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राजकमल चौधरी, और ज्याँ जेने की आतंरिक समीपता: सुरेंद्र चौधरी

सुरेंद्र चौधरी और राजकमल चौधरी गया कॉलेज, गया के दिनों से दोस्त थे. राजकमल की मृत्यु के तत्क्षण बाद मुक्ति-प्रसंग की समीक्षा लिखने के अतिरिक्त बहुत दिनों तक सुरेंद्र चौधरी ने उनपर लगभग नहीं लिखा. अपनी दुविधा को अपनी एक अप्रकाशित पुस्तक में वे कुछ ऐसे स्पष्ट करते हैं, ” मैंने राजकमल की कहानियों पर अब तक कुछ नहीं लिखा. मेरे मन में उस दोस्त लेखक के लिए एक संशय सदा बना रहा . क्या मैं इस आदमी के द्वारा उसके लेखन को जान सकता हूँ? क्या वह किसी भी अर्थ में पूर्ण होगा? उसके लेखन और समय से काफी दूर आकर मैं अपनी जिज्ञासा दुहरा भर सकता हूँ! मेरा ख्याल है कि वह अपने कथा-साहित्य के लिए याद किया जाय या न किया जाय  मगर मुक्ति-प्रसंग के लिए याद किया जाएगा.”

जहाँ तक मेरी जानकारी है, सुरेंद्र चौधरी ने राजकमल चौधरी की कृति-केन्द्रित एक ही लेख/समीक्षा लिखी है- मुक्ति-प्रसंग: एक और देह गाथा. इसके अतिरिक्त सुरेंद्र चौधरी के आलोचकीय-वृत्त में राजकमल चौधरी अक्सरहां नजर आते हैं. मुक्ति-प्रसंग की समीक्षा के अतिरिक्त अन्य प्रसंगों से दो उद्धरण यहाँ द्रष्टव्य हैं. #उदय शंकर

भावना से परिचालित होने वाले व्यक्ति का वेग तो समझा जा सकता है मगर उसकी को समझना बड़ा कठिन काम है, क्योंकि यह गति दिशा-निरपेक्ष होती है. समकालीन कवियों के एक अच्छे बड़े समूह की दिशाहीनता इसी वेग का परिणाम है. इस भावनात्मक वेग के काव्यात्मक उपकरणों को पहचानना बहुत मुश्किल काम नहीं है. आत्मोद्रेक की काव्य-शैली इसी भावनात्मक वेग से बनती है. उसकी नाटकीयता में आत्मसाक्षात्कार के घनीभूत क्षण बिरले ही होते हैं. राजकमल की आत्मोद्रेकपूर्ण काव्य-शैली के नकलची शायद ही उन घनीभूत क्षणों को पा सकेंगे जिसमें राजकमल का कवि अपने अनुभवों के सम्मुख अकेला था. फिर आत्मोद्रेक की यह काव्य-शैली वेग में जिस स्वाभाविक ढंग से अपने को तोड़ लेती है, आत्मक्षय करती है उसे दूसरे कहाँ से पाएँगे. वे बंदिशों को तोड़कर भी यह स्वाभाविक आत्म-विभाजन पैदा नहीं कर सकेंगे. राजकमल के लिए आत्मोद्रेक काव्य की शैली नहीं है, अनुभव का बंध (Mode of experience) है.

‘मुक्ति-प्रसंग’ में दो स्तरों पर काव्य-भाषा के अलग-अलग रूप मिलते हैं. उसका तंत्र अलग है. उनका व्यावहारिक रूप एक दूसरे से भिन्न है. यह द्विरूपता राजकमल की कविता में विशेष मानसिक तनाव के भीतर की अनिवार्यता अनिवार्यता है जो कि कविता में नहीं थी. ‘मुक्ति-प्रसंग’ में जहाँ एक ओर उपचार्हीं सीधी साहित्यिक संस्कार वाली बोलचाल की भाषा है, दूसरी ओर वही तंत्र के सिद्धपीठ की भाषा भी है, उसी क्षेत्र के रूपक हैं, काव्य-प्रकरण (allusions) हैं. मैं इस विशेष मनःस्थिति के भीतर के उपचारों की चर्चा एक विशेष कारण से कर रहा हूँ. इसी भीतरी-सन्दर्भ की कृच्छता चाहे जितनी संदेहजनक लगे, मगर आज की मानसिक परिस्थिति में यह असम्भाव्य नहीं है. आत्मीयता राजकमल की काव्य भाषा में, सीधी-सादी तेवर वाली भाषा भी है, मुहावरे समकालीन जीवन के पूरे विस्तार से चुने गए हैं.

 

mukti-prasang

मुक्ति-प्रसंग: एक और देह गाथा

By सुरेंद्र चौधरी

ज्याँ जेने पर सार्त्र ने अपनी पुस्तक के मार्फ़त लोगों को चौंकाया था, यों पुस्तक चौंकाने के लिए नहीं लिखी गयी थी जितनी एक विशिष्ट उद्देश्य से, अस्तित्वादी मनोविश्लेषण को उदाहृत-व्यवस्थित करने के लिए लिखी गयी थी. मुक्ति-प्रसंग में अज्ञेय का एक पत्रांश उद्धृत किया गया है और इसका कोई सम्बन्ध इस पुस्तक से नहीं है-कवि से उसके सम्बन्ध की बाबत मैं यहाँ नहीं कह रहा- इसलिए उसे हम चौंकाने, परिभाषित करने या बहलाने वाला वक्तव्य नहीं मान सकते. क्या अज्ञेय जी का यह कथन कि ‘मृत्यु का स्वीकार, मैं मानता हूँ, आत्मा की या यह न पसंद हो तो कहूँ कि चेतना की एक गहरी आवश्यकता है; और उस स्वीकार में एक तरह की स्वस्थता भी मिलती है,’ ‘मुक्ति-प्रसंग’ की रचना का वैचारिक आधार बन सका है? क्या राजकमल चौधरी की प्रस्तुत रचना के सन्दर्भ में उसकी कोई अनिवार्यता है? क्या हम ‘मुक्ति-प्रसंग’ की वस्तु से उसका कोई आत्मिक सम्बन्ध जोड़ सकते हैं?

‘मुक्ति-प्रसंग’ नाम से जैसा कि कुछ दिनों पूर्व तक प्रपद्यवादी मानते रहे हैं, इसकी सार्थकता प्रमाणित हो पाती है कि किन्तु नामों का भ्रम अक्सर व्यवहार में हुआ करता है. तत्काल हम नाम-माहात्म्य पर न जाएँ. चूँकि मृत्यु पूरी कविता की मनःस्थिति को परिभाषित करती है और उसके मानसिक सन्दर्भ में व्याप्त है, इसलिए मृत्यु की वास्तविकता पर बहस नहीं की जा सकती. किन्तु मृत्यु की प्रत्यक्षता से इनकार नहीं कर सकते. यह कहना भी झटके से संभव नहीं है कि ‘मुक्ति-प्रसंग’ में न तो मृत्यु को स्वीकार करने की क्षमता स्पष्ट हो पाती है और न उसे स्वीकार के साथ अलग कर देने की. हाँ, तत्काल ऐसा जरुर लगता है कि मृत्यु के केन्द्रीय मूड में एक ‘ओनानिस्टिक’ ऐन्द्रजालिक श्रृंखला है जो हमें अतिक्रांत करती है- कभी इस आत्मविगलन से हम खीजते हैं, कभी उसकी गहराईयों में झाँकने को विवश होते हैं. कभी-कभी ऐसा भी लगता है कि मृत्यु को स्वीकारने की अपेक्षा जीवन को नकारने में कवि अधिक सक्षम है. क्या राजकमल का देवता ‘मुक्ति’ नहीं है, नकारत्मक स्वतंत्रता, ‘पॉइंटलेस फ्रीडम’ है?  क्या राजकमल मृत्यु के वास्तविक सन्दर्भ में भी अपने पाताल लोक की संवेदना से मुक्त नहीं हो सका?

मृत्यु को स्वीकार कर उसे अलग कर देने की बात अज्ञेय जी ने जिस ‘हाइडेगेरियन’ स्तर से कही थी, लगता है राजकमल उसे ‘मिस’ कर गया. आत्मविषाक्त और आत्मविगलित अल्पनाएँ पूरी कविता के रूप पर इस तरह हावी हो गईं हैं कि मालूम पड़ता है जैसे उनके बीच अच्छी पंक्तियाँ, अच्छे टुकड़े अथवा कोई सशक्त मानस-प्रवाह दब कर रह गया. बहुत हद तक डॉ. माचवे के इस मंतव्य से सहमत हुआ जा सकता है कि कविता का निष्कर्ष न तो अज्ञेय जी की धारणाओं से संभव हो पाया और न कवि के अपने नकारात्मक वेग से ही. कुछ अनिश्चयात्मक स्थिति बनी रह जाती है. यह अनिश्चय मुक्ति और वरण दोनों के लिए नकारात्मक सिद्ध हो सकता है. फलतः राजकमल मुक्ति के रूप में अपने लिए जो मांग रखता है वह निरर्थक है, एक लम्बे और भावनात्मक काव्य-कर्म की यह निरर्थकता क्या बहुतों के लिए दुःखद नहीं होती?

अपने लिए व्यक्तिगत विश्वासों की एक दुनिया गढ़ लेना और उसमें रहते हुए वास्तविकता को पूरे आत्मवेग के साथ नकारते चलना जितना आसान है, मृत्यु के सन्दर्भ में उसका दबाव झेलना उतना ही मुश्किल. इतना ही नहीं, ज्यां जेने की तरह ही राजकमल भी जब विश्वासों की एक दुनिया गढ़ने के साथ अपने लिए कुछ ‘रिचुअल्स’ भी गढ़ने लगता है, तब समीक्षक के लिए यह आवश्यक हो जाता है कि वह इन क्रियाओं की आत्मिकता को केवल खारिज करने की उतावली न करे. जैन-धर्म-मन्त्रों के साथ गिन्सबर्ग तो आए हैं किंतु जेने नहीं आया, मगर क्या आंतरिक रूप से राजकमल जेने के समीप नहीं है? इसे कुछ लोग दूर की कौड़ी समझ सकते हैं.

राजकमल अपने लिए जिस दुनिया की मांग करता है उसकी कोई व्यवस्थित तस्वीर या नैतिक अनिवार्यता भी उसके दिमाग में है या वह केवल नकारना जानता है? पुस्तक की अंतिम कुछ पंक्तियों का स्वर ‘ऐम्वीवैलेन्ट’ है. वैसे विद्रोह इतना नकारत्मक नहीं होता, और फिर मुक्ति-प्रसंग विद्रोह की कविता कहाँ है? वह तो अनुभव के एक नितांत आतंरिक स्तर पर मृत्यु को स्वीकार कर जाने का दर्शन है! स्पष्ट है कि अज्ञेय का मंतव्य राजकमल की चेतना में प्रवेश करने से रह गया है, शायद उसकी दुनिया में यह मंतव्य है ही नहीं! जब वह कहता है कि ‘ मैं इस शव के गर्भ में हूँ और यह शव मेरे कन्धों पर है’, तब ऐसा लगता है कि अज्ञेय जी के शब्द उसकी चेतना पर ‘फलैट’ पड़ रहे हैं!

नकार के इस अबाध वेग के बावजूद इस प्रसंग में एक आर्द्र करने वाली आन्तरिकता है. यह आन्तरिकता कैसे परिभाषित होती है? क्या राजकमल के विश्वासों में? उसके पास विशवास नहीं है! वरण में? वरण की आत्मक्षमता भी उसमें वैसी उत्कट नहीं है! फिर? इस आन्तरिकता को न तो उसके नकार के दर्शन से परिभाषित किया जा सकता है और न ही उसकी स्वीकारात्मक शाब्दिक भूमिकाओं से ही. यह अनिवार्यता बनती है वस्तुतः जीने की उसकी लालसा से, इसी से वह परिभाषित भी होती है. जिजीविषा और मुमुक्षा तो राजकम के लिए केवल पारिभाषिक शब्द हैं!

मृत्यु की भयावहता का गहराता हुआ रंग पूरी कविता पर तो नहीं, मगर उसके कुछ अंशों पर तो इतना है कि केवल उन अंशों से जीवन के प्रति उसकी निर्लसता का वक्तव्य खंडित हो जाता है. ‘एनेस्थेशिया’ के प्रभाव की तरह यह रंग नीला है, मृत्यु का रंग, कूलक्षय करती हुयी नदी का रंग, असीम आकाश का रंग, अपूर्ण, अपनी कामनाओं से विवश स्त्री का रंग! आत्म-स्वीकृतियों में जरुर इमानदारी और सच्चाई है जो कवि को उनके प्रति मुक्त करती हुई मालूम पड़ती है. मसलन,

नदी के किनारे वापस चले आना, तुम्हारी नियति है,

हर बार प्रत्यागमन

वह आदि वर्ण वह नीलापन

तुम कभी नहीं पाओगे अपराजित कभी.

या…

 

सबके लिये सबके हित में

अस्पताल चला गया राजकमल चौधरी

लिखने-पढ़ने, गाँजा-अफ़ीम-सिगरेट पीने

मरने का अपना एकमात्र कमरा अंदर से बन्द करके

दोपहर दिन के पसीने, पेशाब, वीर्यपात

मटमैले अँधेरे में लेटे हुये

धुँआ, क्रोध, दुर्गंधियाँ पीते रहने के सिवा

जिसने कोई बड़ा काम नहीं किया

अपनी देह

अथवा अपनी चेतना में

इस उम्र तक.

यह आत्म-विवृति कभी आंतरिक अनुभव के स्तर पर गहरे अवसादक प्रभाव उत्पन्न करती है. जैसे इन पंक्तियों में:

जटिल हुए, किन्तु

कोई भी प्रतिमा बनाने योग्य नहीं हुए

उसके अनुभव!

अपने आन्तरिक और निकटतम देश में घूमता हुआ यह व्यक्ति कभी-कभी गहरी आत्मलीनता में गहरे मानवीय अर्थों के प्रति अवाचक सचेत हो गया-सा मालूम पड़ने लगता है. यों उसे अपनी व्यर्थता का पूरा-पूरा बोध है और उस व्यवस्था का भी, जिसने उसे इतना व्यर्थ बना दिया है! इस गहरे आत्मबोध से कवि से स्वर में निजता के साथ वास्तविक गहराई आ जाती है.

नहीं करूँगा औरों के अपराध

मेरे वकील और मेरे न्यायाधीश यहाँ नहीं

उस सफ़ेद ठण्ड कमरे में प्रतीक्षारत हैं मेरे लिए

यहाँ नहीं बोलूँगा

सफाई के वकील, अभी मैं चुप हूँ.

और अभी मैं चिंताग्रस्त हूँ.

इस चिंताग्रस्त मानस के कई मानसिक आयाम हो सकते हैं, वस्तुतः हैं. राजकमल खुद भी एक खुली पुस्तक है, इतिहास-पुरुष चाहे वह न भी हो. इस अर्थ में मुक्ति-प्रसंग का कवि पारदर्शी है, इसे उसकी कविताओं से भी जाना जा सकता है. गहरी होती मृत्यु-छायाओं के बीच भी राजकमल पारदर्शी है, रहस्य के रंग भरना उसे नहीं आता.

राजकमल की आन्तरिक्ता को इन थोड़े-से उदाहरणों से मैंने परिभाषित नहीं किया, वस्तुतः वह परिभाषा की चीज भी नहीं है. मगर हिंदी कविता के समकालीन स्वरुप से वह इस अर्थ में भिन्न है कि उसका त्रास, अकेलापन, मृत्यु से साक्षात्कार और इन सब मनःस्थितियों में जूझता हुआ कवि-मानस ‘फ़ेक’ नहीं है. इसी वास्तविकता ने मुक्ति-प्रसंग को दर्शन की रिक्तता की सीमाओं के बावजूद पठनीय बना दिया है.

***

सर्व-प्रथम, आलोचना, १९६७ के किसी अंक में प्रकाशित. फिर, उदयशंकर द्वारा संपादित सुरेंद्र चौधरी के प्रकाशित लेखों के संकलन के तीसरे भाग, ‘साधारण की प्रतिज्ञा: अँधेरे से साक्षात्कार’ में पुनर्प्रकाशित.

 

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नंगे-फ़क़ीर सरमद के क़त्ल की दास्तान: कृष्ण कल्पित

सरमद शहीद पर लिखी जा रही लंबी-कविता अथवा काव्याख्यान पूरा हुआ ।

दो महीने से इस मुश्किल काम में लगा हुआ था। इतनी सामग्री इकट्ठा करली कि उसमें फँस के रह गया था। किसी शख़्सियत पर कविता लिखना आसान काम नहीं। चाहे वह पौराणिक हो ऐतिहासिक हो या फिर समकालीन। यह निश्चय ही ज़ोखिम का काम है।

बहुत सी कविताएँ याद आईं । निराला की ‘राम की शक्तिपूजा’, मायकोव्स्की की ‘लेनिन’, धूमिल की राजकमल चौधरी और नागार्जुन की केदारनाथ अग्रवाल पर लिखी कविता । अर्नेस्टो कार्देनाल की मर्लिन मुनरो पर लिखी कविता और बर्तोल्त ब्रेख़्त की Lao Tzu : Legend of the Book Tao-Te-Ching on Lao Tzu’s Road into Exile । ( हालांकि ब्रेख़्त की कविता लाओ त्ज़े पर कम उसकी 81 सूक्तियों की क्लासिक-किताब पर अधिक है )

100 से ऊपर पंक्तियों की कविता  ‘सरमद : जामा मस्जिद की सीढ़ियों पर एक नँगे फ़क़ीर के क़त्ल की दास्तान’ आपके समक्ष है।  #कृष्ण कल्पित

Sarmad by Sadequain

सरमद शहीद से प्रेरित सादेकैन की एक  कृति 

जामा मस्जिद की सीढ़ियों पर एक नंगे-फ़क़ीर के क़त्ल की दास्तान

By कृष्ण कल्पित

उम्रेस्त कि आवाज़-ए-मंसूर कुहन शुद
मन अज़ सरे नो जलवा देहम दारो रसनरा !
( मंसूर की प्रसिद्धि पुरानी हो गई । मैं सूली पर चढ़ने का दृश्य नये सिरे से पैदा करता हूँ । )

(१)

-आप इतने बड़े विद्वान हैं, फिर भी नंगे क्यों रहते हैं ?

दिल्ली के शहर क़ाज़ी मुल्ला क़वी के सवाल के जवाब में सरमद ने कहा :
शैतान बलवान (क़वी) है !

शहर क़ाज़ी को लगा कि सरमद उसे शैतान कह रहा है । मुल्ला की भृकुटियाँ तन ही रही थी कि सरमद ने फिर कहा :
एक अजीब चोर ने मुझे नंगा कर दिया है !

(२)

शहर क़ाज़ी मुल्ला क़वी को आलमगीर औरंगज़ेब ने सरमद के पास भेजा था – उसकी नग्नता का रहस्य जानने के लिये । औरंगज़ेब शाहजहाँ के बाद दारा शिकोह को ठिकाने लगाकर बादशाह बना था । औरंगज़ेब जानता था कि दारा शिकोह सरमद की संगत में था और उसके बादशाह बनने की भविष्यवाणी सरमद ने की थी ।

औरंगज़ेब के दिल में सरमद को लेकर गश था – वह उसे भी दारा शिकोह की तरह ठिकाने लगाना चाहता था लेकिन कोई उचित बहाना नहीं मिल रहा था । औरंगज़ेब जानता था कि बिना किसी वाजिब वजह के सरमद का क़त्ल करने से उसे चाहने वाले भड़क सकते थे – जिनकी सँख्या अनगिनत थी ।

औरंगज़ेब क़ातिल होने के साथ धर्मपरायण भी था और बादशाह होने के बावजूद टोपियाँ सिलकर अपना जीवन-यापन करता था ।

(३)

क़ाज़ी मुल्ला क़वी ने दरबार में उपस्थित होकर सरमद का हाल सुनाया और सरमद की मौत का फ़तवा जारी करने के लिये क़लमदान का ढक्कन खोल ही रहा था कि औरंगज़ेब ने उसे इशारे से रोक दिया और कहा :
नग्नता किसी की मौत का कारण नहीं हो सकती ।

औरंगज़ेब जितना अन्यायप्रिय था उतना ही न्यायप्रिय भी था !

(४)

तब आलमगीर ने अन्याय को न्याय साबित करने के लिये धर्माचार्यों की सभा आहूत की । सरमद को भी बुलवाया गया ।

सर्वप्रथम औरंगज़ेब ने सरमद से पूछा :
सरमद, क्या यह सच है कि तुमने दारा शिकोह के बादशाह बनने की भविष्यवाणी की थी ?

सरमद ने स्वीकृति में सर हिलाया और कहा :
मेरी भविष्यवाणी सच साबित हुई । दारा शिकोह अब समूचे ब्रह्मांड का बादशाह है ।

इसके बाद धर्मसभा के अध्यक्ष सिद्ध-सूफ़ी ख़लीफ़ा इब्राहिम बदख़्शानी ने सरमद से उसकी नग्नता का कारण पूछा । सरमद ख़ामोश रहा । फिर पूछा गया तो सरमद ने वही जवाब दिया जो उसने शहर क़ाज़ी को दिया था :
एक अजीब चोर है जिसने मुझे नंगा कर दिया !

तब ख़लीफ़ा ने सरमद को इस्लाम के मूल सूत्र कलमाये तैयब ( लाइलाहा इल्लल्लाह अर्थात कोई नहीं अल्लाह के सिवा ) पढ़ने के लिये कहा ।

सरमद के विरुद्ध यह भी शिकायत थी कि वह जब भी कलमा पढ़ता है, अधूरा पढ़ता है । अपनी आदत के अनुसार सरमद ने पढ़ा :
लाइलाहा ।

सरमद को जब आगे पढ़ने को कहा गया तो सरमद ने कहा कि मैं अभी यहीं तक पहुँचा हूँ कि कोई नहीं है । आगे पढूँगा तो वह झूठ होगा कयोंकि आगे के हर्फ़ अभी मेरे दिल में नहीं पहुँचे हैं । सरमद ने दृढ़ शब्दों में कहा कि मैं झूठ नहीं बोल सकता ।

बादशाह औरंगज़ेब, धर्मसभा के अध्यक्ष ख़लीफ़ा बदख़्शानी, शहर क़ाज़ी मुल्ला क़वी के साथ समूची धर्मसभा और पूरा दरबार सरमद का जवाब सुनकर सकते में था । ख़लीफ़ा ने कहा :
यह सरासर इस्लाम की अवमानना है, कुफ़्र है । अगर सरमद तौबा न करे, क्षमा न मांगे तो इसे मृत्युदंड दिया जाये

(५)

जब सरमद ने तौबा नहीं की क्षमा माँगने से इंकार कर दिया तो धर्माचार्यों की सभा और बादशाह की सहमति से शहर क़ाज़ी मुल्ला क़वी ने क़लमदान का ढक्कन खोला, उसमें क़लम की नोक डुबोई और काग़ज़ पर सरमद के मृत्युदंड का फ़रमान लिख दिया ।

अपनी मौत का फ़रमान सुनकर सरमद को लगा जैसे वह बारिश की फुहारों का संगीत सुन रहा है । वह भीतर से भीग रहा था जैसे उसकी फ़रियाद सुन ली गई है जैसे उसे अपनी मंज़िल प्राप्त हो गई है ।

सरमद अब कुफ़्र और ईमान के परे चला गया था । सरमद ने सोचा :
कितने फटे-पुराने वस्त्रों वाले साधु-फ़क़ीर गुज़र गये – अब मेरी बारी है ।

(६)

सरमद, तू पूरी दुनिया में अपने नेक कामों के नाते जाना जाता है । तूने कुफ़्र को छोड़कर इस्लाम धारण किया । तुझे ख़ुदा के काम में क्या कमी नज़र आई जो अब तुम राम नाम की माला जपने लगा !

सरमद को अपनी ही रुबाई याद आई और अपना पूरा जीवन आँखों के सामने चलचित्र की तरह घूमने लगा ।

पहले अरमानी-यहूदी, फिर मुस्लिम और अब हिन्दू !

सरमद जब अरब से हिंदुस्तान की तरफ़ चला था तो वह एक धनी सौदागर था । उसे वह लड़का याद आया, जिससे सिंध के ठट्टा नामक क़स्बे में उसकी आँख लड़ गई थी । इस अलौकिक मोहब्बत में उसने अपनी सारी दौलत उड़ा दी। सरमद दीवानगी में चलते हुये जब दिल्ली की देहरी में घुसा तो एक नंगा फ़क़ीर था ।

उसे वे धूल भरे रास्ते याद आये , जिस से चलकर वह यहाँ पहुँचा था ।

और सरमद को उस हिन्दू ज्योतिषी की याद आई जिसने उसकी हस्त-रेखाएँ देखकर यह पहेलीनुमा भविष्यवाणी की थी :

तुम्हारे मज़हब के तीसरे घर में मृत्यु बैठी हुई है!

(७)

अगले दिन सरमद को क़त्ल करने के लिये जामा मस्जिद की सीढ़ियों पर ले जाया गया, जहाँ इतनी भीड़ थी कि पाँव धरने की जगह नहीं थी । कुछ तमाशा देखने तो अधिकतर अपने प्रिय सरमद की मौत पर आँसू बहाने आये थे।जामा मस्जिद की सबसे ऊँची सीढ़ी पर खड़े होकर सरमद ने यह शे’र पढ़ा :

शोरे शुद व अज़ ख़्वाबे अदम चश्म कशुदेम

दी देम कि बाकीस्त शबे फ़ितना गुनूदेम !

( एक शोर उठा और हमने ख़्वाबे-अदम से आँखें खोलीं तो देखा – कुटिल-रात्रि अभी शेष है और हम चिर-निद्रा के प्रभाव में हैं । )

इसके बाद अपनी गर्दन को जल्लाद के सामने झुकाकर सरमद फुसफुसाया :

आओ, तुम जिस भी रास्ते से आओगे, मैं तुझे पहचान लूँगा !

(८)

सरमद का कटा हुआ सर जामा मस्जिद की सीढ़ियों से नृत्य करता हुआ लुढ़कता रहा ।सरमद के कटे हुये सर को उसके पीर हरे भरे शाह ने अपने आगोश में ले लिया । पवन पवन में मिल गई – जैसे कोई विप्लव थम गया हो !

(९)

मुस्लिम इतिहासकार वाला दागिस्तानी ने अपनी किताब में लिखा है कि वहाँ उपस्थित लोगों का कहना था कि जामा मस्जिद की सीढ़ियों से ज़मीन तक पहुँचते हुये सरमद के कटे हुये सर से यह आवाज़ निकलती रही :
ईल्लल्लाह   ईल्लल्लाह  ईल्लल्लाह
और यह भी प्रवाद है कि सरमद के कटे हुये सर से बहते हुये लहू ने जामा मस्जिद की सीढ़ियों पर जो इबारत लिखी गई उसे इस तरह पढा जा सकता था :
लाइलाहा  लाइलाहा लाइलाहा !

(१०)

इतिहास की किताबों में सरमद शहीद का ज़िक़्र मुश्किल से मिलता है लेकिन जामा मस्जिद के सामने बने सरमद के मज़ार पर आज भी उसके चाहने वालों की भीड़ लगी रहती है । यह जुड़वाँ मज़ार है । हरे भरे शाह और शहीद सरमद के मज़ार ।हरे भरे शाह और सरमद । जैसे निज़ामुद्दीन औलिया और अमीर ख़ुसरो । पीरो-मुरीद । एक हरा । एक लाल ।

इन के बीच नीम का एक घेर-घुमावदार, पुराना वृक्ष है जिससे सारे साल इन जुड़वाँ क़ब्रों पर नीम की निम्बोलियाँ टपकती रहती हैं ।

और जब दिल्ली की झुलसा देने वाली गर्मी से राष्ट्रपति-भवन के मुग़ल-गॉर्डन के फूल मुरझाने और घास पीली पड़ने लगती है तब भी सरमद के मज़ार के आसपास हरियाली कम नहीं होती । सरमद की क़ब्र के चारों तरफ़ फूल खिले रहते हैं और घास हरी-भरी रहती है !

(११)

ख़ूने कि इश्क़ रेज़द हरगिज़ न बाशद

( इश्क़ में जो ख़ून बहता है वह कदापि व्यर्थ नहीं जाता ! )

■     ■    ■

Krishna Kalpitअपने तरह का अकेला-बेबाक और विवादित कवि । कृष्ण कल्पित का जन्म 30 अक्टूबर, 1957 को रेगिस्तान के एक कस्बे फतेहपुर शेखावटी में हुआ। अब तक कविता की तीन किताबें और मीडिया पर समीक्षा की एक किताब छप चुकी है। एक शराबी की सूक्तियां  के लिए खासे चर्चित। ऋत्विक घटक के जीवन पर एक पेड की कहानी नाम से एक वृत्तचित्र भी बना चुके हैं।  अभी  हाल ही में बाग़-ए-बेदिल नाम से एक विलक्षण  और विशाल  काव्य-संकलन  के साथ-साथ ‘कविता-रहस्य ‘ नामक  पुस्तक प्रकाशित । 

मुक्तिबोध की रचनात्मकता : प्रो.राजकुमार

मुक्तिबोध के बहाने प्रो. राजकुमार एक बहस की धारावाहिकता में गहरे विश्वास के साथ उतरे हैं. इस सीरिज का पहला , दूसरा लेख   और  तीसरा लेख  आप पढ़ चुके हैं,  चौथा  यहाँ  प्रस्तुत  है. #तिरछीस्पेल्लिंग 

यह बात सही है कि मुक्तिबोध नारीवादी रचनाकार या आलोचक नहीं हैं। यह भी सही है कि मुक्तिबोध कोई दलितवादी चिन्तक या रचनाकार नहीं हैं। इतना ही नहीं, मैं जो बात जोर देकर कहना चाहता हूँ वह यह है कि मुक्तिबोध यथार्थवादी रचनाकार भी नहीं हैं। लेकिन इससे मुक्तिबोध छोटे नहीं हो जाते, इससे मुक्तिबोध की तौहीन नहीं होती। इसके बावजूद मुक्तिबोध एक बड़े चिन्तक, विचारक और रचनाकार हैं। #लेखक

Muktibodh By Haripal Tyagi

Muktibodh By Haripal Tyagi

मुक्तिबोध की रचनात्मकता

 

By प्रो.राजकुमार

मुक्तिबोध ने जो बातें आलोचक या चिन्तक के रूप में लिखी हैं, वे बातें तो महत्त्वूपर्ण हैं ही, लेकिन जो बातें उनकी रचनाओं में आयी हैं, वे कई बार उनसे भी महत्त्वपूर्ण हैं, जो उन्होंने एक आलोचक के रूप में सचेत ढंग से लिखी हैं। मुक्तिबोध के आलोचनात्मक रूप को समझने के लिए सिर्फ उनके वैचारिक लेखन को न देखें, उनके रचनात्मक लेखन में जो विचार के स्फुरण हैं, वे भी बहुत महत्त्वपूर्ण हैं और कई बार वैचारिक लेखन से ज्यादा महत्त्वपूर्ण हैं। मुक्तिबोध ने स्वयं ‘संवेदनात्मक ज्ञान और ज्ञानात्मक संवेदना’ की बात की है। विचार और संवेदना तथा रचना और विचार को मुक्तिबोध अलग करके देखने के हिमायती नहीं हैं।

मुक्तिबोध ने प्रायः विधाओं की पारम्परिक सीमाओं को तोड़ा है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण ‘एक साहित्यिक की डायरी’ है। इसे क्या कहेंगे, डायरी, संस्मरण, नोटबुक, वैचारिक-चिन्तनपूर्ण लेखों को संजोने का उपक्रम; आखिर इसे क्या कहा जाए! इसी तरह मुक्तिबोध की जो कहानियाँ हैं, उनको भी हिन्दी में कहानी लिखने की पहले से चली आ रही परम्परा के परिदृश्य में देखने पर कई बार समस्या उत्पन्न होती है। यह तय करना मुश्किल हो जाता है कि इन्हें कहानी माना जाए, निबंध माना जाए या फिर संस्मरण माना जाए। कहने का तात्पर्य यह है कि मुक्तिबोध ने जिस विधा में भी लिखा उस विधा को समस्याग्रस्त बनाया। उन्होंने उसकी पहले से चली आ रही संरचना को किसी न किसी रूप में बदला। इसलिए सिर्फ आलोचनात्मक लेखन में नहीं, बल्कि रचनात्मक लेखन में भी, मुक्तिबोध ने जो कुछ लिखा है, उस पर विचार करने की जरूरत है।

मुक्तिबोध के समूचे लेखन में प्रेमचंद के प्रति आदर का भाव है, लेकिन प्रेमचंद के बारे में मुक्तिबोध ने लगभग न के बराबर लिखा है। निराला के प्रति भी आदर का भाव है लेकिन मुक्तिबोध ने उनकेे बारे में भी कुछ नहीं लिखा। मुक्तिबोध ने सबसे ज्यादा जिस रचनाकार के बारे में लिखा है, वे जयशंकर प्रसाद हैं। सोचने वाली बात है कि मुक्तिबोध जयशंकर प्रसाद के बारे में इतना क्यों लिखते हैं? ‘कामायनी’ का जिस तरीके से उन्होंने मूल्यांकन किया है, उससे आप क्या वास्तव में समझ सकते हैं कि मुक्तिबोध ने प्रसाद से क्या लिया! मुझे लगता है कि ‘कामायनी एक पुनर्विचार’ पुस्तक में मुक्तिबोध ने प्रसाद के बारे में चाहे जो भी निर्णय दिए हों, लेकिन मुक्तिबोध जो चीजें प्रसाद से लेते हैं, वह भारतीय सभ्यता का गहरा, सूक्ष्म सांस्कृतिक बोध है। समूची हिन्दी काव्य परम्परा में, बहुत गहरे अर्थों में, एक सच्चे भारतीय कवि के रूप में मुक्तिबोध अपने आपको प्रस्तुत करते हैं। छायावादी कवियों में निराला की कविता की क्रांतिकारिता अपनी जगह है। निराला ने ‘तुलसीदास’ और ‘राम की शक्तिपूजा’ जैसी लम्बी कविताएँ लिखी हैं। लेकिन इसके बावजूद भारतीय सभ्यता का बहुत गहरा और सूक्ष्म सांस्कृतिक बोध जिस तरह प्रसाद के यहाँ है, वैसा और किसी के यहाँ नहीं है। मुझे लगता है कि यह शायद बड़ा कारण है, जिसकी वजह से मुक्तिबोध लगातार प्रसाद की कविताओं से उलझते हैं। भले ही, उन्होंने इस बात को सीधे-सीधे न लिखा हो। मुक्तिबोध का ‘कामायनी’ के बारे में जो मूल्यांकन है, वह बड़ा ही नकारात्मक लगता है, लेकिन उन्होंने प्रसाद से जो कुछ लिया है, वह बहुत महत्त्वपूर्ण है।

मुक्तिबोध ने प्रसाद की ‘कामायनी’ को ‘फैंटेसी’ के रूप में देखा। प्रसाद ने भी एक अन्योक्ति के रूप में उसकी भूमिका लिखी है। प्रसाद ने भी ऐसा कुछ नहीं कहा जिससे लगे कि ‘कामायनी’ एक यथार्थवादी रचना है। मुक्तिबोध का प्रसाद के साथ जो तादात्म्य है, उसके केन्द्र में उस शिल्प-विधान की भी भूमिका है जो मुक्तिबोध प्रसाद की ‘कामायनी’ से ग्रहण करते हैं और फिर जिसे अपने स्तर पर विकसित करते हैं। उन्होंने जैसे प्रसाद की ‘कामायनी’ को एक ‘फैंटेसी’ कहा है, वैसे ही, वह अपनी समूची रचनाओं को ‘फैंटेसी’ कहते हैं। उन्होंने यह माना है कि उनकी रचनाएँ ‘फैंटेसी’ के विधान में लिखी गयी हैं। इसलिए समस्या यह है कि जो रचना ‘फैंटेसी’ के विधान में लिखी गयी हो, जिसमें अन्तर्वाह्य, ‘स्वप्न’ और ‘यथार्थ’ का साफ-साफ अन्तर न किया गया हो, उसकी व्याख्या यथार्थवादी सैद्धान्तिकी के सहारे कैसे की जा सकती है।

उनकी कविता ‘अंधेरे में’ में यह प्रसंग आता है कि यह तो स्वप्न कथा है। ये सारी बातें स्वप्न में चल रही थी। यह जानबूझ कर मुक्तिबोध ने किया है। और यह उन्होंने इसलिए किया है क्योंकि ‘स्वप्न और यथार्थ’ के पहले से, यथार्थवादी दौर से, चले आ रहे विभाजन को वे तोड़ना चाहते थे; या उसको धुंधला करना चाहते थे। इसी तरह से क्या अन्दर है और क्या बाहर है, क्या आत्मगत है और क्या वस्तुगत है, इसका भी पारम्परिक विभाजन जो यथार्थवाद के रास्ते चला आ रहा था, मुक्तिबोध ने तोड़ दिया। उदाहरण के माध्यम से यह बात समझ सकते हैं। उनकी ‘भूल गलती’ कविता को लीजिए। वह ‘भूल गलती’ किसकी है? पहले यह भ्रम होता है कि किसी से कोई चूक-भूल हो गयी है, उसकी सजा मिलने वाली है। लेकिन फिर पता चलता है कि यह तो सत्ता का प्रतीक है। अन्दर क्या है, बाहर क्या है, इसका साफ-साफ विभाजन पहले से चला आ रहा था, मुक्तिबोध ने उसे तोड़ दिया। और आखिरी चीज इस प्रसंग में यह कि व्यक्ति की निश्चित-निर्धारित संभावनाओं को भी मुक्तिबोध ने समस्याग्रस्त बनाया। इस दृष्टि से आप विचार करें कि माक्र्सवाद की विधेययवादी/प्रत्यक्षवादी (Positivist) समझ उस दौर तक चली आयी थी जिसमें ज्यादातर चीजों के बारे में निश्चित रूप से कहने का दावा किया जाता था। मुक्तिबोध ने इस समझ को चुनौतीग्रस्त बनाया और व्यक्ति की संभावनाओं को कहीं न कहीं खुला छोड़ दिया। जैसे, ‘अंधेरे में’ कविता में ‘एक व्यक्ति अन्दर है और दूसरा उसकी साँकल खटखटा रहा है। कहने के लिए यह दो व्यक्ति हैं, लेकिन हम जानते हैं कि यह एक ही व्यक्ति की दो संभावनाएँ हैं। एक ही व्यक्ति दो रूपों में विकसित हो सकता है या कई रूपों में विकसित हो सकता है। अब वह समाज और देश-दुनिया कैसी है और वह कैसा प्रयास करता है, अपने को किधर जोड़ता है, इससे उसकी कौन-सी संभावनाएँ फलीभूत होंगी, यह निश्चित होगा।

व्यक्ति की पहचान नयी कविता के दौरान एक बड़ा मुद्दा था। व्यक्ति कैसे बनता है? व्यक्ति की अस्मिता को कैसे परिभाषित किया जाए? मुक्तिबोध ने इस बात को रेखांकित करने का प्रयास किया कि व्यक्ति की संभावनाएँ तो अनन्त हैं। वह कई रूपों में विकसित हो सकता है। व्यक्ति का कौन-सा रूप विकसित होगा यह इस बात पर निर्भर करता है कि समाज उसे कैसा असवर देता है और वह व्यक्ति कैसा प्रयास करता है। ये बातें यथार्थवाद की सैद्धान्तिकी के बाहर की बातें हैं। इसलिए यथार्थवाद के सहारे मुक्तिबोध या मुक्तिबोध की रचनाओं की व्याख्या नहीं कर सकते। यह अलग बात है कि कुछ लोगों को लगता है कि यथार्थवाद एक ऐसी ‘मास्टर की’ है, जिसके जरिये अतीत से लेकर वर्तमान तक और भविष्य में जो कुछ होगा, उसकी भी व्याख्या की जा सकती है। ऐसे लोगों को आप छोड़ दें, साहित्य और कला के विकास के बारे में जिनको थोड़ा बहुत मालूम है, वे जानते हैं कि यथार्थवाद के बाद पश्चिम में आधुनिकतावाद या जिसे अंग्रेजी में ‘मार्डनिज़्म’ कहते हैं, वह आता है। और मुक्तिबोध स्वयं उसके साथ जुड़े हुए हैं, मुक्तिबोध की एक किताब है, ‘नयी कविता का आत्मसंघर्ष’। मार्क्सवाद के साथ उनका चाहे जैसा भी संबंध रहा है, लेकिन मुक्तिबोध ने कभी यह नहीं कहा कि वे नयी कविता से बाहर के कवि हैं। नागार्जुन, केदारनाथ अग्रवाल या और दूसरे मार्क्सवादी कवि हैं, जिन्होंने अपने को नयी कविता से बाहर रखा। नयी कविता से बाहर रहने वाले कवि के रूप में मुक्तिबोध ने स्वयं को कभी पेश नहीं किया, बल्कि उसी के अन्दर एक प्रगतिशील संभावना खोजने की कोशिश मुक्तिबोध ने की। नयी कविता या नयी कहानी वही है जिसको अंग्रेजी में मार्डनिज़्म कहा जाता है। उसी का भारतीय संस्करण हमारे यहाँ नयी कविता या नयी कहानी के दौरान आया। उसी के अन्दर मुक्तिबोध भी सक्रिय हैं। उसी के अन्दर नयी कविता के दौरान बहसें हुईं। नयी कविता की वैचारिकी से बहस करते हुए, उससे उलझते हुए, मुक्तिबोध मार्क्सवादी आलोचना की, प्रचलित समझ से अपना एक संबंध स्थापित करते हैं। नयी कविता के दौरान कविता या साहित्य को लेकर जो एक नये प्रकार का चिन्तन आ रहा था, उससे भी वे उलझते हैं।

यथार्थवाद के आधार पर मुक्तिबोध की रचनाओं की व्याख्या नहीं कर सकते या नहीं करनी चाहिए। यथार्थवाद के चौखटे में मुक्तिबोध कहीं से भी फिट नहीं होते। उनका रचना-विधान यथार्थवाद से बाहर का है, जिसको आप मोटे तौर पर आधुनिकतावाद के साथ जोड़कर देख सकते हैं। इस पर हमें जरूर विचार करना चाहिए कि मुक्तिबोध भारतीय साहित्य और कला की क्या किसी वैकल्पिक परम्परा की ओर संकेत करते हैं या उसकी संभावनाओं को तलाशने की कोशिश करते हैं। हिन्दी की जिस जातीय परम्परा की बात आधुनिक युग में की जाती है, जिसके पुरस्कर्ता के रूप में हिन्दी में रामविलास शर्मा का नाम लिया जाता है, वह जातीय परम्परा मोटे तौर पर यथार्थवाद की सैद्धान्तिकी पर आधारित है। यथार्थवाद की सैद्धान्तिकी से प्रेरित प्रभावित जो रचनाएँ उस दौर में लिखी गयीं, वह बहुत महत्त्वपूर्ण हैं और उनके महत्त्व से इन्कार नहीं किया जा सकता। उस यथार्थवाद की सैद्धान्तिकी से प्रेरित-प्रभावित रचनाओं के कारण भारत की साहित्यिक और सांस्कृतिक परम्परा का जो पहले से चला आ रहा सिलसिला था, उससे हमारा संबंध कहीं न कहीं टूटता और खण्डित भी होता है। यह अकारण नहीं है। चाहे लोक-परम्परा हो या चाहे लोकाख्यान हो या लोक जीवन से जुड़े हुए अन्य विविध रूप हों, यथार्थवाद से प्रेरित हिन्दी की जातीय साहित्य की परम्परा में उनकी लगभग उपेक्षा की गयी। इप्टा ने जिस प्रकार के नाटक खेले और कुछ लोकगीतों का प्रयोग किया, वहाँ भी पहले से प्रचलित और लोकप्रिय रूपों का इस्तेमाल करने की प्रवृत्ति अधिक थी, लेकिन उनकी संवेदना और सैद्धान्तिकी से तदाकार होने का कोई प्रयास या उलझने का प्रयास वहाँ भी नहीं दिखता। इसलिए यथार्थवाद से प्रेरित रचनाओं की महत्ता को स्वीकार करने के बावजूद यह मानना पड़ेगा कि यथार्थवादी आग्रह के कारण कहीं न कहीं पूर्व प्रचलित परम्परा से विच्छेद भी दिखायी पड़ता है।

मुक्तिबोध को उस प्रसंग में रखकर देखना चाहिए, जहाँ रखकर विचार करने से उनका महत्त्व उद्घाटित होता है। आप जानते हैं कि मुक्तिबोध की कविताओं में और कहानियों में भी, जो आख्यान है, वह लगभग लोककथाओं जैसा है। लोककथाओं के स्ट्रक्चर में उनकी कविताएँ रची गयी हैं। उनकी कहानियों में भी यही चीज दिखायी पड़ेगी। यह दिलचस्प है कि मुक्तिबोध हिन्दी के पहले (अज्ञेय के साथ) पूरी तौर पर शहरी कवि हैं, जिनका गाँव से संबंध नहीं रहा है। इसके बावजूद उनके रचना-विधान में लोककथाओं से लेकर लोकजीवन की ‘बावड़ी’ तक अनेकों चीजें हैं। इनसे संबंधित बहुतेरे बिम्ब और प्रतीक हैं। यहाँ तक कि मुक्तिबोध के रंगबोध पर भी भारतीय लोकजीवन की गहरी छाप है।

मुक्तिबोध रूपक और प्रतीक के लिए जाने जाते हैं। लेकिन उससे ज्यादा खास चीज, जो मुझे बराबर आकृष्ट करती रही है कि कई बार भक्तिकालीन कवियों की पूरी की पूरी शब्दावली मुक्तिबोध के यहाँ मिल जाती है। इड़ा, पिंगला, सुषुम्ना और अनेक शब्द मुक्तिबोध के यहाँ मिल जाते हैं, जिससे रामविलास जी को यह भ्रम होता है कि यह तो रहस्यवादी हो गए हैं। दरअसल, समूची भक्तिकालीन परम्परा के दौरान शब्दों की एक नयी समृद्धि आयी; उसको एक नए स्तर पर अर्जित करने और उसका नवोन्मेष करने का उद्यम मुक्तिबोध की कविता में दिखायी पड़ता है। मुक्तिबोध बहुत गहरे और सूक्ष्म अर्थों में भारतीय संस्कृति और सभ्यता के कवि हैं। भारतीय साहित्यिक परम्परा का जितना गहरा संस्कार मुक्तिबोध के यहाँ दिखायी पड़ता है, उनसे पहले प्रसाद के यहाँ है, और उसके बाद तो फिर किसी के यहाँ नहीं है।

