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भीष्म साहनी की कहानी-(अ)कला: संजीव कुमार

हिंदी कहानी के आन्दोलन ने जहाँ एक और पुरानी जड़ता को तोड़कर नयी ज़मीन तैयार की, वहीँ उसमें कभी मूर्खतापूर्ण और कभी षड्यंत्रपूर्ण चयनवाद भी उभरा. हिंदी के कई महत्वपूर्ण कहानी लेखक इस चयनवाद के शिकार हुए. ऐसे आन्दोलनों के शिकार भीष्म साहनी  भी हुए. यह चयनवादी आलोचना उनकी भी थी जो अपने को प्रगतिशील और जनवादी सिद्ध करने के लिए कुछ भी कर रहे थे.  इस चयनवाद के शिकार भीष्म साहनी जी अकेले नहीं हुए. कई दूसरे महत्वपूर्ण हिंदी कथा लेखक और कवि या तो पीढ़ियों के अंतराल के नाम पर आधुनिक न रहे या फिर उनके सामाजिक संघर्ष को क्रांतिकारी  तत्त्वों में शामिल न किया गया. यह अवश्य ही दुर्भाग्यपूर्ण परिस्थिति थी जिसके विरुद्ध आज भी संघर्ष करने की आवश्यकता बनी हुयी है. खासकर तब; जबकि क्रांतिकारिता की व्याख्या सामाजिक परिवर्तन के दूसरे छोर पर जा रही है…. फिट्गेराल्ड ने कभी कहा था, ‘मैं अपने समकालीनों के साथ नहीं होना चाहता, क्योंकि मेरी नियति भविष्य के कूड़ेदान में नहीं होगी.’ भीष्म साहनी अपने समय के साथ हो सकते हैं, अपने समकालीन लेखकों के साथ नहीं…. ऐसा नहीं है कि भीष्म साहनी जी अपनी कहानियों के कलात्मक रूपगठन के प्रति असचेष्ट हों. वे इस दिशा में यशपाल की उस शैली का थोड़ा अभ्यास किया मालूम पड़ते हैं जो प्रतिमुखता का एक नाटकीय चरम बिंदु पूरे घटनाक्रम के भीतर से खड़ा कर लेती है और हमें अभिभूत करती है… आधुनिकतावादी लेखकों ने कथानक को प्रायः व्यर्थ बना दिया है. हिंदी में प्रेमचंद-यशपाल से लेकर भीष्म साहनी और अमरकांत-रेणु ने उनकी पुनः प्रतिष्ठा के लिए संघर्ष किया है. भीष्म जी की तमाम कहानियों की रूप-रचना में एक कथानक होता है, एक भरी-पूरी कहानी होती है, जिसमें अकेला चरित्र अपनी भीतरी परिस्थितियों में कम होता है. एक पूरा व्यापाररत समुदाय उनके साथ दिखता है. ..कहानीपन की रक्षा का संघर्ष कहानी की रचनात्मक पहचान के लिए आवश्यक हो गया है. आज की अधिकांश कहानियों में हलचल तो बहुत होती है, पर अंतर्वस्तु में एक रिक्तता-सी लगती है.  # सुरेन्द्र चौधरी (‘हिंदी कहानी : रचना  और परिस्थिति ‘ में संकलित  ‘भीष्म  साहनी : नए  राष्ट्रीय बोध के अन्वेषक ‘ लेख से )  

फोटो- त्रिभुवन तिवारी, आउटलुक से साभार

फोटो- त्रिभुवन तिवारी, आउटलुक से साभार

   

By संजीव कुमार

यह थोड़ा अजीब तो है, पर क्या करें, कि कहानीकार भीष्म साहनी के बारे में सोचते हुए बरबस ‘मोहन जोशी हाजि़र हों’ और ‘तमस’ वाले अभिनेता भीष्म साहनी याद आ जाते हैं। दोनों जगह उनका किरदार ऐसा था जिसमें आविष्ट नाटकीयता वाले क्षणों की पर्याप्त गुंजाइश थी, पर भीष्म जी के अभिनय ने उन क्षणों को असाधारण तरीक़े से उभारने में कोई दिलचस्पी नहीं दिखायी। उसे किसी चिह्नित की जाने योग्य नाटकीयता के हवालेे नहीं किया। बस, जीवन के सहज प्रवाह का थोड़ा असहज हो जाना ही चिह्नित हो पाया। लगा, हम सामान्य दिनचर्या में आए हुए कुछ व्यतिक्रमों से रू-ब-रू हैं, उन व्यतिक्रमों के प्रति अतिरिक्त रूप से संवेदनशील बनानेवाली अभिनय-कला से नहीं। मानो हम बिना किसी नाटकीयता के प्रत्यक्ष जीवन की सादगी का साक्षात्कार कर रहे हों, उस जीवन की कलात्मक पुनर्रचना का नहीं।

कहानीकार भीष्म साहनी भी ऐसे ही हैं। उनकी कहानियां कथा-स्थितियों और पाठक के बीच किसी कहानीकार की मध्यस्थता का अहसास नहीं होने देतीं। बेहद सीधे-सादे तरीक़े से वे कहानी कहते चले जाते हैं। कहीं कोई चमकता हुआ वाक्य नहीं, कोई ऐसी साहित्यिक हिकमत नहीं जिसे देखकर आप ‘वाह’ कह उठें, कहीं किसी प्रसंग को थम-ठहर कर अलग से उभारने का जतन नहीं। आचार्य रामचंद्र शुक्ल होते तो शायद कहते कि इन्हें जीवन के मार्मिक स्थलों की पहचान नहीं है, इसलिए उन जगहों पर ठहर कर धैर्य से रमते नहीं हैं। पर मार्मिक स्थलों की पहचान का यह सूत्र तुलसीदास पर, या पुरानी/प्रचलित कथा को उपजीव्य बनानेवाले किसी भी रचनाकार पर तो लागू हो सकता है, भीष्म जी पर लागू नहीं हो सकता। तुलसी के पास कथा पहले से थी, विमर्श और वक्रता ही अपनी थी। उन्हेें एक पूर्वप्रचलित कथा में धैर्यपूर्ण ट्रीटमेंट की मांग करनेवाले मार्मिक स्थलों की पहचान करनी थी। भीष्म जी के पास कथा – यानी घटनाओं का कंकाल – और विमर्श, दोनों अपना है। उन्हें किसी पहले की कथा में ख़ास अपनी वक्रता पैदा नहीं करनी है। उनका कौशल उपजीव्य कथा की घटना-शृंखला में मार्मिक स्थलों की पहचान कर उसका सधे हाथों से ट्रीटमेंट करने में नहीं, स्वयं ऐसे स्थलों की कल्पना-उद्भावना करने में निहित है – ऐसी कथा-स्थितियों की उद्भावना जहां पात्र और परिस्थितियों के घात-प्रतिघात से जीवन का कोई मार्मिक पक्ष, कोई दबा हुआ आशय, कोई पहचाना किंतु अनपहचाना-सा सत्य बेसाख़्ता उभर आये।… और इस काम में भीष्म साहनी माहिर हैं। शायद इसी महारत केे चलते उनमें सीधेे-सादे ढंग से कहानी कह जानेे का दुर्लभ-सा आत्मविष्वास है।

भीष्म जी की इस विशेषता को नामवर सिंह ने अचूक ढंग सेे पहचाना था। ‘कहानी नयी कहानी’ में कहानी की संरचना को लेकर जगह-जगह अनेक सूत्र देते हुए जिस सूत्र के उदाहरण के रूप में उन्होंने भीष्म साहनी का उल्लेख किया है, उसे याद कीजिए। सजीव बिंब, सांकेतिकता, ‘आधारभूत विचार का द्रवीभूत होकर संपूर्ण कहानी के शरीर में भर उठना’, वातावरण-निर्माण, टेक्स्चर – इन सबकी चर्चा करते हुए भीष्म साहनी की कहानियां उदाहरण नहीं बनी हैं। वे उदाहरण बनी हैं इस सूत्र का: ‘‘कहानी जीवन के टुकड़े में निहित ‘अंतर्विरोध’, ‘द्वंद्व’, ‘संक्रांति’ अथवा ‘क्राइसिस’ को पकड़ने की कोशिश करती है और ठीक ढंग से पकड़ में आ जाने पर यह खंडगत अंतर्विरोध ही वृहद् अंतर्विरोध के किसी-न-किसी पहलू का आभास दे जाता है।… यह एक विरोधाभास है कि कहानी जैसा एकान्वित शिल्प अंतर्विरोध पर निर्भर होता है। नये कहानीकारों में भीष्म साहनी में एक ही साथ इन दोनों विशेषताओं का सर्वोत्तम सामंजस्य मिलता है। इस दृष्टि से भीष्म साहनी सबसे सफल कहानीकार हैं।’’ इसके बाद वे ‘चीफ़ की दावत’ का सधा हुआ विश्लेषण करते हैं और बताते हैं कि किस तरह कहानी की मां केवल एक चरित्र नहीं रह जाती, संपूर्ण प्राचीन का प्रतीक बन जाती है। और किस प्रकार ‘एक समर्थ कहानीकार जीवन की छोटी-से-छोटी घटना में अर्थ के स्तर-स्तर उद्घाटित करता हुआ उसकी व्याप्ति को मानवीय सत्य की सीमा तक पहुंचा देता है।’

यह अकारण नहीं है कि जीवन के टुकड़े में निहित अंतर्विरोध, द्वंद्व, क्राइसिस आदि को पकड़ने के उदाहरण के रूप में ही भीष्म जी याद आये, सजीव बिंब या वातावरण-निर्माण या ‘संगीत का-सा प्रभाव उत्पन्न करने’ का सामथ्र्य आदि के उदाहरण के रूप में नहीं। प्रतीक की बात ज़रूर की गई है (‘संपूर्ण प्राचीन का प्रतीक’), पर यह सायास नियोजित प्रतीक के अर्थ में नहीं है, जैसा राजेंद्र यादव या मोहन राकेश के यहां मिलता है। मोहन राकेश की ‘एक और जि़ंदगी’ में कोर्टरूम के भीतर पंखे से कटकर नीचे गिरे पक्षी का प्रतीक एक सजग सहित्यिक युक्ति है जो तलाक लेते पति-पत्नी के बच्चे की लहूलुहान आत्मा का प्रतीकार्थ व्यक्त करने के लिए प्रयुक्त हुई है। ‘चीफ़ की दावत’ की मां को ऐसी साहित्यिक युक्ति केे अर्थ में प्रतीक नहीं कहा गया है। इसीलिए मां प्रतीक ‘है’ नहीं, प्रतीक ‘बन जाती है’। प्रतीक ‘बन जाना’, दरअसल, पठन के स्तर पर उपलब्ध की गई व्यंजना या ध्वनि है, जो इसीलिए संभव हुई है कि कहानीकार ने एक अंतर्विरोध से जुड़ी विडंबना को सफ़ाई से पकड़नेवाली कथा-स्थिति निर्मित की है। कोई आष्चर्य नहीं कि मां के प्रतीक बन जाने की बात कहते हुए नामवर सिंह को काव्यशास्त्र में वर्णित व्यंजना की याद आई: ‘‘काव्यशास्त्र के आचार्यों ने मुख्यार्थ के भीतर से जो अर्थ की व्यंजना कराई है, वह भी इसी का रूप है। जीवन का सत्य इसी तरह खंड के भीतर से, किंतु उसे खंडित करता हुआ पूर्ण की ओर संकेेत करता है; खंड की सीमा को तोड़कर पूर्ण में मिलता है, मुख्यार्थ को बाधित करके रसमय अर्थ को व्यंजित करता है…।’’

मुख्यार्थ से आगे जाकर व्यंजित होनेवाला अर्थ (मुख्यार्थ कोे बाधित करके नहीं, मुख्यार्थ-बाध लक्षणा का लक्षण है; इस बात पर नामवर जी के नंबर कट सकते हैं), खंड की सीमा को तोड़कर पूर्ण में मिलता जीवन-सत्य – भीष्म जी की कहानियों की यह विशेषता उन्हें सीधा-सादा नहीं रहने देती, अंदाज़े-बयां में वे जितनी भी सीधी-सादी लगें। इसीलिए कहा है, दिल को देखो, चेहरा न देखो…। वस्तुतः अंदाज़े-बयां की सादगी और कहानी विधा की अपनी आकारिक सीमाओं के साथ भीष्म जी जितनी बड़ी वास्तविकताओं की ओर संकेत कर पाते हैं, वही उनके महत्व का आधार है। उनकी यादगार कहानियां – ‘चीफ़ की दावत’, ‘वाड्.चू’, ‘ओ हरामज़ादेे’, ‘अमृतसर आ गया है’, ‘अहम् ब्रह्मास्मि’ आदि – इसीलिए यादगार हैं। ‘वाड्.चू’ का उदाहरण लें। किसी भावुक कर देनेवाले संस्मरण की तरह प्रतीत होती यह कहानी आपको अचूक ढंग से यह अहसास कराती है कि व्यक्तिगत स्तर पर अपने दौर से विदाई ले लेना किसी के लिए संभव नहीं। आपका दौर आपका पीछा नहीं छोड़ता। वाड्.चू पुरानी पोथियों में ही घुसा रहता है, महाप्राण बुद्ध के प्रति एक भावुक लगाव में सिमटा। उसे न नेहरू से मतलब है, न चाउ एन लाई से। उसके अंदर मातृभूमि को लेकर कोई नाॅस्टैल्जिक भाव नहीं है, भले ही कहानी के प्रथम पुरुष वाचक को यह लगता रहा हो कि एक बार अपनी ज़मीन पर लौटने के बाद दुबारा भारत आना उसके लिए भावनात्मक कारणों से संभव नहीं होगा। वाड्.चू के साथ ऐसा कुछ नहीं होता। वह चीन जाता है और दुबारा अतीत की उन्हीं पोथियों में शरण पाने के लिए भारत लौट आता है। लेकिन दोनों जगह वह राज्यतंत्र की निगाह में संदिग्ध है। कोई यह मानने को तैयार नहीं कि वह किसी राज्यतंत्र के लिए हानिरहित एक अतीतजीवी प्राणी है। उसका दौर उसका पीछा करता रहता है और जब पीछा करना छोड़ता है, तब तक वाड्.चू का सर्वस्व लुट चुका होता है। अपने आसपास जितना अतीत उसने इकट्ठा कर रखा था, पांडुलिपियों और नोट्स की शक्ल में, जो उसकी दृष्टि में अत्यंत मूल्यवान था, छिन्न-भिन्न हो जाता है। वाड्.चू का जीवन सारहीन, बेमानी-सा हो जाता है और कुछ समय बाद उसकी मृत्यु हो जाती है। मानो एक ख़ास तरह के पर्यावरण में ही जी पानेवाले प्राणी से उसका पर्यावरण छीन लिया गया हो।

क्या वाड्.चू की त्रासदी को एक व्यक्ति की बदकि़स्मती के रूप में पढ़ा जा सकता है? निस्संदेह, पढ़ा तो जा ही सकता है, पर यह भी निष्चित है कि एक चरित्र और उसके साथ परिस्थितियों के इस घात-प्रतिघात की योजना भीष्म जी ने इतने संकरे पठन के लिए नहीं की है। अनैतिहासिक और समय-निरपेक्ष होकर जिया नहीं जा सकता, यह कठोर सचाई वाड्.चू की त्रासदी में व्यंजित होती है और यह व्यंजना व्यक्तियों से आगे वर्गों, समुदायों और राष्ट्रों पर भी लागू होती है। ‘खंड की सीमा को तोड़कर पूर्ण में मिलता जीवन-सत्य’ यही है जिसको साधने में यह सीधी-सादी कहानी कामयाब है। और इसे साधने के लिए भीष्म जी किसी ऐसी हिकमत का प्रयोग नहीं करते जिसे मैं थोड़े मज़ाकिया लहज़े में ‘सफऱ्ेस टेंशन’ कहना पसंद करता हूं। वे कोई ऐसा वाक्य नहीं लिखते जो आपको अर्थ की किसी विशेष दिशा की ओर ढुलकाने का ज़रिया बन जाए। बावजूद इसके अभिधा से आगे व्यंग्यार्थ की ओर आपकी यात्रा अनिवार्य हो जाती है, क्योंकि कहानी अपने वाक्यों से नहीं, वाक़यों से वह ध्वनि पैदा करने में समर्थ है।

इस रूप में गहरी अर्थ-व्यंजनाओं से भरी कथा-स्थितियों की कल्पना करना ही कहानीकार के तौर पर भीष्म साहनी का स्व-भाव है। शैली-शिल्प में नयापन या अतिरिक्त आकर्षण पैदा करना उनका स्व-भाव नहीं है, इसीलिए जहां वे इसकी कोशिश करते भी हैं, वहां उन्हें कोई सफलता नहीं मिलती। ‘वाड्.चू’ में ही देखें तो पहले वाक्य के साथ भीष्म जी ने एक चैंकाऊ कि़स्म की शुरुआत करने की कोशिश की है: ‘तभी वाड्.चू आता दिखाई पड़ा।’ लेकिन यह ‘तभी’ बिल्कुल जमता नहीं, क्योंकि वह अपना औचित्य सिद्ध नहीं कर पाता। शैली का चैंकाऊपन कतई प्रति-उत्पादक हो जाता है। इसी तरह ‘चीलें’ कहानी में वे चील का जो प्रतीक खड़ा करने की कोशिश करते हैं, वह ख़ासा निष्प्रभावी है। दरअसल, कहानियां उनके भीतर इस तरह के वातावरणधर्मी प्रयोगों के रूप में जन्म नहीं लेती हैं। नयी कहानी में स्त्री-पुरुष-संबंधों वाले कथ्य और प्रतीकात्मक-सांकेतिक शैली-शिल्प-विधान को जो महत्व मिला था, उसने शायद धक्का देकर भीष्म जी को ऐसी कहानी लिखने के लिए प्रेरित किया। वे अपनी प्रकृति से मूड/मनःस्थिति को आधार बनानेवाले कहानीकार हैं नहीं, जैसे कि वे ‘चीलें’ में दिखना चाहते हैं।

