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मुक्तिबोध: ‘अंधेरे’ के उस महाकवि से बहुत कुछ सीखना बाकी है: रामजी राय

(रचनाओं से अधिक लेखकों की चर्चा करने वाला समाज सही अर्थों में साहित्यिक समाज नहीं कहा जा सकता . लेखक के प्रभा -मंडल का रचनाओं के प्रकाश – वृत्त से अधिक चमकीला हो जाना पढने वाले समाज के बरक्स पूजने वाले समाज की ओर संकेत करता है . अभी शताब्दियों के बहाने अज्ञेय को उनकी तेजी से बढ़ती हुयी अप्रासंगिकता से बचाने की खूब कोशिशें हुईं . लेकिन उनकी कौन सी रचना नए सिरे से उभर कर सामने आयी है ? किन रचनाओं के अलक्षित किन्तु कालजयी महत्व के बारे में हिंदी पाठकों की जानकारी में इज़ाफा हुआ है ? कौन -सी रचनाओं को हिंदी के नए पाठक -समाज की स्वीकृति और सराहना मिली है ?रचना से अधिक व्यक्ति की चर्चा चर्चाकारों के पूजापाठी संस्कारों के अलावा लेखक की रचनात्मक विरासत की कमजोरी की तरफ भी इशारा करता है.

अगले साल मुक्तिबोध की मृत्य के पचास साल पूरे हो रहे हैं . ”अँधेरे में ” के प्रकाशन के भी. इस आधी सदी में हमने अपने लोकतंत्र में इस कविता को क्रमशः उतरते देखा है . जैसे कविता में दर्ज दुस्स्वप्न को फलीभूत होते हुए . इस कविता को फिर से पढ़ने , समझने और इस पर चर्चा करने का यह मुनासिब वक्त है . जरूर चर्चा के दौरान असहमति , आलोचना और विरोध के स्वर भी मुखर हों , क्यंकि बहसों के झंझावात मन ही विचार के फूल खिलते हैं . आशुतोष कुमार )

मुक्तिबोध- हरिपाल जी की कूची से

मुक्तिबोध- हरिपाल जी की कूची से

By रामजी राय

मुक्तिबोध की 1943-44 के बाद की सारी कविताओं  का केंद्र है ‘‘सत्य से सत्ता के युद्ध का रंग’’, खासकर आजादी के बाद की कविताओं का तो जैसे यह एकमात्र केंद्रीय तत्व बन गया। मुक्तिबोध के यहां इसी को आत्मसात और अभिव्यक्त करने का नाम है ‘नई कविता का आत्मसंघर्ष’। यथार्थ में इस संघर्ष के मार्ग की अड़चनें और रुकावटें भी होती हैं। और यथार्थ में वर्ग हैं और वर्गसंघर्ष है सो, कोई भी आत्मसंघर्ष अनिवार्यतः इस वर्ग संघर्ष का अंग है। मुक्तिबोध के यहां साधना नहीं, संघर्ष ही केंद्रीय पद है। वर्गसंघर्ष, आत्मसंघर्ष और चेतना के संघर्ष के त्रिकोणात्मक रूप में।  वैसे ही जैसे “हमारा जीवन त्रिकोणात्मक है- बाह्य जगत अर्थात वर्ग जगत; बाह्य की क्रियाओं और रूपों को आत्मसात करता और उसके विरुद्ध या अनुकूल प्रतिक्रियाएं करता बाल्यकाल से निर्मित होता आ रहा हमारा  अंतर्जीवन;  इन दोनों भुजाओं की आधार-रेखा हमारी अपनी चेतना कि जो चेतना इन दो भुजाओं के बिना अपना स्वरूप और आकार ही स्थापित नहीं कर सकती।”  कलात्मक संघर्ष यही है – तत्व के लिए संघर्ष, दृष्टि विकास का संघर्ष और अभिव्यक्ति को सक्षम बनाने का  संघर्ष। बेशक सापेक्षिक रूप से स्वायत्त अपने गति-नियमों के साथ। इसकी विशद व्याख्या मुक्तिबोध ने  ‘कला का तीसरा क्षण’ नामक निबंध में व अन्यत्र भी  की है।

जितना ही तीव्र है द्वंद्व क्रियाओं -घटनाओं का

बाहरी दुनिया में

उतनी ही तेजी से

भीतरी दुनिया में चलता है द्वंद्व कि

फिक्र से फिक्र लगी हुई है। (अंधेरे में)

भीतर का दूसरा हिस्सा भी

चुप नहीं है

भीतर का दूसरा पक्ष भी

चुप नहीं है

फैलाता आग भरे हमले की धूम

तड़ातड़ टकराने लगी हैं

विचारों की लाठियां

हवाओं में घूम!

खून रंगे माथों को चूम

खयालों की मुंडेर से जोरदार

पत्थरों की खूब बौछार

भयानक! दंगा है भीतरी हिस्सों में तेज,

फेंककर मारी जातीं कुर्सियां

माथों को तोड़ती है मेज

विधान की अंतः सभाओं में

वारदातें सनसनीखेज!!… (चंबल की घाटियां)

  ‘‘साहित्य जीवन की पुनर्रचना होती है’’ और इस पुनर्रचना में रचनाकार के संवेदनात्मक उद्देश्य की भूमिका महत्वपूर्ण होती है। मुक्तिबोध ने इस संवेदनात्मक उद्देश्य के महत्व और उसे पहचाने  जाने  पर बहुत बल दिया है।  दृष्टि विकास का संघर्ष मुक्तिबोध के आत्म संघर्ष का एक प्रमुख तत्व रहा है। ज्ञान के क्षेत्र में अद्यतन खोजों का आलोचनात्मक नजरिए से विश्लेषण करते हुए अपने सिद्धांत को विकसित और अद्यतन बनाने का संघर्ष मुक्तिबोध के संवेदनात्मक उद्देश्य का अंग है। डा. रामविलास शर्मा का मुक्तिबोध से टकराव खासकर इसी एक बात पर सबसे अधिक है। वे इसे मार्क्सवाद को अद्यतन बनाया जाना नहीं मानते हैं इसीलिए उन्हें रहस्यवाद, अस्तित्ववाद और फ्रायड आदि के साथ मार्क्सवाद का समन्वय दिखता है। इस पर यहां चर्चा की गुंजाइश नहीं है। इस विषय में स्वतंत्र रूप से विचार किया जाना चाहिए। मुक्तिबोध के संवेदनात्मक उद्देश्य से इस या उस वजह से अलगाव में पड़ जाना भाष्यकारों की मूल समस्या रही है। सच-सच बातों को वह सीधे-सीधे कहने को तड़प गया। अपने कहे जानेवालों ने  उस समय भी उनकी अनसुनी की और आज भी अनसुनी छोड़  देना चाहते हैं। आखिर क्यों?

 क्योंकि – ‘जगत-समीक्षा की हुई उसकी, विवेक-विक्षोभ महान उसका, अंधेरे में रहकर भी द्यृति-आकृति-सा भविष्य का नक्शा दिया हुआ उसका’, वे सह नहीं सकते थे। क्योंकि ‘‘वे बहुत असुविधकारक थे, वे मूल्य सत्य थे इस जग के परिवर्तन के, उनसे होता पट-परिवर्तन, यवनिका-पतन मन में जग में’’। ये मूल्य-सत्य सहानुभूतिकर्ता बनने भर की नहीं बल्कि अपने क्रियागत परिणति के लिए  कम से कम सक्रिय कार्यकर्ता बनने की मांग करते हैं।

उसके अपने कहे जानेवाले विभिन्न कारणों से उस कैंड़े के थे नहीं, जिस कैंड़े का वह था कि कह पाते

‘‘नहीं, नहीं, उसको मैं छोड़ नहीं सकूंगा

सहना पड़े जो मुझे भले ही।’’

अंधेरा उसके लिए कविता की टेकनीक नहीं थी, न ही वह उसकी गुप्त पीड़ाओं, चिंताओं या कि उसकी आत्मग्रस्तता से उपजता था (उसकी कविता में मौजूद अंधेरे को उसके प्रशंसकों, आलोचकों ने इन्हीं रूपों में देखा हैं ) वह यथार्थ था, उसके समय और समाज का अंधकार था, जिसे गश खाकर गिरते होरी की आंखों में छाते हुए प्रेमचंद ने देखा था, जिसे निराला ने देखा था –

‘‘…उगलता गगन घन अंधकार

खो रहा दिशा का ज्ञान

स्तब्ध है पवन चार’’

या कि ‘‘गहन है, यह अंधकारा’’ और जिसे मुक्तिबोध ने भी देखा

‘‘चिंता हो गई, कविता पढ़ते ही

उसमें से अंधेरे का भभकारा उमड़ा’’।

चिंता इसलिए भी कि ऐसा नहीं होना था। आजादी मिलने के साथ तो इस अंधेरे को खत्म होते जाना था। लेकिन यह और भी बढ़ता जा रहा है। इस आजादी के साम्राज्यवाद से समझौतापरस्ती की असलियत को दूसरे कई अन्य लोगों ने भी देखा, इसे कहा और लिखा भी। शुरुआती दौर में कम्युनिस्ट पार्टी ने तो इस आजादी को ‘झूठी आजादी’ कहा। प्रगतिशील कवियों ने इस पर कविताएं भी लिखीं। लेकिन  विकसित हो रहे नए यथार्थ की गहनता उन कविताओं में न थी।

सब कुछ के बावजूद आजादी स्वयं में एक नया यथार्थ थी। इसके आकर्षण थे, व्यामोह, झांसे और कुटिलताएं थीं। इस ऐयारी चांदनी के अंदर लोगों की तकलीफें बढ़ रही थीं, गरीब, किसान, मजदूर जगह-जगह इसके खिलाफ आंदोलनों, हड़तालों आदि में उतर रहे थे, सरकार उन्हें पुलिस-दमन के जरिए दबा रही थी लेकिन खुद कम्युनिस्ट पार्टी धीरे-धीरे इस सबसे किनारा कसने लगी थी। पहले सैद्धांतिक स्तर पर फिर व्यवहार में भी। तीसरी पार्टी कांग्रेस के प्रस्ताव में कहा गया: ‘शांति के लिए भारत का संघर्ष घनिष्ठ रूप में भारत की पूर्ण और निर्बंध राष्ट्रीय स्वाधीनता के प्रश्न के साथ जुड़ा हुआ है। इस स्वाधीनता का अर्थ है पहले अंग्रेजों के नियंत्रण से मुक्ति और सामंतवाद को खत्म करना।’ पार्टी की तीसरी कांग्रेस दिसंबर 53-जनवरी 54 में हुई। इसमें गौर करने लायक है प्रस्ताव का पहला हिस्सा। इसमें शासक वर्ग से कम्युनिस्ट पार्टी के समझौते की गंध मिल रही थी, बजरिए विदेश नीति। नेहरू की ‘प्रगतिशील विदेश नीति’ पूर्ण और निर्बंध राष्ट्रीय स्वाधीनता की प्रमुख आधार बन गई । किसी भी देश की विदेश नीति गृहनीति का ही विस्तार होती है। इस नाते थोड़ा संदेह करने के लिए भी गृहनीति की जांच-परख कर लेनी चाहिए थी। दूसरे कि  भारत में साम्राज्यवाद था तो लेकिन प्रत्यक्ष तौर पर नहीं। उसका रूप बदल गया था। इसलिए प्रधान अंतर्विरोध भी बदल गया था। इस प्रस्ताव में ‘तथा सामंतवाद को खत्म करना’कहने के जरिए उस प्रधान बन गए अंतर्विरोध को गौण बना देने की गंध भी मौजूद है। बाद  में यह कहा जाने लगा कि ‘भारत की स्वाधीनता और अर्थतंत्र को सुदृढ़ करने का संसाधन है ’सोवियत संघ और चीन से भारत के संबंध। (चौथी  कांग्रेस, 1956)। साफ-साफ कहा गया कि ‘पूंजीपति वर्ग साम्राज्यवाद का विरोध करता है, राष्ट्रीय अर्थतंत्र पर उसकी पकड़ को ढीला करने की कोशिश करता है लेकिन इसके साथ ही विदेशी पूंजी के और अधिक आयात के लिए सुविधाएं देता है।’रामविलास शर्मा कहते हैं कि यह स्थिति का सही वर्णन है और टिप्पणी करते हैं ‘साम्राज्यवाद से देशी पूंजी के अंतर्विरोध बने हुए हैं, साथ ही विदेशी पूंजी के और अधिक आयात के लिए सुविधाएं भी वह देता है।’लेकिन नतीजा क्या निकला? शासक वर्ग से कम्युनिस्ट पार्टी का साझा। बाद की कथा सबको मालूम है – ‘एक शम्मा थी दलीले शहर सो वह भी खामोश’ – ‘काला समुंदर ही लहराया, लहराया!’ जिसके कि होने में गहन अंशदान तुम्हारा।

यहां एक बात नोट कर लेनी चाहिए कि इसके साथ कम्युनिस्ट पार्टी के अंदर सैद्धांतिक अंतर्विरोध भी बढ़ने लगे और आंतरिक बहसें तेज हो गईं। साथ ही यह भी कि सैद्धांतिक धरातल पर मुक्तिबोध पर भी इसका प्रभाव दिखता है, मुख्यतः विदेश नीति वाले मसले पर। जिसका हवाला मुक्तिबोध संबंधी अपने पुनर्मूल्यांकन वाले लेख में डा. शर्मा ठीक ही देते हैं, लेकिन यह प्रभाव केवल व्यावहारिक धरातल तक ही सीमित है, जीवनानुभवों, संवेदनात्मक अनुभवों के धरातल पर नहीं। वहां स्थिति इसके ठीक उलट है। इस पर चर्चा उचित जगह पर आगे होगी। कुल मिलाकर यह 1947 के बाद का , नया यथार्थ था और इसकी अनिवार्य मांग हो गई, ‘इसका तू शोध कर, इसका तू भाष्य कर।’

‘काली उन लहरों को पकड़कर अंजलि में

जब-जब मैं देखना चाहता हूं-

क्या हैं वे? कहां से आई हैं?

किस तरह निकली हैं

उद्गम क्या, स्रोत क्या

उनका इतिहास क्या

काले समुंदर की व्याख्या क्या, भाष्य क्या’

और मुक्तिबोध इस नए यथार्थ का, इस बाहर-भीतर पसर रहे अंधेरे का उसकी संपूर्णता में निरीक्षण-आत्मनिरीक्षण, उसके मूल कारणों, उससे पैदा हो रहे प्रश्नों, प्रश्नों के कारणों को जानने और उसकी एक-एक लहर का चित्रण करने के काम में दम साधे, पूरे मनोयोग, धीरज और हां, पूरी जिज्ञासा, कहिए जिज्ञासा का पूरी तरह शिकार होकर उतर पड़ते हैं। जिज्ञासा जो ‘बाल्यकाल, नवयौवन और तारुण्य के विभिन्न उषःकालों में हृदय का छोर खींचती हुई, आकर्षण के सुदूर ध्रुव-बिंदुओं से हमें जोड़ देती है।… ‘देखने’ की इच्छा, ‘जानने’ की इच्छा, ‘रहस्य’ की उलझी हुई बातों को सुलझाने की इच्छा, कितनी मनोहर, कितनी दुर्निवार और अदम्य हो सकती है, यह उसी से जाना जा सकता है जो जिज्ञासा का शिकार है। ’सुदूर नेब्युला से लेकर आभ्यांतर निराले लोक तक, अति निकट वर्तमान से लेकर सुदूर अतीत तक, अपने देश से लेकर देश-देशांतर तक की इस साहस और जोखिम भरी जिज्ञासा-यात्रा में ‘सहसा’, ‘अचानक’, ‘यकायक’, ‘अकस्मात’ बहुत कुछ दिखता, लुप्त होता, मिलता, खोता, आता, जाता रहता है। भय और पुलक की चिहुंकन और सिहरन, खतरनाक अघट घटनाओं की थरथरी आदि बहुत कुछ अनुभव के हिस्से बनते रहते हैं। ‘साहित्य और जिज्ञासा’ नाम से उनका एक छोटा-सा लेकिन बहुत बेहतरीन निबंध है। अपने इस निबंध में मुक्तिबोध लिखते हैं, ‘उम्र में बढ़कर, जब हमें ‘ओपीनियन’ बनाने की आदत पड़ जाती है, जब हम बुद्धिमान और बुद्धिवादी बन जाते हैं तब हमारे दिमाग की बाल-कमानी यानी जिज्ञासा पुरानी और घटिया हो जाती है। तब इसे किसी बालक को जरूरत पड़ती है, जो यह टाइमपीस तोड़कर देखे कि उसकी भीतरी बनावट क्या है।

 ‘लेकिन पुराने बालकों में ऐसे लोग भी निकलते हैं, जिनमें जिज्ञासा की तीव्र दृष्टि और आग्रहशीलता के साथ उस ओर यौवनसुलभ श्रम करने की प्रवृत्ति और खोज के आधार पर वृद्धसुलभ अनुभवपूर्ण मत बनाने की शक्ति रहती है। साहित्य इस जिज्ञासा का ऋणि है।’ और हिंदी साहित्य मुक्तिबोध और नागार्जुन की जिज्ञासा का ऋणि रहेगा। मुक्तिबोध की कविताओं में स्वप्न सौंदर्य पर तो कई एक का ध्यान गया है, बल्कि जरूरत से ज्यादा ही और कुछ ने तो इसे उनकी वृत्ति ही मान लिया – ‘स्वप्न उनकी वृत्ति है, वे चीजों को स्वप्न में परिवर्तित किए बगैर समझ ही नहीं पाते’ – और इसके लिए उनकी काफी लानत-मलामत भी की है, लेकिन मुक्तिबोध की इस जिज्ञासा-वृत्ति और इस नाते उनके काव्य सौंदर्य के एक लगभग अछूते पक्ष की तरफ अभी लोगों का ध्यान नहीं गया है।

मुक्तिबोध ने साहित्य और जिज्ञासा नामक अपने इस निबंध में एक और महत्वपूर्ण बात कही है – ‘कहा जाता है कि साहित्य हृदय की भावनाओं से उत्पन्न होता है। इसमें यह और जोड़ देना चाहिए कि भावना जिज्ञासा की पैठ के बिना, उसके द्वारा की जानेवाली तटस्थ तथा तीव्र खोज के, ऊंचा साहित्य उत्पन्न नहीं कर सकती। ध्यान में रखने की बात यह है कि भावना, जिसके प्रति वह है उसके प्रति आकर्षण या विरोध के (बिना) काम नहीं कर सकती। अर्थात, वह पक्ष या विपक्ष में ही काम कर सकती है। किंतु जिज्ञासा के द्वारा की गई यथार्थवादी खोज से प्राप्त ज्ञान के आधार पर, और उसकी सहायता से, चलनेवाली भावना अलग होती है। वह एक चरित्र या स्थिति के विश्लेषण के टुकड़ों को फिर से जोड़कर समन्वय और सामान्यीकरण करती है। किंतु वह इतना करके ही चुप नहीं रहती, चरित्र के विकास के मूल कारणों की खोज करती है, प्रश्नों के कारणों का अनुसंधान और उनका चित्रण करती है। और इस दृष्टि से वह चित्रण और स्थिति दोनों के प्रति अधिक न्याय करती है।’

नए यथार्थ के सर्वेक्षण का यह काम उनकी कविताओं में इस रूप में प्रस्तुत है मानो एक फील्ड वर्क हो, जमीनी सर्वेक्षण –

‘ओ नागात्मन,

संक्रमण-काल में धीर धरो

ईमान न जाने दो!!

तुम भटक चलो

इन अंधकार मैदानों में सर-सर करते…

खोदो, जड़ मिट्टी को खोदो!

