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द ग्रेट अमेरिकन सर्कस: संजय सहाय

जैसे-जैसे अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव की चर्चा वैश्विक हो रही है, वैसे-वैसे इसकी प्रक्रिया (चुनाव) के  लोकतांत्रिक होने- न होने को लेकर शक जाहिर किया जाने लगा है.  इस चुनावी प्रक्रिया और इसके नियमों-कानूनों की ओर से लगभग अनभिज्ञ होकर हम टीवी में चुनावी डिबेट देखते हुए खुश-नाखुश होते रहते हैं. संजय सहाय का यह लेख अमेरिकी राष्ट्रपति  की चुनावी-प्रक्रिया के अधिकांश पहलुओं को उनके ऐतिहासिक संदर्भों के साथ रखने का प्रयास किया.

By संजय सहाय

अमेरिकी व्यवस्था से प्रभावित व्यक्तियों और दलों द्वारा अपने देश में भी संसदीय प्रणाली को छोड़ राष्ट्रपति (प्रेसीडेंशियल) प्रणाली को लागू करने की अनुशंसा की जारी रही है. अमेरिकन प्रेसीडेंशियल प्रणाली को समझे बिना ही लोग इसे लेकर अति उत्साहित रहते हैं. उनकी समझ से इसमें जनता राष्ट्रपति को सीधे चुनती है. अतः वह राष्ट्रपति की बढ़ी शक्ति को अधिक वैधता प्रदान करती है फिर इस व्यवस्था में राष्ट्रपति और विधायिका दो समानांतर संस्थाएं हो जाती हैं जिससे कि सत्ता के दुरुपयोग पर अंकुश रहता है. साथ ही सरकार में निर्णय जल्दी हो पाते हैं और महाभियोग जैसी अनोखी परिस्थितियों को छोड़ सत्ता में एक निश्चित काल के लिए खासा स्थायित्व रहता है. जबकि प्रधानमंत्री एक विधेयक के न पास हो पाने से ही अल्पमत में आकर कभी भी सत्ता खो सकता है. उधर प्रेसीडेंशियल प्रणाली के विरोधियों का मानना है कि राष्ट्रपतिवाद चुनाव की बाज़ी और दाम दोनों को ऊपर उठा देता है,  ध्रुवीकरण को बढ़ावा देता है साथ ही उसका विद्रूपीकरण भी करता है और अंततः अधिनायकवाद की ओर ले जा सकता है. फिर दो समानांतर सत्ता केंद्रों (राष्ट्रपति और विधायिका की वजह से बार-बार गतिरोध की स्थिति बन सकती है तथा दोनों समानांतर धाराएं असफलताओं के लिए एक-दूसरे पर दोष डालते हुए अपनी जवाबदेही से बचती रह सकती है. आदि-आदि. हालांकि जहां तक अधिनायक की बात है तो चाटुकारिता भरे अपरिपक्व लोकतंत्रों में प्रधानमंत्री भी बड़ी आसानी से अधिनायकवाद बन जाते हैं ऐसा हम पूर्व और वर्तमान दोनों समय में देख सकते हैं.

यह बात सही है कि प्रेसीडेंशियल प्रणाली के अधिकतर मामलों में जनता सीधे राष्ट्रपति का चुनाव करती है किंतु यह बात संयुक्त राज्य अमेरिका पर कतई लागू नहीं होती. अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव की प्रक्रिया अत्यधिक जटिल, लंबी और विश्व में सबसे खर्चीली है. यह प्रक्रिया संयुक्त राज्य अमेरिका के संविधान में निहित है और 12वें, 22वें और 23वें संशोधन द्वारा सुधारी गई है. साथ ही भिन्न राज्यों के कानूनों की वजह से और स्थानीय रिवाजों के कारण समय के साथ इसमें खासा बदलाव आया है. हर चाल साल बाद होने वाले राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति पद के इन चुनावों में उम्मीदवारी के लिए कम से कम 35 वर्ष की आयु और जन्मजात अमेरिकी नागरिक होना आवश्यक है जो कि पिछले चौदह वर्षों से लगातार संयुक्त राज्य में रह रहा हो. कोई भी राष्ट्रपति अधिकतम दो बार ही राष्ट्रपति रह सकता है. फ्रैंकलिन डिलानो रूजवेल्ट अपवाद रहे जिन्होंने चार प्रेसीडेंशियल चुनाव जीतने का रिकॉर्ड कायम किया था. अमेरिका में किसी भी राष्ट्रपति के लिए अधिकतम दो मियाद की परंपरा एक अलिखित कानून की तरह तब से लागू थी जब जॉर्ज वाशिंगटन ने 1796 में तीसरी बार राष्ट्रपति बनने से इनकार कर दिया था. हालांकि यूलिसिस ग्रांट ने तीसरी बार के लिए प्रयास किए थे किंतु वे सफल नहीं हो पाए थे और निंदा के पात्र भी बने थे. जबकि प्रेसीडेंट मैकिनले की सितंबर, 1901 में हुई हत्या के बाद उपराष्ट्रपति से राष्ट्रपति बने थियोडोर रूजवेल्ट कुल ढाई मियाद तक राष्ट्रपति रहे. फ्रैंकलिन डी.रूजवेल्ट के 1945 में गुज़र जाने के उपरांत संविधान के 22वें संशोधन से किसी एक राष्ट्रपति के लिए अधिकतम दो मियाद का लिखित कानून बन गया. हालांकि यदि 75 प्रतिशत कांग्रेस का समर्थन मिल जाए तो दो मियाद से अधिक भी मिल सकते हैं.

मूलतः दो दलीय राजनीति (डेमोक्रैट्स और रिपब्लिकन) की इस व्यवस्था में राष्ट्रपति चुनाव के लगभग साल-भर पहले से ही जटिल, उबाऊ और खर्चीली प्रक्रिया की शुरुआत होती है. सबसे पहले दोनों प्रमुख दल अपने-अपने राष्ट्रपति पद के उम्मीदवारों में से किसी एक उम्मीदवार का चयन करने के लिए भिन्न राज्यों में जनमत लेते हैं. जनमत के लिए वे किसी भी राज्य में दो में से कोई एक प्रक्रिया चुन सकते हैं. पहला तरीका छोटी-छोटी जनसभाओं जिसे काकस कहते हैं, में आंतरिक मतदान के जरिए वे अपने उम्मीदवारों की लोकप्रियता माप सकते हैं. दूसरा ज्यादा पसंदीदा तरीका प्राइमरीज का है. प्राइमरीज राज्यों के खर्चे और व्यवस्था पर होने वाला गुप्त मतदान है. प्राइमरीज भी दो प्रकार की होती हैं- एक ‘बंद’ जिसमें दल विशेष के रजिस्टर्ड मतदाता ही भाग ले सकते हैं, दूसरी ‘खुली’ हुई जिसमें कोई भी मतदाता आकर मत डाल सकता है. काकस द्वारा हो या प्राइमरीज द्वारा- भिन्न उम्मीदवारों को प्राप्त मतों के अनुपात में ही हर राजनीतिक दल उनके लिए डेलीगेट्स (प्रतिनिधि) मुकर्रर कर सकता है जो जुलाई में होने वाली राष्ट्रीय दलीय महासभा में अपनी पार्टी के अनेक प्रत्याशियों में से किसी एक की राष्ट्रपति पद की उम्मीदवारी तय करते हैं.

1970 से पहले संयुक्त राज्य के ज्यादातर डेलीगेट्स का आवंटन काकस प्रक्रिया में हुए मतदान के आधार पर ही किया जाता था किंतु 1972 के सुधारों के उपरांत अधिकतर राज्यों ने प्राइमरीज व्यवस्था को अपना लिया है. सिर्फ आयोवा, लुजियाना, मिनेसोटा और गेन सहित चैदह राज्यों और चार सं. रा. टेरिटरिज ने ही 2016 के लिए कॉकसेज के माध्यम से डेलीगेट चुने हैं. दोनों प्रमुख दलों की राज्यों की इकाइयों द्वारा इन तमाम प्रक्रियाओं से गुज़रने के बाद, पार्टी विशेष की केंद्रीय समिति यह निर्णय लेती है किस राज्य से कितने डेलीगेट्स के लिए जाएंगे और किस-किस उम्मीदवार के लिए नत्थी कर दिए जाएंगे. ये डेलीगेट्स अपनी-अपनी पार्टियों के सक्रिय कार्यकर्ता होते हैं. कुछ राज्यों में मतों के अनुपातिक न होकर जीतने वाले उम्मीदवार को ‘विनर टेक ऑल’ की तर्ज पर सारे के सारे डेलिगेट्स मिल जाने की व्यवस्था है और फिर इनके ऊपर सुपर डेलीगेट्स सुपर डेलीगेट्स विशेष तौर पर डेमोक्रेटिक पार्टी में अपनी मनमर्जी के डेलीगेट होते हैं. इन्हें किसी के साथ नत्थी नहीं किया जाता और ये अपनी पार्टी के किसी भी उम्मीदवार के पक्ष में अपना वोट दे सकते हैं. ये मूलतः अपनी पार्टी के कद्दावर नेताओं में से चुने जाते हैं और उम्मीदवार के चयन को उलट-पुलट कर सकते हैं. इसी तरह से रिपब्लिकन पार्टी में सुपर डेलीगेट्स तो नहीं होते किंतु तीन डेलीगेट प्रति राज्य के हिसाब से इनकी जगह तय रहती है.

इस जगह पर पहुंचकर हम पाते हैं कि सुपर डेलीगेट्स या ‘विनर टेक ऑल’ जैसे राज्यों के डेलीगेट भ्रष्टाचार की बड़ी संभावनाएं जगाते हैं. बड़े पैमाने पर पैसे और प्रभाव का खेल आरंभ हो जाता है. प्रत्याशियों के साथ सहभोज में 20-30 लाख रुपये प्रति प्लेट के डिनर बिकने लगते हैं. युद्धास्त्रानिर्माताओं, अन्य उद्योगपतियों और धंधेबाजों के लिए खजाने खुल जाते हैं. ताकि चार सालों में वे अपने चुनावी निवेश पर कई गुना मुनाफा कमा लें. इस बात की संभावना भी बनी रहती है कि राज्यव्यापी चुनावों में ज्यादा मत पाने वाला प्रत्याशी भी राष्ट्रपति पद की दौड़ से बाहर कर दिया जाए और खास लोगों का चहेता उस पार्टी का राष्ट्रपति पद को घोड़ा घोषित कर दिया जाए. हिलेरी क्लिंटन जिनके पक्ष में डेलीगेट ज्यादा हैं और बर्नी सैंडर्स जिनको ज्यादा जन समर्थन है-के मामले में कुछ ऐसा ही होता दिख रहा है.