पर इसका यह भी मतलब नहीं कि मनोविज्ञान पर उनकी पकड़ मूड/मनःस्थिति को आधार बनानेवालों के मुक़ाबले कहीं भी कमतर है। यह कहते हुए मुझे ‘चीफ़ की दावत’ समेत भीष्म जी की कितनी ही कहानियां याद आ रही हैं, पर जि़क्र सिर्फ़ ‘अहम् ब्रह्मास्मि’ का करूंगा जिसका पाठ अभी मेरी मेज़ पर नहीं है और जिसे पढ़े हुए भी लगभग तीस साल गुज़र चुके हैं। उसका मुख्य पात्र अंग्रेज़ीयत से बहुत प्रभावित है। उसे अंग्रेज़ों की सभी चीज़ें बड़ी अच्छी लगती हैं। एक बार वह कहानी के ‘मैं’ से कहता है कि देखो, अहम् ब्रह्मास्मि का जो अंग्रेज़ी अनुवाद है, वह कितना सुंदर है, ‘आई ऐम द डिवाइन फ़्लेम’। और ऐसा कहते हुए उसके चेहरे पर एक अजीब तरह का दिव्य भाव उभर आता है। फिर कहानी में एक प्रसंग आता है जिसमें एक सिनेमा हाॅल के यूरिनर से अंग्रेज़ उसे धक्के मारकर हटा देते हैं, क्योंकि वह – एक काला देसी आदमी – उन्हें इंतज़ार करवा रहा है। इस घटना के बाद जब कहानी का प्रथम पुरुष वाचक उसके घर पहुंचता है तो कमरे में न पाकर उसे ढूंढ़ता हुआ छत पर जाता है। वहां देखता है कि वह आंखें मूंदे हुए ध्यानस्थ बैठा है और बुदबुदा रहा है, ‘आई ऐम द डिवाइन फ़्लेम… आई ऐम द डिवाइन फ़्लेम’। वाचक को लगता है कि वह मंत्र बुदबुदाता हुआ सतह से दो इंच ऊपर उठ गया है।

यह कथा-सार मैं तीस साल पहले, अपनी किशोेरावस्था मेें पढ़े हुए पाठ केे आधार पर बता रहा हूं। मुमकिन है, इसमें मेरा कुछ अपना भी जुड़ गया हो। पर कहानी की मुख्य विडंबना निभ्र्रांत है। और कहने की ज़रूरत नहीं कि वह हीनता-ग्रंथि की गहरी मनोवैज्ञानिक पकड़ पर टिकी है। मनोवैज्ञानिक पकड़ के इसी अर्थ में ‘अमृतसर आ गया है’ या ‘ओ हरामज़ादे’ भी मुख्यतः मनोविज्ञान की कहानियां हैं, भले ही कहानीकार घटनाओं की जगह मनःस्थितियों के रचाव में दिलचस्पी लेता न दिखाई दे।

कुल मिलाकर, भीष्म साहनी की अनेक कहानियां कहानी विधा की शक्ति का उदाहरण हैं। जिन लोगों को यह लगता था कि इस छोटे आकार की विधा में बड़ी बात को समेटने का माद्दा ही नहीं है, उन्हें खरा उत्तर देनेवाली कहानियों में भीष्म जी की कई कहानियां शामिल हैं। सबसे बड़ी बात कि यह माद्दा कथा-कथन की सादगी और भरपूर पठनीयता को बनाये रखते हुए हासिल किया गया है। कहानीकार बनने के इच्छुक किसी नये लेखक को अगर यह आत्मविश्वास अर्जित करना हो कि वह भी कहानियां लिख सकता/सकती है तो उसे भीष्म जी की कहानियां अवश्य पढ़नी चाहिए।

संजीव कुमार

संजीव कुमार

संजीव कुमार। युवा आलोचक और कहानीकार। ‘जैनेन्द्र और अज्ञेयः सृजन का सैद्धांतिक नेपथ्य’ पुस्तक के लिए देवीशंकर अवस्थी सम्मान। दिल्ली विश्विद्यालय के देशबंधु कॉलेज में  प्राध्यापक। इनसे sanjusanjeev67@gmail.com पर संपर्क सम्भव है।

सहमत (सफ़दर हाशमी मेमोरियल ट्रस्ट) द्वारा प्रकाशित भीष्म साहनी पर केंद्रित पुस्तिका से साभार

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सुरेन्द्र चौधरी- विराट ऐतिहासिक संदर्भों से समृद्ध आलोचक: मार्तंड प्रगल्भ

सच्ची आलोचना किस कदर गंभीर वैचारिक संघर्ष का परिणाम होती है इसे सुरेन्द्र चौधरी के लेखन में स्पष्ट ही देखा जा सकता है। रचना के प्रति  जिस संवेदनशीलता की जरूरत होती है और असहमति के क्षणों में भी आलोचना की भाषा में  जो विनम्रता होनी चाहिए इसे भी इनके यहाँ देखा जा सकता है। सुरेन्द्र चौधरी पर बहस एक ऐतिहासिक ज़रुरत है। ज़रुरत है हिंदी की प्रगतिशील आलोचना की एक दूसरी परम्परा से संवाद की। बौद्धिक समाज क्या इसके लिए तैयार है? विचारहीनता और तात्कालिकता के दबाव के बीच हिंदी आलोचना की समृद्ध प्रगतिशील परंपरा क्या सुरेन्द्र चौधरी से संवाद नहीं करेगी? ऐतिह्यता का प्रश्न सुरेन्द्र चौधरी के लेखन का मूल प्रश्न है। इसलिए समकालीनता और तात्कालिकता से उनकी मुठभेड़ ही उनकी आलोचना बनाती चलती है। यह अकारण नहीं कि इतिहास के प्रश्नों से उलझने वाला यह आलोचक साहित्य के आख्यान रूपों पर अपनी विशेष दृष्टि रखता है। पर कविता के संबंद्ध में उनका छिटपुट लेखन किसी भी बड़े काव्य आलोचक के लिए इर्ष्या का कारण बन सकते है।  बहरहाल। 

BY मार्तंड प्रगल्भ 

सबसे पहले डॉ॰ चौधरी की पुस्तक ‘इतिहास: संयोग और सार्थकता’ से उनके कुछ निष्कर्षों-स्थापनाओं को उद्धृत करना चाहता हूँ-

  •  ‘‘स्पष्ट है कि हिंदी साहित्य में आधुनिकता दो महायुद्धों के बीच उत्पन्न अवस्था नहीं है और न वह मात्र ‘मूल्यबोध और विराट विघटन’ के तनाव के बीच की उपलब्धि है। हिंदी में आधुनिकता की प्रतिष्ठा इस ‘विराट विघटन’ के नारे से लगभग 80-90 वर्ष पूर्व हो चुकी थी। हिंदी में आधुनिकता बोध का संस्कार आत्मचेता से अधिक वस्तुसत्य चेता है।’’ (पृ.219 खंड1) (ध्यान दें कि आधुनिकतावाद शब्द का इस्तेमाल न करते हुए भी, आधुनिकता, आधुनिकताबोध के अपने आशयों को यहां मिलाकर प्रयोग किया गया है। परंतु महायुद्धों की चर्चा से स्पष्ट है कि आधुनिकतावाद शब्द के अपने अर्थों में ही इसे पढ़ना चाहिए। इन शब्दों के अपने अर्थ पश्चिमी हैं परंतु डॉ॰ चौधरी भारतीय परिस्थितियों में इसे समझने की कोशिश कर रहे हैं।)
  •  ‘‘भारतीय परिस्थितियों में ‘उदारतावादी चेतना’ चूंकि रोमैंटिक दृष्टिविस्तार का परिणाम थी और बौद्धिक उद्बोध की परिणति थी इसलिए आधुनिक इतिहास में वह अपने ढंग की अकेली है। …भारत में आधुनिकता पश्चिमी राज्यसत्ता की क्रांतिकारी भूमिका से नहीं आई और न वह भारत में उनकी शैक्षणिक नीति से आई। वह भारतीय बुद्धिजीवी के उद्बोध से उत्पन्न हुई। …वस्तुतः भारत में आधुनिकता का उत्थापन अंग्रेजों की प्रत्यवस्थान शक्ति से भारतीय पूंजी के प्रतिरोध से होता है। इस अर्थ में भारतीय पूंजीपति की राष्टीय भूमिका अपने उत्थापन युग में क्रांतिकारी जनहितपरक, और राष्टीय स्वार्थ से अनिवार्यतः प्रेरित रही है। भारतेंदु युग का संपूर्ण साहित्य अपने जन चारित्र्य के व्याख्यान के द्वारा यह स्पष्ट करता है कि इस युग में भारतीय बुद्धिजीवी का स्वार्थ अविकल रूप से भारतीय जनता से जुड़ा हुआ था। इस काल का वर्गसंघर्ष चरित्रतः उपनिवेशविरोधी और आभिजात्यविरोधी है। यही कारण है कि संपूर्ण युग की विचार पद्धति में उपनिवेशविरोध और आभिजात्यविरोध की चिंतासरणि प्रधान है।’’ (पृ.219-20-21,खंड1)
  • ‘‘ऐसा लगता है कि ‘भाग्यवती’ के लेखक ने अकेले भाग्यवती से सारी भूमिकाएं संपन्न करवाने का व्रत ले लिया है, फिर भी इतना तो निश्चित है कि हिंदी उपन्यास साहित्य में भाग्यवती आधुनिक युग की यूलिसिस है।’’ (पृ.222, खंड1) (यूलिसिस और जेम्स ज्वाएस की अपनी पश्चिमी उपस्थिति और आयरलैंड की औपनिवेशित दासता जिस ढंग से अंतर्विरोधी साम्राज्यवादी चरित्र का क्रिटिक है, उसे भारतीय संदर्भों में भाग्यवती से तुलना करना एक प्रमुख वैचारिक प्रस्थान है। ‘माडर्निस्ट’ पेपर में संकलित फ्रेडरिक जेमसन के लेखों में इस आधुनिकतावाद के सहारे साम्राज्यवाद के चरित्र को समझने का प्रयास किया गया है।)
  • ‘‘उदारता की चेतना, मेरी छोटी धारणा के अनुसार, एक विशेष वर्ग की जीवन परिस्थितियों की द्वंद्वात्मकता की मांग है। यह वर्ग अपने प्रारंभिक उत्थापन के युग में निश्चित रूप से क्रियाशील, अथवा प्रगतिशील रहता है। भारतेंदु युग अपनी उदारचेता जीवन-विधा के कारण और विचार सरणि के कारण क्रियाशीलता और प्रगति का युग है। इस युग की सबसे बड़ी विशेषता इसका ‘आधुनिकता बोध’ नहीं है, बल्कि आधुनिकता की मांग को क्रियात्मक पूर्णता देने की तत्परता है। यह युग, जहां एक अभावात्मक परिस्थिति का निषेध करता है (निगेशन ऑफ निगेशन) वहीं इसका अंतर्विरोध सार्थक हो जाता है।’’ (पृ.223,खंड1)
  • ‘‘भारतेंदु युग की सारी परिस्थितियां रोमांटिक धारणा के अनुकूल होकर भी रोमैंटिक उद्बोध में असफल रहीं। इसका एकमात्र कारण राजनीतिक सत्ता का अंतर्विरोध था। भारत उस उत्थान विशेष में औपनिवेशिक व्यवस्था के रूप में परिणति ग्रहण कर रहा था, फलतः भारतीय बुद्धिजीवी उस अदम्य असीमित इच्छाशक्ति के बोध को व्यावहारिक परिणति देने में असमर्थ था। राजनीतिक  परतंत्रता ने भारत के प्रथम आत्मोद्बोध को व्यंग्यात्मक परिणति दे दी। किंतु यह राजनीतिक परतंत्रता देश की प्रथम जागृति को बहुत दिनों तक व्यंग्यात्मक दृष्टिकोण के घेरे में बंधे रहने तक विवश नहीं कर सकी। निर्विशेष राष्टीयता बनकर यह जागृति श्रीधर पाठक, राम नरेश त्रिपाठी और मैथिलीशरण गुप्त के साहित्य में उत्थापित हुई। हिंदी में छायावाद इसी निर्विशेष जागृति का परिणाम है। उसकी अवाचकता का यही रहस्य है। (पृ.226, खंड1)
  •  ‘‘कविता के आश्रय पक्ष की जितनी समृद्ध भक्ति काल के पश्चात छायावाद के उत्थान में देखी जा सकती है वह न इन दो कालों के अंतराल में संभव है और न उसके पश्चात ही। व्यक्ति की इच्छाशक्ति जितने विविध धरातलों पर छायावाद युग में बोध (रियलाइजेशन) ढूंढती है, उतनी किसी परवर्ती उत्थान में नहीं।’’ (पृ. 227, खंड1)
  •  ‘‘प्रसाद ने न केवल गुप्त युग की गाथाएं गाईं, बल्कि उस युग की कला, संस्कृति का दैवीकरण किया। उन्होंने भारतीय इतिहास की गति का अतीत की ओर मोड़ना चाहा…। प्रसाद शात्योब्रां की तरह स्वच्छंदतावाद की प्रतिक्रियात्मक सरणि के अनुगामी है। राजनीतिक धारणा के क्षेत्र में साम्राज्य वैभववादी, धर्म के क्षेत्र में सनातनी और दर्शन के क्षेत्र में सांस्कृतिक स्पर्श के साथ प्रसाद स्वच्छंदतावादी हैं।’’ (पृ.228, खंड1)
  •  ‘‘महादेवी इस धारा की सबसे कमजोर कवयित्री हैं क्योंकि उनका उद्बोध न अतीत की भूमि पर संतुलित हो पाता है और न इतिहास की वर्तमान गति का अनुसरण कर पाता है। अतीत से विच्छुरित और वर्तमान में अप्रतिष्ठित कवयित्री की आत्मा संतुलन के लिए मात्र अवाचक का सहारा लेती रह जाती है। उनका दुखवाद इसलिए (मेरी दृष्टि में) उनके व्यक्तिगत कारणों से अधिक दृष्टिकोण की अस्पष्टता का परिणाम है। महादेवी निरर्थक आत्मचेतना का दैवीकरण करती हैं।’’ (पृ.228, खंड1)
  •  ‘‘पंत जी का रोमैंटिक दृष्टिकोण अपनी ही द्विरूपता के कारण उलझ जाता है। ‘गुंजन’ के उपरांत निरंतर वे पश्चिम और पूर्व के बीच अपनी चेतना का समझौता करने को आकुल हैं। भौतिकता और आध्यात्मिकता उनके लिए समस्याएं (इनिग्मा) उलझनें बन जाती हैं। भावसत्ता और वस्तुसत्ता के बीच कृत्रिम विभाजन करने को वे आकुल हैं। ऐसा कृत्रिम विभाजन निराला ने नहीं किया; महादेवी ने भौतिक धरातल का बलात् निषेध-आग्रह रखा, प्रसाद ने ‘कामायनी’ में इस विरोध का संतुलन कल्पित रूप से कर लिया। पंत जी किसी भी कल्पित भूमि पर ऐसा समझौता कर नहीं पाते, अरविंद के सर्वचेतनवाद की शरण में जाकर भी नहीं। (उदाहरणार्थ ‘कला और बूढ़ा चांद’)। वे चेतना के धरातल पर दो बिंदुओं को सरल रेखा से मिलाना चाहते हैं, यथार्थ अंतर्विरोध बन जाता है। फलतः वे प्रसाद की तरह नव्य श्रेण्यता (निओ क्लासिसिज्म) को स्वीकार करने में भी अक्षम रहते हैं और शुद्ध रोमैंटिक उद्बोधों को भी सहेज नहीं पाते। निराला और प्रसाद से वे इसी अर्थ में न्यून सिद्ध होते हैं।’’ (पृ.231, खंड1)
  • ‘‘मेरी दृष्टि में छायावाद के प्रारंभिक उत्थान में नाटकीय संवादी स्वर नहीं है। यह शुरू होती है बच्चन, भगवती चरण वर्मा, दिनकर और नवीन के साथ। इन कवियों में अधिकांश के पास कोई दृष्टि ही नहीं है, उनके पास केवल प्रतिरोधजन्य नाटकीयता है जो कभी दृष्टि बन ही नहीं सकती। उस अर्थ में इनमें जो सहजता है, उसे विशिष्ट मनोभूमि की सहजता मानने का खतरा केवल साही साहब ले सकते हैं। जितना शक्ति प्रवाह बच्चन और वर्माजी की रचनाओं में नहीं है, उतना साही साहब में है जिसके बहाव में वे साहित्य के सहज विकास के सूत्रों को छोड़कर कैलिडोस्कोपिक विविध्ता में खो जाते हैं।’’ (पृ.233, खंड1) (‘लघु मानव के बहाने हिंदी कविता पर एक बहस’ में उल्लिखित छायावादी विजन के टूटने के संदर्भ में पढ़ा जाए।)
  •  ‘‘चाहे प्रगतिवादी आंदोलन ने साहित्य में कोई महान भूमिका न भी पूरी की हो मगर इतना तो मानना पड़ेगा कि उसने क्षयी रोमांस का रचनात्मक धरातल पर विरोध किया और हिंदी नवलेखन को मध्य वर्ग की पतनशीलता की तस्वीर बन जाने से बहुत हद तक बचा लिया। हिंदी नवलेखन अगर ‘गुनाहों के देवता’ की पूजा और ‘अंधा युग’ के विक्षिप्त बोध से बच सका तो इसका कारण मैं यशपाल, अश्क, नागार्जुन, त्रिलोचन और केदारनाथ अग्रवाल के सशक्त रचनात्मक लेखन को मानता हूँ।’’ (पृ.235, खंड1)
  •  ‘‘तृतीय दशक में रोमैंटिक दृष्टि जिस प्रकार अपनी विशिष्ट असंगतियों के कारण पतनशील हो गई थी। उसकी प्रतिक्रिया की जमीन अलग-अलग है, एक ओर अज्ञेय के साथ व्यक्तित्व का उत्थापन और दूसरी ओर मानववाद की परंपरा के विकास की तत्परता। संपूर्ण चतुर्थ दशक और पंचम दशक में व्यक्तिवाद से मानववाद की टकराहट होती रही और उसकी अनुगूंज साहित्य के क्षेत्र में सुनाई पड़ती रही। इस दरम्यान व्यक्तिवाद न बर्गशां से लेकर सार्त्र तक के नकाब बदले, मगर उसका संकट समाप्त नहीं हुआ।’’ (पृ. 236)
  •  ‘‘1950-60 तक नवलेखन ने एक व्यापक आंदोलन का स्वरूप धारण कर लिया लेकिन इससे यह नहीं मान लेना चाहिए कि नवलेखन पर व्यक्तिवाद का प्रभाव शेष ही नहीं रहा था। कवियों का एक समुदाय ऐसा था जो अब भी बदले हुए स्वर में पुराना राग अलाप रहा था। कहानियों में व्यक्तियों की आत्मकेंद्रता के साथ एक समानान्तर स्वर भी उभरता है जिसे प्रकाश में लाने की आवश्यकता है। यह स्वर हमारे स्वातंत्रयोत्तर नवजागरण से जुड़ा हुआ है। (डॉ॰ नामवर सिंह की शब्दावली में)” (पृ.237, खंड1)

