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हिन्दी नवजागरण की परिकल्पना पर पुनर्विचार की जरूरत : राजकुमार

हिन्दी नवजागरण की अवधारणा ज्ञान के विशेष पैराडाइम के अन्तर्गत, जिसे सुविधा के लिए औपनिवेशिक आधुनिकता का पैराडाइम कह सकते हैं, गढ़ी गयी थी। आधुनिकता की ज्ञानमीमांसा के निकष पर ही समस्याएँ चिन्हित की गयीं और उसी के अनुरूप समाधान सुझाए गए। इक्कीसवीं सदी तक आते-आते ज्ञान का यह पैराडाइम बदल गया। पैराडाइम बदलते ही समस्याओं की पहचान और उनके समाधान के स्वरूप में भी बदलाव आ गया। उन्नीसवीं सदी में जन्मी विचारधाराओं को यथावत दुहराकर न तो आज की समस्याओं की सम्यक् पहचान संभव है और न ही उनका समाधान। इसलिए हिन्दी नवजागरण की परिकल्पना और उसके द्वारा सुझाए गए विकल्पों पर नये सिरे से विचार करने की जरूरत है। क्योंकि पुराने पैराडाइम के तहत दिये गये जो उत्तर पहले सही लगते थे, वे अब कारगर नहीं लगते। इसी परिप्रेक्ष्य में हिन्दी नवजागरण की अवधारणा और उससे जुड़ी समस्याओं को नये सिरे से समझने की शुरूआती कोशिश इस लेख में की गयी है।   # लेखक

सहमत से साभार-संपादित

सहमत से साभार-संपादित

By राजकुमार

1857 के विद्रोह में मध्यवर्ग और व्यवसायियों/उद्यमियों की भूमिका प्रायः नगण्य रही है। किन्तु विद्रोह के बाद घटित होने वाले नवजागरण और राष्ट्रीय आन्दोलन में इन्हीं दो वर्गों की केन्द्रीय भूमिका रही। नवजागरण और राष्ट्रीय आन्दोलन में नेतृत्व इन्हीं दो वर्गों के हाथ में रहा। 1857 के विद्रोह और परवर्ती नवजागरण के चरित्र में जो अन्तर दिखायी पड़ता है, उसकी व्याख्या इनके वर्ग-चरित्र में आये बदलाव के सहारे की जा सकती है। इसी कारण नवजागरण कालीन चिन्तकों के दृष्टिकोण में अंग्रेजी राज के प्रति एक खास तरह की दुविधा दिखायी पड़ती है। वे अंग्रेजी राज की तारीफ करते हैं किन्तु साथ ही कुछ मुद्दों पर उसकी आलोचना भी करते हैं। इस दुविधा को इतिहासकार सुधीर चन्द्र ने अपनी पुस्तक आप्रेसिव प्रेजेण्ट में ‘एम्बीवैलेन्स’ का नाम दिया है। ‘एम्बीवैलेन्स’ का हिन्दी में ‘आविकर्षण’ के रूप में अनुवाद किया गया है। नवजागरण कालीन चिन्तकों में राष्ट्रभक्ति-राजभक्ति, स्त्रियों की स्वाधीनता और मुसलमानों को लेकर दुविधा दिखायी पड़ती है। ऐसा आविकर्षण केवल हिन्दी नवजागरण तक सीमित नही है, दूसरी भाषाओं के नवजागरण में भी इन मुद्दों को लेकर ऐसा ही आविकर्षण मौजूद है।

इतिहासकार रंजीत गुहा ने अपनी पुस्तक ‘सम एलीमेंट्री ऐस्पेक्ट्स  ऑफ पीजेंट इनसर्जेन्सी इन कॉलोनियल इंडिया’ में लिखा है कि 57 के विद्रोहियों के दृष्टिकोण में अंग्रेजी राज के प्रति एक सचेत शत्रुता का भाव था। वे अंग्रेजी राज को उखाड़कर अपना शासन कायम करना चाहते थे और अंग्रेजी राज की किसी भी सकारात्मक भूमिका को स्वीकार नहीं करते थे। पुरुषोत्तम अग्रवाल ने अपने एक निबंध ‘1857 और हिन्दी नवजागरण’ में भारतेन्दु युगीन हिन्दी नवजागरण के चिन्तकों के दृष्टिकोण और 57 के विद्रोहियों के दृष्टिकोण में दिखायी देने वाले अन्तर की विस्तार से चर्चा की है। वे रामविलास शर्मा के इस तर्क से सहमत नहीं हो पाते कि भारतेन्दु युग हिन्दी नवजागरण का दूसरा चरण है। उल्लेखनीय है कि रामविलास शर्मा 1857 के विद्रोह को हिन्दी नवजागरण का प्रथम चरण मानते हैं और भारतेन्दु युग को उसकी निरन्तरता में दूसरा चरण। लेकिन जैसाकि ऊपर कहा गया, हिन्दी नवजागरण को 1857 के विद्रोह की निरन्तरता में देखना सही नहीं है। 1857 के विद्रोह और हिन्दी नवजागरण के बीच अंग्रेजी शासन के प्रति दृष्टिकोण में आये अन्तर के साक्ष्य पर 57 और भारतेन्दु युग के बीच निरन्तरता से ज्यादा विच्छिन्नता के तत्व परिलक्षित होते हैं।

भारतेन्दु युगीन हिन्दी नवजागरण की एक बड़ी समस्या यह है कि इसमें कथित उर्दू परम्परा में लिखे गये साहित्य की चर्चा ही सिरे से गायब है। हिन्दी नवजागरण की शुरूआत ही भारतेन्दु के इस कथन से मानी गयी है कि 1873 में हिन्दी नये चाल में ढली। उर्दू को आप हिन्दी की शैली मानें या उसकी परिकल्पना को ही अस्वीकार करें, लेकिन सच्चाई है कि हिन्दी के नये चाल में ढलने से पहले उर्दू में साहित्य लिखने का सिलसिला शुरू हो चुका था। इसलिए फारसी लिपि या उर्दू में फारसी-अरबी के शब्दों को जबर्दस्ती ठुँसने की आलोचना करने के बावजूद हिन्दी जाति के नवजागरण की चर्चा से उर्दू में लिखे गये साहित्य को आप बाहर नहीं कर सकते। ऐसा करने से  उसकी साम्प्रदायिक परिणति की सम्भावनाएँ बढ़ जाती हैं और अन्ततः वही हुआ भी। मुख्य बात यह है हिन्दी क्षेत्र की व्यापकता और भाषायी जटिलता के कारण यहाँ ऐसी स्थितियाँ उत्पन्न हुईं कि तेलगू, बांग्ला या मराठी की तरह हिन्दी का कोई एक रूप सुनिश्चित करना और बाकी रूपों को बाहर कर देना सभी को स्वीकार्य निर्णय नहीं बन पाया। फारसी और फिर उर्दू की परम्परा के विकास के कारण हिन्दी के ही कई रजिस्टर बन गये। कई बार तो एक ही समय में अलग-अलग परम्परा से जुड़े लोग इन रजिस्टरों का अलग-अलग ढंग से उपयोग करते दिखायी पड़ते हैं। समस्या तब उत्पन्न होती है जब हम इनमें से किसी एक रूप के आधार पर हिन्दी का स्वरूप स्थिर करने की कोशिश करते हैं। हिन्दी, हिन्दुस्तानी और उर्दू के बीच खींचतान के समूचे इतिहास को इसी परिप्रेक्ष्य में समझना चाहिए। भारतेन्दु युगीन हिन्दी नवजागरण की समस्या यह है कि उसने हिन्दी का एक सही रूप तय कर बाकी रूपों को प्रकारान्तर से अवैध घोषित कर दिया और उनके बारे में किसी भी प्रकार के चिन्तन-अध्ययन का ही निषेध कर दिया। उर्दू परम्परा में लिखे गये साहित्य को हिन्दी नवजागरण के दायरे से बाहर कर देने के बावजूद भारतेन्दु को इस बात का एहसास था कि उर्दू शायरी की परम्परा से भिन्न खड़ी बोली हिन्दी में कविता लिख पाना आसान नहीं होगा। विद्वानों को इस बात पर विचार करना चाहिए कि हिन्दी को उर्दू से अलगाने के बावजूद स्वयं भारतेन्दु उर्दू में रसा नाम से कविता क्यों लिखते थे। यही नहीं, इस बात पर भी नये सिरे से विचार किया जाना चाहिए कि नयी चाल की हिन्दी के समर्थक भारतेन्दु अपनी ज्यादातर कविताएँ ब्रज भाषा में क्यों लिखते हैं। खड़ी बोली में तो उन्होंने ‘अमीर खुसरों के वजन पर सिर्फ मुकरिया ही लिखी। एक खास तरह की हिन्दी की वकालत करने के बावजूद भारतेन्दु के लेखन में उर्दू और ब्रज भाषा की उपस्थिति बहुत ही महत्वपूर्ण है। यदि गम्भीरता से विचार किया जाये तो इससे हिन्दी क्षेत्र के भाषायी मानचित्र की जटिलता को समझने में मदद मिल सकती है।

असल में भारतेन्दु संक्रमण कालीन दौर के रचनाकार-चिन्तक हैं, जहाँ कई तरह के विचार और प्रभाव तो सक्रिय है लेकिन इनमें से किसी को निर्णायक बढ़त हासिल नहीं हुई है। भारतेन्दु के रचनात्मक व्यक्तित्व में कई धाराएँ-उपधाराएँ सक्रिय दिखायी पड़ती हैं। इसीलिए उर्दू और ब्रज भाषा की साहित्यिक परम्परा के प्रति कम से कम रचनात्मक स्तर पर उनके यहाँ कुछ गुंजाइश बची हुई है।

किन्तु द्विवेदी युग तक आते-आते अंग्रेजी शिक्षा के प्रचार-प्रसार के परिणामस्वरूप भारत के तत्कालीन चिन्तक इस नतीजे पर पहँुचे कि भारत की पराधीनता का मुख्य कारण ये है कि यहाँ पश्चिमी ढंग के राष्ट्रवाद का विकास नहीं हो पाया। भारत की मुक्ति और एक स्वाधीन राष्ट्र के रूप में उसके विकास के लिए उसे पश्चिमी राष्ट्रों के वजन पर पुनर्गठित करना होगा। अब इस बात का कोई विशेष महत्व नहीं रह गया कि भारतीय सभ्यता में स्वाभाविक रूप से विकसित होने वाली प्रवृत्तियों को केन्द्र में रखकर ‘आधुनिक’ भारत की परिकल्पना की जाए। इसके बजाय सारा जोर इस ओर चला गया कि भारतीय सभ्यता की उन विशेषताओं को चिन्हित किया जाए, जिन्हें खींच-खाँच कर पश्चिमी राष्ट्रवाद के साँचे में फिट किया जा सके।