बहरहाल चुनावी वर्ष की गर्मियों में (जुलाई) दोनों प्रमुख राजनैतिक दलों की राष्ट्रीय महासभा में डेलीगेट्स द्वारा अपने-अपने राष्ट्रपति पद के प्रत्याशी चुन लिए जाने के उपरांत नए सिरे से इस राष्ट्रव्यापी दंगल की शुरुआत होती है. जिसमें टीवी डिबेट्स, चुनावी रणनीतियां, बड़े-बड़े दावे-वादे, राजनीतिक प्रीतिभोज और प्रलोभन- सबकी भूमिका रहती है. किंतु हमारी जनधारणा के विपरीत तब भी इन अमेरिकी चुनावों में जनता अपने राष्ट्रपति को सीधे नहीं चुनती.

अमेरिकी संविधान में राजनीतिक दलों की भूमिका का प्रावधान नहीं है क्योंकि अमेरिका के संस्थापक पिता (फाउंडिंग फादर) जिनमें जेम्स मैडिसन, एलेक्जेंडर हैमिल्टन, जॉन जे, जॉन ऐडम, थॉमस जेफरसन, बेंजामिन फ्रैंकलिन और जॉर्ज वाशिंगटन प्रमुख थे, अमेरिकन राजनीति को पक्षधरता से दूर रखना चाहते थे. संघीय पत्र संख्या 9 और 10 में एलेक्जेंडर हैमिल्टन और जेम्स मैडिसन ने घरेलू घटकवाद से मुल्क को सावधान किया है. अपने शुरुआती दौर में राष्ट्रपति के चुनाव की प्रक्रिया को लेकर बहुत वाद-विवाद हुए. जेम्स विल्सन और जेम्स मैडिसन जैसे नेता राष्ट्रपति का चुनाव सीधे जनमत से चाहते थे लेकिन अमेरिका के दक्षिणी राज्यों में जहां पर गुलाम अधिक थे और मुक्त मतदाताओं की संख्या उत्तरी राज्यों के मुकाबले बहुत कम थी, उससे समस्या पैदा हो रही थी जेम्स मैडिसन इस बात को महसूस करते हुए लिखते हैं- हालांकि राष्ट्रपति चुनाव के लिए एक लोकप्रिय मतदान आदर्श होता लेकिन इस पर सहमति बन पाना असंभव दिख रहा है क्योंकि दक्षिणी राज्यों को ऐसे राष्ट्रपति चुनावों में अपनी भूमिका प्रभावकारी नहीं दिखती.“ अतः 6 सितंबर, 1787 में संवैधानिक महासभा ने इलेक्टोरल कॉलेज का प्रस्ताव पास कर दिया. इसके पहले 1787 की संविधान सभा में नवनिर्मित सं. रा. की राजव्यवस्था को लेकर बहुत तरह के प्रस्ताव आए जिसमें जेम्स मैडिसन द्वारा लिखित और एडमंड रैन्डॉल्फ द्वारा प्रस्तुत वर्जीनिया प्लान लाया गया जिसमें अन्य व्यवस्थागत बातों के अलावा राज्यों की मुक्त आबादी के अनुपात में प्रतिनिधियों की संख्या रखने का प्रस्ताव था. किंतु इस प्लान पर छोटे राज्यों को घोर आपत्ति थी. इसके बाद न्यूजर्सी प्लान पर चर्चा हुई जिसे उसके प्रस्तुतकर्ता के नाम से पैटर्सन प्लान भी कहा जाता है. इसमें प्रत्येक राज्य से एक प्रतिनिधि का प्रावधान था जो संयुक्त राज्य के पूर्व संविधान ‘आर्टिकल्स ऑफ़ कंफेडरेशन’ की तर्ज पर था और जिसे संयुक्त राज्य के मूल 13 राज्यों ने मान्यता दी थी लेकिन इस पर भी जमकर विरोध हुआ खासकर वर्जीनिया प्लान के प्रस्तुतकर्ताओं द्वारा जिसमें जेम्स मैडिसन और रैन्डॉल्फ प्रमुख थे. इसके बाद कनेक्टिकट सुलह के नाम से सहमति बनी जिसमें दो सदनों का प्रस्ताव था. राज्यों को बराबर प्रतिनिधित्व देने वाला ‘सीनेट’ (सीनेटर का कार्यकाल 6 वर्ष होता है और 1/3 सदन का चुनाव हर दूसरे वर्ष होता है.) और जनसंख्या को अनुपातिक प्रतिनिधित्व देने वाला ‘हाउस ऑफ़ रिप्रजेंटेटिव (चुनाव हर दो वर्ष बाद). इसमें बचे हुए पेंच ‘3/5 की सुलह’ के नाम से सुलझा लिए गए. गुलाम प्रथा के समर्थक खेतिहर दक्षिणी राज्य गुलामों की संख्या को जोड़कर हाउस ऑफ़ रिप्रेजेंटेटिव में अपने अनुपातिक प्रतिनिधित्व पर अड़े हुए थे जबकि गुलाम प्रथा के विरोधियों का मानना था कि चूँकि गुलामों को मतदान का अधिकार नहीं है अतः काले गुलामों की संख्या के बहाने गुलाम समर्थक गोर लोग ही कांग्रेस में अपनी संख्या बढ़ा लेंगे. विडम्बना यह रही कि एक काले गुलाम को 3/5 सामान्य नागरिक मानाने का प्रस्ताव गुलाम प्रथा के विरोधियों की तरफ से ही आया और स्वीकृत हो गया. संविधान से यह प्रावधान अमेरिकी गृहयुद्ध के उपरांत 1865 के तेरहवें संशोधन से गुलाम प्रथा की समाप्ति के उपरान्त निकल दिया गया.

इलेक्टोरल कॉलेज में इलेक्ट्रेट की संख्या पर तय हुआ कि दोनों सदनों की संख्या के बराबर ही राष्ट्रपति को चुनने वाले इलेक्ट्रेट की संख्या होगी. आज के दिन दो सीनेटर प्रति राज्य के हिसाब से सौ सीनेटर, हाउस ऑफ़ रिपे्रजेंटेटिव के 435 सदस्यों- कुल संख्या 535 और डिस्ट्रीक्ट ऑफ़ कोलंबिया (वाशिंगटन डीसी) से आते तीन इलेक्ट्रोरेट को लेकर इलेक्टोरल कॉलेज की संख्या कुल 538 होती है. इसमें से कोई भी इलेक्ट्रेट कांग्रेस का सदस्य नहीं हो सकता और न ही वह किसी भी लाभ के पद पर बना व्यक्ति हो सकता है. राष्ट्रपति चुन लिए जाने के उपरांत इलेक्टोरेट की कोई भूमिका नहीं होती.

अमेरिकन आम चुनाव में मतदाता दरअसल इलेक्टोरेट को चुनते हैं जो अपनी पार्टी के राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति द्वय के उम्मीदवारों के साथ नत्थी (Pledged) किए हुए रहते हैं और सुनने में यह बेशक अटपटा लगेगा किंतु मुख्य उम्मीदवारों के साथ-साथ बैलेट पर इनका नाम लिखा हो भी सकता है या नहीं भी हो सकता है. ये इलेक्टर्स अपने राजनीतिक दल के समर्पित कार्यकर्ता होते हैं और अपने दल की राज्य इकाई अथवा केंद्रीय समिति द्वारा नामित/चयनित किए जाते हैं.

नवंबर में हुए राष्ट्रव्यापी मतदान के नतीजे आ जाने के बाद इलेक्टोरल कॉलेज गठित हो जाता है और उसके इलेक्टर्स जिस भी पार्टी के उम्मीदवार द्वय को 270 या उससे अधिक मत दे देते हैं वह राष्ट्रपति निर्वाचित हो जाता है.

नेब्रेस्का और मेन को छोड़ बाकी राज्यों में राष्ट्रपति चुनाव की दौड़ में आगे निकले प्रत्याशी द्वय को ‘विनर टेक ऑल’ की तर्ज पर सारे इलक्टर्स मिल जाते हैं. सन् 2000 के राष्ट्रपति चुनाव में राष्ट्र-भर में अधिक जनमत प्राप्त करने के बावजूद अल गोर के जॉर्ज बुश जूनियर से हार जाने में अन्य कारणों के साथ यह भी एक बड़ा कारण था. कोई आश्चर्य नहीं कि इलेक्टोरल कॉलेज प्रणाली की आवश्यकता और विश्वसनीयता को लेकर अमेरिका में भी गंभीर सवाल उठते रहे हैं. परत-दर-परत जटिलता से भरी यह प्रणाली संसदीय प्रणाली के मुकाबले कोई खास उत्साह नहीं जगा पाती.

बहरहाल राष्ट्रपति प्रणाली हो या संसदीय प्रणाली- नीयत साफ हो तो सब ठीक रहता है किंतु अमूमन ऐसा हो नहीं पाता. आज के दिन लोकतंत्रों के लिए सबसे बड़ा खतरा धन का बढ़ता हुआ प्रभाव है. संयुक्त राज्य में राजनैतिक चंदे जुगाड़ने और उन्हें चुनावों में खर्च करने का जिम्मा पॉलिटिकल एक्शन कमिटियों (पीएसी) के पास रहता है. कोई भी संस्था जो चुनावों में 2600 डॉलर से अधिक प्राप्त या खर्च करती हो उसे यह हैसियत मिल जाती है. सन् 2002 के मकेन-फीनगोल्ड रिफार्म एक्ट के जरिए अमेरिकी चुनावों को धनिकों का चुनाव बनने से रोकने की चेष्टा की गई थी किंतु सिटिजंस यूनाइटेड बनाम फेडरल इलेक्शन कमीशन के चल रहे मुकदमे पर अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने अपने 2010 के फैसले से 2002 के मकेन-फीनगोल्ड रिफार्म एक्ट की उन धाराओं को उलट दिया है जो कॉरपोरेट जगत् और यूनियन द्वारा चुनावों में खर्च करने पर निषेध लगाता था. इसने पी.ए.सी. के समानांतर सुपर पी.ए.सी. संस्थाओं को जन्म दे दिया है. सिटिजंस यूनाइटेड के पक्ष में आए इस फैसले से कॉरपोरेट घरानों और संघों को छूट मिल गई है कि वह अपने खजाने से, स्वतंत्रा रूप से किसी भी पार्टी या प्रत्याशी के पक्ष में कितनी भी दौलत सुपर पी.ए.सी. के जरिए खर्च कर सकते हैं.

2016 के राष्ट्रपति चुनाव में अब तक दलों और प्रत्याशियों द्वारा पांच हजार करोड़ रुपये के बराबर की राशि जुगाड़ी जा सकी है जबकि सूपर पी.ए.सी. की तरफ से इस चुनाव में अब तक सात हजार करोड़ रुपये डाले जा चुके हैं जिसका बड़ा हिस्सा रिपब्लिकन प्रत्याशियों के पक्ष में गया है और यह तब जब अभी दोनों दलों के मुख्य उम्मीदवारों का तय होना बाकी है. ध्यान रहे कि यह खर्च सिर्फ राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति कुल दो पदों के चुनाव पर हो रहा है.