    Surendra Choudhary 13 जून 1933- 09 मई 2001

    Surendra Choudhary
    13 जून 1933- 09 मई 2001

क्या आधुनिक हिंदी साहित्य के इतिहास को देखने की एक नयी दृष्टि का उन्मेष इन उद्धरणों से होकर नहीं जाता? बौद्धिक समाज क्या इसके लिए तैयार है? विचारहीनता और तात्कालिकता के दबाव के बीच हिंदी आलोचना की समृद्ध प्रगतिशील परंपरा क्या सुरेन्द्र चौधरी से संवाद नहीं करेगी? ऐतिह्यता का प्रश्न सुरेन्द्र चौधरी के लेखन का मूल प्रश्न है। इसलिए समकालीनता और तात्कालिकता से उनकी मुठभेड़ ही उनकी आलोचना बनाती चलती है। यह अकारण नहीं कि इतिहास के प्रश्नों से उलझने वाला यह आलोचक साहित्य के आख्यान रूपों पर अपनी विशेष दृष्टि रखता है। पर कविता के संबंद्ध में उनका छिटपुट लेखन किसी भी बड़े काव्य आलोचक के लिए इर्ष्या का कारण बन सकते है।  बहरहाल।

 सुरेंद्र चौधरी के लिए भारतीय इतिहास की धारा जातीयता के निर्माण के प्रश्न से तय होती मालूम होती है। जातीय निर्माण की प्रक्रिया संबंधी यह चिंतन हिंदी में राम विलास शर्मा की देन है। जातीय निर्माण की अवधारणा को भाषा से जोड़ते हुए डॉ॰ शर्मा ने एक किताब लिखी थी-‘भाषा और समाज’। इसमें उन्होंने कुछ महत्वपूर्ण मुद्दे उठाए थे। लघु जातियों के निर्माण संबंधी अवधारणा को प्रस्तुत करते हुए शर्मा ने बताया था कि किस प्रकार जनपदों के विकास से भिन्न वस्तुगत आधार लेकर मध्यकाल में जातियों का निर्माण हुआ। यह निर्माण हिंदी की भिन्न बोलियों के विकास के साथ हुआ था और दोनों में कापफी सारे संबंध सूत्र उन्होंने खोजे थे। स्तालिन के महाजाति की निर्माण संबंधी धारणा और उसके भाषा विषयक चिंतन का प्रभाव यहां स्पष्ट रूप से लक्षित किया जा सकता है। इसे आधुनिक काल में तथा उससे पहले व्यापारिक पूंजीवाद के साथ जोड़ते हुए महाजाति और राष्ट्रभाषा की अवधारणा डॉ॰ शर्मा ने रखी थी। इतिहास की यह अवधारणा दोषयुक्त है परंतु उसके अपने ऐतिहासिक आधार भी हैं। और इसका एक सिरा राष्ट्रवादी इतिहास लेखन और मार्क्सवादी इतिहास लेखन के घालमेल में खोजा जा सकता है। बहरहाल, नवजागरण और जातीय निर्माण संबंधी प्रक्रिया के चिंतन का एक स्वरूप और उसका प्रभाव ग्रहण चौधरी के लेखन में स्पष्टतया देखा जा सकता है। इसी संदर्भ में औपनिवेशिक चिंतन को एक चुनौती भी मिलती रही है। डॉ॰ चौधरी ने 1857 के महाविद्रोह के बाद चलनेवाली जातीयताओं के नवगठन को औपनिवेशिक प्रशासकीय नीति के लिए एक खतरा माना था। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में लिखा कि उर्दू को इलाकाई जबान बताकर अलगाने की कोशिशें हुईं, बंगाल विभाजन हुआ, मराठा क्षेत्र को तोड़ा गया और उड़ीसा के साथ विभाजक नीति अपनाई गई। ‘‘ऐसी स्थिति में भारत की एकता, कौमियतों की नकार से सिद्ध करने के बजाय उसके सहकार में सिद्ध करने का स्तर जनवादी है।’’ (पृ.122, खंड1) इतिहास में जनवादी मूल्यों की पहचान हमेशा एक चुनौती रही है। रेडिकल इतिहास लेखन कई बार अतिवाद का शिकार होता रहा है। इस अतिवाद के मूल में एक ऐसी इतिहास दृष्टि काम करती है जो नितांत समकालीन विमर्शों का प्रक्षेप अतीत के किसी कालखंड में करता है। ठेठ समकालीन विमर्शों को आधार बनाकर इतिहास की व्याख्याएं  गलत निष्कर्षों तक पहुंच जाती हैं। हिंदी नवजागरण संबंधी चिंतन के साथ यही होता रहा है। सांप्रदायिकता के प्रश्नों से जूझते हुए कुछ विचारक हिंदी नवजागरण को नितांत हिंदू नवजागरण सिद्ध करते हैं। ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य की सीमाओं को ध्यान में न रखने के कारण ही ऐसा होता है। भारतेंदुयुगीन नववैष्णवता को पुनरुत्थानवादी बताना भी ऐसी ही दृष्टि का फल है। वास्तविकता यह है कि जिस वैष्णवता को भारतेंदु भारतीयता का आधार बता रहे थे, वह कोई मध्ययुगीन अवधारणा न थी। धर्मांधता और सांप्रदायिकता के बरक्स यह धर्म और लोक में प्रेम की महत्ता को स्वीकार करते हुए अलगाववादी ताकतों के खिलाफ एक मॉडल था। राज्य और जाति संबंधी पश्चिमी अवधारणा के समानांतर यह राष्ट्र-राज्य के अपने निर्धारक तत्वों को पहचानने की कोशिश थी। डॉ॰ चौधरी ने ‘स्वाधीनता संग्राम और हिंदी साहित्य’ नामक लेख में डॉ॰ राम विलास शर्मा की मान्यताओं से सहमति जताई है। बाद में इस नववैष्णवता के जनवादी स्वरूप की पहचान डॉ॰ नामवर सिंह ने ‘हिंदी नवजागरण की समस्याएं’ नामक अपने लेख में की है। अमेरिकी स्वाधीनता आंदोलन के वक्त जिस प्रकार नव ईसाई विचारधारा की नैतिकता कोई बाधक तत्व नहीं थी और मैक्स बेबर से लेकर व्हिटनी ग्रिसगोल्ड तक इसका समर्थन कर रहे थे, उसी प्रकार भारतेंदु मंडल की वैष्णव नैतिकता ‘क्रिस्तान, मुसलमान और ब्राहम धर्मों के प्रेम मार्ग’ को इस विचारधारा से जोड़ने का जनवादी प्रयास था। और यह अकारण न था कि नववैष्णवता की यह धारा गांधी के ‘हिंद स्वराज’ के लोकचिंतन का आधार भी बना था। पश्चिमी आधुनिकता के मूल्यों में छिपे प्राच्यवादी षड्यंत्र के सामने भारतीयता की पहचान एक समस्या है। ‘हिंद स्वराज’ के सौ वर्ष पूरे होने पर जो चिंतन दोबारा भारतीय आधुनिकता की खोज कर रही है, वह इस नववैष्णवता के महत्व को खारिज नहीं कर सकती। डॉ॰ चौधरी ने लिखा था-‘‘बचकाने किंतु उत्साही मार्क्सवादी को इसे संदर्भ से जोड़ने की जरूरत है। स्वाधीनता आंदोलन और साहित्य की प्रेरक परिस्थितियों का यह ताना-बाना बहुत महत्वपूर्ण है और किसी निर्णायक दिशा के लिए आधार का काम करता है। नववैष्णवता न पुनरुत्थानवादी है, न पुराणपंथी और न वह शुद्ध मध्ययुगीन ही है। उसमें वर्तमान के अनुरूप धार्मिक सहिष्णुता, उदारता और प्रेम मार्ग पर चलकर उस एकता की आकांक्षा है जो उसकी मुक्ति का उपनिवेश और पिछड़ेपन का बायस बन सकती है। धर्म बुद्धि साहस की स्वीकृति और आलस्य त्याग के साथ इस नववैष्णवता का वही संबंध हो सकता है जो कॉलविनवादियों का न्यू इंग्लैंड से बना था।’’ (पृ.125, खंड1)

आगे डॉ॰ चौधरी नववैष्णवता के अंतर्विरोधों को पहचानने के लिए ‘इंदु’ और ‘सरस्वती’ के लेखों का हवाला भी देते हैं। हरिऔध, मैथिलीशरण गुप्त और प्रसाद के विचारों की समीक्षा का आग्रह करते हैं। ‘जनमेजय का नागयज्ञ’ में कृष्ण का मानवता की घोषणा और ‘कंकाल’ में गोस्वामीजी के भाषणों में इस नववैष्णवता के अनुगूंज है। ‘‘आज हम धर्म के जिस ढांचे के शव को घेरकर रो रहे हैं, वह उनका (कृष्ण) धर्म नहीं है।’’ पंडित माध्व प्रसाद मिश्र के लेखों में नववैष्णवता के प्रश्नों पर चिंतन है। ग्रियर्सन की क्रिस्टोमायथी से पहले श्री ब्रहमानंद जी 1897 में निबंधावली में क्रिश्चियन विश्वासों का नववैष्णव संदर्भ दिखाया था। स्वदेश भक्ति का भावना के रसात्मक रूप का नववैष्णवता से क्या संबंध हो सकता है, यह भी डॉ॰ चौधरी की चिंता का विषय है। क्या नववैष्णवता का प्रेमचंद पर भी प्रभाव था या फिर निराला का नववेदांत पुनरुत्थानवादी था? ऐसे प्रश्नों पर फिर से विचार की आवश्यकता है।

विचारधारात्मक अंतर्विरोधों के कौन से सूत्र हिंदी नवजागरण के प्रारंभिक चरण को भाषा के सांप्रदायीकरण की ओर ले जाते हैं, इसे डॉ॰ चौधरी नहीं बताते। भारतेंदुयुगीन राजभक्ति बनाम देशभक्ति के द्वैत को व्याख्यायित न कर डॉ॰ चौधरी इतिहास की मौखिक परंपरा के क्रांतिकारी होने के मिथक को तोड़ने के लिए तत्कालीन पत्रिकाओं में छपे लेखों की ओर जाते हैं और शोध कार्य का आहवान करते हैं।

इस संदर्भ में कुछ बिंदुओं की ओर ध्यान दिलाना आवश्यक है। पहला यह कि डॉ॰ चौधरी का लेख ‘स्वाधीनता संग्राम और हिंदी साहित्य’ अक्टूबर-दिसंबर 1986 की आलोचना में प्रकाशित नामवर सिंह के लेख ‘हिंदी नवजागरण की समस्याएं’ में निकाले गए निष्कर्षों की असहमति में लिखा गया है। नामवर सिंह का मानना है कि हिंदी साहित्य का प्रत्यक्षततः संबंध बांग्ला नवजागरण से है जबकि डॉ॰ चौधरी इसे अनिवार्यतः 1857 के साम्राज्यवाद विरोधी-उपनिवेशवाद विरोधी चरित्र से जोड़ते हैं। नवजागरण और भाषा के संबंध पर नामवर सिंह ने ठोस प्रतिक्रिया दी और उसके सांप्रदायिक आधार की ओर इशारा किया है। इसलिए वहां नववैष्णवता की प्रगतिशीलता के अंतर्विरोधों को भाषा की समस्या से समझने पर बल है। यह बात सुरेंद्र चौधरी नहीं करते हैं। हिंदी नवजागरण में राजनीतिक चिंतन या सत्ता परिवर्तन की अनुगूंज मद्धिम हो जाती है और वह मूलतः सांस्कृतिक नवजागरण हो जाता है। इसलिए ‘स्वत्व निज भारत गहै’ (नामवर इसे आधुनिक शब्दावली में आइडेंटिटी से जोड़ते हैं) के स्वत्व प्राप्ति के राजनीतिक स्वाधीनता वाला पक्ष जरूरी होते हुए भी यहां तथ्यात्मक रूप से परोक्ष ही था। नामवर सिंह ने लिखा है-‘‘राजनीतिक स्वाधीनता इस स्वत्व प्राप्ति की पहली शर्त है। नवजागरण के उन्नायक इस आवश्यकता का अनुभव न करते रहे होंगे, यह सोचना कठिन है, फिर भी तथ्य यही है कि नवजागरणकालीन प्रकाशित साहित्य में राजनीतिक स्वाधीनता का स्पष्ट स्वर कम ही सुनाई पड़ता है। पहले ईस्ट इंडिया कंपनी और फिर महारानी विक्टोरिया के शासन काल में राज के विरुद्ध निश्चय ही किसानों के छिटपुट विद्रोह बराबर होते रहे जिनमें सबसे संगठित और सशक्त सन सत्तावन की राज्यक्रांति है फिर भी समकालीन शिष्ट साहित्य में उसकी गूंज सुनाई नहीं पड़ती-लोक साहित्य भले ही प्रचुर मात्र में मौखिक रूप में रचा गया। यह स्थिति सन सत्तावन के पहले तो थी ही, उसके बाद कम से कम तीन दशकों तक बनी रही। आर्थिक शोषण के खिलाफ जरूर लिखा गया, पुलिस तथा अफसरों के अत्याचार और अन्याय की भी शिकायत की गई, पर राजसत्ता पलटने के विचार को जैसे अंतर्गुहावास दे दिया गया।’’ (हिंदी का गद्यपर्व, नामवर सिंह, पृ.87, राजकमल प्रकाशन, 2010) मानो इसी का जवाब देते हुए सुरेंद्र चौधरी ने लिखा-‘‘जनता के चित्त में स्वदेशी-स्वराज का भाव 1857 की देन है, इसे स्वीकार करने में कठिनाई नहीं होनी चाहिए। संभवतः इसी शक्ति संबल को पहचानकर स्वदेशी की भावना के लिए भारतेंदु युग के कवियों को देश निकाला तो न दिया गया, पर वर्नाकुलर प्रेस पर अनेक बंदिशें डाली गईं। स्वदेशी के प्रति इस राज के रुख ने स्वतंत्रता के राग को बल दिया, इस पर बहस नहीं की जा सकती। …सत्ता परिवर्तन की आकांक्षा नारों में अवश्य प्रकट नहीं हुई। ‘अंग्रेजों भारत छोड़ो’ जैसा नारा भारतेंदु युग में न लगा था, मगर सत्ता परिवर्तन को भी गुहावास न दिया गया था।’’ और इसके प्रमाण में डॉ॰ चौधरी ने ‘नागरनैया जाला काले पनिया रे ना!’ जैसे गीतों का उदाहरण दिया है। उन्होंने बताया है कि राज-रजवार और विष्णु सिंह के गीत मगध में गाए जाते थे, बाबू कुंअर सिंह की मुसलमान प्रेमिका के गीत सारे भोजपुर में गाए जाते थे। हरेंद्र देव के काव्य में उसकी आवृत्तियां हैं। फिर अवध बुंदेलखंड से निकलकर सुदूर गया जिले तक इसकी अंतरध्वनियों की पहचान वह करते हैं।

तो क्या हिंदी जाति के साहित्य में 1857 के महाविद्रोह का मूल स्वर भारतेंदु युग में सुनाई पड़ता है? और क्या यह नवजागरण उसी चेतना का विस्तार है? क्या सचमुच हिंदी नवजागरण 1857 में व्यक्त जनजागरण की ही अगली ऐतिहासिक अवस्था है और हिंदी नवजागरण के शिष्ट साहित्य में व्यक्त विचार से नामवर सिंह का क्या अभिप्राय है? क्या भारतेंदु मंडल की विचारधारा 1857 की चेतना से भिन्न स्वर अख्तियार करती है तथा जनसमुदाय की संवेदना 1857 के साथ है? क्या मौखिक परंपरा साम्राज्यवाद उपनिवेशवाद विरोध की राजनीतिक आकांक्षा को कायम रखती है और हिंदी (या बांग्ला या मराठी) नवजागरण के नेताओं या उनके लक्ष्यीभूत श्रोता या पाठक जिस नवनिर्मित मध्यवर्ग से थे, उस मध्यवर्ग का मानस 1857 की मूलभूत चेतना से दूर पड़ता है?

डॉ॰ चौधरी और डॉ॰ नामवर सिंह दो भिन्न दृष्टियों से उस काल को देख रहे हैं। मध्यवर्गीय/भद्रलोक के शिष्ट साहित्य के अंतर्विरोधी या नवजागरण के नेताओं की अंतर्विरोधी यह साफ इशारा करती है कि वहां 1857 के दो प्रमुख गुण सांप्रदायिक एकता और औपनिवेशिक सत्ता के प्रति सचेत वैरभाव (कांसस हास्टेलिटी) का अभाव है। रंजीत गुहा मानते हैं कि ‘यह सचेत वैरभाव संघर्ष में हिस्सा लेनेवालों तक ही सीमित नहीं था’ बल्कि एक कन्पेफडरेट नेशनेलिज्म के जरिए हिंदू मुसलिम संघर्ष के सिद्धंत का समाधान भी था। इसके बदले नवजागरण कालीन नेताओं में और इसलिए साहित्य में भी वैरभाव की जगह ‘कांसस लायलिटी ऑफ द टेक्स्ट’ (देखें, रंजीत गुहा, द इंडियन हिस्टोग्रापफी ऑफ इडियाः ए नाइन्टीन्थ सेंचुरी एजेंडा एण्ड इट्स इम्प्लीकेशंस; सीएसएसएस, कलकत्ता, 1987, पृ.54) मिलता है। देशभक्ति और राजभक्ति की यह विभाजित चेतना जितना भद्रवर्गीय हितों से चालित थी, उतनी ही राष्टीय स्वरूप की निर्मिति में अदरनेस को परिभाषित करने में भी थी। डॉ॰ चौधरी लोकचेतना को 1857 का विकास मानते वक्त इस तथ्य को नजरअंदाज करते हैं। लोक की असंबद्ध यद्यपि प्रतिरोधी विचारधारा को हिंदी नवजागरण का प्रमुख स्वर मान लेना ठीक नहीं मालूम पड़ता। लोक साहित्य में 1857 की वीरता के स्मृति चिन्ह शेष थे। गीत गाए जाते थे परंतु वहां राज के प्रति कोई सचेत वैरभाव नहीं रह गया था। इसके बदले अतीत की मोहक स्मृति ही प्रधान थी। इस गौण धारा को प्रमुखता देने से नवजागरण के संष्लिष्ट चरित्र की व्याख्या उसी अतिरेकवादी उत्साही जनवाद से ग्रसित हो जाती है जिसकी खिलाफत डॉ॰ चौधरी लगातार करते रहे थे।