ओ भूगर्भशास्त्री,

भीतर का बाहर का

व्यापक सर्वेक्षण कर डालो।’

और सर्वेक्षण इसलिए कि यह एक सामाजिक दायित्व है, जिसे वहन करना है –

‘वे आते होंगे लोग

जिन्हें तुम दोगे

देना ही होगा, पूरा हिसाब

अपना, सबका, मन का, जन का।’

इसीलिए मुक्तिबोध की कविताएं एक ही साथ बाहर और भीतर दोनों तरफ चलती हैं। इस दायित्वबोध के साथ चरित्र, चरित्रों की बाहरी-भीतरी स्थितियां, चरित्रों का विकास, विकास के मूल कारण, प्रश्न, प्रश्नों के कारण, लोग, लोगों की गतिविधि, मनोहर वाद-विवाद, संवाद, बहसें, टकराहटें व उलझाव और इनमें से बदलते जगत का चेहरा, अपनी पूरी प्रक्रिया के साथ चित्रित हैं। मुक्तिबोध के यहां काव्य सौंदर्य, काव्यानुभव, काव्याभिव्यक्ति अर्थात सब कुछ एक प्रक्रिया है। इस प्रक्रिया से अलग रहकर मुक्तिबोध के काव्य सौंदर्य को नहीं समझा जा सकता। लेनिन ने अपनी किताब ‘भौतिकवाद और अनुभवसिद्ध आलोचना’ में एक जगह लिखा है, ‘सत्य एक प्रक्रिया है। इस प्रक्रिया से अलग सत्य कुछ नहीं है।’

ऊपर से देखने पर मुक्तिबोध का काव्यशिल्प एक जैसा लगता है। लेकिन एक जैसे लगते काव्यशिल्प के अंदर काफी विविधता है। खोज की यह प्रक्रिया इस विविधता का आधार है। एक ही कविता में जिस तरह कई-कई स्थितियां, कथाएं, कथाओं की उपकथाएं, चरित्र, नाटकीय मोड़, संवाद, मनोहर वाद-विवाद, उद्बोधन, आत्मउद्बोधन आदि हैं, उसी अनुरूप एक ही कविता के अंदर कई शिल्प और भाषा के कई स्तर, कई भंगिमाएं हैं। हर कविता सधी हुई हो सो बात नहीं। कई कविताओं में अटकाव है और अभिव्यक्ति उलझी हुई। कुछ कविताओं में ब्यौरे लंबे हैं, कई जगह अनावश्यक भी। ध्यान देने की बात है कि कई कविताएं किसी दूसरी कविता का पूर्वाभ्यास लगती हैं। उदाहरण के लिए ‘एक टीले और एक डाकू की कहानी’ नामक कविता ‘चंबल की घाटियां’ कविता का पूर्वाभ्यास लगती है, तो कई बार एक कविता की कोई पंक्ति दूसरी किसी कविता में अधिक परिमार्जित-विकसित और संक्षिप्त रूप में आती है, तो कई बार एकाध-दो पंक्तियों में आकर अपनी किसी पूर्व स्थिति, पूर्व संदर्भ का बोध कराती लगती है और कई बार तो कुछ भिन्न तरह से आकर पहले की कविता-स्थिति, अनुभव, निष्कर्ष की समीक्षा के उपर टिप्पणी या उसमें संशोधन-परिवर्तन का आभास देती हुई अपनी नई स्थिति को जताती हुई लगती है। ‘अंधेरे में’  का इस दृष्टि से अध्ययन दिलचस्प होगा। कुल मिलाकर ऐसा लगता है मानो कविताएं एक-दूसरे से मिलकर किसी समग्र को अभिव्यक्त कर रही हों या कि एक में मिलकर कोई एक ही कविता बना रही हों। मुक्तिबोध खुद भी कहते थे कि मैं हर रूप में कविता में, कहानियों में एक बात को अभिव्यक्त कर देने के प्रयास में लगा रहता हूं। इसलिए अपनी ही इतनी काट-छांट, इतना संशोधन, इतना लिखना

‘कि फिर भी वह अधूरा था अधूरा…

केवल भावना से काम चलना खूब था मुश्किल

…हमें था चाहिए कुछ वह

कि जो ब्रह्मांड समझे त्रस्त जीवन को

हमें था चाहिए कुछ वह

कि जो गंभीर ज्योतिःशास्त्र रच डाले

नया दिक्काल-थियोरम बन

प्रकट हो भव्य सामान्यीकरण

मन का

कि जो गहरी करे व्याख्या

अनाख्या वास्तविकताओं

जगत की प्रक्रियाओं की

कि पूरा सत्य

जीवन के विविध उलझे प्रसंगों में

सहज ही दौड़ता आए –

स्मरण में आए –

मार्मिक चोट के गंभीर दोहे सा

कि भीतर से सहारा दे

बना दे प्राण लोहे सा।’

‘यही थी भूमिका हम तुम मिले थे जब।’

इस खोज-यात्रा में मुक्तिबोध ने बहुत कुछ देखा। देखा चमचमातों की धाक है, भीड़ है, भड़क्का, है, जमाना उचक्का है। देखा शोषण की अति मात्रा, स्वार्थों की सुख-यात्रा से, आत्मा से जाते हुए अर्थ और मरी हुई सभ्यता को। दार्शनिक दुखों की गिद्ध सभा और उस दार्शनिक आत्मा को भी देखा, स्वर दबा सिसकते जो जब जीवित थी, जन-उत्पीड़न विभ्राट-व्यवस्था के सम्मुख, छाया जीवन जीकर भी, उदर-शिश्न के सुख भोगती रही, आध्यात्मिक गहन प्रश्न के सुख भोगती रही। जीने से पहले ही समस्याओं के हल को मरते हुए देखा। चंबल की घाटी को देश में बदलते और खतरनाक लूटपाट, आग डकैतियां होते देखा। काले समंदर का पश्चिमी किनारे से नाता और जमाने का चेहरा देखा जहां साम्राज्यवादियों की चलती है; उसकी पैसे की संस्कृति, भारतीय आकृति में बंधकर, दिल्ली को वाशिंगटन और लंदन का उपनगर बनाने पर तुली है और भारतीय धनतंत्री, जनतंत्री बुद्धिजीवी स्वेच्छा से उसी का ही कुली है। देखा बड़े प्रेम से बटन होल में फूल लगाकर, अपने मालिक के ये चाकर खद्दरधारी प्यारे मिस्टर जनरल डायर को, उन्हें लीलने आई नारे भरी खचाखच सड़क पर, मंचों पर से फायर-फायर भौंकते। देखा इस महा कंस से भय खाकर आत्मोत्पत्र सत्य, अनुभव बालक को कचरे के ढेरों, कुओं, बावडि़यों, सुनसान रास्तों पर चुपचाप फेंके जाते और देखा उस अनुभव बालक की आक्रोश मुख-गरिमा का सौंदर्य। देखा उपेक्षित काल-पीडि़त सत्य के समुदाय, असंख्य स्त्री-पुरुष-बालक भटकते हैं। किसी की खोज है उनको, किसी नेतृत्व की, जो सिर्फ इंसान होने की हैसियत चाहते हैं, जैसे आसमान, पेड़ या मैदान एक शानऔर हैसियत रखते हैं, वैसे ही और ठीक उसी ठोस और पक्की बुनियाद पर जो अपने लिए इज्जत तलब करते हैं। बराबरी का हक, बराबरी का दावा, नहीं तो मुठभेड़ और धावा। देखा लड़ाइयां और लड़ाइयों के मोर्चे। और इस भयानक अंधेरे में भी देख लिया देश की गहन मृतात्माओं को दल बांध रात में फासिस्टी जुलूस में चलते, जिसमें नेता और धनपति, अखबारपति, बड़े-बड़े श्रीमुख, प्रकांड आलोचक-कवि-साहित्यकार से लेकर तो शहर के कुख्यात डोमी जी उस्ताद तक को शामिल। देखा किसी जनक्रांति के दमन निमित्त मार्शल लाॅ को लगते। और इस सर्वेक्षण की प्रक्रिया में ही मुक्तिबोध विकसित करते हैं अपनी वह काव्य भाषा जो ‘मानो वह गहरे जनसंकट का प्रसंग हो या युग-युग की अनुभव पीड़ा के विस्फोटों के उत्पन्न ज्वलंत पत्थर कोयले के दुर्धर स्फुलिंग हो।’या कि ‘सत्य से सत्ता के युद्ध का रंग’ हो। खासकर आजादी के बाद और उसमें भी 54 से लेकर 64 तक की कविताओं में युद्ध का यह रंग और अधिक गहरा और सुर्ख होता गया।

यह सर्वेक्षण इतना गहन व विस्तृत, इसका चित्रण और अभिव्यक्ति इतनी यथार्थ है कि इसके जरिए थोड़े ही और श्रम से स्वतंत्र भारत के आज तक का सामाजिक-सांस्कृतिक इतिहास लिखा जा सकता है।

नए भारत की खोज

एक महत्व की बात घटित हुई, इस प्रक्रिया में गुणात्मक अंतर आ गया – नए यथार्थ की यह खोज नए भारत की खोज में बदल गई।

‘प्रतिष्ठित राज्य-संस्कृति के प्रभावी दृश्य

सुंदर सभ्यता के तुंग स्वर्ण-कलश

सब आदर्श

उनके भाष्यकर्ता ज्ञानवान महर्षि

ज्योतिर्विद, गणितशास्त्री, विचारक, कवि

सभी वे याद आते हैं

प्रतापी सूर्य हैं वे सब प्रखर जाज्वल्य

पर, यह क्या

अंधेरे स्याह धब्बे सूर्य के भीतर बहुत विकराल

धब्बों के अंधेरे विवर-तल में से

उभरकर उमड़कर दल बांध

उड़ते आ रहे हैं गिद्ध

पृथ्वी पर झपटते हैं!

निकालेंगे नुकीली चों से आंखें

कि खएंगे हमारी दृष्टियां ही वे!’

अपनी प्राचीन गौरवशाली सभ्यता और संस्कृति की बेहद सटीक व्याख्या और उसके प्रति बेहद ताकतवर और धारदार नजरिया और कितना रोमांचित और सजग करनेवाला।

‘मन में ग्लानि, गहन विरक्ति… भयानक क्षोभ।’

‘मेरी छांह …खड़ी स्तब्ध

उसके गहन चिंताशील नेत्रों में

विदारक क्षोभमय संतप्त जीवन दृश्य क्रमागत तिर रहे से हैं।

जहां भी डालती वह दृष्टि

संवेदन-रुधिर-रेखा-रंगी तस्वीर तिर आती

गगन में, भूमि पर सर्वत्र दिखते हैं

तड़प मरते हुए प्रतिबिंब

जग उठते हुए द्युति-बिंब

दोनों की परस्पर-गुंथन

या उलझाव लहरीला

व उस उलझाव में गहरे

बदलते जगत का चेहरा।’

इस नजर से ‘अंतःकरण का आयतन संक्षिप्त है’ एक बेहद खूबसूरत और महत्व की कविता है। बहरहाल, अब

‘झूठी है संगति

झूठी हैं बुद्धियां

सब आत्मशुद्धियां झूठी…’

जैसे ‘ब्रह्मराक्षस’ कविता के निरंतर शुद्धि-स्नान पर बेलौस टिप्पणी। कवि के सामने एक ही सवाल रह जाता है

‘कि सारे प्रश्न छलमय

और उत्तर और भी छलमय

समस्या एक

अपने सभ्य ग्रामों और नगरों में

सभी मानव सुखी, सुंदर व शोषणमुक्त कब होंगे!’

और मन में केवल एक जिज्ञासा भरी तड़प

‘हमारे देश भारत में

पुरानी हाय में से

किस तरह से आग भभकेगी

उड़ेंगी किस तरह भक से

हमारे वक्ष पर लेटी हुई विकराल चट्टानें

व इस पूरी क्रिया में से

उभरकर भव्य होंगे, कौन मानव गुण!’

और कवि एक सुचिंतित निष्कर्ष पर पहुंचता हुआ हठात निर्णय लेता है, –

‘सुकोमल काल्पनिक तल पर

नहीं है द्वंद्व

का उत्तर

तुम्हारी स्वप्न वीथी कर सकेगी क्या

बिना संहार के सर्जन असंभव है

समन्वय झूठ है

सब सूर्य टूटेंगे व उनके केंद्र फूटेंगे

उड़ेंगे ब्रह्मांड में सर्वत्र

उनके नाश में तुम योग दो।’

कोई हमदर्दी नहीं, पुराने के साथ पूरी तरह एक रैडिकल रॅप्चर, क्रांतिकारी संबंध विच्छेद के बिना नए भारत का स्वप्न नहीं देखा जा सकता। उसकी खोज और स्थापना नहीं की जा सकती। यह हमारे नवजागरण और स्वतंत्रता आंदोलन के मनीषियों-चिंतकों, नेताओं और रवीन्द्रनाथ, जयशंकर प्रसाद आदि जैसे कवि विभूतियों की आलोचना भी है।

फैंटेसी को काव्यरूप के बतौर अपनाना मुक्तिबोध की मजबूरी थी। इस नए यथार्थ के विस्तृत सर्वेक्षण और उस यथार्थ से प्राप्त नए भारत के स्वप्न को – इतने बड़े आख्यान को, उसके इतिहास, भूगोल, संदर्भ और परिप्रेक्ष्य के साथ – संभव समग्रता में संभवतः किसी अन्य काव्य रूप द्वारा अभिव्यक्त भी नहीं किया जा सकता था। इस काव्य रूप के अपने कुछ नुकसान थे। मुक्तिबोध न केवल इसके प्रति सजग थे बल्कि चित्रण की यथार्थता के प्रति भी वे सजग थे, सजग और प्रतिबद्ध। इस प्रक्रिया में अधिकांशतः हुआ यही है कि यथार्थने – युग के, जग के गहरे विक्षोभों ने, नए सौंदर्यानुभवों के कर्ण कर्कश गद्य ने फैंटेसी की जमीन ही नहीं फाड़ी बल्कि उसे इतना झीना बना दिया कि उसमें से यथार्थ हमेशा झलमलाता रहे। बेशक, मुक्तिबोध की कविताएं हमसे अवश्य ही थोड़े धीरज, हार्दिकता, थोड़े समय और श्रम की मांग करती हैं। प्रसंगवश, व्यक्तित्व और मिजाज के स्तर पर मुक्तिबोध के आदर्श जयशंकर प्रसाद नहीं हैं। अगर कोई है तो सबसे आगे बढ़कर कबीर हैं। इसके प्रमाण मुक्तिबोध की कविताओं में भरे पड़े हैं, कहीं ‘उस चोट के गंभीर दोहे सा’ तो कहीं ‘भीतर कोई बैठा है कबीर मर्मी’ तो कहीं

‘भव्य हजारों साल पुराने ओ बूढ़े उस्ताद

तुम्हारी क्रियावन-वेदना क्या कहना

तुम बाजार में खड़े स्वयं जलती मशाल…

ब्रह्म-रंध्र में गूंजेगा फिर द्रोही-अनहद नाद, ओ बुजुर्ग उस्ताद’

आदि कई रूपों में। ‘भविष्यधारा’ कविता में तो कबीर का जिक्र आने के बाद कविता कुछ इस तरह आगे बढ़ती है जैसे कबीर स्वयं मुक्तिबोध ही हों। भक्तिकाल पर एक नई दृष्टिा डालता, रामचंद्र शुक्ल और हजारी प्रसाद द्विवेदी से भिन्न इतिहास दृष्टि से उसकी व्याख्या और कबीर के समकालीन बतानेवाले लेख को सभी जानते हैं। कबीर की तरह ही मुक्तिबोध भाषा से जिस तरह का काम चाहते हैं, ले लेते हैं।

मुक्तिबोध नए भारत की खोज पर आकर रुकते नहीं, इस विवेक-प्रक्रिया की क्रियागत परिणति के लिए और अधिक जाग्रत, और अधिक बेचैनी से भर उठते हैं। ‘अब न समय है, जूझना ही तय है… फजूल है इस वक्त कोसना खुद को। एकदम जरूरी दोस्तों को खोजूं, पाऊं मैं नए-नए सहचर, सकर्मक सत्-चित्-वेदना-भास्वर।’

‘अब अभिव्यक्ति के सारे खतरे उठाने ही होंगे

तोड़ने होंगे ही मठ और गढ़ सब।’

यहां ‘अभिव्यक्ति’ का अर्थ एक ही रहता है लेकिन संदर्भ और आयाम बहुत हैं। संदर्भ बदलने के साथ इसका रूप भी बदल जाएगा। सामाजिक, राजनीतिक आंदोलन से लेकर तो जनक्रांति तक सब अभिव्यक्ति ही है – जनता की, जनसंघर्षों की, उनके स्तर की। अब नए-नए मित्र और सहचर, एकदम जरूरी दोस्त, सकर्मक सत्-चित्-वेदना-भास्वर इसलिए तो नहीं खोजे जा रहे हैं कि लेखकों का प्रगतिशील या आपको यह न पसंद हो तो कह लीजिए परिमली संगठन बनाना है। बल्कि इसलिए खोजे जा रहे हैं कि जूझना ही तय है, कि इसके बगैर इस यथार्थ अंधेरे को नहीं मिटाया जा सकता, कि नए भारत के स्वप्न को पूरा नहीं किया जा सकता। हमारे जैसे देश और समाज में यह ‘अभिव्यक्ति’ ‘जनक्रांति’ है और यह भी कि यह ‘सशस्त्र जनक्रांति’ है। नामवर सिंह को अन्य परेशानियों के अलावा इस बात से भी परेशानी है कि ‘कोई मुक्तिबोध को एकदम सशस्त्र क्रांति का समर्थक घोषित कर रहा है।’सशस्त्र से पहले ‘एकदम’ शब्द लगाकर नामवर सिंह अपने लिए एक छूट लेते हैं और सशस्त्र क्रांति को खारिज भी कर देते हैं। वे कहना यह चाहते हैं कि अब शांतिपूर्ण क्रांति भी हो सकती है – ‘शांतिपूर्ण संक्रमण।’ ख्रुश्चेव के सोवियत की सत्ता पर आने के बाद से यह सिद्धांत आया और सीपीआई ने इसे मान भी लिया। रामविलास शर्मा नामवर सिंह की परेशानी पर टिप्पणी करते हुए कहते हैं कि इस जनक्रांति की कहीं कोई व्याख्या नहीं की गई लेकिन मुक्तिबोध की कविताओं में यह क्रांति सशस्त्र अवश्य है, भले ही ‘एकदम सशस्त्र’ न हो। और फिर कविताओं से, कविताओं के वातावरण से यह दिखाते हैं कि यह क्रांति का रूप ही देखते आए थे। यह बिल्कुल सही है। लेकिन वे मूल रूप से (इस बाबत उन्होंने और भी बहुत कुछ कहा है) यह सिद्धांत प्रतिपादित करते हैं कि जहां भी संसदीय जनतंत्र कायम हो गया है, वहां सशस्त्र क्रांति नहीं हुई है। और कहा कि मुक्तिबोध दुनिया में अन्य देशों में चल रहे छापामार युद्धों के आधार पर अपने यहां सशस्त्र क्रांति का चित्र बनाते थे। अर्थात भारत में सशस्त्र क्रांति नहीं होगी। और इस तरह दोनों आलोचक सिद्धांततः एक जमीन पर ही आ खड़े होते हैं, राजनीतिक शब्दावली में इसे सामाजिक-जनवाद कहते हैं। जिसका वर्ग आधार है पेट्टि बुर्जुआ, मध्य वर्ग। अब मुक्तिबोध अपने तीव्र आत्म-संघर्ष के बावजूद कहां व कितनी दूर तक मध्यवर्गी चेतना से ग्रसित थे या मुक्त इनके साथ इस बहस में उलझना फजूल है।

कम्युनिस्ट पार्टी की चौथी  पार्टी कांग्रेस (1956) से शासक वर्ग से साझा का, समझौते का जो रास्ता निकला था, वह ‘शांतिपूर्ण संक्रमण’ के रास्ते से गुजरता हुआ वर्ग संघर्ष और क्रांति की जरूरत से इंकार में अपनी पूर्णता को प्राप्त हो गया है। यही हाल विभाजन के बाद बनी सीपीएम का है। बेशक, उसकी इस यात्रा का सूत्र दूसरा रहा है। शासक वर्ग के चरित्र के इस विश्लेषण से कि वह ‘साम्राज्यवाद का विरोध करता है और राष्ट्रीय अर्थतंत्र पर उसकी पकड़ को ढीला करता है…। ’मुक्तिबोध का संवेदनात्मक ज्ञान तो टकराता ही है, ज्ञानात्मक संवेदन भी टकराता है। पहले ज्ञानात्मक संवेदन को ही लें। मुक्तिबोध ने ‘अंग्रेज गए पर इतनी अंग्रेजी पूंजी क्यों?’ शीर्षक के अंतर्गत प्रकाशित एक टिप्पणी में कहा है, ‘आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि पंडित नेहरू की पंचवर्षीय योजनाओं में भी प्रतिवर्ष 100 करोड़ रुपयों की विदेशी पूंजी निमंत्रित की गई है। पंचवर्षीय योजना के नाम पर औद्योगिक क्षेत्र में भारतीय पूंजीपति, विदेशी पूंजीपतियों (अंग्रेजों और अमरीकियों) से सांठ-गांठ किए हुए हैं।’आगे इस सांठ-गांठ का आर्थिक आंकड़ों के साथ विस्तृत ब्यौरा है। फिर निष्कर्ष निकाला गया है कि – ‘यहां केवल इतना ही कह देना पर्याप्त है कि एकाधिकारवादी स्वदेशी पूंजी विदेशी आर्थिक स्वार्थों से बहुत हद तक मिल गई है, जिसका फल यह है कि भारत में अन्य विदेशी पूंजी तथा ब्रिटिश पूंजी का शिकंजा ढीला होने के बजाय और अधिक कस गया है’( ‘सारथी’ 3 अक्तूबर, 1954)। आगे इसी टिप्पणीमें अपनी कम पूंजी लगाकर भी विदेशी पूंजी द्वारा अपने से कई गुना अधिक देशी पूंजी पर कई तरीके से नियंत्रण किए जाने के तथ्य दिए गए हैं और निष्कर्ष निकाला गया है कि – ‘…यह अपेक्षा कि भारतीय पूंजीपति इस विदेशी शिकंजे का विरोध करेंगे व्यर्थ-सी है। अपने मुनाफे की वृद्धि के लिए भारत-शासन पर निर्णायक प्रभाव रखते हुए वे साम्राज्यवादी पूंजी को बुलाते हैं, उस पूंजी के जूनियर पार्टनर की हैसियत से काम करते हैं और उनसे पूंजीबद्ध हो जाते हैं। पंचवर्षीय योजना ने उनको इस कार्य में अधिक उत्साहित किया है। स्पष्ट बात यह है कि ये कल के राष्ट्रवादी पूंजीपति आज भारत को केवल औपनिवेशिक क्षेत्र बनाए रखने की ओर ही कदम बढ़ा रहे हैं। ’मुक्तिबोध ने बस इसे राजनीतिक अर्थशास्त्रीय सूत्रीकरण करते हुए मात्र यह नहीं कहा है कि ‘वस्तुतः ये विदेशी पूंजी के दलाल हैं’, अन्यथा इस विश्लेषणात्मक टिप्पणी से अर्थ यही निकलता है। अगर यहां ‘कामायनी: एक पुनर्विचार’ में इस पूंजीवाद की जन्मकुंडली पर व्यक्त मुक्तिबोध के विचार को जोड़ दें तो जो चित्र प्रस्तुत होता है वह यह कि दलाली इस पूंजीपति का जन्मचिह्न (बर्थ मार्क) है: ‘शक्तिशाली ब्रिटिश साम्राज्यवाद के भीतर भारतीय पूंजीवाद का जन्म हुआ। इसके भीतर औद्योगिक पूंजीवाद बहुत क्षीण था। बड़े-बड़े करोड़पतियों की आमदनी का जरिया वस्तुतः अनुत्पादनशील लेन-देन और सट्टा (पढि़ए मिस्ट्रीज आॅफ दी बिड़ला हाउस) था। ’ऐसा पूंजीवाद सामंतवाद से लड़ भी नहीं सकता। ‘साम्राज्यवाद के अंर्गत, पूंजीवादी अर्थतंत्र के भीतर, सामंती तत्वों की प्रभाव-छायाएं बड़ी सघन, बहुत लंबी-चैड़ी और विस्तीर्ण रही। …अर्थात, कुल मिलाकर सामंती तत्वों के प्रति जो आमूल परिवर्तनकारी व्यापक उग्र प्रतिक्रिया होनी चाहिए थी, वह न हुई। …राजनीति, समाजनीति के क्षेत्र में इस प्रक्रिया ने गांधीवादी अर्थतंत्र की प्रवृत्ति को जन्म दिया। मशीनों के विरुद्ध, व्यापक औद्योगीकरण के विरुद्ध, राष्ट्र के केंद्रस्थ शासनतंत्र के विपरीत ग्राम प्रजातंत्र की स्थापना के पक्ष का समर्थन करनेवाली एक ऐसी विचारधारा थी, जो भारत की अविकसित, आर्थिक अवस्था को कायम रखना चाहती थी।… भारत के पिछड़े हुए स्वरूप को समाप्त करने के बजाए उस स्वरूप में आदर्शवादी रंग मिलाना चाहती थी। पूंजीवाद ने कुशलतापूर्वक इस विचारधारा का अपने लिए उपयोग कर लिया।…’और इस तरह भारत में ’47 के बाद जो सामाजिक ढांचा बना वह अर्द्ध सामंती और अर्द्ध औपनिवेशिक था। कम्युनिस्ट पार्टी ने सामंतवाद के खिलाफ निशाना साधते हुए इस राजनीतिक-सामाजिक ढांचे को तोड़ने की जगह शासक वर्ग सम समझौते का, उसका पिछलग्गू बनने का रास्ता अपनाया। इस ढांचे को बलपूर्वक तोड़े बगैर भारतीय जनता की मुक्ति और भारत का उनमुक्त विकास संभव नहीं है –