यथार्थवाद से इतर जो गैर यथार्थवादी परम्परा है, वह कैसे भारतीय सभ्यता की पहले की विरासत – लोक परम्परा और शास्त्रीय परम्परा – से जुड़ने में हमारी मदद करती है और एक वृहत्तर भारतीय समाज के साथ भी हमारा संवाद स्थापित करने में सहायता करती है। भारतेन्दु हरिश्चन्द्र का नाटक है ‘अंधेर नगरी’। कहा जाता है कि यह एक लोककथा है और पारसी रंगमंच पर इस तरह का नाटक खेला भी जाता था। भारतेन्दु ने उसे अपने ढंग से समृद्ध किया। ‘अंधेर नगरी’ का पूरा रचना-विधान भारतीय लोक परम्परा के आख्यान के अनुरूप है या उसके नजदीक है। उसकी व्याख्या यथार्थवाद की तार्किक सैद्धान्तिकी के आधार पर नहीं कर सकते। शायद यह बड़ा कारण है कि यह छोटा सा नाटक इतना लोकप्रिय हुआ। उसकी लोकप्रियता सिर्फ विश्वविद्यालयों और हिन्दी विभाग की चौहद्दी तक सीमित नहीं रहती। यह नाटक इतना विस्तार पाता है कि आपातकाल के दौरान उसे प्रतिबंधित करना पड़ा। यह जो शक्ति है, वह गैर यथार्थवादी शिल्प-विधान की खासियत है, जो ‘अंधेर नगरी’ में दिखायी पड़ती है। यह शक्ति, यह खासियत फिर मुक्तिबोध में दिखायी पड़ती है, हबीब तनवीर में दिखायी पड़ती है और विजयदान देथा की कहानियों में दिखायी देती है। यही मुक्तिबोध के चिन्तन का प्राण है।

मुक्तिबोध ने गैर यथार्थवादी रचनात्मकता को, पहले से चली आ रही परम्परा को, पहचाना, उसके द्वार खोले, उसके महत्त्व को सामने लाने का काम किया। प्रेमचंद ने 1936 में प्रगतिशील साहित्य मंच के अध्यक्षता पद से दिये गये भाषण ‘साहित्य का उद्देश्य’ में पहले के समूचे साहित्य का सुलाने वाला साहित्य के रूप में जिक्र किया था। मैं यथार्थवाद की इसी विडम्बना की ओर संकेत करना चाहता था। इसका दुष्परिणाम यह हुआ कि आधुनिक युग से पहले की समूची विरासत को, उसकी उपलब्धियों को, चाहे वह शास्त्रीय परम्परा की हों या लोक परम्परा की, अस्वीकार कर दिया गया। इसी पृष्ठभूमि में मुक्तिबोध ने एक बड़ा काम किया। वह अध्याय फिर से खोला गया, उसके महत्त्व को नये सिरे से समझने और उससे सीखने के एहसास को हमारे अन्दर उत्पन्न किया गया। आश्चर्य होता है कि मुक्तिबोध यह काम तब कर रहे थे, जब दुनिया में जादुई यथार्थवाद नाम की कोई चीज कहीं थी ही नहीं।

जादुई यथार्थवाद को साहित्य में लाने वाले लातिन अमरीकी उपन्यासकार गैब्रियल गार्सिया मार्खेज़ का नाम विशेषरूप से लिया जाता है। जादुई यथार्थवाद की शैली में नए तरह का जो आख्यान है, वह कहीं न कहीं लातिन अमरीकी लोक जीवन को फिर से एक नये स्तर पर उपन्यास के शिल्प में लाने का उपक्रम है। यह संभव ही नहीं हो पाता, अगर बीच में आधुनिकतावाद न आता। अगर आधुनिकतावाद ने यथार्थवाद की सैद्धान्तिकी को चुनौती न दी होती तो कोई भी लेखक, चाहे वह लातिन अमरीकी हो या कोई और, वह मैजिकल रियलिज्म के ढंग की रचना नहीं कर सकता था। विद्वान जानते हैं कि मैजिकल रियलिज्म का विकास कैसे हुआ। उसमें आधुनिकतावाद का बहुत महत्त्वपूर्ण योगदान है।  इसीलिए मुक्तिबोध के योगदान के इस पक्ष को देखकर आश्चर्य होता है। जादुई यथार्थवाद कहीं आया ही नहीं था, और इसके बावजूद मुक्तिबोध इस तरह की कविताएँ लिखने का साहस कर रहे थे। इसी अर्थ में कई बार विचार के स्तर पर हम ज्यादा औपनिवेशिक होते हैं जबकि संवेदना और संस्कार के स्तर पर देशी होते हैं। संवेदना या संस्कार हमेशा प्रतिक्रियावादी ही नहीं होते, गलत ही नहीं होते, कई बार ज्यादा सच्चे और अच्छे होते हैं। मुक्तिबोध के यहाँ भी हम इस बात को लागू करके देख सकते हैं कि उनकी रचनात्मकता में इस तरह के बहुत सारे पक्ष हैं। कई बार अपने वैचारिक चिन्तन में वे इस पर ध्यान नहीं देते हैं या फिर उस पर ढंग से विचार नहीं करते।

नयी कविता में इस बात को लेकर बड़ी बहस हुई कि जीवनानुभूति और सौन्दर्यानुभूति में क्या संबंध है। नयी कविता के दौरान यथार्थ वाला नुस्खा नहीं आता है। अज्ञेय ने, जिन्हें टी॰एस॰ इलियट से प्रेरणा मिली थी, कहा कि जीवनानुभूति और सौन्दर्यानुभूति दोनों ही अलग या समानान्तर चलने वाली चीजें हैं। इनके बीच कोई सीधा संबंध नहीं है। यह एक समझ थी, जिसके हिन्दी में प्रवक्ता अज्ञेय थे। दूसरी समझ मार्क्सवादियों की थी कि जीवनानुभूति और सौन्दर्यानुभूति में कोई फर्क नहीं है। अगर आपके पास जीवन का अनुभव है तो वही पर्याप्त है और उससे अपने आप रचना बन जाएगी। रचना आपकी जीवनानुभूति का ‘बाइप्रोडक्ट’ है। इस संबंध में मुक्तिबोध ने न तो यह कहा कि ये दोनों बिल्कुल अलग हैं और न तो यह कि जीवन की अनुभूति और सौन्दर्य की अनुभूति दोनों एक हैं। उन्होंने कहा कि सैन्दर्यानुभूति जीवनानुभूति से गुणात्मक रूप से भिन्न है। इसका मतलब है कि रचना जीवन का ‘बाइप्रोडक्ट’ नहीं है। रचना एक कौशल और अनुशासन भी है। अगर वह कौशल और अनुशासन आपको नहीं आता, तो जीवन में आपने चाहे जितना संघर्ष किया हो, उसके बाद भी कोई अच्छी रचना या कविता लिख पाएंगे, ऐसा कोई दावा आप नहीं कर सकते। तीन क्षणों की चर्चा में मुक्तिबोध ने इसी बात को बहुत विस्तार से दिखाया है कि रचना का जब बीज पड़ता है और जब रचना अन्तिम रूप से बनती है तो उसमें बहुत बदलाव आ जाता है। मुक्तिबोध ने इस बात को अपने आखिरी दिनों के आस-पास महसूस किया था कि हर विधा का अपना एक स्वभाव या चरित्र होता है। कविता, कहानी या अन्य दूसरी विधाओं में भी उस विधागत स्वभाव या चरित्र को आप एक सीमा तक तो बदल सकते हैं, लेकिन एक सीमा के बाद आप उसे नहीं बदल सकते। बल्कि इसका उल्टा होता है कि वह विधा भी आपको बदलती है। अगर आपको कहानी लिखनी है तो कहानी लिखने के बारे में जैसे ही सोचेंगे, वैसे ही आप अपने अनुभव को कहानी की विधा में रूपान्तरित करने की कोशिश करने लगेंगे। किसी विधा में अनुभव को रूपान्तरित करने की जो कोशिश है, उसमें वह विधा भी आपको और आपके अनुभव को बदल देती है। वह विधा आपकी भाषा को भी बदल देती है। बहुत सारी चीजें आपके जीवननानुभव में जुड़ जाती हैं और बहुत सी चीजें घट जाती हैं। मुक्तिबोध ने ये सारी बातें उस समय लिखी है जब हेडेन ह्वाइट जैसा कोई समाजशास्त्रीय चिन्तक नहीं हुआ था। हेडेन ह्वाइट की एक बड़ी प्रसिद्ध पुस्तक है ‘कन्टेन्ट आॅफ फाॅर्म’। इसका हिन्दी अनुवाद किया जाए तो होगा ‘रूप की अन्तर्वस्तु’। चाहे संगीत का रूप हो या साहित्य की किसी विधा का रूप हो, उसका अपना एक स्वाभाव होता है। एक रूप एक खास तरह की चीजों को ग्रहण करेगा, दूसरी चीजों को वह ग्रहण नहीं करेगा, और अगर आप एक सीमा के बाद जबदस्ती करने की कोशिश करेंगे, तो वह रूप उसे धारण नहीं करेगा। आप लाख कहते रहें  कि आपने कविता लिख दी है, और चौबीस कैरेट यथार्थ उसमें डाल दिया है, लेकिन अगर वह विषय उस रूप के अन्दर ‘फिट’ नहीं हो पाया तो फिर उसे कविता नहीं कहा जाएगा। उपन्यास लिखना है तो आप उपन्यास को चाहे जितना भी बदलें, अन्ततः आपको उपन्यास ही लिखना है। कविता लिखनी है तो आप कविता को चाहे जितना भी बदलें, अन्ततः कविता ही लिखनी है। यह विवेक कहीं न कहीं होना चाहिए कि रूप विषय को किस हद तक धारण कर सकता है। सुई से तलवार का काम नहीं लिया जा सकता और तलवार से सुई का काम नहीं ले सकते, यह बात मुक्तिबोध के तीन क्षणों के विवेचन से निकलकर हमारे सामने आती है, और हमें बहुत कुछ सीखने के लिए विवश करती है। यह बात अलग है कि स्वयं मुक्तिबोध का समूचा रचनात्मक लेखन इस कसौटी पर हमेशा खरा नहीं उतरता। मुक्तिबोध के यहाँ सर्वत्र श्रेष्ठ कविता नहीं है। बहुत सारे अंश हैं, जहाँ बिखराव भी दिखायी पड़ेगा, जहाँ लगता है कि रूप ने इसको धारण नहीं किया है। खास तौर से ‘अंधेरे में’ का जो पूरा विन्यास है, जहाँ नाटक की संरचना में कविता रचने का प्रयास उन्होंने किया है, वहाँ आप इस बात को महसूस कर सकते हैं। जिस रूप की तलाश मुक्तिबोध को थी, जो कई दफा उन्हें कुछ अंशों में मिलता था, और कभी नहीं मिलता, शायद वह तलाश ‘अंधेरे में’ जाकर पूरी होती है। इस तरह की और भी कुछ रचनाओं का उल्लेख किया जा सकता है, लेकिन नाटक की संरचना के अंदर अपनी प्रगीतात्मक संवेदना को कैसे पिरोया जाए, यह रचनात्मक विधान मुक्तिबोध ने अपने आखिरी दौर में खोज लिया। वहाँ रूप ने संवेदना को धारण किया है। इस दौर में इस तरह की दो रचनाएँ मिलती हैं। दूसरे पक्ष से धर्मवीर भारती का ‘अंधायुग’ है, जो नाटक की संरचना में एक खास तरह की प्रगीतात्मकता को धारण करने की तकनीक विकसित करता है। दूसरी तरफ मुक्तिबोध की ‘अंधेरे में’ है जहाँ वे लोकनाट्य की संरचना में प्रगीतात्मक क्रांतिकारी संवेदना को धारण करने का एक तरीका विकसित करते हुए दिखायी पड़ते हैं। लेकिन इस विस्तार में जाने के लिए तो एक नया लेख लिखना होगा।

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प्रो॰राजकुमार शोर-शराबे से दूर अध्ययन-अध्यापन में मग्न रहने  वाले युवा-तुर्क हिन्दी आलोचक हैं। भक्ति साहित्य, हिन्दी नवजागरण, आधुनिकता, आधुनिक साहित्य, प्रेमचंद, हिन्दी कहानी इत्यादि पर लगातार लेखन। किताबों में जैसी रुचि इनकी  है,  वह अन्यत्र दुर्लभ ही हो गई है। फिलहाल, बी॰एच॰यू॰ के हिन्दी विभाग में प्राध्यापक।इनसे dr.kumar.raj@gmail.com पर संपर्क संभव।

मुक्तिबोध के बहाने रचना और आलोचना के अंतर्संबंधों की पड़ताल: प्रो.राजकुमार

मुक्तिबोध के बहाने प्रो. राजकुमार एक बहस की धारावाहिकता में गहरे विश्वास के साथ उतरे हैं. इस सीरिज का पहला  और दूसरा लेख  आप पढ़ चुके हैं, तीसरा यहाँ प्रस्तुत है.

दूसरा लेख इस मायने में विशेष रहा कि सोशल साइट्स पर  इससे संदर्भित  विषद  प्रतिक्रियाएं  देखने  को  मिलीं. लेकिन ज्यादातर प्रतिक्रयाएं  अवांतर प्रसंगों  में उलझी  रहीं. और लेख की  मूल  आत्मा से बहस को भटकाने की कोशिश की  गयी. प्रो.राजकुमार  की यह विशेषता  है कि  अवांतर प्रसंगों में उलझने  के बजाय  अपनी  निरंतरता / धारावाहिकता कायम रखते हैं.  उम्मीद  है कि  यह सीरिज लम्बी चलेगी. #तिरछीस्पेल्लिंग 

Muktibodh By Haripal Tyagi

Muktibodh By Haripal Tyagi

आलोचना और रचना

By प्रो.राजकुमार

हिन्दी में आलोचना को परजीवी कहने का चलन रहा है। इधर कुछ ‘सर्जनात्मक‘ किस्म के ‘आलोचकों’ ने आलोचना को परजीवी के कहने के बजाय प्राध्यापकीय कहना शुरू कर दिया है। आलोचना अच्छी या बुरी तो हो सकती है और होती भी है; जैसे रचना अच्छी या बुरी हो सकती है, होती है, लेकिन प्राध्यापकीय आलोचना किस बला का नाम है? ‘जिसे प्राध्यापक लिखे वह प्राध्यापकीय आलोचना’!

रामचन्द्र शुक्ल, हजारी प्रसाद द्विवेदी, रामविलास शर्मा और नामवर सिंह- हिन्दी के चार बड़े आलोचक और चारों के चारों प्राध्यापक! हिन्दी आलोचना के इतिहास की इनके बिना कल्पना ही नहीं की जा सकती। हिन्दी ही नहीं, समूची दुनिया में आलोचना, समाज विज्ञान और विज्ञान के इतिहास की कल्पना विश्वविद्यालय के बिना असंभव है। लेकिन ये सारा ज्ञान-विज्ञान और साहित्य-सिद्धान्त इन सर्जनात्मक आलोचकों की दृष्टि में प्राध्यापकीय होने के कारण त्याज्य है।

हिन्दी में यह धारणा बद्धमूल रही है कि आलोचना दोयम दर्जे का काम है। अस्ल चीज है रचना। रचना मौलिक सृजन है और आलोचना उस पर आश्रित परजीवी, जिसकी हैसियत लाल बुझक्कड़ से अधिक नहीं।

आधुनिक आलोचना की जिस ढब पर शुरुआत हुई, उससे इस धारणा को बल भी मिला। परजीवी की छवि से मुक्ति पाने की छटपटाहट में आलोचक का नया रूप सामने आया जिसे अंग्रेजी में ‘स्कॉलर क्रिटिक’ कहा गया है। स्कॉलर क्रिटिक की छवि अपने यहाँ हजारी प्रसाद द्विवेदी पर बहुत सटीक बैठती है। मध्यकालीन संस्कृति और बौद्धिक परम्परा के गम्भीर अध्येता जिन्होंने आधुनिक रचनात्मकता पर बहुत कम लिखा। स्कॉलर क्रिटिक की परम्परा का विकास आगे चलकर संस्कृति के आलोचक के रूप में हुआ। सांस्कृतिक आलोचक के अध्ययन का दायरा साहित्य तक सीमित नहीं रह गया। वह समूची संस्कृति का आलोचक बन गया। साहित्य संस्कृति का पर्याय नहीं है, संस्कृति का एक हिस्सा है। सांस्कृतिक आलोचना समग्र सांस्कृतिक गतिविधि के परिप्रेक्ष्य में ही संस्कृति के इस साहित्य वाले हिस्से का अध्ययन करती है। सांस्कृतिक आलोचना की सार्थकता का विश्लेषण करते हुए टेरी इगल्टन ने तो साहित्य के विभागों का नाम ही सांस्कृतिक-अध्ययन विभाग रख देने की सलाह दी थी। सांस्कृतिक आलोचना उस दौर की उपज थी, जब सिद्धान्त-निर्माण का बोलबाला था, हर छोटा-बड़ा आलोचक थियरी बनाने में लगा था। थियरी ज्ञान मीमांसा और सत्तामीमांसा के एक अंग के रूप में साहित्य और संस्कृति का अध्ययन करती थी। थियरी की बाढ़ अब उतर चुकी है और साहित्य की सापेक्ष स्वायत्तता और स्वकीयता को नये सिरे से समझने की कोशिश चल पड़ी है, किन्तु इस समूचे घटनाक्रम से यह अभिज्ञान तो हो ही गया कि साहित्य को ज्ञानमीमांसा और सत्तामीमांसा के परिप्रेक्ष्य में ही ठीक से समझा जा सकता है। मुक्तिबोध के शब्दों में कहें तो साहित्य-समीक्षा सभ्यता-समीक्षा भी है। सभ्यता-समीक्षा के दायित्व से सम्पृक्त होकर ही साहित्य-समीक्षा सार्थक हो सकती है। यह कहना ठीक नहीं होगा कि मुक्तिबोध से पहले साहित्य-समीक्षा के इस गुरुतर दायित्व का एहसास हिन्दी में किसी को था ही नहीं। किन्तु मुक्तिबोध को इस बात का श्रेय अवश्य दिया जाना चाहिए कि उन्होनें साहित्य-समीक्षा को सही मायने में सभ्यता-समीक्षा के रूप में विकसित और स्थापित किया। यह काम उन्होंने उस समय किया जब साहित्य में आधुनिकतावाद का बोलबाला था और उसकी स्वायत्तता का बढ़ चढ़कर बखान किया जा रहा था। यह वही समय था जब पुराने ढंग की ‘मार्क्सवादी आलोचना’ साहित्य की स्वायत्तता के तर्क का ठीक-ठीक जवाब नहीं दे पा रही थी। लेकिन मुक्तिबोध के आलोचनात्मक लेखन पर बात आगे बढ़ाने से पहले रचना और आलोचना के सम्बन्ध को लेकर जो चर्चा शुरू हुई थी, उस पर दोबारा लौटें।

उल्लेखनीय है कि सॉस्यूर के भाषा-विषयक चिन्तन से प्रेरित संरचनावाद ने साहित्यिक आलोचना को एक मुकम्मल शास्त्र में तब्दील करने की कोशिश की और इस प्रक्रिया में साहित्य के मूलभूत नियमों को खोज निकालने का दावा किया। आलोचना को परजीवीपन से ऊपर उठाकर विज्ञान के समकक्ष खड़ा कर देने की मुहिम से पहले नॉर्थाप फ्राई अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘एनॉटमी ऑफ़ क्रिटिसिज्म’ में ऐसा उद्यम कर चुके थे। फ्राई के विचार रचना और आलोचना के अंतर्संबंधों को समझने की दृष्टि से महत्वपूर्ण है, इसलिए उनकी संक्षेप में चर्चा अप्रासंगिक न होगी।

यह धारणा, कि रचनाकार ही रचना के साथ ‘न्याय‘ कर सकता है, मानकर चलती है कि आलोचक परजीवी है, जबकि सच्चाई यह है कि आलोचना एक स्वतंत्र विद्या है जो साहित्य का अध्ययन करती है, जैसे विज्ञान वस्तु जगत अध्ययन करता है। आलोचना के अपने नियम कायदे और सिद्धान्त हैं। फ्राई के अनुसार रचनाकर-आलोचक के लिए अपनी रचनात्मक अभिरूचि से ऊपर उठ पाना प्रायः असंभव होता है। छोटे-मोटे लोगों की तो बात ही क्या टी.एस. इलियट जैसे प्रतिभाशाली व्यक्तित्व का भी आलोचनात्मक विवेक काफी कुछ उनकी रचनात्मक अभिरूचि से निर्धारित दिखता है। रचनाकार का अपने और दूसरों के बारे में लेखन दिलचस्प तो हो सकता है लेकिन उसे अन्तिम और आधिकारिक लेखन नहीं कहा जा सकता। अक्सर रचनाकार अपने लेखन के भी ख़राब आलोचक साबित हुए हैं। प्रमाण स्वरूप अनेकों उदाहरण दिये जा सकते हैं। फ्राई के मुताबिक ‘जब रचनाकार आलोचक की तरह बोलने लगता है तब वह आलोचना नहीं, दस्तावेज़ निर्मित करता है। इस दस्तावेज़ का आलोचक द्वारा परीक्षण अपेक्षित होता है। सामान्य रूप से यह माना जाता है कि रचयिता के मुक़ाबले आलोचक रचना के महत्व का बेहतर निर्णायक होता है। यह धारणा चली आ रही है कि आलोचक को रचना का अन्तिम निर्णायक मानना हास्यास्पद है, जबकि व्यवहार में यह स्पष्ट है कि वही (आलोचक) रचना का अन्तिम निर्णायक होता है। इसका कारण निश्चयात्मक (Assertive) लेखन और साहित्यिक लेखन में विभेद न कर पाने की असमर्थता है। वर्णानात्मक-निश्चयात्मक लेखन की उत्पत्ति सक्रिय इच्छा-शक्ति और सचेत मस्तिष्क से होती है और ऐसा लेखन मुख्य रूप से कुछ ‘कहने‘ से ताल्लुक़ रखता है।

जैसा कि पहले कहा गया, फ्राई के बाद संरचनावाद आया। संरचनावाद ने साहित्य के मूलभूत सिद्धान्तों, रूढ़ियों, और परम्पराओं को खोज निकालने का दावा किया। आलोचना शास्त्र बन गई, बल्कि जोनाथन कूलर के शब्दों में कहें तो काव्यशास्त्र, संरचनावादी काव्यशास्त्र। और फिर आया उत्तर संरचनावाद, उसने इस तरह के शास्त्र-सिद्धान्त निर्माण की संभावना को सिरे से खारिज कर दिया, लेखन की परम्परागत कसौटियों और श्रेणी विभाजन को तोड़ दिया, और विधाओं की मर्यादा और स्वायत्तता को मानने से इन्कार कर दिया। साहित्य की साहित्यकता का बखान जिन गुणों के आधार पर किया जाता था, वे सभी गुण, विश्लेषण करने पर पता चला, गैर साहित्यिक लेखन में भी मौजूद हैं। निष्कर्ष यह निकला कि साहित्यिक लेखन में ऐसा कोई आभ्यन्तिरक गुण नहीं जो गैर साहित्यिक लेखन में मौजूद न हो। दोनों में फर्क सिर्फ प्रकार्य (Function) और रूढ़ि से पैदा होता है। तात्विक और आधारभूत भिन्नता वस्तुतः सांस्कृतिक निर्मिती है और उसे विखण्डित करने की ज़रूरत है। फिर क्या था स्त्री-पुरूष (प्रकृति-संस्कृति) की तरह रचना और आलोचना की द्विआधारी अवधारणा को भी खण्डित करने की आवश्यकता महसूस हुई। इहाब हसन ने अपनी पुस्तक ‘पैराक्रिट्सिज्म’ में इस जरूरत को पूरा कर दिया। हसन ने दिखाया कि रचना और आलोचना में कोई तात्विक और आधारभूत अन्तर नहीं है। जो अन्तर है वह सांस्कृतिक निर्मित है और उसे तोड़ देने में ही दोनों का भला है।

‘आलोचना भी रचना है कहने में रचना की श्रेष्ठता कायम रहती है, जैसे झाँसी की रानी को मर्दानी कहने में मर्द की श्रेष्ठता कायम रहती है। उत्तर संरचनावाद में श्रेष्ठता के इस तात्विक और बुनियादी आधार को विखण्डित कर अस्मिता और विधा की स्वायत्तता को ही समस्याग्रस्त बना देता है। यहाँ भिन्नता का महत्व है लेकिन यह भिन्नता तात्विक और बुनियादी किस्म की नहीं है। इस भिन्नता के आधार पर किसी को हीन या श्रेष्ठ नहीं ठहराया जा सकता है।

अब न तो व्यक्ति की स्वायत्तता का कोई पैरोकार बचा है और न ही कला और साहित्य का। ये सभी पाठ (Text) हैं और ये पाठ परस्पर सम्बद्ध (Intertextual) हैं। परस्पर सम्बद्धता का मतलब है कि कोई भी पाठ पूर्णतः मौलिक नहीं है, दूसरे पाठ से जुड़ा हुआ उस पर निर्भर है। इसका निहितार्थ यह भी है कि सभी पाठ बराबर हैं। लब्बोलुआब यह कि रचना और आलोचना के बीच खड़ी दीवार ढह चुकी है। रचना आलोचनात्मक हो गई है और आलोचना रचनात्मक।

यह एहसास भले ही नया हो किन्तु सच्चाई यही है कि श्रेष्ठ आलोचना और रचना में ऐसा आत्यान्तिक भेद कभी था ही नहीं। मुक्तिबोध एक ऐसे लेखक हैं जिनका लेखन रचना और आलोचना के बीच की पारस्परिक सीमाबद्धता को लगातार समस्याग्रस्त बनाता है। उनकी कविताएँ, कहानियाँ और लेख विधाओं के पारम्परिक चौखटे में फिट नहीं बैठते। कविता में वे थीसिस लिखते हैं और उनके लेखों में ऐसे टुकड़े ख़ूब मिल जायेंगे जिन्हे मज़े से कविता में खपाया जा सकता हैं। उनकी कहानियाँ ऐसी हैं जिनमें रेखाचित्र, लोक-नीति-कथा और निबन्ध के गुण घुले-मिले हैं। ‘एक साहित्यिक की डायरी’ को क्या कहेंगे? रचना या आलोचना? मुक्तिबोध पारम्परिक किस्म के आलोचक नहीं हैं। वस्तुतः आलोचना उनके सम्पूर्ण लेखन का अभिन्न हिस्सा है, कोई आपदधर्म नहीं। कुछ लोग सोचते हैं कि अपने विरोधियों और साहित्य के दरोगा अर्थात् आलोचकों को जवाब देने के लिए उन्होंने आलोचना को आपद् धर्म के रूप में चुना। इस बात में आंशिक सच्चाई हो सकती है किन्तु उन्हें ध्यान से पढे़ं तो यह बात समझ में आ जाती है कि उनका लगभग समूचा लेखन ही बहस मुबाहिसे से बना है। यह बहस विरोधियों से ही नहीं होती, विरोधियों से भी ज्यादा स्वयं से होती है। इसलिए आलोचना उनके लेखन का आपदधर्म नहीं स्वधर्म है। उनका रचनात्मक लेखन भी एक प्रकार की आलोचना है, सभ्यता-समीक्षा है। कविता में थीसिस लिखने की उनकी प्रतिश्रुति का मतलब हैः कविता में सभ्यता-समीक्षा लिखना।

इसलिए मेरा खयाल है कि मुक्तिबोध के आलोचनात्मक लेखन की चर्चा करते समय हमें सिर्फ उनके ‘आलोचनात्मक लेखन’ पर ध्यान नहीं देना चाहिए क्योंकि उनके ‘आलोचनात्मक चिन्तन’ के कई मोती उनकी रचनाओं में डूबे हुए हैं। मैं उनके आलोचनात्मक चिन्तन के कुछ ऐसे ही पक्षों का यहाँ उल्लेख करना चाहूँगा। मैं जानता हूँ कि यह काम आसान नहीं है फिर भी कुछेक प्रसंग आपके समक्ष रखता हूँ।

अक्सर कहा जाता है कि रचना का मर्म तो रचनाकार ही जानता है। इसलिए यदि रचना का ‘असली’ अर्थ जानना है तो रचनाकार से पूछो। आलोचक तो बाहरी व्यक्ति है वह रचना के साथ न्याय नहीं कर सकता। यह बात भी सिद्ध हो चुकी है कि लेखक अपनी रचना (कहानी, कविता, उपन्यास, आलोचना…) का अन्तिम और अधिकारिक व्याख्याकार नहीं हो सकता। क्योंकि, रचना केवल वही नहीं कहती जो लेखक कहलाना चाहता है, बहुत कुछ ऐसा भी कहती है जो वह नहीं कहलाना चाहता। यही नहीं, रचना का अर्थ पाठक और संदर्भ बदलने के साथ बदल जाता है। वस्तुतः रचना जन्म लेने के बाद रचनाकार से स्वतंत्र हो जाती है और सामाजिक जीवन का हिस्सा बन जाती है। सामाजिक जीवन को प्रभावित करती है और सामाजिक जीवन से प्रभावित होती है। कालजयी रचनाओं की जीवन-यात्रा लम्बी होती है। मामूली रचनाएं अपने रचयिता से विलग होने के बाद शीघ्र ही कालकवलित हो जाती हैं क्योंकि उनमें बदलते हुए संदर्भ में पुनर्नवता की संभावना नहीं होती। जिसे अपनी सामर्थ्य पर भरोसा नहीं होता वह रचना को सीने से चिपकाए ‘असली’ अर्थ न समझ पाने के लिए पाठकों-आलोचकों को कोसता रहता है। आलोचना को प्राध्यापकीय कहकर गरियाने वाले ज्यादातर स्वनामधन्य रचनाकार इसी कोटि में आते हैं। मुक्तिबोध को अपनी रचनात्मक सामर्थ्य पर भरोसा था। इसीलिए वे मानते हैं कि कविता पूर्ण हो जाने के बाद कवि से स्वतंत्र जीवन जीने लगती हैः

नहीं होती, कहीं भी ख़त्म कविता नही होती

कि वह आवेग त्वरित काल यात्री है।

व मैं उसका नहीं कर्ता,

पिता-धाता

कि वह कभी दुहिता नहीं होती,

परम स्वाधीन है वह विश्वशास्त्री है।

गहन-गम्भीर छाया आगमिष्यत् की

लिए, वह जनचरित्री है।

नये अनुभव व संवेदन

नये अध्याय-प्रकरण जुड़

तुम्हारे कारणों से जगमगाती है

व मेरे कारणों से सकुच जाती है।

कहने की आवश्यकता नहीं कि कविता (रचना) रचयिता से मुक्त होकर अपना भावी जीवन प्रारम्भ करती है और फिर उसमें नये अनुभव एवं संवेदन जुड़ते चले जाते हैं। जिस रचना में ऐसी सामर्थ्य होती है वही कालजयी कहलाती है; बाकी रचनाएं रचनाकार के साथ ही कालकवलित हो जाती है।

रचना जन्म के बाद रचनाकार से स्वाधीन हो जाती है, यह बात समझाने के लिए शायद ज़्यादा मशक्कत की जरूरत नही; लेकिन इसी से जुड़ा हुआ सवाल है, रचनाकार और रचना के सम्बन्ध का। यह सवाल ज़्यादा उलझा हुआ है और इसका संतोषजनक समाधान खोज निकालना आसान नहीं। उल्लेखनीय है कि मुक्तिबोध के समय में भी इस सवाल पर बहस हुई थी। अज्ञेय ने इलियट के वज़न पर भोक्तामन और सृष्टा-मन तथा जीवनाभूति और सौंदर्यानुभूति में विभेद किया था। मुक्तिबोध ने इस अवधारणा का ज़ोरदार खण्डन करते हुए भोक्ता-मन एवं स्रष्टा-मन के ऐक्य पर ज़ोर दिया था। ऐक्य का विशद विश्लेषण करते हुए उन्होंने सौन्दर्यानुभूति को जीवनानुभूति से गुणात्मक रूप से भिन्न माना। इस बात का निहितार्थ यह है कि रचना को जीवन का ‘बाइप्रोडक्ट’ नहीं कहा जा सकता। रचना और रचनाकार के बीच कोई प्रत्यक्ष, पारदर्शी और निष्क्रिय सम्बन्ध नहीं होता। रचना प्रक्रिया के मुक्तिबोध द्वारा किये गये विश्लेषण से इस बात की पुष्टि होती है। वस्तुतः रचना एक सचेत कर्म है और रचना के दौरान रचनाकार अपनी सोच के मुताबिक अनुभव को काटने-छाँटने एवं सम्पादित करने के लिए ‘स्वतंत्र’ होता है। किंतु यह स्वतंत्रता भी सापेक्षिक ही है। क्योंकि रचनाकार की स्वतंत्रता को सामाजिक स्थिति, अवचेतन, जड़ीभूत सौंदर्याभिरूचि जैसे कई कारण जाने-अनजाने प्रभावित करते हैं। फिलहाल इस तफ़सील में न जाकर सिर्फ़ भाषा चरित्र के बारे में बात करते हैं। औसत समझ के विपरीत भाषा आइने की तरह कोई पारदर्शी और निष्क्रिय माध्यम नहीं है जिसके आर-पार देखा जा सके। भाषा एक स्वायत्त संकेतप्रणाली है, जिसके अपने नियम-कायदे हैं। जीवन-जगत् का बोध भाषा में ही संभव होता है। इसका मतलब यह है कि भाषा सिर्फ़ साधन नही है, उसके बिना बाहर जीवन-जगत् का बोध संभव ही नही। जीवन-जगत् का बोध भाषा के रास्ते से गुज़रता है। और चूँकि भाषा दर्पण की तरह कोई निष्क्रिय पारदर्शी माध्यम नही है, भाषा अपना खेल दिखाती है। फ़ैज के शब्दों में कहें तो ‘बात बदल-बदल जाती है।’ कहना चाहते हैं कुछ और कह जाते हैं कुछ और।

भाषा का यह खेल जीवन-जगत् के बोध के समय ही नहीं, रचना-प्रक्रिया के दौरान भी चलता रहता है। यही नहीं जब रचना पूर्ण हो जाने पर पाठक से रूबरू होती है तब भी भाषा का यह खेल जारी रहता है। यही कारण है कि अलग-अलग देशकाल के पाठक/आलोचक एक ही रचना का अर्थ अलग-अलग ढंग से करते हैं। यदि ऊपर कही गयी बातें सही हैं तो फिर यह मानना पड़ेगा कि रचना रचनाकार के जीवन की प्रत्यक्ष और पारदर्शी अभिव्यक्ति नहीं है। मुक्तिबोध के शब्दों में सौन्दर्यानुभूति जीवनानुभूमति से गुणात्मक रूप से भिन्न चीज है; पूर्णतया पृथक न सही, किन्तु प्रतिरूप भी नहीं। सौन्दर्यानुभूति को जीवनानुभूति से गुणात्मक रूप से भिन्न बताने के बाद मुक्तिबोध को लगा कि कई दफा रचनाकार सिर्फ स्वाँग भरता है, वास्तव में वैसी अनुभूति उसके जीवन में होती नहीं। जैसे अभिनेता पात्रों का अभिनय करता है वैसे वह सिर्फ अभिनय कर रहा होता है। नयी कविता में ऐसा स्वाँग खूब दिखायी पड़ता है। मुक्तिबोध ने लिखा है कि महादेवी वर्मा की कविताओं में दुख की भरमार है लेकिन महादेवी ने स्वयं स्वीकार किया है कि उनका जीवन वैसा दुखमय नहीं था जैसा कि उनकी कविताएं पढ़ने पर प्रतीत होता है।

उल्लेखनीय है कि रोलां बार्थ भी लेखन को स्वांग ही मानते हैं, भले ही इस शब्द का इस्तेमाल न करते हों। उन्होंने ब्रेख्त के नाट्य-सिद्धान्त का उल्लेख करते हुए लिखा है कि जैसे ब्रेख्त के यहाँ अभिनेता, जिस पात्र का अभिनय करता है, उससे तादात्म्य स्थापित नहीं करता, वैसे ही ब्रेख्तियन अंदाज में अपने बारे में बोलता हूँ। यहाँ बोलने (लिखने वाले) ‘मैं’ और वास्तविक ‘मैं’ में दूरी बनी रहती है; ‘उसे जीने के बजाय दिखाता हूँ।’ लेखन इमेज सिस्टम का प्रदर्शन है। अपने काल्पनिक आत्म से दूरी बनाए रखते हुए और साथ ही अन्य के परिपे्रक्ष्य से उसका निरीक्षण करते हुए उसकी विभिन्न भूमिकाओं का डिमान्स्ट्रेशन या रिहर्सल है। जरूरत के मुताबिक लगाया गया मुखौटा है। जाहिर है कि मुक्तिबोध लेखन को स्वांग मानने के हिमायती नहीं, बल्कि लेखन और जीवन में एकता के पक्षधर थे। फिर भी वे किसी स्थायी, स्वायत्त, आत्मपूर्ण और सुसमन्वित व्यक्ति-अस्मिता की अवधारणा को भी स्वीकार नहीं करते। जबकि अज्ञेय ‘नदी का द्वीप’ में इसके ठीक विपरीत, एक स्वायत्त, आत्मपूर्ण एवं स्थायी व्यक्ति-अस्मिता की अवधारणा पेश करते हैं। उत्तर आधुनिक सिद्धान्तकार व्यक्ति-अस्मिता की ऐसी अवधारणा को तो मिथ या फिक्शन मानते ही हैं, फ्रेडरिक जेम्सन जैसा वामपंथी विचारक भी उनकी इस बात के लिए तारीफ़ करता है कि उन्होंने आत्म-पूर्ण समन्वित आत्म की अवधारणा को छिन्न-भिन्न कर दिया। मुक्तिबोध के यहाँ आत्म की अस्मिता स्वयं-सम्पूर्ण और स्थिर नहीं है, बल्कि बाहरी दबाव और भीतरी (परस्पर विरोधी) आग्रहों से लगातार संशय-ग्रस्त, अनिर्णीत, विरोधाभासी और परिवर्तनशील है। परम अभियक्ति या अरूण कमल की तलाश तो निरन्तर है, लेकिन झूठे समन्वय या शिलीभूत सामंजस्य के मर्म को भी वे बख़ूबी समझते हैं। मुक्तिबोध की कविता लगातार यह दिखाती है कि व्यक्ति की अस्मिता ‘नदी के द्वीप’ की तरह स्थिर नहीं होती। जैसे विचारधारा के भीतर से एक प्रच्छन्न विचारधारा झाँकती दिखाई पड़ती है, वैसे ही एक व्यक्ति के भीतर एक और व्यक्ति की मौजूदगी का एहसास होता रहता है। इन दोनों के बीच अनवरत संवाद चलता रहता है। यह संवाद अस्मिता के किसी स्वायत्त-आत्मपूर्ण (नदी का द्वीप जैसी) अवधारणा को नकारता है। मुक्तिबोध के यहाँ अस्मिता की अवधारणा जिस रूप में आती है, कई मायनों में वह जूलिया क्रिस्तेवा की ‘threshold’ की अवधारणा से मिलती जुलती है। उल्लेखनीय है कि क्रिस्तेवा के यहाँ चेतन और अवचेतन के बीच चौहद्दी लगातार बदलती रहती है, क्योंकि इनके बीच निरन्तर संवाद चलता रहता है। अस्मिता का कोई भी रूप अन्तिम और पूर्ण नहीं होता। पूर्णता स्वप्न में तो संभव है लेकिन यथार्थ में नहीं, मुक्तिबोध यह समझते थे।

यदि अस्मिता का कोई भी रूप पूर्ण और अन्तिम नहीं है तो उसमें सकारात्मक और नकारात्मक परिवर्तन भी संभव हैं। यही कारण है कि कल तक आग उगलने वाले मृत ज्वालामुखी बन जाते हैं और रावण के घर पानी भरने लगते हैं। कोई ज़रूरी नहीं कि रचनाकार अपने इस रूप को रचना में प्रस्तुत करे ही। अनुभव, संवेदना और कल्पना का सहारा लेकर वह स्वांग भी भर सकता है। मार्सेल प्रूस्त ने लिखा है कि पुस्तक में सामने आने वाला व्यक्तित्व और सामाजिक जीवन में दिखाई पड़ने वाला व्यक्तित्व अलग-अलग होते हैं। इलियट के कथन से हम वाकिफ़ ही हैं, उसे दोहराने की ज़रूरत नहीं। अब जबकि आत्मकथा को भी लेखक के जीवन की सीधी पुनर्प्रस्तुति मानने के बजाय लेखक के जीवन का सृजित गल्प माना जा रहा है, रचना को लेखक के जीवन का पर्याय मानने का कोई तुक नहीं। यह ठीक है कि कुछ रचनाकारों के जीवन और रचना में पर्याप्त समानता दिख सकती है, किंतु सर्वत्र ऐसा हो, यह ज़रूरी नहीं। लेखन एक विशिष्ट लीला कर्म हैं, रचनाकार के सम्पूर्ण व्यक्तिगत सामाजिक जीवन का लेखा-जोखा नहीं। लेखन और रचनाकार के जीवन में संगति की अपेक्षा एक आदर्श के रूप में ठीक है, लेकिन अक्सर ऐसी संगति होती नहीं है। आलोक धन्वा या वी.एस. नयपाल अपवाद नहीं है; बात सिर्फ़ यह है कि उनके जीवन की कुछ बातें सामने आ गयीं, और हम छाती पीटने लगे। चोरी तो ज़्यादातर लोग करते हैं लेकिन चोर वही कहलाता है जो चोरी करते पकड़ा जाय और जिसे सज़ा मिले। इसलिए बेहतर यही होगा कि रचनाकार की रचना और जीवन दोनों को देखा जाय। लेकिन मुसीबत यह है कि रचनाकार का जीवन, विशेष रूप से व्यक्तिगत जीवन, पाठक की पहुँच से बाहर है। वह तो उतना ही देख सकता है जितना दिखाने के लिए लेखक तैयार हो। वैसे इस मामले में वी.एस.नयपाल की दाद देनी पड़ेगी। उन्होंने माना है कि लेखक के जीवन की पड़ताल करने की चाहत बिल्कुल वैध है। उन्होंने कहा है कि लेखक के जीवन का व्योरा अन्ततः लेखक की पुस्तक से बेहतर साहित्यिक कृति साबित हो सकता और अपने समय के सांस्कृतिक ऐतिहासिक पक्ष को ज्यादा गहराई से आलोकित कर सकता है। इसलिए यदि मुक्तिबोध दिमागी गुहांधकार में झाँकने की कोशिश करते थे और बाह्य संघर्ष के साथ-साथ आत्म संघर्ष पर इतना जोर देते थे, तो क्या ग़लत करते थे, अब तक के अनुभव ने हमें यही सिखाया है कि मानव-मस्तिष्क बहुत जटिल है और तर्क-विवेक को अक्सर चकमा दे जाता है। वह सामाजिक-आर्थिक स्थितियों से निरपेक्ष नही है, लेकिन उसे सामाजिक-आर्थिक स्थितियों में निःशेष (Reduce) भी नहीं किया जा सकता।

देखिये बात कहाँ से कहाँ पहुँच गई। क्या लिखने चला था और क्या लिख गया! अभी तो लगता है कि सिर्फ़ भूमिका ही बनी है। जो बातें लिखना चाहता था वे तो रह ही गईं।

राजकुमार जी

प्रो॰राजकुमार

शोर-शराबे से दूर अध्ययन-अध्यापन में मग्न रहने  वाले युवा-तुर्क हिन्दी आलोचक। भक्ति साहित्य, हिन्दी नवजागरण, आधुनिकता, आधुनिक साहित्य, प्रेमचंद, हिन्दी कहानी इत्यादि पर लगातार लेखन। किताबों में जैसी रुचि इनकी  है,  वह अन्यत्र दुर्लभ ही हो गई है। फिलहाल, बी॰एच॰यू॰ के हिन्दी विभाग में प्राध्यापक।इनसे dr.kumar.raj@gmail.com पर संपर्क संभव।

 

मुक्तिबोध के बहाने ‘परंपरा के आहत नैरन्तर्य’ पर एक बहस: प्रो.राजकुमार

मुक्तिबोध के बहाने प्रो. राजकुमार एक बहस की धारावाहिकता में गहरे विश्वास के साथ उतरे हैं. इस सीरिज का पहला लेख आप पढ़ चुके हैं.

