहास यह दिखाता है कि जब ऐसे बहुजातीय राष्ट्र-राज्य विघटित होते हैं, तो उनमें निहित अलग अलग जातीयताएं जिनमें किसी भी हद तक आधुनिक पूंजीवादी विकास हो चुका होता है, वे अलग अलग स्वतन्त्र संप्रभु राष्ट्र-राज्यों के रूप में तब्दील हो जाती हैं. बुर्जुआ राष्ट्र-राज्यों के ही साथ ऐसा होता हो सिर्फ ऐसा नहीं,  बल्कि सोवियत संघ जैसे समाजवादी गणराज्य के विघटन के बाद भी ऐसा ही हुआ है.
रामविलास जी के  हिन्दी जाति के निर्माण संबंधी चिंतन का सैद्धांतिक महत्त्व भारत के बहुजातीय संप्रभु राष्ट्र राज्य बनने तक जातीय विकास की प्रक्रियाओं को समझने से ताल्लुक  रखता है. लेकिन उसके बाद के दौर की जो जटिलताएं हैं, उन्हें समझने और हल करने के लिए रामविलास जी के काम को आगे बढाने की ज़रुरत है, सिर्फ उनकी स्थापनाओं के मूल्यांकन या पुनर्मूल्यांकन से बात बनेगी नहीं. जब कोई काम आगे बढ़ता है तो पीछे हुए कामों में खुद -ब-खुद कई तरह की तरमीम होती चलती है.
जब वे कहते हैं कि  महाजाति का  निर्माण एक सुदीर्घ  प्रक्रिया है, तो ज़ाहिर है कि वे सामंती युग में ही लघुजातियों से महाजातियों की तरफ लम्बे संक्रमण की बात कर रहे हैं जो सामंती युग समाप्त होने के पहले ही शुरू होता है और बाद भी जारी रहता है. रामविलास शर्मा के सामने यहीं वह समस्या खड़ी होती है जो स्टालिन के विवेचन ने पैदा की है और वह है; ‘नेशनैलिटी’ और ‘नेशन’ में भेद को धूमिल करने की समस्या. चूँकि स्टालिन के लिए जाति और राष्ट्र प्रायः एक हैं, अतः वे जातीय गठन को पूंजीवाद और आधुनिकता से अनिवार्यतः जोड़ देते हैं. जबकि  सामान्य भाषा, आर्थिक जीवन, प्रदेश और संस्कृति की विशेषता जो भारत के अनेक समुदायों में पंद्रहवीं शताब्दी में ही दिखाई देती हैं, उन्हें जाति न मानने का कोई कारण नहीं दिखता, लेकिन समस्या यह उत्पन्न होती है कि इसे पूंजी के युग की घटना या आधुनिक परिघटना कैसे माना जाए. रामविलास जी हिन्दी जाति के निर्माण को सौदागरी पूंजी के विकास से उचित ही जोड़ते हैं, लेकिन उनका आग्रह यह हो जाता है कि सौदागरी पूंजी को पूंजीवाद की ही एक अवस्था माना जाए. इससे हिन्दी या अन्य भारतीय जातियों के उदय की यह शर्त पूरी हो जाती है जो स्टालिन के विवेचन में विद्यमान है .
