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निमित्त: उस्मान ख़ान

एक भविष्य-दृष्टि के साथ देखें या मौजूदा वक्त की निगाह से देखें या बहुत दूर नहीं गए व्यतीत के साये में देखें… कैसे भी देखें यह कहते हुए अफसोस होता है कि हिंदी कहानी बहुत देर से खुद को संदेहास्पद बनाने के आयोजन में मुब्तिला है। कहानी एक सुंदर विधा है और अगर उसे एक स्त्री मानें तब यह कह सकते हैं कि वह इन दिनों अपने रचयिता की जबरदस्ती से आजिज है। यहां मौजूद कवि उस्मान खान का गद्य इस औरत को उसकी आजिजी से आजाद कराने की एक इंकलाबी कोशिश है। गद्य इसे यूं कहा जा रहा है क्योंकि कहानी के मानकों पर यह कहानी पूरी नहीं उतरती। इसकी जिंदगी इसके उन्वान को सही नहीं ठहराती। ‘निमित्त’ का मतलब शब्दकोशों में ‘कारण’, ‘लक्ष्य’, ‘मकसद’ वगैरह बतलाया गया है। इस गद्य में जो घट रहा है, उसका निमित्त जाहिर तौर पर इस गद्य में नहीं मिलेगा। यहां गद्यकार के पास वक्त बहुत कम है और घटनाएं बहुत ज्यादा। जैसे एक छोटे से सफर में कोई हमसफर जब पूरी जिंदगी का सफर जानना चाहता है, तब बयान करने वाली कोशिश ‘क्या घटनाएं हुईं’ यह बताने की होती है, यह बताने की नहीं कि ‘घटनाएं क्यों हुईं’। इस प्रक्रिया में वाग्जाल और विस्तार कम होता है। सुनने वाला इसे संदेह से नहीं देखता, उसे सोचने का रोजगार मिल चुका होता है। संदेहास्पद कहानियों के दौर में ‘निमित्त’ एक ऐसी ही कहानी है— सोचने का रोजगार सौंपती हुई। इसने वह शिल्प नहीं चुना है जो मानकों को पूरा करने के लिए अपनी असलियत से अलग हो जाता है। यह कहानी उन कहानियों की तरह नहीं है, एक पैराग्राफ तक चलकर पढ़ने वाले जिनकी उंगली छोड़ देते हैं। #अविनाश मिश्र 

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Snap Shot from Titas Ekti Nodir Naam (1973)


निमित्त

 By उस्मान ख़ान

‘जी नहीं, आपके कहने से मैं इश्वर या धर्म पर विश्वास नहीं कर सकता! आपका ख़ुदा कैसा जीव है! न सुनता है, न देखता है, न बोलता है। उसे कुछ महसूस नहीं होता। वह खुश नहीं होता, नाराज़ नहीं होता। न्याय-अन्याय से उसे कुछ लेना-देना नहीं। फ़िर भी आपने अपनी ख़ुशी के लिए एक कल्पना-लोक बनाया है, जिसमें आप जो चाहें, हो सकता है। आपको अपनी कमज़ोरियों और कमअक़्ली को छुपाने के लिए एक खोल चाहिए, आपने अपने बाहर एक शक्ति को मान लिया, जो आपकी कमज़ोरी और कमअक़्ली को दूर कर सकती है, आप उसकी शरण में जाते हैं, उससे गुहार करते हैं, उसकी मनुहार करते हैं, वह नहीं सुनता, नहीं ही सुनता। वह हो तो सुने!’

इतना सुनने की देर थी कि बाबा ने मुझे धक्का मारकर घर से बाहर किया। ‘बदतमीज़! हरामख़ोर! भगवान को गाली देता है!’। मैं भी चुपचाप निकल गया। बाबा खुद भी जानता है कि उसने रो-रोकर, गिड़गिड़ाकर भगवान से अपनी पहली बीबी की जान की भीख माँगी थी, और भगवान ने उसकी अनसुनी कर दी थी। बाबा जब भी पहली माँ की बात करता है, भगवान को एक-दो गाली ज़रूर देता है। लेकिन मैं कैसे गाली दे सकता हूँ? भगवान का ठेका तो बाबा का है। बाबा भी ढकोसलेबाज़ है।

मुँह-अँधेरे मैं घर की दीवार से चिपककर सिर झुकाए ऐसे गली पार करता हूँ जैसे कोई उल्का-पिण्ड। तुरंत। मेरे पैर इतनी तेज़ी से उठते हैं जैसे रेल चल रही हो। मैं पूरी कोशिश करता हूँ कि घर में किसी के भी जागने से पहले घर से निकल जाऊँ। पहली बार जब आई ने दरवाज़ा खुला देखा था, तो क्या सोचा होगा! उसने मुझे कुछ कहा नहीं। मुझे पता है, मेरे बाद वही जागती है और सबसे पहला काम दरवाज़ा बंद करने का करती है। रात को भी वह दरवाज़ा अटकाकर सोती है, मैं जब चाहूँ घर आ सकता हूँ!

घर में सब लोग इस बारे में जानते हैं। कोई कुछ कहता नहीं। सबने मेरे इस रूप को स्वीकार कर लिया है। पहले-पहल बाबा कुछ कहते थे, बाद में उन्हें भी कोई फर्क नहीं रह गया। बाबा कभी-कभी मुझे परेशान करने के लिए दरवाज़ा बंद कर देते हैं, मैं भी दरवाज़ा नहीं बजाता। चुपचाप लौट जाता हूँ।

लौट जाता हूँ! कहाँ लौट जाता हूँ? कहीं भी! घर मेरे लिए मजबूरी है, जैसे सोना। मुझे नींद आने लगती है, तो मैं घर आ जाता हूँ। सोता हूँ और फिर निकल जाता हूँ। कहाँ? कहीं भी!

असल में, घर मेरे लिए एक सराय का काम देता है। जश्न हमारे घर में वैसे भी नहीं मनाया जाता और कभी कुछ हँसी-खुशी का मौका होता है, तो मैं अपनी तथाकथित मनहूस सूरत नहीं दिखाता। त्यौहारों पर भी यही स्थिति होती है। सब मुझे भूल गए हैं, ऐसा भी नहीं। पर कोई मुझे याद करना चाहता है, ऐसा भी नहीं। मैं उन्हें कुछ दे नहीं पाया। यानी अपने परिवार को। आई हैं, बाबा है, भैया है, भाभी हैं और उनसे जुड़े तमाम रिश्तेदार हैं। रिश्तेदार अक्सर आते-रहते हैं और अक्सर ही मैं इधर-उधर भटकता अपनी नींद को बहलाता रहता हूँ। भैया की स्थिति भी ऐसी ही है, वह भी घर से भागा फिरता है, जबकि वह कमाता है और कमाना अपने-आप में एक जादू है, जो लोगों को आपकी ओर आकर्षित करता है, आप जितना कमाते हैं, लोग उतना ही आपकी तरफ खींचते चले आते हैं और जहाँ आपने कमाना बंद किया लोगों को आपसे चिढ़ होने लगती है, आई भी जली-कटी सुना देती है, फिर और किसी का क्या कहूँ। हालाँकि मैं भिड़ जाता हूँ, ख़ासतौर पर रिश्तेदारों के साथ, उनसे मुझे और भी कुछ लेना-देना नहीं रहता। मैं उन्हें खरी-खोटी सुनाता हूँ। उनके मुँह पर उनके काले धंधे और धुर्तताओं की बात करता हूँ। वे मुझसे ख़ार खाते हैं। मैं उनसे मज़ा पाता हूँ।

आप सोच रहे होंगे मैं कोई काम क्यों नहीं करता। दरअसल, मैं कोई काम करना नहीं चाहता। काम करने से क्या होता है? काम करने से आज तक किसी को कोई फायदा हुआ है! कुल मिलाकर रुपया कमाने के अलावा काम करने का कोई और मकसद मुझे नज़र नहीं आता। और मैं रुपया कमाना नहीं चाहता। जी नहीं! ऐसा नहीं कि मैं निठल्ला हूँ। मैं पूरा दिन और कभी-कभी पूरी रात भी घुमता रहता हूँ। इस गली से उस गली, इस मुहल्ले से उस मुहल्ले, इस चौक से उस चौक। मैं दिन-भर चलता रहता हूँ। इस शहर का एक-एक हिस्सा मैं माप चुका हूँ। अब यह तो कोई काम नहीं है, और इस काम का कोई रुपया भी नहीं देता। और अगर देता भी, तो मैं लेता नहीं।

फिर आप कहेंगे मैं खाता-पीता कहाँ से हूँ? मैं कुछ छोटे-मोटे काम करता हूँ। फ्री-लांसिंग समझिए! तब भी मुझे घर से लगाव है। पता नहीं मेरा मन यहाँ अटका रहता है। सोने को तो मैं कहीं भी सो सकता हूँ। पर कहीं भी सोने पर बाबा घर ले आते हैं। कभी मुझे समझ नहीं आता कि ये लोग मुझसे चाहते क्या हैं? रुपया! बस यही एक चीज! क्या रुपये के बाहर आदमी का कोई काम नहीं! भैया बोलता है कि मैं अव्यवहारिक हूँ। मैं ध्यान नहीं रखता किसके सामने क्या बोलना चाहिए। मैं मूढ़मगज हूँ। ऐसा भैया का कहना है। मेरा मानना है वह एक हाफ-फ्राई ऑमलेट है, जिसे वास्कोडिगामा ने बनाया था और अब फफूँदा चुका है। वह इन्सान नहीं है। रुपये का भक्त है। एक-एक रुपये का नफ़ा-नुकसान जोड़ता रहता है। उसने अपनी एक दुकान डाल ली है। उसी पर ऐंठता है। और कुछ नहीं। बाबा जानता है कि भैया मकान के चक्कर में उसकी देख-रेख कर रहा है। अगर आज वो मकान भैया के नाम करा दे, तो भैया कल ही उसे घर से निकाल दे। या कम से कम ऊपरवाली कोठरी में डाल दे, जिसमें अभी मैं डला हुआ हूँ!

बाबा मुझे ठीकाने से लगाना चाहता है, लेकिन हार चुका है, एक वह समझ चुका है कि मुझे नहीं समझाया जा सकता। भाभी अब भी समझती है कि मुझे दुनियादारी के काम में लगा सकती है, पर मेरा ख़याल है वह ग़लत समझती है, बल्कि मेरा मानना है कि वह मुझे समझती ही नहीं। उसे मेरी शादी के अलावा कुछ नहीं सूझता। उसे लगता है शादी ही मेरे मर्ज़ का ईलाज है। वैसे मेरा मर्ज़ है क्या?

मैंने कहा कि मैं रुपया नहीं कमाता, इधर-उधर घुमता रहता हूँ, कभी कोई काम मिल जाए तो कर लेता हूँ, वह भी मनमाफिक, मन नहीं हो तो कोई मुझसे काम नहीं करवा सकता, कोई कितना ही बड़ा तीसमारख़ाँ क्यों न हो, कितनी ही नौकरियाँ मैंने ऐसे ही गँवाई है। बाबा ने अब किसी से मेरी नौकरी के बारे में बात करना भी बंद कर दिया है। कभी-कभी अच्छा लगता है कि सभी लोगों ने मेरे इस रूप को स्वीकार कर लिया है।

खै़र! जब मैं सुबह दीवार से चिपककर तेज़कदम गली पार करता हूँ, तो मेरा मकसद सीधे बस-अड्डे की तरफ जाना होता है। बस-अड्डे पर भाई लोग खड़े रहते हैं। इनमें से अधिकतर लड़के अख़बार का इंतज़ार कर रहे होते हैं। अलग-अलग बसों में अख़बारों के बंडल रख दिए जाते हैं और फिर भाई लोग फ्री हो जाते हैं। वे सब मुझे जानते हैं। मैं कभी-कभी उनके साथ भी बैठता हूँ, ख़ासकर ठंड के वक़्त, जब वे लोग टायर जलाकर हाथ तापते हैं। ज़्यादातर लड़के कॉलेज में हैं, एक-दो अनपढ़ हैं और दो, जिन्हें मैं पहले जुड़वा भाई समझता था, पिछले पाँच साल से दसवीं पास करने की कोशिश कर रहे हैं। यही आठ-दस लड़कों का झूंड हर सुबह यहाँ पहुँचता है। ये लोग शोर-गुल मचाते हैं। बसों में सवारियाँ बैठाते हैं, सामान लादते हैं, ग़रज़ कि दिन-भर बस-अड्डे पर अपना टाईम काटते हैं और रुपया कमाते हैं। मुझे पढ़ा-लिखा और सीधा-सादा आदमी समझते हैं, सोचते हैं मुझे दुनिया की ज़्यादा ही फिक्र है। लेकिन जैसा कि उस दिन महेश कह रहा था, मैं कुछ नहीं कर सकता। सोचने से कुछ नहीं होता। शायद उस दिन वह किसी से नाराज़ होगा, और अपना गुस्सा मुझ पर निकाल रहा होगा। वर्ना वह ऐसा क्यों कहता!

मैं हर सुबह दो घंटे इसी बस-अड्डे पर बिताता हूँ। अब ये लोग मुझे हर रोज़ देखने के आदी हो गए हैं। जब शुरू में मैं यहाँ आता था, तो ये लोग मुझे हैरत और शक की नज़र से देखते थे। धीरे-धीरे मुझे जानने लगे, और मुझे अहानीकारक जानकर मेरी उपेक्षा करने लगे। मुझे उनकी उपेक्षा से कोई फर्क नहीं पड़ता।

बसों की आवाज़, लोगों के शोर-गुल के बीच यहाँ सुबह होती है। अलग-अलग दिशाओं में जाने वाले लोग इकट्ठा होने लगते हैं। कुछ लोग रोज़ के मुसाफ़िर हैं, उन्हें भी मैं पहचानता हूँ। फिर भी एक अनजानापन सबके चेहरे पर दिखाई देता है। वे लड़के भी मुझे नहीं जानते, दुकानवाले भी नहीं, मुसाफ़िर भी नहीं। वे सब असल में मुझे सनकी समझते हैं।

वैसे मैं मृदुभाषी हूँ। लेकिन मैं उनकी हाँ में हाँ नहीं मिला सकता। ख़ासतौर पर बुढ़ों में मैं यह बीमारी पाता हूँ। वे चाहते हैं कि मैं उनकी बातें सिर हिलाकर स्वीकार करता जाऊँ, लेकिन ये मुझसे नहीं होता। मैं कैसे काले को सफेद मान सकता हूँ, फिर चाहे कोई महात्मा ही यह बात मुझे क्यों न कहे! पर लोग जब अपने से ही जुदा हैं, तो फिर मुझसे कैसे मिलेंगे! हो ही सकता है, ऐसा मैं सोचता हूँ, क्योंकि कभी-कभी मुझे यह भी लगता है कि यह मेरी हताशा है, जो मुझे ऐसा सोचने पर मजबूर करती है, वर्ना ये लोग तो खुश हैं। अपना काम करते हैं, रुपया कमाते हैं, घर-परिवार देखते हैं, मान-सम्मान पाते हैं। इन्हें बेवजह दुःखी क्यों माना जाए!