‘इस-उस जमाने के धंसानों में से

उमड़ते हैं अंधेरे के मेघ

मैं एक थमा हुआ मात्र आवेग

रुका हुआ एक जबर्दस्त कार्यक्रम

मैं एक स्थगित हुआ अगला अध्याय

अनिवार्य

आगे ढकेली गई प्रतीक्षित

महत्वपूर्ण तिथि।’(चंबंल की घाटियां)।

इसी कविता में मध्यवर्ग के साथ-साथ कम्युनिस्ट पार्टी की इस समझौतापरस्ती की भी गहरी आलोचना है ऐसा मानना चाहिए – ‘प्रस्तरीभूत मैं गतियों का हिम हूं

बीच ही में टूट गया कोई पराक्रम हूं’

जैसी पंक्तियां कम्युनिस्ट पार्टी की ओर ही इशारा करती हैं। अन्यथा मध्य वर्ग के किस पराक्रम का जिक्र हो सकता है जो बीच ही में टूट गया। फिर तो

‘शिलीभूत भूमि से

सामंजस्यों का घनीभूत जितना

यत्न है तुम्हारा

उतना ही बंजर बनती है दुनिया

उतनी ही जिंदगी उजाड़ बनती।’

यहां ‘अभिव्यक्ति’ से पैदा हुए दूसरे मसले पर भी बात कर ली जाए। अब अगर अभिव्यक्ति के अंदर जनक्रांति तक समाहित है तो यह भी है कि हर समाज, जिसकी अपनी एक विशेष ऐतिहासिक अवस्था, कालखंड है उसकी अपनी एक ‘संपूर्ण अभिव्यक्ति’, ‘परम अभिव्यक्ति’ भी होती है। कविता या अन्य कला रूप में यह ‘परम अभिव्यक्ति’ सापेक्षिक रूप में ही होगी। मुक्तिबोध की कविताओं में इसकी भी व्याख्या नहीं की गई है, जैसे क्रांति की भी नहीं की गई है। लेकिन कविता की इन पंक्तियों – ‘इसीलिए मैं हर गली में

और हर सड़क पर

झांक-झांक देखता हूं हर एक चेहरा

प्रत्येक गतिविधि

प्रत्येक चरित्र

व हर एक आत्मा का इतिहास

हर एक देश व राजनीतिक स्थिति और परिवेश

प्रत्येक मानवीय स्वानुभूत आदर्श

विवेक-प्रक्रिया, क्रियागत परिणति!!

खोजता हूं पठार…पहाड़…समुंदर

जहां मिल सके मुझे

मेरी वह खोई हुई

परम अभिव्यक्ति

आत्म-संभवा।’

– से कुछ अर्थ निकाला जा सकता है। जिसे किसी निरपेक्ष, रहस्यवादी पूर्ण ज्ञान की तलाश होगी, वह समाधि लगाएगा, कुंडनिली जगाएगा या और बहुत कुछ जो होता है करेगा, वह दूसरा इतना कुछ क्यों करने जाएगा। किसी विश्वविद्यालय, फांउडेशन या कि शोध संस्थान ने उसे इसकी नौकरी भी नहीं दे रखी थी। उसने तो यह जिम्मेदारी खुद अपने कंधों पर ले रखी थी, इस दायित्वबोध के नाते कि ‘वे आते होंगे लोग

जिन्हें तुम दोगे

देना ही होगा, पूरा हिसाब

अपना, सबका, मन का, जन का।’

इस खोज के उद्देश्य सामाजिक हैं। इस खोज की प्रक्रिया यथार्थवादी है, वह यह जानता था कि यह विश्व बोधगम्य है, इसे पूरी तरह जाना जा सकता है लेकिन इसे पूरी तरह कभी भी नहीं जाना जा सकता, क्योंकि वह परिवर्तनशील है। वह हिंदी साहित्य में सबसे अधिक वैज्ञानिक आविष्कारों की न केवल जानकारी रखता था बल्कि कविता में उनका उपयोग भी करता था। इसलिए कहा जा सकता है कि उसने इस ‘परम अभिव्यक्ति’ पद का सापेक्षिक रूप में ही प्रयोग किया होगा, शायद लेनिन के शब्दों में यह सोचते हुए कि ‘फिर भी पूर्णता की मांग ज्ञान को पथरा जाने से रोकती है’ – फिर वही यात्रा सुदूर की, फिर वही खोज भरपूर की। इस खोज का संवेदनात्मक उद्देश्य क्रांतिकारी था वह अपने समय की केवल व्याख्या भर नहीं, उससे मुठभेड़ करते हुए इसकी संपूर्णता में यथार्थ अभिव्यक्ति के जरिए उसे बदलने में हिस्सेदार होना चाहता था। स्पष्ट है कविता क्रांति नहीं होती। लेकिन क्रांति की दुर्निवारता, आसन्नता को अपने समय के यथार्थ के रूप में अभिव्यक्त कर पाना, परम अभिव्यक्ति हैं ऐसी अभिव्यक्ति साहित्य जगत में स्वयं एक क्रांति होती है और वास्तविक जगत में होनेवाली क्रांति से अलग भी होती है और एकाकार भी। इस क्रांतिकारी संवेदनात्मक उद्देश्य को अस्मिता की तलाश के जरिए व्याख्यायित नहीं किया जा सकता, उसके क्रांतिकारी महत्व, उसकी सामाजिक उपयोगिता पर पर्दा जरूर डाला जा सकता है।

सन् 1989 मंे इलाहाबाद में ‘कविता के नए प्रतिमान: पुनर्विचार’ से एक व्याख्यानमाला में व्याख्यान देते हुए नामवर सिंह ने कहा, ‘‘कविता के नए प्रतिमान’ में ‘अनुभूति की प्रामाणिकता’, ‘जटिलता’, ‘तनाव’, ‘विसंगति’, ‘विडंबना’, ‘ईमानदारी’ आदि संकल्पनाओं का जो परीक्षण किया था और अनेक की अपर्याप्तता और असंगतियों का जो संकेत किया था वह केवल तार्किक था। ये सभी अमेरिकन ‘नई समीक्षा’ की संकल्पनाएं थीं।…ये अवधारणाएं केवल अपनी साहित्यिक भूमिका ही नहीं निभा रही थीं बल्कि इनकी एक निश्चित राजनीतिक भूमिका भी थी। ‘कविता के नए प्रतिमान’ में यह नहीं कहा गया है। ‘कविता के नए प्रतिमान’ का रूपवाद यह है कि उसमें रूपवाद की आलोचना भी रूपवादी ढंग से की गई है, ऐतिहासिक आधार पर नहीं।’बताया कि ‘शीत-युद्ध के काल में समीक्षा का जो प्रतिमान सबसे अधिक फला-फूला वह था ‘न्यू क्रिटिसिज्म’ (नई समीक्षा)। इस समीक्षा सिद्धांत मंे यह कहा गया कि बड़ी कविता वह है जिसमें विचारधारा न हो, जिसमें ‘पैराडाक्स’ हो, द्वंद्व हो, तनाव हो, कवि कमिट न करे। तो यह है शीत-युद्ध का काव्यशास्त्र। इसकी सारी शब्दावली ‘विचारधारा के इस अंत’ की शब्दावली है। कहा जाने लगा कि ‘नाजीवाद’ के साथ ही यह कम्युनिस्ट विचारधारा का भी अंत हो गया।’अर्थात इस ‘शीत-युद्ध के काव्यशास्त्र’ का उद्देश्य था कम्युनिज्म विरोध। अब जिस ‘कविता के नए प्रतिमान’ के ‘केंद्र’ में मुक्तिबोध हैं, उनका सारा काव्य और समीक्षा सिद्धांत मूलतः इस शीत-युद्ध के सिद्धांत के खिलाफ संघर्ष है। इस संघर्ष में उन्होंने साफ तौर पर यह निष्कर्ष निकाला कि ‘नई कविता के कलेवर पर शीत-युद्ध की छाप है।’ सवाल यह है कि केंद्र की हालत तो यह है लेकिन उसको अपने ‘कविता के नए प्रतिमान’ के केंद्र में रखनेवाले से ऐसी चूक क्यों हुई? सीधे तो नहीं लेकिन प्रकारांतर से नामवर सिंह यह सफाई देते हैं कि ’‘1968 के आसपास भारतीय राजनीति और उसके समानांतर हमारे साहित्य में जो महत्वपूर्ण परिवर्तन हुए थे, उनकी झलक ’68 में तो मिली थी, पर उसका वेग बाद में प्रकट हुआ। नक्सलबाड़ी आंदोलन चाहे जितना भी दुस्साहसिक रहा हो, उसने हमारी संपूर्ण चेतना को झकझोर दिया। ‘नई कविता’ के बाद हमारा साहित्य बहुत नगराभिमुख हो चला था। ‘अकविता’ जैसे अराजकतावादी आंदोलन महानगरों की चेतना से आक्रांत थे। नक्सलबाड़ी आंदोलन ने पुनः हमारी नगराभिमुख चेतना को गांवों की ओर लौटाने का काम किया। इसी के चलते बड़े-बड़े कवियों के रहते हुए धूमिल जैसे कवि ने गंवई-गांव के ठेठ मुहावरे से सारी ‘नई कविता’ के भाषा के जादू को तोड़ दिया। 1968 के बाद हमारे देश की राजनीति में और साहित्य में एक लड़ाकूपन, एक जुझारूपन आया, अनेक नए कवि एक नई भाषा और एक नई संवेदना लेकर आए। मुझे लगता है कि ‘कविता के नए प्रतिमान’ में जो नहीं था – परिवर्ती परिस्थितियों के कारण मैं उसे अधिक स्पष्टता से देख पाया।’’ और कहा कि जो काम तब नहीं हो पाया अर्थात ‘नई समीक्षा’ का ऐतिहासिक आधार पर खंडन वह ‘कविता की दूसरी परंपरा’ की खोज और स्थापना के लिए जरूरी है।

और इसके लिए आधुनिकतावाद के दो विभाग बनाए ‘पश्चिमी आधुनिकतावाद और दूसरा, उससे अलग ठेठ अपनी जमीन से, अपनी परंपरा से जो लोग अपना विकास कर रहे थे, अपने लिए रास्ता निकाल रहे थे।’पहली धारा में वे थे जो ‘इलियट, पाउंड आदि की आधुनिकतावादी संवेदना के आधार पर कविताएं लिख रहे थे – अज्ञेय, मुक्तिबोध, शमशेर बहादुर सिंह आदि। दूसरे में थे – नागार्जुन, त्रिलोचन, केदारनाथ अग्रवाल।’ और प्रश्न किया कि देखना यह चाहिए कि सार्थक कविता और काव्य मूल्यों का निर्माण किस धारा के अंतर्गत हुआ? अव्वल तो यह विभाजन ही अवसरवादी, सुविधावादी विभाजन है – ‘गलतियां करते ही रहने का धंधा है तुम्हारा’ – मुक्तिबोध, कबीर, प्रेमचंद, निराला की ठेठ परंपरा को विकसित, परिमार्जित और उन्नत करनेवाली धारा के कवि हैं। इस ओर इस लेख में संकेत भी किए गए हैं। स्वयं नामवर सिंह की अन्य दो बातों से भी यही प्रमाणित होता है। नंबर एक कि वे कहते हैं कि ‘कविता की दूसरी परंपरा’ की खोज और स्थापना के लिए ‘नई समीक्षा’ के ऐतिहासिक आधार का खंडन जरूरी है। अगर ऐसा ही है तो ‘कविता के नए प्रतिमान’ में यह काम आप भले नहीं कर पाए, मुक्तिबोध पहले ही यह काम कर गए हैं। उनका समूचा काव्य शीत-युद्ध के काव्य मूल्यों के पीछे छिपे वर्ग मूल्य और राजनीति के खिलाफ ज्वलंत दस्तावेज है। इस तरह, यह काम आपके लिए छूटा हुआ नहीं है।

दूसरी बात, जिस नक्सलबाड़ी के घटित होने के वर्षों-वर्षों बाद उसकी रोशनी में आप जो कुछ देख पाए, उस नक्सलबाड़ी जैसे किसी विद्रोह की दुर्निवारता की पूर्वाभास है मुक्तिबोध की कविता। जिस फैंटेसी में वे विचरण कर रहे थे, वही नक्सलबाड़ी के विद्रोह के रूप में वास्तव हुई – मैं विचरण करता-सा हूं एक फैंटेसी में, सच है यह फैंटेसी कल वास्तव होगी। उसके सपने का आधार बाहर के देशों में हो रहे छापामार युद्ध ही नहीं थे। सबसे पहले वह अपने लोगों के दहाड़ते विक्षोभों, धरती के छाती के अंदर की ज्वालामुखियों की गड़गड़ाहट को बड़े ध्यान से सुन-देख रहा था और इस सबको सामने ले आने के लिए जी-मर रहा था। वह किसी सुदूर, जिसे कभी न कभी तो जरूर होना है अर्थात क्रांति के प्रति निचतिवादी आस्था रखनेवालों में से नहीं, उसकी हर लहर को यथार्थ रूप में हृदयंगम करनेवालों में से था। वह देख रहा था – छिड़ने ही वाली है युगव्यापी एक बहस, होने ही वाली है भारी जद्दोजहद। और ’68 में कम्युनिस्ट पार्टी दो हिस्सों में बंट गई – सीपीआई और सीपीएम के रूप में। लेकिन सीपीएम के अंदर भी भारतीय शासक वर्ग के चरित्र और भारतीय क्रांति के रास्ते को लेकर छिड़ी बहस रुकी नहीं और तेज हो गई – फूट पड़ी नक्सलबाड़ी के विद्रोह की चिंगारी – ‘हठात आंखों के सामने लगा, जैसे भारतवर्ष पर छाए हुए अंधेरे बादल छंट गए हों, दीप्त सूर्यालोक से जगमगा रहा हो मेरा देश भारतवर्ष, जनता का जनवादी भारतवर्ष, समाजवादी भारतवर्ष।’(चारु मजुमदार) और जैसे जादू के जोर से खिंची चल पड़ी दसियों हजार नौजवान कम्युनिस्टों की एक समूची पीढ़ी, जिस पीढ़ी ने स्वेच्छा से रवींद्रनाथ के शब्दों में ‘जीबन आर मृत्यु के पाएर भृत्य बानिए’(जीवन और मृत्यु को पांवों की दासी बनाकर) शहादत कबूल की। मुक्तिबोध नक्सलबाड़ी के अवांगार्द कवि हैं।

जिस तरह नक्सलबाड़ी क्रांति के ठेठ भारतीय रास्ते की, नए भारत की खोज है, उसी तरह ‘परम अभिव्यक्ति की खोज’ नए आधुनिक भारत और भारतीय काव्य मूल्यों की खोज है – इस पर आगे और बात की जानी चाहिए – जिसे नामवर सिंह मुक्तिबोध को ईलियट, पाउंड आदि की आधुनिकतावादी संवेदना के खांचे में रखकर ‘अस्मिता की खोज’ बना डालते हैं और उसके क्रांतिकारी महत्व और सामाजिक उपयोगिता पर पर्दा डाल देते हैं। मुक्तिबोध, नागार्जुन, त्रिलोचन को चर्चा के केंद्र में ले आने का काम भी सबसे आगे बढ़कर नक्सलबाड़ी ने किया, जैसे उन मूल्यों को जिनकी नामवर सिंह ने चर्चा की है और ठीक ही चर्चा की है।

आप की ही बात मान ली जाए कि आपने ‘नई समीक्षा’ के रूपवाद का रूपवादी ‘खंडन’ किया है तब भी विडंबना देखिए कि आप रूपवाद के रूपवादी खंडन में ही फंसे रह गए (यह क्यों हुआ! क्योंकर हुआ!!) जबकि उसने भाववादी शिल्प, ‘बुर्जुआ के ही औजार का उपयोग’ कर 1947 के बाद के नए यथार्थ, नए भारत की खोज की यथार्थ अभिव्यक्ति कर डाली। ‘इससे फर्क नहीं पड़ता कि आपने हथियार किसी डकैत से लिया या किसी और से असल सवाल यह है कि आप उसका कैसा और किसलिए इस्तेमाल करते हैं।’ (लेनिन)। ‘परम अभिव्यक्ति की खोज’ ठेठ अर्थों में आधुनिक नए भारत की खोज है, ‘अस्मिता की खोज’ नहीं।

‘अजीब हुआ

वह भीतर से देदीप्यमान जो रहती थी

भू-गर्भ-गुहा

अब अंधियारी, काली व स्तब्ध

निश्चेतन, जड़, दुःसहा!!

अजीब हुआ!!’

11 सितंबर, 1964। मुक्तिबोध नहीं रहे। लेकिन नए भारत को निर्मित और स्थापित करने का काम अभी भी बाकी है। जो फासिस्ट शक्तियां कल तक अंधेरे में जुलूस निकालकर चलती थीं और जो, 1975 में आपातकाल के रूप में एक बार सामने आई थीं, आज वे खुलेआम देश की छाती पर चढ़ी हुई दिन में भी अंधेर मचाए हुए हैं। वे आधुनिक मानव मूल्यों को, जनतंत्र को, वह चाहे जितना कमजोर ही क्यों न हो, खत्म कर देश पर पूरी तरह (अभी वे इसमें पूरी तरह कामयाब नहीं हो पाई हैं) फासिस्ट शासन थोप देना चाहती हैं। नए आर्थिक सिद्धांत बनाकर देश की स्वतंत्रता और संप्रभुता को साम्राज्यवादियों के हाथों गिरवी रखती जा रही हैं। परिवर्तन की विरोधी, अतीत को व्यतीत न माननेवाली सनातनी शक्तियां यह सब कुछ भारतीयता और भारतीय संस्कृति के नाम पर करना चाहती हैं। उनके अनुसार, ‘हमारे यहां (भारत में) अतीत व्यतीत नहीं होता।’ (निर्मल वर्मा, भारत और यूरोप प्रतिश्रुति के क्षेत्र) वे आधुनिक जीवन मूल्यों के लिए संघर्ष को यूरोप बनाम भारत, भारतीय बनाम पश्चिमी के जाल में उलझाकर रूढि़वादी, प्रतिक्रियावादी जीवन मूल्यों को स्थापित करना चाहती हैं। वे क्रांतिकारी, परिवर्तनकारी नवीन प्रेरणाओं को हर तरह से राष्ट्रीय उन्मादों को पैदा कर मार डालना चाहती हैं। वैचारिक क्षेत्र में तरह-तरह के ‘उत्तरवाद’ मूल रूप से प्रतिक्रियावाद की ही विचारधाराएं हैं। उपभोक्तावाद से संयुक्त अवसरवाद की बाढ़ मुक्तिबोध के समय से कहीं ज्यादा विकराल हुई है। कल तक एकाध-दो फांउडेशन आदि हुआ करते थे, आजकल न जाने कितने फाउंडेशन और ‘स्वयंसेवी संस्थाएं’ हैं, बौद्धिक वर्ग को क्रीतदास बनाने और किराए के विचारों का उद्भाष कराने के लिए। ‘उम्मीद भी पहले-सी चुलबुली लड़की नहीं रही’(विस्वावा शिंबोश्र्का) ऐसे में औरों के साथ-साथ वामपंथी कतारों का एक हिस्सा भी इस उपभोक्तावादी-अवसरवाद में खूब गोते लगा रहा है। इस नाते भी वैचारिक अंधेरा और घना हो रहा है। अंतरराष्ट्रीय-राष्ट्रीय स्थितियां जिस तरह की हैं वे फासिस्ट शक्तियों और विचारों को सुदृढ़ कर रही हैं। आतंकवाद के नाम पर अमरीका का अफगान युद्ध साम्राज्यवादी युद्ध है, इसमें कोई शक नहीं। यह कौन सा मोड़ लेगा यह तय नहीं है लेकिन हमारे अपने देश में इस स्थिति का फायदा उठाकर शासन-सत्ता एक फासिस्ट सत्ता के रूप में उभर आने की पूरी कोशिश कर रही है –

‘साम्राज्यवादियों के बदशक्ल चेहरे

एटमिक धुएं के बादलों-से गहरे

क्षितिज पर छाए हैं

…साम्राज्यवादियों के पैसे की संस्कृति

भारतीय आकृति में बंधकर

दिल्ली को

वाशिंगटन व लंदन का उपनगर बनाने पर तुली है

भारतीय धनतंत्री

जनतंत्री बुद्धिवादी

स्वेच्छा से उसी का ही कुली है

…जन-राष्ट्र-लोकनायक

जन-मुक्ति-आंदोलन

के सिद्ध विरोधी

ये साम्राज्यवादियों की पांत में ही बैठे हैं

जनता के विरुद्ध घोर अपराध कर

फांसी के फंदे की रस्सी से ऐंठे हैं।’

लगभग ऐसा ही है हमारे ‘जमाने का चेहरा’। बेशक, इसके खिलाफ अपने देश में भी और दुनिया के पैमाने पर विरोध की शक्तियां भी पहले के मुकाबले बड़े पैमाने पर गतिशील और लामबंद हो रही हैं। हमें अपने समय और समाज का नए सिरे से भीतर से बाहर तक व्यापक सर्वेक्षण करने, और भी अधिक दृढ़ता से और भी अधिक कठोर आत्म संघर्ष चलाने, ज्ञान के क्षेत्र में अद्यतन खोजों का आलोचनात्मक नजरिए से विश्लेषण करते हुए अपनी विश्वदृष्टि को विकसित और अद्यतन बनाने की जी-तोड़ कोशिश करना बहुत जरूरी है। ‘जो उम्मीद त्याग चुके हैं’ – कहने दो उन्हें जो कहते हैं। हमें जनता की प्रतिरोधी शक्ति, क्रांतिकारी भावना और सामाजिक क्रांति में उम्मीद जगाने वाली अभिव्यक्ति के लिए ही जीना और मरना है। ‘अंधेरे’ के उस महाकवि से हमें आज भी बहुत कुछ सीखना बाकी है।

रामजी राय

रामजी राय

रामजी राय  बहुत कम और तीखा लिखने के साथ-साथ अपनी राजनीतिक सक्रियताओं के लिए जाने जाते हैं। समकालीन जनमत के प्रधान संपादक। जन संस्कृति मंच से जुड़ाव।

पटना कलम- विलुप्त शैली की कुछ कवितायें: कृष्ण कल्पित

By कृष्ण कल्पित 

1

जेपी लोकतन्त्र की आँख से ;

ढुलका हुआ आँसू था,

जो अब सुख चला है, पार्थ!