रामविलास जी महाजाति शब्द  को ‘नेशन’ के अर्थ में प्रयुक्त करते हैं, उन्हीं विशेषताओं को ध्यान में रखकर जिन्हें स्टालिन ने गिनाया है, लेकिन अपने भारतीय अनुभव से जानते हैं कि इसके गठन का आरम्भ भारत के सामंत काल में शुरू हो गया था.  इस अंतर्विरोध को हल करने के क्रम में वे  हिन्दी और अन्य भारतीय महाजातियों  के निर्माण को आधुनिक काल कहते हैं. दरअसल ‘आरंभिक आधुनिकता’ को आजकल उत्तर सामंत काल और व्यापारिक पूंजी से जोड़ कर देखने का खासा अकादमिक रिवाज़ है. इस मामले में यदि रामविलास जी हिन्दी जाति के निर्माण काल को आधुनिक बताते हैं, तो एक तरह से वे बाद के ‘आरंभिक आधुनिकता’ के शास्त्रकारों को पूर्वाषित करते हैं. आधुनिकता और पूंजीवाद को सहवर्ती मानने की धारणा चलती रही है. लेकिन आधुनिकता ठीक-ठीक एक मूल्य और उन मूल्यों को उत्पन्न करने वाली भौतिक परिस्थितियों के रूप में कई जगह औद्योगिक  पूंजीवाद से पहले ही  अस्तित्व में आ गई हो, तो यह कोई अनहोनी बात नहीं है. आज के ‘आरंभिक आधुनिकता’ के व्याख्याता मोटे तौर पर सन १५०० से लेकर सन १८०० तक के काल को आरंभिक आधुनिकता का काल बताते हुए लगभग उन सारे ही तर्कों का सहारा लेते हैं जिन्हें रामविलास शर्मा उनसे दशकों पहले प्रस्तुत करते हैं. ये अध्येता भारत के सम्बन्ध में मुग़ल काल को आरंभिक आधुनिकता का काल  बताते हैं जो रामविलास जी के विवेचन का स्वाभाविक निष्कर्ष है. यह रामविलास जी की  जातीय गठन को समझने के लिहाज से एक महत्वपूर्ण मौलिक सैद्धांतिक स्थापना है जिसे विश्व अकादमी ने अन्यान्य स्रोतों से पाया और बहुत बाद में अपने विमर्शों में शामिल किया.
जहां तक जातीय गठन के पूंजीवाद के साथ सम्बन्ध का सवाल है, रामविलास शर्मा इस ‘आरंभिक आधुनिक काल’ को एक साथ सामंती और पूंजीवादी, दोनों मानते प्रतीत होते हैं. सामंती खोल में व्यापारिक और सूदखोर पूंजी का विकास मार्क्स के विवेचन में औद्योगिक पूंजीवाद की पूर्वपीठिका है या उसके लिए आवश्यक परिस्थितियों में से एक है. लेकिन मार्क्स इस व्यापारिक पूंजी के दौर को पूंजीवाद की अवस्था नहीं मानते, क्योंकि यह सामंती दौर में अंतर्भूत है. रामविलास शर्मा व्यापारिक पूंजी के दौर को पूंजीवाद की ही अवस्था मानते है और उनकी योजना के अनुसार इस दौर में सामंतवाद और पूंजीवाद एक तरह से ओवरलैप करते हैं. फिर भी नाम ही देना हो, तो रामविलास जी इस दौर को पूंजीवादी दौर कहना तय करते हैं. मार्क्स यदि इसे सामंतवाद  का दौर  (औद्योगिक पूंजीवाद से पहले सौदागरी पूंजी के संचय का दौर) ही मानते हैं, तो इसलिए कि वे उत्पादन-पद्धति को किसी ऐतिहासिक चरण की पहचान का केन्द्रीय तत्व मानते हैं, जबकि रामविलास जी इस प्रसंग में विनिमय पर अधिक जोर देते हैं. मैं उनकी इस स्थापना के सैद्धांतिक मूल्य पर कोई टिप्पणी कर सकने में सक्षम नहीं हूँ.
अगर महाजातियों के निर्माण की रामविलास जी की धारणा को हम गंभीरता से पढ़ें तो उनके लिए महाजाति के निर्माण का एक चरण सामंती काल में व्यापारिक पूंजी के माध्यम से आकार ग्रहण करता है, जबकि दूसरा चरण औद्योगिक पूंजी के दौर में पूंजीपति वर्ग की मुख्य भूमिका के साथ आकार ग्रहण करता है. इस दौर में आकर वह राष्ट्र या नेशन का रूप अख्तियार करती है. मेरे पढने के मुताबिक़, उनकी महाजाति की धारणा में ‘नेशनैलिटी’ और ‘नेशन’ एक continuum की तरह आते हैं जबकि स्टालिन के यहाँ ये पद लगभग समानार्थी लगते हैं.  रामविलास जी स्टालिन से  अलग इस बात में भी हैं कि  वे जातीय विकास को सिर्फ औद्योगिक पूंजीवाद की परिघटना नहीं मानते, बल्कि उसकी दीर्घ प्रक्रिया को रेखांकित करते हैं जो उनकी धारणा के अनुसार सामंती और व्यापारिक पूंजीवाद के ओवरलैप के दौर से लेकर औद्योगिक और महाजनी पूंजी के दौर तक चलती रहती है और  समाजवादी दौर तक भी. वे स्टालिन से इस मामले में भी अलग हैं कि वे मानते हैं कि जातीय गठन की प्रक्रिया में, सभी परिस्थितियों में आर्थिक जीवन की नियामक भूमिका रहे, यह ज़रूरी नहीं.