ये सारी स्थितियां अमेरिका सहित विश्वभर के लोकतंत्रों को किस दिशा में ले जा रही हैं इसमें संदेह की गुंजाइश नहीं बचतीलोकतंत्रों को कुबेरतंत्र में बदलने का षड्यंत्र चल रहा है. भारत में भी पिछला लोकसभा चुनाव हम भूले नहीं हैं. देश की सबसे धनी ‘पारटी’ ने खरबों रुपये खर्च कर अब तक का सबसे महंगा चुनाव लड़ा. 5-6 सौ करोड़ रुपये के स्रोत का हिसाब तो वे आज तक नहीं दे पाए हैं. सावधान रहें- विश्वभर के राज्याध्यक्षों के सिंहासन नितंबों सहित नीलामी पर हैं.

sanjay jee

संजय सहाय

 चर्चित कथाकार, फिल्मकार और हंस के संपादक. चित्रकला और फिल्मों में अद्भुत रूचि. आप उनसे  sanjaysahay1@gmail.com पर संपर्क कर सकते हैं.

साभार- हंस, मई, 2016.

कुबेरतंत्र में भामाशाह की तलाश: संजय सहाय

संजय सहाय जब ‘हंस’ का यह संपादकीय-लेख लिख रहे थे उसी समय विश्व का एक चर्चित फ्रेंच अर्थशास्त्री थॉमस पिक्केटी  भारत के दौरे पर था. अनके जगह उसने इस भ्रम का पर्दाफ़ाश किया कि भारतीय कुलीन तंत्र आम भारतीयों की तुलना में ज्यादा टैक्स पेय करता है. उसने बताया कि जब से नवउदारवाद का झोंका भारतीय जमीन पर आया है तब से यहाँ की सरकार ने टैक्स-देनदारों के आंकड़ों को सार्वजनिक करना बंद कर दिया है. उसने यह भी जोड़ा कि अगर इनकम टैक्स रिटर्न के आंकड़ों को सामने लाया जाएगा तो इसकी गुंजाइश ज्यादा है कि जीडीपी के उछाल के अनुपात में ही गरीबी-अमीरी की खाई और चौड़ी हुयी है.
संजय सहाय अक्सर अपने संपादकीय में चकित करते हैं. काफी मेहनत करते हैं और हिंदी की ‘मुख्य-धारा’ विषयक परिधि से अपने को बाहर कर लेते हैं. कभी चित्रकला, कभी सिनेमा, कभी संगीत , कभी फासिज्म और अब अर्थतंत्र.

कुबेरतंत्र में भामाशाह की तलाश!

By संजय सहाय

बचपन में मां से एक कहानी सुनी थी- हल्दी घाटी की लड़ाई के बाद जब राणा प्रताप जंगल-जंगल भटक रहे थे और बच्चों को घास की रोटी खिला रहे थे तब मेवाड़ के एक बड़े सेठ भामाशाह ने अपनी सारी दौलत लाकर राणा के कदमों में रख दी थी. ऐसे स्वामिभक्त, राजभक्त और त्यागी सेठ के लिए सचमुच आंखों में श्रद्धा छलछला आई थी. हालांकि तबसे लेकर आज तक, कोई ऐसा संवेदनशील, अपने सामाजिक दायित्वों के प्रति सचेत और मानवीय मूल्यों के लिए समर्पित राष्ट्रभक्त सेठ- जिंदा या मुर्दा- कैसा भी, नहीं मिला. हां, उस कथा को सारे सेठ-साहूकारों ने अपने पक्ष में खूब भुनाया. बाद में पता चला कि 1542 में पैदा हुए ओसवाल जाति से संबंधित भामाशाह का साहुकारी या महाजनी से कुछ लेना-देना नहीं था. उनके पिता भारमल राणा सांगा के वक्त रणथम्भौर किले के किलेदार हुआ करते थे और बाद में राणा उदय सिंह के प्रधानमंत्री भी रहे. भामाशाह भी मेवाड़ के जाने-माने लड़ाका, सेनाध्यक्ष, राज-सलाहकार और प्रधानमंत्री रहे. भामाशाह की तरह ही उनके छोटे भाई ताराचंद भी एक कुशल योद्धा और प्रशासक थे जिन्होंने अनेक अवसरों पर राणा की सेनाओं का संचालन किया था. हल्दीघाटी की लड़ाई के उपरांत जब राणा प्रताप को अपनी सेना के पुनर्गठन के लिए धन की आवश्यकता पड़ी तो दोनों राजभक्त भाईयों ने बीस हजार स्वर्ण मुद्राओं और पच्चीस लाख रूपए से राणा की मदद की. यह पैसे उन दोनों भाईयों के उस खजाने का एक हिस्सा भर थे जो उन्होंने समय-समय पर मुगल ठिकानों पर हमला करके लूटा था. इस प्रकार से देखा जाए तो वह सारा धन मेवाड़ राज्य की संपत्ति ही था. कालांतर में भामाशाह ने मेवाड़ राज्य के खजांची और प्रधानमंत्री का पद भी संभाला, और ताराचंद गोदवाड़ के राज्यपाल नियुक्त किए गए. भामाशाह के वंशज अनेक पीढि़यों तक मेवाड़ के राणाओं के प्रधानमंत्री रहे. इसलिए भारतीय संदर्भ में भामाशाह को एक तोंदियल-सा धन्नासेठ मान बैठना उतना ही हास्यास्पद होगा जितना कि जगत सेठों, राकफेलरों, रॉथ्सचाइल्डों, अंबानियों, अडाणियों या जिंदलों को भामाशाह मान बैठना.

अरस्तु का मानना था कि यदि शासक अभिजात वर्ग जनहित को सर्वोपरि मानकर फैसले लेने लगे तो वह शिष्टतंत्र कहलाएगा और जनसाधारण को नज़रअंदाज कर सिर्फ अपने फायदे के लिए फैसले लेने लगे तो वह निरंकुश कुलीनतंत्र में बदल जाएगा. मध्यम वर्गों के हाथों में सत्ता रखने के हिमायती अरस्तु का यह भी मानना था कि एक विशाल मध्यम वर्गों का समूह छोटे से अभिजात वर्ग को निरंकुश कुलीनतंत्र में बदल जाने से रोक सकता है. बहरहाल, शुरू से ही यह स्पष्ट हो गया था कि अभिजात शासक वर्ग के भीतर भी सत्ता सिर्फ धनी लोगों के हाथों में ही सिमट जाती है जो सिर्फ अपने हितों को ध्यान में रख राज्य के नियम बनाते हैं. इस वजह से कुलीन तंत्र की बजाय उसे कुबेरतंत्र कहना अधिक उपयुक्त रहेगा.

समय-समय पर एक भयावह-सी अफवाह उड़ती रहती है कि पूरी दुनिया को दरअसल एक अति धनाढ्य गुप्त पंथ चला रहा है जिसे इल्युमिनाटी कहते हैं. इल्युमिनाटी पश्चिमी यूरोप और उत्तरी अमेरिका के अंतरराष्ट्रीय बैंकरों, उद्योगपतियों और व्यापारियों का एक कार्टेल है जिसमें रॉथ्सचाइल्ड, रॉकफेलर, मॉर्गन, लज़ार्ड, वारबर्ग, श्राॅडर और शीफ जैसे खानदान जुड़े हैं. अब तो इसमें रूसी और हिंदुस्तानी धनाढ्यों के साथ-साथ अनेक राष्ट्राध्यक्षों के नाम भी गिनाए जाने लगे हैं. अब चूंकि विश्वभर की पूरी दौलत का आधा हिस्सा कुल 62 लोगों के हाथों में निहित है, इस अफवाह को बल मिलता है. 1776 में बवेरिया के एक जर्मन दार्शनिक योहान ऐडम वाइसहोप्ट ने फ्री मेसन पंथ की तर्ज पर ही एक गुप्त समूह की स्थापना की जिसे उसने ऑर्डर ऑफ इल्युमिनाटी की संज्ञा दी थी. इसकी स्थापना में ऐडम को मायर रॉथ्सचाइल्ड का भरपूर सहयोग मिला था. कालांतर में इस समूह को लेकर इतने किस्से प्रचलित हुए कि उसमें से सच और झूठ का फैसला करना नामुमकिन है. इस गुप्त समाज पर अंबेर्तो एको और डैन ब्राउन ने उपन्यास लिखे. 1979 में रोमांचक उपन्यासकार राबर्ट लडलम का बेस्ट सेलर ‘दी मैटरीज़ सर्किल’ भी इल्युमिनाटी, मायर रॉथ्सचाइल्ड जैसे चरित्रों और कुबेरतंत्र के खतरों में खेलता एक रोचक पाठ है. विश्व-व्यवस्था में सचमुच इल्युमिनाटी की कोई भूमिका रही भी या नहीं, या उन्होंने अपने लाभ के लिए तख्तापलट से लेकर जाने-माने राजनेताओं की हत्याएं करवाई अथवा नहीं, पूरी दुनिया की राजनीति और अर्थव्यवस्था को अपनी चेरी बनाकर रखा या नहीं- इस पर कयास लगते रहेंगे, कहानियां बनती रहेंगी. किंतु अंतरात्मा विहीन, विवेकहीन धनकुबेरों के कारनामे जगजाहिर हैं. 18वीं सदी से उभरता यह नव कुबेरतंत्र ग्रीस, कार्थेज, रोम या जापान के प्राचीन कुबेरतंत्रों से इस मामले में भिन्न था कि वे सत्ता और सरकारों का नियंत्रण पर्दे के पीछे रह सुरक्षित दूरी से करने लगे थे. रजवाड़ों को धन-बल-छल से प्रभावित कर लेना बहुत आसान था. लोकतांत्रिक राज्यों में भी ज्यादा कुछ मुश्किल नहीं हुई. अब तो दस-बीस हजार करोड़ के चुनावी चंदे देकर सरकारों पर काबिज हो जाने से ज्यादा सुरक्षित और सस्ता सौदा और क्या हो सकता है? फिर जनता का गुस्सा झेलने के लिए चौड़े सीने वाले नेतागण तो खड़े ही हैं. हालांकि इस लीक से थोड़ा हटकर नव-कुबेर डॉनल्ड ट्रम्प ने सीधे सत्ता पाने के लिए खुद को अमेरिकी राष्ट्रपति पद के लिए प्रस्तुत कर डाला है.