हर रोज़ सूरज उस कचरे के ढेर के पीछे से उगता है। कुत्ते उस ढेर पर लोटते रहते हैं। सुअर चरने के लिए आते हैं। ढेर से कचरा निकालकर ठंड में लड़के जलाते हैं।

इस दीवार की टेक लगाए मैं हर रोज़ की योजना तैयार करता हूँ, यानी आज मुझे कहाँ जाना है? किधर घुमना है? मैं झूठ नहीं बोलूँगा, कभी-कभी अपनी धुन में मैं शहर से बाहर भी निकल जाता हूँ। आस-पास के देहातों में चक्कर मारता हूँ। मैंने चाय पी, पोहा खाया और त्रिवेणी की तरफ़ चल दिया। आज का दिन उधर ही गुज़ारने का विचार था। त्रिवेणी उस जगह का नाम क्यों है? मेरी जानकारी में इसीलिए कि कभी वहाँ तीन नालों का संगम होता था, पर समय के कचरे-गंदगी ने उन नालों में बहते प्रसाद जल को काला-बदबूदार बना दिया था और दो नालों पर बस्तियाँ बन चुकी थी। एक नाला बचता था, जो अब भी वहीं स्थिर है, काला-बदबूदार जल बहाता हुआ। पर तब जब ये नाले साफ़ पानी से भरे रहते थे कुछ जोगियों ने अपना मठ इनके किनारे बनाया। आज वह मठ बस्ती के बीच आ गया है। लेकिन मठ की बावड़ी बस्ती से थोड़ी दूर है। मठ के पास काफ़ी जगह है। जिसमें कुछ खेत हैं, दुकाने हैं और एक बाग़ीचा और एक बड़ी बावड़ी है। असल में, त्रिवेणी की तरफ जाने का मतलब इस बावड़ी की तरफ जाना ही है। गर्मियों में बावड़ी के आस-पास इतनी शीतलता रहती है कि सो जाने को मन करता है, पर पूजारी या कभी दुकानवाले आकर उठा देते हैं। और फिर उनसे कौन चिक-चिक करे! पर वे भी मुझे जानते हैं, और अक्सर टोकते नहीं, पर जानते हैं कि मेरी जेब में माताजी के दान-पात्र में डालने के लिए कुछ भी नहीं रहता है; बल्कि भोग वगैरह के वक़्त मैं अक्सर उपस्थित रहता हूँ। शायद इसीलिए उनके मन में मेरे लिए कुछ कलुष है! पर मैं वहाँ पहुँच ही गया।

अभी आठ ही बजे थे। एक माशूक-आशिक पहले ही बरगद के नीचे बैठे थे। मुझे देखकर थोड़ा संभल गए। किताब लेकर ऐसे देखने लगे, जैसे इतिहास या विज्ञान की सबसे गंभीर समस्या पर चिंतामग्न हों। मैंने उनकी उपेक्षा की, और आगे बढ़ गया। देखता क्या हूँ, दूसरे बरगद के नीचे एक और जोड़ा बैठा है। उफ़! इन तोता-मैनाओं ने हर दृश्य ख़राब कर रखा है। कभी-कभी सोचता हूँ नौजवानों की उस मुहिम से जुड़ जाऊँ, जिसमें ऐसे जोड़ों को देखते ही उनके घर फोन कर दिया जाता है, और हीर-राँझे की अच्छी-ख़ासी बेइज़्ज़ती की जाती है। पर, यह क्रूर आनंद मैं मन ही मन लेता रहा। मुझे इन लड़कियों में रुचि नहीं। इन लड़कियों में जान नहीं होती। ये अपने कहे पर टिकी भी नहीं रह सकतीं। मुझे तो लगता है, मौज-मस्ती के लिए ही ये लोग यहाँ आते हैं, या किसी भी ऐसी शांत जगह पर जाते हैं, जहाँ इनकी चहचहाहट कोई न सुने। फिल्मों ने इनके दिमाग़ का सत्यानाश कर दिया है। हर कोई अपने को फिल्मी नायिका या नायक समझता है। वैसे ही चलते-फिरते हैं। बैठते-उठते हैं। हँसते-रोते हैं। कपड़े पहनते हैं। गाने गाते हैं। इन्हें देश-समाज से कुछ लेना-देना नहीं है। एक-दूसरे को छूने-चूमने-भोगने के अलावा इनके पास कोई विषय नहीं है। टॉकिज के बच्चे!

मैं आगे बढ़ता गया। दूसरे के बाद तीसरा जोड़ा मिला। खै़र हुई चौथा जोड़ा नहीं मिला, फिर भी दो और बरगद छोड़कर मैं सातवें बरगद तक पहुँचा। यह बाग़ीचे का आख़री बरगद है। इसके बाद खेतों का सिलसिला शुरू हो जाता है। इस बरगद के बाद, कुछ जगह छोड़कर, जामून और अमरूद के पेड़ लगे हैं, और साथ में ही मिर्च, धनिया और बैंगन-टमाटर, पुदीना-जैसे पौधे-पत्ते लगे रहते हैं। बाग़ीचे का यह कोना ही मुझे सर्वाधिक पसंद है। इधर तक कोई नहीं आता। मैंने थोड़ी देर में तीनों जोड़ों की सुध लेने की सोची। समाज में बेहयाई मुझे पसंद नहीं। जो करना है विधि-विधान से करो। यह क्या कि आज इसका हाथ पकड़े घुम रहे हैं, कल उसका मुँह चूम रहे हैं! यह सब मुझे लफंगई लगती है। लड़का करे या लड़की। मैंने देखा तीनों यथावत् प्रेम-क्रीड़ा में संलग्न हैं। वे मुझे भूल चुके। एक लड़की की खीं-खीं मेरे तन-बदन में आग लगा गई। झुँझलाकर मैंने एक पत्थर उठाया, और पहले बरगद की ओर फेंका। मुझे अचानक इन लोगों पर गुस्सा आने लगा था। पत्थर सीधे लड़की के सिर पर लगा था। लड़की खून-झार हो गई। लड़का दौड़कर मेरी तरफ़ आने लगा। मैं शांत मूरत बनकर बैठा रहा। एक पल के लिए लड़का रुका, फिर पीछे दौड़कर गया। लड़की को देखने लगा। फिर दौड़कर मेरी तरफ़ आया। लड़की की चीख़ सुनकर बीचवाले दोनों जोड़े भाग गए थे। लड़का मेरे पास पहुँचा, ‘भैया, देखिए न दीदी को किसी ने पत्थर मार दिया है!’। मेरी जान में जान आई, मुझे समझ आया कि उसे मुझ पर नहीं किसी और पर शुब्हा है। मैं उसके साथ दौड़कर उस तरफ़ गया। देखा लड़की प्राण त्याग चुकी थी। उसकी सफ़ेद चुनरी लाल हो गई थी। एकबारगी मेरे शरीर में झुनझुनी दौड़ गई। मैंने बोला, ‘यह तो गई!’। लड़का वहाँ से भाग खड़ा हुआ। मैं चिल्लाता रहा, ‘अबे! कहाँ भाग रहा है? क्या कर दिया लड़की का?’ मैंने देखा अब वहाँ कोई नहीं था। मैंने लड़की का चेहरा ग़ौर से देखा। वह मेरी भाभी थी। अब मैं लड़के का चेहरा याद करने लगा, लेकिन मुझे याद नहीं आ रहा था।

मैं धीरे-धीरे उस जगह से दूर निकल गया। मन फिर शांत होने लगा। मुझे नहीं पता कि मैंने इतनी आसानी से यह फैसला कैसे ले लिया! मुझे अपनी आज की योजना में फेर-बदल करना पड़ा। मैं अब शहर के दूसरे कोने की ओर जाना चाहता था। लेकिन, शहर के अंदर से होकर नहीं। मैंने सोचा था कि एक बजे तक गंगानगर पहुँच जाऊँगा। वहीं कुछ खाऊँगा, और फिर शाम वहीं काटूँगा। गंगानगर शहर का बाहरी ईलाक़ा है। यह नगर अभी बस रहा है। जब सरकार ने ग़रीबों के लिए घर बनाने की सोची, तो शहर के बाहर इस कुड़ेदान को चुना। इसके आगे खेत शुरू हो जाते हैं और फिर उबड़-खाबड़ ज़मीन जो जंगल में बदलती जाती है। गंगानगर भी एक बस-अड्डा है। यह एक छोटा बस-अड्डा है। यहाँ से गाँवों की तरफ़ जाने वाली बसें मिलती हैं। बस-अड्डे से थोड़ी दूर सड़क के किनारे एक दुकान है, जहाँ दिन में आपको खाना मिल सकता है। मैं खाना खाकर झरने तक घूमने भी जाऊँगा, और अगर मन हुआ, तो नहा भी लूँगा।

दुकान तक पहुँचते हुए एक बार मेरे पैर लड़खड़ाए, जैसे मुझे चक्कर आ गया हो। मैंने खुद को संभाला और दुकान के बाहर लगी बेंच पर बैठ गया। दुकानवाला मेरा मुँह ताक रहा था। फिर मेरी ओर देखकर मुस्कुराने लगा। मैंने एक दर्दभरी मुस्कान दी। वह मेरे पास आकर बोला, ‘क्या हुआ?’

मैंने कहा, ‘चक्कर आ गया!’ वह फिर मुस्कुराने लगा। ‘अभी तो गर्मी शुरू भी नहीं हुई, अभी से चक्कर खाकर गिरने लग गए!’ अब मैं मुस्कुराया। मैंने खाना खाया और एक लस्सी पी। जान में जान आई। पर, एक फाँस-सी गले में लग रही थी। बार-बार प्यास लग रही थी। आखिर मैं उठकर झरने की तरफ चल दिया।

इस पगडंडी से मैं कई बार झरने की तरफ गया हूँ। मैं देख रहा था, आसमान एकदम साफ़ था। नील। कुछ एकदम सफ़ेद-झक बादलों के टुकड़े थे, जो इधर-उधर खिसक रहे थे, ऐसा लग रहा था जैसे नीले दवात पर रुई के फाहे इधर-उधर तैर रहे हों। अब इस पगडंडी पर मैं अकेला चला जा रहा हूँ। धीरे-धीरे शहर की सब निशानियाँ गुम होती जा रही हैं। तालखेड़ी आ गया। गाँव के किनारे होते हुए मैं आगे बढ़ता जा रहा हूँ। देखता हूँ, पगडंडी पर कुछ लोग अर्थी लिए जा रहे हैं। मैं धीरे चलने लगता हूँ, ताकि उन लोगों से एक निश्चित दूरी बनाए रख सकूँ। पर, कदम अपनी गति पकड़ लेते हैं। मैं उनके करीब पहुँच गया हूँ। उलझन में हूँ, उन लोगों से आगे निकलना ठीक नहीं जान पड़ रहा, पता नहीं क्या सोचने लगें! कहीं कोई झगड़ा न करने लगे! आखिर, मैं उनके पीछे-पीछे चलने लगा। एक-दो लोगों ने मुझे पलटकर देखा, और फिर अपनी गति से चलने लगे। कुछ देर में वे लोग पगडंडी छोड़कर खेत के रास्ते आगे बढ़ गए। मैं झरने की तरफ बढ़ने लगा। झरने के पास जाकर बैठ गया।

शाम हो चुकी थी। दूर-दूर तक पंछियों के झुंड दिखाई दे रहे थे। झरने के पास कुछ पक्षी-दल उतरते, और दाना-पानी करके आगे बढ़ जाते। कुछ ही मिनटों में वह जगह पंछियों के कलरव से भर गई। झरने की आवाज़ पंछियों के शोर-गुल में दब गई। इन पंछियों को मेरे आस-पास भटकने से डर नहीं लग रहा था। मैं मूर्ति की तरह अचल बैठा था। मेरे कंधे, सिर, गोद सब पर पंछी बैठे थे। मैं आँखें बंदकर उनके नाखुनों और चोंच के वार सह रहा था। मुझे इस काम में अद्भूत आनंद मिल रहा था। जैसे, शरीर और दिमाग़ दोनों एक साथ हलके होते जा रहे थे। जीवन का कौन-सा सुकून था, जो इस रास्ते मिलना था! मेरा मन शांति से सराबोर था। इस तरह ताज़ा महसूस हो रहा था, जैसे शरीर श्मशान का धूँआ खाने के बाद नहाने पर करता है। मेरा रोम-रोम धूल रहा था कि एक आदमी ने हाँका लगाया। वह दौड़कर मेरे पास आ गया। मैंने चौंककर उसे देखा। वह हाँफ रहा था। अचरज से मेरी ओर देखते हुए बोला, ‘क्या हो रहा है?’

मैंने पहले अपनी तरफ़ देखा, मेरे शरीर पर जगह-जगह घाव हो गए थे, पर मुझे दर्द नहीं हो रहा था। मेरा शरीर जैसे सुन्न था। दिमाग़ भी कुछ ग्रहण नहीं कर रहा था। मैं उस आदमी को देखता रहा। उसके पीछे नीला आकाश था। मुझे चक्कर-सा आने लगा।

जब जागा तो देखता हूँ, अपने घर में हूँ, मेरी झाड़-फूँक हो रही है। मेरे शरीर के घाव कसक रहे हैं। मैं आई को आवाज़ देता हूँ। आई मेरे पास आकर बैठ जाती है। मेरी नज़र भाभी की माला चढ़ी तस्वीर पर पड़ती है। मैं रोने लगता हूँ। आई मेरे सिर पर हाथ रखती है, और कहती है, ‘सब ठीक हो जाएगा!’ लेकिन मेरी आँखों से आँसू बहे जा रहे हैं, और मैं लगातार कहे जा रहा हूँ, ‘मैं अब रुपया कमाऊँगा!’। एक साधू मेरे पास आकर खड़ा हो जाता है। मैं अपनी बात दोहराए जा रहा हूँ। वह मेरे सिर पर भभूत मलता है। मुझे पसीना आने लगता है। मैं अपनी बात दोहराए जा रहा हूँ। बाबा मेरे पास आकर खड़ा होता है। थोड़ी देर मुझे देखता रहता है, फिर एक ज़ोरदार तमाचा जमाता है, और मैं चुप हो जाता हूँ, उसका मुँह देखने लगता हूँ।

वह एक ऐसा दिन था, जिसने मेरी ज़िन्दगी बदल दी। मैंने भैया के सामने भाभी के साथ हुई दुर्घटना पर दुःख जताया, और अपनी सफ़ाई में यही कहा कि मुझे पता ही नहीं! किसी आवाज़ के पीछे-पीछे मैं झरने तक चला गया था! और, फिर आगे क्या हुआ, मुझे पता नहीं! बात यही थी कि तालखेड़ी का ही कोई आदमी मुझे झरने के पास से उठाकर लाया था, बाद में, गंगानगरवाले दुकानदार से बात करके पता चला कि उसने ही मेरे मामा को सूचित किया था। वह मेरे मामा का पुराना दोस्त है। फिर, मैं एक दिन अस्पताल में भी बेहोश रहा। घर पर भी एक-दो दिन बदहवासी की हालत में रहा।

धीरे-धीरे मेरे घाव भर गए। कई बार सोचा कि भैया या आई को बता दूँ कि भाभी को पत्थर मैंने ही मारा था। पर इससे बात उलझ जाएगी। वे लोग समझ नहीं पाएँगे, और मैं भी समझा नहीं पाऊँगा। अब मैं बस-अड्डे या त्रिवेणी या गंगानगर या शहर-सराय की तरफ नहीं जाता। इधर-उधर भटकना भी मैंने बंद कर दिया है। मन में एक कचोट रहती है, पर कोई तरीका नहीं सूझता, क्या करूँ? जो मैंने किया है, उसका कोई दोष अपने ऊपर नहीं मानता। आखिर, मैंने जान-बूझकर कुछ नहीं किया। मुझे क्या पता था कि पत्थर सीधा जाकर उसको लगेगा! और, वह मेरी भाभी होगी, और, वह भी इतनी कमज़ोर कि एक पत्थर की चोंट भी नहीं झेल पाएगी! भैया दूसरी शादी के लिए गोटी सेट कर रहे हैं। उनकी एक मुहब्बत थी। पिछले ही साल उसके भी पति का देहावसान हो गया। वह भी गली में ही रहती है। आई ने उसकी मौसी से बात की है। हो सकता है, अगले साल मेरे पास फिर से भाभी हो! आई मेरी भी शादी कराना चाहती है। मैंने भी इनकार नहीं किया। जिन रिश्तेदारों को मैं गाली दिया करता था, उनके साथ भी अब तमीज़ से पेश आता हूँ। भगवान को उलटा-सीधा बकना भी मैंने बंद कर दिया है। सब्ज़ी-मंडी में हिसाब देखने का काम पकड़ा है। काम अच्छा है। सुबह-सबेरे सब्ज़ी-मंडी पहुँच जाता हूँ, दिन-भर वहीं फलों और सब्ज़ियों की गंध में कटता है। शाम को सीधे घर पहुँचता हूँ। टी.वी. देखता हूँ। कभी चौक तक घुम आता हूँ। फिर सो जाता हूँ।

भाभी मेरी शादी करवाना चाहती थी। अगर ज़िंदा रहती, तो कितनी खुश होती कि मैं काम-धंधे से लग गया हूँ, और लड़की देखने के लिए उत्सुक हूँ। पर कौन जाने, तब ऐसा होता भी!

आखिर वह दिन भी आया, मेरी शादी हो गई। मैंने जब करुणा का घूँघट उठाया, मेरा दिल धक् करके रह गया। एकबारगी लगा, भाभी है। मैंने खट् से घूँघट छोड़ दिया। दूसरी बार घूँघट उठाने की मेरी हिम्मत नहीं हुई। आखिर करुणा ने ही घूँघट उठा दिया। मैं उसका चेहरा देखकर फुला नहीं समाया। मेरा वहम था, और कुछ नहीं। मैंने करुणा के कंधों को चूमा।

मेरी शादी हो गई थी, पर मैं करुणा से एक दूरी बनाए रहता था। उसके साथ अकेले रहने में मुझे शंकाएँ घेरने लगती थी। वह मेरे अतीत के बारे में कुछ नहीं जानती! मैंने कहाँ-कहाँ खाक छानी है? कैसे-कैसे पापड़ बेले हैं? वह कुछ नहीं जानती! वह मुझसे कुछ जानना भी नहीं चाहती। वह अपने में खुश है। बस उसे एक बच्चा चाहिए, फिर वह और खुश हो जाएगी। मुझे लगता है, उसकी ज़िंदगी में बस खुश होना ही लिखा है। वह हमेशा प्रसन्नचित्त रहती है। मैं भी उसे देखकर खुश होता हूँ। वह चपल है। चंचल है। जीवन से भरी हुई है। फिर भी, कभी-कभी मुझे डरा देती है। रात को जब वह पानी पीने उठती है, मैं उस पर नज़र रखता हूँ। अगर वह गु़सलख़ाने में जाए और ज़्यादा देर लगाए, मुझे आतुरता होने लगती है कि वह क्या कर रही है?