द्विवेदी जी समेत उस समय के बुद्धिजीवियों को ये बात सालने लगी कि राष्ट्रभाषा के बिना राष्ट्रवाद की परिकल्पना कैसे संभव होगी। भारत पश्चिमी राष्ट्रों से इस मायने में भिन्न था कि यहाँ कई भाषाएँ बोली जाती थीं। किन्तु सबसे ज्यादा लोगों द्वारा बोली जाने वाली भाषा के रूप में हिन्दी को खड़ा कर राष्ट्रभाषा बनने के उसके दावे को मजबूत करने के लिए ऐसी हिन्दी की परिकल्पना की गयी, जिसमें हिन्दी के विविध रूपों और तथाकथित जनपदीय भाषाओं/ बोलियों के लिए कोई जगह नहीं बची। इसका परिणाम ये हुआ कि भारतीय सभ्यता में भाषाओं के विकास और उनके पारस्परिक सम्बन्ध को या तो नजरअन्दाज कर दिया गया या उसको समझने का विवेक ही नहीं उत्पन्न हो पाया। यदि समूचे भारत के भाषायी मानचित्र की चर्चा न भी की जाय तो भी इस तथ्य से इनकार नहीं किया जा सकता कि हिन्दी प्रदेश में एक ही समय में अलग-अलग कार्यों के लिए और कभी-कभी एक ही कार्य के लिए हिन्दी के भिन्न-भिन्न ‘रजिस्टर’ का इस्तेमाल होता रहा है। हिन्दी प्रदेश का भाषायी स्वरूप हमेशा बहुभाषी रहा है। भाषायी स्वरूप को लेकर असहमतियाँ हो सकती हैं और होनी भी चाहिए, लेकिन उनके अस्तित्व को ही दरकिनार कर गढ़ी गई हिन्दी नवजागरण की कोई भी परिकल्पना, नेक इरादों के बावजूद, आत्मघाती और अन्ततः साम्प्रदायिक होने के लिए अभिशप्त है।

किसी एक भाषायी रजिस्टर पर केन्द्रित हिन्दी की परिकल्पना से जितनी समस्याएँ सुलझती हैं उससे ज्यादा समस्या पैदा हो जाती है। हिन्दी प्रदेश के भाषायी मानचित्र को जनपदीय बोलियों और राष्ट्रीय भाषा के द्वि-आधारी विरुद्धों में रखकर देखने से उत्तर भारतीय भाषाओं के अन्तर्सम्बन्ध को समझने-समझाने की अभी तक जो कोशिश होती आयी है, उस पर पुनर्विचार करने की जरूरत है। असल में उत्तर भारतीय भाषाओं को किसी अन्य प्रसंग में लिखे गए ए.के. रामानुजन के वक्तव्य को किंचित परिवर्तित करते हुए कहें तो, एक ही सातत्य या स्पेक्ट्रम के क्रमशः परिवर्तित होते हुए हिस्से के रूप में देखा जाना चाहिए। कई बार इसका एक छोर दूसरे छोर से काफी अलग लगता है, लेकिन है वो उसी स्पेक्ट्रम का हिस्सा। इस स्पेक्ट्रम में दिखायी पड़ने वाले भाषायी परिवर्तन को चोटियों और घाटियों के रूपक के जरिये व्याख्यायित कर सकते हैं। चोटियाँ इस स्पेक्ट्रम के वो बिन्दु हैं, जहाँ उनका अन्तर आत्यन्तिक रूप में दिखाई पड़ता है और घाटियाँ वह स्थल हैं, जहाँ ये तीक्ष्णता क्रमशः ढलान पर उतरते हुए एक दूसरी भाषायी चोटी की ओर चढ़ने लगती है। ये भाषायी घाटियाँ ऐसे  पाॅकेट हैं, जहाँ एक भाषा या बोली का रजिस्टर धीरे-धीरे दूसरी भाषा के रजिस्टर में तब्दील होने लगता है। मनुष्य के शरीर में फैली हुई नसों की तरह ये भाषाएँ परस्पर जुड़ जाती हैं। इनकी सीमाएँ धँुधली, अस्पष्ट और खुली हुई हैं। इसीलिए इन भाषाओं/बोलियों के रजिस्टर दूसरी बोली या भाषा से, आधुनिक युग से पहले तक, जुड़े हुए दिखायी पड़ते हैं। राजनीतिक-आर्थिक सांस्कृतिक कारणों से इनमें से किसी एक भाषायी रजिस्टर का दायरा बढ़ जाता है और उसे ही कुछ लोग भाषा या राष्ट्र की भाषा के रूप में पुरस्कृत करने लगते हैं। इसमें भी कोई हर्ज नहीं, लेकिन समस्या तब पैदा होती है जब किसी भाषायी रजिस्टर विशेष को राष्ट्र की भाषा के रूप पुरस्कृत करने की प्रक्रिया में अन्य भाषायी रजिस्टरों को जनपदीय बोली के रूप में अवमूल्यित या तिरस्कृत कर दिया जाता है। यहाँ तक कि उन्हें साहित्य और कला की भाषा के रूप में भी आगे जारी रखने के औचित्य का निषेध कर दिया जाता है। यदि हम भाषा और बोली के युग्म में हिन्दी प्रदेश की भाषायी प्रकृति पर विचार करने के बजाय उनके अन्तर्सम्बन्ध के नैरूतर्य पर विचार करें तो हम उन गलतियों को दोहराने से बच सकते हैं, जिनका सामना हिन्दी जाति की एक भाषा खड़ी करने के यांत्रिक रवैये के कारण अभी तक हम करते रहे हैं। उत्तर भारत की भाषाओं/ बोलियों में नैरन्तर्य का एक बड़ा प्रमाण ये है कि क्रिया रूपों अथवा उच्चारण में कुछ अन्तर के बावजूद इनके शब्द भण्डार में कोई विशेष अन्तर नहीं है।

ये सही है कि अठारहवीं शताब्दी में हिन्दी के उस भाषायी रजिस्टर में जिसे आज उर्दू कहते हैं, बोल-चाल के शब्दों को निकालकर फारसी और अरबी के शब्दों की खूब भर्ती की गई। नतीजा ये हुआ कि इस परम्परा में लिखे गये साहित्य का दायरा अरबी-फारसी जानने वाले कुछ अभिजनों तक ही सीमित हो गया और यहाँ की लोक भाषाओं से उसका सम्बन्ध कमजोर पड़ गया। इस प्रवृत्ति की आलोचना करना तो ठीक था, लेकिन इस परम्परा में लिखे गए साहित्य की उपलब्धियों का सिरे से निषेध कर ‘नए चाल में ढली’ हिन्दी में साहित्य लिखने और उसे इस परम्परा से अलग दिखाने के लिए जैसा साहित्य लिखा गया, उसमें इस परम्परा की साहित्यिक उपलब्धियों से कुछ भी न ग्रहण करने का भाव ज्यादा था।

यदि भारतेन्दु युग में उर्दू की परम्परा से नई हिन्दी का सम्बन्ध-विच्छेद हुआ तो द्विवेदी युग की उपलब्धि ये है कि इस दौर में ब्रजभाषा की परम्परा से भी उसे काट दिया गया। रीति विरोधी अभियान चलाकर ये सिद्ध करने का प्रयास किया गया कि ब्रजभाषा में आधुनिक युग की संवेदना वहन करने की सामथ्र्य नहीं है। ब्रजभाषा में तो पतनशील सामंती मानसिकता की कामुक शंृगारिक कविताएँ ही लिखी जा सकती हैं। रीतिकालीन शृंगारिक कविताओं को ही नहीं, स्त्री लोकगीतों को भी विक्टोरियन नैतिकता के प्रभाव में अश्लील घोषित कर दिया गया जबकि इतिहास यह है कि आधुनिक योरोपीय भाषाओं में भी अपनी क्लासिक साहित्य और ज्ञान को आत्मसात कर कुछ-कुछ वैसा ही साहित्य लिखा गया था जैसा रीतिकालीन कविताओं में दिखाई पड़ता है इस बात को पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया गया कि सूर, मीरा से लेकर न जाने कितने भक्त कवियों ने इसी भाषा में कविताएँ लिखी हैं। रीतिकालीन दौर में भी शंृगारिक कविताएँ लिखने वाले कवियों से ज्यादा ऐसे कवियों की संख्या है, जिन्होंने भक्ति-प्रधान कविताएँ लिखी हैं। यही नहीं, कथित रीतिकाल के दौर में ही 60 से भी अधिक संख्या में वीरकाव्य-लिखे गए हैं। दैनंदिन जीवन से सम्बन्धित समस्याओं पर लिखी गई कविताओं के साथ-साथ नीतिपरक कविताएँ भी इस दौर में कम नहीं लिखी गईं। स्वयं भारतेन्दु हरिश्चन्द्र, नरोत्तमदास और जगन्नाथ दास ‘रत्नाकर’ जैसे आधुनिक दौर के कवियों के यहाँ भी वैसी कविताएँ नहीं मिलतीं, जिनका रीति-विरोधी अभियान के नाम पर विरोध किया गया। असल में उर्दू के दावे को खारिज करना तो आसान था, लेकिन उर्दू के दावे को खारिज करने के बाद ब्रजभाषा के दावे को खारिज करना बहुत मुश्किल था। साहित्यिक उपलब्धि की दृष्टि से तो खड़ी बोली कहीं से ब्रज भाषा के सामने खड़ी ही नहीं होती। उर्दू को दरकिनार करने के बाद साहित्य की भाषा के रूप में व्यापकता और विस्तार की दृष्टि से भी ब्रजभाषा का दायरा खड़ी बोली के मुकाबले बहुत विस्तृत था। गुजरात से लेकर बंगाल तक ब्रजभाषा में साहित्य लिखने की परम्परा दिखायी पड़ती है। खड़ी बोली के पक्ष में दूसरा तर्क ये दिया गया कि ब्रजभाषा में गद्य का पर्याप्त विकास नहीं हुआ, लेकिन यदि उर्दू परम्परा के विकास को हिन्दी से अलग कर दें, तो उस समय तक हिन्दी में ही गद्य का कौन सा विकास दिखाया जा सकता था। ये सही है कि फोर्ट विलियम काॅलेज, ईसाई मिशनरियों और अन्य लोगों के सहयोग से उन्नीसवीं शताब्दी में हिन्दी गद्य का तेजी से विकास हुआ। जो शोध हुए हैं, उनके आधार पर ये कहना भी पूरी तरह सही नहीं है कि ब्रजभाषा में गद्य का विकास ही नहीं हुआ। सबसे पुराने व्याकरण और शब्दकोश ब्रजभाषा के ही बनाये गये और अनेक संस्कृत ग्रन्थों का ब्रजभाषा-गद्य में अनुवाद किया गया। इन सारे तथ्यों पर ध्यान देने के बाद ये बात समझ में आती हैं कि रीतिविरोधी अभियान के नाम पर वास्तव में ब्रजभाषा के साहित्यिक-वैचारिक अवदान का निषेध किया जा रहा था।