इस क्रूर निरंकुश, स्वार्थी और रोज परिष्कृत होते कुबेरतंत्र का सबसे उपयुक्त उदाहरण रॉथ्सचाइल्ड खानदान है जिसकी शुरूआत 1744 में फ्रैंकफर्ट में जन्मे मायर एमशेल रॉथ्सचाइल्ड से हुई. जर्मन भाषा में रॉथ्सचाइल्ड को रोटशील्ड कहते हैं जिसका अर्थ होता है- लाल रंग की ढाल. एक दरबारी यहूदी होने के नाते मायर रॉथ्सचाइल्ड राजघराने के सदस्यों की संपत्ति का प्रबंधन करता था. बदले में उसे वे सारी सुविधाएं और अवसर मिलते थे जिनसे पृथक-बस्तियों में रहने वाले यहूदी पूरी तरह से वंचित थे. हालांकि मायर एमशील्ड की पैदाइश भी एक घेटो में ही हुई थी. मायर रॉथ्सचाइल्ड का जीवन दर्शन था- ‘मुझे किसी भी देश की मुद्रा पर नियंत्रण दे दो, फिर वहां का कानून कौन बनाता है- मुझे इसकी परवाह नहीं होगी.’ आज के दिन 350 बिलियन डॉलर से अधिक की संपत्ति वाले इस परिवार को अपने रसूख की वजह से शुरूआती दिनों में ही फ्रांसीसी क्रांति में बहुत आर्थिक लाभ हुआ. फिर ऑइस्ट्रियन सेना को बेची गई रसद, वर्दी, घोड़े और युद्ध के साजो-सामान से उन्होंने अकूत संपत्ति अर्जित की. ‘हेशियन’ भाड़े के सिपाहियों से भी उन्होंने खूब धन कमाया और अपने पांच बेटों को फ्रैंकफर्ट, नेपल्स, वियेना, लंदन और पेरिस भेजकर रॉथ्सचाइल्ड बैंकों की स्थापना की. अब पूरी दुनिया उनके इशारों पर नाच रही थी. अनेक लोगों का मानना है कि रॉथ्सचाइल्ड खानदान ने कई राज्याध्यक्षों की हत्याएं करवाईं. इजरायल की स्थापना के पीछे वे सबसे बड़ी ताकत थे. अपने शत्रुओं के दमन के लिए उन्होंने हर तरह के हथकंडों का इस्तेमाल किया. वाटरलू की लड़ाई में नेपोलियन पर वेलिंग्टन की विजय को रॉथ्सचाइल्ड ने अपने चतुर जासूसों की मदद से पहले जान लिया था. उन्होंने फ्रांसीसी कंपनियों के शेयर समय रहते बेच अकूत मुनाफा कमाया. कुछ का तो यहां तक मानना है कि खुद यहूदी होते हुए भी रॉथ्सचाइल्ड कुनबे के लोग ही नात्सी जर्मनी में यहूदियों के सर्वनाश का कारक बने.

इनमें से तथ्य जो भी हो, जितना भी हो, किंतु यह सच है कि इन धन-कुबेरों को कोई फर्क नहीं पड़ता कि युद्ध में कौन जीतता या हारता है, कौन जीता या मरता है. इन्हें हर स्थिति में अपने मुनाफे से ही मतलब रहता है. युद्ध भी यही पैदा करते हैं, उसका साजो-सामान और हथियार भी यही बेचते हैं, फिर घायलों के उपचार में इनकी ही बीमा-कंपनियां और अस्पताल मरहम-पट्टी बेचकर मुनाफा कमाते हैं और घडि़याली आंसू भी इनकी ही दुकानों से खरीदे जा सकते हैं.

हिटलर से बहुत पहले ही लगभग 1910 से अमेरिका के जे.डी. राकफेलर और केलॉग जैसे धनपति ईयूजेनिक विज्ञान के विकास के प्रबल समर्थक और पोषक थे. जिसका उद्देश्य एक ‘स्वामी-प्रजाति’ पैदा करना और निम्न जातियों का खात्मा करना था. रॉथ्सचाइल्ड की तरह राकफेलर ने भी हर तरह के गैरकानूनी और अमानवीय हथकंडे अपनाए. मजदूरों को कुचलने के लिए निजी सेनाओं तक का इस्तेमाल किया. अपने विरोधियों के खात्मे में हर संभव नीचताएं कीं. अपनी चमकदार छवि बनाने के लिए पब्लिक रिलेशन इंडस्ट्री की शुरुआत की. ये तमाम धनकुबेर विश्व भर के मीडिया को अपनी मुट्ठी में कर चुके हैं और अपनी छद्म छवि बनाने से लेकर झूठा इतिहास गढ़ने की सारी तरकीबें आजमाते रहे हैं. सन् 2007 में मणिरत्नम की ‘गुरु’ नाम की फिल्म आई थी जिसमें एक जाने-माने अनैतिक मुनाफाखोर को गांधी और नेहरू से बड़ा जनसेवक बताने का प्रयास किया गया था जबकि तथ्य यह है कि हमारे मुल्क में इन कुबेरों में शायद ही कोई ऐसा मिलेगा जो गर्दन तक गंदगी में न डूबा हुआ हो और जो हर तरह के गैरकानूनी कामों में न लिप्त हो. प्राकृतिक संसाधनों, बिजली और करों की चोरी से लेकर तस्करी और हत्याओं तक.

1936 में डैनियल गुएरिन ने अपनी किताब ‘फासिज्म एंड बिग बिजनेस’ में और बाद में अमेरिकी राष्ट्रपति ड्वाइट आइजनहॉवर ने अपने 1961 के विदाई भाषण में सेना, सैन्य-उद्योग और राजनीति के अपवित्र गठबंधन के खतरों से अपने मुल्क को आगाह किया था. हमारे मुल्क में चूंकि सैन्य उद्योग या उद्योग ही बहुत मामूली-सा है, हम इसकी जगह ‘धंधेबाज’ शब्द का इस्तेमाल कर सकते हैं. सचमुच यह गठबंधन एक अभेद्य लौह त्रिकोण है जिसमें भारी-भरकम चंदे हैं, मुंहमांगी ठीकेदारी है, बिके हुए नेता और अफसर हैं और निरंतर-चिरंतर जारी जंग है. दुर्भाग्य से अमेरिका सहित पूरी दुनिया ने आइजनहॉवर की चेतावनी पर ध्यान नहीं दिया. देते भी कैसे? जब जनचेतना का रखवाला मीडिया भी उन लोगों के कब्जे में हो जो सिर्फ अपनी शर्तों पर युद्ध और शांति चाहते हैं ताकि वे अधिक से अधिक मुनाफा कमा सकें. नोम चोमस्की का भी मानना है कि अमेरिका मूलतः एक कुबेरतंत्र है जो लोकतांत्रिक बनावट का है.

यह स्पष्ट होता जा रहा है कि कुबेरतंत्र के दबावों में लोकतंत्र हार चुका है. जब सरकारों को धंधेबाज नियंत्रित करने लगें, जब अंतरराष्ट्रीय संबंध उनके प्रभाव से बनने-बिगड़ने लगें तो संदेह नहीं रह जाना चाहिए कि हम किस तरह की व्यवस्था में जी रहे हैं. वरना क्या कारण था कि तब जबकि भारत-पाकिस्तान के बीच कोई अधिकारिक सौहार्द्र कायम नहीं हुआ हो और जब हाल-फिलहाल तक विरोधी स्वरों को पाकिस्तान भेज देने की गालियां उगली जा रही हों- ऐसे असहज वक्त में जिंदल महोदय प्रधानमंत्री की रहस्यमयी ‘औचक’ पाकिस्तान यात्रा पर वहां उनकी अगवानी करने को पहले से खड़े थे!

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संजय सहाय

संजय सहाय. चर्चित कथाकार, फिल्मकार और हंस के संपादक. चित्रकला और फिल्मों में अद्भुत रूचि. आप उनसे sanjaysahay1@gmail.com पर संपर्क कर सकते हैं.

साभार- हंस, फ़रवरी, 2016.

गर्व से कहो हम फासिस्ट हैं: संजय सहाय

By संजय सहाय 

1921 में नेशनल फासिस्ट पार्टी (पीएनएफ) के जन्म के साथ ही इटली में फासिज्म का उदय हुआ. इस नए राजनीतिक विचार का अंकुरण प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान हो चुका था. यह सर्वसत्तावादी कट्टर राष्ट्रवाद की राजनीति पर आधारित पार्टी थी, जिसका उद्देश्य पूरी तरह से दक्षिणपंथी था, किंतु जिसकी राजनैतिक शैली वामपंथी तत्त्वों से प्रभावित थी.

फासीज़ प्राचीन रोम के पहले की इट्रस्कन सभ्यता का चिह्न था, जिसे रोम ने दंडाधिकार के प्रतीक के रूप में अपना लिया था. रोमन फासीज़ बर्च या एल्म की लकड़ी से बने पाँच-पाँच फीट के डंडों का गट्ठर होता था, जो समूह की शक्ति का प्रतीक था. गट्ठर को लाल रंग के चमड़े के फ़ीतों से कसा जाता था, और ऊपर एक कुल्हाड़ी या फरसे का फल भी बाँध दिया जाता था. कुल्हाड़ी दंडाधिकारी के मृत्युदंड अथवा जीवनदान देने के अधिकारों को इंगित करती थी. फासीज़ के चिह्न का इस्तेमाल इटली में भिन्न राजनैतिक समूह पहले भी करते रहे थे. वे उसे ‘फासियो’ कहते थे, जिसका अर्थ लीग्स अथवा संघ है. अमेरिका में भी फासीज़ का इस्तेमाल अनेक राजकीय व न्यायिक चिह्नों में होता रहा है. 1870 के उपरांत फ्रेंच रिपब्लिक ने भी अपनी राजकीय मुहर में इसका इस्तेमाल किया. आज भी इसका इस्तेमाल फ्रांस में गैरआधिकारिक तौर पर राष्ट्रीय चिन्ह में होता है. फासिस्ट पार्टी के बेनिटो मुसोलिनी ने फासिज़्म के मूल चिह्न के रूप में फासीज़ का उपयोग किया. इतालवी फासिज़्म की जड़ें वहाँ के राष्ट्रवाद में थीं. पीएनएफ का घोषणापत्र था कि यह पार्टी राष्ट्रसेवा को समर्पित एक क्रांतिकारी मिलीशिया (जनसेना) है, जिसकी नीतियाँ तीन उद्देश्यों के लिए हैं- व्यवस्था, अनुशासन और वर्गीकरण. यह बात दीग़र है कि अनुशासन के नाम पर अराजकता फैलाने में मौत का काला प्रतीक धारण किए मुसोलिनी के ‘ब्लैक शर्ट्स’ गैंग के सदस्य सबसे आगे रहे. इस नवोदित इतालवी फासिज़्म ने स्वयं को प्राचीन रोमन साम्राज्य के उत्तराधिकारी के रूप में पेश किया और प्राचीन रोम तथा रेनेसांस काल के रोम के बाद स्वयं को तीसरे रोमन साम्राज्य के रूप में प्रचारित किया. बेनिटो मुसोलिनी जूलियस सीज़र को फासिस्टों का आदर्श मानता था, और आगस्टस सीज़र को साम्राज्य-निर्माण का. 1932 में घोस्ट राइटर जिओवानी जेंतीले ने ‘द डॉक्ट्राइन ऑफ फासिज़्म’ (फासिज़्म का तत्व) लिखी, जो बतौर लेखक बेनिटो मुसोलिनी के नाम से प्रकाशित हुई. यह इतालवी फासिज़्म का निरूपण था. यह डॉक्ट्राइन कहता है ‘फासिस्ट राज्य शक्ति और साम्राज्य का संकल्प है. यह साम्राज्य न केवल सीमाओं, सैन्यबल या व्यापारिक विस्तार की अवधारणा पर आधारित है बल्कि नैतिक और आध्यात्मिक विस्तार पर भी. एक ऐसे साम्राज्य की कल्पना की जा सकती है जहाँ एक राष्ट्र बिना किसी भूभाग को जीते प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से दूसरे राष्ट्रों का मार्गदर्शन तय कर सकता है.’ ज़ाहिर है कि विश्वगुरु बनने की सनक पर हमारा एकाधिकार नहीं रहा है. 