बंगाली जातीयता के निर्माण के सन्दर्भ में पार्थ चटर्जी लक्ष्य करते हैं कि आठवीं सदी से पूर्वी सागरों पर अरब व्यापारियों का कब्ज़ा हो गया और बंगाल का भारत के  समुद्री व्यापार में हिस्सा गिरता गया. राजसत्ता और समाज पर जो दबदबा व्यापारियों और बैंकरों का पांचवीं-छठी शताब्दी में था, वह अब न रह गया. लेकिन  कई शताब्दियों तक व्यापारियों की भूमिका काफी घट जाने के बावजूद, सामंतों की  विघटनकारी खींचतान आदि के होते हुए भी स्वतन्त्र राजवंशों के अधीन बंगाली राष्ट्रीयता का निर्माण जारी रहा. बंगाली सांस्कृतिक समुदाय का राजनीतिक एकीकरण पाल और सेन वंशों से लेकर स्वतंत्र सुल्तानों  के अधीन जारी रहा. ज़ाहिर है कि बंगाली राष्ट्रीयता के गठन की इन परिस्थितियों में आर्थिक जीवन नियामक नहीं रहा.  यह उदाहरण रामविलास जी की उस धारणा की भी तस्दीक करता  है जो उनके जातीयता संबंधी चिंतन को स्टालिन से सर्वाधिक अलग करता है, वह यह कि जाति/महाजाति के गठन में सामंती राजसत्ता भी सहायता करती है. यह अलग बात है कि पार्थ चटर्जी जहां महज ‘जातीयता’  या ‘नैशनैलिटी’ के सन्दर्भ में विचार करते हैं, वहीं रामविलास शर्मा महाजाति के गठन में Nationality- Nation Continuum का सन्दर्भ लेते हैं. इसीलिए पार्थ चटर्जी के विवेचन में बांग्ला जाति या लघुजाति के गठन में सौदागरी पूंजी के अभाव में भी सामंती राजवंश प्रमुख भूमिका निभाते हैं, जबकि रामविलास जी के विवेचन में सामंती राजसत्ता महाजातीय निर्माण में सहायता करती है, ख़ासकर एक सुकेंद्रित और निरंकुश राजसत्ता व्यापार के प्रसार से महाजाति के गठन और फलतः जातीय भाषा के गठन और प्रसार में सहायता करती है. रामविलास जी के सामने तुर्क, पठान और खासकर मुग़ल राजसत्ता का उदाहरण है. ‘भाषा और समाज’ लिखे जाने तक और उसके काफी बाद तक स्टालिन के प्रभाव में बहुतेरे भारतीय मार्क्सवादी चिन्तक यह मानते रहे कि औपनिवेशिक युग से पहले भारत में राष्ट्रीयताओं के अस्तित्व की बात करना ठीक नहीं है. हालांकि ऐसा नहीं है कि सभी मार्क्सवादी चिंतकों की धारणा यही रही हो. उदाहरण के लिए ई. एम. एस नम्बूदिरीपाद ने १९५२ में ही ‘केरल’ जाति का निर्माण काल चौदहवीं सदी से बताया था.
