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शिप ऑफ थीसियस – अनहोनी और होनी की उदास रंगीनियाँ: उदय शंकर

BY उदय शंकर

शिप ऑफ थीसियस । सबसे पहले यह शीर्षक ही दर्शक को जिज्ञासु बनाता है। आनंद गांधी, जो फिल्म के लेखक-निर्देशक हैं, का मानना है कि यह शीर्षक मूलतः एक थॉट-एक्सपरिमेंट है जिसका प्रेरणा-स्रोत ‘शिप ऑफ थीसियस’ नामक एक विरोधाभासी (पैराडॉक्सिकल) गुत्थी है। वह गुत्थी इस रूप में है कि थीसियस ने एक जहाज बनाया था और सौ साल बाद उस जहाज का एक-एक पुर्जा बदल दिया गया। मतलब कि उस जहाज में अब कोई भी पुर्जा ऐसा नहीं बचा था जिसे थीसियस ने उसमें लगाया था। पहला सवाल यहीं पर आता है कि क्या यह 100 साल बाद वाला जहाज भी थीसियस का जहाज है या नया जहाज है? अगर नया है तो वह कौन सा समय, बिन्दु या पुर्जा है जहां से जहाज अपनी पहचान (Identity) का नवीकरण शुरू करता है। एक तरह की उलझन, विरोधाभास जिसका कोई तार्किक उत्तर या निष्कर्ष संभव नहीं है, पैराडॉक्स कहलाता है। किसी पैराडॉक्स का कोई भी निष्कर्ष या उत्तर अपने आप में, ‘पहले अंडा या मुर्गी’ टाइप का, उलझन पैदा करती है। इसी कारण से यह सवाल अस्तित्व के सवाल के आस-पास टीक जाता है और यही वह बिन्दु है जहां आनंद गांधी इस पैराडॉक्स को मानवीय जीवन-जगत के बीच में रख कर देखते हैं। शिप ऑफ थीसियस फिल्म इसी जिज्ञासा के साथ शुरू होती है (जैसा कि आनंद गांधी का कहना है) कि इंसान के शरीर की एक-एक कोशिका 7 साल के बाद बदल जाती है। इस बदलाव के कारण किसी भी इंसान में क्या-क्या परिवर्तन होते हैं? वह आदमी क्या वही रह जाता है या कुछ और हो जाता है? अगर वह कुछ और हो जाता है तो वह क्या है, जैसे अनगिनत सवाल उभरते हैं। इन सवालों का कोई भी तर्कसंगत उत्तर संभव नहीं है। बहुतों का तो यहाँ तक मानना है कि इस तरह के सवाल या बदलाव की कोई भी सम्पूर्ण अभिव्यक्ति भाषा में संभव नहीं है, भाषा में व्यक्त हुये ऐसे जिज्ञासु तेवर को कोई भी आसानी से बचकानी हरकत कह सकता है। इस तरह की जिज्ञासाओं को अनुभूत करने के लिए एक तरह की संवेदना की आवश्यकता होती है। मेरा मानना है कि विरोधाभासी गुत्थियों, जीवन-शैली-प्रक्रिया को दर्शाने के लिए सिनेमा बहुत ही अच्छा माध्यम है। शिप ऑफ थीसियस जीवन की सतत-प्रक्रिया में उभरने वाले विरोधाभास का बखान है, बिना किसी मूल्य-निर्णय के, सिर्फ बखान।

ship of theseus's Poster

ship of theseus’s Poster

शिप ऑफ थीसियस में यह बखान तीन कहानियों के माध्यम से सम्पन्न हुआ है। पहली कहानी नेत्रहीन फोटोग्राफर आलिया (आयदा-अल-काशेफ) की है। नेत्र रूपी अभावात्मक स्थिति को वह कैमेरे से संतुलित करती है। यह संतुलन ही उसकी पहचान (एक अच्छी और प्रशंसित फोटोग्राफर के रूप में) को निर्मित करती है। अभाव उसके लिए रचनात्मकता का स्रोत बन जाती है। वह ‘अपने अनुभव-संसार’ में खुद को सम्पूर्ण महसूस करती है। बाद में जब उसे आँखें और रोशनी वापस मिल जाती है तो वह खुद को असहज महसूस करती है। वह एक दूसरे अभावात्मक स्थिति में चली जाती है, फोटोग्राफी नहीं कर पाती है। भौतिक-अभाव की पूर्ति रचनात्मक-अभाव (पहचान का संकट) के रूप में प्रकट हो जाती है। यहीं पर सवाल खड़ा होता है कि आलिया की असली पहचान क्या है? आँख वापस आने के बाद वाली आलिया पुरानी आलिया से कितनी अलग है, नयी है या वही है? यह एक विरोधाभासी गुत्थी है।

