Archive for the tag “संजीव कुमार”

हिन्दू परम्पराओं का राष्ट्रीयकरण: संजीव कुमार

आज तक अपना लिखा हुआ/किया हुआ बताने में ख़ासा संकोच होता रहा. अब सोचता हूँ, बता ही दिया करूं…. साथी बली सिंह की एक कविता है ना–अपनी चर्चा, अपनी तारीफ़ खुद ही करो, और कौन करेगा?…. तो साहिबान, अब छप के आ गयी है वसुधा डालमिया की वो किताब जिसका हम (मैं और योगेन्द्र दत्त) ने अनुवाद किया है. मुश्किल किताब थी. अंदाजा इससे लगाइए कि हमें मिलने से पहले 500 पृष्ठों का एक पूरा अनुवाद, मूल्य चुका कर, डस्टबिन में फेंका जा चुका था.वसुधा जी ने न तो अनुवादक का नाम बताया, न वह अनुवाद दिखाया. बस, ये जानकारी दी कि किताब का कोई वाक्य ही उसके पल्ले नहीं पडा था, यह अनुवादक ने खुद स्वीकार कर लिया था. बहरहाल, हम वह अनुवाद भले न देख पाए हों, अनुवादक का नाम अन्य स्रोतों से ऊपर करने में ज़रूर कामयाब रहे. कभी भंग की तरंग में रहे तो खोल देंगे, और क्या! ….

इपंले की लिखी “अनुवादक की भूमिका” एक छोटी-मोटी समीक्षा की तरह ही है#लेखक 13584646_1005030236280453_1234566605917380552_o

By संजीव कुमार

‘हिन्दू परम्पराओं का राष्ट्रीयकरण: भारतेंदु हरिश्चंद्र और उन्नीसवीं सदी का बनारस’ / अनुवादक की भूमिका

यह किताब हिंदी में कई साल पहले आ जानी चाहिए थी। अंग्रेज़ी में इसे छपे उन्नीस साल हो गए। इस बीच हमारे यहां भारतेंदु युग पर विचारोत्तेजक बहसें न हुई हों, ऐसा नहीं है, पर उनमें इस पुस्तक द्वारा मुहैया कराई गई विपुल सामग्री और अंतर्दृष्टि का शायद ही कोई इस्तेमाल हुआ है। छिटपुट नामोल्लेख की बात अलग है। ऐसा एक उल्लेख मेरी भी स्मृति में है जहां विद्वान आलोचक ने इस किताब की किसी स्थापना पर बात नहीं की, बस इसके मुखपृष्ठ पर छपी तस्वीर (पहला पेपरबैक संस्करण, ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस) का ज़िक्र किया, यह बताने के लिए इन दिनों आलोचना में भारतेंदु को बदनाम करने की प्रवृत्ति कैसे बढ़ी है: ‘‘एक ही [आशय है, इसी] प्रवृत्ति के तहत वसुधा डालमिया भारतेंदु हरिश्चंद्र पर केंद्रित अपनी पुस्तक के कवर पर उनको एक बंगाली प्रेमिका को गोद में लेकर बैठा दिखाती हैं।’’ (शंभुनाथ, ‘नवजागरण का पुनर्पाठ’. शंभुनाथ संपा. भारतेंदु और भारतीय नवजागरण, पृ. 192. 2009, दिल्ली: प्रकाशन संस्थान) इससे और कुछ साबित हो या न हो, यह ज़रूर साबित होता है कि विद्वान आलोचक ने कवर से आगे बढ़ने/पढ़ने की ज़हमत नहीं उठाई थी।

अगर हिंदी में यह किताब आज से दसेक साल पहले आ गई होती तो क्या भारतेंदु युग और हिंदी नवजागरण की बहसों में, ख़ास तौर से रामविलास शर्मा की जन्मशती के मौक़े पर, इसका उल्लेख अनिवार्यतः होता? कहना मुश्किल है। इसलिए कि, पीछे उद्धृत विद्वान आलोचक के अनुमान/विश्वास के विपरीत, यह पुस्तक जितनी समृद्ध है, उतनी सनसनीख़ेज़ नहीं, जितनी अंतर्दृष्टिपूर्ण है, उतनी खंडनमंडनात्मक नहीं। मूल्य-निर्णय की जल्दबाज़ी से कोसों दूर यहां विश्लेषण का धैर्य और ठहराव, अतीत की उपलब्ध सामग्री के अधिक अर्थपूर्ण पुनर्विन्यास का यत्न, और इतिहास से सही उत्तर पा सकने के लिए उसके सामने सही सवाल पेश करने की सजगता है। जहां सनसनी नदारद हो, खंडन या मंडन में दिलचस्पी कम हो और मूल्य-निर्णय की आतुरता न हो, ऐसी किताबें हिंदी के वाद-विवाद-संवाद को अधिक आकर्षित नहीं कर पातीं। इसीलिए भरोसे के साथ नहीं कहा जा सकता कि यह पहले भी आ गई होती तो इसने हमारी बहसों को प्रभावित किया होता या आगे प्रभावित कर पाएगी। अलबत्ता, यह बात पूरे भरोसे के साथ कह सकता हूं कि यहां ऐसी जानकारियां और स्थापनाएं हैं जिनसे सूचित-विदित होना, यहां तक कि उत्तेजित-उद्वेलित होना भी, हमारी बहसों के लिए लाभप्रद होगा। ऐसा कहते हुए मुझे अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में हुई एक राष्ट्रीय संगोष्ठी याद आ रही है जिसमें मुझे अपने सत्र के सदर साहब से इस बात पर झाड़ खानी पड़ी थी कि मैं भारतेंदु के साहित्यकार-पत्रकार होने के साथ-साथ एक धार्मिक नेता होने जैसा ‘स्वीपिंग रिमार्क’ कैसे दे सकता हूं! सदर की बातों का जवाब देने की कोई परंपरा नहीं है, पर मुझे थोड़े अशालीन तरीक़े से इस परंपरा को तोड़ना पड़ा था और उन्हें सलाह देनी पड़ी थी कि वे अपनी जानकारी किन स्रोतों से दुरुस्त कर सकते हैं।

भारतेंदु एक धार्मिक नेता भी थे, इस बात का संज्ञान लेने से भारतेंदु का क़द घट नहीं जाता और न ही इसकी अनदेखी करने से उनका क़द बढ़ जाता है। तथ्यों के प्रति अपने को खुला रखना और उनके सहसंबंधों के बीच से किसी दौर के गतिशास्त्र को समझने की कोशिश करना इतिहासकार का काम है, न कि व्यक्तियों की क़द-काठी के बारे में आसानी से समझ में आनेवाले फ़ैसले सुनाना। यह बात हिंदी के साहित्यिक-सांस्कृतिक इतिहास-लेखन से संस्कारित मुझ जैसे पाठक को वसुधा डालमिया की किताब पढ़ते हुए ही निर्णायक रूप से समझ में आई। भारतेंदु के समकालीनों से लेकर आज के विद्वानों तक की स्थापनाओं का जायज़ा लेने के बाद उनकी सुचिंतित राय है कि

‘‘भारतेंदु और उनके कामों का आलोचनात्मक मूल्यांकन एक छोर से दूसरे छोर की ओर जाता रहा है – उन पर पुनरुत्थानवादी होने का आरोप लगाने से लेकर उन्हें आधुनिकता के पुरोधा के रूप में सराहने तक, राजभक्त बताने से लेकर आमूल-परिवर्तनवादी बताने तक; हालांकि रामविलास शर्मा के बाद से आधुनिकता के अग्रदूत की भूमिका में उन्हें स्थिर करने की ओर एक निश्चित झुकाव रहा है। यह भूमिका साहित्यिक उत्पादन में भी देखी गयी है और उस राजनीतिक हैसियत में भी जो उन्हें प्राप्त थी। उनके काम के पारंपरिक पहलुओं पर विचार करने का कोई ढांचा प्रकटतः उपलब्ध नहीं है, सिवाय उस ढांचे के जो ‘पुनरुत्थानवादी’ के नकारात्मक अभिप्राय वाले ‘टैग’ ने मुहैया कराया है।’’

इसी चिंता के तहत यह किताब एक ऐसे ढांचे की प्रस्तावना करती है जो भारतेंदु के पारंपरिक और परिवर्तनोन्मुख पहलुओं की एक साथ सुसंगत रूप में व्याख्या कर सके। इस ढांचे में भारतेंदु हिंदुस्तान के उस उदीयमान मध्यवर्ग के एक नेतृत्वकारी प्रतिनिधि के रूप में सामने आते हैं जो पहले से मौजूद दो मुहावरों के साथ अंतरक्रिया करते हुए एक तीसरे आधुनिकतावादी मुहावरे को गढ़ रहा था। ये तीन मुहावरे क्या थे, इनकी अंतरक्रियाओं की क्या पेचीदगियां थीं, सांप्रदायिकता और राष्ट्रवाद के सहविकास में आरंभिक सांप्रदायिकता और आरंभिक राष्ट्रवाद को चिह्नित करनेवाला यह तीसरा मुहावरा किस तरह समावेशन-अपवर्जन की दोहरी प्रक्रिया के बीच हिंदी भाषा और साहित्य को हिंदुओं की भाषा और साहित्य के रूप में रच रहा था और इस तरह समेकित रूप से राष्ट्रीय भाषा, साहित्य तथा धर्म की गढ़ंत का ऐतिहासिक किरदार निभा रहा था, किस तरह नई हिंदू संस्कृति के निर्माण में एक-दूसरे के साथ जुड़ती-भिड़ती तमाम शक्तियों के आपसी संबंधों को भारतेंदु के विलक्षण व्यक्तित्व और कृतित्व में सबसे मुखर अभिव्यक्ति मिल रही थी – यह किताब इन अंतस्संबंधित पहलुओं का एक समग्र आकलन है। यह आकलन हिंदू पहचान के सृदृढ़ीकरण और हिंदू परंपराओं के राष्ट्रीयकरण की जिस प्रक्रिया को चिह्नित करता है, उसे एक साथ मुक्तिकामी भी मानता है और दमनकारी भी। मुक्तिकामी इस अर्थ में कि इसने

“सामाजिक व राजनीतिक मुद्दों की व्यापक राजनीतिक मुखरता के लिए, इन्हें अभिव्यक्त करने में सक्षम लचीली भाषा के विकास के लिए और एक समृद्ध साहित्य के लिए दमनकारी और सर्वव्यापी राजनीतिक सत्ता के विरुद्ध एक देशी सांस्कृतिक व राजनीतिक पहचान की अभिव्यक्ति का रास्ता खोला। यह प्राधिकार में परिवर्तन का द्योतक था जो अब न केवल राजाओं और ब्राह्मणों में बल्कि नवमध्यवर्ग में भी स्थित था।“

और दमनकारी इस अर्थ में कि समावेशी होने के साथ-साथ यह

“अपवर्जी भी था, इसने न केवल मुसलमानों को बेदखल किया बल्कि हिंदू सामाजिक व्यवस्था की कगारों पर बैठे समुदायों को भी बेदखल किया। यहां विभाजक रेखाओं को जान-बूझकर धुंधला छोड़ दिया गया था। फिर भी, अपने तमाम धुंधलेपन के बावजूद ये रेखाएं भेदभावमूलक अंतर की तीव्र सजगता को सामने ला रही थीं।“

कहने की ज़रूरत नहीं कि यहां बल एकतरफ़ा फ़ैसले सुनाने के बजाय चीज़ों के ऐतिहासिक प्रकार्य और गतिशास्त्र को समझने पर है। ध्वस्त करने या महिमामंडित करने की जल्दबाज़ी वसुधा डालमिया के लेखन का स्वभाव नहीं है, मामला भारतेंदु का हो या भारतेंदु पर विचार करनेवाले विद्वानों का। यहां मैं ख़ास तौर से रामविलास शर्मा से संबंधित दो टिप्पणियों को उद्धृत करने का लोभ संवरण नहीं कर पा रहा, जिनमें देखा जा सकता है कि शक्तियों और सीमाओं को रेखांकित करते हुए किस तरह की निरावेग तार्किकता का निर्वाह किया गया हैः

“रामविलास शर्मा के अध्ययनों ([1942]1975, [1953]1984) में कवि के परंपरावादी आकलनों से और अधिक आमूल क़िस्म का प्रस्थान दिखलाई पड़ा। शर्मा पहले व्यक्ति थे जिन्होंने भारतेंदु और उनके समकालीनों की सरल, बोलचाल वाली और जीवंत गद्य शैली की सराहना की, जिसे रामविलास शर्मा स्वयं अपने समकालीनों द्वारा प्रयुक्त होता हुआ देखना चाहते थे; ऐसे समकालीन, जो बाद के भारी-भरकम, अधिक संस्कृतनिष्ठ, और बोलचाल के मुहावरे से अपना संपर्क गंवा चुके गद्य के शिकार हो गये थे। उन्होंने इस भाषा को भारतेंदु के पत्रकारीय कार्य के जनवादी पक्ष के बतौर देखा। उन्होंने पत्रिकाओं को विस्मृति के गर्त से निकालने की ज़रूरत पर बल दिया और अपनी पहली क़िताब के निबंधों में उन लेखों, संपादकीयों तथा टिप्पणियों से बहुतेरे उद्धरण दिये जिन्हें भारतेंदु की गं्रथावलियों में जगह नहीं मिल पायी थी। विवेचित सामग्री के अधिक विस्तृत दायरे ने लेखक और उसके समय के बारे में एक अलग दृष्टि को उभरने का मौक़ा दिया। शर्मा इस तथ्य को रेखांकित करने वाले पहले व्यक्ति थे कि भारतेंदु के संबोध्य पुराने दौर के अभिजन नहीं रह गये थे, क्योंकि पत्रिकाओं में जिन मुद्दों पर चर्चा की गयी थी वे व्यापक जनता के साथ सरोकार रखने वाले मुद्दे थे। भारतेंदु के राजनीतिक रैडिकलिज़्म की सराहना करने वाले पहले व्यक्ति भी शर्मा ही थे।“
॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰
“बलिया व्याख्यान का रामविलास जी द्वारा किया गया विश्लेषण उनके अपने विचार-लोक तक पहुंचने का साधन मुहैया कराता है। वे भारतेंदु के राजनीतिक विचारों की परिपक्वता पर बल देते हैं और उन्हें अपने समय से काफ़ी आगे का मानते हैं। इस रूप में उनके राष्ट्रवाद की पेशबंदी करते हुए शर्मा इस तथ्य की अहमियत को दरकिनार कर देते हैं कि वह राष्ट्रवाद अभी भी बिल्कुल बनती हुई स्थिति में था, कि कई मुद्दे सुलझाये जाने की प्रक्रिया में ही थे। इसके अलावा, अपने पठन के प्रबल राष्ट्रवादी अभिप्रायों का निर्वाह करते हुए, वे व्याख्यान में हिंदू-मुस्लिम एकता की अपील और ‘हिंदू’ को अधिक समावेशी तरीके से इस्तेमाल करने के निवेदन पर ही ग़ौर फ़रमाते हैं। इस तरह वे तेज़ी से अलग होते दो समुदायों के बीच के उन तनावों और वैर-भाव की अनदेखी करते हैं जो उस व्याख्यान में भी दस्तावेज़ीकृत हैं। उस दौर को हिंदू पुनरुत्थानवाद का दौर बताये जाने की कोशिशों को अगर रामविलास शर्मा असंगत बता कर ख़ारिज करते हैं, तो साथ में धार्मिक मुद्दों को भी दरकिनार कर देते हैं और इस तरह भारतेंदु के काम का यह ख़ासा विचारणीय पहलू हाशिये पर चला जाता है।“

पहला अंश जितनी सारगर्भित प्रशंसा का उदाहरण है, दूसरा उतनी ही सारगर्भित आलोचना का, और ग़ौर करने की बात है कि दोनों जगहों पर शैली एक-सी है – सीधी बात कहनेवाली तार्किक शैली, जिसमें कोई भावनात्मक अतिरेक नहीं है।
कुल मिलाकर, इस किताब का हिंदी में आना एकाधिक कारणों से ज़रूरी था। नई सूचनाओं और स्थापनाओं के लिए तो इसे पढ़ा ही जाना चाहिए, साथ ही, हर तथ्य को साक्ष्य से पुष्ट करनेवाली शोध-प्रविधि, हर कोण से सवाल उठानेवाली विश्लेषण-विधि और खंडन-मंडन के जेहादी जोश से रहित निर्णय-पद्धति के नमूने के रूप में भी यह पठनीय है।

अनुवाद के लिहाज से यह किताब, निस्संदेह, बहुत चुनौतीपूर्ण थी। अवधारणात्मक जटिलताओं और लंबी तथा गझिन वाक्य-रचना को हिंदी में लाने में अनुवादक-द्वय के पसीने छूट गये। इसके बावजूद मूल के साथ कितना न्याय हो पाया है, कहना कठिन है। हर बार इस अनुवाद को पढ़ते हुए कुछ-न-कुछ बदल डालने की ज़रूरत महसूस होती है… पर एक असंतुष्ट-सा ही सही, पूर्णविराम लगाना इसके प्रेस में जाने के लिए तो ज़रूरी है! हां, पूर्णविराम लगाते हुए वसुधा डालमिया की एक शैली विशेष को लेकर पाठकों को सचेत करना ज़रूरी है। कई जगह जब वे किसी किताब/लेख/भाषण में आई हुई बातों का सार-संक्षेप प्रस्तुत कर होती हैं तो वाक्य-रचना कुछ इस तरह की होती है कि वह बात स्वयं लेखिका की अपनी बात प्रतीत होने लगती है। ऐसा भ्रम अंग्रेज़ी में पढ़ते हुए नहीं होता, पर हिंदी में उल्था करने पर होता है। मिसाल के लिए, जहां वे भारतेंदु के बलिया भाषण की अंतर्वस्तु के बारे में बताती हैं, वहां आए हुए इन वाक्यों को देखें:

“अंग्रेज़ों की कृपा से और सामान्यतः संसार की उन्नति के चलते कितना सारा तकनीकी ज्ञान सुलभ हो गया था। बावजूद इसके देश की जनता, जिसने पुराने ज़माने में अपने आदिम औज़ारों के साथ आश्चर्यजनक खोजें की थीं, अब चुंगी की कतवार फेंकने की गाड़ी से ज़्यादा कुछ न थी। मौजूदा दौर में उन्नति के लिए एक घुड़दौड़ चल रही थी, और जापानियों को छोड़ भी दें तो अमेरिकी, अंग्रेज़ तथा फ्रांसीसी इस घुड़दौड़ में आगे रहने का पूरा जुगाड़ लगाये हुए थे। यह ऐसा समय नहीं था जब पीछे छूटना किसी भी तरह गवारा हो।… यह शिकायत कि ख़ाली पेट इन चीज़ों के बारे मेें कैसे सोचें, अंततः क़ायल करने वाली न थी।“

ऐसे अंश बहुतेरे हैं। इन्हें पढ़ते हुए सावधान रहना पड़ेगा कि लेखिका अपनी बात नहीं कह रहीं, वे किसी और को, बिना उद्धरण-चिह्नों के, अपने शब्दों में उद्धृत कर रही हैं। यह सावधानी न बरती गई तो संभव है, लेखिका को ऐसी अनेक बातों का आरोप झेलना पड़े जो उनकी नहीं हैं और जो हिंदी की प्रकृति तथा अनुवाद की विकृति के कारण उनकी प्रतीत होती हैं।

SANJIV KUMAR

संजीव कुमार

संजीव कुमार। युवा आलोचक और कहानीकार। ‘जैनेन्द्र और अज्ञेयः सृजन का सैद्धांतिक नेपथ्य’ पुस्तक के लिए देवीशंकर अवस्थी सम्मान। दिल्ली विश्विद्यालय के देशबंधु कॉलेज में  प्राध्यापक। इनसे sanjusanjeev67@gmail.com पर संपर्क सम्भव है।

दंगा भेजियो मौला! उर्फ़ भारतीय मुसलमानों की नियति: संजीव कुमार

कोई तो वजह रही होगी कि अनिल यादव के संकलन ‘नगरवधुएं अख़बार नहीं पढ़तीं’ (2011, अंतिका प्रकाशन, ग़ाजि़याबाद) से पहली बार गुज़रते हुए ‘दंगा भेजियो मौला!’ कहानी पढ़ने से रह गयी! जहां तक याद आता है, कहानी का पहला पृष्ठ पढ़ने के बाद उसे छोड़ दिया था। संभव है, ‘लोककवि का बिरहा’ और ‘नगरवधुएं अख़बार नहीं पढ़तीं’ जैसी चर्चित कहानियों ने, जिनका नाम पहले से सुना हुआ था, पूरा ध्यान अपनी ओर खींच लिया हो और इपंले (इन पंक्तियों के लेखक) को आश्वस्त कर दिया हो कि जब हमें पढ़ ही लिया तो और क्या रक्खा है?

लेकिन यही कुल वजह नहीं रही होगी। पहला पृष्ठ पढ़ने के बाद कहानी छोड़ी गयी, इससे लगता है कि मुख्य कारण कहीं और है। पाठक-पंछी आया तो… पर फंसा नहीं! वह पास आता ही नहीं तो बात और थी। इससे क्या यह निष्कर्ष नहीं निकलता कि दाने बिखेरने और जाल बिछाने में कहानीकार की ओर से कहीं चूक रह गयी?… जी हां, बहुत घटिया रूपक है।[1] पर आप भी समझते हैं, यहां आशय बस इतना है कि कहानी अगर अपनी शुरुआत से ही पाठक को बांध नहीं लेती तो यह कहानीकार के सामर्थ्य की न्यूनता का प्रमाण है! वह कहानी ही क्या जो पढ़ते चले जाने को बाध्य न कर दे!..