मेरी शंका ठोस होने लगी जब एक दिन मैंने करुणा को कमरे में अकेले कुछ बुदबुदाते सुना। मैं ऐसी बुदबुद अक्सर सुनता रहता था, पर पहली बार मैंने साफ़-साफ़ सुना। यह करुणा की ही बुदबुदाहट थी। मैंने गुसलख़ाने के दरवाज़े पर कान टिका दिए। वह कुछ मंत्र-सा बुदबुदा रही थी। बीच-बीच में मेरा नाम ले रही थी। गुसलख़ाने से अगरबत्ती की गंध आ रही थी। उसकी बुदबुदाहट तेज़ हो रही थी। मेरे मुँह से आवाज़ नहीं निकल रही थी कि एक हल्की-सी आवाज़ निकली, ‘करुणा!’। अंदर से बुदबुद की आवाज़ बंद हो गई। मेरी साँस में साँस आई कि देखता हूँ करुणा बालकनी से झाडू़ निकालती हुई कमरे में खिसकती आ रही है। वह मेरी ओर देखकर हल्के-से मुस्कुराती है, और अपने काम में मगन हो जाती है। मैं गुसलख़ाने का दरवाज़ा खोलता हूँ, अंदर बाल्टी में बूँद-बूँद पानी चू रहा है। मेरा हलक़ सूख रहा था, मैं गु़सलख़ाने का नल कसके बंद कर रसोई की ओर चला गया। आई और भैया रसोई में बैठे भैया की शादी में लगने वाले सामान की लिस्ट तैयार कर रहे थे। मैंने पानी पीया और आई के घुटने पर सिर रख रोने लगा। आई बोली, ‘क्या हुआ?’। मैं कुछ कह न सका। रोना बंदकर चुपचाप आई की गोद में लेट गया।

मैं सोचता हूँ कि अब समय इस बोझ को बढ़ाता ही जाएगा। मैं कभी यह स्वीकार नहीं कर सकूँगा कि मैंने ही भाभी को मारा है, अनजाने में ही सही। उन दिनों की उदासी और खीझ याद करके अब भी मेरा मन भर आता है। पता नहीं, उन दिनों क्या धुन रहती थी। कहीं मन नहीं लगता था। और अब, मन बीच-बीच में बेवजह हड़बड़ाने लगता है। साँस फूलने लगती है।

भैया की शादी हो गई। मेरे और करुणा के पास एक लड़की है। पता नहीं क्यों, आई ने उसका नाम महिमा रख दिया है! महिमा भैया की पहली पत्नी का नाम था। मेरे जीवन में और एक शाश्वत दुःख इस नाम के साथ आ गया। मैं आई को समझा भी नहीं पाया कि क्यों यह नाम नहीं रखना चाहिए! उल्टा मैंने देखा, आई ने जब मुझसे पूछा कि इसका नाम महिमा रख दें, तो मैंने ऐसे सहर्ष स्वीकृति दी, जैसे मैं ख़ुद यही नाम रखने वाला था।

पर इन दो वर्षों ने मुझे पूरी तरह बदल दिया। मेरे बाल सफेद हो गए हैं। चेहरा झुलसा हुआ लगता है। शरीर के पुराने घाव फिर उभर आए हैं। क्या बीमारी है, कुछ पता नहीं चलता! शरीर से मवाद निकलता रहता है। दर्द होता है। हगन-मूतने से भी मोहताज हो गया हूँ। करुणा दिन-रात मेरी देख-भाल में लगी रहती है। महिमा से ज़्यादा बच्चा मैं हो गया हूँ। देखता हूँ, सबको मेरी फिक्र लगी रहती है। भैया जैसा रुपयों का दास, मेरे ईलाज पर अपना सबकुछ लुटा चुका है। पर, मेरा शरीर छीजता जा रहा है। घावों के आस-पास लगता है माँस खींचा रहा है, जैसे घाव का छेद और बढ़ने वाला है। तेज़ दर्द होता है। मैं चीखता रहता हूँ। महिमा का कमरा अलग कर दिया गया है। उसे आई के कमरे में सुला दिया जाता है। नई भाभी मुझसे घृणा-सी करती है। उसका चेहरा देखकर मुझे अपने जीवन से और निराशा हो जाती है। लगता है, मैं मर ही जाऊँगा!

अब सोचने की क्षमता भी जवाब दे रही है। मैं कुछ बुदबुदाता रहता हूँ। कोई समझ नहीं पाता। करुणा भी रुखी और उदास होती जा रही है। बात-बात पर भाभी से झगड़ पड़ती है। कभी मुझे एक-दो दिन आराम भी रहता है। पर, यह आराम शारीरिक होता है। घाव जैसे टीसना कम कर देते हैं। वह भी आखिर थक जाते हैं। लेकिन, दिमाग़ में ख़यालों का अंबार लग जाता है। करुणा का क्या होगा? महिमा का क्या होगा?

कभी एक लाल चुनरी हवा में लहराती दिखती है।

धीरे-धीरे मैं ख़तम हो रहा हूँ।

एक दिन करुणा महिमा का झूला मेरे पलंग के पास डालकर खाना बनाने रसोई चली गई। महिमा थोड़ी देर हँसती रही, फिर चुप हो गई। मैंने पलंग पर लेटे-लेटे ही महिमा को संबोधित कर अपनी बात शुरू की…मैं नहीं जानता, उस दिन मुझे क्या हुआ था। पर न जाने क्यों, मैं अब भी, खुद को गुनाहगार नहीं मान पाता हूँ! आख़िर, वह एक पल का बहाव था। होनी कौन जानता था?…आदमी किन-किन चीज़ों के वश में नहीं होता! वह सोचता कुछ है, कहता कुछ है, करता कुछ है, और, होता कुछ और है! किसका मनचाहा हुआ है दुनिया में!…हाँ, ठीक है, मैं सच्चे मन से मानता हूँ कि मैंने ही भाभी को मारा है। बस!…मुझे लगा मेरे मन से एक बोझ हट गया।

धीरे-धीरे रात घिर आई। दो साल में मेरा हाल यह हो गया था कि अगर कोई मुझे पहली बार देखता, तो बाबा का भाई ही मानता। मेरे सारे बाल पक गए थे। दवाईयाँ खा-खाकर मुँह का स्वाद बिगड़ गया था। हमेशा थूकते रहने की इच्छा होती थी। धीरे-धीरे चारों ओर सन्नाटा पसर गया था। पूरा शहर इस वक़्त सो रहा है। नहीं, पूरा शहर कभी नहीं सोता! लेकिन, जितना सो रहा है, उतनों के सपने हैं, हाँ, ठीक है, सब लोग सपने भी नहीं देख रहे हैं, लेकिन आज रात जो लोग सपने देख रहे हैं, वे सब सुन लें, ‘मैंने ही अपनी भाभी की जान ली है!’।

हमेशा मैं ऐसा नहीं करता, पर आज मैंने दवाई नहीं ली। मैं चुपचाप लेटा था। कभी नींद का बगुला पलकों पर बैठ जाता था और कभी पंख फड़फड़ाकर उड़ जाता था। मेरी नींदे हराम थीं। इसीलिए मुझे दवाई खाकर सोना पड़ता था, पर कभी-कभी, मैं उसे टाल भी देता था। यानी, खिड़की से बाहर फेंक देता था। यह काम सफाई से करना होता था, वर्ना आई, करुणा सब लोग मुझे पचास बातें समझाने लगते, जिनसे मन और कमज़ोर हो जाता है। चाँदनी का एक टुकड़ा खिड़की से कमरे के अंदर गिरा हुआ था। मैं उसी को देख रहा था। करुणा वहीं लेटी थी। करुणा की देह अब भी आकर्षक है। आखिर वह 23 साल की है। कसी हुई। एक बच्चे की माँ होकर भी वह अभी ढिलमढल्ला नहीं हुई है। उसका हँसना कम हो गया है, लेकिन वह आनंद की मूर्ति है। उसे देखकर मन प्रफुल्ल हो जाता है। अचानक चाँदनी के टुकड़े पर एक साया दिखाई दिया। उसने करुणा को हल्के से हिलाया। करुणा जागी, हड़बड़ाई, और पलंग की ओर देखने लगी। मैंने एक पल के लिए आँखें बंद कर लीं, और फिर पलकों की कोर से देखने लगा। करुणा उठकर मेरे पास आई। दो पल मुझे देखा, और फिर मुझे हल्के से हिलाया। मैं ऐसे पड़ा रहा, जैसे बेहोश हूँ। वह आदमी वहीं चाँदनी के टुकड़े पर लेटा हुआ था। करुणा भी उसके पास जाकर लेट गई। मैं उनकी काम-लीला देखता रहा। पता नहीं, मेरे मन को क्या सुख मिल रहा था! मेरी आत्मा तृप्त हो रही थी। मुझे लग रहा था, जैसे मेरे मन पर बरसों से रखा कोई बोझ हट रहा है। थोड़ी देर में देखा चाँदनी के टुकड़े पर अकेली करुणा रह गई थी। लेकिन अब, उसकी देह देखकर मुझे घिन आ रही थी। सारा आकर्षण मुलम्मे की तरह उतर रहा था। मेरे मन में ईर्ष्या पैदा हुई। बदले की भावना। अब मैं करुणा से बदला लेना चाहता था। आखिर उसने मुझे धोखा दिया है। भाभी भी तो धोखा दे रही थी, अनजाने ही उसे सज़ा मिल गई।

मैं अपने घावों के ठीक होने की दुआ करने लगा। मैं चुप था। करुणा मेरी रोज़ की तरह सेवा कर रही थी। जैसे कुछ हुआ ही नहीं। पर अब, उसके हर स्पर्श में मुझे अजीब झनझनाहट महसूस होती थी, जैसे उसका बदन कोई ग़लीज़ चीज़ हो। कभी-कभी मैं उसके हाथ से अपने को बचाने की कोशिश करता था। मुझे लगता है, करुणा को कुछ भान हुआ था। मैं भी सचेत रहने लगा।

धीरे-धीरे मैं ठीक होने लगा। बाल तो सफेद ही रहे, लेकिन घाव भर गए। करुणा का हँसता चेहरा धीरे-धीरे उदास होने लगा। अब उसके खाट पकड़ने की बारी थी। आई ने कहा, ‘तेरी सेवा ने ही उसे थका दिया है। अब तू उसकी तीमारदारी कर!’ मैंने भी उसकी सेवा का बीड़ा उठा लिया। उसे बुखार आ गया था। काम का बोझ तो उस पर बढ़ा ही था। महिमा को जन्म दिया, और फिर मेरी उपचार-व्यवस्था करती रही। फिर घर के काम-काज अलग! और फिर वह आदमी। मेरे मन ने ईर्ष्यामयी क्रूर अट्ठहास किया। वह भी तो मेहनत का काम है!

मुझे महिमा के अपनी बच्ची होने पर शक होना लाज़मी था। मैं दिन-भर उसके चेहरे से अपना और करुणा का चेहरा मिलाता रहता था। मुझे विश्वास हो गया कि वह मेरी लड़की नहीं है। महीनों बाद मैं बाज़ार गया। जब लौटकर आया तो रात गहरा चुकी थी। घर पर सब लोग सो गए थे। दरवाज़ा अटका हुआ था। मैं दरवाज़ा बंद करके अपने कमरे की ओर चल दिया। कमरे में चाँदनी का टुकड़ा वैसे ही पड़ा था। करुणा सो रही थी और महिमा भी। मैंने पास जाकर दोनों को ग़ौर से देखा। मेरे दिमाग़ में उस रात का दृश्य चलने लगा। धीरे-धीरे दिमाग़ पर एक धुन सवार हुई। मैं गुसलख़ाने में गया और वहाँ से कपड़े पीटने की मोगरी ले आया, और माँ-बेटी दोनों को दुनिया से पार कर दिया। मेरे मन में न हैरानी थी, न डर। मैं चाँदनी का टुकड़ा देख रहा था और दो साए।

इस बार भी मुझे सज़ा नहीं हुई। एक आदमी पकड़ा गया, जिसका नाम मनीष था। मैंने सोचा, मुझे अपना जुर्म क़बूल कर लेना चाहिए। पर मेरा मन फिर एक क्रूर अट्ठहास कर उठा। यह आदमी करुणा का प्रेमी था। मैं अपना काम करके कमरे से निकला, और कुछ देर में वो कमरे में घूसा। कमरे की हालत देखकर उसकी चीख़ निकल गई। सारे लोग दौड़े आए। देखा, तो वह आदमी था, और करुणा और महिमा की लाश थी। उसे पकड़कर पुलिस के हवाले कर दिया गया। उसने भी अपना जुर्म क़बूल कर लिया। तब मैंने सोचा, मैं क्यों दूसरे के फटे में पाँव डालूँ! आख़िर, यह सब उसीका किया-धरा था। अगर वह उस रात न आता, तो मैं एक-दो दिन में मर ही जाता। पर, उसी की मेहरबानी कि मैं ज़िंदा हूँ, और दो बच्चों का बाप हूँ। अब मुझे ईश्वर पर दृढ़ विश्वास है। ईश्वर-विरोधी मुझे फूटी आँख नहीं सुहाते। सोचता हूँ, अगर ईश्वर नहीं है, तो इतनी बड़ी दुनिया का नियंता कौन है? कोई शक्ति, कोई बल तो है, जो मुझसे परे है, जो मेरे माध्यम से अपना काम करता है। मेरी आत्मा भी तो उस परम-आत्मा का ही अंश है। मेरे मुँह से जो शब्द निकलते हैं, वह भी तो उस परमपिता के हैं। मेरे हाथों जो कुछ होता है, वही करवाता है। मैं तो निमित्त मात्र हूँ। कर्ता कोई और है! उसकी लीला अपरम्पार है। वह जैसा सोचता है, वैसा ही होता है। उसकी मर्ज़ी के बिना एक पत्ता भी हिलता हो, तो कोई मुझे बता दे! वह सर्वशक्तिमान, सर्वज्ञ है। मैं उसका दास हूँ। जो वह चाहता है, मुझसे करवाता है। मैं निर्बल हूँ। प्रार्थना के अलावा मैं कर ही क्या सकता हूँ!

हे परमपिता, परमेश्वर, परमात्मा! विकल-पीड़ित आत्माओं को शांति दे, शांति दे, शांति दे!!

usman khanउस्मान ख़ान समकालीन हिंदी साहित्य के अलहदा युवा कवि-कथाकार हैं. चर्चाओं और पुरस्कारों की भीड़ से अलहदा… छपाऊ मानसिकता से भी अलहदा... जे.एन.यू. के हिंदी विभाग से मालवा के लोकसाहित्य पर पीएचडी. इनसे usmanjnu@gmail.com पर संपर्क कर सकते हैं.

साभार- हंस, मई , 2016

शराबघर: कृष्‍ण कल्पित

तिरछिस्पेल्लिंग कविता-कहानियां या रचनात्मक गद्य प्रकाशित नहीं करता है और न ही कभी कुछ आमंत्रित करता है. लेकिन यहाँ कुछ कवितायें और एकाध कहानियाँ प्रकशित जरुर हुयी हैं. उनका प्रकाशन इस विशवास के साथ ही हुआ है कि वे एक एक्सक्लूसिव मिज़ाज का प्रतिनिधित्व करती हैं. कृष्ण कल्पित की यह कहानी ‘शराबघर’ इसी एक्सक्लूसिवनेस के कारण यहाँ दी जा रही है. कृष्ण कल्पित हिंदी पब्लिक स्फीयर के एक अनोखे रचनाकार हैं, जिनसे हम प्यार करते हैं, जिन्हें संजोना चाहते हैं. उनके अक्खड़पन का राज कहीं और है. वे हिंदी के एक रेयर आधुनिकतावादी (Modernist)लेखक हैं जिन्हें परंपरा के पगों का स्पर्श प्राप्त है. बाग़-ए-बेदिल, कविता रहस्य और उनकी कवितायें बाकी जो भी होंगी बाद में होंगी, सबसे पहले वे यह बताती हैं कि उनका कवि काव्य-परंपरा के भिन्न-भिन्न पड़ावों को चखने का आदि रहा है. कृष्ण कल्पित आचार्य कवि हैं. लेकिन यह कहना उनके कवि-व्यक्तित्व को कहीं से कम करना नहीं है. ‘शराबी की सूक्तियां’ इसीलिए उपर्युक्त सूचि से बचा ली गई थी. ‘शराबी की सूक्तियां’ का मूल्यांकन या आकलन अभी तक हिंदी समाज नहीं कर पाया है, जबकि यही समाज ‘मधुशाला’ की तुकबंदियों को हर बेतुके अवसरों पर दुहरा दिया करता है. ‘शराबी की सूक्तियां’ का महत्व अगर समझना हो तो थोड़ा-सा भारतीयेत्तर साहित्य की कुछ बानगियों को देखना पड़ेगा. यहाँ सिर्फ दो नाम लेकर आगे बढ़ जाउंगा, एक हैं पोलिश रचनाकार येजी पिल्ह, जिनकी पुस्तक ‘द माइटी एंजेल’ लोकप्रिय पोलिश पुस्तकों में शुमार है और जिस पर प्रसिद्द पोलिश फिल्मकार  वोइचेह स्मजोव्स्कि ने इसी नाम से फिल्म बनायी है; दूसरे हैं अतिलोकप्रिय अमेरिकन कवि/गद्यकार चार्ल्स बुकोव्स्की, जो आवारगी, शराब, अकथ की कथनी करने वाले के रूप में प्रसिद्ध हैं और इनके और इनकी रचनायों के ऊपर कम से कम चार-पांच फिल्में जरुर बन चुकी हैं. यह सब सिर्फ इसलिए कहा गया है कि शराबी की रचनात्मकता को शराब के बोतल का जिन्न मात्र न समझ लिया जाय और दुनिया में हिंदी के अलावा ऐसा बहुत कम जगह समझा गया है.