डॉ॰ चौधरी अगर भाषा और नवजागरण के संबंधों की पड़ताल करते तो शायद इस ओर उनका ध्यान जरूर जाता। 19वीं सदी के उतररार्द्ध का पूरा काल भारतीय राष्टीयता के निर्माण का गर्भकाल था। भारतीय राष्टीयता के तमाम अंतर्विरोधों का उत्स भी यही है। 1920 के दशक में रूप लेनेवाली सांप्रदायिकता और 20वीं सदी में लगातार बदलते राष्ट्रवादी चिंतन की रूपरेखा में अपने प्रारंभिक रूप में यहीं दिखाई पड़ती है। हिंदी और उर्दू राष्टीयताओं को उसके धार्मिक प्रतीकों के साथ पढ़ने की कोशिश हमें नवजागरण के पूरे संदर्भ को समझने पर मजबूर करता है। भारतेंदुयुगीन जातीयता हिंदू-मुसलमान भद्रवर्गीय हितों से चालित था, जहां भाषा को लगातार एक हथियार की तरह इस्तेमाल करते हुए पूरे समुदाय की पीडि़त ग्रंथि (विक्टिम कॉम्प्लेक्स) को निर्मित किया गया और इसी के सहारे जातीय गोलबंदी की गई। उस वक्त राष्टीयता का सवाल अंग्रेजों के विरुद्ध अपने आपको किस प्रकार परिभाषित किया जाए-इस प्रश्न से जुड़ी थी। इसलिए भारतेंदु और अन्य हिंदी आंदोलन के नेताओं के साथ कई उदारपंथी नेता जैसे बिशन नारायण डर (लखनऊ के सम्मानित वकील, भारतीय  राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष भी रहे तथा उर्दू के शाय तथा  मुसलमानों के मित्र के रूप में प्रसिद्ध और बंगाल के आर्थिक इतिहासकार विक्टोरियन उदारपंथी तथा प्रगतिशील राष्ट्रवादी रोमेश चंद्र दत्त ने लगातार हिंदू-मुस्लिम एकता की बात भी की और राष्ट्र की एकता के हिंदुओं की एकता की भी चर्चा की (देखें, ज्ञानेंद्र पांडेय; दी कन्स्ट्रकशन ऑफ कम्युनलिज्म इन कॉलोनियल नॉर्थ इंडिया, आक्सफोर्ड, 2006, पृ.218)। इस दौर की जातीयता में हिंदू जाति के संगठन और उत्थान का महत्व दिया गया तथा अंडरटोन के रूप में यह पहचान की राजनीति मुसलमानों को सामने रखकर निर्मित की गई। परंतु तब राष्ट्र के उत्थान का मतलब था, अलग-अलग समुदायों का उत्थान। हिंदू-मुसलमान-ईसाई-सिख आदि मिलकर राष्ट्र का निर्माण करते हैं, ऐसा माना जा रहा था। (देखें, वही, पृ. 223) भारतेंदु और सर सैयद अहमद खां के वक्तव्यों में भी इसकी अनुगूंज स्पष्ट ही देखी जा सकती है।

साठ के दशक की पूरी पीढ़ी जिस यातना, संत्रस, संशय, सिनिक, नकार विद्रोह आदि से गुजर रही थी, उसका और उसके कारणों की पड़ताल डॉ॰ चौधरी निरंतर अपने लेखन में करते हैं। डॉ॰ चौधरी ने लगातार नई पीढ़ी और बीच की पीढ़ी के अंतर्विरोधों को रेखांकित किया है। बिचली पीढ़ी के अवसरवाद तथा तटस्थता को नकारकर नवलेखन ने ‘प्रतीक्षा’ के मोहभंग के कारण एक निषेध और नकार की मुद्रा अख्तियार की थी। यह मुद्रा केवल एक भंगिमा मात्र न थी। इस नकार के वस्तुगत कारण थे और रचनात्मक मानस को ये उद्वेलित भी कर रहे थे। एक संवादी आलोचक की भांति इस नई पीढ़ी की रचनाशीलता को संभावनाओं के रूप में समझने की जरूरत थी। डॉ॰ चौधरी इसे पूरा करने की कोशिश करते हैं। स्वातंत्रयोत्तर दो दशकों में लगातार वर्ग संघर्ष की शिथिलता के कारण मध्यवर्गीय लेखक सामान्य जनजीवन से दूर होते गए। इस शिथिलता के साथ भारतीय सत्ता तंत्र की नीतियों और जनतंत्र के पीड़ादायी अनुभव ने एक ऐसी पीढ़ी को जिसने अपनी आंखें नए और स्वतंत्र भारत में खोली थीं, उमस से भर दिया। आजादी के बाद जन आंदोलनों का दौर एक तरह से रुक गया था। इसने कहीं न कहीं मध्यवर्गीय अलगाव का जन्म दिया। प्रतीक्षा और अलगाव के अंतर्विरोध में कुछ लोगों ने आत्म समर्पण कर दिया और अपनी राजनीतिक चेतना गिरवी रख दी। नवलेखन जब अलगाव और अस्तित्व के संकट की घोषणा कर रहा था तो इसे हमारे कुछ पुराने आलोचकों ने अंतर्राष्टीय नारों का प्रभाव कहकर खारिज कर दिया था। लेखन के बीज शब्द के रूप में स्वतंत्रता नई पीढ़ी के लिए महज नारा न था। लेकिन इसे मानवीय अस्तित्व की स्वतंत्रता के व्यापक फलक पर देखने के बजाय तत्कालीन प्रगतिशीलों ने भी अमेरिकी कल्चरल प्रफीडम के शीतयुद्धकालीन विचारधारा का प्रभाव माना और इसे भाववाद की इकहरी संकल्पना में ढालने की कोशिश की। दूसरी ओर, लेखक की स्वतंत्रता के नाम पर रूपवादियों खासकर परिमलवादियों और अज्ञेयवादियों ने इसे बल प्रदान किया। सुरेंद्र चौधरी ने ऐसी स्थिति को अधूरा और भ्रामक मानते हुए नवलेखन को एक बंद पद्धति मानने से इनकार किया था। आलोचना को नई पीढ़ी से बातचीत का दरवाजा खोलना चाहिए। इस मान्यता से वह कभी पीछे नहीं रहे। उन्होंने जोर देकर कहा कि नई पीढ़ी का संकट उतना निजी नहीं था जितना वह उपरी दृष्टि से मालूम पड़ता था। ‘नकार’ की दृष्टि किस ऐतिहासिक संकट में पैदा हो रही थी, उसे समझना जरूरी था। स्थिति को केवल नकारते हुए लड़ा नहीं जा सकता। यह सही था लेकिन नकार की भी एक सच्चाई तो होती ही है। इसी सच्चाई और यंत्रणा के दोहरे दबाव के बीच उस वक्त की रचनादृष्टि सार्थकता पाती है। और ‘‘जो लोग इस दुहरे दबाव को नहीं महसूस करते हैं वे या तो मुहावरे चुराते हैं, या फिर पूरी पीढ़ी के साथ एक व्यावसायिक खेल खेल रहे हैं। हमारी पीढ़ी की रचनात्मक लड़ाई का यह एक आंतरिक आयाम है।’’ (खंड तीन, पृ.146)

स्वतंत्रता के बाद की बिचली पीढ़ी ने देह को लेकर नई पीढ़ी की रचनादृष्टि को ‘ऐय्यास प्रेतों’ की तरह ट्रीट किया था। चौधरी ने देह की इस राजनीति को इसकी ऐतिहासिक भूमिका में समझने का प्रयास किया। उन्होंने स्पष्ट किया, ‘‘हम अदेह राजनीति के धर्मवीर नहीं हैं। चूंकि देह हमें देह हमें दुनिया में गोचर करती है, इंद्रियग्राहय अनुभवों से संपन्न करती है और दुनिया के मूर्त रिश्तों के बीच प्रतिष्ठित करती है, इसलिए हमारी राजनीति देह को नकारती नहीं है…। प्रश्न केवल देह की अमूर्त परिभाषा का नहीं, देह और देह के बीच मूर्त रिश्तों का है। हमारे लिए देह की अनेक यातनाएं हैं, वह हमें मूर्त-अमूर्त सभी देशों में आज गति दे रही है, इसलिए देह को हम अस्पृश्य नहीं मानेंगे। देह का दुरुपयोग करने में जैनेंद्र और अज्ञेय से कमलेश्वर और भारती भिन्न नहीं हैं। … बिचली पीढ़ी के आर्यसमाजी आलोचक देह की राजनीति को तो देखते हैं मगर उसके विस्तार को नहीं देख पाते। यह विस्तार हमें जीवन की वास्तविकताओं से जोड़ता है। देह में ही पेट भी है, इसे हम भूले नहीं हैं! आवेश के शुद्ध भावनात्मक रिश्ते आज की दुनिया में बन पाते हैं, इसमें अगर हमें विश्वास नहीं है तो जिम्मेदारी हमारी है…। चेतना अथवा संस्कारजन्य नैतिकता के सारे नियम देह पर ज्यों के त्यों लागू नहीं किए जा सकते…। देह की अपनी समस्याएं हैं, अपने स्वतंत्र नियम हैं। देह की इन ठोस मूर्त समस्याओं को नजरअंदाज कर उस पर टिप्पणी करना मुझे उचित नहीं मालूम पड़ता।’’ (वही, पृ. 147) देह की इस राजनीति को उस वक्त इतने बड़े परिपे्रक्ष्य में और किसी ने देखा हो, ऐसा मुझे मालूम नहीं। नामवर सिंह ने ‘मुक्ति प्रसंग’ के संदर्भ में लिखा था कि उस कविता में ‘‘बीच-बीच में सेक्स के खुले शब्दों से भद्र रुचि को ध्क्का देने की शोखी या शरारत है।’’ लेकिन इस देह की राजनीति का व्यापक आधार क्या है, इसकी बात उन्होंने भी न की। कापफी समय बाद फ्रेडरिक जेमेसन ने देह की इस राजनीति के ठोस द्वंद्वात्मक समझ को एक भिन्न संदर्भ में पेश किया। उत्तर आधुनिक दौर में ‘देह का आना एक वर्चुअल दुनिया में यथार्थ की विजय है। अपनी संकीर्णता और वस्तुपूजा के बावजूद देह की प्रधानता मोहक वर्चुअल रियलिटी के बीच मानवीय संवेदनाओं के हस्तक्षेप की तरह है। क्या मोहभंग से उपजे आक्रोश के दौर में नई पीढ़ी का स्वप्न को नकारकर देह की सत्ता और उसकी चुनौतियों को खुलकर व्यक्त करना इसी प्रकार का एक प्रयास न था!

नई पीढ़ी के बारे में डॉ॰ चौधरी आशान्वित थे और कृत्रिम भावनात्मक सत्य के बरक्स अपने को ही बार-बार तोड़ते, नकारते और लांघते चलने के क्रम में प्राप्त मानवीय वास्तविकता को महत्वपूर्ण मानते थे। ‘हम कुछ न बनाते हुए भी चीखने को विवश हैं’। घटित का यही मर्म कहीं न कहीं स्पर्श भी करता है और धूमिल ने ता लिखा ही था-‘‘मगर यह वक्त घबराए हुए लोगों की शर्म आंकने का नहीं है।’’ अपने को बार-बार तोड़कर अर्जित सत्य के बारे में बात करते हुए डॉ॰ चौधरी के दिमाग में रघुवीर सहाय की ये पंक्तियां जरूर रही होंगी-

‘‘कुछ होगा, कुछ होगा अगर मैं बोलूंगा

न टूटे न टूटे तिलिस्म सत्ता का

मेरे अंदर का एक कायर टूटेगा टूट

मेरे मन टूट एक बार सही तरह

अच्छी तरह टूट मत झूठ-मूठ उफब मत रूठ

मत डूब सिर्पफ टूट’’ (आत्महत्या के विरुद्ध्द्ध

परंतु बड़े आश्चर्य की बात है कि रघुवीर सहाय की इन कविताओं में उन्हें ‘आत्मीयता’ का स्पर्श नहीं मिला। और ये महज ‘रक्तचापहीन पीली पत्रकारिता’ की कविता जान पड़ी। टूटने से ज्ञात मानवीय सत्य दूसरी जगह उन्हें सपाटबयानी लगी। ऐसी सपाटबयानी ‘‘कल्पित दर्द के रिहटोरिक को तोड़ने का सबसे नाटकीय और तात्कालिक माध्यम बन जाती है। समस्या एक दूसरे स्तर पर फिर भी बनी रह जाती है। सपाटबयानी आवेश के निरंतर अंदाज को तोड़कर अगर कहीं स्थिर हो जाती है तो यह उसकी अशक्यता ही होती है। यह अशक्यता पहले रिहटोरिक को तोड़ती है फिर अपने को तोड़ते चलना उसकी नियति हो जाती है। कोई कवि मुहावरे के लंगड़े दरवाजे से आसानी से फैशन में आ जाता है और कविता को अनुभव की प्रामाणिकता से छलने लगता है…। अपने को ही बार-बार तोड़ते रहने की रघुवीर सहाय की नियति है क्योंकि उन्हें किसी शर्त पर उस जंगल से निकलना स्वीकार्य नहीं है…। मुझे लगता है कि ‘आत्महत्या के विरुद्ध’ की अधिकांश कविताएं एक अजीब रौ में लिखी गई हैं। उनमें न तो विजयदेव नारायण साही की कविताओं की आत्मीयता है और न राजकमल का वेग।’’ (वही, पृ. 63-69) मतलब इन कविताओं में आत्मीयता नहीं है और परिवेश से संपृक्ति भी नहीं है और टूटना एक मुहावरा भर है-एक रेहटोरिक को तोड़कर दूसरा रेहटोरिक गढ़ना-वास्तविक कर्मक्षेत्र की संवेदना से व्यवस्था को तोड़कर विद्रोही बनना और मुहावरों से युग को तोड़कर आततायी कहलाने का जो अंतर है, उसे आत्महत्या के विरुद्ध की कविताएं साथ-साथ व्यक्त करती हैं। आखिर क्या कारण है कि एक जगह सैद्धंतिक रूप से स्वयं को तोड़ने की महत्ता को स्वीकार करने के बावजूद डॉ॰ चौधरी को दूसरी जगह व्यवस्था को तोड़ने की इच्छा उसमें दिखाई नहीं पड़ी। उसमें आत्मीयता नहीं मिली-वह मिली भी तो विजयदेव नारायण साही की कविता में। कहीं ऐसा तो नहीं था कि पत्रकारिता की भाषा के विरोध ने उन्हें सपाटबयानी के विरोध तक पहुंचा दिया था। अनात्मीयता तथा परिवेश असंपृक्ति के अनुभव के पीछे सपाटबयानी संबंधी धारणा काम कर रही थी। काव्य भाषा संबंधी चिंतन मे ही कहीं कोइ दोष तो नही था!

रघुवीर सहाय की कविताओं में आत्मीयता नहीं मिलने पर डॉ॰ चौधरी ने जो आक्षेप लगाए थे, उसका उत्तर ‘कविता के नए प्रतिमान’ में नामवर सिंह ने दिया भी था। परिवेश को रचनात्मक रूप देने के लिए नाटकीयता कैसे काम करती है और वहां कविता के भीतर का नाटकीय नायक, जो प्राइवेट से ज्यादा सामान्य यथार्थ के किसी निजी साक्षात्कार का एक राजनीतिक व्यक्तित्व के साथ अपनी उपस्थिति दर्ज कराता है। नामवर सिंह ने लिखा था कि आत्महत्या के विरूद्ध की कविताएं ऐसे ही आत्मीय राजनीतिक व्यक्तित्व की कविताएं हैं।

निर्वैयक्तिकता की अपनी घोषणाओं के बावजूद ‘प्रगीतात्मक’ आत्मीयता का बोध और तदनुरूप काव्य भाषा का मोह डॉ॰ चौधरी को ‘आत्महत्या के विरुद्ध’ की कविताओं में ‘रक्तचापहीन पीली पत्रकारिता के मुहावरों के खतरनाक प्रयास को देख लेती है। 1970 में जब ‘कविता के नए प्रतिमान: विसंगति और विडंबना का सौन्दर्यशास्त्र’ शीर्षक आलेख में डॉ॰ चौधरी ने ‘कविता के नए प्रतिमान’ की समीक्षा की तो फिर से अपनी पुरानी धारणा का ही समर्थन करते हुए लिखा-‘‘पत्रकार की नाटकीय आत्मीयता में सबकुछ एक ‘मैं’ के अधीन होता है। इसमें की कीमियागिरी में घुलनशील तत्व: मैं बने की घोल में सारा तथ्य घुल जाता है-उसकी स्वतंत्रता और वास्तविकता समाप्त हो जाती है। ‘आत्महत्या के विरुद्ध’ में एक नाटकीय ‘मैं’ का ऐसा ही स्फार है जिसमें तथ्यों की वस्तुनिष्ठता घुलती रहती है। सबकुछ ‘मैं’ के गुंजलक में कैद हो जाता है और सारे करतब के साथ यही ‘मैं’ स्थितियों, घटनाओं और संबंधें पर गुंजलक मारकर बैठा शेष रह जाता है। इतिहास को नचाता हुआ, इतिहास के बीच गतिशील इकाई के रूप में नहीं, सर्वतंत्र स्वतंत्र सत्ता के विस्पफोट के रूप में। इस अनात्म ‘मैं’ का यही रहस्य है जिसकी ओर मैंने इशारा किया था। ‘मैं’ के स्पफार की यह मुद्रा आत्मीय नहीं हो सकती।’’ (खंड1, पृ. 211)

‘कविता के नए प्रतिमान’ की आलोचना उन्होंने दो लेखों में की है। ‘समकालीन कविता: अंधेरे से साक्षात्कार’ शीर्षक लेख में यद्यपि उन्होंने ‘कविता के नए प्रतिमान’ का नाम नहीं लिया है लेकिन विसंगति, विडंबना, नाटकीयता, सपाटबयानी और काव्यभाषा संबंधी नामवर सिंह की स्थापनाओं की आलोचना इसमें है जबकि ‘कविता के नए प्रतिमान: विसंगति और विडंबना का सौन्दर्यशास्त्र’ नामवर सिंह की किताब की समीक्षा है। ‘कविता के नए प्रतिमान’ की इससे अच्छी समीक्षा मेरे देखे में नहीं आई। डॉ॰ चौधरी ने शुरू में ही बताया है कि किस प्रकार छायावाद के ऐतिहासिक पतन पर अपनी दृष्टि केंद्रित न करके नामवर सिंह ने विजयदेव नारायण साही की इस स्थापना का समर्थन किया कि छायावाद का अंतर्विरोध उसके नैतिक विजन के टूट जाने तक सीमित था। उन्होंने आरोप लगाया कि नामवर सिंह ने इसे ज्यों का त्यों स्वीकार करते हुए भावना बुद्धि का एक हीगेलियन डाइलेक्टिक्स गढ़ लिया है। इसी का परिणाम है-काव्य संवेदना का विभाजन। डॉ॰ चौधरी ने लिखा कि नामवर सिंह की इस पुस्तक में ‘‘विवाद शैली के आतंक में इतिहास का परिप्रेक्ष्य डूबता नजर आता है… ‘कविता के नए प्रतिमान’ में जो सबसे बड़ा दोष है, वह परिप्रेक्ष्य के खो जाने का नहीं है, इतिहास के अदृश्य रह जाने का है।’’ (खंड 1, पृ. 206)