‘कि जनता आती है’ वाले;

विशाल गांधी मैदान में,

अब बाजीगर और रंडियाँ घूमते हैं!

दरअसल;

सम्पूर्ण क्रांति

अब एक रेलगाड़ी का नाम है, सार्त्र!

Image by Uday Shankar

Image by Uday Shankar

2.

(आज नालंदा-राजगीर से लौटा हूँ, पार्थ!)

उड़ रही  ख़ाक बची है, भंते!

बुद्ध की राख़ बची है, भंते!

गिड़गिड़ाने से कुछ नहीं हासिल,

बात-बेबाक बची है, भंते!

बाँट दी सबको चिट्ठियाँ दुःख की,

अब कहाँ डाक बची है, भंते!

परखचे उड़ चुके हैं कल्पित के,

इक फकत साख बची है, भंते!

मेरे हिस्से की पी गए शमशेर,

अब महज़ ताख बची है, भंते!

3.

(विश्वनाथ त्रिपाठी के लिए)

काहे नाराज़  हो निउनिया तुम।

दिल में जूँ राज़ हो निउनिया तुम।

बज रहा साज़ हो निउनिया तुम।

मेरी आवाज़ हो निउनिया तुम।

मुझको अंज़ाम-ए-मुहब्बत समझो,

और आगाज़ हो निउनिया तुम।

कल कहाँ थी मुझे नहीं मालूम,

अब-अभी-आज हो निउनिया तुम।

बंड था बाण भूल जा उसको,

अब तो हल्लाज हो निउनिया तुम।

एक पनवाँ खिलाय दो हमको,

काहे नाराज़ हो निउनिया तुम।

Image by Uday Shankar

Image by Uday Shankar

4.

आज क्या लिखके भेज दूँ तुमको।

तुम तो जानो हो क्या कहूँ तुमको।

रंग फबता है नीलगूँ तुमको।

तुम जो बोलो तो कल मिलूँ तुमको।

हममें कुछ फ़र्क़ ही नहीं जानम,

मैं भी पागल हूँ और जुनूँ तुमको।

आज कुछ इस तरह से हो जाए,

बोलता मैं रहूँ सुनूँ तुमको।

इक उचटती निगाह ले जाओ,

कुछ तो तोहफ़ा नज़र करूँ तुमको।

बेख़याली में काश हो जाए,

डगमगा कर के थाम लूँ तुमको!

5.

मैं भी कब तक यहाँ रह लूँगा,

मैं भी एक दिन मर जाऊँगा।

मेरा घर है चाँद के पीछे,

मैं भी अपने घर जाऊँगा।

सरहप्पा से गोरख आई,

ऐसी थी मजबूत बुनाई,

ओढ़ रहा हूँ बड़े जतन से,

मैं भी चादर धर जाऊँगा।

आज मेरे कल दिवस दूसरा,

आएगा फिर नया सिरफिरा,

थोड़े दिन की बात है जानम,

मैं भी तुम्हें बिसर जाऊँगा!

6.

कौन मक्कार कहता है कि

ठुमरी का अवसान हो जाएगा, पार्थ!

ख़माज ख़त्म हो जाएगा,

दादरा नष्ट हो जाएगा और चैती बिसरा दी जाएगी!

तब उस स्त्री का क्या होगा

जिसने अपना जीवन

करुण-किरवानी को अर्पित कर दिया है, सार्त्र!…

‘चैत मास बोले रे कोयलिया, हे रामा! मोरे अंगनवा!’

और वह अंधा हारमोनियम वादक!

कृष्ण कल्पित

कृष्ण कल्पित

अपने तरह का अकेला-बेबाक और विवादित कवि । कृष्ण कल्पित का जन्म 30 अक्टूबर, 1957 को रेगिस्तान के एक कस्बे फतेहपुर शेखावटी में हुआ। अब तक कविता की तीन किताबें और मीडिया पर समीक्षा की एक किताब छप चुकी है। एक शराबी की सूक्तियां  के लिए खासे चर्चित। ऋत्विक घटक के जीवन पर एक पेड की कहानी नाम से एक वृत्तचित्र भी बना चुके हैं। 

आलोचना -सहस्त्राब्दी अंक सैंतालीस से साभार 

समकालीन कविता का आत्मसंघर्ष: सुधीर रंजन सिंह

By सुधीर रंजन सिंह 

(इस आलेख को भारत भवन में प्रस्तुत करने को लेकर मुझे एक अत्यंत आत्मीय और अग्रज कवि से तीखे विवाद और आत्मसंघर्ष से गुज़रना पड़ा है। मैं कभी किसी राजनीतिक संस्था या लेखक संगठन का सदस्य नहीं रहा। मैं कवि और आलोचक हूँ। कदाचित अस्वीकृत। स्वीकृति की शर्तें पूरी करने में मैं अपने को अयोग्य अनुभव करता हूँ। मंच और संस्थाओं से संवाद के स्तर पर मेरा सम्बन्ध रहा है। इसके लिए भी मैंने खुद होकर विशेष प्रयास नहीं किया। आलोचनात्मक लेखन प्रायः मैंने अपनी अकादमिक आवश्यकताओं  के अधीन किया है। आमंत्रण अथवा आग्रह पर कुछ ही लेखन किए हैं। अवसर ही कम थे। दूसरे स्तर पर, अपने लोगों से सीखने में मैं कभी पीछे नहीं रहा। यह प्रक्रिया है, जिसका लाभ मुझसे दूसरों ने भी लिया होगा। मेरा अनुभव है कि मेरी बातों का जिन लोगों ने लाभ लिया, मंच पर खड़े होने की दशा में उन्होंने मेरी तरफ पीठ कर ली।
मंचों की पीठ मेरी ओर अधिक रही। प्रतिबद्धता की पीठ भी मेरी ओर रही। विरोधियों का सामना करते हुए यह बात होती तो मैं इसे भी सह लेता। उनके साथ तो सामंजस्य के कीर्तिमान स्थापित किए गए। कॅरियर की दुनिया में, चाहे वह साहित्य से सम्बन्धित क्यों न हो, कोई सचमुच शत्रु नहीं होता और सच्चा मित्र भी शायद ही कोई होता है। सच यही है कि सत्ता संरचना से बाहर कोई नहीं है, और इसका पापबोध भी नहीं है। सामंजस्य को रणनीति की संज्ञा दी जाती है। लेकिन उनका यह सोचना कहाँ तक ठीक है कि दूसरे हमेशा  बिना हथियार और रणनीति के अपने पापबोध में अलग-थलग पड़े रहें?
मित्र की मर्जी के विरुद्ध मैंने यह आलेख प्रस्तुत किया, निश्चित  ही यह अपराध मुझसे हुआ है। इसे लेकर मैं यही अनुभव करता हूँ, भर्तृहरि का श्लोक है- ‘‘बौद्धरो मत्सरग्रस्ताः प्रभवः स्मयदूषिताः। अबोधोपहताष्चान्ये जीर्णमंङ्गे सुभाषितम्।।’’ इसकी अनुरचना मेरे द्वारा की गई है- ‘‘जाऊँ, किसे सुनाऊँ/ ठहरे जो विज्ञ विषारद/ रोग डाह का उन्हें लगा है/ कुबेर बड़े कि अधिकारी जो/ रहते ऐंठे-ऐंठे हैं/ जनगण है अपना/ समझ उतना पाए न वह/ छीज जातीं बातें अच्छी/ देह के भीतर।’’)

 लाँग नाइन्टीज़: अनेकान्त काल

विषय है मानवीय मूल्य और समकालीन हिन्दी कविता का आत्मसंघर्ष। यहाँ विशेषण के रूप में आया मानवीय स्वयं मूल्य है, और जहाँ तक मुझे ध्यान है कविता के सन्दर्भ में मानवीय मूल्य को आगे करके कोई बहस नहीं चली है। हिन्दी में नई कविता के सिद्धान्तकारों के द्वारा प्रचलित पद है- मानव मूल्य। यह बहस के लिए तब बड़ा विषय हुआ करता था और उसके पीछे एक उद्देश्य था। साहित्यिक बहसों के पीछे उद्देश्य प्रायः राजनीतिक ही हुआ करते हैं। मानव मूल्य पर विचार के साथ भी यह था। मुझे थोड़ी देर के लिए उस प्रसंग में जाने की इजाजत दें। उसके बाद मैं समकालीन कविता के आत्मसंघर्ष पर जिरह की इजाजत चाहूँगा। अन्त में यदि सम्भव हुआ तो मानवीय मूल्य पर अपनी बात समाप्त करूँगा।

धर्मवीर भारती की एक पुस्तक का नाम है- मानव मूल्य और साहित्य। भारती नई कविता के प्रमुख कवियों में से हैं, लेकिन नई कविता के प्रमुख सिद्धान्तकार थे लक्ष्मीकांत वर्मा और विजय देवनारायण साही। लक्ष्मीकांत वर्मा की पुस्तक नई कवित के प्रतिमान, जो बहस की दृष्टि से उस ज़माने में पर्याप्त महत्त्व की थी, में एक लेख है- मानव विशिष्टता और आत्मविश्वास के आधारमानव विशिष्टता से लक्ष्मीकांत वर्मा का आशय मानव मूल्य ही था। यह 1957 की पुस्तक है। इससे पहले 1948 से 1956 के बीच जयशंकर प्रसाद से पद उधार लेकर लघुमानव की धारणा को आगे किया गया था, जिसका विकास विजय देवनारायण साही के प्रसिद्ध विवादित लेख लघुमानव के बहाने हिन्दी कविता पर बातचीत में हुआ। उसमें लघुमानव को मानव मूल्य का सैद्धान्तिक आधार दिया गया और छायावाद से लेकर अज्ञेय तक की कविता पर विचारोत्तेजक टिप्पणी की गई। बाद में लक्ष्मीकांत वर्मा ने साही के प्रयास को नई कवितावादी सूत्र के रूप में सामने रखा मानव मूल्यों के सन्दर्भ में लघु-मानव की कल्पना नामक लेख में। इस प्रकार, ‘मानव मूल्य पद अथवा अवधारणा नई कविता द्वारा प्रचलित है। उसी की शब्दावली में कहें तो यह नई कविता के सहचिन्तन की उपलब्धि है। यह अच्छी बात है कि नई कविता में सामूहिक चिन्तन था, जो आज प्रायः दुर्लभ हो गया है। उस सामूहिक चिन्तन का दोष यह था, मुक्तिबोध की शब्दावली में कहें, उसने एक क्लोज्ड सिस्टम बना लिया था, जिससे संघर्ष की आवश्यकता थी, और जिसे मुक्तिबोध ने आत्मसंघर्ष की संज्ञा दी थी – नई कविता का आत्मसंघर्ष। आज हम समकालीन कविता के आत्मसंघर्ष पर बात कर रहे हैं तो उस आत्मसंघर्ष को भी याद किया जाना चाहिएजिसे मुक्तिबोध ने नई कविता के सन्दर्भ में आवश्यक समझा था। उनकी यह बात यहाँ याद करने योग्य है, ‘‘नई कविता में स्वयं कई भावधाराएँ हैं, एक भाव-धारा नहीं। इनमें से एक भाव-धारा में प्रगतिशील तत्त्व पर्याप्त है।  समीक्षा होना बहुत आवश्यक है। मेरा अपना मत है, आगे चलकर नई कविता में प्रगतिशील तत्त्व और भी बढ़ते जाएँगे, और वह मानवता के अधिकाधिक समीप आएगी।’’1

आगे चलकर नई कविता में प्रगतिशील तत्त्व तो नहीं बढ़े- नई कविता ही नहीं रही- लेकिन प्रगतिशील कविता का जो अगला विस्तार हुआ, उसमें नई कविता के तत्त्व अवश्य बढ़ गए। यह एक हद तक ज़रूरी भी था। नई कविता में नएपन पर जो जोर था, उसका मूल्य है। उसके कुछ दीग़र मूल्यों से असहमति की गुंजाइश है। मुक्तिबोध का आत्मसंघर्ष उसी गुंजाइश को दर्शाता है। उनके यहाँ मानवता का प्रयोग नई कविता के सहचिन्तन के परिणाम के रूप में आने वाला मानव मूल्य के अर्थ में नहीं हुआ है। नई कविता में मानव मूल्य को अर्थ दिया गया था- अनुभूति की प्रामाणिकता, ‘अनुभूति की ईमानदारी आदि। इस अर्थ में खोट नहीं है, खोट है इसकी ऐतिहासिक नियति में। नई कविता से पहले यूरोप में आवाँगार्द कला में प्रामाणिक अनुभव को पकड़ने का सराहनीय प्रयास हुआ था, लेकिन बाद में वही प्रामाणिक अनुभव शीतयुद्ध की राजनीति की विचारधारा बना, जिसका शिकार नई कविता भी हुई। उसके प्रति मुक्तिबोध ने सावधान किया था। उनके शब्द हैं, ‘नई कविता के बुर्ज से शीतयुद्ध की गोलन्दाजी हो रही है। यह आकस्मिक नहीं है कि मुक्तिबोध ने अनुभूति की प्रामाणिकता के वज़न पर जीवनानुभूति पद को आगे किया। जीवनानुभूति में मानवता का पक्ष प्रबल है। आज हम कह सकते हैं कि जीवनानुभूति की धारणा कविता के सन्दर्भ में पर्याप्त नहीं है, लेकिन उसकी ऐतिहासिक आवश्यकता से इनकार नहीं कर सकते हैं। उसमें शीतयुद्ध की गोलन्दाजी के विरुद्ध जीवनानुभूति के ज़रिए मानवता के अधिकाधिक समीप जाने की चेष्टा की गई है।

शीतयुद्ध 1986-’87 में समाप्त हो गया। आज यह बहस बेकार है कि शीतयुद्ध का खलनायक अमरीका था या अमरीका और रूस दोनों देश। सिर्फ़ यही कहा जा सकता था कि द्विधु्रवीय व्यवस्था से विश्वव्यापी संकट पैदा हो गया था। शीतयुद्ध की समाप्ति के पाँच साल बाद सोवियत-कम्यून भी समाप्त हो गये और  नई विश्व-व्यवस्था आई। इस बात को बीस साल हो गए हैं। आज इस गोष्ठी के माध्यम से कविता के सन्दर्भ में मानव मूल्य का प्रश्न उठाया गया है तो इसकी प्रासंगिकता को समझना हमारे लिए ज़रूरी है। नई कविता की वापसी तो सम्भव नहीं है, लेकिन मुझे लगता है कि नई कविता की जो राजनीति थी, जिससे मुक्तिबोध ने अगाह किया था, उसी तरह की समझ की वापसी हो रही है।

90 के बाद का समय हमारा जीवन काल है- हमारा यानी सामान्य रूप से स्वाधीनता के आसपास जनमे लोगों से लेकर युवतम पीढ़ी का। इनमें संवेदना अथवा चेतना के धरातल पर मैं बहुत भेद नहीं करना चाहता। समसामयिक होने के नाते लोगों के पूर्वग्रह काम कर सकते हैं। समकालीनता के साथ यह बात प्रायः होती ही है। वर्तमान मतभेद की भूमि न हो, तो वह कितनी बेजान चीज़ होगी, इसका अनुमान किया जा सकता है। इसके बावजूद, वर्तमान की वास्तविक विशिष्टताओं का शरसन्धान कठिन होता है। इसके लिए बहुत बड़ी बहस की आवश्यकता है। वर्तमान के अन्तर्विरोध आखिर हमारे ही अन्तर्विरोध होते हैं, जिन्हें समझने के लिए समसामयिक ऐतिहासिक यथार्थ को कठोर आत्मचेतना के स्तर पर पहचानने की आवश्यकता होती है।

समकालीनता पर कच्ची-पक्की बहसें हमेशा चलती रहती हैं। कविता के सन्दर्भ में कई उल्लेखनीय बहसें हुई हैं। अभी-अभी एकांत श्रीवास्तव ने वागर्थ का अंक निकाला है- हिन्दी कविता: 80 के बाद (लाँग नइान्टीज़)। उसमें दस लोगों ने बहस में भाग लिया है। लाँग नाइन्टीज़ की अवधारणा बद्रीनारायण की है। 2008 में देखने को मिली द लाँग नाइन्टीज़: समय को समझने का एक विनम्र प्रस्ताव शीर्षक से। उसी की कड़ी है फटी हुई जीभ की दास्तान नामक लेख जो 2009 में छपा था। वह विचारोत्तेजक मामला है, जिस पर मैंने थोड़ा-सा लिखा है जो आलोचना के नए अंक में छपा है। आज की बहस में भी मैं लाँग नाइन्टीज़ से जुड़ी कुछ बातें कहने की इजाजत चाहूँगा।

लाँग नाइन्टीज़ के पहले राजेश जोशी और विजय कुमार आलोचना के मंच से समकालीनता और कविता विषय को बहस के लिए आगे कर चुके थे। बाद में राजेश जोशी ने अपनी दूसरी नोटबुक वाली किताब का नाम ही रखा- समकालीनता और साहित्य। उसमें समकालीनता और कविता लेख में मेरी धारणा का उल्लेख किया गया है, जो मैंने एरिक हॉब्सबॉम की ‘शॉर्ट सेंचुरी के वज़न पर रखी थी- हमारे अपने सन्दर्भ में 19वीं शताब्दी की शुरूआत 1857 के विद्रोह से और 20वीं शताब्दी की शुरूआत 1947 में मिली आज़ादी से मानी जानी चाहिए। राजेश जोशी ने अपनी सुविधा के अनुसार मेरी उस बात को छोड़ दिया कि हमारे सन्दर्भ में 20वीं शताब्दी लगभग असमाप्त है। समाप्ति के कुछ चिह्न बाबरी मस्जिद के ध्वंस और उसके बाद की कुछ घटनाओं में अवश्य दिखते हैं। लेकिन हम 21वीं शताब्दी में आ गए हैं, कि इसे लेकर मेरे मन में दुविधा है। सूचना-प्रौद्योगिकी के विस्तार के लिहाज से यह आप कह सकते हैं कि हम लगभग 21वीं शताब्दी में आ गए हैं।

यह हमारा जीवन काल है। जब तक हम जि़न्दा हैं इसे समझने के लिए बार-बार नए सिरे से प्रयास की आवश्यकता होगी। और यह कोई प्रलय-काल नहीं है। वे बहुत-सी आशाएँ जो मनुष्य ने कल्पित की थीं, इस काल में फली-फूल रही हैं। एक स्वप्नहीनता के बावजूद। यह बात कविता में भी है। कविता का अर्थ होता है स्वप्नहीनता के विरुद्ध होना, भविष्य की ओर देखना। ब्रेख्त की मशहूर कविता है आने वाली पीढि़यों से, जो इस बेचैनी के साथ शुरू होती है- सचमुच, मैं एक अँधेरे वक्त़ में जी रहा हूँ!यह उस वक्त़ की कविता है जब द्वितीय विश्वयुद्ध का आग़ाज़ हो चुका था। मानवता भीषण ख़तरे में पड़ गई थी। यह कवि के लिए घोर आत्मसंघर्ष का दौर था, जिसमें वह अपनी कमियों को भी टटोलता है। सबने पढ़ी होगी यह कविता। कविता समाप्त होती है-