परम्परागत काव्य, काव्यशात्र और काव्य-परंपरा का धनी होना ही क्या कृष्ण कल्पित की प्रासंगिकता है? अगर इतना भर होता तो वे एक भाष्यकार मात्र बन कर रह जाते. कल्पित की प्रासंगिकता वहाँ है जब वे परंपरा प्रदत्त सूत्रों का प्रासंगिक भाष्य कर डालते हैं लेकिन उनकी इस प्रासंगिकता का सूत्र/सन्दर्भ क्या है? कभी एक बंगाली मित्र, जो कि दर्शन का शोधार्थी था, को शराबी की सूक्तियां सुनाई थी, उसने सुनकर जो पहली पंक्ति उचारी थी वह यह कि कवि मॉडर्निस्ट है. मैं भी यही सोचा करता था लेकिन कभी बोलने की हिम्मत नहीं हुयी थी. इस धारणा के प्रति अभी तक पूरी तरह से सहमत भी नहीं हुआ था. लेकिन जैसे ही उनकी कहानी ‘शराबघर’ पढ़ी, लोहा मान लिया. ‘शराबघर’ कहानी की चर्चा पहले क्यों नहीं हुयी या  क्यों नहीं सुनी इसका अंदाजा लगाना मुश्किल है. कल्पित बहुत ही सहज और प्रवाहपूर्ण गद्य के भी धनी हैं, यह अब तक अनछुआ था. कल्पित सार्त्र के इतने नजदीक सिर्फ ध्वनित नहीं होते हैं बल्कि रचनात्मक रूप से वहीं कहीं स्थित हैं, ‘शराबघर’ कहानी से इसकी तस्दीक की जा सकती है. ‘शराबघर’ की आत्मा हिंदी में किसी और के यहाँ अगर मिलती है तो वे हैं ज्ञानरंजन और उनकी कहानी ‘घंटा’.

कृष्ण कल्पित के ‘शराबघर’ को ‘विमर्श’ के दायरे की कहानी मानता हूँ, जिस पर चर्चा होनी चाहिए. इसी लिए हमने हिंदी के अप्रतिम गद्यकार अनिल यादव से आग्रह किया कि वे इसकी एक भूमिका लिखें. तिरछीस्पेल्लिंग कृष्ण कल्पित और अनिल यादव दोनों का आभारी है. @तिरछिस्पेल्लिंग

कंपनीराज की देन बार, क्लब और पब सदा की नकली जगहें हैं जहां ऐसे लोग बहुतायत में आते हैं जो जीने नहीं जीते दिखने को जिंदगी मानते हैं. इस नकल का नतीजा है कि वहां शराब पीकर की जाने वाली बातों से लेकर टॉयलेट में पेशाब की झार तक एक जैसी होती है. उनके मुकाबिल देसी के ठेके, हौलियां और कलारियां लगभग मायालोक हैं. अव्वल तो वहां देस दिखता है. मैने बहुत थोड़े वक्त के लिए ही सही ऐसे ठेके जिये हैं जहां कारोबार शुरू करने के पहले कालीमाई को माला और दारू चढ़ाई जाती है, बोतलों के बीच तार पर गंवई दुकानदार का लंगोट सूख रहा होता है, कोई बच्चा पढ़ रहा होता है और वह जस्ते की थाली में बेंट की जगह सुतली बंधे चाकू से हमाहमीं के साथ शराबियों से दुआ सलाम करता हुआ तरकारी काट रहा होता है. देस भी कुछ चीज नहीं, वहां न जाने कितनी सभ्यताओं के नुमाइंदों के रूप में साले-बहनोई, घीसू-माधव, मौलवी-शागिर्द, मौसिया, फूफू, भांजे, दूल्हा भाई, आशिक और माशूका के बाप एक साथ बैठे मिलते हैं. हरेक का अपना मौलिक लबोलहजा यहां तक कि सिसकारी और भींगी मूंछे निथारने की अदा होती है, उनके भीतर कोई पुरातन जगह होती है जहां से वे बोलते हैं, उस जगह को पहचानने की तमीज हो तभी पता चलता है कि वे किस इतिहास से हंकाले जाने के बाद यहां आन पहुंचे हैं. वहां शोर के रोएंदार सीने में एक इत्मीनान का बड़ा सा दायरा होता है जिसमें नई जिंदगी के खाके बनते हैं, जहां बरसों से कोई हर शाम दो कुल्हड़ रख के पीता है, कोई अपने आंसुओं और रातरानी की महक में नहाकर पवित्र लौटता है, कोई दोस्त को दो निवाले खिलाने के लिए कसमें देते हुए मां हुआ जाता है, कोई एक ही मुड़े तुड़े कागज को बरसों पढ़ता है, कोई ध्यानस्थ होकर दुनिया की सतह से बहुत ऊपर चला जाता है और नहीं लौटता. मुझे अपने दौर सबसे जहीन, प्रतिभाशाली लोग वहीं मिले हैं, हमेशा की तरह उनमें से ज्यादातर की अदा बरबाद होना थी और उन्हें इसकी खास फिक्र भी नहीं थी.

इसे शराब का कसीदा न समझा जाए लेकिन उसमें कुछ ऐसा होता जरूर है जो जिंदगी की आग को कुरेद देता है बशर्ते आपमें कभी जरा सी आग रही हो. इसे घटिया पियक्कड़ों की सताई औरतें नहीं समझेंगी, वे शरीफ लोग तो कतई नहीं जिन्होंने चखी नहीं लेकिन नैतिकता और पाखंड के नशे में धुत्त रहते हैं. कृष्ण कल्पित की इस कहानी में एक ऐसे ही शराबघर के सहन में डोलती उसकी आत्मा के पैरों की आवाज सुनाई पड़ती है. कोई दो राय नहीं कि शराबी की सुक्तियां उनकी कमाई चीज है. @अनिल यादव

Snap shot from O-Bi, O-Ba: The End of Civilization

Snap shot from O-Bi, O-Ba: The End of Civilization

By कृष्‍ण कल्पित

शराबघर

वह एक सस्‍ता शराबघर था. शहर के बीचों बीच – थोड़ा अंदर धंसकर. वहां देशी से लेकर विदेशी तक हर किस्‍म की शराब मिलती थी और कहा जाता था कि यह शराबघर चौबीसों घंटे खुला रहता है. य‍ह ठीक भी था, क्‍योंकि एक दिन सवेरे चार बजे तक पीते रहने के बाद हम वहीं ‘लुढ़क’ गए थे और आंख खुलने पर देखा कि शहर की नालियां साफ करने वाले सफाई मजदूर देसी शराब की गुटकियां ले रहे थे. सुबह के पांच साढे पांच बजे होंगे, जब बांसों पर लटकाई हुई झाड़ूओं से छनकर आती रोशनी हमारे चेहरों पर पड़ी.

शर्माजी अभी ‘जागे’ नहीं थे. मैंने उन्‍हें झिंझोड़कर उठाने की कोशिश की. वे हड़बड़ाकर उठे और जेब में पड़े चश्‍मे को टटोलने लगे. शराबघर की दीवार के परली तरफ वाले रास्‍ते पर सामाजिक कार्यकर्ताओं का एक जत्‍था ‘उठ जाग मुसाफिर भोर भई, अब रैन कहां जो सोबत है’ गाते हुए गुजर रहा था. इस गाने को सुनकर या जाने किसी और बात पर एक सफाई मजदूर बेतरह हंसने लगा. मैंने, चौंक कर उसकी तरफ देखा, उसने हमारी तरफ भरपूर नजरों से देखा और कहने लगा, ‘जागो, मालिक, अब तो जागो .’

मैं खिसिया दिया. शर्माजी ने सिगरेट सुलगाते हुए ‘मालिक’ शब्‍द का व्‍यंग्य मिश्रित उच्‍चारण किया और हंसने लगे. हम धीरे-धीरे ‘जाग’ रहे थे हालांकि रात को पी गई शराब का खुमार अब भी हमारी आंखों की जड़ों तक पहुंच रहा था.

हम शराबघर से बाहर निकल रहे थे और चुप थे. चलते हुए हमारी चुप्‍पी इतनी शांति प्रदायिनी थी कि बोलते हुए तकलीफ हो रही थी. वैसे भी पिछली रात हम इतना बोल चुके थे कि बड़ी आसानी से दो-तीन दिन चुप रह सकते थे. हम बहुत धीमे-धीमे चल रहे थे. थोड़ा दूर आकर, गली के नुक्‍कड़ के पास शर्माजी ने पूछा, ‘वह तो रात को ही चला गया होगा.’

‘’हां उसे घर पहुंचना जरूरी था. वैसे मेरे इस उत्‍तर की कोई खास जरूरत नहीं थी, क्‍योंकि शर्माजी को पता था कि वह रात को ही चला गया है. फिर भी यह निरर्थक बातचीत हमारे बीच संवाद का रास्‍ता खोल रही थी, जिसे मैं अभी जानबूझकर टाले रखना चाह रहा था.

हम साल भर से इस शराबघर में आ रहे थे. लेकिन सवेरे की रोशनी में यह परिचित रास्‍ता कुछ बदला हुआ सा लग रहा था. मैं धुंधली पड़ चुकी लंबी गुलाबी दीवार पर बने बुर्ज को देर तक देखता रहा. लाल भक्‍क सूरज को बुर्ज में उलझा हुआ देखकर मैं अभिभूत हो गया. कुछ-कुछ ऐसा लग रहा था जैसे इस धरती पर पहली बार सवेरा हुआ हो. ऐसा शायद इसलिए कि एक तो पिछले कई बरसों से सबेरे जल्‍दी उठने की आदत नहीं रही थी और दूसरे नशा अभी पूरी तरह उतरा नहीं था.’ ‘अद्भुत’ मैं मन ही मन बुदबुदाया और बाहर से साइकिल पर गुजर रहे हॉकर से पूछा, ‘क्‍या खबर हैॽ’ हॉकर ने एक बार मेरी तरफ देखा और बिना जवाब दिए पैंडल मारता आगे बढ़ गया.

शर्माजी मुझसे आगे चल रहे थे. मैं पीछे चल रहा था और प्रसन्‍न था. असल में प्रसन्‍नता हमारे शरीरों के अंदरूनी और निचले हिस्‍से में थोड़ी बहुत बची रह गई थी जो कभी-कभार अल्‍कोहल के धक्‍के से ऊपर आ जाती थी. हम नवाब तो थे नहीं, गरीब और मध्‍यवर्ग के लड़के थे, जो गांवों-कस्‍बों में अपने ढहते हुए घरों और दुखी माताओं को छोड़कर इस बड़े शहर में आये थे. एक दिन हमने सिर्फ जीते रहने की धुन पर थिरकने से इनकार कर दिया तो हमें खदेड़ा जाने लगा. इस तरह हमें समाज की ‘मुख्‍यधारा’ से बाहर कर दिया गया. तब हमारी आंखों में कुछ स्‍वप्‍न बचे हुए थे. हम सोचते थे कि हम एक दिन इस दुनिया को बदल देंगे. यह तो अब आकर पता चला कि हम समाज का कुछ भी नहीं हिला पाए. बल्कि हमारे ही हुलिए बदल गए. हम चाहते तो लौट भी सकते थे और अपनी मां की गोद में बैठकर सुबक सकते थे. लेकिन उससे क्‍या होता? न हममें लौटने की इच्‍छा बची थी न शक्ति. हमारे कुछ मित्र बीच से लौट भी गए थे, पर हम इस जोखिम भरे रास्‍ते पर बहुत आगे बढ़ आये थे, जहां रोमांच तो था ही कुछ ‘खोजने’ का आनंद भी था. लगता था जैसे हम कहीं पहुंच रहे थे. यह शायद हमारा भ्रम था. हम कहीं नहीं पहुंचते थे, सिर्फ हर शाम बिना नागा इस सस्‍ते शराब घर में पहुंच जाते थे.

यह शराबघर किसी बंदरगाह की तरह था, जहां हमें हार-थककर अपने अपने ‘बेड़े’ डालने थे. शराबघर क्‍या था, एक बहुत पुराना मकान था. दरवाजे के बाहर एक नीम का पेड़ था. अंदर आने पर एक चौक, दो-तीन कोठरियां, जो शराब रखने का गोदाम बन चुकी थीं और आंगन के बीचों बीच एक गहरा कुआं था, जिसमें बहुत नीचे जाकर पानी चमकता था. इस शराबघर का मालिक एक रिटायर्ड फौजी था, जो बिना लाइसेंस अपने बूते पर शराबघर को चलाता था. शराबबंदी के मुश्किल समय में भी इस बूढ़े फौजी ने शहर की इस ‘आखिरी रोशनी’ को बूझने नहीं दिया था. ऐसा लगता था जैसे इस बूढ़े फौजी के लिए यह शराबघर चलाना व्‍यापार कम और ‘मिशन’ अधिक हो. पूरे शहर में यह शराबघर फौजी के अड्डे के नाम से मशहूर था.

हम काफी भटक-भटका कर इस अड्डे तक पहुंचे थे. पहले-पहल शायद शर्माजी ही मुझे इस अड्डे तक लेकर आए थे. कोई सालेक भर पहले की बात होगी. मैं कॉफी हाउस के आखिरी कोने में बैठा बची हुई आखिरी अठन्‍नी उछाल रहा था और बीच-बीच में केबिन में बैठी उस लड़की की तरफ देख रहा था, जो अपने बगल में बैठे लड़के से अपने थके हुए शरीर को सटाए दे रही थी. इस चक्‍कर में अठन्‍नी बार-बार हथेली की बजाए टेबल पर गिर रही थी. तभी कॉफी हाउस का दरवाजा खोलकर सोम अंदर घुसा– उसने घुसते ही कोने में बैठ मुझे देख लिया था. वह सीधा मेरे पास आया. बीच में, और बाहर कई लोगों ने उसे ‘सोम सोम’ कहकर पुकारा, लेकिन उसने किसी की आवाज पर कान नहीं दिया. वह जब से शहर के एक प्रमुख अखबार का सिटी रिपोर्टर बना है, उसकी पूछ बढ़ गई है. इस बात को सोम जानता था, इसी से वह अभी तक बचा हुआ था. वह जानता था कि उसे कोई नहीं पूछता, सब साले उस अखबार के आगे पूंछ हिला रहे हैं जो सवेरे-सवेरे इस शहर पर कनात की तरह तन जाता है. सोम तो छह महीने पहले भी था, इसी शहर में, इसी कॉफी हाउस में, इसी नरक में. तब किसी चिड़िया के पूत ने नहीं पुकारा– ‘सोम –सोम’. आगे सोफे पर बैठा वह तुंदियल खादी का कुरता, सोम के सामने ही-ही करते जिसके दांत नहीं थकते, आज वही दार्शनिक भाव से चलकर आया था. यहीं कोने में. पिछली सर्दियों में. सोम सिगरेट खाली करके गांजे को हथेली पर रगड़ रहा था. खादी के कुरते ने टेलीविजन के उद्घोषक की तरह आते ही सोम से कहा था, ‘सोम, तुम धीरे-धीरे अपनी मृत्‍यु की तरफ बढ़ रहे हो… .

‘तुम कौन से तक्षशिला की ओर बढ़ रहे हो, कुत्‍ते. चले जाओं यहां से.’ ‘कुत्‍ता’ संबोधन सुनकर वह हक्‍का-बक्‍का रह गया था. चुपचाप वापस लौट गया था. कुत्‍ते, मच्‍छर, कीड़े आदि सोम के प्रिय सम्‍बोधन थे, जिन्‍हें वह किसी भी लाट-साहब के लिए कहीं भी काम में ले सकता था. इधर अखबार में काम करने के बाद वह ‘बास्‍टर्ड’ शब्‍द का इस्‍तेमाल ज्‍यादा करने लगा है.

वह आते ही मुझ से लगभग लिपट गया. मैंने महसूस किया उसके लिपटने में वही पुराने वाला ताप अभी है. बाहर से भले ही आदमी बदल जाए, भीतर से बदलने में समय लगता है.

‘आओे, प्‍यारे.’ सोम ने कहा. मैं उसके पीछे पीछे कॉफी हाउस के बाहर चला आया था.