चूँकि हिन्दी नवजागरण की अवधारणा किसी न किसी रूप में आधुनिकता के प्रोजेक्ट के साये में विकसित हो रही थी और इस प्रोजेक्ट के मुताबिक पहले से चली आ रही सांस्कृतिक और वैचारिक परम्पराएँ व्यर्थ और पिछड़ी हुई मान ली गई थीं, इसलिए आधुनिकता के प्रोजेक्ट को हिन्दी में उतारने के लिए हिन्दी का ऐसा रजिस्टर ज्यादा उपयुक्त लगा, जिस पर परम्परा का कोई बोझ ही नहीं था। खड़ी बोली में आधुनिक युग से पहले साहित्यिक-वैचारिक लेखन की कोई उल्लेखनीय परम्परा नहीं थी, इसलिए उसमें पूर्व परम्परा से सम्बन्ध-विच्छेद करने की कोई जरूरत ही नहीं थी। परम्परा की चिन्ता किये बिना, जो चाहें, जैसे चाहें, लिख सकते थे। उल्लेखनीय है कि मुगलकाल में उर्दू का विकास भी कुछ इसी तरह हुआ था। प्रसिद्ध इतिहासकार मुजफ्फर आलम ने अपने एक लेख में लिखा है कि उर्दू में लेखन के पीछे दो शर्तें लगाई गई थीं, पहली यह कि इसकी लिपि फारसी होगी, दूसरी यह कि बोल-चाल की भाषा में शब्द न उपलब्ध होने पर फारसी या अरबी से शब्द लिये जायेंगे। खड़ी बोली उर्दू में बिल्कुल नये सिरे से साहित्य लिखना ब्रज-भाषा की तुलना में इसलिए आसान था, क्योंकि ब्रजभाषा में साहित्य की एक पूर्व परम्परा थी, जबकि खड़ी बोली में साहित्य लिखने की कोई उल्लेखनीय परम्परा नहीं थी। खड़ी बोली उर्दू की तरह ही खड़ी बोली हिन्दी में जिस तरह के साहित्य-लेखन की शुरूआत हुई, उसका न तो उर्दू की परम्परा से, न ब्रजभाषा की परम्परा से कोई उल्लेखनीय सम्बन्ध दिखायी पड़ता है। लोकसाहित्य की परम्परा से सम्बन्ध स्थापित करने का तो खयाल भी नहीं आता। परम्परा से विच्छेद या परम्परा से मुक्ति के इन दोनों उदाहरणों की विशद चर्चा तो यहाँ संभव नहीं है, फिर भी खड़ी बोली हिन्दी में लिखे गए आधुनिक साहित्य पर दो चार बातें करना बेहद जरूरी है।

रामविलास शर्मा ने लिखा है कि हिन्दी नवजागरण में अंग्रेजी शिक्षा और पश्चिमी ज्ञान की कोई उल्लेखनीय भूमिका नहीं रही। थोड़ी रियायत देते हुए उन्होंने ये जरूर जोड़ दिया है कि अंग्रेजी साहित्य की मानवतावादी और प्रगतिशील परम्परा भी रही है और उससे सीखने में कोई हर्ज नहीं। लेकिन आधुनिक हिन्दी साहित्य की गम्भीरता से पड़ताल करने पर ये बात स्पष्ट हो जाती है कि उसकी मूल प्रेरणा और आदर्श अंग्रेजी साहित्य ही रहा है। ज्यादातर आधुनिक हिन्दी साहित्य पश्चिम से प्रेरणा लेते हुए और उसी के मानदण्ड पर लिखा गया है। कहने वाले चाहें तो कह सकते हैं कि ये अंग्रेजी साहित्य की नकल है। लेकिन अंग्रेजी के प्रसिद्ध उत्तर औपनिवेशिक चिंतक होमी भाभा ने नकल में भी अकल की बात करते हुए मिमिक्री और हाइब्रिडिटी (संकरता) के सिद्धान्तों के सहारे औपनिवेशिक देशों में लिखे गए साहित्य के महत्व का बहुत जोर-शोर से प्रतिपादन कहते हुए इस प्रकार के साहित्य की उपनिवेशवाद-विरोधी भूमिका को रेखांकित करने का गंभीर प्रयास किया है। होमी भाभा के इस तर्क को सामान्य रूप से आज भी दोहराया जा रहा है। लेकिन वास्तव में ये एक पैराडाइम शिफ्ट था। प्रसिद्ध इतिहासकार रणजीत गुहा के अनुसार पैराइाइम के इस युद्ध में पश्चिम की विजय हुई; अद्भुत पर अनुभूति की विजय हुई। विद्वानों ने रणजीत गुहा के इस तर्क की आलोचना करते हुए दिखाया है कि पश्चिम के विपरीत भारतीय यथार्थवादी उपन्यास विस्मय, फैन्टेसी और काव्यत्व से पूर्णतः विच्छिन्न नहीं थे। इसलिए ये कहना सही नहीं है कि इस पैराडाइम शिफ्ट के कारण पहले से चली आ रही भारतीय साहित्यिक परम्परा का पूरी तरह निषेध हो गया। ये तर्क सही है, पर असल बात ये है कि इस पैराडाइम शिफ्ट के बाद साहित्य, संस्कृति और ज्ञान-विज्ञान की बुनियाद आधुनिकता की ज्ञानमीमांसा पर टिक जाती है और भारतीय ज्ञानमीमांसा की परम्परा का इस्तेमाल सिर्फ खाली जगहों को भरने के लिए, एक ऐसा संस्करण तैयार करने के लिए किया जाता है, जिसकी पैकेजिंग भारत में की गई हो। इसे कुछ इस तरह समझना चाहिए, जैसे उत्पादन भले ही भारत में हो रहा हो लेकिन उसकी टेक्नाॅलजी पश्चिम से ली गई हो। इसी तर्क को आगे बढ़ाते हुए कहना चाहिए कि लिखा भले ही भारतीय भाषाओं में जा रहा है, लेकिन उसका विन्यास और उसकी अन्तर्दृष्टि पश्चिम से ली गई है। भारतीय भाषाओं में लिखने से कोई साहित्य भारतीय नहीं हो जाता और न ही भारतीय भाषाओं में चिन्तन करने से कोई चिन्तन भारतीय हो जाता है।

उत्तर औपनिवेशिक चिन्तकों द्वारा तैयार माॅडल के विकल्प के रूप में मैं एक दूसरे किस्म के माॅडल का प्रस्ताव करने की जुर्रत कर रहा हँू। थोड़ी देर के लिए कल्पना कीजिए कि भारतीय ज्ञानमीमांसा और साहित्यिक परम्परा की नियामक भूमिका को स्वीकार करते हुए आधुनिकता की ज्ञानमीमांसा से भी हमने कुछ तत्व लिये होते तो उसकी सूरत और सीरत कुछ और होती। राजनीतिक और सामाजिक चिन्तन के क्षेत्र में गाँधी ने और काव्य के क्षेत्र में कुछ ऐसी ही कोशिश रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने की थी। किन्तु ये इकलौती कोशिशें थीं और परवर्ती चिन्तकों और रचनाकारों ने इन्हें परम्परावादी, रहस्यवादी कहकर नकार दिया। परिणाम ये हुआ कि साहित्य, संस्कृति और ज्ञान के क्षेत्र में जो भी चिन्तन हुआ उसकी नियामक प्रेरणा पश्चिमी आधुनिकता की ज्ञानमीमांसा से तय होती रही। हिन्दी में तो सामान्य रूप से आज जैसी स्थिति है, वो और भी विडम्बनापूर्ण है। यहाँ तो उस ज्ञान को, जिसका विकास पश्चिम में 30-40 के दशक में हुआ था, आज भी भारतीय चिन्तन के रूप में पूरे भक्तिभाव से दोहराया जा रहा है। जबकि पश्चिम में भी इस ज्ञान को अब कोई तवज्जो नहीं दे रहा। इसीलिए आधुनिक युग में भारतीय भाषाओं में जो साहित्य लिखा गया है, उसमें ज्यादा ऐसा नहीं है, जिसे सही मायने में भारतीय साहित्य कहा जा सके। जो है, वह पश्चिमी आधुनिकता के सर्वव्यापी प्रभाव के बावजूद है।