पर तुम, जब वह वक्त आए

आदमी आदमी का मददगार हो

याद करना हमें

कुछ समझदारी के साथ।

वह वक्त़ आए, कविता इसी के लिए लिखी जाती है। इसी बात में कवि की समकालीनता, आत्मसंघर्ष और भविष्य में उसका जीवन है। यही मानवीय मूल्य भी है। मानवीय मूल्य सत्य के अन्वेषण में है। सत्य वही नहीं जो हम देखते हैं, बड़ा सत्य वह है जो हम चाहते हैं। सवाल यह है कि हम चाहते क्या हैं और कितनी ताकत के साथ चाहते हैं। बहुत ऊर्जा चाहिए। बहुत ताकत चाहिए। बहुत सावधानी भी चाहिए। लेकिन विगत के उद्यमों, चाहे वे आसन्न विगत के क्या न हों, को झुठलाने और नकारने की आवश्यकता नहीं पड़नी चाहिए। पुराने के बीच से ही नया फूटता है। नए के भीतर से दूसरा नया फूटेगा। पुराना फ़ैशन की तरह कभी न लौटे, लेकिन उसका अद्भुत अपनी जगह ज़रूर बना रहेगा, और उसमें झाँकने की भी आवश्यकता बनी रहेगी।

समकालीन कवि वह है जो अपने को पूर्ववर्तियों की वैचारिक मान्यताओं की कड़ी के रूप में देखता है। वह केवल वास्तविकता की ओर उन्मुख नहीं है। वास्तविकता को वह आत्मचेतना के स्तर पर रचने का प्रयास करता है, जिसमें भविष्य और उसके रास्ते संकेतित होते हैं। यह काम चुपचाप चलता है, बहुत बोलकर नहीं। कविता की यही प्रकृति है। कवि के आत्मसंघर्ष की यह प्रकृति है। कवि वास्तविकता का हिस्सा मात्र नहीं होता। वह वास्तविकता के विरुद्ध एकांत की रचना करता है,और एकांत जिस चुप्पी की रचना करता है उसमें अनन्त का स्फोट होता है। दूसरे शब्दों में, भविष्य का स्फोट होता है।

प्रश्न है हमारा समय क्या है? हमारे समय की कविता कैसी है? बद्री हमारे समय को लाँग नाइन्टीज़ नाम देते हैं। लाँग नाइन्टीज़ यानी हॉब्सबॉम की ‘शॉर्ट सेंचुरी के बाद का समय, जिसमें पुराना समाप्त हो चुका, लेकिन नए का स्वप्न साफ नहीं है। लाँग नाइन्टीज़ पद में, इस तरह समाजवाद के भविष्य के प्रति निराशा दिखाई देती है। निराशा उचित है। लेकिन उस निराशा के उत्तर में इधर-उधर से लाए गए वैचारिक संस्रोतों में जो चमक और ऊर्जा देखी गई है, और जिस तरह पूर्व पीढ़ी के कृतित्व पर शरसन्धान किया गया है, वह आत्मश्लाघापूर्ण विच्छेद की ऊँचाई पर है। किसान, मजदूर और प्रोलेटेरियत आन्दोलनांे के बरक्स उपेक्षित एवं दलित, महिला एवं सबाल्टर्न प्रतिरोध बद्री के अनुसार ’90 के बाद की विशेषता है। (वागर्थ-209/34) इससे सहमत होने की गुंजाइश मेरी समझ से कम बनती है। ये बातें बहुत पहले पैदा हो गई थीं। हॉब्सबॉम की पुस्तक एज़ ऑफ एक्सट्रिम्स के शुरू में लोगों की नज़र में बीसवीं शताब्दी क्या है शीर्षक के अन्तर्गत कुछ टिप्पणियाँ शामिल की गईं हैं। नोबेल पुरस्कार से सम्मानित रीता लेवी मोंतेलसिनी की टिप्पणी है, ‘‘सभी बातों के बावजूद इस शताब्दी में अच्छे से अधिक अच्छे के लिए क्रांतियाँ हुई हैं… चैथी सत्ता का उदय और सदियों से दमित नारी का उत्थान।’’ यह बात यूरोप की तुलना में भारत में कम हुई थी, लेकिन हुई थी। कविता में भी ’90 से पहले यह दिखाई पड़ती है। रघुवीर सहाय में स्त्री प्रश्न खूब है। मंगलेश, अरुण कमल, राजेश जोशी और उदयप्रकाश में भी है। यह अलग बात है कि इन कवियों ने इसे अलगा कर दिखाने की कोशिश नहीं की, और पिछले दौर में कवयित्रियों का अभाव रहा। अच्छी बात है कि बद्री ने अपने पूर्व के कुछ कवियों को, जिसमें राजेश और अरुण हैं, सरलीकरण की प्रवृत्ति से बाहर रखकर देखा है, लेकिन इसके लिए उन्हें ’90 का ऋणी बना दिया है। बड़ी चीज़ नब्बे है; जैसे पहले छायावाद के विरुद्ध बड़ी चीज़ नई कविता थी। नयी कविता छायावादी संस्कार की शत्रु थी; ’90 परवर्ती प्रगतिशील संस्कार का किंचित शत्रु हुआ।

प्रगतिशील कविता, अपने सफल-असफल दावों में, मानवता के लिए संश्लिष्ट विश्वदृष्टि अर्जित करने का प्रयास करती है। विश्वदृष्टि का अर्थ विचारधारा अथवा माक्र्सवादी दृष्टि नहीं। विश्वदृष्टि का सम्बन्ध साहित्य से है, वह साहित्य से उद्भूत होने वाली चीज़ है। नई कविता भी विश्वदृष्टि अर्जित करने का प्रयास करती है। अज्ञेय के यहाँ यह बात है। प्रगतिशील कविता और नई कविता, दोनों आधारभूत विभिन्नताओं को टटोलने का प्रयास करती हैं। दोनों अपने-अपने स्तर पर एक जगह आकर मिलने का भी प्रयास करती हैं। शमशेर और मुक्तिबोध, दोनों इस बात के उदाहरण हैं। अच्छी बात थी कि इन कवियों में जीत की तमन्ना थी तो असफलता का इतिहास रचने का साहस था, जो बाद में कम दिखाई पड़ता है। आज सफलता के लिए जोड़-तोड़ कितना बढ़ा है, बद्रीनारायण को भी मालूम है।

बद्रीनारायण ने जितने समकालीन प्रतिरोध गिनाए हैं, उनमें से एक है सबाल्टर्न। यह भी ’90 की कोई संवृत्ति नहीं है। दूसरी बात, जैसे आवाँगार्द की कला में बाद में आकर्षण नहीं बचा था, वही बात सबाल्टर्न के साथ है। सबाल्टर्न लोग त्रासदी के प्रसन्न-चित्त आख्याता बन गए, सांस्कृतिक प्रभुत्व (कल्चरल हिगेमनी) तोड़ना उनके एजेंडे में नहीं रहा। आज जब मजदूरों, किसानों, निम्न बुर्जुआ का लोकप्रिय गठबंधन, जिसे जनता कहा जाता है, गायब हो रहा है, सबाल्टर्न पर फ्रेडरिक जैम्सन की उत्तर आधुनिकता के विमर्षों पर यह टिप्पणी सही बैठती है।

इसके लिए फ्रायड के स्वप्न विश्लेषण के रूपक का इस्तेमाल किया गया है। संभवतः सब बातों के बावजूद यह नई कहानी नहीं है। फ्रायड के उस आनन्द को याद करें जो उन्हें एक अस्पष्ट आदिवासी संस्कृति की खोज से प्राप्त हुआ था। स्वप्न विश्लेषण की अनेक परम्पराओं में से सिर्फ़ यह खोज उनकी अवधारणा के काम की थी कि सभी स्वप्नों के सेक्स सम्बन्धी छुपे अर्थ होते हैं- केवल सेक्स सम्बन्धी स्वप्नों के, जिसके कुछ और ही अर्थ होते हैं। यही बात उत्तर आधुनिक बहसों पर भी लागू होती है। जिस विराजनीतिक नौकरशाही से यह संवाद स्थापित करता है, वहाँ समस्त सांस्कृतिक लगने वाली बातें राजनीतिक नीतिशिक्षण का प्रतीकात्मक रूप निकालती हैं- सिवाय एकमात्र स्पष्ट राजनीतिक स्वर के जो पुनः राजनीति से संस्कृति में घुसपैठ का लक्ष्य रखता है।2

    बद्रीनारायण ने ’90 के दशक में उभरे कवियों में सामान्य सम्बन्ध-सूत्र की दृष्टि से स्थानीयता अथवा लोक को जो महत्त्व दिया है वह तब तक फ्रायडीय आनन्द से आगे की कहानी नहीं बन सकता, जब तक कि उसकी आधारभूत विभिन्नता किसी संश्लिष्ट और मूलगामी विश्वदृष्टि पर आकर नहीं मिलती। कम-से-कम दबाव पैदा करने की षक्ति तो उसमें होनी ही चाहिए। मैं यह नहीं कहता कि आज की कविता में यह बात एकदम नहीं है; लेकिन स्थानीयता अथवा लोक के नाम पर विराजनीतिक नौकरशाही से सामंजस्य बैठाने और सत्ता संरचना में अपने को खपा देने का भी काम कम नहीं हुआ है। संभव है कि इस कहानी के हम भी किरदार और पवित्र पापी हों। इस बात से कविता के आत्मसंघर्ष का गहरा सम्बन्ध है।

    फूको प्रतिपादित करते हैं सत्ता सर्वत्र है। कोई भी ऐसा स्थान नहीं है, जहाँ से प्रतिरोध को सत्ता से अलगाया जा सके। जो विरोध में खड़ा है वह वास्तव में दूसरे प्रकार की सत्ता है। साहित्य अथवा कविता प्रतिरोध की सत्ता के रूप में भी इसका अपवाद नहीं है। इसलिए पूर्व पीढ़ी को कोसना और अपनी पीठ थपथपाना ठीक नहीं है। इस रास्ते हम समकाल के ही बन्दी हो जाते हैं। ठीक काम यह है कि हम समसामयिक ऐतिहासिक यथार्थ और उसकी चुनौतियों से आत्मचेतना के स्तर पर टकराते रहें। इसे सच्ची रचनाशीलता कही जा सकती है। इससे नए रास्ते निकलेंगे, नई युगचेतना निर्मित होगी। परिवर्तनकारी समय (पद बद्री का) की रचना भी इसी रास्ते होगी। भारत माता ग्राम-वासिनी, जो लाँग नाइन्टीज़ के सम्पादकीय में एकांत श्रीवास्तव ने उत्साह में जो कहा है, भावना के स्तर पर मैं उनकी बात की इज्जत करता हूँ, लेकिन उसमें निहित नाॅस्टैलिजिया और रूमानियत से बात नहीं बनेगी। कई-कई विषय और भावधाराओं की ज़रूरत है। समकालीन कविता के आत्मसंघर्ष में केवल गाँव और कस्बा शामिल नहीं हैं। विगत की तुलना में उसके क्षेत्र में कई गुना विषय बढ़ गए हैं। काव्य-वस्तु के विकास के लिए भी संघर्ष करना है, जो इस सूचना प्रौद्योगिकी युग में कई गुना कठिन हो गया है। काव्य-विषय की दृष्टि से हमें भारी कठिनाइयों का सामना करना पड़ सकता है। सूचना प्रौद्योगिकी की पहुँच कवि-चेतना को मात कर देती है। उससे सीखने और टकराने, दोनों की ज़रूरत है। हम सूचना और संचार प्रविधियों की अर्थव्यवस्था में आ चुके हैं। इसकी नई उत्पादन विधि, डी. फोरे की मानें तो, साॅफ्टवेयर के विकास को भी पार कर जाएगी, किस हद तक, उसे अभी समझा नहीं जा सकता है।3 इस तरह कवि-कर्म कठिन से कठिनतर होता जाएगा। ऐसे में, हमारी अन्तःप्रेरणाएँ ही सबसे अधिक काम आएँगी। दूसरी बात, सूचना प्रौद्योगिकी भी विषय है। बड़ा विषय है। जैसे पहले औद्योगिक क्रान्ति और मजदूरों के आन्दोलन बड़े विषय थे।

    हमारे समकालीन कवि दो प्रकार के हैं। एक वे हैं जो अपनी रचना और उसके विषयों को लेकर बहुत मुखर हैं। उन्हें अपने को मनवाने की चिन्ता अधिक रहती है। समझौताविहीन स्तर पर और बेहतरी की दिशा में या कहें प्रगति की मंशा से यदि किसी में यह है, उसे भी आत्मसंघर्ष के रूप में मंजूर किया जाना चाहिए। दूसरे वे हैं जो अपने कवि होने के प्रति संकोच का भाव रखते हैं। उनका आत्मसंघर्ष कठिन है। उनमें अन्तःप्रेरणाएँ अधिक सक्रिय रहती हैं, लेकिन उन्हें समझने में कवि अपने को असमर्थ महसूस करता है। जब कवि ही नहीं समझ पाता तो दूसरों के लिए समझना मुश्किल काम होगा ही। इस मुश्किल के भीतर कवि के आत्मसंघर्ष को समझने और इसी दृष्टि से उसे महत्त्व दिए जाने की आवश्यकता है। आज कवि बहुत हैं, लेकिन इस मुश्किल के भीतर ऊँचाई पाने वाले कवि बहुत कम हैं। जो हैं उन्हें आगे रखकर देखने की ज़रूरत है। आत्मसंघर्ष वाली बात ठीक-ठीक तभी समझ में आ सकती है।

    अन्तःप्रेरणा- जिसे पुराने लोग कारयित्री प्रतिभा कहते थे। यह उत्पाद्य प्रतिभा है। प्रतिभा कहने से भी काम चल सकता है। इसमें अनुभूति, जीवनानुभूति और कलात्मक अनुभूति, सभी बातें शामिल हो जाती हैं। यह सदैव बेहतरी अथवा अच्छाई की दिशा में सक्रिय रहती है। इसे मान लेने के बावजूद, जैसा कि मैं समझता हूँ, अन्तःप्रेरणा वह स्पेस है जहाँ अच्छाई और बुराई को बराबर का दर्जा प्राप्त होता है। अन्तःप्रेरणा में हम एक वस्तु को दूसरी वस्तु को विकल्प के रूप में नहीं देखते, उनसे चेतनागत सम्बन्ध अथवा विषेष प्रकार का तादात्म्य स्थापित करते हैं। सम्बन्ध की प्रकृति अथवा वह विषेष प्रकार क्या है, यह महत्त्वपूर्ण है। अन्तःप्रेरणा की क्रियाओं में अच्छा और बुरा दोनों समान महत्त्व रखते हैं। इस सम्बन्ध में फूको का एक कथन याद आता है, ‘‘मैं नहीं कहता कि सभी चीज़ें बुरी हैं, लेकिन वे सभी चीज़ें खतरनाक हैं जो ठीक-ठीक बुरी के समान नहीं हैं।’’4

    एक साक्षात्कार में यह बात आई है। और मैं जब यह पढ़ रहा था तो अचानक मुझे रामचरितमानस का अन्तिम दोहा याद आया-

कामहि नारि पिआरी जिमि लोभहि प्रिय जिमि दाम।

तिमि  रघुनाथ  निरंतर  प्रिय  लागहु  मोहि राम।

    मैंने शुरू में कहा था कि अंत में मानवीय मूल्य पर भी एकाध बात करूँगा। कामपिपासा और लोभ बुराई है, अमानवीय है। तुलसी ने अपनी भक्ति को उसके समकक्ष रखा। बुराई में जितनी शक्ति होती है, वह भक्ति को प्राप्त हो, भाव यह है। भक्ति को पाने के लिए उस पर बुराई को उत्प्रेक्षित करना पड़ा। मानवीय मूल्य तो ठीक है, लेकिन जो संसार है उसमें मानवीय-अमानवीय, अच्छा-बुरा, सब कुछ है- सुगुन छीर अवगुन जल ताता; मिलइ रचइ परपंच विधाता।

    अन्तःप्रेरणा के क्षेत्र में अन्तर्बाधा के लिए स्थान नहीं है। लेखक के नाते हम जानते हैं कि मूल्य अन्तिम नहीं होते। सात्र्र का यह कथन महत्त्वपूर्ण है, ‘‘मानवता को अभी निर्धारित होना बाकी है।’’ यही समझ हमें फासीवादी होने से बचाती है और आत्मसंघर्ष के लिए युक्ति प्रदान करती है।

    एक साथ कई विषयों से गुज़रना और उनसे जुड़े प्रश्नों पर बात करना कठिनाई पैदा करता है। यह दौर ही ऐसा है- अनेक विषयों और प्रश्नों से घिरा। इस अर्थ में मैं मानता हूँ कि नौवाँ दशक और उसके बाद का समय अलग से दिखाई देता है। लेकिन इसे लाँग नाइन्टीज़ ही कहा जाए, इसे लेकर मेरे मन में दुविधा है। बद्रीनारायण की इस बात से मैं सहमत हूँ कि नब्बे के दशक के पूर्व की कविता में जा वैचारिक संस्रोत काम कर रहे थे, वे बाद में कमजोर पड़ गए या अपर्याप्त साबित हुए। हमारे समय में अनेकान्त का महत्त्व है। हम किसी भी बुनियादी विषय पर एकमत होने की स्थिति में पहले की तुलना में बहुत कम हैं। दूसरी ओर, दूसरों की तरफ से प्रस्तावित विषय और विचार के प्रति हम पहले की तरह द्वेषी नहीं हैं। हम अकेला विकल्प हैं, यह बात अब नहीं रही। हमारा विवाद सबसे है और अपने आपसे भी है, जो जीवन और रचनाशीलता दोनों में मायने पैदा कर रहा है। लेकिन जिस दुनिया में हम जी रहे हैं उसमें ख़तरे भी कई गुना बढ़ गए हैं, उसमें हार जाने का डर विगत की तुलना में बढ़ गया है। यह एक ऐसा क्षण अथवा विन्दु है जो हमें इस समझ पर कायम होने के लिए विवश करता है कि पिछले दर्शन का महत्त्व है, लेकिन उसमें ज़रूरी संशोधन और नये अध्याय जोड़ने की ज़रूरत पड़ेगी। अभी तो हमें यही पता नहीं है कि हम कहाँ जा रहे हैं। यह अनेकान्त काल है। लेकिन रचनाशीलता के लिए, तमाम मुश्किलों के बावजूद, यही ऊर्वर काल है। हमें अपना काम करते हुए इस उम्मीद पर अपने को कायम रखने की ज़रूरत है, जो ब्रेख्त की उद्धृत पंक्तियों में है, ‘…जब वह वक्त आए/ आदमी-आदमी का मददगार हो/ याद रखना हमें/ कुछ समझदारी के साथ। जब वह वक्त़ आएगा तो बे्रख्त के साथ शायद हमें भी कुछ समझदारी के साथ थोड़ा याद रखा जाए। आमीन!

 सन्दर्भ:

(1) मुक्तिबोध रचनावली-5/334 (पे.बै.).

(2) फ्रेडरिक जैम्सन, पोस्ट मार्डनिज़्म ऑर द कल्चरल लॉजिक  ऑफ लेट कैपिटलिज़्म, पृ.-64.

(3) प्रसन्न कुमार चैधरी की पाण्डुलिपि अतिक्रमण की अन्तर्यात्रा से साभार.

(4) फूको रीडर, पॉल  रेबिनो (सम्पादक), पृ.-343.

