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सीरिया को यहाँ से देखो: माने मकर्तच्यान

सीरिया के बारे में एक भारतीय के रूप में हमें कुछ नहीं पता है. हम भारतीय सचमुच के भारतीय रह नहीं गए हैं. जिनके कारण हमें भारतीय तमगे से नवाजा जाता है वह एलिट भारतीयता है. जिसकी जडें इंग्लैंड,अमेरिका और यूरोप से जुड़ी हैं. यही जडें भारतीय मानस का विश्वबोध विकसित करने में सबसे ज्यादा रोल अदा करती हैं. यह अकारण नहीं हैं कि दक्षिणपंथी ताकतों से लेकर वामपंथी  तक सीरिया के बारे में एकमय राय रखती हैं. सीरिया को यहाँ से देखो मतलब पूरब के नजरिये से देखने का मतलब क्या होता है, इस आर्टिकल से समझा जा सकता है.

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Bulent Kilic/Agence France-Presse — Getty Images

सीरिया में शतरंज

By माने मकर्तच्यान

सीरिया

यह नाम आज दुनिया के कोने-कोने में चर्चा में है. वर्षों से राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय  मीडिया की मुख्य ख़बरों में सीरिया का नाम उछलता रहा है. मध्य एशिया के इस मुल्क की ज़मीन किन शक्तियों के बीच संघर्ष का केंद्र बनी है और सीरिया में हो रही घटनाएँ क्यों विश्व की राजनीति का भविष्य तय करने वाली हैं – इस पेचीदगी को समझने का प्रयास करते हैं.

नक्शे पर सीरिया को देखें तो पाते हैं कि यह देश पूर्वी गोलार्द्ध पर और विभिन्न संस्कृतियों के केंद्र में स्थित है. उत्तर में आर्मीनियाई तोरोस पर्वतमाला ने मध्य पूर्वी के इस देश को माइनर एशिया से पृथक कर दिया है. पश्चिम में भूमध्य सागर तटीय क्षेत्र, पूर्व में मेसोपोटामिया और दक्षिण में अरब रेगिस्तान से यह मुल्क घिरा हुआ है. राजनीतिक मानचित्र के अनुसार पश्चिम में लेबनान, उत्तर में तुर्की, पूर्व में इराक, दक्षिण में जॉर्डन और पश्चिम दक्षिण में इजरायल से उसकी सीमाएं बांधते हैं. आज का सीरियाई अरब गणतंत्र मात्र 70 साल पुराना है लेकिन सीरियाई सभ्यता का आरंभ लगभग 6000 ई.पू. माना जाता है. इसके प्रमाण वहां विश्व प्राचीनतम शहरों जैसे एब्ला, मारी, उगारित आदि में देखने को मिलते हैं. इसकी राजधानी दमिश्क पृथ्वी पर निरंतरता में बसे हुए सबसे पुराने नगरों में से एक है. इस शहर का प्रारंभिक उल्लेख 15वीं शताब्दी ई.पू. मिस्र के फ़िरौन तुतमोस तृतीय के भौगोलिक नक्शे में पाया जाता है. पहाड़ों से घिरे तथा जीवन के लिए आवश्यक जल स्रोत बराडा नदी के नज़दीक होने के कारण इसकी अवस्थिति सामरिक और नागरिक दोनों ही दृष्टियों से महत्वपूर्ण है. देश का व्यापारिक महत्व रखनेवाला दूसरा शहर अल्लेपो है जो कि उतना ही प्राचीन है.

हज़ारों सालों से व्यापारिक, आर्थिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक और सामरिक चौराहे पर स्थित यह भूखंड शुरु से ही विश्व की विभिन्न शक्तियों से प्रभावित और नियंत्रित होता रहा है. यहीं से विश्व के सभी छोटे-बड़े विजेता गुज़रे हैं. अकाडिनी-सुमेरों से लेकर हित्तियों, मिस्र के फ़िरौन, अश्शूर और आक्मेनिड फ़ारसियों तक यहां आए. सिकंदर के बाद 87 ई.पू. में आर्मीनियाई राजा तिग्रान के साम्राज्य में सीरिया का मिल जाना और आगे 64 ई.पू में रोमन साम्राज्य का इस पर कब्ज़ा हो जाना उल्लेखनीय घटनाएं हैं. इसके उपरांत समय समय पर सेल्जुक तुर्क, क्रूसेडर्स, मंगोल, मिस्र के मामलुक अन्य जातियां यहां तबाही मचाकर गुज़र चुकी हैं.

सीरिया 16वीं सदी से अगली 4 सदियों तक उस्मान तुर्कों के अधीन रहा. 1918 में प्रथम विश्व युद्ध में उस्मानी साम्राज्य की हार के बाद सीरिया एक स्वतंत्र राज्य बनने की उम्मीद में था कि फ्रांस व् ब्रिटेन ने मध्यपूर्व का आपस में बंटवारा कर लिया. सीरिया फ्रांस के नियंत्रण में आ गया. सन् 1920 में हाशमी परिवार के फ़ैज़ल प्रथम के अंतर्गत सीरिया कुछ महीनों के लिए स्वतंत्र राज्य बनकर उभरा. 1936 के सितंबर में सीरिया और फ्रांस के बीच सीरिया की स्वतंत्रता को लेकर एक मसविदे पर दस्तख़त हुए और हाशिम अल-अतास्सी को सीरियाई आधुनिक गणराज्य के प्रथम राष्ट्रपति के रूप में चयनित करने की योजना बनी. हालांकि यह संधि अस्तित्व में कभी नहीं आई क्योंकि फ्रेंच विधानमंडल इस करार की पुष्टि से मुकर गया. सीरियाई राष्ट्रवादियों और अंग्रेज़ों के सतत दबाव में अप्रैल,1946 में फ्रांस को अपनी सेना सीरिया से हटा लेने पर मजबूर होना पड़ा और अंततः उन्होंने सीरियन रिपब्लिकन सरकार के हाथ में देश की सत्ता सौंप दी.