यह अकारण नहीं है कि यद्यपि आधुनिक हिन्दी साहित्यिक चिन्तन में भक्ति आन्दोलन के महत्व का बढ़चढ़कर बखान किया जाता है, किन्तु विरली ही कोई ऐसी रचना होगी, जिसे पढ़कर लगे कि ये रचना भक्ति संवेदना से गुजकर लिखी गई है। परम्परा का किताबी ढंग से बखान तो खूब किया गया, लेकिन परम्परा से रचनात्मक स्तर पर कुछ भी सीखने और ग्रहण करने के चिन्ह कुछ ही रचनाओं में दिखाई पड़ते हैं। मतलब बिल्कुल साफ है, परम्परा का गुणगान कीजिए और कुछ भी लिखते समय उसे भूल जाइए। कुछ विद्वान गरीबी, भूखमरी, किसान, मजदूर जैसे विषयों पर लिखी गई रचनाओं के आधार पर ये सिद्ध करने की कोशिश करते हैं कि इसकी प्रेरणा भक्तिकालीन साहित्य से आई है। अब उन्हें कौन समझाए कि भक्ति काव्य-संवेदना से उसका कोई सम्बन्ध नहीं है। इस प्रकार के विषयों पर लिखी गई रचनाओं का प्रेरणास्रोत पश्चिमी चिन्तन और यथार्थवादी साहित्यिक परम्परा है। भक्ति आन्दोलन न भी होता तो भी इन विषयों पर इसी ढंग से लिखा जाता। दूसरे देशों में, जहाँ भक्ति साहित्य जैसी कोई परम्परा नहीं है, इन विषयों पर थोड़े-बहुत हेर-फेर के साथ इसी ढंग से लिखा गया है। इन विषयों पर लिखी गई रचनाओं को देखने से शायद ही कहीं ऐसी प्रतीति होती हो कि उन्हें भारतीय सांस्कृतिक एवं बौद्धिक परम्परा को आत्मसात करके लिखा गया है। परम्परा के मूल्यांकन से समृद्ध रचनाएँ हिन्दी में ज्यादा नहीं हैं। कुल मिलाकर भारतेन्दु की कुछ रचनाओं, प्रेमचन्द और रेणु के कथा-साहित्य, प्रसाद और मुक्तिबोध की कविताओं के अतिरिक्त कौन सी ऐसी रचनाएँ हैं, जिन्हें भारतीय परम्परा के बीच से निकली हुई रचनाओं के रूप में चिन्हित किया जा सके। विडम्बना ये है कि आधुनिक साहित्य में जहाँ भक्ति साहित्य का सचमुच असर दिखाई पड़ता है, उसे रहस्यवादी कह कर खारिज कर दिया जाता है। इसका सटीक उदाहरण है कि भक्ति काल का सबसे अधिक गुणगान करने वाले रामविलास शर्मा ने मुक्तिबोध की कविताओं को रहस्यवादी कहकर खारिज कर दिया। जबकि उनकी कविता के टेक्स्चर में संत साहित्य की संवेदना की गहरी छाप है। हबीब तनवीर और विजयदान देथा की रचनाओं के बारे में जरूर ऐसा कहा जा सकता है कि वे भारतीय साहित्यिक परम्परा से अनुस्यूत और उसे आगे बढ़ाने वाली रचनाएँ हैं, लेकिन उन पर विचार करने के लिए एक स्वतंत्र लेख की दरकार होगी।

उल्लेखनीय है कि प्रगतिशील लेखक संघ (1936) के पहले घोषणा-पत्र में भक्तिकालीन साहित्य को पलायन का साहित्य कह कर खारिज कर दिया गया था। प्रेमचन्द ने इस अधिवेशन के बहुप्रशंसित अध्यक्षीय भाषण में आधुनिक युग से पहले के समूचे साहित्य को मौजमस्ती और मनबहलाव का साहित्य करार दिया था। बाद में परम्परा के मूल्यांकन के प्रसंग में भले ही उस गलती को दुरुस्त कर लिया गया हो लेकिन रचनात्मक लेखन और वैचारिक चिन्तन के क्षेत्र में परम्परा के सकारात्मक मूल्यांकन से कुछ भी ग्रहण करने की जहमत उठाने के निशान विरले ही दिखाई पड़ते हैं।

पश्चिम में आधुनिकता के अभ्युदय के साथ साहित्य और कलाओं को आधुनिकता के प्रोजेक्ट के सहायक के रूप में देखने की प्रवृत्ति जोर पकड़ने लगी और उन्नीसवीं शताब्दी में यथार्थवाद के अभ्युदय के साथ अपने चरमोत्कर्ष पर पहुँच गई। उल्लेखनीय है कि पश्चिम में समाज विज्ञान का विकास विज्ञान की पद्धति की बुनियाद पर हुआ था और इसीलिए समाज का अध्ययन करने वाले शास्त्रों को ‘समाज विज्ञान’ के रूप में प्रतिष्ठित करने पर जोर दिया गया। एंगेल्स ने तो माक्र्स के चिन्तन का महत्व प्रतिपादित करते हुए स्पष्ट रूप से लिखा कि जैसे डार्विन ने प्रजातियों के विकास के नियम खोज निकाले वैसे ही माक्र्स ने समाज के विकास के नियम खोज लिये। यही कारण है कि लम्बे समय तक माक्र्सवाद को समाज के विकास के नियमों की पहचान कराने वाला विज्ञान कहा जाता रहा। फिलहाल इस बहस के विस्तार में जाने की जरूरत नहीं है, संप्रति विचारणीय मुद्दा ये है कि साहित्य और कलाओं को आधुनिकता के प्रोजेक्ट के अधीन कर देने की परिणति क्या हुई? प्रेमचन्द द्वारा प्रगतिशील लेखक संघ के पहले अध्यक्षीय भाषण ‘साहित्य का उद्देश्य’ की चर्चा हम पहले कर चुके हैं, इसी क्रम में प्रेमचन्द की उस प्रसिद्ध और बार-बार दोहराई जाने वाली उक्ति के उल्लेख के जरिये हम अपने तर्क को आगे बढ़ाना चाहेंगे। प्रेमचन्द ने कहा था, ‘साहित्य देशभक्ति और राजनीति के पीछे चलने वाली सच्चाई नहीं, बल्कि उनके आगे मशाल दिखाती हुई चलने वाली सच्चाई है।’ प्रेमचन्द के इस वक्तव्य पर थोड़ा रुककर विचार करें तो ये स्पष्ट हो जाएगा कि प्रेमचन्द यहाँ पर साहित्य के महत्व का जिस प्रकार प्रतिपादन कर रहे हैं, उससे राजनीतिक चिन्तन की केन्द्रीयता का निषेध नहीं होता। यहाँ राजनीतिक चिन्तन के सर्वोपरि महत्व को स्वीकार करते हुए उसी दायरे में और उसी कसौटी पर साहित्य के महत्व को राजनीतिक चिन्तन से भी आगे के कदम के रूप में रेखांकित किया गया है। प्रेमचन्द अक्सर कहते भी थे कि जो काम गाँधी राजनीति में कर रहे हैं, वही काम वो साहित्य के दायरे में कर रहे हैं। कहने की जरूरत नहीं होनी चाहिए कि यहाँ साहित्य के महत्व का प्रतिपादन राजनीतिक प्रोजेक्ट के अधीन ही है, भले ही उसे राजनीति के आगे-आगे चलने वाली मशाल ही क्यों न कहा गया हो। रामचन्द्र शुक्ल ने भी अपने प्रिय कवि तुलसीदास के साहित्य के मार्फत साधनावस्था के जिस साहित्य को सर्वोत्कृष्ट घोषित किया और जो पहली नजर में ठेठ भारतीय निकष जान पड़ता है, वास्तव में आधुनिकता के विमर्श से बहुत गहरे प्रभावित निकष है। इसलिए यह अकारण नहीं है कि आधुनिक साहित्य के मूल्यांकन के प्रसंग में वे ठाकुर जगमोहन सिंह के उपन्यास ‘श्यामास्वप्न’ के बजाय लाला श्रीनिवासदास के ‘परीक्षागुरु’ को तरजीह देते हैं, क्योंकि वह अंगे्रजी ढंग का नावेल है। इससे यह बात खुलकर सामने आ जाती है कि सब कुछ के बावजूद आधुनिक हिन्दी साहित्य अन्ततः अंग्रेजी ढंग का ही साहित्य है। यह बिल्कुल संभव है कि रामचन्द्र शुक्ल ने जानबूझकर और सचेत रूप से ऐसा न किया हो। लेकिन, जैसा कि कहा जाता है, जादू वही जो सिर चढ़कर बोले; ये आधुनिकता का जादू है, जो हिन्दी के लेखकों-आलोचकों के सिर चढ़कर बोल रहा है। फिर चाहे वो रामचन्द्र शुक्ल हों, महावीर प्रसाद द्विवेदी हों या प्रेमचन्द ही क्यों न हों। महावीर प्रसाद द्विवेदी ने तो साहित्य को ‘ज्ञानराशि का संचित कोश’ कह कर साहित्य को आधुनिकता के प्रोजेक्ट के अधीन करने की पहले से चली आ रही प्रक्रिया को जैसे उसकी तार्किक परिणति तक पहँुचा दिया। रामचन्द्र शुक्ल ने द्विवेदी जी के साहित्य-विवेक पर सही टिप्पणी की है: 1)‘कवि और कविता कैसा गम्भीर विषय है, कहने की आवश्यकता नहीं। पर इस विषय की बहुत मोटी-मोटी बातें बहुत मोटे तौर पर कही गयी हैं। ….2) द्विवेदी जी के लेखों को पढ़ने से ऐसा जान पड़ता है कि लेखक बहुत मोटी अक्ल के पाठकों के लिए लिख रहा है। एक-एक सीधी बात कुछ हेरफेर -कहीं-कहीं केवल शब्दों के ही- साथ पाँच-छह वाक्यों में कही हुई मिलती है।…3) इन पुस्तकों को एक मुहल्ले में फैली बातों से दूसरे मुहल्ले वालों को कुछ परिचित कराने के प्रयत्न के रूप में समझना चाहिए।’ साहित्य की बुनियादी भूमिका के इस अवमूल्यन का परिणाम ये हुआ कि वह आधुनिकता के विमर्श के इर्द-गिर्द घूमने लगा, कभी उसके पीछे-पीछे तो कभी, प्रेमचन्द के कथन के वजन पर कहें तो, उसके आगे-आगे।

मनुष्य के सामाजिक जीवन को नितान्त भौतिक समृद्धि के परिप्रेक्ष्य में परिभाषित करने का परिणाम ये हुआ कि जीवन के वे आयाम, जिनकी सिर्फ भौतिक सन्दर्भों में व्याख्या एक सीमा के बाद संभव नहीं है, लेकिन जो भौतिक उपलब्धि से कम महत्वपूर्ण नहीं हैं, हमारे चिन्तन की परिधि से ही बाहर चले गए। भावनाओं, संवेदनाओं और मानवीय जीवन की अस्तित्वमूलक चिन्ताएँ और मानवीय अस्तित्व की सार्थकता की वे परिकल्पनाएँ, जो भौतिक उपलब्धि से आगे जाती हैं, का भी इस राजनीतिक विमर्श में अवमूल्यन हो गया। यहाँ पर ये ध्यान दिलाने की जरूरत है कि भारतीय चिन्तन परम्परा में मानवीय जीवन के अस्तित्व की सार्थकता को कभी भी सिर्फ भौतिक उपलब्धियों के निकष पर तौलने की कोशिश नहीं की गई थी। बहुत पीछे न भी जाएँ तो भक्तिकालीन साहित्य की बुनियादी संवेदना के सहारे भी इसे समझा और समझाया जा सकता है। असल में साहित्य, संगीत और कलाएँ मनुष्य की संवेदना के उन आयामों को जागृत, उद्दीप्त और समृद्ध करती हैं, जहाँ तक आधुनिकता के ‘एक आयामी’ विमर्श से पैदा होने वाला समाज विज्ञान पहुँच ही नहीं सकता। साहित्य, संगीत और कलाएँ मानवीय अस्तित्व की सार्थकता के उन आयामों को रचती रही हैं, जिनकी चिन्ता आधुनिकता के विमर्श में कम ही दिखाई पड़ती हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि वे मानवीय अस्तित्व की सार्थकता को सिर्फ भौतिक उपलब्धि के निकष पर परिभाषित करने की प्रक्रिया का अतिक्रमण करती हैं। ऐसा नहीं है कि साहित्य और कलाएँ भौतिक समृद्धि, गैर-बराबरी और किसी भी प्रकार के भेदभाव और शोषण को पूरी तरह से नजर अंदाज करती हैं, लेकिन यह जरूर है कि वे भौतिक समृद्धि को मानवीय अस्तित्व की सार्थकता के एकमात्र निकष के रूप में देखने के विमर्श में ढलने से इनकार करती हैं। इसके बजाय वे मानवीय अस्तित्व की सार्थकता के उन आयामों (कल्पित या वास्तविक) को रचती हैं, जिनके सामने भौतिक समृद्धि का पैमाना फीका लगने लगता है।