 भारत भवन में 21.12.2012 को पढ़ा गया आलेख। कुछ अंश नहीं पढ़े गए। संशोधित।

sudhir ranjan singh

sudhir ranjan singh

हिन्दी के आलोचक। काव्य संकलन ‘और कुछ नहीं तो’ और आलोचना की पुस्तक ‘हिन्दी समुदाय और राष्ट्रवाद’ प्रकाशित। एक कविता संकलन और आलोचना की दो पुस्तकें शीद्घ्र प्रकाश्य। भोपाल के शासकीय महाविद्यालय में प्राध्यापन।

भावनाएँ अस्तित्व की निकटतम अभिव्यक्ति हैं: गोरख पांडेय

By गोरख पांडेय

(यह डायरी इमर्जेंसी के दिनों में लिखी गयी । इसमें तत्कालीन दौर के साथ गोरख की निजी जिन्दगी भी दिखाई पड़ती है । याद रहे कि गोरख पाण्डे स्किजोफ़्रेनिया के मरीज रहे थे और इसी बीमारी से तंग आकर उन्होंने आत्महत्या भी की थी । अनेक जगहों पर डायरी की टीपें लू शुन की कहानी ‘एक पागल की डायरी’ की याद दिलाती हैं । चाहें तो उस कहानी की तरह इसे भी रूपक की तरह पढ़ सकते हैं अर्थात उनको महसूस हो रहे त्रास को आपात्काल के आतंक का रूपक समझकर । इसमें संवेदनशील कवि की अपनी ही बीमारी से जूझते हुए रचनाशील बने रहने की बेचैनी दर्ज है । आर्नोल्ड हाउजर ने लिखा है कि कलाकार अक्सर असामान्य होते हैं लेकिन सभी असामान्य लोग कलाकार नहीं होते । गोरख पांडेय की यह डायरी एक कवि की डायरी है- इसका अहसास कदम कदम पर होता है । स्किजोफ़्रेनिया का वह पहला हमला था । तनाव को आता हुआ वे महसूस करते हैं । फिर विवेक साथ छोड़ने लगता है । काल्पनिक प्रेम होने लगते हैं । कल्पना में ही मुलाकातें, कल्पना में ही प्रेमिका दुश्मन भेजती है । कल्पना में दुश्मनों से मुकाबला और उनकी पराजय । लेकिन जब कविता में यही अनुभूतियाँ प्रकट होती हैं तो उनकी परिपक्वता देखते ही बनती है । दोस्तों की भारी फ़ौज, उनके साथ स्त्रियों से लेकर तरह तरह के विषयों पर अनन्त बहसें । जिनका जिक्र इस डायरी में आया है उन सबका परिचय भाकपा (माले) से हो चुका था । सभी साथ हैं पर गोरख बनारस से भागते हैं । दिल्ली आने पर पुराने साथियों में थकान दिखाई पड़ती है । अन्तिम कविता में वे इन्हीं साथियों को पुकार रहे हैं । यह डायरी प्रोफ़ेसर सलिल मिश्र से प्राप्त हुई है – गोपाल प्रधान ।)

गोरख पांडेय

गोरख पांडेय

6—3—1976

कविता और प्रेम – दो ऐसी चीजें हैं जहाँ मनुष्य होने का मुझे बोध होता है । प्रेम मुझेसमाज से मिलता है और समाज को कविता देता हूँ । क्योंकि मेरे जीने की पहली शर्त भोजन, कपड़ा और मकान मजदूर वर्ग पूरा करता है और क्योंकि इसी तथ्य को झुठलाने के लिये तमाम बुर्जुआ लेखन चल रहा है, क्योंकि मजदूर वर्ग अपने हितों के लिये जगह जगह संघर्ष में उतर रहा है, क्योंकि मैं उस संघर्ष में योग देकर ही अपने जीने का औचित्य साबित कर सकता हूँ—–

इसलिये कविता मजदूर वर्ग और उसके मित्र वर्गों के लिये ही लिखता हूँ । कविता लिखना कोई बड़ा काम नहीं मगर बटन लगाना भी बड़ा काम नहीं । हाँ, उसके बिना पैंट कमीज बेकार होते हैं ।

8—3—1976 पाल्हामऊ गाँव (जौनपुर)

श्यामा को विभाग में सूचना दी कि दो-एक दिन मुझे यहाँ नहीं रहना है । वह उदास थी । धीरे धीरे वह मेरे ऊपर हावी होती जा रही है । मैं होने दे रहा हूँ ।

2 बजे बस स्टेशन टुन्ना के साथ । रिक्शे पर टुन्ना से कहा- कहो तो मैं एक कविता बोलूँ-

उसने जीने के लिये खाना खाया

उसने खाने के लिये पैसा कमाया

उसने पैसे के लिये रिक्शा चलाया

उसने चलाने के लिये ताकत जुटायी

उसने ताकत के लिये फिर रोटी खाई

उसने खाने के लिये पैसा कमाया

उसने पैसे के लिये रिक्शा चलाया

उसने रोज रोज नियम से चक्कर लगाया

अन्त में मरा तो उसे जीना याद आया

मिश्रा की शादी में शरीक हुए । मिश्रा वर की तरह चमक रहा है । बारात की तरह बारात । शादी की तरह शादी ।

9—3—1976

जौनपुर से गाजीपुर । पहिये खराब होते हुए । बसें रूकतीं और भागतीं । रामजी की शादी । ज्यादा खुला और निकट का माहौल । मीठा, चाय, पान, सिगरेट और दोस्त बहुतायत । रामजी की पत्नी दिखी । खूबसूरत लड़की । खुश है । रामजी उछलते कूदते । धर्म और अध्याम के विरुद्ध भाषण । चितरंजन, कृष्णप्रताप वगैरह । टुन्ना, अमित, महेश्वर । विनय भाई की कविताएँ । अद्भुत सहजता बच्चों सरीखी ।

नेतन क दवरी से जिनगी पुआल भईल ।

10—3—1976

रास्ते में । वापसी । पैसा । महेश्वर प्रधान । मैं । पैसा । महेश्वर । तनाव । मैं । पैसा । तनाव । महेश्वर । मैं । तनाव ।

11—3—1976

श्यामा नहीं दिखी । विभाग में परसों आई थी । कल नहीं । आज भी नहीं ।

12—3—1976

आज विभाग नहीं गया । खूब सोया । होली आयी । लड़के, लड़कियाँ घरों को चले । होली खेलने । रात को छात्रावास में कोई लड़का बहुत तेज चीखा- तेरी बहन की– । चीखती हुई यौनवर्जना । होली ।

ठप सा पड़ा हुआ है

देश

आपात स्थिति

सिर्फ़ चलती है

थम गयी है हलचल

शोर बन्द है

शान्ति बन्दूक की नली से

निकलती है

कामरेड,

कहीं कुछ हो रहा है ?

मुझे निराश मत करो

कामरेड,

बताओ कहीं कुछ हो रहा है ?

यह पहाड़ हड्डी पसली एक करता है

फिर भी महंगू चुपचाप

ढो रहा है

क्या यही सच है कामरेड

कि विचार और क्रिया में

दूरी हमेशा बनी रहती है

कामरेड, कितना मुश्किल है सही होना

कहीं कुछ हो रहा है कामरेड !

13—3—1976

परसों ललित कला की प्रदर्शनी देखी । साथ में अवधेश जी, श्रीराम पाण्डेय ।

एक मर्द का कन्धे से ऊपर का भाग औरत के जांघों और नाभि के बीच गायब हो गया है । प्रधान जी इस सिलसिले में टिप्पणी करते हैं कि एक व्यक्ति पीछे से उन्हें टोक देता है । बाद में पता चलता है कि वह चतुर्थ वर्ष का कला-छात्र है । उसके विचार से ‘हम जितना समझते हैं वह ठीक है ।’ वह कहना यह चाहता है कि वैसे तो हमारी समझ के पल्ले बहुत कुछ नहीं पड़ रहा मगर जो पड़ रहा है वह हम जैसे गंवारों के लिये काफ़ी है । फिर खड़े खड़े कला पर बहस ।

एक– चित्रकार अपनी भावनाओं के अनुसार चित्र बनाता है । दर्शक उसे अपनी भावनाओं के अनुसार समझता है । अगर चित्र दर्शक के मन में कोई अनुभूति उपजाने मेंसमर्थ हो जाता है तो चित्रकार सफल है ।

दो– क्या हमें हक है कि चित्र में व्यक्त कलाकार की भावना को जानें ? या वह मनमानी ढंग से कुछ भी सोचने के लिये छोड़ देता है ? क्या चित्रकार हमें अनिश्चित भावनाओं का शिकार बनाना चाहता है ? क्या वह अपना चित्र हमारे हाथ में देकर हमसे पूरी तरह दूर और न समझ में आने योग्य रह जाना चाहता है ? क्या उसे हमारी भावनाओं के बारे में कुछ पता है ?

अन्ततः क्या कलाकार, उसकी कृति और दर्शक में कोई संबंध है ? या तीनों एकदम स्वतंत्र एक दूसरे से पूर्णरूपेण अलग इकाइयां हैं ?

एक तरफ़ कलाकार आपातस्थिति की दुर्गा का गौरव चित्रित कर रहा है, दूसरी तरफ़ कलाकार आपातस्थिति को चित्र में लाना अकलात्मक समझकर खारिज कर देता है । ये दोनों एक ही स्थिति के मुखर और मौन पहलू नहीं हैं ?

बहुतायत उन चित्रों की है जिनमें सारी दुनिया सेक्स की धुरी पर घूमती नजर आती है । सचित्र कोकशास्त्र को शरमाकर अमूर्त बनाने की क्या जरूरत है ?

पेंसिल से बरगद का तना बनाया है किसी ने । खूबसूरत । वह लंका पर दिखने वाली लड़की जो मुझसे ऊब गयी थी, पता चला कि धर की सहछात्रा है । विधु वर्मा भी हैं । मैं विधु को देखता हूँ । धर ने बेंत से मोर बनाया है । बड़ा सा । बाहर खड़ा है ।

Of nature the ancients loved to sing the beauty:

Moon and flowers, snow and wind, mist, hills and streams.

But in our days poems should contain verses steely.

And poets should form assault teams.

The body is in jail

But thy spirit, never.

For the great cause to prevail

Let thy spirit soar, higher.

Every morning the sun, emerging over the wall

Beams on the gate, but the gate is not yet open

Inside the prison lingers a gloomy fall

But we know outside the sun has risen.

Nostalgically a flute wail in the ward

Sad grows the tone, mournful the melody.

Miles away, beyond passes and streams in infinite melancholy

A lonely wife mounts a tower to gaze abroad.

14—3—1976

आशा करना मजाक है

फिर भी मैं आशा करता हूँ

इस तरह जीना शर्मनाक है

फिर भी मैं जीवित रहता हूँ

मित्रों से कहता हूँ –

भविष्य जरूर अच्छा होगा

एक एक दिन वर्तमान को टालता हूँ

क्या काम करना है ?

इसे मुझे तय नहीं करना है

लेकिन मुझे तय करना है

मैं मित्रों को बुलाउँगा –

कहूँगा –

हमें (हम सबको) तय करना है

बिना तय किए

इस रास्ते से नहीं गुजरना है ।

मुझे किसी को उदास करने का हक नहीं

हालांकि ऐसे हालात में

खुश रहना बेईमानी है ।

हिंदी में कौन सुंदर लेखिका है ? महेश्वर के कमरे में बात आती है । एक लेखिका की विलेन जैसी छवि पर अटक जाती है । क्या पूर्वी उत्तर प्रदेश में सुंदर औरतें हैं ? पहले मैं सोचता था कि नहीं हैं । मेरा यह भ्रम चूर चूर हो गया । मध्यमा में जिस लड़की को चाहता था वह देवरिया के एक गाँव की थी । गोरी, कमल की लम्बी पंखुड़ी सी बड़ी आँखें मुझे अब तक याद हैं । याद है, किस तरह उसने एक बार हाथ पकड़कर अपनी ओर खींचा था, मैं सितार के कसे तारों की तरह झनझना उठा था ।

पिछले दिसम्बर तक जिस लड़की को चाहता था वह आजमगढ़ से आयी थी । उसने खुद को सजाने सवारने में कोई कसर नहीं रखी थी । बाब्ड, बेलबाटम, मासूम, कटार सी तीखी । लचीली, तनी हुई, प्रेम से डूबती, घृणा से दहकती । मैंने उसे कविता दी थी–

हिंसक हो उठो

मेरे लुटे हुए प्राण

अन्ततः वह हिंसक हो उठी ।

सवाल यह नहीं कि सुन्दर कौन है । सवाल यह है कि हम सुन्दर किसे मानते हैं । यहाँ मेरे subjective होने का खतरा है । लेकिन सच यह है कि सौन्दर्य के बारे में हमारी धारणा बहुत हद तक काम करती है । हम पढ़े लिखे युवक फ़िल्म की उन अभिनेत्रियों को कहीं न कहीं सौन्दर्य का प्रतीक मान बैठे हैं जो हमारे जीवन के बाहर हैं । नतीजतन बालों की एक खास शैली, ब्लाउज, स्कर्ट, साड़ी, बाटम की एक खस इमेज हमारे दिमाग में है । हम एक खास कृत्रिम स्टाइल को सौन्दर्य मानने लगे हैं । शहर की आम लड़कियाँ उसकी नकल करती हैं । जो उस स्टाइल के जितना निकट है हमें सुन्दर लगती है ।

फिर भी हम स्टाइल को पसन्द करते हैं, ऐसा मानने में संकोच करते हैं । फ़िल्में, पत्रिकाएँ लगातार औरत की एक कामुक परी टाइप तस्वीर हमारे दिमागों में भरती हैं, लड़कियों को हम उसी से टेस्ट करते हैं । हम विचारों के स्तर पर जिससे घृणा करते हैं भावनाओं के स्तर पर उसी से प्यार करते हैं । भावनाएँ अस्तित्व की निकटतम अभिव्यक्ति हैं । यह हुआ विचार और अस्तित्व में सौन्दर्यमूलक भेद । यह भेद हमारे अंदर चौतरफ़ा वर्तमान है ।

हमें कैसी औरत चाहिए ?

निश्चय ही उसे मित्र होना चाहिए । हमें गुलाम औरत नहीं चाहिए । वह देखने में व्यक्ति होनी चाहिए, स्टाइल नहीं । वह दृढ़ होनी चाहिए । चतुर और कुशाग्र होना जरूरी है । वह सहयोगिनी हो हर काम में । देखने लायक भी होनी चाहिए । ऐसी औरत इस व्यवस्था में बनी बनायी नहीं मिलेगी । उसे विकसित करना होगा । उसे व्यवस्था को खतम करने में साथ लेना होगा । हमें औरतों की जरूरत है । हमें उनसे अलग नहीं रहना चाहिए ।

15—3—1976

दिन मे खूब सोया । सपना देखा । पिता की गिरफ़्तारी हुई । सरकारी लोन न लौटाने की वजह से । मैंने घर का काम सम्हाला । खेत में काम करते वक्त जूता बदला ।

बदला शहर कि साथ में जूता भी बदल गया

बदले थे ब्रेख्त ने वतन जूतों से जियादह

लीडर ने भी देखा न था कब जूता चल गया

मिलते हैं अब गवाह सबूतों से जियादह

शाम को गम्भीर मानसिक जड़ता और दबाव । गोया बोल ही न सकूं । न हंस सकूं । महेश्वर, अमित, प्रधान, जलेश्वर सब इसे लक्ष्य करते हैं । यह परेशानी काफ़ी दिनों बाद हूई है । एक चट्टान सी दिमाग पर पड़ी हुई है । मैं हंसने की, हल्का होने की कोशिश करता हूं । लेकिन नाकामयाब । लगता है, भीतर ही भीतर कोई निर्णय ले रहा हूं । दुःखों के भीतर से और दुखी होने का निर्णय – ऐसा लगता है । अमित के कमरे में चाय पी । महेश्वर और कभी कभी प्रधान ने गाना गाया । जलेश्वर ने उर्दू शायर की नकल की । जड़ता कुछ टूटी । तब तक मैंने फ़ैसला भी कर लिया । मैं सु को पत्र लिखूंगा । लिखूंगा–

पता नहीं यह पत्र आप तक पहुंचे या नहीं । फिर भी लिख रहा हूं । आप को ताज्जुब होगा ।

आप नाराज भी होंगे । फिर भी मैं अपने आपको रोक नहीं पा रहा ।

आप को मेरे व्यवहारों से मेरे न चाहते हुए भी कष्ट पहुंचा । (मैंने लिखा है न चाहते हुए । आप गुस्से में इसका अर्थ चाहते हुए लगा सकते हैं । उन दिनों आप मेरे प्रति जितना खौफ़नाक पूर्वाग्रह के शिकार थे, उसमें सहज ढंग से मेरी हर बात का उल्टा ही अर्थ आपके दिमाग में आया होगा ।)

खैर, जब आपने मेरे प्रति हमलावर रुख अख्तियार किया, तब भी मैं आप पर नाराज नहीं हो सका । नाराज हुआ तो सिर्फ़ एक आदमी पर । उस पर, जिसने मेरे ऊपर हमले की योजना बनायी ।

नाराजगी से ज्यादा सदमा लगा मुझे । पूरी तरह गलत समझ लिये जाने का सदमा । आप लोगों की निगाह में वे तमाम लोग सही हो गये जो झूठ और पाखण्ड के साये में पलते हैं । मैं गलत हो गया । अगर इसे अहंकार न मानकर तथ्य का विवरण देना समझा जाय तो मैं अपने बारे में कह सकता हूं कि मैंने कदम कदम पर पाखण्ड और दमन के खिलाफ़ बगावत की है । मैंने अतीत में एक लड़की से सम्बन्ध इसीलिए तोड़ा था कि उसके साथ मेरा सम्बन्ध पूरी तरह से पाखण्ड और दमन पर आधारित था । उसे एक सेकण्ड के लिए भी न चाह सका । साथ ही वह सम्बन्ध मेरे पिता द्वारा बचपन में पैसे के आधार पर तय किया गया था । पिता से नफ़रत करने और उनके निर्णयों को नष्ट करने की कड़ी में यह घटना भी हुई थी ।

अपने बारे में सफाई देना जरूर कष्टप्रद स्थिति है । मुझे कतई पसन्द नहीं । फिर भी मैं तमाम बार बौखला सा उठता हूं कि मुझे क्यों इस तरह गलत समझा गया । आपने पूछा था कि मैं आपको दलाल समझता हूं ? मैं आपसे जानना चाहता था कि क्या आप मुझे लम्पट और व्यभिचारी समझते हैं ? आपके पास इसका प्रमाण नहीं है । आपको ताज्जुब होगा कि मुझे लड़कियाँ लगातार फ़ेवर करती हैं । इसका कारण मुझे नहीं पता । लेकिन यह तथ्य है । आपको ताज्जुब होगा यह भी जानकर कि आज तक पूरे जीवन में दो-चार वाक्य अगर मैंने किसी लड़की से कहे हैं, तो वह यही है । उसने मुझे खुद ही बात करने(या सुनने !) के लिए अप्रत्यक्ष तरीके से कहा था । इसका यह मतलब नहीं कि मैं उससे प्रभावित न था । प्रभावों के बावजूद मैं टालने की कोशिश करता रहा था ।

वह अंततः हिंसक हो उठी । मैंने उसे पढ़ने को एक कविता दी थी । उसमें कहीं लुटे हुए प्राणों को ‘हिंसक’ होने को कहा गया है । उसने हिंसक होकर, मुझे लगता है, कविता की सलाह को लागू कर दिया । लेकिन किसके ऊपर हिंसा ? उन पर जो हिंसा के लगातार शिकार हैं या उन पर जो हिंसा से शिकार बनाते हैं ?

उसे मुझसे सिर्फ़ शिकायत यह हो सकती है कि उसके सामने खुलकर मैंने अपने अतीत और वर्तमान की परिस्थितियों को नहीं रखा । इस काम में उसने भी मुझे मदद नहीं दी । एक तो मैं खुद इस मामले में बहुत काम्प्लिकेटेड हो गया हूं, दूसरे जब भी प्रयास किया उसने नकारात्मक रुख अपनाया । कई बार तो लगा कि उससे बात करते ही शायद रो पड़ूंगा या ऊल-जलूल बक जाऊंगा । सो, रुक गया । फिर परिस्थिति और जटिल होती गयी ।

हालांकि कई मामलों में मैं अपने आपको मूर्ख मानता हूं लेकिन वह बिल्कुल मूर्ख साबित हुई । कभी कभी सोचता हूं कि उसने गद्दारी की । लेकिन फिर लगता है कि यह उसके प्रति शायद ज्यादती होगी । (मजे की बात यह है कि वह मुझे ही गद्दार समझती है !)

वैसे तो आपको पत्र लिखकर धन्यवाद देने की बहुत पहले से इच्छा थी मगर इस बीच दो तीन घटनाओं ने मुझे उत्तेजित कर दिया । उसने अपने एक सहपाठी से मेरे बारे में बिल्कुल एकांगी सूचनाएं दीं । याने कि झूठ बोल गई । मैंने इसके लिए उसे एक बार अप्रत्यक्ष ढंग से डांटा था । फिर आप लंका पर दिखाई पड़े । कई बार आपसे बात करने की इच्छा हुई । लेकिन आप कहीं फिर मुझे गलत न समझ बैठें, इसलिए रोक गया ।

आपको मेरे या मेरे किसी मित्र के व्यवहार से कष्ट पहुंचा हो तो मुझे सख्त अफ़सोस है । मुझे आपसे कभी कोई शिकायत, कोई नाराजगी कतई नहीं रही । उसके प्रति जरूर गुस्सा रहा है, जो मेरा ख्याल है कि समय के साथ धीरे धीरे खतम हो जायेगा—-

(हां, आपको सूचित कर दूं कि किसी भी व्यक्ति द्वारा किसी दूसरे व्यक्ति को चाहा जाना अपराध नहीं है । गैर जिम्मेवारी और झूठ अपराध है । नारी मित्र चुनने का पूरा अधिकार मुझे है । मैं इसके लिए कानून के पोथों को गैर जरूरी मानता हूं । किसी का मूल्यांकन करते वक्त हमें अपने दृष्टिकोण का भी मूल्यांकन करना चाहिए ।)

बहुत बहुत धन्यवाद

आपका

16—3—1976

होली खेली गयी । खाना हुआ । सोये । शाम को शहर की ओर । महेश्वर, प्रधान, अमित,जलेश्वर, बलराज पाण्डेय । बलराज पाण्डे पत्नी से झगड़कर हास्टल अकेले आये । अस्पताल में अनिल नाम के प्यारे से बच्चे को अबीर लगाया गया । अमित हैदराबाद से अनुत्साहित और विवर्ण सा लौटा । विनोद जी को बुखार है और सिर में काफ़ी दर्द ।

लंका से अस्सी की ओर बढ़ने पर देखा कि नी के घर के पास एक और मकान उठ रहा है । काफ़ी उठ चुका है । अस्सी पर कालोनी की ओर मुड़ने वाले रास्ते की तरफ़ निगाह गयी ।

फिर तेरे कूचे को जाता है खयाल

दिले – गुमगश्ता मगर याद आया

शेखर इन्तजार ही कर रहा था । बहुत प्यारा लड़का है । इस शहर में एकमात्र आदमी जिसने हम सभी को अपने घर निमंत्रित किया था । वैसे रास्ते में नेपाली कवि श्री शेखर वाजपेयी जी मिले । मीठा, पूड़ियां, नमकीन, शराब, गोश्त- उसने सब कुछ खिलाया । हम प्रसन्न हुए । फिर अस्सी चौराहे पर देखा कि शास्त्री जी की दुकान बदल गयी है । बड़ी और खूबसूरत सजावट । केदार जी ने मस्ती में अबीर चारों तरफ़ छिड़क दिया ।

पाण्डे जी के साथ उनके घर । राय जी से परिचय हुआ, उनके पड़ोसी हैं । काशी विद्यापीठ में रिसर्च । दोनों की पत्नियां । महेश्वर औरतों के अलग होने से क्षुब्ध हैं । पान, सिगरेट । अन्त में मेरे मुंह से निकलता है – आप लोग जरा स्वतंत्र होइए भाई ।

नन्दू के घर – रास्ते में चन्दन भाई और क्रिस्टोफ़र । गोरख दा, उनके बच्चे, मां, दीदी सब घर पर । वहां भी मीठा मिला । लौटते रास्ते में नन्दू मिले । भांग में मस्त । कई लोगों के साथ चाय पीने चले । साथ में धर भी हो गया है । वहां गाना और कविता । भांग की कुल्फ़ी ली जा चुकी है । धर कलकत्ता की खुशखबरी देता है । डायनामाइट । टूटना । निकलना । लौटे । पैदल ही जाना है । पैदल ही आना है । महेश्वर के कमरे में चाय बनी । फिर थककर सो गये । सुबह देर से उठे । लगा, शाम हो गयी है ।