यक़ीन मानिए, कुछ समय पहले तक इपंले ऐसा ही मानता था, पर ‘दंगा भेजियो मौला!’ जैसी कहानियों ने बताया कि ऐसा मानने में कितनी समस्याएं हैं। इपंले जब पाठक को पंछी और पाठ की शुरुआत को दाना बताता है तो वह इस हक़ीक़त पर पर्दा डाल देता है कि पाठकीय योग्यता भी अलग-अलग तरह की होती है। जब वह कहता है कि ‘अपनी शुरुआत से ही जो पाठक को बांध न ले…’ वगैरह, तो वह निहित रूप में स्वयं को एक आदर्श पाठक बता रहा होता है, जिसकी कसौटी पर कहानी की सम्मोहन-क्षमता को कस कर उसके बारे में वस्तुनिष्ठता का दावा करनेवाला एक फ़ैसला सुनाया जा सकता है। जबकि सचाई यह है कि वह ख़ास तरह की शक्तियों और सीमाओं से युक्त पाठक है और कहानी के साथ न बंध पाना, उसे छोड़ कर आगे बढ़ जाना, हो सकता है, कहानी की नहीं, बतौर पाठक खुद उसकी सीमाओं का निदर्शन हो। शब्द जिन भावों/अनुभवों/स्मृतियों को कुरेदना चाहते हैं, हो सकता है, वे इस ‘ख़ास’ पाठक के भीतर नगण्य वा नदारद हों। फिर कुरेदने की कला कितनी भी समर्थ हो, इस पाठक के पक्ष में उससे निकलेगा क्या? इस तरह जो अयोग्यता पाठक की है, उसे उलट कर कहानी और कहानीकार की अयोग्यता बता दिया जाता है। इसे कहते हैं, नाच न जाने, आंगन टेढ़ा! #लेखक

Snapshot from Goodnight Mommy (2015)

Snapshot from Goodnight Mommy (2015)

 

दंगे में आएंगे

By संजीव कुमार

‘दंगा भेजियो मौला!’ कहानी एक दृश्य से शुरू होती है। यह ऐसा दृश्य है जिसकी अपने मन के पटल पर पुनर्रचना कर पाना सीमित अनुभव वाले इपंले सरीखे एक मध्यवर्गीय के लिए थोड़ा मुश्किल है। सिनेमा तो है नहीं कि दृश्य बना-बनाया मिल जाए! कहानी के पाठक को शब्दों से निकाल कर दृश्य की पुनर्रचना करनी होती है और इस काम में उसके अपने अनुभव और स्मृतियों का योगदान होता है। इसीलिए बहुत चित्रात्मक और बिंबधर्मी वर्णन-विवरण भी अलग-अलग पाठक के मन में अलग-अलग बिंब निर्मित करते हैं। साहित्यिक कृतियों के फि़ल्मांतरण के खि़लाफ़ यह एक मज़बूत तर्क रहा है कि इससे अनंत संभावनाओं का निशेध होकर कृति एक निश्चित दृश्यावली में रूढ़/फि़क्स हो जाती है। इस तर्क से बहस हो सकती है, पर वह अभी छेड़नी नहीं है। कहना बस इतना है कि जब हम कहानी के दृश्य की बात करते हैं तो वहां पाठक भी सक्रिय भूमिका में होता है – उसके मन में दृश्य का उभरना जितना शब्दों को बरतने के कहानीकार के कौशल पर निर्भर करता है, उतना ही उसके अपने अनुभव-स्मृतियों की थाती तथा उसी से जुड़ी, शब्दों को दृश्यांतरित करने की योग्यता पर भी।

लगता है, पहली बार ‘दंगा भेजियो मौला!’ पढ़ते हुए इसी थाती और योग्यता पर मामला अटक गया था। इपंले दृश्य को अपने अंदर क़ायदे से रच नहीं पाया, इसीलिए तल्लीनता बनी नहीं और कहानी छूट गयी।

तो ऐसा क्या है इस दृश्य में?

असल में, वह जो भी है, सिर्फ़ इस दृश्य में नहीं, पूरी कहानी में है। ऐसी नारकीय स्थिति और देश तथा समाज के घूरे पर फेंक दिये जाने की नियति, जिसकी कल्पना भी सीमित मध्यवर्गीय अनुभव वाले व्यक्ति के लिए कठिन है। अभी, इस कहानी को पूरा पढ़ चुके होने के बाद भी, मैं उस मुहल्ले की एक आधी-अधूरी तस्वीर ही अपने मन में बना पाता हूं जो पूरे शहर के बरसाती पानी और सीवर लाइनों के उफन कर उल्टी दिशा में बहने से निकले मल-मूत्र की झील बना हुआ है और लंबे समय आधी-आधी मंजि़ल तक इस पानी में डूबे रहनेवाले मकान अक्सर ईंटों के बीच की मिट्टी के गल जाने से भहरा कर गिर पड़ते हैं और उनकी छतों पर खेलते बच्चों की लाशें थोड़ी देर बाद फूल कर उस बजबजाती झील की सतह पर उतरा जाती हैं। मेरे कोश में ऐसे स्मृति-चित्र ही बहुत कम हैं जिन्हें कहानीकार के शब्द कुरेद सकें और जिनकी मदद से मैं ‘अनायास’ अपने अन्दर इस दृश्य को रच सकूं। नहीं हैं, ऐसा तो नहीं कहा जा सकता, पर निस्संदेह कम और कमज़ोर हैं। इसीलिए शब्दों को अपने भीतर दृश्यांतरित करना नामुमकिन नहीं, पर मुश्किल है। मुश्किल से हर पाठक भागता है। सो इपंले भी पहली बार भाग खड़ा हुआ।

पर अच्छी रचना की यह विषेशता होती है कि अगर आप उसके साथ थोड़ी मुश्किल उठाने को तैयार हो जाएं तो वह आपको देश-दुनिया, समाज और राजनीति, मन और भावलोक के किसी ऐसे अज्ञात-अल्पज्ञात हिस्से में ले जाती है जहां से आप अधिक अनुभवी, अधिक परिपक्व होकर लौटते हैं। पाठानुभव जीवनानुभव की कमी को पूरा करने लगता है। ‘दंगा भेजियो मौला!’ ऐसी ही रचना है।

कहानी आपको मुसलमान बुनकरों के एक मुहल्ले में ले जाती है जो नदी के किनारे शहर के निचले हिस्से में बसा है – एक ‘लो लैंड’ जो हर साल महीने-डेढ़ महीने के लिए शहर भर के बरसाती पानी और सीवर से निकले गू-मूत की सड़ती झील में तब्दील हो जाता है और उसके हटने के बाद हैजा, डायरिया जैसी बीमारियां हमला कर देती हैं। हर साल कई महीने इन मुसीबतों से लड़ने के बाद ही वहां सामान्य जि़ंदगी बहाल हो पाती है। महान भारतीय राष्ट्र-राज्य के भीतर एक पराये राष्ट्र की तरह बरता जानेवाला यह मुहल्ला, मोमिनपुरा, अपनी बदहाली के लिए सिर्फ़ घृणा, उपेक्षा और उपहास का विषय है। राज्यतंत्र भी उसकी बदहाली को कम करने के लिए आगे नहीं आता, अलबत्ता बढ़ाने के लिए आता है। ‘हाथ में जल लेकर गंगा-जमुनी तहज़ीब का हवाला देने के दिन कब के लद चुके’ हैं। मोमिनपुरा के बाशिंदे दंगापीडि़त नहीं हैं, पर उनके साथ जो हो रहा है, वह किसी दंगे से कम नहीं:

दंगा तो हो ही रहा है।… सरकार ने अफ़सरों को इधर आने से मना कर दिया है। डॉक्टरों ने इलाज से मुंह फेर लिया है। जो पंप यहां लगने चाहिए, उन्हें नदी में लगाकर पानी इधर फेंका जा रहा है। करघे सड़ चुके हैं, घर ढह रहे हैं, बच्चे चूहों की तरह डूब कर मर रहे हैं। सबको इसी तरह बिना एक भी गोली-छुरा चलाए मार डाला जाएगा। जो बेघर-बेरोज़गार बचेंगे, वे बीमार होकर लाईलाज मरेंगे।’

यों तो मोमिनपुरा का हर साल यही हाल होता है, पर इस साल यह सड़ती झील हटने का नाम नहीं ले रही। पाकिस्तान और डल झील जैसे नामों से नवाज़े जानेवाले इस इलाक़े में ‘म्यूनिसिपैलिटी ने इस साल पानी निकासी के लिए एक भी पंप नहीं लगाया। अफ़सरों ने लिख कर दे दिया, सारे पंप ख़राब हैं, मरम्मत के लिए पैसा नहीं है, सरकार पैसा भेजेगी तो पानी निकाला जाएगा। लोक निर्माण विभाग ने घोषित कर दिया कि हाईवे की पुलिया से हर साल की तरह अगर पानी की निकासी की गई तो जर्जर सड़क टूट सकती है और शहर का संपर्क बाक़ी जगहों से कट सकता है। आपदा राहत विभाग ने ऐलान कर दिया कि यह बाढ़ नहीं, मामूली जलभराव है, इसलिए कुछ करने का प्रश्न ही नहीं पैदा होता।… अस्पतालों ने मोमिनपुरा के मरीजों की भर्ती करने से मना कर दिया कि जगह नहीं है और संक्रमण से पूरे शहर में महामारी का ख़तरा है। पावरलूम की मशीनें और मकानों का मलबा ख़रीदने के लिए कबाड़ी फेरे लगाने लगे। पानी में डूबे मकानों का तय-तोड़ होने लगा। रियल इस्टेट के दलाल समझा रहे थे कि हर साल तबाही लाने वाली ज़मीन से मुसलमान औने-पौने में जितनी जल्दी पिंड छुड़ा लें उतना अच्छा।…

यही है वह मुसलसल, बिना असलहे और बिना शोर-शराबे के चलता दंगा जो शासन-प्रशासन से लेकर शहर की जनता तक एक महामारी की शक्ल में फैले सांप्रदायिक मिज़ाज की अभिव्यक्ति है। अपने मुहल्ले की बदहाली को कम करने की जद्दोजहद में लगे मोमिनपुरा की क्रिकेट टीम के लड़के जब अपनी हर तरह की कोशिश से बेज़ार हो जाते हैं, तब यह ज़हरबुझा सच उनकी रगों में दौड़ जाता है कि न सिर्फ़ एक दंगा लगातार जारी है, बल्कि वह आमने-सामने वाले दंगे से ज़्यादा क्रूर और ख़तरनाक है, क्योंकि आमने-सामने की मारकाट वाले दंगे में कम-से-कम शासन-प्रशासन को इधर का रुख करना पड़ता है। दंगा इस बदहाली से बेहतर इस मायने में ठहरता है कि तब हाकिमों की ओर से, नेताओं और सामाजिक कार्यकर्ताओं की ओर से थोड़ी मदद मिल जाती है। थके-हारे, हताश और मायूस ये ग्यारह खिलाड़ी एक जुमे को फ़जर की नमाज़ के वक़्त सिज़दा कर एक ही दुआ मांगते हैं: ‘दंगा भेजियो मोरे मौला, वरना हम सब इस नर्क में सड़ कर मर जाएंगे। गू-मूत में लिथड़ कर मरने की जि़ल्लत से बेहतर है कि ख़ून में डूब कर मरें।’ और ‘दो दिन बाद मोमिनपुरा में भरते पानी के दबाव से हाई-वे की पुलिया टूट गई। काली झील कई जगहों से सड़क तोड़ कर उफनाती हुई पास के मोहल्लों और गांवों के खेतों में बह चली। घंटे-घडि़याल-शंखों का समवेत शोर बर्दाश्त के बाहर हो गया।… प्रभातफेरी करनेवालों की अगुवाई में शहर और गांवों से निकले जत्थे मोमिनपुरा पर चढ़ दौड़े। सीवर के बजबजाते पानी में हिंदू और मुसलमान गुत्थमगुत्था हो गये। अल्लाह ने हताश लड़कों की दुआ कबूल कर ली थी।’

इतना विचलित कर देनेवाली और इतने बड़े फलक पर अपनी रौशनी फेंकनेवाली कहानियां पिछले सालों में गिनती की लिखी गई होंगी। भारत के उदारीकरण के साथ-साथ राज्य की मशीनरी से लेकर जनता के एक बड़े हिस्से तक का जो सांप्रदायीकरण हुआ है, या कहें कि इन सभी ठिकानों पर दबे पड़े बहुसंख्यावादी सांप्रदायिक विष-बीज को जिस तरह पनपने, फूलने-फलने का मौक़ा मिला है- जिसके आलोक में ही नरेंद्र मोदी और भाजपा के उभार जैसी परिघटना की व्याख्या हो सकती है – उसकी यह प्रतिनिधि कहानी है। प्रभात पटनायक इसे आज़ादी की लड़ाई से विरासत में मिले साम्राज्यवादविरोधी समावेशी राष्ट्रवाद से बूर्जुआ राष्ट्रवाद की ओर संक्रमण का नतीजा मानते हैं जो कि नवउदारवादी दौर की लाक्षणिक विषेशता है (देखें, ‘विश्वीकरण का दौर और राष्ट्रवाद की दो अवधारणाएं’, लोकलहर, 15-21 जून 2015)। उनके अनुसार, राष्ट्रवाद के इन दो रूपों में अंतर करना इसलिए ज़रूरी है कि इसके बग़ैर हम एक युगांतकारी संक्रमण को समझ नहीं सकते। पहले वाले के लिए मुक्ति की धारणा अहम थी और वह तीसरी दुनिया के अन्य मुक्ति आंदोलनों के साथ एकजुटता पर बल देता था, जबकि दूसरा वाला देश की अंतरराष्ट्रीय ताक़त और औक़ात को बढ़ाने पर बल देता है। पहला वाला जनता को ग़रीबी, भूख, कंगाली से उबारने का लक्ष्य निर्धारित करता था, जबकि दूसरा वाला जीडीपी की देवमूर्ति बनाकर उसे पूजता है और उसके लिए किसानों को बेदख़ल करना, मज़दूरों के अधिकारों में कटौती करना, ग़रीबों के कल्याण की योजनाओं को ख़त्म करना – ऐसी किसी भी चीज़ को जायज़ ठहराता है। लेकिन नवउदारवादी प्रतिज्ञाओं पर खरा उतरनेवाला, राष्ट्रवाद के पहले से दूसरे रूप की ओर यह संक्रमण, जैसा कि प्रभात पटनायक लिखते हैं-

आसान नहीं था। इसलिए भारत जैसे देश में पूंजीवादी राष्ट्रवाद के अपने संपूर्ण रूप में उभरने की एक ज़रूरी शर्त यह है कि वह कोई अतिरिक्त सहारा पकड़ ले। सांप्रदायिक फ़ासीवाद उसका ऐसा ही सहारा है। एक ऐसे समाज में जिसने साम्राज्यवादविरोधी राष्ट्रवाद की मज़बूत उपस्थिति को देखा हो, यूरोपीय ढंग का उत्तर-वेस्टफेलियाई राष्ट्रवाद गढ़ा जाए, इसके लिए एक ख़ास ‘प्रतिक्रांति’ की ज़रूरत होती है, जिसे सबसे अच्छी तरह से ऐसी ताक़तें ही ला सकती हैं जो शुरू से ही साम्राज्यवादविरोधी राष्ट्रवाद के खि़लाफ़ रही हों यानी ‘सांप्रदायिकता’ की, ‘सांप्रदायिक फ़ासीवाद’ की ताक़तें। इसलिए साम्राज्यवादविरोधी राष्ट्रवाद की राख पर बूर्जआ राष्ट्रवाद के फलने-फूलने के लिए विडंबनापूर्ण तरीक़े से सांप्रदायिक फ़ासीवादी ताक़तों का हस्तक्षेप ज़रूरी है। यही भारत में हो रहा है।

यह लेख इसी साल के जून महीने का है और यह मूलतः केंद्र में एक सांप्रदायिक फ़ासीवादी सरकार के आने की व्याख्या करता है, पर यह स्पष्ट है कि यहां जिस प्रक्रिया की बात की गयी है, उसका आग़ाज़ इस मुल्क में उदारीकरण की शुरुआत के साथ हुआ था। 2003 में छपी ‘दंगा भेजियो मौला!’ इसी प्रक्रिया की एक विचलित कर देनेवाली सामाजिक अभिव्यक्ति का चित्र है। मोमिनपुरा स्वर्ग तो कभी न था, पर अब उसे मुकम्मल नर्क बनाने और बनाये रखने में जैसे सारी ताक़तें लगी हुई हैं। बहुसंख्यक सांप्रदायिकता बेहद मुखर और कारगर हो चली है। कहानी इसके कई-कई ब्यौरे देती है, जिनकी विषेशता है कि वे चीज़ों को एक स्थिति के रूप में नहीं, एक घटना-विकास के रूप में, बनते-बढ़ते रुझान के रूप में पेश करते हैं, और उनका निचोड़ इस मार्मिक वाक्य में सिमट जाता हैः

आचमन करने और हाथ में जल लेकर गंगा-जमुनी तहज़ीब का हवाला देने के दिन कब के लद चुके थे। यह शहर अब इस पानी और बस्ती दोनों से छुटकारा पाना चाहता था।

कहानी को पढ़ कर ख़त्म करते हुए आप महसूस करते हैं कि आपने किसी एक शहर के मुसलमानों की नहीं, समग्रता में भारतीय मुसलमान की गति और नियति का साक्षात्कार किया है। मोमिनपुरा या ऐसी किसी भी बस्ती को ‘पाकिस्तान’, ‘मिनी पाकिस्तान’ कहना तो एक क्रूर सांप्रदायिक मज़ाक है, पर मोमिनपुरा जिस शहर का हिस्सा है, वह ‘मिनी हिंदुस्तान’ ज़रूर है – पूरे मुल्क का एक स्याह रूपक – जहां ‘नियम और अनुशासन के साथ हर सुबह और गगनभेदी होती जा रही घंटे-घडि़याल और शंख की ध्वनियों’ के बीच एक मुसलमान बस्ती ‘पवित्र शहर का कमोड’ बने रहने को अभिशप्त है और पूरा शहर उससे छुटकारा पा लेने को आतुर, जिसके लिए ज़रूरी है कि उसके अभिशाप को और गाढ़ा किया जाए। धीमे ज़हर की मौत मरता यह भारतीय मुसलमान किसी भी कोने से मदद की उम्मीद नहीं कर सकता। राज्य और तमाम दूसरी एजेंसियों की थोड़ी भी नज़रे इनायत वह तभी हासिल कर सकता है जब इस धीमे ज़हर की जगह एक विस्फोटक तरीक़े से क़ानून और व्यवस्था की समस्या उठ खड़ी हो। इसीलिए विडंबनापूर्ण ढंग से वह दंगे की कामना करता है।

यहां ऐजाज़ अहमद का एक प्रकाशित व्याख्यान, ‘कम्यूनलिज़्म: चेंजिंग फॉर्मस् ऐंड फार्च्यूनस्’ (दि माक्र्सिस्ट, अप्रैल-जून 2013), याद आता है जहां वे यह बताते हुए, कि पूंजीवाद का हिंस्र लुटेरापन भारत में जाति संरचनाओं और सांप्रदायिक टकरावों के चलते हमेशा से पर्याप्त मुखर रहा है, कहते हैं: ‘ऐसी प्रवृत्तियां नवउदारवादी अतिवाद की शुरुआत से पहले थोड़े नियंत्रण में थीं; अब ऐसे अधिकतर नियंत्रणों को तिलांजलि दे दी गयी है और राज्य, कमोबेश अनिच्छापूर्वक, तभी हस्तक्षेप करता है जब कोई सांप्रदायिक दंगा हो जिसे कि सारतः एक क़ानून और व्यवस्था संबंधी समस्या के रूप में देखा जाता है।’ ‘दंगा भेजियो मौला!’ में मोमिनपुरा की क्रिकेट टीम के लड़के मदद की गुहार लगाने हर जगह जाते हैं, कोई सीधे मुंह बात नहीं करता और तब उन्हें भी समझ आ जाता है कि ये तभी आएंगे जब दंगा होगाः

देर रात गए जब वे अपनी साईकिलें नाव पर लाद कर घरों की ओर लौटते, अंधेरी छतों से आवाज़ें आतीं, ‘‘क्या यासीन मियां, वे लोग कब आएंगे?’’