मुख्य शीर्षक में ‘परंपरा का आहत नैरन्तर्य’ पद हिंदी के विद्वान आलोचक सुरेन्द्र चौधरी के यहां से लिया गया है. अभी तक सुरेन्द्र चौधरी हिंदी के अंतिम आलोचक रहे हैं जिन्होंने परम्परा की निरंतरता में उत्पन्न हुए व्यवधान को व्यापक फलक पर विवेचित करने के प्रयास किए हैं. और, यह भी कम आश्चर्य की बात नहीं कि टूट की दोनों शिराओं के मध्य मुक्तिबोध को स्थित करने के प्रयास किए हैं. सुरेन्द्र चौधरी के बाद प्रो. राजकुमार के यहां वही चिंता फिर से सामने आती है. राजकुमार जी हिंदी के एकाध समकालीन आलोचकों में हैं जिनके यहां विमर्श की एक नितांत सुदृढ़ और स्पष्ट भाषा है. प्रो. राजकुमार साहित्य के ककहरा सिखाने वाले संदर्भों को छोड़ते चलते हैं और उथले उद्धरणों, भूमिकाओं से लदी-फदी फूहड़ आलोचना के बरअक्स सभ्यता, परंपरा, संस्कृति के व्यापक वितान की आलोचना-धरा पर नज़र आते हैं. स्याही इसी विश्वास से पन्ने पर झरती है कि लम्बी बहस की तैयारी है. यह विश्वास बहुत दिन बाद समकालीन हिंदी आलोचना में किसी के पास दिखा है. यह विश्वास रामविलास शर्मा के बाद सिर्फ सुरेन्द्र चौधरी के पास ही अभी तक सुरक्षित था. सुरेन्द्र चौधरी के दो उद्धरणों के साथ, प्रो. राजकुमार की इस बहस से खुद को साझा कीजिये, और उम्मीद है कि यह बहस यहां नहीं, तो कहीं भी लम्बी चलनी चाहिए. #तिरछीस्पेलिंग

…रचना और वातावरण की संगति ही केवल आहत होती हुई नहीं मालूम पड़ती, रचनात्मक परिस्थिति का नैरन्तर्य भी टूटता हुआ मालूम पड़ता है. …इस आहत नैरन्तर्य को, ‘discontinues को पहचाना मुक्तिबोध ने. अपनी रचनात्मक संवेदना में इसे मूर्त करते हुए उन्होंने ‘विपात्र’ और ‘क्लाड इथर्ली’ जैसी रचनायें लिखीं. #सुरेन्द्र चौधरी, 1971

पश्चिमी साहित्य में रूपक का उपयोग ऐतिहासिक समय का नाश करने और उसे ‘समय के रूपक’ से बदलने के लिए किया गया है. इसके विपरीत मुक्तिबोध ने रूपक की दूर-दृष्टि का, अन्यापदेश की दृष्टि का उपयोग  ऐतिहासिक  समय की जटिलता को मूर्त करने के लिए किया. # सुरेन्द्र चौधरी, 1980

Muktibodh By Haripal Tyagi

Muktibodh By Haripal Tyagi

जिसके आगे राह नहीं

By प्रो.राजकुमार 

जड़ीभूत सौन्दर्याभिरुचि की बात मुझे समकालीन कविता ही नहीं, समकालीन साहित्य और समकालीन सामाजिक विमर्शों पर नये सिरे से सोचने और विचारने के लिए प्रेरित करती हैं। मुझे जहाँ तक ध्यान आता है, मुक्तिबोध ने जड़ीभूत सौन्दर्याभिरुचि की बात की है। सभी जानते हैं कि मुक्तिबोध का संघर्ष, जिसको वे प्रायः आत्मसंघर्ष ही कहना पसन्द करते थे, दो तरफा था। जिसको हम यथार्थवादी-प्रगतिशील-मार्क्सवादी धारा कहते हैं, उससे मुक्तिबोध असंतुष्ट थे। उन्होंने अपने लेखन में बार-बार इसका उल्लेख किया है लेकिन साथ ही साथ, मुक्तिबोध का संघर्ष उस दूसरी परम्परा से भी था जिसके वाहक के रूप में हम लोग हिन्दी में, और किसी का नाम न भी लें, तो अज्ञेय का नाम लेते हैं। संक्षेप में, मुक्तिबोध आधुनिकतावादी साहित्यिक धारा या चिन्तन-परम्परा से भी संतुष्ट नहीं थे। सोचने वाली बात ये है, कि अगर मुक्तिबोध यथार्थवादी धारा और आधुनिकतावादी धारा दोनों से असंतुष्ट थे तो आखिर वो कर क्या रहे थे। मैं यह बात जोर देकर कहना चाहता हूँ कि मुक्तिबोध ने अपने वैचारिक लेखन में भले ही स्पष्ट रूप से यह बात न लिखी हो, लेकिन अपने रचनात्मक लेखन में, मेरा संकेत उनकी कहानियों और कविताओं की ओर है, वे एक तीसरी धारा निकालने की कोशिश करते हैं। इसे सुविधा की दृष्टि से मैं भारतीय परम्परा या सभ्यता की धारा कहना पसंद करूंगा।

यह दिलचस्प है कि भारतीयता की बात, भारतीय परम्परा की बात उस जमाने में वे लोग करते थे जिनको हम आधुनिकतावादी-प्रयोगवादी या नयी कवितावादी आलोचक/रचनाकार कहते हैं। ऐसे रचनाकारों में अज्ञेय का नाम तो आता ही है, बाद में निर्मल वर्मा का नाम भी जुड़ जाता है। आप याद करें, उस दौर में भारत की बात करना, भारतीय सभ्यता की बात करना, भारतीय परम्परा की बात करना एक अपराध जैसा था। बहुत आसानी से ऐसी बातें करने वाले को अतीतजीवी या साम्प्रदायिक घोषित कर दिया जाता था। उस दौर में मुक्तिबोध ने अपनी रचनाओं में भारतीय परम्परा को नये सिरे से पुर्ननवता देने की कोशिश की। इसीलिए मुझे लगता है कि मुक्तिबोध की चिन्ता यह थी कि साहित्य और कला की भारतीय परम्परा को आगे बढ़ाया जाय और उसमें हमारे औपनिवेशिक इतिहास की वजह से जो व्यवधान आया है, जो व्यतिक्रम आया है, जो टूटन पैदा हुई है, उसकी यथासंभव भरपाई की जाय। उस दौर में ऐसी कोशिश सम्भवतः सिर्फ मुक्तिबोध कर रहे थे। ये अजीब विडम्बना है कि भारतीयता की बात अज्ञेय ने बहुत की है, उसके बाद निर्मल वर्मा ने भी की है, लेकिन रचनात्मक स्तर पर न तो इनकी कहानियों में और न ही उपन्यासों में, भारतीय साहित्य-परम्परा से जुड़ने का गम्भीर प्रयास दिखाई पड़ता है। वैचारिक स्तर पर जरूर ये उसकी चर्चा करते हैं। वैसे ये भी अपने आप में छोटी बात नहीं है। लेकिन रचनात्मक स्तर पर अगर देखें तो सम्भवतःमुक्तिबोध उस दौर में अकेले हैं जो इन दोनों छोरों से जूझते हुए साहित्य और कला की भारतीय परम्परा से अपना सम्बन्ध जोड़ते हैं, और उसी के अनुरूप अपनी रचनात्मकता का विकास करते हैं। अस्सी के दशक में लैटिन अमेरिकन लेखकों के प्रभाव-विस्तार के साथ, और फिर ग्रैबियल गार्सिया मार्केज के उपन्यास को नोबल प्राइज मिलने के बाद इस प्रकार की रचनात्मकता की विस्तार से चर्चा होने लगी और नाम दिया गया कि ये जादुई यथार्थवाद है। मैं मुक्तिबोध के लेखन के संदर्भ में उस जादुई यथार्थवाद को लागू करने का कोई प्रस्ताव नहीं कर रहा हँू। लेकिन ये जरूर कहना चाहता हँू कि मुक्तिबोध ने, पूरे तौर से न सही, फिर भी साहित्य और कला की एक भारतीय दृष्टि विकसित करने का उस दौर में प्रयास किया था, जब दुनिया में जादुई यथार्थवाद जैसी कोई चीज नहीं थी।

आज के संदर्भ में जब हम जड़ रुचियों के दायरे और आज के साहित्य की बात करते हैं तो मुझे हैरत होती है कि बात सिर्फ जड़ अभिरुचियों तक क्यों सीमित रह जाती है। कविताओं का जो समकालीन स्वरूप है, उसके बारे में विचार करने के लिए हम क्यों तैयार नहीं होते। क्या आप ये मान कर चल रहे हैं कि रूचियाँ विकसित हो जायेंगी तो कविता का आयतन अपने आप विस्तृत हो जाएगा। कविता या साहित्य क्या आज की रुचियों का बाई प्रोडक्ट है? रुचियाँ ही सबकुछ हैं और कविता तो उसको भरने वाला झोला है! अगर साहित्य और कलाओं कि यही समझ है, तो मुझे लगता है कि यह गम्भीर चिन्ता का विषय है। साहित्य और कला के रूप ऐसे नहीं चलते हैं और न विकसित होते हैं। दुनिया में कहीं भी आप देख लीजिए साहित्य और कलाओं का रूप झोले की तरह नहीं है। साहित्य और कलाओं के रूप अलग-अलग सभ्यताएँ लम्बे समय में अर्जित, विकसित और समृद्ध करती हैं। एक तरह से साहित्य और कला के रूप शार्टहैण्ड या संस्कृतियों के मेमोरी बैंक के रूप में काम करते हैं। और इसीलिए न तो उनको इतनी आसानी से छोड़ा जा सकता है और न किसी दूसरी सभ्यता के साहित्य और कला-रूप को टेक्नोलाॅजी की तरह आयात किया जा सकता है। साहित्य और कलाओं का आदान-प्रदान टेक्नोलाॅजी और अर्थव्यवस्थाओं के आदान-प्रदान जैसा नहीं है। क्या हम इसके बारे में विचार करने के लिए तैयार हैं?

हमारे यहाँ साहित्य और कला के रूपों का जिस प्रकार से विकास हुआ, उस पर भी नये सिरे से विचार करने की जरूरत है। क्योंकि साहित्य और कलाएँ और इनके विकसित होने वाले रूप सिर्फ रूप नहीं होते हैं, वो कहीं न कहीं बहुत गहरे स्तर पर अपनी सभ्यता की बहुत बुनियादी स्मृतियों को भी संजोते और सरंक्षित करते हैं। इसी वजह से जब हम इन रूपों में रचना करते हैं तो बृहत्तर समाज के साथ तादात्म्य और सम्बन्ध आसानी से स्थापित हो जाता है। क्या हम यह मानना चाहेंगे कि आज के दौर में साहित्य की बहुत सारी विधाएँ और विशेष रूप से कविता, एक गहरे संकट के दौर से गुजर रही हैं। क्या ये सच नही है कि हिन्दी जगत से एक ईंट उठाते ही चार-पाँच उदीयमान कवि बिलबिलाते हुए निकल आतेे हैं! कवियों की भरमार है और आप ये न सोचें कि मैं उनके महत्व को नहीं समझ रहा। मैं इन कवियों के महत्व को स्वीकार करने वालों में सबसे आगे हूँ लेकिन मेरा प्रश्न ये है कि जिस रूप में आज कविता लिखी जा रही है, उसका इतिहास-भूगोल क्या है? वो कितने लोगों तक पहुँचती है? अगर मैं आपको चिढ़ाने के अंदाज में कहूँ  कि हिन्दी कविता के पाठक कम और कवि ज्यादा हैं, हो सकता है, आप आपत्ति करें। लेकिन शायद इसमें सच्चाई है। हिन्दी कविता की किताबें कितनी बिकती हैं? इस पर भी विचार करना चाहिये। हिन्दी के कितने प्रकाशक हिन्दी कविता की पुस्तकें छापने के लिए तैयार हैं और अगर नहीं तैयार हैं, तो क्या कारण हैं। वैसे तो ये बात सारे अनुशासनों पर लागू होती है, लेकिन हमारा सम्बन्ध मुख्य रूप से साहित्य से है, कविता से है; इसलिए हम इसी की चर्चा करेंगे। खासतौर से 19वींशताब्दी  के  बाद,  बीसवीं  शताब्दी  और इक्कीसवीं  शताब्दी  में  हिन्दी  कविता  का  जिसरूप में विकास हुआ, क्या उस पर हम नये सिरे से विचार करना चाहते हैं? या आजभी हम इतने आत्ममुग्ध हैं कि जैसे सब कुछ ठीक-ठाक है, कोई समस्या नहीं है, औरजो  समस्या  की  बात  करता  है,  करता रहे,  उसकी  बात  पर  ध्यान  नहीं  देना  चाहिए।आप याद कीजिए कि रामचन्द्र शुक्ल ने ठाकुर जगमोहन सिंह के उपन्यास के सम्बन्धमें लिखा था कि ये अंग्रेजी ढंग का नाॅवेल नहीं है। मुझे ये चीज बड़ी महत्वपूर्ण लगतीहै  और  इस  पर  मैं लम्बी बहस के  लिए तैयार  हूँ कवियों  से  या  किसी  से  भी।

उन्नीसवीं शताब्दी के अन्तिम दशकों के उपरान्त, भारतेन्दु के बाद, हिन्दी में जितनी भी साहित्यिक विधाएँ हैं, उनका विकास अंग्रेजी ढंग पर ही हुआ है। ये बात सिर्फ उपन्यास पर लागू होती हो, ऐसा नहीं है। कविता से लेकर कहानी, निबन्ध सभी पर ये बात लागू होती है। ये अकारण नहीं है। उसका एक अपना संदर्भ है। आप जानते हैं कि आधुनिक हिन्दी साहित्य के रचयिता, श्रोता और पाठक ज्यादातर ऐसे लोग रहे हैं, जिनका अंग्रेजों द्वारा स्थापित विश्वविद्यालयों से सम्बन्ध रहा है। या तो वे विश्वविद्यालय में रहे हैं या उन्होंने विश्वविद्यालय से शिक्षा प्राप्त की है। अंग्रेजों द्वारा स्थापित विश्वविद्यालयों में जिस ढंग के साहित्य को माॅडल के रूप में पेश किया गया और जिसके वजन पर हमारे यहाँ बाद में साहित्य लिखा गया, वो थोड़े बहुत हेर-फेर, बदलाव, के बावजूद अंग्रेजी ढंग का साहित्य है। रंगरोगन भले ही भारतीय लगे। क्या इक्कीसवीं शताब्दी के दूसरे दशक में अंग्रेजी ढंग के इस साहित्य पर हमें नये सिरे से विचार नहीं करना चाहिये? जनता के नाम पर या मजदूर-किसान के नाम पर कविता लिखी जा रही है। आप जानते हैं कि वह कहाँ पहुंच रही है और कौन उसको समझ रहा है, उसका दायरा कितना है! मैं इसलिए यह कह रहा हूँ  कि अगर उससे पहले के साहित्यिक परिदृश्य पर आप विचार करें, कविता के इतिहास पर विचार करें तो बड़ा अलग परिदृश्य दिखाई देगा। कविता का अपने यहाँ संगीत से बहुत गहरा सम्बन्ध रहा है। संगीत से ही नहीं, उसका सम्बन्ध नृत्य और नाट्य से भी रहा है। कविता केवल पढ़ने की चीज अपने यहाँ नहीं थी। किन्तु अगर ‘आधुनिक’ हिन्दी कविता पर ध्यान दें तो नई कविता तक आते-आते आप छन्द भी छोड़ देते हैं। अगर ये अंग्रेजी ढंग की कविता नहीं है, तो क्या है? फ्री वर्स अगर पश्चिम में लिखा गया है तो आप भी फ्री वर्स में लिख रहे हैं।

कविता का पूरा का पूरा जो फार्म है, वो अपनी काव्य परम्परा से कुछ भी नहीं लेता है, जो लेता है, वो बहुत ही नगण्य है, वो सिर्फ एक तरह की औपचारिकता है।. दूसरा तरीका ये हो सकता था कि आप भारतीय परम्परा में पहले से चले आ रहे साहित्य और कला रूपों को विकसित करते और बदले हुए सन्दर्भ में जरूरत के हिसाब से पश्चिमी साहित्यिक-सांस्कृतिक परम्परा से भी कुछ बातों को अपना लेते। हिन्दी की जातीय परम्परा को विकसित करने का संभवतः यह ज्यादा बेहतर और अपनी परम्परा से जुड़ा हुआ तरीका होता। अगर आप सही मायने में समकालीन कविता की समस्या पर विचार कर रहे हैं तो आपको इस पहलू पर भी ध्यान देना चाहिये। उसकी तमाम उल्लेखनीय उपलब्धियाँ हैं। मैं उन्हें जानता हूँ और नाम गिना सकता हूँ। कुछ अपवाद हैं, जिन्होंने इस ढाँचे को तोड़कर अलग ढंग से लिखने की कोशिश की है, लेकिन वो अपवाद ही हैं। मुख्य रूप से आज भी कविता का जो स्वरूप हमारे यहाँ चल रहा है, वो वही है जिसका निर्माण नई कविता के दौर में हुआ था। भंगिमाएँ अलग हो सकती है, कोई अपने को प्रगतिवादी कह सकता है, उसमें प्रगतिशीलता की छौंक लगा सकता है, कोई स्वयं को प्रयोगवादी कह सकता है। लेकिन नयी कविता के समय से चले आ रहे शिल्प-विधान से हटकर प्रयोग करने का साहस मुझे कहीं दिखाई नहीं पड़ता। एक बने बनाये फार्म में कविता लिख ली जाय, कविता बना ली जाय, यही अपने आप में लक्ष्य है। और जब तक यह ढंग चलता रहेगा, तब तक मुझे नहीं लगता कि उस दायरे का विस्तार होगा जिसे जड़ अभिरुचियों का दायरा कहा जा रहा है। चाहे जितना क्रान्तिकारी कन्टेन्ट आप उसमें भर दें, जब तक उसके फार्म में बदलाव नहीं लाते, तब तक उसका दायरा नहीं बढ़ने वाला। आप कहते रहिए अमुक के लिए है ये रचना, लेकिन आप जानते हैं कि वो उसको पढ़-समझ नहीं सकता।

मैं एक और बात कहना चाहता हूँ और उसे आधुनिकताप्रसूत दूसरे अनुशासनों पर भी आप लागू कर सकते हैं। 19वीं शताब्दी में भारतेन्दु के साथ हिन्दी साहित्य में एक बड़ा परिवर्तन होता है। वो परिवर्तन ये है कि साहित्य का एक सामाजिक उद्देश्य होना चाहिए। वही साहित्य श्रेष्ठ है जो उस समय के निर्धारित सामाजिक उद्देश्य के अनुरूप है उसका पूरक है, उसकी मदद करता है। छायावाद अपवाद है, किन्तु फिलहाल उस विस्तार में जाना जरूरी नहीं। आधुनिकता के आगमन के साथ साहित्य को किसी न किसी उद्देश्य के अधीन रखकर देखने की प्रवृत्ति चल पड़ी। साहित्य ‘इस’ उद्देश्य के अनुरूप है, तो ठीक है, लेकिन उससे विरुद्ध, या उससे अलग है तो फिर वह जड़ अभिरुचियों के अन्तर्गत आ जाएगा। जैसे एक समय तक प्रेम पर कविता लिखना उचित नहीं माना जाता था। जैसे एक जमाने में शतरंज खेलना सामन्ती व्यवस्था की पतनशीलता का पर्याय मान लिया गया था। क्या आज भी ऐसा सोच सकते हैं कि शतरंज खेलने में या सितार बजाने में यदि किसी को सुख मिलता है, भले ही दुनिया के तमाम छल-छद्म में शामिल न हो तो फिर वह पतनशील है, क्योंकि ‘समाज’ से विमुख है। क्या असामाजिक कहकर उसकी आलोचना होनी चाहिए! लेकिन आप जाानते हैं कि ये हुआ है। साहित्य को जब आप किसी विचार या विचारधारा के अधीन कर देते हैं, तब उसी के अनुरूप यह निर्धारित करने लगते हैं कि कौन सी रुचि जड़ है और कौन सी रुचि खुली हुई है, उन्मुक्त है। इसीलिए इस पर भी विचार करना चाहिए कि जड़ रुचियों से आशय क्या है? क्या आप साहित्य को किसी विचारधारा के प्रस्तोता के रूप में देखते हैं, जो विचारधारात्मक ज्ञान को एक तरह के कला माध्यम में डालकर पेश करता है? या आप उसकी कोई स्वतंत्र भूमिका भी देखते हैं, जहाँ वो अपने समय के ज्ञान को विचार के स्तर पर भी समृद्ध करता है, उसको चुनौती देता है या उसमें कुछ जोड़ता है। जड़ अभिरुचियों के सन्दर्भ में भी ये एक विचारणीय विषय है कि ये अभिरुचियाँ बनती कैसे हैं; कैसे तय होता है कि कौन सी अभिरुचियाँ जड़ हैं, कौन सी अभिरुचियाँ जड़ नहीं हैं। ध्यान रहे ंकि साहित्य, कला और ज्ञान की दुनिया ऐसी है, जहाँ सच और गलत का निर्धारण बहुमत से नहीं होता। अल्पमत यहाँ सही हो सकता है और बहुमत गलत।

मध्यकाल में साहित्य की भाषा बदल जाने के बावजूद अपनी पूर्व परम्परा से सम्बन्ध विच्छेद नहीं होता। जबकि ‘आधुनिक युग’ में हिन्दी की कथित जातीय परम्परा का विकास जिस रूप में हुआ, उसका सम्बन्ध ठिकाने से न तो शास्त्रीय परम्परा से कायम हुआ, न लोक परम्परा से। समूची मध्यकालीन कविता का संगीत से अभिन्न सम्बन्ध होता था और उसकी व्याप्ति का एक बड़ा कारण ये था कि उसका गायन/पाठ होता था। आधुनिक हिन्दी कविता की विडम्बना ये है कि उसका कोई जातीय संगीत विकसित नहीं हो सका, जबकि उसी की सहोदर उर्दू का ग़जल और कव्वाली के रूप में जातीय संगीत बन गया। इसी वजह से उर्दू कविता की लोकप्रियता सिर्फ उर्दू पढ़ने और लिखने वालों तक सीमित नहीं रही। यह अकारण नहीं है कि उर्दू के अच्छे से अच्छे कवि मुशायरों में शिरकत करते हैं और बड़ी संख्या में लोग उनको सुनने के लिए पहुँचते हैं। पूर्वी अंग की गायकी की बुनियाद पर क्या हिन्दी का जातीय संगीत विकसित किया जा सकता था? लोकप्रिय संस्कृति से जुड़े रूपों की पूरी तरह से उपेक्षा करके भी क्या किसी भाषा की कविता वृहत्तर समुदाय तक पहुंच सकती है?हिन्दी  में  तो  आलम  ये  रहा  है कि जिस  किसी की  कविता लोकप्रिय  हुई,  उसे  दोयमदर्जे  का  कवि  ठहरा  दिया  गया। दिनकर  और  बच्चन  जैसे कवियों  को हिन्दी में इसीलिए श्रेष्ठ कवियों की श्रेणी में नहीं रखा जाता। अंग्रेजी ढंग के साहित्य का भारतमें  जो  हाल है, सो है  ही, पश्चिम में  भी  इसके पाठक  और  श्रोता  बहुत  कम  बचे हैं। बाॅब  डिलन को गत वर्ष नोबेल  पुरस्कार  देकर कविता  के  लगातार  संकुचित  हो रहे दायरे को बढ़ाने की कोशिश की गयी। वे मूलतः ऐसे गीतकार और गायक है, जिनको सुनने और पसंद करने वालों की संख्या बहुत ज्यादा है। क्या हिन्दी जगत को भी लगातार कम होते जा रहे पाठक-श्रोता समुदाय के मद्देनजर साहित्यिक विधाओं के चले आ रहे स्वरूप के बारे में नये सिरे से नहीं सोचना चाहिए?

राजकुमार जी

प्रो॰राजकुमार

शोर-शराबे से दूर अध्ययन-अध्यापन में मग्न रहने  वाले युवा-तुर्क हिन्दी आलोचक। भक्ति साहित्य, हिन्दी नवजागरण, आधुनिकता, आधुनिक साहित्य, प्रेमचंद, हिन्दी कहानी इत्यादि पर लगातार लेखन। किताबों में जैसी रुचि इनकी  है,  वह अन्यत्र दुर्लभ ही हो गई है। फिलहाल, बी॰एच॰यू॰ के हिन्दी विभाग में प्राध्यापक।इनसे dr.kumar.raj@gmail.com पर संपर्क संभव। 

मुक्तिबोध के बहाने साहित्य-संस्कृति पर एक बहस: डॉ. राजकुमार

पश्चिमी विचारों के बढ़ते वर्चस्व के बावजूद उन्नीसवीं शताब्दी में ‘अन्धेर नगरी’ जैसे नाटकों, बीसवीं सदी में हबीब तनवीर के नाटकों, विजय तेन्दुलकर के ‘घासीराम कोतवाल’, गिरीश कर्नाड के ‘नागमण्डलम’ और ‘हयवदन’ जैसे नाटकों; विजयदान देथा की कहानियों और मुक्तिबोध की कहानियों और कविताओं में भारतीय परम्परा के सहज विकास के साक्ष्य मिल जाते हैं। ये सूची और भी लम्बी हो सकती है लेकिन ऊपर गिनाए गये नामों के सहारे हिन्दी की जातीय परम्परा ही नहीं, भारतीय साहित्य की जातीय परम्परा के विकास की वैकल्पिक अवधारणा प्रस्तुत की जा सकती है। कहने की आवश्यकता नहीं कि हिन्दी की जातीय परम्परा की वैकल्पिक अवधारणा विकसित करने में मुक्तिबोध के रचनात्मक और वैचारिक लेखन की भूमिका बहुत ही महत्वपूर्ण हो सकती है। #लेखक 

Muktibodh By Haripal Tyagi

Muktibodh By Haripal Tyagi

रूप की संस्कृति और मुक्तिबोध

By डॉ. राजकुमार

1.

कोई भी कार्य ठीक से पूरा करने के लिए एक संस्कृति की आवश्यकता होती है। अंग्रेजी में इसे वर्क कल्चर कहते हैं और इसका काम चलाऊ अनुवाद कार्य-संस्कृति हो सकता है। कार्य-संस्कृति के अभाव में ठिकाने से कोई भी काम कर पाना मुश्किल हो जाता है। कार्य-संस्कृति सिर्फ कानून, कायदों के औपचारिक ज्ञान और उन्हें व्यवहार में लागू करने से नहीं बनती। जब तक किसी बाहरी दबाव या डर के बिना हम स्वतः अपने दायित्त्व का निर्वाह नहीं करने लगते, तब तक यह नहीं माना जा सकता कि सही मायने में हमने एक कार्यसंस्कृति विकसित कर ली है। असल में कार्य संस्कृति एक संस्कार की तरह हमारे व्यक्तित्व में व्याप्त हो जाती है, जिसका कई बार हमें, सचेत रूप में, अहसास भी नहीं होता। यदि समकालीन भारत में ज्यादातर लोग अपने दायित्त्व का निर्वाह नहीं करते या सिर्फ मजबूरी में या भयवश अपनी जिम्मेदारी पूरी करते हैं तो इसका मतलब ये है कि हम कार्य-संस्कृति विकसित करने में असफल रहे हैं। एक सार्थक कार्य-संस्कृति का विकास किसी भी समाज को बेहतर ढंग से संचालित करने के लिए जरूरी है।

कार्य-संस्कृति की तरह साहित्य और कलाओं की भी संस्कृति होती है। साहित्यिक संस्कृति के अभाव में अच्छे और बेहतर साहित्य का सृजन असम्भव नहीं तो मुश्किल जरूर हो जाता है। साहित्यिक संस्कृति का सम्बन्ध सिर्फ समकालीन साहित्यिक संस्कृति से नहीं होता; समकालीन साहित्यिक संस्कृति भी वास्तव में किसी सभ्यता के समूचे साहित्यिक इतिहास को आत्मसात् करने पर बनती है। सार्थक साहित्य के रूप में पहचान उसी लेखन की बनती है जिसे अपनी सभ्यता के सांस्कृतिक इतिहास से उत्तीर्ण होकर लिखा जाता है। साहित्यिक लेखन मूलतः सांस्कृतिक कर्म है। इस सांस्कृतिक कर्म का एक राजनीतिक सन्दर्भ भी बन जाता है। लेकिन इसे राजनीतिक कर्म में निःशेष नहीं किया जा सकता है। माक्र्सवादी विचारधारा के हिमायती होने के बावजूद मुक्तिबोध के साहित्यिक लेखन का गहरा सरोकार भारतीय सांस्कृतिक परम्परा से रहा है। इसीलिए निराला के बजाय उनका तादात्म्य जयशंकर प्रसाद से बनता है। ‘तुलसीदास’ और ‘राम की शक्ति पूजा’ जैसी कविताएँ लिखने के बावजूद निराला की रचनाओं में सांस्कृतिक-बोध प्रसाद की रचनाओं की तरह अनुस्यूत नहीं है।

कोई भी सभ्यता अपने सुदीर्घ सांस्कृतिक जीवन के दौरान साहित्य और कला के विविध रूपों या विधाओं का विकास करती है। इन विधाओं/रूपों की अपनी बुनियादी संरचना होती है। इस बुनियादी संरचना का एक व्याकरण होता है। उस विधा में जो भी सार्थक बदलाव आते हैं, वे इस व्याकरण के अधीन संभव होते हैं। विजातीय प्रभाव भी इस व्याकरण के अधीन रूपान्तरित होकर रचना में आते रहते हैं। आरम्भिक आधुनिक दौर में संगीत, साहित्य, नृत्य, स्थापत्य, चित्रकला आदि के क्षेत्र में जो भी बदलाव आये, वे इसी तरह आए। इसीलिए विजातीय तत्त्वों को आत्मसात कर लेने के बावजूद जातीय परम्परा की निरन्तरता बनी रही।

साहित्य और कला के जातीय रूप जड़ नहीं होते। पहले से चली आ रही परम्परा से ही उनका विकास होता है। कोई रूप स्थिर होने से पहले कई स्रोतों से बहुत सारी चीजें आत्मसात करता है। जैसे कत्थक नृत्य के जिस रूप से आज हम परिचित हैं, वह रूप एक दिन में नहीं, धीरे-धीरे अस्तित्त्व में आया। एक बार जब कोई रूप पूर्णता प्राप्त कर लेता है तो उसका स्वरूप स्थिर हो जाता है। वह स्वायत्तता अर्जित कर लेता है। उसकी एक बुनियादी संरचना निर्मित हो जाती है। ये संरचना एक प्रकार के व्याकरण के अधीन कार्य करने लगती है। फिर इस व्याकरण में कोई बुनियादी बदलाव करना मुश्किल हो जाता है। इस रूप/विधा या माध्यम में काम करने वाला रचनाकार तभी सफल होता है, जब उस विधा के व्याकरण को समझकर सक्रिय होता है। इसके बावजूद, किसी विधा के अन्दर ऐसी गुंजाइश रहती है कि उसमें कुछ नया उन्मेष किया जा सके। उदाहरण के लिए गजल विधा का प्रयोग प्रायः प्रेम सम्बन्धी अनुभूतियों की अभिव्यक्ति के लिए किया जाता रहा है। किन्तु गजल में प्रेम की केन्द्रीयता को स्वीकार करते हुए भी सार्थक नवोन्मेष सम्भव है। फ़ैज अहमद फ़ैज की गजलें इस बात का साक्ष्य प्रस्तुत करती हैं कि प्रेम की केन्द्रीयता को स्वीकार करने के बावजूद उसमें क्रान्तिकारी और प्रगतिशील तेवर पैदा किये जा सकते हैं। किन्तु यदि गजल की विधा में वीर रस या समाज सुधार सम्बन्धी बातें डालने की कोशिश की जाए तो ये स्वरूप उसे धारण नहीं कर पाएगा। एक अच्छा रचनाकार वो है जो अपने माध्यम के प्रति संवेदनशील है; जो ये जानता है कि सुई से तलवार का काम नहीं लिया जा सकता और न ही तलवार से सुई का।

ये सही है कि नये युग की अनुभूतियों को साकार करने और नये विषयों को साहित्य और कला के माध्यमों में रचने हेतु नई विधाओं या रूपों का विकास होता है, किन्तु नई विधाएँ या नये रूप भी अपनी पूर्व परम्परा से ही निकलते हैं। उनका व्याकरण पूर्व प्रचलित रूपों से थोड़ा अलग तो होता है, लेकिन उनसे निरपेक्ष नहीं होता। इसीलिए उसे जातीय परम्परा के विकास के रूप में देखा जाता है। जैसे ध्रुपद गायन परम्परा का विकास ख्याल गायकी के रूप में हुआ और फिर ख्याल गायकी की परम्परा से आगे पूर्वी गायकी का विकास हुआ। पूरबी अंग की गायकी में लोक परम्परा में पहले से मौजूद होरी, चैती, दादरा, कजरी इत्यादि रूपों का उपशास्त्रीय गायन के रूप में उन्नयन होता है। इसी तरह रवीन्द्र संगीत का विकास हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत परम्परा और बांग्ला की बाउल गायन की लोक परम्परा से जुड़कर हुआ। रवीन्द्र संगीत कोे पश्चिमी संगीत परम्परा के कुछ तत्त्वों का भी समावेश है। रवीन्द्र संगीत को इसीलिए संगीत की जातीय परम्परा के सहज विकास के रूप में देखा जाता है। इसके बावजूद उसका बुनियादी स्वभाव भारतीय संगीत परम्परा से निर्मित है। इसके विपरीत जहाँ पश्चिमी संगीत की नियामक भूमिका होगी, वहाँ भारतीय संगीत परम्परा से कुछ तत्व ले लेने के बावजूद भी उसका स्वभाव जातीय/भारतीय नहीं रहेगा। भले ही उसकी भाषा और रंग-रोगन भारतीय क्यों न हो। गाँधी ने कई बातें पश्चिमी परम्परा से लीं, फिर भी उनके चिन्तन का स्वभाव भारतीय बना रहा, क्योंकि उन्होंने पश्चिमी विचारों को भारतीय चिन्तन परम्परा के व्याकरण में आत्मसात कर लिया। इसके उल्टी बात उन विचारकों की है जिन्होंने भारतीय चिन्तन परम्परा को पश्चिमी परम्परा में आत्मसात करने की कोशिश की।

उन्नीसवीं सदी में औपनिवेशिक आधुनिकता के आगमन के साथ भारतीय नवजागरण की चर्चा आरम्भ होती है। भारतीय नवजागरण के दौरान ज्ञान, साहित्य और कला की पहले से चली आ रही बुनियादी संरचना को त्यागकर पश्चिमी संरचनाओं को अपना लिया जाता है। इसे पैराडाइम शिफ्ट कहा गया। पश्चिमी पैराडाइम के निकष पर भारतीय सभ्यता की साहित्यिक, सांस्कृतिक और ज्ञान सम्बन्धी परम्पराओं को नापा जाने लगा। पश्चिमी पैराडाइम को ही थोड़ा-बहुत बदलकर भारतीय यथार्थ को बोधगम्य बनाने के लिए इस्तेमाल किया जाने लगा। पश्चिमी साहित्यिक तथा कलात्मक रूपों में भारतीय यथार्थ-बोध को ढालकर अभिव्यक्त किया जाने लगा। रामविलास शर्मा ने इसे हिन्दी की जातीय परम्परा के विकास के रूप में समादृत किया है। अंग्रेजी के विद्वान आलोचक होमी भाभा ने इसे ‘मिमिक्री’ और ‘हाइब्रिडिटी’ की संज्ञा दी है। किन्तु न तो इसे हिन्दी की जातीय परम्परा का विकास कहा जा सकता है और न ही इसकी व्याख्या ‘हाइब्रिडिटी’ के रूप में की जा सकती है। आरम्भिक आधुनिक दौर में हुए बदलाव की व्याख्या अवश्य हिन्दी की जातीय परम्परा के विकास के रूप में की जा सकती है क्योंकि उस दौर में पश्चिमी एशिया और अरब से आये प्रभाव को पहले से चले आ रहे साहित्यिक-सांस्कृतिक रूपों के व्याकरण के अधीन आत्मसात कर लिया गया। किन्तु उन्नीसवीं सदी में ऐसा नही हुआ। पहले से चले आ रहे साहित्यिक-सांस्कृतिक रूपों को त्यागकर पश्चिमी साहित्यिक-सांस्कृतिक रूपों को अपना लिया गया और फिर इन पश्चिमी साहित्यिक-सांस्कृतिक रूपों में ‘भारतीय यथार्थ’ ठँूसने की कोशिश की जाने लगी। साहित्यिक सांस्कृतिक विधाओं की परिकल्पना डिब्बे के रूप में किए बिना साहित्यिक सांस्कृतिक रूपों और अन्तर्वस्तु (यथार्थ) में पूर्ण पार्थक्य स्वीकार कर पाना संभव न था। साहित्यिक-सांस्कृतिक रूप वास्तव में ‘रूप’ नहीं होते। वे किसी संस्कृति को बोधगम्य बनाने वाले मंत्र की तरह होते हैं जिनके बिना उस संस्कृति का बोध ही असंभव हो जाता है। किसी सभ्यता की धड़कन उसके सुदीर्घ सांस्कृतिक इतिहास के दौरान विकसित साहित्यिक-सांस्कृतिक रूपों में अवतरित होती है। टेक्नाॅलजी का एक सभ्यता से दूसरी सभ्यता में स्थानान्तरण आसान होता है, किन्तु साहित्यिक-सांस्कृतिक रूपों को एक जगह से निकालकर दूसरी जगह रोपना आसान नहीं होता।

भाषा का स्वभाव किसी डिब्बे की तरह नही, जिसमें कुछ भी डाला जा सके। भाषा दर्पण की तरह भी नहीं, जो यथार्थ को प्रतिबिम्बित करे। भाषा कोई पारदर्शी माध्यम भी नहीं, जिसके आर-पार देखा जा सके। भाषा यथार्थ को प्रतिबिम्बित नही करती, बल्कि एक संसार रचती है। यह संसार यथार्थ से मिलता-जुलता हो सकता है और पूरी तरह काल्पनिक भी। संसार रचने की सामथ्र्य भाषा में है। इसका मतलब यह है कि भाषा अपने ढंग से, अपनी शर्तों पर एक संसार रचती है। आप भाषा में जो बतलाना चाहते हैं, वह बात भाषा में वैसे ही नहीं आती, जैसे आप चाहते हैं। बात बदल-बदल जाती है। मुक्तिबोध ने कला के तीन क्षण में इस प्रसंग की विस्तार से चर्चा की है। फ़ैज ने इसी बात को अपने अन्दाज में इस तरह कहा है:

                                दिल से तो हर मुआमला करके चले थे साफ हम।

                                कहने में उनके सामने बात बदल-बदल गयी।।

2.

 हिन्दी की जातीय परम्परा की सबसे ज्यादा चर्चा रामविलास शर्मा ने की। रामविलास शर्मा ने भारतेन्दु युग के साथ विकसित होने वाले समूचे आधुनिक हिन्दी साहित्य की व्याख्या हिन्दी की जातीय परम्परा के सहज विकास के रूप में की है। रामविलास शर्मा ने हिन्दी की जातीय परम्परा की जिस तरह व्याख्या की है, वह मुख्यतः अन्तर्वस्तु प्रधान है। अन्तर्वस्तु केन्द्रित समझ से सामाजिक परिवर्तन के कारणों की व्याख्या की जा सकती है। लेकिन साहित्य और कला के विभिन्न रूपों में घटित होने वाले परिवर्तन की सन्तोषजनक व्याख्या नहीं की जा सकती। क्योंकि साहित्यिक और कलात्मक रूपों की एक विशिष्ट संरचना होती है और उनमें जो भी बदलाव आते हैं, वे बदलाव प्रायः उस संरचना के अन्दर से निकलते हैं। ये मानना गलत है कि साहित्यिक या कलात्मक रूप सामाजिक परिवर्तनों को यथावत् प्रतिबिम्बित करते हैं। सामाजिक परिवर्तन का एहसास साहित्यिक-कलात्मक रचनाओं से होता जरूर है। लेकिन ये एहसास साहित्य और कला के विभिन्न माध्यम् अपनी शर्तों पर, माध्यम के स्वभाव के अनुरूप ही कराते हैं। इनका वैशिष्ट भी यही है। इसीलिए संगीत सुनने और कविता पढ़ने/सुनने से हमें जो अनुभूति होती है, वह अनुभूति समाज-विज्ञान पढ़ने से होने वाले अनुभूति से भिन्न होती है।

हिन्दी की जातीय परम्परा की कोई भी सार्थक चर्चा साहित्य या कला के ‘माध्यम’ को छोड़कर सम्भव नहीं। साहित्य और कलाओं के प्रभाव का निर्धारण भी मुख्य रूप से माध्यम विशेष में अर्जित की गयी दक्षता से होता है। ये प्रभाव सिर्फ अन्तर्वस्तु से निर्धारित/तय नहीं होता।

मुक्तिबोध सम्भवतः हिन्दी के उन विरल लेखकों में से हैं, जिनका सांस्कृतिक बोध बहुत ही गहरा है। सही मायने में सृजनात्मक सांस्कृतिक बोध स्थूल नहीं, बहुत सूक्ष्म होता है; और विचार नहीं, संस्कार की तरह रचनात्मकता के विभिन्न आयामों में रूपायित होता है।

मुक्तिबोध का रचना संसार हमें इसलिए प्रभावशाली लगता है क्योंकि उन्होंने भारतीय सभ्यता के सांस्कृतिक बोध को संवेदना के स्तर पर अनुभव किया और फिर अपनी कृतियों में इस अनुभूति को सृजित किया। विचारणीय प्रश्न ये है कि जब सर्वत्र यथार्थवाद का बोलबाला था, मुक्तिबोध ने अपनी रचनात्मकता अभिव्यक्ति के लिए ऐसे रूप की खोज की जिसका सम्बन्ध न तो यथार्थवाद से और न ही आधुनिकतावाद से बनता है। असल में मुक्तिबोध का जैसा रचनात्मक व्यक्तित्व था, उसकी अभिव्यक्ति यथार्थवादी शिल्प में सम्भव नहीं थी। उसकी अभिव्यक्ति आधुनिकतावादी शिल्प में भी संभव नहीं थी। ये बात अलग है कि मुक्तिबोध की रचनात्मक अभिव्यक्ति की संगति यथार्थवादी शिल्प के बजाय आधुनिकतावादी शिल्प से ज्यादा बनती है। फिर भी उसकी सन्तोषजनक व्याख्या आधुनिकतावादी सैद्धान्तिकी के सहारे सम्भव नहीं। मुक्तिबोध की रचनात्मकता का बहुत गहरा सम्बन्ध भारत की पूर्व औपनिवेशिक सांस्कृतिक परम्परा से है। उसी की बुनियाद पर वे आधुनिकतावादी और यथार्थवादी सैद्धान्तिकी का अतिक्रमण करते हैं। भले ही मुक्तिबोध ने बहुत सोच-समझकर ऐसा न किया हो, लेकिन उनकी कविताओं और कहानियों के विन्यास के आधार पर ऐसा अवश्य कहा जा सकता है कि उनकी रचनात्मकता न तो आधुनिकतावाद के साँचे में फिट होती है, न यथार्थवाद के साँचे में।

3.

अगर भारतेन्दु युग से आधुनिक हिन्दी की शुरूआत मानी जाए, तो फिर यह भी मानना पड़ेगा कि आधुनिक युग की शुरूआत के साथ ही रूप और अन्तर्वस्तु का पार्थक्य स्वीकार कर लिया गया। रूप और अन्तर्वस्तु का पार्थक्य स्वीकार करने से आशय यह है कि रूप की परिकल्पना एक तटस्थ अवधारणा के रूप में की जाने लगी, जिसमें सुविधानुसार कोई भी अन्तर्वस्तु डाली जा सकती है। इस बात को ज्यादा सरल तरीके से कहें तो रूप की परिकल्पना एक डिब्बे के रूप में की गयी, जिसमें जरूरत के हिसाब से कुछ भी डाला जा सकता है।

आधुनिकताजन्य चेतना के प्रचार-प्रसार के सम्बन्ध में भारतेन्दु ने लिखा है, ‘‘मैंने यह सोचा है कि जातीय संगीत की छोटी-छोटी पुस्तकें बनें और वे सारे देश, गाँव गाँव, में साधारण लोगों में प्रचार की जायँ। यह सब लोग जानते हैं कि जो बात साधारण लोगों में फैलेगी उसी का प्रचार सार्वदेशिक होगा और यह भी विदित है कि जितना ग्रामगीत शीघ्र फैलते हैं और जितना काव्य को संगीत द्वारा सुनकर चित्त पर प्रभाव होता है उतना साधारण शिक्षा से नहीं होता। इससे साधारण लोगों के चित्त पर भी इन बातों का अंकुर जमाने को इस प्रकार से जो संगीत फैलाया जाय तो बहुत कुछ संस्कार बदल जाने की आशा है। … इस हेतु ऐसे गीत बहुत छोटे छोटे छंदों में और साधारण भाषा में बनैं, वरंच गवाँरी भाषाओं में और स्त्रियों की भाषा में विशेष हों। कजली, ठुमरी, खेमटा, कँहरवा, अद्धा, चैती, होली, साँझी, लंबे, लावनी, जाँते के गीत, बिरहा, चनैनी, गजल इत्यादि ग्रामगीतों में इनका प्रचार हो और सब देश की भाषाओं में इसी अनुसार हो।’’

भारतेन्दु के उपर्युक्त कथन से इस बात की पुष्टि होती है कि रूप की परिकल्पना अन्तर्वस्तु निरपेक्ष सत्ता के रूप में की जाने लगी।

इससे पहले रूप और अन्तर्वस्तु की परिकल्पना परस्पर निरपेक्ष सत्ता के रूप में नहीं की जाती थी। जैसे हिन्दुस्तानी संगीत परम्परा में ये बताया गया है कि अमुक राग अमुक समय पर गाया जाना चाहिए। इसका मतलब यह है कि एक समय विशेष की संवेदना एक राग विशेष में ही रूपायित हो सकती है। अर्थात् राग के स्वभाव का सम्बन्ध प्रहर विशेष के अनुरूप बनता है। समय और राग के सम्बन्ध की पहचान का विस्तार षड्ऋतुवर्णन और फिर बारहमासा गायन की लोकपरम्परा में दिखायी देता है। यदि चैबीस घण्टे के चक्र में रागों का समय निर्धारित किया गया है, तो बारहमासे को साल के बारह महीनों के चक्र में स्थापित किया गया है। ये माना गया कि हर महीने का स्वभाव अलग है। किसी माह या ऋतु के स्वभाव के अनुरूप ही उस माह या ऋतु में गाये जाने वाले गीत की धुन विकसित की गयी। उदाहरण के तौर पर फागुन माह में गाये जाने वाले गीत ‘होरी’ की धुन और सावन महीने में गाये जाने वाले गीत कजरी की धुन अलग है। इसका मतलब ये है कि धुन सिर्फ रूप नहीं है, जिसमें कैसा भी गीत गाया जा सकता है। चैती की धुन में होरी नहीं गा सकते और होरी की धुन में चैती गाने पर अटपटा लगेगा। इस तरह धुन और गीत परस्पर इस तरह मिल जाते हैं कि इनमें से किसी को मात्र ‘रूप’ नहीं कहा जा सकता। धुन भी अंतर्वस्तु है और गीत भी अन्तर्वस्तु है। यह भी कहा जा सकता है कि रूप और अन्तर्वस्तु इस तरह एकाकार हो जाते हैं कि ये कहना न तो सम्भव है और न तो उचित है कि क्या रूप है और क्या अन्तर्वस्तु। कुन्तक ने इस स्थिति को ‘निरस्त सकल अवयव’ कहा है। कुन्तक का आशय यह है कि रचना में प्रयुक्त विभिन्न अवयवों की स्वतंत्र सत्ता समाप्त हो जाती है। ठीक इसी तरह गीत और धुन का स्वतंत्र अस्तित्व समाप्त हो जाता है। जो प्रभाव है वह इनके एक हो जाने से उत्पन्न होने वाला प्रभाव है।

ऊपर के विवेचन से ये बात समझने में मदद मिल सकती है कि रूप की परिकल्पना समय और विषयवस्तु से निरपेक्ष नहीं होती। एक रूप में जो चाहें, वो मनमाफिक नहीं भरा जा सकता। जैसे कजरी की धुन में परिवार नियोजन का महत्त्व गाया जाने लगे तो उसका प्रभाव बहुत संतोषजनक नहीं होगा। इसका एक निहितार्थ ये भी है कि रूप अपने स्वभाव के अनुरूप अन्तर्वस्तु को ही स्वीकार करता है। रूप के स्वभाव के विपरीत जब भी कुछ डालने की चेष्टा की जाती है, उसके सार्थक और टिकाऊ परिणाम नहीं निकलते। प्रसिद्ध चिन्तक हेडेन व्हाइट ने इसीलिए ‘कंटेंट आॅफ दि फार्म’ की चर्चा की है। ‘कंटेंट आफ दि फार्म’ से आशय यह है कि सामान्य समझ के विपरीत रूप यह निर्धारित करता है कि उसमें कैसी अन्तर्वस्तु रखी जा सकती है। रूप से अन्तर्वस्तु निर्धारित होती है। अन्तर्वस्तु से रूप नहीं।

पहचान/अस्मिता को रेखांकित करने वाली चीज रूप है, न कि अन्तर्वस्तु। पहले तो यही देखा जाएगा कि आप सुर में गा सकते हैं या नहीं। किसी गायक की पहचान इस बात से होगी कि उसे रागों का ज्ञान है या नहीं और वह राग में गा सकता है या नहीं। गायक राग में क्या गाता है, गीत के विषय या बोल क्या हैं, ये बातें काफी हद तक उस राग की प्रकृति से निर्धारित होंगी। ये बात साहित्य पर भी लागू होती है।

अभी तक कही गयी बातें अगर ठीक हैं, तो फिर रूप और अन्तर्वस्तु सम्बन्धी उस समझ पर नये सिरे से विचार करना चाहिए, जिसकी शुरूआत हिन्दी में भारतेन्दु के साथ होती है। यह सही है कि समूचे आधुनिक हिन्दी साहित्य में विषयवस्तु को केन्द्रीय मानकर रूप और अन्तर्वस्तु के सम्बन्ध पर चर्चा हुई। व्यवहार में भी इस पर इसी रूप में अमल किया गया। यहाँ तक कि प्रयोगवादी-आधुनिकतावादी रचनाकारों ने भी रूप के महत्त्व और उसके सांस्कृतिक संदर्भ को नजरअंदाज करने की गलती की। अंग्रेजी ढंग का नाॅवेल या कविता लिखने वालों में केवल यथार्थवादी-प्रगतिवादी रचनाकार ही नहीं आते, प्रयोगवादी-आधुनिकतावादी रचनाकारों ने भी अंग्रेजी ढंग के रूप-विन्यास में ही अपनी ज्यादातर रचनाएँ लिखी हैं। प्रयोगवादी-आधुनिकतावादी रचनाकार रूप की चिन्ता तो खूब करते हैं, लेकिन ये बात भुला देते हैं कि जिस रूप में वो रचना कर रहे हैं, उस रूप का सम्बन्ध पश्चिमी साहित्यिक-सांस्कृतिक परम्परा से है। पश्चिमी साहित्यिक-सांस्कृतिक परम्परा की कोख से जन्मे रूप में अव्वल तो भारतीय अन्तर्वस्तु आ नहीं सकती और अगर वो ठीक से उस ‘रूप’ में समा जा रही है तो उसे भारतीय अन्तर्वस्तु कहना ही संदेहास्पद होगा। ये जरूर कह सकते हैं कि रूप और अन्तर्वस्तु दोनों पश्चिमी हैं ! लेकिन फिर ये सवाल उठेगा कि गैर-पश्चिमी भाषा और साहित्यिक-सांस्कृतिक संदर्भ में ऐसी रचना की क्या संगति बनेगी, जिसका रूप और अंतर्वस्तु दोनों पश्चिमी है।

जैसाकि पहले कहा गया, इस प्रश्न का एक उत्तर होमी भाभा के यहाँ मिलता है, जहाँ वे इस स्थिति को वर्णसंकरता के रूप में व्याख्यायित करते हैं। ये न तो पूरी तरह पश्चिमी, और न पूरी तरह भारतीय रूप और संवेदना है, क्योंकि पश्चिम के सम्पर्क में आने के बाद समूचा साहित्यिक-सांस्कृतिक संदर्भ ही वर्णसंकर हो गया है। वास्तविकता तो ये है कि जिसे वर्णसंकरता की स्थिति कहा गया है, वो वास्तव में वर्णसंकरता की स्थिति है नहीं। यहाँ सब कुछ पश्चिम का ही है, सिर्फ रंगरोगन और भाषा भारतीय है। वर्ण संकरता की स्थिति तब उत्पन्न होती है, जब दोनों पक्षों की भूमिका बराबरी की होती है। ये अकारण नहीं है कि इस कथित वर्णसंकरता ने किसी बड़े वैचारिक एवं रचनात्मक उन्मेष को जन्म नहीं दिया। वर्णसंकरता की ये अवधारणा इससे पहले इतिहासकारों द्वारा प्रयुक्त भारतीय नवजागरण की अवधारणा की तरह ही बहुत उर्वर साबित नहीं हुई। क्योंकि पराधीनता के दौरान पश्चिम से जो भी संवाद हुआ, वो ग़ैर बराबरी के स्तर पर हुआ और इस संवाद में पश्चिम की हर क्षेत्र में नियामक और केन्द्रीय भूमिका स्वीकार करते हुए उसका भारतीय संस्करण गढ़ने की कोशिश की गयी। इसलिए इस स्थिति को वर्णसंकरता की अवधारणा के जरिये व्याख्यायित करने के बजाय ‘डिराइवेटिव डिस्कोर्स’ के रूप में व्याख्यायित करना ज्यादा सटीक होगा। डिराइवेटिव डिस्कोर्स की अवधारणा का इस्तेमाल पार्थ चटर्जी ने अपनी पुस्तक में राष्ट्रवादी चिन्तन को व्याख्यायित करने के संदर्भ में किया है। इस सोच में ये बात शामिल है कि मूल और नियामक चिन्तन तो पश्चिम का है, और राष्ट्रीय चिन्तन के रूप में जो कुछ लिखा-पढ़ा गया है, वो पश्चिमी चिन्तन से ही निकला है। इस विमर्श में भारतीय राष्ट्रीय चिन्तन की स्वायत्तता स्वीकार करने के बावजूद पश्चिमी चिन्तन की केन्द्रीयता बनी रहती है। क्या यही बात प्रयोगवादी-आधुनिकतावादी-यथार्थवादी रचनाकारों के साहित्यिक अवदान के बारे में भी कही जा सकती है! क्या उनके अवदान की व्याख्या डिराइवेटिव डिस्कोर्स के रूप में करना उचित नहीं होगा?