आज शाम को लंका घूमे । दिन में कपड़ साफ़ किया । पत्र लिखा । स्वप्न देखा कि एक बस ड्राइवर खड्ड में गिरने से बस को रोकने के लिए उसे पीछे मोड़ने की कोशिश कर रहा है । अब थीसिस पर कुछ काम शुरू करना है ।

18—3—1976

प्रधानमंत्री का कहना है-

विरोधियों की गैर जिम्मेदाराना

हरकतें देखते हुए-

उन्हें प्रधानमंत्री बने रहना है ।

उन्हें मालूम नहीं

उनके पिता जब प्रधानमंत्री थे

तब उन्होंने प्रधानमंत्री

होना चाहा था ।

होने के बाद भी

उन्हें मालूम है कि प्रधानमंत्री

होना उन्होंने चाहा न था ।

उनका लड़का भी नहीं चाहता

प्रधानमंत्री होना

लेकिन नहीं चाहने के बावजूद

हो जायेगा

तब बतायेगा- उसे बने रहना है ।

एक बिल्कुल बेहूदा जीवन । पंगु, अकर्मण्य समाज विरोधी जीवन । क्या जगह बदल देने से कुछ काम कर सकूंगा ? मैं बनारस तत्काल छोड़ देना चाहता हूं । तत्काल । मैं यहां से बुरी तरह ऊब गया हूं । कुछ भी कर न पा रहा । मुझे कोई छोटी मोटी सर्विस पकड़नी चाहिए । और नियमित लेखन करना चाहिए । यह पंगु, बेहूदा, अकर्मण्य जीवन मौत से बदतर है । मुझे अपनी जिम्मेदारी महसूस करनी चाहिए । मैं भयानक और घिनौने सपने देखता हूं । लगता है, पतन और निष्क्रियता की सीमा पर पहुंच गया हूं । विभाग, लंका,छात्रावास लड़कियों पर बेहूदा बातें । राजनीतिक मसखरी । हमारा हाल बिगड़े छोकरों सा हो गया है । लेकिन क्या फिर हमें खासकर मुझे जीवन के प्रति पूरी लगन से सक्रिय नहीं होना चाहिए ? जरूर कभी भी शुरू किया जा सकता है । दिल्ली में अगर मित्रों ने सहारा दिया तो हमें चल देना चाहिए । मैं यहां से हटना चाहता हूं । बनारस से कहीं और भाग जाना चाहता हूं । मैं जड़ हो गया हूं, बेहूदा हो गया हूं । बकवास करता हूं । कविताएं भी ठीक से नहीं लिखता । किसी काम में ईमानदारी से लगता नहीं । यह कैसी बकवास जिंदगी है ? बताओ, क्या यही है वह जिंदगी जिसके लिए बचपन से ही तुम भागमभाग करते रहे हो ? तुमने समाज के लिए अभी तक क्या किया है ? जीने की कौन सी युक्ति तुम्हारे पास है ? बेशक, तुम्हे न पद और प्रतिष्ठा की तरफ़ कोई आकर्षण रहा है न अभी है । मगर यह इसीलिए तो कि ये इस व्यवस्था में शोषण की सीढ़ियां हैं ? तो इन्हें ढहाने की कोई कोशिश की है ? कुछ नहीं कुछ नहीं । बकवास खाली बकवास । खुद को पुनर्निर्मित करो । नये सिरे से लड़ने के लिए तैयार हो जाओ ।

मैं दोस्तों से अलग होता हूं

एक टूटी हुई पत्ती की तरह

खाई में गिरता हूं

मैं उनसे जुड़ा हूं

अब हजारो पत्तियों के बीच

एक हरी पत्ती की तरह

मुस्कुरा उठता हूं ।

मेरे दोस्तो के हाथ में

हथकड़ियां

निशान मेरी कलाई पर

उभरते हैं

हथकड़ियां टूटती हैं

जासूस मेरी निगाहों में

झांकने से डरते हैं ।

22—3—1976

फिर अद्भुत दुर्घटना हो रही है । सु आया 4-5 दिन पहले । बीस तारीख की शाम को गी भी लंका पर दिखी । बाल बांध रखे थे । बहुत सीधी-सादी लड़की लग रही थी । बगल से उसका चेहरा दिखाई पड़ा । दुखी-सी लगी । महेश्वर आदि ने दूर आगे जाकर उसे करीब से देखा । मैंने किसी से कहा- ‘चलो । उन्हें छोड़ आयें । वह हमारे घर आयी हैं ।’ वह एक दुकान पर कुछ खरीदने के लिए रुकी । मैं वहां रुककर दुकान से उसके उतरने का इन्तजार करता रहा । घबराहट और उत्तेजना में तेजी से इधर उधर टहलता रहा । वह उतरी । एक बार उसने मेरी तरफ़ देखा । फिर मैं और सारे दोस्त लौट पड़े । के पी, प्रधान, महेश्वर,टुन्ना, अमित सबने उसे देखा । महेश्वर ने कहा- गुरू, मैं तुमसे ईर्ष्या करता हूं । मेरे अंदर किसी भी लड़की के बारे में यह सोचने की इच्छा क्यों नहीं उभरती कि वह हमारे घर आयी है । चलो, उसे छोड़ आयें । मेरे अंदर प्रेम की यह भावना क्यों नहीं उभरती ? वह बहुत भावुक हो गया है । कल, यानी इक्कीस को दिन में हम सभी अस्सी तक गये थे । कोई नहीं दीखा । आज शाम को सु एक महिला के साथ हम सबके करीब से गुजरा । वह गम्भीर लग रहा था । बाद में हम उसके घर की तरफ़ से अस्सी तक गये । फिर दूसरी तरफ़ से लौट आये । शेखर से उसकी बातें नहीं हुईं । यह अच्छी बात नहीं है । वैसे मैंने मिलने को उससे लिख दिया है । मैं अपनी तरफ़ से कोई शिकायत नहीं रहने देना चाहता ।

24—3—1976

कितना गहरा डिप्रेशन है । लगता है मेरा मस्तिष्क किन्हीं सख्त पंजों द्वारा दबाकर छोटा और लहूलुहान कर दिया गया है । जड़ हो गया हूं । कुछ भी पढ़ने-लिखने, सुनने समझने की इच्छा ही नहीं होती । ठहाके बन्द हो गये हैं । सुबह इन्तजार करता रहा । कोई नहीं आया ।

फ़ैज की कविता ‘तनहाई’ –

फिर कोई आया दिलेजार ! नहीं, कोई नहीं

राहरौ होगा, कहीं और चला जायेगा ।

ढल चुकी रात बिखरने लगा तारों का गुबार

लड़खड़ाने लगे एवानों में ख्वाबीदा चिराग

सो गई रास्ता तक तक के हर इक राहगुजर

अजनबी खाक ने धुंधला दिए कदमों के सुराग

गुल करो शमएं, बढ़ा दो मयो-मीना-ओ-अयाम

अपने बेख्वाब किवाड़ो को मुकफ़्फ़ल कर लो

अब यहां कोई नहीं, कोई नहीं आयेगा ।

मुझे शक हो रहा है कि मेरे देखने, सुनने, समझने की शक्ति गायब तो नहीं होती जा रही है । अगर मेरे पत्र के बाद उन्हें देखा, तो निश्चय ही वे सम्बन्धों को फिर कायम करना चाहते हैं । अगर नहीं, तो हो सकता है कि मैंने भ्रमवश किसी और को देखकर उन्हें समझ लिया हो । यह खत्म होने की, धीरे धीरे बेलौस बेपनाह होते जाने की, धड़कनें बन्द कर देने वाले इन्तजार की सीमा कहां खत्म होती है ? क्या जिन्दगी प्रेम का लम्बा इन्तजार है ? अगर मैं रहस्यवादी होता तो आसानी से यह कह सकता था । लेकिन मैं देखता हूं, देख रहा हूं,कि बहुत से लोग प्रेम की परिस्थितियों में रह रहे हैं । अतः मुझे अपने व्यक्तिगत अभाव को सार्वभौम सत्य समझने का हक नहीं है । यह एक छोटे भ्रम से बड़े भ्रम की ओर बढ़ना माना जायेगा । मुझे प्रेम करने का हक नहीं है, मगर इन्तजार का हक है । स्वस्थ हो जाऊंगा, कल शायद खुलकर ठहाके लगा पाऊंगा ।

25—3—1976

तुम्ही कहो कि तेरा इन्तजार क्यों कर हो

दर्द, तनहाई, खमोशी ही बहुत ज्यादा है

तुम्ही कहो कि मुझे तुमसे प्यार क्यों कर हो

मैं तुम्हे एक बहुत ही उत्पीड़ित और उग्र आत्मा मानता हूं । मैं तुम्हे सचमुच चाहता हूं । मैं तुम्हे सुखी देखना चाहता हूं । लेकिन मेरी प्रिय, क्या अच्छा न होगा कि हम एक दूसरे को बिल्कुल भूल जाएं । तुम जिद पकड़ लेती हो तो फिर मान ही नहीं सकती । मैं तुम्हारा सम्मान करता हूं । तुम्हारी सुविधा के लिए भरसक प्रयास करता हूं । लेकिन तुम क्या करती हो ? तुम्हारे लिए कितनी दूर दूर तक अपने आपको झुका लेता हूं । बखुशी । लेकिन तुम हो कि झुकने का नाम नहीं लेतीं । तुम सु को क्यों नहीं मेरे पास भेजती हो ?मैं क्या करूं कि तुम्हे सुखी और तनावमुक्त बना सकूं ?

25—3—1976

घबरा गया, दो बजे वहां उसके कालेज जाना है । दूबे से कहा, उसने मोटर साइकिल किसी की ली । जाने को तैयार हो गया । तब तक मिश्रा आया । साइकिल से । मैं, मिश्रा, यादव,दूबे ttc चले । TTC पुस्तकालय में वही उसकी चिरपरिचिता दर्शन में सहपाठिनी बैठी है । उसने मुझे देखकर मुंह फेर लिया । क्लासों में उसे ढूंढ़ा । एक जगह लगा, वह है । फिर इन्तजार करने लगा । मिश्रा ने बताया, वह पुस्तकालय के सामने खड़ी है । गया, नहीं दिखी । मिश्रा पीछे लान की ओर गया । वह वहां दो तीन लड़कियों के साथ बैठी है । तो छुप रही है । मुझे लगा, मुझसे छुप रही है । तुरन्त चल देने को कहता हूं मिश्रा से । फिर रुक जाता हूं । 4 की घंटी बजती है । लड़कियां मोटर पर बैठने के लिए आती हैं । वह भी । वह आंख बन्द किए, गहरी मुस्कान के साथ धीरे धीरे चलती हुई बस में चली जाती है । मिश्रा के साथ चल देता हूं । खुश हूं । उसे देखकर । वह कालेज में लड़कों के साथ घुलमिल गयी है । किसी लड़के के साथ एक खाली कमरे में बैठने की वजह से वह कमरा लाक कर दिया गया है । वह एन्जाय कर रही है । अच्छी बात है । मुझे लग रहा है कि मैं उसके पीछे गलत पड़ा हूं । उन दिनों वह मुझे चाहती थी । अब वह नहीं, मैं उसे चाहता हूं । फ़र्क है, बहुत बड़ा फ़र्क । नहीं । खैर सुधीर मिलता है तो उससे बात करूंगा । उसके बाद खत्म । वैसे इसे खत्म ही समझा जाना चाहिए । वह मेरे साथ हो भी गयी तो टूटते स्वास्थ्य, अभावग्रस्त गृहस्थी के माहौल में उस अत्यन्त सजीव लड़की को, जिसे भरपूर जीने का हक है, मैं परीशान ही करूंगा । नहीं, मुझे उसके प्रति एक लिजलिजा मोह घिर आया है । जबकि वह उच्छल, उन्मुक्त, सहज, स्वस्थ, सुखी नजर आ रही है । उसे किसी भी प्रकार का कष्ट नहीं । उसे मुझे प्यार करने की वजह से कष्ट नहीं । अगर प्यार नहीं तब भी मेरी तरफ़ से कष्ट नहीं । नहीं, नहीं, नहीं ।

मुझे मेरे प्यार ने खुद-ब-खुद सौंप दिया

हत्यारों के हाथ में

एक लम्बे अर्से तक उसका इन्तजार किया

चुपचाप समूचे अस्तित्व से मैंने

इन्तजार किया

वह झटके में दिखाई पड़ी

आवाज दी, उसने मेरी आवाज दोहरायी

ठहरो आ रही हूं

फिर अंधेरे में गायब हो गयी

मैंने खुद को एक नदी की तरह

उसकी ओर बहते हुए पाया

उसने मुझे मुस्करा कर देखा

मैंने उत्तेजित कण्ठ से मुक्ति का गीत गाया

बार बार मुझे लगा- इतना प्यार सह

नहीं सकूंगा या तो उसके पैरों पर

गिरकर रो पड़ूंगा या दुश्मन

हमला करेगा मैं उसकी मार से

जीवित रह नहीं सकूंगा ।

चुपचाप, समूचे अस्तित्व से उसका

इन्तजार किया

वह मुझे फूलों में मिली

जब धूप पंखुड़ियों को जला देती है

वह खिड़कियों पर मिली जब उनके

बन्द होने का वक्त होता है

वह मिली ट्रेन की थरथराती सीटियों में

जब प्लेटफ़ार्म खाली हो चुकते हैं

एक दिन अस्पताल में बिना दवा के

कराहती दम तोड़ रही थी कि मिली

उसने मेरी ओर देखा- देर हो चुकी है

मैंने अपराधी की तरह सिर झुका लिया ।

मिली वह मुझे मगर तब जब कि

शेर उसके मासूम शरीर पर अपने

खूनी पंजे जमा चुका था-

मैंने सोचा-

शेरों के राज्य में प्यार की हिफ़ाजत

के लिए हथियार और साहस बेहद जरूरी हैं

और सभी नरभक्षियों का बेमुरौव्वत

सफ़ाया कर दिया जाना चाहिए ।

एक दिन इशारे से बुलाकर उसने कहा-

देखो, मैं इस मकान में कैद हूं

किसी तरह बाहर निकालो

ओह, तुम उस राजकुमार के इन्तजार में हो

जो घोड़े पर सवार तलवार चमकाते हुए आयेगा

और जंजीरें काटकर तुम्हे उड़ा ले जायेगा ?

ऐसा, नहीं प्रिय, राजकुमार एक धोखा है

एक स्वप्न जो कभी पूरा नहीं होगा

आओ मिलजुलकर आदमी की तरह

बेड़ियां काटें ।

उसने कहा- मेरे हाथ कोमल हैं

और ये तो फूल हैं जिन्हे तुम जंजीरें

कहते रहते हो, सो, मुझे मेरे हाल पर

छोड़ दो, मुझे बाहर धकेलते हुए

उसने दरवाजा धड़ाम से बन्द किया ।

लेकिन वह मेरी निगाहों में थी नसों में

खून की तरह बहती और धड़कती हुई

रात का स्वप्न और दिन की कल्पना थी

वह मेरे लिए मेरे अस्तित्व से ज्यादा जरूरी थी

एक दिन वह फिर मिली अज्ञान, भूख और

थकान से टूटी हुई- मेरी जेब खाली थी

मजबूरी से उसे देखा, क्षमा मांगी, मानो

गलती हो गयी हो

उसने कहा- तुम धोखा दे रहे हो किस

बूते पर मुझसे उम्मीद की ?

मैंने कहा- झूठ और लूट के दौर में

हमारे पास सिर्फ़ दो ही रास्ते हैं-

चोरी या बगावत

उसने मुझे नफ़रत से देखा- पाखण्ड है

तुम्हारी हरेक बात, हर शब्द एक छल है

उसने मेरे मुंह पर थूक दिया और वहीं

सूखे गोश्त की गठरी सी ढेर हो गयी

मैंने उसे फिर से आवाज दी- उठो, मेरी

प्राण, मुक्ति की लड़ाई देश देश में शुरू

हो चुकी है आओ हम भी शामिल हों

जीवन को बेहतर बनाने के लिए अगर

लड़ते हुए मारे भी गये हम

सम्मानित ही होंगे

इस बार आवाज लगाते लगाते मेरे

फेफड़ों में दर्द शुरू हो गया था

सोचा था- इस बार प्यार मुझे जरूर

मिलेगा

लेकिन मिले हत्यारे

उन्होने कहा- तुमको वैधानिक तरीकों

से फांसी दी जायेगी

काफ़ी पियो, घबराओ नहीं

मैंने कहा- अगर मैं अपराधी हूं

मुझे सिर्फ़ प्यार के सामने ही सफाई देनी है

अगर मैंने कभी विश्वास तोड़ा है

मुझे गोली मार दो

अगर मैंने कभी नफ़रत के सामने घुटने टेके हैं

मुझे गोली मार दो

अगर सचमुच प्रेम जुर्म है तब मेरे साथ

उसे भी गोली मार दो जिसने प्यार को

सम्भव कहा था

उसने मेरे सिवा और कोई दूसरी शर्त नहीं

रखी थी

मगर हत्यारे क्या सुनते हो हो कर हँस

पड़े- हमें उसी ने भेजा है

उन्होंने कहा- तुम्हारे ऊपर नाजायज

तरीके से माल हड़पने का आरोप है

जबकि कानून में व्यक्तिगत सम्पत्ति

को पवित्र माना गया है ।

आखिरकार, मुझे मेरे प्यार ने खुद-ब-खुद

सौंप दिया हत्यारों के हाथ में ।

27—3—1976

26 को विभाग में कविता पढ़ी । लड़के हल्के फुल्के ढंग की चीज सुनना चाहते थे । वह बिल्कुल गम्भीर नहीं होना चाहते थे । बोर हो गये । लेकिन मैंने जबरन सुनाया । एक लड़की, जो काफ़ी दिनों से मुझे अपनी ओर प्रेरित करना चाहती है, पढ़कर चलते वक्त, कह पड़ी,’बहुत बोर किया’ । मैं हक्का बक्का था । सचमुच मुझ पर उसने बड़ी चोट की । इसका प्रभाव यह हुआ कि कुछ देर तक मैं उसकी ओर बगैर देखे पड़े रहने के बाद, कुछ गुस्से में और कुछ खुशी में देखने लगा । वह बाल वगैरह झटकने लगी, उत्तेजित और खुश । फिर मैंने withdraw कर लिया । वह खुश रही, फिर दुखी हो गयी । वह जरा छरहरी नहीं है । वर्ना ठीक है । लड़कियां बहुत अच्छी होती हैं । गी बहुत अच्छी है । रात में यादव ने बताया कि वह काफ़ी गम्भीर थी आज । मुझे सुनकर फिर उसके प्रति मोह जगा । यह ठीक नहीं । उसे खुश रहने का हक है । वैसे पता है कि नकली जिन्दगी जीने के लिए वह खुद को तैयार कर चुकी है । नकली जिन्दगी, झूठ, खुशी ये सब हमारी औरत की शोभा हैं । हमें चाहिए कि उनके बदलाव का उपाय करें लेकिन इसकी तकलीफ क्या वे झेल पायेंगी ? यह बिना व्यवस्था के बदले नहीं हो सकता ।

खुश रहो जहां भी रहो तुम जाने जिगर

कभी कभी हमें भी याद कर लिया करना

28—3—1976

आज खूब सोया । कुछ नहीं किया । अब लिखने बैठ रहा हूं ।

29—3—1976

को अंधेरा, रास्ते में बारिश ।

30—3–1976

को बारिश, फिर रोशनी ।

31—3—1976

दवा की तलाश में गोदौलिया ।

दवा नहीं मिली । संयोग से सु मिला । hello. वह मुस्कुराया । फिर चौराहे तक साथ साथ आये । चाय पीने की बात उसने अस्वीकार की । मैंने कहा- कभी मिलिए । उसने सिर थोड़ा झुकाकर सोच की मुद्रा अपनायी । फिर स्वीकार के लहजे में सिर हिलाया । मैंने गर्मजोशी से हाथ मिलाया । शाम को जैसे उसका इन्तजार करता रहा । वह निश्चित रूप से उसके द्वारा भेजा गया था लंका पर । फिर जब बुला रहा हूं तो क्यों नहीं आता ?

शायद उसने stand बदल दिया है !