‘कविता के नए प्रतिमान’ में इतिहास के अदृश्य रह जाने के कारण नागार्जुन, त्रिलोचन, केदार और सुमन जैसे दूसरे कवि प्रतिमानों के निर्माण से गायब हैं। ‘कविता के नए प्रतिमान’ का परिप्रेक्ष्य निश्चित रूप से मुक्तिबोध हैं लेकिन ‘परिवेश और मूल्य’ में जिस इतिहास को दिखाने की कोशिश नामवर सिंह कर रहे थे, वह उन्हीं के शब्दों में अपूर्ण है और जिसकी क्षतिपूर्ति ‘अंधेरे में पुनश्च’ नामक अध्याय भी नहीं कर पाया। डॉ॰ चौधरी ने यह भी बताया है कि नई कविता के अनुभव संसार की वर्गीय संरचना को लक्ष्य करते हुए मुक्तिबोध ने जो कुछ भी लिखा, उसके बावजूद उनकी भावधारा अपनी विचारधारा से संगत न हो पाई। कला के तीसरे क्षण वाला उनका सिद्धांत उनकी अपनी काव्य प्रक्रिया का अंतर्विरोध भी है। ‘‘कला के जिस तीसरे क्षण को वे संपूर्ण रचनात्मक क्षण सिद्ध करते हैं, क्या वह ‘आत्मपूर्ण तात्कालिकता’ का पर्याय नहीं है। क्या यह ‘आत्मपूर्ण तात्कालिकता सारे कला सत्य को अपने भीतर की परिस्थितियों में या परम स्थिति में फ्रीज नहीं कर देती? सारे विकास को अपने भीतर ही नहीं समेट लेती? यह इतिहास का निषेध है और बर्गशैनियन गुणात्मक काल संरचना से मुक्तिबोध की भावधारा पीडि़त रही। इससे इनकार नहीं किया जाना चाहिए।’’ (खंड 1, पृ. 209)

डॉ॰ चौधरी ने यह भी आरोप लगाया कि विसंगति और विडंबना को जब नामवर सिंह समकालीन इतिहास की मूल लाक्षणिकता के रूप में प्रस्तुत करने लगते हैं तो वह विसंगति और विडंबना को गहरे अर्थ से काटकर फ्राइवालस बना देते हैं। बुर्जुआ सौंदर्यशास्त्र से लड़ने के क्रम में जिन रूपवादी औजारों की सहायता नामवर सिंह लेते हैं, कहीं न कहीं उन औजारों के खुद ही शिकार हो जाते हैं। डॉ॰ चौधरी ने खुद ही लिखा-‘‘कविता के मूल्यांकन में संरचनावादी दृष्टि कहां मार्क्सवादी सौंदर्यशास्त्र से टकराती है, इसे जानना हो तो नामवर की यह पुस्तक महत्वपूर्ण उदाहरण बन सकती है। जिस तरह हीगेलियन द्वंद्ववाद विचारों की गत्यात्मकता पर आश्रित है और कालचाप से आपकी प्रत्यवस्थाएं निर्मित कर उन्हें एक उच्च संश्लेष में बदल लेता है, उसी तरह नामवर का संरचनावादी दृष्टिकोण भी एक कल्पित पूर्णता का संश्लेष बनकर रह जाता है जिसका इतिहास, अनुभव और मानवीय कार्य व्यापारों तथा भावनाओं के मूर्त विश्व से कोई सीधा संबंध नहीं है। … ‘कविता के नए प्रतिमान’ वस्तुतः प्रतिमानों की भीड़ है जिसमें सही प्रतिमान दबा पड़ा रह जाता है।’’ (खंड 1, पृ. 213)

नामवर सिंह पर भाववादी चिंतन के प्रभाव के रूप में कहानी आलोचना संबंधी कुछ निष्कर्ष लगातार डॉ॰ चौधरी की आलोचना के केंद्र में रहे हैं। निर्मल वर्मा के कहानी संग्रह ‘परिंदे’ को नई कहानी की पहली कृति कहना और उसे ‘कालातीत कलादृष्टि’ से विभूषित करना ऐसा ही एक प्रयास था। डॉ॰ चौधरी लिखते हैं कि ‘परिंदे’ संग्रह की कहानियों में ताजगी थी मगर यह ताजगी कतई इस कारण नहीं थी कि निर्मल वर्मा ने इन कहानियों में अपने समय के इतिहास की उस विराट नियति को पहचान लिया था जो मनुष्य को अकेला करती है। ‘‘तमाम कुशलता के बावजूद ‘परिंदे’ जैनेंद्र का अतिक्रमण नहीं करती थी। इतना अवश्य था कि लतिका का पिंजरा बड़ा हो गया था, मगर कैच 22 वह तब भी न बन पाया था। फिर भी नई स्थितियों में स्त्री की यह नियति एक पैराडॉक्स खड़ा करती थी। लतिका को पिंजड़े से ज्यादा उसका अपना नैतिक आवेश बांधता है- इसी बिंदु पर उसकी अपनी पहली और आखिरी पहचान संभव है। … यूरोप की पतनशील परंपरा के आघात को नई कहानी का उद्घोष मानना वैचारिक दिवालियेपन के अतिरिक्त कुछ नहीं कहा जा सकता। बिंब, ध्वनियां, रंग ऐंद्रियबोध को गहरा करते हैं, मगर इससे यथार्थ का ऐतिहय ढांचा कालचाप भी प्राप्त कर लेता है-इसे नहीं माना जा सकता। शायद इस महत्वपूर्ण तथ्य की परीक्षा नहीं की जा सकी। ये विचारधाराएं आंतरिकता को तथ्यबद्ध दायरे से निकालकर जिस अगोचर भावभूमि पर ले जाती हैं, उनका सत्य क्या है। उनका सत्य लौकिक भावभूमि के विरोध में प्रकट हुआ है। यह सत्य जो एक लौकिक भावभूमि को तोड़कर प्रकट हुआ था, किसी कालजयी दृष्टि का परिणाम न था। बल्कि कालचाप से निर्वासित मध्यवर्ग की आत्मचेतना का परिणाम था! उस पर बुर्जुआ विचारधारा का ताजा रंग चढ़ आया।’’ (खंड 2, पृ. 26 व 127-28)

डॉ॰ चौधरी समकालीनता के प्रस्थान बिंदु के रूप में आजादी को रखते हैं। उनके लिए यह आजादी कालगत परिवर्तन के बजाय देश में होने वाला एक परिवर्तन था। यह देशगत परिवर्तन न केवल विभाजन की पीड़ा से ग्रसित था वरन भारतीय जीवन को जो वृहत्तर यथार्थ गांव और शहर की सीमा को तोड़कर राष्ट्रीय धारा में एक होना चाहते थे, वहां गांधीजी की परिकल्पना खंडित हुई थी और निश्चित रूप से गांव और शहर दो भिन्न यथार्थ से रूबरू थे। सुरेंद्र चौधरी ने नेहरू युग के अंतर्विरोधें को अलग-अलग तरीकों से लगातार व्याख्यायित करने की कोशिश की और इसके साथ रचनाशीलता की संलग्नता को चिन्हित भी किया। इन अंतर्विरोधें को पाटने की समस्या ही तात्कालिकता के समक्ष सबसे बड़ी चुनौती थी। स्वातंत्रयोत्तर हिंदी कहानी में जो तथ्य नई कहानी को कहानी से अलग करता था, वह निश्चित रूप से मध्यवर्ग का आत्मकेंद्रण था। ’62 के राष्ट्रीय हादसे से पहले दशक में निश्चित रूप से एक नवरोमैंटिक उत्थान था (नामवर सिंह के शब्दों में)। मगर जिसे पीड़ाभरी प्रतीक्षा कहा जाता है, उसके इतर इस प्रतीक्षा की सीमाओं को तोड़कर मुक्तिबोध वृहत्तर ऐतिहासिक अंतर्विरोधें से जूझ रहे थे। उनका सिनिकल और संशयवादी होना केवल आवेशजन्य नहीं था। ‘विपात्र’ और ‘क्लाड ईथरली’ की पीड़ा  प्रतिरोध, विद्रोह और स्वतंत्रता की एक पूरी दुनिया को रूपकों में ढालने का प्रयास था। अपने प्रयास में मुक्तिबोध जरूर अकेले थे लेकिन वहां निर्मल वर्मा का अकेलापन नहीं था। डॉ॰ चौधरी जोर देकर कहना चाहते हैं कि नई कहानी की संष्लिष्टता और उसका नयापन जिस रास्ते होकर आजादी के बाद की रचनात्मक परिस्थितियों और उसके अंतर्विरोधें को कैच करने की कोशिश कर रहा था, उसकी दुनिया मुक्तिबोध के रूपकों में ही साकार होती है। जिस प्रकार कविता मुक्तिबोध के यहां सारे रोमैंटिक आवेश उतार देती है, उसी प्रकार कहानीकार मुक्तिबोध के यहां भी भावुकता से उठनेवाली टीस और पीड़ाभरी प्रतीक्षा के बदले आहत नैरंतर्य का संकट केंद्रियता पाता है। नई कहानी की रचनाशीलता के केंद्र में व्यतीत होती व्यवस्था और चरित्रों के प्रति एक व्यथा भरा मोह है जो परिवार-समाज के अंतर्विभाजन के कारण पैदा हुई थी। ‘‘मुझे याद है कि पश्चिम में कथा साहित्य की बहस में जहां जॉर्ज स्पाइनर महाकाव्यात्मक और नाटकीय के बहाने दो सदियों की कथा यात्र के रचनात्मक सार पर बहस कर रहे थे, वहीं मार्क स्पिनका ने डिकेंस और काफ्का की आधुनिकता के केंद्र में परिवार-समाज को रखकर देखा था। ऐसे प्रयत्न अपने यहां न दिखाई पड़े। नामवर जी नई कहानी की बहस में परिवार, समाज को विशेष महत्व देते दिखाई न पड़े। (खंड 2, पृ. 28)

परिवार-समाज की इस केंद्रीयता का कोई कहानीकार था तो वो अमरकांत था। छोटे-छोटे क्रियाकलापों में कितने गहरे भावात्मक अर्थ छिपे रहते हैं, अपनी इसी पहचान के कारण अमरकांत की कहानियां अलग पड़ती हैं। परिवार के भीतर के जीवित रेशों से बनी कहानियां और परिवार के भीतर की भयावहता-दोनों कैसे राष्ट्रीय संदर्भ से जुड़कर भय और त्रास के बावजूद अपने संघर्ष को जीवित रखने की जातीय जिजीविषा से लैस हो सकती है- इसका विश्वास केवल अमरकांत की कहानियां देती हैं। ‘अमरकांत: जीवन की संभावनाओं के लिए संघर्ष’ शीर्षक आलेख नई कहानी के सबसे सशक्त कहानीकार को दुबारा देखने की एक कोशिश है। बड़े ताज्जुब की बात है कि अमरकांत पर कोई स्वतंत्र लेख न तो नामवर सिंह ने उस दौर में लिखा, न ही किसी और ने। डॉ॰ चौधरी का यह लेख उस महती आवश्यकता की पूर्ति करता है।

दूसरे खंड में संकलित डॉ॰ चौधरी के लेख एक बार फिर यह साबित करते हैं कि वह हिंदी के शीर्षस्थ कथा आलोचक हैं। ‘हिंदी कहानीः प्रक्रिया और पाठ’ के साथ कहानी के स्थापत्य को समझने का जो प्रयास उन्होंने शुरू किया था, वह उनके बाद के लेखन में भी लक्षित किया जा सकता है। प्रस्तुत संकलन के लेखों से गुजरते हुए हम लगातार उत्तरशती की कथायात्र करते हैं। इस कथायात्र में समकालीन से जूझते हुए कहानियों का भिन्न भिन्न रचना संदर्भ और उन रचना संदर्भों से झांकते हुए कहानी के स्थापत्य की भिन्न भिन्न भंगिमाएं मिलती हैं। प्रेमचंद के संदर्भ में उन्होंने जिस प्रकार कथावाचन को महत्व दिया था, उसी प्रकार बाद के कहानीकारों के यहां कथावाचक का हासिया किस प्रकार कहानी की रचना परिस्थिति को समृद्ध करता है, उसे भी समझने का प्रयास है। कला और जनवाद के रिश्ते भी डॉ॰ चौधरी के लेखन में निरंतर केंद्रीयता पाते रहे हैं। कथ्य की मार्मिक पहचान केवल नारों से तय नहीं होती। कहानी के भीतर जनवादी आंदोलन की अधिकांश कहानियां गढ़े गए यथार्थ की कहानियां हैं जो निश्चित रूप से यथार्थ के आतंक से पलायन है। अभिधत्मक पहचान और सर्वव्यापी चेतना कलारूपों के लिए मिथकों का आश्रय नहीं लेती। व्यापक और जटिल अनुभवों तक पहुंचने का एक रास्ता मिथकों को तोड़कर भी तय किया जा सकता है। इसके अमरकांत लगातार सिद्ध करते रहे।

सुरेंद्र चौधरी की कथा आलोचना पर विस्तृत बहस की जरूरत है। ये बहस हिंदी कथा आलोचना को नई दिशा दे सकती है। प्रस्तुत आलेख में उन सारे बिंदुओं को समाहित करना संभव नहीं है। खंड दो में मुक्तिबोध, भीष्म साहनी, प्रेमचंद और रेणु की कहानियों की विस्तृत समीक्षा के अलावा मार्क्सवादी सौन्दर्यशास्त्र पर भी एक बहस है। ‘हिंदी व्यंग्य की जातीय परंपरा और परसाई’ शीर्षक आलेख में एक विधा के रूप में व्यंग्य की आवश्यकता और शक्ति-दोनों को पहचानने का भी एक प्रयास है। समाज की विडंबना और उसके अंतर्विरोध जब तर्क की संगति से आगे निकलकर सादृश्यमूलक कल्पना का आधार लेती है तो वह व्यंग्य की बनावट में अपनी पहचान बनाती है। यह व्यंग्य दृष्टि परसाई के यहां अपने आलोचनात्मक यथार्थवाद के कारण ही केवल हास्य का माध्यम नहीं रह जाती। परसाई का व्यक्तित्व अपने युग के आत्मसंशय से ऊपर है। इसलिए वह ओजपूर्ण ढंग से अंतर्विरोधी स्थितियों पर प्रतिक्रिया करता है। एक नैतिक ऊर्जा की मद्धिम आंच में परसाई अपने चरित्रों और परिस्थितियों को पकाते हैं जिससे उनकी शैली तो अलग होती ही है, उसमें नया तासीर भी पैदा होता है। परसाई का व्यंग्य और उनकी गद्यशैली ठेठ अर्थों में हिंदी की जातीय परंपरा का निर्वाह करती है।

’90 के बाद की हिंदी कहानियों में घटना संकुलता के बीच से नई परिस्थितियों का कहानी में सार्थक उपयोग किस प्रकार हो- इस पर डॉ॰ चौधरी विस्तृत विवेचन करते हैं। सांप्रदायिकता जैसी थीम को ले करके फैशनपरक कहानियों का दौर भी चला था। डॉ॰ चौधरी कहते हैं कि तात्कालिकता के मोह में बाजार का गुलाम बनना एक बात है और विराट ऐतिहासिक संदर्भ को कहानियों में ढालना दूसरी बात। मानवीय गरिमा को केंद्र में रखकर लिखी गई दो कहानियों को डॉ॰ चौधरी अपनी समीक्षा का आधार बनाते हैं। प्रियंवद की कहानी ‘वे वहां कैद हैं’ एक पूरी पीढ़ी की दुश्चिंताओं और उलझनों को अपने केंद्र में रखती है। यहां उलझन, दुश्चिंताओं का कारण है या परिणाम-ये तो तय नहीं होता, परंतु तर्क और आवेशजन्य अपराध किस प्रकार मानवीय परिस्थितियों को एक मिथक में बदल देता है-वह पफर्क सामने आया है। छोटे-छोटे प्रसंगों से कैसे बड़ी पृष्ठभूमि का निर्माण होता है-प्रियंवद ने इसे अपनी कहानी कला में साधा है। डॉ॰ चौधरी लिखते हैं-‘‘कहानी के गद्य में प्रियंवद की अपनी अलग पहचान है। संवाद और दृश्य-दोनों इस गद्य से सजीव हो उठते हैं। मनुष्य की जटिल भावनाओं को नैतिक आवर्तों में डालकर देखने की एक विशेष कुशलता उनमें दिखाई पड़ेगी। न्याय और करुणा की सरहदों से एक साथ टकराता हुआ उनका गद्य संसार अथक और अक्षय शक्ति की सूचना देता है। अपनी पीढ़ी के वे अकेले गद्य लेखक हैं जिनमें मुझे ये विशेषताएं लक्षित होती हैं। कविता के मुहावरे में वे नहीं उछालते, जैसा उनके कुछ समकालीन उछालते हैं पर गद्य की पूरी काठी में लिरिक का स्पर्श होता है। (खंड 2, पृ. 265)

दूसरी कहानी है उदय प्रकाश की ‘और अंत में प्रार्थना’। व्यक्तिगत और अवांतर प्रसंगों से सार्वजनिक विडंबना को कैसे सामने लाया जाता है-इसे इस कहानी के संदर्भ में समझा जा सकता है। विषय साधारण ही हो, सारे क्रियाकलाप दैनिक जीवन के ही हों परंतु फिर भी उसमें कलात्मक उन्मेष कैसे हो सकता है-इसे प्रस्तुत कहानी से समझा जा सकता है। विभाजन के प्रेतों से लड़ता हुआ वाकणकर का व्यक्तित्व जिस आत्मसाक्ष्य की पीड़ा से गुजरता है, वह आधुनिक इतिहास में राष्ट्रीयता, वर्ण और ध्र्म तथा पूंजीवादी दुष्चक्र के जटिल संबंधें को कथा के भीतर मूर्त करता है। डॉ॰ चौधरी लिखते हैं-‘‘राज्यसत्ता के चरित्र को परोक्ष रूप से कहानी के गठन के साथ इस ऊंचे स्तर पर उजागर करने वाली कुछ ही कहानियां मैंने पढ़ी हैं। हिंदी कहानियों में किया गया ढेर सारा राजनीतिक लेखन इस स्तर तक नहीं उठता, इसके आसपास तक भी नहीं पहुंचता। उनमें क्रांति की उतावली में पूरी प्रक्रिया का सहज विसर्जन देखा जा सकता है।’’ (खंड 2, पृ. 272)

यह आधी अधूरी रूपरेखा मात्र है एक भुला दिए गए आलोचक के विशाल और सजग आलोचना कर्म का।  सच्ची आलोचना किस कदर गंभीर वैचारिक संघर्ष का परिणाम होती है इसे सुरेन्द्र चौधरी के लेखन में स्पष्ट ही देखा जा सकता है। सुरेन्द्र चौधरी पर बहस एक ऐतिहासिक ज़रुरत है। ज़रुरत है हिंदी की प्रगतिशील आलोचना की एक दूसरी परम्परा से संवाद की। बाकी फिर कभी।

(सुरेन्द्र चौधरी से संबंद्धित सारे उद्धरण अंतिका प्रकाशन से तीन खंडों में प्रकाशित उनके रचना संचयन से लिए गए हैं। विवरण नीचे उपलब्ध है। इस लेख का संशोधित-संपादित अंश अकार में प्रकाशित हो चुका है। मैं इसके लिए अकार का आभारी हूँ।)