बाहर सूरज ढल रहा था. ढलते सूरज की किरणें शहर की पुरानी इमारतों से टकराकर सोने की तरह चमक रही थी. वह मेरा प्रिय दृश्‍य था. मैं आंखों के ऊपर हथेली टिकाकर उस सोनिया धूप को आंखों में भरता रहा. सूरज ! अपनी सोनिया किरणों पर इतराओ मत, हमारे यहां की तो रेत भी सोना है. सूरज ने मेरी बात नहीं सुनी. मैंने सामने देखा, सोम निराश होकर लौट रहा था. उसने कहा, ‘आज पगार का दिन है, शहर की तमाम दुकानें बंद हैं और आजकल पुलिस कुछ ज्‍यादा ही ध्‍यान दे रही है… फिर भी रूको, मैं सोचता हूं– क्‍या किया जा सकता है.’

तभी सामने रेलिंग के पास से शर्माजी आते दिखे. शर्माजी हमारे बीच उस पुरोधा की तरह थे, जिन्हें सब संकटों का हल पता हो. शर्माजी हमसे उम्र में काफी बड़े थे और हमारे लिए घने छायादार पेड़ की तरह थे, जिसकी छांव में हम सुस्‍ताया करते थे. वे इस शहर से थोड़ा दूर एक कस्‍बे के कॉलेज में अंग्रेजी पढ़ाते थे. पिछले डेढ़ साल से इसी शहर में थे और विश्‍वविद्यालय में अंग्रेजी के ब्‍लैक लिटरेचर पर कोई शोध कर रहे थे. मेरी जानकारी में पिछले डेढ़ वर्ष से शर्माजी ने अपने शोध का एक पन्‍ना भी नहीं लिखा था. वे लिखने से परे थे. साहित्‍य से उनका गहरा लगाव था. पीने के बाद वे जब कोई ब्‍लैक कहानी या कविता सुनाते तो उनकी आंखे भीग जाती थी. थोड़ा ज्‍यादा पीने के बाद वे ब्‍लैक लिटरेचर भूल जाते और कबीर, तुलसी और मीरा की कविताएं सुनाते. कबीर का ‘कौन ठगवा नजरिया लूटल हो’ पद सुनाते हुए उनकी आंखों से जार-जार आंसू बहते थे. फिर किन्‍हीं अज्ञात लोगों को संबोधित करके वे कहते थे, ‘वे स्साले हंसते हैं कि मैं रोता हूं. रोना पाप है क्‍या, हां मैं रोता हूं … क्‍योंकि मेरी आंखों में आंसू है….’ ऐसे ही एक लंबे एकालाप के बाद उनका एक तकिया कलाम था, ‘जिनकी आंखों का पानी मर गया, वे क्‍या खाक लिक्‍खेंगेॽ’ इसके बाद एक सांस खींचकर एक लंबा मौन और फिर शर्माजी का हंसना. सीधे हृदय से निकली हुई हंसी.

उस दिन पहली बार शर्माजी मुझे और सोम को फौजी के अड्डे पर लाए थे. वह दिन और आज का दिन, शायद ही कोई दिन बीता हो जब हम इस अड्डे पर न आये हों. सोम जरूर बीच-बीच में गच्‍चा दे जाता था, लेकिन अब तक कॉफी हाउस के कई और लोगों को हमारे अड्डे का पता चल चुका था और वे सूंघते-सूंघते यहां तक आने लगे थे, जिनका उद्देश्‍य सिर्फ शराब पीना था, उनसे हम बचना चाहते थे और उनसे बचना मुश्किल था. वे दिन भर गिद्ध की तरह शहर पर मंडराते हैं और शाम होते ही किसी ठौर उतर लेते हैं. वे बुरे नहीं थे, लेकिन इतने भले थे कि हर समय उनके भीतर मनुष्‍यता फुफकारती रहती थी.

वहां इतने सारे लोगों को एक साथ बैठकर पीते हुए देखने से एक घटना प्रधान संसार के चलते रहने की अनुभूति होती थी. मजदूर, रिक्‍शा चलाने वाले, ठेले वाले, छोटे-मोटे व्‍यापारी, रंगरेज, अध्‍यापक, सिनेमा के पोस्‍टर बनाने वाले चित्रकार, मोची, बढ़ई और बहुत संभव है कि उठाइगीर, चोर, मवाली और हत्‍यारे भी इनमें हों. उस पुराने मकान के आंगन में जिसे जहां जगह मिली वहीं पर बैठकर पी रहे हैं. कोठरी के बाहर एक मरियल लट्टू जल रहा था और चांदनी रात का भूरा मैला आलोक उस शराब घर पर बरस रहा था. आधे-अधूरे अस्‍पष्‍ट शब्‍द, फुसफुसाती आवाजें, और बीच-बीच में फुसफुसाहट को बेधती हुई तीखी और कर्कश आवाजें. इससे पहले जीवन के इतने बीचों बीच बैठकर मैंने शराब नहीं पी थी. इतना सारा जीवन. मेरी आंखें आश्‍चर्य से फटी जा रही थी. उस दिन ही मैंने असलियत में जाना कि इस शहर में करने के लिए इतने सारे धंधे हैं और जीने के लिए इतनी सारी जगहें.

उस दिन जब हम उस शराबघर से बाहर निकले तो मेरी चाल में किसी सम्राट की सी लचक थी, आंखों में किसी संत की सी तरलता और हृदय में अथाह प्‍यार. बाहर आकर लगा यह शहर हमारे लिए ही जगमगा रहा है. दूर पहाड़ी पर बने किले की रोशनियां खास हमारे लिए हैं. उस दिन बरसों बाद मैंने एक पुरानी फिल्‍म का गाना पूरा गाया.

असल में पिछले एक अरसे से हम थोड़े से लोगों की संगत में सड़ रहे थे. विश्‍वविद्यालय और कॉफी हाउस. हमारे पास सिर्फ ये दो जगहें बची थीं. थोड़े से अध्‍यापक, शोध-छात्र, पत्रकार और कॉफी हाउस के वही चिर-परिचित पुराने चेहरे. कोई ऐसा कोण नहीं बचा था, जिधर से हमने इन चेहरों को नहीं पहचाना हो. वे सब इतने जाने-पहचाने चेहरे थे कि पूरी तरह बेजान थे. निराशा हमारे शरीर में धंसने लगी थी और अब हमारा स्थाई भाव बन चुका था. एक चिड़चिड़ापन चेहरे पर हर समय चिपका रहता था. सफलता हमें डराने लगी थी और विफलता भीतर ही भीतर कुतर रही थी. हम न रोजों में रोने लायक बचे थे न गीतों में गाने लायक.

मुझे एमए किए तीन बरस बीत चुके थे. पिछले तीन बरसों से मैं अवैध रूप से विश्‍वविद्यालय के होस्‍टल में रह रहा था. अभी कुछ दिन हुए एक दिन जब मैं देर रात को हॉस्‍टल पहुंचा तो देखा मेरा सामान, किताबें और बिस्‍तर कमरे के बाहर फेंक दिये गए हैं और कमरे पर हॉस्‍टल का एक मोटा ताला लटक रहा है. रात मैं वहीं बरामदे में पड़ी एक टूटी खाट पर सोया था सवेरे एक रिक्‍शे पर अपना सामान लादकर सीधा शर्माजी के कमरे पर पहुंच गया. शर्माजी ने मेरा बिस्‍तर अपने कमरे के एक कोने में बिछा दिया. तब से मैं शर्माजी के कमरे में ही रह रहा था. इन दिनों मैं घोर निराशा में डूबा हुआ था. कोई भी रास्‍ता नहीं दिखलाई पड़ रहा था. मैं जीवन से पूरी तरह खाली हो चुका था.

शर्माजी ने मुझे आश्रय दिया, सहारा दिया, दिलासा भी दी. लेकिन मेरे मन पर पड़ा हुआ निराशा का भारी पत्‍थर हट नहीं रहा था.

उन दिनों मृत्‍यु को लेकर बहुत सारी कविताएं भी मैंने लिखीं. यह साल सवा साल पहले की बात है. शर्माजी सवेरे निकल जाते थे और मैं सारा दिन कमरे में अकेला पड़ा हुआ मृत्‍यु चिंतन में लीन रहता. शराब पीने के बाद मरने की इच्‍छा अधिक प्रबल हो उठती थी. एक दिन मैंने अपनी मृत्‍यु संबंधी सारी कविताओं को एक डायरी में उतारा और डायरी के पहले पृ्ष्‍ठ पर लिखा– ‘मैं मरना चाहता हूं.’ इसके बाद मैंने लिखा– ‘अब मुझसे जीने के लिए कहना किसी सम्राट से मूंगफली बेचने के लिए कहना है.’ यह एक जापानी उपन्‍यासकार के पत्र का अंश था, जो उसने आत्‍महत्‍या करने से पहले अपनी बहन को लिखा था. मैंने इसके नीचे अपने हस्‍ताक्षर किए और डायरी सिरहाने रखकर सो गया .

दूसरे दिन आंख खुलने पर जब मैंने इस डायरी को पढ़ा तो बड़ा अटपटा सा लगा. फिर मुझे हंसी आ गई. बाहर दरवाजे पर दूध वाला घंटी बजा रहा था. हॉकर ने नीचे से अखबार फेंका जो मेरे सर से आकर टकराया. मैंने अपनी उस डायरी को कमरे के ऊपरी कोने में बनी ताख पर फेंक दिया और खिड़की के पास आया. बाहर रास्‍ते में एक दस बारह साल का चरवाहा हाथ में एक बेंत लेकर बकरियों के रेवड़ को हांकता हुआ पहाडि़यों की तरफ ले जा रहा था. शर्माजी अभी सोए हुए थे. मैं जल्‍दी-जल्‍दी तैयार हुआ और बाहर निकल आया. यह उसी दिन की बात है, जब मैं कॉफी हाउस से उठन्‍नी उछाल रहा था और जिस दिन पहली बार उस सस्‍ते शराबघर में गया था. उसी दिन वहां से बाहर निकलकर मैंने कहा था, ‘मैं अभी जीना चाहता हूं.’

मैं तेज तेज कदमों से चलकर शर्माजी के पास तक आ गया. हम एक चाय की थड़ी पर बाहर पड़े मूढ़ों पर बैठ गए. शर्माजी ने पूछा, ‘रात को बाबू खां पेंटर तुमसे क्‍या कह रहा था?

‘बाबू खां ने मुझे काम के लिए बुलाया है. उसने कहा है कि मैं उसके होर्डिंग रंग दिया करूं.’ मैंने कहा .

शर्माजी यह तो जानते ही थे कि मैं पिछले छह महीने से जिस प्रेस में जाकर प्रुफ पढ़ता हूं, वह काम मुझे रामदयाल फोरमेन ने दिलवाया था. रामदयाल से भी मेरी मुलाकात यहीं हुई थी. शर्माजी यह भी जानते थे कि आजकल सफेद बालों वाला बूढ़ा शराबी घर से हर रोज टिफिन लाता है और मुझे कॉफी हाउस में प्रेस में ढूंढता रहता है और धमकाकर पूछता है, ‘खाना खाया या नहीं?’

और तुम उस बढ़ई से क्‍या पूछ रहे थे ॽ’ शर्माजी रात को सचमुच ज्‍यादा पी गए थे और उन्‍हें रात की कोई बात याद नहीं.

मैं उससे पूछ रहा था कि एक डबल बेड का क्‍या खर्चा बैठता है?’ मैंने उत्‍तर दिया.

शर्माजी एक रहस्‍यभरी दृष्टि से मेरी तरफ देखकर चाय की चुस्कियां लेने लगे. मैंने सामने देखा, सफाई मजदूर अपने कंधों पर बांसझाड़ू लटकाए शहर की तरफ बढ़ रहे थे. वे अब शहर की गंदगी साफ करेंगे. देशी दारू का एक तेज भभका हवा में तैर गया.

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कृष्ण कल्पित. यह तब के आस-पास की ही तस्वीर है जब उन्होंने यह कहानी लिखी होगी. उनसे मोबाइल-9968312514 और ईमेल- krishnakalpit@gmail.com पर संपर्क संभव है.

घोंघा: संजीव कुमार (कहानी बहस के लिए)

इस कहानी के इर्द-गिर्द एक बहस कहानीकारों, आलोचकों और सुधि पाठकों के बीच चल पड़ी है युवा आलोचक आशुतोष कुमार ने अपने फेसबुक वाल पर अभी हाल में ही लिखा है- “संजीव कुमार की कहानी ‘घोंघा’ पर मित्रों में बहस जारी है हिंदी आलोचना के एक नए विमर्श के मुताबिक़ इसके ‘पोर्नोग्राफिक’घोषित हो जाने का खतरा भी है। इस कहानी को जल्दबाजी में न पढ़ियेगा। हमारे सामाजिक मन की बहुत भीतरी तहों में उतर कर उसे विचलित करने का माद्दा इस कहानी में है। लैंगिक, वर्गीय, समाज-आर्थिक प्रतिसंधों (faultiness)  के टकराव का यौन दमित समाज में युवा हो रही पीढ़ी के भावबोध पर कितना विनाशकारी असर हो सकता है,इसे समझना हो तो कहानी पढ़ लीजिये।” सवाल उठाये जा रहें हैं कि इस कहानी में कहन का जो खिलंदड़ा अंदाज़ लिया गया है ,वह  त्रासदी की भीषणता को घटा कर एक मनोरंजक गप्प में बदल देने की समसामयिक  हिकमत का नमूना तो नहीं हो  गया है? कथावाचन की क्लासिकी परम्परा को एक अमानवीय वृत्तांत की रचना के उपकरण के रूप में चित्रित करना क्या कहानी कहने- सुनने के कौतूहल मात्र को संदिग्ध नहीं बना देता ? स्त्री के प्रति सहानुभूति का दावा करती हुयी कहानी स्त्री की असहाय दशा का ग्राफिक चित्रण  कर ती कहीं पाठकों की दमित यौन भावनाओं को उत्प्रेरित करने का बहाना तो नहीं बन रही?

‘घोंघा’ कहानी जिस चुहलबाजी या ‘मनोरंजक’ उठान के साथ शुरू होती है, कहानी उसका निर्वाह नहीं कर पाती क्योंकि कहानी एक ट्रैजिक ‘अंत’ के साथ पाठकों के बीच खुलती है। कहानी अपनी शुरुआत के साथ ही जैसे पाठकों को अपने बीच साधारणीकृत कर लेती है. लेकिन यही शुरुआत कहानी के संपूर्ण प्रभाव में एक विस्मृत पार्श्व बन जाती है. क्लासिकल कहानियों की जो भी स्मृति हमारे कथा-संसार में विद्यमान हैं, उसका बहुलांश कहानी के ऐसे फॉर्म को सहजता प्रदान नहीं करता है. लेकिन एक बात तो स्पष्ट है कि यह कहानी अपने कथात्मक-स्वाद में भले दो स्तरों पर चलती हो लेकिन इन दोनों स्तरों का उत्स कहीं न कहीं एक ही सामाजिक-सच्चाई है. एक सवाल यहाँ वाजिब हो सकता है कि जिस सामाजिक सच्चाई को व्यक्त करने के लिए कहानीकार ने एक लोक-स्वीकृत फॉर्म, जो पाठकों को सहज ही कथा का आनंद देता है, को त्याज्य समझा, वह क्या इतना अनिवार्य था?

सवाल यह भी हो सकता है कि कथावाचकों का संसार क्या सचमुच इतना निष्करुण भी है? यह बात सिर्फ इसलिए नहीं कही जा रही  है कि कथाकार ने कथावाचन के लोकप्रिय अंदाज को विस्मृति के हवाले कर दिया बल्कि इसलिए भी कि चौपालों का कथानायक-कथावाचक ‘जितुआ’ कैसे निष्करुण और स्त्रीविरोधी समाज का प्रतिनिधि कारक के बतौर सामने आता है. 