Guernica

Guernica

प्रथम विश्वयुद्ध में हारे हुए जर्मनी और हवा का रुख देख मित्र शक्तियों के साथ मिल गए विजेता इटली, जिसकी आर्थिक व्यवस्था विजय के बावजूद ध्वंस के कगार पर पहुँच चुकी थी, दोनों में ऐसी परिस्थितियाँ बनती जा रही थीं जहाँ सर्वसत्तावादी, नस्लवादी, कट्टर राष्ट्रवाद को लोकप्रियता मिल सके. वर्साई संधि से ब्रिटेन और फ्रांस अवश्य लाभान्वित हो रहे थे किंतु इटली, जिसने छह लाख सैनिकों को युद्ध में खोया था, की जनता जून 1919 की इस संधि से स्वयं को छला हुआ महसूस कर रही थी और तत्कालीन नेतृत्व को इसके लिए दोषी मान रही थी. उधर हारा हुआ जर्मनी तो इस संधि से अत्यंत आहत था. अन्य सैन्य/ आर्थिक प्रतिबंधों के साथ-साथ जर्मनी को युद्ध के लिए जिम्मेदार होने के कारण 132 बिलियन मार्क का जुर्माना भी भरना था. नतीजा था कट्टर राष्ट्रवाद. जर्मनी में 1919 में ही बनी नात्सी पार्टी, जो फासिस्ट सिद्धांतों पर आधारित थी, अडोल्फ हिटलर के नेतृत्व में 1933 में सत्तासीन हो गई. मुसोलिनी के तीसरे रोमन साम्राज्य की घोषणा की ही तरह इसने भी खुद को तीसरे ‘राइश’ (राज्य/साम्राज्य) के रूप में पेश किया. पहला राइश औटो प्रथम के सन 962 में हुए राज्याभिषेक से लेकर नेपोलियन के युद्धों (1806) तक रहा. दूसरा राइश होहेनत्सोलर्न राजाओं के अंतर्गत औटो वान बिस्मार्क द्वारा एकीकृत किए गए जर्मनी के ‘इंपीरियल चांसलर’ नामित (1871) किए जाने से लेकर वर्साई संधि के पूर्व अंतिम चांसलर फ्रीड्रिक एबर्ट (1918) तक रहा. जर्मन फासिज़्म इतालवी फासिज़्म से इस मामले में थोड़ा भिन्न अवश्य रहा कि जर्मन फासिज़्म में नस्लवाद और आर्यन प्रभुताबोध चरम पर रहा. हालाँकि दोनों फासिस्ट राज्यों का अंत किस तरह हुआ यह किसी से छिपा नहीं है.

सामान्यत: ऐसी शक्तियों के उदय के लिए आवश्यक है कि पूरा समाज अनेक प्रकार की हीन ग्रंथियों और बोधों से ग्रस्त हो- जैसे, ‘हम सदियों गुलाम रहे’, ‘दूसरों ने हमें लूटा’, ‘हमारे सीधेपन का बेजा लाभ उठाया’, ‘हमारे वर्तमान नेताओं ने हमें ठगा’ आदि-आदि. ऐसी परिस्थिति में व्यक्ति केंद्रित, सर्वसत्तावादी और कट्टर राष्ट्रवादी शक्तियों का आकर्षण बेपनाह रूप से बढ़ जाता है. बावजूद इसके सावधानी बरतने की घोर आवश्यकता है. हमारे जैसे उदारवादी व्यवस्था के हिमायती लोग तो किसी न किसी तरह वैसे दिन भी काट लेंगे, लेकिन इसके दूरगामी परिणाम राष्ट्र के लिए बहुत गंभीर हो सकते हैं. यहाँ यह बताना दिलचस्प है कि 2003 में डॉक्टर लारेंस ब्रिट नाम के सज्जन ने भिन्न फासिस्ट राज्यों (मुसोलिनी, हिटलर, फ्रैंको, सुहार्तो व अन्य लातिनी मुल्कों के तानाशाहों) के अध्ययन के बाद यह निष्कर्ष निकाला कि इन सब फासिस्ट राज्यों के चरित्र में 14 बिंदु समान थे.

  • एक, राष्ट्रवाद का सशक्त प्रचार.
  • दो, मानवाधिकारों के प्रति धिक्कार (शत्रु व राष्ट्रीय सुरक्षा का भय दिखा लोगों को इस बात के लिए तैयार करना कि खास परिस्थितियों में मानवाधिकारों को अनदेखा किया जा सकता है, और ऐसी स्थिति में शारीरिक-मानसिक प्रताड़ना से लेकर हत्या तक सब जायज़ है.).
  • तीन, शत्रु को और बलि के बकरों को चिह्नित करना (ताकि उनके नाम पर अपने समूहों को एकत्रित-उन्मादित किया जा सके कि वे ‘राष्ट्रहित’ में अल्पसंख्यकों, भिन्न नस्लों, उदारवादियों, वामपंथियों, समाजवादियों और उग्रपंथियों को मानवाधिकारों से वंचित रखने में समर्थन दें.).
  • चौथा, सेना को आवश्यकता से अधिक तरजीह और उसका तुष्टिकरण.
  • पाँचवाँ, पुरुषवादी वर्चस्व.
  • छठा, मास मीडिया को येन-केन-प्रकारेण प्रभावित कर उसे अपना पक्षधर बनाना और नियंत्रण में रखना.
  • सातवाँ, बुद्धिजीवियों, साहित्यकारों और संस्कृति कर्मियों पर नकेल कसना.
  • आठवां, धार्मिकता व सरकार में घालमेल करते रहना (बहुसंख्यकों के धर्म और धार्मिक भावाडंबर का इस्तेमाल कर जनमत को अपने पक्ष में प्रभावित करते रहना).
  • नौवाँ, कारपोरेट जगत को पूर्ण प्रश्रय देना (चूँकि कारपोरेट जगत से जुड़े उद्योगपतियों/ व्यापारियों द्वारा ही फासिस्ट ताकतें सत्ता में पहुँचाई जाती हैं, तो जाहिर है एक-दूजे के लिए…).
  • दसवाँ, श्रमिकों की शक्ति को कुचलना.
  • ग्यारहवाँ, अपराध और दंड के प्रति अतिरिक्त उत्तेजना का माहौल बनाना.
  • बारहवाँ, पुलिस के पास असीमित दंडात्मक अधिकार देना.
  • तेरहवाँ, भयानक भाई-भतीजावाद और भ्रष्टाचार.
  • चौदहवाँ, चुनाव जीतने के लिए हर प्रकार के हथकंडे अपनाना.


माना कि डॉक्टर ब्रिट कोई बड़े इतिहासकार या शिक्षाविद नहीं हैं, पर कुछेक त्रुटियों के बावजूद उनके बिंदुओं को आसानी से खारिज नहीं किया जा सकता. उपरोक्त बिंदुओं में से अनेक को हम तथाकथित उदारवादी मुल्कों से लेकर भारतवर्ष तक की पूर्ववर्ती सत्ताओं द्वारा समय समय पर आजमाते देखते रहे हैं, पर बहुत संभव है कि आने वाले दिनों में भारत में बड़ी तादाद में इनका इस्तेमाल किया जाए. इस बात की भी बड़ी संभावना है कि निकट भविष्य में  कतार में खड़े अपने सीनों पर हथेली टिकाए हम जोर-जोर से चीखते नजर आएँ- गर्व से कहो हम फासिस्ट हैं.

संजय सहाय

संजय सहाय

संजय सहाय. चर्चित कथाकार, फिल्मकार और हंस के संपादक. चित्रकला और फिल्मों में अद्भुत रूचि. आप उनसे sanjaysahay1@gmail.com पर संपर्क कर सकते हैं.

हिन्दी सिनेमा की भाषा- एक के भीतर अनेक: चन्दन श्रीवास्तव

By चन्दन श्रीवास्तव 

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हंस फरवरी-2013- हिन्दी सिनेमा के सौ साल

मौका हिन्दी-दिवस का था, चूंकि हिन्दी-दिवस पर दस्तूर ‘हिन्दी-हित-चिन्ता’ का है सो एक मशहूर दैनिक(हिन्दुस्तान) ने अपने वेबपेज पर‘हिन्दी फिल्में, कितनी हिन्दी’ शीर्षक से एक पोस्ट लगायी। जैसा कि शीर्षक से ही जाहिर है, अख़बार ने इस पोस्ट में बड़े संताप के स्वर में जानना चाहा कि हिन्दी फिल्म इंडस्ट्री में ‘हिन्दी से भरपूर नाम-दाम कमाने वाले अपने कामकाज और जीवन में हिन्दी को कितना सम्मान देते हैं, कितना अपनाते हैं ? ”

अख़बार की इस ‘हिन्दी-चिन्ता’ में जावेद अख्तर यह कहते हुए शामिल हुए कि “ इधर हमारी फिल्म इंडस्ट्री में अंग्रेजी का बोलबाला है।..ज्यादातर हिंदी फिल्मों में स्क्रिप्ट की जो हालत हो रही है, उससे मैं बहुत दुखी हूं। ” जावेद साहब ने अपने दुःख के दो कारण गिनवाये। एक तो यह कि “आज अंग्रेजी के लोग हिंदी फिल्मों के पटकथा लेखन में अपना योगदान दे रहे है ” जबकि  हिंदी या उर्दू का उन्हें “समुचित ज्ञान” नहीं है। दूसरे, जावेद साहब के हिसाब से हिन्दी फिल्मों की स्क्रिप्ट की दुर्दशा के लिए आज के अभिनेता “ज्यादा जिम्मेदार” हैं क्योंकि “उनकी(सिने-अभिनेता की) सबसे बड़ी परेशानी यह है कि वो हिंदी या उर्दू साहित्य के जरा भी नजदीक नहीं है। उर्दू की बात जाने दें, हिंदी पढ़ने में भी उन्हें खासी दिक्कत होती है। इसका सीधा असर अच्छी स्क्रिप्ट पर पड़ता है।” इन दो वजहों से जावेद अख्तर को लगता है कि बॉलीवुड में “हिंदी फिल्में सही हिंदी में कम ही लिखी जाती हैं। सरल हिंदी में लिखी पटकथा में भी बीच-बीच में अंग्रजी शब्दों का उपयोग जम कर किया जाता है। ऐसी स्क्रिप्ट यहां कम ही देखने को मिलती है, जिसमें अंग्रेजी शब्दों के मोह से बचते हुए शुद्ध हिंदी या उर्दू के शब्दों का उपयोग किया जाता हो।”