वर्तमान राष्ट्रपति बशर अल-असद के पिता हाफ़िज अल-असद का जन्म निर्धन परिवार में हुआ था. विद्यार्थी रहते हुए ही वे बाथ पार्टी से जुड़ गए थे. आगे चलकर वे सीरियन एयर फोर्स में लेफ़्टिनेंट बन गए. 1963 के सीरिया में तख़्तापलट के उपरांत बाथिस्ट सेना का पुरे सीरिया पर नियंत्रण हो गया और उससे जुड़े हाफ़िज अल-असद सीरियन एयर फोर्स के कमांडर नियुक्त कर दिए गए. 1966 में एक और तख़्तापलट के उपरांत वे रक्षा मंत्री बना दिए गए और अपने देश की राजनीति में बहुत लोकोप्रिय होते चले गए. यही वजह थी कि जब उन्होंने समस्त सीरियन सेना के अध्यक्ष सालाह जदीद को निकाल बाहर किया तो कोई हाय-तौबा नहीं मची. 1970 में वे सीरिया के प्रधानमंत्री बन गए और 71 में राष्ट्रपति पद के लिए चुन लिए गए. उसी अप्रैल में मिस्र के अनवर सादात, लीबिया के मुअम्मर गद्दाफ़ी के साथ हाफ़िज असद ने ‘फेडरेशन ऑफ अरब रिपब्लिक्स’ नाम का संघ बनाने की चेष्टा की. यह समझौता विश्व राजनीति में एक बहुत ही मजबूत गठबंधन का रूप ले सकता था. इस विचार का इन तीनों मुल्कों की जनता में जबरदस्त स्वागत भी हुआ किन्तु यह संघ मात्र पांच वर्षों तक ही चल पाया. और इन तीनों मुल्कों में अनेक मुद्दों पर कभी भी पूरी तरह सहमती नहीं बन पाई. 1982 में हम्मा शहर की घेरेबंदी और विरोधी मुस्लिम ब्रडरहुड के उदय के बीच हम्मा के चालीस हज़ार नागरिकों की हत्या का आरोप भी हाफ़िज असद पर लगा. 1983 के नवंबर में हाफ़िज को हृदयघात हुआ. उसी समय उसके भाई रिफ़ात अल-असद जो तब सीरियन सेना के प्रमुख हुआ करते थे, ने हाफ़िज का तख़्तापलट करने की नाकाम कोशिश की. 1994 में हाफ़िज के सबसे बड़े बेटे की कार दुर्घटना में हुई मौत के उपरांत हाफ़िज अधिक बीमार रहने लगे. इन्हीं परिस्थितियों में 1994 में हाफ़िज के छोटे बेटे बशर अल-असद को सीरिया की राजनीति में लाया गया. जून 2000 में हाफ़िज असद की मृत्यु हो गई किन्तु उसके पहले ही उन्होंने सेना एवं उच्च पदाधिकारियों का समर्थन बशर के पक्ष में सुरक्षित कर लिया था. सत्तांतरण निर्विघ्न रूप से हो गया. असद ने पहले बाथ पार्टी का नेतृत्व संभाला और फिर सीरिया के राष्ट्रपति निर्वाचित कर लिए गए. लेबनान के 2005 के ‘सीडर रिवोल्यूशन’ के बाद वहां की सीरियाई समर्थन वाली सरकार का पतन हो गया और सीरियन सेना को वहां से हटना पड़ा. इससे बशर की साख़ को काफ़ी बट्टा लगा किन्तु फिर भी वह 2007 में दुबारा राष्ट्रपति चुन लिए गए.

अल्पसंख्यक अलावित (शिया मुसलमानों की एक धारा) के प्रभुत्व वाली इस सरकार के अंतर्गत सीरिया आदर्श मुल्क नहीं है, ख़ासकर नागरिक-मानवाधिकारों और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के मामलों में. बावजूद इसके यह अरब दुनिया में एक मात्र बचा हुआ स्वतंत्र धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र है. तुर्की और सऊदी अरब के मानवाधिकार-हनन के सामने सीरिया अभी भी शरीफ़ दिखता है. इसके लोकप्रिय, साम्राज्यवाद विरोधी और धर्मनिरपेक्ष सोच का आधार वहां की बाथ पार्टी (सीरियाई सरकार) की नीतियों से प्रेरित है, जिसमें मुस्लिम, ईसाई और द्रूज तीनों ही धर्मों के लोग शामिल हैं. मिस्र और ट्यूनीशिया के विपरीत, सीरिया में राष्ट्रपति बशर अल-असद को बड़ा जनसमर्थन प्राप्त है.

हालांकि हाल के वर्षों में बढ़ती बेरोज़गारी, सामाजिक स्तर और स्थितियों में गिरावट आई है और यह अकारण नहीं है कि वहां बड़े पैमाने पर विरोध प्रकट होते रहे हैं. विशेष रूप से 2006 में अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष के निर्देश पर मितव्ययिता, वेतन वृद्धि पर रोक, वित्तीय प्रणाली की नियंत्रण मुक्ति, व्यापारिक कानूनों में ‘सुधार’ और निजीकरण जैसी औषधियां पिला देने के उपरांत.

2010 में ह्यूमन राइट्स वॉच के अनुसार मानवाधिकारों के मामलों में सीरिया ‘दुनिया के सबसे ख़राब देशों में था’. सीरियाई अधिकारियों पर लोकतंत्र का ध्वंस करने, मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को गिरफ़्तार करने, वेबसाइटों पर रोक लगाने, ब्लॉगर्स को हिरासत में लेने और यात्रा पर प्रतिबंध लगाने जैसे अनेक आरोप लगाये गए. सीरिया के संविधान में लैंगिक समानता का अधिकार है किन्तु आलोचकों का कहना है कि व्यक्तिगत कानून और दंडसंहिता स्त्रियों के अधिकारों को सुरक्षित नहीं रख पाते. यही नहीं, वह पुरुषवादी ’प्रतिष्ठाजन्य हत्याओं’ के प्रति भी नर्म है।

2010 में ही मध्य-पश्चिमी एशिया एवं उत्तरी अफ्रीका में श्रृखंलाबद्ध विरोध-प्रदर्शन का दौर आरंभ हुआ जिसे अरब स्प्रिंग या अरब जागृति नाम से जाना जाता है. ‘अरब स्प्रिंग’ क्रान्ति ने अरब जगत के साथ-साथ समूचे विश्व को हिलाकर रख दिया था. इसकी शुरुआत ट्यूनीशिया में 17 दिसंबर,2010 को मोहम्मद बउजिजी- एक फेरीवाले के आत्मदाह से हुई थी. इस क्रांति की लपटें अल्जीरिया, मिस्र, जॉर्डन, यमन तथा अरब लीग व् इसके आसपास के क्षेत्रों में फैल गई. सीरिया भी उससे अछुता न रहा.

सीरियाई गृह युद्ध

सीरियाई गृहयुद्ध जॉर्डन की सीमा पर सटे एक छोटे से शहर दारा से शुरू हुआ. 17 मार्च,2011 को बशर अल-असद के त्यागपत्र की मांग को लेकर लोग सड़कों पर उतर आए. सीरिया का यह तथाकथित ‘शांतिपूर्ण’ विरोध-प्रदर्शन सीरियन सेना द्वारा बलपूर्वक दबा दिया गया. उसी जुलाई में सेना से टूटे हुए समूहों ने ‘मुक्त सीरियन सना’ के गठन की घोषणा की.