इस कहानी का महत्व इसलिए भी सुरक्षित होना चाहिए कि यह कहानी एक ऐसे दौर में लिखी गयी है जब कहानीकारों के एक अतिप्रचारित तबके ने भाषा की ‘चुहलता’ के सामने मानों आत्मसमर्पण कर दिया हो. ऐसा नहीं है कि संजीव कुमार में उस ‘चुहलता’ की प्रतिभा नहीं है बल्कि उनके इस प्रतिभा की व्युत्पति एक सामाजिक-वैचारिक अभ्यास की कमानी पर कस कर होती है।
कोई सत्ता-प्रतिष्ठान रचनात्मक-संसार को कैसे गैर रचनात्मक बहसों में उलझाकर व्यक्तिगत लानत-मलानत में खींसे निपोरता है इसका सबसे बड़ा उदाहरण अभी हिन्दी के बौद्धिक समाज में देखने को मिल रहा है। ऊपर से तुर्रा यह कि बहस इस बहाने शुरू हुई कि रचना को देखना चाहिए न कि रचनाकार में पुष्ट उसके वैचारिक व्यक्तित्व को। 
तो इस प्रस्ताव के साथ हम इस कहानी को बहस के लिए प्रस्तावित करते हैं। हमें उम्मीद है कि कहानी विचारोत्तेजक लगेगी और आप भी कुछ टिप्पणीनुमा जोड़ना चाहेंगे। 

आप अपनी टिप्पणी-लेख-समीक्षा को इन पतों पर मेल कर सकते हैं- ashuvandana@gmail.com और  udayshankar151@gmail.com। धन्यवाद। 

Massacre in Korea By Picasso

Massacre in Korea By Picasso

घोंघा

BY संजीव कुमार

उम्र की दूसरी-तीसरी दहाई में अनगिनत बार मैंने वह सपना देखा होगा…

पर मुश्किल यह है कि अभी जब उस सपने से कहानी शुरू करना चाहता हूं, कुछ भी क़ायदे से याद नहीं आ रहा।

ये भी हो सकता है कि हर बार मैं उसे वही सपना समझता होऊं, पर वह वही न होता हो। कुछ अजीबो-ग़रीब चीज़ें हर सपने में एक-सी होती हों, जिनके चलते लगता हो कि सपना वही है। जैसे यह, कि शहर के अपने छात्रावास से निकलते ही मैं गांव की बूढ़ी गंडक नदी के घाट पर पहुंच जाता हूं! जैसे यह, कि गंडक-तट की रेतीली मिट्टी पर पड़े असंख्य घोंघों के बीच मैं बचता-बचाता चलता हूं और साथ में सोचता हूं कि मैं किसे बचा रहा हूं, ख़ुद को या घोंघों को? जैसे यह, कि नदी की सतह समतल न होकर उन्नतोदर है, बीच से उठी हुई! जैसे यह, कि बांध की ढलान पर सलवार-कुर्ते की एक जोड़ी पड़ी है, अपने होने में किसी के न होने को अनायास दर्ज करती। जैसे यह, कि अचानक मुझे पता चलता है, यह बूढ़ी गंडक नदी नहीं, बूढ़ा गंडक समुद्र है!! जैसे यह, कि मैं धरती से आसमान तक फैले डरावने जबड़े जैसी एक लहर से बचने के लिए भागता हूं और घोंघों के कठोर खोल के टूटने-चुभने से मेरे तलवे लहूलुहान होते जाते हैं और रफ़्तार ऐसी कि घोंघों से बस थोड़ी ही तेज़!

तो मुझे यह नहीं कहना चाहिए कि अनगिनत बार मैंने यह सपना देखा होगा। कहना चाहिए कि अनगिनत बार ये चीज़ें मेरे सपनों में आयी होंगी, जोड़-घटाव के अलग-अलग समीकरणों में उलझी।

इनके पीछे भी एक कहानी है। यों तो एक नहीं, अनेकों कहानियां होंगी, पर एक को मैं अपने पूरे होशोहवास में जानता हूं। उस एक कहानी के पीछे भी अनेकों कहानियां होंगी जिन्हें मैं बिल्कुल नहीं जानता।

हमारा कॉलेज गंगा के किनारे था। अंग्रेज़ों का बनवाया हुआ वह परिसर इतना विराट और जटिल था कि मैं विष्वास के साथ नहीं कह सकता कि स्कूल से निकलने के बाद के जो पांच साल मैंने वहां गुज़ारे, उनमें कॉलेज की इमारत के हर कोने को देख पाया होऊंगा। शहर की मुख्य सड़क पर–उसे ‘मेन रोड’ कहा भी जाता था–कॉलेज का प्रवेश-द्वार था, जिससे घुसने के बाद पेड़ों की क़तारों के बीच एक लंबा फ़ासला तय करके ही हम इमारत के भीतर के किसी ठिकाने तक पहुंच पाते थे। हमारा छात्रावास, कई और छात्रावासों के साथ, इसी परिसर में एक तरफ़ था, गंगा के ज़्यादा क़रीब। लेकिन एक ही परिसर के भीतर हमारे गौरवशाली कॉलेज और दयनीय छात्रावास की इमारत के बीच कोई तुलना न थी। दरअसल, उसे इमारत कहना ही अजीब लगता है। वह अंग्रेज़ों के ज़माने की एक फ़ौजी बैरक थी, करकट यानी ऐस्बेस्टाॅस की छत वाली, जिसे छात्रावास में तब्दील करने के बाद बेहतर तो क्या, ज्यों-का-त्यों बनाये रखने की भी कोई कोशिश नहीं की गयी थी। लिखित इतिहास पर भरोसा न करने वाले मेरे ज़्यादातर सहपाठियों का तो मानना था, और इसके लिए मौखिक स्रोतों के अनगिनत साक्ष्य उनके पास थे, कि वह फ़ौजियों की बैरक नहीं, उनका अस्तबल था जिसे छात्रावास में तब्दील करते वक़्त सिर्फ़ इतना किया गया कि हर कमरे के सामने की लोहे वाली बैरियर हटा कर वहां दीवार चुनवा दी गयी और एक दरवाज़ा निकाल दिया गया। इसके अलावा सब कुछ घोड़ों के हिसाब से ही बना रहने दिया गया। करकट की छत के नीचे लगी प्लाई की फॉल्स सीलिंग के बारे में उनका कहना था कि वह तो अंग्रेज़ों के घोड़ों के लिए भी ‘आवश्यक आवश्यकता’ की श्रेणी में आता होगा। वह न होती तो मई-जून के महीनों में, जब करकट की वजह से इन कमरों में अदृश्य आग जल रही होती, घोड़े शर्तिया बग़ावत कर बैठते और अंग्रेज़ों को यह साबित करने में अपने कई इतिहासकारों को झोंकना पड़ता कि चूंकि घोड़ों का सामंतवाद के साथ क़रीबी रिश्ता रहा है, इसलिए इस बग़ावत का मूल चरित्र प्रतिगामी है।

बहरहाल, निहायत घोड़ोपयोगी होते हुए भी हमारा छात्रावास बाहर कहीं किराये का कमरा लेकर रहने की बनिस्पत बहुत आरामदेह था। उसके आसपास खुला-खुला वातावरण था, उत्तर की तरफ़ कुछ क़दम के फ़ासले पर गंगा थी, चारों ओर काफ़ी बड़ी संख्या में पेड़-पौधे थे, और सबसे बड़ी बात कि एक ‘बबजिया’ की देख-रेख में चलने वाला किफ़ायती मेस था जहां 110 रुपये में महीने भर सुबह-शाम का खाना मिल जाता था। जिस मैथिल युवक को ‘बाबा’ के साथ सम्मानसूचक ‘जी’ और अपमानसूचक ‘आ/वा’ लगा कर ‘बबजिया’ कहा जाता था, वही मेस का कर्ताधर्ता और सर्वेसर्वा था। मेस में खाने के हक़दार तो हॉस्टलर्स ही थे, लेकिन आठ-दस बाहर के ग्राहक भी वह बनाये रखता था जिनसे वह उसी खाने के 140 रुपये वसूलता था।

बाहर के ग्राहकों में सिर्फ़ जीतेंद्र था जिससे बबजिया 110 रुपये ही लेता था, या कहिए कि ले पाता था। जीतेंद्र हमारे ही कॉलेज का विद्यार्थी था और हमारे छात्रावास के साथ उसका ऐसा रिश्ता था कि बहुत-से लोग उसे यहीं का अंतेवासी समझते थे। रहता भी पास ही था, उपप्राचार्य की कोठी के आउटहाउस में। प्राचार्य और उपप्राचार्य को कॉलेज के परिसर में ही अंग्रेज़ों के ज़माने की बनी कोठियां मिली हुई थीं। दोनों कोठियां गंगा के ठीक किनारे पर बनी थीं जिनमें पेड़ों और झाड़-झंखाड़ से भरा बड़ा-सा अहाता था। अहाते और गंगा की तरफ़ जाती ढलान के बीच कम्पाउंड वॉल थी जिसे अहाते की तरफ़ से देखो तो खेत की मेड़ से बस थोड़ी ही ऊंची नज़र आती, पर गंगा की तरफ़ से देखने पर उसकी ऊंचाई आठ फीट से कम न थी। प्राचार्य ने तो नहीं, पर उपप्राचार्य ने अपना आउटहाउस किराये पर एक मामा-भांजे को दे रखा था। जीतेंद्र वही भांजा था। उससे उम्र में तीन-चार साल बड़ा उसका मामा शायद ठेकेदारी के धंधे में हाथ-पैर मार रहा था। वह अक्सर सुबह जल्दी निकल कर देर रात लौटता था। इसीलिए हमारे मेस में खाना सिर्फ़ जीतेंद्र खाता था।

लंच और डिनर के समय के अलावा भी जित्तू का काफ़ी वक़्त हमारे छात्रावास में बीतता। बी.ए. अंतिम वर्श के सारे लड़के उसके मित्र थे और वह प्रायः किसी-न-किसी के कमरे में बैठा पाया जाता। ग़रज़ कि हमारा छात्रावास उसकी अड्डेबाज़ी का पसंदीदा ठिकाना था।

इस ठिकाने पर दो चीज़ों को उसकी विशिष्ट पहचान का दर्जा हासिल था। पहली चीज़ थी उसकी हंसी, जो किसी भी तरह की मासूमियत से कोसों दूर थी। हंसते हुए अक्सर उसकी आंखों में एक शैतानी चमक होती जो ऐसे सभी लोगों की आंखों में होती है जिनके भीतर दूसरों को नुकसान पहुंचा कर, या किसी भी तरीक़े से उन्हें मायूसी, हताशा या कुंठा में धकेल कर लुत्फ़ लेने की प्रवृत्ति होती है। लेकिन उसकी पहचान के रूप में स्थापित विशेषता यह नहीं थी। पहचान वाली विशेषता यह थी कि उस हंसी में घोड़ों की हिनहिनाहट और परिंदों के परों की फड़फड़ाहट का विचित्र संयोग था। हिनहिनाहट का संबंध गले से रहा होगा और फड़फड़ाहट का जीभ और होठों से। बल्कि यह कहना ज़्यादा सही होगा कि हिनहिनाहट उसकी हंसी का मूल स्वर था और फड़फड़ाहट उस लार की वल्गा को खींचे रखने का शोर जो हर हंसी के साथ जीतेंद्र के मुंह से बरबस बाहर की ओर चल पड़ती थी। ऐसी हंसी पूरे हॉस्टल  में किसी की नहीं थी। वह कॉरीडोर के कोने वाले कमरे में भी हंस रहा हो तो दूसरे कोने में बैठा बंदा समझ जाता कि जितुआ हंस रहा है। और जितुआ हंस रहा है, मतलब पूरी संभावना है कि उसके आसपास कोई-न-कोई परेशान या चिड़चिड़ा या बग़लें झांकता या मायूस या आहत है।

कॉरीडोर के एक कोने वाले कमरे से दूसरे कोने वाले कमरे तक आवाज़ों के पहुंच जाने का रहस्य यह था कि कमरों में लगी फ़ाॅल्स सीलिंग जगह-जगह से उजड़ चुकी थी और उसके तथा करकट की छत के बीच सभी कमरों को जोड़ता हुआ एक सुरंगनुमा ख़ालीपन था, क्योंकि कमरों के बीच की पार्टीशन वाली दीवार फॉल्स सीलिंग की ऊंचाई तक ही थी। लिहाज़ा किसी एक कमरे से उठती आवाज़ उस सुरंग में घुसने के बाद सभी कमरों में यथायोग्य बंट जाती। बिल्कुल पास के कमरों में उसकी गुणवत्ता उत्तम, थोड़े बाद वाले कमरों में मध्यम और ख़ासे दूर के कमरों में अधम होती।

और इस सुरंग से होकर आती आवाज़ों में से जीतेंद्र की हंसी ही नहीं, उसके गपास्टक की आवाज़ भी एकदम अलग से पहचानी जाती थी। जी हां, यह गपास्टक या कि़स्साग़ोई उसकी दूसरी पहचान थी। वह जहां भी बैठता, वहां धीरे-धीरे पांच-सात लड़के इकट्ठा हो ही जाते, क्योंकि वह एक-के-बाद-एक दिलचस्प कि़स्से इंतहाई सहज और ग़ैरबनावटी अंदाज़ में सुनाता जाता। महमूद और दानिश भी, जो इन दिनों दास्तानगोई की कला को दुबारा ज़िंदा कर रहे हैं, उससे कुछ-न-कुछ सीख सकते थे। वह जो कुछ सुनाता, उसमें आपबीती कितनी होती थी और कितना मनगढ़ंत, कहना मुष्किल है, लेकिन उसका दावा सच का होता और बातें सच्ची लगती भी थीं। यानी वह पत्रकारीय अर्थों में ‘स्टोरी’ सुनाता था जहां झूठ को भी सच के दावे और ढब के साथ पेश किया जाता है, साहित्यिक अर्थों में नहीं जहां हम सच को भी झूठ कह कर परोसते हैं। उसके पास दुनिया का विशाल अनुभव था जो कभी भी निःशेष न होने वाले खज़ाने की तरह उसके साथ चलता था और उसकी बातें सुन कर हम ख़ुद को कुंए का मेढ़क समझने पर मजबूर होते थे। हमारे पास दरी वाले सिनेमाघरों से लेकर पलंग और मसनद वाले सिनेमाघरों तक का तज़ुर्बा नहीं था। हमने कोठों और चकलाघरों का स्वाद नहीं चखा था। हमने ट्रकों में सफ़र करके लाइन-होटलों में रातें नहीं गुज़ारी थीं। हम कभी डब्ल्यू.टी. यात्रा करने के ज़ुर्म में जेल नहीं गये थे। हमने टिकटें ब्लैक में बेच कर उम्दा रेस्तरांओं में मुगऱ्मुसल्लम नहीं उड़ाया था। रहरी यानी अरहर के खेत देखने में कैसे होते हैं, यह हममें से ज़्यादातर को पता नहीं था, फिर भला हम कैसे जानते कि वह कामातुर जोड़ों के लिए अभयारण्य क्यों साबित होता है! निचोड़ यह कि जीतेंद्र के कि़स्से हमारे लिए अवैध और निषिद्ध ज्ञान का भंडार थे।

इस भंडार में यों तो लगभग हर चीज़ हमारे काम की थी, पर सबसे ज़्यादा काम की चीज़ थी उसका कामशास्त्र। उसे हम श्लेष में ‘काम’ की चीज़ कहते, क्योंकि वही हमारी अभावग्रस्तता (या शायद अकालग्रस्तता) और ग़र्ज़मंदी का सबसे अहम संदर्भ था। कहने को हम एक सहशिक्षा महाविद्यालय में पढ़ रहे थे, पर लड़कियां हमारे लिए उतनी ही दुर्लभ थीं जितनी पास वाले ब्वायज़ कॉलेज यानी ‘बंडाश्रम’ के लड़कों के लिए। हिक़ारत में दिये गये इस ‘बंडाश्रम’ नाम के बदले ब्वायज़ कॉलेज के लड़के हमारे बारे में कहने लगे थे कि साले, बात तो ऐसे करते हैं जैसे सहशिक्षा महाविद्यालय में नहीं, सहवास महाविद्यालय में पढ़ते हों। ये करमघट्टू, ताखे पर रखी हुई मिठाई देख-देख के रोज़ इतनी लार टपकाते हैं कि एक दिन जब मिठाई मिलेगी तब पूरी लार ख़त्म हो चुकी होगी, मिठाई घोंटी नहीं जाएगी।

बंडाश्रम वालों की इस बात का उत्तरार्द्ध भले ही शु द्ध खिसियाहट का नमूना हो, ताखे पर रखी हुई मिठाई वाला उपमान ग़लत नहीं था। लड़कियों के साथ हमारा संबंध वैसा ही था जैसा दिन और रात, सूरज और चांद के बीच होता है। कभी क़ायदे से मिल न पाना हमारी कि़स्मत में बदा था। बस, कक्षाएं थीं जो सुबह और शाम की भांति आधे-अधूरे ढंग से हमें पास आने का मौक़ा देती थीं। पता नहीं, कॉलेज के स्थपति ने कितना विराट गल्र्स कॉमन-रूम बनावाया था कि कक्षाओं में बैठी लड़कियों के अलावा बची हुई सारी लड़कियां उस कॉमन-रूम के पेट में समा जाती थीं। क्लास शु रू होने से दो मिनट पहले वे कॉमन-रूम से निकल कर क्लास-रूम के बाहर झंुड में खड़ी हो जातीं। उनके झुंड का रंग-ढंग देख कर मुझे रोयाल चिकेन सेंटर की वे मुर्गियां याद आतीं जो आसिफ़ मियां का हाथ पिंजरे के अंदर जाते ही मुंह दूसरी ओर घुमाये परले कोने में अंड़सने लगती थीं (ज़ाहिर है, उसमें मुर्गे भी होते होंगे, लेकिन मेरी याद में सब मुर्गियां बन कर ही आते)।… टीचर के आने पर उसके पीछे-पीछे वे क्लासरूम में प्रवेश करतीं और आगे की दो ख़ाली क़तारों में जाकर बैठ जातीं। इन क़तारों को उन्हीं के लिए ख़ाली छोड़ा जाता था। फिर क्लास ख़त्म होने पर वे टीचर के पीछे-पीछे क्लास-रूम से निकलती हुई सीधा गल्र्स कॉमन-रूम या किसी और क्लास-रूम की तरफ़ झुंड में बढ़ जातीं। ज़्यादातर लड़कियों को हम उनके राॅल नंबर से जानते थे, क्योंकि हाजि़री लगाने के लिए नाम नहीं, राॅल नंबर पुकारा जाता था। थक-हार कर उसे ही हमने उनके नाम का दर्जा दे दिया था। मिसाल के लिए, हमारे क्लास की तीन निहायत खूबसूरत लड़कियों के नाम थे, 84, 310 और 320। कॉलेज के 99 फ़ीसदी लड़कों को सालों-साल किसी लड़की से दो शब्द बात करने का मौक़ा न मिलता था और यही हाल 99 फ़ीसदी लड़कियों का था। बचे 1 फ़ीसदी लड़के और लड़कियां। तो उनकी बात ही अलग थी! वे हमें अपने शहर तो क्या, इस मत्र्यलोक के ही प्राणी नहीं लगते। उन्हें हम देवलोक का प्रतिनिधि मानते थे। हां, कभी-कभी जब कोई देवता हमारी दुनिया के किसी असुर से इस बात पर पिट जाता कि उसने उस लड़की से बात क्यों की जिसके पिता को असुर विशेष ने अपना ससुर मान लिया है, तब उसका देवत्व हमारे लिए संदेह के घेरे में आ जाता था।

ख़ैर, अकाल की इस चर्चा को यहीं विराम दें, क्योंकि वह हरिकथा की तरह अनंता है और आपके सामने मैं अपने अभावों का रोना रोने नहीं बैठा हूं। मैं तो…

या पता नहीं…

अच्छा, छोडि़ए! मैं क्या करने बैठा हूं, यह ख़ासा बहसतलब हो सकता है, पर फि़लहाल मैं जो कर रहा था, वह चर्चा थी जीतेंद्र की हंसी और कि़स्साग़ोई की। तो उसके कि़स्सों का जादू ही था जो हमें उसके आसपास मंडराने के लिए मजबूर करता था, वर्ना उसकी शैतानी हंसी का निशाना हम सब कभी-न-कभी बन चुके थे। और जब भी कोई उसका निशाना बनता, अविलंब यह क़सम खाता कि इस साले से अब कोई दोस्ती-यारी नहीं रखनी है… लेकिन बमुष्किल चैबीस घंटे बाद वह जितुआ के आसपास मंडराता पाया जाता।

ऐसे ही एक दिन, जब शैतानी हंसी का शिकार बनने के बाद खायी गयी क़सम का स्वाद मेरे मन की जिह्वा से उतरा भी न था, जित्तू ने रात के खाने के बाद और दोस्तों से अलग मुझे पकड़ा।

‘का रे चिकेन! गुस्सा हो?’ कहते हुए उसने मेरे कंधे के पास की गोलाई को बड़े मानीख़ेज़ अंदाज़ में दबाया। यह उसका प्यार जताने का ख़ास तरीक़ा था। उसके ‘चिकेन’ में चिकना होने और सुस्वादु खाद्य पदार्थ होने का अर्थ मिला हुआ था और यह संबोधन उसने ख़ास मेरे लिए सुरक्षित कर रखा था। यह शब्द मुझे सचेत रूप से कभी आपत्तिजनक नहीं लगा, पर शायद मेरे मन में इसने अनजाने ही कोई गांठ डाल दी थी जिसका कहीं-न-कहीं मेरी मोटी मूंछों के साथ संबंध है जिन्हें मैंने उन्हीं दिनों तराशना बंद कर फलने-फूलने के लिए छोड़ दिया था।

बहरहाल, कंधे की गोलाई को उसकी हथेली की पकड़ से आज़ाद कराते हुए मैंने उसे ‘बड़गाहीभाई’ की पदवी से नवाज़ा और कहा कि बताये, बात क्या है। वह पहले तो हिनहिनाती हंसी हंसता रहा, फिर मेरे और पास आकर धीमे से, लगभग बुदबुदाते हुए बोला, ‘आज केतनो गरिया लो भइवा, सब माफ है। हम त अंदर तक सिलाबोर (सराबोर) हैं… पूरा, जबर्दस्त!’

कह कर वह मुस्कुराती आंखें से इस बयान के असर को टटोलने लगा। उसे पता था कि वह गपास्टक का पहला टुकड़ा मेरी ओर उछाल चुका है और अब मेरा उपेक्षापूर्वक वहां से चलते बनना असंभव हो गया है।

असर तो सचमुच हुआ था, पर मैंने कोशिश की कि वह दिखे नहीं। बात को हल्के में लेने वाले अंदाज़ में कहा, ‘बेसी पेल मत। बताओ, का बात है?’

वह फिर हिनहिनाया, जैसे कहना चाहता हो कि लाख छुपाओ, छुप न सकेगा… वग़ैरा। फिर बोला, ‘आजकल धकाधक चल रहलउ हे, भइवा। रात दिन।’ कह कर उसने एक गंदा इशारा किया जिसका मतलब था कि रात-दिन चलने वाली चीज़, और कुछ नहीं, संभोग है।

सुन कर मैं चैंधिया गया होउंगा, क्योंकि वह मेरे चेहरे को देखते हुए, उस चेहरे की ओर तर्जनी से निशाना साधे हुए, इतनी ज़ोर से हिनहिनाया कि दूर खड़े सारे लड़के हमारी ओर देखने लगे। कुछ पलों बाद जब उसका हिनहिनाना रुका, तो हंसी के दबाव में उसकी आंखों से पानी बहने लगा था। ‘ओह, मजा आ गेलउ, भइवा,’ कहते हुए उसने मुझे कंधे से पकड़ा और जो लड़के इस हंसी के चलते समुत्सुक होकर हमारी ओर क़दम बढ़ा चुके थे, उनसे अलग ले चला।

अलग जाते हुए जो बात उसने लगभग फुसफुसाते हुए बतायी, वह इस प्रकार थी।

पिछली रात जब वह अपने मामू के साथ नाइट शो देख कर स्टेशन के पास के सिनेमा हाॅल से कैम्पस की ओर लौट रहा था, एक लड़की सड़क पर अकेली दिखी। मामा-भांजे ने सोचा, शायद पैसे पर चलने वाली है। थोड़ी ठिठोली करने की इच्छा हुई। टोका। लड़की बहुत घबरायी हुई थी। बात करने पर पता चला कि रात के दस बजे स्टेशन पर उतरी थी। सदर अस्पताल जाना है, जहां उसकी मां भर्ती है। पास में पैसे नहीं हैं और पैदल किस रास्ते जाये, उसे समझ नहीं आ रहा।… मामा-भांजे ने एक-दूसरे को देखा, आंखों ही आंखों में बातें हुईं। उपप्राचार्य, जिनकी कोठी के आउटहाउस में वे रहते थे, हफ़्ते भर के लिए सपरिवार बाहर गये हुए थे। इससे अच्छा समय और क्या हो सकता था! तुरंत एक रिक्षा रुकवाया। लड़की से कहा कि वे जहां रहते हैं, वह जगह अस्पताल के पास ही है, साथ आ जाये। लड़की उनके साथ रिक्षे पर बैठ गयी। मामा-भांजा उसे लिये हुए अपने कमरे पर आ गये। कॉलेज के विशाल परिसर में घुसने के बाद से लड़की यही समझती रही कि अस्पताल आ गया है। कमरे में लाने के बाद लड़की को धमका कर दोनों ने अपनी प्यास बुझायी। साथ में एक काम और किया। प्यास बुझाते समय उसके जो कपड़े उतारे थे, उन्हें एक बक्से में बंद कर ताला लगा दिया। लड़की अब बिल्कुल नंगी थी, इसलिए उसके भाग खड़े होने का सवाल ही नहीं था। तब से लगभग चैबीस घंटे गुज़र चुके थे। लड़की इस बीच सोई नहीं थी। उनके बिस्तर के एक कोने में घुटने मोड़े, अपनी देह से ही देह को ढंके बैठी थी, गठरी की तरह। मामू ने सुबह काम पर जाने से पहले इस गठरी को खोला था और उसके बाद से भांजा तीन बार खोल चुका था। हर बार वह लाचार-सी खुल जाती और गिड़गिड़ाती कि उसे एक बार अस्पताल पहुंचा दिया जाए, वह रात को फिर आ जाएगी। हर बार जितुआ उसे आष्वस्त करता कि एक दिन अच्छे-से भोग लेने दे, अगले दिन पहंुचा दिया जाएगा।

सच कहूं तो अब बिल्कुल याद नहीं कि इस बात को सुन कर मुझे कैसा लगा था। अंदर कहीं गुस्से का ज्वार उठा हो और मैंने जितुआ के मुंह पर थूक दिया हो, या दूर-दूर से हमें बातें करते देख रहे दोस्तों को बुला कर जितुआ की हैवानियत के लिए उसे सार्वजनिक रूप से ज़लील किया हो, या चुप रह कर मन-ही-मन संकल्प किया हो कि कल पुलिस को सूचना देकर उसके कमरे पर छापा डलवा दूंगा, या चेहरे पर याचक भाव लाकर उससे कहा हो कि हमरो दिलबा दे न, यार–ऐसा कुछ नहीं हुआ था। शायद जितुआ की हैवानियत के प्रति एक गहरी वितृश्णा और निर्वस्त्र स्त्री-देह की दुर्निवार रूप से सम्मोहक कल्पना के बीच मैं ठिठक गया था। शायद ये सी-साॅ के दो बाज़ुओं की तरह थीं, जिनकी बीच वाली टेक के दोनों ओर अपने पैर जमाये मैं सीधा खड़े रहने की कोशिश कर रहा था। इतना याद है कि छूटते ही कोई प्रतिक्रिया देने के बजाय कुछ क्षण ठहर कर मैंने कहा था, ‘साला, एकदम्मे जंगली है का रे? भाक्!’ और अपने कमरे की ओर चल पड़ा था। पीछे से हंसी के फ़व्वारे के साथ झरते उसके ये शब्द सुनाई पड़े थे, ‘जंगलवा में ई सब कहां मिलता है, भइवा!’

कमरे में लौट कर मैं अपनी मेज़-कुर्सी ठीक से जमा ही रहा था कि वह पीछे से फिर आ पहुंचा। ‘जंगली बनना है, शिशिर?’ इस बार उसका अंदाज़ गंभीर था, ‘सोच ले, भइवा! एक नंबर समान है। बाद में मत बोलना कि साला दोस्त काम नहीं आया। हम त अपना भर कोसिस करते ही हैं कि तू लोग को दुनिया का सब स्वाद चखवा दें।’

बेशक! अभी दो दिन पहले ही उसने हमें सामूहिक रूप से एक स्वाद चखवाया था। ब्लू-फि़ल्म का। उपप्राचार्य उसी दिन सपरिवार बाहर गये थे। उनके निकलते ही जितुआ ने ‘चंदा’ करके रात को अपने कमरे पर ब्लू-फि़ल्म का प्रोग्राम रखा (इससे पहले तक ‘चंदा’ हमारे लिए सरस्वती पूजा से जुड़ी शब्दावली का हिस्सा था)। डेढ़ सौ रुपये में टी.वी. सेट, वी.सी.पी. और कैसेट्स–रात भर के लिए। हम लपक कर और ललक कर इस आयोजन में शरीक हुए थे, एक अभूतपूर्व स्वाद की उम्मीद में खुदबुदाते। जित्तू के कमरे की ओर जाते हुए रास्ते में एक तज़ुर्बेकार साथी ने बताया था कि बेट्टा, जब सीन देखोगे न, त अइसा सांस फुलने लगेगा जइसे आॅक्सीजन कम पड़ गया हो। फस्ट टाइम वाला सब लोग का यही हाल होता है।

और सचमुच, हमारा यही हाल हुआ था।

लेकिन यह मेरे लिए थोड़ा परेशान करने वाली बात थी कि जित्तू ने जब जंगली बनने का न्यौता दिया, तब भी एकाएक मैंने उसी तरह सांसों का फूलना महसूस किया। फेफड़ों में एकाएक जैसे कुछ ज़्यादा जगह बन आयी थी और हवा जाने का रास्ता नाकाफ़ी लगने लगा था। एक मिनट तक मैं उसकी ओर पीठ किये अपनी मेज़ पर किताबें जमाता रहा, फिर एक शब्द में मैंने जवाब दिया, ‘कल।’ मेरी इस असहमत-सी सहमति पर वह फिर हिनहिनाया और कुछ ‘घाघ’ या ‘घुन्ना’ या ‘घोंघा’ जैसा कमेंट मारते हुए रुख़्सत हो गया।

‘हां रे साला, घाघ तो हम हैं,’ मैंने सोचा, ‘कल पता लगेगा। ई जान रहा है कि हम स्वाद के चक्कर में आ रहे हैं? जब लड़की को आजाद करा देंगे, तब समझ में आएगा, केतना घाघ हैं।’ मैंने ख़ुद को विष्वास दिलाया कि कमरे पर चलने का न्यौता पाकर मेरी सांसों का फूल आना, दरअसल, एक मज़लूम को आज़ाद कराने के दुस्साहसिक विचार से उपजे भय और रोमांच का नतीजा था।

वह एक बेचैन रात थी। जितुआ की हैवानियत के बारे में सोच-सोच कर मैं सो नहीं पा रहा था। साले ने पिछले चैबीस घंटे से किसी को क़ैद कर रखा है और वह भी इस हालत में! कल रात से वह अपने लाचार जिस्म पर सात-आठ दफ़े इन दरिंदों की ठोकरें झेल चुकी है।…और यह सिलसिला ऐन उस घड़ी शुरू हुआ है जब वह ऊपर वाले का शुक्र मना रही थी कि उसने आखि़रकार अपने दूत भेज कर उसे मां के पास पहुंचवा ही दिया। कॉलेज के विशाल परिसर में पेड़ों की क़तारों के बीच से गुज़रते हुए और दूर-दूर गलियारों और छात्रावासों के कमरों में जलती लाइटों को देखते हुए उसे तसल्ली हुई होगी कि इतने शांत और शानदार अस्पताल में मौत उसकी मां के आस-पास भी फटकने का साहस नहीं करेगी। शहर का सारा इंतज़ाम कितना ‘निम्मन’ है और लोग कितने ‘सुपातर’, उसने सोचा होगा। और इसके तुरंत बाद वह जैसे पहाड़ की चोटी से अंधेरे खड्ड में गिरी होगी। फिर मन और देह की भयावह पीड़ा से कराहती एक गठरी बन कर बिस्तर के कोने में धंस गयी होगी।

यह सब कुछ मैं शायद इन्हीं शब्दों में नहीं सोच रहा था, पर इतना तो याद है कि शब्दों में ही सोच रहा था। ध्यान जब भी भटक कर किसी और दिशा में जाता, मैं शब्दों और सुचिंतित वाक्यों से हांक कर उसे ग़ुस्से और हमदर्दी की उसी राह पर ले आता। अंततः मैंने तय किया कि कल कंचन’दी के घर से–वह उसी शहर में रहने वाली मेरी मौसेरी बहन थीं–एक जोड़ी कपड़े लेकर आना है, ताकि जितुआ के कमरे पर जाते ही उस लड़की को कपड़े दूं और उसके सदर अस्पताल जाने का इंतज़ाम करूं।

अगले दिन क्लास ख़त्म होते ही मैं कंचन’दी के यहां गया। उन्हें बताया कि नाटक खेलने के लिए सलवार-कुर्ते की एक जोड़ी चाहिए। वे इस शर्त पर कपड़े देने को राज़ी हुईं कि मैं रात का खाना वहीं खाऊं। रात का खाना खाकर अपने झोले में एक सलवार सूट रखे मैं नौ बजे छात्रावास पहुंचा।

जितुआ गेट पर ही मिल गया। वह डिनर के बाद अपने कमरे की ओर जा रहा था। मुझे देखते ही बोला, ‘का भइवा, कहां गायब हो जाते हो? साला दिन भर खोज खोज के तबाह हो गये।’ फिर पास आकर फुसफुसाया, ‘अबहीं चलबे?’