अंधेरे में लड़के एक-दूसरे को लाचारी से ताकते रहते और नाव चुपचाप आगे बढ़ती रहती। टीम के लड़के दौड़ते रहे, लोग टरकाते रहे और बस्ती पूछती रही। एक रात बढि़याते पानी ने घर लौटते लड़कों से कहा, ‘‘बेटा, अब वे लोग नहीं आएंगे।’’

‘‘काहे?’’ यासीन ने पूछा।

‘‘तजुरबे की बात है, उस दुनिया के लोग यहां सिर्फ़ दो बखत आते हैं। या दंगे में या इलेक्शन में। ग़लतफ़हमी में न रहना कि वे यहां आकर तुम्हारे बदन से गू-मूत पोंछ कर तुम लोगों को दूल्हा बना देंगे।’’

अगले दिन यासीन ने दांत भींचकर हर रात सैकड़ों आवाज़ों में पूछे जानेवाले उस एक सवाल का जवाब नाव पर सफ़ेद पेंट से लिख दिया, ‘‘दंगे में आएंगे।’’ ताकि हर बार जवाब देना न पड़े।

ऐजाज़ अहमद की बात से यहां एक फर्क है। ऐजाज़ नवउदारवादी दौर में राज्य के चरित्र के बदलाव की ही बात करते हैं, पर ‘दंगा भेजियो मौला!’ कई दूसरी एजेंसियों को भी समेटती हुई एक अधिक जटिल तस्वीर सामने रखती है। मदद मांगने निकले लड़के ‘पहले उन नेताओं, समाज सेवियों और अख़बार वालों के पास गये जो दो बरस पहले हुए दंगे के दौरान बस्ती में आए थे और उन्होंने उनके बुजुर्गों को पुरसा दिया था। वे सभी गरदनें हिलाते रहे लेकिन झांकने नहीं आए। फिर वे सभी पार्टियों के नेताजियों, सरकारी अफ़सरों, स्वयंसेवी संगठनों के भाइजियों और मीडिया के भाईजानों के पास गए।’ सबने उन्हें टरका दिया। यहां मामला सिर्फ़ सामाजिक सरोकारों को बलाए-ताक़ रख चुके, जातिवाद और सांप्रदायिकता को नियंत्रित करने की ओर से उदासीन-अनिच्छुक नवउदारवादी राज्य का नहीं है; मामला एक ऐसे सर्वव्यापी नकारात्मक बदलाव का है जिसमें उम्मीद के सभी ठिकाने ध्वस्त हो गये हैं।

ऐसा पहले नहीं था। परिस्थितियां विपरीत थीं, पर इस क़दर नहीं। इसीलिए मोमिनपुरा के लोग शुरू में उम्मीद लगाए रहते हैं। वे समझ नहीं पाते कि आखि़र इस बार पानी का दायरा फैलता ही क्यों जा रहा है और क्यों उनकी मदद से हर किसी ने हाथ खींच लिये हैं। बढ़ता पानी अपनी ‘डभ्भक-डभ्भाक’ आवाज़ में उनसे कुछ कहता है, पर वे समझते नहीं। यह बदले हुए समय को पहचानने में हुई चूक है। उम्मीद के तिनके को कौन छोड़ना चाहता है? आखि़रकार क्रिकेट टीम के लड़के धीरे-धीरे पानी की बात समझने लगते हैं। क्रिकेट टीम के लड़के ही क्यों? क्योंकि वे ही हैं जिन्होंने मल्लाहों के नाव देने से मना कर देने के बाद कहीं से एक नाव का जुगाड़ किया है और मुहल्ले की हाड़ी-बीमारी-मौत जैसी हर मुसीबत में आपात सेवा देने से लेकर मदद की गुहार लगाने की दौड़-धूप तक का सारा काम करते हुए एक बड़े कैनवास पर चीज़ों को रखने-देखने-आंकने की स्थिति में हैं। पानी के साथ उनकी बातचीत को कहानीकार ने एक युक्ति के रूप में इस्तेमाल किया है। यह, दरअसल, गहरी हताशा के क्षणों में सच तक ले जानेवाला आत्मालाप और आत्ममंथन है। इसी मंथन से गुज़रते हुए बिखरे-बिखरे सारे तथ्य एक साथ इकट्ठा होते हैं और उनके बीच से सत्य सहसा फूट पड़ता है, जैसे जिग्सॉ पज़ल के सारे टुकड़े सही ठिकानों पर जुड़ गये हों। पानी की बात समझ कर, यानी तमाम टुकड़ों के जुड़ने से बनी मुकम्मल तस्वीर को देख कर, लड़के ‘दंगा भेजियो मोरे मौला’ की दुआ मांगते हैं और उनकी दुआ कबूल होती है।

‘अल्लाह ने लड़कों की दुआ कबूल कर ली थी’ – कहानी के इस आखि़री वाक्य से लगता है कि लड़के निष्क्रिय याचक भर हैं, पर इससे ठीक पहले के वाक्यों में कहानी सांकेतिक रूप से उनकी सक्रियता की ओर इशारा करती है। ‘दो दिन बाद मोमिनपुरा में भरते पानी के दबाव से हाई-वे की पुलिया टूट गयी।’ भरते पानी का दबाव मोमिनपुरा के वाशिंदों के बढ़ते असंतोष के दबाव का संकेत बन कर आया है। इसका मतलब, पुलिया टूटी नहीं, तोड़ी गयी। यह पुलिया ही थी जिससे होकर हर साल पानी को निकास मिलता था, पर इस साल प्रशासन ने किसी-न-किसी बहाने से इस काम को रोक रखा है। गू-मूत में लिथड़ कर मरते ये घिरे हुए लोग अंततः घिराव को तोड़ देते हैं। ‘घंटे-घडि़याल-शंखों का समवेत शोर बर्दाश्त के बाहर हो गया’ – यह वाक्य पुलिया टूटने की सूचना के बाद का है, पर यह कथाकाल में भी बाद का माना जाए, यह ज़रूरी नहीं। इसे पुलिया तोड़ दिये जाने की पृष्ठभूमि के रूप में भी पढ़ सकते हैं। बर्दाश्त के बाहर हो जाना इस शोर के एकाएक बहुत बढ़ जाने का अर्थ भी देता है – अपने अभिशाप से लड़ते मुसलमानों के खि़लाफ़ साम्प्रदायिक हिंदुओं की जंग का ऐलान – और मोमिनपुरा के बर्दाश्त की सीमा टूटने का अर्थ भी देता है, यानी दूसरी तरफ़ के बढ़ते हुए शक्ति-प्रदर्शन के खि़लाफ़ मुसलमानों की ओर से एक बड़ा इंकार।

ऐसी सांकेतिकता और मितकथन इस कहानी की बड़ी ताक़त है। अनिल यादव के पास बहुत लंबी-लंबी कहानियां भी हैं, जिनके मुक़ाबले ‘दंगा भेजियो मौला!’ बिल्कुल शास्त्रीय अर्थों में ‘शॉर्ट स्टोरी’ है। डिमाई आकार के लगभग छह पृष्ठ। इस मझोले आकार में एक बड़ी बात को रखने की कला जैसी इस कहानी में है, वैसी खुद अनिल अपनी दूसरी कहानियों में अर्जित नहीं कर पाए हैं। पढ़ते हुए आप महसूस करते हैं कि वाचक ज़रूरी ब्यौरे देने में कोई कटौती नहीं कर रहा, लेकिन अपने वर्णनों-विवरणों में कहीं रमने को राज़ी नहीं है; जिस स्याह यथार्थ को वह उकेर रहा है, उसमें रमना एक अपराध है। वेदना में व्यक्ति या तो प्रलाप करता है, या बहुत कम बोल कर काम चलाता है। ‘दंगा भेजियो मौला!’ कम बोलनेवाली कहानी है। लगभग स्तब्ध अभिव्यक्ति जैसा ढब, भाषा की ख़पत में कोई शाहख़र्ची और इत्मीनान नहीं, एकदम ज़रूरत और भावनाओं के गहरे दबाव से निकले शब्द, और उतना ही कहकर आगे बढ़ जाना जितना कहकर लगा कि बात पूरी हो गयी। ऐसा अनुपात-बोध इधर की कहानियों में विरल है। कहानीकार कहीं भी विमर्श को वाचाल ढंग से पेश करने या आरोपित करने को समुत्सुक नहीं है। विरले ही कहीं ‘अभिमत’ के रूप में कोई बात कही गयी है; प्रस्तुति का अधिकांश ‘तथ्य-कथन’ की शक्ल में है। ‘तथ्य’ के पीछे ‘अभिमत’ का बल होता है, या कहें कि तथ्यों के चयन-संयोजन में अभिमत व्यंजित होता है, यह बात अलग है।

कहानी अपनी पूरी संरचना में सुसंगत है। यहां कुछ भी अलग नहीं छिटकता – न दृश्य, न ब्यौरे, न भाषा, न कथा-युक्तियां। इनमें से कोई अपने लिए नहीं है, सभी एक-दूसरे के लिए हैं। भारतीय मुसलमान की जिस अंधकारपूर्ण नियति को कहानीकार सामने रखना चाहता है, वह इस सुसंगत संरचना के कारण एक समग्र प्रभाव के रूप में उभरती है। कहानीकार की ख़ासियत है कि वह अपने सघन गद्य के बीच एकाएक कोई बहुत काव्यात्मक बिंब या उक्ति ला सकता है और बिना उसके आकर्षण में फंसे आगे निकल सकता है। ‘नाव दिन भर बस्ती के दुख ढोती रही’, ‘पानी में डूबे घरों में उन बच्चों की मांओं की सिसकियों की तरह कुप्पियां भभक रही थीं’, ‘…जीवन अचानक शहर की बुनकर बस्ती की खड़कताल से बिदक कर बाढ़ में डूबे, अंधियारे कछारी गांव की चाल चलने लगता’ – ऐसी काव्यात्मक उक्तियां उसके यहां कब आकर बिना कोई अतिरिक्त अवधान पाए निकल जाती हैं, पता भी नहीं चलता। वे गद्य की लय में एकरस हैं। इसीलिए वे अपना अलग वजूद जतलाने की बजाय पिघल कर एक पूरी मनःस्थिति की निर्मिति में शामिल हो जाती हैं। इसी मनःस्थिति के सघन रचाव का परिणाम है कि पानी से बातचीत जैसी ग़ैर-यथार्थवादी युक्ति भी बहुत चुपके से आकर कहानी में घुलमिल जाती है और आपको उसके अनोखेपन का अलग से अहसास नहीं होता। प्रकृति के साथ मनुष्य की बातचीत निविड़ अकेलेपन और गहरी वेदना का चिरपरिचित साक्ष्य रहा है। ‘मेघदूत’ के यक्ष और सूरदास की गोपियों को याद कीजिए। ‘दंगा भेजियो मौला!’ में यह एक समुदाय का अकेलापन है, जिसमें प्रकृति से कुछ कहना-सुनना एक सहज व्यापार की तरह लगता है। पर यह यक्ष और गोपियों के जैसा नहीं है, जिसमें अपने भीतर इकट्ठा भावनाओं का गुबार बाहर निकाल देने के लिए एक संबोध्य ढूंढ़ लिया गया है। कहानी पढ़ते हुए आप अनुभव कर सकते हैं कि यह कहा-सुनी उन पात्रों के भीतर की है और इसी मंथन से किसी विकट सत्य को प्रकट होना है। मोमिनपुरा क्रिकेट क्लब के कुछ लड़के हमेशा नाव पर ही रहने लगे हैं, ताकि रात में गिरनेवाले मकान में फंसे लोगों की जान बचाने के लिए हमेशा तैयार मिलें। ‘दिन बीतने के साथ बदबूदार हवा के झोंकों से नाव झील पर डोलती रही, तीन तरफ़ से बस्ती को घेरे कालोनियों की रोशनियां काले पानी पर नाचती रहीं, हर रात बढ़ते पानी के साथ बादलों से झांकते तारों समेत आसमान और क़रीब आता रहा। सावन बीता, भादों की फुहार में भींगते शहर से घिरे दंड-द्वीप पर अकेली नाव में रहते काफ़ी दिन बीत गए और तब लड़कों के आगे रहस्य खुलने लगे।… पानी, हवा, घंटे-घडि़याल, मर कर उतराते जानवर, गिरते मकान, रोशनियों का नाच, सितारे और चींडियों के झुंड – सभी कुछ न कुछ कह रहे थे। एक रात जब पूरी टीम बादलों भरे आसमान में आंखें गड़ाए प्रभात-फेरी का इंतज़ार कर रही थी, पानी बहुत धीमे से बुदबुदाया, ‘‘दंगा तो हो ही रहा है।’’

एक समूह/समुदाय का भयावह अकेलापन, उस अकेलेपन में चलनेवाला आत्ममंथन और उस आत्ममंथन से उपजा एक सच जो आसपास की हर शै के परस्पर संबंध से निकलनेवाला अर्थ है – इसे इतने संयम और सांकेतिक लाघव के साथ व्यक्त कर पाना हर कहानीकार के बस की बात नहीं हैं।

पीछे संरचना की सुसंगतता की बात की गयी। वह घटकों के अचूक संष्लेश में ही नहीं, कहानी की शुरुआत और अंत की सधी हुई योजना में भी है। कहानी एक दृश्य से शुरू होती है और एक दृश्य के साथ ख़त्म होती है; बीच का लगभग पूरा हिस्सा परिदृश्य का विस्तार है। जिस जगह जाकर वह ख़त्म होती है, वहां आप कहानी का बाक़ायदा अंत होना महसूस करते हैं। यह उन कहानियां की तरह नहीं है जो अपनी तमाम खूबियों के बावजूद अंत की ओर अधर में लटक जाती हैं। उनके उदाहरण फिर कभी। कोई कहानी अपनी पूरी बनावट से अंत संबंधी कैसी अपेक्षाएं जगाती है, और किस तरह की कहानियों में कोई ‘अंत’ ज़रूरी होता है, किनमें नहीं, इस पर भी फिर कभी। फिलहाल इतना ही कि ‘दंगा भेजियो मौला!’ को पढ़ते हुए आप एक बाक़ायदा अंत की अपेक्षा करते हैं और कहानी इस अपेक्षा को पूरा करती है। अनिल यादव की ही ‘लोककवि का बिरहा’ या ‘आर जे साहब का रेडियो’ जैसी कहानियों को पढ़ें तो स्पष्ट हो जाएगा कि कहानी की पूरी उठान से जगनेवाली अपेक्षा के मुक़ाबले कमज़ोर अंत का क्या मतलब होता है; जैसे अपनी दौड़ शानदार ढंग से पूरा करता कोई धावक फि़निश लाइन से ठीक पहले लड़खड़ा कर बैठ जाए!

पता नहीं, इपंले कह पाया या नहीं, पर वह कहना यही चाहता था कि अगर शुरुआत से ही कोई कहानी आपको गिरफ़्त में नहीं ले लेती, तो यह पाठक के रूप में आपकी अयोग्यता की निशानी भी हो सकती है और अगर आप थोड़ी मुश्किल उठाने को तैयार हो जाएं, तो अपनी इस अयोग्यता से उबरा भी जा सकता है।

[1] यों तो हर रूपक में बात को भटका कर अनजान दिशाओं की ओर ले जाने का दुर्गुण होता है, पर यह तो और भी दुष्ट है। दुष्ट माने दोषपूर्ण, जैसे शास्त्रों में वर्णित ‘दुष्ट काव्य’। पाठक अगर पंछी है और कहानीकार बहेलिया, तो पठन का सुख पाठ की गिरफ़्त में आने से पहले तक ही समझना चाहिए। गिरफ़्त में आने के बाद सुख का क्या मतलब? यानी इस रूपक की मानें तो पढ़ना एक सज़ा है (और वह असंगति अलंकार भी यहां कारगर नहीं कि ‘मज़ा इसमें इतना मगर किसलिए है’)! इसीलिए कहा, बहुत घटिया रूपक है। इसे थोड़ा ज़्यादा बोलने की इजाज़त दें तो कमबख़्त अनाप-शनाप बकने लगेगा।

संजीव कुमार

संजीव कुमार

संजीव कुमार। युवा आलोचक और कहानीकार। ‘जैनेन्द्र और अज्ञेयः सृजन का सैद्धांतिक नेपथ्य’ पुस्तक के लिए देवीशंकर अवस्थी सम्मान। दिल्ली विश्विद्यालय के देशबंधु कॉलेज में  प्राध्यापक। इनसे sanjusanjeev67@gmail.com पर संपर्क सम्भव है।

साभार- हंस, सितम्बर, 2015

भीष्म साहनी की कहानी-(अ)कला: संजीव कुमार

हिंदी कहानी के आन्दोलन ने जहाँ एक और पुरानी जड़ता को तोड़कर नयी ज़मीन तैयार की, वहीँ उसमें कभी मूर्खतापूर्ण और कभी षड्यंत्रपूर्ण चयनवाद भी उभरा. हिंदी के कई महत्वपूर्ण कहानी लेखक इस चयनवाद के शिकार हुए. ऐसे आन्दोलनों के शिकार भीष्म साहनी  भी हुए. यह चयनवादी आलोचना उनकी भी थी जो अपने को प्रगतिशील और जनवादी सिद्ध करने के लिए कुछ भी कर रहे थे.  इस चयनवाद के शिकार भीष्म साहनी जी अकेले नहीं हुए. कई दूसरे महत्वपूर्ण हिंदी कथा लेखक और कवि या तो पीढ़ियों के अंतराल के नाम पर आधुनिक न रहे या फिर उनके सामाजिक संघर्ष को क्रांतिकारी  तत्त्वों में शामिल न किया गया. यह अवश्य ही दुर्भाग्यपूर्ण परिस्थिति थी जिसके विरुद्ध आज भी संघर्ष करने की आवश्यकता बनी हुयी है. खासकर तब; जबकि क्रांतिकारिता की व्याख्या सामाजिक परिवर्तन के दूसरे छोर पर जा रही है…. फिट्गेराल्ड ने कभी कहा था, ‘मैं अपने समकालीनों के साथ नहीं होना चाहता, क्योंकि मेरी नियति भविष्य के कूड़ेदान में नहीं होगी.’ भीष्म साहनी अपने समय के साथ हो सकते हैं, अपने समकालीन लेखकों के साथ नहीं…. ऐसा नहीं है कि भीष्म साहनी जी अपनी कहानियों के कलात्मक रूपगठन के प्रति असचेष्ट हों. वे इस दिशा में यशपाल की उस शैली का थोड़ा अभ्यास किया मालूम पड़ते हैं जो प्रतिमुखता का एक नाटकीय चरम बिंदु पूरे घटनाक्रम के भीतर से खड़ा कर लेती है और हमें अभिभूत करती है… आधुनिकतावादी लेखकों ने कथानक को प्रायः व्यर्थ बना दिया है. हिंदी में प्रेमचंद-यशपाल से लेकर भीष्म साहनी और अमरकांत-रेणु ने उनकी पुनः प्रतिष्ठा के लिए संघर्ष किया है. भीष्म जी की तमाम कहानियों की रूप-रचना में एक कथानक होता है, एक भरी-पूरी कहानी होती है, जिसमें अकेला चरित्र अपनी भीतरी परिस्थितियों में कम होता है. एक पूरा व्यापाररत समुदाय उनके साथ दिखता है. ..कहानीपन की रक्षा का संघर्ष कहानी की रचनात्मक पहचान के लिए आवश्यक हो गया है. आज की अधिकांश कहानियों में हलचल तो बहुत होती है, पर अंतर्वस्तु में एक रिक्तता-सी लगती है.  # सुरेन्द्र चौधरी (‘हिंदी कहानी : रचना  और परिस्थिति ‘ में संकलित  ‘भीष्म  साहनी : नए  राष्ट्रीय बोध के अन्वेषक ‘ लेख से )  

फोटो- त्रिभुवन तिवारी, आउटलुक से साभार

फोटो- त्रिभुवन तिवारी, आउटलुक से साभार

   

By संजीव कुमार

यह थोड़ा अजीब तो है, पर क्या करें, कि कहानीकार भीष्म साहनी के बारे में सोचते हुए बरबस ‘मोहन जोशी हाजि़र हों’ और ‘तमस’ वाले अभिनेता भीष्म साहनी याद आ जाते हैं। दोनों जगह उनका किरदार ऐसा था जिसमें आविष्ट नाटकीयता वाले क्षणों की पर्याप्त गुंजाइश थी, पर भीष्म जी के अभिनय ने उन क्षणों को असाधारण तरीक़े से उभारने में कोई दिलचस्पी नहीं दिखायी। उसे किसी चिह्नित की जाने योग्य नाटकीयता के हवालेे नहीं किया। बस, जीवन के सहज प्रवाह का थोड़ा असहज हो जाना ही चिह्नित हो पाया। लगा, हम सामान्य दिनचर्या में आए हुए कुछ व्यतिक्रमों से रू-ब-रू हैं, उन व्यतिक्रमों के प्रति अतिरिक्त रूप से संवेदनशील बनानेवाली अभिनय-कला से नहीं। मानो हम बिना किसी नाटकीयता के प्रत्यक्ष जीवन की सादगी का साक्षात्कार कर रहे हों, उस जीवन की कलात्मक पुनर्रचना का नहीं।