ये तो नही कहा जा सकता कि हिन्दी की जातीय परम्परा का उन्नीसवीं सदी के बाद विकास ही नहीं हुआ। लेकिन ये जरूर कहा जा सकता है कि हिन्दी की जातीय परम्परा के सहज विकास के रूप में समादृत किये जाने वाले बीसवीं शताब्दी के साहित्य का स्वरूप जातीय कम और पश्चिमी ज्यादा है। असल में, जैसे-जैसे जातीय परम्परा के संस्कार कमजोर कमजोर पड़ते गये, वैसे-वैसे पश्चिमी विचारों का प्रभाव बढ़ता गया। किन्तु पुराने संस्कार इतने आसानी से छूटते नहीं। पश्चिमी विचारों के बढ़ते वर्चस्व के बावजूद उन्नीसवीं शताब्दी में ‘अन्धेर नगरी’ जैसे नाटकों, बीसवीं सदी में हबीब तनवीर के नाटकों, विजय तेन्दुलकर के ‘घासीराम कोतवाल’, गिरीश कर्नाड के ‘नागमण्डलम’ और ‘हयवदन’ जैसे नाटकों; विजयदान देथा की कहानियों और मुक्तिबोध की कहानियों और कविताओं में भारतीय परम्परा के सहज विकास के साक्ष्य मिल जाते हैं। ये सूची और भी लम्बी हो सकती है लेकिन ऊपर गिनाए गये नामों के सहारे हिन्दी की जातीय परम्परा ही नहीं, भारतीय साहित्य की जातीय परम्परा के विकास की वैकल्पिक अवधारणा प्रस्तुत की जा सकती है। कहने की आवश्यकता नहीं कि हिन्दी की जातीय परम्परा की वैकल्पिक अवधारणा विकसित करने में मुक्तिबोध के रचनात्मक और वैचारिक लेखन की भूमिका बहुत ही महत्वपूर्ण हो सकती है।

राजकुमार जी

प्रो॰राजकुमार

शोर-शराबे से दूर अध्ययन-अध्यापन में मग्न रहने  वाले युवा-तुर्क हिन्दी आलोचक। भक्ति साहित्य, हिन्दी नवजागरण, आधुनिकता, आधुनिक साहित्य, प्रेमचंद, हिन्दी कहानी इत्यादि पर लगातार लेखन। किताबों में जैसी रुचि इनकी  है,  वह अन्यत्र दुर्लभ ही हो गई है। फिलहाल, बी॰एच॰यू॰ के हिन्दी विभाग में प्राध्यापक।इनसे dr.kumar.raj@gmail.com पर संपर्क संभव। 

 

साभार – कथादेश 

जारी….

 

जाने दो वह कवि कल्पित था : अविनाश मिश्र

कभी निराला के लिए नागार्जुन ने लिखा था : ‘‘उसे मरने दिया हमने रह गया छुट कर पवन/ अब भले ही याद में करते रहें सौ-सौ हवन।’’ यह लिखाई बताती है कि हिंदी साहित्य में मरण का बहुत माहात्म्य है, यह ज्ञानरंजन भी बहुत पूर्व में कह चुके हैं। मुझे यह कहना भला तो नहीं लग रहा है, लेकिन मुझे लगता है कि कृष्ण कल्पित के जीते-जी शायद उन्हें वह प्रतिष्ठा नहीं मिलेगी जिसके वह हकदार हैं। आज हिंदी साहित्य में कृष्ण कल्पित का मौखिक और कुटिल विरोध उनके लिखित विरोध से कई गुना बढ़ चुका है। उन पर हो रहे आक्रमण कभी निराला पर हुए आक्रमणों की याद दिलाते हैं। इस तरह देखें तो हिंदी कविता और आवारगी की ही नहीं कृष्ण कल्पित अपमान की परंपरा को भी आगे बढ़ा रहे हैं। इस अपमान में भी आनंद की तलाश उनकी सहज-वृत्ति है। इसके लिए वह जिस सिद्ध ‘विट’ तक जाते हैं, वह एक साथ उनके कुछ मित्रों और कई शत्रुओं का निर्माण करती है। इन शत्रुओं में औसत कवि-कवयित्री, फूहड़ लेखक-लेखिकाएं, मतिमंद और माफिया आलोचक, अर्थपिशाच प्रकाशक, काहिल प्राध्यापक और उनके निकम्मे शोधार्थी, मानसिक रूप से दिवालिए पत्रकार, चालू और हद दर्जे के बेवकूफ टिप्पणीकार, भ्रमरवृत्तिदक्ष दलाल और प्रतिभा-प्रभावशून्य युवक-युवतियां शामिल हैं। इस पर सोचा जाना चाहिए कि आखिर एक कवि इतने सारे मूर्त शत्रुओं के बीच रहकर कैसे काम करता है. #लेखक 

परंपरा का आवारापन

कृष्ण कल्पित की कविता-सृष्टि पर एकाग्र

 

By  अविनाश मिश्र  

‘‘आलोचक कवि हो यह जरूरी नहीं, लेकिन कवि का आलोचक होना अपरिहार्य है!’’

यह कहने वाले समकालीन हिंदी कविता के सबसे आवारा कवि कृष्ण कल्पित कवियों में सबसे बड़े शराबी और शराबियों में सबसे बड़े कवि हैं। एक आलोचनात्मक आलेख के लिहाज से यह शुरुआत कुछ अजीब और भारहीन लग सकती है, लेकिन मैं चाहता हूं कि जैसे कृष्ण कल्पित (कृ.क.) को कविता नसीब हुई है, वैसे ही मुझे उनकी कविता की आलोचना नसीब हो।

इस आलोचना के केंद्र में वे असर हैं जो मेरे उत्साह में मुझ तक विष्णु खरे के जरिए, विष्णु खरे तक मुक्तिबोध के जरिए, मुक्तिबोध तक निराला के जरिए, निराला तक कबीर के जरिए, कबीर तक बाणभट्ट के जरिए और बाणभट्ट तक वाल्मीकि के जरिए आए। लेकिन कहां ये तेजस्वी और पराक्रमी कवि-आलोचक और कहां अत्यंत अल्प बौद्धिकता वाला मैं! मुझे यह बहुत अच्छी तरह मालूम है कि जिस परंपरा में कृ.क. आवारगी करते रहे हैं, उसमें मेरी गति बहुत क्षीण है। इस गति के बावजूद मैं कृ.क. की कविता-सृष्टि पर एकाग्र होकर कुछ कहने का प्रयत्न कर रहा हूं और इस सिलसिले में विष्णु खरे की एक कविता ‘कूकर’ मेरे साथ चलने लगी है।

हिंदी कविता संसार में एक लंबे समय तक कृ.क. के नाम के आगे गलत या प्रश्न का निशान लगाया जाता रहा है, लेकिन अब यह एक तथ्य और सच्चाई मालूम पड़ती है कि कृ.क. पूरब की कविता की पूरी परंपरा को देखने वाले अपनी और अपने से ठीक पूर्व की पीढ़ी में एकमात्र आवारा कवि हैं। अपने नियमों से ही अपना खेल खेलते हुए वह कविता की दुनिया में किसी और के खेल में शामिल होने वाले बेवकूफों, कायरों और शोहदों में नहीं हैं और उनसे दूर भी रहे हैं।

दिशाओं में गर्क हो जाने की ख्वाहिश रखने वाले वह उन कवियों में से हैं जिन्होंने अपने शुरुआती रियाज को भी शाया करवाया है। इस रियाज को अगर रियाज ही माना जाए, तब हिंदी कविता की मुख्यधारा में सही मायनों में कृ.क. का काव्य-प्रवेश साल 1990 में आए ‘बढ़ई का बेटा’ से होता है। इस संग्रह की आखिरी कविता कवियों के मुख्यधारा तक आने, उसमें भटकने, खटने और खो-खप जाने को बयां करती है :

बहुत दूर से चलकर दिल्ली आते हैं कवि

भोजपुर से मारवाड़ से संथाल परगना से मालवा से

छत्तीसगढ़ से पहाड़ से और पंजाब से चलकर

दिल्ली आते हैं कवि

जैसे कामगार आते हैं छैनी-हथौड़ा लेकर

रोजी-रोटी की तलाश में

[ कवियों की कहानी ]

 

इस काव्य-प्रवेश से एक दशक पूर्व ‘भीड़ से गुजरते हुए’ के गीतों से पहले एक भूमिका में कवि ने दर्ज किया :

अभी मैं हांफ रहा हूं

मुझे सुनने को आतुर लोगों

अभी मैं हांफ रहा हूं

जब मैं हांफने की

पूरी यात्रा तय कर लूंगा

तब मैं पूरी कथा कहूंगा

कृ.क. के कवि के इस शाया रियाज में रेतीली स्थानीयता की विसंगतियां थीं, प्रेमानुभव थे और ‘दर्द जितना भी मिला, प्यास बनकर पी गए’ वाली रूमानियत और शहादत थी। इसमें लोक-संवेदना और विस्थापन की मार थी। लय से लगाव और छंद का ज्ञान साथ लिए इस रियाज में एक अनूठा कथा-तत्व था, इसलिए इसे कथा-गीत कहकर भी पुकारा गया :

राजा रानी प्रजा मंत्री बेटा इकलौता

एक कहानी सुनी थी जिसका अंत नहीं होता

इस रियाज ने एक आवारागर्द अक्ल रखने वाले कृ.क. की कवि-छवि का बहुत दूर तक नुकसान किया। इसने हिंदी कविता की व्यावहारिक राजनीति को यह छूट दी कि वह कृ.क. के कवि के इर्द-गिर्द प्रश्नवाचकता का वृत्त निर्मित करे और इसे बहुत दूर तक विस्फारित कर सके। इस वृत्त में ‘कैद’ कवि का काव्य-संघर्ष इसलिए बहुत उल्लेख्य है क्योंकि उसकी कविता पहले गीत की रूढ़ संवेदना से बाहर आई, फिर आठवें दशक के फॉरमूलों से और फिर नवें दशक के नक्शे से भी। इस प्रकार एक सीधी गति में सफर करते हुए कृ.क. की कविता आज सारे दायरों को ध्वस्त कर अपना एक अलग देश बना चुकी है और यह कहना सुखद है कि छूट चुके मरहलों से उसके रिश्ते अब भी अच्छे हैं।

प्रस्तुत सामयिकता में कृ.क. की कविताएं अभ्यस्त मुहावरों और काव्य-समझ की कविताएं नहीं हैं। इस वक्त हिंदी में कविता के जितने भी सांचे हैं — प्रतिबद्ध कविता, वैचारिक कविता, सैद्धांतिक कविता, राजनीतिक कविता, क्रांतिकारी कविता, ऐतिहासिक कविता, वैश्विक कविता, आंचलिक कविता, प्राकृतिक कविता, सांस्कृतिक कविता, लोक कविता, ग्रामीण कविता, कस्बाई कविता, नागर कविता, पर्वतीय कविता, स्त्रीवादी कविता, दलित कविता, आदिवासी कविता, अल्पसंख्यक कविता, सर्वहारा कविता, तात्कालिक कविता, समयातीत कविता, आवश्यकतावादी कविता, आशावादी कविता, निराशावादी कविता, इच्छावादी कविता, चालू कविता, जड़ कविता, स्मृत्यात्मक कविता, गत्यात्मक कविता, रत्यात्मक कविता, काव्यात्मक कविता, गद्य कविता, ठोस कविता, तरल कविता, मुश्किल कविता, सरल कविता, अगड़ी कविता, पिछड़ी कविता, आधुनिक कविता, उत्तर आधुनिक कविता, गंभीर कविता, लोकप्रिय कविता, जन कविता, बौद्धिक कविता — उनमें से किसी एक में कृ.क. की कविता को नहीं रखा जा सकता। इस कविता-समय में इन काव्य-प्रकारों और प्रवृत्तियों के बीच इस प्रकार कृ.क. की कविता एक ‘आवारा कविता’ नजर आती है। आवारगी सदा से समय में तिरस्कृत रही आई है। यह अलग बात है :

पुरस्कृत कवियों से कविता दूर चली जाती है

कविता तिरस्कृत कवियों पर रीझती है

[ कविता-रहस्य, 25:1 ]

 

आवारा कविता अपने आस-पास को बहुत सजगता और ईमानदारी से देखती है, लेकिन वह अपने समय में बहुत अकेली भी पड़ जाती है और इसलिए ही वह परंपरा से संबद्ध होती है। इस प्रकार की कविता में एक खास किस्म का देहातीपन और बेबाकी होती है, और उसका कहना-बोलना अक्सर किसी सच्चे-निहंग पागलपन की याद दिलाता है। यहां यह भी बताते हुए आगे बढ़ना चाहिए कि किसी गैर-मार्क्सवादी कवि की कविता को सीधे मनुष्य से प्रतिबद्ध बता देने वाले समीक्षात्मक-आलोचनात्मक प्रयत्न मार्क्सवादी आलोचना के कूपाकाश में प्राय: बहुत नवीन और अलग समझे जाते रहे हैं। लेकिन किसी विचार या राजनीति से प्रतिबद्ध होने बावजूद कविता — अगर वह कविता है — तो अनिवार्यतः — प्रथमतः और अंततः — मनुष्य से ही प्रतिबद्ध होगी, इसलिए किसी कवि की कविता का मनुष्य से प्रतिबद्ध होना या बने रहना कोई नई और अनूठी बात नहीं है। नयापन और वैशिष्ट्य तो इसमें है कि कवि अपनी प्रतिबद्धता को बयां कैसे कर रहा है, और यह भी मैं कोई नई बात नहीं कह रहा हूं, बस इस प्रसंग में इस जरूरी बात को दुहरा भर रहा हूं। इस अर्थ में देखें तो कृ.क. का कवि एक शास्त्रकार भी है। वह माफिया आलोचकों को पहचानता है और उसकी कविता कातिलों का कातिल होने की बराबर कोशिश करती है। आस-पास को कभी ओझल न करने वाली मानवीय दृष्टि के साथ दृढ़ यह कविता बंकिमता को बचाती है और परंपरा में आवारगी करते हुए कथित आधुनिकता और उत्तर-आधुनिकता दोनों से ही परहेज बरतती है। यह इस यकीन के साथ व्यक्त होती है कि एक नए कवि में सारे पुराने कवि शामिल होते हैं। यह जरी-गोटेदार भाषा से दूरी बनाकर करुणा और क्रोध से संभव हुई वाग्मिता को प्रश्रय देती है। तत्कालप्रिय प्रवचनात्मकता से प्राप्त वैचारिक प्रतिबद्धता-पक्षधरता से बचती हुई यह लोगों के बीच, लोगों का होने की कोशिश करती है और इस कोशिश में जनप्रिय और बदनाम साथ-साथ होती है।

कविता में क्या हो, क्या न हो, क्या कहा जाए, क्या न कहा जाए, कैसे कहा जाए, कैसे न कहा जाए… यह सब हिंदी कविता में गई सदी के सातवें दशक में ही पूर्णरूपेण तय और स्पष्ट हो गया था। कुछेक अपवादों को छोड़ दें तो आज करीब-करीब सारे नए-पुराने कवि इस स्पष्टता के साथ ही लिख रहे हैं। कृ.क. इन अपवादों में से ही एक या कहें इन अपवादों में भी एक अपवाद हैं। कविता और कवि-व्यक्तित्व दोनों ही कृ.क. के पास है। निराला और राजकमल चौधरी के बाद यह संयोग कृ.क. के रूप में हिंदी में कई दशकों के बाद घट रहा है। यह यों ही नहीं है कि आज हिंदी साहित्य (हिं.सा.) के सारे संगठित तत्व और शक्तियां कृ.क. पर क्रुद्ध और इसलिए उनके विरुद्ध हैं। अद्भुत आकर्षक आवारगी से भरा हुआ कृ.क. का व्यक्तित्व और उसका कवित्व हिं.सा. के जड़, संकीर्ण और अदूरदर्शी आलोचकों के बीच उभरा है। यह भी कह सकते हैं कि कृ.क. जैसे कवि के लिए यह समय पूरी तरह मुफीद नहीं रहा आया। कृ.क. कविता में और कविता से अलग भी प्राय: बहुत मूल्यवान बातें कहते हैं, लेकिन कभी-कभी उनमें व्यावहारिक संचार का बहुत अभाव होता है। इस अभाव को अपना अपमान समझ हिं.सा. की व्यावहारिक राजनीति उनसे एक शत्रु की तरह बर्ताव करती है। यह बर्ताव तत्काल भले ही कुछ बर्बाद करता दिखे, लेकिन बहुत दूर तक इसकी कोई गति नजर नहीं आती, क्योंकि कृ.क. के पास भविष्य कविता के रूप में सुरक्षित है और इस दृश्य में भी यह कृ.क के सौभाग्य का तेवर नहीं तो और क्या है कि उनके और उनके कवित्व के प्रति अनुराग रखने वाले बढ़ते ही जा रहे हैं। उनके पक्ष में नजर आने वाले ऐसे उदीयमान व्यक्तित्वों की कोई कमी नहीं है जिनसे कल हिंदी धन्य होगी। यहां वरिष्ठ कवियों के बहाने युवा कवियों को संबोधित कृ.क. की ये कविता-पंक्तियां दृष्टव्य हैं :

जिसकी एक भी पंक्ति नहीं बची

उसके पास सर्वाधिक तमगे बचे हुए हैं

 

[ वरिष्ठ कवियो ]

एक योग्य कवि की लंबी उपेक्षा उसको पराक्रमी बनाती चली जाती है। इस पराक्रम से उसके प्रशंसकों का एक अलग समुदाय निर्मित होता है और उसके समर्थकों की एक अलग श्रेणी… ‘निराला की साहित्य साधना’ को यहां याद करते चलिए। दुरभिसंधियां युक्तियां बन जाती हैं, लेकिन एक वैविध्यपूर्ण कवि-व्यक्तित्व खुद को कभी संघर्ष से वंचित नहीं करता। कुंठाएं उसे दबोचने की कोशिश करती हैं, लेकिन वह आत्म-विश्वास को संभाले रखता है। कृ.क. के यहां ये विशेषताएं नजर आती हैं। उन्होंने शिल्प से आक्रांत और शब्द से आडंबर किए बगैर हिंदी कविता में एक असंतुलन उत्पन्न किया है। इस असंतुलन ने तमाम ‘विशिष्ट कवियों’ को असुरक्षा में डाल दिया है। अब स्थिति यह है कि सांस्कृतिक रूप से सत्तावान तंत्र और संरचनाएं कृ.क. की प्रत्येक पंक्ति से भयभीत रहती हैं। इस तंत्र और इन संरचनाओं ने वर्षों तक उनके कवि को खत्म करने के यत्न किए, लेकिन ‘अपने होने को प्रकाशित करने’ के नए माध्यमों के उदय के बाद आज कृ.क. हिंदी के सबसे चर्चित कवियों में से एक होकर उभरे हैं। उन्होंने एक काव्यात्मक न्याय के लिए प्रचलनों के बीतने की प्रतीक्षा की है। उनकी प्रतीक्षा समाप्त नहीं हुई है, लेकिन उन्हें कुछ राहत है क्योंकि मौजूदा हिं.सा. में उनके प्रकट-अप्रकट ‘प्रॉपर प्रशंसक’ अभी हिंदी के किसी भी दूसरे कवि से ज्यादा भासते हैं। उनकी कविता के प्रेमियों की दर्ज-बेदर्ज और लिखित-वाचिक प्रतिक्रियाएं हिंदी कविता संसार में उनके कवि के ‘अन्यत्व’ को पुख्ता करती हैं। उनके इस उदय और उभार ने तमाम चिढ़े हुए, अयोग्य, औसत और जलनशील तत्वों को उनके खिलाफ भी सक्रिय कर दिया है। इसके साथ ही उनके उन शत्रुओं का यहां क्या ही उल्लेख किया जाए जिनका प्रज्ञा-क्षेत्र ही बाधित है और जिनका पूरा व्यक्तित्व और लेखन कृ.क. के शाश्वत किए-धरे के आगे बहुत संक्षिप्त और सस्ता लगता है। कृ.क. जिस शैली और शाला से खुद को जोड़ते हैं, वहां यश के साथ अपयश मुफ्त मिलता है और इसलिए उनके अपयश से ‘यश’ कमाने वालों की भीड़ भी इधर बहुत भारी हो गई है। इस भीड़ में अधिकांश ऐसे हैं जो ‘भीड़’ को ‘भीर’ और ‘भारी’ को ‘भाड़ी’ लिखते हैं।

कभी निराला के लिए नागार्जुन ने लिखा था : ‘‘उसे मरने दिया हमने रह गया छुट कर पवन/ अब भले ही याद में करते रहें सौ-सौ हवन।’’ यह लिखाई बताती है कि हिं.सा. में मरण का बहुत माहात्म्य है, यह ज्ञानरंजन भी बहुत पूर्व में कह चुके हैं। मुझे यह कहना भला तो नहीं लग रहा है, लेकिन मुझे लगता है कि कृ.क. के जीते-जी शायद उन्हें वह प्रतिष्ठा नहीं मिलेगी जिसके वह हकदार हैं। आज हिं.सा. में कृ.क. का मौखिक और कुटिल विरोध उनके लिखित विरोध से कई गुना बढ़ चुका है। उन पर हो रहे आक्रमण कभी निराला पर हुए आक्रमणों की याद दिलाते हैं। इस तरह देखें तो हिंदी कविता और आवारगी की ही नहीं कृ.क. अपमान की परंपरा को भी आगे बढ़ा रहे हैं। इस अपमान में भी आनंद की तलाश उनकी सहज-वृत्ति है। इसके लिए वह जिस सिद्ध ‘विट’ तक जाते हैं, वह एक साथ उनके कुछ मित्रों और कई शत्रुओं का निर्माण करती है। इन शत्रुओं में औसत कवि-कवयित्री, फूहड़ लेखक-लेखिकाएं, मतिमंद और माफिया आलोचक, अर्थपिशाच प्रकाशक, काहिल प्राध्यापक और उनके निकम्मे शोधार्थी, मानसिक रूप से दिवालिए पत्रकार, चालू और हद दर्जे के बेवकूफ टिप्पणीकार, भ्रमरवृत्तिदक्ष दलाल और प्रतिभा-प्रभावशून्य युवक-युवतियां शामिल हैं। इस पर सोचा जाना चाहिए कि आखिर एक कवि इतने सारे मूर्त शत्रुओं के बीच रहकर कैसे काम करता है :

जनवरी बलात्कार के लिये मुफीद महीना है

फरवरी में किसी का भी कत्ल किया जा सकता है

मार्च लड़कियों के घर से भागने का मौसम है

अप्रैल में किया गया अपहरण फलदायक होता है

मई में सामूहिक हत्याकांड अच्छे से किया जा सकता है

जून के महीने में दलितों के घर लहककर जलते हैं

जुलाई में मुसलमानों को मारा जा सकता है

अगस्त में तो बच्चे मरते ही हैं

सितंबर में किसान चाहें तो पेड़ों से लटक सकते हैं

अक्टूबर में डिफाल्टर देश छोड़कर भाग सकते हैं

नवंबर गोरक्षकों के लिए आरक्षित है

वे किसी भी निरपराध नागरिक को सरे-आम मार सकते हैं

दिसंबर में आप आंसू बहा सकते हैं

प्रायश्चित कर सकते हैं

और अगर चाहें तो कृष्ण कल्पित के विरुद्ध विज्ञप्ति जारी कर सकते हैं!

 

[ नया बारामासा ]

 

बुरी खबर और भयावह यथार्थ को कविता में लाने के लिए कृ.क. कविता को किसी अपराध की तरह संभव करते हैं। अन्याय, शोषण और गैर-बराबरी के विरुद्ध लड़ने का उनका तरीका एक ‘नैतिक कवि’ का तरीका नहीं भी लग सकता है। इस लड़ाई में वह ‘राजनीतिक रूप से गलत’ भी नजर आ सकते हैं, लेकिन उनका पक्ष और स्थिति बहुत स्पष्ट है। दरअसल, वह बहुत तत्कालप्रिय ढंग से उम्मीद और नाउम्मीदी में होना नहीं जानते हैं और न ही वह अपने कवि और कविता और कथ्य की शर्त पर सबको खुश रखना चाहते हैं। वह उस प्रतिबद्धता से खुद को अलग करते चलते हैं, जिसका दांव पर कुछ भी नहीं लगा होता :

वह दिन जरूर आएगा जब मुझे मार गिराया जाएगा

 

मेरा जीवन हत्यारों का चूका हुआ निशाना है!

[ चूका हुआ निशाना ]

 

कृ.क. की अब तक प्रकाशित कविता-सृष्टि में यह बात बहुत स्पष्ट नजर आती है कि वह एक साथ साहित्यिक और सामाजिक कवि हैं। इस दर्जा साहित्यिक कवि कि समाज उन्हें पढ़-सुनकर बहुत सहजता से साहित्यिक हो सकता है। यह एक जनकवि के होने की अलामत है। एक जनकवि खुद को और जन के दुख को सुनाना जानता है। इस जिक्र में यह कहने में कोई हर्ज नहीं है कि मौजूदा दौर में सही मायनों में हिंदी में जनकवि होने की विशेषता सिर्फ कृ.क. में ही दृश्य होती है। यह हमारी भाषा और उसमें कविता का दुर्भाग्य है कि कृ.क. की काव्य-प्रतिभा के साथ-साथ उनकी इस विशेषता के साथ भी न्याय नहीं हुआ। उनकी इस क्षमता को पहचानकर भी नजरअंदाज किया गया। बौद्धिकों और जनता दोनों को ही आकर्षित करने वाली कृ.क. की कविताओं में वे सारे अवयव हैं जो एक जनकवि का निर्माण करते हैं। हिंदी की औसतताओं के कौआरोर में उनकी कविता महज किताबी नहीं है। वह यात्राएं करना जानती है, खुद को गाना और कंठ में बसना भी। यह कविता जन को संस्कारित करने की काबिलियत रखती है, लेकिन इसे प्रशंसक मिलते हैं, जन नहीं मिलते, पाठक मिलते हैं, वे आलोचक नहीं मिलते जो इस कविता को जन के बीच प्रतिष्ठित कर सकें। यहां सार्त्र को याद कीजिए जिन्होंने कहा था कि मेरे पास पाठक हैं, लेकिन मुझे जनता चाहिए।

लड़कपन से ही कवि-कर्म में संलग्न कृ.क. के कवि के निर्माण में तुलसी, सूर, मीरा, कबीर की तरह ही मीर, ग़ालिब, ज़ौक़, नज़ीर और हाफ़िज़, बेदिल, शेखसादी और कालिदास, भवभूति, भर्तृहरि और खुसरो का योगदान है। यह स्वयं कवि ने स्वीकारा है और यह भी कि उसकी हिंदी में उर्दू सहज रूप से विद्यमान रहती है। कृ.क. हिंदी नहीं हिंदवी का कवि कहलाना पसंद करते हैं। हिंदवी वह है जिसमें मीर लिखते थे।

आलोचना और प्रशंसा दोनों से ही अब तक आहत नहीं हुए कृ.क. वरिष्ठों में सबसे युवा हैं और युवाओं में सबसे वरिष्ठ, स्वीकृतों में वह सबसे बहिष्कृत हैं और बहिष्कृतों में सबसे स्वीकृत। वह मुक्त वैभव में छंद हैं और छंद वैभव में मुक्त। जहां सब मुखर हैं, वहां वह चुप हैं और जहां सब चुप हैं, वहां वह मुखर। वह कवियों की जमीन जानते हैं और जमीन की कविता भी। भुला दिए गए शब्दों को वे जमा करते हैं और घिसे हुए शब्दों को हटाते रहते हैं। उनके शब्दों में दृश्य हैं, लेकिन फिल्म बनाने की एक धुंधली-सी इच्छा बहुत बार मन में जगने के बावजूद वह आज तक एक भी फिल्म नहीं बना पाए हैं। बचपन से लेकर अब तक के बहुत सारे ऐसे दृश्य उनकी आंखों के सामने से गुजरे हैं, जब उन्हें लगा है कि एक फिल्म बनानी चाहिए। कस्बे के घर के आंगन में गोबर से लिपे हुए चूल्हे को फूंक मारकर सुलगाती हुई दादी की आंखों से निकलते हुए आंसू, अपने लंबे कानों को जोर-जोर से हिलाकर तितर-बितर करती हुई काले छबकों वाली बकरी और चटख-चटख करती हुई लकड़ियां— यह सब देखकर पहली बार उन्हें लगा था कि केवल दृश्यों के माध्यम से भी कुछ रचा जा सकता है। यह बहुत पुरानी बात है, जब उनके पिता होर्डिंग्स बनाया करते थे और उनसे रंगों की पुताई करवाते थे। चाक्षुष सौंदर्य और मानवीय क्रियाओं से भरे-पूरे ऐसे न जाने कितने दृश्यों का एक अंतहीन और अटूट सिलसिला यहां तक चला आया है। कुछ रचने की इस आरंभिक अकुलाहट ने ही उन्हें कवि-कर्म में प्रवृत्त किया। यहां पूर्व में दर्ज उनके रियाज, काव्य-प्रवेश और काव्य-विकास को याद करें तो उनकी कविताएं सिनेमा से जुड़े उनके स्वप्न और उनकी आकांक्षा का प्रतिफलन लगती हैं :

कभी-कभी यह सोचकर घबरा जाता हूं कि अचानक फिल्म बनाने की सुविधाएं पा गया तो क्या करूंगा? फिल्म बनाने से पहले पांच-दस हजार फुट कच्ची फिल्म बिगाड़नी चाहिए। अब तक बिगाड़ देनी चाहिए थी। पहली बार में पांच-सौ फुट में से साढ़े चार सौ फुट फिल्म सही निकाल पाना कितना मुश्किल होगा। लेकिन अगर ऐसा हुआ भी तो क्या इस बात का डर, तनाव और एक किस्म का निजी आतंक भी मेरी रचनात्मकता का हिस्सा नहीं रहेगा? इस ‘अभाव’ को भी तो रचनात्मकता में बदला जा सकता है।

[ पसरी हुए रेत पर ]

अभाव को रचनात्मकता में बदलती हुई कृ.क. की कवि-छवि में कुछ पुराने शब्द, कुछ भावनाएं और कुछ अनगढ़पन सदा नजर आता रहा है। कमजोर जिंदगी के बयान छुपाने की कोशिश उनकी कविता ने अब तक नहीं की है :

नई दिल्ली के कवियो!

चाहे जितनी कमजोर दिखे मैं अपनी कविता नहीं बदलूंगा

 

[ दिल्ली के कवि ]

 

ऊपर उद्धृत पंक्तियां साल 1987 में हुई कृ.क. की एक कविता से हैं। वह बार-बार दिल्ली में आते और बार-बार दिल्ली से जाते रहे हैं। साल 1988 में हुई उनकी एक और कविता में इस बीच के ब्यौरे कुछ यों सामने आते हैं :

कुछ कवि हो गए मशहूर कुछ काल-कवलित

कुछ ने ढूंढ़ लिए दूसरे धंधे मसलन शेयर बाजार

 

कुछ डूबे हुए हैं प्रेम में कुछ घृणा में

 

कुछ ने ले लिया संन्यास कुछ ने गाड़ी

 

कुछ लिखने लगे कहानी कुछ फलादेश

 

इनके बीच एक कवि है जिसे अभी याद हैं

पिछली लड़ाई में मारे गए साथियों के नाम

उसके पास अभी है एक नक्शा!

[ नक्शा ]

‘नक्शा’ आलोकधन्वा को समर्पित है, लेकिन इसमें कृ.क. का सफर भी साफ नजर आता है। इस नजर आने में बहुत दूर-दूर से चलकर दिल्ली आती हुई रेलगाड़ियां हैं जिनमें कवि हैं — दुनिया की सबसे पुरानी कला के मजदूर — अपने अभावों, पुकारों और तकलीफों के साथ। वे ऋतु कोई भी हो शोक में डूबे हुए हैं — आंसुओं को रोकने की कला सीखते हुए — देश की अलग-अलग दिशाओं से आए हुए वे दिल्ली की अलग-अलग दिशाओं में भटक रहे हैं, उन्हें कोई काम नहीं मिल रहा है :

वे जिंदा रहने को आते हैं दिल्ली और मारे जाते हैं

भूख से बेकारी से उपेक्षा से मरते हैं वे

[ कवियों की कहानी ]

एक कवि गोरख पांडे की याद में लिखी गई यह ‘कवियों की कहानी’ एक दूसरे कवि कृ.क. ने लिखी है यह सोचकर :

होती है हर एक कवि की अपनी एक कहानी

जिसे लिखता है एक दूसरा कवि

 

इस साहित्यिक और बौद्धिक वातावरण को बहुत करीब से देखते हुए कृ.क. की और हिंदी की उम्र में धीमे-धीमे चलते हुए वह वक्त नजदीक आ गया, जब उन्होंने इस वातावरण के विरोधी कवि के रूप अपनी काव्य-भाषा और शैली के लिए नए आयाम पाने का संघर्ष प्रारंभ किया। पूरब की पूरी कविता और काव्य-शास्त्र की पूरी परंपरा में आवाजाही और उससे मुठभेड़ करते हुए कृ.क. की उम्र में वे वर्ष भी आए, जब वह समकालीन हिंदी कविता के लिए बिल्कुल बेगाने हो गए :

इस जरीगोटेदार भाषा के बांदी समय में

कौन समझेगा कि मुझ पगलैट को तो

अपने ही खोजे शब्दों के बदरंग चिथड़े प्यारे हैं

 

[ शब्दों के चिथड़े ]

कृ.क. ने मध्यकाल की मीरा की कविता और जीवन को केंद्र में रखते हुए ‘कोई अछूता सबद’ में हिंदी में लोकप्रिय हुए तत्कालीन स्त्री-विमर्श को समझने की कोशिश की :

तुम जो पहनाओगे पहनूंगी

जो खिलाओगे खाऊंगी

तुम जहां कहोगे वहां बैठ जाऊंगी

कहोगे तो बिक जाऊंगी बाजार में

[ ढलती रात में ]

संसार एक नई शताब्दी से परिचित हो चुका था, लेकिन हिंदी कविता संसार कृ.क. से अब तलक एक अपरिचित की तरह बर्ताव कर रहा था। उनकी आवारगी बढ़ती जा रही थी और आवारा पंक्तियां और सूक्तियां उन पर आयद हो रही थीं और वह उन्हें इस उम्मीद में प्रकाशित करवाते जा रहे थे कि शायद वे एक रोज मानवता के काम आएंगी :

कभी प्रकाश में नहीं आता शराबी

 

अंधेरे में धीरे-धीरे विलीन हो जाता है

[ एक शराबी की सूक्तियां, 35 ]

 

कृ.क. की एक कहानी ‘शराबघर’ के नायक की मरने की इच्छा शराब पीने के बाद अधिक प्रबल हो उठती है। वह एक रोज अपनी मृत्यु संबंधी सारी कविताओं को एक डायरी में उतारता है और डायरी के पहले पृष्ठ पर लिखता है :

‘मैं मरना चाहता हूं।’

 

लेकिन वह मरा नहीं, वह आज तक शराबघरों में भटक रहा है। उसकी सूक्तियों को जानने वालों की संख्या बढ़ती चली जा रही है, लेकिन अभी भी उसे जानने वाले बहुत कम हैं।

‘एक शराबी की सूक्तियां’ को कृ.क. ने अपना ‘मुक्तिप्रसंग’ कहा है और राजकमल चौधरी ने ‘मुक्तिप्रसंग’ को अपना वर्तमान :

‘‘…मैं अपने अतीत में राजकमल चौधरी नहीं था। भविष्य में यह प्रश्नवाचक व्यक्ति और इस व्यक्ति की उत्तर-क्रियाएं बने रहना मेरे लिए संभव नहीं है। क्योंकि, मैं केवल अपने वर्तमान में जीवित रहता हूं। …अतएव, ‘मुक्तिप्रसंग’ मेरा वर्तमान है। …मृत्यु की सहज स्वीकृति से देह की सीमाओं, संगतियों और अनिवार्यताओं से मुक्त हुआ जा सकता है। …ऑपरेशन थिएटर की सफेद टेबल पर संज्ञाहीन होते हुए, मैंने ऐसा अनुभव किया है। मैंने अनुभव किया है कि स्वयं को और अपने अहं को मुक्त किया जा सकता है। …इस अनुभव के साथ ही, दो समानधर्मा शब्द जिजीविषा और मुमुक्षा इस कविता के मूलगत कारण हैं। …सती-वर्तमान के अग्निजर्जर शव को अपने कंधों पर, मैं शिव की तरह धारण करता हूं। मैं इस शव के गर्भ में हूं, और यह शव मेरे कंधों पर है। इसकी विकृति, वीभत्सता और दुर्गंधियों में मुझे जीवित रहना ही पड़ेगा। जीवित ही नहीं, मुक्त और स्वाधीन भी रहना होगा।’’

 

राजकमल चौधरी को यहां उद्धृत करने की जरूरत इसलिए महसूस हुई ताकि यह कहा जा सके कि कृ.क. की प्रत्येक प्रकाशित कृति कृ.क. का ‘मुक्तिप्रसंग’ ही प्रतीत होती है। उनकी प्रत्येक कृति उनकी पूर्व और आगामी कृतियों से मुक्त और स्वाधीन है। बहरहाल, लोक के अवलोकन और अर्थ के आरोह-अवरोह और मिजाजे-सुखन की अच्छी तरह शिनाख्त करने में व्यस्त उनकी आवारगी के नए-नए रंग एक के बाद एक हिंदी कविता संसार के मुंह पर खुलने लगे। उनकी कविता का वह बंद दरवाजा जिसे हिंदी साहित्य के समकालीन बौद्धिक वातावरण में कोई खटखटा नहीं रहा था, उन्होंने उसे खुद ही खोल दिया और बाद इसके इस वातावरण में बेचैनियां, सरगोशियां, गलतफहमियां फलने-फूलने-फैलने लगीं। बेइंसाफी के यथार्थ में कृ.क. बहुत बेपरवाह नजर आए और उनकी कविता पूर्व-अपूर्व कवियों के नक्षत्र-मंडल को तहस-नहस करने के इरादे से परंपरा में कुछ इस प्रकार धंसी कि सूक्ति, संदेश, अफवाह, अधूरा वाक्य, चेतावनी, धमकी, शास्त्र, इतिहास, कथा और नामालूम क्या-क्या हो गई :

 

विलग होते ही

बिखर जाएगी कलाकृति!

 

[ एक शराबी की सूक्तियां, 78 ]

नगर ढिंढोरा पीटता फिरता हूं हर राह

रोज रात को नौ बजे करता हूं आगाह

 

[ बाग़-ए-बेदिल, पृष्ठ-41 ]

 

कल्पितजी को हो गया काव्य-शास्त्र से प्यार

देखो क्या अंजाम हो भवसागर या पार!   

 

[ कविता-रहस्य, 24:6 ]

 

मैं अपने दोनों हाथ ऊपर उठाकर एक बार फिर कहता हूं :

यह महादेश चल नहीं सकता

 

[ हिंदनामा : एक महादेश का महाकाव्य, 52 ]

…यह कोई शिगूफा नहीं मेरा शिकस्ता दिल ही है जो इतिहास की अब तक की कारगुजारियों पर शर्मसार है जिसका हिंदी अर्थ लज्जित बताया गया है जिसके लिए मैं शर्मिंदा हूं और इसके लिए फिर लज्जित होता हूं कि मुझे अब तक क्यों नहीं पता था कि मांस के शोरबे को संस्कृत में यूष कहा जाता है शोरिश विप्लव होता है 1857 जैसा धूल उड़ाता हुआ एक कोलाहल और इस समय मैं जो उर्दू-हिंदी शब्दकोश पढ़ रहा हूं जिसके सारे शब्द कुचले और सताए हुए लोगों की तरह जीवित हैं…

 

[ रेख़ते के बीज : उर्दू-हिंदी शब्दकोश पर एक लंबा पर अधूरा वाक्य ]

कविता लिखना अपराध है

किसी खास मकसद के लिए किया गया जुर्म


कविता पुरस्कृत होने की कला नहीं सजायाफ्ता होने की छटपटाहट है

जो सभागारों में सिसक रहे हैं वे कवि नहीं हैं

कवि वे हैं जो रूमाल से अपना चेहरा छिपाए संसार से छुपते फिरते हैं


[ कविता के विरुद्ध ]

कृ.क. की कविता-सृष्टि से प्रस्तुत इन उद्धरणों के उजाले में यहां यह भी ध्यान देने योग्य है कि काव्य-स्फीतियों और विस्फोटों के आगे नतमस्तक हिं.सा. की मुख्यधारा की कविता में जिस वस्तु को कविता-संग्रह कहकर पुकारा जाता है, ऐसी एक भी वस्तु साल 1990 के बाद से कृ.क. की अब तक सामने नहीं आई है। लगभग तीन-साढ़े तीन दशक प्राचीन कृ.क. की कविता-सृष्टि में कविता-संग्रह इन पंक्तियों के लिखे जाने तक सिर्फ एक ही है— ‘बढ़ई का बेटा’। इस दरमियान उन्होंने अपनी विवादास्पदता के अंतरालों में ‘रेख़ते के बीज’, ‘साइकिल की कहानी’, ‘अकेला नहीं सोया’, ‘कविता के विरुद्ध’, ‘खाली पोस्टकार्ड’, ‘मीठा प्याज’, ‘वापस जाने वाली रेलगाड़ी’, ‘राख उड़ाने वाली दिशा में’, ‘वरिष्ठ कवियो’, ‘अपना नाप’, ‘पानी’, ‘एक कवि की आत्मकथा’, ‘नया बारामासा’, ‘एक अधूरा उपन्यास’, ‘अफीम का पानी’, ‘प्रसिद्ध’, ‘खून के धब्बे’, ‘नया प्रेम’, ‘चूका हुआ निशाना’ जैसी चर्चित पर असंकलित कविताएं लिखने के अलावा जो कुछ भी लिखा है — वह संग्रह के लिहाज से नहीं — किताब की तरह लिखा है। यह गौरतलब है कि कृ.क. की किताबें एक जिल्द में प्रकाशित होने से पूर्व ही प्रकाशित हो रहती हैं। उनकी कविताएं उनकी तरह ही बिखरी हुई हैं। वे उन सारी जगहों पर बिखर गई हैं, जहां वे प्रकाशित हो सकती हैं। एक विकास-क्रम में बिखरना और निखरना… कृ.क. की कविता-सृष्टि के दो संयुक्त-तत्व हैं। समय से और समकालीनता से सताए हुए कृ.क. इस लोक के तमाम स्मृत-विस्मृत कवियों के कुल के हैं। आवारापन में वह बुद्ध के कुल के हैं। फक्कड़पन में वह कबीर और मीरा के कुल हैं। संस्कृत में वह भर्तृहरि, बाणभट्ट और राजशेखर के कुल के हैं। उर्दू में वह मजाज़ और मंटो के कुल के हैं। हिंदी में वह निराला, उग्र, भुवनेश्वर और राजकमल चौधरी के कुल के हैं।

कृ.क. की कविता-सृष्टि का काव्य-पुरुष प्रचलन के विपर्यय में और प्रयोग के पक्ष में सतत सक्रिय, रचनात्मक, सांसारिक और विवादात्मक रहा है। उनके काव्य-पुरुष के इस संघर्ष को समझने के लिए ‘बाग़-ए-बेदिल’ की स्थापना बहुत काम आ सकती है। यह स्थापना उनके लेखे उनकी एक लिखी जा रही पुस्तक ‘आवारगी का काव्यशास्त्र’ का प्रथम अध्याय है। यह अध्याय एक रचयिता की आवारगी का अनूठा विश्लेषण है। राजशेखर की ‘काव्य-मीमांसा’ के एक श्लोक के आश्रय से यहां स्पष्ट होता है कि आवारगी से जांघें दृढ़ हो जाती हैं। आत्मा भी मजबूत और फलग्राही हो जाती है और उसके सारे पाप पथ पर ही थक कर नष्ट हो जाते हैं। दो हजार पन्नों की सामग्री को संपादित करने के बाद पांच सौ बारह पन्नों में समाए ‘बाग़-ए-बेदिल’ के जिल्दबंद होने से पहले इस किताब के कुछ और नाम भी थे — ‘समकालीन संदेश रासक’, ‘शैतान के श्लोक’ और ‘पार्थ और सार्त्र’ — लेकिन पक्की स्याही से छपने के बाद अब इसका सिर्फ एक नाम है— ‘बाग़-ए-बेदिल’। समकालीन हिं.सा. की व्यावहारिक राजनीति में एक अज्ञात-अनाम-अजनबी कवि की तरह व्यवहृत कृ.क. ने इस किताब को यह सोचकर शाया करवाया कि यूरोपीय, मुगल, गॉथिक और आधुनिक शिल्प की समकालीन हिंदी कविता की इमारतों के बीच, ‘बाग़-ए-बेदिल’ के ये खंडहर शायद बुरे नहीं लगेंगे :

‘कद्र जैसी मेरे शे’रों की अमीरों में हुई,

वैसी ही उनकी भी होगी मेरे दीवान के बीच!’