हम देखते हैं कि गुप्त साम्राज्य के पराभव के बाद अनेक ऐसे राजवंशों की स्थापना होती है जिनका राजनीतिक और सैनिक सत्ता संबंधी दृष्टिकोण शायद ही कभी उनकी  सीमित क्षेत्रीय सरहदों से परे जा पाता हो. आठवीं शती से भारतीय कला की स्थानीय या क्षेत्रीय शाखाएँ विकसित होने लगती हैं. बारहवीं सदी से नागरी, बांग्ला, गुजराती आदि  एक दूसरे से अलग पहचानी जा सकने वाली  लिपियों के आरंभिक रूप मिलने लगते हैं. पद्रहवीं शती तक उत्तर और पश्चिम भारत की सभी आधुनिक भाषाओं की लिपियों का पूर्ण विकास हो जाता है. चौदहवीं  सदी तक सारी ही आधुनिक भारतीय भाषाएँ पूरी तरह बन चुकी हैं और सभी में रचनात्मक  साहित्य का निर्माण शुरू हो जाता है. इस समय तक अलग अलग क्षेत्रों के साहित्य और कलाओं की  विशिष्ट सौन्दर्यशास्त्रीय परम्पराएं मिलने लगती हैं. चौदहवीं सदी से ही भारत में सांस्कृतिक अभिव्यक्तियाँ प्रमुखतः क्षेत्रीय भाषाओं और साहित्यों के इर्द-गिर्द होती हैं न कि संस्कृत या फारसी के इर्द-गिर्द, कुछ अपवादों को छोड़कर.  मोटे तौर पर आठवीं से लेकर चौदहवीं शती के बीच भारत में सामंती युग के दौरान लघुजातियों का निर्माण होता है और चौदहवीं तथा पंद्रहवीं शताब्दी से महाजातियों  के निर्माण की और संक्रमण का दौर  शुरू  हो जाता है.
यदि रामविलास जी की भारत में जाति गठन संबंधी धारणाओं की योजना में थोड़ी तबदीली की जुर्रत की जाए तो, यह योजना इस प्रकार बन सकती है-
१. आठवीं से चौदहवीं सदी तक मूलतः सामंती युग में लघु जातियों का निर्माण.
२. चौदहवीं-पद्रहवीं सदी से अठारहवीं सदी तक महाजातियों के बनने का लंबा संक्रमण काल जिसमें मुख्यतः सौदागरी पूंजी, कारीगरों की भूमिका और सहायक रूप में सुगठित केन्द्रीय सामंती सत्ता की भूमिका भी रहती है. इसे  आरंभिक आधुनिकता का काल कहा जा सकता है. इसमें जातीयता की विशेषताएं भी रहती हैं और आधुनिक राष्ट्र के बीज भी होते हैं. हिन्दी जाति के सन्दर्भ में इसे रामविलास जी के ही शब्दों में जनजागरण का काल कह सकते हैं. यहाँ हम इस बहस में नहीं उलझते की इसे भी पूंजीवाद का या सामंती और पूंजीवादी दौर के ओवरलैप का काल कहें या न कहें.
३. उन्नीसवीं सदी से आरम्भ होने वाला महाजाति के निर्माण का अगला चरण जिसमें मुख्य भूमिका भारत के सन्दर्भ में अखिल भारतीय पूंजीपति वर्ग की है, जो सामंती अवशेषों और विदेशी पूंजी पर निर्भरता के बावजूद औपनिवेशिक शासन के विरोध और मोल-तोल की जटिल प्रक्रिया से गुज़रते हुए  अनेक जातियों को एक आधुनिक बुर्जुआ राष्ट्र राज्य में एकीकृत करता है. यहाँ यह भी ध्यान देने की ज़रुरत है कि जहां एक भौगोलिक संस्कृति इकाई के बतौर भारतवर्ष की कल्पना समाज के ऊपरी वर्गों में उस दौर से मिलती है जब संस्कृत संपर्क भाषा थी, या आगे चलकर खुसरो आदि ने ‘हिन्दुस्तान’ की महिमा के गीत गाए, वहीं यह उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध और बीसवीं सदी के पूर्वार्द्ध में ही संभव हुआ कि भारतेंदु और द्विवेदी युग के तमाम लेखकों ने बड़े पैमाने पर भारत या हिन्दुस्तान के लिए कौम, वतन, राष्ट्र, जाति, नेशन आदि शब्दों का इस्तेमाल किया. यह महाजाति के आधुनिक पूंजीवादी राष्ट्र-राज्य का स्वरूप अख्तियार करने की संभावना का का सूचक  है. अजीमुल्ला खान ने १८५७ में जो राष्ट्र-गीत लिखा था, उसमें भी यही बात है-
हम हैं मालिक इसके हिन्दोस्तां हमारा
पाक वतन है कौम का, जन्नत से भी न्यारा’