जैसे आज कुछ लोगों को ‘हिन्दी सिनेमा’ की ‘हिन्दी’ पर अंग्रेजी का बोलबाला नजर आता है वैसे ही बीते वक्त में कुछ लोगों को हिन्दी सिनेमा के साथ ‘उर्दू’ का जिक्र गवारा ना था। पोस्ट में कही गई जावेद अख्तर की बातों को पढ़कर सिने-इतिहास के गंभीर अध्येता रविकांत(सीएसडीएस स्थित सराय वाले) का वह आलेख याद आया जिसे उन्होंने कभी शिमला स्थित भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान की एक संगोष्ठी में पढ़ा था। “सिनेमा, भाषा, रेडियो: एक त्रिकोणीय इतिहास” शीर्षक इस लेख में छोटा-सा जिक्र आता है कि हिन्दी फिल्मों को बेशुमार अमर गीत देने वाले साहिर लुधियानवी सन् 1960 के दशक में एक दफे बिहार गए थे और किसी मुशायरे में कह दिया था कि हिन्दी फिल्मों की भाषा 97 फीसदी उर्दू है। फिल्मों से जुड़ी पत्रकारिता के मामले में जिस “माधुरी’ ( इसका शुरुआती नामी सुचित्रा था, माधुरी नाम बाद में पडा) पत्रिका को मील का पत्थर माना जाएगा वही साहिर लुधियानवी के पीछे पड़ गई।

पत्रिका के  ‘चले पवन की चाल’ नाम के पन्ने पर एक चिट्ठी छपी। इसके लिखने वाले ने अपना नाम लिखा था ‘फिल्मेश्वर’ और चिट्ठी का शीर्षक था- ‘ हिन्दी और उर्दू के नाम पर नफरत के शोले भड़काने वाले अवसरवादी साहिर के नाम एक खुला पत्र ।’ चिट्ठी दिलचस्प है क्योंकि उसके मुताबिक साहिर फारसी लिपि में लिखे होने के कारण जिसे उर्दू समझ रहे हैं वह दरअसल हिन्दी ही है। इस चिट्ठी का एक अंश है- “यह जानकर वाकई बड़ा आश्चर्य हुआ कि आप समझते हैं कि आपने एक फिल्म में हिन्दी गीत लिखे हैं। लेकिन आपने हिन्दी पर यह अहसान पहली ही बार नहीं किया है। आप इससे पहले भी हिन्दी में ही लिखते रहे हैं। आपने फिल्मों में आने से पहले भी जो कुछ लिखा था, वह हमारी निगाह में तो हिन्दी ही थी..यह जरुर है कि आपने जब वह सब कलमबंद किया था जो फारसी लिपि इस्तेमाल की थी। यूं देखा जाय तो अपनी चितरलेखा के गीत भी आपने अपनी तरफ से चाहे हिन्दी में लिखे हों लेकिन कागज पर उतारा उन्हें फारसी लिपि में ही था।इतनी छोटी सी बात का मतलब आप जैसा बड़ा और दानिशमंद शायर शायद फौरन समझ गया होगा- दो लिपियों से भाषा दो नहीं हो जाती और एक ही लिपि में कई भाषाएं भी लिखी जा सकती हैं। ” वैसे साहिर लुधियानवी को फिल्मेश्वर का यह तर्क गले उतरा होगा ऐसा नहीं लगता क्योंकि भाषा के मामले में साहिर का पक्ष बड़ा साफ है। आजादी के बाद के वक्त में जिस वक्त सरकार को गालिब के मजार के जीर्णोद्धार की फिक्र हुई थी उन दिनों साहिर लुधियानवी ने लिखा था-

जिन शहरों में गूंजी थी गालिब की नवा बरसों- उन शहरों में अब उर्दू बे-नामो निशां ठहरी

आजादि-ए-कामिल का ऐलान हुआ जिस दिन- मातूब जबां ठहरी, गद्दार जबां ठहरी।

जिस अहद-ए-सियासत ने ये जिन्दा जबां कुचली- उस अहद-ए-सियासत को मरहूमों का गम क्यों है

गालिब जिसे कहते हैं उर्दू ही का शायर था- उर्दू पे सितम ढाकर गालिब पर करम क्यों है।

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साहिर लुधियानवी

और साहिर ही क्यों, हिन्दी-सिनेमा को केंद्र में रखकर हुए अंग्रेजी-लेखन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा यही मानकर चलता है कि हिन्दी-सिनेमा की भाषा मुख्य रुप से उर्दू रही है। इस सोच की एक मिसाल मुकुल केशवन का बहुउद्धृत आलेख- उर्दू, अवध एंड तवायफ- द इस्लामिकेट रुटस् ऑव हिन्दी सिनेमा- है। यह आलेख यही साबित करने के लिए लिखा गया है कि- “ हिन्दी-सिनेमा का महल बहुमंजिला तो है लेकिन इसका स्थापत्य इस्लामी रुपाकारों से प्रेरित है। इन इस्लामी रुपकारों का सबसे प्रकट उदाहरण है उर्दू। विडंबनापूर्ण लेकिन सच बात यह है कि आजाद भारत में उर्दू का आखिरी मजबूत मकाम हिन्दी-सिनेमा ही साबित हुआ, भाषाई हठधर्मिता के सागर में उर्दू का आखिरी स्वर्ग। और जो ऐसा हुआ तो यह सही ही है क्योंकि हिन्दी सिनेमा की काया उर्दू की जबांदानी और लोकाचारी संस्कारों से बनी है। ” इसी बात का एक विस्तार नसरीन मुन्नी कबीर की किताब ‘टॉकिंग फिल्मस्: कॉन्वर्सेशनस् ऑन हिन्दी सिनेमा विद् जावेद अख्तर’  में मिलता है। इसमें जावेद अख्तर एक जगह कहते हैं- “भारत की बोलती फिल्मों ने अपना बुनियादी ढांचा उर्दू फारसी थियेटर से हासिल किया। इसलिए बोलती फिल्मों की शुरुआत उर्दू से हुई। यहां तक कि कलकत्ता का नया थियेटर भी उर्दू के लेखकों का इस्तेमाल करता था। बात यह है कि उत्तर भारत के शहरी इलाके में उर्दू देश के बंटवारे से पहले बोल-चाल की जबान थी और इसे ज्यादातर लोग समझते थे और यह पहले की तरह आज भी बड़ी नफीस जबान है जिसके भीतर हर तरह के जज्बात और ड्रामे की तर्जुमानी की सलाहियत है।”

ऐसा कहते हुए मुकुल केशवन या फिर जावेद अख्तर कुछ बातों की अनदेखी करते हैं। एक तो यही कि हिन्दी-सिनेमा के भीतर एक लंबी कड़ी हिन्दू-धर्मकथाओं पर आधारित फिल्मों की रही है और उनकी संवाद-भाषा आजादी से पहले और बाद में भी संस्कृत की तरफ झुकी रही। इसके लिए ज्यादा उदाहरण ना देते हुए जिस दशक में फिल्म शोले(1975) बनी थी उसी दशक की दो फिल्मों हरिदर्शन(1972) और जय़ संतोषी मां(1975) को याद कर लेना काफी होगा। फिल्म हरिदर्शन में लक्ष्मी विष्णु के वाराह रुप धारण करने पर अचरज में पड़े नारद से कहती हैं- “  प्रभु तो जैसा कारण हो वैसा ही रुप लेकर पापियों के पास जाते हैं। आप उनके प्रिय प्रतिनिधि होकर भी ये नहीं जान पाये।’’ और ‘जय संतोषी मां’ फिल्म की शुरुआती पंक्ति ही है- “संतोषी मां की महिमा अपार है। हर भक्त ने उनकी महिमा का गुणगान अपने अपने ढंग से किया है।इस चित्र की कथा भी कुछ धार्मिक पुस्तकों और लोककथाओं के आधार पर है। आशा है, आप इसे सच्ची भावना से स्वीकार करेंगे।”

दूसरी बात पारसी थियेटर से हिन्दी फिल्मों के रिश्ते से जुड़ी है। हरीश त्रिवेदी ने अपने आलेख- ऑल काईंड ऑव हिन्दी: द इवॉल्विंग लैंग्वेज ऑव हिन्दी सिनेमा- में ध्यान दिलाया है कि पारसी थियेटर के लिए नाटक लिखने वालों में सिर्फ आगा हश्र कश्मीरी का ही नाम नहीं आता, नारायण प्रसाद ‘बेताब’ और पंडित राधेश्याम कथावाचक का भी आता है। नारायण प्रसाद ‘बेताब’ ने अपने नाटकों के लिए जो भाषा नीति बनायी वह उन्हीं के शब्दों में कुछ ऐसी थी-“ना ठेठ हिन्दी ना खालिस उर्दू,जुबान गोया मिली जुली हो- अलग रहे दूध से ना मिश्री, डली-डली दूध में घुली हो । ” बहरहाल, नारायण प्रसाद बेताब की भाषा का एक छोर फारसीनिष्ठ था तो दूसरा छोर संस्कृतिनिष्ठ। वे ‘रुस्तम व सोहराब’के लिए  यह लिख सकते थे- “अगर तुम मादरे-ईरान के फरजंद होते तो मैं कनीज बनकर तुम्हारी खिदमत में अपनी जिंदगी..” तो भीष्म-प्रतिज्ञा के लिए ऐसी भाषा भी गढ़ सकते थे- “जिस स्त्री के पास रुप है हृदय नहीं है, सेवा है प्रेम नहीं है, पुत्र की लालसा है किन्तु पुत्र की ममता नहीं है- उसके पास दया !”  और तीसरी बात थोड़ी महीन है, जिसकी तरफ इतिहासकार विनय लाल ने अपने लेख हिन्दुईज्म एंड बॉलीवुड- अ फ्यू नोटस् में ध्यान दिलाया है। विनय लाल की मानें तो हिन्दी सिनेमा का एक बड़ा हिस्सा हिन्दू-मानस और संस्कृति का झरोखा है। ‘अमर अकबर एंथोनी’, ‘कुली’ और ‘मर्द’ सरीखी हिट फिल्मों के निर्देशक मनमोहन देसाई को विनयलाल ने यह कहते हुए उद्धृत किया है कि मेरी फिल्में महाभारत की कथाओं पर आधारित हैं। विनयलाल की मान्यता है कि हिन्दी फिल्में हिन्दू-धर्म के मिथकों का पुनराख्यान हैं। वे इस कोटि में श्याम बेनेगल की फिल्म कलयुग(1980) को भी ऱखते हैं (क्योंकि इसमें महाभारत की ही कथा के समान दो व्यवसायी घरानों की दुश्मनी को दिखाया गया है) तो  “हम पाँच” (1980) को भी( क्योंकि इसमें पांडव सरीखे पाँच भाइयों की टक्कर दुर्योधन सरीखे जमींदार वीरप्रताप और शकुनि सरीखे उसके लाला मामा की कुटिल चालों से होती है)। और हिन्दी-फिल्मों के कथा-काया के भीतर हिन्दू मिथकों की आत्मा खोजने वाले अकेले विनय लाल ही नहीं हैं, उनसे मिलती-जुलती बात संस्कृति-मनोविज्ञानी सुधीर कक्कड़ भी कहते हैं। सुधीर कक्कड़ की मानों तो हिन्दी फिल्मों के नायकों का छलिया और खिलंदड़ रुप( जैसे फिल्म राजा बाबू में गोविन्दा) कृष्ण के चरित्र पर गढ़ा गया वैसे ही धीरोदात्त रुप( जैसे फिल्म जंजीर में अमिताभ) राम के चरित्र पर।