मैं इन्तजार में जड़ हो जाता हूं । लिख पढ़ नहीं पाता । थीसिस का काम पड़ा है नहीं कर पाता । मैं यह सब क्या कर रहा हूं ? यह मूर्खता, यह मेरी प्रचण्ड और घातक मूर्खता । मुझे क्या करना चाहिए ? कुछ समझ नहीं पाता । अगर वह नकार रही है तो वह आयी ही क्यों उस दिन ? क्या यह देखने कि अभी तक मैं उसके पीछे जा सकता हूं या नहीं । अपनी ताकत आजमाने ? अगर यह बात है तो उसे खुश होना चाहिए क्योंकि मैं गया उसके पीछे । मैंने उसे follow किया । लेकिन अगर वह सचमुच contact बनाना चाहती है तो उसे क्यों नहीं भेजती । शायद उसने आने से इन्कार कर दिया हो । नहीं, वह आने से इन्कार नहीं करेगा । वही नहीं भेजती । तब इसके दो कारण हो सकते हैं । पहला, वह चाहती है कि मैं college जाकर उससे बातें करूं । दूसरा, यह कि वह इस किस्से का अन्त चाहती है । अगर अन्त चाहती है । तो कोई बात नहीं (टुन्ना से साभार) अगर नहीं चाहती तो मुझे जाना चाहिए या नहीं । मुझे जाना चाहिए । लेकिन मैं डर जाता हूं कि वहां जाकर अगर परिस्थितियां नार्मल नहीं मिलीं तो मैं बात न कर सकूंगा । इसीलिए तो मुझे सु की जरूरत महसूस होती रही है । अगर सु मुझे हेल्प नहीं करता तो क्या वह मेरी c में प्रतीक्षा करती रहे, मैं कभी जा न सकूं और सब कुछ खत्म हो जाए, सब कुछ खत्म हो जाए । अच्छा, यह सब कुछ खत्म हो जाए । मैंने अपनी तरफ़ से सारी बातें स्पष्ट कर दी हैं । उसे तमाम मौका है, सोचने समझने का । मैं इन्तजार करूंगा । खत्म हो जाने तक । अच्छा है ।

1—4—1976

हवाई प्यार की दुनिया में सब कुछ अनोखा है । आप जिसे चाहते हैं, उससे बात नहीं कर सकते । उसके लिए मर मिटना चाहते हैं, मगर उससे एक शब्द तक आप बोल नहीं सकते ।

उसकी इच्छा है कि college में मैं उससे मिलूं और बात करूं । यह नहीं हो सकता । मैं कायर, हृदयहीन , भग्नाकुल, जड़, स्तब्ध हो गया हूं । उसने मुझे कई बार माफ़ किया है । मैं उसके सामने छोटा, बहुत छोटा लग रहा हूं । वह साहस में, उदारता में,समझ में हर चीज में मुझसे आगे निकल गयी है । सु से आशा लगाना हम सबके लिए गलत है । यह कैसा प्यार कि एक तीसरा आदमी, भले ही वह बहुत करीबी हो, मदद करे, तब चले वर्ना ठप हो जाय । नहीं, हममें प्यार व्यार कुछ नहीं, एक हवाई आकर्षण है जो सिर्फ़ लहूलुहान करके जमीन पर औंधे मुंह गिरा देता है । तब लगता है कि जमीन सचमुच कितनी खुरदुरी और सख्त है । मैं उससे क्षमा मागूंगा, कभी सीधे बोल न पाने के लिए क्षमा । वह शायद क्षमा कर भी दे, मगर मैं खुद को कतई क्षमा नहीं कर सकता । मैं उसके साथ खिलवाड़ करता रहा हूं । नहीं, यह गलत है । मैं उसे चाहता रहा हूं । मगर शायद अब हम इतने दूर चले आये हैं कि पीछे लौटने के रास्ते बन्द हो चले हैं । April’s fool No. 1 I am.

2—4—1976ऽ

आज फिर तनाव । नसों का दबते चले जाना, उसी पर केन्द्रित हो जाना, सोचना कि मैं गलत हूं, कमजोर, कायर, बुद्धू, डरपोक हूं । फिर पत्र लिखा । तनाव कुछ कम हुआ । लू शुन की कहानी ‘साबुन’ पढ़ता हूं ।

3—4—1976

दूसरी बार अस्सी पर मेरे दुश्मनों द्वारा हमले की पूरी योजना । लेकिन मेरे दुश्मन काफ़ी कमजोर हैं । दिमागी तौर पर वे काफ़ी कमजोर हैं । वे मजे से असफल कर दिये जाते हैं । मैं, महेश्वर, प्रधान, टुन्ना, शेखर दुकान में चाय पीते हैं । सु बाहर बुलाता है । मैं उसे अन्दर बुलाता हूं । फिर आता है । वह निहायत झूठी बातें सुनाता है । बेसिर पैर की बातें । मैं दृढ़तापूर्वक उसके झूठ को चुनौती देता हूं । वह निःशब्द हो जाता है । वे सबके सब झूठे, घृणित, लण्ठ और षड़यन्त्रकारी हैं । वह लड़की षड़यन्त्रकारी है । चाहे किसी ने भी उसके साथ जो कुछ भी कार्रवाई की हो, मैंने न तो उसे कभी अपमानित करने की चेष्टा की,न ही कुछ कहा, लेकिन उसने बार बार मेरी नीयत पर घृणित शक के साथ अपमानजनक रुख अख्तियार किया । वह सही मायनों में एक झूठी, गद्दार, हरामी, जलील औरत हो गयी है । षड़यन्त्रकारियों के साथ मिल गयी है । यह उसका अन्तिम और सही मूल्यांकन है । इसके सिवा उसे और मूल्य देना अपने आपको अपमानित करना है । मैं उसके समूचे व्यक्तित्व से अपनी ईमानदारी, सहजता और (मूर्खता की हद तक बढ़ी हुई) भावुकता में निश्चय ही आगे बढ़ गया हूं ।

8—4—1976

सोया, बार बार नींद टूटी । गलत सपने देखे । अवसन्न हो गया हूं । वह औरत मुझे भीतर से तोड़ती चली जा रही है । स्वास्थ्य लगातार खराब हो रहा है । थीसिस का काम जरा भी नहीं खिसका । मैं अवसन्न हो रहा हूं ।

10—4—1976

आतंक—-प्यार—-आतंक—-अन्त । जीवन फिर शुरू हो जाता है । चीजें खत्म होती हैं फिर शुरू हो जाती हैं ।

11—4—1976

मेरा पूरा पतन हो गया है । यह मेरी आर्थिक परिस्थिति से अभिन्न रूप से जुड़ा है । मुझे पहले खाना जुटाने का काम करना चाहिए । यह सीख है । सारे अनुभव बताते हैं कि आदमी को दो जून पेट भरने का इन्तजाम करना चाहिए और बातें बाद में आती हैं । लेकिन मैं हवा में प्यार की सोचता रहा हूं । मैं हवा में तिरता सा रहा हूं । बिना देश और दुनिया की परिस्थितियों का विचार किए प्यार के बारे में बेहूदा कल्पनाएं करता रहा हूं । नतीजा कि मैं ही सब कुछ हूं । समाज के बिना एक व्यक्ति कुछ नहीं है । वह बोल नहीं सकता, वह मुस्कुरा नहीं सकता, वह सूंघ नहीं सकता, वह आदमी नहीं बन सकता । मुझे इसके लिए दण्डित किया जाना चाहिए कि एक घृणापूर्ण दम्भ के अलावा मेरे पास कुछ देने को नहीं रह गया है ।

सामाजिक चेतना सामाजिक संघर्षों में से उपजती है । व्यक्तिगत समस्याओं से घिरे रहने पर सामाजिक चेतना या सामाजिक महत्व की कोई चीज उत्पादित करना मुमकिन नहीं । व्यक्तिगत समस्याएं जहां तक सामाजिक हैं, सामाजिक समस्याओं के साथ ही हल हो सकती हैं । अतः व्यक्तिगत रूप से उन्हें हल करने के भ्रम का पर्दाफाश किया जाना चाहिए ताकि व्यक्ति अपनी भूमिका स्पष्ट रूप से समझ सके और समाज का निर्णायक अंग बन सके ।

13—4—1976

कल रामजी भाई आये । विनोद जी का आपरेशन । महेश्वर से बातचीत फिर शुरू हुई । गिरीश आया (यों कहें कि टपका) पाण्डेय भी ।

आज फिर अजीब सी उदासी, जड़ता । चाय, सिगरेट, काम कुछ नहीं । थीसिस लिखो । इस बेहूदगी को करो ताकि बेहूदा लोग यह न समझें कि तुम बेहूदगी भी नहीं कर सकते थे ।

भारी मात्रा में साहित्यिक उत्पादन की जरूरत है । और कुछ न हो पा रहा है ।

षड़यन्त्रकारी मेरे पीछे पड़े हैं । मेरे खिलाफ़ बड़ी आसानी से षड़यन्त्र सफल हो सकते हैं । कारण कि मैंने अपनी कोई दीवार नहीं बनायी जहां से छुप कर बचाव और हमला कर सकूं । सचाइयों के सिवा मेरे पास कोई ताकत नहीं । तो क्या सिर्फ़ सच से अपनी हिफ़ाजत की जा सकती है ? हां, की जा सकती है अगर उसे समझ के साथ कारगर ढंग से उपयोग में लाया जाय । सच और मूर्खता में सम्बन्ध नहीं हो सकता । मूर्खतापूर्ण सच सामाजिक रूप से हानिकारक व्यंग्य हो जाता है । सच, साहस और समझ तीनों मिलकर ही एक दूसरे को मजबूत करते हैं और स्वयं पुरअसर होते हैं । सत्य नपुंसक होने पर झूठ से भी गन्दा लगता है । सत्य को बल दो, साहस करो ताकि झूठ को घुटने टेक देना पड़े । अगर सच के लिए लड़ना है तो तलवार की धार पर चलना सीखना पड़ेगा ।

डोल रहे हैं चांद सितारे

धरती डोल रही है

शासन डांवाडोल न होगा

रानी बोल रही है

बटीं रस्सियां जाल बुनाए

सागर पर फैलाए

लहरें और मछलियां सारी

होशियार हो जाएं

तूफ़ानों को रोक न पायी तो

विष घोल रही है

13—4—1976

आज शाम को Ass और dog लंका पर से गुजरते दिखे । Ass and dog. I felt almost heated with anger and shame. I feel myself one of the most wretched beings. But for what? For love. A hateful word, a word which signifies my degradation, insult, humiliation before a wretched woman of beautiful appearance. The woman who made me follow her second time and exposed me to the ghasty sounds and bloody theeth of hounds was point of my life. I felt as if I will not be able to continue if I do not get her company. I wanted to approach her very respectfully and she treated me as an insect so that the real insects of fraud forgery were transformed into respected men. The second time I got strangled in the conspiracy of that charming lady who played my love to kill me with the help of ass and dog. That lady of dogs and asses is so sweet that she can easily sell her on highest costs in the sweet and socially established markets of living skin.

I, a man of extraordinary foolishness and weekness for eye charm, have placed myself under such a humiliating position that I can not forgive myself on this time. I am unforgivable before me and before the exploited people of my country. I tried to break the barriers of claas on the basis of love. It only means that I tried to neglect the real questions being in the heart of the society.

I made a conspiratorial type of girl my judge. I gave her all powers to make last judgement upon me. And she judged. She judged me by the standards of her charming skin which she knew can not be undermined in the market. I took her as a human personality. And she was conspiracy of living skin in the market-place where all dogs and asses follow her with watery mouth and sparkling eyes. She saw that I neglected her most important aspect, her charming skin and on which she ever prided. And she threw me in the area of hounds and asses to be eaten. They have started eating. They came and see me and felt enjoyed that I have been so captivated by their supreme lady. The lady with sweet smiles and glazy eyes, the lady with murderous skills and conspiratorial plans, the lady whom I loved with whole existence, the lady who made the dogs capable of eating me. That grand lady of dogs and asses became my judge. A pure beast, a beast without any respect and attraction for human qualities like sincerity, simplicity etc. , a beast of lust and robust flesh, a beast eager of eating human flesh. That grand lady out of a beast or that pure beast out of a lady was made my judge with the help of my utter foolishness, and urge for a friendly company of a woman. I am defeated in a war with the hateful beasts like dogs and asses because I ‘loved’ (how ironical the word sounds in my ears!) a wretched beast of a woman playing love with me and conspiring to kill me. I am by chance saved, but I find no wayout of humiliation, torture and shame in which I have placed myself with the help of this conspiracy called love.

I loved a woman and I conspired against myself because I loved a conspirator woman. She is now instructing her dogs and asses who can fill my ears with the sounds of shame and degradation and who can bite me whenever they get chance.

14—4—1976

Last night slept a lot. Now feeling better. Miss Sinha has recovered her health. She was seen standing on the balcony by someone. It is good. I feel better because now there is no reason for feeling. Some persons feel always bad. They acquire a habit of such felings. Therefore, do not adjust themselves to different conditions. I am regaining my strength because I have released the violence perpetrated on me through different channels. And I must be ready to face it even it comes from any side. It does not matter. Enemy is enemy, whatsoever he (or she) may be. I must not care. I must be ready to retaliate properly. If I live under such conditions of life, I will be compelled to face violence. So, it does not matter where does it come from. The main thing is violence exercised on me from hateful beasts. I know, I can not be challenged in my sincerity. I mean that violence also must be opposed with sincerity.

Begin my pen,

Begin with the words of fire and pain

Begin my pen

Begin with loud laughter

The musical attack on the pickpocket’s soverign

Begin my pen,

Begin with the pulses beating

And thoughts bursting out of brain

Begin my pen,

With the arms raised and eyes open

Begin my pen

Begin to change the world

And to create fighters

Out of crushed women

And men

Begin my pen.

21—6—1976

महीनों बाद डायरी के पन्ने पलटे हैं । दिल्ली की ओर । अपर इण्डिया ट्रेन में । शे*, रा*शे*, मिश्रा, नन्दू, रमेश आदि कई मित्रों के बीच स्टेशन पर बहुत मैत्रीपूर्ण माहौल । मैं महीनों बाद हल्का महसूस कर रहा हूं । मानो एक जड़ हो गयी परिस्थिति से मुक्त हो गया हूं । दिल्ली पहुंचकर काम की तलाश में जुट जाना है, नये सिरे से पूरी ताकत के साथ जीने और संघर्ष करने की कोशिश करनी है । वह अपनी तमाम बेहूदा हरकतों के साथ ट्रेन में याद आ रही है । साफ़ साफ़ पता चल गया है कि मेरे लगातार अवसन्न रहने का कारण क्या था ? इस अद्भुत कमजोरी पर विजय हासिल करना मेरे लिए निहायत जरूरी है । वर्ना मैं इसी तरह फिर टूट जाऊंगा ।

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सुबह अपर इण्डिया में । 22—-6—76

रात में ठण्ढ और स्मृतियों की बाढ़ । जैसे चेतना गाढ़े दर्द की तरह बह रही हो । सुबह दर्द । उदासी । अपरिचित चेहरों के बीच । अलीगढ़ में चाय पी । 2*30 पैसे । दिल्ली में रोटियां सस्ती हो रही हैं और तुम लोग महंगा करते जा रहे हो ? चांदी वाले सेठ लेटे हैं । बगल के सेठ बच्चे जासूसी उपन्यास पढ़ते हैं । रात में जो औरत अपने पति के स्टेशन पर छूट जाने के डर से रो रही थी, पति और बच्चे के साथ खुश है । वह बिल्कुल निश्चिन्त और सुरक्षित है ।

24—6—-1976

दिल्ली । गालिबो मीर की दिल्ली, ताज ओ तख्त की दिल्ली, हिन्दुस्तान की राजधानी दिल्ली । परसों से यहां हूं । कोई काम नहीं । विभास के मैत्रीपूर्ण व्यवहार से आश्वस्त हूं । बीच बीच में बनारस की दुर्घटनाएं याद आती हैं ।

_________

यह लम्बी यात्रा है-

जंगलों, पहाड़ों, खाइयों और

सुरंगों से होकर

तुम आगे बढ़ते जाना

पीछे मत देखना

जहां तक जा चुके हो- उसके

पीछे थकने के बाद

खूबसूरत फूलों की घाटियां

दिखाई पड़ेंगी और तुम

पत्थर हो जाओगे ।

मां ने नन्हे बेटे को

हिदायत दी सिर पर प्यार से

हाथ रखते हुए ।

बन्द करो कहानियां

ओह ! मैंने कभी कल्पना भी

न की थी ।

रोशनी आंखों में चुभ रही है

बत्तियां बुझा दो ।

हालत यहां तक पहुंच चुकी है

तुम रोशनी से डरने लगे हो

दूब की हरी पत्ती तुम्हे भद्दा मजाक

लगती है

कहां तो हम एक साथ हो रहे थे

हमने सिपाहियों की एक

टुकड़ी बना ली थी

उत्साह में ऊभ चूभ होते हुए

आवाज बुलन्द की थी-

अब आदमी का शोषण

आदमी नहीं करेगा ।

हालत यहां तक पहुंच चुकी है

कि तुम्हे कुछ शब्दों से चिढ़

हो रही है- जैसे शोषण,

गोया बार बार दोहराने से

इनका अर्थ खतम हो चुका हो

तुमने हथियार रख दिया है

सोचते हो कि तुम्हारा हारा हुआ

युद्ध अगली पीढ़ियां लड़ेंगी ।

हालत यहां तक पहुंच चुकी है-

भेड़ियों का हमला और तेज हो चुका है

गांव गांव से बच्चों को

रातो रात उठा लिया जाता है

खून के साथ वे दिल और दिमाग

भी चाट रहे हैं ।

जंगल- व्यवस्था के भीतर

आदमी की तरह बोलने

चलने और हाथ उठाने पर

पाबन्दी लगा दी गयी है

अब आगे से रेंग कर चलना होगा

लूट की जुबान

शहद घोलकर बोलनी होगी

इजाजत है तो सिर्फ़ यह कि

हाथों से अपने साथियों का

गला घोंट दो ।

वह नन्हा सा लड़का जंगलों

पहाड़ों, घाटियों, सुरंगों से

होकर आगे बढ़ता है ।

उसके हाथ में एक तलवार है

और निगाहों में बदले की आग ।

उसने ठोकरें खायीं

रोटियों के बजाय

उसने देखी है-

फ़रेब पर लिपटी हुई खूबसूरत

रंगों की चमक

वह तुम्हे भी आवाज देता है-

आओ,

एक एक कर साथियो,

मेरे पास आओ,

अभी हमें बहुत दूर जाना है

सफ़र लम्बा है

मगर आदमी के लिए

मुश्किल नहीं है

मेरे साथ आओ,

साथियो,

एक एक इन्च जमीन के लिए

हमें हजारों साल लड़ना पड़ा है

सम्मान की एक रोटी

हमारे लिए

मौत के बाद का स्वप्न बनी

रही है

हमारे सिरों पर

आकाश के सिवा

दूसरी छत तलवार की होती है

आओ, मेरे साथ आओ

साथियों,

मैं पीढ़ी दर पीढ़ी बढ़ती हुई

भूख और अपमान

का भविष्य हूं

तुमको कहानी बुरी लगती है

और तुम्हे उसका पात्र होना

स्वीकार नहीं ।

लेकिन तुम कहां खड़े हो ?

तुम्हारे पास इसका जवाब है ?

एक अर्से से मैं बोलता रहा हूं

खून और आग को

निचोड़ कर मैंने शब्दों में रख दिया

सोचता था-

मैं कहूंगा- ‘क्रान्ति’

और तूफ़ान आ जायेगा

महल ढहने लगेंगे

तमाम जन्जीरें चरमरा कर

टूट जायेंगी

और हम मुक्त होकर खुशी से

नाच उठेंगे ।

एक मात्र मन्जिल थी-

आजादी

सोते और जागते हुए

मेरे होठो पर थरथराता था

एक शब्द- अजादी

मगर क्या हुआ ?

धीरे धीरे हम टूटते चले गये

हमने एक दूसरे पर अविश्वास

करना सीख लिया

अब वे शब्द हमारी छातियों

पर पत्थरों की तरह

पड़े हुए हैं ।

क्या हुआ ?

कितने लोगों ने सोचने

की दिशा बदल दी

कइयों ने पीछे लौटना ही

वाजिब समझा

और एक हमसफ़र

ने कान में

फुसफुसा कर कहा था-

हम लोग गलत थे

फिर से सोचना ।

उस लड़के का क्या हुआ ?

वह अब भी बढ़ता है जंगलों

पहाड़ों, खाइयों से होकर,

एक हाथ में तलवार

और निगाहों में बदले की आग

उसको शुरू में यह भी पता न था

दुश्मन कौन है ? कहां है ?

उसकी जमीन, उसका सुख

उसकी मेहनत, उसका फल

कौन लूट रहा है

उसके स्वप्न कहां गिरवी रखे

गये हैं

कहां कैद हैं उसकी उम्मीदें ।

कल तक उसे यह भी पता न

था । उसने एक राक्षस का

नाम सुना था और बढ़ता

रहा था आगे और आगे

अब हालात बदल चुके हैं-

वह जानता है-

राक्षस का एक सही नाम

जमींदार है, दूसरा नाम है

दलाल पूंजीपति तीसरा

नाम साम्राज्यवादी

और वे समाजवाद या

जनतन्त्र की आड़ में

हमला कर रहे हैं ।

वह दुश्मन को पहचानता

है जो सफलता की ओर

पहला बड़ा कदम है ।

तुम शब्दों के जादू से

बंधे रहे

‘क्रान्ति’ एक लम्बी लड़ाई

जो तुम्हारे लिए

जादू थी

तुमने ठोकरें खायी नहीं

भरभरा कर गिर पड़े थे ।

तुम्हे जमीन सख्त लगने

लगी । दुश्मन की

परछाइयां तुम्हारे सपने

भी रौंदने लगीं

अब तुम सोचते हो-

आने वाली पीढ़ियां

लड़ेंगी-

आने वाली पीढ़ियां

जरूर लड़ेंगी

लेकिन मौजूदा लड़ाई को

टाला नहीं जा सकता ।

जंगलों में या अंधेरी

कोठरियों में, सीलन भरे

तहखानों में तुम्हारी पहले से

ज्यादा जरूरत है

एक भी पैर जख्मी होता

है तुम्हारी अंगुलियां

जरूरी हो जाती हैं

शब्द जादू नहीं हैं

मगर अभियान के

लिए सैनिक गीत

मांगते हैं

सोचने का साहस करो

साहस के साथ लड़ो

अभी तो लड़ाई शुरू हुई है

अगली पीढ़ियां लड़ेंगी

मगर उन्हे कौन माफ़ करेगा

जिन्होने दुश्मन के सामने

घुटने टेक दिये ?

वह नन्हा मुन्ना आगे

बढ़ता है हाथ में तलवार

और निगाहों में बदले की

आग

सुनो, वह तुम्हे भी

पुकार रहा है ।

________

भारी बूट, चमकते कपड़े,

सिर पर टोप लगाये

सरकस के हाथी पर बैठे

जब दो बौने आये

मची खलबली दर्शकगण में-

यह भी खूब तमाशा

हाथी नाच रहा है कत्थक

बौने बजा रहे हैं तासा-

ढिम ढिम ढिम ढिम

तड़ तड़ ढिम ढिम

सुनो भाइयो,

बहनो, सुन लो

अद्भुत है यह हाथी

हाथी ने आंखें मटकायीं

ये हैं मेरे साथी ।

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