इकबाल जब लिखते हैं कि- ‘हिन्दी हैं हम वतन हैं हिन्दोस्तां हमारा’ तो इन पंक्तियों में महाजातियों के आधुनिक राष्ट्र-राज्य बनने की ऐतिहासिक आकांक्षा व्यक्त होती है जो कालिदास या खुसरो के भारत वर्णन से बिलकुल अलग चीज़ है.लेकिन इस औपनिवेशिक दौर में  पूंजीपति वर्ग के नेतृत्व में चले राष्ट्रीय आन्दोलन की सबसे बड़ी कमजोरी यह रही कि वह संप्रदाय के आधार पर बंट गया और विभिन्न जातियों का जो एकीकरण जनता के स्तर पर स्वाधीनता के लिए जन-आन्दोलनों के ज़रिए हो रहा था, उन जातियों में भी सम्प्रदाय के आधार पर बंटवारा हो गया और अंततः एक नहीं, बल्कि दो बहुजातीय राष्ट्र-राज्य बन गए. यह कमोबेश वयस्क किन्तु बाद को विकलांग  आधुनिकता का काल कहा जा सकता है. रामविलास जी के शब्दों में जिसे नवजागरण कहा जाता है , वह उपरोक्त कमजोरियों के चलते जातीय जीवन की विशेषता बना नहीं रह सका. असल में यह जो तीसरा दौर है, जातीय गठन के लिहाज से सबसे जटिल दौर है.


इस दौर की जटिलता पर आने से पहले हम रामविलास शर्मा के दो व्यावहारिक  प्रस्तावों पर चंद बातें कहना चाहते हैं. पहली बात यह है कि उनकी ये बातें प्रस्ताव मात्र हैं, सैद्धांतिक प्रस्थापनाएँ नहीं हैं. एक बात यह है कि उन्होंने लिखा है कि यदि हिन्दी-उर्दू दो भाषाएँ नहीं हैं, तो क्या ही  अच्छा होता कि दोनों की एक ही लिपि यानी देवनागरी ही होती. आज जितने बड़े पैमाने पर उर्दू साहित्य की कृतियाँ देवनागरी में लिप्यन्तरित की जा रही हैं, उतने बड़े पैमाने पर किसी अन्य भाषा से अनुवाद नहीं हो रहे हैं. कारण साफ़ है. लिप्यान्तरण सहज है, भाषांतरण मुश्किल. अपने समय में रामविलास शर्मा को प्रगतिशील आन्दोलन में इस बात के लिए चाहे जितना लड़ना पड़ा  हो कि हिन्दी-उर्दू दो नहीं एक ही भाषा हैं, लेकिन बाद को  शम्सुर्रहमान  फारुकी से लेकर क्रिस्टोफर किंग तक सब यह मानते हैं कि औपनिवेशिक हस्तक्षेप से पहले ये दो भाषाएँ नहीं थीं, कि यह एक ही भाषा है और औपनिवेशिक दौर से पहले उर्दू  नाम की कोई भाषा नहीं थी. ‘ज़बान-ए-उर्दू-ए-मोअल्ला’ के कुपाठ से उर्दू संभवतः एक अलग भाषा मान ली गई. वैसे भी भाषा की पहचान क्रियापदों से होती है, जिनके क्रियापद एक हैं, वे एक ही भाषा हैं. लेकिन उनकी दो और बातों पर गौर करना चाहिए- एक यह कि हिन्दी, हिन्दवी या रेखता नाम से जो भाषा थी, उसकी लिपियाँ दो थीं. दरअसल दो लिपियाँ होते हुए भी जातीय विकास में कोई कठिनाई नहीं आई. मुल्ला दाउद, खुसरो या जायसी की प्राचीन पांडुलिपियाँ चाहे अरबी-फारसी लिपि में मिलें या देवनागरी में, उनकी भाषा जातीय भाषा ही है, लिहाजा लिपि से कोई फर्क नहीं पड़ता. रामविलास जी खुद भी यही कहते हैं. इसलिए लिपि बदलना कोई अनिवार्य चीज़ नहीं है, जातीय एकता के लिए. रामविलास जी खुद लिखते हैं, “लिपि भी संस्कृति का अंग है.” ऐसे में उनके प्रस्ताव को अरबी-फारसी लिपि को छोड़ देने के अर्थ में नहीं ग्रहण करना चाहिए, बल्कि बेहतर तो ये हो कि नागरी जाननेवालों, ख़ास कर बौद्धिकों  को प्रयास कर के अरबी-फारसी लिपि को सीख लेना चाहिए. यह जातीय एकता के लिए शुभ ही होगा. इसके अलावा यदि औपनिवेशिक हस्तक्षेप से ही सही हिन्दी- उर्दू दो भाषाएँ बन गई हैं, उनकी अलग साहित्यिक परम्पराएं दो सौ सालों में निर्मित हो गईं हैं, तो बगैर एक को दूसरे के मातहत बनाए साहित्य-संस्कृति के स्तर पर दोनों को नज़दीक लाने के  शैक्षणिक, प्रशासनिक और वैदुषिक प्रयास बढाने की दिशा में हमें काम करना चाहिए. आखीर सोवियत संघ में तो ऐसी लिपियों को भी पुनर्जीवित किया गया, जो मृतप्राय थी.