कहानीकार भीष्म साहनी भी ऐसे ही हैं। उनकी कहानियां कथा-स्थितियों और पाठक के बीच किसी कहानीकार की मध्यस्थता का अहसास नहीं होने देतीं। बेहद सीधे-सादे तरीक़े से वे कहानी कहते चले जाते हैं। कहीं कोई चमकता हुआ वाक्य नहीं, कोई ऐसी साहित्यिक हिकमत नहीं जिसे देखकर आप ‘वाह’ कह उठें, कहीं किसी प्रसंग को थम-ठहर कर अलग से उभारने का जतन नहीं। आचार्य रामचंद्र शुक्ल होते तो शायद कहते कि इन्हें जीवन के मार्मिक स्थलों की पहचान नहीं है, इसलिए उन जगहों पर ठहर कर धैर्य से रमते नहीं हैं। पर मार्मिक स्थलों की पहचान का यह सूत्र तुलसीदास पर, या पुरानी/प्रचलित कथा को उपजीव्य बनानेवाले किसी भी रचनाकार पर तो लागू हो सकता है, भीष्म जी पर लागू नहीं हो सकता। तुलसी के पास कथा पहले से थी, विमर्श और वक्रता ही अपनी थी। उन्हेें एक पूर्वप्रचलित कथा में धैर्यपूर्ण ट्रीटमेंट की मांग करनेवाले मार्मिक स्थलों की पहचान करनी थी। भीष्म जी के पास कथा – यानी घटनाओं का कंकाल – और विमर्श, दोनों अपना है। उन्हें किसी पहले की कथा में ख़ास अपनी वक्रता पैदा नहीं करनी है। उनका कौशल उपजीव्य कथा की घटना-शृंखला में मार्मिक स्थलों की पहचान कर उसका सधे हाथों से ट्रीटमेंट करने में नहीं, स्वयं ऐसे स्थलों की कल्पना-उद्भावना करने में निहित है – ऐसी कथा-स्थितियों की उद्भावना जहां पात्र और परिस्थितियों के घात-प्रतिघात से जीवन का कोई मार्मिक पक्ष, कोई दबा हुआ आशय, कोई पहचाना किंतु अनपहचाना-सा सत्य बेसाख़्ता उभर आये।… और इस काम में भीष्म साहनी माहिर हैं। शायद इसी महारत केे चलते उनमें सीधेे-सादे ढंग से कहानी कह जानेे का दुर्लभ-सा आत्मविष्वास है।

भीष्म जी की इस विशेषता को नामवर सिंह ने अचूक ढंग सेे पहचाना था। ‘कहानी नयी कहानी’ में कहानी की संरचना को लेकर जगह-जगह अनेक सूत्र देते हुए जिस सूत्र के उदाहरण के रूप में उन्होंने भीष्म साहनी का उल्लेख किया है, उसे याद कीजिए। सजीव बिंब, सांकेतिकता, ‘आधारभूत विचार का द्रवीभूत होकर संपूर्ण कहानी के शरीर में भर उठना’, वातावरण-निर्माण, टेक्स्चर – इन सबकी चर्चा करते हुए भीष्म साहनी की कहानियां उदाहरण नहीं बनी हैं। वे उदाहरण बनी हैं इस सूत्र का: ‘‘कहानी जीवन के टुकड़े में निहित ‘अंतर्विरोध’, ‘द्वंद्व’, ‘संक्रांति’ अथवा ‘क्राइसिस’ को पकड़ने की कोशिश करती है और ठीक ढंग से पकड़ में आ जाने पर यह खंडगत अंतर्विरोध ही वृहद् अंतर्विरोध के किसी-न-किसी पहलू का आभास दे जाता है।… यह एक विरोधाभास है कि कहानी जैसा एकान्वित शिल्प अंतर्विरोध पर निर्भर होता है। नये कहानीकारों में भीष्म साहनी में एक ही साथ इन दोनों विशेषताओं का सर्वोत्तम सामंजस्य मिलता है। इस दृष्टि से भीष्म साहनी सबसे सफल कहानीकार हैं।’’ इसके बाद वे ‘चीफ़ की दावत’ का सधा हुआ विश्लेषण करते हैं और बताते हैं कि किस तरह कहानी की मां केवल एक चरित्र नहीं रह जाती, संपूर्ण प्राचीन का प्रतीक बन जाती है। और किस प्रकार ‘एक समर्थ कहानीकार जीवन की छोटी-से-छोटी घटना में अर्थ के स्तर-स्तर उद्घाटित करता हुआ उसकी व्याप्ति को मानवीय सत्य की सीमा तक पहुंचा देता है।’

यह अकारण नहीं है कि जीवन के टुकड़े में निहित अंतर्विरोध, द्वंद्व, क्राइसिस आदि को पकड़ने के उदाहरण के रूप में ही भीष्म जी याद आये, सजीव बिंब या वातावरण-निर्माण या ‘संगीत का-सा प्रभाव उत्पन्न करने’ का सामथ्र्य आदि के उदाहरण के रूप में नहीं। प्रतीक की बात ज़रूर की गई है (‘संपूर्ण प्राचीन का प्रतीक’), पर यह सायास नियोजित प्रतीक के अर्थ में नहीं है, जैसा राजेंद्र यादव या मोहन राकेश के यहां मिलता है। मोहन राकेश की ‘एक और जि़ंदगी’ में कोर्टरूम के भीतर पंखे से कटकर नीचे गिरे पक्षी का प्रतीक एक सजग सहित्यिक युक्ति है जो तलाक लेते पति-पत्नी के बच्चे की लहूलुहान आत्मा का प्रतीकार्थ व्यक्त करने के लिए प्रयुक्त हुई है। ‘चीफ़ की दावत’ की मां को ऐसी साहित्यिक युक्ति केे अर्थ में प्रतीक नहीं कहा गया है। इसीलिए मां प्रतीक ‘है’ नहीं, प्रतीक ‘बन जाती है’। प्रतीक ‘बन जाना’, दरअसल, पठन के स्तर पर उपलब्ध की गई व्यंजना या ध्वनि है, जो इसीलिए संभव हुई है कि कहानीकार ने एक अंतर्विरोध से जुड़ी विडंबना को सफ़ाई से पकड़नेवाली कथा-स्थिति निर्मित की है। कोई आष्चर्य नहीं कि मां के प्रतीक बन जाने की बात कहते हुए नामवर सिंह को काव्यशास्त्र में वर्णित व्यंजना की याद आई: ‘‘काव्यशास्त्र के आचार्यों ने मुख्यार्थ के भीतर से जो अर्थ की व्यंजना कराई है, वह भी इसी का रूप है। जीवन का सत्य इसी तरह खंड के भीतर से, किंतु उसे खंडित करता हुआ पूर्ण की ओर संकेेत करता है; खंड की सीमा को तोड़कर पूर्ण में मिलता है, मुख्यार्थ को बाधित करके रसमय अर्थ को व्यंजित करता है…।’’

मुख्यार्थ से आगे जाकर व्यंजित होनेवाला अर्थ (मुख्यार्थ कोे बाधित करके नहीं, मुख्यार्थ-बाध लक्षणा का लक्षण है; इस बात पर नामवर जी के नंबर कट सकते हैं), खंड की सीमा को तोड़कर पूर्ण में मिलता जीवन-सत्य – भीष्म जी की कहानियों की यह विशेषता उन्हें सीधा-सादा नहीं रहने देती, अंदाज़े-बयां में वे जितनी भी सीधी-सादी लगें। इसीलिए कहा है, दिल को देखो, चेहरा न देखो…। वस्तुतः अंदाज़े-बयां की सादगी और कहानी विधा की अपनी आकारिक सीमाओं के साथ भीष्म जी जितनी बड़ी वास्तविकताओं की ओर संकेत कर पाते हैं, वही उनके महत्व का आधार है। उनकी यादगार कहानियां – ‘चीफ़ की दावत’, ‘वाड्.चू’, ‘ओ हरामज़ादेे’, ‘अमृतसर आ गया है’, ‘अहम् ब्रह्मास्मि’ आदि – इसीलिए यादगार हैं। ‘वाड्.चू’ का उदाहरण लें। किसी भावुक कर देनेवाले संस्मरण की तरह प्रतीत होती यह कहानी आपको अचूक ढंग से यह अहसास कराती है कि व्यक्तिगत स्तर पर अपने दौर से विदाई ले लेना किसी के लिए संभव नहीं। आपका दौर आपका पीछा नहीं छोड़ता। वाड्.चू पुरानी पोथियों में ही घुसा रहता है, महाप्राण बुद्ध के प्रति एक भावुक लगाव में सिमटा। उसे न नेहरू से मतलब है, न चाउ एन लाई से। उसके अंदर मातृभूमि को लेकर कोई नाॅस्टैल्जिक भाव नहीं है, भले ही कहानी के प्रथम पुरुष वाचक को यह लगता रहा हो कि एक बार अपनी ज़मीन पर लौटने के बाद दुबारा भारत आना उसके लिए भावनात्मक कारणों से संभव नहीं होगा। वाड्.चू के साथ ऐसा कुछ नहीं होता। वह चीन जाता है और दुबारा अतीत की उन्हीं पोथियों में शरण पाने के लिए भारत लौट आता है। लेकिन दोनों जगह वह राज्यतंत्र की निगाह में संदिग्ध है। कोई यह मानने को तैयार नहीं कि वह किसी राज्यतंत्र के लिए हानिरहित एक अतीतजीवी प्राणी है। उसका दौर उसका पीछा करता रहता है और जब पीछा करना छोड़ता है, तब तक वाड्.चू का सर्वस्व लुट चुका होता है। अपने आसपास जितना अतीत उसने इकट्ठा कर रखा था, पांडुलिपियों और नोट्स की शक्ल में, जो उसकी दृष्टि में अत्यंत मूल्यवान था, छिन्न-भिन्न हो जाता है। वाड्.चू का जीवन सारहीन, बेमानी-सा हो जाता है और कुछ समय बाद उसकी मृत्यु हो जाती है। मानो एक ख़ास तरह के पर्यावरण में ही जी पानेवाले प्राणी से उसका पर्यावरण छीन लिया गया हो।

क्या वाड्.चू की त्रासदी को एक व्यक्ति की बदकि़स्मती के रूप में पढ़ा जा सकता है? निस्संदेह, पढ़ा तो जा ही सकता है, पर यह भी निष्चित है कि एक चरित्र और उसके साथ परिस्थितियों के इस घात-प्रतिघात की योजना भीष्म जी ने इतने संकरे पठन के लिए नहीं की है। अनैतिहासिक और समय-निरपेक्ष होकर जिया नहीं जा सकता, यह कठोर सचाई वाड्.चू की त्रासदी में व्यंजित होती है और यह व्यंजना व्यक्तियों से आगे वर्गों, समुदायों और राष्ट्रों पर भी लागू होती है। ‘खंड की सीमा को तोड़कर पूर्ण में मिलता जीवन-सत्य’ यही है जिसको साधने में यह सीधी-सादी कहानी कामयाब है। और इसे साधने के लिए भीष्म जी किसी ऐसी हिकमत का प्रयोग नहीं करते जिसे मैं थोड़े मज़ाकिया लहज़े में ‘सफऱ्ेस टेंशन’ कहना पसंद करता हूं। वे कोई ऐसा वाक्य नहीं लिखते जो आपको अर्थ की किसी विशेष दिशा की ओर ढुलकाने का ज़रिया बन जाए। बावजूद इसके अभिधा से आगे व्यंग्यार्थ की ओर आपकी यात्रा अनिवार्य हो जाती है, क्योंकि कहानी अपने वाक्यों से नहीं, वाक़यों से वह ध्वनि पैदा करने में समर्थ है।

इस रूप में गहरी अर्थ-व्यंजनाओं से भरी कथा-स्थितियों की कल्पना करना ही कहानीकार के तौर पर भीष्म साहनी का स्व-भाव है। शैली-शिल्प में नयापन या अतिरिक्त आकर्षण पैदा करना उनका स्व-भाव नहीं है, इसीलिए जहां वे इसकी कोशिश करते भी हैं, वहां उन्हें कोई सफलता नहीं मिलती। ‘वाड्.चू’ में ही देखें तो पहले वाक्य के साथ भीष्म जी ने एक चैंकाऊ कि़स्म की शुरुआत करने की कोशिश की है: ‘तभी वाड्.चू आता दिखाई पड़ा।’ लेकिन यह ‘तभी’ बिल्कुल जमता नहीं, क्योंकि वह अपना औचित्य सिद्ध नहीं कर पाता। शैली का चैंकाऊपन कतई प्रति-उत्पादक हो जाता है। इसी तरह ‘चीलें’ कहानी में वे चील का जो प्रतीक खड़ा करने की कोशिश करते हैं, वह ख़ासा निष्प्रभावी है। दरअसल, कहानियां उनके भीतर इस तरह के वातावरणधर्मी प्रयोगों के रूप में जन्म नहीं लेती हैं। नयी कहानी में स्त्री-पुरुष-संबंधों वाले कथ्य और प्रतीकात्मक-सांकेतिक शैली-शिल्प-विधान को जो महत्व मिला था, उसने शायद धक्का देकर भीष्म जी को ऐसी कहानी लिखने के लिए प्रेरित किया। वे अपनी प्रकृति से मूड/मनःस्थिति को आधार बनानेवाले कहानीकार हैं नहीं, जैसे कि वे ‘चीलें’ में दिखना चाहते हैं।

पर इसका यह भी मतलब नहीं कि मनोविज्ञान पर उनकी पकड़ मूड/मनःस्थिति को आधार बनानेवालों के मुक़ाबले कहीं भी कमतर है। यह कहते हुए मुझे ‘चीफ़ की दावत’ समेत भीष्म जी की कितनी ही कहानियां याद आ रही हैं, पर जि़क्र सिर्फ़ ‘अहम् ब्रह्मास्मि’ का करूंगा जिसका पाठ अभी मेरी मेज़ पर नहीं है और जिसे पढ़े हुए भी लगभग तीस साल गुज़र चुके हैं। उसका मुख्य पात्र अंग्रेज़ीयत से बहुत प्रभावित है। उसे अंग्रेज़ों की सभी चीज़ें बड़ी अच्छी लगती हैं। एक बार वह कहानी के ‘मैं’ से कहता है कि देखो, अहम् ब्रह्मास्मि का जो अंग्रेज़ी अनुवाद है, वह कितना सुंदर है, ‘आई ऐम द डिवाइन फ़्लेम’। और ऐसा कहते हुए उसके चेहरे पर एक अजीब तरह का दिव्य भाव उभर आता है। फिर कहानी में एक प्रसंग आता है जिसमें एक सिनेमा हाॅल के यूरिनर से अंग्रेज़ उसे धक्के मारकर हटा देते हैं, क्योंकि वह – एक काला देसी आदमी – उन्हें इंतज़ार करवा रहा है। इस घटना के बाद जब कहानी का प्रथम पुरुष वाचक उसके घर पहुंचता है तो कमरे में न पाकर उसे ढूंढ़ता हुआ छत पर जाता है। वहां देखता है कि वह आंखें मूंदे हुए ध्यानस्थ बैठा है और बुदबुदा रहा है, ‘आई ऐम द डिवाइन फ़्लेम… आई ऐम द डिवाइन फ़्लेम’। वाचक को लगता है कि वह मंत्र बुदबुदाता हुआ सतह से दो इंच ऊपर उठ गया है।

यह कथा-सार मैं तीस साल पहले, अपनी किशोेरावस्था मेें पढ़े हुए पाठ केे आधार पर बता रहा हूं। मुमकिन है, इसमें मेरा कुछ अपना भी जुड़ गया हो। पर कहानी की मुख्य विडंबना निभ्र्रांत है। और कहने की ज़रूरत नहीं कि वह हीनता-ग्रंथि की गहरी मनोवैज्ञानिक पकड़ पर टिकी है। मनोवैज्ञानिक पकड़ के इसी अर्थ में ‘अमृतसर आ गया है’ या ‘ओ हरामज़ादे’ भी मुख्यतः मनोविज्ञान की कहानियां हैं, भले ही कहानीकार घटनाओं की जगह मनःस्थितियों के रचाव में दिलचस्पी लेता न दिखाई दे।

कुल मिलाकर, भीष्म साहनी की अनेक कहानियां कहानी विधा की शक्ति का उदाहरण हैं। जिन लोगों को यह लगता था कि इस छोटे आकार की विधा में बड़ी बात को समेटने का माद्दा ही नहीं है, उन्हें खरा उत्तर देनेवाली कहानियों में भीष्म जी की कई कहानियां शामिल हैं। सबसे बड़ी बात कि यह माद्दा कथा-कथन की सादगी और भरपूर पठनीयता को बनाये रखते हुए हासिल किया गया है। कहानीकार बनने के इच्छुक किसी नये लेखक को अगर यह आत्मविश्वास अर्जित करना हो कि वह भी कहानियां लिख सकता/सकती है तो उसे भीष्म जी की कहानियां अवश्य पढ़नी चाहिए।

संजीव कुमार

संजीव कुमार

संजीव कुमार। युवा आलोचक और कहानीकार। ‘जैनेन्द्र और अज्ञेयः सृजन का सैद्धांतिक नेपथ्य’ पुस्तक के लिए देवीशंकर अवस्थी सम्मान। दिल्ली विश्विद्यालय के देशबंधु कॉलेज में  प्राध्यापक। इनसे sanjusanjeev67@gmail.com पर संपर्क सम्भव है।

सहमत (सफ़दर हाशमी मेमोरियल ट्रस्ट) द्वारा प्रकाशित भीष्म साहनी पर केंद्रित पुस्तिका से साभार

बत्रा जी का शिक्षा बचाओ आंदोलन या ‘मस्तिष्क में सड़ांध’: संजीव कुमार

हिंदुत्ववादियों को अपनी बौद्धिक दरिद्रता के चलते (ये) ऊटपटांग बातें पूरी तरह दुरुस्त भी लगती हैं, साथ ही, उन्हें यह भी पता है कि उन्हें किन लोगों को संबोधित करते हुए उनके अज्ञान का लाभ उठाना है। शिक्षा, और उसमें भी इतिहास की शिक्षा, इसीलिए उनके निशाने पर रहती है कि इससे ऐसे लोगों की तादाद के बढ़ते जानेे का वास्तविक ख़तरा है जिन्हें उनकी बातें बेसिर-पैर की नज़र आएंगी। ग़ौरतलब है कि ये हिंदुत्ववादी विचारक (?!) कभी किसी बौद्धिक मंच पर बहसों में शामिल नहीं होते। वे उन जगहों पर जाते भी हैं तो तोड़-फोड़ या नारेबाज़ी की कार्रवाई को अंजाम देने। हां, टेलीविज़न चैनलों की बहसों में कई बार अवश्य शामिल होते हैं जहां उन्हें पता होता है कि तर्क-विवेक-सम्मत प्रतिपादन के लिए अपेक्षित धैर्य की गुंजाइश बहुत कम है और प्रदर्शनकारी कला के उपयोग की गुंजाइश बहुत ज़्यादा। ये मुख्यतः गाज-फेन उगलनेवाली बहसें होती हैं जिनमें बौद्धिक दरिद्रता को गाज-फेन के भीतर छिपा देने की सहूलियत पर्याप्त मात्रा में रहती है।  #लेखक 

This is the enemy

This is the enemy

किसकी मजाल है जो शिक्षा को बचा ले ‘शिक्षा बचाओ आंदोलन’ से

By संजीव कुमार

बातों के सिर-पैर प्राणियों के सिर-पैर की तरह नहीं होते कि उनका होना या न होना नंगी आंखों से दिख जाए।

अभी जब इपंले (इन पंक्तियों का लेखक) यह लेख लिखने बैठा है, उसके सामने विश्व हिंदू परिषद् के श्री जुगल किशोर का एक ताज़ातरीन साक्षात्कार है। श्री जुगल किशोर हिंदुओं की ‘घर वापसी’ की मुहिम के संयोजक हैं और उनका साक्षात्कार 15 दिसंबर 2014 के ‘द इकोनाॅमिक टाइम्स’ में छपा है। इसमें वे फ़रमाते हैं, ‘वेदों में मैला ढोने की प्रथा और लोगों के बहिष्कार (आशय अस्पृश्यता से है) का कोई उल्लेख नहीं है। अगर आप इन समुदायों को निकट से देखें तो उनके गोत्र सोलंकी, चौहान, सिसोदिया, राठौर आदि हैं। कारण यह कि वे पराजित राजपूत हैं जिन्हें इस्लाम न अपनाने के लिए दंडित किया गया। वे निम्न में भी निम्नतम बना दिये गये। दूसरे हिंदुओं को उनका सामाजिक बहिष्कार करने पर बाध्य किया गया। अब नरेंद्रभाई मैला ढोने की प्रथा को ख़त्म करने और मुग़ल परंपरा का अंत करने का प्रयास कर रहे हैं।’

वेदों के बाद सीधा मुग़ल काल में छलांग लगा देना, बीच में ‘गीता’ और ‘मनुस्मृति’ और इस तरह के दशाधिक पाठों तथा उनमें प्रतिबिंबित होती सामाजिक व्यवस्था को गोल कर देना, अस्पृश्यता को मुग़लों द्वारा स्थापित परंपरा बताना! – ज़ाहिर है, श्री जुगल किशोर की बातों का कोई सिर-पैर नहीं है। फिर इस तरह की बातें इतने आत्मविश्वास के साथ कैसे कही जाती हैं? दो ही कारण हो सकते हैंः या तो कहनेवाले को खुद ही यह दिखाई न दे कि उसकी बातें बेसिर-पैर की हैं, या फिर उसे यह भरोसा हो कि वह जिन लोगों तक अपनी बात पहुंचाना चाहता है, उनके पास सिर-पैैर की इस अनुपस्थिति को देखने वाली निगाह नहीं है।