मार्तंड प्रगल्भ

मार्तंड प्रगल्भ

मार्तंड प्रगल्भ जे.एन.यू. के भारतीय भाषा केंद्र में पी.एच.डी. के लिए शोधरत  हैं। फिलहाल लिडेन (नीदरलैण्ड) में अध्ययन-प्रवास कर रहे हैं। उनसे mpragalbha1@gmail.com पर संपर्क संभव है।

Published Books Of Surendra Chaudhary: 

  •  Hindi Kahani : Prakriya Aur Path (Hindi), Radhakrishna Prakashan, 1963, 1995
  • Phanishwar Nath Renu, Sahitya Academy, 1987
  • Itihas : Sanyaog Aur Sarthakata(I), Antika Prakashan, 2009
  • Hindi Kahani : Rachana Aur Paristhiti(II), Antika Prakashan, 2009
  • Sadharan Ki Pratigya : Andhere Se Sakshatkar(III), Antika Prakashan, 2009

आत्मकथ्य- मेरे आलोचक का जन्म: सुरेन्द्र चौधरी

राजेन्द्र यादव जी ने इतिहास को बिका हुआ गवाह कहा है। क्या भावी इतिहास को भी हम खरीदा गया गवाह ही छोड़ देंगे? क्या, हम इतिहास को, प्रभुवर्ग को,प्रभुसत्ता को फिर से समर्पित करने जा रहे हैं? घटनाक्रम ने निराशा पैदा की है,पर इस सीमा तक नहीं। दूसरी परम्परा की खोज का खतरा यह है कि खोज के पहले हम उसे प्रभुवर्ग को समर्पित कर देंगे। क्या हिंदी साहित्य की परम्परा प्रभुवर्ग को समर्पित रही है? अगर नहीं, तो उस परम्परा में ही स्वीकृति और स्वतंत्रता की धाराओं की पहचान की जा सकती है? हाँ, शास्त्र और लोक का भेद संस्कृति के ऐतिह्य रूप के निर्धारण के लिए महत्त्वपूर्ण है।

Surendra Choudhary 13 जून 1933- 09 मई 2001

Surendra Choudhary
13 जून 1933- 09 मई 2001

मेरे आलोचक का जन्म

BY सुरेन्द्र चौधरी

 

किसी विचार-व्यवस्था के लिए मैंने लेखन आरम्भ किया हो ऐसा दावा किए बगैर भी कहना चाहूँगा कि मेरी लड़ाई एक व्यवस्था के लिए थी। याद आता है कि सन् 1951में अपने पहले ही लेख में इस प्रश्न से मैं टकराया था। जैनेन्द्र जी की एक लेखमाला ‘आदर्श क्या : संघर्ष कि समन्वय साहित्य सन्देश में प्रकाशित हो रही थी जो उस समय की सबसे बड़ी प्रतिष्ठित आलोचनात्मक पत्रिका थी। मेरा लेख संघर्ष के पक्ष में और समन्वय के विरोध में लिखा गया था। तब मैं इन्टरमीडिएट का विद्यार्थी था। कॉलेज और नगर में इसकी नोटिस ली गई। हिंदी विभागाध्यक्ष डॉ. वासुदेवनन्दन जी ने जानना चाहा था कि क्या यह लेख मेरा ही लिखा है।

उत्साह में व्यवस्था की परवाह नहीं होती। अगर वह किसी का विरोध करता है तो किसी को चुनता भी है। मैंने संघर्ष चुना था। संघर्ष आज भी जारी है। यह संघर्ष अपने आप से भी चलता है। साहित्य और विशेषत: आधुनिक साहित्य की मेरी समझ वस्तुत: मानव-मुक्ति और राष्ट्रीय-मुक्ति की उस पृष्ठभूमि में बनी जिसमें एक नई संस्कृति का जन्म हुआ था। उसमें संघर्ष की अंतर्ध्वनियाँ मेरे युवा मन ने सुनी थीं और मेरी चेतना ने उसे अपना आदर्श बनाया था। अपने पहले लेख में यह प्रस्तावना आकस्मिक नहीं थी।

ये वर्ष मेरी बहु-उन्मुखता के वर्ष थे। पढ़ाई, छात्र-संगठन, फुटबॉल और राजनीति में एक साथ रुचि रखने के कारण लेखन नहीं कर पा रहा था। पढऩा जारी था। यूरो-इंडियन चिन्तन से स्वतंत्र होकर हमारे लिए कला-रूप, सामाजिक संगठन, विश्व-दृष्टि, और क्रान्तिकारी नैतिकता संबंधी प्रश्न नया दबाव पैदा कर रहे थे। यह सब बहुत सचेत रूप से हो रहा था, चाहे बहुत व्यवस्थित न भी रहा हो। प्रगतिशील लेखक संघ 1953 में नए दौर में प्रवेश कर रहा था। मैं उसके जलसों में पहुँच जाता था। अगले दो वर्ष मेरे आलोचक के निर्माण में अहम भूमिका पूरी करते हैं।

आधुनिकता और आधुनिकीकरण के पूरे दौर में अपनी पीढ़ी को समकालीन मानने का सौभाग्य हमें प्राप्त है। साहित्य के अलावा मेरी रुचि दर्शन और अर्थशास्त्र में थी। साहित्य का प्रश्न सांस्कृतिक प्रश्न बन गया था। गोष्ठियों में स्व. राहुल जी के मुँह से यह मैं कई बार सुन चुका था। वे इसे भाषा से भी जोड़ रहे थे। स्वतंत्र भारत के सन्दर्भ में यह सहज ही अनुमेय है।

एम.ए. में मैं स्व. नलिन विलोचन शर्मा जी के सम्पर्क में आ गया था। वे घोषित रूप से मार्क्सवाद-विरोधी आलोचक थे। मेरी अभिरुचि और साहित्यिक रुझान का उन्हें पता था। उन्होंने मुझे नए मार्क्सवादी आलोचकों का साहित्य पढऩे को दिया। यही नहीं यूरोप-अमेरिका के क्लासिक कथाकारों की रचनाएँ पढऩे को दीं। जैनेन्द्र उनके प्रिय लेखक थे। समकालीन कहानीकारों पर कई उत्तेजक रायें देते रहते थे। उनकी कृपा से मुझे लुकाच, हाउजर, काडवेल, वाल्टर-बेंजामिन आदि का प्राय: अनुपलब्ध साहित्य पढऩे को मिला। निश्चित रूप में तब मैं इनकी पारस्परिक असंगतियों को समझ नहीं पा रहा था। मार्क्सवादियों के बीच ढेर-सारी सांस्कृतिक समस्याओं पर विचार आरम्भ हो चुका था। स्व. नलिन जी की कृपा से मुझे वल्गर सोशियालॉजी पर सोवियत यूनियन में चल रही बहस की एक पूरी पुस्तक उपलब्ध हो गई थी।

निश्चित ही अत्यन्त सम्वेदनशील मार्गों से मेरा प्रशिक्षण हो रहा था। सन् 1955-56 में मैं नामवर जी के व्यक्तिगत सम्पर्क में आया। मेरे वर्तमान का निर्माण उनके हाथों हुआ है। वैसे कई व्यावहारिक मुद्दों पर मैं उनकी कार्य-प्रणाली से अलग भी रहा हूँ। मैंने उन दिनों गया को वैचारिक हलचलों का केन्द्र बना रखा था। अपने कॉलेज की हिंदी परिषद के अधिवेशन राष्ट्रीय स्तर पर मैंने किए। श्री अज्ञेय और डॉ. रामविलास जी को छोडक़र प्राय: सभी इस मंच पर आए। श्री यशपाल, जैनेन्द्र, महादेवी वर्मा, डॉ. भगवत शरण उपाध्याय, भैरव प्रसाद गुप्त, डॉ. प्रकाश चंद्र गुप्त, त्रिलोचन के साथ-साथ राजा राधिकारमण, नलिन विलोचन शर्मा, केसरी कुमार, डॉ. जगदीश गुप्त, नामवर सिंह, मार्कण्डेय आदि तमाम लोगों का सहयोग मुझे प्राप्त हुआ।

1955-60 के बीच हिंदी आलोचना एक नए दौर में प्रवेश कर रही थी। मैंने छिटपुट निबन्ध इस दौर में खूब लिखे। ‘लहर’, ‘कल्पना’, ‘ज्योत्स्ना’ और साठ के बाद ‘जनयुग’ और ‘आलोचना’ में ‘लहर’, ‘आधार’ आदि पत्रों के साथ लिख रहा था। ‘लहर’ से सम्पर्क में स्व. मित्र राजकमल के माध्यम से आया था। स्व. प्रकाश जैन और मनमोहिनी ने और ‘आलोचना’ में डॉ. नामवर सिंह ने मुझे काफी छापा। आज भी इनका ऋण मुझ पर है। नामवर जी के कारण मेरी आलोचना दृष्टि का विस्तार हुआ। उन्हीं दिनों मैं विदेशी पत्रिकाओं के सम्पर्क में आया। ये पत्रिकाएँ विश्व-स्तर पर जानी जाती थीं और साहित्य-संस्कृति-विचार के सभी अंगों की ताज़ातर समस्याओं को हल करने में लगी थीं।

मार्क्सवाद के साथ इनके अंतर्विरोध साफ थे। पर ये अंतर्विरोध, सारे के सारे कैटेस्ट्राफिक न थे। कुछ हद तक उनका हल निकाला जा सकता था। नववामपंथी चिन्तन भी सुसंगत हो चुका था। क्लासिकल और सोवियत मार्क्सवाद से यूरोपीय मार्क्सवादियों की कुछ दूरियाँ भी मेरे ध्यान में आने लगी थीं। रोज़र गैरोदी तब तक फ्रेंच पार्टी से निकाले न गए थे। वे तेज़ी से लिख रहे थे। ग्रामशी को खूब पढ़ा जा रहा था। उनके ‘हेगेमनी’ के सिद्धान्त की चर्चा हमारे बीच भी होने लगी थी।

हिंदी में डॉ. रामविलास शर्मा के निबन्ध-संग्रह लगातार आ रहे थे। पुस्तकें भी आई थीं। ‘भाषा और समाज’ एक गम्भीर पुस्तक थी। वे भारतीय सन्दर्भ में हमारे सबसे प्रासंगिक लेखक हो गए थे। कुछ वर्ष पहले की स्थिति उलट गई थी। वे ब्रिटिश आलोचकों की तरह जटिल से जटिल विषय पर अपनी प्रवहमान सरल गद्य-शैली में लिखते थे। उनका प्रभाव गैर-मार्क्सवादियों पर भी पड़ रहा था। शैक्षणिक दुनिया में किसी मार्क्सवादी की बात मानी जाने लगी थी। मैंने उनसे बहुत कुछ सीखा, पर मेरा मार्ग नामवर जी वाला ही था।

सन् 1963 में मैंने कहानी पर एक पुस्तक लिखी—’हिंदी कहानी : प्रक्रिया और पाठ’। मैं आज भी उसे एक प्रासंगिक पुस्तक मानता हूँ। कथा-संबंधी यह पुस्तक अद्यतन सैद्धान्तिक-व्यावहारिक प्रश्नों से टकराती थी। कहानी की प्रक्रिया पर, विशेष रूप से हिंदी कहानी की प्रक्रिया पर मैंने विस्तार से विचार किया था। तब भी मेरी धारणा थी कि गाथा को कथा में बदलकर कहानी का मार्ग निकाला गया है। यह हिंदीतर भाषाओं (आधुनिक) के लिए भी सच है। ‘पाठ’ को मैं उत्तरआधुनिकता की चर्चा से पहले महत्त्व दे रहा था। वाचिक परम्परा के समानान्तर मैं पाठ के महत्त्व को सिद्ध करना चाह रहा था। आज इस मुद्दे पर खासी बहस देश-विदेश के कथा-साहित्य में चल रही है। थाने की रपट लिखने वाले कुछ लोग कहानी की रपट भी लिख रहे हैं। उनकी शिकायत है कि मैं नैरेटर और नैरेशन की अपनी रट भूल नहीं रहा। वे राबर्ट शोल्ज की ‘फैब्रुलेटर्स’ और फेडरमैन द्वारा सम्पादित ‘सरफिक्शन’ उलट लें। जेराल्ड ग्रैफ का लम्बा लेख ‘द मिथ ऑफ पोस्टमाडर्निस्ट ब्रेक थ्रू’ (‘ट्राइ क्वाटर्ली’ 1973) भी उन्हें इस वापसी के महत्त्व तक ले जाएगा।

‘अस्तित्ववाद और समकालीन हिंदी साहित्य’ विषय पर अपना शोध-प्रबन्ध लिखा और ‘सामयिक’ में डॉ. नामवर सिंह की पुस्तक ‘कविता के नए प्रतिमान’ की लम्बी समीक्षा लिखी। काव्य-भाषा और कविता की संरचना की ओर मेरा ध्यान इसी क्रम में गया। कथा-प्रक्रिया की तरह काव्य-प्रक्रिया को भी मैंने अलग से समझने की चेष्टा की। वैसे कविता पर लिखने का मेरा कोई विचार न था। इस दिशा में मैंने कोई विशेष चेष्टा भी नहीं की।

कथा की ओर मेरी उन्मुखता ने मुझे फिर कहानी-उपन्यासों की दुनिया में ला खड़ा किया। मैंने एक लम्बे अरसे तक लिखना बंद भी कर दिया। हिंदी में कई नए आन्दोलनों की हवा थी। आधुनिकता और समकालीनता का प्रभाव कहीं मिला-जुला था और कहीं विरोधी था। कथा-साहित्य में समकालीनता की कई समस्याएँ थीं। एक विचित्र सहवर्तिता के भीतर समकालीनता अपनी स्वतंत्र पहचान बनाने के लिए संघर्ष कर रही थी। स्वाभाविक था कि इसमें मेरी दिलचस्पी होती। रेणु पर लिखकर जैसे मैं अपनी ही दृष्टि की सफाई करता रहा। भारतीय साहित्य के निर्माताओं में रेणु की जगह ढूँढ पाने की मेरी चेष्टा ने मुझसे उन पर एक मोनोग्राफ लिखवाया (1988)। इसमें मैंने आधुनिकता और समकालीनता की सरहद पर रेणु के साहित्य का मूल्यांकन किया।

भारत के राजनीतिक संक्रमण को यशपाल, भगवती चरण वर्मा, भीष्म साहनी और रेणु ने अपने-अपने नज़रिए से, गहरी संलग्नता से देखा-परखा था। नागर जी के कई उपन्यासों में शहरी जीवन की संक्रमणशीलता लक्षित हो रही थी। ‘मैला आँचल’ और ‘परती-परिकथा’ में रेणु ने ग्रामीण समाज और जीवन की हलचलों को व्यापक ढंग से चित्रित किया था। उनके राजनीतिक समीकरण बिहार के गाँवों में आज भी थोड़े अंतर के साथ मिल जाएँगे। रेणु ने अपनी राजनीतिक पहचान से ज़्यादा उस नई आर्थिक-सामाजिक प्रक्रिया को पहचाना था जिसका अंतर्विरोध वर्तमान इतिहास की धुरी बन जाता है। गाँव में एक साथ शासन का आधुनिक तंत्र पहुँचता है और सामन्तवाद की वापसी होती है। गाँवों के आधुनिकीकरण की यह बाधा लगभग स्थायी हो गई है।

यह विशेषता रेणु को अधिकांश लेखकों से अलग करती है। मैंने अपने मोनोग्राफ में इसे रेखांकित किया। भूमि समस्या का खूनी आभास उनकी रचनाओं में मिलने लगता है। बहुत-सी पूर्व स्थितियाँ यहाँ आकर खत्म हो जाती हैं, मेरा ध्यान मुख्य रूप से इन खत्म होती स्थितियों की ओर था, क्योंकि उनकी जगह ही नहीं स्थितियाँ भर पातीं। सामन्तवाद की वापसी एक विलक्षण तत्व थी। परिघटनाएँ इसे स्पष्ट कर रही थीं। अपनी पुस्तक में भरसक मैं इन परिघटनाओं के रचनात्मक संयोग पर विचार करना चाह रहा था।

समकालीन कहानियों पर एक पुस्तक लिख रहा हूँ। मेरे मन में एक ही विचार कुण्डली मारकर बैठा है—क्या समकालीन कहानियाँ समकालीनता की सभी ध्वनियाँ प्रकट कर रही हैं? क्या उनमें समकालीन परिस्थिति और प्रसंगों के अलावा कुछ नहीं है? क्या उसमें ‘अन्य’ का विचार केवल लोगों को प्रभावित-आतंकित करने के लिए है। ये नए लेखक क्या अपनी विषय-वस्तु से सचमुच दूर हैं! मुझे ऐसा कभी नहीं लगा। अपनी विषय-वस्तु पर इनकी पकड़ है, चाहे इनकी रचना दृष्टि बहुत व्यापक न भी हो। रचना के शिल्प पर इनकी पकड़ को लेकर अवश्य बहस की जा सकती है।

इतिहास और वर्तमान में एक साथ निबद्ध हमारी कथा का यथार्थ वस्तुत: आधुनिकता के लिए चुनौती है। आधुनिकता ऊपर से नीचे आएगी या वह समानान्तर आगे बढ़ेगी? आधुनिकीकरण की मिली-जुली प्रक्रिया साधक है या बाधक? वह किसके लिए साधक है और किसके लिए बाधक है? आज इस आखिरी प्रश्न का उत्तर देना बहुत कठिन नहीं है। कर्ज़ की व्यवस्था हमेशा-हमेशा उपभोक्ता समाज को जन्म देती है। कर्ज़ की पीने और फाकामस्ती करने की कला हर समाज को नहीं आती!