रामविलास जी का एक सुझाव यह भी था कि हिन्दीभाषी सभी प्रदेशों का एक प्रदेश बनना चाहिए. यह भी सुझाव या प्रस्ताव ही है, कोई सैद्धांतिक प्रस्थापना नहीं. वास्तव में आज के दौर में जातीय निर्माण के लिए आर्थिक जीवन ही निर्णायक तत्व बना हुआ है. उपनिवेश रहे देश आज़ाद तो हुए लेकिन विश्व-पूंजीवाद के साथ उनके शासक तबकों का निर्भरता का सम्बन्ध बढ़ता ही चला गया है. उपनिवेशवादी और साम्राज्यवाद के पुराने रूप में  एक विकसित राष्ट्र  दूसरे को प्रत्यक्षतः और राजनीतिक तौर पर गुलाम बना लेता था. तब अनेक उत्पीडित जातियां ऐसी साम्राज्यवादी शक्तियों  के खिलाफ संघर्ष में एकताबद्ध होती थीं. आज नव-साम्राज्यवाद के दौर में राष्ट्रीय स्तर का पूंजीपति वर्ग खुद दलाल के रूप में उनका हित-पोषण करता है. ऐसे में किसी बाहरी शक्ति द्वारा एक ही भौगोलिक-सांस्कृतिक क्षेत्र की तमाम जातियों का एक समान प्रत्यक्ष  शोषण नहीं होता, बल्कि इसके रूप बहुत अलग हो गए हैं. राष्ट्रीय स्तर के पूंजीपति वर्ग अपने-अपने देशों में साम्राज्यवादी देशों की प्राथमिकता के अनुकूल पूंजीवादी विकास करते हैं जो बहुजातीय राष्ट्र में कभी एक जाति की कीमत पर दूसरी जाति का विकास करने के रूप में प्रकट होता है, कभी आतंरिक उपनिवेशन के रूप में. कभी एक ही भाषिक प्रदेश के भीतर असमतल विकास के कारण विकासहीनता के शिकार लोगों का अलगाव अपना अलग प्रदेश माँगने के आन्दोलनों में प्रकट होता है, भले ही जातीय दृष्टि  से वे एक हों. यह सब कुछ विश्व पूंजी द्वारा सतत निर्मित केन्द्रों और परिधियों के बीच संघर्ष के राष्ट्र राज्य के दायरे में प्रतिफलित रूप हैं. ये केंद्र और परिधियाँ विकसित और अविकसित या विकासशील देशों के बीच, किसी भी राष्ट्र  के भीतर एक जाति  और दूसरी जाति  के बीच, किसी भी जाति  के एक क्षेत्र और दूसरे क्षेत्र के बीच, गाँव और शहर के बीच- यानी अनेक स्तरों पर दिखाई देती हैं.