इपंले को लगता है कि मामला ‘या तो, या फिर’ वाला नहीं है। दोनों कारण साथ-साथ काम कर रहे हैं। हिंदुत्ववादियों को अपनी बौद्धिक दरिद्रता के चलते ये ऊटपटांग बातें पूरी तरह दुरुस्त भी लगती हैं, साथ ही, उन्हें यह भी पता है कि उन्हें किन लोगों को संबोधित करते हुए उनके अज्ञान का लाभ उठाना है। शिक्षा, और उसमें भी इतिहास की शिक्षा, इसीलिए उनके निशाने पर रहती है कि इससे ऐसे लोगों की तादाद के बढ़ते जानेे का वास्तविक ख़तरा है जिन्हें उनकी बातें बेसिर-पैर की नज़र आएंगी। ग़ौरतलब है कि ये हिंदुत्ववादी विचारक (?!) कभी किसी बौद्धिक मंच पर बहसों में शामिल नहीं होते। वे उन जगहों पर जाते भी हैं तो तोड़-फोड़ या नारेबाज़ी की कार्रवाई को अंजाम देने। हां, टेलीविज़न चैनलों की बहसों में कई बार अवश्य शामिल होते हैं जहां उन्हें पता होता है कि तर्क-विवेक-सम्मत प्रतिपादन के लिए अपेक्षित धैर्य की गुंजाइश बहुत कम है और प्रदर्शनकारी कला के उपयोग की गुंजाइश बहुत ज़्यादा। ये मुख्यतः गाज-फेन उगलनेवाली बहसें होती हैं जिनमें बौद्धिक दरिद्रता को गाज-फेन के भीतर छिपा देने की सहूलियत पर्याप्त मात्रा में रहती है।

कोई चाहे तो कह सकता है कि बौद्धिक क्षमता की पहचान करानेवाले मानक दरअसल ऐसी निर्मितियां हैं जो आधुनिकता की पश्चिमी परियोजना द्वारा हमारे ऊपर थोप दी गयी हैं। यह बौद्धिक कर्म के आधुनिकता-निर्मित ढांचे का असर है जिसके चलते एक ख़ास प्रविधि का पालन करनेवाला, तार्किक-वैज्ञानिक चिंतन के मुहावरों में बंधा लेखन ही हमारे लिए उत्तम बौद्धिकता की निशानी होता है। जिन विचारकों में ग़ैरमिलावटी भारतीयता बची हुई है, उनके यहां यह निशानी न मिले, यह स्वाभाविक है। वस्तुतः उनके यहां ठेठ भारतीय कि़स्म की बौद्धिकता है जिसे पश्चिमी आधुनिकता ने, और इसीलिए हम जैसे जड़ों से कटे लोगों ने, बौद्धिकता मानने से इंकार कर दिया है।

यह उत्तरआधुनिक दलील प्रथमदृष्ट्या बहुत ग़लत नहीं लगती। पर शिक्षा-संस्कृति के मोर्चे पर संघ की अगुवाई करनेवालों को पढ़ें तो इस दलील की कमज़ोरी दयनीय ढंग से उजागर होने लगती है। वहां बौद्धिक कर्म के उन सदियों पुराने उसूलों का भी कोेई पालन नहीं मिलता जिनका स्वयं प्राचीन भारतीय पांडित्य-परंपरा में सख़्ती से पालन किया गया है। इसका एक अद्भुत नमूना है, दीनानाथ बत्रा की किताब ‘भारतीय शिक्षा का स्वरूप’। यह किताब अक्तूबर महीने की 29 तारीख़ को एक भव्य समारोह में वेंकैया नायडू के हाथों लोकार्पित हुई जिसमें श्री नायडू ने इस किताब की, और साथ ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की ओर से शिक्षा-संस्कृति के मोर्चे पर काम करनेवाले समर्पित प्रचारक बत्रा जी की भूरि-भूरि प्रशंसा की।

किताब पर आने से पहले आदरणीय दीनानाथ बत्रा के महत्व को रेखांकित करना ज़रूरी है। शिक्षा बचाओ आंदोलन की अगुवाई करते हुए 2014 में वेंडी डाॅनीगर की किताब ‘द हिंदूज़: ऐन आॅल्टरनेटिव हिस्ट्री’ को लुगदी करवाने में कामयाबी हासिल कर वे चर्चा में आये थे। वैसे वे काफ़ी समय से संघ के शिक्षा-नीति-निर्धारकों में रहे हैं और राजग-1 के दौरान 2001 में एन.सी.ई.आर.टी. के सलाहकार के तौर पर उन्होंने उस समिति का नेतृत्व किया था जिसने इतिहास की किताबों में से हिंदू राष्ट्रवादियों को ठेस पहुंचानेवाले हिस्सों को निकाल बाहर करने के काम को अंजाम दिया। शिक्षा के भारतीयकरण और उसमें मूल्य-शिक्षा के समावेश के उद्देश्य से बत्रा जी ने नौ पाठ्यपुस्तकें भी लिखीं, जिनका गुजराती में अनुवाद कर गुजरात सरकार ने अपने 42000 विद्यालयों में उन्हें पढ़ाना अनिवार्य किया है। इनमें ‘तेजोमय भारत’ और ‘प्रेरणादीप 1’ ‘प्रेरणादीप 2’ जैसी किताबें हैं जिनमें विद्यार्थियों के लिए परोसी गयी सामग्री काफ़ी चर्चा में रही है। मसलन, ‘तेजोमय भारत’ में महाभारत की कथा के आधार पर प्राचीन भारत में स्टेम सेल रिसर्च होने, टेलीविज़न के होने, अनश्व रथ के नाम से मोटरकार की मौजूदगी इत्यादि की जानकारी दी गयी है। ‘प्रेरणादीप’ के अलग-अलग भागों में स्पष्ट नस्लवादी मिज़ाज वाली ‘शिक्षाप्रद’ कहानियां हैं। गुजरात के निवर्तमान मुख्यमंत्री और देश के वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्वयं इन किताबों के महत्व पर प्रकाश डाला है और भारतीय शिक्षा के उद्धार की मुहिम में बत्रा जी के महती योगदान को एकाधिक अवसरों पर स्वीकार किया है।

इन बातों से समझा जा सकता है कि राजग-2 में शिक्षा के स्तर पर जो कुछ होने जा रहा है – और ज़ाहिर है कि बहुत कुछ होने जा रहा है – उसमें दीनानाथ बत्रा नेतृत्वकारी भूमिका में रहेंगे। ऐसे व्यक्ति के विचारों को सीधे उसकी पुस्तक से हासिल करने में किसकी दिलचस्पी नहीं होगी! लिहाज़, इपंले प्रभात प्रकाशन से साढ़े तीन सौ रुपये में उनकी किताब ख़रीद लाया और यद्यपि उसे पढ़ना असंभवप्राय था, उसने पढ़ने की कोशिश में कोई कसर नहीं रखी। इस कोशिश के दौरान जो अनुभव हुए, उनका सारांश आगे दिया जाता है।

अगर आप आजकल के बाबाओं को प्रामाणिक भारतीयता का सबसे ठोस उदाहरण मानते हों, तो बत्रा जी की यह किताब भारतीयता से ओतप्रोत है। इसकी अंतर्वस्तु और शैली, दोनों बाबाओं के प्रवचन जैसी है। इसमें न किसी उद्धरण का स्रोत बताने की ज़हमत उठाई गयी है, न किसी तथ्य को प्रमाणपुष्ट करने की। (वह सब बत्रा जी कह रहे हैं, यही क्या काफ़ी नहीं है!) उद्धृत किये गये लोगों का पूरा परिदृश्य इतना वैविध्यपूर्ण है कि आप दंग रह जाएंगे। यहां श्री मां, साईं बाबा, एकनाथ जी, स्वामी रंगनाथन, मां शारदा इत्यादि से लेकर विक्टर ह्यूगो, स्वामी विवेकानंद, रामकृष्ण परमहंस, महात्मा गांधी, बिनोवा भावे, गिजुभाई, दीनदयाल उपाध्याय, श्री गोलवलकर, डाॅ. कोठारी, डाॅ. राधाकृष्णन और पता नहीं कौन-कौन से विचारक मौजूद हैं और ऐसा लगता है कि इन सबने मिल कर कुछ एक जैसी ही बातें कही हैं। उद्धरणों के साथ कहीं भी संदर्भ नहीं बताया गया है, पर वह उतनी चिंताजनक बात नहीं। चिंताजनक यह है कि पढ़ कर कई बार संदेह होता है कि लेखक अपने ही शब्दों पर उद्धरण चिह्न ठोंक कर उन्हें किसी नामी-गिरामी के हवाले किये दे रहा है। पृष्ठ 177 पर स्वामी विवेकानंद का एक उद्धरण हैः ‘‘समझ के बिना कोरा ज्ञान मस्तिष्क में पड़ा सड़ांध पैदा करता है। प्रेम के ढाई अक्षर आत्मसात करने से जीवन सफल तथा धन्य हो जाता है।’’ फिर 186 पर विवेकानंद का उद्धरण हैः ‘‘शिक्षा जानकारियों का ढेर नहीं, जो मस्तिष्क में पड़ा रहकर सड़ांध पैदा करता है। ज्ञान के चार अक्षर भी यदि हम जीवन में आत्मसात कर लें तो हमारा जीवन सफल हो जाए।’’ चूंकि दोनों उद्धरणों का स्रोत नहीं बताया गया है, इसलिए प्रामाणिकता जांची नहीं जा सकती, पर यह अनुमान लगाया जा सकता है कि ‘मस्तिष्क’, ‘सड़ांध’, ‘अक्षर’, ‘जीवन’, ‘आत्मसात’ और ‘सफल’ जैसे शब्दों को दुहराते हुए, और ‘प्रेम के ढाई अक्षर’ तथा ‘ज्ञान के चार अक्षर’ का अंतर बरत कर, दो जगह दो बातें स्वामी विवेकानंद ने नहीं कही होंगी। यह बत्रा जी की अपनी मेधा से निकले हुए सूत्र ही हो सकते हैं जिन्हें अधिक वज़न देने के लिए उन्होंने विवेकानंद के नाम कर दिया है। यह बात तब और पुष्ट होती है जब आप पाते हैं कि पृष्ठ 17 पर लेखक बिना किसी को उद्धृत किये यह बात कह रहा हैः ‘‘शिक्षा जानकारियों का ढेर नहीं है, जो मस्तिष्क में पड़ी रहकर सड़ांध पैदा करती है।’’ फिर पृ. 205 पर उसके अपने शब्दः ‘‘शिक्षा कोरा अक्षर-ज्ञान नहीं है, जो मस्तिष्क में पड़ा सड़ांध पैदा करता है।’’ और तो और, इसी पुस्तक में बत्रा जी की जो कविताएं संकलित हैं, उनमें भी यह रचनात्मक सूत्रीकरण मिलता है, जिससे यह अंतिम रूप से सिद्ध हो जाता है कि विवेकानंद को इसका श्रेय उन्होंने महज़ उदारतावश दे दिया था। कविता पंक्ति हैः ‘यदा-कदा मास्टरजी आते हैं, मस्तिष्क में ढूंसते हैं अक्षरज्ञान / वह वहां सदा सड़ांध पैदा करता है, नहीं है यह अनुभूत ज्ञान।’

ग़रज़ कि सड़ांध ने बत्रा जी के शिक्षा-चिंतन पर लगभग क़ब्ज़ा जमा लिया है। यह स्वामी विवेकानंद के चिंतन से आया हुआ शब्द है, ऐसा मानने को जी नहीं करता, पर जांच कैसे हो!

पृष्ठ 186 पर डाॅ. राधाकृष्णन को लेखक ने अंग्रेज़ी में उद्धृत किया हैः “Stagnation is death and motion is life”। यही वाक्य इसी तरह पृष्ठ 177 पर लेखक की अपनी बात के रूप में है। अब चूंकि राधाकृष्णन स्वयं बत्रा जी के जीवनकाल में रहे हैं, इसलिए यह भी नहीं कहा जा सकता कि बत्रा जी के रूप में उनका पुनर्जन्म हुआ है और दोनों एक ही व्यक्ति हैं!

किताब में आये सभी उद्धरणों का हाल ऐसा ही है। कुछ नमूने देखें:

पूर्व राष्ट्रपति ए.पी.जे. अब्दुल कलाम ने लिखा है-

जब हृदय में शुद्धता हो, तो चरित्र में सुंदरता आ जाती है,

यदि चरित्र सुंदर हो तो, परिवार में समरसता होती है। -पृ. 32

श्रीमां का कहना है- ‘‘जो व्यक्ति लक्ष्यविहीन है, वह सुखविहीन तथा श्रीविहीन है।’’ -पृ. 107

ऐसे व्यक्तियों के संबंध में स्वामी रामतीर्थ ने कहा है-

“He has the strength of ten, because his heart is pure. -पृ. 183

मैक्समूलर ने लिखा था- “We have conquered India once we shall conquer it again through Education.” (उद्धरण यथावत) -पृ. 218

यूसुफ अली की पुस्तक, जिसमें उसने महिलाओं/बालिकाओं की शिक्षा के संबंध में जो विचार लिखे हैं, वे विचार करने योग्य हैं। उसका कथन है कि जब तक लड़कियों की शिक्षा में सुधार नहीं होता, तब तक भारत की स्थिति में सुधार की संभावना बहुत ही कम है।  -पृ. 43

ऐसे उद्धरणों से पूरी किताब भरी पड़ी है। बात किसी भी स्तर की हो, उसे किसी-न-किसी के उद्धरण से पुष्ट किया गया है। लेखक को यह भले ही न पता हो कि संदर्भ-सहित उद्धरण किस तरह दिये जाते हैं, यह अवश्य पता है कि अपनी हर बात को किसी और के हवाले से पुष्ट करते चलना एक प्रतिष्ठाप्राप्त अकादमिक पद्धति है। इस पद्धति का उपयोग करने के लिए सचमुच जो श्रम करना पड़ता है, उसकी क्षमता और अवकाश न भी हो तो क्या फ़कऱ् पड़ता है? अपनी ओर से वाक्य बनाओ और उसे किसी के हवाले कर दो! जहां कोई बड़ा नाम ध्यान न आए, वहां ‘एक शिक्षाविद् का मत’ बताकर काम चला लो (पृ.23)। इसी पृष्ठ पर किन्हीं राडन और सर आपर्सीनन को भी उद्धृत किया गया है जिनके बारे में कुछ पूछते हुए भी इपंले को डर लगता है कि कहीं लोग पलटकर यह न कह बैठें कि अरे, इन्हें नहीं जानते, कैसे अनपढ़ हो? इसलिए इपंले यह क़यास लगाने की गुस्ताख़ी नहीं करेगा कि ये नाम काल्पनिक भी हो सकते हैं। हां, यह कहने की गुस्ताख़ी ज़रूर करेगा कि यह जो कोई विदेशी या ख्रिस्तान है राडन नाम का, उसने शिक्षा का ‘उद्देश्य व्यक्ति का परम्ब्रह्म में विलय प्राप्त करना’ तो नहीं ही बताया होगा, जैसा कि उसके नाम से उद्धृत कथन में बताया गया है। लिहाज़ा, या तो राडन का नाम काल्पनिक है या फिर उसका कथन। शायद इसीलिए अपनी कल्पना को और कष्ट न देकर बत्रा जी ने उसी पृष्ठ पर अन्यत्र ‘एक शिक्षाविद्’ से काम चला लिया है।

चूंकि इस तरह के उद्धरणों की प्रामाणिकता को जांचने का कोई तरीका नहीं है, इसलिए बत्रा जी यहां बाइज़्ज़त न सही, संदेह का लाभ पाकर निकल जाते हैं; फंसते वहां हैं जहां सचमुच किसी प्रसिद्ध कथन या काव्यांश को उद्धृत कर बैठते हैं। ‘कामायनी’ की पंक्तियों का उन्होंने क्या हाल किया है, देखिये:

‘‘ज्ञान भिन्न, क्रिया भिन्न,

और इच्छा क्यों पूरी हो मन की।

यदि एक-दूसरे से ना मिल सकें,

तो विडंबना है जीवन की।’’   -पृ.127

प्रसाद जी के साथ एक ही बार ऐसा बरताव करके वे संतुष्ट नहीं हुए। दुबारा-तिबारा भी किया। पृ. 186 और फिर पृ. 220 पर यह छंद इस रूप में उद्धृत है:

‘‘ज्ञान-भिन्न क्रिया कुछ और,

इच्छा क्यों पूरी हो मन की,

एक-दूसरे से न मिल सकें,

तो विडंबना है जीवन की।’’

इसी तरह एक छोटी-सी कहानी रचते हुए लेखक ने लक्ष्मण और उनकी पत्नी उर्मिला के बारे में लिखा है, ‘‘लक्ष्मण जब वनवास जाने लगे थे तो उन्होंने कहा था कि मैं श्रीराम के साथ जा रहा हूं, यह नहीं कहा कि मैं कब लौटूंगा। उर्मिला ने अपनी एक सखी से यह शिकायत की थी कि सखि, वे मुझसे कहके जाते।’’ (पृ. 269) याद कीजिए कि ‘सखि, वे मुझसे कह कर जाते’ मैथली शरण गुप्त की पंक्ति है जो उनकी कविता में गौतम बुद्ध की पत्नी यशोधरा का कथन है।

पश्चिमी विद्वत्ता की बराबरी में दिखने की ग़रज़ से बत्रा जी पूरी किताब में लगातार अंग्रेज़ी में कुछ-कुछ कहते चलते हैं। पढ़ते हुए काशीनाथ सिंह की कहानी ‘संकट’ याद आती है जिसमें फ़ौज से छुट्टी पर आया हुआ राधो अपने दोस्तों के साथ बातें करते हुए हास्यास्पद ढंग से अंग्रेज़ी का प्रयोग करता चलता है। कुछ नमूनेे देखिएः

Keep your mind on things that you want and off the things that you don’t want. (27)

Our mind is videographer and tape recorder. (27)

In the words of Swamiji The sutras apply to and cover each and every chapter of each and every branch of mathematics (Arithmetic’s) Algebra,Geometry, Trigonometry, astronomy, Calculus etc. (49) (उद्धरण यथावत)

We are the trustee of the wealth. (122)

Read, chew and digest. (176)

All for one and one for all is our song. (188)

ये वाक्य अचानक हिंदी के बीच टपक पड़े हैं और उद्धरणों के रूप में नहीं हैं। ऐसे उदाहरण अनगिनत हैं। प्रो. कपिल कपूर ने किताब का प्राक्कथन लिखते हुए ठीक ही कहा है, ‘सबसे पहले इस पर ध्यान दिया जाना चाहिए कि हिंदी में पुस्तक रचना का श्री बत्राजी का फ़ैसला सिद्धांतों के आधार पर लिया गया है। आजकल शिक्षित भारतीयों के बीच अंग्रेज़ी के प्रति दासता की मनोवृत्ति मौजूद है। हर कोई इस उम्मीद में अंग्रेज़ी में लिखना चाहता है कि शिक्षित लोग पर उसका रोब पड़ेगा…।’ बत्रा जी को पढ़ते हुए समझा जा सकता है कि किस तरह उनका अद्भुत अंग्रेज़ी ज्ञान उन्हें बार-बार उस ज़बान की ओर धकेलता है, पर सिद्धांतों के आधार पर लिए गए फ़ैसले के चलते ही वे हिंदी में लिखते जाते हैं। कहीं-कहीं अंग्रेज़ी में कुछ कह भी जाते हैं, तो निश्चय ही ऐसा वे इस उम्मीद के साथ नहीं करते होंगे कि ‘शिक्षित लोगों पर उसका रोब पड़ेगा’। प्रो. कपिल कपूर का कहना बिल्कुल दुरुस्त है। अनुमान लगाया जा सकता है कि ऐसा वे, काशीनाथ सिंह के राधो की तरह, अशिक्षितों पर रोब ग़ालिब करने के उद्देश्य से करते होंगे।

ग़लत-सही उद्धरणों और अंग्रेज़ी वाक्यों वाली यह बाबासुलभ शैली भी क्षम्य होती, अगर कम-से-कम सुसंबद्ध तरीके से अपनी बात कहने का गुर ही बाबाओं से ले लिया गया होता। बत्रा जी की मुश्किल यह है कि प्रवचन और लेखन का यह बुनियादी सिद्धांत भी उनके यहां मात खा जाता है। वे अपनी जैसी-तैसी स्थापनाओं को बस जैसे-तैसे स्थापित करते चले जाते हैं। किताब के पहले ही अध्याय को देखें तो उसका शीर्षक है, ‘भारतीय शिक्षा का स्वरूप’, पर पूरे अध्याय में इस स्वरूप को लेकर शायद ही कोई बात कही गयी है। असंबद्ध अनुच्छेदों में तरह-तरह की बातें कहता हुआ लेखक शिक्षासंबंधी सरकारी तंत्र के ढांचे पर विचार व्यक्त करने लगता है और फिर अचानक, बिना किसी बुद्धिगम्य कारण के, ‘गांधी के शिक्षा संबंधी विचार’ उपशीर्षक के अंतर्गत अपनी समझ के अनुसार उनके विचारों को बिंदुवार रखने लगता है। इसी तरह एक जगह शिक्षा के अधिकार को लेकर नेशनल सैंपल सर्वे की कुछ बातों को बिंदुवार रखते हुए एक बिंदु यह भी दिया गया हैः ‘हम कहते हैं – सा विद्या या विमुक्तये, अब तो कहा जाता है – सा विद्या या नियुक्तये’ (पृ. 201)। पढ़ कर दिमाग़ चकरा जाता है कि आखि़र नेशनल सैंपल सर्वे वालों को क्या हो गया कि ‘30 प्रतिशत विद्यालयों के पास भवन नहीं हैं’ जैसी बातें बताते-बताते संस्कृत की शब्दक्रीड़ा में लग गए!