इतिहासकार ज्ञानेन्द्र पाण्डेय ने अपने लेख ‘गैरियत का गद्य’ में लिखा है कि मनुष्य के आत्यन्तिक दुखों को इतिहास के दायरे में दर्ज कर पाना नामुनकिन है। सुख-दुख, हर्ष-विषाद की आत्यन्तिक मनःस्थितियों के आयाम जिस तरह साहित्य, संगीत तथा कलाओं में आते हैं, वे समाज विज्ञान के विषयों में उस तरह से आ ही नहीं सकते। विडम्बना ये है कि आधुनिकता के साथ पैदा होने वाले समाज विज्ञान के इर्द-गिर्द मंडराने वाला साहित्य अपनी उस बुनियादी भूमिका को चाहे-अनचाहे अप्रासंगिक मानकर छोड़ देता है, जहाँ तक समाज विज्ञान के किसी विषय के लिए पहुँच पाना ही मुश्किल है। उर्दू के कवि मोमिन की एक पंक्ति है, ‘तुम मेरे पास होते हो, गोया जब कोई दूसरा नहीं होता।’ इसी पंक्ति के वजन पर, चाहें तो, कह सकते हैं कि साहित्य और कलाएँ वहाँ भी मनुष्य के पास होती हैं, जहाँ ज्ञान-विज्ञान के दूसरे अनुशासन पहुँच  ही नहीं पाते।

यह अकारण नहीं है कि पहले स्वच्छन्दतावादी और फिर आधुनिकतावादी साहित्य और कलाओं में आधुनिकता के इस ‘एक आयामी’ विमर्श से बाहर निकलने की एक लहूलुहान जद्दोजहद दिखाई पड़ती है। ये सही है कि आधुनिकता के इस लौहपाश से बाहर निकलने में आधुनिक साहित्य और कलाएँ सफल नहीं हुईं, लेकिन इससे उनकी कोशिश का महत्व कम नहीं हो जाता।

महावीर प्रसाद द्विवेदी ने साहित्य को ज्ञानराशि का संचित कोश मानकर और कविता तथा गद्य के अन्तर को मिटाकर और चाहे-अनचाहे साहित्य को पूर्व औपनिवेशिक परम्परा से काटकर जिस प्रकार के साहित्यिक लेखन को पुरस्कृत किया, उसके आदर्श कवि मैथिली शरण गुप्त ही हो सकते थे। मैथिली शरण गुप्त की कविता को देखकर लगता है कि जैसे समूची भारतीय परम्परा में उनसे पहले कोई कवि ही नहीं हुआ और वे पहले व्यक्ति हैं, जिन्होंने कविता लिखने का बीड़ा उठाया है। संवेदनात्मक दृष्टि से कुछ नैतिक आग्रहों के पद्य में अनुवाद के अतिरिक्त शायद ही ऐसा कुछ हो, जिसके लिए उनकी कविता को पढ़ना जरूरी लगे। समूची भारतीय काव्य परम्परा में कविता की दुनिया कभी भी इतनी इकहरी और एकायामी नहीं रही, जितनी मैथिली शरण गुप्त की कविताओं में दिखाई पड़ती है। स्वाभाविक ही था कि छायावादी काव्य में इस एकायामी इतिवृत्तात्मकता से असंतोष फूट पड़ता। लेकिन जैसा पहले भी उल्लेख किया जा चुका है कि ज्यादातर आधुनिक साहित्य का विकास अंग्रेजी शिक्षा प्राप्त व्यक्तियों द्वारा, अंग्रेजों द्वारा स्थापित शिक्षा केन्द्रों यानी विश्वविद्यालयों के परिसर में हुआ। इसीलिए छायावादी कविता में कृत्रिम कल्पनाशीलता तो खूब है, लेकिन वैसी कल्पनाशीलता बहुत कम है, जिनका जन्म एक गहरी बेचैनी से होता है और जिसके साक्ष्य कबीर, जायसी, सूर, मीरा और यहाँ तक कि तुलसीदास के साहित्य में दिखाई पड़ते हैं।

यह अकारण नहीं है कि समूचे प्रगतिवादी, यथार्थवादी और यहाँ तक कि आधुनिकतावादी साहित्य में भी गहरी सांस्कृतिक बेचैनी और उहापोह के ऐसे निशान कम ही दिखाई पड़ते, जिनसे ये प्रतीत हो कि ये समूचा साहित्य भारतीय सभ्यता की उस सुदीर्घ परम्परा में लिखा गया है, जिसमें सब कुछ बुरा ही नहीं है, बहुत कुछ अच्छा भी है।

अन्त में ये कहना अनुचित नहीं होगा कि सही मायने में भारतीय साहित्य में नवजागरण तो तब होगा जब हम आधुनिकता से पहले की साहित्यिक और ज्ञान परम्परा से तथा लोक परम्परा से, आधुनिकता के निकष को अन्तिम सच न मानते हुए, नए सिरे से संवाद स्थापित करेंगे।

प्रो॰राजकुमार

प्रो॰राजकुमार

प्रो॰ राजकुमार।  शोर-शराबे से दूर अध्ययन-अध्यापन में मग्न रहने  वाले युवा-तुर्क हिन्दी आलोचक। भक्ति साहित्य, हिन्दी नवजागरण, आधुनिकता, आधुनिक साहित्य, प्रेमचंद, हिन्दी कहानी इत्यादि पर लगातार लेखन।  किताबों में जैसी रुचि इनकी  है,  वह अन्यत्र दुर्लभ ही हो गई है। फिलहाल, बी॰एच॰यू॰ के हिन्दी विभाग में प्राध्यापक।इनसे dr.kumar.raj@gmail.com पर संपर्क संभव। 

साभार- नया ज्ञानोदय 

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समकालीन कविता का आत्मसंघर्ष: सुधीर रंजन सिंह

By सुधीर रंजन सिंह 

(इस आलेख को भारत भवन में प्रस्तुत करने को लेकर मुझे एक अत्यंत आत्मीय और अग्रज कवि से तीखे विवाद और आत्मसंघर्ष से गुज़रना पड़ा है। मैं कभी किसी राजनीतिक संस्था या लेखक संगठन का सदस्य नहीं रहा। मैं कवि और आलोचक हूँ। कदाचित अस्वीकृत। स्वीकृति की शर्तें पूरी करने में मैं अपने को अयोग्य अनुभव करता हूँ। मंच और संस्थाओं से संवाद के स्तर पर मेरा सम्बन्ध रहा है। इसके लिए भी मैंने खुद होकर विशेष प्रयास नहीं किया। आलोचनात्मक लेखन प्रायः मैंने अपनी अकादमिक आवश्यकताओं  के अधीन किया है। आमंत्रण अथवा आग्रह पर कुछ ही लेखन किए हैं। अवसर ही कम थे। दूसरे स्तर पर, अपने लोगों से सीखने में मैं कभी पीछे नहीं रहा। यह प्रक्रिया है, जिसका लाभ मुझसे दूसरों ने भी लिया होगा। मेरा अनुभव है कि मेरी बातों का जिन लोगों ने लाभ लिया, मंच पर खड़े होने की दशा में उन्होंने मेरी तरफ पीठ कर ली।
मंचों की पीठ मेरी ओर अधिक रही। प्रतिबद्धता की पीठ भी मेरी ओर रही। विरोधियों का सामना करते हुए यह बात होती तो मैं इसे भी सह लेता। उनके साथ तो सामंजस्य के कीर्तिमान स्थापित किए गए। कॅरियर की दुनिया में, चाहे वह साहित्य से सम्बन्धित क्यों न हो, कोई सचमुच शत्रु नहीं होता और सच्चा मित्र भी शायद ही कोई होता है। सच यही है कि सत्ता संरचना से बाहर कोई नहीं है, और इसका पापबोध भी नहीं है। सामंजस्य को रणनीति की संज्ञा दी जाती है। लेकिन उनका यह सोचना कहाँ तक ठीक है कि दूसरे हमेशा  बिना हथियार और रणनीति के अपने पापबोध में अलग-थलग पड़े रहें?
मित्र की मर्जी के विरुद्ध मैंने यह आलेख प्रस्तुत किया, निश्चित  ही यह अपराध मुझसे हुआ है। इसे लेकर मैं यही अनुभव करता हूँ, भर्तृहरि का श्लोक है- ‘‘बौद्धरो मत्सरग्रस्ताः प्रभवः स्मयदूषिताः। अबोधोपहताष्चान्ये जीर्णमंङ्गे सुभाषितम्।।’’ इसकी अनुरचना मेरे द्वारा की गई है- ‘‘जाऊँ, किसे सुनाऊँ/ ठहरे जो विज्ञ विषारद/ रोग डाह का उन्हें लगा है/ कुबेर बड़े कि अधिकारी जो/ रहते ऐंठे-ऐंठे हैं/ जनगण है अपना/ समझ उतना पाए न वह/ छीज जातीं बातें अच्छी/ देह के भीतर।’’)

 लाँग नाइन्टीज़: अनेकान्त काल

विषय है मानवीय मूल्य और समकालीन हिन्दी कविता का आत्मसंघर्ष। यहाँ विशेषण के रूप में आया मानवीय स्वयं मूल्य है, और जहाँ तक मुझे ध्यान है कविता के सन्दर्भ में मानवीय मूल्य को आगे करके कोई बहस नहीं चली है। हिन्दी में नई कविता के सिद्धान्तकारों के द्वारा प्रचलित पद है- मानव मूल्य। यह बहस के लिए तब बड़ा विषय हुआ करता था और उसके पीछे एक उद्देश्य था। साहित्यिक बहसों के पीछे उद्देश्य प्रायः राजनीतिक ही हुआ करते हैं। मानव मूल्य पर विचार के साथ भी यह था। मुझे थोड़ी देर के लिए उस प्रसंग में जाने की इजाजत दें। उसके बाद मैं समकालीन कविता के आत्मसंघर्ष पर जिरह की इजाजत चाहूँगा। अन्त में यदि सम्भव हुआ तो मानवीय मूल्य पर अपनी बात समाप्त करूँगा।