 

इसी तरह ‘बाग़-ए-बेदिल’ में भी आपको

नकली कवियों

मंदबुद्धि संपादकों

डॉनों

मठाधीशों

गॉडफादरों इत्यादि

कुलीन कातिलों का चेहरा दिखाई पड़ेगा पार्थ!

 

पढ़ते

सुनते

देखते रहिएगा—

 

कल्ब-ए-कबीर और कला कातिलों की जंग का

यह हैरतअंगेज जासूसी काव्य!

 

[ कला कातिल-2 ]

‘बाग़-ए-बेदिल’ हिंदी साहित्य के एक विशेष कालखंड का व्यंजनात्मक इतिहास है। विलुप्त काव्य-पंक्तियों, धुनों, लयों, छंदों का पुनर्वास करती हुई यह कृति एक वाचिक वैभव का लिखित पाठ है। आक्रामकता और आत्ममुग्धता से लबालब ‘बाग़-ए-बेदिल’ के बारे में समादृत कवि अरुण कमल का यह कथन उद्धृत करने योग्य है : ‘‘कौन-सा ऐसा समकालीन है जिसके तरकश में इतने छंद हैं, इतने पुष्प-बाण? आवाज और स्वर के इतने घुमाव, इतने घूर्ण, इतने भंवर, इतनी रंगभरी अनुकृतियां हैं। कई बार तो इनमें से कुछ पदों को पढ़कर मैं ढूंढ़ता हुआ क्षेमेंद्र या राजशेखर या मीर या शाद तक पहुंचा। ये कविताएं हमारे अपने ही पते हैं खोए हुए, उन घरों के पते, जहां हम पिछली सांसें छोड़ आए हैं। इन्हें पढ़कर लगता है कि हिंदी कवि के पास खुद अपनी कितनी बड़ी और चौड़े पाट वाली परंपरा है।’’

इस सबके बावजूद यह हाल है कि क्या कहा जाए… हिंदी संसार में यों लगता है जैसे शत्रुओं की तो छोड़िए कोई शुभचिंतक मित्र भी पूरा का पूरा कृ.क. का अपना नहीं। कृ.क. का जिक्र आने पर वे या तो चुप रहते हैं या आधे दिल से विहंस कर पैरवी करते हैं या बात बदलने का यत्न। एक अक्षय परंपरा में आवारा भटकने के लिए कृ.क. अकेले कर दिए गए हैं, लेकिन वह इस तरह के पहले और अकेले कवि नहीं हैं। उन जैसे कवियों को इसलिए एक और मन मिलता है— कभी न थकने वाला। मन जो हवाओं-सा तेज नहीं, लेकिन जानता है कि उसे उड़ना ही है— एक जारी कवि-समय में अपने काव्य-पथ और समानधर्माओं की तलाश में। मैं इस आलोचना को यहां खत्म नहीं कर रहा हूं, बस कुछ वक्त के लिए रोक रहा हूं, यह सोचकर :

समझदार था मूरख भी था

दीवाना भी वह किंचित था

 

अश्रु आंख में और हृदय में

युगों-युगों का दुख संचित था

उसकी कही हुई बातों में

आखर कम अरथ अमित था

 

जाने दो वह कवि कल्पित था!    

***

 

संदर्भ :

प्रस्तुत आलेख में कृष्ण कल्पित की अब तक प्रकाशित कविता और कविता से संबंधित छह किताबों — राजस्थान साहित्य अकादेमी से प्रकाशित ‘भीड़ से गुजरते हुए’ (1980), रचना प्रकाशन, जयपुर से प्रकाशित ‘बढ़ई का बेटा’ (1990), कलमकार प्रकाशन, जयपुर से प्रकाशित ‘कोई अछूता सबद’ (2003), अंतिका प्रकाशन, गाजियाबाद से प्रकाशित ‘बाग़-ए-बेदिल’ (2013), दखल प्रकाशन, दिल्ली से प्रकाशित ‘एक शराबी की सूक्तियां’ (2015) और बोधि प्रकाशन, जयपुर से प्रकाशित ‘कविता-रहस्य’ (2015) — को आधार बनाया गया है। इसके अतिरिक्त जिल्दबंद होने से पूर्व ही सोशल नेटवर्किंग साइट ‘फेसबुक’ पर स्वयं कवि के द्वारा ही प्रकाशित ‘हिंदनामा : एक महादेश का महाकाव्य’ को भी पाठ में लिया गया है। कवि की फेसबुक टाइमलाइन के साथ इंटरनेट की दुनिया में यत्र-तत्र बिखरी कविताओं को भी प्रयोग में लिया गया है। ‘जनसत्ता’, ‘संबोधन’, ‘जलसा’, ‘पाखी’ और ‘इंडिया टुडे साहित्य वार्षिकी’ जैसे पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित कवि के काम और कविताओं पर भी नजर मारी गई है और टेलीविजन और सिनेमा को केंद्र में रखकर लिखे गए लेखों-टिप्पणियों की कलमकार प्रकाशन, जयपुर से प्रकाशित किताब ‘छोटा परदा बड़ा परदा’ पर भी। निराला के लिए नागार्जुन द्वारा लिखी गई पंक्तियां यात्री प्रकाशन से प्रकाशित निराला पर केंद्रित नागार्जुन की किताब ‘एक व्यक्ति : एक युग’ (1992) के समर्पण-पृष्ठ से हैं। राजकमल चौधरी का कथ्य देवशंकर नवीन के संपादन में वाणी प्रकाशन से आए उनकी कविताओं के एक चयन ‘ऑडिट रिपोर्ट’ (2006) में शामिल लंबी कविता ‘मुक्तिप्रसंग’ से पहले दी गई टिप्पणी से लिया गया है। अरुण कमल को उद्धृत करने के लिए ‘बाग़-ए-बेदिल’ के आखिरी पन्ने को धैर्य से पढ़ा गया है। प्रस्तुत आलेख की शुरुआत और आखिरी अनुच्छेद पर विष्णु खरे की कविता ‘कूकर’ की छायाएं हैं, कहीं-कहीं इस कविता की कुछ पंक्तियां जस की तस, कहीं कुछ बदलकर ले ली गई हैं। इसके लिए विष्णु खरे के प्रति आलेखकार कृतज्ञ है।

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साभार: पहल 110

 

आभासी पटल (सोशल साइट्स) के बाहर ‘कुंठित मन’ की ‘निर्लज्ज अभिव्यक्तियाँ’ कितनी अमानवीय होती हैं, वह जानी-पहचानी है. अविनाश के पास ‘कूटनीति’ की भाषा नहीं है, जिसका सबसे सजग इस्तेमाल आभासी लोक-वृत्त के दायरे में किया जाता है. जिस दिन उसके पास यह आ जायेगी, वह ख़त्म हो जाएगा.  यह आभासी-व्यवहार और कुछ नहीं, बल्कि हाल-चाल, दुआ-सलाम की भाषा को पाने का ही करतब है. यह भाषा आदमी को दलाल, अवसरवादी, व्यवसायी बना सकती है लेकिन रचनाकार नहीं. यह ‘सर्वधर्म-समभाव’ की सबसे उपजाऊ जमीन है. जहाँ भाषा गूगल-ट्रांसलेट हो जाती है. अविनाश से संपर्क -स्थापित हेतु  darasaldelhi@gmail.com का इस्तेमाल कर सकते हैं.

कविता की अवांगार्द परंपरा: हरी चरन प्रकाश

मेकिंग इट न्यू : मॉडर्निज़्म इन मलयालम, मराठी ऐन्ड हिन्दी पोएट्री  का प्रकाशन इंडियन इंस्टीच्यूट ऑफ़  एड्वान्सड् स्टडी द्वारा वर्ष 1995 में किया गया है। इसके लेखक ई. वी. रामकृष्णन हैं। भारतीय साहित्य के अध्येताओं के लिए ई. वी. रामकृष्णन एक जाना पहचाना नाम है। 2005 में उनके द्वारा चुनी गई कहानियों (1900-2000) का एक संकलन, साहित्य अकादमी ने प्रकाशित किया है। ई.वी.आर. अंग्रेजी में लिखते हैं।

प्रस्तुत पुस्तक मलयालम, मराठी और हिन्दी की आधुनिकतावादी कविता की सामाजिकी के मूल्यांकन का एक प्रयास है। लेखक का यह मानना है कि भारतीय कविता में आधुनिकतावाद कोई एकनिष्ठ आन्दोलन नहीं रहा है। उन्होंने कविता के उच्च आधुनिकतावादी महानगरीय मुहावरे और अवांगार्द कवियों के आमूलचूल परिवर्तनवादी (रेडिकल) स्वरों के बीच जो वैचारिक द्वन्द है, उसकी पहचान की है। मलयालम, मराठी और हिन्दी की काव्य परम्परा में आधुनिकतावाद के गतिपथ का संधान करते हुए ई. वी. रामकृष्णन ने अय्यप्पा पणिकर, धर्मवीर भारती, दया पवार, नामदेव ढसाल, गजानन माधव मुक्तिबोध, एम. गोविन्दन, दिलीप चित्रे, अरूण कोलतकर, कदमनित्ता रामकृष्णन, के. जी. शंकर पिल्लई, केदारनाथ सिंह और के. सच्चिदानन्दन की काव्यालोचना के जरिये आधुनिक भारतीय कविता में फार्म और कन्टेन्ट की द्वन्दात्मकता पर प्रकाश डाला है। #लेखक 

आधुनिकतावाद का कवित्त विवेक

By हरी चरन प्रकाश

स्थान और मेरी स्वयं की सीमाओं के कारण प्रस्तुत आलेख सम्प्रति मुक्तिबोध पर ही समाप्त करना पड़ा है। परन्तु इसके पूर्व सही सन्दर्भ की स्थापना करने के लिए यह आवश्यक  प्रतीत होता है कि विचाराधीन पुस्तक के इंट्रोडक्शन  तथा उसके संक्षेप में ‘द ट्रजेक्टरी ऑफ़ मॉडर्निज़्म इन इंडियन पोएट्री: एन ओवरव्यू’अध्याय के अंतर्गत (I) टुवर्ड्स मटिअरिलिस्टिक व्यू ऑफ़ मॉडर्निज़्म इन  इंडियन पोएट्री (II) ऐमबिव्अलन्स् ऐज रेजिस्टंस मिथ एंड मॉडर्निज़्म (III) ‘मीनिंग्स चेंज विद चेंजिंग क्वेसचंस फ्रॉम हाइ मॉडर्निज़्म टू द अवांगार्द’ के शीर्षकों के अधीन भारतीय कविता में आधुनिकतावाद की जिन प्रवृत्तियों का परिचय दिया गया है, उसका समुचित उल्लेख किया जाए। शायद यह लिखने की जरूरत नहीं है कि यह अध्यायक्रम हमें पूर्वोक्त कवियों के रचनात्मक विमर्श के बारे में तैयार करता है।

पुस्तक का परिचय देते हुए ई.वी.आर. पहले अपने उदेश्य को स्पष्ट करते हैं। स्वयं उनके कथनानुसार उन्होंने आधुनिकतावाद के आन्दोलन के दृष्टिपथ का संधान करते हुए उसकी महत्वपूर्ण प्रवृत्तियों में जो फर्क है उसे चिह्नित करने का प्रयास किया है। मलयालम, मराठी और हिन्दी के कुछ प्रतिनिधि कवियों की कविता का अध्ययन करते हुए उनकी प्राथमिकता यह रही है कि इन भाषाओं की आधुनिकतावादी साहित्यिक प्रावस्था में इनके बीच जो समांतरता और भेद रहे हैं उन्हें जाना जाए बनिस्बत इसके कि पश्चिमी आधुनिकतावाद और उसके भारतीय प्रतिस्थानी के बीच समरूपता ढूंढ़ने की कवायद की जाय। यहां पर शब्द ‘भारतीय’ के बारे में एक टिप्पणी आवश्यक है। अगर हम ‘भारतीय साहित्य’ के नाम से कोई श्रेणी बनाते हैं तो निश्चित  रूप से उक्त श्रेणी में हम एक समजातीय भाव को अंतर्निविष्ट मानते हैं। साहित्यिक विमर्श में ‘भारतीय साहित्य’ का पद उसी समय से प्रचलित हुआ जब से भारत को एक राष्ट्र के रूप में जाना जाने लगा। उल्लेखनीय है कि औपनिवेशिक काल से ही भारत की सांस्कृतिक और राजनीतिक राष्ट्रीयता की पहचान करने का कार्य आरम्भ हुआ। भारत की सांस्कृतिक पहचान के लिए उसके अतीत को खंगालना जरूरी था, खासतौर से उसके साहित्य को जिसमें वैदिक काल भी शामिल था। आरम्भ से ही एक श्रेणी के रूप में ‘भारतीय साहित्य’ एक प्राच्यवादी अथवा भारतविद्याव्यवसायी संरचना रही है। चूंकि भारतीय साहित्य के बारे में यह दृष्टिकोण प्रधानतः एक आध्यात्मिक परम्परा के पाठीय तत्वज्ञान में गूंथा गया है इसलिए भारतीय भाषाओं की कुछ महत्वपूर्ण साहित्यिक रूपरचना इसकी परिधि से बाहर रही है।

आगे, राजनीति या साहित्य की एक कोटि के रूप में ‘भारतीयता’ की अवधारणा को ‘विदेशी’ से अलग या उसके मुकाबले में प्रस्तुत किया जाता है जबकि इसी ‘विदेशी या अन्यदेशी ’ के मुकाबले नाइजीरिया या तन्जानिया का लेखक ’अफ्रीकन’ पद का प्रयोग करता है। इससे ऐसा प्रतीत होता है कि शब्द ‘भारतीय’ कुछ ऐसे मूल्यों की वकालत करना है जो सम्पूर्ण भारत को यूरोप या अफ्रीका की तरह और उसी वज़न पर एक अलग सांस्कृतिक इकाई मानता है। स्वभावतया, भारतीय भाषाओं के साहित्य के बारे में अंग्रेजी में जो लेखन किया जाता है वह भी इसी वैश्विक और शास्त्रीकृत दृष्टिकोण की पुष्टि करता है। प्रो. ई. वी. रामकृष्णन यहां इस बात को भी स्पष्ट करना चाहते हैं कि उनके अध्ययन का उदेश्य अपेक्षतया सीमित और विनीत है। उन्होंने अपने अध्ययन के लिए जो तुलनात्मक रीति नियोजित की है उसमें भारतीय सभ्यता के एकत्व की महिमामय धारणा के तहत चीजों को नहीं देखा गया है। उन्होंने मात्र एक आंतरिक समीक्षा की है जिसमें यह मूल्यांकित करने का प्रयास किया गया है कि मलयालम, मराठी तथा हिन्दी कविता की प्रवृतियों का समकालीन भारत में, जिन्दगी की जद्दोजहद के संदर्भ में, क्या और कितनी सामाजिक प्रासंगिकता है। ध्यातव्य है कि अपने समाज और साहित्य के संदर्भ में एक कवि की विद्रोही या सिंहासनविरोधी भूमिका उसके उस रचनात्मक संघर्ष का हिस्सा है जिसके द्वारा वह अनुभवों की वैकल्पिक शब्दावली विकसित करता है। इतिहास का महाआख्यान, साहित्य की नवविद्रोही प्रवृत्यिों को तब तक आत्मसात नहीं कर सकता है जब तक कि उन प्रवृत्तियों को पालपोस कर घरेलू न बना दिया जाए। इतिहास का दुरमुट और शास्त्रीकरण में निहित पालतू उपयोगिता, कृतिकारों और कृतियों को काल की तलहटी में कुछ ऐसा जमा देती है कि उनकी वर्तमान प्रासंगिकता को ढूंढ़ना मुश्किल हो जाता है। हमें यह भी ध्यान में रखना है कि राष्ट्रीय और क्षेत्रीय आकांक्षाओं के बीच की दूरी, उत्तर औपनिवेशिक काल की अस्मिता बोधक शब्दावली के कारण कुछ और समस्याजनक हो गई है। इस अध्ययन का बृहत्तर सामाजिक संदर्भ, स्वातंत्र्योतर काल की प्रतियोगी अस्मिताओं की चढ़ा-उपरी से सम्बन्धित है जिसको वर्तमान समय के सांस्कृतिक पाठ में उत्कीर्ण राजनीतिक उपपाठ के संदर्भ में अर्थापित किया जा सकता है।

कुछ समय पूर्व के. एम. जॉर्ज द्वारा सम्पादित ‘कम्परेटिव इन्डियन लिटरेचर’ में भारत की पृथक साहित्यिक परम्पराओं को इतिहासबद्ध करने का प्रयास खास तौर पर दिखा है। किताब की दोनों जिल्दों में राष्ट्रीय और क्षेत्रीय के बीच जो दूरी है उसे पाटने का प्रयास नहीं किया गया है क्योंकि भारतीय साहित्य को पृथक अस्तित्वशाली क्षेत्रीय साहित्य का समुच्यय माना गया है। परन्तु, शिशिर कुमार दास ‘अ हिस्ट्री ऑफ़ इंडियन लिट्रेचर’ में इस सीमारेखा को लांघते हैं। उन्होंने भूलभुलैया जैसे जटिल फलक पर भारत की पृथक-पृथक साहित्यक परम्पराओं को जोड़ने वाले कुछ चैराहे और साथ ही कुछ समान्तर गलियारे खोजे हैं। उनके इस दृष्टिकोण से सहमत होने को दिल चाहता है कि भारतीय साहित्य का इतिहास, भारतीय जन की सम्पूर्ण साहित्यिक गतिविधि का इतिहास है। उनकी छोटी या बड़ी समस्त साहित्यिक परम्पराओं के प्रशासन और परिवर्तन, उनके ह्रास और पुनर्जीवन और उनके उत्थान और पतन का लेखा-जोखा है। किन्तु यहां एजाज अहमद की ‘इन थ्योरी: क्लास,  नेशन्स, लिट्रेचरस’ की बिना पर यह भी कहने का मन होता है कि उपरोक्त  आदर्शीकृत दृष्टिकोण में जो एकतामूलक, एककोषी रूझान है वह भूगोल  दर्शन और राष्ट्र-राज्य की विचारधारा के प्रभाव से जन्मा है। चूंकि किसी भी भारतीय भाषा का साहित्य अपने भाषिक समुदाय के संदर्भ में कुछ निश्चित  ऐतिहासिक काम करता है इसलिए उसकी अर्थवत्ता उसकी उसी  विशिष्टता में स्थित है। अगर अमुक अमुक क्षेत्रीय-भारतीय भाषाओं के महत्वपूर्ण साहित्यिक पाठों को खींच-तान कर राष्ट्रीय साहित्यिक इतिहास का हिस्सा बना भी दिया जाय तो इस बात की प्रबल सम्भावना रहेगी कि उक्त पाठ का जो सहजात सम्बन्ध उसके सामुदायिक संदर्भ के साथ है, वह या तो विस्मृत हो जाए या विरूपित हो जाए।

आधुनिकता के बारे में हमारा दृष्टिकोण अधिकतर उन आंग्ल-अमरीकी आलोचकों द्वारा निर्मित है जो राजनीति और संस्कृति के अन्तर्संबंध को तवज्जो नहीं देते हैं। उनकी साहित्यिक टीकाएं अधिकतर आधुनिकतावाद की बहुलतावादी प्रवृत्तियों को ऐसी अमूर्त संहिताओं में ढालती हैं जो बहुराष्ट्रीय संदर्भों में ही क्रियाशील होती हैं। महानगरीय संस्कृति, पश्चिम का पतन, नवाचार, निर्वासित कलाकार जो एक नई भाषा की खोज में निकला है, जैसी विषयवस्तु आधुनिकता के आंग्ल-अमरीकी विमर्श में महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं। विस्थापन, अलगाव और निजवाचक पाठ का आख्यान, कला की ऐसी महिमाशाली ईक्षा के इर्दगिर्द बुना जाता है जो सीमान्त से आगे, वियना, पेरिस, लन्दन और न्यूयॉर्क जैसे पारदेशीय नगरों के बीच आवाजाही करना रहता है। परन्तु इस प्रकार का पाश्चात्य आख्यान, भारतीय कविता के आधुनिकतावादी पाठ में मौजूद सामाजिक और राजनीतिक यथार्थ के दृष्टिगत, कतई प्रासंगिक नहीं है। हालाकि यह भी सही है कि आंग्ल-अमरीकन नमूने से प्रेरित आधुनिकतावाद के इस क्षेत्रातीत प्रारूप को उच्च पाठीयता की उस स्वदेशी परम्परा से भी कुछ सहारा मिला है जिसका रूझान शास्त्रीय ज्ञान की सर्वभारतीय/भारतव्यापी प्रणाली में रहा है। एक अवरोपित विश्वबोध, जो लिखने की तकनीक के लिए सात समुन्दर पार से प्रेरणा ग्रहण करता है, परन्तु अपनी रचना के वैधीकरण के लिए संस्कृत काव्यात्मकता की ओर मुड़ कर देखता है, कविता में स्वच्छन्दतावाद/छायावाद के जमाने से प्रचलित है। संस्कृति के आभिजात्यवादी दृष्टिकोण में जो अमूर्त सार्वभौमिकता है वह मनुष्य के सौन्दर्य संसार को उच्चीकृत करके स्वायत्त बना देती है। भारतीय समाज की पूर्वआधुनिक स्थितियों से किसी ज्ञानमीमांसक विच्छेद के अभाव में सौन्दर्यबोध के उपरोक्त उच्चीकरण/विशेषीकरण का प्रभाव यह होता है कि साहित्य के नए मुहावरे, भिन्नता/दूसरेपन को अगली पंक्ति में बिठा देते हैं। प्रो. ई. वी. रामकृष्णन के अनुसार दूसरेपन की यह गण्यमान्यता आधुनिकतावाद के दौर में सामान्य पाठक और साहित्य के बीच बढ़ती हुई दूरी के लिए उत्तरदायी है।

वी. के. गोकाक की ‘कम्परेटिव इंडियन लिटरेचर’ में से उद्धृत करते हुए ई. वी. आर. लिखते हैं कि भारतीय भाषाओं में प्रगतिशील कविता, रूमानी कविता, आधुनिकतावादी कविता, प्रयोगवादी कविता कुछ आगे-पीछे और कुछ साथ-साथ चलती रही है लेकिन मोटे तौर पर यह कहना चाहिए कि प्रयोगवादी कविता बीसवीं शती के पांचवे छठे दशक में पली बढ़ी जबकि प्रगतिशील कविता की चेतना चौथे दशक में विकासमान हुई।

वी. के. गोकाक ने आधुनिक कविता की परम्पराओं में कोई विभेद नहीं किया है। इसके बरअक्स यू. आर. अनन्तमूर्ति, रामचंद्र शर्मा और डी. आर. नागराज द्वारा सम्पादित पुस्तक ‘विभाव: माडर्निज्म इन इंडियन राइटिंग’ में कहा गया है कि भारतीय आधुनिकतावाद का सबसे रोचक पहलू यह है कि इसने रूढि़वादियों (कन्ज़रवेटिव्स) और आमूलचूल परिवर्तनवादियों (रेडिकल्स) दोनों को अपने भीतर जगह दी है और शायद यह यूरोपीय आधुनिकतावाद और भारतीय आधुनिकतावाद की सबसे महत्वपूर्ण और समान  विशिष्टता है।

पूर्वोक्त अभियुक्ति से किंचित असहमत होते हुए ई. वी. आर. उक्त सम्पादकों के इस नज़रिए पर सवाल उठाते हैं कि क्या दक्षिणपन्थी अडिगा और वामपन्थी मुक्तिबोध एक जैसी युक्तियों का उपयोग करते हुए समान मानसिक अवस्थाओं का अन्वेषण करते हैं? अगर एक क्षण के लिए यह मान भी लिया जाए कि वह समान उपकरणों का उपयोग करते हैं तो इससे भारतीय आधुनिकतावाद में किसी अन्तर्निहित एकता की उपस्थिति प्रमाणित नहीं होती है। सभी तरह के प्रयोगशील लेखन को आधुनिकतावाद की एक छतरी के नीचे लाना सही नहीं होगा। अतः यह आवश्यक है कि आधुनिकतावाद के अंतर्गत रूढि़वाद और आमूलचूल परिवर्तनवाद के बीच के फर्क को स्पष्ट किया जाए। तद्नुसार प्रो. ई. वी. रामकृष्णन ने रूढिवादी प्रवृत्तियों के लिए ‘उच्च आधुनिकतावाद’ और आमूलचूल परिवर्तनवादी को निर्दिष्ट करने के लिए ‘अवांगार्द’ शब्द का उपयोग किया है।

यहां पर यह तथ्य भी विचारणीय है कि भारतीय सन्दर्भ में ‘आधुनिकतावाद’ को यह अपयश भी मिला है कि उसका सौन्दर्यात्मक सांचा भारतीय यथार्थ के एक अच्छे-खासे हिस्से से सामंजस्य नहीं बिठा पाता है। यह भी एक तथ्य है हमारी लिखित और मुद्रित शाब्दिकता से अछूता जो दूसरा भारत है, और फिर भी जिसकी एक जोरदार/तगड़ी उपस्थिति है, की अवहेलना कोई भारतीय लेखक नहीं कर सकता है। ई. वी. आर. के इस अध्ययन में यह जताया गया है कि आधुनिकतावादी खित्ते के लेखक वंचित और दलित वर्गों की अनुचारी सामाजिक स्थिति से निर्मित प्रतिसंस्कृति को कैसे सम्बोधित करते हैं। भारतीय भाषाओं में कविता की जो अवांगार्द परम्परा है उसमें अभिव्यक्ति के देशज रूपों का इस्तेमाल करते हुए और इन रूपों के भीतर भारतीय यथार्थ के एक बडे़ हिस्से को ग्रहण कर उसे जगह देते हुए, पाश्चात्य आधुनिकतावाद को देशी आत्मिकता देने का प्रयास किया गया है। अब सवाल यह है कि अवांगार्द किस मायने में उच्च आधुनिकतावाद के मुकाबले रूढि़द्रोही और परिवर्तनकामी है। आंग्ल-अमरीकी आलोचना में अवांगार्द पर कोई चर्चा भूले-भटके ही हुई है क्योंकि आधुनिकतावाद की आमूलचूल परिवर्तनवादी प्रवृतियां (रेडिकल) कान्टीनेन्टल लेखन में ही अधिक नुमायां हैं। हालांकि रेनाल्ट पोगियोलि, आक्तेवियो पाज और ज्यार्ज नोज़लोपि ने नवप्रवर्तनशील या प्रयोगशील आधुनिकतावाद के सभी रूपों को अवांगार्द की श्रेणी में रखा है लेकिन ई. वी. आर का यह मानना है कि पीटर बर्जर की पुस्तक ‘द थ्योरी ऑफ़ द अवांगार्द’ में अवांगार्द की जो रूपरेखा दी गई है वह भारतीय भाषाओं में कविता के आधुनिकत्व पर चर्चा के लिए अधिक उपयुक्त है। बर्जर की थ्योरी रूमानियत और उच्च आधुनिकतावाद के नैरन्तर्य को और अधिक स्पष्ट करती है। यूरोप में बीसवीं शताब्दी के शुरूआती दशकों में जो अवांगार्द आन्दोलन चला उसे बर्जर ऐतिहासिक अवांगार्द कहते हैं और यह ऐतिहासिक अवांगार्द, आधुनिकतावाद के ‘उच्च’ संस्करण के आधारिक सिद्धान्तों को अमान्य करता है। बर्जर ‘उच्च आधुनिकतावाद’ के लिए ‘सौन्दर्यवाद’ शब्द का उपयोग करते हैं और इस प्रकार उच्च आधुनिकतावाद तथा रूमानियत के बीच जो नैरन्तर्य है, उसे रेखांकित करते हैं। बर्जर के अनुसार उन्नीसवीं शती के यूरोप में बुर्जुआजी की राजनीतिक स्थिति मजबूत होने के बाद कलागत संरचनाओं में रूप और अंतर्वस्तु की जो द्वन्दात्मकता थी, वह दिनोदिन रूपाभिसारी होती गई। इसका नतीजा यह हुआ कि कला के क्षेत्र में अंतर्वस्तु का स्थान गौण होता गया और रूप की सौन्दर्यशास्त्रीयता विशेषाधिकारसम्पन्न हो गई। कांट और शिलर की रचनाओं से कुछ ऐसे संकेत मिलते हैं जिनके अनुसार कला के विकासक्रम की सम्पूर्णता उस मुकाम पर होती है जहां वह जीवन के कार्यव्यापार से अलग हो जाती है। कला में सौन्दर्यपरकता के इस स्वायत्त क्षेत्र और सौन्दर्यानुभूति पर उसके असर की जो सामाजिक कीमत अदा करनी पड़ सकती है, उसे अवांगार्द ने पहचाना। इस प्रकार अवांगार्द की प्रस्थापना उस बिन्दु से होती है जहां कला आत्मसमीक्षा की प्रक्रिया से गुजरती है और जहां कला अपने संस्थागत रूप को प्रश्नों से आकुल करती है। इसे अगर उदाहरण के जरिए समझे तो मामला कुछ यूं होगा कि अगर एक  विशिष्ट धार्मिक विचार की आलोचना दूसरे धार्मिक विचार को खड़ा करके की जाए तो यह एक व्यवस्थाजन्य आलोचना होगी लेकिन अगर धर्म की संस्था की ही आलोचना की जाए तो यह आत्मसमीक्षा होगी। अतः बर्जर के अनुसार आधुनिकतावादी सौन्दर्यवाद और अवांगार्द पयार्यवाची नहीं हैं। हालांकि, रूमानियत (छायावाद) अपनी प्रवृतियों में रूपवादी थी लेकिन उसकी विषयवस्तु के जो नैतिक आग्रह थे, उन्होंने कम से कम रूमानियत के शुरूआती दौर में उसके स्वायत्ततापरक दावों का खंडन किया था। वहीं पर उच्च आधुनिकतावाद ने सम्पूर्ण स्वायत्तता के उपक्रम द्वारा अंतर्वस्तु की सारी निशानियां ही मिटा डालीं।

माधव आप्टे द्वारा संपादित पुस्तक ‘मास कल्चर, लैंग्वेज ऐन्ड आर्टस इन इन्डिया’ में संकलित वाल्टर स्पिन्क के निबन्ध में पाश्चात्य और भारतीय कला के अन्तर को विवेचित करते हुए जो बातें कहीं गई हैं यदि उन्हें एक वाक्य में कहने की कोशिश की जाए तो कहा जाएगा कि भारतीय कला स्वभावतया परिवर्धनधर्मी है न कि परिवर्तनकामी। भारतीय राज्याचार का बहुलतावाद और इसके बहुभाषीय चरित्र ने इसके साहित्य में अनेक और भिन्न प्रकार के आन्दोलनों और रीतियों को एक ही समय में परवान चढ़ाया। साहित्यिक विमर्श की यह विविधता अलगाव की मनःस्थिति में रह रहे सौन्दर्यवादी भाव के अकेलेपन का प्रतिरोध करती है। इस प्रतिरोध को समाज के दलित-वंचित वर्गों की जनचेतना के प्रतिसांस्कृतिक दबावों से बल मिलता है। भारत के क्षेत्रीय साहित्य में शास्त्रीकृत और अशास्त्रीकृत रचनात्मकता के बीच जो सम्बन्ध है वह सदा से समस्याग्रस्त रहा है। ई. वी. आर. का आग्रह है कि भारतीय भाषाओं की साहित्यिक परम्पराओं के विकास में परम्परानिष्ठ, पौराणिक विश्वदृष्टि और वास्तविक, लौकिक यथार्थ के प्रवाह तथा इतिहास द्वारा पोषित दृष्टि के बीच का टकराव, निर्णयात्मक महत्व का रहा है। आधुनिक प्रयोगशील लेखन के पूर्व भारतीय भाषाओं का साहित्य अधिकतर एक प्रगतिशील प्रावस्था से गुजरा है। इसी प्रगतिशील प्रावस्था के दौरान भारतीय लेखक ने यह वैचारिकता ग्रहण की कि सौन्दर्यचेतना को अगर जीवन से पृथक कर एक उदात्त लोक में प्रतिष्ठापित कर दिया जाता है तो उसकी एक बड़ी सामाजिक कीमत अदा करनी पड़ती है। इस समझदारी के बावजूद, प्रगतिशील वैचारिकी की रचनात्मक सम्भावना का यथेष्ट परिपोषण इस कारण नहीं हो पाया क्योंकि प्रगतिशील लेखक अन्वेषणात्मक लेखक के प्रति उत्साहित नहीं थे। इसी दरम्यान स्टालिन राज की हिंसा के उजागर होने से उत्पन्न क्षोभ और अपयश, औद्योगीकरण की ओर उन्मुख नये भारत की चिन्तन-दिशा से गांधीवादी विचारधारा की असंगति आदि ने मिलकर एक ऐसा वातावरण उत्पन्न किया जो अभी तक के आदर्शवादी सोच-विचार के सांचे से बाहर जाने के लिए रास्ता ढूंढ़ रह था। यही वह आधुनिकतावादी आवेग था जो मुख्यतया सांस्कृतिक प्रतिरोध के रूप में और साथ ही साथ सामाजिक परिवर्तन के विचार के प्रति दुचित्तेपन के रूप में प्रकट हुआ। नई अकादमियों और शिक्षा संस्थानों की स्थापना तथा लिखित एवं मुद्रित शब्द के बढ़ते हुए प्रभावक्षेत्र के कारण संस्कृति, मुद्रित शब्दों के क्षीरसागर में निवास करने लगी और इस कारण संस्कृति का पारिभाषिक क्षेत्र रोजमर्रा की जिन्दगी से अलग हो गया।

शुरूआती तौर पर अवांगार्द का मुहावरा उच्च आधुनिकतावाद से इसलिए अलग नहीं लगता है क्योंकि दोनों समान रूप से उन पितृसत्तात्मक धारणाओं पर सवाल उठाते हैं जो भारतीय साहित्य में संस्थागत रूतबा प्राप्त कर चुके हैं। अवांगार्द और उच्च आधुनिकतावादी दोनों ही साहित्य धाराएं, राष्ट्रवादी-रूमानी छवि का प्रतिनिधित्व करने वाले केन्द्रीय सत्ताचरित्रों के विरूद्ध थीं। यू. आर. अनन्तमूर्ति, रामचंद्र शर्मा और डी. आर. नागराज द्वारा सम्पादित ‘विभव: मार्डनिज्म इन इंडियन राइटिंग’ का पुनः उल्लेख और उपयोग करते हुए ई. वी. आर. बताते हैं कि इस किताब में ‘टैगोर सिन्ड्रोम’ पर क्या टिप्पणी की गई है। इस टिप्पणी के अनुसार, शैली और विचारधारा दोनों ही स्तरों पर यह जाहिर होता है कि विभिन्न भारतीय भाषाओं के साहित्य के बुजुर्गवारों/पितृमूर्तियों में एक आश्चर्यजनक समानता है। सांस्कृतिक राष्ट्रवाद, रूमानी मुहब्बत, प्रकृति, रहस्यवाद, तत्ववादी रूझान और राष्ट्रनिर्माण के आदर्श ने मिलजुल कर टैगोर सिन्ड्रोम की साझी आचारिकता गढ़ी। किन्तु यह पंचामृत कुछ इतना मीठा और पुराना था कि जी भिन्नाने लगा। कालान्तर में जब इस प्रकार की पितृपूजक सत्ता की सांस्कृतिक प्रभुताई असह्य हो गयी तो नई पीढ़ी ने यह दुर्वह बोझ उतार फेंकना चाहा। नई पीढ़ी की इस अवज्ञाकारी हरकत ने ही साहित्य में आधुनिकतावादी आन्दोलन का सूत्रपात किया। ई.वी.आर. आगे बताते हैं कि मलयालम में जी. शंकर कुरूप, कन्नड़ में बेंद्रे, मराठी में रविकिरन मंडल के कविगण, गुजराती में उमाशंकर जोशी और हिन्दी में छायावादी कवियों को कुछ इस प्रकार की प्रतिगामी काव्यात्मत्कता का मूर्तरूप समझा गया जिसे उखाड़ फेंकना आवश्यक था। किन्तु इसी स्थल पर ई.वी.आर. यह भी कहते हैं कि आधुनिकतावादी कविता का घनिष्ठ पाठ यह उजागर करता है कि बहुत सी जगहों पर नई कविता के पैरोकारों/अलमबरदारों ने पितृमूर्तियो की विरासत का अच्छा-खासा पुनर्नियोजन किया है। अमियदेव के बोधक्षम विश्लेषण ‘वाज़ इट आल इन द मैनर ऑफ़ मलर्म: द बंगाली पोइटिक ऑफ़ द 1930’s विद रेफ्फेरेंस टू द पोएट्री’ में यह दिखाया गया है कि बंगाल के आधुनिकतावादी कवियों सुधीन्द्रनाथ, जीवनानन्द दास, बुद्धदेव बोस और अमिय चक्रवर्ती की कविता में कुछ पश्चिमी प्रभाव, कुछ संस्कृत साहित्य से रिश्ता और टैगोर की विरासत के अलग-अलग नकूश मिलते हैं। इससे यह तथ्य रेखांकित होता है कि कवियों का ऐसा घनिष्ठ पाठ जिसमें उनके योगदान की वृहत्तर सन्दर्भों में आंकलित करने की सावधानी बरती गई हो, भारतीय आधुनिकतावादी साहित्य की छिपी हुई रूपरेखा को सामने ला सकता है।

प्रस्तुत अध्ययन का पहला भाग उस बृहत्तर संदर्भ की चर्चा करता है जिसके सापेक्ष दूसरे भाग में विभिन्न कवियों का वर्गीय पाठ और तीसरे भाग में कवियों का व्यक्ति पाठ किया गया है।
पुस्तक के अध्याय (I) में ‘टुवर्ड्स अ मटीअर्अिलिस्टिक व्यू ऑफ़ मॉडर्निज़्म इन इन्डियन पोएट्री’ की शुरूआत करते हुए ई.वी.आर. लिखते हैं कि ‘कविता‘ नामक पत्रिका के माध्यम से बुद्धदेव बोस ने पिछली पीढ़ी के साहित्यकारों के विरूद्ध विद्रोह की अगुआई की। टैगोर उक्त पिछली पीढ़ी के प्रतिनिधि कवि थे जिन्हें ‘कविता’ का पहला अंक भेजते हुए दिनांक 30 सितम्बर 1935 के पत्र में बुद्धदेव बोस ने कहा – “आप एक चीज का संज्ञान लेने के लिए बाध्य हैं- इस अंक की अधिकांश कविताएं गद्य में हैं। मेरा मानना है कि गद्यात्मक कविताओं की जिस शैली का परिचय आपने -‘पुनश्च‘ के माध्यम से दिया है, वह विभिन्न लेखकों के हाथों से गुजरते हुए और भिन्न-भिन्न आकारों में ढलते हुए कविता का स्थाई चिह्न होने वाला है। मेरी व्यक्तिगत धारणा यह है कि भविष्य में गद्यशैली में लिखी र्गइं कविताओं की संख्या पद्य में लिखी गई कविताओं से कम नहीं होगी।”

अंतर्वस्तु को सन्दर्भित किए बिना यहां कविता की ‘गद्यात्मकता’ पर जो जोर दिया गया है उससे यह संकेत मिलता है कि नया कवि कविता के रूपात्मक गुणों को कितना अधिक महत्व देना चाहता है। जब टैगोर ने आधुनिक कवियों की तुलना अघोरपंथियों से की तब जाहिरा तौर पर उनके दिमाग में नई कविता की अंतर्वस्तु उथल-पुथल मचा रही होगी। रूमानी- राष्ट्रवादी या रूमानी- प्रगतिवादी और आधुनिकतावादी के बीच जो बेचैनी भरा सम्बन्ध रहा है उसमें रूप और अंतर्वस्तु का यह द्वन्द एक विग्रही मुद्वा बन जाता है। 1938 में जीवनानन्द दास ने उच्च आधुनिकतावादी मुद्रा, जिसकी अनुगूंज चालीस के दशक में अज्ञेय में सुनाई पड़ती है, अख्तियार करते हुए कहा कि कविता सबके लिए नहीं है और जब तक लोगों के दिल-ओ-दिमाग नए क्षितिजों को ग्रहण नहीं करते हैं तब तक सच्ची कविता को समाज के सम्पूर्ण ढांचे में प्रवेश करने का मार्ग नहीं मिलेगा- अलबत्ता बाजारों और डाकयार्ड के तीसरे दर्जे के कवियों का अनगढ़ महिमान्वयन एक दीगर बात है। लेकिन उपरोक्त समय में ही हम समर सेन के काव्यात्मक अभ्यास से गुजरते हैं जहां हम अवांगार्द की उस संवेदना का प्रथम आभास पाते हैं जो सौन्दर्यवादी आधुनिकतावाद के समानान्तर चलती है। निर्मल घोष द्वारा सम्पादित ‘स्टडीज़ इन मार्ड्न पोएट्री’ में प्रलय कुमार देव ने लिखा कि समर सेन की कविता में ‘‘आत्माभिव्यक्ति से अधिक महत्वपूर्ण है स्व के सामाजीकरण की कोशिश”।

1943 में तार सप्तक का प्रकाशन हिन्दी कविता के लिए एक नया मोड़ थी। तार सप्तक के संपादक अज्ञेय के पिता एक पुरातत्वविद थे जिन्हें काम के सिलसिले में उत्तर भारत में जगह-जगह जाना और रहना पड़ा। परिणामतया, यह हकीकत कि अज्ञेय ने हिन्दी अधिकतर किताबों से सीखी, उतनी ही महत्वपूर्ण है जितनी उनकी अंग्रेजी शिक्षा-दीक्षा है। अज्ञेय द्वारा संपादित ‘प्रतीक’ ने आधुनिकतावाद के मुहावरे को कविता के अगवाड़े पर ला बिठाया। नई कविता का नाम धारण करने वाले इस कुल ने जल्दी ही उस लेखन से किनारा कर लिया जो सामाजिक यथार्थ से गांठ जोड़ कर चल रहा था। अज्ञेय के इस समय में त्रिलोचन शास्त्री, नागार्जुन तथा केदार नाथ अग्रवाल जैसे कवि जो अपने समय के सजीव-सम्मुख यथार्थ से प्रेरक शक्ति प्राप्त कर रहे थे, को पिछवाड़े धकेलने के प्रयास हुए। इस नयी कविता के कवियों ने आंग्ल-अमरीकी और फ्रांसीसी बिम्बवादियों के नक़्शेकदम पर चलते हुए, विश्व की अनुभवातीत झलक दिखाने के लिए यह जरूरी समझा कि कविता के स्थापत्य को सर्वाधिक महत्व दिया जाए। उनकी कविताएं एक ऐसे विश्वव्यापी किन्तु प्रदेशविहीन भूदृश्य पर रची र्गइं जिन्होंने उनके काव्यात्मक अनुभव को इतिहासहीन बना दिया। लेकिन इसी समय के आसपास हिन्दी के अवांगार्द मुहावरे ने गजानन माधव मुक्तिबोध जैसा तेजस्वी प्रवक्ता पाया।

मराठी भाषा में, 1947 में आई मर्डेकर की ‘कही कविता’ को आधुनिकतावाद का शंखनाद कहा जा सकता है। तीस के दशक में मर्डेकर इंगलैण्ड में रह रहे थे और वहां वह बिम्बवाद के प्रभाव में आए। ‘ऐन अन्थोलॉजी ऑफ़ मराठी पोएट्री’ में मर्डेकर की ‘कही कविता’ पर टिप्पणी करते हुए दिलीप चित्रे ने कहा कि किताब का कवर पेज ही स्तब्ध कर देने वाला था। कवर पेज पर एक नंगी पुरूष आकृति का उपहासचित्र था। पौरूषहीन, कमजोर, बीमार, क्लीव और नायकत्व की प्रभा का विपर्यय । अन्दर के पृष्ठ अवसाद से भरे थे। एक परिचयात्मक, उदास कविता जो आत्मनिन्दा से भरी पड़ी थी और जिसमें मराठी के महान संत कवियों की तुलना में स्वयं की तुच्छता का बखान किया गया था। इसके आगे युद्ध, अनास्था, आदर्शहीनता, धर्म का आतंक और बीमारी इत्यादि जैसे अवसादकारी विषयों पर और भी उदास और उजाड़ कविताएं थीं। स्वयं मर्डेकर के लिए यह एक बड़ा परिवर्तन था। मर्डेकर के पहले कविता संग्रह ‘शिशिरागम’ से ‘कही कविता’ की तुलना करते हुए फिलिप एनब्लॉम्ब बाम्बे लिटरेरी रिव्यू में प्रकाशित लेख ‘माडर्निज्म इन बाम्बे: मराठी ऐन्ड इंग्लिश वर्जन‘ में कहते हैं कि मर्डेकर ने एक झटके में न केवल पारंपरिक मराठी सानेट को बाहर का रास्ता दिखा दिया वरन तीस के दशक की प्रबल काव्यशैली के रूप, छंद और शब्द विन्यास के उस सारे तामझाम को खारिज कर दिया जिसका उपयोग उन्होंने कभी ‘शिशिरागम’ नामक कविता में किया था। प्रख्यात आलोचक जी. आर. कामथ ‘अनिरूद्ध’ ने मर्डेकर की इस ‘कही कविता’ को आलोचकों के लिए चुनौती के रूप में पेश करते हुए इसे ‘नया काव्य‘ या ‘नवकविता‘ का नाम दिया। मर्डेकर का परवर्ती मराठी कवियों पर अच्छा-खासा प्रभाव पड़ा। हालांकि उनका विरोध भी कम नहीं हुआ, तब भी और आज भी, किन्तु मराठी कविता में उनकी हैसियत एक अकेले शिखर जैसी है। कुल मिला कर कहना चाहिए कि शैली के प्रति मर्डेकर का व्यामोह उन्हें उच्च आधुनिकतावाद के करीब ले जाता है।