हमारी रचनाशीलता और रचना के लिए अनुकूल परिस्थिति पर बाज़ार का और बाज़ारू माध्यमों का प्रभाव बड़ा भयानक सिद्ध होगा। पुस्तकें पहुँच से बाहर हो रही हैं। कला-संस्कृति के नाम पर जितने फुटकल आइटम्स परोसे जा रहे हैं वे सूचना से अधिक क्या हैं? क्या सचमुच इनके फुटकल प्रसार से किसी कला-संस्कृति का विस्तार सम्भव है? क्या अभी जो चित्रों की नीलामी हो रही है, वह एक प्रकार के पूँजीनिवेश से भिन्न अहमियत रखती है? ‘जनसत्ता’ में अभी कल इस संबंध में एक रपट छपी है। उसमें कुछ चौंकाने वाली सूचनाएँ हैं। नटराज की मूर्ति का कोई खरीदार न था। पता नहीं, इनमें जो महँगे दामों पर नीलामी हुई, कितनी मूलकृतियाँ हैं। वस्तुओं का दूसरा पक्ष भी है, यह कहकर वस्तु की बजाय संरचना की विशेषता को वास्तविक सिद्ध करने की चेष्टा ने अतियथार्थवाद के सारे प्रकारान्तरों को ध्वस्त किया है, यह हम देख चुके हैं। मैं यह नहीं कहता कि यथार्थ एकात्मक है, मगर क्या रचना में वह केवल अपनी संरचना का विषय मात्र नहीं है, यह हमारे जीवन से उत्प्रेरित वास्तविक गोचर विषय भी है। चरित्र और उसकी स्थितियों में यह यथार्थ अपनी पूरी जटिलता से व्यक्त होता है। हमारी कथात्मक पद्धतियों में शब्द और प्रतीक, वस्तु और विचार, दृश्य और संकेत इस प्रकार अंतर्लयित हैं कि उन्हें अलगाने की स्थिति में यह मौलिकता नष्ट हो जाती है।

यथार्थवाद इस मौलिकता को नष्ट कर रचनात्मक मार्ग नहीं निकाल सकता। परम्परा का यह उपयोग हमें वर्तमान के साक्षात्कार में भी मदद करता है। जीवन की पद्धति पर, भोग-पद्धति पर तकनीकी प्रभाव दुहरे ढंग से प्रतिक्रिया कर रहे हैं। वे हमारे बाहरी जीवन को प्रभावित करते हुए भी हमारी दृष्टि और संस्कार को उस तरह प्रभावित नहीं कर रहे जिस तरह पश्चिमी मनुष्य को कर रहे हैं। परिवार और समाज में आज भी हमारी जड़ें शेष हैं।

यथार्थ गतिशील है। किन्तु यह गति एक समाज से होकर है। इस समाज से होकर ही गति इतिहास बनती है। काल की स्थिति और गति के इस विश्वगत भेद को भुलाकर मानवीय वास्तविकता नष्ट हो जाती है। परकीयता (एलियनेशन) क्या एक सामाजिक अवबोध नहीं है? क्या व्यक्ति एक आकस्मिक घटना भर है? प्रभु और सम्राट के अतिरिक्त क्या और कोई धुरी नहीं है? फिर ऐसे समाजों में कालक्रम में ऐसा भयानक अलगाव कैसे प्रकट हुआ? मानवीय यथार्थ के साथ ये प्रश्न सामाजिक इतिहास और संस्कृति की तमाम पूर्व कल्पनाओं से जुड़े हैं।

परकीयता का कारण वर्तमान यथार्थ में ढूँढना इसलिए भी गलत नहीं है। इसे अस्तित्ववाद की आध्यात्मिक परकीयता से भिन्न करके देखा जाना चाहिए। ये प्रश्न यथार्थवाद के जीवन प्रश्न हैं और तकनीकी समाज में इनके और भी भयानक परिणाम निकलने की सम्भावना बढ़ जाती है। इस दार्शनिक प्रश्न पर ज़्यादा बल देना इस छोटे से आत्मकथ्य में सम्भव नहीं होगा।

इतिहास, साहित्य और संस्कृति के प्रश्न हमारे वर्तमान के लिए सबसे प्रासंगिक हैं। एक स्वतंत्र राष्ट्र का इतिहास और संस्कृति से संबंध स्थापित करने में साहित्य की क्या भूमिका हो सकती है? भारत के भावी इतिहास, संस्कृति में वर्ग, राज्य और जन में किसकी प्रमुख भूमिका होगी? क्या हम इस भूमिका को निर्धारित करने में साहित्य का कोई भविष्य देख रहे हैं? यह ठीक है कि साहित्य परिवर्तन का औज़ार नहीं है, पर वह एक निर्भर रहने योग्य माध्यम है। साहित्य की क्रान्तिकारी भूमिका इसी अर्थ में ग्रहण की जाती है।

राजेन्द्र यादव जी ने इतिहास को बिका हुआ गवाह कहा है। क्या भावी इतिहास को भी हम खरीदा गया गवाह ही छोड़ देंगे? क्या, हम इतिहास को, प्रभुवर्ग को, प्रभुसत्ता को फिर से समर्पित करने जा रहे हैं? घटनाक्रम ने निराशा पैदा की है, पर इस सीमा तक नहीं। दूसरी परम्परा की खोज का खतरा यह है कि खोज के पहले हम उसे प्रभुवर्ग को समर्पित कर देंगे। क्या हिंदी साहित्य की परम्परा प्रभुवर्ग को समर्पित रही है? अगर नहीं, तो उस परम्परा में ही स्वीकृति और स्वतंत्रता की धाराओं की पहचान की जा सकती है? हाँ, शास्त्र और लोक का भेद संस्कृति के ऐतिह्य रूप के निर्धारण के लिए महत्त्वपूर्ण है।

ब्राह्मणवादी विचारधारा और व्यवस्था के सांस्कृतिक स्वरूप को समझने के लिए यह भेद एक मौलिक आयाम भी प्रस्तुत करता है। जनता से इसके अंतर्विरोध कई स्तरों पर प्रकट हुए। साहित्य में उसकी खोज की जानी चाहिए। पर उसे उस तरह नहीं खोजा जा सकता जिस तरह दलित साहित्य की खोज की जा रही है। सामाजिक परिवर्तन के प्रश्न को आर्थिक होड़ में डालकर हम क्या स्वयं उसकी सम्भावनाओं पर प्रश्नचिह्न नहीं लगा रहे। गांधी की नामलेवा व्यवस्था में भी अन्त्यज अपने हाशिए पर ही हैं। सामाजिक न्याय माँगने वाली शक्तियाँ क्या सामाजिक न्याय देंगी भी!

राष्ट्रवाद का जो भी स्वरूप निर्धारित हो, राष्ट्रीयता हमारी वही रहेगी जो इतिहास द्वारा प्रदत्त है। कौमियतों से स्वतंत्र राष्ट्रवाद की उदग्र परिकल्पना ठीक उसी तरह की होगी जिस तरह वर्णों से स्वतंत्र हिन्दू समाज की परिकल्पना। दोनों में एक ही तरह के खतरे निहित होंगे। ऐसे राष्ट्र में भी वर्ण विरोध बढ़ेंगे ही। मुख्यधारा की अवधारणा और परिकल्पना (जनता के राष्ट्र की) क्या पूरी तरह आयत्त है? अगर नहीं तो उसे जनवादी राष्ट्र की धारणा कैसे प्राप्त होगी? इसका आधार भारतीय जीवन और जन में है, पर उसे विकसित करने और मुख्य धारा के रूप में प्रतिष्ठित करने की आवश्यकता दिनोंदिन बढ़ रही है। हम साम्प्रदायिकता के एक भयानक दौर से गुज़र रहे हैं। इस आन्तरिक विरोध से जनवादी और क्रान्तिकारी प्रक्रिया बाधित होती है। मनुष्य की सचेत भूमिकाएँ हर दौर में महत्त्व रखती हैं, आज के दौर में उन्हें भुलाया नहीं जा सकता। उसकी आवश्यकता और बढ़ ही गई है। विश्व केन्द्रीकरण की शक्तियों को नाकाम कर ही जनवादी प्रक्रिया सफल होगी। जैसा कि डॉ. रामविलास शर्मा जी ने लिखा भी है—इजारेदार पूँजी सैन्य केन्द्रीय राज्यसत्ता, केन्द्रीय प्रजातंत्र आदि से हमारी दूरी बढ़ रही है। अंतर्विरोध तीखे हो रहे हैं। (‘क्रान्तिकारी जनवाद का दर्शन और भारत’, साम्य पुस्तिका-9)।

विकासशील देशों के गैर-पूँजीवादी मार्ग पर बढऩे की आर्थिक-राजनीतिक सम्भावनाएँ कम होती जा रही हैं। कुछ तो बाहरी दबावों के कारण और कुछ सोवियत व्यवस्था के नष्ट होने से इस मार्ग की बाधाएँ बहुत बड़ी हो गई हैं। राष्ट्रीय सरकारों पर जनता का जैसा दबाव होना चाहिए, वह नहीं है। उन पर विश्व-बैंक और मुद्राकोष का दबाव ज़्यादा है। आन्तरिक अव्यवस्था से ऐसी सरकारें दिन-ब-दिन ग्रस्त होती जा रही हैं, हमें इसे भूलना नहीं चाहिए। प्रतिरोध सफल न हुआ तो हम एक अधिक जटिल और आतंककारी गुलामी की गोद में गिर सकते हैं। वर्तमान परिस्थितियों में हमें जनता के बीच के अंतर्विरोधों से भी निबटना पड़ेगा।

संस्कृतियों की स्वायत्तता को नष्ट कर एक भावी सभ्यता के सर्वग्रासी रूप की परिकल्पना कैसी लगेगी? वर्तमान पूँजीवादी सभ्यता क्या इसी ओर बढ़ रही है? इतिहास-दर्शन के अनेक प्रश्नकर्ताओं ने सदी के दूसरे दशक में ही इसकी सम्भावना व्यक्त की थी। दो विश्वयुद्धों के बाद पश्चिमी पतनशीलता क्या नव-उपनिवेशवाद से थमी है। मगर यह साझा उपनिवेशवाद कहाँ तक चलेगा? फिलहाल इन नव-उपनिवेशवादी हमलों से विकासशील देश ही त्रस्त नहीं है, कुछ उन्नत पूँजीवादी देश भी परेशान हैं। फ्रांस इसका ताज़ा उदाहरण हैं।

जनवादी क्रान्ति में क्या विकासशील राष्ट्रों की मुक्ति निहित है? यह प्रश्न तमाम पिछड़े हुए किन्तु परिवर्तनकामी राष्ट्रों की समस्या है। भारतीय वामपंथी-जनवादी इस संबंध में क्या सोच रहे हैं यह भी हमसे छिपा नहीं है। पर जनता क्या उनसे स्वतंत्र भी कुछ सोचने के लिए राजनीतिक रूप से तैयार है? ये प्रश्न हमारे लिए निर्णायक प्रश्न हैं।

इन बृहत्तर प्रश्नों के सन्दर्भ में रचना और आलोचना की स्थिति पर विचार करना एक बार फिर ज़रूरी हो गया है। भारतीय नवजागरण के भावी परिणामों पर विचार करने के पहले उसके वर्तमान स्वरूप पर विचार करना ज़रूरी है। क्या यह नवजागरण राष्ट्रीय परिदृश्य में बिखराव—धार्मिक अस्मिता और शोषित राष्ट्रीयता जैसे नारों में—ला रहा है? क्या उसका कोई भी सकारात्मक भविष्य नहीं है? नवजागरण में तो राष्ट्र को जनता की शक्ति मिलनी चाहिए और जनता को राष्ट्र की ऐक्यबद्धता। उपनिवेशवाद के पहले दौर में हमारे नवजागरण को पीछे ठेल दिया गया। क्या नव-उपनिवेशवाद का सांस्कृतिक हमला उसे पीछे ठेलने में समर्थ हो जाएगा? हमारे सामने ये चुनौतियाँ हैं। हर वामपंथी मंच पर यह खुली बहस का विषय है। स्थितियों के साथ संवाद बनाए रखना ज़रूरी है। नवजागरण के तमाम मुद्दे नए सिरे से तय करने की कोशिशें भी चल रही हैं।

लोकजागरण जनता के जनवाद के पक्ष में जाए इसकी संभावनाओं और बाधाओं पर दृष्टि केंद्रित किए बिना बहुत सारी सांस्कृतिक समस्याओं का हल नहीं निकलेगा। इसके लिए साहित्य के नवगठन और पुनर्गठन का महत्त्व क्या है?

आज़ादी हमारे निकटतम इतिहास की सबसे बड़ी घटना है। इसके साथ एक विशाल जनगण का भविष्य जुड़ गया था। उपनिवेशवाद से मुक्ति के इस दौर में अनेक छोटे-बड़े राष्ट्र इस भविष्य से जुड़ गए थे। परिवर्तन की एक अमूर्त भावना जनगण में थी। विकासशीलता को एक नया सन्दर्भ और अर्थ मिल गया था। पर साथ ही यह भी एक तथ्य है कि इस लोकतंत्र की शक्ति को पहचानकर भी उसके व्यावहारिक तर्क अलग-अलग पडऩे लगे थे। समाजवाद की अंतर्ध्वनियाँ सुनाई ज़रूर पड़ती थीं पर उन्हें समर्थित आधार देने वाला कोई बड़ा संगठित वर्ग न था। जनता ने अपना जनतंत्र नेतृत्व को प्राय: समर्पित कर अपनी भूमिका को विराम दिया। राष्ट्रीय पुनर्गठन का समाजवादी लक्ष्य फिर भी तय न हुआ। व्यावहारिक तर्क एकता और संघर्ष की वामपंथी असमंजस्यता का शिकार हुआ। गैर-काँग्रेसवादी कार्यनीति गैर-राजनीतिक गठबन्धन से अधिक कुछ न रही।

जनता के पुनर्गठन का सवाल तय न हो तो कला और संस्कृति के पुनर्गठन का प्रश्न स्वत: कुछ मध्यवर्गीय समूहों तक सीमित हो जाता है। ये मध्यवर्गीय समूह अपने को पिछड़े हुए समाज से अलग-थलग समझते हैं। यही नहीं ये क्रान्ति की क्रान्तिकारी व्याख्या करते हुए यह कार्यभार दूसरों को सौंप देते हैं। परिणाम स्पष्ट है, बहुत-सी ऊँची लहरें समय के साथ गुज़र जाती हैं। एकत्वहीन मध्यवर्गीय समूह हलचल को अपनी स्वतंत्रता मानकर जनवाद और क्रान्ति को किस कदर बदनाम करता है, इसकी मिसालें हमारे यहाँ के अलावा अन्य समाजों में भी मिल जाएँगी।

जनवाद के सन्दर्भ में एक विशेष स्थिति इसलिए भी देखी जा सकती है कि चीनी कम्युनिस्ट पार्टी की वर्तमान काँग्रेस ने समाजवाद को एक चीनी तत्व बनाकर छोड़ दिया है।

डॉ. रामविलास शर्मा जी ने साहित्य, परम्परा, जातीयता, इतिहास और विश्व-दृष्टि को लेकर इधर कुछ नए और बड़े सवाल उठाए हैं। अभी इनमें से अधिकांश सवाल बहस के बीच हैं। मगर इन प्रश्नों ने हमें बड़े राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय परिदृश्य से जोड़ दिया है। भारतीय साहित्य के इतिहास-दर्शन से ये तमाम प्रश्न जुड़ते हैं। कोई भी मार्क्सवादी विचारक इन प्रश्नों से बचाव नहीं कर सकता। उनका भारतीय मानसिकता की ओर लौटना उस अर्थ में नहीं लिया जा सकता जिस अर्थ में हम ‘हारे को हरिनाम’ कहते हैं। वे सम्पूर्ण मानसिकता को एक रचनात्मक और सृजनात्मक जीवनधारा से द्वन्द्वात्मक रूप में परखने के लिए यह यात्रा करते हैं। संस्कृतियों के अध्ययन की एक नई दृष्टि विकसित करने का श्रेय शर्मा जी के लेखन को जाता है। भारतीय सन्दर्भ में वे अकेले मार्क्सवादी हैं जिन्होंने दो पीढिय़ों का प्रशिक्षण बड़े पैमाने पर किया है। उन्हें कई मुद्दों पर अस्वीकार करने के लिए भी हमें नया कुछ सोचने पर विवश होना पड़ता है।

मेरे दिमाग में भारतीय कृषितंत्र और ग्राम समुदायों के संघटन का एक ऐसा ही मसला फँसा हुआ है। ग्राम-समुदायों को लेकर इधर मार्क्सवादियों के बीच काफी बहस चली है। सन्दर्भ एशियाई उत्पादन-पद्धति का रहा है। क्या भारतीय ग्राम-समुदायों की परिकल्पना महज़ एक उपनिवेशवादी तंत्र की आवश्यकता थी? क्या पितृ-सत्तात्मक-समाज निरंकुश साम्राज्य और निरीह ग्राम-समुदाय स्वयं मार्क्स के लिए समस्या नहीं बने थे? अगर ये ग्राम-समुदाय ही निरंकुश साम्राज्यों का उत्सर्जन करते हैं और स्वयं जड़ रह जाते हैं तो इस जड़ता का रहस्य बहुत अबूझ नहीं रह जाता। इसका यह अर्थ नहीं लिया जाना चाहिए कि इस प्रकार का कृषितंत्र स्वयं गतिहीन था। सामुदायिक सम्पत्ति और बड़े कुटुम्ब-परिवारों की व्यक्तिगत सम्पत्ति को लेकर अभी काफी उलझनें बनी हुई हैं। बहरहाल, कृषितंत्र और कृषि पर आधारित समुदायों के जीवन पर पुरातत्व का भी प्रयत्न अब तक निर्णायक नहीं है।

हिंदी भाषी जाति, लोक जागरण (मध्ययुग) और हिंदी नवजागरण को लेकर शर्मा जी ने बहुत कुछ लिखा है। हिन्दू पुनरुत्थानवादियों के लिए वे एकमात्र चुनौती हैं। चुनौतियाँ निरस्त प्रतिमानों की नहीं होतीं।

समकालीन साहित्य पर मैंने फुटकल बहुत लिखा है, पर लगता है फुटकल लेखन कभी बंद किया जाना चाहिए ताकि थोक लिखने का अवसर बने। अभी तक जो पहचान बनी है वह इस फुटकल लेखन की ही है। कोशिश कर रहा हूँ कि इससे उबरूँ। कुछ पारिवारिक परिस्थितियाँ,  कुछ छोटे शहर की सीमा, चाहकर भी नया लिखने की परिस्थिति कम बनती है और जब बनती है तो बाहर दौडऩा पड़ता है। विश्वविद्यालय का पुस्तकालय अभी अव्यवस्थित ही चल रहा है। इधर अनुदान की राशि में भारी कटौती ने कई समस्याएँ पैदा कर दी हैं। स्तरीय पत्रिकाएँ भी खरीदी नहीं जातीं।

जितनी तैयारी है उतने को भी संयोजित करना चाहूँ तो कुछ वर्ष लग ही जाएँगे। दिमाग में कई छोटी-बड़ी योजनाएँ हैं। अभी कहानी की समकालीनता पर एक छोटी पुस्तक लिखने में लगा हूँ। कुछ मित्र सवाल करते हैं कि क्या कहानी की समकालीनता कोई ऐसा परिदृश्य तैयार करती है कि उस पर गम्भीरता से विचार किया जा सके। मेरे लिए समृद्धि और दरिद्रता दोनों चिन्ता के कारण हो सकते हैं। मेरे लिए इतना आश्वासन पर्याप्त है कि कहानी की समकालीनता हिंदी कहानी की समकालीनता के पक्ष में है। बाहरी बोझ उस पर कम हुआ है। अपनी विषय-वस्तु पर कहानी की पकड़ मज़बूत हुई है। समय की जटिलता के नाम पर अमूर्त कहानियाँ कम लिखी जा रही हैं। हाँ, आरक्षण के सवाल पर कहानीकारों में आपसी अलगाव थोड़ा लक्षित हुआ है। यह पूरे देश की वास्तविकता है और केवल इसे कहानीकारों के बीच के विभाजन के रूप में नहीं देखा जा सकता।

चेखव को जुमलों से मारने वालों पर आज टिप्पणी करने की ज़रूरत नहीं। ज़रूरत है समकालीन कहानी को अपनी आधुनिक पहचान देने की जो हमारे लिए एक निर्णायक प्रश्न है। कला और कहानी के संबंध को उस तरह नहीं देखा जा सकता जिस तरह कला और कविता के संबंध को देखा जा सकता है। अपने विवेचन में भरसक मैं इस विवादास्पद प्रश्न से जूझा हूँ। वैसे अपनी शक्ति को बढ़ा-चढ़ाकर देखने की कोशिश मैंने अब तक नहीं ही की है।

एक छोटी योजना भारतीय मिथक-चक्र पर लिखने की है। किसी जाति या जातियों के समुदाय का विचार-विश्वास मिथकों के अध्ययन से जाना जाता है। इतिहास पूर्व का सांस्कृतिक स्रोत होने के कारण इनका विश्वव्यापी अध्ययन किया गया है और आज भी किया जा रहा है। हमारे देश में मिथकों के कई चक्र हैं जिनसे हमारे उपमहाद्वीप की जीवनविधि में आए परिवर्तनों को समझा जा सकता है। ये विश्वास परलोक संबंधी ही नहीं, इहलोक संबंधी भी हैं। वैदिक-पौराणिक मिथक-चक्रों के साथ उनके लौकिक चक्र भी हैं जो लिखित से अधिक वाचिक परम्पराओं में जीवित हैं। तुलनात्मक रूप से इनका अध्ययन अनेक समानताओं और विरोधों को उजागर करता है।

ब्राह्मणवाद एक व्यवस्था भी है और विचारधारा भी। इन दोनों रूपों में उसके ऐतिहासिक अध्ययन की योजना है। थोड़ा काम किया भी है। वर्तमान सन्दर्भ में तो यह विचारधारा एक निर्णायक मोड़ पर खड़ी है। इतिहास के भीतर से वर्तमान तक आकर क्या भावी समाज के लिए यह संकटपूर्ण व्यवस्था साबित होने जा रही है? इन तमाम प्रश्नों से टकराना आज ज़रूरी है। ब्राह्मïणवाद क्या कोई ऐतिह्य उत्तर देने की स्थिति में है? कौन-सी व्यवस्था इसका उत्तर है? क्या भारतीय समाज इस विकल्प के लिए तैयार है? जनवादी व्यवस्था में क्या ये बद्धमूल अंतर्विरोध नष्ट होंगे? ऐसे कुछ मुद्दे क्या विकल्प की व्यवस्था के लिए तय हैं? आलोचनाकर्म की जटिलताओं से खूब परिचित हूँ। मेरे लिए आलोचना एक प्रकार का रचनात्मक विवेक है। सम्वेदना उसकी बुनियादी शर्त है। इस समीकरण के बावजूद आलोचना कठिन होती है। आलोचना का व्यावहारिक पक्ष मज़बूत हो तो सिद्धान्त की व्यवस्था अदृश्य भी छोड़ी जा सकती है। इसे हमारे कुछ मित्र विसर्जनवाद मानते हैं। सिद्धान्त के प्रति अतिरिक्त मोह का कारण क्या झूठी आत्मसजगता से कुछ अधिक है? मेरे कुछ जनवादी मित्र, जो अरसे पहले अपनी सिद्धान्त-प्रियता के लिए प्रसिद्ध थे, आज सबसे उपराम दिखाई पड़ते हैं।

किसी ने ठीक लिखा है कि आलोचक अपने अनुभव के साथ-साथ एक समृद्ध रचनात्मक अनुभव से भी बहुत कुछ सीखता है। बृहत्तर अनुभव-संसार से उसका यह सब कुछ सीखना, जो अपने एकान्त अनुभव से वह नहीं सीख सकता, उसकी दृष्टि को अधिक व्यापक भोग (भाव) के क्षेत्र में उछाल देता है। उसके कर्तव्य में इस दुहरे अनुभव की जटिलताएँ प्रकट होती हैं। ये अनुभव पूरक भी हो सकते हैं और परस्पर विरोधी भी। इन स्थितियों में उसका हल भी उसे ढूँढना पड़ता है। जीवन में, और विशेष रूप से समकालीन जीवन में, जो कुछ आंतरिक और स्फूर्तिदायक है उसकी पकड़ और पहचान सरल क्रिया नहीं होती। हम अनुभव की इन संजटिल चुनौतियों से जूझते हुए उनका कलात्मक और रचनात्मक अर्थ प्राप्त करते हैं।

हमारे अनुभव-संसार में बहुत से मूलगामी महत्त्व के परिवर्तन हुए हैं। पिछले चालीस वर्षों के इन अनुभवों का समकालीन संसार भारत के यथार्थ को समझने के लिए बहुत ही प्रासंगिक है। भारतीय सन्दर्भ में अन्य देशीय यथार्थ को समझने की चुनौतियाँ भी इसी में शामिल हैं। आधुनिकता और समकालीनता की बहुत-सी असंगतियाँ अगर हल की गई हैं तो बहुत-सी नई पैदा भी हो गई हैं। एक सचेत आलोचक के लिए इनकी रचनात्मक पहचान इसलिए भी बहुत ज़रूरी है।

आलोचनात्मक प्रेरणा का रहस्य इस काल की दुहरी बनावट में आज झाँकने से खुलता है। देश बाद में बदलता है काल में इसकी प्राथमिकताएँ पहले ही झाँकने लगती हैं। यह काल के अनुभव को बार-बार पुनर्गठित करने की प्रक्रिया में व्यक्त होती हैं। आज के समाज में यह प्रक्रिया कुछ ज़्यादा ही तेज़ हुई है। और भविष्य में यह कुछ अप्रत्याशित ढंग से प्रकट होती है, इसकी सम्भावनाएँ बढ़ गई हैं। तकनीकी क्रान्ति का यथार्थ पर यह प्रभाव अनिवार्य है। आलोचना कर्म के लिए प्रसंग प्राप्त स्थिति सुखद न हो, पर अनिवार्य है। कलात्मक अनुभव के संबर्द्धन के लिए यह और भी ज़रूरी है। कलात्मक अनुभव का यह योगपद आलोचक को सच्ची परिपक्वता देता है। यह आलोचना का ‘डायलेक्टिक’ गढऩे में उसकी मदद करता है। संकीर्ण द्वन्द्व से उसे उबारता भी है। एक प्रकार के सँकरे डायलेक्टिक की गिरफ्त में आकर यह कलात्मक अनुभव भी व्यर्थ हो सकता है। आवेश सम्वेदना का पर्याय नहीं हो सकता, वैसे जीवन के साधारण अनुक्रम में वही पहले प्रत्यक्ष होता है।

हिंदी आलोचना की कुछ व्यावहारिक समस्याएँ भी हैं। वह एक लम्बे अरसे से परिवर्तन और परम्परा के संक्रमण की पीड़ा झेल रही है। एक पारम्परिक समाज में ऐसी समस्याएँ आकस्मिक नहीं होतीं। परम्परा को जड़ता मानने की आदत से आलोचना को परहेज़ करना चाहिए। परम्परा से गति को शक्ति मिलती है। परम्परा सम्वर्धन है। परिपाटी अलग चीज़ है। वह कुछ तोड़ती नहीं, इसलिए कुछ नया जोड़ती भी नहीं। एक यांत्रिक और निर्धारित मार्ग का अनुगमन-भर करती है। परम्परा नवीनता को लयबद्ध गति की स्वच्छंदता के रूप में आत्मसात करती है। वह केवल लयहीन गति का विरोध करती है। दूसरी परम्परा की खोज करने के बदले यदि हम इस लयबद्ध गति की स्वच्छंदता की खोज करें तो परम्परा के नवीकरण के लिए वह उपयोगी होगा।

मूल्यवान को निरर्थक से अलग करने की यह एक विधि-सम्मत प्रणाली भी है।

रचनाकारों को आलोचक से हमेशा शिकायत रही है। आज यह कोई नई बात नहीं है। अगर कुछ नया है तो वह यह कि आलोचना की मंचबद्धता ने प्रतिबद्धता का एकाधिकार प्राप्त कर लिया है। समस्त क्रान्ति का स्रोत अपने को सिद्ध करने वाले मंच आज अपने अंतर्विरोधों से ही परेशान हैं। रचनाकार इसके लिए कम दोषी नहीं है। मंच लेखक का होता है, कुर्सियाँ आलोचक सँभालता है। प्रतिबद्धता इतनी विवश, इतनी सँकरी नहीं हो सकती। जो हमारे मंच से बाहर के लेखक हैं वे तो लगभग तय मानते हैं कि हमारे रुख में कोई सकारात्मक परिवर्तन होने से रहा। हमारी उदारता भी उन्हें अभिप्राय-मुक्त नहीं मालूम पड़ती।

आलोचक की अविश्वसनीयता एक खतरनाक स्थिति है। वह निर्णायक प्रश्नों को भी संदेहास्पद बना देती है। यही नहीं, रचना की पहचान के लिए भी वह एक द्विविधाजनक मानसिकता तैयार करती है। आलोचना की एक अच्छी पुस्तक पढऩे का अवसर वर्षों बाद आता है। समीक्षाएँ, रचनात्मक पहचान नहीं बना पातीं। लगता है इस मोर्चे पर भयानक सन्नाटा तिर रहा है। रामविलास जी इस सन्नाटे को तोड़ रहे हैं, क्या यही हिंदी आलोचना की एकमात्र गतिविधि है? सुनता हूँ कि हिंदी नवजागरण पर नामवर जी की एक पुस्तक आ रही है। उससे शायद जड़ता थोड़ी टूटे। सन्तोष करने के और भी बहाने ढूँढे जा सकते हैं।

अपने स्वर में उभरती हुई निराशा स्वयं मुझे चौंकाने वाली लगती है। रचना और आलोचना के लिए आज कोई स्थिति निरापद नहीं हो सकती। पर निराशा एक भिन्न स्थिति है। वह समय के आवर्त्त में हमें और अकेला करती है। इसके विपरीत रचना और संघर्ष के व्यावहारिक रिश्ते लेखक की ऊर्जा के स्रोत होते हैं। कुछ ही लेखक यदि उस रिश्ते को जीवित रखते हैं तो उत्सर्जन की सम्भावनाएँ बनी रहती हैं। आलोचना इनका आधार दृढ़ कर सकती है—रचना और संघर्ष को व्यावहारिक बनाने में उसका सर्जनात्मक योगदान हो सकता है।

जीवन-मूल्यों के बीच कहीं गहरी और निर्णयात्मक टकराहट है। पूरे समकालीन भारतीय जीवन और विचारों-विश्वासों में उसकी व्याप्ति देखी जा सकती है। ऐसी स्थिति में अपने ही लिखे पर विश्वास जमाना चाहता हूँ। मैं अपने लिखे पर अमल करता रहा हूँ। इसलिए भी आत्मविश्वास बढ़ा है। वैसे अभी ऐसा कुछ मैंने नहीं लिखा जो मेरी पहचान को एक सार्वजनिक चेहरा दे सके। साठ की उम्र तक पहुँचकर भी ऐसा न हुआ, इसके लिए खुद भी जि़म्मेदार हूँ। पढऩे की मेरी जि़द ने लिखने में बाधा पैदा की है। आज भी जब कुछ पढऩे को मिल जाता है तो लिखना हफ्तों स्थगित रहता है। नोट्स लेने के अलावा कुछ भी लिख नहीं पाता। लिखना सचमुच साधना है।

भारतीय लेखन के सन्दर्भ में हिंदी लेखन पर विचार किया जाए यह एक शुभ स्थिति होगी। अब तक हमने केवल अंतरराष्ट्रीय साहित्य में ही अपनी जड़ों और शाखों की पहचान की है, अब ऐसा भी समय आ गया है कि हम अपनी जड़ों पर भी ध्यान केन्द्रित करें। हमारे साहित्य में जो जनवादी तत्व हैं और प्रगतिशील भविष्य के लिए आवश्यक तत्व हैं—उनको सहेजकर रचनात्मक चित्र का पोषण करें। समकालीन वैचारिक संघर्ष में उनसे हमें असीम मदद मिलेगी।

संबंधों को विजातीय बना देने वाले जिस समय में हम जी रहे हैं और आततायी परकीयता झेल रहे हैं उससे जनता और साहित्य-संस्कृति की मुक्ति के लिए हमें लम्बा रास्ता तय करना है—यह रास्ता संघर्ष का रास्ता है, हमारे उदग्र अभियान का अंग है।

षष्ठिपूर्ति पर पठित, ‘परिवेश’, नवंबर, 1992-अप्रैल, 1993 से साभार

 

Published Books Of Surendra Chaudhary:

  •  Hindi Kahani : Prakriya Aur Path (Hindi), Radhakrishna Prakashan
  •  Phanishwar Nath Renu, Sahitya Academy
  • Itihas : Sanyaog Aur Sarthakata, Antika Prakashan
  • Hindi Kahani : Rachana Aur Paristhiti, Antika Prakashan
  • Sadharan Ki Pratigya : Andhere Se Sakshatkar, Antika Prakashan

 

रेणु: एक अंतर्कथा: सुरेन्द्र चौधरी

By सुरेन्द्र चौधरीphanishwar-nath-renu-2
रेणु की विचारधारा उनकी भावधारा से बनी थी। उन्हें विचारों से अपने भावजगत की संरचना करने की विवशता नहीं थी। यही कारण था कि वे अमूर्त से सैद्धान्तिक सवालों पर बहस नहीं करते थे। उनके विचारों का स्रोत कहीं बाहर-पुस्तकीय ज्ञान में न था…..राजनीतिक हस्तक्षेप में उनका विश्वास बढ़ रहा था। उनके मन में एक आशा पनप रही थी। और जब ऐसा कुछ हुआ, तो रेणु अचानक सक्रिय हो गए……मानसिक क्षमताओं के प्रशिक्षण की बात पर वे मुस्कुराते। वे विश्वास करते थे कि प्रशिक्षण के लिए ज़िंदगी स्वयं एक पाठशाला है। उनका विश्वास था कि राजनीतिक पृष्ठभूमि के कलात्मक उपयोग के लिए कार्यकर्त्ता की दृष्टि का विसर्जन जरूरी है। इससे राजनीतिक पृष्ठभूमि स्वयं अपनी गतियों को अधिक क्षमता से और अधिक स्पष्टता धारण करती है। लेखकीय प्रतिबद्धता इससे आहत नहीं होती।…रेणु जी प्रतिबद्धता को इतनी नाजुक चीज न समझते थे कि उसके लिए गुहार की जरूरत पड़ती रहे। वे उसे लेखक और आदमी की अविभाज्य नैतिकता मानते थे। पर साथ ही मैंने यह भी पाया था कि कतिपय राजनीतिक गतिविधियों से वे बेहद निराशा का अनुभव करते थे।…उनका विचार था कि भारत में किसी शाब्दिक ढंग की वामपंथी एकता के बदले हमें जनता के बीच की एकता के आधारों को पहचानना चाहिए….पर उन्हें अपने विश्वासों ने भी कम निराश नहीं किया। इसे मोहभंग न कहा जाय तो क्या कहा जाय? जिस उत्साह और सक्रियता के साथ वे सन ‘ 74  के आंदोलन में शरीक हुये थेऔर जिस प्रकार वे उससे प्रेरित हो रहे थे, उसे बाद की स्थितियों ने जिस हद तक झुठलाया, उससे गहरी मानसिक निराशा उत्पन्न होना स्वाभाविक था। रेणु का मोहभंग हुआ। भारतीय राजनीति में नेतापंथी तत्त्व की वास्तविकता क्रांति से बड़ी हो जाये, यह एक दुर्घटना थी। यह रेणु के जीवन का सकरुण इतिहास बन गया।

रेणु जानते थे कि एशियाई देशों में, कृषि-उत्पादन में बृद्धि और सामाजिक न्याय, दोनों को एक-दूसरे की प्रगति में योगदान करना है। पूरा ढांचा इस योग में बाधक है। इस ढांचे को बदले बगैर कोई प्रगति नहीं होगी। मगर जब तक ढांचा बादल नहीं जाता, तब तक गाँव सोया रहे इससे हास्यास्पद बात और क्या हो सकती है?…. लोकतन्त्र और सम्पूर्ण क्रांति के अनिवार्य और ऐतिहासिक सम्बन्धों को लेकर उनकी समझ स्पष्ट थी। यह समझ व्यावहारिक अधिक थी, सैद्धान्तिक कम।… वे इस तंत्र की मानसिक बनावट को ज्यादा अच्छी तरह समझते थी। लोकतन्त्र के बिना सामाजिक न्याय संभव नहीं है। मगर हुम जिस लोकतन्त्र में हैं वह एक प्रकार का राज्यतंत्र है। फिर भी वह पुराने तंत्र की अपेक्षा अधिक गतिशील है। इस तंत्र के दोनों पक्षों पर उनकी सावधान दृष्टि थी। यही कारण है कि इस तंत्र की निरंकुशता के विरुद्ध जब संघर्ष प्रारम्भ हुआ तो वे उसकी अगली कतार में आ गये-नेता की तरह नहीं, कार्यकर्त्ता की तरह।

वे जनता की शक्ति में विश्वास करते थे। नेतृत्व के संबंध में वे अवश्य इतने आश्वस्त न थे। यही कारण है कि सम्पूर्ण क्रान्ति के संदर्भ में वे तमाम तथाकथित क्रांतिकारी शक्तियों की एकता को लेकर कभी आश्वस्त न हो सके थे। मगर अपनी इस भावना को उनहोंने रणनीति के ऊपर कभी नहीं थोपा। वे जानते थे कि इससे आंदोलन में बाधाएँ आयेंगी और उसकी  भावनात्मक शक्ति क्षीण होगी। श्री जयप्रकाश के क्रांतिकारी व्यक्तित्व और  कर्तव्य में उनकी आस्था लगभग ध्रुव थी।….’परती-परिकथा ‘ में विस्तार से प्रस्तुत कुबेर सिंह और जितेंद्र के संबंध में वामपंथी एकता को लेकर उनकी टकराहटों की चर्चा कई दृष्टियों से महत्व की हो जाती है। कांग्रेस के राजनीतिक प्रभुत्व को तोड़े बिना यह संभव न होता। पर क्या इस एकाधिकार को केवल अकेली पार्टी-शक्ति पराजित कर सकती है? वामपंथी शक्तियों की एकता के पीछे यही समझ कार्य करती दिखाई पड़ती है। रेणु कमयुनिस्ट न थे, पर उनका समाजवाद इस अर्थ से ज्यादा नीति-निपुण और उदार था। फ़्रांस और इटली के अनुभवों से वामपंथी एकता की समझ पुष्ट होती थी। ।
उपर्युक्त उद्धृत अंश सुरेन्द्र चौधरी की पुस्तक’ फणीश्वर नाथ रेणु ‘ के अध्याय ‘ एक अंतर्कथा’ से 

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