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यथार्थ का दुस्स्वप्न और आखेटक स्त्री: आशुतोष कुमार

‘अपने जैसा जीवन ‘ , ‘नींद थी और रात थी ‘ और ‘स्वप्न समय ‘ सविता सिंह  के अब तक प्रकाशित तीन कविता- संग्रह हैं . इन कविताओं से गुजरते हुए सहज ही महसूस किया जा सकता है कि यहाँ जो ‘मैं’ है , वह एक ‘स्त्री’ है.  वह सभी कालों और सभ्यताओं की स्त्रियों का प्रतिनिधित्व करती है . बेशक वह कवयित्री के समय की, हमारे अपने समय की, निवासी  है. लेकिन उसे भरपूर अहसास है कि वह एक  परंपरा में स्थित है , बल्कि उसी के हाथों निर्मित है. यह पितृसत्ता की अतिप्राचीन परंपरा है . यह स्त्री के लिए वंचना, दमन और  उत्पीड़न की परंपरा है . सविता सिंह की कविताओं की  ‘स्त्री’ इस परंपरा के बारे में अच्छी तरह जानती है . सचेत है . वह इस महान परंपरा की  कैद से मुक्ति चाहती है .  उनकी कविता  मुक्ति के स्वप्न की कविता है . उनके यहाँ स्वप्न एक बार बार दुहराया जाने वाला का विषय है।  #लेखक

By Tumpa Chakraborty

By Tumpa Chakraborty

कविता मुक्ति की एक रणनीति है

By आशुतोष कुमार 

 ‘स्त्री’ के लिए कविता अनेक रूपों में मुक्ति की रणनीति हो सकती है.
अनादि काल से स्त्री कविता का विषय जरूर बनती रही है , लेकिन खुद उसकी  – एक साधारण स्त्री की –  पहुँच शास्त्रीय कविता तक नहीं रही . उसे कविता का लुत्फ़ उठाने लायक शिक्षा और दीक्षा से वंचित रखा गया .  उसे कभी इतनी फुर्सत ही नहीं दी गई कि वह कविता पर ध्यान दे सके . कुछ भी हो , कविता के लिए फुर्सत चाहिए .   रसास्वादन के लिए भी , रचना के लिए भी . यह फुर्सत पुरुष के पास  हो सकती थी . फुरसतिया तबके के पुरुष के पास तो इफरात में थी . उसने इस फुर्सत का इस्तेमाल नायिका- भेद और नख-शिख के अलावा प्रेम की विभिन्न दशाओं का रस लेने में किया.  लेकिन  ‘स्त्री’ के पास न तो फुर्सत थी , न अवसर था , न कविता तक उसकी पहुँच थी . अमीर तबकों की स्त्री के पास भी पुरुष को लुभाने के लिए आकर्षक स्त्री बने रहने की काम की व्यस्तता थी . पुरुष की रची कविता के सांचे में खुद को ढालने की अंतहीन व्यस्तता . खुद उसके लिए कविता नहीं थी.  उसके जीवन में कविता की गुंजाइश नहीं थी . मतलब यह कि कविता  ‘स्त्री’ के  उत्पीड़न के यंत्र के रूप में काम कर रही थी . पुरुष की कविता  ‘स्त्री’ से उसकी मनुष्यता छीन कर उसे श्रृंगार-सामग्री या भोगवस्तु में बदल रही थी . या , ज़्यादा से ज़्यादा देवी या माँ के छवि में कैद कर उसे पूजा की सामग्री में बदल रही थी .

‘ अपने जैसा जीवन ‘ संग्रह की कविता  ‘परंपरा में’ सविता सिंह की  ‘स्त्री’ साफ़ कहती है –

‘ दूर तक सदियों से चली आ रही परम्परा में
उल्लास नहीं मेरे लिए
कविता नहीं
शब्द भले ही रौशनी के पर्याय रहे हों औरों के लिए
जिन्होंने नगर बसाए हो ,
सभ्यताएं बनायी हों
युद्ध लादे हों
शब्द लेकिन छुप कर मेरी आँखों में धुंधलका ही बोते रहे हैं
और कविता रही  है गुमसुम
अपनी परिचित असहायता में
छल-छद्म से बुने जा रहे शब्दों के तंत्र में
इन नगरों के साथ निर्मित की गई एक स्त्री भी
जिसकी आत्मा बदल गई उसकी देह में’ ….

 लेकिन इसी कविता में यह  ‘स्त्री’ सदियों तक प्रतीक्षा  करती है , शब्दों को अपनी मुक्ति की रणनीति के रूप में आजमाने के लिए .

‘ …..शब्दों के षड्यंत्र तब होंगे  उसकी विजय के लिए
बनेंगे नए नगर फिर दूसरे
युद्ध और शांति पर नए सिरे से लिए जायेंगे फैसले .’

मुक्ति की रणनीति के रूप में कविता की यह नयी भूमिका ‘स्वप्न समय ‘ में  कविता के नाम लिखी गई  कविता ‘ तुम्हे लिखना ‘ में यों प्रकट होती है –

‘… एक गरम नदी के किनारे खड़े होना लिखना है मेरी कविता
उस दृश्य को देखना
जहां अनभिज्ञता के शव आते हैं
अपनी मासूम मनुष्यता छोड़ने
पहनने कठोर ज्ञान के परिधान

तुम्हे लिखना बदल लेना है
इस जीवन को दूसरे जीवन से
एक स्वप्न को दूसरे से
या फिर इस जीवन को स्वप्न से ‘

‘मासूमियत’ का त्याग कर परम्परा से प्राप्त शव जैसे जीवन को एक नए जीवन से बदल लेने  का स्वप्न . यह स्वप्न ही उस स्त्री की कविता है . यह स्वप्न उसकी रणनीति है . यह एक स्वप्न को दूसरे स्वप्न से बदलना भी है . अचेतन जीवन से उपजे निस्पंद स्वप्न को चेतना से दीप्त जीवन-स्वप्न में . यह कविता सपने  देखने का सपना है . सपने से वंचित  ‘स्त्री’ के लिए सपना  देखना मुक्ति की रणनीति है. उसके पास जीवित रहने का इसके सिवा और कोई तरीका नहीं है कि दुस्स्वप्न जैसे जीवन को स्वप्न से बदल लिया जाए .

सपने देखने का सपना मुक्ति की  रणनीति का एक हिस्सा है . दूसरा हिस्सा यथार्थ को सपने में देखना है .  दुस्स्वप्न की तरह देखना . यह दूसरा हिस्सा निर्णायक है .यथार्थ से आँखें मूँद कर सपने  देखना पलायन है . पलायन मुक्ति का रास्ता नहीं हो सकता . मुक्ति का रास्ता केवल उस सपने में हो सकता है , जो यथार्थ के दुस्स्वप्न के भीतर गहरे धंस कर देखा जाता है . उस यथार्थ को बाहर से देखना काफी नहीं है . उसे प्रत्यक्ष नहीं देखा जा सकता . प्रत्यक्ष जो दिखता है , वह आभासी यथार्थ है . प्रत्यक्ष  दिखने वाला संसार आभासी यथार्थ का संसार है . यह आदर्शों , आदर्शवाक्यों  , घोषणापत्रों ,सजावटों , पच्चीकारियों , नकाबों , बहुरूपों , विभ्रमों और कपट का संसार है . यह , बकौल शमशेर , ‘होनी और अनहोनी की उदास रंगीनियों’ का संसार है . इस आभासी  संसार की  हकीकत को उसकी सारी तफसीलों के साथ आदि से अंत तक  देखने के लिए उसे सपने में ढाल कर देखने की तरकीब कारआमद पायी गयी है . कबीर ने अपनी उलटबांसियों में इसी तरकीब का इस्तेमाल किया था . मुक्तिबोध की फैंटेसी और बोर्खेज की जादुई कहानियों में इसी तरकीब का इस्तेमाल किया गया है .  सविता सिंह की कविताओं में बोर्खेज का आनाजाना लगा रहता है . यथार्थ को सपने में ढाल कर देखने की सब से बड़ी सुविधा यह है कि  कम से कम उसे देखा जा सकता है ! भले ही वह दुस्स्वप्न  हो , आखिरकार टूट सकता है . उसे बदला भी जा सकता है . उसमें  वे सारी सम्भावनाएं हो सकती हैं , जो यथार्थ में नहीं हो सकतीं .

‘… और यह जीवन भी है जैसे अपना ही हाथ उलटा पड़ा हुआ
किसी पत्थर के नीचे
इसे सीधा करते रहने का यत्न ही जैसे सारा जीवन
तडपना पत्थर की आत्मीयता के लिए ज्यूं सदा
हल्के पांव ही चलना श्रेयस्कर है  इस धरती पर इसलिए

एक नींद  की तरह है सब कुछ
नींद उचटी कि गायब हुआ
स्वप्न-सा चलता यह यथार्थ …’
(किसकी नींद स्वप्न किसका’/ ‘स्वप्न समय’)

नींद उचटने पर  गायब होने की गुंजाइश वह तिनका है जिसके सहारे ‘स्त्री’ -जीवन के इस  कठोर विकल्पहीन यथार्थ को आँख टिका कर देखा जा सकता है . कविता में दर्ज किया जा सकता है .  सपना यथार्थ के सब से मार्मिक तथ्यों को , उसके सारतत्व को , रूपक में बदल कर देखने की कला है . नींद में जो सपने की तरह दिखाई देता है , वही जागते हुए कविता की तरह  दिखता है .  पत्थर के नीचे उलटे पड़े हाथ जैसे जीवन को उसके इस असली रूप में स्वप्न में नहीं तो और कैसे देखा जा सकता है . जीवन जैसे पत्थर के नीचे दबे हाथ को सीधा करते रहने का यत्न . और तड़पना उस पत्थर की आत्मीयता के लिए ! भले ही  इसे एक स्वप्न या दुस्स्वप्न की तरह देखा जा सकता हो , लेकिन इस हकीकत को स्वप्न में भी देखना दुखदायी है. बकौल तुलसीदास ,  ‘पराधीन सपनेहुँ सुख नाहीं’ ! लेकिन आखिरकार उसे  देखना , ठीक- ठीक दर्ज़ करना और सलीके से  बयान करना उस से  मुक्ति पाने की एक रणनीति है .

स्वप्न में यथार्थ को देखने की इस कला की खोज किसने की ? अधिक सम्भावना है , यह ‘स्त्री’ की खोज रही होगी .  याद कीजिये , बचपन में मांओं और नानियों के मुंह से सुनी हुई कहानियां . इन कहानियों में जीवन का कितना बड़ा यथार्थ रूप बदल कर आता है.  कहानी में ढल कर आता है . वो तमाम कहानियाँ यथार्थ को सपने में ‘देखने’ लायक , कहने- सुनने लायक , समझने लायक और बदलने  की आशा जगाने लायक बनाने के सिवा कुछ और नहीं करती थीं . जादुई यथार्थवाद के महान लेखक गाब्रिएल गार्सिया मार्केस की तरह फैंटेसी के कवि मुक्तिबोध ने भी अपनी कला के लिए अपनी मां का ऋण स्वीकार किया है . यह उसके लिए ज़िन्दा रहने और जीने की कला भी है . उसने इसे अपने अनुभव से पाया होगा.यह  उसके जीने की शर्त रही होगी . असहनीय यथार्थ को सपने में ही सहा जा सकता है . दुस्स्वप्न जैसे जीवन को नींद में ही  जिया जा सकता है . ‘स्त्री’ का सारा जीवन जैसे एक लम्बी नींद हो.