बात आज के जावेद अख्तर की हो या कल के साहिर लुधियानवी अथवा किसी छद्मनामधारी ‘फिल्मेश्वर’ की – सभी मानकर चलते हैं कि नाम अगर ‘हिन्दी सिनेमा’ है तो जो कथा दर्शक को दिखाई जा रही है उसमें बोली जाने वाली भाषा का रुप जरुरी तौर पर कोई एक ही होगा।‘फिल्मेश्वर’ की नजर में यह भाषा हिन्दी है, साहिर लुधियानवी की नजर में उर्दू और जावेद अख्तर के हिसाब से हिन्दी/उर्दू। हिन्दी फिल्मों के संवाद-पक्ष बारे में प्रगतिशील इदारे में ज्यादातर बातें इसी मान्यता की छांव में होती हैं। बस अन्तर इतना रहता है कि नफासत की नोंक चूंकि वहां ज्यादा ही बारीक होती है इसलिए हिन्दी फिल्मों की भाषा को ‘हिन्दुस्तानी’ कह दिया जाता है, यानि एक ऐसी भाषा जो चले हिन्दी-व्याकरण की पटरियों पर और शब्द ना तो संस्कृत के लादे और ना ही फारसी के। इस भाषा को इंगित करने के लिए कभी इसे ‘आम-फहम’ कहा जाता है तो कभी ‘बोल-चाल’ की भाषा और जोर यह दिखाने पर रहता है कि यह भाषा तद्भव-प्रेमी है- उन्हीं शब्दों को अपने भीतर समेटती है जिसके नक्काशीदार कोने जनता की जुबान पर घिस गए हों, चाहे ये शब्द पूरबिया गांवों के हों, संस्कृत और फारसी के या फिर अंग्रेजी के।

‘हिन्दी फिल्मों के संवाद हिन्दुस्तानी में लिखे जाते हैं या उन्हें हिन्दुस्तानी में होना चाहिए’- यह बात जैसे ही कोई कहता है, बात भाषा से उठकर भारतीय राष्ट्रवाद के मनचीते स्वरुप पर चली आती है। भारत के सेकुलरवाद की कुश्ती ज्यादातर धर्मगत(हिन्दू-मुसलमान) पहचानों से रही और इसी के अनुकूल ‘देश के बंटवारे’ की लहुलुहान चादर ओढ़कर आजादी के शुरुआती दशकों में देश के भावी नागरिक से चाहा यह गया कि- तू हिन्दू बनेगा ना मुसलमान बनेगा, इंसान की औलाद है, इंसान बनेगा-  और इस मुकाम तक पहुंचने के पहले के सोपान के तौर पर सोचा गया कि- हिन्दू-मुसलिम-सिक्ख ईसाई- आपस में हैं भाई-भाई। पीछे से चला आ रहा भाषाई इतिहास-बोध कहता था कि हिन्दी संस्कृत से निकली है, वेद संस्कृत में हैं और वेद चूंकि हिन्दुओं का आदिग्रंथ है इसलिए हिन्दी हिन्दुओं की भाषा है।इस सोच का एक और संस्करण था (और यह ज्यादातर मौन रहा क्योंकि पाकिस्तान बन चुका था और उस राष्ट्र की भाषा उर्दू घोषित हो चुकी थी) जो मन ही मन मानता था कि उर्दू का रिश्ता अरबी से, अरबी का रिश्ता कुरान से और कुरान का अनिवार्य रिश्ता मुसलमान से है। हिन्दू-हिन्दी बनाम मुसलिम-उर्दू के इस तनाव को कैसे साधा जाय- भारतीय सेकुलरवाद की बड़ी चिंता तो यह थी। विकल्प के तौर पर तान अंग्रेजी पर जाकर टूटी क्योंकि पश्चिमी काट की ‘आधुनिकता’ ने पहले से स्थापित कर रखा था कि सारे पौराणिक पहचानों से परे वह जो एक ‘इंसान’ होता है- वह सिर्फ तर्कबुद्धि की भाषा बोलता-लिखता है और तर्कबुद्धि की भाषा अगर कोई है तो अंग्रेजी। नए आजाद देश में यह बात धमाके से कही नहीं जा सकती थी क्योंकि मान्यता यह रही कि राष्ट्र बनना है तो राष्ट्रभाषा होनी ही चाहिए। विकल्प के तौर पर एक प्रत्यय गढ़ा गया ‘साझी संस्कृति’ का और इस साझी संस्कृति को बाकी बातों के अलावा भाषा में भी खोजा गया- एक ऐसी भाषा जिसमें अपनी-अपनी ‘रुढियां’ यानि संस्कृत और अरबी-फारसी खोकर, हिन्दू-मुसलमान दोनों अपनी अभिव्यक्तियों के लिए एक नया घर बना सकें। यह खोज आखिर को जिस भाषा पर खत्म हुई उसे 1930 के दशक में हिन्दुस्तानी कहा जा चुका था और महात्मा गांधी की मेहरबानी से उसकी चाल-ढाल भी तय की जा चुकी थी। आजादी के बाद के शुरुआती दशक में चूंकि बड़ी तेजी से संस्कृतनिष्ठ सरकारी हिन्दी का प्रचलन हुआ, इसलिए हिन्दुस्तानी के कंधे पर एक तमगा और जुड़ा कि यह  हिन्दू-वर्चस्व वाली प्रतिगामी भाषा नहीं है- बल्कि सत्ता के विरोध की भाषा है। सेकुलरवादी सोच की इसी भाषाई प्रसंग के भीतर हिन्दी फिल्मों की भाषा को प्रगतिशील इदारों में ‘हिन्दुस्तानी’ कहकर याद किया गया।

हिन्दी फिल्मों में चलने वाली इस हिन्दुस्तानी भाषा के उदाहरण बहुतेरे हैं, मिसाल के लिए याद करें फिल्म दीवार का वह यादगार संवाद जिसमें शिव की मूर्ति के आगे अमिताभ बच्चन को यह कहते हुए दिखाया गया है- “आज, खुश तो बहुत होगे तुम। देखो, जो आज तक तुम्हारें मंदिर की सीढियां नहीं चड़ा। जिसने आज तक तुम्हारे सामने सर नहीं झुकाया। जिसने आज तक कभी तुम्हारे सामने हाथ नहीं जोड़े। वो आज तुम्हारे सामने हाथ फ़ैलाए खड़ा है। बहुत खुश होगे तुम। बहुत खुश होगे कि आज मैं हार गया। लेकिन तुम जानते हो कि जिस वक्त मैं यहाँ खड़ा हूँ, वो औरत जिस के माथे से तुम्हारे चौखट का पत्थर घिस गया, वो औरत जिस पर ज़ुल्म बढ़े तो उसकी पूजा बढ़ी, वो औरत जो ज़िंदगी भर जलती रही लेकिन तुम्हारे मंदिर में दीप जलाती रही, वो औरत। वो औरत आज ज़िंदगी और मौत के सरहद पर खड़ी है। और.. ये तुम्हारी हार है…।” इस संवाद में जुल्म और जिंदगी सरीखे उर्दू-परंपरा के शब्द आते हैं तो मंदिर और दीप सरीखे हिन्दी-परंपरा के शब्द भी। आगे इसी संवाद में जुर्म और सज़ा जैसे शब्द आते हैं तो सुहागन और विधवा जैसे शब्द भी।

हिन्दी फिल्मों के संवादों की भाषा को हिन्दी-उर्दू-हिन्दुस्तानी अथवा अंग्रेजी के झगड़े से दूर ले जाकर सोचें तो नजर आएगा कि यह एक बहुलस्वरी दुनिया है, नजर आएगा कि ‘हिन्दी फिल्म’ शब्द एक व्युत्तपत्तिमूलक शब्द(जेनरिक टर्म) भर है- एकभाषा के आवरण में बहुभाषा को समेटने वाला शब्द।। हम यह देख पायेंगे कि हिन्दी-सिनेमा के संवाद ‘साझी संस्कृति’ के तकाजे से ही नहीं गढ़े जाते बल्कि कथा में आये पात्र को विश्वसनीय बनाने के लिए भी गढ़े जाते हैं और कथा के पात्रों को गढ़ा जाता है उस ‘औसत दर्शक’ की कल्पना से जो कालक्रम में हमेशा बदलते रहा है। इस कोने से देखें तो पता चले कि फिल्म मुगले-आजम में दिलीप कुमार का अगर उर्दूं-छौंक वाला यह संवाद है कि-‘मुझ पे जुल्म ढाते हुए आपको जरा ये सोचना चाहिए कि मैं आपके जिगर का टुक़ड़ा हूं कोई गैर या कोई गुलाम नहीं’ तो उसके सामने खड़ी दुर्गा खोटे का संस्कृत की कुरुणा से सना यह वाक्य भी – ‘नहीं सलीम नहीं..तुम हमारी बरसों की प्रार्थनाओं का फल हो।’ याद आएगा कि मुगले-आजम की बहुलस्वरी दुनिया में सिर्फ यही नहीं गाया गया कि- ‘जब रात है ऐसी मतवाली तो सुबह का आलम क्या होगा’ बल्कि उसमें किसी का यह स्वर भी शामिल था- ‘मोहे पनघट पर नंदलाल छेड़ गयो रे..। ’ बहुभाषिकता के कोने से देख सकें तो तुलना कर पायेंगे मुगले-आजम में बोले हुए दिलीप कुमार के संवाद( ‘तकदीरें बदल जाती हैं, जमाना बदल जाता है..मगर इस बदलती दुनिया में मोहब्बत जिस इनसान का दामन थाम लेती है वो इनसान नहीं बदलता’) की फिल्म ‘गंगा-जमुना’ में उन्हीं पर फिल्माये हुए गीत से( ‘रुप को मन मा बसई ब त बुरा का होईहैं, कोहू सो प्रीत लगईब त बुरा का होईहैं’)। याद आएगा कि अमिताभ ने अपनी फिल्मों अगर यह कहा है कि ‘मर्द को दर्द नहीं होता’  तो ‘माई नेम ईज एंथोनी गॉनसाल्विस’ भी। हम देख पायेंगे कि हिन्दी फिल्मों में अगर ‘फिरऔनों के गरुर’ को उनके ही महल में अपने पाँव के खून से कुचलती हुई एक ‘पाकीजा’ औरत है तो वह ‘टोपोरी’ भी जो कहता है- ‘आती क्या खंडाला’।

हमें बीते वक्त का अफसोस चाहे जितना हो लेकिन इस अफसोस से हिंदी-सिनेमा की भाषा(ओं) को नहीं पढ़ा जा सकता क्योंकि इस विधा को हमेशा अपने औसत दर्शक का अनुमान ठीक-ठीक लगाना पड़ता है।1990 के दशक के आते-आते हिन्दी-सिनेमा ने ठीक पहचाना कि उसका औसत दर्शक बदल चुका है। मध्यवर्ग का आकार ही नहीं बढ़ा साथ-साथ उसके स्वाद बढ़े हैं और वह अपने स्वाद को महत्वाकांक्षा की भाषा हिंग्लिश में पहचानता है, उस हिंग्लिश को जिसे अख़बारों के समाचार से लेकर टीवी पर चलने वाले विज्ञापनों तक ने गढ़ा है। ऐसे में यह अफसोस क्यों कि ‘हिन्दी फिल्मों पर अंग्रेजी का बोलबाला’ है ?