 दूसरी कहानी मैत्रेय(नीरज कबि) नाम के एक श्वेतांबर साधु/भिक्षु की है। जिनके बारे में कहा जाता है कि वे साधु कम शास्त्री ज्यादा हैं। जीव-जंतुओं के अधिकारों और पर्यावरण को बचाने के लिए संघर्ष करते हैं। वे इस संघर्ष में किसी भी तरह के समझौते के लिए तैयार नहीं हैं और यही ‘नैतिक आवेग’ उनकी पहचान है। वे पेट की बीमारी से परेशान हैं लेकिन दवाइयाँ नहीं लेते हैं क्योंकि हर दवा के पीछे जीव-जंतुओं की हिंसा है। यही समस्या आगे जाकर लिवर सिरोसिस में तब्दील हो जाती है जिसका तत्काल इलाज बहुत जरूरी है क्योंकि समस्याएँ विकराल रूप धारण कर कैंसर में तब्दील हो सकती हैं। उनका नैतिक आवेग फिर आड़े आ जाता है और वे समझौता करने के बजाय जीवन को त्यागने का फैसला करते हुये आमरण अनशन की शुरुआत करते हैं। आमरण अनशन और बीमारी दोनों के प्रभाव ने उन्हें एक दिन अंदर से तोड़ दिया, जीने की ललक फिर से पैदा हो गई और डॉक्टर/दवा की सेवा लेने को तैयार हो गए। उनमें लिवर का प्रत्यारोपण (Liver Transplantation) किया जाता है और वे फिर से स्वस्थ्य हो जाते हैं। उनके स्वस्थ होने में जीव-हिंसा का योगदान शामिल हो गया। अब वे ‘श्वेतांबर साधु/भिक्षु’ नहीं रहते हैं। पहली कहानी की तरह ही यहाँ भी एक अभावात्मक स्थिति से दूसरी अभावात्मक स्थिति की ओर यात्रा है। दोनों स्थितियों में उत्पन्न हुये पहचान के संकट का कोई तर्कसंगत जवाब नहीं है, इसीलिए यह कहानी भी एक विरोधभासी-गुत्थी का निर्माण करता है।

तीसरी कहानी नवीन (सोहुम शाह) नामक एक स्टॉकब्रोकर की है। उपर्युक्त दोनों कहानियों से यह कहानी थोड़ी भिन्न है। पहली भिन्नता यह है कि शुरुआती दोनों कहानियों के पात्रों की ‘पहचान-यात्रा’ रचनात्मक-नैतिक पहचान से भौतिक पहचान की पूर्णता को पाने का है। इस कहानी में घटना-क्रम के लिहाज से यह यात्रा विपरीत दिशा में चित्रित है। कहानी का शुरुआती दृश्य ही यह इंगित करता है कि वह अब भौतिक-रूप से एक सम्पूर्ण इंसान है क्योंकि उसमें किडनी का प्रत्यारोपण (Transplantation) संपन्न हो गया है। वह अब स्वस्थ है। इसके बाद ही उसका पेशागत पहचान स्पष्ट होता है कि वह दिन-रात सिर्फ पैसों के बारे में सोचने वाला एक स्टॉकब्रोकर है। उसकी नानी समाजसेविका है, जिसके पास वह आज-कल रहता है। एक दुर्घटना में नानी का पैर टूटता है और वह फिर से अस्पताल वाले माहौल में चला जाता है। नानी उसे हमेशा ताना देती है कि फ्रीडम-फाइटर और समाज-सेविका का नाती अमेरिका का पिट्ठू बना बैठा है। लोगों के सामने वह खुद को अपमानित महसूस करता है। इसी बीच पता चलता है कि डॉक्टरों के गिरोह ने एक मजदूर की किडनी चुरा ली है। संयोग ही है कि जिस दिन नवीन को किडनी लगाई गई थी उसी के एक दिन पहले मजदूर की किडनी चोरी हुयी थी और दोनों का ब्लड-ग्रुप भी एक ही है। नवीन को शक होता है कि कहीं वही किडनी उसे नहीं लगाई गई है। यहाँ से नवीन एक नई पहचानगत यात्रा पर निकलता है। शंका का समाधान जल्द ही हो जाता है और पता चलता है कि मजदूर की किडनी स्टॉकहोम, स्वीडन के एक अमीर आदमी को लगाई गई है। नवीन उस आदमी से मिलने स्टॉकहोम जाता है। इन सारे प्रयासों का लब्बोलुआब यह निकला कि रोता हुआ हारा-पीटा मजदूर फिर से हरा हो जाता है। यहाँ फिर वही सवाल कि स्टॉक-ब्रोकर से कार्यकर्ता बनने की इस यात्रा में नवीन ने जो-जो पहचान पाया उनके बीच में क्या संबंध है? कौन सी पहचान नवीन की सम्पूर्ण पहचान है? संकुचित और अनैतिक संसार के निवासी नवीन का यह कायाकल्प भी एक विरोधाभासी गुत्थी ही है।

तात्कालिक स्फुट विचार 1शिप ऑफ थीसियस एक ऐसी फिल्म है जिसने बॉलीवुड में विद्यमान ‘छवि-समृद्धि के स्टीरियोटाइप’ को तोड़ा है। इस लिहाज से भी यह कुछ अपवाद फिल्मों की श्रेणी में आती है। फिल्म ‘छवि-समृद्धि’ के सबसे आसान तरीके मसलन ‘स्मोक, पिस्टल और सेक्स’ से एक सचेत दूरी बनाती है। यह दूरी और कुछ नहीं बल्कि छवि-अंकन में निष्णात आनंद की एक सचेत रचनात्मक जिम्मेवारी को दिखाता है। जहां आप ‘प्रचलित जनाभिरुचियों’ को सहलाते नहीं हैं बल्कि आप उसे संशोधित-संवर्द्धित और संश्लिष्ट करते हैं। जिसके बाद आपको यह कहने की जरूरत नहीं पड़ती है कि धूम्रपान करने से कर्क रोग होता है या संभोग करने से एड्स होता है।

तात्कालिक स्फुट विचार 2– कला में विचार(Idea) को विचार के रूप में चित्रित करना खतरे से खाली नहीं है। दर्शन का क्षेत्र पहले से ही इसके लिए सुरक्षित है। कला-सिनेमा-साहित्य में विचार को शब्दों-रंगों से रंगना तब-तक सार्थक नहीं कहा जायेगा, जब-तक उसका एक सामाजिक परिप्रेक्ष्य स्पष्ट न हो। आनंद गांधी की फिल्म शिप ऑफ थीसियस  के सन्दर्भ में जो नया विवाद पैदा हुआ है, उसकी समस्या की जड़ मुझे यहीं दिखती है। राइट हियर राइट नाउ, कंटिन्युअम और शिप ऑफ थीसियस देखने के बाद यह कहा जा सकता है कि आनंद का मानना है कि जगत में जो कुछ भी घटता है उसका कोई न कोई लिंक पूरे समाज के साथ जुड़ा होता है और इसी में एक तार्किक सामाजिक सार्थकता भी निहित होती है। यह मान लेने के बाद सम्बद्धता-प्रतिबद्धता का सवाल गौण हो जाता है। मतलब आज हमारा जीना सिर्फ एक विचार का घटित होना भर है। आनंद को इस आइडिया वाले गेम से बाहर निकलना होगा। भरे-पूरे समाज को चित्रित करने के क्रम में घटिया विचार भी परिष्कृत हो जाता है। यह चिंता इसलिए है कि बॉलीवुड में बहुत दिन बाद कोई ‘क्राफ्ट्स मैन’/हुनरमंद निदेशक दिखा है, जरुरत है कि आर्टिस्ट के दर्जे तक कैसे पहुंचा जाये।

1.

किसी फिल्म को लोगों की दृष्टि से बचा ले जाना हो तो उसे आर्ट फिल्म का दर्जा दे दो। शिप ऑफ थीसियस  के संदर्भ में शुरू में ही यह प्रयास दिखा, लेकिन यह सफल होता हुआ नहीं दिख रहा है। क्या आर्ट फिल्म कोई स्पष्ट-परिभाषित पद है? यह अतिप्रचलित पद पता नहीं कब, कैसे और किन फिल्मों के लिए स्थिर हो गया, समझ के परे है। अमेरिका-इंग्लैंड की तर्ज पर यह बॉलीवुड में भी घुस गया। जहां फिल्म-निर्माण एक उद्योग के बतौर स्थापित हुआ, फिल्में सार्वजनिक उपभोग (Mass Consumption) के लिए माल में तब्दील हुयीं। यूरोप में आर्ट फिल्म जैसे पद का प्रचलन नहीं है। क्या इसमें कुछ संकेत छुपे हो सकते हैं? अगर इसे थोड़ा स्पष्ट किया जाय तो ऐसे कहा जा सकता है कि दो तरह की फिल्में होती हैं। एक कंपनी (Producent) की फिल्में होती हैं, दूसरी रचयिता/निर्देशक (Author/Director) की फिल्में होती हैं। दुनिया भर की तमाम क्लासिक फिल्में रचयिता/निर्देशक की फिल्में हैं। शिप ऑफ थीसियस रचयिता/निर्देशक की फिल्म है। किसी कंपनी के हितों को ध्यान में रख कर बनाई गई ‘कमर्शियल फिल्म’ नहीं है। बॉलीवुड और हॉलीवुड में फिल्म को एक कला-माध्यम के रूप में सिर्फ तकनीक और पैसे के संदर्भ में ही देखा-समझा गया है। जिस कला-माध्यम की शुरुआत मैन विद द मूवी कैमरा से हुयी हो, वह कैसे हॉलीवुड और बॉलीवुड में मैन विद द वुमेन, वायलेन्स, स्मोक, सेक्स, पैसा एंड 3डी ग्लासेस हो गया! मैन विद द मूवी कैमरा की परंपरा वाली फिल्मों ने अपनी एक भाषा विकसित की है- दृश्य भाषा (Visual language)। यह भाषा यथार्थ के विवरणों को पकड़ने में बड़ी सहायक हुयी है। फिल्म जैसे दृश्य कला-माध्यम की सबसे बड़ी भूमिका अभी तक कुछ रही है तो वह है यथार्थ के विवरणों को उसकी सम्पूर्ण नग्नता और सुंदरता के साथ सामने ले आना। बेला तार जैसा प्रसिद्ध निर्देशक इसीलिए जाना जाता है। वातावरण की एक-एक हरकत को पकड़ने के लिए वह बहुत समय लेता है, पत्तियाँ अगर टूट कर जमीन पर गिरती हैं तो  हवा चलने के बाद वह फिर से उड़ती भी हैं और इस क्रिया को कैद करने में जितना भी समय लगता है, बेला तार वह समय लेता है। लॉन्ग शॉट/वाइड एंगल के संदर्भ में कैमेरे पर उसकी ऐसी पकड़ दिखती है, मानो एडिटर को बहुत मगज़मारी नहीं करनी पड़ी होगी। कहानी सुनने के आदि हम बॉलीवुड के भावक को यह सब कुछ अजीब लगता है। बेला तार/तारकोव्स्की जैसे निर्देशकों की फिल्मों में वातावरण के विवरणों वाला यथार्थ जैसे ही पर्दे पर दिखता है तो मानो यथार्थ मूर्तिमान हो उठता है और लगता है कि यथार्थ से ज्यादा सुंदर, उदास, हिंसक कुछ हो ही नहीं सकता है। यह वातावरण, जिसमें एक साथ बहुत चीजें घटित हो रही हैं, की बारीकियों को सम्पूर्णता में पकड़ने की कोशिश करना यही एहसास दिलाता है कि दृश्य-श्रव्य कला का इससे बड़ा उत्स कुछ और नहीं हो सकता है और जिसने भी इसे संपूर्णता में पकड़ने की कोशिश की है वह बड़ा कलाकार हुआ है, और साथ ही साथ उस वातावरण में उपस्थित चरित्र (अभिनेता/अभिनेत्री), जो कि लंबे समय तक के लिए सहजता की मांग करता है, की सार्थकता उसके अभिनय-सामर्थ्य से तय होती है। (यह स्थिति प्रयोग-सिनेमा(मणि कौल) के उस प्रस्तावना के विरोध में ठहरती है जहां अभिनय-कौशल को एक बाहरी गुण मानने का आग्रह था।) अकारण नहीं है कि फिल्म-कला के इस पक्ष ने साहित्य को, खासकर कथा-लेखन(Fiction Writing) को ‘बुरी’ तरह प्रभावित किया है। दूर से उदाहरण लेने से अच्छा है कि अपने निर्मल वर्मा को ही देख लिया जाय। उनकी कथा-शैली ऐसी फिल्मों से प्रभावित लगती है। जब वे इस तरह लिखते हैं -‘वह पतझड़ की एक शाम थी। पेड़ों से पत्तियाँ नदारद थीं। आँखों के सामने से कुछ पीली और बहुत सारी सूखी पत्तियाँ उड़ती हुयी चली जाती थीं। पत्तियों की खड़-खड़ से अचानक उसका आत्मचेता मन सचेत होता है और वह सामने से आती हुयी दिखती है।’ शायद असद जैदी ने तो कहीं लिख भी दिया है कि निर्मल वर्मा को पढ़ना ऐसा लगता है मानो आप किसी खराब फिल्म की पटकथा पढ़ रहे हों। क्योंकि यह शैली पर्दे पर ही साक्षात होती है। कथा-लेखन पर इसका असर कितना सही है या कितना गलत है यह बहस का एक अलग विषय हो सकता है। ठीक इसके उलट बॉलीवुड/हॉलीवुड की फिल्मों को कथा-साहित्य ने (पल्प फिक्शन) ने बहुत ही प्रभावित किया है। इस प्रभाव के कारण हम सिनेमा जैसे दृश्य-कला को भी साहित्य के मानदंडों पर ही तौलते रहे हैं और कथानक की बारीकियों को टटोलने में ही अपनी समीक्षक-बुद्धि की इतिश्री समझते रहे हैं। और जहाँ फिल्मों ने कहानियों को प्रभावित किया, वहाँ हम ‘कथानक का ह्रास’ टाइप जुमले फेंक कर उसके विश्लेषण में खुद को न्योछावर करते रहे हैं। शिप ऑफ थीसियस एक ऐसी फिल्म के रूप में हमारे समक्ष चुनौती पेश करती है, जहां से कथा-शिल्प और फिल्म-शिल्प की बहस की शुरुआत हो सकती है। कहानी-कथा के भाषा-शिल्प में बनी फिल्मों की भीड़ में शिप ऑफ थीसियस सिनेमा की भाषा/शैली में तीन कहानियाँ कहती है।

2.

शिप ऑफ थीसियस के अतिप्रचार को भी लोग मुद्दा बना रहे हैं और इसका कारण किरण राव-अमीर खान के समर्थन को बता रहे हैं। यह बात सही है कि किरण राव ने इस फिल्म को एक बड़े प्लेटफॉर्म पर आने का मौका दिया है। लेकिन फिल्म के साथ किरण राव का यह जुड़ाव फिल्म के बन जाने और फिल्मोत्सवों में चर्चा हो जाने के बाद का जुड़ाव है। मैं खुद इस फिल्म की चर्चा कमल स्वरूप जैसे फिल्म निर्देशक से 2 साल पहले से सुनता आ रहा हूँ। कहने का मतलब यह कि किरण राव का इस फिल्म से कोई रचनात्मक जुड़ाव नहीं है। आनंद गांधी का कितना नाम हो रहा है, इससे पहले यह भी देख लेना चाहिए कि एक अच्छी फिल्म से जुड़ने के कारण किरण राव का भी नाम हो रहा है कि नहीं! यहाँ सारे जुड़ाव का मूल स्रोत है शिप ऑफ थीसियस । अगर किरण राव में इतनी क्षमता है कि वे किसी फिल्म को अतिप्रचारित (बौद्धिक खेमों में) करवा सकती हैं, तब तो धोबी घाट को भी वही परिणाम मिलना चाहिए था जो शिप ऑफ थीसियस को मिल रहा है!!

शिप ऑफ थीसियस को सिनेमाघर में लगे अभी एक सप्ताह हुये ही थे कि उसकी पहली कहानी पर आइडिया को चोरी करने का आरोप लगने लगा। पहली कहानी को रंग से महरूम (Bereft Of Colours) नामक एक डिप्लोमा शॉर्ट फिल्म से प्रेरित बताया गया। आनंद इस आरोप को सिरे से नकारते हैं। मैंने भी इस डिप्लोमा फिल्म को देखा और पाया कि पहली कहानी और डिप्लोमा फिल्म में विचार के शुरुआती स्तर पर कुछ समानताएँ हैं। लेकिन दोनों फिल्मों के निष्कर्ष अलग-अलग हैं। अगर विचार की समानता को किनारे रख दें तो इसमें किसी को शक नहीं है कि आनंद की फिल्म डिप्लोमा फिल्म की तुलना में ज्यादा सुंदर/समृद्ध, यथार्थवादी और आगे बढ़ा हुआ कदम है। जैसे पिकासो का वह महत्वपूर्ण चित्र जिसे हम कोरिया में जनसंहार (Massacre in Korea) नाम से जानते हैं, साथ ही साथ लोग यह भी जानते हैं कि यह चित्र फ्रांसिस्को डि गोया  के चित्र तीन मई, 1808 (1814) से प्रभावित है। पूरा का पूरा कम्पोजीशन फ्रांसिस्को डि गोया से उठाया गया है लेकिन पिकासो ने उस फ्रेम को/ कम्पोजीशन को एकदम से एक तीव्रता के साथ समकालीन बना दिया। आनंद गांधी अगर अनजाने में भी उस डिप्लोमा से कुछ लिए होंगे तो भी शिप ऑफ थीसियस की पहली कहानी की कोई भी तुलना (समानधर्मा के सेंस में) डिप्लोमा फिल्म से संभव नहीं है; क्योंकि दोनों फिल्म की अंतश्चेतना में एक तरह का विलगाव है। घटना-स्तर की समानता को ही अगर हम कला में चोरी का मामला बनाते हैं तो परंपरा में संवर्द्धन की गुंजाइश वाली स्थिति से छुटकारा पा लेना होगा। तुर्गनेव ने कहा था कि हमलोग (कहानी लेखक) गोगोल के ओवरकोट से निकले हैं। तुर्गनेव के कहने का साफ संकेत था कि हमारी कहानियों में गोगोल की परंपरा जगमगाती है। परंपरा का एक-एक पड़ाव कलाकृति में दीपदिपाता है और यह सब इसलिए भी होता है कि हर कलाकृति अपने आदिम-रूपों को पाने के लिए लालायित रहती है। इन मानकों के आस-पास जो भी कृति अपनी जगह बनाने में सफल होती है उन्हें हम क्लासिक का दर्जा देते हैं। ऐसी फिल्मों को हम लेखक-निर्देशक की फिल्में कहकर कंपनियों की फिल्मों से अलगाते हैं। किसी भी अच्छी फिल्म/क्लासिक फिल्म की जब हम चर्चा करते हैं तो सुधी समीक्षक सबसे पहले उसमें उसी परंपरा की खोज करते हैं। परंपरा से लेते हुये क्या तोड़ा, क्या जोड़ा, या और कुछ नहीं तो परंपरा का निर्वहन ही किया कि नहीं! इस निर्वहन पर भी लोग आरोप लगा सकते हैं कि निर्देशक ने कहाँ-कहाँ से माल टीपा है। अगर, मैं संवेदनशीलता के तकाजे को भूल जाऊँ तो कह ही सकता हूँ कि शिप ऑफ थीसियस वातावरण के नैराश्य को चित्रित करने के लिए तारकोव्स्की के कैमेरे का इस्तेमाल करता है। दो या तीन जगह आपको साफ-साफ दिखेगा कि दृश्य तारकोव्स्की की फिल्म स्टॉकर (1979) से प्रभावित हैं और मिरर (1975) का वह प्रसिद्ध धान का खेत भी यहाँ मौजूद है। शहरी संरचना को एक सांस्कृतिक बिम्ब के रूप में चित्रित करते समय आनंद गांधी के यहाँ क्रिस्टोफ़ किसलोवस्की भी मौजूद हैं। इसी तरह एक धार्मिक/आध्यात्मिक व्यक्तित्व की दुनिया या उसकी ऊंचाई को दिखाता हुआ अलेखान्द्रो जोदोरोवस्की के होली माउंटेन का रेड टावर भी एक जगह दिखता है। बेला तार भी अपने लॉन्ग शॉट और वाइड एंगल के साथ हैं। आर्टिस्ट (2011) का भी स्पर्श दिख सकता है, पहली कहानी में इस स्पर्श को लोग अनुभव कर सकते हैं। आर्टिस्ट में लोग गूंगे थे, इसलिए इशारों में बात करते थे। तकनीकी साधनों के विकास/आविष्कार ने जब लोगों को जुबान और कान दे दी तो मुख्य पात्र ने जीना स्थगित कर दिया क्योंकि बाकी लोग कहने-सुनने के अभ्यास में व्यस्त हो गए। मुख्य पात्र इस नए आविष्कार के साथ सहज नहीं हो पा रहा था और खुद को समाप्त कर देना ही बेहतर समझा। और विजय आनंद की गाइड(1965) तो है ही। हालांकि, आनंद गांधी का कहना है कि उन्होंने गाइड नहीं देखी है और इसे नहीं मानने का कोई कारण नहीं है। परंपरा का अनुभव/असर कोई प्रत्यक्ष क्रिया नहीं है। फिल्म-निर्माण की प्रक्रिया में यह अनुभव एक सामूहिक अनुभव हो जाता है, जिसके अंत में यह निर्दिष्ट करना भी संभव नहीं होता कि कौन सा असर कहाँ से आया है और यह तब तक चलेगा जब तक वह एक सामूहिक रचना-कर्म बना रहेगा। इन तमाम प्रभावों को उस यात्रा की तरह ही मानता हूँ जहां हर कला-कृति अपने आदिम रूप को पाना चाहती है।उस आदिम रूप को पाने के लिए उसकी एक यात्रा पीछे की तरफ होती है, जिसमें परंपरा के महत्वपूर्ण पड़ाव जगमगाते से दिखते हैं।

यह असर फिल्म का असर नहीं होकर परंपरा का असर है और गाइड का असर साफ-साफ दिखता है। मसलन जब मैत्रेय का एक साथी साधु कहता है –“और आपके गुरु जी बोस्टन में हैं। वो भी हमारे सप्रिय मैत्रेय की तरह साधु कम और शास्त्री ज्यादा हैं। चलो अँग्रेजी बोलने का कुछ तो फायदा हुआ।” याद करें, गाइड का वह दृश्य जहां साधु-पंडित बने राजू और परंपरागत पंडित-पुजारियों के बीच शास्त्रार्थ होता है। परंपरागत पंडित-पुरोहितों द्वारा संस्कृत में पूछे गए सवाल से राजू अवाक रह जाता है, तब पुरोहित लोग उसका मज़ाक उड़ाते हैं कि ‘संस्कृत आती हो तब न’। इसके बाद राजू उनसे अँग्रेजी में सवाल करता है, तो पंडित-पुरोहित अवाक हो जाते हैं, फिर राजू उनका मज़ाक उड़ता है- ‘अँग्रेजी आती हो तब न!!’  दूसरा दृश्य, अन्न-त्याग के बाद जब राजू मरणासन्न है जहां लोगों का मेला लगा हुआ है। अन्न-त्याग के बाद मरणासन्न स्थिति में पहुँचे मैत्रेय के आस-पास वही दृश्य अपने लघु-रूप में मौजूद है। लेकिन इन सब प्रभावों के बावजूद शिप ऑफ थीसियस  आनंद गांधी की फिल्म है, एक निर्देशक-लेखक की फिल्म है क्योंकि अपने निष्कर्षों में यह गाइड से अलग है और यह निष्कर्ष ही आनंद का वैचारिक प्रस्थान है। गाइड में दया-दर्शन का पात्र बना राजू मर जाता है क्योंकि उसे एक विश्वास/आस्था को कायम रखवाना था इसे वह नैतिक जिम्मेवारी की तरह ढोता है लोगों के अंदर से यह आस्था भी अगर खत्म हो जाएगी तो उनकी मानवीय जिजीविषा दम तोड़ देगी। शिप ऑफ थीसियस के मैत्रेय के सत्य-प्रयोग में खुद की जिजीविषा आड़े आ जाती है और जीने का तर्क हावी हो जाता है। भावना पर तर्क की जीत जैसा कुछ। क्योंकि एक जगह मैत्रेय खुद कहता है- “Just cut down the sentimentality a bit. We must address people’s reason more.”

3.

फिल्म-आलोचना, साहित्य-आलोचना एक तरह की संवेदना की मांग करती है। 1980 में जन्मे आनंद गांधी 19 साल की उम्र से ही फिल्मों-धारावाहिकों के लिए लिख रहे हैं। 14 साल की उम्र से ही संस्थागत ज्ञान-अध्ययन क्षेत्र को अलविदा कहकर स्वाध्याय और गुणी-ज्ञानी के संगत में चले जाते हैं। हिन्दुस्तानी-परंपरा के दार्शनिक सवालों से लेकर पश्चिम तक के दार्शनिक गुत्थियों से जूझते रहे हैं, और यह दार्शनिक गुत्थी अपने ‘बालकोचित प्रयासों’ के साथ उनकी सारी फिल्मों में मौजूद रही है। 32 साल की उम्र में शायद ही किसी भारतीय निदेशक ने ऐसा नाम कमाया हो, जैसा आनंद गांधी ने शिप ऑफ थीसियस को बनाते ही हासिल किया है। शिप ऑफ थीसियस को देखते हुये इतना जरूर महसूस होता है कि यह कला के उस दायरे फिल्म है जहां बालकोचित जिज्ञासा सी सरलता और ‘अबोधता’ एक प्राथमिक मांग होती है और आनंद गांधी उस मांग को पूरा करते हैं। आनंद अपने वक्तव्यों में जितने ज्ञानी-मुनि ध्वनित होते हैं, शिप ऑफ थीसियस  में उतने ही मासूम दिखते हैं। उन्हें यह भलीभाँति पता है कि उनकी कहानियों का उत्स कुछ दार्शनिक सवाल हैं लेकिन वे कह कहानी ही रहे हैं और यही रचनात्मक ईमानदारी उन्हें ग्राह्य बनाता है। नहीं तो, प्रयोग-सिनेमा की तरह सतह से उठते देर नहीं लगता आनंद गांधी को। जहां ‘बौद्धिक-प्रलाप’ कहानी की सतह पर ही बजबजाने लगता है, और टेक्स्ट के मूल स्रोत को भी सशंकित कर देता है। आधुनिक रचना-प्रक्रिया का यह स्वाभाविक क्रम रहा है- विचार<थीम<कहानी। शिप ऑफ थीसियस अगर इसी रचना-प्रक्रिया को उदाहृत करता है तो क्या गलत करता है? यह सवाल जरूर वाजिब है कि जिन दार्शनिक गुत्थियों को वह सुलझाने के लिए कहानियाँ कहता है, क्या वह उन गुत्थियों को या उनकी प्रासंगिकता को सार्थक करता है? और कुछ लोगों का मानना है कि वह सार्थक नहीं करता है। क्या इसी से फिल्म या किसी भी कला-रूप को हम खारिज कर सकते हैं?

4.

अब जरा तीनों कहानियों का जायजा लें जिनसे शिप ऑफ थीसियस बनता है या शिप ऑफ थीसियस नामक विरोधाभासी गुत्थी को बखानने के क्रम में जो तीन कहानियाँ कही गई हैं। इस पर थोड़ा सोचने की गुंजाइश श्रद्धेय आलोचक पुरुषोत्तम अग्रवाल ने पैदा कर दी है,  फिल्म देखने के तत्काल बाद फ़ेसबुक के अपने वाल पर उन्होंने प्रतिक्रिया दी “…the film makes a case for organ donation, a very noble thing to do in itself….” क्या सचमुच फिल्म सिर्फ यही कहती है? मुझे लगता है यह स्थितियों के सरलीकरण के अलावा और कुछ नहीं है। तीनों कहानियों में अंगदान के अलावा भी कुछ शानदार चीजें साझा हैं। अंगदान कितना भी महान हो लेकिन वह सिर्फ घटना है। इन तीनों कहानियों में मुझे जो शानदार लगी और साथ ही साथ जो तीनों कहानियों में साझा की गई है, उसका संबंध एक विचार से भी है। वह विचार यह है कि मानसिक रूप से हम अपने समाज के हिस्से नहीं हैं। ऐसे में हमारा अस्तित्व हमेशा दूसरे के मुक़ाबले तय होता है या पहचान पाता है। उस दूसरे से, जिससे हम सार्थक होना चाहते हैं, भौतिक रूप से एक अन्यता (otherness) का संबंध होता है। यही अन्यता मानसिक रूप से अपने समाज-वर्ग-जाति-लिंग-पेशा आदि के संबंध में द्रष्टव्य होता है। भौतिक और मानसिक अन्यता का यह भाव और स्थिति परस्थितियों को विडंबनात्मक बनाती है, जिससे कहानी में contrast पैदा होता है। पहली कहानी की नेत्रहीन फॉटोग्राफर आलिया के संसार में न तो कोई दूसरा फोटोग्राफर है और न ही कोई नेत्रहीन। वह अक्सर आँख वालों की दुनिया से प्रशंसित होती है, एक गैर पेशेवर दुनिया की ओर मुखातिब रहती है। इस भौतिक अन्यता को वह मानसिक अन्यता में भी बरकरार रखना चाहती है। अपने पुरुष दोस्त से उसकी हर तकरार इसी ओर इशारा करती है। जैसे ही आँख वाली दुनिया में वह आँख के साथ शामिल होती है उसकी भौतिक अन्यता समाप्त हो जाती है और यही उसके लिए बेचैनी का सबब है।

जिस सांसारिक मोह-माया से उबरने के लिए मैत्रेय के मंडली के लोगों ने भिक्षुक होना स्वीकार किया, मैत्रेय को छोड़कर सभी लोग वापस उसी माया-मोह में फँसते दिखते हैं। लोग ज्यादा खाने के कारण या ज्यादा खाने के लिए दवाइयाँ खाते हैं। भक्तजनों से ज्यादा सेवा-भाव के लोलुप दिखते हैं। इन तमाम प्रयासों के बावजूद उनके लिए एक सात्विक भाव लिए कोई भक्तमंडली नहीं दिखती है, दिखती भी है तो कुछ ‘घरेलू महिलाओं’ की एक भीड़। मैत्रेय इन साधुओं से एकदम अलग दिखता है। बिना किसी आग्रह-भाव के इनके आस-पास पढ़े-लिखे संभ्रांत से दिखते भक्तों की एक जमात है। जिसमें युवा भी हैं और बुड्ढे भी। डॉक्टर हैं तो वकील भी हैं। यही संभ्रांत सांसारिक तबका उनकी बातों को तवज्जो देता है। पढ़ने लिखने की सामाग्री मुहैया करता है। यहाँ भी दिखता है कि मैत्रेय अपने साधु-जमात से मानसिक रूप से असंपृक्त है, लेकिन भौतिक रूप से उसी समाज का हिस्सा है। इस मानसिक असंपृक्ति को वह संभ्रांत सांसारिक भक्तों के बीच घुलाना चाहता है। यहाँ वह एक तरह का मानसिक लगाव अनुभव करता है। लेकिन इस तरह का मानसिक लगाव कुछ बलिदान भी मांगता है, इसी वेदी पर गाइड के राजू जी को अपनी बलि देनी पड़ी थी।

और अंत में, तीसरी कहानी का नवीन, एक स्टॉक ब्रोकर, शेयर बाज़ार का दलाल, पैसों का लालची। नानी के बहाने समाजसेवियों की जमात में गिर पड़ा है। इस कहानी में आप कह सकते हैं कि नवीन की स्थिति अन्य कहानियों की तुलना में स्वाभाविक नहीं है बल्कि परिस्थितिजन्य है। नवीन के भीतर होने वाले बदलाव को हम देख सकते हैं। यहाँ भी शेयर बाज़ार वाले उसके  संगी-साथी या उनका भरा-पूरा समाज नहीं दिखता है। नवीन के भीतर हुये बदलाव और नानी की संगत ने पहले से विद्यमान मानसिक अन्यता को तीव्रता प्रदान कर दी है। इस तीव्रता के कारण वह मानसिक रूप से अब नानी से संपृक्त महसूस करने लगा है। इस कहानी में पूर्व की दोनों कहानियों की निरंतरता के तत्व की तुलना में विलोम-तत्व(antithesis) ज्यादा प्रभावशाली हैं, ऐसा मुझे लगता है। शुरुआती दोनों कहानियों के पात्रों का यात्रा-क्रम अभावात्मक हैं। भौतिक अभाव पर जीत रचनात्मक और नैतिक अभाव का कारण बनता है। भौतिक अभाव से रचनात्मक और नैतिक अभाव की यात्रा। दूसरे तरीके से कहें तो रचनात्मक-नैतिक समृद्धि से ‘रचनात्मक-नैतिक ह्रास’ की यात्रा। आलिया और मैत्रेय की यात्रा एक ही मायने में सार्थक है कि वे शारीरिक (भौतिक) पूर्णता को पाते हैं, लेकिन यह उनका सम्पूर्ण व्यक्तित्व नहीं बनाता है। नवीन की यात्रा में अभावात्मक स्थिति जैसा कुछ नहीं है। वह एक साथ शारीरिक-सामाजिक-सांस्कृतिक सभी तरह की समृद्धि की ओर अग्रसर है। तीसरी कहानी में सामाजिक परिप्रेक्ष्य का दायरा अन्य दोनों कहानियों के बनिस्पत ज्यादा बड़ा और स्पष्ट है। घटनाओं के जमघट वाला भरा-पूरा संसार और यही वह कारण है कि यह कहानी पूर्व की दोनों कहानियों का विलोम सा लगता है; लेकिन ऐसा भी नहीं है कि यह कहानी कोई निरंतरता भंग करती है क्योंकि तीनों में परिवर्तन, परिवर्तन का परिणाम और परिवर्तन के कारण जैसे सवाल कहीं न कहीं विरोधवासी स्थितियों में डालता है।

5.