9 नवंबर,2011 तक संयुक्त राष्ट्र के मुताबिक राष्ट्रपति बशर अल-असद के ख़िलाफ़ विद्रोह के दौरान 3500 से अधिक मौतें हुई, जिसमें से 250 से अधिक सिर्फ़ 2 साल तक के बच्चे थे. कहा जाता है कि अनेक अल्पव्यस्क लड़कों के साथ सुरक्षाबल के अधिकारियों ने सामूहिक बलात्कार भी किया. विरोध की लपटें तेजी से चारों ओर फैल गईं.

अगस्त 2013 में असद सरकार पर अपने नागरिकों के ख़िलाफ़ रासायनिक हथियार इस्तेमाल करने का आरोप लगा. जून में ही व्हाइट होउस ने घोषित किया था कि अमेरिका को इस बात का विश्वास है कि असद ने राष्ट्रपति पद की सीमाओं का उल्लंघन करते हुए अप्रैल में अपनी निरीह जनता पर रासायनिक हथियारों का प्रयोग किया है. हालांकि इस बात का कोई पुख़्ता सबूत वे अब तक नहीं दे पाए हैं. अमेरिकी विदेश सचिव जॉन केरी ने दावा किया कि उनकी यह जानकारी अखंडनीय है. यह भी कहा “दुनिया किसी मुगालते में न रहे, और उन तमाम लोगों पर हर हाल में जिम्मेदारी तय की जाएगी जिन लोगों ने विश्व की सबसे निरीह जनता पर जघन्यतम हथियारों का इस्तेमाल किया है कि इस दुनिया में कुछ भी और नहीं है जो इससे अधिक गंभीर हो!”

बशर अल-असद के इस संभावित अमानवीय कृत्य पर किसी भी तरह की नरमी न बरतते हुए भी यह कहना आवश्यक है कि सीरिया पर 12,192, इराक पर 12,095, अफ़गानिस्तान पर 1,337 बम गिराने वाले और इराक में यूनाइटेड नेशनस असिस्टेंस मिशन फॉर इराक की रिपोर्ट के मुताबिक 2016 में अकेले इराक में 19,266 नागरिकों को बमबारी से मार देने वाले ‘शांति दूत’ और नोबल पुरस्कार विजेता बराक ओबामा और उनके प्रशासन के मुंह से यह उक्ति अशोभनीय लगती है.

बहरहाल, अमेरिका में इज़रायल के तत्कालीन राजदूत माइकल ओरेन ने वॉल स्ट्रीट जर्नल में तब साहित्यिक अंदाज़ में लिखा था कि “असद ने अपनी स्वतंत्रता मांगती जनता पर जो हिंसक हमला किया है वह इज़रायल के इस भय की पुष्टि करता है कि सीरिया के जिस शैतान को हम जान गए हैं वह उस शैतान से भी बदतर है जिसे हम अब तक नहीं जानते”. मई,2011 तक इज़रायल के शीर्ष अधिकारियों- प्रधानमंत्री, रक्षा मंत्री, विदेश मंत्री और राष्ट्रपति सबने सार्वजनिक रूप से घोषित कर दिया था कि वे असद का पतन देखने को आतुर थे. यह उन्होंने ओबामा की ऐसी ही घोषणा के तीन माह पूर्व कर लिया था. तब से सीरिया फिर एक बड़ी त्रासदी झेल रहा है.

किसकी किससे है लड़ाई ?

मुख्य रूप से सीरिया में चार भिन्न संगठनों के बीच युद्ध चला है. सीरियाई सरकार जिसमें अलावितों का बहुमत है. विरोधी दलों जिसमें सुन्नी मुसलमानों का बहुमत है, आइ.एस.आइ.एल या दाएश जो भी कह लें जो सलाफ़ी और वहाबी पंथ को मानने वाले सुन्नी हैं और कुरदीश रोजावा जो आम तौर पर शिया हैं. राष्ट्रपति असद के नियंत्रण में मुख्य रूप से सीरिया का पश्चिमी भाग और तटीय क्षेत्र है. इनका युद्ध सीधे तौर पर आइ.एस.आइ.एल और उन विपक्षी दलों के साथ है, जिसके अनेक घटकों ने मिलकर खुद को मुक्त सीरियन सेना की संज्ञा दे रखी थी. इस सेना का 2012 में एक दूसरे से मतभेद रखते अनेक खण्डों में विभाजन हो गया जिसका एक हिस्सा अतिवादी इस्लामिक संगठनों जैसे कि अल नुसरा/अल कायदा के साथ हो लिया और अन्य हिस्से बिना कट्टर जेहादी बनें असद के ख़िलाफ़ लड़ते रहे.

इस्लामिक स्टेट ऑफ इराक (आइ.एस.आइ.) के नेता अबू बक्र अल-बग़दादी ने अप्रैल 2013 में सीरिया में अल कायदा समर्थित आतंकवादी समूह में जो कि खुद को जबत अल नुसरा या नुसरा फ्रंट कहते हैं, का विलय किया और खुद को आइ.एस.आइ. के बजाय आइ.एस.आइ.एल (इस्लामिक स्टेट इन इराक एंड द लेवांत) या आइसिस कहने की घोषणा कर दी. हालांकि अल नुसरा फ्रंट के नेता अबू मुहम्मद अल-जव्लानी ने विलय के दावे का खंडन किया था. वैसे एक ही अतिवादी धारा के इन गुटों में विलय होना या न होना बाकियों के लिए कोई ख़ास मायने नहीं रखता है.

इस्लामी राज्य आज विश्व शांति के लिए ख़तरा माना जाता है.आइसिस तीन साल में इराक के बाद अपने आतंकी शिंकजे को सीरिया में फैला लिए और 29 जून,2014 को इस्लामी ख़लीफ़ाई साम्राज्य के निर्माण की घोषणा कर दी तथा विश्व के अनुमानित 1.5 अरब मुसलमानों को भी इस साम्राज्य का सदस्य बता दिया. आइसिस के ख़िलाफ़ कोई एक संयुक्त मोर्चा नहीं लड़ रहा है. रूसी वायु सेना समर्थित सीरियन सरकारी सेना, अमेरिका के नेतृत्व में पाश्चात्य गठबंधन, साथ ही कुर्द, लेबनान, इराक आर इरान के शियाई ताकतें आइसिस नामक भयानक बीमारी के ख़िलाफ़ लड़ रहे हैं. हालांकि पश्चिमी गठबंधन की यह नूरा कुश्ती है या सचमुच की लड़ाई यह भविष्य ही बतायेगा.

गौरतलब है कि जहां आइसिस का प्रभुत्व फैला वहां आतंक मचाना और सैकड़ों हज़ारों आम नागरिकों का कत्ल करना तो सामान्य बात थी. असंख्य युद्ध अपराध तथा विशेष रूप से अल्पसंख्यक येज़ीदियों और कुर्दों का नरसंहार भी किया गया. जनवरी, 2014 से लेकर 25 अप्रैल 2015 तक सिर्फ़ इराक में 28,34,676 लोग विस्थापित कर दिए गए जिसमें बच्चों की संख्या 13 लाख थी. इस्लामिक स्टेट के धर्म-पिता और उनकी ही तरह सलाफ़ी धर्म को मानने वाले सऊदी अरब का मानवाधिकारों का ट्रैक रिकॉर्ड भी घिनौना रहा है किन्तु अमेरिका जैसे उनके मित्र राष्ट्रों को उसपर किसी भी प्रकार की आपत्ति नहीं होती.

बहरहाल सीरिया का उत्तरी भाग रोजावा के नियंत्रण में है, जिसकी कमान कुर्दों की जनतांत्रिक संघ ईकाई वाई.पी.जी.के हाथ में है. गृहयुद्ध के दौरान असद सरकार ने अपनी सेना को रोजावा से हटा लिया था तबसे वहां आइसिस व विद्रोहियों के ख़िलाफ़ स्थानीय कुर्द लड़ाकुओं का युद्ध ज़ारी है. आज के दिन रोजावा और असद सरकार के बीच संबंध एक दूसरे के अस्तित्व के लिए ख़तरनाक नहीं रह गए हैं.

सीरिया और उसके विशाल पड़ोसी राज्य तुर्की के बीच संबंध तनावपूर्ण रहे हैं. इसका मुख्य कारण सीरिया की ओर से कुर्दिश स्वायत्त राज्य की स्थापना का समर्थन और तुर्की बांधों की समस्या है, जो सीरिया के लिए पानी की आपूर्ति में बाधा पहुंचाते हैं. इस गृहयुद्ध के दौरान तुर्की ने सीरियाई सरकार के विद्रोही दलों तथा आइसिस का भी बड़े पैमाने पर समर्थन किया और रोजावा की स्वायत्तता के खि़लाफ़ रहा.

पर इन सबसे बढ़कर बाहरी ताकतों का भिन्न स्तरों पर हस्तक्षेप बेहद महत्वपूर्ण है. सीरिया को लेकर संयुक्त राष्ट्र के वीटो शक्तियों के बीच दो समूहों में बंटवारा हो गया, एक पश्चिमी-अमेरिका के नेतृत्व में ब्रिटेन, फ्रांस, यमन, संयुक्त अरब अमीरात, कतर और 2016 के दिसंबर तक तुर्की सहित का गठबंधन और दूसरा पूर्वी -रूस, सीरिया, चीन, इरान का गठबंधन.

अमेरिका के नेतृत्व में पश्चिमी गठबंधन असद की सरकार को गिराने हेतु आइसिस व विद्रोहियों या विपक्षी दलों का समर्थन और प्रशिक्षण प्रत्यक्ष-परोक्ष रूप से करता रहा जबकि रूस और चीन युद्ध में असद सरकार के समर्थन में खड़े रहे.

15-16 नवम्बर,2015 को जी20 समिट में पुतिन के बयान ने सीरिया के इस गृह युद्ध की शक्ल ही बदल डाली. रूस के राष्ट्रपति ने तुर्की और अमेरिका के गठबंधन पर प्रहार करते हुए कहा कि आइसिस की आमदनी तेल और पट्रोलियम उत्पादों के अवैध व्यापार से होती है. प्रतिदिन तुर्की से इराक तक अंतहीन ट्रकों की शृंखला का खुलासा करने वाले उपग्रह चित्रों के माध्यम से अपनी बात की पुख़्ता करते हुए पुतिन ने कहा कि आइसिस की भिन्न-भिन्न इकाइयों का वित्तपोषण करने वाली ताकतों में 40 देश और उसी जी20 के कुछ सदस्य भी शामिल हैं. साथ ही यह भी कहा कि आइसिस को जड़ से तब तक ख़त्म करने में सफ़ल नहीं होंगे जब तक उनके आर्थिक स्रोतों को काट न दिया जाएं.

30 सितम्बर,2015 को सीरिया की सरकार के अनुरोध पर रूसी वायु सेना सीरिया में घुस गई. सीरियाइ सेना रूस की मदद से न सिर्फ आइसिस के विस्तार को रोकने में सफ़ल हुई, बल्कि उन्हें भारी नुक्सान भी पहुँचाया. तब से अब तक आइसिस ने 4600 वर्गमील भू-भाग और अपने 35,000 लड़ाकुओं को खो दिया है. सीरियाई सेना स्थानीय नागरिक सेनाओं के साथ मिलकर 586 शहरों व् गांवों को आइसिस से मुक्त करा चुकी है.

अगस्त, 2014 में ओबामा की आइसिस के ख़िलाफ़ बमबारी की घोषणा से उनकी विश्व भर में प्रशंसा हुई किन्तु सवाल यह उठता है आइसिस से चल रही इस लड़ाई में अमेरिका तीन सालों से कर क्या रहा था? अमेरिका का खुफिया तंत्र और सैन्य तंत्र अपने जानते दोहरी चाल खेल रहे है. एक तरफ तो आइसिस को हथियारों, प्रशिक्षण और सामरिक साधनों से लैस कर रहे हैं और दूसरी तरफ़ विद्रोही दलों को सीरियन आर्मी तथा आइसिस से लड़ने का प्रशिक्षण भी दे रहे हैं. अमेरिका असद को हटाना चाहता है और आइसिस भी यही चाहता है. चाणक्य की उक्ति ‘शत्रु का शत्रु मित्र’ के अनुसार असद को गिराने में अमेरिका और आइसिस मित्र हो जाते हैं. आइसिस से कोई प्यार न रखते हुए भी चूँकि असद को गिराना अमेरिका की पहली प्राथमिकता है तो आइसिस के साथ वन-नाईट स्टैंड की तर्ज पर हमबिस्तर होने में उन्हें कोई गुरेज नहीं होता. ख़ैर, दो नावों पर सवार होने का नतीजा क्या हो सकता है यह बार-बार भुगतने के बावजूद अमेरिका सीखने को तैयार नहीं दिखता. यह मानना भी संभव नहीं है कि अमेरिकी कांग्रेस और पेंटागन में समन्वय टूट चूका है और दोनों मुक्त रूप से अलग अलग नीतियों पर चल रहे हैं.

सीरियाई युद्ध कैसे उभरा?

सीरियाई युद्ध को समझने के लिए उसकी शुरुआत कहां से हुई और कैसे हुई समझना आवश्यक है. विश्वभर में लोगों को प्राप्त जानकारियां मुख्यधारा के माध्यमों द्वारा प्रचारित ख़बरों के ऊपर टिकी हुई है, जबकि अनेक सूत्रों से यह पता चलता है कि दारा से शुरू हुआ सीरियाई गृहयुद्ध मोसाद (इज़रायल खुफ़िया एजेंसी) और पश्चिमी शक्तियों द्वारा इस्लामी आतंकवादियों को स्थापित करने की एक सोची समझी योजना थी.

पहला महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि पश्चिमी मीडिया द्वारा सामने लाई गई यह ख़बर कि दारा आन्दोलनकारियों पर सीरियाई पुलिस और सशस्त्र बलों ने अंधाधुंध फायरिंग की और निहत्थे ’लोकतंत्र समर्थक’ प्रदर्शनकारियों की हत्याएं की और यह सही भी था किन्तु जिस बात का उल्लेख करना पश्चिमी मीडिया सुविधानुसार भूल गया, वह यह था कि प्रदर्शनकारियों में आतंकवादी निशानेबाज़ और हथियारबंद योद्धा भी थे, जो सोची-समझी रणनीति के तहत सुरक्षा बलों और प्रदर्शनकारियों दोनों पर गोलियां बरसा रहे थे. यह इस बात से भी साबित होता है कि दारा में मरने वालों में पुलिसकर्मियों की संख्या प्रदर्शनकारियों की तुलना में अधिक थी. और यह ख़बर कोई और नहीं, इज़रायल नेशनल न्यूज़ रिपोर्ट ने प्रसारित की थी, जो कि किसी भी हालत में दमिश्क के पक्ष में प्रचार नहीं करते. इससे यह स्पष्ट होता है कि दारा के आन्दोलन में पुलिसबल शुरुआत में बुरी तरह सशत्र जिहादियों द्वारा घिर गया था, न कि शांत आंदोलनकारियों पर गोलियां बरसा रहा था.

दूसरा महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि दारा के आन्दोलन में बाहरी शक्तियों की संलिप्तता का अंदाजा इस बात से भी लगता है कि यह सारा आन्दोलन दमिश्क या अलेप्पो में, जो कि प्रतिपक्ष के गढ़ हुआ करते थे, से न होकर जॉर्डन की सीमा पर स्थित दारा में हुआ. इन्टरनेट पर उपलब्ध अनेक औपचारिक सूत्रों के अनुसार (अल जजीरा और सी.एन.एन समेत) सीरियाई रेबेल्स को सीआईए द्वारा बड़े पैमाने हथियार उपलब्ध कराए गए थे और यह वर्षों तक जॉर्डन व् तुर्की की सीमा से होता रहा.

 ‘प्रोजेक्ट फॉर दी इन्वेस्टीगेशन ऑफ करप्शन एंड आर्गनाइज़्ड क्राइम’ (ओ.सी.सी.आर.पी) के जुलाई,2016 की रिपोर्ट के अनुसार युक्रेन, बोस्निया, बल्गेरिया, क्रोएशिया, चेक गणराज्य, मोंटेनेग्रो, स्लोवाकिया, सर्बिया और रोमानिया जैसे यूरोपीय देशों ने सैकड़ों टन की संख्या में राइफलों, मोर्टारों, रॉकेट लंचेर्स, टैंक रोधी हथियारों तथा भारी मशीनगनों को जिसकी कुल कीमत 12 लाख यूरो भी (वास्तविक आंकडें भविष्य बताएगा), सऊदी अरब और जॉर्डन व् तुर्की के जरिए सीरियाई लड़ाकुओं और आतंकवादियों के हाथ में थमा दिया. यद्यपि यू.एस. का बराबर कहना यह रहा है कि वे सिर्फ़ सीरियन लड़ाकुओं को चुन चुनकर प्रशिक्षित करते थे, आइसिस को नहीं. पर तथ्यों का कुछ और ही कहना है.

प्रसिद्ध मानवाधिकार समूह एमनेस्टी इंटरनेशनल द्वारा प्रकाशित 44 पृष्ठ के रिपोर्ट के मुताबिक आइसिस के पास अमेरिका-निर्मित भारी शस्त्रागार पाया गया था (जिसकी घोषणा रूस के रक्षा अधिकारियों ने भी बारंबार की है), जो कि इराकी सेना व उन्हीं सीरियन लड़ाकुओं से आइसिस को प्राप्त हुआ था. आइसिस के कब्ज़े में पाए गए हथियारों व गोला-बारूद का ज़खीरा ‘अंततः इस बात को दर्शाता है कि इराक में दशकों तक ग़ैर ज़िम्मेदारी से हथियार सप्लाई किए गए और अमेरिका के नेतृत्व में अधिकृत प्रशासन हथियारों के वितरण तथा स्टॉक को सुरक्षित रूप से प्रबंधन करने में नाकाम रहा.” अमेरिका और उसके गठबंधन में अन्य आपूर्तिकर्ता देशों की सोची-समझी साज़िश के तहत लापरवाही से, गै़र ज़िम्मेदारी या ‘जान बूझकर’ आइसिस के आतंकवादियों को हथियार पकड़ा दिए, यह बहस का मुद्दा है.

इज़रायली खुफिया सूत्रों (देखें देबका, 14अगस्त, 2011) तक ने इसको छिपाया नहीं हैः “शुरुआत से ही नाटो और तुर्की के हाई कमान द्वारा इस्लामी ‘स्वतंत्रता सेनानियों’ को  प्रशिक्षित और हथियारबंद किया गया. अफगान-सोवियत युद्ध से बचे हज़ारों मुजाहिदीनों को सी.आई.ए के इस धर्मयुद्ध में नियुक्त किया गया. इस पूरी योजना को सऊदी अरब और कतर का सक्रिय समर्थन प्राप्त था. आगे चलकर यह तथाकथित इस्लामी स्वतंत्रता सेनानी अल-नुसरा और आइसिस में समन्वित हो गए.” अपनी नाक बचाने के लिए अमेरिका अब चाहे स्वतंत्रता सेनानी जैसी पावन-सी संज्ञाएँ गढ़ता रहे, पर तथ्य यह है कि अमेरिका अपनी समस्त मूर्खताओं समेत अल-नुसरा और आइसिस का पोषण कर रहा था.

पुरस्कृत लेखक मिख़ाइल चोसुदोव्स्की, जो कि ओटावा विश्वविद्यालय में अर्थशास्त्र के प्रोफे़सर रह चुके हैं, और वर्तमान में वैश्वीकरण संबंधी अनुसंधान केंद्र के निदेशक हैं, के अनुसार सीरिया में विरोध प्रदर्शन का ढांचा लीबिया में ही बनाया गया था. “पूर्वी लीबिया में ‘लीबिया इस्लामिक लड़ाकू समूहों’ को ब्रिटिश एमआइ6 और सी.आई.ए का समर्थन पहले से ही प्राप्त था. सीरिया में मीडिया के झूठ और जालसाजी से निर्मित विरोध प्रदर्शन का उद्देश्य धर्मनिरपेक्ष मुल्क को कमज़ोर करना था और मानवोचित उद्देश्य के नाम पर अपनी ग़ैर कानूनी दखलंदाज़ी को ‘संयुक्त राष्ट्र’ से हरी झंडी दिलवाना था”.

तीसरा उल्लेखनीय तथ्य यह है कि जब ओबामा से पूछा गया था कि आइसिस सशक्त बनता जा रहा है तो ओबामा ने उत्तर इस विश्वास के साथ दिया था कि मानो आइसिस पूरी तरह उनके ही नियंत्रण में हो. “मुझे नहीं लगता कि वे कुछ अधिक ताकतवर हो रहे हैं. शुरू से ही हमारा उद्देश्य उन पर नियंत्रण रखना रहा है और हम इसमें सफ़ल रहे हैं….इराक में उनकी बढ़त नहीं हुई है. सीरिया में भी वे बस आयेंगे (असद का अंत कर?) और चले जाएंगे.”

एक तरफ़ अमेरिका का राष्ट्रपति कहता है कि उन्हें नहीं लगता कि आइसिस की बढ़त हुई है और दूसरी तरफ़ उसी अमेरिका का विदेश सचिव स्वीकार करता है कि आइसिस की वृद्धि हुई थी पर उसे रोकने की योजना भी न थी. विकिलीक्स ने हाल ही में संयुक्त राष्ट्र महासभा में सितम्बर,2016 को हुई गुप्त बैठक की रिकॉर्डिंग ज़ारी कर दी है. इसमें अचंभित कर देने वाले तथ्य उभरकर सामने आए हैं. बैठक में अमेरिका के विदेश सचिव जॉन केरी ने सीरियाई सरकार के विद्रोही प्रतिनिधियों को कहा कि उन्हें इस बात का ज़रा भी अंदाज़ा नहीं था कि असद अमेरिका के सामने घुटने टेकने के बजाय रूस के पास चला जाएगा- ‘हम जानते थे कि आइसिस की बढ़त हो रही है…हम देख रहे थे…हमने देखा कि यह बड़ी शक्ति के रूप में उभर रहा है और हमें लगा कि असद पर इससे बेतरह दबाव बनेगा और वह हमसे हमारी शर्तों पर समझौता करने पर मज़बूर हो जाएगा लेकिन ऐसा करने के बजाय उसने पुतिन से समर्थन मांग लिया…हमने सीरिया में बल प्रयोग का तर्क खो दिया’.

यदि अमेरिका को सच में आइसिस के पांव कांटने होते तो जून, 2014 में सीरिया से इराक तक ख़ाली रेगिस्तान के बीच से गुजरने वाले आइसिस के सिलसिलेवार टोयोटा ट्रकों के काफ़िलों को बमबारी से उड़ा न डालते? सीरिया के रेगिस्तान जैसा खुला क्षेत्र तो अमेरिका के प्रतिष्ठित जेट लड़ाकू विमानों (एफ़15, एफ22 रेप्टर, एफ6) के लिए सैन्य दृष्टि से गुड़ियों का खेल होता. यही नहीं, 2015 के अक्टूबर में रूसी और अमेरिकी वायु सेनाओं के बीच सीरिया में आपातकालीन स्थिति के दौरान उड़ान पथों को लेकर मार्गदर्शित करने, बमबारी और अन्य गतिविधियों पर हुए समझौते के तहत रूसी वायु सेना को सटीक जानकारी देने के बजाय पश्चिमी गठबंधन की ओर से भ्रमित तथा दुर्व्यवहार करने के अनेक आरोप लगे हैं. इनमें एक आरोप यह था कि अमेरिकी विमान अपनी उड़ान के स्तर से लगभग एक किलोमीटर (0.62 मील) नीचे जाकर रुसी एस.यू 35 लड़ाकू जेट के मार्ग में बाधा पहुंचाते थे. अमेरिकी सैन्य अधिकारियों ने इस पर रुसी अधिकारियों से माफ़ी भी मांगी थी. इससे भी भयानक घटना 17सितंबर को घटी जब देर एज़-ज़ोर में पश्चिमी गठबंधन द्वारा रूसी विमानों को लक्ष्य से गुमराह कर दिए जाने के बाद किए गए उनके हमले में 62 सीरियन सैनिक मारे गए और 100 घायल हुए. हमले से 2 महीने बाद पेंटागन ने लिखित रूप में स्वीकारा कि घटना “खेदजनक त्रुटि” थी. अमेरिका की अत्याधुनिक व् श्रेष्ठतम सैन्य मशीनरी की ऐसी बेहूदा हरकतों पर वहां के रक्षा सचिव को शर्म से डूब मरना चाहिए था.

सीरियाई गृह युद्ध के कारणों में से सबसे मज़बूत और महत्वपूर्ण कयास यह है कि यह सारा खेल तब शुरू हुआ था जब सन् 2000 में अमेरिका समर्थक कतर ने सऊदी अरब, जॉर्डन, सीरिया और तुर्की के जरिए यूरोप तक प्राकृतिक गैस पहुँचाने वाले दस बिलियन डॉलर, 1500 कि.मी. पाइपलाइन के निर्माण करने की घोषणा की. वहां ईरान की भी पाइपलाइन के निर्माण की योजनाएं थीं जो कि इराक और सीरिया के बीच से निकलने वाली थी और रूस को इस पर कोई आपत्ति नहीं थी. रूस ने कतर और तुर्की पाइपलाइन की योजना को अपने अस्तित्व को ख़तरे में डालने वाली नाटो की साजिश बताया. यूक्रेन में 2014 के विद्रोह के पीछे भी यही साजिश थी जहां से रूस के 80% गैस का रास्ता गुजरता था और जिस पर नाटो की निगाहें टिकी हुई थी. युक्रेनियन युद्ध के ठीक पहले अमेरिकी उपराष्ट्रपति बायडेन के पुत्र, केरी परिवार यूक्रेन के सबसे बड़े नेचरल गैस के प्रोडूसर बोर्ड में शामिल कर लिए गए, क्रांति हुई और आख़िर नाटो अपने मिशन में कामयाब हुआ. विकिलीक्स द्वारा हिलरी क्लिंटन के गुप्त कागजों के खुलासे से यह भी स्पष्ट होता है कि लीबिया और सीरिया में यह सारा षड्यंत्र इसलिए भी रचा गया है क्योंकि वे अमेरिकी डॉलर से नाता तोड़ने और पश्चिमी केंद्रीय बैंकिंग के एकाधिकार से मुक्त होना चाहते थे.

बहरहाल, सीरिया के इस युद्ध में रूसी और अमेरिकी सैन्य बलों के बीच कोई सीधा संघर्ष नहीं है. यह तो एक परोक्ष युद्ध है जिसमें पश्चिमी शक्तियों समर्थित विद्रोही दल और उन्हीं शक्तियों द्वारा पोषित आइसिस रूस समर्थित सीरियाई सरकार के ख़िलाफ़ लड़ रहे हैं. इसका जीता जागता उदाहरण अलेप्पो है.

मीडिया का षड्यंत्र

सीरिया के अति प्राचीन और व्यापारिक दृष्टि से महत्वपूर्ण अलेप्पो शहर को आइसिस से मुक्त कराने की लड़ाई यहाँ उल्लेखनीय है. यह आइसिस की रीढ़ तोड़ देने वाली लड़ाई थी, साथ ही साथ ज़ियोनिस्ट ताकतों के इशारों पर नाचती पश्चिमी मीडिया के विद्रूप चेहरा का पर्दाफ़ाश भी कर दिया. एक-एक करके सी.एन.एन., बी.बी.सी., अल जज़ीरा और तमाम मुख्यधारा के मीडिया के नकाब उतर गए. इसमें ट्विटर और फे़सबूक पर सक्रिय एजेंटों की भी पोल खुल गई.

युद्ध की विषम परिस्थितियों में, जहां बिजली आपूर्ति जैसी समस्याएँ आम बात हैं, वहां चंद ‘मासूम नागरिक’ इंटरनेट सुविधा से परिपूर्ण, दुनिया को सीरियाई सेना और रूस की क्रूरता का ‘आंखों देखा हाल’ दुनिया को दिखाने का कर्तव्य निभा रहे थे. ‘यह मेरा अंतिम विडियो है’…‘अलेप्पो में लोग भाग रहे हैं’…‘कोई अब बचा नहीं, सब मर गए हैं’ आदि आदि हैश-टैग करते पोस्टों को लाखों फे़सबूक व् ट्विटर के योद्धाओं ने मीडिया के हाथों की कठपुतली बनकर उनके झूठ और अफ़वाहों को अंतिम सत्य मान लिया और आगे प्रसारित भी किया. इस पूरी प्रक्रिया में आइसिस नाम का उल्लेख ऐसे नदारद था जैसे इस नाम का कोई संगठन कभी रहा ही न हो. नतीजा यह निकला कि सीरियन व रूसी सेना विश्व भर में निंदनीय बन गई. इतना बड़ा मिथ्या-प्रचार अभियान इस युद्ध में पहली बार देखा गया.

यह बात बिल्कुल सही है कि हर युद्ध में कोलैटरल डैमेज भी होता है और आम नागरिक भी मारे जाते हैं. ऐसा हम प्रथम और द्वितीय महायुद्धों जिसमें हिरोशिमा व नागासाकी भी शामिल हैं, से लेकर इराक और अफगानिस्तान के युद्धों में देख चुके हैं जहाँ विपक्षी लड़ाकुओं के अलावा लाखों की संख्या में निरीह नागरिक मारे गए. और ऐसा कुछ अलेप्पो में भी हुआ होगा किन्तु यह विश्वास कर लेना कि रूस की बमबारी में तो निरीह जनता मारी जाती हैं जबकि अमेरिकी बमबारी में एक ही घर में बैठे सिर्फ़ सक्रिय आतंकवादी मारे जाते हैं और आम जन का बाल भी बांका नहीं होता यह नितांत हास्यास्पद विचार है. किसी भी प्रकार की मानवीय क्षति हमारे वक्त की बड़ी त्रासदी है किन्तु युद्ध में किसी के लिए भी इससे पूरी तरह बचना असंभव है.

तथ्य यह भी बताते हैं कि 16 दिसंबर,2016 को फ्रेंच स्वतंत्र मीडिया एजेंसी ( वोल्टेयरनेट.ओर्ग) की ख़बर के मुताबिक सीरियन विशेष बलों द्वारा अलेप्पो शहर के एक बंकर में 14 नाटो अधिकारी जिंदा पकड़े गए थे. सीरिया के नामी सांसद व् अलेप्पो चैम्बर ऑफ कॉमर्स के निदेशक फ़ारेज शहाबी ने अपने फ़ेसबूक पेज पर पकड़े गए अधिकारियों के नाम व् राष्ट्रीयता को भी साझा किया था, जिसमें 8 सऊदी अरब के अधिकारी थे, एक अमेरिका, एक तुर्क, एक इज़रायली, एक कतर, एक जॉर्डन और एक मोरोको का था. 19 दिसंबर को संयुक्त राष्ट्र में सीरियाई राजदूत बशर जा़फ़री ने इस ख़बर की अधिकारिक रूप से घोषणा भी की थी. यद्यपि कई सूत्रों के अनुसार पश्चिमी गठबंधन के अधिकारियों की संख्या उससे भी अधिक थी- 22 अमेरिकन, 16 एमआई, 6 ब्रिटिश एजेंट्स, 21 फ्रेंच, 7 इज़राइली, 62 तुर्की यानि लगभग 150 ऑफ़िसर और सेना प्रशिक्षक आइसिस के संग अलेप्पो की बमबारी में फंस गए थे. इससे पूर्व रूस क्रूज मिसाइल ’कैलिबर’ के हमले से 30 इजराइली व् पश्चिमी देशों के सैन्य सलाहकारों की मौत की ख़बर भी प्रसारित की गई थी और यदि यह सच है तो अपने एजेंट्स को वहां से बचाने के उद्देश से अमेरिका के विदेश सचिव केरी की चिंता वाजिब थी और मास्को से सैन्य अभियान को स्थगित करने का आग्रह भी स्पष्ट हो जाता है. सवाल यह उठता है कि आख़िर पश्चिमी गठबंधन के यह अधिकारी आइसिस के नियंत्रण वाले अलेप्पो में कर क्या रहे थे ? जबकि सीरियाई सरकार ने उन्हें कोई आमंत्रण दिया भी नहीं था.

इन परिस्थितियों में यह संदेह भी पैदा होता है कि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षापरिषद् द्वारा अलेप्पो में सात दिन के लिए मानवीय सहायता हेतु युद्धविराम का प्रस्ताव कहीं ‘अपने’ लोगों को बचाने का प्रयास तो नहीं था? बहरहाल रूस और चीन ने इसका विरोध किया था और इसे पारित नहीं होने दिया था. रूस का मानना था कि इस तरह के अल्पकालिक विराम से आतंकवादी हथियारों का पुनर्संग्रहण कर ताकत इकठ्ठा कर सकते हैं और यह किसी भी हालत में वे नहीं होने देंगे.

अलेप्पो में हुए इस भीषण युद्ध के दौरान रूस ने जिस प्रकार आम जन के बीच सहायता पहुंचाई वह उल्लेखनीय है. अलेप्पो के नागरिकों को शहर से बाहर सुरक्षित जगहों पर पहुँचाने और उन्हें यथासंभव चिकित्सकीय व् अन्य सुविधाएं देने के अलावा सीरियन सेना के विरुद्ध लड़ रही मुक्त सीरियन सेना के 6000 से अधिक लड़ाकुओं को भी जो हथियार डालने को राज़ी हो गए थे, उन्हें अपने परिवार सहित अलेप्पो और इड्लिब शहरों के बीच बने विशेष ‘कॉरिडोर’ से सुरक्षित जगह पर पहुंचाया दिया गया. यह पूरी घटना न सिर्फ़ रूसी वायु सेना व् असंख्य ड्रोनों की निगरानी में हुई बल्कि रूसी रक्षा मंत्रालय के वेबसाइट से लेकर रशियन टुडे के फ़ेसबूक पृष्ठ पर लाइव प्रसारित की जा रही थी. निस्संदेह रूसी प्रचारतंत्र भी सिर्फ़ अपने अच्छे कृत्यों का प्रचार प्रदर्शन अपने पक्ष को मज़बूत करने के लिए कर रहा होगा.

इस तथ्य का यहां उल्लेख अनुचित नहीं होगा कि रूस और सीरिया के साथ साथ अलेप्पो में आइसिस पर जीत का श्रेय ईरान को भी जाता है. सीरियाई कुर्दों का आइसिस के ख़िलाफ़ जंग में ईरानी सैन्य सलाहकारों ने मदद ही नहीं प्रशिक्षण भी दिया था.

बहरहाल युद्ध अभी पूरी तरह से ख़त्म नहीं हुआ है और न ही निकट भविष्य में शांति बहाल होने की संभावनाएं दिख रही हैं. किंतु अब तक के इस युद्ध का यह नतीजा अवश्य निकला है कि अलेप्पो में आइसिस के पतन के उपरांत चमत्कारिक रूप से एरडोगन का हृदय परिवर्तन हो गया है और वे रूस और ईरान के साथ तालमेल बिठाने में लग गए हैं.

इसी क्रम में रूस-ईरान-तुर्की की 27 दिसंबर की बैठक से पूर्व 19 दिसंबर को तुर्की की राजधानी अंकारा के एक संग्रहालय में चित्र-प्रदर्शनी के दौरान रूस के राजदूत आंद्रेई कार्लोव की हत्या कर दी गई. हत्या को लेकर अनेक कयास लगाए जा रहे हैं जिसमें यह भी है कि पश्चिमी गठबंधन की यह कोशिश थी कि तुर्की के साथ रूस का समझौता टूट जाए.

फिलहाल रूस-ईरान-तुर्की के बीच समझौते के तहत सीरिया में अधिकारिक रूप से संघर्ष विराम ज़ारी है. अमेरिका सहित अन्य पश्चिमी शक्तियां भी आश्चर्यचकित रूप से चुप हैं. हालांकि हाल ही में अमेरिका के रक्षा सचिव एश कार्टर ने अपने ब्यान में यह घोषित कर दिया है कि “अमेरिका आइसिस से अकेले लड़ रहा है और रूस ने सीरिया में कुछ भी नहीं किया है. सवाल यह उठता है कि जब रूस ने सीरिया में कुछ भी नहीं किया है (अच्छा या बुरा) तो फिर विश्व भर में उसकी निंदा क्यों करवाई जा रही थी? इन सब बातों से साफ़ पता चलता है कि अब तक विश्व में स्वयंभू रहा अमेरिका युद्ध में असद की सफलता और विश्व राजनीति में रूस की बढ़ती प्रभुता से कितना बौखलाया हुआ है.

हंस के दिसंबर,2015 के संपादकीय में उठाया गया सवाल आज भी उतना ही प्रासंगिक है -“..अफ्रीका, मध्य-पूर्व एशिया, पश्चिमी जगत और इज़रायल के बनते-बिगड़ते समीकरणों, कूटनीतिक पेचीदगियों और जटिल अंतर्राष्ट्रीय संबंधों के बीच एक बड़ा प्रश्न अनुत्तरित रह जाता है. विश्व भर में एक सार्वभौमिक नियम है कि हत्या के लिए हथियार उपलब्ध कराने वाला, प्रशिक्षण और साधन प्रदान करने वाला भी बराबर का दोषी होता है. आइसिस को तो उसके किए की सजा मिलने जा रही है किंतु पश्चिम के इन प्रभुओं को, सऊदी राजशाही को, कतर, तुर्की और इज़रायल को उनके किए की सज़ा कब मिलेगी? यह बड़ा सवाल है.”

ख़ैर, अमेरिकी राष्ट्रपति पद पर एक अल्पशिक्षित बड़बोले और नितांत अभद्र इस नारंगी से जीव के आगमन के साथ ही शांति नोबल पुरुस्कार विजेता ओबामा को अपने किए लाखों वधों की जवाबदेही से छुटकारा मिल जाएगा. आज अचानक ‘ग्लैडिएटर’ फिल्म का एक संवाद याद आ गया – जब रोम का एक सीनेटर अपने क्रूर सम्राट कमोडस के लिए कहता है कि “सम्राट अच्छी तरह जानता है कि रोम क्या है. रोम महज एक भीड़ है. उनको जादू दिखाओ- वे चमत्कृत हो जाते हैं. सम्राट उनके लिए बड़े पैमाने पर मौत लाएगा जिसके लिए वे उसे बेपनाह प्यार करेंगे”.

14859701_1474274785922952_6659694896302909380_oमाने मकर्तच्यान, जेएनयू में शोधरत इंडोलॉजी की छात्रा हैं. आर्मेनिया से आती हैं और वैश्विक गतिविधिओं पर पैनी नज़र रखती हैं. आप उनसे  mane.nare@gmail.com पर संपर्क कर सकते हैं.

साभार- हंस, फ़रवरी, 2016

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