अय्यप्पा पणिकर की ‘कुरूक्षेत्रम‘ का 1960 में प्रकाशन और 1968 में उनके संपादकत्व में ‘केरल कविता‘ का निकलना, मलयालम भाषा में आधुनिकता रचनात्मकता के लिए महत्वपूर्ण घटनाएं हैं। एक टूटी-फूटी दुनिया के लिए उपयुक्त मुहावरा गढ़ने के लिए पणिकर ने स्व की खोज को सबसे महत्वपूर्ण विषयवस्तु बनाया। हालांकि परवर्ती मलयालम कवियों पर पणिकर का प्रभाव बीजस्वरूप रहा लेकिन कविता की भाषा पणिकर के मन-मस्तिष्क पर इस कदर हावी थी, कि आखिरकार वह उच्च आधुनिकतावादी प्रजाति के एक रूपवादी ही माने जाएंगे। इतिहास की प्रक्रिया और सामाजिक स्व के प्रति गहरे अविश्वास ने उन्हें ऐसा उत्कट व्यक्तिवादी बना दिया कि उनका कवि एक विकासमान समाज का संगी-साथी नहीं हो पाया।

साठ के दशक में ही एम. गोविन्दन और उनकी पत्रिका ‘समीक्षा’ ने मुख्यतः मद्रास में रहने वाले लेखकों और चित्रकारों की एक बिरादरी कायम करने में रचनात्मक भूमिका निभाई जिसका भारत के अन्य राज्यों के लेखकों और कलाकारों से संपर्क हुआ। इस संपर्क से अन्य राज्यों में अवांगार्द की जो विभिन्न प्रवृतियां क्रियाशील थीं वे व्यापक रूप से सामने आयीं। इसी समय के आगे-पीछे मराठी में भी तमाम ऐसी लघु पत्रिकाएं मशाल की तरह जलती-बुझती रहीं जिन्होंने अवांगार्द के मुहावरे को गढ़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इनमें ‘शब्द’ नाम की पत्रिका सर्वाधिक प्रभावशाली रही है।

यहां कुछ रूककर हमें काफी पीछे जाना है, ताकि हम भारत की क्षेत्रीय भाषाओं के द्वंद को समझ सकें। क्षेत्रीय भाषाओं का आर्विभाव और विकास, बौद्ध धर्म के प्रचार और प्रसार से जुड़ा नजर आता है। बौद्ध धर्म के आचार्यों और प्रचारकों ने देशी जुबानों और बोलियों को तरजीह दी। इस तरीके से वह पुरोहितों की गूढ़ गुणधर्म वाली उस भाषा का विरोध कर सकते थे जो तत्कालीन हिन्दू वैचारिकता की वाहक थी। जातक कथाओं ने लोक मानस को अभिव्यक्ति के नए आयाम दिए। इस प्रक्रिया ने भूधर्मी भाषा के विकास के साथ-साथ उस भाषा में सांस्कृतिक और साहित्यिक अभिव्यक्ति को विकसित किया। पालि ने संस्कृत का स्थान लिया क्योंकि एक तरफ तो वह बोलियों के इतनी करीब थी कि लोग उसे समझ सकें दूसरी तरफ वह किसी बोली विशेष से इतनी दूर भी थी कि उसे किसी  विशिष्ट स्थानीय मुहावरे में ही समझने की विवषता नहीं थी। मोटे तौर पर पालि के बाद प्राकृत का युग माना जाता है हालांकि पाकृत और पालि एक दूसरे को आच्छादित भी करते हैं। (यों तो 500 ई. पू. से 1000 ई. पू. तक के काल की भाषा को प्राकृत कहते हैं) किन्तु इस पूरे काल को प्रथम प्राकृत-काल, द्वितीय प्राकृत काल और तृतीय प्राकृत काल के रूप में तीन कालों में बांटा जाता है। उसमें प्रथम काल (आरम्भ से ईसवी सन् के आरम्भ तक) की भाषा पालि और शिला लेखी प्राकृत है,  दूसरे काल (ईसवी सन् से लगभग 500 ई. तक) की भाषा का नाम प्राकृत है और तीसरे काल (500 ई. से 1000 ई. तक) की भाषा का नाम अपभ्रंश है। इस अपभ्रंश की करीब सत्ताइस प्रान्तीय किस्में हुई जिनसे अधिकांश भारतीय भाषाएं पैदा हुई। इस सूचना का मन्तव्य केवल इस तथ्य को रेखांकित करना है भारत में क्षेत्रीय भाषाओं का प्रवर्तन उस मिजाज से जुड़ा है जिसके तहत समाज के बडे़ हिस्से ने पाठाधारित पौराणिक विश्वदृष्टि की गूढ़ रूढि़वादिता का सांस्कृतिक प्रतिरोध किया है। इन क्षेत्रीय भाषाओं ने अपनी अलग अस्मिता मध्यकाल के भक्त कवियों की महान रचनाओं द्वारा अर्जित की। भक्ति साहित्य पर किए गए नए अध्ययनों ने यह दिखाया है कि भक्ति आन्दोलन की अन्तरवस्तु क्रान्तिकारी थी और यह बात दीगर है कि बाद में इसकी शक्ति को पहचान कर अभिजाततंत्र ने इसको हथिया लिया। वस्तुतः भक्ति आन्दोलन ने पुराणपंथियों और सामान्य जन के बीच जो वैचारिक विग्रह था उसका समाधान जनसामान्य के पक्ष में किया। संक्षेप में भारतीय इतिहास की नाट्यशाला में जो बार-बार होने वाली परिघटना है वह यही है कि भारत का पण्डितवर्ग पहले जनसामान्य की भाषा और संस्कृति के प्रभाव में आता है फिर बाद में वह उसे अपने हित में अनुकूलित कर लेता है। इस प्रकार अभिजात्य उच्चवर्गीय और उपवर्गीय हैसियतों के बीच जो द्वन्द है उसकी तह में गृहस्वामियों द्वारा किये जाने वाले मालिकाना शोषण-पोषण और उक्त शोषण-पोषण के तले दबे हुए गृहसेवकों की आकांक्षाओं का संघर्ष छिपा है।

इतिहास की इस गली में जाने का उदेश्य केवल यह है कि हम क्षेत्रीय भाषाओं के कवि की बहुसांस्कृतिक पृष्ठभूमि को थोड़ा और समझ सकें और साथ ही साथ उसकी कविता में शास्त्रीय, क्षेत्रीय और विदेशी परम्पराओं का जो तिहरा रिश्ता दिखता है उसे भी समझ सकें। चूंकि यह तीनों परम्पराएं क्षेत्रीय भाषाओं की भाषिक संवेदना में साथ-साथ मौजूद हैं इसलिए अक्सर इनकी संयोजनात्मक प्रकृति, कविता की आधुनिकता के बारे में हमें संकेत दे देती हैं।

भारतीय भाषाओं की कविता में आधुनिकता के विकास के लिए सर्वाधिक महत्वपूर्ण योगदान पाश्चात्य प्रभाव का रहा है। वर्ष 1835 और 1857 के बीच भारतीय साहित्य पर पश्चिमी प्रभाव के बारे में लिखते हुए शिशिर कुमार दास कहते हैं कि इस अवधि में जिन लेखकों ने भारतीय साहित्य की रूपरेखा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई वे सभी अपनी मातृभाषा, के साथ-साथ अंगे्रजी और किसी शास्त्रीय भाषा (संस्कृत या फारसी) में प्रवीण थे। इसी दरम्यान लोगों की रूचि गद्य में, खास तौर पर कहानी और उपन्यास में जागृत हुई जिसने साहित्य की दिशा को नए कोण दिए और एक नया पाठकवर्ग उत्पन्न किया जो उत्सुकतापूर्वक अनुदित साहित्य भी पढ़ना चाहता था। इस परिवर्तन के परिणामस्वरूप कविता और साहित्य की अन्य विधाओं के बीच के सम्बन्ध को एक दूसरे सांचे में ढालने की आवश्यकता पड़ी। उस समय तक भारतीय भाषाओं में उपन्यास का या अन्य गद्यरूपों का जो पूर्वोतिहास था उसके दृष्टिगत इस नए पाठकवर्ग के समक्ष, आधुनिक उपन्यासों के कारण अभिरूचि का कोई गंभीर संकट नहीं खड़ा हुआ। इसके विपरीत चूंकि भारतीय भाषाओं में कविता की एक लम्बी, अविच्छिन्न और समृद्ध परम्परा रही है इसलिए कविता के पाठक के समक्ष यह समस्या खड़ी हुई कि वह कविता से क्या उम्मीद करे। एक तरफ उसकी पारम्परिक रूचिसंपन्नता थी तो दूसरी तरफ कविता के नए रूप उससे कुछ अलग अपेक्षा रखते थे। नतीजतन उन्नीसवीं शती के मध्य तक जैसाकि शिशिर कुमार दास कहते हैं, भारतीय भाषाओं में पारम्परिक और पाश्चात्य नमूने की कविताओं के बीच द्वंद की स्थिति रही। परन्तु जैसे-जैसे अभिजातवर्ग पश्चिमी/अंग्रेजी प्रभाव में आता गया, गीत और छोटी कविताओं ने महाकाव्य और खंडकाव्य के मुकाबले ज्यादा जगह बना ली। यहां यह कहना चाहिए तत्कालीन भारतीय बुद्धिजीवी चाहे वह बांग्लाभाषी रवीन्द्रनाथ टैगोर हों या मराठी के विष्णुशास्त्री चिपलुणकर हों, ने इस पश्चिमी प्रभाव को भारतीय मेधा के लिए नवजीवनदायी ही माना। किन्तु यहां यह कहना जरूरी है कि भारतीय भाषा साहित्य पर अंग्रेजी के इस प्रभाव को सर्वभारतीय, क्षेत्रीय और विदेशी परम्पराओं के तिहरे बहुसांस्कृतिक सम्बन्धों की पृष्ठभूमि में ही समझा जा सकता है। व्लादिमिर माकुर अपने निबन्ध ‘कल्चर ऐज ट्रांसलेशन’ में कहते है कि अनुवाद के स्वत्वहारी कार्यकलाप के फलस्वरूप एक मिलते-जुलते सांस्कृतिक इंद्रियबोध की अवतारणा होती है। चूंकि बहुत सी भारतीय भाषाओं में तीस और चालीस के दशक से पहले साहित्यिक समालोचना की कोई विकसित परम्परा नहीं थी इसलिए इन अनुवादों ने कविता के पठन-पाठन के प्रतिमान तय करने का भी काम किया। कहना चाहिए कि हमारे समाज में भाषाओं की विभाजनरेखा थोड़ी तरल है और द्विभाषिता का भी खूब चलन है इसलिए किसी भी भाषा के लिए यह पूरी तरह से संभव नहीं है कि वह किसी समुदायविशेष के आत्मबोध का आख्यान, एकात्मवादी संस्कृतियों की तरह एकात्म स्वरों में रचे। चूंकि हमारे आत्मजगत की संरचना, भाषा के द्वारा होती है इसलिए ‘निज भाषा‘ की यह तरलता भी उन आख्यानों में शब्दित हो जाती है जो हमारे स्व को अभिव्यक्त करने का बीड़ा उठाते हैं। उन्नीसवीं और बीसवीं शती के सन्धिकाल के कवियों में एक ऐसी बेचैनी थी, कला की स्वतंत्रता को सुनिश्चित  करने की ऐसी चाह थी कि उन्होंने रूप, छन्द और विषयवस्तु को लेकर लगातार प्रयोग किए। इन प्रयोगों के पीछे एक आवेग यह भी था कि अपनी भाषा को अंतर्नुवाद्यता के मानकों के करीब पहुंचाया जाए। इन प्रयोगों ने अभिव्यक्ति के कुछ ऐसे ढंग-ढर्रे पैदा किए जिन्होंने विदेशी परम्परा और उसमें निहित अन्यता/दूसरेपन के अनुकूल और प्रतिकूल दोनों किस्म के काव्यानुभव रचे। इस समय का कवि दो दुनियाओं के बीच जिस सुगमता के साथ जी रहा था वह उसके तरलित स्वत्व का घोतक है।

लेकिन जैसे-जैसे अंग्रजी अनुशासन की शिक्षापद्धति का प्रसार होता गया वैसे-वैसे ही पूरी भारतीय शिक्षापद्धति विहित पाठ्यक्रम के इर्द गिर्द संघटित होने लगी। साहित्यिक निदेश में इस औपनिवेशिक आधिपत्य का एक फल यह भी था कि तत्कालीन साहित्यिक विमर्श महान परम्पराओं की ओर उन्मुख हो गया और छोटी परम्पराओं का उपेक्षित ज्ञान साहित्य में प्रवेश नहीं कर सका। विनय हार्डीकर कहते हैं कि तत्समय मराठी में समस्त साहित्यिक गतिविधि उच्च वर्ग तक सीमित थी और कभी कभार जब यह उच्च वर्ग नीचे की ओर ताकता भी था तो इस अहसास के साथ वह ऊंचा है और ऊंचाई से देख रहा है। इस परिदृश्य का ज़ायजा लेते हुए कृष्ण कुमार ‘पॉलिटिकल एजेण्डा ऑफ़ एजुकेशन: ए स्टडी ऑफ़ कॉलोनियलिस्ट ऐन्ड नेशनलिस्ट आईडियाज’ में कहते हैं कि टैगोर की जागरूकता भी, एक सूचनासंपन्न चिंतित बुर्जुआ की चेतना की द्योतक थी और भारतीय गांवों की दुर्दशा को वह एक पराए व्यक्ति की भांति ही देख सकते थे। इन हालात में यह समझा जा सकता है कि उन्नीसवीं और बीसवीं शती के आरम्भ में निम्नवर्ग और स्त्रियों की लेखकीय भागीदारी क्यों इतनी कम रही, हालांकि इसी अवधि में दो नाम, मलयाली कवि कुमारन असन (1873-1924 – एझवा नामक दलित समुदाय से) और ओडि़या कवि गंगाधर महर (1862-1924 – जुलाहा समुदाय से) अपवादस्वरूप सामने आते हैं।

यहां पर थोड़े दुहराव के साथ यह कहना पड़ रहा है कि भारतीय भाषाओं में आधुनिकतावाद के कालक्रम को तब तक सार्थक रीति से नहीं समझा जा सकता जब तक कि मुद्रण के कार्यव्यापार को न समझा जाए। लिखाई के साथ छपाई के गठबंधन ने साहित्यिक रचनात्मकता को राजनीतिक आयाम दिए। बेनीडिक्ट ऐन्डरसन ‘इमेजिन्ड कम्युनिटीज: रिफ्लेक्षन्स आन द ओरीजिन ऐन्ड स्पे्रड ऑफ़ नेशनलिज़्म‘ में कहते है कि मुद्रित होने के लिए तैयार भाषाओं ने उनके बोलने वालो के लिए यह सम्भव बना दिया कि वह राष्ट्रीयता की कल्पना से सिक्त सामुदायिकता का भ्रूण बन सकें। मुद्रण का पूंजीवाद यह सुनिश्चित करता है कि देर या सबेर ऐसा समुदाय आत्मालोचना के लिए प्रस्तुत हो और अपनी प्रवृतियों और वरीयताओं को नए सिरे से निर्धारित करें। भारतीय भाषाओं में साहित्यिक समालोचना का प्रादुर्भाव मुद्रण के इसी पूंजीवाद का उपोत्पाद है। यही वह समय था जब कि भारतीय जन के जीवन के निजी और सार्वजनिक क्षेत्र पुर्नसंयोजित किए जा रहे थे। जो चीजें अनायास ही व्यक्ति के निजी जीवन का अंग मानी जाती थी उन पर राज्य की निगरानी बढ़ रही थी, जिसके फलस्वरूप नागरिक समाज में निजी और सार्वजनिक क्षेत्र की सायास निशानदेही तेजी से हो रही थी। ऐसे में एक व्यक्ति के लिए यह जरूरी हो गया कि वह इन दोनों क्षेत्रों के बढ़ते हुए बंटवारे को समझ कर अपनी जीवन शैली निर्धारित करे।
नागरिक समाज में निजी और सार्वजनिक क्षेत्र के इस बदलते हुए रिश्ते के आलोक में आधुनिकता की संवेदना के प्रकट होने की व्याख्या की जा सकती है। कहा जा सकता है कि आधुनिकता की संवेदना वह आलोचनात्मक आत्मबोध है जिसके जरिए उस समय का व्यक्ति निजी और सार्वजनिक क्षेत्र के तत्कालीन रिश्तों का विश्लेषण और उनका पुर्नसंयोजन कर रहा था। वस्तुतः भारतीय भाषाओं में कविता का आधुनिकतावादी मुहावरा राजनीतिक आन्दोलनों और राज्य की समष्टियों से व्यक्ति की वियुक्ति की दावेदारी पेश कर रहा था। वह राजनीतिक समाज की समावेशी चक्की से छिटक कर अपना अस्तित्व बचाए रखना चाहता था। इन अर्थों में आधुनिकतावादी संवेदना, आधुनिकता की ही समीक्षा कर रही थी।

इस काल के साहित्यकारों के लिए आधुनिकता का मतलब था, इतिहास में जागना। इसका मतलब था स्व की ऐसी परिभाषा की खोज जिसके जरिए विस्तारित आख्यानों में स्व को स्थापित किया जा सके। चूंकि साम्राज्यवाद भौगोलिक हिंसा का एक ऐसा उपक्रम था जिसके द्वारा लगभग पूरी पृथ्वी खोजी, नापी और नियंत्रित की जा चुकी थी इसलिए इस काल के राष्ट्रीय कवियों ने इस खोई हुई भूमि को कल्पना के जरिए प्राप्त करना चाहा। हालांकि, अधिकतर राष्ट्रीय कविता इसी मानचित्रण आवेग से उपजी थी परन्तु इनके बीच मलयालम के कुमारन असन और मराठी के केशवसुत जैसे कवि भी थे जिनकी रूमानियत गहरी सामाजिक चेतना से परिष्कृत थी। वह जाति के दंश और आर्थिक असमनाताओं के प्रति सचेत थे और कोई ताज्जुब नहीं कि उनकी कविताओं में मातृभूमि की भावुक वन्दना नहीं है। बाद में प्रगतिशील साहित्यकार जिन्होंने अपने पूर्ववर्तियों की रूमानी देशभक्ति को खारिज किया, कुमार असन और केशवसुत की इस विरासत का आह्वान किया।

राष्ट्रीय रूमानी कविता के अवसान और आधुनिकतावादी कविता के आविर्भाव के बीच अधिकतर भारतीय भाषाओं में प्रगतिशील आन्दोलन का एक महत्वपूर्ण दौर आया। इस दौर पर शिकागो रिव्यू में प्रकाशित लेख “सम कॉन्टेक्स्ट ऑफ़ मॉडर्न इंग्लिश पोएट्री” में टिप्पणी करते हुए विनय धारवाड़कर कुछ ऐसा मानते हैं कि समाजवादी मूल्यों का परचम फहराने वाले प्रगतिशील लेखकों ने बाज औकात भारतीय समाज की एक उजाड़ और निराशाजनक तस्वीर प्रस्तुत की है। प्रगतिशील लेखन ने महाकाव्यात्मक गम्भीरता और प्रगीतात्मकता के बजाय व्यंग्य, विडम्बना और भर्त्सना का रास्ता चुना। इस परिप्रेक्ष्य में प्रगतिशील दौर और साहित्य की आधुनिकतावादी करवट के बीच जो सम्बन्ध है उसका गहरा अध्ययन होना चाहिए। मोटे तौर पर यह माना जाता है कि हिन्दी में प्रयोगवादी रचना प्रगतिशील आन्दोलन की प्रतिक्रिया में हुई है। परन्तु इस संबंध में अमियदेव का यह कहना है कि बंगाली में और शायद हिन्दी में भी तीसरे दशक में प्रगति-प्रयोग की युति रही है जिसमें खंडन-मडन की द्वन्दात्मकता के अलावा संवादात्मक विचार-विनिमय की गुंजाइश रही है। गुजराती, मलयालम और मराठी में 1940 के आसपास प्रगतिशीलता का एक सुपरिभाषित दौर रहा है। गुजराती में उमाशंकर जोशी और सुन्दरम् ने समाजवादी विचार की रेडिकल धारा को गांधी के सुधारवादी कार्यक्रमो के साथ संष्लेषित किया।

यहाँ यह उल्लेख करना उपयुक्त होगा कि तीसरे दशक तक समाज के मध्यवर्ग में यह बात जड़ पकड़ चुकी थी कि साहित्य एक लिखित, मुद्रित और प्रकाशित अवधारणा है। उपरोक्त गतिविधियों के संस्थानीकरण के कारण साहित्य के उत्पादन और वितरण में समाज के कुछ वर्गों का ऐसा वर्चस्व बना जिसके अनुकूल पूरे समाज के साहित्यिक मानक तय किए जाने लगे। क्षेत्रीय भाषाओं का संस्कृतीकरण और पुनरूत्थानवादी प्रवृत्तियां बढ़ीं। के. एम. मुंशी की 1935 में प्रकाशित ‘गुजरात ऐन्ड इट्स लिटरेचर’ की भूमिका लिखते समय महात्मा गांधी ने मध्यम वर्ग की साहित्यिक समझ की सीमाओं की ओर ध्यान खींचते हुए अपनी स्वभावगत साफगोई के साथ कहा ‘‘श्री मुंशी ने हमारी साहित्यिक उपलब्धियों का जो आकलन किया है वह मुझे बहुत वफादार लगता है। स्वभावतया उनका सर्वेक्षण उस भाषा तक सीमित है जो मध्यम वर्ग द्वारा बोली और समझी जाती है। व्यवसायिक मानसिकता के आत्मतृप्त लोगों की भाषा प्रकृतिशः ‘स्त्रैण और विषयासक्त’ रही है। हम लोगों (आमजन) की भाषा के बारे में कुछ नहीं जानते। हम उनकी बोली-बानी नहीं समझते। उनके (आमजन) और हम मध्यवर्गीय लोगों के बीच इतना फासला है कि हम उन्हें नहीं जानते हैं और वह तो हमारी सोच और हमारी वाणी के बारे में और भी कम जानते हैं।”

के. एम. मुंशी के गुजराती साहित्य का इतिहास और रामचन्द्र शुक्ल के हिन्दी साहित्य के इतिहास पर ऐसे पुनरूत्थानवादी आवेग की छाप है जो अतीत को स्मारकीय पदों में ढालने का कार्य करता है। गांधीजी ने ‘उनके और हमारे’ बीच जिस बढ़ती खाई का उल्लेख किया था वह इस बात की द्योतक है कि इस समय तक सामाजिक यथार्थ और राष्ट्रीय नियति के प्रति जनसामान्य और उच्चवर्ग के नजरिए में फर्क आ गया था। इसका असर भाषा पर भी पड़ा जिसके तहत साहित्यिक भाषा एक ऐसी  विशिष्ट इकाई हो गई जो अकलात्मक बोली और भाषा से अलग है। प्रगतिशील लेखकों ने इस अवस्था को इसी समय पहली बार एक विचारधारात्मक घटना के रूप में पहचाना। हालांकि अपने समय में अवांगार्द ने भी यह पहचान अपने तरीके से की। जहां प्रगतिशीलों ने समस्त पूर्वकालिक भारतीय कविता को वर्तमान के लिए महत्वहीन पाया वहीं कविता के अवांगार्द मुहावरे ने परम्परा का अन्वेषण कर के उसे एक संघर्ष-स्थल के रूप में प्रस्तुत किया।

एज़ाज अहमद ’इन थ्योरी’ में कहते हैं कि पारम्परिक सम्पत्तिशाली और नए व्यवसायिक वर्ग, दोनों के ही पेटी-बुर्जुआ अपनी शिक्षा-दीक्षा और व्यवसायिक महत्वाकांक्षाओं की गतिकी के कारण अंग्रेजी और पाठीय परम्पराओं की ओर आकर्षित हुए। उच्च आधुनिकतावाद के महानगरीय मुहावरे और उसमें ‘प्रगतिवाद’ के विरूद्ध जो विरोधाभाव है उसे उक्त संदर्भ के साथ ध्यान में रखना चाहिए। साथ ही जान फ्रो की यह टिप्पणी भी दिमाग के एक कोने में रखने लायक है कि आधुनिकतावाद, यथार्थवादी सौन्दर्य दृष्टि के इतना विरूद्ध भी नहीं है क्योंकि वह यथार्थवाद की आन्तरिक विसंगतियों का समापनकाण्ड है। वस्तुतः अमियदेव द्वारा उल्लिखित प्रगति-प्रयोग युति को उच्चारोही मध्यम वर्ग और शेष समाज के बीच होने वाले इसी व्यवहार-व्यापार के संदर्भो में देखना चाहिए। इस बात के बावजूद कि प्रगतिशील आन्दोलन ने साहित्य का जनभाषीय संस्कार किया, यह बात अपनी जगह सही है कि भाषा के भीतर अधिपति और उपवर्गीय तत्वों का जो अंतर्विरोध था उसे यह आन्दोलन पूरी तरह सुलझा नहीं पाया। आधुनिक समाज में लेखक और पाठक के बीच सम्बन्धों की जो समस्याजनक प्रकृति है उसे न समझने के कारण प्रगतिशील आन्दोलन ने इस बात की आवश्यकता नहीं समझी कि सौन्दर्यशास्त्र का नया विधान रचा जाए ताकि अनुभूति और अभिव्यक्ति के लिए नए तरीके चलन में आ सकें। इसी के साथ एज़ाज अहमद का यह कथन भी महत्वपूर्ण है कि भारतीय भाषाओं के साहित्य के लिए यथार्थ से मुठभेड़ निर्णायक सिद्ध हुई क्योंकि जहां साहित्य के बहुत से अन्य रूप आए और गए, यथार्थवाद बना रहा क्योंकि दुनिया को समझने का इसका तरीका उस ऐतिहासिक क्षण के साथ जुड़ा जब भारतीय समाज अपने पहले बुर्जुआ उथल-पुथल से गुजरते हुए खुद की वर्गसंरचना और पूंजीवादी प्रकार का गृहप्रबन्धन करते हुए अपनी वर्गचेतना की निर्मिति कर रहा था।

कुल मिलाकर, एक प्रगतिशील रचनाकार, साहित्यिक रूपाकारों में अन्तर्निहित सौन्दर्यपरक रचनान्तरणों की गतिकी को सन्दर्भित किए बिना, साहित्य को लेखक और समाज के साझे विश्वास की अभिव्यक्ति मानता था जबकि उच्च आधुनिकतावादी, सामाजिक इतिहास को इतना अस्त-व्यस्त और अव्यवस्थित मानते हैं कि उससे किसी नैतिक आध्यात्मिक या सौन्दर्यात्मक आयाम की उत्पत्ति हो ही नहीं सकती। दूसरी तरफ अवांगार्द लेखक इतिहास के प्रति नाउम्मीद नहीं है भले ही आधुनिक बुर्जुआ समाज, कला और मानवता के लिए किसी आशा का संचार न करता हो। यथार्थवाद और अवांगार्द के बीच लम्बी लम्बी बहसे हुई हैं, जिनमें ब्लाख, लुकाच, ब्रेख्त, बेजामिन और अदोर्नो ने जम कर भाग लिया है। लुकाच ने जेम्स ज्वायस के मुकाबले टॉमस मान को तरजीह दी है क्योंकि ज्वायस के अवांगार्द लेखन को उन्होंने जीवन और यथार्थ से रिक्त पाया। इसके विपरीत ब्रेख्त और अर्दोनो ने अपने-अपने तरीके से अवांगार्द लेखन का बचाव किया। ब्रेख्त ने लुकाच को जवाब देते हुए कहा कि बालजक या टाल्स्टाय की यथार्थवादी रचना पद्धति अपनी समस्त संभावनाओं को निचोड़ कर निढाल हो चुकी है इसलिए अब सर्वहारा के लिए असाधारण और जोखिम भरी रचना करने से नहीं डरना चाहिए बशर्ते कि वह यथार्थ स्थितियों से व्यवहार करती और जूझती हो। ब्रेख्त ने कला में अन्वेषण और प्रयोग की आवश्यकता पर बल दिया क्योंकि एक कलाकार को बीसवीं सदी के पूंजीवादी समाज में हो रहे सामाजिक परिवर्तनों से जूझना है।

लूकाच की ‘द मीनिंग ऑफ़ कन्टेमपरेरी रीअलिज़्म’ की समीक्षा करते हुए अदोर्नो ने रूप की प्रमुखता पर बल दिया है। जेम्स ज्वायस, काफ्का और बेकेट ने रूप के जिन नियमों का वरण किया है वे सभी उनकी सामाजिक अंतर्वस्तु से गहरे और सौन्दर्यपरक रीति से जुडे़ हुए हैं। इन बहसों का जिक्र इसलिए प्रासंगिक है कि इनके जरिए हमे उन मुद्दों को समझने में मदद मिलती है जो प्रगतिशीलता और प्रयोगवाद के द्वन्दात्मक/संवादात्मक रिश्तों की पड़ताल से जुडे़ हैं।

चूंकि हिन्दी में आधुनिकतावाद को प्रगतिशीलता के विरोध में परिभाषित किया गया है इसलिए अज्ञेय जैसे उच्च आधुनिकतावाद के हामी-हिमायती की बौद्धिक स्थापनाओं को करीब से जानना जरूरी होगा। अज्ञेय ने कला को अपूर्णता के विरूद्ध एक विद्रोह माना है। अपने विनिबिन्ध ‘संस्कृति और परिस्थिति’ में वह कहते हैं कि हमारी जीवन शैली ही नहीं हमारा जीवन ही बदल गया है। जिन्दगी न शहरी रह गई है और न ग्रामीण, इसका ढांचा ही खो गया है। इसे जोड़ने वाला कुछ नहीं बचा है। वह एक कामगार की विच्युतावस्था की बात करते हैं परन्तु साथ में यह कहते हैं कि उसकी विच्युति, उसके अलगाव की समस्या, सांस्कृतिक ज्यादा है और आर्थिक कम। जब वह यह कहते हैं कि आर्थिक दशा या जीवनस्तर में सुधार किसी राष्ट्रीय या अन्तर्राष्ट्रीय संस्कृति को जन्म नहीं देगी, तो वह प्रगतिवादियों को जवाब दे रहे होते हैं। जब वह कहते हैं कि संस्कृति का तत्व आलोचनात्मक आस्वाद के रोपण और पोषण से प्राप्त होता है और उसे मशीन, प्रचार, भाषण और बहसों द्वारा विकसित नहीं किया जा सकता है तब वह इलियट की अनुगूंज पैदा करते हैं। महान शास्त्रीय रचनाओं में खोने और उन्हें पाने के लिए सख्त दिमागी प्रशिक्षण की आवश्यकता है। वर्गभेद का विस्तार एक लेखक के लिए आवश्यक नहीं है, क्योंकि दुःख, अधूरेपन का त्रास और पीड़ा, सर्वव्यापी और वर्गातीत है। अज्ञेय, जोर देकर कहते हैं कि एक अधिकांशतया अनपढ़ समाज जिसमें अधिकतर शिक्षा विदेशी भाषा में दी जाती है, के लेखक से यह उम्मीद नहीं करनी चाहिए कि वह जनसामान्य के लिए या उनके बारे में लिखे।

अज्ञेय का सतत दृष्टिकोण यह रहा है कि आभिजात्य मूल्यों का एक ऐसा रूपस्वी शरण्य कायम किया जाए जिसके जरिए एक उदात्त संस्कृति लोक को सीमांकित और सुरक्षित किया जा सके। अज्ञेय के संस्कृति, भाषा और निजता सम्बन्धी सरोकार, सामान्य जीवन से उनके अलगाव को सत्यापित करते हैं। उनकी संस्कृतनिष्ठ भाषा जिसमें किसी भी हिन्दी भाषाभाषी क्षेत्र की बोलीबानी का अभाव है, उनके इस अलगाव को और पुष्ट करती है। जिस समय वह आधुनिक सामाजिक परिवेश की नुक्ताचीनी करते हैं जिसके कारण यह अजनबीयत पैदा होती है उस समय वह इस बात को नहीं मानते हैं कि सामाजिक परिवर्तन के जरिए संप्रेषण की समस्या को हल किया जा सकता है। अज्ञेय के लिए कविता एक शाब्दिक निर्मिति है जो आधुनिक समाज से त्रस्त लोगों को पनाह देती है। उनकी कविता में बारम्बार प्रयुक्त होने वाले रूपक यथा नदी, नाव, यात्री, मार्ग और द्वीप उनकी तबियत के रूमानी रूझान की ओर इशारा करते हैं। उनके आधुनिकतावाद को अस्तित्ववादी विचारों की मध्यस्थता भी प्रभावित करती है क्योंकि वह एक इतिहासेतर, आत्मनिष्ठ स्थल जिस पर अस्तित्ववादी सौन्दर्यचेतना की पदचाप है, को अधिमान्यता देते हैं। अज्ञेय के कृतित्व में आत्मनिष्ठा की रूमानी विरासत, अजनबीयत का बोध और आत्मचेतना के चरम क्षणों के प्रति अस्तित्ववादी रूचि सहयात्री बन कर सामने आती है। इसके मूल में अज्ञेय की वह दृष्टि है जिसके तहत स्व एक ऐसा एकाकी, समाजच्युत आभ्यांतर स्थल है जो सामाजिक अंतर्व्यवहार और तर्कजन्य वाक् से अलग और कटा हुआ है। लोथार लुत्से की ‘हिन्दी राइटिंग इन पोस्ट कोलोनियल इंडिया: अ स्टडी इन द अस्थेटिक्स ऑफ़ लिटरेरी प्रोडक्शन’ में छपे हुए एक इंटरव्यू में अज्ञेय कहते हैं कि उनके जैविक स्व और उनके पंडित-कवि के बीच अंतःसंघर्ष की स्थिति है। नई कविता और अस्तित्ववाद में अज्ञेय की कविता की यौक्तिक विशेषता पर प्रकाश डालते हुए राम विलास शर्मा दिखाते हैं कि कैसे अज्ञेय तमाम स्रोतों से भावना और दार्शनिक अन्तरदृष्टि बटोर कर उन्हें अपनी भावात्मक संरचना का अंग बनाते हैं। अज्ञेय छांट-छांट कर ऐसे विचार चुनते हैं जो उनके अनुकूल और प्रिय हैं। फलस्वरूप, उनकी सारग्रही प्रतिभा वेदान्त, जेन, बौद्धधर्म और अस्तित्ववाद में कोई विभेद करने का कष्ट नहीं करती है। उनकी कल्पना अमूर्तन के संदर्भमुक्त संसार में विहार करती है। उनकी पांडित्यपूर्ण और र्निवैयक्त्कि वैश्विक वाणी, विभिन्न विचार प्रणालियों को बिना उनके ऐतिहासिक सन्दर्भ और प्रत्ययात्मक सहारे के समावेशित करती है। उनकी यह आवाज सद्य और सदैव परिवर्तनशील वर्तमान के लिए प्रतिबद्ध है। दूसरी तरफ मुक्तिबोध जैसे कवि हैं जो अपनी कला को जीवन के प्रवाह से संशोधित और विशेषित होने देते हैं और इस प्रकार समय और इतिहास का अपने अंतर्विरोधो के साथ के साथ संवाद बनाते हैं। अवांगार्द का यह जो संवादात्मक स्वभाव है वह उसे उच्च आधुनिकतावाद की प्रतिपाद्य मुद्राओं से अलग करता है।

अज्ञेय के उच्च आधुनिकतावाद ने एक पूरी पीढ़ी के हिन्दी के काव्यानुरागियों की पाठकीय संवेदना के संस्कार में बीजभूमिका निभाई है। कुछ यही भूमिका मराठी में सुरेश जोशी और मलयालम में अय्यप्पा पणिकर ने निभाई है। हालांकि अज्ञेय, जोशी और पणिकर बुर्जुआ संस्कृति के आलोचक हैं परन्तु उनकी यह रूपवादी दृष्टि कि साहित्य की संरचना सामाजिक व्यवहार से बाहर और ऊपर है, अप्रत्यक्ष रूप से उन्हें उस संस्कृति के पाले में खड़ी कर देती है जिसके वे घोषित रूप से आलोचक हैं। यह वह संस्थानीकृत, द्वीपीय साहित्यिक संस्कृति है जिसे अवांगार्द के मुहावरे ने अतिक्रमित किया है। मुक्तिबोध, दिलीप चित्रे और सच्चिदानन्दन जैसे कवि पूरी तरह से आश्वस्त हैं कि कोई भी सौन्दर्यपरक तथ्य ऐसा नहीं है जो सामाजिक इतिहास के बृहत्तर संदर्भों की पोटली से बाहर हो। साहित्यिक गतिविधियों के संस्थानीकरण के प्रति उपरोक्त आत्मालोचक चेतना, रूप और अंर्तवस्तु के प्रति अवांगार्द के कलाकार की दृष्टि को परिवर्तित करती है। अवांगार्द की आकांक्षाओं में साहित्यिक क्षेत्र के बढ़ते लोकतंत्रीकरण (जो सम्भव हुआ क्षेत्रीय भाषाओं में मुद्रण, पठन और पाठन की वृद्धि से) और नए रूपविधान का आवेग साफ-साफ झलकता है। औपनिवेशिक काल से पहले भी और खासकर भारतीय इतिहास के संक्रमणकालीन समयो में सनातन धर्म और साधारण धर्म के बीच जो अन्तःसंघर्ष रहा है वह भारतीय भाषाओं के साहित्यिक विमर्श का आवश्यक लक्षण रहा है। भक्तिकालीन कविता इसका अन्यतम उदाहरण हैं जिसके प्रति आधुनिकतावादी कवियो का विचित्र और कदाचित अनूठा आकर्षण रहा है।

कुमकुम सांगरी, मीराबाई पर किए गए अध्ययन में यह दर्शाती हैं कि कैसे भक्ति के उदार और विसम्मत रूपांकनों ने उच्च हिन्दूवाद के तत्वज्ञान (माया और कर्म आदि) का चुनिंदा प्रयोग करके ऐसे इंद्रियातीत मूल्य के सृजन का प्रयास किया जो लौकिक-भौतिक जीवन की दैनन्दिनी में रचे-बसे हुए हों और सबकी पहुंच के अन्दर हों। औपनिवेशिक काल में उच्चवर्ग और जनसामान्य में सामाजिक स्तर पर जो विभाजन रहा है उसने सामाजिक यथार्थ और राष्ट्रीय नियति को समझने के अलग-अलग रास्तों को जन्म दिया। पश्चिमी शिक्षा दीक्षा से लैस जिस उच्चवर्ग ने बुद्धिवादी और विकासवादी विचारों से प्रेरणा ग्रहण की वही वर्ग अपनी घरेलू जिन्दगी, परिवार और समुदाय के परम्परागत मानको के अनुसार जी रहा था। सांस्कृतिक रूप से दोहरे दबाव अपनाता और झेलता हुआ यह वर्ग एक दोहरे भाषा संसार को भी उसी तरह भोग और भुगत रहा था।

यह दोहरापन समाज की सत्तासंरचना में भी था। एक तरफ इस उच्च या मध्यमवर्गीय शिक्षित नागरिक वर्ग के जीवन के अन्तर्विरोध सरकार से निभाने वाले संबंधों के कारण पैदा हुए तो दूसरी तरफ जनता के उपवर्गों से निभाने वाले कामकाजी सम्बन्ध भी इसका एक कारक थे। इस अन्तर्विरोध से उत्पन्न सत्ता के ढांचे की अभिव्यक्ति शास्त्रीकृत परम्परा की पाठीयता और रंगकलाओं की वाचिक और मौखिक उपस्थिति के बीच विद्यमान और अनसुलझे तनाव में हुई। कोई आश्चर्य नहीं कि भक्ति साहित्य में विद्रोह और समर्पण के बीच जो तनाव है उसने उच्च आधुनिकतावादी और अवांगार्द दोनों किस्म के कवियों को बहुत आकृष्ट किया है क्योंकि तनाव, सत्ता के दो छोरों से संवाद करने में काव्य की प्रतिभा की मदद करता है।

स्वतंत्रता के बाद भाषिक आधार पर राज्यों का जिस प्रकार पुनर्गठन हुआ उसको क्षेत्रीय बुद्धिजीवियो का पूर्ण समर्थन मिला। यह समझा गया कि क्षेत्रीय भाषाओं के बौद्धिक वर्ग ने आजादी के बाद सत्ता-व्यवस्था में बढे़ केन्द्रोन्मुखी झुकाव का प्रतिकार क्षेत्रीय भाषिकता के माध्यम से प्राप्त सांस्कृतिक प्रतिरोध के द्वारा किया। इस पूरी प्रक्रिया का दिलचस्प परिणाम यह है कि राष्ट्रीय संस्कृति के बरअक्स देशी संस्कृतियों का उठान हुआ जो अपनी अनन्यता और दूसरों की अन्यता के प्रति अतिरिक्त रूप से सचेत रहने लगीं। इस सांस्कृतिक-साहित्यिक परिघटना के परिणामस्वरूप भारतीय संवेदना टुकड़ों में बंटने लगी। यह बंटवारा इस बात पर बहुत कुछ निर्भर था कि किसी लेखक की स्थानिकता क्या है। उदाहरण के लिए यदि अंग्रेजी में लिखने वाले व्यक्ति के लिए यह लगभग तय है कि उसका पाठक पश्चिमी रंग में रंगा हुआ अभिजातवादी प्रवृत्तियों का व्यक्ति होगा तो नतीजतन उसमें उस आत्मालोचन की प्रक्रिया धीमी होगी जो अवांगार्द का पारिभाषिक लक्षण है। उच्च आधुनिकतावाद और अवांगार्द का फर्क लेखन में रूपविधान की प्रस्तुति और उसके पाठक के बीच सम्बन्धों की शर्तों के अनुसार समझा जा सकता है। कहने की आवश्यकता नहीं कि एक तैयार पाठक के मन-मस्तिष्क में किसी पाठ का अर्थ खुलना और बनना उस पाठ में मौजूद प्रत्यक्षीकरण की शर्तों के द्वारा संचालित होता है। उच्च आधुनिकतावादी पाठ की लाक्षणिकता एक स्थिर असांसारिकता का अनुभवात्मक क्षेत्र रचती है।

ब्रेख्त ने बुर्जुआ रंगमंच के बारे में कहा है कि उसके द्वारा चित्रित लोग कथित ‘शाश्वत मानव’ की अवधारणा से बंधे हुए हैं। इस रंगमंच की कहानियां सर्वव्यापी किस्म की स्थितियां रचती हैं जिनमे एक ‘मनु’, चाहे जिस कालखंड या युग का मनुष्य हो अपने को अभिव्यक्त कर सकता है। इसकी सारी घटनाएं एक संकेत-सूत्र हैं और इस संकेत सूत्र का एक ‘शाश्वत’ उत्तरगान है, जो अपरिहार्य है, स्वाभाविक है और बिना किसी हस्तक्षेप के शुद्ध-विशुद्ध मानवीय है। ई.वी.आर. कहते हैं कि ब्रेख्त के उपरोक्त विचार कमोबेश उच्च आधुनिकतावादी रचनाओं के नाटकीय प्रभाव पर भी लागू होते हैं।

उक्त क्षेत्रातीत दृष्टि के विपरीत एक दूसरी दृष्टि भी है जिसमें यह विचार कि मनुष्य परिवेश का कार्यक्रम है और परिवेश मनुष्य का कार्यक्रम है, उस अनुभवात्मक क्षेत्र में समावेशित है जो पाठ/रचना के शाब्दिक विन्यास में पैबस्त है। इस दृष्टि के समर्थन में ब्रेख्त के विचार प्रासंगिक हैं जब वह कहते हैं कि कला के नए सिद्धान्तों की स्थापना और चित्रण/वर्णन के नए तरीकों को प्रस्तुत करने के लिए हमें बदलते हुए युग की मांगों की पहचान से शुरूआत करनी चाहिए जबकि समाज के पुनर्निमाण की आवश्यकता और सम्भावना आँखों के सामने मंडरा रही हो। मनुष्य के कार्यव्यापार की हर घटना का संज्ञान लेना चाहिए और चीजों को देखने के लिए सामाजिक दृष्टिकोण अपनाना चाहिए।

कहना चाहिए कि कला के प्रति उपरोक्त दृष्टिकोण जिस आत्मालोचना को सम्भव बनाता है उसके जरिए हम अपने परिवेश के ऐतिहासिक सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक पहलुओं को न तो किसी बहाने से देखते हैं और न मनुष्य से अलग मानते हुए देखते हैं बल्कि हमारी दृष्टि का गठन मनुष्य के द्वारा होता है और मनुष्य का गठन हमारी दृष्टि के द्वारा होता है।

उपरोक्तानुसार ही अवांगार्द की सौन्दर्य चेतना जीवन की उस अन्तर्वस्तु से निर्धारित होती है जिसे सामाजिक परिवर्तन की गत्यात्मकता को समझ कर ही पाया जा सकता है। वस्तुतः उच्च आधुनिकतावाद और अवांगार्द आधुनिकतावाद के भीतर दो अलग सामाजिकस्थल और विरोधी राजनीतिक प्रवृत्तियो को दर्शाने वाले पद हैं। हालांकि यहां यह कहना जरूरी है कि कोई भी रचना पूरी तरह उच्च आधुनिकतावादी या अवांगार्दी नहीं हो सकती है। सच तो यह है कि आधुनिकतावादी कविता के तेवरो को केवल समाज और समाजेतर के सन्दर्भ में ही नहीं समझा जा सकता है। आधुनिकतावादी कवि ने पौराणिक आख्यानों के साथ जो गठबंधन किया है, उसे विवेचित किए बिना अवांगार्द और उसके बीच के फर्क को सूक्ष्मतः समझना मुश्किल है। कहने की आवश्यकता नहीं कि पौराणिक आख्यान भारतीय कल्पनाप्रणाली का चिरंजीवी आकर्षण है और इस हेतु उन भारतीय आधुनिक कवियों की चर्चा करनी होगी जिन्होंने आधुनिकता को पौराणिक आख्यानों के रसायन से रचा है।