फिल्म की तीनों कहानियों को जोड़ने वाला भौतिक सूत्र वह आदमी है जिसने आठ लोगों को जीवन-प्रदान किया है। उसी एक आदमी के आँख, लिवर और किडनी क्रमशः आलिया, मैत्रेय और नवीन को लगाया गया है। इस बिना पर भी यह सिर्फ अंगदान की कहानी नहीं रह जाएगी? क्योंकि यहाँ भी एक विरोधाभास खड़ा होता है कि उस आदमी के अंग, जो अन्य आठ लोगों को लगाया गया है, अन्य लाभार्थियों में लग कर क्या अपने पुराने पहचान से पृथक हो गए हैं या उन्हें नया पहचान मिल गया है? यहाँ भी एक विरोधाभास है। अगर इस फिल्म को सिर्फ अंगदान की कहानी होना होता तो कम से कम उसे पाँच और कहानियाँ कहनी पड़ती। उस महादानी की भी एक कहानी है जो स्वयं फिल्म में साक्षात नहीं है, वैसे ही जैसे फिल्म का निर्देशक भी साक्षात नहीं होता है। वह एक अंधेरे खोह में, जो कभी-कभी बीहड़ का भी आभास दिलाता है, हेडटॉर्च लिए कुछ खोज रहा है। यह खोह या गुफा प्लेटो के के गुफा जैसा भी नहीं है। जहां लोगों का एक समूह है। समूह जंजीर से (अमिताभ वाला जंजीर भी हो सकता है) बंधा है। उन्हें पीछे देखने की इजाज़त नहीं है जबकि प्रकाश-स्रोत उनके पीछे ही है लेकिन वे उसे देख नहीं पा रहे हैं। वे प्रकाश के उद्गम से अंजान अपनी छायाओं को दीवाल पर देखते हैं और उन्हें ही यथार्थ समझ बैठे हैं। इस खोह में वह दानी व्यक्ति अकेला है प्रकाश-स्रोत को खुद ललाट में बांध रखा है और अपनी छाया को साथ लिए आगे बढ़ता जा रहा है। उसने क्या अनुभूत किया यह बताने के लिए वह हमारे बीच नहीं है, लेकिन उसके हाथ में एक कैमरा था और वह अपनी गति-दिशा और गंतव्य के रास्ते को रिकॉर्ड करता जा रहा था। उसने गंतव्य को पाया कि नहीं यह भी हमें मालूम नहीं है। हम सिर्फ उस ‘लक्ष्य’ को पाने की प्रक्रिया से वाकिफ हैं और वह प्रक्रिया इतनी समृद्ध है कि हम उस अधूरी यात्रा को भी उसकी  सचेत और गंभीर संलग्नता के बतौर संज्ञान में लेने को तत्पर हैं। हर ‘सफल यात्रा’ कुछ संज्ञाएँ देकर समाप्त हो जाती है, फिर संज्ञाओं की यात्रा शुरू होती है, मसलन कुछ आविष्कार, कुछ दवाइयाँ, कुछ स्थान और कुछ ‘ज्ञान’ भी। और, हर असफल यात्रा बहुत सारी कहानियाँ देकर हमें भी खुद में साझा कर लेती है, वह हमारे भावनात्मक संसार में एक थाती बनकर बस जाती है। हम सारी कहानियों को समेटने में सफल नहीं हो सकते हैं, क्योंकि वे हमारी क्षमताओं और उम्र के पार होती हैं। बहुत सारी कहानियाँ ऐसी भी होती हैं जो अनकही रह जाती हैं। किसी एक फिल्म में उन सारी कहानियों को समेटना संभव भी नहीं था। शिप ऑफ थीसियस उन्हीं कहानियों में से तीन कहानी को हमारे सामने लाती है और बॉलीवुडीय सिने-अनुभव में एक थाती के रूप में सँजोये जाने वाली फिल्म के रूप में स्थिर/सुरक्षित हो जाती है। कहीं इस फिल्म की एक समीक्षा पढ़ रहा था जिसमें समीक्षक ने यह इच्छा जाहिर की थी कि वह फिल्म के हिन्दी subtitle के लिए खुद को बिना पारिश्रमिक प्रस्तुत करना चाहता है ताकि वह अपनी माँ को यह फिल्म दिखा सके। मेरी माँ न हिन्दी जानती है और न ही अँग्रेजी फिर भी मैं दावे के साथ कह सकता हूँ कि किसी भी बॉलीवुडीय फिल्म से ज्यादा बढ़िया तरीके से वह इस फिल्म को समझ सकती है। क्योंकि, इसकी एक यात्रा पीछे की ओर भी है। जहां वह फिल्म-कला के आदिम रूप को पाने की कोशिश करती है। शिप ऑफ थीसियस की इस यात्रा से उड़ने वाले धूल-कण से निकलने वाली कौंध ने लोगों को कम से कम एक बार आँख मींचने के लिए मजबूर तो कर ही दिया है। दूसरी तरह कहना हो तो जैसे कुमार गंधर्व का कोई गीत आईपॉड में लगाकर उसका ईयरफोन ‘फिल्मी गाने’ के किसी श्रोता के कान में चुपके से ठूंस दिया गया हो।

इति

(इस समीक्षा को लिखवा लिए जाने के लिए अपने अन्यतम मित्र संजय सहाय जी का आभारी हूँ…मित्र रवीश चौधरी से हुयी बात-चीत से बहुत कुछ हासिल किया हूँ और इस लेख में भी बहुलांश इस्तेमाल करने की कोशिश किया हूँ, रवीश जी का भी आभार। )
 उदय शंकर

उदय शंकर

जेएनयू से पीएचडी के लिए शोधरत। तीन खंडों में आलोचक सुरेंद्र चौधरी के रचना संचयन का संपादन। सांस्‍कृतिक आंदोलनों से जुड़ाव। उनसे udayshankar151@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।

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