हिन्दी और उर्दू के नाम पर नफरत के शोले भड़काने वाले अवसरवादी साहिर के नाम एक खुला पत्र

शायरे इन्कलाब,

साहिर लुधियानवी

सबसे पहले आपको इस बात का धन्यवाद कि आपको अपने राष्ट्र की भाषा हिन्दी से प्यार है और इस बात का भी आप हिन्दी साहित्य से प्यार करते हैं। आपने बड़े गर्व के साथ यह फरमाया कि जरुरत पड़ने पर आप हिन्दी में गीत भी लिखते हैं और अपने चित्रलेखा(वह चित्रलेखा जिसे लोगों ने चितरलेखा समझा) के गीतों का उदाहरण भी दिया। यह जानकर वाकई बड़ा आश्चर्य हुआ कि आप समझते हैं कि आपने एक फिल्म में हिन्दी गीत लिखे हैं। लेकिन आपने हिन्दी पर यह अहसान पहली ही बार नहीं किया है। आप इससे पहले भी हिन्दी में ही लिखते रहे हैं। आपने फिल्मों में आने से पहले भी जो कुछ लिखा था, वह हमारी निगाह में तो हिन्दी ही थी..यह जरुर है कि आपने जब वह सब कलमबंद किया था जो फारसी लिपि इस्तेमाल की थी। यूं देखा जाय तो अपनी चितरलेखा के गीत भी आपने अपनी तरफ से चाहे हिन्दी में लिखे हों लेकिन कागज पर उतारा उन्हें फारसी लिपि में ही था।इतनी छोटी सी बात का मतलब आप जैसा बड़ा और दानिशमंद शायर शायद फौरन समझ गया होगा- दो लिपियों से भाषा दो नहीं हो जाती और एक ही लिपि में कई भाषाएं भी लिखी जा सकती हैं। हिन्दुस्तान के जिस प्रदेश में आपका जन्म हुआ उस पंजाब के वारिस ने अपनी पंजाबी भाषा की हीर फारसी लिपि में  लिखी थी, यह भी आप जानते ही होंगे क्योंकि आप जैसे धरती के शायर अपनी संस्कृति की इतनी बात तो जानते ही हैं। जिसे आप आज उर्दू कहते हैं उसके महान कवि गालिब अपने आपको हिन्दी में लिखने वाला कहते थे, यह भी आप उस मुशायरे में  भूले नहीं होंगे जहां आपने हिन्दी साम्राज्यवाद की भयावनी तस्वीर खींची थी

आपने जनता को इस दिन यह भी बताया था कि हिन्दी नाम से जानी-जाने वाली 97 फीसदी फिल्में उर्दू की होती हैं। तो भाईजान, झगड़ा कहां रहा? जिसे आप उर्दू कहते हैं उसे 99.9 फीसदी लोग हिन्दी कहते हैं। तो दोनों एक ही चीज रही न? उन फिल्मों की नामावली अंग्रेजी में होती है तो आपको अंग्रेजी का साम्राज्यवाद नजर नहीं आता? आपको- यानी उस महान आदमी को जिसने साम्राज्यवाद के प्रति विद्रोह का परचम उठा रखा था। नागरी लिपि में आते ही वह साम्राज्यवाद हो गया। उस नागरी लिपि में जिसमें आपके कविता-संग्रह उर्दू लिपि से भी ज्यादा बिके हैं।जब आपके संग्रह नागरी लिपि में छपे थे तो क्या उनका हिन्दी में अनुवाद किया गया था या हू-ब-हू आपके लिखे जैसे ही छापे गए थे और उन्हें हिन्दी के पाठकों ने पूरी तरह समझकर भरपूर रस नहीं लिया था? उनका हिन्दी में प्रकाशन हिन्दी का साम्राज्यवाद नहीं था?

आखिर बात क्या है? हिन्दी और उर्दू की? या हिन्दी और उर्दू के नाम पर संप्रदाय की? इस धर्मनिरपेक्ष राज्य में आजादी के बीस सालों ने इतना तो करिश्मा किया ही है कि हमारे अंदर ही अंदर जो संकुचित भावनाओं की आग फूट रही है, हमने उसे उसके सही नाम से पुकारना बंद कर दिया है और उसे हिन्दी-उर्दू का नाम देकर हम उसे छुपाने की कोशिश करते करते हैं।

आप अपनी भावुक शायरी में कितनी लफ्फाजी करते रहते हों, यह भी सही है यह भी सही है कि आपके दिल में एक दिन इंसान के प्रति प्रेम भरा था।आप सब दुनिया के लोगों को एकसाथ कंधे से कंधा मिलाकर खुशहाली की मंजिल की तरफ बढ़ते हुए देखना चाहते थे। लेकिन दोस्त, आज ये क्या हो गया? इनसान को इनसान के करीब लाने के बजाय आप हिन्दी-उर्दू की आड़ में किस नफरत के शोले से खेलने लगे? सच कहूं तो आज आपकी आवाज से जमाते-इस्लामी की घिनौनी बू आती है। आपने पिछले दिनों वह शानदार गीत लिखा था-

नीले गगन के तले,

धरती का प्यार पले।

यह पत्र लिखते लिखते मुझे उस गीत की याद हो आई। इसलिए आपको देशद्रोही कहने को मन नहीं होता पर मुशायरे में आपकी तकरीर को पढ़कर आपको क्या कहूं यह समझ में नहीं आता। पूरे हिन्दुस्तान की एक पीढ़ी जिसमें पाकिस्तान की भी वही पीढ़ी शामिल की जा सकती है, आपकी कलम पर नाज करती थी, आपके खयालों से( खयालों उर्दू का नहीं हिन्दी का शब्द है, उर्दू में इसे खयालात कहते हैं हुजूरेवाला) प्रभावित थी। आपने उस पीढ़ी की तमाम भावनाओं को अपनी सांप्रदायिकता की एख झलक दिखाकर तोड़ दिया।

जिस भाषा को आप उर्दू कहते हैं और जिसके लिए आज आंध्र, बंगाल,महाराष्ट्र, मैसूर और केरल- सब जगह दूसरी भाषा का दर्जा दिलवाना चाहते हैं वह इन जगहों में भी उतनी ही परदेशन है जितनी पश्चिमी पाकिस्तान में। उर्दू संस्कृति में अपने बच्चों को पालने के लालच में हिन्दुस्तान छोड़ने वाले महान कवि जोश मलीहाबादी तक खुद मानते हैं कि पाकिस्तान में उर्दू का भविष्य डांवाडोल है क्योंकि वह वहां की भाषा नहीं है। पर वे खुश हैं। क्यों?  इसलिए नहीं कि वहां उर्दू पनप रही है बल्कि इसलिए कि वे एक सांप्रदायिक संस्कृति के बीच में पहुंच गए हैं(हालांकि वे अपने को अनीश्वरवादी कहते हैं)। है न कमाल की बात। आपने एक बार लिखा था-

तू हिन्दू बनेगा ना मुसलमान बनेगा

इनसान की औलाद है इनसान बनेगा

लेकिन आपकी आजकल की गतिविधि देखते हुए तो ऐसा लगता है ये आपकी अपनी भावनाएं नहीं थी, आप सिर्फ फिल्म के एक पात्र की भावनाएं लिख रहे थे। आप एक जमाने में वक्त को बदलने की बात लिखा करते थे। फिर भी फिल्मी आवश्यकता के वशीभूत आपने लिखा था-

कल जहां बसती थीं खुशियां-आज है मातम वहां

वक्त लाया था बहारें- वक्त लाया है खिजां

आदमी को चाहिए वक्त से डरकर रहे

कौन जाने किस घड़ी वक्त का बदले मिज़ाज

सारे हिन्दुस्तान में फिल्मोद्योग कम से कम एक ऐसी जगह थी जहां जाति प्रदेश और धर्म का भेदभाव काम के रास्ते में नहीं आता था, मेलजोल के रास्ते में नहीं आता था। और आप इनसानियत के हामी थे। पर आपने इस वातावरण में सांप्रदायिकता का जहर घोल दिया।

लगता है इनसान की औलाद का भविष्य आपकी नजरों में सिर्फ यह है-

तू हिन्दू बनेगा तू मुसलमान बनेगा

शैतान की औलाद है शैतान बनेगा

मैं आखिर में इतनी ही दुआ करना चाहता हूं: खुदा उर्दू को आप जैसे हिमायतियों से बचाये।

फिल्मेश्वर

( यह चिट्ठी माधुरी के 30 जुलाई 1965 के अंक में छपी। चिट्ठी सिने-इतिहासकार रविकांत जी की सहायता से हासिल हुई। प्रस्तुतकर्ता इसके लिए उनका कृतज्ञ है)

5205826_photo3चन्दन श्रीवास्तव,  मूलतया छपरा(बिहार) के निवासी, पिछले पंद्रह सालों से दिल्ली में। पहले आईआईएमसी और फिर जेएनयू में पढ़ाई। “उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध में हिन्दी लोकवृत्त का निर्माण” शीर्षक से पीएचडी के बाद दिल्ली के कॉलेजों में छिटपुट अध्यापन, फिर टीवी चैनल की नौकरी और अब विकासशील समाज अध्ययन पीठ(सीएसडीएस) की एक परियोजना इंक्लूसिव मीडिया फॉर चेंज से जुड़े हैं। इनसे  chandan@csds.in पर संपर्क संभव है। 

साभार- हंस- फरवरी- 2013- हिन्दी सिनेमा के सौ साल

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