धर्मवीर भारती की एक पुस्तक का नाम है- मानव मूल्य और साहित्य। भारती नई कविता के प्रमुख कवियों में से हैं, लेकिन नई कविता के प्रमुख सिद्धान्तकार थे लक्ष्मीकांत वर्मा और विजय देवनारायण साही। लक्ष्मीकांत वर्मा की पुस्तक नई कवित के प्रतिमान, जो बहस की दृष्टि से उस ज़माने में पर्याप्त महत्त्व की थी, में एक लेख है- मानव विशिष्टता और आत्मविश्वास के आधारमानव विशिष्टता से लक्ष्मीकांत वर्मा का आशय मानव मूल्य ही था। यह 1957 की पुस्तक है। इससे पहले 1948 से 1956 के बीच जयशंकर प्रसाद से पद उधार लेकर लघुमानव की धारणा को आगे किया गया था, जिसका विकास विजय देवनारायण साही के प्रसिद्ध विवादित लेख लघुमानव के बहाने हिन्दी कविता पर बातचीत में हुआ। उसमें लघुमानव को मानव मूल्य का सैद्धान्तिक आधार दिया गया और छायावाद से लेकर अज्ञेय तक की कविता पर विचारोत्तेजक टिप्पणी की गई। बाद में लक्ष्मीकांत वर्मा ने साही के प्रयास को नई कवितावादी सूत्र के रूप में सामने रखा मानव मूल्यों के सन्दर्भ में लघु-मानव की कल्पना नामक लेख में। इस प्रकार, ‘मानव मूल्य पद अथवा अवधारणा नई कविता द्वारा प्रचलित है। उसी की शब्दावली में कहें तो यह नई कविता के सहचिन्तन की उपलब्धि है। यह अच्छी बात है कि नई कविता में सामूहिक चिन्तन था, जो आज प्रायः दुर्लभ हो गया है। उस सामूहिक चिन्तन का दोष यह था, मुक्तिबोध की शब्दावली में कहें, उसने एक क्लोज्ड सिस्टम बना लिया था, जिससे संघर्ष की आवश्यकता थी, और जिसे मुक्तिबोध ने आत्मसंघर्ष की संज्ञा दी थी – नई कविता का आत्मसंघर्ष। आज हम समकालीन कविता के आत्मसंघर्ष पर बात कर रहे हैं तो उस आत्मसंघर्ष को भी याद किया जाना चाहिएजिसे मुक्तिबोध ने नई कविता के सन्दर्भ में आवश्यक समझा था। उनकी यह बात यहाँ याद करने योग्य है, ‘‘नई कविता में स्वयं कई भावधाराएँ हैं, एक भाव-धारा नहीं। इनमें से एक भाव-धारा में प्रगतिशील तत्त्व पर्याप्त है।  समीक्षा होना बहुत आवश्यक है। मेरा अपना मत है, आगे चलकर नई कविता में प्रगतिशील तत्त्व और भी बढ़ते जाएँगे, और वह मानवता के अधिकाधिक समीप आएगी।’’1

आगे चलकर नई कविता में प्रगतिशील तत्त्व तो नहीं बढ़े- नई कविता ही नहीं रही- लेकिन प्रगतिशील कविता का जो अगला विस्तार हुआ, उसमें नई कविता के तत्त्व अवश्य बढ़ गए। यह एक हद तक ज़रूरी भी था। नई कविता में नएपन पर जो जोर था, उसका मूल्य है। उसके कुछ दीग़र मूल्यों से असहमति की गुंजाइश है। मुक्तिबोध का आत्मसंघर्ष उसी गुंजाइश को दर्शाता है। उनके यहाँ मानवता का प्रयोग नई कविता के सहचिन्तन के परिणाम के रूप में आने वाला मानव मूल्य के अर्थ में नहीं हुआ है। नई कविता में मानव मूल्य को अर्थ दिया गया था- अनुभूति की प्रामाणिकता, ‘अनुभूति की ईमानदारी आदि। इस अर्थ में खोट नहीं है, खोट है इसकी ऐतिहासिक नियति में। नई कविता से पहले यूरोप में आवाँगार्द कला में प्रामाणिक अनुभव को पकड़ने का सराहनीय प्रयास हुआ था, लेकिन बाद में वही प्रामाणिक अनुभव शीतयुद्ध की राजनीति की विचारधारा बना, जिसका शिकार नई कविता भी हुई। उसके प्रति मुक्तिबोध ने सावधान किया था। उनके शब्द हैं, ‘नई कविता के बुर्ज से शीतयुद्ध की गोलन्दाजी हो रही है। यह आकस्मिक नहीं है कि मुक्तिबोध ने अनुभूति की प्रामाणिकता के वज़न पर जीवनानुभूति पद को आगे किया। जीवनानुभूति में मानवता का पक्ष प्रबल है। आज हम कह सकते हैं कि जीवनानुभूति की धारणा कविता के सन्दर्भ में पर्याप्त नहीं है, लेकिन उसकी ऐतिहासिक आवश्यकता से इनकार नहीं कर सकते हैं। उसमें शीतयुद्ध की गोलन्दाजी के विरुद्ध जीवनानुभूति के ज़रिए मानवता के अधिकाधिक समीप जाने की चेष्टा की गई है।

शीतयुद्ध 1986-’87 में समाप्त हो गया। आज यह बहस बेकार है कि शीतयुद्ध का खलनायक अमरीका था या अमरीका और रूस दोनों देश। सिर्फ़ यही कहा जा सकता था कि द्विधु्रवीय व्यवस्था से विश्वव्यापी संकट पैदा हो गया था। शीतयुद्ध की समाप्ति के पाँच साल बाद सोवियत-कम्यून भी समाप्त हो गये और  नई विश्व-व्यवस्था आई। इस बात को बीस साल हो गए हैं। आज इस गोष्ठी के माध्यम से कविता के सन्दर्भ में मानव मूल्य का प्रश्न उठाया गया है तो इसकी प्रासंगिकता को समझना हमारे लिए ज़रूरी है। नई कविता की वापसी तो सम्भव नहीं है, लेकिन मुझे लगता है कि नई कविता की जो राजनीति थी, जिससे मुक्तिबोध ने अगाह किया था, उसी तरह की समझ की वापसी हो रही है।

90 के बाद का समय हमारा जीवन काल है- हमारा यानी सामान्य रूप से स्वाधीनता के आसपास जनमे लोगों से लेकर युवतम पीढ़ी का। इनमें संवेदना अथवा चेतना के धरातल पर मैं बहुत भेद नहीं करना चाहता। समसामयिक होने के नाते लोगों के पूर्वग्रह काम कर सकते हैं। समकालीनता के साथ यह बात प्रायः होती ही है। वर्तमान मतभेद की भूमि न हो, तो वह कितनी बेजान चीज़ होगी, इसका अनुमान किया जा सकता है। इसके बावजूद, वर्तमान की वास्तविक विशिष्टताओं का शरसन्धान कठिन होता है। इसके लिए बहुत बड़ी बहस की आवश्यकता है। वर्तमान के अन्तर्विरोध आखिर हमारे ही अन्तर्विरोध होते हैं, जिन्हें समझने के लिए समसामयिक ऐतिहासिक यथार्थ को कठोर आत्मचेतना के स्तर पर पहचानने की आवश्यकता होती है।

समकालीनता पर कच्ची-पक्की बहसें हमेशा चलती रहती हैं। कविता के सन्दर्भ में कई उल्लेखनीय बहसें हुई हैं। अभी-अभी एकांत श्रीवास्तव ने वागर्थ का अंक निकाला है- हिन्दी कविता: 80 के बाद (लाँग नइान्टीज़)। उसमें दस लोगों ने बहस में भाग लिया है। लाँग नाइन्टीज़ की अवधारणा बद्रीनारायण की है। 2008 में देखने को मिली द लाँग नाइन्टीज़: समय को समझने का एक विनम्र प्रस्ताव शीर्षक से। उसी की कड़ी है फटी हुई जीभ की दास्तान नामक लेख जो 2009 में छपा था। वह विचारोत्तेजक मामला है, जिस पर मैंने थोड़ा-सा लिखा है जो आलोचना के नए अंक में छपा है। आज की बहस में भी मैं लाँग नाइन्टीज़ से जुड़ी कुछ बातें कहने की इजाजत चाहूँगा।

लाँग नाइन्टीज़ के पहले राजेश जोशी और विजय कुमार आलोचना के मंच से समकालीनता और कविता विषय को बहस के लिए आगे कर चुके थे। बाद में राजेश जोशी ने अपनी दूसरी नोटबुक वाली किताब का नाम ही रखा- समकालीनता और साहित्य। उसमें समकालीनता और कविता लेख में मेरी धारणा का उल्लेख किया गया है, जो मैंने एरिक हॉब्सबॉम की ‘शॉर्ट सेंचुरी के वज़न पर रखी थी- हमारे अपने सन्दर्भ में 19वीं शताब्दी की शुरूआत 1857 के विद्रोह से और 20वीं शताब्दी की शुरूआत 1947 में मिली आज़ादी से मानी जानी चाहिए। राजेश जोशी ने अपनी सुविधा के अनुसार मेरी उस बात को छोड़ दिया कि हमारे सन्दर्भ में 20वीं शताब्दी लगभग असमाप्त है। समाप्ति के कुछ चिह्न बाबरी मस्जिद के ध्वंस और उसके बाद की कुछ घटनाओं में अवश्य दिखते हैं। लेकिन हम 21वीं शताब्दी में आ गए हैं, कि इसे लेकर मेरे मन में दुविधा है। सूचना-प्रौद्योगिकी के विस्तार के लिहाज से यह आप कह सकते हैं कि हम लगभग 21वीं शताब्दी में आ गए हैं।