‘ऐमबिव्अलन्स ऐज़ रिजिसटन्स्: मिथ ऐन्ड मॉडर्निज़्म’ के अध्याय में पुराणगर्भित आधुनिकतावाद को खोलते हुए ई.वी.आर., टेरी ईगलटन की ‘द आईडियोलाजी ऑफ़ द अस्थेटिक’ का उल्लेख करते हैं। टेरी ईगलटन का अभिमत है कि पौराणिक कथा, आधुनिकतावाद और एकाधिकारी पूंजी में पेचीदा सम्बन्ध है। जैसे ही लैस-ए-फ़ैअः अर्थव्यवस्था एक अधिक क्रमबद्ध पूंजीवादी प्रणाली में प्रवेश करती है वैसे ही व्यक्तिवादी अहं जीवन के नए अनुभवों का वाहक बनने के लिए अपर्याप्त हो जाता है। व्यक्ति से इतर और उसके विरूद्ध संसार का ऐसा स्वायत्त, स्वनियमित ढांचा खड़ा हो जाता है जो किसी आदत की तरह प्राकृतिक प्रतीत होता है। यह एक ऐसी कभी न बदलने वाली और सदैव बदलने वाली अजीब दुनिया हो जाती है जिसमें आदिम रूपों का विलय नफीस आकारों में हो जाता है। इसमें भी खास तौर से औपनिवेषीकरण की अधीनता में जी रहे व्यक्ति के स्वैरकल्पना (फन्तासी) और भ्रांति के ऐसे मायाजाल में जा गिरने की सम्भावना रहती है जहां से यथार्थवादी साहित्य के बजाय आधुनिकतावादी साहित्य प्रियतर लगता है।

यहां पर यह उल्लेख करना उपयुक्त होगा कि पश्चिमी रचनाओं/पाठ के संपर्क में आने के बहुत पहले से भारतीय कविगण काव्य रचना के लिए पौराणिक आख्यानों का उपयोग कर रहे थे किन्तु कविता के आधुनिकतावादी दौर में पौराणिक गाथाओं की व्याख्या उत्तर औपनिवेशिक सन्दर्भों और उनके विश्ववैचारिक ढांचे के अन्तर्गत की जाने लगी।

पौराणिक तौर तरीके का इस्तेमाल करके एक आधुनिकतावादी कवि, प्राचीन और समकालीन के बीच सतत तुलनीयता का आवाहन करता है और इसके जरिए उस सांस्कृतिक पुनःप्राप्ति को कायम रखना चाहता था जो स्वतंत्रता संग्राम में चलने वाले राष्ट्रवादी विमर्श का महत्वपूर्ण हिस्सा था। परन्तु एक निस्सीम और नवीकरणीय अतीत के प्रति इस आग्रह के साथ इतिहास के प्रति दुचित्तेपन की मानसिकता भी जुड़ी थी। पुराण के उपयोग द्वारा भारतीय कवि, इतिहास की एकरेखीय, प्रगतिशील और नियामक अवधारणा के विरूद्ध अपना अविश्वास दर्शाने के साथ-साथ उस सर्वभारतीय सांस्कृतिक अनुभव का भी आवाहन कर सकता था जिसका अभी तक भारतीय राष्ट्रीय विचारधारा ने विमर्शात्मक उपयोग नहीं किया था। प्राचीन का अर्वाचीन चेतना के साथ यह संयोग जिस सीमा तक पश्चिमी नमूनो और रीतियों के अनुसार किया गया उस सीमा तक किसी प्रामाणिक भारतीय स्व की खोज स्वतः अप्रमाणित हो जाती है। इस मामले में आधुनिकतावादी कवियों का दुचित्तापन उनके काव्य में पूरी तरह से प्रकट होता है। एक तरफ तो वह इतिहास के अन्दर वैधता प्राप्त करना चाहता है दूसरी तरफ वह पौराणिक काव्यात्मकता का आवाहन करते हुए अद्भुत और अपरिमेय को साधना चाहता है। अतः कविता में आधुनिकतावादी ऐहिक मुहावरे और प्राचीन साहित्य की पवित्र परम्पराओं के बीच क्रियाशील द्वन्दात्मकता के परिपे्रक्ष्य में धर्मवीर भारती का ‘अन्धा युग’ और अय्यप्पा पणिकर की ‘कुरूक्षेत्रम’ का विवेचन आवश्यक है।

‘अन्धायुग’ एक ऐसे महायुद्धोत्तर समाज के बारे में है जो कुलहन्ता-भातृहन्ता हिंसा के प्रभाव से बाहर निकलने में असमर्थ है। अन्धता इस नाटक का केन्द्रीय रूपक है जो साफतौर पर इशारा करता है कि हमारी नैतिक कल्पना, उत्तर औपनिवेशिक सामाजिक यथार्थ से सामंजस्य बिठाने में असमर्थ है। नाटक पर टिप्पणी करते हुए नेमिचन्द जैन ने कहा है कि प्रत्येक व्यक्ति यहां तक कि कृष्ण भी मानसिक एवं नैतिक अन्धता से ग्रस्त हैं जिसके कारण न केवल जीत, हार से अधिक दुःखदायी हो जाती है बल्कि वह आगे और विघटन का रास्ता तैयार करते हुए सभ्यता और संस्कृति को विध्वंस की ओर ले जाती है। भारती के नाटक की यह भविष्यदर्शी विनाशलीलामय दृष्टि एक ऐसा उपकरण हो जाती है जिसके जरिए उत्तर औपनिवेशिक इतिहास की अवसाद रेखाओं को उन प्रश्नचिह्नों में रूपांतरित कर दिया जाता है, जो एक नवजात समाज में स्वतंत्रता और उत्तरदायित्व के केन्द्रीय मुद्दों को सम्बोधित करते हैं।

नाटक के पौराणिक ढांचे में विनयस्त उपरोक्त भविष्यदर्शी मनोरूप, समाज की आदर्शवादी वाग्मिता का निषेध करता है। विदुर का ज्ञान बेकार हो जाता है। युयुत्सु की आत्महत्या और अश्वत्थामा का हत्यारापन, शाश्वत घोषित किए गए मूल्यों को अपनी वेदना से बींधते हैं। सत्य के प्रति युयुत्सु की प्रतिबद्धता उसे अपने लोगों (कौरवों) से विलग कर देती है और पांडवो का साथ देने के फलस्वरूप उसके हिस्से में तिरस्कार आता है। युधिष्ठिर एक ऐसे सिंहासन पर बैठते हैं जो अन्धता का उत्तराधिकारी है। ऐसे माहौल में अपने भाइयों के विरोध में सत्य के लिए लड़ने वाला युयुत्सु का नायकत्व निरर्थक सिद्ध होता है। अन्ततोगत्वा वह कृष्ण और उनके प्रभामंडल को अस्वीकृत करता है। सत्यवादी युधिष्ठिर के अर्धसत्य का मारा हुआ अश्वत्थामा, बदले और हिंसा का ऐसा भीषण दृश्य रचता है कि पृथ्वी का अपना जीवनतत्व खतरे में पड़ जाता है। अभिशप्त अमरत्व का घाव लिए वर्तमान और भविष्य में भटकता हुआ अश्वत्थामा भी कृष्ण को अस्वीकार करता है।

ई.वी.आर. के अनुसार कृष्ण के प्रति धर्मवीर भारती की चित्तवृत्ति आरम्भ से अंत तक उभयभावी रही है। जहां एक तरफ नाटक में कोरस गाने वाले, कृष्ण की सर्वव्यापी सर्वज्ञ दैवीयता का गान करते हैं वहीं नाटक का पाठ ऐसे वृतान्तों से भरा पड़ा है जो कृष्ण को एक तिकड़मी राजनयिक और एक असफल ईश्वर के रूप में दर्शाते हैं। इस दृष्टि से कृष्ण की मृत्यु के अंतिम क्षण महत्वपूर्ण हैं जहां वह एक शिकारी के बाण से मरते हैं और इस तरह से उनके देवत्व की प्रतिमा खंडित हो जाती है। पर उनका मृत्यु पूर्व का बयान जिसमे वह मृत्यु को एक रूपान्तरण मात्र मानते हैं और सारे उत्तरदायित्वों के आदान-प्रदान की घोषणा करते हैं, उन्हे एक दैवी आभा से प्रकाशित कर देता है। कीर्तिजैन यह संकेत करती हैं कि ईश्वर की इस तस्वीर पर ईसाई धर्म दर्शन का प्रभाव है। ई.वी.आर. का कहना है कि कृष्णरूप का इस तरह ईसारूप में विकसित होना भारती के दुचित्तेपन के एक कौतूहलजनक आयाम को उद्घाटित करता है। भारती की द्विविधा यह है कि जहां वह समस्त सर्वव्यापी शक्ति संरचनाओं पर अविश्वास करते हैं वहीं दूसरी तरफ पौराणिक आख्यान का उपयोग यह दर्शाता है कि भारतीय मानस/अनुभव का एक हिस्सा ऐसा भी है जो इन सारभूत संरचनाओं का समर्थन करता है। अन्धा युग अवसाद और अविश्वास का नाटक है, परन्तु नाटक का पुराणबद्ध ढांचा राष्ट्रीय परिपे्रक्ष्य मे मोहभंग के इस केन्द्रीय अनुभव को व्यक्त भी करता है और उसका प्रतिरोध भी करता है। उसी तरह, जैसे कृष्ण के चरित्रचित्रण के माध्यम से भारती जिस बात की पैरवी करते हैं, उसका विरोध भी करते हैं।

यहां यह जान लेना उपयुक्त होगा कि चालीस के दशक के अन्त तक पश्चिम में आधुनिकतावाद की प्रेरणाशक्ति समाप्तप्राय थी। भारत में टी. एस. इलियट की अध्ययनीयता की समीक्षा करते हुए पी. पी. रवीन्द्रन ने यह कहा है कि भारत में टी. एस. इलियट की स्थिति उस समय मजबूत हुई है जब पश्चिम में उनका प्रभाव काफी कुछ क्षीण हो चला था। इलियट के अधिकतर भारतीय अनुवादक, कवि थे, जैसे हिन्दी में धर्मवीर भारती और मलयालम में अय्यप्पा पणिकर। यद्यपि आधुनिकतावादी काव्यात्मक संवेदना पर इलियट का प्रभाव विस्तृत अध्ययन का विषय है तथापि इस प्रसंग में उल्लेखनीय है कि भारतीय कवियों ने पहले के ऐहिक इलियट और बाद के धार्मिक इलियट के बीच फर्क किया है और साथ ही एक ही कवि में दो भिन्न और विपरीत अनुभव-वृत्तियों की उपस्थित ने इन्हें मुग्ध भी किया है। यह बेमतलब नहीं कि भारती के अन्धायुग में इहलोक और पुण्यलोक में संगति बैठाने का प्रयास किया गया है। मराठी कवि मर्डेकर पर इलियट के प्रभाव का उल्लेख करते हुए चंध्राशेखर जहांगीरदार ने अपने निबन्ध ‘मर्डेकर ऐन्ड टी. एस. इलियट’ में कहा है कि जिस तरह से मर्डेकर ने अतीत और वर्तमान, पुराण और इतिहास तथा संतकाव्य और आधुनिकतावाद के बीच संवाद और सम्बन्ध कायम किया है, उस पर इलियट की बौद्धिक छाप है।

भारतीय कवियों द्वारा इलियट का स्वागत आगे चलकर 1950 के दशक में यूरोपीय अस्तित्ववादी कवियों यथा सार्त्र, बेने, कामू और काफ्का के सत्कार से मंडित हुआ। भारती के अंधायुग में युयुत्सु की आत्महत्या और अश्वथामा का अविवेकी हत्यारापन कुछ अस्तित्ववादी सवाल उठाते हैं। परन्तु भारती इन सवालों को उनकी परिणति तक इसलिए नहीं पहुंचा पाते क्योंकि वह स्वतंत्रता और उत्तरदायित्व के अस्तित्ववादी दृष्टिकोण को अपने नाटक के केन्द्र में नहीं स्थापित कर पाए। वस्तुतः हताशा का जो मनोभाव, निजता के संकट से उपजता है वह पणिकर की कविता में अधिक स्पष्टता के साथ दिखाई पड़ता है।

सितम्बर 1960 में प्रकाशित कविता ‘कुरूक्षेत्रम’ में पणिकर ने भगवत गीता की आरम्भिक पंक्तियों को सुभाषित की तरह प्रयुक्त किया है। कुरूक्षेत्र का यह रूपक स्व को एक संघर्षस्थली के रूप में प्रस्तुत करता है। इसके पूर्व 1950 में टी. एस. इलियट पर प्रकाशित एक लेख में पणिकर ने जोर देकर यह कहा था कि रूप और छन्द की बजाय भावानुकूल लय और अनुनाद कविता की रचना करते हैं। पणिकर के अनुसार, एक लेखक के लिए यह जरूरी है कि वह अपने वैयक्तिक और सार्वजनिक स्व को, दिग्काल से बंधे संसार के सापेक्ष सत्यों की समग्रता के भावनात्मक बोध के साथ, समन्वित करे। आगे आधुनिक मलयाली कविता के बारे में लिखते हुए पणिकर कहते हैं कि कवि की विचारधारा कविता की वाक्यरचना में मूर्त होती है। हर कविता का अपना एक सच्चा प्रामाणिक रूप होता है जिसे अंतर्वस्तु से स्वतंत्र होकर विचरने वाले किसी छन्द के अनुरूप नहीं ढाला जा सकता है।

ई.वी.आर ने पणिकर की कुछ पंक्तियों के अंगे्रजी अनुवाद के माध्यम से उनके मानस की प्रस्तुति की है। जीवन की जटिलता के सम्मुख सारे दर्शन व्यर्थ हैं। पणिकर बिलबिलाती, झगड़ती भीड़ के आधुनिक यथार्थ के बाद शांत और सुरम्य वातावरण भी रचते हैं। रूमानी भावनाओं की शब्दावली को कुछ इस तरह पुनर्गठित करते हैं कि रूमानियत की विश्वदृष्टि को प्रश्नांकित किया जा सके। महापौरूष के आख्यानों के जरिए महापौरूष की अवधारणाओं पर सवाल उठाते हैं। स्पष्ट है कि अनुरोध और प्रतिरोध का यह द्वंद कवि और उसके संसार के बीच एक दुचित्तेपन का आभास देता है।

‘मीनिंग्स चेन्ज विद चेन्जिंग क्वेसचन्स: फ्राम हाइ मॉडर्निज़्म टू द अवांगार्द’ के अन्तर्गत ई.वी.आर. ने कई भारतीय कवियों और कविताओं के माध्यम से भारतीय साहित्य में अवांगार्द के आर्विभाव और विकास का विवेचन किया है। ई.वी.आर. के अनुसार पौराणिकता पणिकर के कुरूक्षेत्रम की संरचना को बाहरी तौर पर ही स्थापित करती है। एक रणस्थली के रूप में कुरूक्षेत्रम का केन्द्रीय रूपक उस जनसंकुल संसार से सम्बन्धित है जहां बलात गढ़ा गया संश्लेषण व्यक्ति के स्व के विरूद्ध एक संकट बन कर आता है। यह वह समय था जब सामाजिक आन्दोलनों का रूपान्तरण नौकरशाही के संस्थापन में हो रहा था। नवोदित राज्य में शक्ति का केन्द्रीकरण और लोकप्रिय आन्दोलनों के नौकरशाही का उपकरण बन कर अपभ्रष्ट हो जाने के कारण एक ऐसा वैचारिक संकट उत्पन्न हो गया, जिससे शुरूआती दौर के आधुनिकतावादी कवियों ने कला की स्वायत्तता का दावा करके निपटना चाहा।

पीटर बर्जर की किताब ‘थ्योरी ऑफ़ अवांगार्द’ में इस मत की वकालत की गई है कि आधुनिकतावाद को, परम्परागत लेखकीय तकनीकों पर हमला समझा जाए और अवांगार्द लेखन को कला के संस्थानीकरण पर किया गया प्रहार माना जाए। पीटर बर्जर की उक्त किताब की भूमिका में जोखेन शुल्टे-सास टिप्पणी करते हैं कि एक बुर्जुआ समाज में कला की स्थिति उभयभावी और डांवाडोल होती है। एक तरफ आधुनिक समाज की शास्त्रीय-रूमानी कला समाज मे व्याप्त अजनबीयत का विरोध करती है और भविष्य में कुछ आदर्शों की प्राप्ति करना चाहती है, वहीं दूसरी तरफ चूंकि यह कला पृथक और स्वायत्त होने का दावा करती है इसलिए वह समाज में न्यस्त और व्याप्त अभावों का निरा मुआवजा अदा करके वास्तविक संघर्ष से किनारा कर लेती है। इस तरह से कला यथास्थिति का प्रतिरोध करती है और पोषण भी। वस्तुतः आधुनिकतावादी या सौन्दर्यवादी कला की प्राधानिक विशिष्टता यह है कि यह अपने ही साज़ सामान पर ध्यान बटोरने में लगी रहती है। भारती और पणिकर की आधुनिकतावादी रचनाएं अपनी शैलीगत  विशिष्टताओं की ओर ध्यान खींचती हैं। यहां भाषा स्वयं में एक मूल्य हो जाती है। सौंदर्य क्षेत्र को सामाजिक यथार्थ से स्वतंत्र रूप से परिभाषित करने के कारण उच्च आधुनिकतावाद उस तर्ज और अन्दाज को नहीं समझ पाया जिसके तहत कला एक बुर्जुआ समाज में क्रियाशील थी। इसका एक कारण यह भी था कि पूर्वअवांगार्द काल में कला के संस्थान को उतनी पर्याप्त ऐतिहासिकता के साथ परिभाषित नहीं किया गया था जो आधुनिकतावादी कलाकार को उसके दृष्टिपथ पर साफ-साफ दिखाई पड़ सके।

बीसवीं सदी के छठे और सातवें दशक में अवांगार्द लेखन ने भारतीय कविता में अपनी उपस्थिति का अहसास करया। महत्वपूर्ण बात यह है कि इसी अवधि में गजानन माधव मुक्तिबोध की कविता की क्रांतिकारी सम्भावना का मूल्यांकन हुआ। दलित कविता की सुगबुगाहट इसी समय से हुई। इस काल में मलयालम, हिन्दी और मराठी के अनेक लेखकों ने कला के संस्थानीकरण की अवधारणात्मक समझ विकसित की। सौन्दर्यपरक आधुनिकतावाद से अवांगार्द अथवा टेरी ईगलटन के शब्दों में ‘क्रांतिकारी आधुनिकतावाद’ की ओर हुए इस बदलाव को अनेक कविताओं के नक्शे-कदम पर चलकर समझा जा सकता है।

गोकि ई. वी. रामकृष्णन ने हिन्दी, मराठी और मलयालम कविताओं के माध्यम से ही आधुनिकतावाद की पड़ताल करने की मंशा शुरू में ही जाहिर कर दी थी, तथापि इस अध्याय में उन्होंने गुजराती के सीतान्शु यशस्चंद्रा की कवितावली जो मगन नाम के एक चरित्र के बारे में है, की विस्तृत चर्चा की है। मगन की अषक्त और अनायकोचित मुद्राएं मध्यवर्गीय मूल्यों की आलोचना और उपहास करते हुए शहरीपन के बेहूदेपन और भयावहता को उजागर करती है। (ई.वी.आर. ने निसीम इज्कील और मीनाक्षी मुखर्जी द्वारा अंग्रेजी मे अनुदित ‘मगन्स इन्सोलन्स’ नामक कविता मे से कुछ उद्वरणों का प्रयोग किया है जिसका पदच्छेद मैंने हिन्दी में किया है।)

यह कविता मगन की इस घोषणा के साथ आरम्भ होती है कि

वह जीना चाहता है। इस बात से गुजराती विद्वज्जन भौचक्के रह जाते हैं क्योंकि उन्होंने सदैव साहित्य को जीवन से अलग करके देखा है। वे मगन से कहते हैं कि वह साहित्य के पवित्र मंदिर को छोड़ दें। ऐसा कहते ही एक चमत्कार हुआ। सरस्वती देवालय से निकली और बोली जहां मगन जाएगा वहीं वह जाएगीं। उनके पीछे-पीछे प्रयोग देवी, सुश्री यथार्थ सब उस देवालय को छोड़ने को आमादा हुईं। मजबूरन विद्वज्जन ने कहा अरे! विध्नक ठहर और उस कोने में सड़। लेकिन मगन तो मगन ही है, उसने कहा कि वह प्यार करना चाहता है। इस पर उसे स्टेट बैंक की तिजोरी के सामने खड़ा कर दिया जाता है और उसे प्यार के करारे ‘बंडल‘ दिखाए जाते हैं, किन्तु मगन कहता है कि यह प्यार नहीं है। तब उसे जुतियाने और गरियाने वाली भाषा में पूछा जाता है कि अबे यह प्यार नहीं है तो क्या है? सारे बडे़ लोगों ने, पुरस्कार विजेताओं और पदकधारियों ने इसी स्त्रोत से अपनी कहानियों, कविताओं और नाटकों के लिए प्यार लिया है। अन्ततोगत्वा एक दिन मगन को पुरस्कार मिलता है और मंच उससे अपेक्षा करता है कि मूर्ख मगन भी कुछ कहे तो वह कहता है, (पुरस्कार प्राप्त करने के बाद) मैं जीना चाहता हूं, मैं प्यार करना चाहता हूं, मैं एक कविता लिखना चाहता हूं।

यहां यह उल्लेखनीय है कि अवांगार्द लेखन पूर्ववर्ती लेखकीय कला को अमान्य नहीं करता है, वह तो कला की उस संस्थानकता पर सवाल उठाता है जो जिन्दगी की जद्दोजहद से अलग है। शास्त्रीय आधुनिकता का एक लक्ष्य यह है कि वह मानवता, सत्य और आनंद जैसे मूल्यों को जीवन से बाहर कर कला की कक्षा में स्थापित कर देती है। सीतांशु की आपत्ति भी यही है कि इन मूल्यों को किसी आदर्श लोक में कैद न किया जाए। वस्तुतः धर्मवीर भारती और अय्यप्पा पणिकर ने जिस प्रकार जीवन के वास्तविक व्यवहार से कला को स्वतंत्र किया, उसी से वह रास्ता निकला जिसकी वजह से अवांगार्द लेखन ने यथार्थ का आलोचनापरायण बोध कराया।

सितांशु की पूर्वोक्त कविता में सामान्य भाषा का ओज है। बीसवीं शती के छठे और सातवें दशक में दलित कवियों ने अत्याचार और शोषण के विरूद्ध कविता की सामान्य भाषा को नए आयाम दिए। दलित कवि नामदेव ढसाल के बारे में दिलीप चित्रे लिखते हैं कि ढसाल ने यह दिखाया कि भावात्मक ऊर्जा को संघटित करने और उसे व्यक्त करने के लिए आक्रोष को तर्जोअंदाज की तरह इस्तेमाल किया जा सकता है।

प्रतिवाद को स्वर देने वाले कवियों में शायद ढसाल अकेले ऐसे कवि हैं जो अंडरवर्ल्ड (अधोलोक) के बारे में एक अंतरंग व्यक्ति की तरह बात करते हैं। वह इस नरक के बारे में किसी बुर्जुआ पर्यटक की तरह नहीं बोलते वरन इसकी तमाम ध्वनियों को व्यक्त करते हैं। यहां यह याद रखने योग्य है कि भारत में आधुनिकीकरण की प्रक्रिया संदर्भयुक्त से संदर्भमुक्त की ओर गतिमान रही है, जैसा कि धर्मवीर भारती और अय्यप्पा पणिकर के पाठ से पता चलता है कि उनकी रचनाएं सार्वभौमिक और शाश्वत पर कुछ अधिक ही बल देती हैं। हिन्दू पौराणिक आख्यानों के उपयोग के फलस्वरूप उनकी रचनाओं से जो संकेत उभर कर आते हैं वह एक सर्वभारतीय राष्ट्रवादी विमर्श की पुष्टि करते हैं जबकि स्वयं उनकी अनुभवसामग्री ऐसे किसी भी वैधीकरण (अभिषेक) का विरोध करती है। दलित लेखक जन्म, जाति, लिंग और धर्म के सन्दर्भों पर बल देते हैं क्योंकि एक दलित, संस्कृति तथा उसके सामाजिक बोझ और अपने दलितपन को अलग करके नहीं रह सकता है। यह सवाल ‘मैं कौन हूं‘ एक दलित के लिए कोई तत्वज्ञानद सवाल नहीं है बल्कि आवश्यक रूप से राजनीतिक है। हिन्दू पौराणिकता में जिस तरह का  आदर्शीकृत लावलश्कर है वह वास्तविक मानवीय मानकों पर दुःख और पीड़ा की अभिव्यक्ति में बाधा पहुंचाता है। अतः यह अकारण नहीं है कि वाल्मीकि को संबोधित एक कविता में दलित कवि दया पवार उनके जन्म की विपरीत परिस्थितियों का उल्लेख करते हुए यह पूछते हैं कि रामराज्य की प्रशंसा करते समय क्या उन्हें शूद्रों की चीख सुनाई नहीं दी। इस महाकवि को महाकवि कैसे माने? यदि एक भी पंक्ति वह इस उत्पीड़न के विरूद्ध लिखते तो हम उनका नाम छाती पर लिख लेते।

अम्बेडकर द्वारा 1956 में बौद्ध धर्म को ग्रहण करना दलित साहित्य के उदय के लिए एक बड़ी और महत्वपूर्ण घटना थी। एक ऐसी सामाजिक पहचान का वरण, जिसका गठन पारम्परिक और प्रचलित हिन्दू शास्त्रीयता से बाहर हुआ हो, निष्चय ही साहित्य पर अपेक्षित प्रभाव डालने वाली थी। दलित साहित्य का अवांगार्द रूप इसी घटना के बाद प्रकट हुआ। पुराण से इतिहास की ओर जाने वाले दलित साहित्य में समकालीन इतिहास की पुनर्रचना एक ऐसी भाषा में की जाती है जो उच्चआधुनिकतावाद के अभिजात्यवादी मुहावरे को स्वीकार नहीं करती है। दया पवार की कविता ‘बुद्ध’ में कवि, बुद्ध को अजन्ता और एलोरा की गुफाओं में नहीं देखता है वरन झोपड़ी से झोपड़ी तक चलते हुए और लोगों के दुःख हरते हुए देखता है।

आधुनिकतावादी कविताओं के समग्र मूल्यांकन के लिए उच्चआधुनिकतावाद और अवांगार्द लेखन के विभेद को समझना आवश्यक है। आधुनिकतावाद के शुरूआती दौर में उच्च आधुनिकतावाद अथवा सौन्दर्यात्मक आधुनिकतावाद ने मनुष्य की एक ऐसी अमूर्त अवधारणा प्रस्तुत की जिसमें एक शानदार राष्ट्रीय वितान के तले वर्ग, जाति, धर्म, क्षेत्र और लिंग के भेद ढंक जाते हैं। पौराणिकता की प्रणाली ही ऐसी है कि वह जीवन को उसकी ऐतिहासिक अंतर्वस्तु से निःशेष करते हुए, व्यक्तिगत अनुभव को राजनीतिरहित कर देती है। समाज के दलित और वंचित वर्गों के लिए स्वतंत्रता और अस्मिता की तलाश इतिहास से आरम्भ होती है। बीसवी सदी के पांचवे और छठे दशक में प्रवेश के समय भारतीय आधुनिकतावादी यूरोपीय आधुनिकतावादियों से प्रेरित थे, खास तौर से फ्रांसीसी सिम्बालिस्ट से तथा इलियट और पाउन्ड से। इसके बाद के भारतीय अवांगार्द कलाकार लोक प्रेरणा हेतु लातीनी, अमरीकी और अफ्रीकी लेखकों की ओर देखते थे। इस परिवर्तन के पीछे यह अहसास था कि वे तीसरी दुनिया के वासी हैं और यूरोपीय ढांचा उनके लिए कारगर नहीं है क्योंकि उत्तर औपनिवेशिक काल की अपेक्षाओं के तहत उन्हें अपनी सामाजिक अस्मिता को पुनर्परिभाषित करना है। अवांगार्द लेखक को राष्ट्रीय एजेन्डे की अपर्याप्तता और सीमा दिख रही थी।

छठे दशक के अन्त तक औपचारिक शिक्षा के प्रसार के कारण, शिक्षा से सुलभ हुई सामाजिक गतिविधियों में समाज के नए वर्गों का प्रवेश हुआ। चूंकि इन नवशिक्षित वर्गों का जीवनानुभव प्रचलित आभिजात्य मानदण्डों से मेल नहीं खाता था, इसलिए इस काल के लेखकों ने साहित्यिक भाषा और सामान्य भाषा के अंतर को ध्वस्त करते हुए पाठक और पाठ के रिश्ते को नए सिरे से ढाला। खासतौर से तलछट के संसार को अभिव्यक्ति देने वाली नामदेव ढसाल की भाषा। ढसाल ने एक अद्भुत जारज बोली का प्रयोग किया जिसके द्वारा उन्होंने उस  विशिष्ट और अनुभवसिद्ध स्थितियों को देखा-परखा जो उस स्थल और समय से वास्ता रखती थीं, जिनकी अच्छी तरह से शिनाख्त की जा सकती थी।

मलयालम की अवांगार्द कविता में ईसा और बुद्ध समकालीन इतिहास के दुःख-दर्द को संप्रेषित करने वाले केन्द्रीय रूपकों की शक्ल अख्तियार कर लेते हैं। चूंकि मलयालम में ईसा सम्बन्धी गद्य लेखन का अच्छा-खास इतिहास रहा है इसलिए इस परम्परा के गद्य की पद्यात्मक संभावनाओं की खोज के. आर. रामकृष्णन, के. जी. शंकर पिल्लई और के. सच्चिदानंदन की अनेक कविताओं में की गई है। जहां उच्च आधुनिकता के कवि अय्यप्पा पणिकर के ‘कुरूक्षेत्रम्’ में पद्यात्मक वाक्य-रचना का अनुनादी संगीत है वहीं छठे और सातवें दशक के अवांगार्द लेखन की रचनात्मक संरचना अधिक गद्यात्मक है। यह गद्यात्मकता उस जैविक एवं व्युत्पत्तीय दृष्टिकोण को अस्वीकृत करती है जिसके तहत कविता की एक स्वप्रयोजनपरक दुनिया को मान्यता दी जाती है। मनुष्य की दुःखद नियति की बौद्ध अवधारणा अथवा आत्मकथात्मक स्व पर बल देने वाली गद्यात्मकता का वहन करता हुआ टुकड़ा-टुकड़ा यथार्थ, स्थानीय बोलचाल की भाषा में या संकर जनभाषा के द्वारा अवांगार्दी भारतीय कविता की वाक्य-रचना में प्रवेश करता है। इस संदर्भ में के. जी. संकर पिल्लई की लम्बी मलयालम कविता ‘बंगाल’ (1972) का उल्लेख किया जा सकता है। यहां बंगाल उस वामपंथी क्रांतिकारी चेतना का द्योतक शब्द है जो इस अवधि में व्यवस्थावादी शक्तियों के विरूद्ध लामबन्द हो रही थी। यह कविता, धृतराष्ट्र का नाटकीय एकालाप है जिसमें उसकी अन्धता उस आत्म-विभाजन को रेखांकित कर रही हैं जो छठे दशक के अंतिम वर्षों में और सातवें दशक की शुरूआत में सतह पर आ गई थी। चरित्र रूपांतरण के द्वारा धृतराष्ट्र पुरानी व्यवस्था का संरक्षक बन कर प्रकट होता है और क्रांतिकारी आन्दोलन के प्रतिनिधि संजय से पूछता है बंगाल की क्या खबर है? यह कविता जोड़-जाड़ (मोंताज) की विधियों से गुजरती है जिसमें संष्लेषण के प्रयासों को नकारा गया है। यह जोड़-जाड़ विभक्तमना भारतीय समाज की अभिव्यक्ति है। अन्धा राजा धृतराष्ट्र उस विजन की असफलता का साररूप है जो एक बहुलतावादी समाज की जमीनी हकीकतों को नहीं देख पाया। इस कविता में भारती के अन्धा युग के पौराणिक रूपक को भारतीय समय की राजनीतिक अफरा-तफरी के संदर्भ में इतिहास के पन्नों पर फिर से रचा गया है।

हिन्दी के श्रीकान्त वर्मा की कविताओं में, खास तौर से उनकी मगध श्रृंखला की कविताओं में इतिहास उन रूपकों को उपलब्ध कराता है जो औपनिवेशिक संस्कृति के अवषेषों से पीडि़त आत्मबोध की जटिलता को उधेड़ने और खोलने का काम करते हैं। पराजय और पलायन के प्रतिबिम्ब इन कविताओं को कोंचते रहते हैं। विनय धारवड़कर ने वर्मा की कविता ‘खैबर‘ के बारे में कहा है कि ‘खैबर’ का जिज्ञासु-व्यक्तित्व संदेही स्वभाव का है, यहां तक कि उसमें अनास्था का भी कुछ तत्व है। वह उस इतिहास के प्रति कड़वाहट और क्रोध से भरा हुआ है जिसे वह परे ढकेलना चाहता है, वह एक स्थानीय क्रांतिकारी है जिसे प्राचीन और आधुनिक इतिहास ने जीत लिया है। ई.वी.आर कहते हैं कि ‘खैबर’ के बारे में की गई उक्त टिप्पणी ‘मगध’ श्रंखला की कविता में वर्णित खोज और तलाश की केन्द्रीय विषयवस्तु पर भी लागू होती है। खैबर में कवि पूछता है कि जब हर तरफ दुःख और द्वन्द है तो यह नए शिलान्यास क्यों किए जा रहे हैं।
मगध में कवि कहता है;

तुम भी तो मगध को ढूंढ रहे हो
बंधुओं
यह वह मगध नहीं है
तुमने जिसे पढ़ा है किताबों में,
यह वह मगध है
जिसे तुम
मेरी तरह
गंवा चुके हो

वर्मा की कविताओं में समकालीन यथार्थ से व्याकुल होने का सतत भाव है। उनकी कविताओं में अतीत की गर्त में खोए हुए राज्यों मगध, कलिंग, उज्जैन, हस्तिनापुर और कोसल में कुछ ऐसी अनोखी और पुरावृत्तीय आभा है जो किसी मुद्राशास्त्रज्ञ (न्यूमिसमैटिस्ट) के संग्रह में होती है। किन्तु वर्मा की कविता में सामाजिक दिशाभ्रम की प्रतीति के साथ कोई ऐसा आदर्शवादी आग्रह नहीं जुड़ा है जो उनकी तलाश की प्रतिगामी रूझान पर रोक लगा सके। वोले सोयिन्का के शब्दों में कहें तो ‘एक रचनात्मक सरोकार जो वास्तविकता की संकल्पना या विस्तार, शुद्ध-विशुद्ध आख्यान के परे जाकर करता है’ के अभाव में वर्मा की कविताएं उत्तर औपनिवेशिक समाज की थकान को ही केवल उजागर करती हैं। हालांकि यह बात अपनी जगह सही है कि यह थकान समकालीन भारत का एक गहरा यथार्थबोध है और इस सीमा तक वर्मा की कविताओं के स्वर प्रामाणिक रूप से भारतीय हैं। सामाजिक दिशाभ्रम की राजनीतिक अन्तर्वस्तु जिसका वह चित्रण कर रहे हैं, से वह भलीभांति अवगत हैं यह उनकी निम्न कविता की पंक्तियों में आने वाले इतिहास के बिम्बों में देखा जा सकता है।  तीसरा रास्ता नामक कविता मगध संग्रह से-

मगध में शोर है कि मगध में
शासक नहीं रहे
जो थे
वे मदिरा, प्रमाद और आलस्य के कारण इस लायक
नहीं रहे
कि उन्हें हम मगध का शासक कह सकें
लगभग यही शोर है।
अवन्ती में,
यही कोसल में,
यही
विदर्भ में
कि शासक नहीं रहे
जो थे
उन्हें मदिरा, प्रमाद और आलस्य ने
इस
लायक नहीं
रखा
कि उन्हें हम अपना शासक कह सकें
तब हम क्या करें?

इस क्षुब्ध प्रश्न के पीछे समाज की पुनर्संरचना करने की कवि की ताकत की सीमा और इससे उत्पन्न द्विविधा का भाव है। मलयालम में सच्चिदानंदन की अनेक कविताओं में सरोकार और मुठभेड़ के बीच की इस जमीन पर पैर रखने की कोशिश की गई है। उनकी कविता ‘बर्तोल्त ब्रेख्त और गौतम बुद्ध’ में कवि-नाटककार और संत के बीच एक चुनौतीपूर्ण मुलाकात दर्षाई गई है। ब्रेख्त- जानना चाहते हैं कि बुद्ध का ज्ञान भूख से मर रहे एक बच्चे के लिए क्या अहमियत रखता है? ब्रेख्त महसूस करते हैं कि पुराने उत्तर नए समय के लिए अनुपयोगी हैं क्योंकि कोई उत्तर सर्वकालिक नहीं होता। इसके प्रतिउत्तर में बुद्ध कवि को जीवक नामक भिक्षु की कहानी सुनाते हैं जो एक पागल हाथी पर चढ़ कर उसके कानों में अहिंसा का उपदेश उड़ेले दे रहा था। उस समय भला हो उस शिकारी का जिसने जीवक को रक्तरंजित निर्वाण से बचाया और साथ ही उन्हें जीवित रहने का रहस्य बताया। यहीं पर बुद्ध ब्रेख्त से कहते हैं कि ब्रेख्त जो कह रहे हैं वह अर्द्धसत्य है क्योंकि वस्तुतः बदलते सवालों के साथ उत्तरों के मायने बदल जाते हैं। अवांगार्दी लेखन के लिए बुद्ध की प्रासंगिकता स्पष्ट हो जाती है, यदि सन्दर्भनिष्ठ उत्तरों के प्रति उनके आग्रह को हम इतिहास की रेशा-रेशा  विशिष्टताओं की ओर लौटने की तरह देखें। वस्तुतः उत्तर देने वाले से उसकी व्याख्या की अपेक्षा नहीं करनी चाहिए। यह व्याख्या बदले हुए समय के पूर्वपक्ष और उत्तरपक्ष के हवाले कर देनी चाहिए।

उम्बर्टो इको के इस कथन कि विचारधारा वह विश्वास-व्यवस्था है जिसमें स्वयं का प्रतिवाद करने और वैकल्पिक विश्वास-व्यवस्था, की पहचान करने की जगह ही नहीं होती, के साथ ई. वी. रामकृष्णन, मुक्तिबोध के दरवाजे पर ‘द अनअचीव्ड अब्सोल्यूट एक्सप्रेशन‘ एन्ड द मॉर्डनिटी ऑफ़ मुक्तिबोध’ कहते हुए आवाज लगाते हैं।

संक्रमणकालीन समाजों में अक्सर एक कवि से अपेक्षित होता है कि वह एक आलोचक की भूमिका भी निभाए। इस कवि-आलोचक को विचारों के उस वातावरण को तैयार करना पड़ता है जिसके तहत उसकी रचनाओं का पाठ सम्भव होता है। गजानन माधव मुक्तिबोध एक ऐसे ही कवि-आलोचक थे। समाज के अन्तर्विरोध और सामाजिक व्यवहार के दोगलेपन के बारे में उनका आधारिक अनुभव हिन्दी कविता के प्रचलित रूपों और रूपात्मक संभावनाओं में अंटने वाला नहीं था। 1944 के ‘तारसप्तक’ में छपे उनके वक्तव्य में उनके इस असन्तोष का स्पष्ट उल्लेख है।
आक्टेवियो पाज़ ने एक जगह कहा है कि आधुनिकता की माप-तौल औद्योगिक प्रगति से नहीं वरन् आलोचना और आत्मालोचना की क्षमता से होती है। मुक्तिबोध में आलोचना और आत्मालोचना की यही क्षमता, उनकी आधुनिकता और समकालीन रचनाकारों से उनकी भिन्नता को परिभाषित करती है। इससे इस बात की भी समझ पैदा होती है कि क्यों 1960 के बाद के कवियों पर उनका उल्लेखनीय प्रभाव पड़ा। काव्यरूपों को खोलने की प्रक्रिया में उन्हें उस काव्य परम्परा के आवश्यक तत्वों को विघटित करना पड़ा जिसने काफी हद तक उनके स्व और संवेदना का गठन किया था। ‘तारसप्तक‘ (1944) के वक्तव्य में वह हमें बताते हैं कि कैसे वह समकालीन हिन्दी कविता के सौन्दर्यवादी आदर्शों और मानवीय यथार्थ जैसा कि टालस्टाय और कुछ मराठी लेखकों की कृतियों में व्यक्त हुआ, के बीच, खींचा-तानी के शिकार होते रहे। लेखक की प्रवजन प्रवृत्ति पर बल देते हुए वह कहते हैं कि लेखक को शुद्धतः निजी और व्यक्तिगत से ऊपर उठना है ताकि वह आधुनिक संसार की बहुलता और विविधता का साक्षात्कार कर सके। मुक्तिबोध यह मानते हैं कि काव्यमय जीवन हमारे दैनिक जीवन का आवश्यक हिस्सा है इसलिए कविता के मूल्य सामान्य जीवन के मूल्यों का खंडन नहीं कर सकते हैं। सौन्दर्यात्मक सवाल इसीलिए प्रासंगिक हैं क्योंकि वास्तविक जीवन में उनकी आचरणात्मक हिस्सेदारी है। मुक्तिबोध ने उस समय यह लिखा कि प्रसाद, पन्त और महादेवी का जमाना बीत चुका है, उनकी कल्पनाशक्ति  और उनकी रहस्यात्मक अनुभूतियां पुरानी पड़ चुकी हैं।

उल्लेखनीय है कि मुक्तिबोध का विद्रोह पूरी हिन्दी काव्य परम्परा के विरूद्ध नहीं था बल्कि रूमानियत के उस संस्करण के विरूद्ध था जिसके बारे में एक अच्छी खासी उदारचरित संरक्षणवादी सहमति बन गई थी। टैगोर की गीतांजलि और भारतीय दर्शन में अहंब्रह्मास्मि की तत्वज्ञानी अवधारणा से प्रेरणा प्राप्त करते हुए छायावादी कवियों ने कविता को एक नया प्रगीतात्मक स्वर दिया जिसमें स्वरूप की और विश्वरूप की एकता पर बल दिया गया था। करीने शोमेर ‘महादेवी वर्मा ऐन्ड द छायावाद, एज़ ऑफ़ माडर्न हिन्दी पोएट्री’ में टिप्पणी करती हैं कि छायावादियों के लिए प्रत्येक मनुष्य में कुछ ऐसा है जिसे घटाया या कम नहीं किया जा सकता है और यह कुछ अनन्तः महत्वपूर्ण है।

वस्तुतः छायावादी कविता का सारतत्व यह है कि वह कविता के लिए एक अमूर्त, आत्मनिष्ठ और आभ्यांतरिक लोक की रचना करती है। इस सिलसिले में अपने निबन्ध ‘आधुनिक हिन्दी कविता में यथार्थ’ में महादेवी वर्मा और हरिवंश राय ‘बच्चन’ की तुलना करते हुए मुक्तिबोध कहते हैं कि महादेवी के आंसू हमें द्रवित नहीं करते हैं, जबकि बच्चन की ‘निशानिमंत्रण’ हमें रूलाती है, क्योंकि महादेवी ने दुःखवाद का कल्ट बना लिया जो उनकी कल्पना से उत्पन्न है, इसके विपरीत बच्चन स्वयं रोया है, खुद, तब वह दूसरों को रूला सका। छायावाद की शैल्पिक शब्द-योजना में यह कूवत ही नहीं रही कि वह नई संवेदना के आधारभूत अंतर्द्वंद्वों  को संप्रेषित कर सके। मध्यकालीन भक्त कवियों पर लिखे निबन्ध में मुक्तिबोध यह दर्शाते हैं कि किस प्रकार यह कवि व्यथा और उत्पीड़न के मानवीय यथार्थ से परिचित और प्रेरित थे। यह भी कि आधुनिक भारतीय कवि को भक्ति काव्य के माध्यम से वह पूर्व औपनिवेशिक परम्परा उपलब्ध है जो वंचित वर्गों के दुःख और उत्पीड़न से पहचान कायम कर चुकी थी। अलबत्ता, जब इस भक्ति परम्परा ने जात-पात से परे अपना प्रभाव क्षेत्र बनाया तब उच्चवर्ग ने जातिभेद को बल देने के लिए इस परम्परा का हरण कर लिया। वर्तमान में भी नए साहित्यिक आन्दोलनों की क्रान्तिकारी सम्भावनाओं का यही हश्र हो रहा है कि शासकवर्ग ने उन्हें यथास्थिति के हित में अनुकूलित कर लिया है। छायावाद और आधुनिकतावाद के साथ यही हुआ और मुक्तिबोध ने इस तरह की कथनी और करनी से विद्रोह किया।

जयशंकर प्रसाद की ‘कामायनी‘ पर मुक्तिबोध का प्रबन्ध, भारतीय कविता की एक केन्द्रीय परम्परा से उनकी पसन्दगी और नापसन्दगी का रिश्ता सामने लाता है। वह प्रसाद के कल्पनात्मक विस्तार, प्रवाह और उनकी आह्वानक ताकत से प्रभावित हैं। वह किसी शोध-विचार को काव्यरूप में प्रस्तुत करने की प्रसाद की योग्यता के भी कायल हैं लेकिन मुक्तिबोध प्रसाद की उस विश्वदृष्टि को खारिज करते हैं जो छायावादी कविता के आभिजात्यवादी और तत्वज्ञानी मिजाज का प्रतिनिधित्व करती है। मुक्तिबोध कामायनी के मनु को उन सामंती मूल्यों का मूर्तिमान रूप मानते हैं जो समकालीन इतिहास की समस्याओं के प्रति उच्चवर्ग के रवैये का बोध कराता है। मुक्तिबोध कहते हैं कि प्रसाद का मनु उसी सामाजिक वर्ग का है जिसका अंग और अंश प्रसाद हैं। कामायनी का मनु, वेदों का मनु नहीं है।

ई.वी.आर. के अनुसार प्रसाद की कामायनी उस प्रगीतात्मक और आत्मविष्लेषक स्व की आभ्यांतरिकता की खोज का प्रयास है जो अपनी निजता की स्थापना भव्य कल्पनाप्रवण प्रश्नों के द्वारा करती है। मनुष्य के उद्गम और उसकी पूर्णता की आकांक्षा की निजी पौराणिकी रच कर प्रसाद उस पीढ़ी को स्वर दे रहे थे जो कला और कल्पना की मूल्यवत्ता का सम्मान करती है और यह विश्वास करती है कि इनके द्वारा मानवीय सीमाओं के परे जाया जा सकता है, मानव जीवन को बदला जा सकता हैं। करीने शोमेर कहती हैं कि ‘कामायनी’ महज़ पुरावृतांतवाद का अभ्यास नहीं है, वरन् इसके जरिए एक ऐसी विश्वदृष्टि बनाने-चुनने की कोशिश की गई है जो आधुनिक हिन्दू बुद्धिजीवी के अन्तर्विरोधों का समाधान कर सके, ऐसा बुद्धिजीवी जो आधुनिक पश्चिम के इहलौकिक दृष्टिकोण और उस धार्मिक (पारलौकिक) दृष्टिकोण के बीच फंसा है जिसकी अब वह साख नहीं रही।