ऐसे में जातीय समस्या और विकट हुई है. अलग राज्य के कई आन्दोलनों में वास्तविक वंचना के कारण ही आम लोग वहां के छोटे  पूंजीपति, स्थानीय व्यापारी  और मध्य वर्ग के पीछे गोलबंद होते हैं जैसे कि उत्तराखंड और झारखंड आन्दोलनों में हुआ. (झारखंड आन्दोलन न सिर्फ सबसे पुराना है, बल्कि उसका जातीय पक्ष भी मज़बूत था. यह आन्दोलन मूलतः आदिवासियों का था जिनकी अस्मिता जातीय गठन के सभी तत्वों को ध्यान में रखते हुए हिन्दी, बाँग्ला और उड़िया जातियों से निश्चय ही अलग है. आज का झारखंड प्रदेश सिर्फ बिहार से अलग हुए क्षेत्र से निर्मित है, जबकि झारखंडी जन के निवास-क्षेत्र का अच्छा-खासा हिस्सा अभी भी बंगाल, उड़ीसा आदि  प्रदेशों  में पड़ता है.) ऐसे आन्दोलनों को लेकर मार्क्सवादियों का दृष्टिकोण सकारात्मक होना चाहिए.  लेकिन जहां ऐसा नहीं है और शासक जमात के कुछ हिस्से सिर्फ किसी उप-राष्ट्रीयता को आधार बनाकर सत्ता में अधिक हिस्से के लिए अलग प्रांत की मांग करते हैं, वहां अक्सर ही उन्हें जन समर्थन  नहीं मिलता जैसे कि हरित प्रदेश या पूर्वांचल या भोजपुरी प्रदेश की मांग. इन फर्जी आन्दोलनों के प्रति दृष्टिकोण अलग होना चाहिए.  इस दौर  में जिस हद तक वर्ग संघर्ष तेज़ होगा, जिस हद तक साम्राज्यवाद-प्रेरित विकास के माडल के खिलाफ जन-गोलबंदी होगी, उसी हद तक जातीय समस्या  का भी निदान होता चलेगा. एक जाति का एक राज्य एक आदर्श है, यूटोपिया है, स्वप्न है जो रामविलास जी ने देखा था. लेकिन किसी भी स्वप्न को वास्तविकता में तब्दील करने के लिए वास्तविकता से ही शुरू करना होगा.
आज यह बात स्पष्ट है कि समाजवादी क्रान्ति के प्रथम प्रयोग में आरम्भ में सोवियत संघ में जातीय समस्या को जिस उदात्त, जनवादी स्तर पर हल करने की कोशिश की गई, जहां सभी जातियों को आत्मनिर्णय का अधिकार संविधान-प्रदत्त था, वहां भी आर्थिक विकास की असमानता और किसी हद तक स्टालिन के बाद रूसी जाति के राजनीतिक वर्चस्व के कारण जातीय असंतोष अच्छे-खासे स्तर तक पहुंचा हुआ था और सोवियत विघटन के अनेक कारकों  में से एक कारक  वह भी अवश्य बना. आज पड़ोसी देश नेपाल में जातीय आधार पर प्रान्तों के गठन  के वहां के माओवादियों के प्रस्ताव पर राजनीतिक सहमति न बन पाने के चलते संविधान-निर्माण का काम बाधित पड़ा  हुआ है. मुश्किल यह भी है कि इस सवाल पर नेपाली कम्युनिस्ट पार्टी (एमाले) भी माओवादियों से सहमत नहीं है. भारत में भी अलग राज्य के लिए या उप-जाति के आधार पर किसी प्रांत के भीतर  स्वायत्तशासी क्षेत्र बनाने के आन्दोलनों पर सभी कम्युनिस्ट दल एकमत नहीं होते. इन कुछ उदाहरणों से यह समझा जा सकता है कि अभी भी जातीय गठन का मुद्दा  खुद कम्युनिस्ट आन्दोलन में सैद्धान्तिक और व्यावहारिक स्तर पर समृद्ध किए जाने की मांग करता है.

 Pranay Krishna, Photo By Vijay Kumarप्रणय कृष्‍ण। इलाहाबाद युनिवर्सिटी और जेएनयू से अध्‍ययन। प्रखर हिंदी आलोचक। जन संस्‍कृति मंच के महासचिव।  देवीशंकर अवस्‍थी सम्‍मान  से सम्मानित ।

साभार- कथा-17 

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