यह हमारा जीवन काल है। जब तक हम जि़न्दा हैं इसे समझने के लिए बार-बार नए सिरे से प्रयास की आवश्यकता होगी। और यह कोई प्रलय-काल नहीं है। वे बहुत-सी आशाएँ जो मनुष्य ने कल्पित की थीं, इस काल में फली-फूल रही हैं। एक स्वप्नहीनता के बावजूद। यह बात कविता में भी है। कविता का अर्थ होता है स्वप्नहीनता के विरुद्ध होना, भविष्य की ओर देखना। ब्रेख्त की मशहूर कविता है आने वाली पीढि़यों से, जो इस बेचैनी के साथ शुरू होती है- सचमुच, मैं एक अँधेरे वक्त़ में जी रहा हूँ!यह उस वक्त़ की कविता है जब द्वितीय विश्वयुद्ध का आग़ाज़ हो चुका था। मानवता भीषण ख़तरे में पड़ गई थी। यह कवि के लिए घोर आत्मसंघर्ष का दौर था, जिसमें वह अपनी कमियों को भी टटोलता है। सबने पढ़ी होगी यह कविता। कविता समाप्त होती है-

पर तुम, जब वह वक्त आए

आदमी आदमी का मददगार हो

याद करना हमें

कुछ समझदारी के साथ।

वह वक्त़ आए, कविता इसी के लिए लिखी जाती है। इसी बात में कवि की समकालीनता, आत्मसंघर्ष और भविष्य में उसका जीवन है। यही मानवीय मूल्य भी है। मानवीय मूल्य सत्य के अन्वेषण में है। सत्य वही नहीं जो हम देखते हैं, बड़ा सत्य वह है जो हम चाहते हैं। सवाल यह है कि हम चाहते क्या हैं और कितनी ताकत के साथ चाहते हैं। बहुत ऊर्जा चाहिए। बहुत ताकत चाहिए। बहुत सावधानी भी चाहिए। लेकिन विगत के उद्यमों, चाहे वे आसन्न विगत के क्या न हों, को झुठलाने और नकारने की आवश्यकता नहीं पड़नी चाहिए। पुराने के बीच से ही नया फूटता है। नए के भीतर से दूसरा नया फूटेगा। पुराना फ़ैशन की तरह कभी न लौटे, लेकिन उसका अद्भुत अपनी जगह ज़रूर बना रहेगा, और उसमें झाँकने की भी आवश्यकता बनी रहेगी।

समकालीन कवि वह है जो अपने को पूर्ववर्तियों की वैचारिक मान्यताओं की कड़ी के रूप में देखता है। वह केवल वास्तविकता की ओर उन्मुख नहीं है। वास्तविकता को वह आत्मचेतना के स्तर पर रचने का प्रयास करता है, जिसमें भविष्य और उसके रास्ते संकेतित होते हैं। यह काम चुपचाप चलता है, बहुत बोलकर नहीं। कविता की यही प्रकृति है। कवि के आत्मसंघर्ष की यह प्रकृति है। कवि वास्तविकता का हिस्सा मात्र नहीं होता। वह वास्तविकता के विरुद्ध एकांत की रचना करता है,और एकांत जिस चुप्पी की रचना करता है उसमें अनन्त का स्फोट होता है। दूसरे शब्दों में, भविष्य का स्फोट होता है।

प्रश्न है हमारा समय क्या है? हमारे समय की कविता कैसी है? बद्री हमारे समय को लाँग नाइन्टीज़ नाम देते हैं। लाँग नाइन्टीज़ यानी हॉब्सबॉम की ‘शॉर्ट सेंचुरी के बाद का समय, जिसमें पुराना समाप्त हो चुका, लेकिन नए का स्वप्न साफ नहीं है। लाँग नाइन्टीज़ पद में, इस तरह समाजवाद के भविष्य के प्रति निराशा दिखाई देती है। निराशा उचित है। लेकिन उस निराशा के उत्तर में इधर-उधर से लाए गए वैचारिक संस्रोतों में जो चमक और ऊर्जा देखी गई है, और जिस तरह पूर्व पीढ़ी के कृतित्व पर शरसन्धान किया गया है, वह आत्मश्लाघापूर्ण विच्छेद की ऊँचाई पर है। किसान, मजदूर और प्रोलेटेरियत आन्दोलनांे के बरक्स उपेक्षित एवं दलित, महिला एवं सबाल्टर्न प्रतिरोध बद्री के अनुसार ’90 के बाद की विशेषता है। (वागर्थ-209/34) इससे सहमत होने की गुंजाइश मेरी समझ से कम बनती है। ये बातें बहुत पहले पैदा हो गई थीं। हॉब्सबॉम की पुस्तक एज़ ऑफ एक्सट्रिम्स के शुरू में लोगों की नज़र में बीसवीं शताब्दी क्या है शीर्षक के अन्तर्गत कुछ टिप्पणियाँ शामिल की गईं हैं। नोबेल पुरस्कार से सम्मानित रीता लेवी मोंतेलसिनी की टिप्पणी है, ‘‘सभी बातों के बावजूद इस शताब्दी में अच्छे से अधिक अच्छे के लिए क्रांतियाँ हुई हैं… चैथी सत्ता का उदय और सदियों से दमित नारी का उत्थान।’’ यह बात यूरोप की तुलना में भारत में कम हुई थी, लेकिन हुई थी। कविता में भी ’90 से पहले यह दिखाई पड़ती है। रघुवीर सहाय में स्त्री प्रश्न खूब है। मंगलेश, अरुण कमल, राजेश जोशी और उदयप्रकाश में भी है। यह अलग बात है कि इन कवियों ने इसे अलगा कर दिखाने की कोशिश नहीं की, और पिछले दौर में कवयित्रियों का अभाव रहा। अच्छी बात है कि बद्री ने अपने पूर्व के कुछ कवियों को, जिसमें राजेश और अरुण हैं, सरलीकरण की प्रवृत्ति से बाहर रखकर देखा है, लेकिन इसके लिए उन्हें ’90 का ऋणी बना दिया है। बड़ी चीज़ नब्बे है; जैसे पहले छायावाद के विरुद्ध बड़ी चीज़ नई कविता थी। नयी कविता छायावादी संस्कार की शत्रु थी; ’90 परवर्ती प्रगतिशील संस्कार का किंचित शत्रु हुआ।

प्रगतिशील कविता, अपने सफल-असफल दावों में, मानवता के लिए संश्लिष्ट विश्वदृष्टि अर्जित करने का प्रयास करती है। विश्वदृष्टि का अर्थ विचारधारा अथवा माक्र्सवादी दृष्टि नहीं। विश्वदृष्टि का सम्बन्ध साहित्य से है, वह साहित्य से उद्भूत होने वाली चीज़ है। नई कविता भी विश्वदृष्टि अर्जित करने का प्रयास करती है। अज्ञेय के यहाँ यह बात है। प्रगतिशील कविता और नई कविता, दोनों आधारभूत विभिन्नताओं को टटोलने का प्रयास करती हैं। दोनों अपने-अपने स्तर पर एक जगह आकर मिलने का भी प्रयास करती हैं। शमशेर और मुक्तिबोध, दोनों इस बात के उदाहरण हैं। अच्छी बात थी कि इन कवियों में जीत की तमन्ना थी तो असफलता का इतिहास रचने का साहस था, जो बाद में कम दिखाई पड़ता है। आज सफलता के लिए जोड़-तोड़ कितना बढ़ा है, बद्रीनारायण को भी मालूम है।

बद्रीनारायण ने जितने समकालीन प्रतिरोध गिनाए हैं, उनमें से एक है सबाल्टर्न। यह भी ’90 की कोई संवृत्ति नहीं है। दूसरी बात, जैसे आवाँगार्द की कला में बाद में आकर्षण नहीं बचा था, वही बात सबाल्टर्न के साथ है। सबाल्टर्न लोग त्रासदी के प्रसन्न-चित्त आख्याता बन गए, सांस्कृतिक प्रभुत्व (कल्चरल हिगेमनी) तोड़ना उनके एजेंडे में नहीं रहा। आज जब मजदूरों, किसानों, निम्न बुर्जुआ का लोकप्रिय गठबंधन, जिसे जनता कहा जाता है, गायब हो रहा है, सबाल्टर्न पर फ्रेडरिक जैम्सन की उत्तर आधुनिकता के विमर्षों पर यह टिप्पणी सही बैठती है।

इसके लिए फ्रायड के स्वप्न विश्लेषण के रूपक का इस्तेमाल किया गया है। संभवतः सब बातों के बावजूद यह नई कहानी नहीं है। फ्रायड के उस आनन्द को याद करें जो उन्हें एक अस्पष्ट आदिवासी संस्कृति की खोज से प्राप्त हुआ था। स्वप्न विश्लेषण की अनेक परम्पराओं में से सिर्फ़ यह खोज उनकी अवधारणा के काम की थी कि सभी स्वप्नों के सेक्स सम्बन्धी छुपे अर्थ होते हैं- केवल सेक्स सम्बन्धी स्वप्नों के, जिसके कुछ और ही अर्थ होते हैं। यही बात उत्तर आधुनिक बहसों पर भी लागू होती है। जिस विराजनीतिक नौकरशाही से यह संवाद स्थापित करता है, वहाँ समस्त सांस्कृतिक लगने वाली बातें राजनीतिक नीतिशिक्षण का प्रतीकात्मक रूप निकालती हैं- सिवाय एकमात्र स्पष्ट राजनीतिक स्वर के जो पुनः राजनीति से संस्कृति में घुसपैठ का लक्ष्य रखता है।2

    बद्रीनारायण ने ’90 के दशक में उभरे कवियों में सामान्य सम्बन्ध-सूत्र की दृष्टि से स्थानीयता अथवा लोक को जो महत्त्व दिया है वह तब तक फ्रायडीय आनन्द से आगे की कहानी नहीं बन सकता, जब तक कि उसकी आधारभूत विभिन्नता किसी संश्लिष्ट और मूलगामी विश्वदृष्टि पर आकर नहीं मिलती। कम-से-कम दबाव पैदा करने की षक्ति तो उसमें होनी ही चाहिए। मैं यह नहीं कहता कि आज की कविता में यह बात एकदम नहीं है; लेकिन स्थानीयता अथवा लोक के नाम पर विराजनीतिक नौकरशाही से सामंजस्य बैठाने और सत्ता संरचना में अपने को खपा देने का भी काम कम नहीं हुआ है। संभव है कि इस कहानी के हम भी किरदार और पवित्र पापी हों। इस बात से कविता के आत्मसंघर्ष का गहरा सम्बन्ध है।