लगभग दो दशकों तक कामायनी से मुक्तिबोध की संलग्नता इस तथ्य को सत्यापित करती है कि मुक्तिबोध उन्हीं अन्तर्विरोधों की अनुक्रिया कर रहे थे जिनके समाधान के लिए प्रसाद प्रयत्नशील थे। मुक्तिबोध ने ‘कामायनी’ को किसी ऐतिहासिक या वैदिक काव्य के परिप्रेक्ष्य में नहीं देखा वरन् उन्होंने उसे एक ऐसी कविता के रूप में देखा जो स्वैरकल्पना (फन्तासी) के माध्यम से समकालीन जीवन की समस्याओं को सम्बोधित कर रही है। चूंकि मुक्तिबोध ने अपनी कविता में इसी प्रकार की कल्पना का उपयोग किया था इसलिए वह यह जानते थे कि कामायनी की विस्तृत काव्यगत संरचना, वह आवश्यक कथाबद्ध ढांचा है जो कवि और उसकी कलावस्तु के बीच में वाजिबी फासला पैदा करती है। मुक्तिबोध यह आवश्यक समझते हैं कि कामायनी की कलागत विशेषता और उसके स्थापत्यिक गुण को उस प्रतिगामी और प्रतिक्रियावादी जीवन दृष्टि से अलग किया जाए जो रचना में मूर्तित होती है। चूंकि कामायनी छायावादी काव्योत्कर्ष का अहम प्रतिनिधित्व करने वाली रचना है अतः उसके अंतर में रूपात्मक प्रवीणता और वैचारिक आकाशीयता के बीच जो विग्रह है वह समकालिक इतिहास की चुनौतियों का सामना करने में हिन्दी की मुख्यधारा की काव्यपरंपरा की गहरी खिंची सीमाओं की ओर इंगित करता है। जहां प्रसाद विभाजित स्व के पुनर्संघटन के लिए भारतीय तत्वज्ञानी परम्पराओं की ओर देखते हैं वहीं मुक्तिबोध ऐसे उपचार को बेकार समझते हैं। अतः प्रसाद की कल्पना और मुक्तिबोध की कल्पना में कोई गहरा मेलजोल नहीं है।

अज्ञेय द्वारा समर्थित आधुनिकतावादी शैली की तर्कणा आंग्ल-अमरीकी साहित्यिक प्रतिष्ठान द्वारा प्रतिपादित सिद्धान्तों पर आधारित थी। रिल्के, वैलेरी, ज्वायस, इलियट और यीट्स वगैरह ने कल्पना की स्वायत्तता और स्वांतः सुखाय कलादृष्टि पर बल दिया है। लेकिन बीसवी सदी के पांचवे दशक तक इस प्रकार की सौन्दर्याभिरूचि या उच्च आधुनिकतावाद भारतीय साहित्यिक गृहस्थी का अंग बन चुके थे ओर छठे दशक तक बहुत से भारतीय विश्वविद्यालयों ने इन्हें अपने पाठ्यक्रम में शामिल कर लिया था। इस प्रकार आधुनिकतावाद की अंतर्हित मुक्तकारी शक्तियों को वशवर्ती बनाया जा चुका था और एक प्रतिपक्षी संस्कृति के रूप में उसकी वैधता का क्षरण हो चुका था। यह अनायास नहीं कि मुक्तिबोध ने रूमानियत के छायावादी रूप और उच्च आधुनिकतावाद के शास्त्रीकृत संस्करण से दूरी बनाने की कोशिश की क्योंकि यह दोनों ही सामाजिक-राजनीतिक क्षेत्र में यथास्थिति की पुष्टि करने लगे थे। मुक्तिबोध ने अपने निबन्ध ‘नयी कविता और आधुनिक भाव-बोध’ में इस बात पर अफसोस जताया है कि हम आधुनिकतावाद की तस्वीर केवल यूरोप और अमरीका में देखते हैं, जिसके फलस्वरूप अनेक भारतीय कवि पश्चिमी काव्य को भारतीय परिधान में प्रस्तुत करने लगे हैं। मुक्तिबोध कहते हैं कि भारतीय कवियों को अफ्रीका, एशिया और लातीनी अमरीका के नवोदित समाजों से प्रेरणा ग्रहण करनी चाहिए जहां सामाजिक परिवर्तन और पुनर्रचना के लिए किए जा रहे संघर्ष ने एक नई चेतना पैदा की है।

मुक्तिबोध आश्वस्त थे कि यूरो-अमरीकन उच्च आधुनिकतावाद भारतीय यथार्थ के समन्वेषण के लिए भारतीय साहित्यकार को कोई उपयोगी ढांचा उपलब्ध नहीं करा सकता है। इस बात के दृष्टिगत कि मुक्तिबोध इन विचारों को पांचवे दशक में ही अभिव्यक्ति दे रहे थे, यह सम्भव है कि वह आधुनिक हिन्दी कविता में क्रान्तिकारी प्रवृत्ति का सचेत पोषण कर रहे थे।
पेंगुइन से प्रकाशित ‘न्यू राइटिंग इन इण्डिया’ में आदिल जस्सावाला मुक्तिबोध को अंग्रेजी में अनुदित करने में आई समस्या का उल्लेख करते हुए कहते हैं कि उन्हें अनुदित करने में वही दिक्कत होती है जैसे डायलन टामस को किसी विदेशी भाषा में अनुदित करने में होती हैं। हिन्दी की ध्वनि का पूर्ण उपयोग करते हुए मुक्तिबोध की कविताएं हिन्दू पौराणिकता और लोक कथाओं से भरी पड़ी हैं। इसके साथ ही वह बेबीलोनिया, असीरिया और ग्रीक सभ्यताओं से भी कुछ न कुछ ग्रहण करते हैं।

उक्त स्थिति में स्वाभाविक है कि मुक्तिबोध छोटे प्रगीतात्मक उच्वारों की तुलना में लंबे तारतम्यात्मक वर्णनविधान को अधिक पसन्द करते थे क्योंकि इस तर्जे कलाम में लगातार विकसित होते हुए स्व को धारित करने लायक आख्यानात्मक अवकाष मिल जाता था। ‘तार सप्तक’ के द्वितीय संस्करण में उन्होंने कहा भी कि उनकी समस्या यह नहीं है कि अंतर्वस्तु की कमी है और रूप की समृद्धि है बल्कि समस्या यह है कि अंतर्वस्तु की बहुतायत है और रूप अपर्याप्त है। जुस्तजू इस बात की है कि कैसे अंतर्वस्तु की विविधता को समेट कर इसकी रूप रचना की जाए। अव्यक्त स्व की मनोवेदना मुक्तिबोध को जीवनभर सालती रही। उनकी ‘अंधेरे में‘ का अन्त निम्न पंक्तियों से होता है:

खोजता हूं पठार… पहाड़… समुन्दर
जहां मिल सके मुझे
मेरी वह खोयी हुई
परम अभिव्यक्ति अनिवार
आत्म – सम्भवा

व्यक्त होने और करने की यह कठिनाई उन औपनिवेशिक जटिलताओं से उपजी थी जो अभिव्यक्ति के रास्ते में अवरोध की तरह खड़ी थीं। इसका मतलब यह था कि मुक्तिबोध अपने अनुभवों के उस राजनीतिक मर्म के लिए जगह पैदा करें जिसके लिए मुख्यधारा की हिन्दी कविता में अब तक कोई गुंजाइश नहीं थी। मुक्तिबोध ‘नयी कविता और आधुनिक भाव बोध’ में कहते हैं कि हमारी जिन्दगियों की खंड-खंड अवस्था के कारण नई कविता केवल द्रुत-क्षणिक बिम्ब बना पाती है। मुक्तिबोध देख सकते थे कि उनके यंत्रणाग्रस्त अन्तस की गहरी बेचैनी एक विभाजित समाज की आन्तरिक हिंसा को प्रतिबिम्बित करती थी। ‘चांद का मुंह टेढ़ा है‘ क्योंकि चांद का मुंह टेढ़ा होना उक्त समाज की कुटिलता, दिशाभ्रम और अधोगति का प्रतीक है।

अपनी कविता में मुक्तिबोध प्रतिरोध की एक ऐसी चाक्षुष भाषा की संरचना करते हैं जो संसार का निरूपण करने वाले तमाम सुव्यवस्थित और तार्किक तरीकों को चुनौती देती है। इस सम्बन्ध में ध्यातव्य है कि रूमानियत की छायावादी शैली और उच्च आधुनिकतावाद के शास्त्रीय संस्करण दोनों में ही, उस रूपरीति और बुद्धिवाद को वरीयता दी गई की जो प्राचीन भारतीय दर्शन और नैतिकता की विरासत का समर्थन करते प्रतीत होते थे। किन्तु जिस प्रकार भक्ति आन्दोलनों ने प्राचीन, शास्त्रीय और आभिजात्यवादी विश्वदृष्टि के विरोध में एक प्रतिव्यवस्था खड़ी की थी वैसे ही मुक्तिबोध ने एक ऐसे क्रान्तिकारी आधुनिकतावाद के पोषण का प्रयास किया जो समकालीन इतिहास की विकृतियों को पकड़ने में उनकी घेरेबंद, व्यूहित कल्पना की मदद कर सके।
मुक्तिबोध की कविता के भूदृश्य में प्राचीन खंडहर, परित्यक्त सूनी बावलियां, निर्जन उबड़-खाबड़ पठार, गैर आबाद घाटियां और अन्धेरी संकरी गलियां हैं। इस जमीन की खौफनाकी खुद मुक्तिबोध के अस्तित्व के संकट का बयान करती है। नेमिचन्द जैन को भेजे गए उनके बहुत से खतों में, इस बैरी दुनिया में सम्मान के साथ जीने की उनकी इच्छा और संघर्ष को देखा-पढ़ा जा सकता है। इन खतों में वह अन्धेरा डरावना पाताल है जिसमें वह जी रहे हैं, जहां उनकी आत्मा पर सांप रेग रहे हैं, जहां मन की सारी दुरवस्थाएं प्रेत के आकार में तब्दील होती हैं। इस भूमिगत मनोभूमि का दुःस्वप्न अतिप्रकृत यथार्थवादी (सररिअलिस्टिक) बिम्बो के द्वारा उनकी कविता ‘ब्रह्मराक्षस’ में प्रकट हुआ हे। ‘तीसरा क्षण’ नामक निबन्ध में उन्होंने रचनात्मक कर्म में स्वैर अथवा विलक्षण कल्पना (फैन्टेसी) के तत्व पर विस्तार से लिखा है। वह कहते हैं कि काव्यकर्म का सर्वोच्च क्षण अथवा तीसरा क्षण उस समय घटित होता है जब सामाजिक यथार्थ से प्रेरित पूर्वोक्त कल्पना शब्दों में मूर्तित होती है और भाषा में इंद्रियसंवेद्य रूप ग्रहण करती है। यहां यह कहना कदाचित अप्रासंगिक न होगा कि रामविलास शर्मा ने पराविद्या में मुक्तिबोध की रूचि और जासूसी कथासाहित्य में उनकी दिलचस्पी को कुछेक उन प्रभावों में से माना है जिन्होंने मुक्तिबोध की कविता के मुहावरे को गढ़ा है।

यहां यह जानना भी उपयुक्त होगा कि यद्यपि अतिप्रकृत यथार्थवाद (सररियलिज्म) प्रथम विश्वयुद्ध के बाद यूरोपीय अनुभवों से उपजा था तथापि इसने लातिनी-अमरीकी और अफ्रीकी लेखकों को भी खूब प्रभावित किया था। ‘ड्राइंग द लाइन: आर्ट ऐन्ड कल्चरल आईडेनटिटी इन लेटिन अमरीका’ में ओरियाना बड्डे और वलेरी फ्रेज़र ने यह कहा है कि अनेक लातीनी-अमरीकी देशों में खोई हुई मासूमियत के निमित्त, अतीत की ललकित याद (नॉस्टेल्जिया ), प्राचीन कलाओं के रहस्यात्मक संकेत-सूत्र और नमूनागरी की रिवाज़ी ताकत, के कुछ राजनीतिक आयाम रहे हैं। यूरोप द्वारा इन देशों को जीतने और कब्जियाने से पहले का कालखण्ड यद्यपि इन देशों के वर्तमान निवासियों के जीवन के लिए अजनबी ही था तथापि लुप्त अतीत के प्रति उनकी जो कलात्मक आसक्ति थी, वह लातीनी अमरीकी संस्कृति की यूरोप की संस्कृति से अलग पहचान कायम करने में समर्थ थी। अतीत की इस सांदर्भिकता में औपनिवेशिक विग्रह की जानकारी अतर्निहित थी। इन स्रोतों की ओर लौटना दो बातों का परिचायक है, प्रथमतः कलात्मक प्रस्तुति की प्रचलित और मान्य परम्पराओं की अस्वीकृति और द्वितीयतः देशी संस्कृति की विशेष पहचान की दावेदारी।
मुक्तिबोध द्वारा कविता में अतिप्रकृत यथार्थवादी तारतम्यात्मकता का उपयोग भारतीय अनुभूति के पूर्व औपनिवेशिक स्रोतों की ओर लौटने का एक प्रयास है। मनोवैज्ञानिक स्तर पर समझा जाए तो यह देशी संस्कृति की आद्यरूपा छवियों की ओर वापस आना है। पश्चिम के पारम्परिक साहित्य या मुख्यधारा की भारतीय कविता की खुराक पर पले दिल-ओ-दिमाग को पूर्वऔपनिवेशिक भारत की यह स्वैरकल्पना कुछ विचित्र और विचलित लग सकती है, परन्तु इस कल्पना की मूल्यवत्ता पर बल देकर मुक्बिोध एक ऐसी चाक्षुष भाषा को गढ़ते हैं जो आधुनिकतावादी विरासत से हमारा आमना-सामना कराती है। बड्डे और फ्रेज़र यह बताते है कि तीसरी दुनिया के जो देश सांस्कृतिक स्वाधीनता की छोटी-बड़ी लड़ाइयों में फंसे थे उनके विद्रोह की आंतरिक भाषा को अतिप्रकृत यथार्थवाद वैधता प्रदान करता था। कविता ‘ब्रह्मराक्षस’ हमें यह समझने में मदद कर सकती है कि कैसे मुक्तिबोध भारतीय स्थिति की  विशिष्टताओें को अतिप्रकृत यथार्थवाद में संयोजित करते हैं। अनुष्ठान और स्वप्न की जादुई दुनिया का सृजन करके कविता एक प्रागैतिहासिक वातावरण का आह्वान करती है। ब्रह्मराक्षस एक पैशाचिक, पौराणिक और प्रातिभासिक आकृति है जो मुक्ति की आशा के बिना, प्राश्चित करने के लिए अभिशप्त है। कविता शुरू होती है शहर के उस ओर खंडहर की तरफ परित्यक्त सूनी बावड़ी से, जिसे घेर रखा है खूब उलझी हुई डालों ने। उसी बावड़ी की अबूझ सिहराती-सिहराती गहराइयों में बैठा हुआ ब्रह्मराक्षस अपनी पाप-छाया को धोने के लिए लगातार देह को साफ कर रहा है। पर यह मैल छूटती नहीं है। तो वह उच्चारता है कोई अनोखा स्तोत्र, कोई क्रुद्ध मन्त्रोच्चार अथवा उमड़ता है शुद्ध संस्कृत गालियों का ज्वार। अगर किसी तिरछी होकर गिरती हुई रवि-रश्मि के उड़ते हुए परमाणु उस तक पहुंचते हैं तो वह समझता है कि सूरज ने उसे सलाम भेजा है। अगर भूली भटकी चांदनी की कोई किरण बावड़ी की दीवार से टकराती है तो वह समझता है कि चंद्रमा ने उसे गुरूपद पर अभिषिक्त कर दिया है। ब्रह्मराक्षस ने सारी विद्या पढ़ ली है; सुमेरी -बैबीलोनी जनकथाओं से मधुर वैदिक श्रृचाओं तक, सारे सूत्र, छन्द मंत्र थियोरम, सब प्रमेयों तक और मार्क्स, एंजेल्स, रसेल, ट्वायनबी, हीडेग्गर, स्पेंगलर सात्र्र और गान्धी को आत्मसात कर इनका नया व्याख्यान करता हुआ वह अहर्निष नहाते हुए खुद से जूझ रहा है। अंधेरी सीढि़यों पर चढ़ते-उतरते और चोटिल होते हुए उसे लगता है कि बुरे और अच्छे के बीच के संघर्ष से भी उग्रतर है अच्छे और उससे अधिक अच्छे के बीच का संगर। दो असंगत संसारों के उलझे हुए गणित के रण में अंततः उसका अंत हुआ। इस अतिक्रांत अंतगति के समय में कवि उसका षिष्य होने की इच्छा व्यक्त करता है ताकि वह उसके अधूरे काम को पूरा कर सके और उसकी वेदना के स्त्रोत तक पहुंच सके।

निबन्ध ‘तीसरा क्षण’ में मुक्तिबोध कहते हैं कि भाषा एक सामाजिक परिसम्पत्ति है और हर शब्द के पीछे एक अर्थपरम्परा है जो सामुदायिक जीवन से जुड़ी हुई है। मष्तिष्क को अस्थिर करने वाले वित्रास को एक काव्यपदार्थ में, उसी कला द्वारा परिणत किया जा सकता है जो कला सामाजिक वैधता को अपना प्रतिमान बनाती हो। भावोन्माद और आत्मसंशय के पाताललोक से बाहर निकलने के लिए ब्रह्मराक्षस एक ऐसे गुरू की खोज में है जो उसे उक्त सामाजिक वैधता के संधान के लिए मुक्त कर सके। मुक्तिबोध की आधुनिकता इस तथ्य में निहित है कि वह आधुनिक भारतीय की निजता के संकट को एक बृहत्तर सामाजिक-राजनीतिक और ज्ञानमीमांसक संकट के अंग के रूप में देखते हैं।

मुक्तिबोध की कविता ‘अंधेरे में’ इस संकट की स्पष्टतर अभिव्यक्ति है। इस प्रसंग में एक घटना उल्लेख्य है। वर्ष 1962 में मुक्तिबोध की एक पुस्तक ‘भारत: इतिहास और संस्कृति’ को मध्य प्रदेश सरकार ने माध्यमिक शिक्षा के पाठ्यक्रम में शामिल कर लिया था लेकिन पुस्तक तुरन्त ही विवादों का शिकार हो गई है और सम्पादकों तथा लेखकों के एक वर्ग ने भी इसका खासा विरोध किया। मुक्तिबोध को सफाई का कोई मौका दिए बिना सरकार ने पुस्तक पर प्रतिबंध लगा दिया। इस घटना ने मुक्तिबोध को बहुत विचलित किया। हरिशंकर परसाई के अनुसार मुक्तिबोध ने इस सब को फासिस्ट शक्तियों के आर्विभाव के रूप में देखा। इसके अलावा मुक्तिबोध यह देख सके कि जिस विभाजित स्व के कारण अर्थपूर्ण अभिव्यक्ति बाधित होती है वह वस्तुतः समाज की अंगभंग सांस्कृतिक संवेदना की उपज है।

‘अंधेरे में’ का लम्बा सिलसिलेवार आख्यान कवि के स्व को संघर्ष और द्वंद के क्षेत्र के रूप में चिह्नित करता है। सामाजिक दशा और मनःस्थिति से उत्पन्न भय और मुठभेड़ के रूपक कविता को कोंचते-कुरेदते रहते हैं। कवि के जीवन के अंधेरे में विचरने वाली एक अदृश्य आकृति लाल-लाल कुहरे के श्वास-प्रश्वास से भरी एक तिलस्मी खोह में रहती है। गजब है यह आजानु भुज, सौम्य-सुन्दर सन्देहार्थक आकृति।

वह रहस्यमय व्यक्ति
अब तक न पायी गयी मेरी अभिव्यक्ति है
पूर्ण अवस्था वह
निज-सम्भावनाओं, निहित प्रभावों, प्रतिमाओं की,
मेरे परिपूर्ण का अविर्भाव
हृदय में रिस रहे ज्ञान का तनाव वह,
आत्मा की प्रतिमा

परन्तु यह अनभिव्यक्त स्व, उसका फटेहाल रूप, उसकी रक्त रंजित काया, ये सब, भय, पश्चाताप और दुश्चिंता की खोह में फंसे हुए तड़प रहे हैं। यहां यह याद करना प्रासंगिक होगा कि सरकारी नौकरी करने के सिलसिले में उन्हें अपनी वामपंथी प्रतिबद्धता को छिपाना पड़ा था। एक आविष्ट स्व जो रूग्ण परछाइयों के भीतर चला जाता है, एक प्रताडि़त स्व जिसके पीछे सत्ता पड़ी हुई है, एक ही कलाकार का रूप हैं, जो अपने विभिन्न स्वों को उस एकात्मकता में संघटित करने में असफल है जो परम अभिव्यक्ति को सम्भव बनाती है। कविता में अनेक स्थल ऐसे हैं जिनमें सड़कों और गलियों में हो रहे जनान्दोलनों के चित्र हैं और उन आन्दोलनों को निमर्मतापूर्वक कुचले जाने के दृश्य हैं। इन्हीं सड़कों को रौंदता हुआ गुजरता है, एक भुतहा जुलूस जिसमें हमकदम हैं प्रतिष्ठित पत्रकार, आबदार वर्दीधारी, प्रकाण्ड आलोचक और विचारक, जगमगाते कविगण और मंत्री, उद्योगपति और एक कुख्यात हत्यारा। यह जुलूस उस सामाजिक परिवेश के दुःस्वप्नात्क वैरभाव को सामने लाता है जिसमें कवि सांस ले रहा है। ऐसे वातावरण में अपनी बात कहना कितना मुश्किल और खतरनाक हो जाता है। अपनी बात कहने के लिए कवि को सारे मठ और गढ़ तोड़ने होंगे, पहुंचना होगा दुर्गम पहाड़ों के उस पार… तब कहीं मिलेगा झील के सुनील जल में कांपता हुआ अरूण कमल, परम अभिव्यक्ति के क्षण का वह प्रतीक जिसे कवि सारी उम्र खोजता रहा है। कवि की यह यात्रा उन मूल्यों को अस्वीकृत करती है जो समाज के मध्यवर्ग ने उस पर थोपे हैं। कविता के चौथे हिस्से में उस अपराध-बोध का स्वीकारोद्गार है जहां कवि इस सामाजिक अस्वस्थता का उत्स अपनी आत्मपरकता में भी पाता है। मुक्तिबोध ने यहां खुद को छेद-खोद डाला है-

लो-हित-पिता को घर से निकाल दिया,
जन-मन-करूणा-सी माँ को हंकाल दिया,
स्वार्थों के टेरियार कुत्तों को पाल लिया,
भावना के कर्तव्य-त्याग दिये,
हृदय के मन्तव्य-मार डाले!
बुद्धि का भाल ही फोड़ दिया,
तर्कों के हाथ उखाड़ दिए,
जम गए, जाम हुए, फंस गए,
अपने ही कीचड़ में धंस गए!!
विवेक बघार डाला स्वार्थों के तेल में
आदर्श खा गए!
अब तक क्या किया
जीवन क्या जिया,
ज्यादा लिया और दिया बहुत-बहुत कम
मर गया देश, अरे, जीवित रह गये तुम

यह आत्मसमीक्षा, आधुनिकतावाद के पालक पोषक लक्षणों के विरोध का एक प्रयास है। कविता के एक अन्य हिस्से में कवि स्वयं को इस सामाजिक दुरवस्था के लिए जिम्मेदार ठहराता है। मुक्तिबोध बल देकर कहते हैं कि एक कवि के रूप में उनकी सच्ची पहचान किसी पृथक और निजी हैसियत में नहीं है वरन् सामूहिक-सामाजिक शक्ति के एक ऐसे अंग के रूप में है जो इतिहास को फिर से सक्रिय कर सकता है।

वस्तुतः ‘अंधेरे में’ उस आत्मिक शून्य के बारे में कही गई कविता है जो उदार मानवतावादी (लिबरल हयुमनिज़्म- बहुत मोटे तौर पर एक वह साहित्यिक अवधारणा जिसमें राजनीतिक प्रतिबद्धता पर बल नहीं दिया जाता है और मानव स्वभाव को नियत तथा सतत माना जाता है जिसके फलस्वरूप किसी साहित्यिक रचना को किसी कालखंड की सामाजिक-राजनीतिक कक्षा में स्थापित करने की आवश्यकता नहीं होती है। संक्षिप्त और मार्मिक ढंग से कहें तो यह पूछने की आवश्यकता नहीं है कि बन्धु आप की लोकेशन क्या है?) विचारधारा के ह्रदय में जगह बनाए हुये थी और जिससे बहुत से भारतीय बुद्धिजीवी प्रभावित थे। इससे अलग मुक्तिबोध कहते हैं;

कविता में कहने की आदत नहीं पर कह दूं,
वर्तमान समाज में चल नहीं सकता
पूंजी से जुड़ा हुआ हृदय बदल नहीं सकता,
स्वातन्त्र्य व्यक्ति का वादी
छल नहीं सकता मुक्ति के मन को, जन को।

उदार मानवतावादी वाग्मिता की सुविधा यह है कि एक उत्तरऔपनिवेशिक समाज में जो परस्पर–विरोधी आवेग जन्म लेते और पनपते हैं उनकी अनदेखी की जा सकती है और कुछ हद तक तथा कुछ जोर-जबरदस्ती के साथ उनमें परस्पर-अनुकूलता भी दिखाई जा सकती है। राज्यसत्ता से चोट खाए हुए मुक्तिबोध देख सकते थे कि इस तरह का छद्म मेल-मिलाप आगे चल कर व्यक्ति और समाज को छिन्न-भिन्न करने का काम ही करेगा। परम अभिव्यक्ति की खोज, उनका एक ऐसा प्रयास है जिसके जरिए वह स्वयं को अपने ऐतिहासिक सन्दर्भों की भौगोलिकी में स्थापित कर रहे थे। कविता के आखिरी हिस्से में वह बताते हैं;

इसीलिए मैं हर गली में
और हर सड़क पर
झांक-झांक देखता हूं हर एक चेहरा,
प्रत्येक गतिविधि
प्रत्येक चरित्र
व हर एक आत्मा का इतिहास,
हर एक देश व राजनैतिक परिस्थिति
प्रत्येक मानवीय स्वानुभूत आदर्श
विवेक-प्रक्रिया, क्रियागत परिणति!!

मुक्तिबोध के सामने यह बिल्कुल स्पष्ट है कि अव्यक्त निजस्व का प्रत्यादान (वसूलयाबी), परिवेश की  विशिष्ट यथार्थता और जिए गए जीवन के गुणावगुण की अनुभूति से ही होता है। मुक्तिबोध की आधुनिकता में, कला के इस कौशल की पहचान है कि कला, व्यक्ति और समाज के बीच मध्यस्थीय हस्तक्षेप करके अभिव्यक्ति के ऐसे प्रवाहशील मुहावरे को प्राप्त कर सकती है जहां सौन्दर्यशास्त्र और नीतिशास्त्र की समस्याओं में परस्पर अनन्यता नहीं होगी, जहां यह दोनों कोई द्विध्रुवीय संकल्पनाएं नहीं होंगी।

मैंने यह सोचा था कि इस प्रस्तुति में मैं अपनी ओर से कुछ नहीं कहूंगा क्योंकि किसी भी किताब के बारे में यह बड़ी आसानी से कहा जा सकता है कि उसमें क्या नहीं है और क्या होना चाहिए तथापि दो-एक बातें पूछने का मन होता है। पहली यह कि, जब पौराणिकी के आह्वान को आधुनिकतावाद से जोड़ा गया तो क्या धर्मवीर भारती के साथ थोड़ा उल्लेख इस संदर्भ में दिनकर की प्रासंगिकता का होना चाहिए या नहीं। दूसरा यह है कि भारतीय पौराणिकता का आह्वान करना वही नहीं है जो ग्रीक या रोमन पौराणिकता का आह्वान है क्योंकि भारतीय पौराणिक परम्परा अभी भी जीवित है और किसी मृत परम्परा का पुरातात्विक, अकादमिक अवशेष नहीं है। इस अन्तर के काव्यात्मक प्रतिफलन को स्पष्ट करने का अवकाश होना चाहिये।

उक्त के अलावा ‘अंधेरे में’ गांधी की जटिल उपस्थिति के बारे में और पणिक्कर के ‘कुरूक्षेत्रम्’ में गांधी होने के दर्द की जो झलक है अगर उसके बारे में भी ई.वी.आर. कुछ कहते तो अच्छा होता।

इस किताब में अन्य ऐसे अध्याय हैं जिन्हें मैं प्रस्तुत नहीं कर सका। ‘द डायलॉजिक इमेजिनेशन इन मोड़ें मराठी दलित राइटिंग’। ‘द सर्च फार अ द्रविड़ियन पोअटिक: नेटीविज़्म- मॉर्डनिज़्म कन्जंक्ट इन मलयालम पोएट्री। ‘रिक्लेमिंग द पेरीफरल वायसेज़: द डिसीडेन्ट सेन्सीबिलिटी इन केदारनाथ सिंह पोएट्री। ब्लैक एक्सक्लेमेशन्स एन्ड सैवेज साइलेन्सेज़: द पोएट्री ऑफ़ दिलीप चित्रे। लिविंग ऑफ़ द फाल्ट लाइन: द पोएट्री ऑफ़ सच्चिदानंदन।

ई.वी.आर. की इस कृति में ग्रंथन का प्रयास बहुत अधिक दिखता है। उद्धरणों के प्रति लेखक का अतिरिक्त रूझान और कुछ स्थलों पर भाषा की सूत्रात्मकता के कारण आलोचना की सुगमता भी प्रभावित हुई है।

उपर्युक्त दो पंक्तियों के बावजूद मैं पुनः यह स्पष्ट करना चाहूँगा कि मेरे द्वारा इस पुस्तक की प्रत्यालोचना का कोई प्रयास नहीं हुआ है। मेरा यह आलेख 243 पृष्ठों की ‘मेकिंग इट न्यू’ का न केवल संक्षिप्त वरन् आंशिक प्रस्तुतीकरण है जिसके कारण कुछ जरूरी कड़ियाँ मुझसे छूट गई हैं। इसके अलावा इस बात के भी दृष्टिगत कि कदाचित हिन्दी कविता में आधुनिकतावाद के उत्तरवर्ती लक्षणों, उच्च आधुनिकतावाद और अवांगार्द पर अन्य भारतीय भाषाओं की साहित्यधारा के परिप्रेक्ष्य में तुलनात्मक अध्ययन कम ही हुआ है, प्रो. रामकृष्णन के इस कार्य का समग्र मूल्याकन हिन्दी के अधिकारी, विद्वानों द्वारा किया जाना अपेक्षित प्रतीत होता है।

हरी चरन प्रकाश हिंदी के वरिष्ठ कथाकार हैं, तीन कहानी-संग्रह और एक उपन्यास प्रकाशित। लखनऊ में रहते हैं और उनसे +919839311661  पर  संपर्क संभव है।

साभार-पाखी, दिसम्बर, 2015

बाकी प्रेम कविताएँ: उस्मान खान

By उस्मान खान

लाल धधकते लोहे के टुकड़े

तुम्हारी आंखें,

आंखों के नीचे हड्डी की टेढ़ी-उभरी लकीर। (नज़्र-ए-शमशेर)

Snap shot from'Would You Be Mine'

Snap shot from’Would You Be Mine’

बाकी प्रेम कविताएं

1.

वहां बारिश होती है

पुरानी लकड़ी की पाट भींगती है

उसकी दरारों से दीमक चूने लगते हैं

माथे पर खिड़की के लोहे की ठंडक महसूस करता हूं

भाप जैसे बूंद-बूंद कर टपक रही है दिमाग़ में

मैं आंखें बंद कर लंबी सांस खींचता हूं

जैसे सकल विस्तार को अपनी श्वास-नलिका में घूमता महसूस करता हूं

बिंदु-बिंदु प्रकाश छिटका है

प्रकाश वर्ष दूर एक-एक बिंदु

कोई मासूम नहीं होता

न तू थी, न मैं था

तू भूल भी गई शायद

या याद भी रहा तो क्या मुझे पता नहीं!

पर एक इच्छा है जागी हुई

कि एक दिन उस खिड़की के लोहे पर माथा रख

हम दोनों बारिश देखें!

मैं तुझे जिस उम्र में छोड़ आया था

असल में, वहीं से तुझे अपने साथ लाया था

जिस दिन बारिश हो रही थी

रसायनों की हल्की गंध के बीच

मैं खड़ा था अकेला अपने में

तुम मुस्कुराई

जैसे, आज कहूं, वसंतसेना!

इसीलिए चाहता था बहुत तुम्हें

कि बक़ौल बेदिल सच सच को ढूंढ़ता है।

जिस दिन बारिश हो रही थी

मैंने एक पल के लिए ब्रह्माण्ड को सुंदर रूप दिया

आत्मसात किया

जैसे एक ठोस वस्तु तरंग बन जाती है

देखते ही देखते विचार बदले कि बस!

एक पल के लिए मैं कितनी दूर बह चला

जैसे ये पल भी उस पल का विस्तार है

जिस दिन बारिश हो रही थी।

2.

मैं बहता जा रहा था

आगे, आगे, बहुत आगे

कि तुमने मुझे श्मशान की याद दिला दी

दोपहर वह मई की

वह झरबेरियों से उलझना

पर तुमने क्यों कहा कि मैं बदल गया हूं,

मुझसे बात भी नहीं की

मिली भी नहीं!

क्या मैं ऐसा बदल गया था

कि हम बात भी नहीं कर सकते थे।

शायद मैंने तुम्हारे मन में बसी

अपनी ही छवि तोड़ दी थी।

3.

तुम ही थी, जिसने मुझसे कहा,

किसी का मज़ाक उड़ाना नहीं अच्छा!

मैंने मन में बसा ली वो तरलता।

कोई कितना इंसान हो सकता!

और कौन सिखाता?

4.

मैं तुम्हें अपनी शक्ल देना चाहता था

तुम मुझे अपनी

समुद्र की लहरों को मैं बाहों में समेट लेना चाहता था

तुम किनारे-किनारे थोड़ी दूर जाना चाहती थी

नाव में ठहरे जल में

हमने देखा अपना बिम्ब

तुम अलग- मैं अलग- बहुत

दूसरी नाव में लेटा मैं

अलग हो गया अचानक

तुमसे – समुद्र से – सबसे

ये सबसे ध्वंसक पल था

मैं बाद में आत्मसात कर पाया

बहुत बाद में बात कर पाया

वह समुद्री खोह का कालापन

मांसल एकदम ठोस

मांस का लोथड़ा

समुद्र में गहरे-गहरे डूबते जाने जैसा

सुबह अचानक रात का नशा उतरा लगे जैसे

तूफ़ान में मिले हम, तूफ़ान में बिछड़े।

5.

उस रात मैं दुःखी था

दुःख से टूटा था

दुःख से भरा हुआ

वंचना का दाह

उपेक्षा की कड़ुआहट

क्रूरता का दर्शन

विश्वासघात का डर जैसे

मैं तुम्हारे सामने इतना बच्चा हो गया

कि खुद डर गया।

6.

जुनूं का एक पल वो अगर जिंदगी बदलता

मैं खींच लाता आज तक वो दोपहर, वो गली

तुम्हारी एड़ियों के ऊपर जो दूज का चांद रखा है

तुम्हारे कंधे के ठोसपन ने जो लरज़ मुझे दी है

लगता है आज भी उस गली में तुम्हारी एड़ियों पर

दूज का चांद रखा हो जैसे

मैंने एक घर चुन लिया था

एक जिंदगी

एक शहर चुन लिया था

एक नदी वहां बहती थी

रेल के पुल के नीचे

जहां हम शाम को घूमने जाया करते थे

मैं खूब मेहनत करता था

तुम खूब खुश होती थीं

तुम खूब मेहनत करती थीं

मैं खूब खुश होता था

वहां गाड़ियां तेज़ चलती थीं

शाम को बाज़ार में खाने-पीने की

तमाम तरह की चीज़ें मिलती थीं

वहीं एक गली में मैदान के पास

मैंने घर ले लिया था

(मुझे और अच्छे से याद नहीं!)

मैं तुम्हारे इतने पास होना चाहता था

कि मेरा दिल फटने लगता था

सांसे तेज़ होने लगती थी

इतने पास के खयाल से ही

मैं इतनी तेज़ दौड़ा

तेज़, और तेज़

मेरी सांस फूलने लगी

सीना फटने लगा

मैं और, और लंबे डग भरने लगा

थंबे, नाले, नदियां, पुल कूदने लगा

मैदान-पहाड़-देश-ग्रह-नक्षत्र

मैं तारों के महासमुद्र में तैरने लगा

तेज़-तेज़-और तेज़- मैं पार करता गया

एक महासमुद्र से दूसरे महासमुद्र से तीसरे महासमुद्र

मैं साइकिल से गिर पड़ा

और मैंने महसूस किया

मेरे सिर पर तुम्हारी हंसी

जुनून बनकर खड़ी है।

7.

वह रहस्य जन्म का जीवन का

रसमयी लालसा, विस्मयी वासना

उष्ण द्रव वसीय वह

मध्यमिका जैसे शरीर से परे किसी ताप में

प्रथम आविष्कार

वह न गंध न रूप न आकार

केवल एक उष्ण तरल एहसास

वाष्प की तरह अब भी जमा जैसे छाती मैं।

8.

मैंने ठुकराया तुम्हारा प्यार

मैंने तुम्हें छीज-छीजकर मरते देखा

मैंने तुम्हारी देह को गलते देखा

मैंने बहुत कामना की

तुम्हें गले लगाने की

पर जब सब कुछ छुट गया

तुम एक दिन विलीन हो गईं

किस वक़्त पता नहीं

मुझे तुम्हारी लाश से क्या मतलब!

मैं तुम्हारा प्यार ठुकरा चुका था

पर एक इच्छा थी

तुम्हें गले लगाता

और हम लोग मगरे तक घूमने चलते एक बार।

9.

दोपहर है

नीम-नील, नीम-सफ़ेद दीवार है

मैं एक पल के लिए उसके इतने नज़दीक़ हूं

कि उसकी सांसें अपनी गर्दन पर महसूस कर सकता हूं

एक उसी पल में

मैं घबरा जाता हूं

अपने-आप से

पीछे हट जाता हूं

अचानक एक आवाज़, दोपहर खींच लेती है।

आगे नहीं…

मैं पीछे हटता जाता हूं!

इसके आगे क्या…

10.

फिर बारिश हुई नदी पर

रात के आखरी-आखरी पहर

सांय-सांय में घुल गई

बूंद-बूंद फिर लहर-लहर

– – –

मैं मिट्टी के इतने पास

तुम्हारे इतने पास

आम की जड़ के इतने पास

जैसे यहीं मिलनी मुझे

युगों से मुझे ढूंढ़ती : तस्क़ीन!

– – –

मैं फिर तुमसे प्यार करना चाहता हूं,

मैं तुम्हारी लासानी मूर्ति बना रहा हूं।

मैं कल इसे तोड़ने का वादा करता हूं,

मैं फिर तुमसे प्यार करना चाहता हूं।

– – –

वहां एक नदी है

गरजती हुई

सफ़ेद

वो एक चट्टान को सदियों से विलीन करने में लगी है

वो चट्टान अब भी है वहां

उस पर हमारे पांव के निशां

वे आत्म-आहुतियां

घुलती जाती हैं एक समग्र इतिहास में

एक पल में

दरवाज़े बनते

रंगाई होती है

सदियों की रुकी चर्चाएं जैसे चल पड़ती हैं

हवा चलने लगती है

प्लास्टिक की बोतल

एक झटके में

जमीन से सौ फुट ऊपर घूमने लगती है

जमने लगती है

फिर धीरे-धीरे ज़मीन पर धूल

बगुले छिप जाते हैं ईमली की कोटरों में

हरी घास के साथ भींगते हैं झींगुर

मैं दूर तक देख सकता हूं अनाकुल मन से

बारिश और सिर्फ बारिश

भींगना और सिर्फ भींगना

मक़बरों की टूटी हुई ईंटें

परित्यक्त मीलों में मशीनें

ट्रकों के टायर – भींगते हैं

भींगती हैं झरबेरियां और मेंहदी

भींगते हैं अंजीर और बबूल

भींगते हैं मैं और तुम

और अपराजिता के फूल!

usman khan

उस्मान ख़ान समकालीन हिंदी कविता के अलहदा और युवा कवि हैं. चर्चाओं और पुरस्कारों की भीड़ से अलहदा… छपाऊ मानसिकता से भी अलहदा... जे.एन.यू. के हिंदी विभाग से मालवा के लोकसाहित्य पर पीएचडी. इनसे usmanjnu@gmail.com पर संपर्क कर सकते हैं.

विश्व हिन्दी सम्मेलन और साइकिल की कहानी: कृष्ण कल्पित

By कृष्ण कल्पित

 विश्व हिन्दी सम्मेलन

जिस भाषा में हम बिलखते हैं
और बहाते हैं आंसू
वे उस पर करते हैं सवारी
भरते हैं उड़ान उत्तुंग आसमानों में

एक कहता है मैं नहीं गया
मुझे गिना जाए त्यागियों में
एक कहता है मैं चला गया
मुझे गिना जाए भागियों में

एक आसमान से गिरा रहा था सूचियां
हिन्दी पट्टी के सूखे मैदानों पर

हिन्दी के एक नए शेख ने
बना रखा था सरकारी कमेटियों का हरम
एक से निकलकर
दूसरे में जाता हुआ

एक मूल में नष्ट हो रहा था
दूसरा ब्याज में और तीसरा लिहाज़ में

एक चिल्लाता था
मैं जीवन भर होता रहा अपमानित
अब मुझे भी किया जाए सम्मानित

एक कहता था
मुझे दे दिया जाए सारा पैसा
मैं उसका डॉलर में अनुवाद करूंगा
एक कहता था नहीं
सिर्फ मैं ही बजा सकता हूं
यह असाध्य वीणा

एक साम्राज्यवादी
एक सम्प्रदायवादी के गले में
फूल-मालाएं डाल रहा था
एक स्त्री किसी निर्दोष के रक्त से
करती थी विज्ञप्तियों पर हस्ताक्षर

यह एक अजीब शामिल बाजा था
जिसमें एक बाजारू गायक
अश्लील भजन गा रहा था

एक सम्पादक
विदेश राज्य मन्त्री के जूते में
निर्जनता ढूंढ रहा था
एक पत्रकार का
शास्त्री भवन की एक दराज़ में
स्थाई निवास था

एक कहता था मैं इतालवी में मरूंगा
एक स्पेनिश में अप्रासंगिक होना चाहता था
एक किसी लुप्त प्राय भाषा के पीछे
छिपता फिरता था

एक रूठ गया था
एक को मनाया जा रहा था
एक आचार्य जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय
में कराह रहा था
एक मसखरा
मुक्तिबोध पर व्याख्यान दे रहा था

 एक मृतक

ब्रिटिश एअरवेज़ के पंखों से लिपटा हुआ था

दूसरा मृतक
भविष्य में होने वाली
सभी गोष्ठियों की अध्यक्षता कर चुका था
एक आत्मा
आगामी बरसों के
सभी प्रतिनिधि मण्डलों में घुसी हुई थी

यह भूमण्डलीकरण का अजब नज़ारा था कि
सोहो के एक भड़कीले वेश्यालय में
हिन्दी का लंगोट लटक रहा था

और दूर पूरब में
और धुर रेगिस्तान के किसी गांव में
जन्म लेता हुआ बच्चा
जिस भाषा में तुतलाता था
उसे हिन्दी कहा जाता था

कहां खो गया प्रतिरोध !
क्या भविष्य में सिर्फ़
भिखारियों के काम आएगी
यह महान भाषा !

इसी भाषा में एक कवि
दो टूक कलेजे के करता पछताता
लिखता जाता था कविता
और फाड़ता जाता था।

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Bicycle-thieves's Poster

Bicycle-thieves’s Poster

साइकिल की कहानी

यह मनुष्य से भी अधिक मानवीय है
चलती हुई कोई उम्मीद
ठहरी हुई एक संभावना
उड़ती हुई पतंग की अंगुलियों की ठुमक
और पांवों में चपलता का अलिखित आख्यान
इसे इसकी छाया से भी पहचाना जा सकता है

मूषक पर गणेश
बैल पर शिवजी
सिंह पर दुर्गा
मयूर पर कार्तिक
हाथी पर इन्द्र
हंस पर सरस्वती
उल्लू पर लक्ष्मी
भैंसे पर यमराज
बी. एम. डब्ल्यू पर महाजन
विमान पर राष्ट्राध्यक्ष
गधे पर मुल्ला नसरूद्दीन
रेलगाड़ी पर भीड़
लेकिन साइकिल पर हर बार कोई मनुष्य

कोई हारा-थका मजदूर
स्कूल जाता बच्चा
या फिर पटना की सड़कों पर
जनकवि लालधुआं की पत्नी
कैरियर पर सिलाई मशीन बांधे हुए
साइकिल अकेली सवारी है दुनिया में
जो किसी देवता की नहीं है

साइकिल का कोई शोकगीत नहीं हो सकता
वह जीवन की तरफ दौड़ती हुई अकेली
मशीन है मनुष्य और मशीन की यह सबसे प्राचीन
दोस्ती है जिसे कविता में लिखा पंजाबी कवि
अमरजीत चंदन ने और सिनेमा में दिखाया
वित्तोरिया देसीका ने ’बाइसिकल थीफ’ में

गरीबी यातना और अपमान की जिन
अंधेरी और तंग गलियों में
मनुष्यता रहती है
वहां तक सिर्फ साइकिल जा सकती है
घटना-स्थल पर पायी गयी सिर्फ इस बात से
हम इस निष्कर्ष पर नहीं पहुँच सकते कि
साइकिल का इस्तेमाल मनुष्यता के विरोध में
किया गया जब लाशें उठा ली गयी थीं
और बारूद का धुआं छट गया था तब

साइकिल के दो चमकते हुए चक्के सड़क के
बीचों-बीच पड़े हुए थे घंटी बहुत दूर
जा गिरी थी और वह टिफिन कैरियर जिसमें
रोटी की जगह बम रखा हुआ था कहीं
खलाओं में खो गया था।

एक साइकिल की कहानी
अंततः एक मनुष्य की कहानी है !

कृष्ण कल्पित

कृष्ण कल्पित

अपने तरह का अकेला-बेबाक और विवादित कवि । कृष्ण कल्पित का जन्म 30 अक्टूबर, 1957 को रेगिस्तान के एक कस्बे फतेहपुर शेखावटी में हुआ। अब तक कविता की तीन किताबें और मीडिया पर समीक्षा की एक किताब छप चुकी है। एक शराबी की सूक्तियां  के लिए खासे चर्चित। ऋत्विक घटक के जीवन पर एक पेड की कहानी नाम से एक वृत्तचित्र भी बना चुके हैं।  अभी  हाल ही में बाग़-ए-बेदिल नाम से  एक विलक्षण  और विशाल  काव्य-संकलन  प्रकाशित । आवारगी का काव्यशास्त्र  इसी संकलन  की भूमिका है। 

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