ऐसी असंबद्धता के उदाहरण किताब में शुरू से आखि़र तक मिलते हैं। वस्तुतः इसे पुस्तक का एक गुण नहीं, बल्कि अंगी गुण कहना चाहिए। विचार जैसे भी हों, उन्हें विचार के रूप में सिलसिलेवार रखने की एक लेखक से जो अपेक्षा की जाती है, बत्रा जी उसकी जमकर उपेक्षा करते हैं और शायद इसके अलावा उनके पास कोई चारा भी नहीं है।

असंबद्धता के इस अंगी गुण के बीच बत्रा जी के शिक्षा-चिंतन की जो कुछ मूल्यवान बातें पकड़ में आती हैं, उन्हें इस प्रकार सूत्रबद्ध किया जा सकता है:

  • शिक्षा का उद्देश्य है, ‘बुद्धि और हृदय का संतुलित समुत्कर्ष करना, फुरतीले शरीर में व्यवहारशील मस्तिष्क रखना तथा आवश्यक ज्ञान प्राप्त कर अपने व्यक्तिगत तथा पारिवारिक जीवन को सुख-संपन्न बनाकर मोक्ष को प्राप्त करना’ (पृ. 24)।
  • माक्र्स, मैकाले और मैक्समूलर – ‘इन तीन मक्कारों ने हमारी शिक्षा, संस्कृति और इतिहास को विकृत किया, इन्होंने हमारे गौरव को विदेशी कर्णधारों के नाम के साथ जोड़कर हमारे स्वर्ण पृष्ठों पर कालिख लगाने का काम किया’ (पृ. 50)।
  • ‘स्वतंत्र भारत में सबसे अधिक अन्याय जिस विषय के साथ हुआ है, वह है इतिहास। इतिहास-लेखन के लिए एनसीईआरटी द्वारा जो मार्गदर्शन के निर्देश दिए गए हैं, उससे इस विषय का विकृत स्वरूप हमारे सम्मुख आएगा। देश की एकता को प्रोत्साहन देने का यह अप्राकृतिक प्रयास सफल नहीं हो सकेगा।’ (पृ. 138)
  •  आदर्श बालक की संकल्पना को साकार करने के लिए नमस्कार मुद्रा, मौन, ओंकार उच्चारण, प्राणायाम, ब्रह्मनाद, गायत्री मंत्र एवं शांति पाठ का अभ्यास, यज्ञ-हवन, प्रातःस्मरण, योगाभ्यास, यम-नियम आदि का पालन, उन्हें गीता, रामायण का पाठ और भावार्थ बताना – ये सब आवश्यक कार्यक्रम हैं। (देेखिए, ‘आदर्श बालक की संकल्पना’ शीर्षक अध्याय)
  • ‘राष्ट्रीय शिक्षा नीति के संबंध में विचार करते हुए संस्कृति, राष्ट्र, संप्रदाय, धर्म, पंथनिरपेक्षता, शिक्षा, आचार्य, विद्यालय, पाठ्यक्रम, परीक्षा आदि शब्दों के ठीक अर्थ तथा इनसे जुड़े भावों को यदि देश की मिट्टी के साथ नहीं जोड़ा गया तो कोई भी शिक्षा योजना राष्ट्रीय नहीं हो सकती और इसका परिणाम होगा भारत में अभारत के चिह्न।’ (पृ. 205)
  • शिक्षा का अटूट संबंध संस्कृति और राष्ट्र से है। हमारे देश में कहा-सुना जाता है कि भारतीय संस्कृति मिलीजुली (कंपोजिट) है। वास्तविकता यह है कि संस्कृति अलग-अलग हिस्सों से नहीं बनती। संस्कृति गंगा की धारा के समान है। संस्कृति में नए तत्व आते हैं, परंतु उनका पृथक् कोई अस्तित्व नहीं रहता। भारत की संस्कृति कहने का अर्थ हिंदू संस्कृति लगाया जाता है और यह उचित भी है। संकोच या प्रयोजनवश इस तथ्य को स्वीकार न करने केे बड़े घातक परिणाम हुए हैं।’ (पृ. 204-5)
  •  ‘जाति, रंग, प्रदेश, धर्म अथवा भाषा के आधार पर किसी व्यक्ति तथा व्यक्ति समूह को विशेष सुविधाएं अथवा अधिकार देने की प्रथा बंद की जाए।’ (पृ. 206)

इन बातों की व्याख्या करने और इनकी शक्तियां-सीमाएं बताने की हिमाकत कौन करे! क्या यह बताने की ज़रूरत है कि ये सारी बातें मोहन भागवत की इस घोषणा, कि ‘इस देश में सभी हिंदू हैं’ और एक साध्वी के इस अविस्मरणीय वाक्य, कि जो रामज़ादे नहीं हैं वे ………..ज़ादे हैं, का शिक्षा के क्षेत्र में अनुवाद हैं?

बत्रा जी ने किताब के आखि़री हिस्से में शिक्षासंबंधी अपनी कुछ कविताएं और कहानियां भी संकलित कर दी हैं। प्राक्कथन-लेखक प्रो. कपिल कपूर का मानना है कि ये ‘सभी कविताएं मन को द्रवीभूत करती हैं तथा प्रभावशाली हैं।’ ऐसी प्रभावशाली कविता का एक नमूना देखिएः

‘जहां रहते वहां पड़ोसी तो हैं, पड़ोसीपन है कहां?

लड़ते-झगड़ते, गाली-गलौज, शांति रहती है कहां?

विद्यालय तो गली-गली में हैं, विद्या का आलय है कहां?

कक्षा में विद्यार्थी तो हैं, अध्यापक पता नहीं हैं कहां?

अफ़सोस कि जिस तरह भारतीय शिक्षा व्यवस्था बत्रा जी के बताये रास्ते पर नहीं चल रही, उसी तरह हिंदी कविता भी उनके जैसी काव्यकला के नमूने पेश नहीं कर पा रही। कहां हैं हिंदी के पास कथ्य और शिल्प में ऐसी अनोखी कविताएं?

याद रखें कि दीनानाथ बत्रा जी इस समय संघ परिवार के सबसे कद्दावर शिक्षा-चिंतक हैं। ‘शिक्षा बचाओ आंदोलन’ और ‘शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास’ उन्हीं के नेतृत्व में चल रहे हैं। अगर और किसी वजह से नहीं, तो सिर्फ़ बत्रा जी की इस किताब को देखकर ही कोई भी शिक्षित व्यक्ति समझ सकता है कि आज शिक्षा को सबसेे पहले इसी शिक्षा बचाओ आंदोलन सेे बचाने की ज़रूरत है।

संजीव कुमार

संजीव कुमार

संजीव कुमार। युवा आलोचक और कहानीकार। ‘जैनेन्द्र और अज्ञेयः सृजन का सैद्धांतिक नेपथ्य’ पुस्तक के लिए देवीशंकर अवस्थी सम्मान। दिल्ली विश्विद्यालय के देशबंधु कॉलेज में  प्राध्यापक। इनसे sanjusanjeev67@gmail.com पर संपर्क सम्भव है।

हंस, जनवरी, 2015 से साभार 

घोंघा: संजीव कुमार (कहानी बहस के लिए)

इस कहानी के इर्द-गिर्द एक बहस कहानीकारों, आलोचकों और सुधि पाठकों के बीच चल पड़ी है युवा आलोचक आशुतोष कुमार ने अपने फेसबुक वाल पर अभी हाल में ही लिखा है- “संजीव कुमार की कहानी ‘घोंघा’ पर मित्रों में बहस जारी है हिंदी आलोचना के एक नए विमर्श के मुताबिक़ इसके ‘पोर्नोग्राफिक’घोषित हो जाने का खतरा भी है। इस कहानी को जल्दबाजी में न पढ़ियेगा। हमारे सामाजिक मन की बहुत भीतरी तहों में उतर कर उसे विचलित करने का माद्दा इस कहानी में है। लैंगिक, वर्गीय, समाज-आर्थिक प्रतिसंधों (faultiness)  के टकराव का यौन दमित समाज में युवा हो रही पीढ़ी के भावबोध पर कितना विनाशकारी असर हो सकता है,इसे समझना हो तो कहानी पढ़ लीजिये।” सवाल उठाये जा रहें हैं कि इस कहानी में कहन का जो खिलंदड़ा अंदाज़ लिया गया है ,वह  त्रासदी की भीषणता को घटा कर एक मनोरंजक गप्प में बदल देने की समसामयिक  हिकमत का नमूना तो नहीं हो  गया है? कथावाचन की क्लासिकी परम्परा को एक अमानवीय वृत्तांत की रचना के उपकरण के रूप में चित्रित करना क्या कहानी कहने- सुनने के कौतूहल मात्र को संदिग्ध नहीं बना देता ? स्त्री के प्रति सहानुभूति का दावा करती हुयी कहानी स्त्री की असहाय दशा का ग्राफिक चित्रण  कर ती कहीं पाठकों की दमित यौन भावनाओं को उत्प्रेरित करने का बहाना तो नहीं बन रही?

‘घोंघा’ कहानी जिस चुहलबाजी या ‘मनोरंजक’ उठान के साथ शुरू होती है, कहानी उसका निर्वाह नहीं कर पाती क्योंकि कहानी एक ट्रैजिक ‘अंत’ के साथ पाठकों के बीच खुलती है। कहानी अपनी शुरुआत के साथ ही जैसे पाठकों को अपने बीच साधारणीकृत कर लेती है. लेकिन यही शुरुआत कहानी के संपूर्ण प्रभाव में एक विस्मृत पार्श्व बन जाती है. क्लासिकल कहानियों की जो भी स्मृति हमारे कथा-संसार में विद्यमान हैं, उसका बहुलांश कहानी के ऐसे फॉर्म को सहजता प्रदान नहीं करता है. लेकिन एक बात तो स्पष्ट है कि यह कहानी अपने कथात्मक-स्वाद में भले दो स्तरों पर चलती हो लेकिन इन दोनों स्तरों का उत्स कहीं न कहीं एक ही सामाजिक-सच्चाई है. एक सवाल यहाँ वाजिब हो सकता है कि जिस सामाजिक सच्चाई को व्यक्त करने के लिए कहानीकार ने एक लोक-स्वीकृत फॉर्म, जो पाठकों को सहज ही कथा का आनंद देता है, को त्याज्य समझा, वह क्या इतना अनिवार्य था?

सवाल यह भी हो सकता है कि कथावाचकों का संसार क्या सचमुच इतना निष्करुण भी है? यह बात सिर्फ इसलिए नहीं कही जा रही  है कि कथाकार ने कथावाचन के लोकप्रिय अंदाज को विस्मृति के हवाले कर दिया बल्कि इसलिए भी कि चौपालों का कथानायक-कथावाचक ‘जितुआ’ कैसे निष्करुण और स्त्रीविरोधी समाज का प्रतिनिधि कारक के बतौर सामने आता है. 

इस कहानी का महत्व इसलिए भी सुरक्षित होना चाहिए कि यह कहानी एक ऐसे दौर में लिखी गयी है जब कहानीकारों के एक अतिप्रचारित तबके ने भाषा की ‘चुहलता’ के सामने मानों आत्मसमर्पण कर दिया हो. ऐसा नहीं है कि संजीव कुमार में उस ‘चुहलता’ की प्रतिभा नहीं है बल्कि उनके इस प्रतिभा की व्युत्पति एक सामाजिक-वैचारिक अभ्यास की कमानी पर कस कर होती है।
कोई सत्ता-प्रतिष्ठान रचनात्मक-संसार को कैसे गैर रचनात्मक बहसों में उलझाकर व्यक्तिगत लानत-मलानत में खींसे निपोरता है इसका सबसे बड़ा उदाहरण अभी हिन्दी के बौद्धिक समाज में देखने को मिल रहा है। ऊपर से तुर्रा यह कि बहस इस बहाने शुरू हुई कि रचना को देखना चाहिए न कि रचनाकार में पुष्ट उसके वैचारिक व्यक्तित्व को। 
तो इस प्रस्ताव के साथ हम इस कहानी को बहस के लिए प्रस्तावित करते हैं। हमें उम्मीद है कि कहानी विचारोत्तेजक लगेगी और आप भी कुछ टिप्पणीनुमा जोड़ना चाहेंगे। 

आप अपनी टिप्पणी-लेख-समीक्षा को इन पतों पर मेल कर सकते हैं- ashuvandana@gmail.com और  udayshankar151@gmail.com। धन्यवाद। 

Massacre in Korea By Picasso

Massacre in Korea By Picasso

घोंघा

BY संजीव कुमार

उम्र की दूसरी-तीसरी दहाई में अनगिनत बार मैंने वह सपना देखा होगा…

पर मुश्किल यह है कि अभी जब उस सपने से कहानी शुरू करना चाहता हूं, कुछ भी क़ायदे से याद नहीं आ रहा।

ये भी हो सकता है कि हर बार मैं उसे वही सपना समझता होऊं, पर वह वही न होता हो। कुछ अजीबो-ग़रीब चीज़ें हर सपने में एक-सी होती हों, जिनके चलते लगता हो कि सपना वही है। जैसे यह, कि शहर के अपने छात्रावास से निकलते ही मैं गांव की बूढ़ी गंडक नदी के घाट पर पहुंच जाता हूं! जैसे यह, कि गंडक-तट की रेतीली मिट्टी पर पड़े असंख्य घोंघों के बीच मैं बचता-बचाता चलता हूं और साथ में सोचता हूं कि मैं किसे बचा रहा हूं, ख़ुद को या घोंघों को? जैसे यह, कि नदी की सतह समतल न होकर उन्नतोदर है, बीच से उठी हुई! जैसे यह, कि बांध की ढलान पर सलवार-कुर्ते की एक जोड़ी पड़ी है, अपने होने में किसी के न होने को अनायास दर्ज करती। जैसे यह, कि अचानक मुझे पता चलता है, यह बूढ़ी गंडक नदी नहीं, बूढ़ा गंडक समुद्र है!! जैसे यह, कि मैं धरती से आसमान तक फैले डरावने जबड़े जैसी एक लहर से बचने के लिए भागता हूं और घोंघों के कठोर खोल के टूटने-चुभने से मेरे तलवे लहूलुहान होते जाते हैं और रफ़्तार ऐसी कि घोंघों से बस थोड़ी ही तेज़!

तो मुझे यह नहीं कहना चाहिए कि अनगिनत बार मैंने यह सपना देखा होगा। कहना चाहिए कि अनगिनत बार ये चीज़ें मेरे सपनों में आयी होंगी, जोड़-घटाव के अलग-अलग समीकरणों में उलझी।

इनके पीछे भी एक कहानी है। यों तो एक नहीं, अनेकों कहानियां होंगी, पर एक को मैं अपने पूरे होशोहवास में जानता हूं। उस एक कहानी के पीछे भी अनेकों कहानियां होंगी जिन्हें मैं बिल्कुल नहीं जानता।

हमारा कॉलेज गंगा के किनारे था। अंग्रेज़ों का बनवाया हुआ वह परिसर इतना विराट और जटिल था कि मैं विष्वास के साथ नहीं कह सकता कि स्कूल से निकलने के बाद के जो पांच साल मैंने वहां गुज़ारे, उनमें कॉलेज की इमारत के हर कोने को देख पाया होऊंगा। शहर की मुख्य सड़क पर–उसे ‘मेन रोड’ कहा भी जाता था–कॉलेज का प्रवेश-द्वार था, जिससे घुसने के बाद पेड़ों की क़तारों के बीच एक लंबा फ़ासला तय करके ही हम इमारत के भीतर के किसी ठिकाने तक पहुंच पाते थे। हमारा छात्रावास, कई और छात्रावासों के साथ, इसी परिसर में एक तरफ़ था, गंगा के ज़्यादा क़रीब। लेकिन एक ही परिसर के भीतर हमारे गौरवशाली कॉलेज और दयनीय छात्रावास की इमारत के बीच कोई तुलना न थी। दरअसल, उसे इमारत कहना ही अजीब लगता है। वह अंग्रेज़ों के ज़माने की एक फ़ौजी बैरक थी, करकट यानी ऐस्बेस्टाॅस की छत वाली, जिसे छात्रावास में तब्दील करने के बाद बेहतर तो क्या, ज्यों-का-त्यों बनाये रखने की भी कोई कोशिश नहीं की गयी थी। लिखित इतिहास पर भरोसा न करने वाले मेरे ज़्यादातर सहपाठियों का तो मानना था, और इसके लिए मौखिक स्रोतों के अनगिनत साक्ष्य उनके पास थे, कि वह फ़ौजियों की बैरक नहीं, उनका अस्तबल था जिसे छात्रावास में तब्दील करते वक़्त सिर्फ़ इतना किया गया कि हर कमरे के सामने की लोहे वाली बैरियर हटा कर वहां दीवार चुनवा दी गयी और एक दरवाज़ा निकाल दिया गया। इसके अलावा सब कुछ घोड़ों के हिसाब से ही बना रहने दिया गया। करकट की छत के नीचे लगी प्लाई की फॉल्स सीलिंग के बारे में उनका कहना था कि वह तो अंग्रेज़ों के घोड़ों के लिए भी ‘आवश्यक आवश्यकता’ की श्रेणी में आता होगा। वह न होती तो मई-जून के महीनों में, जब करकट की वजह से इन कमरों में अदृश्य आग जल रही होती, घोड़े शर्तिया बग़ावत कर बैठते और अंग्रेज़ों को यह साबित करने में अपने कई इतिहासकारों को झोंकना पड़ता कि चूंकि घोड़ों का सामंतवाद के साथ क़रीबी रिश्ता रहा है, इसलिए इस बग़ावत का मूल चरित्र प्रतिगामी है।

बहरहाल, निहायत घोड़ोपयोगी होते हुए भी हमारा छात्रावास बाहर कहीं किराये का कमरा लेकर रहने की बनिस्पत बहुत आरामदेह था। उसके आसपास खुला-खुला वातावरण था, उत्तर की तरफ़ कुछ क़दम के फ़ासले पर गंगा थी, चारों ओर काफ़ी बड़ी संख्या में पेड़-पौधे थे, और सबसे बड़ी बात कि एक ‘बबजिया’ की देख-रेख में चलने वाला किफ़ायती मेस था जहां 110 रुपये में महीने भर सुबह-शाम का खाना मिल जाता था। जिस मैथिल युवक को ‘बाबा’ के साथ सम्मानसूचक ‘जी’ और अपमानसूचक ‘आ/वा’ लगा कर ‘बबजिया’ कहा जाता था, वही मेस का कर्ताधर्ता और सर्वेसर्वा था। मेस में खाने के हक़दार तो हॉस्टलर्स ही थे, लेकिन आठ-दस बाहर के ग्राहक भी वह बनाये रखता था जिनसे वह उसी खाने के 140 रुपये वसूलता था।

बाहर के ग्राहकों में सिर्फ़ जीतेंद्र था जिससे बबजिया 110 रुपये ही लेता था, या कहिए कि ले पाता था। जीतेंद्र हमारे ही कॉलेज का विद्यार्थी था और हमारे छात्रावास के साथ उसका ऐसा रिश्ता था कि बहुत-से लोग उसे यहीं का अंतेवासी समझते थे। रहता भी पास ही था, उपप्राचार्य की कोठी के आउटहाउस में। प्राचार्य और उपप्राचार्य को कॉलेज के परिसर में ही अंग्रेज़ों के ज़माने की बनी कोठियां मिली हुई थीं। दोनों कोठियां गंगा के ठीक किनारे पर बनी थीं जिनमें पेड़ों और झाड़-झंखाड़ से भरा बड़ा-सा अहाता था। अहाते और गंगा की तरफ़ जाती ढलान के बीच कम्पाउंड वॉल थी जिसे अहाते की तरफ़ से देखो तो खेत की मेड़ से बस थोड़ी ही ऊंची नज़र आती, पर गंगा की तरफ़ से देखने पर उसकी ऊंचाई आठ फीट से कम न थी। प्राचार्य ने तो नहीं, पर उपप्राचार्य ने अपना आउटहाउस किराये पर एक मामा-भांजे को दे रखा था। जीतेंद्र वही भांजा था। उससे उम्र में तीन-चार साल बड़ा उसका मामा शायद ठेकेदारी के धंधे में हाथ-पैर मार रहा था। वह अक्सर सुबह जल्दी निकल कर देर रात लौटता था। इसीलिए हमारे मेस में खाना सिर्फ़ जीतेंद्र खाता था।

लंच और डिनर के समय के अलावा भी जित्तू का काफ़ी वक़्त हमारे छात्रावास में बीतता। बी.ए. अंतिम वर्श के सारे लड़के उसके मित्र थे और वह प्रायः किसी-न-किसी के कमरे में बैठा पाया जाता। ग़रज़ कि हमारा छात्रावास उसकी अड्डेबाज़ी का पसंदीदा ठिकाना था।