    फूको प्रतिपादित करते हैं सत्ता सर्वत्र है। कोई भी ऐसा स्थान नहीं है, जहाँ से प्रतिरोध को सत्ता से अलगाया जा सके। जो विरोध में खड़ा है वह वास्तव में दूसरे प्रकार की सत्ता है। साहित्य अथवा कविता प्रतिरोध की सत्ता के रूप में भी इसका अपवाद नहीं है। इसलिए पूर्व पीढ़ी को कोसना और अपनी पीठ थपथपाना ठीक नहीं है। इस रास्ते हम समकाल के ही बन्दी हो जाते हैं। ठीक काम यह है कि हम समसामयिक ऐतिहासिक यथार्थ और उसकी चुनौतियों से आत्मचेतना के स्तर पर टकराते रहें। इसे सच्ची रचनाशीलता कही जा सकती है। इससे नए रास्ते निकलेंगे, नई युगचेतना निर्मित होगी। परिवर्तनकारी समय (पद बद्री का) की रचना भी इसी रास्ते होगी। भारत माता ग्राम-वासिनी, जो लाँग नाइन्टीज़ के सम्पादकीय में एकांत श्रीवास्तव ने उत्साह में जो कहा है, भावना के स्तर पर मैं उनकी बात की इज्जत करता हूँ, लेकिन उसमें निहित नाॅस्टैलिजिया और रूमानियत से बात नहीं बनेगी। कई-कई विषय और भावधाराओं की ज़रूरत है। समकालीन कविता के आत्मसंघर्ष में केवल गाँव और कस्बा शामिल नहीं हैं। विगत की तुलना में उसके क्षेत्र में कई गुना विषय बढ़ गए हैं। काव्य-वस्तु के विकास के लिए भी संघर्ष करना है, जो इस सूचना प्रौद्योगिकी युग में कई गुना कठिन हो गया है। काव्य-विषय की दृष्टि से हमें भारी कठिनाइयों का सामना करना पड़ सकता है। सूचना प्रौद्योगिकी की पहुँच कवि-चेतना को मात कर देती है। उससे सीखने और टकराने, दोनों की ज़रूरत है। हम सूचना और संचार प्रविधियों की अर्थव्यवस्था में आ चुके हैं। इसकी नई उत्पादन विधि, डी. फोरे की मानें तो, साॅफ्टवेयर के विकास को भी पार कर जाएगी, किस हद तक, उसे अभी समझा नहीं जा सकता है।3 इस तरह कवि-कर्म कठिन से कठिनतर होता जाएगा। ऐसे में, हमारी अन्तःप्रेरणाएँ ही सबसे अधिक काम आएँगी। दूसरी बात, सूचना प्रौद्योगिकी भी विषय है। बड़ा विषय है। जैसे पहले औद्योगिक क्रान्ति और मजदूरों के आन्दोलन बड़े विषय थे।

    हमारे समकालीन कवि दो प्रकार के हैं। एक वे हैं जो अपनी रचना और उसके विषयों को लेकर बहुत मुखर हैं। उन्हें अपने को मनवाने की चिन्ता अधिक रहती है। समझौताविहीन स्तर पर और बेहतरी की दिशा में या कहें प्रगति की मंशा से यदि किसी में यह है, उसे भी आत्मसंघर्ष के रूप में मंजूर किया जाना चाहिए। दूसरे वे हैं जो अपने कवि होने के प्रति संकोच का भाव रखते हैं। उनका आत्मसंघर्ष कठिन है। उनमें अन्तःप्रेरणाएँ अधिक सक्रिय रहती हैं, लेकिन उन्हें समझने में कवि अपने को असमर्थ महसूस करता है। जब कवि ही नहीं समझ पाता तो दूसरों के लिए समझना मुश्किल काम होगा ही। इस मुश्किल के भीतर कवि के आत्मसंघर्ष को समझने और इसी दृष्टि से उसे महत्त्व दिए जाने की आवश्यकता है। आज कवि बहुत हैं, लेकिन इस मुश्किल के भीतर ऊँचाई पाने वाले कवि बहुत कम हैं। जो हैं उन्हें आगे रखकर देखने की ज़रूरत है। आत्मसंघर्ष वाली बात ठीक-ठीक तभी समझ में आ सकती है।

    अन्तःप्रेरणा- जिसे पुराने लोग कारयित्री प्रतिभा कहते थे। यह उत्पाद्य प्रतिभा है। प्रतिभा कहने से भी काम चल सकता है। इसमें अनुभूति, जीवनानुभूति और कलात्मक अनुभूति, सभी बातें शामिल हो जाती हैं। यह सदैव बेहतरी अथवा अच्छाई की दिशा में सक्रिय रहती है। इसे मान लेने के बावजूद, जैसा कि मैं समझता हूँ, अन्तःप्रेरणा वह स्पेस है जहाँ अच्छाई और बुराई को बराबर का दर्जा प्राप्त होता है। अन्तःप्रेरणा में हम एक वस्तु को दूसरी वस्तु को विकल्प के रूप में नहीं देखते, उनसे चेतनागत सम्बन्ध अथवा विषेष प्रकार का तादात्म्य स्थापित करते हैं। सम्बन्ध की प्रकृति अथवा वह विषेष प्रकार क्या है, यह महत्त्वपूर्ण है। अन्तःप्रेरणा की क्रियाओं में अच्छा और बुरा दोनों समान महत्त्व रखते हैं। इस सम्बन्ध में फूको का एक कथन याद आता है, ‘‘मैं नहीं कहता कि सभी चीज़ें बुरी हैं, लेकिन वे सभी चीज़ें खतरनाक हैं जो ठीक-ठीक बुरी के समान नहीं हैं।’’4

    एक साक्षात्कार में यह बात आई है। और मैं जब यह पढ़ रहा था तो अचानक मुझे रामचरितमानस का अन्तिम दोहा याद आया-

कामहि नारि पिआरी जिमि लोभहि प्रिय जिमि दाम।

तिमि  रघुनाथ  निरंतर  प्रिय  लागहु  मोहि राम।

    मैंने शुरू में कहा था कि अंत में मानवीय मूल्य पर भी एकाध बात करूँगा। कामपिपासा और लोभ बुराई है, अमानवीय है। तुलसी ने अपनी भक्ति को उसके समकक्ष रखा। बुराई में जितनी शक्ति होती है, वह भक्ति को प्राप्त हो, भाव यह है। भक्ति को पाने के लिए उस पर बुराई को उत्प्रेक्षित करना पड़ा। मानवीय मूल्य तो ठीक है, लेकिन जो संसार है उसमें मानवीय-अमानवीय, अच्छा-बुरा, सब कुछ है- सुगुन छीर अवगुन जल ताता; मिलइ रचइ परपंच विधाता।

    अन्तःप्रेरणा के क्षेत्र में अन्तर्बाधा के लिए स्थान नहीं है। लेखक के नाते हम जानते हैं कि मूल्य अन्तिम नहीं होते। सात्र्र का यह कथन महत्त्वपूर्ण है, ‘‘मानवता को अभी निर्धारित होना बाकी है।’’ यही समझ हमें फासीवादी होने से बचाती है और आत्मसंघर्ष के लिए युक्ति प्रदान करती है।

    एक साथ कई विषयों से गुज़रना और उनसे जुड़े प्रश्नों पर बात करना कठिनाई पैदा करता है। यह दौर ही ऐसा है- अनेक विषयों और प्रश्नों से घिरा। इस अर्थ में मैं मानता हूँ कि नौवाँ दशक और उसके बाद का समय अलग से दिखाई देता है। लेकिन इसे लाँग नाइन्टीज़ ही कहा जाए, इसे लेकर मेरे मन में दुविधा है। बद्रीनारायण की इस बात से मैं सहमत हूँ कि नब्बे के दशक के पूर्व की कविता में जा वैचारिक संस्रोत काम कर रहे थे, वे बाद में कमजोर पड़ गए या अपर्याप्त साबित हुए। हमारे समय में अनेकान्त का महत्त्व है। हम किसी भी बुनियादी विषय पर एकमत होने की स्थिति में पहले की तुलना में बहुत कम हैं। दूसरी ओर, दूसरों की तरफ से प्रस्तावित विषय और विचार के प्रति हम पहले की तरह द्वेषी नहीं हैं। हम अकेला विकल्प हैं, यह बात अब नहीं रही। हमारा विवाद सबसे है और अपने आपसे भी है, जो जीवन और रचनाशीलता दोनों में मायने पैदा कर रहा है। लेकिन जिस दुनिया में हम जी रहे हैं उसमें ख़तरे भी कई गुना बढ़ गए हैं, उसमें हार जाने का डर विगत की तुलना में बढ़ गया है। यह एक ऐसा क्षण अथवा विन्दु है जो हमें इस समझ पर कायम होने के लिए विवश करता है कि पिछले दर्शन का महत्त्व है, लेकिन उसमें ज़रूरी संशोधन और नये अध्याय जोड़ने की ज़रूरत पड़ेगी। अभी तो हमें यही पता नहीं है कि हम कहाँ जा रहे हैं। यह अनेकान्त काल है। लेकिन रचनाशीलता के लिए, तमाम मुश्किलों के बावजूद, यही ऊर्वर काल है। हमें अपना काम करते हुए इस उम्मीद पर अपने को कायम रखने की ज़रूरत है, जो ब्रेख्त की उद्धृत पंक्तियों में है, ‘…जब वह वक्त आए/ आदमी-आदमी का मददगार हो/ याद रखना हमें/ कुछ समझदारी के साथ। जब वह वक्त़ आएगा तो बे्रख्त के साथ शायद हमें भी कुछ समझदारी के साथ थोड़ा याद रखा जाए। आमीन!

 सन्दर्भ:

(1) मुक्तिबोध रचनावली-5/334 (पे.बै.).

(2) फ्रेडरिक जैम्सन, पोस्ट मार्डनिज़्म ऑर द कल्चरल लॉजिक  ऑफ लेट कैपिटलिज़्म, पृ.-64.

(3) प्रसन्न कुमार चैधरी की पाण्डुलिपि अतिक्रमण की अन्तर्यात्रा से साभार.

(4) फूको रीडर, पॉल  रेबिनो (सम्पादक), पृ.-343.

 भारत भवन में 21.12.2012 को पढ़ा गया आलेख। कुछ अंश नहीं पढ़े गए। संशोधित।

sudhir ranjan singh

sudhir ranjan singh

हिन्दी के आलोचक। काव्य संकलन ‘और कुछ नहीं तो’ और आलोचना की पुस्तक ‘हिन्दी समुदाय और राष्ट्रवाद’ प्रकाशित। एक कविता संकलन और आलोचना की दो पुस्तकें शीद्घ्र प्रकाश्य। भोपाल के शासकीय महाविद्यालय में प्राध्यापन।

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