‘बहुत सुबह जग जाती हैं मेरे शहर की औरतें
वे जगी रहती हैं नींद में भी
नींद में ही वे करती हैं प्यार, घृणा और सम्भोग
निरंतर रहती हैं बंधी नींद के पारदर्शी अस्तित्व से
बदन में उनके फुर्ती होती है
मस्तिष्क में शिथिलता ..’
(‘सच का दर्पण ‘से )

मस्तिष्क की यह शिथिलता जड़ता नहीं है .एक असम्भव जीवन जीने की रणनीति है . कविता की अंतिम पंक्तियाँ प्रमाण हैं –
‘… फिर भी
अपने एकांत के शब्दरहित लोक में
एक प्रतिध्वनि-सी
मन के किसी बेचैन कोने से उठती जल की तरंग-सी
अपने  चेहरे को देखा करती हैं
एक दूसरे के चेहरे में
बनाती रहस्यमय ढंग से
एक दूसरे को अपने सच का दर्पण ..’

‘स्त्री’ की कविता दुस्स्वप्न से स्वप्न तक एक निरंतर यात्रा है .  यथार्थ और स्वप्न का सहजीवन है . यह सहजीवन यथार्थ या स्वप्न की आतंककारी स्वायत्तता से मुक्ति की रणनीति है . यह यथार्थ को स्वप्न में और स्वप्न को यथार्थ में बदलने की प्रक्रिया भी है .

यह तय है कि मुक्ति की रणनीति के रूप में देखा गया स्वप्न एकांतिक निजी स्वप्न नहीं हो सकता . यथार्थ हमेशा सांझा होता है , इसलिए मुक्ति भी सांझी ही हो सकती है . ‘स्त्री’ अपने अनुभव से इस सच को जानती है . वह जानती है कि उसका दुख न  संयोग है , न निजी दुर्भाग्य . यह उसके सामाजिक अस्तित्व में अंतर्निहित है .  मनुष्य की सभ्यता ने अब तक जो अपना स्वरूप रचा है , यह दुख उसकी मूल अंतर्वस्तु है . इस दुख के भागीदार के लिए अपने सहभागियों से अपरिचित रहना मुमकिन नहीं . वर्चस्व और हिंसा की सभ्यता में दुख केवल स्त्रियों के हिस्से में नहीं आया है . यह उन सब की नियति बन कर आया है जो इस उत्पीड़न और हिंसा के निशाने पर हैं . जैसे वे ‘रेड इंडियन ‘ लोग , जिन्हें संयुक्त राज्य अमरीका  की स्थापना के लिए लगभग पूरी तरह उजाड़ दिया गया (‘शैटगे ,जहां ज़िन्दगी रिसती जाती है’) . जैसे भारत के वे आदिवासी जिन्हें तेज विकास दर के नाम पर रोज  उजाड़ा और खदेड़ा जा रहा है (स्वप्न के ये राग’). जैसे ‘कर्नाटक के  एक  अँधेरे गाँव में / जीवन का खेल समाप्त करने की तैयारी कर रहा’  किसान परिवार(‘अंत’) ,जैसे बीच सडक पर गिर पड़े खदेड़े जाते वे मुश्ताक मियाँ  जो ‘ढाबा चलाते थे / लाखों लोगों को अब तक खिला चुके थे / गोश्त रोटी तरकारी दाल सलाद’ (‘मुश्ताक मियाँ की दौड़’), जैसे दुनिया भर के गरीब मेहनतकश लोग , जैसे देश भर में छाये एक ‘नए अँधेरे ‘ को पह्चानने की कोशिश कर रहा बच्चा( ‘नया अन्धेरा’)जैसे खून और खामोशी में धकेल दी गयी मासूम बच्चियां (‘खून और खामोशी’), जैसे किताबें , जैसे जंगल- नदियाँ- पहाड़ , और जैसे वे पेड़ जो ‘रात भर जगे रहते हैं'(‘अनिद्रा में’).

‘….जंगल के जंगल कारतूस और बन्दूकों से लैस अब
रात भर जगे रहते हैं पेड़
कुछ बच नहीं पा रहा
न मर्द , न औरतें , न बच्चे
न रात , न उसका रहस्य ..’
(‘अनिद्रा में’ से )

‘स्त्री’ जानती है कि इन सब कविता-वंचितों की नियति और मुक्ति सांझा है . इसलिए उसकी कविता इन सब की कविता  है . इन सब की मुक्ति की रणनीति है. इन सब की मुक्ति का स्वप्न है . ‘स्त्री’ इन सब का प्रतिनिधित्व करती है .

इस तरह जब ‘स्त्री’ इस  विराट विकराल यथार्थ को स्वप्न के जरिये देखती है , तब उसे सभी कालों और सभ्यताओं में चल रहे आखेट के दृश्य दिखाई देते हैं . इस आखेट के निशाने पर स्त्री हो या भील लोग हों या मासूम बच्चियां हों या ‘नये अँधेरे’  को पहचान रहे बच्चे हों . यह आखेट इतना पुराना है और इस तरह लगातार जारी है कि  अक्सर  उसके दृश्य स्वप्न में  पूर्वजन्म की स्मृतियों की तरह आते हैं ( ‘सपने और तितलियाँ’ ; ‘चांद, तीर और अनश्वर स्त्री’ ). यह आखेट जो  ‘स्त्री’ की कविता में यथार्थ का दुस्स्वप्न है  , वह उसके स्वप्न में एक प्रति-आखेट में बदल जाता  है . यह इस तरह होता है कि जो आखेट के निशाने पर थे , वे खुद को बचाने-छुपाने- भगाने की कोशिश करना छोड़ खुद आखेट में शामिल हो जाते हैं . बचने -भागने की कोशिश करना बेकार है , क्योंकि आखेटक कई गुना अधिक ताकतवर है , और हर जगह मौजूद है .  उसके मंसूबों को विफल करने का एक ही उपाय है , उसे खुद आखेट के निशाने में बदल देना . इकतरफा आखेट को दुतरफा  बना देना . यह आखेटक के लिए हतप्रभ करने वाली स्थिति है . यह उसके पराजय की शरुआत है . क्योंकि  इस स्थिति से निपटना उसे आता ही नहीं . उसे आखेट के निशाने पर होने का  कोई अनुभव ही नहीं है . वह भागते हुए शिकार पर तीर चला सकता है , लेकिन पलटवार की स्थिति में चारो खाने चित हो जा सकता है .

यों  स्वप्न में स्त्री पलटवार करती है. प्रतिआखेटक है. यही मुक्ति की रणनीति है . यही उसकी कविता है .

‘.. वे ही कह सकते हैं कि एक स्वर उन्होंने बचा रखा है
कहने के लिए कि कितना जरूरी है
इस संसार को अपनी ही खूंरेजी  से बचाना
वे कह रहे हैं या कि गा रहे हैं
कि वे पुराने हैं बहुत पुराने
उन्होंने देखे हैं छः सौ चालीस चाँद
और भगवान का मरना भी
जबकि बिरसा भगवान मर नहीं सकता
जब तक तीर है और निशाना
जब तक आता है उन्हें विषकंटक  से विष निकलना
पकाना  उसे तीर पर लगाना ..’
(‘स्वप्न के ये राग’ से )

‘.. आखेट के लिए बुलाता है अगर कोई मुझे
नहीं है भागना
शामिल होना है इस खेल में
आखेटक से डरना नहीं
यदि बचे रहना है

मुझे मालूम है अब खूब
रात  और स्वप्न के मैदान में
तीर और चाँद मुझे देखा करेंगे
और मैं रहूंगी हिरणों के झुण्ड में शामिल
उनकी छलांगों के मुक्ति विलास में
लांघती -फांदती जंगल के जंगल ..’
(‘चांद, तीर और अनश्वर स्त्री’ से )

‘… वह मेरे पीछे पीछे है घोड़े पर
थोड़ा सुस्त अब रह रह कर दहाड़ता मगर
फिर बिलखता और सर को पटकता
दिखाता अपने घाव और रक्तस्राव
और मैं भागती जाती हूँ
पेड़ों की फुनगियों पर पहुँच जाती हूँ
डालों पर झूलती हूँ
यह सब मुझे एक खेल- सा लग रहा है
तभी वह फेंकता है संशय के बीज हवा में
कहता है यह खेल नहीं क्रूरता है ..’
(‘सपने और तितलियाँ’से )

इन तीन में से आख़िरी उद्धरण जिस कविता से लिया गया है , वह मुक्ति की  रणनीति के रूप में कविता विधा की स्वाभाविक सीमा को भी दर्ज करती है . कविता में आखेट और प्रतिआखेट के रूपक के जरिये  ‘स्त्री’ आखेट के लक्ष्य जैसी अपनी नियति को चुनौती देती है . वह स्वप्न देखने के साहस का इस्तेमाल यथार्थ के दुस्स्वप्न को चुनौती देने में करती है . लेकिन सपने में वह इस दुस्स्वप्न को  किसी सुस्वप्न से बदल नहीं सकती . इसके लिए उसे सपने से बाहर जाना होगा . सपना देखना स्वप्नहीन  यथार्थ को चुनौती देना है , उसे  सपने -जैसी सच्चाई में बदल देना नहीं .

आखेट के  सपने का  प्रतिआखेट के सपने में बदलना  स्वप्न- चक्र का पूरा हो जाना है . सपने में इसके आगे की सम्भावना नहीं है . सपने में इसके आगे केवल इस स्वप्न-चक्र को दुहराया जा सकता है . ‘सपने और तितलियाँ ‘ में यही  दुहराव अनेक जन्मों में दुहराई जा रही कथाओं के रूप में प्रकट होता है .  हर जन्म में वही घुड़सवार आखेटक पुरुष ‘स्त्री ‘ के प्रेमी के रूप में लौटता है . हर जन्म में वह स्वयं  आखेट भी बनता है. पिछले जन्म में वह अपने प्रतिद्वंदियों का आखेट बनता है और इस जन्म में अपनी प्रेमिका का.  अपने हर जन्म में वह आखिरकार मार दिया जाता है . फिर भी एक नए जन्म में उसे लौटना  है , क्योंकि ‘स्त्री’ और पुरुष , प्रेमिका और प्रेमी , आखेट और आखेटक  एक दूसरे के हिस्से हैं .

‘… याद करो हम कौन हैं  – एक दूसरे के हिस्से
अलग कर दिए गए थे जो कई सदी पहले…’

बेहद दिलचस्प है देखना कि एक सचेत मुक्तिकामी स्त्री  की कविता में  पुरुष और स्त्री की छवियाँ कितनी पारंपरिक हैं!  पुरुष हमेशा घोड़े पर सवार हो कर आता है . ‘..ऐसा लगता है कि वह खुद भी एक घोड़ा है / उसके भीतर भी एक वेग है / एक सनक तापों के रौंदने की क्षमता से उपजी.. .’ और ‘स्त्री’ भी वही पारंपरिक स्त्री है , जिसके ‘पांव दुर्बल हैं’ , और जिसके पास ‘फल और नदियाँ’ हैं ! उनका  इसी तरह होना स्वाभाविक है , क्योंकि वे एक ही स्वप्न के दो हिस्से हैं .  वे एक ही स्वप्न -रणनीति के दो हिस्से हैं . वे एक ही कविता के दो हिस्से हैं . वे एक दूसरे के बिना अधूरे हैं . एक दूसरे के बिना उनका होना सम्भव ही नहीं. यह एक विपरीत युग्म ( देरिदा का ‘बाइनरी अपोजीशन’ ) है .उनकी निष्पत्ति  आखेट और प्रतिआखेट के निरंतर चलने वाले चक्र में ही है . इसलिए अंततः

‘.. आता है धीरेधीरे लौट कर
फिर सारा दुख सारा पश्चाताप
जिनसे मेरी दुनिया तब भी जीवंत थी
सिर्फ उनमें तितलियाँ चुम्बनों की तरह नहीं
यातनाओं में शामिल हमशक्लों के तरह थीं
और प्रेम के लिए अस्तित्व खतरों में था ..’