इस ठिकाने पर दो चीज़ों को उसकी विशिष्ट पहचान का दर्जा हासिल था। पहली चीज़ थी उसकी हंसी, जो किसी भी तरह की मासूमियत से कोसों दूर थी। हंसते हुए अक्सर उसकी आंखों में एक शैतानी चमक होती जो ऐसे सभी लोगों की आंखों में होती है जिनके भीतर दूसरों को नुकसान पहुंचा कर, या किसी भी तरीक़े से उन्हें मायूसी, हताशा या कुंठा में धकेल कर लुत्फ़ लेने की प्रवृत्ति होती है। लेकिन उसकी पहचान के रूप में स्थापित विशेषता यह नहीं थी। पहचान वाली विशेषता यह थी कि उस हंसी में घोड़ों की हिनहिनाहट और परिंदों के परों की फड़फड़ाहट का विचित्र संयोग था। हिनहिनाहट का संबंध गले से रहा होगा और फड़फड़ाहट का जीभ और होठों से। बल्कि यह कहना ज़्यादा सही होगा कि हिनहिनाहट उसकी हंसी का मूल स्वर था और फड़फड़ाहट उस लार की वल्गा को खींचे रखने का शोर जो हर हंसी के साथ जीतेंद्र के मुंह से बरबस बाहर की ओर चल पड़ती थी। ऐसी हंसी पूरे हॉस्टल  में किसी की नहीं थी। वह कॉरीडोर के कोने वाले कमरे में भी हंस रहा हो तो दूसरे कोने में बैठा बंदा समझ जाता कि जितुआ हंस रहा है। और जितुआ हंस रहा है, मतलब पूरी संभावना है कि उसके आसपास कोई-न-कोई परेशान या चिड़चिड़ा या बग़लें झांकता या मायूस या आहत है।

कॉरीडोर के एक कोने वाले कमरे से दूसरे कोने वाले कमरे तक आवाज़ों के पहुंच जाने का रहस्य यह था कि कमरों में लगी फ़ाॅल्स सीलिंग जगह-जगह से उजड़ चुकी थी और उसके तथा करकट की छत के बीच सभी कमरों को जोड़ता हुआ एक सुरंगनुमा ख़ालीपन था, क्योंकि कमरों के बीच की पार्टीशन वाली दीवार फॉल्स सीलिंग की ऊंचाई तक ही थी। लिहाज़ा किसी एक कमरे से उठती आवाज़ उस सुरंग में घुसने के बाद सभी कमरों में यथायोग्य बंट जाती। बिल्कुल पास के कमरों में उसकी गुणवत्ता उत्तम, थोड़े बाद वाले कमरों में मध्यम और ख़ासे दूर के कमरों में अधम होती।

और इस सुरंग से होकर आती आवाज़ों में से जीतेंद्र की हंसी ही नहीं, उसके गपास्टक की आवाज़ भी एकदम अलग से पहचानी जाती थी। जी हां, यह गपास्टक या कि़स्साग़ोई उसकी दूसरी पहचान थी। वह जहां भी बैठता, वहां धीरे-धीरे पांच-सात लड़के इकट्ठा हो ही जाते, क्योंकि वह एक-के-बाद-एक दिलचस्प कि़स्से इंतहाई सहज और ग़ैरबनावटी अंदाज़ में सुनाता जाता। महमूद और दानिश भी, जो इन दिनों दास्तानगोई की कला को दुबारा ज़िंदा कर रहे हैं, उससे कुछ-न-कुछ सीख सकते थे। वह जो कुछ सुनाता, उसमें आपबीती कितनी होती थी और कितना मनगढ़ंत, कहना मुष्किल है, लेकिन उसका दावा सच का होता और बातें सच्ची लगती भी थीं। यानी वह पत्रकारीय अर्थों में ‘स्टोरी’ सुनाता था जहां झूठ को भी सच के दावे और ढब के साथ पेश किया जाता है, साहित्यिक अर्थों में नहीं जहां हम सच को भी झूठ कह कर परोसते हैं। उसके पास दुनिया का विशाल अनुभव था जो कभी भी निःशेष न होने वाले खज़ाने की तरह उसके साथ चलता था और उसकी बातें सुन कर हम ख़ुद को कुंए का मेढ़क समझने पर मजबूर होते थे। हमारे पास दरी वाले सिनेमाघरों से लेकर पलंग और मसनद वाले सिनेमाघरों तक का तज़ुर्बा नहीं था। हमने कोठों और चकलाघरों का स्वाद नहीं चखा था। हमने ट्रकों में सफ़र करके लाइन-होटलों में रातें नहीं गुज़ारी थीं। हम कभी डब्ल्यू.टी. यात्रा करने के ज़ुर्म में जेल नहीं गये थे। हमने टिकटें ब्लैक में बेच कर उम्दा रेस्तरांओं में मुगऱ्मुसल्लम नहीं उड़ाया था। रहरी यानी अरहर के खेत देखने में कैसे होते हैं, यह हममें से ज़्यादातर को पता नहीं था, फिर भला हम कैसे जानते कि वह कामातुर जोड़ों के लिए अभयारण्य क्यों साबित होता है! निचोड़ यह कि जीतेंद्र के कि़स्से हमारे लिए अवैध और निषिद्ध ज्ञान का भंडार थे।

इस भंडार में यों तो लगभग हर चीज़ हमारे काम की थी, पर सबसे ज़्यादा काम की चीज़ थी उसका कामशास्त्र। उसे हम श्लेष में ‘काम’ की चीज़ कहते, क्योंकि वही हमारी अभावग्रस्तता (या शायद अकालग्रस्तता) और ग़र्ज़मंदी का सबसे अहम संदर्भ था। कहने को हम एक सहशिक्षा महाविद्यालय में पढ़ रहे थे, पर लड़कियां हमारे लिए उतनी ही दुर्लभ थीं जितनी पास वाले ब्वायज़ कॉलेज यानी ‘बंडाश्रम’ के लड़कों के लिए। हिक़ारत में दिये गये इस ‘बंडाश्रम’ नाम के बदले ब्वायज़ कॉलेज के लड़के हमारे बारे में कहने लगे थे कि साले, बात तो ऐसे करते हैं जैसे सहशिक्षा महाविद्यालय में नहीं, सहवास महाविद्यालय में पढ़ते हों। ये करमघट्टू, ताखे पर रखी हुई मिठाई देख-देख के रोज़ इतनी लार टपकाते हैं कि एक दिन जब मिठाई मिलेगी तब पूरी लार ख़त्म हो चुकी होगी, मिठाई घोंटी नहीं जाएगी।

बंडाश्रम वालों की इस बात का उत्तरार्द्ध भले ही शु द्ध खिसियाहट का नमूना हो, ताखे पर रखी हुई मिठाई वाला उपमान ग़लत नहीं था। लड़कियों के साथ हमारा संबंध वैसा ही था जैसा दिन और रात, सूरज और चांद के बीच होता है। कभी क़ायदे से मिल न पाना हमारी कि़स्मत में बदा था। बस, कक्षाएं थीं जो सुबह और शाम की भांति आधे-अधूरे ढंग से हमें पास आने का मौक़ा देती थीं। पता नहीं, कॉलेज के स्थपति ने कितना विराट गल्र्स कॉमन-रूम बनावाया था कि कक्षाओं में बैठी लड़कियों के अलावा बची हुई सारी लड़कियां उस कॉमन-रूम के पेट में समा जाती थीं। क्लास शु रू होने से दो मिनट पहले वे कॉमन-रूम से निकल कर क्लास-रूम के बाहर झंुड में खड़ी हो जातीं। उनके झुंड का रंग-ढंग देख कर मुझे रोयाल चिकेन सेंटर की वे मुर्गियां याद आतीं जो आसिफ़ मियां का हाथ पिंजरे के अंदर जाते ही मुंह दूसरी ओर घुमाये परले कोने में अंड़सने लगती थीं (ज़ाहिर है, उसमें मुर्गे भी होते होंगे, लेकिन मेरी याद में सब मुर्गियां बन कर ही आते)।… टीचर के आने पर उसके पीछे-पीछे वे क्लासरूम में प्रवेश करतीं और आगे की दो ख़ाली क़तारों में जाकर बैठ जातीं। इन क़तारों को उन्हीं के लिए ख़ाली छोड़ा जाता था। फिर क्लास ख़त्म होने पर वे टीचर के पीछे-पीछे क्लास-रूम से निकलती हुई सीधा गल्र्स कॉमन-रूम या किसी और क्लास-रूम की तरफ़ झुंड में बढ़ जातीं। ज़्यादातर लड़कियों को हम उनके राॅल नंबर से जानते थे, क्योंकि हाजि़री लगाने के लिए नाम नहीं, राॅल नंबर पुकारा जाता था। थक-हार कर उसे ही हमने उनके नाम का दर्जा दे दिया था। मिसाल के लिए, हमारे क्लास की तीन निहायत खूबसूरत लड़कियों के नाम थे, 84, 310 और 320। कॉलेज के 99 फ़ीसदी लड़कों को सालों-साल किसी लड़की से दो शब्द बात करने का मौक़ा न मिलता था और यही हाल 99 फ़ीसदी लड़कियों का था। बचे 1 फ़ीसदी लड़के और लड़कियां। तो उनकी बात ही अलग थी! वे हमें अपने शहर तो क्या, इस मत्र्यलोक के ही प्राणी नहीं लगते। उन्हें हम देवलोक का प्रतिनिधि मानते थे। हां, कभी-कभी जब कोई देवता हमारी दुनिया के किसी असुर से इस बात पर पिट जाता कि उसने उस लड़की से बात क्यों की जिसके पिता को असुर विशेष ने अपना ससुर मान लिया है, तब उसका देवत्व हमारे लिए संदेह के घेरे में आ जाता था।

ख़ैर, अकाल की इस चर्चा को यहीं विराम दें, क्योंकि वह हरिकथा की तरह अनंता है और आपके सामने मैं अपने अभावों का रोना रोने नहीं बैठा हूं। मैं तो…

या पता नहीं…

अच्छा, छोडि़ए! मैं क्या करने बैठा हूं, यह ख़ासा बहसतलब हो सकता है, पर फि़लहाल मैं जो कर रहा था, वह चर्चा थी जीतेंद्र की हंसी और कि़स्साग़ोई की। तो उसके कि़स्सों का जादू ही था जो हमें उसके आसपास मंडराने के लिए मजबूर करता था, वर्ना उसकी शैतानी हंसी का निशाना हम सब कभी-न-कभी बन चुके थे। और जब भी कोई उसका निशाना बनता, अविलंब यह क़सम खाता कि इस साले से अब कोई दोस्ती-यारी नहीं रखनी है… लेकिन बमुष्किल चैबीस घंटे बाद वह जितुआ के आसपास मंडराता पाया जाता।

ऐसे ही एक दिन, जब शैतानी हंसी का शिकार बनने के बाद खायी गयी क़सम का स्वाद मेरे मन की जिह्वा से उतरा भी न था, जित्तू ने रात के खाने के बाद और दोस्तों से अलग मुझे पकड़ा।

‘का रे चिकेन! गुस्सा हो?’ कहते हुए उसने मेरे कंधे के पास की गोलाई को बड़े मानीख़ेज़ अंदाज़ में दबाया। यह उसका प्यार जताने का ख़ास तरीक़ा था। उसके ‘चिकेन’ में चिकना होने और सुस्वादु खाद्य पदार्थ होने का अर्थ मिला हुआ था और यह संबोधन उसने ख़ास मेरे लिए सुरक्षित कर रखा था। यह शब्द मुझे सचेत रूप से कभी आपत्तिजनक नहीं लगा, पर शायद मेरे मन में इसने अनजाने ही कोई गांठ डाल दी थी जिसका कहीं-न-कहीं मेरी मोटी मूंछों के साथ संबंध है जिन्हें मैंने उन्हीं दिनों तराशना बंद कर फलने-फूलने के लिए छोड़ दिया था।

बहरहाल, कंधे की गोलाई को उसकी हथेली की पकड़ से आज़ाद कराते हुए मैंने उसे ‘बड़गाहीभाई’ की पदवी से नवाज़ा और कहा कि बताये, बात क्या है। वह पहले तो हिनहिनाती हंसी हंसता रहा, फिर मेरे और पास आकर धीमे से, लगभग बुदबुदाते हुए बोला, ‘आज केतनो गरिया लो भइवा, सब माफ है। हम त अंदर तक सिलाबोर (सराबोर) हैं… पूरा, जबर्दस्त!’

कह कर वह मुस्कुराती आंखें से इस बयान के असर को टटोलने लगा। उसे पता था कि वह गपास्टक का पहला टुकड़ा मेरी ओर उछाल चुका है और अब मेरा उपेक्षापूर्वक वहां से चलते बनना असंभव हो गया है।

असर तो सचमुच हुआ था, पर मैंने कोशिश की कि वह दिखे नहीं। बात को हल्के में लेने वाले अंदाज़ में कहा, ‘बेसी पेल मत। बताओ, का बात है?’

वह फिर हिनहिनाया, जैसे कहना चाहता हो कि लाख छुपाओ, छुप न सकेगा… वग़ैरा। फिर बोला, ‘आजकल धकाधक चल रहलउ हे, भइवा। रात दिन।’ कह कर उसने एक गंदा इशारा किया जिसका मतलब था कि रात-दिन चलने वाली चीज़, और कुछ नहीं, संभोग है।

सुन कर मैं चैंधिया गया होउंगा, क्योंकि वह मेरे चेहरे को देखते हुए, उस चेहरे की ओर तर्जनी से निशाना साधे हुए, इतनी ज़ोर से हिनहिनाया कि दूर खड़े सारे लड़के हमारी ओर देखने लगे। कुछ पलों बाद जब उसका हिनहिनाना रुका, तो हंसी के दबाव में उसकी आंखों से पानी बहने लगा था। ‘ओह, मजा आ गेलउ, भइवा,’ कहते हुए उसने मुझे कंधे से पकड़ा और जो लड़के इस हंसी के चलते समुत्सुक होकर हमारी ओर क़दम बढ़ा चुके थे, उनसे अलग ले चला।

अलग जाते हुए जो बात उसने लगभग फुसफुसाते हुए बतायी, वह इस प्रकार थी।

पिछली रात जब वह अपने मामू के साथ नाइट शो देख कर स्टेशन के पास के सिनेमा हाॅल से कैम्पस की ओर लौट रहा था, एक लड़की सड़क पर अकेली दिखी। मामा-भांजे ने सोचा, शायद पैसे पर चलने वाली है। थोड़ी ठिठोली करने की इच्छा हुई। टोका। लड़की बहुत घबरायी हुई थी। बात करने पर पता चला कि रात के दस बजे स्टेशन पर उतरी थी। सदर अस्पताल जाना है, जहां उसकी मां भर्ती है। पास में पैसे नहीं हैं और पैदल किस रास्ते जाये, उसे समझ नहीं आ रहा।… मामा-भांजे ने एक-दूसरे को देखा, आंखों ही आंखों में बातें हुईं। उपप्राचार्य, जिनकी कोठी के आउटहाउस में वे रहते थे, हफ़्ते भर के लिए सपरिवार बाहर गये हुए थे। इससे अच्छा समय और क्या हो सकता था! तुरंत एक रिक्षा रुकवाया। लड़की से कहा कि वे जहां रहते हैं, वह जगह अस्पताल के पास ही है, साथ आ जाये। लड़की उनके साथ रिक्षे पर बैठ गयी। मामा-भांजा उसे लिये हुए अपने कमरे पर आ गये। कॉलेज के विशाल परिसर में घुसने के बाद से लड़की यही समझती रही कि अस्पताल आ गया है। कमरे में लाने के बाद लड़की को धमका कर दोनों ने अपनी प्यास बुझायी। साथ में एक काम और किया। प्यास बुझाते समय उसके जो कपड़े उतारे थे, उन्हें एक बक्से में बंद कर ताला लगा दिया। लड़की अब बिल्कुल नंगी थी, इसलिए उसके भाग खड़े होने का सवाल ही नहीं था। तब से लगभग चैबीस घंटे गुज़र चुके थे। लड़की इस बीच सोई नहीं थी। उनके बिस्तर के एक कोने में घुटने मोड़े, अपनी देह से ही देह को ढंके बैठी थी, गठरी की तरह। मामू ने सुबह काम पर जाने से पहले इस गठरी को खोला था और उसके बाद से भांजा तीन बार खोल चुका था। हर बार वह लाचार-सी खुल जाती और गिड़गिड़ाती कि उसे एक बार अस्पताल पहुंचा दिया जाए, वह रात को फिर आ जाएगी। हर बार जितुआ उसे आष्वस्त करता कि एक दिन अच्छे-से भोग लेने दे, अगले दिन पहंुचा दिया जाएगा।

सच कहूं तो अब बिल्कुल याद नहीं कि इस बात को सुन कर मुझे कैसा लगा था। अंदर कहीं गुस्से का ज्वार उठा हो और मैंने जितुआ के मुंह पर थूक दिया हो, या दूर-दूर से हमें बातें करते देख रहे दोस्तों को बुला कर जितुआ की हैवानियत के लिए उसे सार्वजनिक रूप से ज़लील किया हो, या चुप रह कर मन-ही-मन संकल्प किया हो कि कल पुलिस को सूचना देकर उसके कमरे पर छापा डलवा दूंगा, या चेहरे पर याचक भाव लाकर उससे कहा हो कि हमरो दिलबा दे न, यार–ऐसा कुछ नहीं हुआ था। शायद जितुआ की हैवानियत के प्रति एक गहरी वितृश्णा और निर्वस्त्र स्त्री-देह की दुर्निवार रूप से सम्मोहक कल्पना के बीच मैं ठिठक गया था। शायद ये सी-साॅ के दो बाज़ुओं की तरह थीं, जिनकी बीच वाली टेक के दोनों ओर अपने पैर जमाये मैं सीधा खड़े रहने की कोशिश कर रहा था। इतना याद है कि छूटते ही कोई प्रतिक्रिया देने के बजाय कुछ क्षण ठहर कर मैंने कहा था, ‘साला, एकदम्मे जंगली है का रे? भाक्!’ और अपने कमरे की ओर चल पड़ा था। पीछे से हंसी के फ़व्वारे के साथ झरते उसके ये शब्द सुनाई पड़े थे, ‘जंगलवा में ई सब कहां मिलता है, भइवा!’

कमरे में लौट कर मैं अपनी मेज़-कुर्सी ठीक से जमा ही रहा था कि वह पीछे से फिर आ पहुंचा। ‘जंगली बनना है, शिशिर?’ इस बार उसका अंदाज़ गंभीर था, ‘सोच ले, भइवा! एक नंबर समान है। बाद में मत बोलना कि साला दोस्त काम नहीं आया। हम त अपना भर कोसिस करते ही हैं कि तू लोग को दुनिया का सब स्वाद चखवा दें।’

बेशक! अभी दो दिन पहले ही उसने हमें सामूहिक रूप से एक स्वाद चखवाया था। ब्लू-फि़ल्म का। उपप्राचार्य उसी दिन सपरिवार बाहर गये थे। उनके निकलते ही जितुआ ने ‘चंदा’ करके रात को अपने कमरे पर ब्लू-फि़ल्म का प्रोग्राम रखा (इससे पहले तक ‘चंदा’ हमारे लिए सरस्वती पूजा से जुड़ी शब्दावली का हिस्सा था)। डेढ़ सौ रुपये में टी.वी. सेट, वी.सी.पी. और कैसेट्स–रात भर के लिए। हम लपक कर और ललक कर इस आयोजन में शरीक हुए थे, एक अभूतपूर्व स्वाद की उम्मीद में खुदबुदाते। जित्तू के कमरे की ओर जाते हुए रास्ते में एक तज़ुर्बेकार साथी ने बताया था कि बेट्टा, जब सीन देखोगे न, त अइसा सांस फुलने लगेगा जइसे आॅक्सीजन कम पड़ गया हो। फस्ट टाइम वाला सब लोग का यही हाल होता है।

और सचमुच, हमारा यही हाल हुआ था।

लेकिन यह मेरे लिए थोड़ा परेशान करने वाली बात थी कि जित्तू ने जब जंगली बनने का न्यौता दिया, तब भी एकाएक मैंने उसी तरह सांसों का फूलना महसूस किया। फेफड़ों में एकाएक जैसे कुछ ज़्यादा जगह बन आयी थी और हवा जाने का रास्ता नाकाफ़ी लगने लगा था। एक मिनट तक मैं उसकी ओर पीठ किये अपनी मेज़ पर किताबें जमाता रहा, फिर एक शब्द में मैंने जवाब दिया, ‘कल।’ मेरी इस असहमत-सी सहमति पर वह फिर हिनहिनाया और कुछ ‘घाघ’ या ‘घुन्ना’ या ‘घोंघा’ जैसा कमेंट मारते हुए रुख़्सत हो गया।

‘हां रे साला, घाघ तो हम हैं,’ मैंने सोचा, ‘कल पता लगेगा। ई जान रहा है कि हम स्वाद के चक्कर में आ रहे हैं? जब लड़की को आजाद करा देंगे, तब समझ में आएगा, केतना घाघ हैं।’ मैंने ख़ुद को विष्वास दिलाया कि कमरे पर चलने का न्यौता पाकर मेरी सांसों का फूल आना, दरअसल, एक मज़लूम को आज़ाद कराने के दुस्साहसिक विचार से उपजे भय और रोमांच का नतीजा था।

वह एक बेचैन रात थी। जितुआ की हैवानियत के बारे में सोच-सोच कर मैं सो नहीं पा रहा था। साले ने पिछले चैबीस घंटे से किसी को क़ैद कर रखा है और वह भी इस हालत में! कल रात से वह अपने लाचार जिस्म पर सात-आठ दफ़े इन दरिंदों की ठोकरें झेल चुकी है।…और यह सिलसिला ऐन उस घड़ी शुरू हुआ है जब वह ऊपर वाले का शुक्र मना रही थी कि उसने आखि़रकार अपने दूत भेज कर उसे मां के पास पहुंचवा ही दिया। कॉलेज के विशाल परिसर में पेड़ों की क़तारों के बीच से गुज़रते हुए और दूर-दूर गलियारों और छात्रावासों के कमरों में जलती लाइटों को देखते हुए उसे तसल्ली हुई होगी कि इतने शांत और शानदार अस्पताल में मौत उसकी मां के आस-पास भी फटकने का साहस नहीं करेगी। शहर का सारा इंतज़ाम कितना ‘निम्मन’ है और लोग कितने ‘सुपातर’, उसने सोचा होगा। और इसके तुरंत बाद वह जैसे पहाड़ की चोटी से अंधेरे खड्ड में गिरी होगी। फिर मन और देह की भयावह पीड़ा से कराहती एक गठरी बन कर बिस्तर के कोने में धंस गयी होगी।

यह सब कुछ मैं शायद इन्हीं शब्दों में नहीं सोच रहा था, पर इतना तो याद है कि शब्दों में ही सोच रहा था। ध्यान जब भी भटक कर किसी और दिशा में जाता, मैं शब्दों और सुचिंतित वाक्यों से हांक कर उसे ग़ुस्से और हमदर्दी की उसी राह पर ले आता। अंततः मैंने तय किया कि कल कंचन’दी के घर से–वह उसी शहर में रहने वाली मेरी मौसेरी बहन थीं–एक जोड़ी कपड़े लेकर आना है, ताकि जितुआ के कमरे पर जाते ही उस लड़की को कपड़े दूं और उसके सदर अस्पताल जाने का इंतज़ाम करूं।

अगले दिन क्लास ख़त्म होते ही मैं कंचन’दी के यहां गया। उन्हें बताया कि नाटक खेलने के लिए सलवार-कुर्ते की एक जोड़ी चाहिए। वे इस शर्त पर कपड़े देने को राज़ी हुईं कि मैं रात का खाना वहीं खाऊं। रात का खाना खाकर अपने झोले में एक सलवार सूट रखे मैं नौ बजे छात्रावास पहुंचा।

जितुआ गेट पर ही मिल गया। वह डिनर के बाद अपने कमरे की ओर जा रहा था। मुझे देखते ही बोला, ‘का भइवा, कहां गायब हो जाते हो? साला दिन भर खोज खोज के तबाह हो गये।’ फिर पास आकर फुसफुसाया, ‘अबहीं चलबे?’