‘चल।’ मैंने कहा और उसके साथ हो लिया।

पिछली बार फूलती हुई सांसों के बीच मैं सिर्फ़ ‘कल’ कह पाया था, इस बार सिर्फ़ ‘चल’। चलते हुए मैंने एक बार अच्छी तरह कंधे से लटके झोले को टटोला। यह अपनी सांसों के फूलने को झुठलाने की कोशिश रही होगी।

कोठी पर पहुंच कर मेरी चाल ख़ुद-ब-ख़ुद धीमी पड़ गयी। जितुआ को मैंने दो क़दम आगे निकल जाने दिया। वह पैंट की जेब में चाभी टटोलता कमरे के दरवाज़े की ओर बढ़ा… पर यह क्या! वहां तो कोई ताला था ही नहीं। हाथ लगाते ही दरवाज़ा खुल गया। ‘अरे! खुलल कैसे है यार? मामू आ गये का?’ कह कर उसने हड़बड़ी में लाइट जलायी।

लाइट ने बताया कि मामू तो नहीं ही आये हैं, लड़की भी नदारद है।

जितुआ सन्न! ‘अरे, कहां गेलउ भइवा?’ वह ऐसे तड़फड़ाने लगा जैसे बिर्हनी के छत्ते में हाथ पड़ गया हो। झटाझट उसने कमरे के सारे कोने-अंतरे तलाश लिये।

मैंने ग़ौर किया, तीन दिन पहले के मुक़ाबले कमरे की रंगत थोड़ी बदली हुई थी। सामान तो अपनी पुरानी जगह पर ही थे–दरवाज़े के ठीक सामने की दीवार के साथ एक स्टोव और दो-चार बर्तन, बांयीं तरफ़ एक चैड़ी-सी चैकी और उस पर बिछा तोशक, फ़ोल्डिंग मेज़ पर कूड़े के ढेर की तरह रखी किताबें, पास ही जस्ते का एक बड़ा-सा बक्सा–पर तोशक को छोड़ कपास का कोई नामोनिशान नहीं था। बिस्तर पर चादर तक न थी और कमरे में आर-पार बंधी रस्सी, जिस पर ढेरों कपड़े टंगे होते थे, ख़ाली पड़ी थी। शायद मामा-भांजे ने सारा कुछ, एहतियातन, बक्से में बंद कर दिया था। उस बक्से पर अभी ताला लटक रहा था।

इन सारे सामानों के बीच वह ‘समान’ कहीं नहीं था। दरवाज़े की आड़ में एक देह भर का जो छोटा-सा गुप्त ठिकाना था, वहां भी नहीं। जितुआ दौड़ कर ग़ुसलख़ाने में झांक आया। वह भी ख़ाली था।

‘ले लोट्टा। लगता है, कमरवा बंद करके जाना भूल गये थे।… लेकिन कपड़ा त सब ताला में बंद है। साली लंगटे भाग गई का?’ कहता हुआ वह बाहर की ओर दौड़ा और फाटक से निकल कर हड़बड़ाया हुआ दोनों तरफ़ देखने लगा, इस दुविधा में कि किधर जाए।

                मैं कमरे के बारामदे पर खड़ा रहा। मुझे संदेह होने लगा था कि कहीं सब कुछ इस साले की कि़स्साग़ोई तो नहीं है! सोचता होगा, ऐसा कोई कि़स्सा बनाने से इसकी मर्दानगी का रुआब जमेगा।… वाह, क्या मर्दानगी है!… अब ये हरामी फाटक के पास से अपने कंधे झुलाये हुए लौटेगा और कहेगा, ‘भाग गेलउ रंडिया। साइद चद्दर-उद्दर कुछ बाहर छूट गेलई होत। ओही लपेट-उपेट के भाग गेलउ।’

उसकी ऐक्टिंग की ओर से मुंह फेर लेने की ग़रज़ से, या शायद किसी अंतःप्रज्ञा के चलते, या शायद यों ही, मैं फाटक से ठीक उल्टी दिशा में देखने लगा जहां पेड़ों और झाड़-झंखाड़ से भरा कोठी का विशाल अहाता था। अहाते के छोर पर खेत की मेड़ से बस थोड़ी ही ऊंची दीवार और आगे गंगा की ढलान। चांदनी रात में यह पूरा विस्तार बहुत रहस्यमय लग रहा था, क्योंकि कोठी की सारी बत्तियां बुझी हुई थीं। सिर्फ़ एक बल्ब था, जितुआ के कमरे का, जो मेरी पीठ के ठीक पीछे था। पर चांदनी में सब कुछ साफ़-साफ़ नज़र आ रहा था, गाछ-वृक्षों की हरीतिमा को छोड़ कर। सांवलापन ओढ़े ये गाछ-वृक्ष ऐसे लग रहे थे जैसे त्रिआयामी परछाईंयों में बदल गये हों। हवा थमी हुई थी। बाउंडरी वाल के आगे तेज़ी से धुंधली पड़ती चांदनी गंगा के विस्तार पर जाकर लगभग लुप्त हो गयी थी। वहां अंधेरा पसरा था और पानी की सरसराहट में सुनायी पड़ता सन्नाटा भी।

आधे मिनट मैं इस रहस्यलोक के किनारे पर खड़ा उसकी चैहद्दियां टटोलने की कोशिश करता रहा। वे जितनी पास थीं, उतनी ही दूर भी।… या शायद वे कहीं थीं ही नहीं। उनके एक साथ पास और दूर होने की अतार्किकता का यही निदान था।

पर उस रहस्यलोक के भीतर कुछ और था जिसने एकाएक मेरा ध्यान खींच कर मुझे हतप्रभ कर दिया और अगले एक-डेढ़ मिनट में वह सब हो गया जिसे बताने के लिए मैं इतने ब्यौरे पार करता यहां तक पहुंचा हूं।

मैंने देखा, दूर किसी मोटे तने की आड़ से झांकती एक गोरी बांह और कमर के कटाव से नीचे का सफ़ेद झक्क अर्द्धचंद्र! वह अपने नंगे जिस्म को एक उम्रदराज़ पेड़ की आड़ में छिपाने की नाकाम कोशिश कर रही थी। जिस्म का जो क़तरा तने से बाहर निकला था, उससे टकरा कर चांदनी जैसे बिखर-बिखर जाती थी। पेड़ कुछ बेतरतीब और विरल झाडि़यों के पीछे था। इसलिए कमर से नीचे की अधगोलाई किसी ढीले-ढाले जाल में उलझी-सी दिख रही थी।

मैं सांसों को संभालता कुछ क्षण रहस्यलोक में छिपे इस सबसे गहरे, किंतु अंशतः अनावृत, रहस्य को देखता रहा। इस बीच उसने तने के पीछे से अपना आधा चेहरा बाहर निकाला और एक आंख से इसी दिशा में देखने लगी जिधर आउटहाउस था, फाटक था और मैं भी। मेरे पीछे बल्ब से रौशन कमरे का दरवाज़ा था, शायद इसीलिए वह समझ न पाई हो कि मैं उसे ही देख रहा हूं। समझ पाती तो तुरंत अपने को छुपा लेने का कोई और जतन करती।

उतनी देर में मैंने अपनी सांसों पर थोड़ा काबू पा लिया था और मुझे याद आ गया था कि मैं इसे देखने नहीं, कपड़े देने आया हूं। मैं बारामदे से उतर कर उस ओर बढ़ गया।

और यही सारी गड़बड़ी की शुरुआत थी। मुझे आगे आता देख वह एकाएक सचेत हुई और वहां से भाग कर पीछे एक केले के पेड़ की आड़ में खड़ी हो गयी। एक कौंध की तरह उसका पूरा नंगा जिस्म दृश्य से होकर गुज़रा। किसी ग्लानि या घबराहट या महज़ एक अपरिचित-सी झेंप के चलते मेरे पैर बारामदे से चार क़दम आगे ही ठिठक गये और मैं कठपुलती की तरह पीछे मुड़ गया, जैसे यह साबित करना हो कि मैंने कुछ नहीं देखा। जितुआ उस समय फाटक के बाहर दाहिनी तरफ़ से लौट कर बाईं तरफ़ जा रहा था। उस पर नज़र पड़ते ही मैं वापस झुरमुट की ओर मुड़ गया।

भाग कर केले की आड़ में उसका जाना, बेशक, ख़ुद को बचाने की कोशिश में एक बेमतलब-सा क़दम था, पर कोई उपाय न देख कर वह लुका-छिपी के खेल में ही बचाव और प्रतिरोध का छद्म संतोश ढूंढ़ रही होगी। यह भी हो सकता है कि केले के नाटे क़द और नीचे को लटके हुए दुकूल-नुमा पत्तों से उसे कुछ ज़्यादा ही उम्मीद रही हो। वहां जाकर शायद उसे महसूस हुआ कि उसकी उम्मीद कितनी ग़लत थी; वह जितना छुप रही थी, उससे ज़्यादा दिख रही थी। मुझे अपनी ओर देखता देख वह स्तनों पर अपने हाथ बांधे पीछे खिसकने लगी। अब वह आड़ से बिल्कुल बाहर थी, पीछे को जाती हुई। उसके बाल बंधे थे। चेहरे से लेकर गर्दन तक का रंग गेहुंआं रहा होगा, तभी वह बहुत साफ़ नज़र नहीं रहा था, पर पूरी देह चांदनी में चमक रही थी।… दो-चार क़दम पीछे जाने के बाद ज़मीन पर गिरी हुई एक सूखी डाल से उसके पैर उलझे। जैसे आत्मरक्षा की कोई युक्ति अचानक सूझ गयी हो, उसने वह मोटी-सी डाल हाथों में उठा ली और उसे ध्यान नहीं रहा… या रहा भी हो… कि ऐसा करने से उसके स्तन पूरी तरह बेबाक हो गये हैं–डुबकी मार कर ऊपर को उठते गोताखोरों की तरह दो भारावनत स्तन…

बचपन के भूगर्भ की किन्हीं परतों में दबा परितृप्त स्पर्ष का एक अहसास मेरी हथेलियों, गालों और होंठों पर बिछलता चला गया।

क्या इसे ही जादुई यथार्थ कहते हैं?

मैं मंत्रविद्ध-सा जड़ हो गया। फिर से यह बात सांसों की धौंकनी में कहीं खो गयी कि मेरे कंधे पर लटकते झोेले में एक जोड़ी कपड़े इसी जादू और रहस्य को ढंकने के लिए हैं। शायद चांदनी का नीम अंधेरा न होता और उसकी देह की चमक ही नहीं, आंखों के डर को भी मैं देख पाता तो यह भूल न होती।… या कौन जाने, यह सिर्फ़ एक लाचारी भरी सफ़ाई हो! कैसे कह सकता हूं कि दिन के उजाले में भी उन आंखों को मैं देख ही पाता! क्या इस वक़्त मैं उसकी देह के अलावा और कुछ भी देख पा रहा था? उमस भरी रात में निस्तब्ध खड़े पेड़, अहाते की ठिगनी चारदीवारी, उसके पार धुंधली पड़ती हुई अंधेरे में गुम जाने वाली ढलान, गंगा के प्रवाह पर कहीं-कहीं रोशनी के कांपते प्रतिबिंब–ये सब मेरी निगाह के दायरे में रह कर भी अदृश्य थे। दृश्य सिर्फ़ एक जिस्म था।

पर यह सब, कुछ गिने-चुने लम्हों की ही बात थी। जब पीछे की ओर चलते हुए अहाते की छोटी-सी दीवार से उसके पैर अटके तो मुझे जैसे होश आया। मैं अपने ठिठके हुए क़दमों को झटक कर आगे लपका और चिल्लाया, ‘अरे, रुको! हम ई कपड़ा…।’ वाक्य बीच में ही छूट गया, क्योंकि मेरे लपकने और चिल्लाने को एक निर्णायक हमला मान कर उसने हाथ में पकड़ी हुई डाल मुझ पर फेंक कर मारी। वह सीधा मेरे चेहरे पर लगी होती अगर हाथों पर रोकते और नीचे झुकते हुए मैं ज़मीन पर न आ गिरा होता। उधर लड़की, शायद जवाबी हमला कर चुकने के बाद की घबराहट में, या मेरी आवाज़ सुन कर पीछे से दौड़े आते हुए जितुआ को देख कर, तेज़ी से पीछे मुड़ी और दो-ढाई फिट ऊंची उस दीवार पर खड़ी हो गयी जिसके बाद गंगा की ढलान शुरू होती थी।

तुरंत उस पार कूद जाने के बजाय वह अगले कुछ सेकेंड वहीं खड़ी रही। शायद पसोपेश में थी कि दूसरी तरफ़ का संसार न जाने कैसा हो। पर यह पसोपेश, निस्संदेह, उसे बेमानी लगा होगा, क्योंकि दुःस्वप्न जैसे इन दो दिनों से ज़्यादा बुरे दिनों की कल्पना भी नामुमकिन थी।

या शायद उन क्षणों में उसकी निगाह दाहिनी ओर के घाट पर, छात्रावास का डिनर निपटाने के बाद तफ़री करते दो-तीन युवकों की ओर चली गयी हो और एक बार को उसने सोचा हो कि उनसे कोई मदद मिल सकती है या नहीं। पर वे उसे, निस्संदेह, एक नग्न स्त्री-देह की मौजूदगी से अनजान, इसीलिए फि़लहाल निश्क्रिय, दरिंदों की तरह नज़र आये होंगे।

या शायद उन क्षणों में उसने सामने, सीधी ढलान के छोर पर, क्रमशः विरल होते दूधिया घोल-जैसी चांदनी में ऊंघती गंगा मैया को एक बार आंख भर कर देखा हो और यह जानते हुए भी, कि इस बात का कोई मतलब नहीं है, ‘रच्छा’ की ‘बिनती’ की हो।

जो भी हो, उठ कर खड़े होते-होते उन क्षणों में मैंने जो देखा, वह मेरी सांसों और शब्दों पर बहुत भारी पड़ रहा था। उसकी पीठ मेरी तरफ़ थी और दीवार के ऊपर जहां वह खड़ी थी, नीम उजाला उसकी देह के आकार में धवल प्रकाश बन गया था।… उघड़ी हुई पीठ से लेकर कमर के कटाव से नीचे के उन्नतोदर विस्तार तक, लगभग स्तब्ध-अवाक् कर देने वाले सौंदर्य का यह भीषण सामना था।… मैंने उखड़ती हुई सांसों के बीच झोले में रखे कपड़े बाहर निकाल लिये और उन्हें हाथों में थामे एक पूरा वाक्य कह डालने की कोशिश की, लेकिन हकलाहट में कुछ बेमेल शब्द ही निकल पाये।…

या शायद वह भी नहीं… बस, कुछ निरर्थक ध्वनियां।

ऐन जिस वक़्त पीछे से भाग कर आता जितुआ मेरे पास तक पहुंचा, लड़की दूसरी तरफ़ कूद गयी और तीर की तरह दौड़ती हुई, मेरी दुःकल्पना की हदों से भी आगे, ढलान पार कर गंगा में समा गयी। शांत लहरों में एक तेज़ हड़कंप हुआ, जैसे दो-तीन बड़े पत्थर एक के बाद एक फेंके गये हों। पर इतना ही। लहरें फिर शांत हो गयीं। दाहिनी ओर के घाट पर बैठे युवक चैंक कर खड़े हो गये और कौतुक से उधर देखने लगे। उन्हें अपनी बांयीं आंख के कोने से जो कुछ दिखा होगा, वह एक पहेली की तरह लग रहा होगा, जिसे वे समझने की कोशिश कर रहे थे।

मैं अब तक दौड़ कर अहाते की दीवार के पास आ गया था। तभी पीछे से जितुआ ने कॉलर पकड़ कर मुझे पेड़ों की आड़ में खींच लिया।

‘भोंसड़ीवाले, सबके नजर में आने का सौख है का?’ वह ग़ुस्से में था।

‘अउ ई का है?’ मेरे हाथ से कंचन’दी का सलवार-सूट खींचते हुए उसने पूछा।

बात समझते उसे देर नहीं लगी।

‘भोंसड़ी के, हम विलेन बनके माल को लें और तू हीरो बनके? एही सोचे थे?… साला, घोंघा!’

शायद मुझे दुबारा कहना चाहिए–बात समझते उसे देर नहीं लगी।

कपड़े मेरे मुंह पर मारते हुए वह अपने कमरे की ओर बढ़ गया। जाते-जाते कहता गया कि तुरंत दफ़ा हो जाऊं, क्योंकि नीचे जिन लड़कों को कुछ गड़बड़ का अंदेशा हुआ है, वे आते ही होंगे।

घाट की ओर से पहेली को हल करने की हलचल लगातार कानों तक आ रही थी। अलबत्ता पानी की हलचल शांत हो गयी थी। गंगा की छाती पर कोई शोर नहीं था।…

क्या उसने इस डर से हाथ-पैर भी नहीं मारे कि कहीं कोई बचाने न आ जाये और कहीं उसकी निर्वस्त्र देह उसके चैतन्य रहते बाहर न निकाल ली जाये?…या क्या पानी की चादर ओढ़ कर उसे इतना सुकून मिला कि पिछले अड़तालीस घंटों से जगी हुई आंखें गहरी नींद में मुंद गयीं?…

भगवान जाने, उसे तैरना आता भी था या नहीं?…

मैं काठ बना कुछ देर पेड़ों के झुरमुट से गंगा को देखता रहा…

पर मेरे पास ज़्यादा समय नहीं था। मुझे दूसरे रास्ते से भाग कर घाट पर खड़े लड़कों में शामिल होना था ताकि इस घटना का कोई सूत्र मुझ तक पहुंचता न लगे।

तेज-तेज़ चलते हुए मैंने सलवार-कुर्ते की जोड़ी को अंदर डाला… और शायद ख़ुद को भी… साला, घोंघा!

संजीव कुमार

संजीव कुमार

संजीव कुमार। युवा आलोचक और कहानीकार। ‘जैनेन्द्र और अज्ञेयः सृजन का सैद्धांतिक नेपथ्य’ पुस्तक के लिए देवीशंकर अवस्थी सम्मान। दिल्ली विश्विद्यालय के देशबंधु कॉलेज में  प्राध्यापक। इनसे sanjusanjeev67@gmail.com पर संपर्क सम्भव है।

कहानी ‘बनास’ से साभार प्रस्तुत है। 

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