दुहराव की जिस प्रक्रिया का संकेत इस कविता में है , उसे तीनों संग्रहों की कुल कविताओं में भी देखा जा सकता है . यहाँ स्वप्न , दुस्स्वप्न , रात , नींद , आखेट और प्रतिआखेट के मजमून बार बार दुहराए जाते हैं . जैसे स्त्री और  पुरुष की  परम्परागत छवियाँ बार-बार दुहराई जाती हैं . इस तरह मुक्ति की रणनीति के रूप में कविता सपना देखने का संकल्प  तो  है , लेकिन वह किसी अदेखे नए स्वप्नलोक के  सृजन से कुछ  दूर है . ये कवितायें सपनों के बारे में  हैं . लेकिन इन कविताओं में उस  मुक्त स्त्री की उपस्थिति , उसकी नयी छवि , उसका नया यथार्थ ,उसकी नयी कल्पनाएँ , उसके नए सपने , उसका नया प्रेमी –यह सब कुछ अभी संभावना भर है  .  यहाँ कविता के बाहर वास्तविक जीवन में  जीवनमरण का संघर्ष करती हुई मुक्त स्त्री के अनुभव  कम   है . यह अभी भी ‘अजन्मी मछलियों का संसार है ‘ . ‘स्वप्न समय ‘ में इसी शीर्षक  की एक कविता का अंत इस तरह होता है –

‘..काश ! मुक्ति इससे भी थोड़ी आसान होती
कोई ऐसी स्थिति होती
कि आक्रोश और अस्वीकृति बदल जाते सीधे नए यथार्थ में
जैसे रोशनी और शब्द बोर्खेज के यहाँ
तब्दील हो जाते हैं आँखों में .. ‘

लेकिन आक्रोश और अस्वीकृति (माने कविता ) सीधे नए यथार्थ में नहीं बदल सकते . मुक्तिकामी कवि के लिए यह अहसास भी कम नहीं . इसका मतलब यह है कि स्वप्नलोक में विचरते हुए भी  उसके पांव हकीकत की जमीन से अलग नहीं हैं . इसका मतलब यह है  कि मुक्ति की रणनीति की तरह लिखी जा रही  कविता मुक्ति की  रणभूमि से बहुत दूर नहीं है .

 आशुतोष कुमार

आशुतोष कुमार

  चर्चित युवा आलोचक. हिंदी विभाग, दिल्ली विश्वविद्यालय में सहायक प्रोफ़ेसर. जनसंस्कृति मंच से जुड़ाव. इनसे   ashuvandana@gmail.com  पर संपर्क संभव है.

आवारगी का काव्यशास्त्र: कृष्ण कल्पित

 By कृष्ण कल्पित 

 आवारगी का काव्यशास्त्र

(प्रथम अध्याय)

कर्णाटीदशनास्ति: शित: महाराष्ट्री कटाक्ष क्षत:

प्रौढान्ध्री-स्तन-पीडि़त:, प्रणयिनि भ्रू-भंग वित्रासित:।

लाटी बाहु-विचेष्टीतश्च मलय स्त्री तर्जनी तर्जित

सोऽयं सम्प्रति राजशेखरकविर्वाराणसीं वाञ्छति॥7॥

—राजशेखर

कर्णाट देश की महिलाओं के दाँतों से अंकित, महाराष्ट्रनियों के तीव्र कटाक्षों से आहत, आंध्र की प्रौढ़ रमणियों के स्तनों से पीडि़त, प्रणयिनियों के कटाक्ष से भयभीत, लाटदेशीय रमणियों के भुजपाशों से आलिंगित और मलय निवासी नारियों की तर्जनी से तर्जित यह कवि राजशेखर अब वृद्धावस्था में वाराणसी में बसना चाहता है।

वाराणसी जाकर बस जाने की इच्छा तो मेरे मन में भी बरसों से है, पर एक हज़ार से अधिक वर्ष पूर्व संस्कृत के एक यायावर कवि राजशेखर ने वाराणसी में बसने के जो कारण गिनाए हैं, वैसे कारण और अर्हता प्राप्त करने में मुझे अभी समय लगेगा।

वैसे तो हज़ारों लाखों लोग बिना किसी कारण वाराणसी में बसे हुए हैं, लेकिन हम अपने समय के एक अनूठे कवि ज्ञानेन्द्रपति से तो यह उम्मीद रख ही सकते हैं कि वे राजशेखर की तरह हमें बताएँ कि कोई पच्चीस वर्ष पूर्व एक दिन अचानक गंगातट पर आकर क्यों बस गए; क्योंकि बिना कसी कारण बनारस में बसना अपराध है, जहाँ जिस पथ से आता है शव उसी पथ से जाता है शव! लोकोपवाद से बचने के लिए भी यह ज़रूरी है।

अगर आपके पास पापों की गठरी नहीं है तो फिर बनारस जाकर क्या कीजिएगा? अभी तो पूरी दुनिया घूमिए—पाप की गठरी को भारी कीजिए—अभी तो यायावर राजशेखर की तरह आवारगी कीजिए—अभी तो यहाँ-वहाँ दूर-दूर तक लावण्य के ढेर बिखरे हुए हैं।

प्रायोजित, सुरक्षित और समयबद्ध आवारगी के इस क्षुद्र समकालीन समय में सच्ची आवारणी अलभ्य है और सच्चे आवारा दुर्लभ। आवारगी एक मुश्किल कला है। यह दुनिया का आठवाँ आश्चर्य है, पैंसठवीं कला है और पिच्यासिवाँ आसन है। इसका कोई शास्त्र नहीं है। यह किसी विश्वविद्यालय में नहीं पढ़ाई जाती। यह पाँवों को लहुलूहान करने का हुनर है। यह जलते अंगारों पर नृत्य करने का दुस्साहस है।

आवारगी एक कोई वनलता सेन है, जो किसी दुर्लभ क्षण में जीवनानन्द दास को मिलती है—इस पथ के दावेदार चरित्रहीन शरत थे—रवीन्द्र नहीं। उर्दू-हिन्दी शब्दकोश में इसका एक अर्थ भीषण जाड़े में लखनऊ के एक सस्ते शराबघर में ठंड से अकड़ी हुई मजाज़ लखनवी की लाश भी है। ये ताँबे के कीड़े हैं, जिन्हें शाहजहाँपुर की धूल में भुवनेश्वर ने खोजा था। यह सत्यजित राय की ‘चारुलता’ नहीं, बल्कि ऋत्विक घटक की ‘बाड़ी थेके पालिए’ है। यह ‘असाध्य वीणा’ तो कतई नहीं है, बल्कि शमशेर की ‘टूटी हुई बिखरी हुई’ है। यह मुक्तिबोध की ‘घेर घुमावदार’ बावड़ी है या फिर राजकमल की अँतडिय़ों में उलझा हुआ ‘मुक्ति प्रसंग’ है।

उर्दू शायरों के अनुसार आवारगी में भी एक सलीका चाहिए। यह एक चालाकी है। वही प्रसिद्ध चालाकी, जिसने हमारे कथित पुरोधाओं को निस्तेज और निर्वीर्य कर दिया है। सत्ता के सतत् संघर्षण से जिनकी तशरीफें फूल गई हैं—जो शाम को इन्डिया इन्टरनैशनल सेन्टर में स्कॉच की चुस्कियों के साथ मुक्तिबोध की सुमिरनी फेरते रहते हैं।

मुक्तिबोध इनके लिए शराब के साथ खाए जाने वाले सलाद से अधिक कुछ नहीं हैं। यह लोग हर तीसरे महीने आवारगी के लिए पेरिस, फ्रैंकफुर्त, शिकागो और लंदन जाते रहते हैं और हमें विदेशी किताबों के कैटलोग दिखाकर डराते रहते हैं। ये सब नकली यायावर हैं, जिन्हें पहचान कर ही हम सच्ची आवारगी की तरफ बढ़ सकते हैं।

वे आधी रात को निकलते हैं घरों से

अक्सर घरवालों को बिना बताए

अंधेरे में ठिठकते हैं एक बार

फिर पैदल ही चल देते हैं स्टेशन की ओर

बुद्ध भी बिना बताए ही घर से निकले थे। नवजात शिशु, सुन्दर स्त्री यशोधरा और अपार वैभव को छोड़कर। वैसे तो बहुत सारे आवारा मशहूर हैं, लेकिन अब तक की मनुष्यता के इतिहास में बुद्ध से बड़ा आवारा कोई और हुआ हो—मुझे पता नहीं। एक दिन मैं नीरांजरा, अचिरावती और नैरांजना नदियों के तट पर एक साथ घूम रहा था। कपिलवस्तु से पाटलिपुत्र से श्रावस्ती से चेतवन से उज्जयिनी से काशी से कोसाम्बी से कुशीनगर से नालंदा से मथुरा से वेलुवन से वैशाली से जंबुनाद तक। यह मेरी आवारगी थी—देशकाल, समय-सीमा और भाषाओं के पार। मैं कन्थक नामक घोड़े पर सवार था, छन्दक मेरा सहायक। ब्राह्मïणों के पाखंड और वैदिक कर्मकाण्ड को ध्वस्त करता हुआ मैं सोच रहा था कि युद्ध का सामना अयुद्ध से और घृणा का मुकाबला अघृणा से ही हो सकता है। यह एक रोमांचक यात्रा थी और मैं अपनी आवारगी में सोच रहा था कि यदि सुरापान और स्त्री-समागम को जोड़ दिया जाए तो बौद्ध-दर्शन दुनिया का सर्वश्रेष्ठ दर्शन हो सकता है।

लगभग नवीं शताब्दी में श्री महेन्द्र विक्रम वर्मा रचित ‘मत्तविलास प्रहसनम्ï’ के उस शाक्य भिक्षु की तरह मुझे भी लगता है कि यह वृद्ध बौद्धों का युवा बौद्धों के विरुद्ध रचा हुआ षड्यन्त्र है। इसे पूरा विश्वास है कि बुद्ध के पिटक ग्रन्थोंं की मूल प्रति में सुरापान और स्त्री-समागम का समावेश ज़रूर होगा। वह उस मूल पिटक के अनुसंधान में रत है, वह उसे खोजना चाहता है। या उनमें यह प्रावधान जोडऩा चाहता है। इसी कर्म में वह शाक्य भिक्षु निमग्न रहता है। एक दिन बौद्ध-मठ जाते हुए वह सोचता है—’अत्यंत दयालु भगवान बुद्ध ने महलों में निवास, सुन्दर सेज लगे पलंगों पर शयन, पहले प्रहर में भोजन, अपराह्म में मीठे रसों का पान, पाँचों सुगन्धों से युक्त ताम्बूल और रेशमी वस्त्रों का पहनना इत्यादि उपदेशों से भिक्षु-संघ पर कृपा करते हुए क्या स्त्री-सहवास और मदिरापान का विधान भी नहीं किया होगा? ज़रूर किया होगा। अवश्य ही इन निरुत्साही तथा दुष्ट वृद्ध बौद्धोंं ने हम नवयुवकों से डाह कर पिटक-ग्रन्थों में स्त्री-सहवास और सुरापान के विधान को अलग कर दिया है—ऐसा मैं समझता हूँ। मैं इस भूल को सुधारूँगा। ऐसा करके मैं बुद्ध-विचार और संघ का बहुत बड़ा उपकार करूँगा।’

‘एक शराबी की सूक्तियाँ’ लिखकर मैं अपने आप को आवारगी का छोटा-मोटा विशेषज्ञ समझने की हिमाकत कर बैठा था। मैं आसमान से तब गिरा, जब मेरी भेंट हज़ार वर्ष पहले लिखे गए इसी संस्कृत नाटक ‘मत्तविलास प्रहसनम्ï’ के मुख्य पात्र मद्यप कापालिक से हुई। यह कापालिक अपनी सहचरी देवसोमा के साथ हर घड़ी मदिरा-मत्त रहता है। आवारगी उसके चरणों की धूल नज़र आती है। यह कापालिक काँचीपुर के एक शराबघर में अपनी प्रिया देवसोमा से कहता है—’प्रिय, देखो देखो। यह मद्यशाला ही यज्ञशाला है, यहाँ ध्वजा को बाँधने का खम्भा ही यूप है, सुरा सोमरस है, मतवाले ही पुरोहित (ऋत्विक) हैं। चषक ही चमस है, शूल्यमांस चिखना ही हविष्य है, पियक्कड़ों का प्रलाप ही यजुर्वेद है और उनके गान समवेद, पीने की इच्छा ही अग्नि है, मद्यशाला का मालिक ही यजमान है। देखो—मत्तविलासों के नृत्य दर्शनीय हैं, जो बजते हुए मृदंग के इशारों पर हो रहे हैं; जिनमें अनेक प्रकार के अंगों का विक्षेप, शब्द तथा कटाक्ष हो रहे हैं—दुपट्टे को एक हाथ में लेकर ऊपर फहराया जा रहा है और गिरते हुए वस्त्र को सम्भालते हुए हाथों की विषम लय है तथा कंठस्वर लडख़ड़ाया हुआ है।’

शराबियों का ऐसा अभूतपूर्व नृत्य ‘मत्तविलास’ के बाद भारतीय वांङमय की समरभूमि में प्रेमचंद के यहाँ कफन में ही दिखाई पड़ता है—जब घीसू और माधो कफन के लिए इक_ा किए गए पैसों से शराब पीकर वह अविस्मरणीय नृत्य करते हैंं—ठगिनी क्यों नैना झमकावै! यह शायद साहित्य में दर्ज पहली दलित आवारगी थी जिसे प्रेमचंद ने लिखकर अमर कर दिया।

राहुल सांकृत्यायन के ‘घुमक्कड़ शास्त्र’ के बावजूद अभी तक आवारगी का कोई शास्त्र नहीं बना। वह शायद बन भी नहीं सकता। आवारगी से शास्त्र बनते हैं, लेकिन आवारगी को किसी शास्त्र में नहीं समेटा जा सकता। आवारगी जन्मना होती है। सोच समझकर आवारगी नहीं हो सकती और आवारगी निरुद्देश्य भी नहीं होती। जेबों में नोट ठूँसकर या क्रेडिट कार्ड के भरोसे की गई आवारगी अपने नाम पर कलंक है। जिसने आजतक बिना टिकट ट्रेन की यात्रा नहीं की उसका जीवन व्यर्थ है। आवारगी में एक गहरी निस्संगता चाहिए होती है। ‘एन ऑटोबायोग्राफी ऑव ए सुपरट्रैम्प’ के नायक की तरह, जो टिकट चेकर से बचने के लिए रेल के डिब्बों में छिपने-छिपाने के उपक्रम में ट्रेन से गिरकर अपनी एक टाँग गवाँ बैठता है। उसे इसका भी कोई अफसोस नहीं, अब वह बैसाखी के सहारे आवारागर्दी करता है अपनी एक टाँग कटने की घटना उसके लिए एक छिपकली की पूँछ कटने से अधिक नहीं।

नई दिल्ली के लोधी गार्डन में सुबह-शाम रिबॉक के जूते पहनकर जॉगिंग करने वाले संतुष्ट सुअरों के विचरण को आवारगी नहीं कहा जा सकता। पटना में फ्रेजर रोड के किसी रेस्त्रां के नीम अंधेरे में किसी सुन्दर कन्या से सटकर बैठना भी आवारगी नहीं है। आवारगी वीकएंड का उद्यम नहीं है, बल्कि वह एक सतत प्रक्रिया है। वामन की तरह समूची पृथ्वी को तीन डग में नाप लेने वाले कूपमंडूक तो बहुत नज़र आएँगे पर अपने स्थान और अपने करघे पर बैठा हुआ कबीर कहीं नहीं जाकर भी (सिर्फ मगहर को छोड़कर) समूची दुनिया में आवारगी करता रहता है और सोलहवीं शताब्दी की वह आवारा औरत मीरा, जो दुर्ग-दीवारों को तोड़कर हाथ में इकतारा लेकर निकल पड़ी थी—साधुओं की संगत में। कविता भी प्रतिरोध हो सकती है—कबीर से सीखो। नृत्य भी विद्रोह हो सकता है—मीरा से सीखो।

यह सही है कि किसी आवारा के पत्रोत्कंठित जीवन का विष बुझा हुआ होता है, फिर भी निराला की तरह उसके हृदयकुंज में आशा का एक प्रदीप हर-पल जलता रहता है। तो क्या निराला ने बगैर आवारगी के ‘तोड़ती पत्थर’ कविता लिखी होगी—

वह तोड़ती पत्थर

देखा उसे मैंने

इलाहाबाद के पथ पर

क्या बिना किसी धुआँधार आवारगी के निराला ने आनन्द भवन की अय्याश अट्टालिकाओं पर गुरु हथौड़ा प्रहार किया था?

हर नया विचार किसी न किसी आवारगी में आकार लेता है। हर सृजनात्मकता के पीछे कोई आवारगी ज़रूर होती है और फिर कविता जैसी कला के लिए तो आवारगी खाद-पानी की तरह मुफीद होती है। उसके बगैर शायद कविता संभव ही नहीं है। फिर भी घनघोर आश्चर्य की बात है कि भारतीय और पाश्चात्य काव्यालोचना में आवारगी का कहीं कोई जि़क्र नहीं पाया जाता। न वह वृत्ति है न प्रवृत्ति न तत्त्व। काव्यालोचन से आवारगी पूरी तरह बहिष्कृत है। जैसे यह कोई काल्पनिक चीज़ है, तो फिर कविता क्या है? कविता की दुनिया में आलोचना अब भी एक कुलीन इलाका है—जहाँ ऐसी पथभ्रष्ट प्रवृत्तियों की थियरी नहीं बनाई जा सकती।

Hektor, the Trojan hero. Aristotle questions his courage.

Hektor, the Trojan hero. Aristotle questions his courage.

आवारगी अब भी आलोचकों द्वारा निंदित क्षेत्र है। कवि अवश्य आवारा प्रसिद्ध हुए हैं, उनकी आवारगी की भी किंवदन्तियाँ बनी हैं। लेकिन संस्कृत के अलंकार शास्त्रियों, रीति-आचार्यों से लेकर अब तक उत्तर-आधुनिक विखंडनवादियों तक किसी भी कविता-क्रिटिक ने आवारगी की गर्द-भरे आईने से कविता कला का क्रिटिक नहीं लिखा है। जबकि बहुधा बगैर भाषा के कविता संभव हो सकती है, लेकिन बगैर आवारगी के नहीं।

अब तक की काव्यालोचना में आवारगी, यायावरी, भले ही काव्य तत्त्व के रूप में नहीं पर परोक्ष रूप से कहीं मिलती है तो राजशेखर की ‘काव्यमीमांसा’ में। काव्यालोचना के इस अपूर्व ग्रन्थ के रचयिता ने कृति में स्वयं को यायावरीय कहा है। और यह तो पहले ही आ चुका प्रसंग है कि समूचे भारतवर्ष में आवारगी करने के बाद कवि राजशेखर अब काशी में बसना चाहते हैं। ध्यान से देखने पर पता चलता है कि काव्यशास्त्र की हस अपूर्व पुस्तक की शैली भी किसी यात्रा-वृतान्त की तरह है। यह तब तक का संस्कृत साहित्य का इतिहास भी है और इसका ‘काव्य-पुरुष’ अध्याय पढ़कर लगता है कि यह एक रोचक आख्यान है। यहाँ खंडन भी है और नई स्थापनाएँ भी। इस पुस्तक में अपने समय के बौद्धिक वातावरण का बहुत ही प्रामाणिक व सरस वर्णन हुआ है।

एक बार मैं अपने समय से और समकालीनता से इतना सताया हुआ था कि मिशेल, फुको, रोलाँ बार्थ, देरीदा, वॉल्टर बेंजामिन, एडोर्नो, एडवर्ड सईद, अमर्त्य सेन अैर ब्रोदोलो को चकमा देकर राजशेखर की ‘काव्यमीमांसा’ में घुस गया। हज़ार साल का गच्चा मार गया। आवारगी के सामने काल हाथ जोड़े खड़ा रहता है। सच्चा आवारा एक आनन्द-यात्रा में रहता है।

मेरी यह आवारगी राजशेखर के साथ थी। राजशेखर को इस तरह भी देखा जाना चाहिए कि वह पहला कवि आलोचक था, जिसने कहा था कि स्त्री भी कवि हो सकती है। न केवल हो सकती हैं, बल्कि थीं। ‘काव्यमीमांसा’ में राजशेखर ने जिन समकालीन स्त्री कवियों का जि़क्र किया है, उनमें कर्णाटदेश की विजयांका, लाटदेश की प्रभुदेवी, विकट नितंबा, शांकरी, पांचाली, शीला भट्टारिका और सुभद्रा हैं। इतनी कवयित्रियाँ तो अभी समकालीन हिन्दी कविता के परिदृश्य में भी दिखाई नहीं पड़तीं।

क्या यह आश्चर्य की बात नहीं है कि राजशेखर बनारस में बसने वाले अपने श्लोक में जिन भू-भाग की स्त्रियों का जि़क्र करते हैं, वहाँ-वहाँ की कवयित्रियों का जि़क्र उनकी ‘काव्यमीमांसा’ में भी है। इसे क्या समझा जाए? आप चाहें तो ‘काव्यमीमांसा’ को एक रसिक के आख्यान की तरह भी पढ़ सकते हैं या फिर आलोचनात्मक आख्यान; या फिर यह एक प्रसिद्ध कवि की मुग्ध कर देने वाली कारीगरी है, जहाँ साहित्य के सारे रस एक ही सरोवर में एकाकार हैं। स्त्री कवियों का जि़क्रभर ही नहीं, बल्कि उनकी कला के बारे में भी हमें पता चलता है। विजयांका को उन्होंने वैदर्भी रीति की रचना में कालिदास के बाद अन्यतम बताया है। तारीफ का यह तरीका आपको नामवर सिंह की याद दिला सकता है—सटीक और निशाने पर। लाटदेश की प्रभुदेवी के बारे में राजशेखर लिखते हैं कि उन्होंने सूक्तियों, कामकेलि तथा कलाओं का काव्य में सन्निवेश कर अपने को अमर कर दिया। भारतवर्ष के सभी भू-भागों की स्त्री कवियों का वर्णन ‘काव्यमीमांसा’ में उपलब्ध है। जिसे पढ़कर बीच-बीच में आपको भ्रम हो सकता है कि आप वात्स्यायन का कामसूत्र पढ़ रहे हैं। कवियों की जीवन शैली, आचार इत्यादि का अध्याय तो राजशेखर ने ‘कामसूत्र’ से लिया ही है।

राजशेखर ने विकट नितंबा की रंजित वाणी की प्रशंसा की है। शीला भट्टारिका के लिए कहा है कि वे पांचाली रीति से कविता करने वाली उत्तम कवि भी थीं। और सुभद्रा की रचना विवेकपूर्ण होती थी। इतना रसभीगा होने के बावजूद राजशेखर का ‘काव्यमीमांसा’ आलोचना ग्रन्थ है और हज़ार बरसों से है।

आलोचना ग्रन्थ होने के बावजूद यह एक कवि की आलोचना है, इस बात का पता हमें तब चलता है, जब राजशेखर अपने समकालीनों और पूर्ववत्र्ती कवियों की आलोचना ईष्र्या से भरकर काव्योक्त ढंग से करते हैं। उनका कहना है कि बाण की स्वच्छन्द वाणी किसी कुलटा स्त्री जैसी है, हालांकि उनकी पदरचना अच्छी है। माघ पर आक्रमण करते हुए वे लिखते हैं—माघ की रचना माघ की तरह कँपाने वाली है और कवियों का उत्साह भंग करने वाली है इत्यादि। यह एक ऐसे बौद्धिक-आवेग-ताप से रची हुई कृति है, जिसकी आँच एक हज़ार वर्ष बाद भी मद्धम नहीं पड़ी है। मेरी आवारगी मुझसे पूछती है कि आखिर बचेगा क्या?

राजशेखर ने अपने को यायावर कुल का कहा है। यानी जिस कुल का काम आवारगी है। एक बंजारा जाति होती है घूमने-फिरने वाली। राजशेखर भी आवारा कवियों के कुल के थे। अकालजलद उनके पूर्वज थे। काव्य पुरुष जैसी कल्पना राजशेखर ही कर सकते थे। इस अध्याय को आप किसी उपन्यास की तरह पढ़ सकते हैं—आत्मकथा की तरह भी। जब काव्यपुरुष माँ सरस्वती को परेशान करने लगा तो उसके लिए साहित्य विद्यावधू का निर्माण किया गया। यह काव्य पुरुष भी आवारगी में माहिर है। पहले वह पूर्व दिशा की ओर जाता है। साहित्यवधू उसे रिझाने का असफल प्रयास करती है। काव्यपुरुष फिर पांचाल देश जाता है, अवन्ती जाता है, दक्षिण जाता है, उत्तर जाता है। और विदर्भ जाकर काव्यपुरुष साहित्यवधू से गन्धर्व विवाह करता है। ऐसी घुमक्कड़ी—ऐसी आवारगी। क्या आपको नहीं लगता कि यहाँ राजशेखर फिर अपनी आत्मकथा लिखने लगे हैं? काव्यपुरुष राजशेखर ही थे। ‘काव्यमीमांसा’ का यह अध्याय लगभग जादुई है, यथार्थ है या नहीं, पता नहीं।

इस जादू के बावजूद ‘काव्यमीमांसा’ काव्यशास्त्र का विलक्षण ग्रन्थ है। राजशेखर कहते हैं सतत् अभ्यास से वाक्य में पाक आता है। राजशेखर कहते हैं कि कविता करना ठीक है पर कुकवि होना ठीक नहीं। यह सजीव मरण है।

राजशेखर कितनी सरलता से यह कहते हैं कि एक कवि के तो घर में ही काव्य रह जाता है। दूसरे का काव्य मित्रों के घरों तक पहुँचता है। किन्तु दूसरी तरह के कवियों का काव्य विदग्धों के मुख पर बैठकर पैर रखकर हर तरफ फैल जाता है। क्या आपको यह समकालीन हिन्दी कविता पर लिखी टिप्पणी नहीं लगती है?

आवारा लोगों और आवारगी के बारे में भी ‘काव्यमीमांसा’ में एक श्लोक है—

                पुष्पिण्यौ चरतौ जंघे भूष्णुरात्मा फलेग्रहि:।

                शेरेस्य सर्वे पाप्यान: श्रमेण प्रपर्थ हता:।।

अर्थात् आवारगी से जाँघें दृढ़ हो जाती हैं। आत्मा भी मज़बूत और फलग्राही हो जाती है और उसके सारे पाप पथ पर ही थक कर नष्ट हो जाते हैं। राजशेखर की ‘काव्यमीमांसा’ दरअसल आवारगी का काव्यशास्त्र है। पाणिनी ने कहा होगा, दण्डी ने, भारवि ने, कालिदास ने, भरत ने—उग्रट ने कहा होगा, लेकिन अब यायावरीय राजशेखर कहता है। जैसे यायावरी दिए गए दृष्टान्त के सिद्ध होने का प्रमाण हो। यह पुराणों में वर्णित भारत-वर्ष का भ्रमण करके लिखा हुआ काव्यशास्त्र ग्रन्थ है। एक ऐसे समय और समाज में यह लिखा गया, जहाँ बौद्धिक उत्तेेजना का माहौल था। जब टीकाएँ मूल ग्रन्थों से अधिक प्रसिद्ध हो चली थीं। राजशेखर ने अपने समय तक के संस्कृत वाङमय का गम्भीर अध्ययन किया था, जिसकी तेजस्वी झलकें हमें ‘काव्यमीमांसा’ में जहाँ-तहाँ मिलती रहती हैं। खंडन और स्थापना। आवारगी ने एक यायावर को काव्यालोचना का काव्यपुरुष बना दिया।

वैसे संस्कृत में यायावरों की कमी नहीं रही। संस्कृत में गद्य काव्य लिखनेवाले महाकवि सुबन्धु के ग्रन्थ ‘वासवदत्ता’ में यायावरी के कई मनोरम दृश्य हैं। उनकी आवारगी ने ही उनसे ऐसा कामोद्दीपक वर्णन करवाया होगा—’पर्वत के चारों ओर शिप्रा बह रही थी। शाम को सुन्दरियाँ उसमें स्नान करने आया करती थीं—उनकी गहरी नाभि में भर जाने के कारण नदी-जल कुंठित हो जाया करता था। वह ललना अपने उन्नत पयोधरों से अलकृंत हो रही थी—उस समय उसके स्तन ऐसे लग रहे थे, जैसे उन्हें गिरने के भय से लौह-कील से जड़ दिया गया हो। वे मानो कामदेव के एकान्त निवास-स्थल हों और वे ऐसे लग रहे थे, जैसे समस्त अंगों के निर्माण के बाद बचे हुए लावण्य के ढेर हों।

आवारगी भले ही घोर निराशा में की जाए, लेकिन उसमें कामभाव छिपा रहता है। एक कामांक्षा। आज तो यह विपुला पृथ्वी सबको एक गाँव दिखाई पड़ रही है तो इसमें आवारा लोगों का कोई कम योगदान नहीं है।

                रात हँस-हँस के ये कहती है कि मैखाने में चल

                फिर किसी शहनाज़े-लाला-रुख के काशाने में चल

                ये नहीं मुमकिन तो फिर ऐ दोस्त वीराने में चल

क्या आवारगी का राष्ट्र-गीत ‘आवारा’ लिखने वाले मजाज़ लखनवी ने कभी भर्तृहरि का शृंगार-शतक पढ़ा होगा—

                मान्सर्ममुत्सार्य विचार्य कार्य-

                भार्या: समर्यादमिद वदन्तु।

                सेत्या नितम्बा: कियु भूधराणा-

                स्मरस्मेर-विलासिनीनाम्ï॥

अर्थात्

शहनाज़े-लाला-रुख के काशाने में चल या फिर किसी वीराने में।

                इक महल की आड़ से निकला वो पीला माहताब

                जैसे मुल्ला का अमामा, जैसे बनिए की किताब

                जैसे मुफलिस की जवानी, जैसे बेवा का शबाब

                ऐ गमे-दिल क्या करूँ, ऐ वहशते-दिल क्या करूँ?

मजाज़ की कविता का केन्द्रीय तत्त्व आवारगी है। जीवन भी। मजाज़ के साथ मेरी आवारगी के भी कई किस्से हैं। आवारगी ज़रूरी नहीं कि समकालीनों के साथ ही हो—वह कभी-कभी तो किसी एक टिमटिमाते हुए सितारे के साथ भी हो सकती है।

किताबों के साथ तो मैंने बहुत आवारगी की है। दोस्तायवस्की की ‘जुर्म और सज़ा’, तालस्ताय की अन्ना, पुनरुत्थान, युद्ध और शांति, काम्यू का आउट साइडर, काफ्का की ट्रायल और चीन की दीवार, रेणु की परती-परिकथा। बाणभट्ट की आत्मकथा का बाण तो खुद बहुत बड़ा आवारा था, नाम गिनवाने का कोई अर्थ नहीं और इधर मैं समकालीनता पर धूल फेंकता हुआ संस्कृत क्लासिकों के साथ आवारगी कर रहा हूँ।

जो सर्वाधिक निन्दित हो, उसके साथ आवारगी का अलग अपना मज़ा है—जैसे राजशेखर की ‘काव्यमीमांसा’।

मैं इतनी सारी कथा-कृतियों का आशिक और राजशेखर साथ चलते हुए कहते हैं कि जिस कवि की प्रतिभा का क्षय निम्नकोटि की कथा-रचना में नहीं होता, वहीं कवियों में श्रेष्ठ है।

मैं अभी बनारस नहीं बसना चाहता, क्योंकि मेरे रास्ते में अभी बहुत सारे लावण्य के ढेर बिखरे हुए हैं!

(कृष्ण कल्पित रचित ‘आवारगी का काव्य-शास्त्र’ नामक ग्रन्थ का प्रथम अध्याय समाप्त। इति यायावरीय:।)

कृष्ण कल्पित

कृष्ण कल्पित

अपने तरह का अकेला-बेबाक और विवादित कवि । कृष्ण कल्पित का जन्म 30 अक्टूबर, 1957 को रेगिस्तान के एक कस्बे फतेहपुर शेखावटी में हुआ। अब तक कविता की तीन किताबें और मीडिया पर समीक्षा की एक किताब छप चुकी है। एक शराबी की सूक्तियां  के लिए खासे चर्चित। ऋत्विक घटक के जीवन पर एक पेड की कहानी नाम से एक वृत्तचित्र भी बना चुके हैं।  अभी  हाल ही में बाग़-ए-बेदिल नाम से  एक विलक्षण  और विशाल  काव्य-संकलन  प्रकाशित । आवारगी का काव्यशास्त्र  इसी संकलन  की भूमिका है। 

समकालीन कविता का आत्मसंघर्ष: सुधीर रंजन सिंह

By सुधीर रंजन सिंह 

(इस आलेख को भारत भवन में प्रस्तुत करने को लेकर मुझे एक अत्यंत आत्मीय और अग्रज कवि से तीखे विवाद और आत्मसंघर्ष से गुज़रना पड़ा है। मैं कभी किसी राजनीतिक संस्था या लेखक संगठन का सदस्य नहीं रहा। मैं कवि और आलोचक हूँ। कदाचित अस्वीकृत। स्वीकृति की शर्तें पूरी करने में मैं अपने को अयोग्य अनुभव करता हूँ। मंच और संस्थाओं से संवाद के स्तर पर मेरा सम्बन्ध रहा है। इसके लिए भी मैंने खुद होकर विशेष प्रयास नहीं किया। आलोचनात्मक लेखन प्रायः मैंने अपनी अकादमिक आवश्यकताओं  के अधीन किया है। आमंत्रण अथवा आग्रह पर कुछ ही लेखन किए हैं। अवसर ही कम थे। दूसरे स्तर पर, अपने लोगों से सीखने में मैं कभी पीछे नहीं रहा। यह प्रक्रिया है, जिसका लाभ मुझसे दूसरों ने भी लिया होगा। मेरा अनुभव है कि मेरी बातों का जिन लोगों ने लाभ लिया, मंच पर खड़े होने की दशा में उन्होंने मेरी तरफ पीठ कर ली।
मंचों की पीठ मेरी ओर अधिक रही। प्रतिबद्धता की पीठ भी मेरी ओर रही। विरोधियों का सामना करते हुए यह बात होती तो मैं इसे भी सह लेता। उनके साथ तो सामंजस्य के कीर्तिमान स्थापित किए गए। कॅरियर की दुनिया में, चाहे वह साहित्य से सम्बन्धित क्यों न हो, कोई सचमुच शत्रु नहीं होता और सच्चा मित्र भी शायद ही कोई होता है। सच यही है कि सत्ता संरचना से बाहर कोई नहीं है, और इसका पापबोध भी नहीं है। सामंजस्य को रणनीति की संज्ञा दी जाती है। लेकिन उनका यह सोचना कहाँ तक ठीक है कि दूसरे हमेशा  बिना हथियार और रणनीति के अपने पापबोध में अलग-थलग पड़े रहें?
मित्र की मर्जी के विरुद्ध मैंने यह आलेख प्रस्तुत किया, निश्चित  ही यह अपराध मुझसे हुआ है। इसे लेकर मैं यही अनुभव करता हूँ, भर्तृहरि का श्लोक है- ‘‘बौद्धरो मत्सरग्रस्ताः प्रभवः स्मयदूषिताः। अबोधोपहताष्चान्ये जीर्णमंङ्गे सुभाषितम्।।’’ इसकी अनुरचना मेरे द्वारा की गई है- ‘‘जाऊँ, किसे सुनाऊँ/ ठहरे जो विज्ञ विषारद/ रोग डाह का उन्हें लगा है/ कुबेर बड़े कि अधिकारी जो/ रहते ऐंठे-ऐंठे हैं/ जनगण है अपना/ समझ उतना पाए न वह/ छीज जातीं बातें अच्छी/ देह के भीतर।’’)

 लाँग नाइन्टीज़: अनेकान्त काल

विषय है मानवीय मूल्य और समकालीन हिन्दी कविता का आत्मसंघर्ष। यहाँ विशेषण के रूप में आया मानवीय स्वयं मूल्य है, और जहाँ तक मुझे ध्यान है कविता के सन्दर्भ में मानवीय मूल्य को आगे करके कोई बहस नहीं चली है। हिन्दी में नई कविता के सिद्धान्तकारों के द्वारा प्रचलित पद है- मानव मूल्य। यह बहस के लिए तब बड़ा विषय हुआ करता था और उसके पीछे एक उद्देश्य था। साहित्यिक बहसों के पीछे उद्देश्य प्रायः राजनीतिक ही हुआ करते हैं। मानव मूल्य पर विचार के साथ भी यह था। मुझे थोड़ी देर के लिए उस प्रसंग में जाने की इजाजत दें। उसके बाद मैं समकालीन कविता के आत्मसंघर्ष पर जिरह की इजाजत चाहूँगा। अन्त में यदि सम्भव हुआ तो मानवीय मूल्य पर अपनी बात समाप्त करूँगा।

धर्मवीर भारती की एक पुस्तक का नाम है- मानव मूल्य और साहित्य। भारती नई कविता के प्रमुख कवियों में से हैं, लेकिन नई कविता के प्रमुख सिद्धान्तकार थे लक्ष्मीकांत वर्मा और विजय देवनारायण साही। लक्ष्मीकांत वर्मा की पुस्तक नई कवित के प्रतिमान, जो बहस की दृष्टि से उस ज़माने में पर्याप्त महत्त्व की थी, में एक लेख है- मानव विशिष्टता और आत्मविश्वास के आधारमानव विशिष्टता से लक्ष्मीकांत वर्मा का आशय मानव मूल्य ही था। यह 1957 की पुस्तक है। इससे पहले 1948 से 1956 के बीच जयशंकर प्रसाद से पद उधार लेकर लघुमानव की धारणा को आगे किया गया था, जिसका विकास विजय देवनारायण साही के प्रसिद्ध विवादित लेख लघुमानव के बहाने हिन्दी कविता पर बातचीत में हुआ। उसमें लघुमानव को मानव मूल्य का सैद्धान्तिक आधार दिया गया और छायावाद से लेकर अज्ञेय तक की कविता पर विचारोत्तेजक टिप्पणी की गई। बाद में लक्ष्मीकांत वर्मा ने साही के प्रयास को नई कवितावादी सूत्र के रूप में सामने रखा मानव मूल्यों के सन्दर्भ में लघु-मानव की कल्पना नामक लेख में। इस प्रकार, ‘मानव मूल्य पद अथवा अवधारणा नई कविता द्वारा प्रचलित है। उसी की शब्दावली में कहें तो यह नई कविता के सहचिन्तन की उपलब्धि है। यह अच्छी बात है कि नई कविता में सामूहिक चिन्तन था, जो आज प्रायः दुर्लभ हो गया है। उस सामूहिक चिन्तन का दोष यह था, मुक्तिबोध की शब्दावली में कहें, उसने एक क्लोज्ड सिस्टम बना लिया था, जिससे संघर्ष की आवश्यकता थी, और जिसे मुक्तिबोध ने आत्मसंघर्ष की संज्ञा दी थी – नई कविता का आत्मसंघर्ष। आज हम समकालीन कविता के आत्मसंघर्ष पर बात कर रहे हैं तो उस आत्मसंघर्ष को भी याद किया जाना चाहिएजिसे मुक्तिबोध ने नई कविता के सन्दर्भ में आवश्यक समझा था। उनकी यह बात यहाँ याद करने योग्य है, ‘‘नई कविता में स्वयं कई भावधाराएँ हैं, एक भाव-धारा नहीं। इनमें से एक भाव-धारा में प्रगतिशील तत्त्व पर्याप्त है।  समीक्षा होना बहुत आवश्यक है। मेरा अपना मत है, आगे चलकर नई कविता में प्रगतिशील तत्त्व और भी बढ़ते जाएँगे, और वह मानवता के अधिकाधिक समीप आएगी।’’1

आगे चलकर नई कविता में प्रगतिशील तत्त्व तो नहीं बढ़े- नई कविता ही नहीं रही- लेकिन प्रगतिशील कविता का जो अगला विस्तार हुआ, उसमें नई कविता के तत्त्व अवश्य बढ़ गए। यह एक हद तक ज़रूरी भी था। नई कविता में नएपन पर जो जोर था, उसका मूल्य है। उसके कुछ दीग़र मूल्यों से असहमति की गुंजाइश है। मुक्तिबोध का आत्मसंघर्ष उसी गुंजाइश को दर्शाता है। उनके यहाँ मानवता का प्रयोग नई कविता के सहचिन्तन के परिणाम के रूप में आने वाला मानव मूल्य के अर्थ में नहीं हुआ है। नई कविता में मानव मूल्य को अर्थ दिया गया था- अनुभूति की प्रामाणिकता, ‘अनुभूति की ईमानदारी आदि। इस अर्थ में खोट नहीं है, खोट है इसकी ऐतिहासिक नियति में। नई कविता से पहले यूरोप में आवाँगार्द कला में प्रामाणिक अनुभव को पकड़ने का सराहनीय प्रयास हुआ था, लेकिन बाद में वही प्रामाणिक अनुभव शीतयुद्ध की राजनीति की विचारधारा बना, जिसका शिकार नई कविता भी हुई। उसके प्रति मुक्तिबोध ने सावधान किया था। उनके शब्द हैं, ‘नई कविता के बुर्ज से शीतयुद्ध की गोलन्दाजी हो रही है। यह आकस्मिक नहीं है कि मुक्तिबोध ने अनुभूति की प्रामाणिकता के वज़न पर जीवनानुभूति पद को आगे किया। जीवनानुभूति में मानवता का पक्ष प्रबल है। आज हम कह सकते हैं कि जीवनानुभूति की धारणा कविता के सन्दर्भ में पर्याप्त नहीं है, लेकिन उसकी ऐतिहासिक आवश्यकता से इनकार नहीं कर सकते हैं। उसमें शीतयुद्ध की गोलन्दाजी के विरुद्ध जीवनानुभूति के ज़रिए मानवता के अधिकाधिक समीप जाने की चेष्टा की गई है।

शीतयुद्ध 1986-’87 में समाप्त हो गया। आज यह बहस बेकार है कि शीतयुद्ध का खलनायक अमरीका था या अमरीका और रूस दोनों देश। सिर्फ़ यही कहा जा सकता था कि द्विधु्रवीय व्यवस्था से विश्वव्यापी संकट पैदा हो गया था। शीतयुद्ध की समाप्ति के पाँच साल बाद सोवियत-कम्यून भी समाप्त हो गये और  नई विश्व-व्यवस्था आई। इस बात को बीस साल हो गए हैं। आज इस गोष्ठी के माध्यम से कविता के सन्दर्भ में मानव मूल्य का प्रश्न उठाया गया है तो इसकी प्रासंगिकता को समझना हमारे लिए ज़रूरी है। नई कविता की वापसी तो सम्भव नहीं है, लेकिन मुझे लगता है कि नई कविता की जो राजनीति थी, जिससे मुक्तिबोध ने अगाह किया था, उसी तरह की समझ की वापसी हो रही है।

90 के बाद का समय हमारा जीवन काल है- हमारा यानी सामान्य रूप से स्वाधीनता के आसपास जनमे लोगों से लेकर युवतम पीढ़ी का। इनमें संवेदना अथवा चेतना के धरातल पर मैं बहुत भेद नहीं करना चाहता। समसामयिक होने के नाते लोगों के पूर्वग्रह काम कर सकते हैं। समकालीनता के साथ यह बात प्रायः होती ही है। वर्तमान मतभेद की भूमि न हो, तो वह कितनी बेजान चीज़ होगी, इसका अनुमान किया जा सकता है। इसके बावजूद, वर्तमान की वास्तविक विशिष्टताओं का शरसन्धान कठिन होता है। इसके लिए बहुत बड़ी बहस की आवश्यकता है। वर्तमान के अन्तर्विरोध आखिर हमारे ही अन्तर्विरोध होते हैं, जिन्हें समझने के लिए समसामयिक ऐतिहासिक यथार्थ को कठोर आत्मचेतना के स्तर पर पहचानने की आवश्यकता होती है।

समकालीनता पर कच्ची-पक्की बहसें हमेशा चलती रहती हैं। कविता के सन्दर्भ में कई उल्लेखनीय बहसें हुई हैं। अभी-अभी एकांत श्रीवास्तव ने वागर्थ का अंक निकाला है- हिन्दी कविता: 80 के बाद (लाँग नइान्टीज़)। उसमें दस लोगों ने बहस में भाग लिया है। लाँग नाइन्टीज़ की अवधारणा बद्रीनारायण की है। 2008 में देखने को मिली द लाँग नाइन्टीज़: समय को समझने का एक विनम्र प्रस्ताव शीर्षक से। उसी की कड़ी है फटी हुई जीभ की दास्तान नामक लेख जो 2009 में छपा था। वह विचारोत्तेजक मामला है, जिस पर मैंने थोड़ा-सा लिखा है जो आलोचना के नए अंक में छपा है। आज की बहस में भी मैं लाँग नाइन्टीज़ से जुड़ी कुछ बातें कहने की इजाजत चाहूँगा।

लाँग नाइन्टीज़ के पहले राजेश जोशी और विजय कुमार आलोचना के मंच से समकालीनता और कविता विषय को बहस के लिए आगे कर चुके थे। बाद में राजेश जोशी ने अपनी दूसरी नोटबुक वाली किताब का नाम ही रखा- समकालीनता और साहित्य। उसमें समकालीनता और कविता लेख में मेरी धारणा का उल्लेख किया गया है, जो मैंने एरिक हॉब्सबॉम की ‘शॉर्ट सेंचुरी के वज़न पर रखी थी- हमारे अपने सन्दर्भ में 19वीं शताब्दी की शुरूआत 1857 के विद्रोह से और 20वीं शताब्दी की शुरूआत 1947 में मिली आज़ादी से मानी जानी चाहिए। राजेश जोशी ने अपनी सुविधा के अनुसार मेरी उस बात को छोड़ दिया कि हमारे सन्दर्भ में 20वीं शताब्दी लगभग असमाप्त है। समाप्ति के कुछ चिह्न बाबरी मस्जिद के ध्वंस और उसके बाद की कुछ घटनाओं में अवश्य दिखते हैं। लेकिन हम 21वीं शताब्दी में आ गए हैं, कि इसे लेकर मेरे मन में दुविधा है। सूचना-प्रौद्योगिकी के विस्तार के लिहाज से यह आप कह सकते हैं कि हम लगभग 21वीं शताब्दी में आ गए हैं।

यह हमारा जीवन काल है। जब तक हम जि़न्दा हैं इसे समझने के लिए बार-बार नए सिरे से प्रयास की आवश्यकता होगी। और यह कोई प्रलय-काल नहीं है। वे बहुत-सी आशाएँ जो मनुष्य ने कल्पित की थीं, इस काल में फली-फूल रही हैं। एक स्वप्नहीनता के बावजूद। यह बात कविता में भी है। कविता का अर्थ होता है स्वप्नहीनता के विरुद्ध होना, भविष्य की ओर देखना। ब्रेख्त की मशहूर कविता है आने वाली पीढि़यों से, जो इस बेचैनी के साथ शुरू होती है- सचमुच, मैं एक अँधेरे वक्त़ में जी रहा हूँ!यह उस वक्त़ की कविता है जब द्वितीय विश्वयुद्ध का आग़ाज़ हो चुका था। मानवता भीषण ख़तरे में पड़ गई थी। यह कवि के लिए घोर आत्मसंघर्ष का दौर था, जिसमें वह अपनी कमियों को भी टटोलता है। सबने पढ़ी होगी यह कविता। कविता समाप्त होती है-

पर तुम, जब वह वक्त आए

आदमी आदमी का मददगार हो

याद करना हमें

कुछ समझदारी के साथ।

वह वक्त़ आए, कविता इसी के लिए लिखी जाती है। इसी बात में कवि की समकालीनता, आत्मसंघर्ष और भविष्य में उसका जीवन है। यही मानवीय मूल्य भी है। मानवीय मूल्य सत्य के अन्वेषण में है। सत्य वही नहीं जो हम देखते हैं, बड़ा सत्य वह है जो हम चाहते हैं। सवाल यह है कि हम चाहते क्या हैं और कितनी ताकत के साथ चाहते हैं। बहुत ऊर्जा चाहिए। बहुत ताकत चाहिए। बहुत सावधानी भी चाहिए। लेकिन विगत के उद्यमों, चाहे वे आसन्न विगत के क्या न हों, को झुठलाने और नकारने की आवश्यकता नहीं पड़नी चाहिए। पुराने के बीच से ही नया फूटता है। नए के भीतर से दूसरा नया फूटेगा। पुराना फ़ैशन की तरह कभी न लौटे, लेकिन उसका अद्भुत अपनी जगह ज़रूर बना रहेगा, और उसमें झाँकने की भी आवश्यकता बनी रहेगी।

समकालीन कवि वह है जो अपने को पूर्ववर्तियों की वैचारिक मान्यताओं की कड़ी के रूप में देखता है। वह केवल वास्तविकता की ओर उन्मुख नहीं है। वास्तविकता को वह आत्मचेतना के स्तर पर रचने का प्रयास करता है, जिसमें भविष्य और उसके रास्ते संकेतित होते हैं। यह काम चुपचाप चलता है, बहुत बोलकर नहीं। कविता की यही प्रकृति है। कवि के आत्मसंघर्ष की यह प्रकृति है। कवि वास्तविकता का हिस्सा मात्र नहीं होता। वह वास्तविकता के विरुद्ध एकांत की रचना करता है,और एकांत जिस चुप्पी की रचना करता है उसमें अनन्त का स्फोट होता है। दूसरे शब्दों में, भविष्य का स्फोट होता है।

प्रश्न है हमारा समय क्या है? हमारे समय की कविता कैसी है? बद्री हमारे समय को लाँग नाइन्टीज़ नाम देते हैं। लाँग नाइन्टीज़ यानी हॉब्सबॉम की ‘शॉर्ट सेंचुरी के बाद का समय, जिसमें पुराना समाप्त हो चुका, लेकिन नए का स्वप्न साफ नहीं है। लाँग नाइन्टीज़ पद में, इस तरह समाजवाद के भविष्य के प्रति निराशा दिखाई देती है। निराशा उचित है। लेकिन उस निराशा के उत्तर में इधर-उधर से लाए गए वैचारिक संस्रोतों में जो चमक और ऊर्जा देखी गई है, और जिस तरह पूर्व पीढ़ी के कृतित्व पर शरसन्धान किया गया है, वह आत्मश्लाघापूर्ण विच्छेद की ऊँचाई पर है। किसान, मजदूर और प्रोलेटेरियत आन्दोलनांे के बरक्स उपेक्षित एवं दलित, महिला एवं सबाल्टर्न प्रतिरोध बद्री के अनुसार ’90 के बाद की विशेषता है। (वागर्थ-209/34) इससे सहमत होने की गुंजाइश मेरी समझ से कम बनती है। ये बातें बहुत पहले पैदा हो गई थीं। हॉब्सबॉम की पुस्तक एज़ ऑफ एक्सट्रिम्स के शुरू में लोगों की नज़र में बीसवीं शताब्दी क्या है शीर्षक के अन्तर्गत कुछ टिप्पणियाँ शामिल की गईं हैं। नोबेल पुरस्कार से सम्मानित रीता लेवी मोंतेलसिनी की टिप्पणी है, ‘‘सभी बातों के बावजूद इस शताब्दी में अच्छे से अधिक अच्छे के लिए क्रांतियाँ हुई हैं… चैथी सत्ता का उदय और सदियों से दमित नारी का उत्थान।’’ यह बात यूरोप की तुलना में भारत में कम हुई थी, लेकिन हुई थी। कविता में भी ’90 से पहले यह दिखाई पड़ती है। रघुवीर सहाय में स्त्री प्रश्न खूब है। मंगलेश, अरुण कमल, राजेश जोशी और उदयप्रकाश में भी है। यह अलग बात है कि इन कवियों ने इसे अलगा कर दिखाने की कोशिश नहीं की, और पिछले दौर में कवयित्रियों का अभाव रहा। अच्छी बात है कि बद्री ने अपने पूर्व के कुछ कवियों को, जिसमें राजेश और अरुण हैं, सरलीकरण की प्रवृत्ति से बाहर रखकर देखा है, लेकिन इसके लिए उन्हें ’90 का ऋणी बना दिया है। बड़ी चीज़ नब्बे है; जैसे पहले छायावाद के विरुद्ध बड़ी चीज़ नई कविता थी। नयी कविता छायावादी संस्कार की शत्रु थी; ’90 परवर्ती प्रगतिशील संस्कार का किंचित शत्रु हुआ।

प्रगतिशील कविता, अपने सफल-असफल दावों में, मानवता के लिए संश्लिष्ट विश्वदृष्टि अर्जित करने का प्रयास करती है। विश्वदृष्टि का अर्थ विचारधारा अथवा माक्र्सवादी दृष्टि नहीं। विश्वदृष्टि का सम्बन्ध साहित्य से है, वह साहित्य से उद्भूत होने वाली चीज़ है। नई कविता भी विश्वदृष्टि अर्जित करने का प्रयास करती है। अज्ञेय के यहाँ यह बात है। प्रगतिशील कविता और नई कविता, दोनों आधारभूत विभिन्नताओं को टटोलने का प्रयास करती हैं। दोनों अपने-अपने स्तर पर एक जगह आकर मिलने का भी प्रयास करती हैं। शमशेर और मुक्तिबोध, दोनों इस बात के उदाहरण हैं। अच्छी बात थी कि इन कवियों में जीत की तमन्ना थी तो असफलता का इतिहास रचने का साहस था, जो बाद में कम दिखाई पड़ता है। आज सफलता के लिए जोड़-तोड़ कितना बढ़ा है, बद्रीनारायण को भी मालूम है।

बद्रीनारायण ने जितने समकालीन प्रतिरोध गिनाए हैं, उनमें से एक है सबाल्टर्न। यह भी ’90 की कोई संवृत्ति नहीं है। दूसरी बात, जैसे आवाँगार्द की कला में बाद में आकर्षण नहीं बचा था, वही बात सबाल्टर्न के साथ है। सबाल्टर्न लोग त्रासदी के प्रसन्न-चित्त आख्याता बन गए, सांस्कृतिक प्रभुत्व (कल्चरल हिगेमनी) तोड़ना उनके एजेंडे में नहीं रहा। आज जब मजदूरों, किसानों, निम्न बुर्जुआ का लोकप्रिय गठबंधन, जिसे जनता कहा जाता है, गायब हो रहा है, सबाल्टर्न पर फ्रेडरिक जैम्सन की उत्तर आधुनिकता के विमर्षों पर यह टिप्पणी सही बैठती है।

इसके लिए फ्रायड के स्वप्न विश्लेषण के रूपक का इस्तेमाल किया गया है। संभवतः सब बातों के बावजूद यह नई कहानी नहीं है। फ्रायड के उस आनन्द को याद करें जो उन्हें एक अस्पष्ट आदिवासी संस्कृति की खोज से प्राप्त हुआ था। स्वप्न विश्लेषण की अनेक परम्पराओं में से सिर्फ़ यह खोज उनकी अवधारणा के काम की थी कि सभी स्वप्नों के सेक्स सम्बन्धी छुपे अर्थ होते हैं- केवल सेक्स सम्बन्धी स्वप्नों के, जिसके कुछ और ही अर्थ होते हैं। यही बात उत्तर आधुनिक बहसों पर भी लागू होती है। जिस विराजनीतिक नौकरशाही से यह संवाद स्थापित करता है, वहाँ समस्त सांस्कृतिक लगने वाली बातें राजनीतिक नीतिशिक्षण का प्रतीकात्मक रूप निकालती हैं- सिवाय एकमात्र स्पष्ट राजनीतिक स्वर के जो पुनः राजनीति से संस्कृति में घुसपैठ का लक्ष्य रखता है।2

    बद्रीनारायण ने ’90 के दशक में उभरे कवियों में सामान्य सम्बन्ध-सूत्र की दृष्टि से स्थानीयता अथवा लोक को जो महत्त्व दिया है वह तब तक फ्रायडीय आनन्द से आगे की कहानी नहीं बन सकता, जब तक कि उसकी आधारभूत विभिन्नता किसी संश्लिष्ट और मूलगामी विश्वदृष्टि पर आकर नहीं मिलती। कम-से-कम दबाव पैदा करने की षक्ति तो उसमें होनी ही चाहिए। मैं यह नहीं कहता कि आज की कविता में यह बात एकदम नहीं है; लेकिन स्थानीयता अथवा लोक के नाम पर विराजनीतिक नौकरशाही से सामंजस्य बैठाने और सत्ता संरचना में अपने को खपा देने का भी काम कम नहीं हुआ है। संभव है कि इस कहानी के हम भी किरदार और पवित्र पापी हों। इस बात से कविता के आत्मसंघर्ष का गहरा सम्बन्ध है।

    फूको प्रतिपादित करते हैं सत्ता सर्वत्र है। कोई भी ऐसा स्थान नहीं है, जहाँ से प्रतिरोध को सत्ता से अलगाया जा सके। जो विरोध में खड़ा है वह वास्तव में दूसरे प्रकार की सत्ता है। साहित्य अथवा कविता प्रतिरोध की सत्ता के रूप में भी इसका अपवाद नहीं है। इसलिए पूर्व पीढ़ी को कोसना और अपनी पीठ थपथपाना ठीक नहीं है। इस रास्ते हम समकाल के ही बन्दी हो जाते हैं। ठीक काम यह है कि हम समसामयिक ऐतिहासिक यथार्थ और उसकी चुनौतियों से आत्मचेतना के स्तर पर टकराते रहें। इसे सच्ची रचनाशीलता कही जा सकती है। इससे नए रास्ते निकलेंगे, नई युगचेतना निर्मित होगी। परिवर्तनकारी समय (पद बद्री का) की रचना भी इसी रास्ते होगी। भारत माता ग्राम-वासिनी, जो लाँग नाइन्टीज़ के सम्पादकीय में एकांत श्रीवास्तव ने उत्साह में जो कहा है, भावना के स्तर पर मैं उनकी बात की इज्जत करता हूँ, लेकिन उसमें निहित नाॅस्टैलिजिया और रूमानियत से बात नहीं बनेगी। कई-कई विषय और भावधाराओं की ज़रूरत है। समकालीन कविता के आत्मसंघर्ष में केवल गाँव और कस्बा शामिल नहीं हैं। विगत की तुलना में उसके क्षेत्र में कई गुना विषय बढ़ गए हैं। काव्य-वस्तु के विकास के लिए भी संघर्ष करना है, जो इस सूचना प्रौद्योगिकी युग में कई गुना कठिन हो गया है। काव्य-विषय की दृष्टि से हमें भारी कठिनाइयों का सामना करना पड़ सकता है। सूचना प्रौद्योगिकी की पहुँच कवि-चेतना को मात कर देती है। उससे सीखने और टकराने, दोनों की ज़रूरत है। हम सूचना और संचार प्रविधियों की अर्थव्यवस्था में आ चुके हैं। इसकी नई उत्पादन विधि, डी. फोरे की मानें तो, साॅफ्टवेयर के विकास को भी पार कर जाएगी, किस हद तक, उसे अभी समझा नहीं जा सकता है।3 इस तरह कवि-कर्म कठिन से कठिनतर होता जाएगा। ऐसे में, हमारी अन्तःप्रेरणाएँ ही सबसे अधिक काम आएँगी। दूसरी बात, सूचना प्रौद्योगिकी भी विषय है। बड़ा विषय है। जैसे पहले औद्योगिक क्रान्ति और मजदूरों के आन्दोलन बड़े विषय थे।

    हमारे समकालीन कवि दो प्रकार के हैं। एक वे हैं जो अपनी रचना और उसके विषयों को लेकर बहुत मुखर हैं। उन्हें अपने को मनवाने की चिन्ता अधिक रहती है। समझौताविहीन स्तर पर और बेहतरी की दिशा में या कहें प्रगति की मंशा से यदि किसी में यह है, उसे भी आत्मसंघर्ष के रूप में मंजूर किया जाना चाहिए। दूसरे वे हैं जो अपने कवि होने के प्रति संकोच का भाव रखते हैं। उनका आत्मसंघर्ष कठिन है। उनमें अन्तःप्रेरणाएँ अधिक सक्रिय रहती हैं, लेकिन उन्हें समझने में कवि अपने को असमर्थ महसूस करता है। जब कवि ही नहीं समझ पाता तो दूसरों के लिए समझना मुश्किल काम होगा ही। इस मुश्किल के भीतर कवि के आत्मसंघर्ष को समझने और इसी दृष्टि से उसे महत्त्व दिए जाने की आवश्यकता है। आज कवि बहुत हैं, लेकिन इस मुश्किल के भीतर ऊँचाई पाने वाले कवि बहुत कम हैं। जो हैं उन्हें आगे रखकर देखने की ज़रूरत है। आत्मसंघर्ष वाली बात ठीक-ठीक तभी समझ में आ सकती है।

    अन्तःप्रेरणा- जिसे पुराने लोग कारयित्री प्रतिभा कहते थे। यह उत्पाद्य प्रतिभा है। प्रतिभा कहने से भी काम चल सकता है। इसमें अनुभूति, जीवनानुभूति और कलात्मक अनुभूति, सभी बातें शामिल हो जाती हैं। यह सदैव बेहतरी अथवा अच्छाई की दिशा में सक्रिय रहती है। इसे मान लेने के बावजूद, जैसा कि मैं समझता हूँ, अन्तःप्रेरणा वह स्पेस है जहाँ अच्छाई और बुराई को बराबर का दर्जा प्राप्त होता है। अन्तःप्रेरणा में हम एक वस्तु को दूसरी वस्तु को विकल्प के रूप में नहीं देखते, उनसे चेतनागत सम्बन्ध अथवा विषेष प्रकार का तादात्म्य स्थापित करते हैं। सम्बन्ध की प्रकृति अथवा वह विषेष प्रकार क्या है, यह महत्त्वपूर्ण है। अन्तःप्रेरणा की क्रियाओं में अच्छा और बुरा दोनों समान महत्त्व रखते हैं। इस सम्बन्ध में फूको का एक कथन याद आता है, ‘‘मैं नहीं कहता कि सभी चीज़ें बुरी हैं, लेकिन वे सभी चीज़ें खतरनाक हैं जो ठीक-ठीक बुरी के समान नहीं हैं।’’4

    एक साक्षात्कार में यह बात आई है। और मैं जब यह पढ़ रहा था तो अचानक मुझे रामचरितमानस का अन्तिम दोहा याद आया-

कामहि नारि पिआरी जिमि लोभहि प्रिय जिमि दाम।

तिमि  रघुनाथ  निरंतर  प्रिय  लागहु  मोहि राम।

    मैंने शुरू में कहा था कि अंत में मानवीय मूल्य पर भी एकाध बात करूँगा। कामपिपासा और लोभ बुराई है, अमानवीय है। तुलसी ने अपनी भक्ति को उसके समकक्ष रखा। बुराई में जितनी शक्ति होती है, वह भक्ति को प्राप्त हो, भाव यह है। भक्ति को पाने के लिए उस पर बुराई को उत्प्रेक्षित करना पड़ा। मानवीय मूल्य तो ठीक है, लेकिन जो संसार है उसमें मानवीय-अमानवीय, अच्छा-बुरा, सब कुछ है- सुगुन छीर अवगुन जल ताता; मिलइ रचइ परपंच विधाता।

    अन्तःप्रेरणा के क्षेत्र में अन्तर्बाधा के लिए स्थान नहीं है। लेखक के नाते हम जानते हैं कि मूल्य अन्तिम नहीं होते। सात्र्र का यह कथन महत्त्वपूर्ण है, ‘‘मानवता को अभी निर्धारित होना बाकी है।’’ यही समझ हमें फासीवादी होने से बचाती है और आत्मसंघर्ष के लिए युक्ति प्रदान करती है।

    एक साथ कई विषयों से गुज़रना और उनसे जुड़े प्रश्नों पर बात करना कठिनाई पैदा करता है। यह दौर ही ऐसा है- अनेक विषयों और प्रश्नों से घिरा। इस अर्थ में मैं मानता हूँ कि नौवाँ दशक और उसके बाद का समय अलग से दिखाई देता है। लेकिन इसे लाँग नाइन्टीज़ ही कहा जाए, इसे लेकर मेरे मन में दुविधा है। बद्रीनारायण की इस बात से मैं सहमत हूँ कि नब्बे के दशक के पूर्व की कविता में जा वैचारिक संस्रोत काम कर रहे थे, वे बाद में कमजोर पड़ गए या अपर्याप्त साबित हुए। हमारे समय में अनेकान्त का महत्त्व है। हम किसी भी बुनियादी विषय पर एकमत होने की स्थिति में पहले की तुलना में बहुत कम हैं। दूसरी ओर, दूसरों की तरफ से प्रस्तावित विषय और विचार के प्रति हम पहले की तरह द्वेषी नहीं हैं। हम अकेला विकल्प हैं, यह बात अब नहीं रही। हमारा विवाद सबसे है और अपने आपसे भी है, जो जीवन और रचनाशीलता दोनों में मायने पैदा कर रहा है। लेकिन जिस दुनिया में हम जी रहे हैं उसमें ख़तरे भी कई गुना बढ़ गए हैं, उसमें हार जाने का डर विगत की तुलना में बढ़ गया है। यह एक ऐसा क्षण अथवा विन्दु है जो हमें इस समझ पर कायम होने के लिए विवश करता है कि पिछले दर्शन का महत्त्व है, लेकिन उसमें ज़रूरी संशोधन और नये अध्याय जोड़ने की ज़रूरत पड़ेगी। अभी तो हमें यही पता नहीं है कि हम कहाँ जा रहे हैं। यह अनेकान्त काल है। लेकिन रचनाशीलता के लिए, तमाम मुश्किलों के बावजूद, यही ऊर्वर काल है। हमें अपना काम करते हुए इस उम्मीद पर अपने को कायम रखने की ज़रूरत है, जो ब्रेख्त की उद्धृत पंक्तियों में है, ‘…जब वह वक्त आए/ आदमी-आदमी का मददगार हो/ याद रखना हमें/ कुछ समझदारी के साथ। जब वह वक्त़ आएगा तो बे्रख्त के साथ शायद हमें भी कुछ समझदारी के साथ थोड़ा याद रखा जाए। आमीन!

 सन्दर्भ:

(1) मुक्तिबोध रचनावली-5/334 (पे.बै.).

(2) फ्रेडरिक जैम्सन, पोस्ट मार्डनिज़्म ऑर द कल्चरल लॉजिक  ऑफ लेट कैपिटलिज़्म, पृ.-64.

(3) प्रसन्न कुमार चैधरी की पाण्डुलिपि अतिक्रमण की अन्तर्यात्रा से साभार.

(4) फूको रीडर, पॉल  रेबिनो (सम्पादक), पृ.-343.

 भारत भवन में 21.12.2012 को पढ़ा गया आलेख। कुछ अंश नहीं पढ़े गए। संशोधित।

sudhir ranjan singh

sudhir ranjan singh

हिन्दी के आलोचक। काव्य संकलन ‘और कुछ नहीं तो’ और आलोचना की पुस्तक ‘हिन्दी समुदाय और राष्ट्रवाद’ प्रकाशित। एक कविता संकलन और आलोचना की दो पुस्तकें शीद्घ्र प्रकाश्य। भोपाल के शासकीय महाविद्यालय में प्राध्यापन।

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