‘चल।’ मैंने कहा और उसके साथ हो लिया।

पिछली बार फूलती हुई सांसों के बीच मैं सिर्फ़ ‘कल’ कह पाया था, इस बार सिर्फ़ ‘चल’। चलते हुए मैंने एक बार अच्छी तरह कंधे से लटके झोले को टटोला। यह अपनी सांसों के फूलने को झुठलाने की कोशिश रही होगी।

कोठी पर पहुंच कर मेरी चाल ख़ुद-ब-ख़ुद धीमी पड़ गयी। जितुआ को मैंने दो क़दम आगे निकल जाने दिया। वह पैंट की जेब में चाभी टटोलता कमरे के दरवाज़े की ओर बढ़ा… पर यह क्या! वहां तो कोई ताला था ही नहीं। हाथ लगाते ही दरवाज़ा खुल गया। ‘अरे! खुलल कैसे है यार? मामू आ गये का?’ कह कर उसने हड़बड़ी में लाइट जलायी।

लाइट ने बताया कि मामू तो नहीं ही आये हैं, लड़की भी नदारद है।

जितुआ सन्न! ‘अरे, कहां गेलउ भइवा?’ वह ऐसे तड़फड़ाने लगा जैसे बिर्हनी के छत्ते में हाथ पड़ गया हो। झटाझट उसने कमरे के सारे कोने-अंतरे तलाश लिये।

मैंने ग़ौर किया, तीन दिन पहले के मुक़ाबले कमरे की रंगत थोड़ी बदली हुई थी। सामान तो अपनी पुरानी जगह पर ही थे–दरवाज़े के ठीक सामने की दीवार के साथ एक स्टोव और दो-चार बर्तन, बांयीं तरफ़ एक चैड़ी-सी चैकी और उस पर बिछा तोशक, फ़ोल्डिंग मेज़ पर कूड़े के ढेर की तरह रखी किताबें, पास ही जस्ते का एक बड़ा-सा बक्सा–पर तोशक को छोड़ कपास का कोई नामोनिशान नहीं था। बिस्तर पर चादर तक न थी और कमरे में आर-पार बंधी रस्सी, जिस पर ढेरों कपड़े टंगे होते थे, ख़ाली पड़ी थी। शायद मामा-भांजे ने सारा कुछ, एहतियातन, बक्से में बंद कर दिया था। उस बक्से पर अभी ताला लटक रहा था।

इन सारे सामानों के बीच वह ‘समान’ कहीं नहीं था। दरवाज़े की आड़ में एक देह भर का जो छोटा-सा गुप्त ठिकाना था, वहां भी नहीं। जितुआ दौड़ कर ग़ुसलख़ाने में झांक आया। वह भी ख़ाली था।

‘ले लोट्टा। लगता है, कमरवा बंद करके जाना भूल गये थे।… लेकिन कपड़ा त सब ताला में बंद है। साली लंगटे भाग गई का?’ कहता हुआ वह बाहर की ओर दौड़ा और फाटक से निकल कर हड़बड़ाया हुआ दोनों तरफ़ देखने लगा, इस दुविधा में कि किधर जाए।

                मैं कमरे के बारामदे पर खड़ा रहा। मुझे संदेह होने लगा था कि कहीं सब कुछ इस साले की कि़स्साग़ोई तो नहीं है! सोचता होगा, ऐसा कोई कि़स्सा बनाने से इसकी मर्दानगी का रुआब जमेगा।… वाह, क्या मर्दानगी है!… अब ये हरामी फाटक के पास से अपने कंधे झुलाये हुए लौटेगा और कहेगा, ‘भाग गेलउ रंडिया। साइद चद्दर-उद्दर कुछ बाहर छूट गेलई होत। ओही लपेट-उपेट के भाग गेलउ।’

उसकी ऐक्टिंग की ओर से मुंह फेर लेने की ग़रज़ से, या शायद किसी अंतःप्रज्ञा के चलते, या शायद यों ही, मैं फाटक से ठीक उल्टी दिशा में देखने लगा जहां पेड़ों और झाड़-झंखाड़ से भरा कोठी का विशाल अहाता था। अहाते के छोर पर खेत की मेड़ से बस थोड़ी ही ऊंची दीवार और आगे गंगा की ढलान। चांदनी रात में यह पूरा विस्तार बहुत रहस्यमय लग रहा था, क्योंकि कोठी की सारी बत्तियां बुझी हुई थीं। सिर्फ़ एक बल्ब था, जितुआ के कमरे का, जो मेरी पीठ के ठीक पीछे था। पर चांदनी में सब कुछ साफ़-साफ़ नज़र आ रहा था, गाछ-वृक्षों की हरीतिमा को छोड़ कर। सांवलापन ओढ़े ये गाछ-वृक्ष ऐसे लग रहे थे जैसे त्रिआयामी परछाईंयों में बदल गये हों। हवा थमी हुई थी। बाउंडरी वाल के आगे तेज़ी से धुंधली पड़ती चांदनी गंगा के विस्तार पर जाकर लगभग लुप्त हो गयी थी। वहां अंधेरा पसरा था और पानी की सरसराहट में सुनायी पड़ता सन्नाटा भी।

आधे मिनट मैं इस रहस्यलोक के किनारे पर खड़ा उसकी चैहद्दियां टटोलने की कोशिश करता रहा। वे जितनी पास थीं, उतनी ही दूर भी।… या शायद वे कहीं थीं ही नहीं। उनके एक साथ पास और दूर होने की अतार्किकता का यही निदान था।

पर उस रहस्यलोक के भीतर कुछ और था जिसने एकाएक मेरा ध्यान खींच कर मुझे हतप्रभ कर दिया और अगले एक-डेढ़ मिनट में वह सब हो गया जिसे बताने के लिए मैं इतने ब्यौरे पार करता यहां तक पहुंचा हूं।

मैंने देखा, दूर किसी मोटे तने की आड़ से झांकती एक गोरी बांह और कमर के कटाव से नीचे का सफ़ेद झक्क अर्द्धचंद्र! वह अपने नंगे जिस्म को एक उम्रदराज़ पेड़ की आड़ में छिपाने की नाकाम कोशिश कर रही थी। जिस्म का जो क़तरा तने से बाहर निकला था, उससे टकरा कर चांदनी जैसे बिखर-बिखर जाती थी। पेड़ कुछ बेतरतीब और विरल झाडि़यों के पीछे था। इसलिए कमर से नीचे की अधगोलाई किसी ढीले-ढाले जाल में उलझी-सी दिख रही थी।

मैं सांसों को संभालता कुछ क्षण रहस्यलोक में छिपे इस सबसे गहरे, किंतु अंशतः अनावृत, रहस्य को देखता रहा। इस बीच उसने तने के पीछे से अपना आधा चेहरा बाहर निकाला और एक आंख से इसी दिशा में देखने लगी जिधर आउटहाउस था, फाटक था और मैं भी। मेरे पीछे बल्ब से रौशन कमरे का दरवाज़ा था, शायद इसीलिए वह समझ न पाई हो कि मैं उसे ही देख रहा हूं। समझ पाती तो तुरंत अपने को छुपा लेने का कोई और जतन करती।

उतनी देर में मैंने अपनी सांसों पर थोड़ा काबू पा लिया था और मुझे याद आ गया था कि मैं इसे देखने नहीं, कपड़े देने आया हूं। मैं बारामदे से उतर कर उस ओर बढ़ गया।

और यही सारी गड़बड़ी की शुरुआत थी। मुझे आगे आता देख वह एकाएक सचेत हुई और वहां से भाग कर पीछे एक केले के पेड़ की आड़ में खड़ी हो गयी। एक कौंध की तरह उसका पूरा नंगा जिस्म दृश्य से होकर गुज़रा। किसी ग्लानि या घबराहट या महज़ एक अपरिचित-सी झेंप के चलते मेरे पैर बारामदे से चार क़दम आगे ही ठिठक गये और मैं कठपुलती की तरह पीछे मुड़ गया, जैसे यह साबित करना हो कि मैंने कुछ नहीं देखा। जितुआ उस समय फाटक के बाहर दाहिनी तरफ़ से लौट कर बाईं तरफ़ जा रहा था। उस पर नज़र पड़ते ही मैं वापस झुरमुट की ओर मुड़ गया।

भाग कर केले की आड़ में उसका जाना, बेशक, ख़ुद को बचाने की कोशिश में एक बेमतलब-सा क़दम था, पर कोई उपाय न देख कर वह लुका-छिपी के खेल में ही बचाव और प्रतिरोध का छद्म संतोश ढूंढ़ रही होगी। यह भी हो सकता है कि केले के नाटे क़द और नीचे को लटके हुए दुकूल-नुमा पत्तों से उसे कुछ ज़्यादा ही उम्मीद रही हो। वहां जाकर शायद उसे महसूस हुआ कि उसकी उम्मीद कितनी ग़लत थी; वह जितना छुप रही थी, उससे ज़्यादा दिख रही थी। मुझे अपनी ओर देखता देख वह स्तनों पर अपने हाथ बांधे पीछे खिसकने लगी। अब वह आड़ से बिल्कुल बाहर थी, पीछे को जाती हुई। उसके बाल बंधे थे। चेहरे से लेकर गर्दन तक का रंग गेहुंआं रहा होगा, तभी वह बहुत साफ़ नज़र नहीं रहा था, पर पूरी देह चांदनी में चमक रही थी।… दो-चार क़दम पीछे जाने के बाद ज़मीन पर गिरी हुई एक सूखी डाल से उसके पैर उलझे। जैसे आत्मरक्षा की कोई युक्ति अचानक सूझ गयी हो, उसने वह मोटी-सी डाल हाथों में उठा ली और उसे ध्यान नहीं रहा… या रहा भी हो… कि ऐसा करने से उसके स्तन पूरी तरह बेबाक हो गये हैं–डुबकी मार कर ऊपर को उठते गोताखोरों की तरह दो भारावनत स्तन…

बचपन के भूगर्भ की किन्हीं परतों में दबा परितृप्त स्पर्ष का एक अहसास मेरी हथेलियों, गालों और होंठों पर बिछलता चला गया।

क्या इसे ही जादुई यथार्थ कहते हैं?

मैं मंत्रविद्ध-सा जड़ हो गया। फिर से यह बात सांसों की धौंकनी में कहीं खो गयी कि मेरे कंधे पर लटकते झोेले में एक जोड़ी कपड़े इसी जादू और रहस्य को ढंकने के लिए हैं। शायद चांदनी का नीम अंधेरा न होता और उसकी देह की चमक ही नहीं, आंखों के डर को भी मैं देख पाता तो यह भूल न होती।… या कौन जाने, यह सिर्फ़ एक लाचारी भरी सफ़ाई हो! कैसे कह सकता हूं कि दिन के उजाले में भी उन आंखों को मैं देख ही पाता! क्या इस वक़्त मैं उसकी देह के अलावा और कुछ भी देख पा रहा था? उमस भरी रात में निस्तब्ध खड़े पेड़, अहाते की ठिगनी चारदीवारी, उसके पार धुंधली पड़ती हुई अंधेरे में गुम जाने वाली ढलान, गंगा के प्रवाह पर कहीं-कहीं रोशनी के कांपते प्रतिबिंब–ये सब मेरी निगाह के दायरे में रह कर भी अदृश्य थे। दृश्य सिर्फ़ एक जिस्म था।

पर यह सब, कुछ गिने-चुने लम्हों की ही बात थी। जब पीछे की ओर चलते हुए अहाते की छोटी-सी दीवार से उसके पैर अटके तो मुझे जैसे होश आया। मैं अपने ठिठके हुए क़दमों को झटक कर आगे लपका और चिल्लाया, ‘अरे, रुको! हम ई कपड़ा…।’ वाक्य बीच में ही छूट गया, क्योंकि मेरे लपकने और चिल्लाने को एक निर्णायक हमला मान कर उसने हाथ में पकड़ी हुई डाल मुझ पर फेंक कर मारी। वह सीधा मेरे चेहरे पर लगी होती अगर हाथों पर रोकते और नीचे झुकते हुए मैं ज़मीन पर न आ गिरा होता। उधर लड़की, शायद जवाबी हमला कर चुकने के बाद की घबराहट में, या मेरी आवाज़ सुन कर पीछे से दौड़े आते हुए जितुआ को देख कर, तेज़ी से पीछे मुड़ी और दो-ढाई फिट ऊंची उस दीवार पर खड़ी हो गयी जिसके बाद गंगा की ढलान शुरू होती थी।

तुरंत उस पार कूद जाने के बजाय वह अगले कुछ सेकेंड वहीं खड़ी रही। शायद पसोपेश में थी कि दूसरी तरफ़ का संसार न जाने कैसा हो। पर यह पसोपेश, निस्संदेह, उसे बेमानी लगा होगा, क्योंकि दुःस्वप्न जैसे इन दो दिनों से ज़्यादा बुरे दिनों की कल्पना भी नामुमकिन थी।

या शायद उन क्षणों में उसकी निगाह दाहिनी ओर के घाट पर, छात्रावास का डिनर निपटाने के बाद तफ़री करते दो-तीन युवकों की ओर चली गयी हो और एक बार को उसने सोचा हो कि उनसे कोई मदद मिल सकती है या नहीं। पर वे उसे, निस्संदेह, एक नग्न स्त्री-देह की मौजूदगी से अनजान, इसीलिए फि़लहाल निश्क्रिय, दरिंदों की तरह नज़र आये होंगे।

या शायद उन क्षणों में उसने सामने, सीधी ढलान के छोर पर, क्रमशः विरल होते दूधिया घोल-जैसी चांदनी में ऊंघती गंगा मैया को एक बार आंख भर कर देखा हो और यह जानते हुए भी, कि इस बात का कोई मतलब नहीं है, ‘रच्छा’ की ‘बिनती’ की हो।

जो भी हो, उठ कर खड़े होते-होते उन क्षणों में मैंने जो देखा, वह मेरी सांसों और शब्दों पर बहुत भारी पड़ रहा था। उसकी पीठ मेरी तरफ़ थी और दीवार के ऊपर जहां वह खड़ी थी, नीम उजाला उसकी देह के आकार में धवल प्रकाश बन गया था।… उघड़ी हुई पीठ से लेकर कमर के कटाव से नीचे के उन्नतोदर विस्तार तक, लगभग स्तब्ध-अवाक् कर देने वाले सौंदर्य का यह भीषण सामना था।… मैंने उखड़ती हुई सांसों के बीच झोले में रखे कपड़े बाहर निकाल लिये और उन्हें हाथों में थामे एक पूरा वाक्य कह डालने की कोशिश की, लेकिन हकलाहट में कुछ बेमेल शब्द ही निकल पाये।…

या शायद वह भी नहीं… बस, कुछ निरर्थक ध्वनियां।

ऐन जिस वक़्त पीछे से भाग कर आता जितुआ मेरे पास तक पहुंचा, लड़की दूसरी तरफ़ कूद गयी और तीर की तरह दौड़ती हुई, मेरी दुःकल्पना की हदों से भी आगे, ढलान पार कर गंगा में समा गयी। शांत लहरों में एक तेज़ हड़कंप हुआ, जैसे दो-तीन बड़े पत्थर एक के बाद एक फेंके गये हों। पर इतना ही। लहरें फिर शांत हो गयीं। दाहिनी ओर के घाट पर बैठे युवक चैंक कर खड़े हो गये और कौतुक से उधर देखने लगे। उन्हें अपनी बांयीं आंख के कोने से जो कुछ दिखा होगा, वह एक पहेली की तरह लग रहा होगा, जिसे वे समझने की कोशिश कर रहे थे।

मैं अब तक दौड़ कर अहाते की दीवार के पास आ गया था। तभी पीछे से जितुआ ने कॉलर पकड़ कर मुझे पेड़ों की आड़ में खींच लिया।

‘भोंसड़ीवाले, सबके नजर में आने का सौख है का?’ वह ग़ुस्से में था।

‘अउ ई का है?’ मेरे हाथ से कंचन’दी का सलवार-सूट खींचते हुए उसने पूछा।

बात समझते उसे देर नहीं लगी।

‘भोंसड़ी के, हम विलेन बनके माल को लें और तू हीरो बनके? एही सोचे थे?… साला, घोंघा!’

शायद मुझे दुबारा कहना चाहिए–बात समझते उसे देर नहीं लगी।

कपड़े मेरे मुंह पर मारते हुए वह अपने कमरे की ओर बढ़ गया। जाते-जाते कहता गया कि तुरंत दफ़ा हो जाऊं, क्योंकि नीचे जिन लड़कों को कुछ गड़बड़ का अंदेशा हुआ है, वे आते ही होंगे।

घाट की ओर से पहेली को हल करने की हलचल लगातार कानों तक आ रही थी। अलबत्ता पानी की हलचल शांत हो गयी थी। गंगा की छाती पर कोई शोर नहीं था।…

क्या उसने इस डर से हाथ-पैर भी नहीं मारे कि कहीं कोई बचाने न आ जाये और कहीं उसकी निर्वस्त्र देह उसके चैतन्य रहते बाहर न निकाल ली जाये?…या क्या पानी की चादर ओढ़ कर उसे इतना सुकून मिला कि पिछले अड़तालीस घंटों से जगी हुई आंखें गहरी नींद में मुंद गयीं?…

भगवान जाने, उसे तैरना आता भी था या नहीं?…

मैं काठ बना कुछ देर पेड़ों के झुरमुट से गंगा को देखता रहा…

पर मेरे पास ज़्यादा समय नहीं था। मुझे दूसरे रास्ते से भाग कर घाट पर खड़े लड़कों में शामिल होना था ताकि इस घटना का कोई सूत्र मुझ तक पहुंचता न लगे।

तेज-तेज़ चलते हुए मैंने सलवार-कुर्ते की जोड़ी को अंदर डाला… और शायद ख़ुद को भी… साला, घोंघा!

संजीव कुमार

संजीव कुमार

संजीव कुमार। युवा आलोचक और कहानीकार। ‘जैनेन्द्र और अज्ञेयः सृजन का सैद्धांतिक नेपथ्य’ पुस्तक के लिए देवीशंकर अवस्थी सम्मान। दिल्ली विश्विद्यालय के देशबंधु कॉलेज में  प्राध्यापक। इनसे sanjusanjeev67@gmail.com पर संपर्क सम्भव है।

कहानी ‘बनास’ से साभार प्रस्तुत है। 

Post Navigation

%d bloggers like this: