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जाने दो वह कवि कल्पित था : अविनाश मिश्र

कभी निराला के लिए नागार्जुन ने लिखा था : ‘‘उसे मरने दिया हमने रह गया छुट कर पवन/ अब भले ही याद में करते रहें सौ-सौ हवन।’’ यह लिखाई बताती है कि हिंदी साहित्य में मरण का बहुत माहात्म्य है, यह ज्ञानरंजन भी बहुत पूर्व में कह चुके हैं। मुझे यह कहना भला तो नहीं लग रहा है, लेकिन मुझे लगता है कि कृष्ण कल्पित के जीते-जी शायद उन्हें वह प्रतिष्ठा नहीं मिलेगी जिसके वह हकदार हैं। आज हिंदी साहित्य में कृष्ण कल्पित का मौखिक और कुटिल विरोध उनके लिखित विरोध से कई गुना बढ़ चुका है। उन पर हो रहे आक्रमण कभी निराला पर हुए आक्रमणों की याद दिलाते हैं। इस तरह देखें तो हिंदी कविता और आवारगी की ही नहीं कृष्ण कल्पित अपमान की परंपरा को भी आगे बढ़ा रहे हैं। इस अपमान में भी आनंद की तलाश उनकी सहज-वृत्ति है। इसके लिए वह जिस सिद्ध ‘विट’ तक जाते हैं, वह एक साथ उनके कुछ मित्रों और कई शत्रुओं का निर्माण करती है। इन शत्रुओं में औसत कवि-कवयित्री, फूहड़ लेखक-लेखिकाएं, मतिमंद और माफिया आलोचक, अर्थपिशाच प्रकाशक, काहिल प्राध्यापक और उनके निकम्मे शोधार्थी, मानसिक रूप से दिवालिए पत्रकार, चालू और हद दर्जे के बेवकूफ टिप्पणीकार, भ्रमरवृत्तिदक्ष दलाल और प्रतिभा-प्रभावशून्य युवक-युवतियां शामिल हैं। इस पर सोचा जाना चाहिए कि आखिर एक कवि इतने सारे मूर्त शत्रुओं के बीच रहकर कैसे काम करता है. #लेखक 

परंपरा का आवारापन

कृष्ण कल्पित की कविता-सृष्टि पर एकाग्र

 

By  अविनाश मिश्र  

‘‘आलोचक कवि हो यह जरूरी नहीं, लेकिन कवि का आलोचक होना अपरिहार्य है!’’

यह कहने वाले समकालीन हिंदी कविता के सबसे आवारा कवि कृष्ण कल्पित कवियों में सबसे बड़े शराबी और शराबियों में सबसे बड़े कवि हैं। एक आलोचनात्मक आलेख के लिहाज से यह शुरुआत कुछ अजीब और भारहीन लग सकती है, लेकिन मैं चाहता हूं कि जैसे कृष्ण कल्पित (कृ.क.) को कविता नसीब हुई है, वैसे ही मुझे उनकी कविता की आलोचना नसीब हो।

इस आलोचना के केंद्र में वे असर हैं जो मेरे उत्साह में मुझ तक विष्णु खरे के जरिए, विष्णु खरे तक मुक्तिबोध के जरिए, मुक्तिबोध तक निराला के जरिए, निराला तक कबीर के जरिए, कबीर तक बाणभट्ट के जरिए और बाणभट्ट तक वाल्मीकि के जरिए आए। लेकिन कहां ये तेजस्वी और पराक्रमी कवि-आलोचक और कहां अत्यंत अल्प बौद्धिकता वाला मैं! मुझे यह बहुत अच्छी तरह मालूम है कि जिस परंपरा में कृ.क. आवारगी करते रहे हैं, उसमें मेरी गति बहुत क्षीण है। इस गति के बावजूद मैं कृ.क. की कविता-सृष्टि पर एकाग्र होकर कुछ कहने का प्रयत्न कर रहा हूं और इस सिलसिले में विष्णु खरे की एक कविता ‘कूकर’ मेरे साथ चलने लगी है।

हिंदी कविता संसार में एक लंबे समय तक कृ.क. के नाम के आगे गलत या प्रश्न का निशान लगाया जाता रहा है, लेकिन अब यह एक तथ्य और सच्चाई मालूम पड़ती है कि कृ.क. पूरब की कविता की पूरी परंपरा को देखने वाले अपनी और अपने से ठीक पूर्व की पीढ़ी में एकमात्र आवारा कवि हैं। अपने नियमों से ही अपना खेल खेलते हुए वह कविता की दुनिया में किसी और के खेल में शामिल होने वाले बेवकूफों, कायरों और शोहदों में नहीं हैं और उनसे दूर भी रहे हैं।

दिशाओं में गर्क हो जाने की ख्वाहिश रखने वाले वह उन कवियों में से हैं जिन्होंने अपने शुरुआती रियाज को भी शाया करवाया है। इस रियाज को अगर रियाज ही माना जाए, तब हिंदी कविता की मुख्यधारा में सही मायनों में कृ.क. का काव्य-प्रवेश साल 1990 में आए ‘बढ़ई का बेटा’ से होता है। इस संग्रह की आखिरी कविता कवियों के मुख्यधारा तक आने, उसमें भटकने, खटने और खो-खप जाने को बयां करती है :

बहुत दूर से चलकर दिल्ली आते हैं कवि

भोजपुर से मारवाड़ से संथाल परगना से मालवा से

छत्तीसगढ़ से पहाड़ से और पंजाब से चलकर

दिल्ली आते हैं कवि

जैसे कामगार आते हैं छैनी-हथौड़ा लेकर

रोजी-रोटी की तलाश में

[ कवियों की कहानी ]

 

इस काव्य-प्रवेश से एक दशक पूर्व ‘भीड़ से गुजरते हुए’ के गीतों से पहले एक भूमिका में कवि ने दर्ज किया :

अभी मैं हांफ रहा हूं

मुझे सुनने को आतुर लोगों

अभी मैं हांफ रहा हूं

जब मैं हांफने की

पूरी यात्रा तय कर लूंगा

तब मैं पूरी कथा कहूंगा

कृ.क. के कवि के इस शाया रियाज में रेतीली स्थानीयता की विसंगतियां थीं, प्रेमानुभव थे और ‘दर्द जितना भी मिला, प्यास बनकर पी गए’ वाली रूमानियत और शहादत थी। इसमें लोक-संवेदना और विस्थापन की मार थी। लय से लगाव और छंद का ज्ञान साथ लिए इस रियाज में एक अनूठा कथा-तत्व था, इसलिए इसे कथा-गीत कहकर भी पुकारा गया :

राजा रानी प्रजा मंत्री बेटा इकलौता

एक कहानी सुनी थी जिसका अंत नहीं होता

इस रियाज ने एक आवारागर्द अक्ल रखने वाले कृ.क. की कवि-छवि का बहुत दूर तक नुकसान किया। इसने हिंदी कविता की व्यावहारिक राजनीति को यह छूट दी कि वह कृ.क. के कवि के इर्द-गिर्द प्रश्नवाचकता का वृत्त निर्मित करे और इसे बहुत दूर तक विस्फारित कर सके। इस वृत्त में ‘कैद’ कवि का काव्य-संघर्ष इसलिए बहुत उल्लेख्य है क्योंकि उसकी कविता पहले गीत की रूढ़ संवेदना से बाहर आई, फिर आठवें दशक के फॉरमूलों से और फिर नवें दशक के नक्शे से भी। इस प्रकार एक सीधी गति में सफर करते हुए कृ.क. की कविता आज सारे दायरों को ध्वस्त कर अपना एक अलग देश बना चुकी है और यह कहना सुखद है कि छूट चुके मरहलों से उसके रिश्ते अब भी अच्छे हैं।

प्रस्तुत सामयिकता में कृ.क. की कविताएं अभ्यस्त मुहावरों और काव्य-समझ की कविताएं नहीं हैं। इस वक्त हिंदी में कविता के जितने भी सांचे हैं — प्रतिबद्ध कविता, वैचारिक कविता, सैद्धांतिक कविता, राजनीतिक कविता, क्रांतिकारी कविता, ऐतिहासिक कविता, वैश्विक कविता, आंचलिक कविता, प्राकृतिक कविता, सांस्कृतिक कविता, लोक कविता, ग्रामीण कविता, कस्बाई कविता, नागर कविता, पर्वतीय कविता, स्त्रीवादी कविता, दलित कविता, आदिवासी कविता, अल्पसंख्यक कविता, सर्वहारा कविता, तात्कालिक कविता, समयातीत कविता, आवश्यकतावादी कविता, आशावादी कविता, निराशावादी कविता, इच्छावादी कविता, चालू कविता, जड़ कविता, स्मृत्यात्मक कविता, गत्यात्मक कविता, रत्यात्मक कविता, काव्यात्मक कविता, गद्य कविता, ठोस कविता, तरल कविता, मुश्किल कविता, सरल कविता, अगड़ी कविता, पिछड़ी कविता, आधुनिक कविता, उत्तर आधुनिक कविता, गंभीर कविता, लोकप्रिय कविता, जन कविता, बौद्धिक कविता — उनमें से किसी एक में कृ.क. की कविता को नहीं रखा जा सकता। इस कविता-समय में इन काव्य-प्रकारों और प्रवृत्तियों के बीच इस प्रकार कृ.क. की कविता एक ‘आवारा कविता’ नजर आती है। आवारगी सदा से समय में तिरस्कृत रही आई है। यह अलग बात है :

पुरस्कृत कवियों से कविता दूर चली जाती है

कविता तिरस्कृत कवियों पर रीझती है

[ कविता-रहस्य, 25:1 ]

 

आवारा कविता अपने आस-पास को बहुत सजगता और ईमानदारी से देखती है, लेकिन वह अपने समय में बहुत अकेली भी पड़ जाती है और इसलिए ही वह परंपरा से संबद्ध होती है। इस प्रकार की कविता में एक खास किस्म का देहातीपन और बेबाकी होती है, और उसका कहना-बोलना अक्सर किसी सच्चे-निहंग पागलपन की याद दिलाता है। यहां यह भी बताते हुए आगे बढ़ना चाहिए कि किसी गैर-मार्क्सवादी कवि की कविता को सीधे मनुष्य से प्रतिबद्ध बता देने वाले समीक्षात्मक-आलोचनात्मक प्रयत्न मार्क्सवादी आलोचना के कूपाकाश में प्राय: बहुत नवीन और अलग समझे जाते रहे हैं। लेकिन किसी विचार या राजनीति से प्रतिबद्ध होने बावजूद कविता — अगर वह कविता है — तो अनिवार्यतः — प्रथमतः और अंततः — मनुष्य से ही प्रतिबद्ध होगी, इसलिए किसी कवि की कविता का मनुष्य से प्रतिबद्ध होना या बने रहना कोई नई और अनूठी बात नहीं है। नयापन और वैशिष्ट्य तो इसमें है कि कवि अपनी प्रतिबद्धता को बयां कैसे कर रहा है, और यह भी मैं कोई नई बात नहीं कह रहा हूं, बस इस प्रसंग में इस जरूरी बात को दुहरा भर रहा हूं। इस अर्थ में देखें तो कृ.क. का कवि एक शास्त्रकार भी है। वह माफिया आलोचकों को पहचानता है और उसकी कविता कातिलों का कातिल होने की बराबर कोशिश करती है। आस-पास को कभी ओझल न करने वाली मानवीय दृष्टि के साथ दृढ़ यह कविता बंकिमता को बचाती है और परंपरा में आवारगी करते हुए कथित आधुनिकता और उत्तर-आधुनिकता दोनों से ही परहेज बरतती है। यह इस यकीन के साथ व्यक्त होती है कि एक नए कवि में सारे पुराने कवि शामिल होते हैं। यह जरी-गोटेदार भाषा से दूरी बनाकर करुणा और क्रोध से संभव हुई वाग्मिता को प्रश्रय देती है। तत्कालप्रिय प्रवचनात्मकता से प्राप्त वैचारिक प्रतिबद्धता-पक्षधरता से बचती हुई यह लोगों के बीच, लोगों का होने की कोशिश करती है और इस कोशिश में जनप्रिय और बदनाम साथ-साथ होती है।

कविता में क्या हो, क्या न हो, क्या कहा जाए, क्या न कहा जाए, कैसे कहा जाए, कैसे न कहा जाए… यह सब हिंदी कविता में गई सदी के सातवें दशक में ही पूर्णरूपेण तय और स्पष्ट हो गया था। कुछेक अपवादों को छोड़ दें तो आज करीब-करीब सारे नए-पुराने कवि इस स्पष्टता के साथ ही लिख रहे हैं। कृ.क. इन अपवादों में से ही एक या कहें इन अपवादों में भी एक अपवाद हैं। कविता और कवि-व्यक्तित्व दोनों ही कृ.क. के पास है। निराला और राजकमल चौधरी के बाद यह संयोग कृ.क. के रूप में हिंदी में कई दशकों के बाद घट रहा है। यह यों ही नहीं है कि आज हिंदी साहित्य (हिं.सा.) के सारे संगठित तत्व और शक्तियां कृ.क. पर क्रुद्ध और इसलिए उनके विरुद्ध हैं। अद्भुत आकर्षक आवारगी से भरा हुआ कृ.क. का व्यक्तित्व और उसका कवित्व हिं.सा. के जड़, संकीर्ण और अदूरदर्शी आलोचकों के बीच उभरा है। यह भी कह सकते हैं कि कृ.क. जैसे कवि के लिए यह समय पूरी तरह मुफीद नहीं रहा आया। कृ.क. कविता में और कविता से अलग भी प्राय: बहुत मूल्यवान बातें कहते हैं, लेकिन कभी-कभी उनमें व्यावहारिक संचार का बहुत अभाव होता है। इस अभाव को अपना अपमान समझ हिं.सा. की व्यावहारिक राजनीति उनसे एक शत्रु की तरह बर्ताव करती है। यह बर्ताव तत्काल भले ही कुछ बर्बाद करता दिखे, लेकिन बहुत दूर तक इसकी कोई गति नजर नहीं आती, क्योंकि कृ.क. के पास भविष्य कविता के रूप में सुरक्षित है और इस दृश्य में भी यह कृ.क के सौभाग्य का तेवर नहीं तो और क्या है कि उनके और उनके कवित्व के प्रति अनुराग रखने वाले बढ़ते ही जा रहे हैं। उनके पक्ष में नजर आने वाले ऐसे उदीयमान व्यक्तित्वों की कोई कमी नहीं है जिनसे कल हिंदी धन्य होगी। यहां वरिष्ठ कवियों के बहाने युवा कवियों को संबोधित कृ.क. की ये कविता-पंक्तियां दृष्टव्य हैं :

जिसकी एक भी पंक्ति नहीं बची

उसके पास सर्वाधिक तमगे बचे हुए हैं

 

[ वरिष्ठ कवियो ]

एक योग्य कवि की लंबी उपेक्षा उसको पराक्रमी बनाती चली जाती है। इस पराक्रम से उसके प्रशंसकों का एक अलग समुदाय निर्मित होता है और उसके समर्थकों की एक अलग श्रेणी… ‘निराला की साहित्य साधना’ को यहां याद करते चलिए। दुरभिसंधियां युक्तियां बन जाती हैं, लेकिन एक वैविध्यपूर्ण कवि-व्यक्तित्व खुद को कभी संघर्ष से वंचित नहीं करता। कुंठाएं उसे दबोचने की कोशिश करती हैं, लेकिन वह आत्म-विश्वास को संभाले रखता है। कृ.क. के यहां ये विशेषताएं नजर आती हैं। उन्होंने शिल्प से आक्रांत और शब्द से आडंबर किए बगैर हिंदी कविता में एक असंतुलन उत्पन्न किया है। इस असंतुलन ने तमाम ‘विशिष्ट कवियों’ को असुरक्षा में डाल दिया है। अब स्थिति यह है कि सांस्कृतिक रूप से सत्तावान तंत्र और संरचनाएं कृ.क. की प्रत्येक पंक्ति से भयभीत रहती हैं। इस तंत्र और इन संरचनाओं ने वर्षों तक उनके कवि को खत्म करने के यत्न किए, लेकिन ‘अपने होने को प्रकाशित करने’ के नए माध्यमों के उदय के बाद आज कृ.क. हिंदी के सबसे चर्चित कवियों में से एक होकर उभरे हैं। उन्होंने एक काव्यात्मक न्याय के लिए प्रचलनों के बीतने की प्रतीक्षा की है। उनकी प्रतीक्षा समाप्त नहीं हुई है, लेकिन उन्हें कुछ राहत है क्योंकि मौजूदा हिं.सा. में उनके प्रकट-अप्रकट ‘प्रॉपर प्रशंसक’ अभी हिंदी के किसी भी दूसरे कवि से ज्यादा भासते हैं। उनकी कविता के प्रेमियों की दर्ज-बेदर्ज और लिखित-वाचिक प्रतिक्रियाएं हिंदी कविता संसार में उनके कवि के ‘अन्यत्व’ को पुख्ता करती हैं। उनके इस उदय और उभार ने तमाम चिढ़े हुए, अयोग्य, औसत और जलनशील तत्वों को उनके खिलाफ भी सक्रिय कर दिया है। इसके साथ ही उनके उन शत्रुओं का यहां क्या ही उल्लेख किया जाए जिनका प्रज्ञा-क्षेत्र ही बाधित है और जिनका पूरा व्यक्तित्व और लेखन कृ.क. के शाश्वत किए-धरे के आगे बहुत संक्षिप्त और सस्ता लगता है। कृ.क. जिस शैली और शाला से खुद को जोड़ते हैं, वहां यश के साथ अपयश मुफ्त मिलता है और इसलिए उनके अपयश से ‘यश’ कमाने वालों की भीड़ भी इधर बहुत भारी हो गई है। इस भीड़ में अधिकांश ऐसे हैं जो ‘भीड़’ को ‘भीर’ और ‘भारी’ को ‘भाड़ी’ लिखते हैं।

कभी निराला के लिए नागार्जुन ने लिखा था : ‘‘उसे मरने दिया हमने रह गया छुट कर पवन/ अब भले ही याद में करते रहें सौ-सौ हवन।’’ यह लिखाई बताती है कि हिं.सा. में मरण का बहुत माहात्म्य है, यह ज्ञानरंजन भी बहुत पूर्व में कह चुके हैं। मुझे यह कहना भला तो नहीं लग रहा है, लेकिन मुझे लगता है कि कृ.क. के जीते-जी शायद उन्हें वह प्रतिष्ठा नहीं मिलेगी जिसके वह हकदार हैं। आज हिं.सा. में कृ.क. का मौखिक और कुटिल विरोध उनके लिखित विरोध से कई गुना बढ़ चुका है। उन पर हो रहे आक्रमण कभी निराला पर हुए आक्रमणों की याद दिलाते हैं। इस तरह देखें तो हिंदी कविता और आवारगी की ही नहीं कृ.क. अपमान की परंपरा को भी आगे बढ़ा रहे हैं। इस अपमान में भी आनंद की तलाश उनकी सहज-वृत्ति है। इसके लिए वह जिस सिद्ध ‘विट’ तक जाते हैं, वह एक साथ उनके कुछ मित्रों और कई शत्रुओं का निर्माण करती है। इन शत्रुओं में औसत कवि-कवयित्री, फूहड़ लेखक-लेखिकाएं, मतिमंद और माफिया आलोचक, अर्थपिशाच प्रकाशक, काहिल प्राध्यापक और उनके निकम्मे शोधार्थी, मानसिक रूप से दिवालिए पत्रकार, चालू और हद दर्जे के बेवकूफ टिप्पणीकार, भ्रमरवृत्तिदक्ष दलाल और प्रतिभा-प्रभावशून्य युवक-युवतियां शामिल हैं। इस पर सोचा जाना चाहिए कि आखिर एक कवि इतने सारे मूर्त शत्रुओं के बीच रहकर कैसे काम करता है :

जनवरी बलात्कार के लिये मुफीद महीना है

फरवरी में किसी का भी कत्ल किया जा सकता है

मार्च लड़कियों के घर से भागने का मौसम है

अप्रैल में किया गया अपहरण फलदायक होता है

मई में सामूहिक हत्याकांड अच्छे से किया जा सकता है

जून के महीने में दलितों के घर लहककर जलते हैं

जुलाई में मुसलमानों को मारा जा सकता है

अगस्त में तो बच्चे मरते ही हैं

सितंबर में किसान चाहें तो पेड़ों से लटक सकते हैं

अक्टूबर में डिफाल्टर देश छोड़कर भाग सकते हैं

नवंबर गोरक्षकों के लिए आरक्षित है

वे किसी भी निरपराध नागरिक को सरे-आम मार सकते हैं

दिसंबर में आप आंसू बहा सकते हैं

प्रायश्चित कर सकते हैं

और अगर चाहें तो कृष्ण कल्पित के विरुद्ध विज्ञप्ति जारी कर सकते हैं!

 

[ नया बारामासा ]

 

बुरी खबर और भयावह यथार्थ को कविता में लाने के लिए कृ.क. कविता को किसी अपराध की तरह संभव करते हैं। अन्याय, शोषण और गैर-बराबरी के विरुद्ध लड़ने का उनका तरीका एक ‘नैतिक कवि’ का तरीका नहीं भी लग सकता है। इस लड़ाई में वह ‘राजनीतिक रूप से गलत’ भी नजर आ सकते हैं, लेकिन उनका पक्ष और स्थिति बहुत स्पष्ट है। दरअसल, वह बहुत तत्कालप्रिय ढंग से उम्मीद और नाउम्मीदी में होना नहीं जानते हैं और न ही वह अपने कवि और कविता और कथ्य की शर्त पर सबको खुश रखना चाहते हैं। वह उस प्रतिबद्धता से खुद को अलग करते चलते हैं, जिसका दांव पर कुछ भी नहीं लगा होता :

वह दिन जरूर आएगा जब मुझे मार गिराया जाएगा

 

मेरा जीवन हत्यारों का चूका हुआ निशाना है!

[ चूका हुआ निशाना ]

 

कृ.क. की अब तक प्रकाशित कविता-सृष्टि में यह बात बहुत स्पष्ट नजर आती है कि वह एक साथ साहित्यिक और सामाजिक कवि हैं। इस दर्जा साहित्यिक कवि कि समाज उन्हें पढ़-सुनकर बहुत सहजता से साहित्यिक हो सकता है। यह एक जनकवि के होने की अलामत है। एक जनकवि खुद को और जन के दुख को सुनाना जानता है। इस जिक्र में यह कहने में कोई हर्ज नहीं है कि मौजूदा दौर में सही मायनों में हिंदी में जनकवि होने की विशेषता सिर्फ कृ.क. में ही दृश्य होती है। यह हमारी भाषा और उसमें कविता का दुर्भाग्य है कि कृ.क. की काव्य-प्रतिभा के साथ-साथ उनकी इस विशेषता के साथ भी न्याय नहीं हुआ। उनकी इस क्षमता को पहचानकर भी नजरअंदाज किया गया। बौद्धिकों और जनता दोनों को ही आकर्षित करने वाली कृ.क. की कविताओं में वे सारे अवयव हैं जो एक जनकवि का निर्माण करते हैं। हिंदी की औसतताओं के कौआरोर में उनकी कविता महज किताबी नहीं है। वह यात्राएं करना जानती है, खुद को गाना और कंठ में बसना भी। यह कविता जन को संस्कारित करने की काबिलियत रखती है, लेकिन इसे प्रशंसक मिलते हैं, जन नहीं मिलते, पाठक मिलते हैं, वे आलोचक नहीं मिलते जो इस कविता को जन के बीच प्रतिष्ठित कर सकें। यहां सार्त्र को याद कीजिए जिन्होंने कहा था कि मेरे पास पाठक हैं, लेकिन मुझे जनता चाहिए।

लड़कपन से ही कवि-कर्म में संलग्न कृ.क. के कवि के निर्माण में तुलसी, सूर, मीरा, कबीर की तरह ही मीर, ग़ालिब, ज़ौक़, नज़ीर और हाफ़िज़, बेदिल, शेखसादी और कालिदास, भवभूति, भर्तृहरि और खुसरो का योगदान है। यह स्वयं कवि ने स्वीकारा है और यह भी कि उसकी हिंदी में उर्दू सहज रूप से विद्यमान रहती है। कृ.क. हिंदी नहीं हिंदवी का कवि कहलाना पसंद करते हैं। हिंदवी वह है जिसमें मीर लिखते थे।

आलोचना और प्रशंसा दोनों से ही अब तक आहत नहीं हुए कृ.क. वरिष्ठों में सबसे युवा हैं और युवाओं में सबसे वरिष्ठ, स्वीकृतों में वह सबसे बहिष्कृत हैं और बहिष्कृतों में सबसे स्वीकृत। वह मुक्त वैभव में छंद हैं और छंद वैभव में मुक्त। जहां सब मुखर हैं, वहां वह चुप हैं और जहां सब चुप हैं, वहां वह मुखर। वह कवियों की जमीन जानते हैं और जमीन की कविता भी। भुला दिए गए शब्दों को वे जमा करते हैं और घिसे हुए शब्दों को हटाते रहते हैं। उनके शब्दों में दृश्य हैं, लेकिन फिल्म बनाने की एक धुंधली-सी इच्छा बहुत बार मन में जगने के बावजूद वह आज तक एक भी फिल्म नहीं बना पाए हैं। बचपन से लेकर अब तक के बहुत सारे ऐसे दृश्य उनकी आंखों के सामने से गुजरे हैं, जब उन्हें लगा है कि एक फिल्म बनानी चाहिए। कस्बे के घर के आंगन में गोबर से लिपे हुए चूल्हे को फूंक मारकर सुलगाती हुई दादी की आंखों से निकलते हुए आंसू, अपने लंबे कानों को जोर-जोर से हिलाकर तितर-बितर करती हुई काले छबकों वाली बकरी और चटख-चटख करती हुई लकड़ियां— यह सब देखकर पहली बार उन्हें लगा था कि केवल दृश्यों के माध्यम से भी कुछ रचा जा सकता है। यह बहुत पुरानी बात है, जब उनके पिता होर्डिंग्स बनाया करते थे और उनसे रंगों की पुताई करवाते थे। चाक्षुष सौंदर्य और मानवीय क्रियाओं से भरे-पूरे ऐसे न जाने कितने दृश्यों का एक अंतहीन और अटूट सिलसिला यहां तक चला आया है। कुछ रचने की इस आरंभिक अकुलाहट ने ही उन्हें कवि-कर्म में प्रवृत्त किया। यहां पूर्व में दर्ज उनके रियाज, काव्य-प्रवेश और काव्य-विकास को याद करें तो उनकी कविताएं सिनेमा से जुड़े उनके स्वप्न और उनकी आकांक्षा का प्रतिफलन लगती हैं :

कभी-कभी यह सोचकर घबरा जाता हूं कि अचानक फिल्म बनाने की सुविधाएं पा गया तो क्या करूंगा? फिल्म बनाने से पहले पांच-दस हजार फुट कच्ची फिल्म बिगाड़नी चाहिए। अब तक बिगाड़ देनी चाहिए थी। पहली बार में पांच-सौ फुट में से साढ़े चार सौ फुट फिल्म सही निकाल पाना कितना मुश्किल होगा। लेकिन अगर ऐसा हुआ भी तो क्या इस बात का डर, तनाव और एक किस्म का निजी आतंक भी मेरी रचनात्मकता का हिस्सा नहीं रहेगा? इस ‘अभाव’ को भी तो रचनात्मकता में बदला जा सकता है।

[ पसरी हुए रेत पर ]

अभाव को रचनात्मकता में बदलती हुई कृ.क. की कवि-छवि में कुछ पुराने शब्द, कुछ भावनाएं और कुछ अनगढ़पन सदा नजर आता रहा है। कमजोर जिंदगी के बयान छुपाने की कोशिश उनकी कविता ने अब तक नहीं की है :

नई दिल्ली के कवियो!

चाहे जितनी कमजोर दिखे मैं अपनी कविता नहीं बदलूंगा

 

[ दिल्ली के कवि ]

 

ऊपर उद्धृत पंक्तियां साल 1987 में हुई कृ.क. की एक कविता से हैं। वह बार-बार दिल्ली में आते और बार-बार दिल्ली से जाते रहे हैं। साल 1988 में हुई उनकी एक और कविता में इस बीच के ब्यौरे कुछ यों सामने आते हैं :

कुछ कवि हो गए मशहूर कुछ काल-कवलित

कुछ ने ढूंढ़ लिए दूसरे धंधे मसलन शेयर बाजार

 

कुछ डूबे हुए हैं प्रेम में कुछ घृणा में

 

कुछ ने ले लिया संन्यास कुछ ने गाड़ी

 

कुछ लिखने लगे कहानी कुछ फलादेश

 

इनके बीच एक कवि है जिसे अभी याद हैं

पिछली लड़ाई में मारे गए साथियों के नाम

उसके पास अभी है एक नक्शा!

[ नक्शा ]

‘नक्शा’ आलोकधन्वा को समर्पित है, लेकिन इसमें कृ.क. का सफर भी साफ नजर आता है। इस नजर आने में बहुत दूर-दूर से चलकर दिल्ली आती हुई रेलगाड़ियां हैं जिनमें कवि हैं — दुनिया की सबसे पुरानी कला के मजदूर — अपने अभावों, पुकारों और तकलीफों के साथ। वे ऋतु कोई भी हो शोक में डूबे हुए हैं — आंसुओं को रोकने की कला सीखते हुए — देश की अलग-अलग दिशाओं से आए हुए वे दिल्ली की अलग-अलग दिशाओं में भटक रहे हैं, उन्हें कोई काम नहीं मिल रहा है :

वे जिंदा रहने को आते हैं दिल्ली और मारे जाते हैं

भूख से बेकारी से उपेक्षा से मरते हैं वे

[ कवियों की कहानी ]

एक कवि गोरख पांडे की याद में लिखी गई यह ‘कवियों की कहानी’ एक दूसरे कवि कृ.क. ने लिखी है यह सोचकर :

होती है हर एक कवि की अपनी एक कहानी

जिसे लिखता है एक दूसरा कवि

 

इस साहित्यिक और बौद्धिक वातावरण को बहुत करीब से देखते हुए कृ.क. की और हिंदी की उम्र में धीमे-धीमे चलते हुए वह वक्त नजदीक आ गया, जब उन्होंने इस वातावरण के विरोधी कवि के रूप अपनी काव्य-भाषा और शैली के लिए नए आयाम पाने का संघर्ष प्रारंभ किया। पूरब की पूरी कविता और काव्य-शास्त्र की पूरी परंपरा में आवाजाही और उससे मुठभेड़ करते हुए कृ.क. की उम्र में वे वर्ष भी आए, जब वह समकालीन हिंदी कविता के लिए बिल्कुल बेगाने हो गए :

इस जरीगोटेदार भाषा के बांदी समय में

कौन समझेगा कि मुझ पगलैट को तो

अपने ही खोजे शब्दों के बदरंग चिथड़े प्यारे हैं

 

[ शब्दों के चिथड़े ]

कृ.क. ने मध्यकाल की मीरा की कविता और जीवन को केंद्र में रखते हुए ‘कोई अछूता सबद’ में हिंदी में लोकप्रिय हुए तत्कालीन स्त्री-विमर्श को समझने की कोशिश की :

तुम जो पहनाओगे पहनूंगी

जो खिलाओगे खाऊंगी

तुम जहां कहोगे वहां बैठ जाऊंगी

कहोगे तो बिक जाऊंगी बाजार में

[ ढलती रात में ]

संसार एक नई शताब्दी से परिचित हो चुका था, लेकिन हिंदी कविता संसार कृ.क. से अब तलक एक अपरिचित की तरह बर्ताव कर रहा था। उनकी आवारगी बढ़ती जा रही थी और आवारा पंक्तियां और सूक्तियां उन पर आयद हो रही थीं और वह उन्हें इस उम्मीद में प्रकाशित करवाते जा रहे थे कि शायद वे एक रोज मानवता के काम आएंगी :

कभी प्रकाश में नहीं आता शराबी

 

अंधेरे में धीरे-धीरे विलीन हो जाता है

[ एक शराबी की सूक्तियां, 35 ]

 

कृ.क. की एक कहानी ‘शराबघर’ के नायक की मरने की इच्छा शराब पीने के बाद अधिक प्रबल हो उठती है। वह एक रोज अपनी मृत्यु संबंधी सारी कविताओं को एक डायरी में उतारता है और डायरी के पहले पृष्ठ पर लिखता है :

‘मैं मरना चाहता हूं।’

 

लेकिन वह मरा नहीं, वह आज तक शराबघरों में भटक रहा है। उसकी सूक्तियों को जानने वालों की संख्या बढ़ती चली जा रही है, लेकिन अभी भी उसे जानने वाले बहुत कम हैं।

‘एक शराबी की सूक्तियां’ को कृ.क. ने अपना ‘मुक्तिप्रसंग’ कहा है और राजकमल चौधरी ने ‘मुक्तिप्रसंग’ को अपना वर्तमान :

‘‘…मैं अपने अतीत में राजकमल चौधरी नहीं था। भविष्य में यह प्रश्नवाचक व्यक्ति और इस व्यक्ति की उत्तर-क्रियाएं बने रहना मेरे लिए संभव नहीं है। क्योंकि, मैं केवल अपने वर्तमान में जीवित रहता हूं। …अतएव, ‘मुक्तिप्रसंग’ मेरा वर्तमान है। …मृत्यु की सहज स्वीकृति से देह की सीमाओं, संगतियों और अनिवार्यताओं से मुक्त हुआ जा सकता है। …ऑपरेशन थिएटर की सफेद टेबल पर संज्ञाहीन होते हुए, मैंने ऐसा अनुभव किया है। मैंने अनुभव किया है कि स्वयं को और अपने अहं को मुक्त किया जा सकता है। …इस अनुभव के साथ ही, दो समानधर्मा शब्द जिजीविषा और मुमुक्षा इस कविता के मूलगत कारण हैं। …सती-वर्तमान के अग्निजर्जर शव को अपने कंधों पर, मैं शिव की तरह धारण करता हूं। मैं इस शव के गर्भ में हूं, और यह शव मेरे कंधों पर है। इसकी विकृति, वीभत्सता और दुर्गंधियों में मुझे जीवित रहना ही पड़ेगा। जीवित ही नहीं, मुक्त और स्वाधीन भी रहना होगा।’’

 

राजकमल चौधरी को यहां उद्धृत करने की जरूरत इसलिए महसूस हुई ताकि यह कहा जा सके कि कृ.क. की प्रत्येक प्रकाशित कृति कृ.क. का ‘मुक्तिप्रसंग’ ही प्रतीत होती है। उनकी प्रत्येक कृति उनकी पूर्व और आगामी कृतियों से मुक्त और स्वाधीन है। बहरहाल, लोक के अवलोकन और अर्थ के आरोह-अवरोह और मिजाजे-सुखन की अच्छी तरह शिनाख्त करने में व्यस्त उनकी आवारगी के नए-नए रंग एक के बाद एक हिंदी कविता संसार के मुंह पर खुलने लगे। उनकी कविता का वह बंद दरवाजा जिसे हिंदी साहित्य के समकालीन बौद्धिक वातावरण में कोई खटखटा नहीं रहा था, उन्होंने उसे खुद ही खोल दिया और बाद इसके इस वातावरण में बेचैनियां, सरगोशियां, गलतफहमियां फलने-फूलने-फैलने लगीं। बेइंसाफी के यथार्थ में कृ.क. बहुत बेपरवाह नजर आए और उनकी कविता पूर्व-अपूर्व कवियों के नक्षत्र-मंडल को तहस-नहस करने के इरादे से परंपरा में कुछ इस प्रकार धंसी कि सूक्ति, संदेश, अफवाह, अधूरा वाक्य, चेतावनी, धमकी, शास्त्र, इतिहास, कथा और नामालूम क्या-क्या हो गई :

 

विलग होते ही

बिखर जाएगी कलाकृति!

 

[ एक शराबी की सूक्तियां, 78 ]

नगर ढिंढोरा पीटता फिरता हूं हर राह

रोज रात को नौ बजे करता हूं आगाह

 

[ बाग़-ए-बेदिल, पृष्ठ-41 ]

 

कल्पितजी को हो गया काव्य-शास्त्र से प्यार

देखो क्या अंजाम हो भवसागर या पार!   

 

[ कविता-रहस्य, 24:6 ]

 

मैं अपने दोनों हाथ ऊपर उठाकर एक बार फिर कहता हूं :

यह महादेश चल नहीं सकता

 

[ हिंदनामा : एक महादेश का महाकाव्य, 52 ]

…यह कोई शिगूफा नहीं मेरा शिकस्ता दिल ही है जो इतिहास की अब तक की कारगुजारियों पर शर्मसार है जिसका हिंदी अर्थ लज्जित बताया गया है जिसके लिए मैं शर्मिंदा हूं और इसके लिए फिर लज्जित होता हूं कि मुझे अब तक क्यों नहीं पता था कि मांस के शोरबे को संस्कृत में यूष कहा जाता है शोरिश विप्लव होता है 1857 जैसा धूल उड़ाता हुआ एक कोलाहल और इस समय मैं जो उर्दू-हिंदी शब्दकोश पढ़ रहा हूं जिसके सारे शब्द कुचले और सताए हुए लोगों की तरह जीवित हैं…

 

[ रेख़ते के बीज : उर्दू-हिंदी शब्दकोश पर एक लंबा पर अधूरा वाक्य ]

कविता लिखना अपराध है

किसी खास मकसद के लिए किया गया जुर्म


कविता पुरस्कृत होने की कला नहीं सजायाफ्ता होने की छटपटाहट है

जो सभागारों में सिसक रहे हैं वे कवि नहीं हैं

कवि वे हैं जो रूमाल से अपना चेहरा छिपाए संसार से छुपते फिरते हैं


[ कविता के विरुद्ध ]

कृ.क. की कविता-सृष्टि से प्रस्तुत इन उद्धरणों के उजाले में यहां यह भी ध्यान देने योग्य है कि काव्य-स्फीतियों और विस्फोटों के आगे नतमस्तक हिं.सा. की मुख्यधारा की कविता में जिस वस्तु को कविता-संग्रह कहकर पुकारा जाता है, ऐसी एक भी वस्तु साल 1990 के बाद से कृ.क. की अब तक सामने नहीं आई है। लगभग तीन-साढ़े तीन दशक प्राचीन कृ.क. की कविता-सृष्टि में कविता-संग्रह इन पंक्तियों के लिखे जाने तक सिर्फ एक ही है— ‘बढ़ई का बेटा’। इस दरमियान उन्होंने अपनी विवादास्पदता के अंतरालों में ‘रेख़ते के बीज’, ‘साइकिल की कहानी’, ‘अकेला नहीं सोया’, ‘कविता के विरुद्ध’, ‘खाली पोस्टकार्ड’, ‘मीठा प्याज’, ‘वापस जाने वाली रेलगाड़ी’, ‘राख उड़ाने वाली दिशा में’, ‘वरिष्ठ कवियो’, ‘अपना नाप’, ‘पानी’, ‘एक कवि की आत्मकथा’, ‘नया बारामासा’, ‘एक अधूरा उपन्यास’, ‘अफीम का पानी’, ‘प्रसिद्ध’, ‘खून के धब्बे’, ‘नया प्रेम’, ‘चूका हुआ निशाना’ जैसी चर्चित पर असंकलित कविताएं लिखने के अलावा जो कुछ भी लिखा है — वह संग्रह के लिहाज से नहीं — किताब की तरह लिखा है। यह गौरतलब है कि कृ.क. की किताबें एक जिल्द में प्रकाशित होने से पूर्व ही प्रकाशित हो रहती हैं। उनकी कविताएं उनकी तरह ही बिखरी हुई हैं। वे उन सारी जगहों पर बिखर गई हैं, जहां वे प्रकाशित हो सकती हैं। एक विकास-क्रम में बिखरना और निखरना… कृ.क. की कविता-सृष्टि के दो संयुक्त-तत्व हैं। समय से और समकालीनता से सताए हुए कृ.क. इस लोक के तमाम स्मृत-विस्मृत कवियों के कुल के हैं। आवारापन में वह बुद्ध के कुल के हैं। फक्कड़पन में वह कबीर और मीरा के कुल हैं। संस्कृत में वह भर्तृहरि, बाणभट्ट और राजशेखर के कुल के हैं। उर्दू में वह मजाज़ और मंटो के कुल के हैं। हिंदी में वह निराला, उग्र, भुवनेश्वर और राजकमल चौधरी के कुल के हैं।

कृ.क. की कविता-सृष्टि का काव्य-पुरुष प्रचलन के विपर्यय में और प्रयोग के पक्ष में सतत सक्रिय, रचनात्मक, सांसारिक और विवादात्मक रहा है। उनके काव्य-पुरुष के इस संघर्ष को समझने के लिए ‘बाग़-ए-बेदिल’ की स्थापना बहुत काम आ सकती है। यह स्थापना उनके लेखे उनकी एक लिखी जा रही पुस्तक ‘आवारगी का काव्यशास्त्र’ का प्रथम अध्याय है। यह अध्याय एक रचयिता की आवारगी का अनूठा विश्लेषण है। राजशेखर की ‘काव्य-मीमांसा’ के एक श्लोक के आश्रय से यहां स्पष्ट होता है कि आवारगी से जांघें दृढ़ हो जाती हैं। आत्मा भी मजबूत और फलग्राही हो जाती है और उसके सारे पाप पथ पर ही थक कर नष्ट हो जाते हैं। दो हजार पन्नों की सामग्री को संपादित करने के बाद पांच सौ बारह पन्नों में समाए ‘बाग़-ए-बेदिल’ के जिल्दबंद होने से पहले इस किताब के कुछ और नाम भी थे — ‘समकालीन संदेश रासक’, ‘शैतान के श्लोक’ और ‘पार्थ और सार्त्र’ — लेकिन पक्की स्याही से छपने के बाद अब इसका सिर्फ एक नाम है— ‘बाग़-ए-बेदिल’। समकालीन हिं.सा. की व्यावहारिक राजनीति में एक अज्ञात-अनाम-अजनबी कवि की तरह व्यवहृत कृ.क. ने इस किताब को यह सोचकर शाया करवाया कि यूरोपीय, मुगल, गॉथिक और आधुनिक शिल्प की समकालीन हिंदी कविता की इमारतों के बीच, ‘बाग़-ए-बेदिल’ के ये खंडहर शायद बुरे नहीं लगेंगे :

‘कद्र जैसी मेरे शे’रों की अमीरों में हुई,

वैसी ही उनकी भी होगी मेरे दीवान के बीच!’

 

इसी तरह ‘बाग़-ए-बेदिल’ में भी आपको

नकली कवियों

मंदबुद्धि संपादकों

डॉनों

मठाधीशों

गॉडफादरों इत्यादि

कुलीन कातिलों का चेहरा दिखाई पड़ेगा पार्थ!

 

पढ़ते

सुनते

देखते रहिएगा—

 

कल्ब-ए-कबीर और कला कातिलों की जंग का

यह हैरतअंगेज जासूसी काव्य!

 

[ कला कातिल-2 ]

‘बाग़-ए-बेदिल’ हिंदी साहित्य के एक विशेष कालखंड का व्यंजनात्मक इतिहास है। विलुप्त काव्य-पंक्तियों, धुनों, लयों, छंदों का पुनर्वास करती हुई यह कृति एक वाचिक वैभव का लिखित पाठ है। आक्रामकता और आत्ममुग्धता से लबालब ‘बाग़-ए-बेदिल’ के बारे में समादृत कवि अरुण कमल का यह कथन उद्धृत करने योग्य है : ‘‘कौन-सा ऐसा समकालीन है जिसके तरकश में इतने छंद हैं, इतने पुष्प-बाण? आवाज और स्वर के इतने घुमाव, इतने घूर्ण, इतने भंवर, इतनी रंगभरी अनुकृतियां हैं। कई बार तो इनमें से कुछ पदों को पढ़कर मैं ढूंढ़ता हुआ क्षेमेंद्र या राजशेखर या मीर या शाद तक पहुंचा। ये कविताएं हमारे अपने ही पते हैं खोए हुए, उन घरों के पते, जहां हम पिछली सांसें छोड़ आए हैं। इन्हें पढ़कर लगता है कि हिंदी कवि के पास खुद अपनी कितनी बड़ी और चौड़े पाट वाली परंपरा है।’’

इस सबके बावजूद यह हाल है कि क्या कहा जाए… हिंदी संसार में यों लगता है जैसे शत्रुओं की तो छोड़िए कोई शुभचिंतक मित्र भी पूरा का पूरा कृ.क. का अपना नहीं। कृ.क. का जिक्र आने पर वे या तो चुप रहते हैं या आधे दिल से विहंस कर पैरवी करते हैं या बात बदलने का यत्न। एक अक्षय परंपरा में आवारा भटकने के लिए कृ.क. अकेले कर दिए गए हैं, लेकिन वह इस तरह के पहले और अकेले कवि नहीं हैं। उन जैसे कवियों को इसलिए एक और मन मिलता है— कभी न थकने वाला। मन जो हवाओं-सा तेज नहीं, लेकिन जानता है कि उसे उड़ना ही है— एक जारी कवि-समय में अपने काव्य-पथ और समानधर्माओं की तलाश में। मैं इस आलोचना को यहां खत्म नहीं कर रहा हूं, बस कुछ वक्त के लिए रोक रहा हूं, यह सोचकर :

समझदार था मूरख भी था

दीवाना भी वह किंचित था

 

अश्रु आंख में और हृदय में

युगों-युगों का दुख संचित था

उसकी कही हुई बातों में

आखर कम अरथ अमित था

 

जाने दो वह कवि कल्पित था!    

***

 

संदर्भ :

प्रस्तुत आलेख में कृष्ण कल्पित की अब तक प्रकाशित कविता और कविता से संबंधित छह किताबों — राजस्थान साहित्य अकादेमी से प्रकाशित ‘भीड़ से गुजरते हुए’ (1980), रचना प्रकाशन, जयपुर से प्रकाशित ‘बढ़ई का बेटा’ (1990), कलमकार प्रकाशन, जयपुर से प्रकाशित ‘कोई अछूता सबद’ (2003), अंतिका प्रकाशन, गाजियाबाद से प्रकाशित ‘बाग़-ए-बेदिल’ (2013), दखल प्रकाशन, दिल्ली से प्रकाशित ‘एक शराबी की सूक्तियां’ (2015) और बोधि प्रकाशन, जयपुर से प्रकाशित ‘कविता-रहस्य’ (2015) — को आधार बनाया गया है। इसके अतिरिक्त जिल्दबंद होने से पूर्व ही सोशल नेटवर्किंग साइट ‘फेसबुक’ पर स्वयं कवि के द्वारा ही प्रकाशित ‘हिंदनामा : एक महादेश का महाकाव्य’ को भी पाठ में लिया गया है। कवि की फेसबुक टाइमलाइन के साथ इंटरनेट की दुनिया में यत्र-तत्र बिखरी कविताओं को भी प्रयोग में लिया गया है। ‘जनसत्ता’, ‘संबोधन’, ‘जलसा’, ‘पाखी’ और ‘इंडिया टुडे साहित्य वार्षिकी’ जैसे पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित कवि के काम और कविताओं पर भी नजर मारी गई है और टेलीविजन और सिनेमा को केंद्र में रखकर लिखे गए लेखों-टिप्पणियों की कलमकार प्रकाशन, जयपुर से प्रकाशित किताब ‘छोटा परदा बड़ा परदा’ पर भी। निराला के लिए नागार्जुन द्वारा लिखी गई पंक्तियां यात्री प्रकाशन से प्रकाशित निराला पर केंद्रित नागार्जुन की किताब ‘एक व्यक्ति : एक युग’ (1992) के समर्पण-पृष्ठ से हैं। राजकमल चौधरी का कथ्य देवशंकर नवीन के संपादन में वाणी प्रकाशन से आए उनकी कविताओं के एक चयन ‘ऑडिट रिपोर्ट’ (2006) में शामिल लंबी कविता ‘मुक्तिप्रसंग’ से पहले दी गई टिप्पणी से लिया गया है। अरुण कमल को उद्धृत करने के लिए ‘बाग़-ए-बेदिल’ के आखिरी पन्ने को धैर्य से पढ़ा गया है। प्रस्तुत आलेख की शुरुआत और आखिरी अनुच्छेद पर विष्णु खरे की कविता ‘कूकर’ की छायाएं हैं, कहीं-कहीं इस कविता की कुछ पंक्तियां जस की तस, कहीं कुछ बदलकर ले ली गई हैं। इसके लिए विष्णु खरे के प्रति आलेखकार कृतज्ञ है।

***

साभार: पहल 110

 

आभासी पटल (सोशल साइट्स) के बाहर ‘कुंठित मन’ की ‘निर्लज्ज अभिव्यक्तियाँ’ कितनी अमानवीय होती हैं, वह जानी-पहचानी है. अविनाश के पास ‘कूटनीति’ की भाषा नहीं है, जिसका सबसे सजग इस्तेमाल आभासी लोक-वृत्त के दायरे में किया जाता है. जिस दिन उसके पास यह आ जायेगी, वह ख़त्म हो जाएगा.  यह आभासी-व्यवहार और कुछ नहीं, बल्कि हाल-चाल, दुआ-सलाम की भाषा को पाने का ही करतब है. यह भाषा आदमी को दलाल, अवसरवादी, व्यवसायी बना सकती है लेकिन रचनाकार नहीं. यह ‘सर्वधर्म-समभाव’ की सबसे उपजाऊ जमीन है. जहाँ भाषा गूगल-ट्रांसलेट हो जाती है. अविनाश से संपर्क -स्थापित हेतु  darasaldelhi@gmail.com का इस्तेमाल कर सकते हैं.

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शराबघर: कृष्‍ण कल्पित

तिरछिस्पेल्लिंग कविता-कहानियां या रचनात्मक गद्य प्रकाशित नहीं करता है और न ही कभी कुछ आमंत्रित करता है. लेकिन यहाँ कुछ कवितायें और एकाध कहानियाँ प्रकशित जरुर हुयी हैं. उनका प्रकाशन इस विशवास के साथ ही हुआ है कि वे एक एक्सक्लूसिव मिज़ाज का प्रतिनिधित्व करती हैं. कृष्ण कल्पित की यह कहानी ‘शराबघर’ इसी एक्सक्लूसिवनेस के कारण यहाँ दी जा रही है. कृष्ण कल्पित हिंदी पब्लिक स्फीयर के एक अनोखे रचनाकार हैं, जिनसे हम प्यार करते हैं, जिन्हें संजोना चाहते हैं. उनके अक्खड़पन का राज कहीं और है. वे हिंदी के एक रेयर आधुनिकतावादी (Modernist)लेखक हैं जिन्हें परंपरा के पगों का स्पर्श प्राप्त है. बाग़-ए-बेदिल, कविता रहस्य और उनकी कवितायें बाकी जो भी होंगी बाद में होंगी, सबसे पहले वे यह बताती हैं कि उनका कवि काव्य-परंपरा के भिन्न-भिन्न पड़ावों को चखने का आदि रहा है. कृष्ण कल्पित आचार्य कवि हैं. लेकिन यह कहना उनके कवि-व्यक्तित्व को कहीं से कम करना नहीं है. ‘शराबी की सूक्तियां’ इसीलिए उपर्युक्त सूचि से बचा ली गई थी. ‘शराबी की सूक्तियां’ का मूल्यांकन या आकलन अभी तक हिंदी समाज नहीं कर पाया है, जबकि यही समाज ‘मधुशाला’ की तुकबंदियों को हर बेतुके अवसरों पर दुहरा दिया करता है. ‘शराबी की सूक्तियां’ का महत्व अगर समझना हो तो थोड़ा-सा भारतीयेत्तर साहित्य की कुछ बानगियों को देखना पड़ेगा. यहाँ सिर्फ दो नाम लेकर आगे बढ़ जाउंगा, एक हैं पोलिश रचनाकार येजी पिल्ह, जिनकी पुस्तक ‘द माइटी एंजेल’ लोकप्रिय पोलिश पुस्तकों में शुमार है और जिस पर प्रसिद्द पोलिश फिल्मकार  वोइचेह स्मजोव्स्कि ने इसी नाम से फिल्म बनायी है; दूसरे हैं अतिलोकप्रिय अमेरिकन कवि/गद्यकार चार्ल्स बुकोव्स्की, जो आवारगी, शराब, अकथ की कथनी करने वाले के रूप में प्रसिद्ध हैं और इनके और इनकी रचनायों के ऊपर कम से कम चार-पांच फिल्में जरुर बन चुकी हैं. यह सब सिर्फ इसलिए कहा गया है कि शराबी की रचनात्मकता को शराब के बोतल का जिन्न मात्र न समझ लिया जाय और दुनिया में हिंदी के अलावा ऐसा बहुत कम जगह समझा गया है.

परम्परागत काव्य, काव्यशात्र और काव्य-परंपरा का धनी होना ही क्या कृष्ण कल्पित की प्रासंगिकता है? अगर इतना भर होता तो वे एक भाष्यकार मात्र बन कर रह जाते. कल्पित की प्रासंगिकता वहाँ है जब वे परंपरा प्रदत्त सूत्रों का प्रासंगिक भाष्य कर डालते हैं लेकिन उनकी इस प्रासंगिकता का सूत्र/सन्दर्भ क्या है? कभी एक बंगाली मित्र, जो कि दर्शन का शोधार्थी था, को शराबी की सूक्तियां सुनाई थी, उसने सुनकर जो पहली पंक्ति उचारी थी वह यह कि कवि मॉडर्निस्ट है. मैं भी यही सोचा करता था लेकिन कभी बोलने की हिम्मत नहीं हुयी थी. इस धारणा के प्रति अभी तक पूरी तरह से सहमत भी नहीं हुआ था. लेकिन जैसे ही उनकी कहानी ‘शराबघर’ पढ़ी, लोहा मान लिया. ‘शराबघर’ कहानी की चर्चा पहले क्यों नहीं हुयी या  क्यों नहीं सुनी इसका अंदाजा लगाना मुश्किल है. कल्पित बहुत ही सहज और प्रवाहपूर्ण गद्य के भी धनी हैं, यह अब तक अनछुआ था. कल्पित सार्त्र के इतने नजदीक सिर्फ ध्वनित नहीं होते हैं बल्कि रचनात्मक रूप से वहीं कहीं स्थित हैं, ‘शराबघर’ कहानी से इसकी तस्दीक की जा सकती है. ‘शराबघर’ की आत्मा हिंदी में किसी और के यहाँ अगर मिलती है तो वे हैं ज्ञानरंजन और उनकी कहानी ‘घंटा’.

कृष्ण कल्पित के ‘शराबघर’ को ‘विमर्श’ के दायरे की कहानी मानता हूँ, जिस पर चर्चा होनी चाहिए. इसी लिए हमने हिंदी के अप्रतिम गद्यकार अनिल यादव से आग्रह किया कि वे इसकी एक भूमिका लिखें. तिरछीस्पेल्लिंग कृष्ण कल्पित और अनिल यादव दोनों का आभारी है. @तिरछिस्पेल्लिंग

कंपनीराज की देन बार, क्लब और पब सदा की नकली जगहें हैं जहां ऐसे लोग बहुतायत में आते हैं जो जीने नहीं जीते दिखने को जिंदगी मानते हैं. इस नकल का नतीजा है कि वहां शराब पीकर की जाने वाली बातों से लेकर टॉयलेट में पेशाब की झार तक एक जैसी होती है. उनके मुकाबिल देसी के ठेके, हौलियां और कलारियां लगभग मायालोक हैं. अव्वल तो वहां देस दिखता है. मैने बहुत थोड़े वक्त के लिए ही सही ऐसे ठेके जिये हैं जहां कारोबार शुरू करने के पहले कालीमाई को माला और दारू चढ़ाई जाती है, बोतलों के बीच तार पर गंवई दुकानदार का लंगोट सूख रहा होता है, कोई बच्चा पढ़ रहा होता है और वह जस्ते की थाली में बेंट की जगह सुतली बंधे चाकू से हमाहमीं के साथ शराबियों से दुआ सलाम करता हुआ तरकारी काट रहा होता है. देस भी कुछ चीज नहीं, वहां न जाने कितनी सभ्यताओं के नुमाइंदों के रूप में साले-बहनोई, घीसू-माधव, मौलवी-शागिर्द, मौसिया, फूफू, भांजे, दूल्हा भाई, आशिक और माशूका के बाप एक साथ बैठे मिलते हैं. हरेक का अपना मौलिक लबोलहजा यहां तक कि सिसकारी और भींगी मूंछे निथारने की अदा होती है, उनके भीतर कोई पुरातन जगह होती है जहां से वे बोलते हैं, उस जगह को पहचानने की तमीज हो तभी पता चलता है कि वे किस इतिहास से हंकाले जाने के बाद यहां आन पहुंचे हैं. वहां शोर के रोएंदार सीने में एक इत्मीनान का बड़ा सा दायरा होता है जिसमें नई जिंदगी के खाके बनते हैं, जहां बरसों से कोई हर शाम दो कुल्हड़ रख के पीता है, कोई अपने आंसुओं और रातरानी की महक में नहाकर पवित्र लौटता है, कोई दोस्त को दो निवाले खिलाने के लिए कसमें देते हुए मां हुआ जाता है, कोई एक ही मुड़े तुड़े कागज को बरसों पढ़ता है, कोई ध्यानस्थ होकर दुनिया की सतह से बहुत ऊपर चला जाता है और नहीं लौटता. मुझे अपने दौर सबसे जहीन, प्रतिभाशाली लोग वहीं मिले हैं, हमेशा की तरह उनमें से ज्यादातर की अदा बरबाद होना थी और उन्हें इसकी खास फिक्र भी नहीं थी.

इसे शराब का कसीदा न समझा जाए लेकिन उसमें कुछ ऐसा होता जरूर है जो जिंदगी की आग को कुरेद देता है बशर्ते आपमें कभी जरा सी आग रही हो. इसे घटिया पियक्कड़ों की सताई औरतें नहीं समझेंगी, वे शरीफ लोग तो कतई नहीं जिन्होंने चखी नहीं लेकिन नैतिकता और पाखंड के नशे में धुत्त रहते हैं. कृष्ण कल्पित की इस कहानी में एक ऐसे ही शराबघर के सहन में डोलती उसकी आत्मा के पैरों की आवाज सुनाई पड़ती है. कोई दो राय नहीं कि शराबी की सुक्तियां उनकी कमाई चीज है. @अनिल यादव

Snap shot from O-Bi, O-Ba: The End of Civilization

Snap shot from O-Bi, O-Ba: The End of Civilization

By कृष्‍ण कल्पित

शराबघर

वह एक सस्‍ता शराबघर था. शहर के बीचों बीच – थोड़ा अंदर धंसकर. वहां देशी से लेकर विदेशी तक हर किस्‍म की शराब मिलती थी और कहा जाता था कि यह शराबघर चौबीसों घंटे खुला रहता है. य‍ह ठीक भी था, क्‍योंकि एक दिन सवेरे चार बजे तक पीते रहने के बाद हम वहीं ‘लुढ़क’ गए थे और आंख खुलने पर देखा कि शहर की नालियां साफ करने वाले सफाई मजदूर देसी शराब की गुटकियां ले रहे थे. सुबह के पांच साढे पांच बजे होंगे, जब बांसों पर लटकाई हुई झाड़ूओं से छनकर आती रोशनी हमारे चेहरों पर पड़ी.

शर्माजी अभी ‘जागे’ नहीं थे. मैंने उन्‍हें झिंझोड़कर उठाने की कोशिश की. वे हड़बड़ाकर उठे और जेब में पड़े चश्‍मे को टटोलने लगे. शराबघर की दीवार के परली तरफ वाले रास्‍ते पर सामाजिक कार्यकर्ताओं का एक जत्‍था ‘उठ जाग मुसाफिर भोर भई, अब रैन कहां जो सोबत है’ गाते हुए गुजर रहा था. इस गाने को सुनकर या जाने किसी और बात पर एक सफाई मजदूर बेतरह हंसने लगा. मैंने, चौंक कर उसकी तरफ देखा, उसने हमारी तरफ भरपूर नजरों से देखा और कहने लगा, ‘जागो, मालिक, अब तो जागो .’

मैं खिसिया दिया. शर्माजी ने सिगरेट सुलगाते हुए ‘मालिक’ शब्‍द का व्‍यंग्य मिश्रित उच्‍चारण किया और हंसने लगे. हम धीरे-धीरे ‘जाग’ रहे थे हालांकि रात को पी गई शराब का खुमार अब भी हमारी आंखों की जड़ों तक पहुंच रहा था.

हम शराबघर से बाहर निकल रहे थे और चुप थे. चलते हुए हमारी चुप्‍पी इतनी शांति प्रदायिनी थी कि बोलते हुए तकलीफ हो रही थी. वैसे भी पिछली रात हम इतना बोल चुके थे कि बड़ी आसानी से दो-तीन दिन चुप रह सकते थे. हम बहुत धीमे-धीमे चल रहे थे. थोड़ा दूर आकर, गली के नुक्‍कड़ के पास शर्माजी ने पूछा, ‘वह तो रात को ही चला गया होगा.’

‘’हां उसे घर पहुंचना जरूरी था. वैसे मेरे इस उत्‍तर की कोई खास जरूरत नहीं थी, क्‍योंकि शर्माजी को पता था कि वह रात को ही चला गया है. फिर भी यह निरर्थक बातचीत हमारे बीच संवाद का रास्‍ता खोल रही थी, जिसे मैं अभी जानबूझकर टाले रखना चाह रहा था.

हम साल भर से इस शराबघर में आ रहे थे. लेकिन सवेरे की रोशनी में यह परिचित रास्‍ता कुछ बदला हुआ सा लग रहा था. मैं धुंधली पड़ चुकी लंबी गुलाबी दीवार पर बने बुर्ज को देर तक देखता रहा. लाल भक्‍क सूरज को बुर्ज में उलझा हुआ देखकर मैं अभिभूत हो गया. कुछ-कुछ ऐसा लग रहा था जैसे इस धरती पर पहली बार सवेरा हुआ हो. ऐसा शायद इसलिए कि एक तो पिछले कई बरसों से सबेरे जल्‍दी उठने की आदत नहीं रही थी और दूसरे नशा अभी पूरी तरह उतरा नहीं था.’ ‘अद्भुत’ मैं मन ही मन बुदबुदाया और बाहर से साइकिल पर गुजर रहे हॉकर से पूछा, ‘क्‍या खबर हैॽ’ हॉकर ने एक बार मेरी तरफ देखा और बिना जवाब दिए पैंडल मारता आगे बढ़ गया.

शर्माजी मुझसे आगे चल रहे थे. मैं पीछे चल रहा था और प्रसन्‍न था. असल में प्रसन्‍नता हमारे शरीरों के अंदरूनी और निचले हिस्‍से में थोड़ी बहुत बची रह गई थी जो कभी-कभार अल्‍कोहल के धक्‍के से ऊपर आ जाती थी. हम नवाब तो थे नहीं, गरीब और मध्‍यवर्ग के लड़के थे, जो गांवों-कस्‍बों में अपने ढहते हुए घरों और दुखी माताओं को छोड़कर इस बड़े शहर में आये थे. एक दिन हमने सिर्फ जीते रहने की धुन पर थिरकने से इनकार कर दिया तो हमें खदेड़ा जाने लगा. इस तरह हमें समाज की ‘मुख्‍यधारा’ से बाहर कर दिया गया. तब हमारी आंखों में कुछ स्‍वप्‍न बचे हुए थे. हम सोचते थे कि हम एक दिन इस दुनिया को बदल देंगे. यह तो अब आकर पता चला कि हम समाज का कुछ भी नहीं हिला पाए. बल्कि हमारे ही हुलिए बदल गए. हम चाहते तो लौट भी सकते थे और अपनी मां की गोद में बैठकर सुबक सकते थे. लेकिन उससे क्‍या होता? न हममें लौटने की इच्‍छा बची थी न शक्ति. हमारे कुछ मित्र बीच से लौट भी गए थे, पर हम इस जोखिम भरे रास्‍ते पर बहुत आगे बढ़ आये थे, जहां रोमांच तो था ही कुछ ‘खोजने’ का आनंद भी था. लगता था जैसे हम कहीं पहुंच रहे थे. यह शायद हमारा भ्रम था. हम कहीं नहीं पहुंचते थे, सिर्फ हर शाम बिना नागा इस सस्‍ते शराब घर में पहुंच जाते थे.

यह शराबघर किसी बंदरगाह की तरह था, जहां हमें हार-थककर अपने अपने ‘बेड़े’ डालने थे. शराबघर क्‍या था, एक बहुत पुराना मकान था. दरवाजे के बाहर एक नीम का पेड़ था. अंदर आने पर एक चौक, दो-तीन कोठरियां, जो शराब रखने का गोदाम बन चुकी थीं और आंगन के बीचों बीच एक गहरा कुआं था, जिसमें बहुत नीचे जाकर पानी चमकता था. इस शराबघर का मालिक एक रिटायर्ड फौजी था, जो बिना लाइसेंस अपने बूते पर शराबघर को चलाता था. शराबबंदी के मुश्किल समय में भी इस बूढ़े फौजी ने शहर की इस ‘आखिरी रोशनी’ को बूझने नहीं दिया था. ऐसा लगता था जैसे इस बूढ़े फौजी के लिए यह शराबघर चलाना व्‍यापार कम और ‘मिशन’ अधिक हो. पूरे शहर में यह शराबघर फौजी के अड्डे के नाम से मशहूर था.

हम काफी भटक-भटका कर इस अड्डे तक पहुंचे थे. पहले-पहल शायद शर्माजी ही मुझे इस अड्डे तक लेकर आए थे. कोई सालेक भर पहले की बात होगी. मैं कॉफी हाउस के आखिरी कोने में बैठा बची हुई आखिरी अठन्‍नी उछाल रहा था और बीच-बीच में केबिन में बैठी उस लड़की की तरफ देख रहा था, जो अपने बगल में बैठे लड़के से अपने थके हुए शरीर को सटाए दे रही थी. इस चक्‍कर में अठन्‍नी बार-बार हथेली की बजाए टेबल पर गिर रही थी. तभी कॉफी हाउस का दरवाजा खोलकर सोम अंदर घुसा– उसने घुसते ही कोने में बैठ मुझे देख लिया था. वह सीधा मेरे पास आया. बीच में, और बाहर कई लोगों ने उसे ‘सोम सोम’ कहकर पुकारा, लेकिन उसने किसी की आवाज पर कान नहीं दिया. वह जब से शहर के एक प्रमुख अखबार का सिटी रिपोर्टर बना है, उसकी पूछ बढ़ गई है. इस बात को सोम जानता था, इसी से वह अभी तक बचा हुआ था. वह जानता था कि उसे कोई नहीं पूछता, सब साले उस अखबार के आगे पूंछ हिला रहे हैं जो सवेरे-सवेरे इस शहर पर कनात की तरह तन जाता है. सोम तो छह महीने पहले भी था, इसी शहर में, इसी कॉफी हाउस में, इसी नरक में. तब किसी चिड़िया के पूत ने नहीं पुकारा– ‘सोम –सोम’. आगे सोफे पर बैठा वह तुंदियल खादी का कुरता, सोम के सामने ही-ही करते जिसके दांत नहीं थकते, आज वही दार्शनिक भाव से चलकर आया था. यहीं कोने में. पिछली सर्दियों में. सोम सिगरेट खाली करके गांजे को हथेली पर रगड़ रहा था. खादी के कुरते ने टेलीविजन के उद्घोषक की तरह आते ही सोम से कहा था, ‘सोम, तुम धीरे-धीरे अपनी मृत्‍यु की तरफ बढ़ रहे हो… .

‘तुम कौन से तक्षशिला की ओर बढ़ रहे हो, कुत्‍ते. चले जाओं यहां से.’ ‘कुत्‍ता’ संबोधन सुनकर वह हक्‍का-बक्‍का रह गया था. चुपचाप वापस लौट गया था. कुत्‍ते, मच्‍छर, कीड़े आदि सोम के प्रिय सम्‍बोधन थे, जिन्‍हें वह किसी भी लाट-साहब के लिए कहीं भी काम में ले सकता था. इधर अखबार में काम करने के बाद वह ‘बास्‍टर्ड’ शब्‍द का इस्‍तेमाल ज्‍यादा करने लगा है.

वह आते ही मुझ से लगभग लिपट गया. मैंने महसूस किया उसके लिपटने में वही पुराने वाला ताप अभी है. बाहर से भले ही आदमी बदल जाए, भीतर से बदलने में समय लगता है.

‘आओे, प्‍यारे.’ सोम ने कहा. मैं उसके पीछे पीछे कॉफी हाउस के बाहर चला आया था.

बाहर सूरज ढल रहा था. ढलते सूरज की किरणें शहर की पुरानी इमारतों से टकराकर सोने की तरह चमक रही थी. वह मेरा प्रिय दृश्‍य था. मैं आंखों के ऊपर हथेली टिकाकर उस सोनिया धूप को आंखों में भरता रहा. सूरज ! अपनी सोनिया किरणों पर इतराओ मत, हमारे यहां की तो रेत भी सोना है. सूरज ने मेरी बात नहीं सुनी. मैंने सामने देखा, सोम निराश होकर लौट रहा था. उसने कहा, ‘आज पगार का दिन है, शहर की तमाम दुकानें बंद हैं और आजकल पुलिस कुछ ज्‍यादा ही ध्‍यान दे रही है… फिर भी रूको, मैं सोचता हूं– क्‍या किया जा सकता है.’

तभी सामने रेलिंग के पास से शर्माजी आते दिखे. शर्माजी हमारे बीच उस पुरोधा की तरह थे, जिन्हें सब संकटों का हल पता हो. शर्माजी हमसे उम्र में काफी बड़े थे और हमारे लिए घने छायादार पेड़ की तरह थे, जिसकी छांव में हम सुस्‍ताया करते थे. वे इस शहर से थोड़ा दूर एक कस्‍बे के कॉलेज में अंग्रेजी पढ़ाते थे. पिछले डेढ़ साल से इसी शहर में थे और विश्‍वविद्यालय में अंग्रेजी के ब्‍लैक लिटरेचर पर कोई शोध कर रहे थे. मेरी जानकारी में पिछले डेढ़ वर्ष से शर्माजी ने अपने शोध का एक पन्‍ना भी नहीं लिखा था. वे लिखने से परे थे. साहित्‍य से उनका गहरा लगाव था. पीने के बाद वे जब कोई ब्‍लैक कहानी या कविता सुनाते तो उनकी आंखे भीग जाती थी. थोड़ा ज्‍यादा पीने के बाद वे ब्‍लैक लिटरेचर भूल जाते और कबीर, तुलसी और मीरा की कविताएं सुनाते. कबीर का ‘कौन ठगवा नजरिया लूटल हो’ पद सुनाते हुए उनकी आंखों से जार-जार आंसू बहते थे. फिर किन्‍हीं अज्ञात लोगों को संबोधित करके वे कहते थे, ‘वे स्साले हंसते हैं कि मैं रोता हूं. रोना पाप है क्‍या, हां मैं रोता हूं … क्‍योंकि मेरी आंखों में आंसू है….’ ऐसे ही एक लंबे एकालाप के बाद उनका एक तकिया कलाम था, ‘जिनकी आंखों का पानी मर गया, वे क्‍या खाक लिक्‍खेंगेॽ’ इसके बाद एक सांस खींचकर एक लंबा मौन और फिर शर्माजी का हंसना. सीधे हृदय से निकली हुई हंसी.

उस दिन पहली बार शर्माजी मुझे और सोम को फौजी के अड्डे पर लाए थे. वह दिन और आज का दिन, शायद ही कोई दिन बीता हो जब हम इस अड्डे पर न आये हों. सोम जरूर बीच-बीच में गच्‍चा दे जाता था, लेकिन अब तक कॉफी हाउस के कई और लोगों को हमारे अड्डे का पता चल चुका था और वे सूंघते-सूंघते यहां तक आने लगे थे, जिनका उद्देश्‍य सिर्फ शराब पीना था, उनसे हम बचना चाहते थे और उनसे बचना मुश्किल था. वे दिन भर गिद्ध की तरह शहर पर मंडराते हैं और शाम होते ही किसी ठौर उतर लेते हैं. वे बुरे नहीं थे, लेकिन इतने भले थे कि हर समय उनके भीतर मनुष्‍यता फुफकारती रहती थी.

वहां इतने सारे लोगों को एक साथ बैठकर पीते हुए देखने से एक घटना प्रधान संसार के चलते रहने की अनुभूति होती थी. मजदूर, रिक्‍शा चलाने वाले, ठेले वाले, छोटे-मोटे व्‍यापारी, रंगरेज, अध्‍यापक, सिनेमा के पोस्‍टर बनाने वाले चित्रकार, मोची, बढ़ई और बहुत संभव है कि उठाइगीर, चोर, मवाली और हत्‍यारे भी इनमें हों. उस पुराने मकान के आंगन में जिसे जहां जगह मिली वहीं पर बैठकर पी रहे हैं. कोठरी के बाहर एक मरियल लट्टू जल रहा था और चांदनी रात का भूरा मैला आलोक उस शराब घर पर बरस रहा था. आधे-अधूरे अस्‍पष्‍ट शब्‍द, फुसफुसाती आवाजें, और बीच-बीच में फुसफुसाहट को बेधती हुई तीखी और कर्कश आवाजें. इससे पहले जीवन के इतने बीचों बीच बैठकर मैंने शराब नहीं पी थी. इतना सारा जीवन. मेरी आंखें आश्‍चर्य से फटी जा रही थी. उस दिन ही मैंने असलियत में जाना कि इस शहर में करने के लिए इतने सारे धंधे हैं और जीने के लिए इतनी सारी जगहें.

उस दिन जब हम उस शराबघर से बाहर निकले तो मेरी चाल में किसी सम्राट की सी लचक थी, आंखों में किसी संत की सी तरलता और हृदय में अथाह प्‍यार. बाहर आकर लगा यह शहर हमारे लिए ही जगमगा रहा है. दूर पहाड़ी पर बने किले की रोशनियां खास हमारे लिए हैं. उस दिन बरसों बाद मैंने एक पुरानी फिल्‍म का गाना पूरा गाया.

असल में पिछले एक अरसे से हम थोड़े से लोगों की संगत में सड़ रहे थे. विश्‍वविद्यालय और कॉफी हाउस. हमारे पास सिर्फ ये दो जगहें बची थीं. थोड़े से अध्‍यापक, शोध-छात्र, पत्रकार और कॉफी हाउस के वही चिर-परिचित पुराने चेहरे. कोई ऐसा कोण नहीं बचा था, जिधर से हमने इन चेहरों को नहीं पहचाना हो. वे सब इतने जाने-पहचाने चेहरे थे कि पूरी तरह बेजान थे. निराशा हमारे शरीर में धंसने लगी थी और अब हमारा स्थाई भाव बन चुका था. एक चिड़चिड़ापन चेहरे पर हर समय चिपका रहता था. सफलता हमें डराने लगी थी और विफलता भीतर ही भीतर कुतर रही थी. हम न रोजों में रोने लायक बचे थे न गीतों में गाने लायक.

मुझे एमए किए तीन बरस बीत चुके थे. पिछले तीन बरसों से मैं अवैध रूप से विश्‍वविद्यालय के होस्‍टल में रह रहा था. अभी कुछ दिन हुए एक दिन जब मैं देर रात को हॉस्‍टल पहुंचा तो देखा मेरा सामान, किताबें और बिस्‍तर कमरे के बाहर फेंक दिये गए हैं और कमरे पर हॉस्‍टल का एक मोटा ताला लटक रहा है. रात मैं वहीं बरामदे में पड़ी एक टूटी खाट पर सोया था सवेरे एक रिक्‍शे पर अपना सामान लादकर सीधा शर्माजी के कमरे पर पहुंच गया. शर्माजी ने मेरा बिस्‍तर अपने कमरे के एक कोने में बिछा दिया. तब से मैं शर्माजी के कमरे में ही रह रहा था. इन दिनों मैं घोर निराशा में डूबा हुआ था. कोई भी रास्‍ता नहीं दिखलाई पड़ रहा था. मैं जीवन से पूरी तरह खाली हो चुका था.

शर्माजी ने मुझे आश्रय दिया, सहारा दिया, दिलासा भी दी. लेकिन मेरे मन पर पड़ा हुआ निराशा का भारी पत्‍थर हट नहीं रहा था.

उन दिनों मृत्‍यु को लेकर बहुत सारी कविताएं भी मैंने लिखीं. यह साल सवा साल पहले की बात है. शर्माजी सवेरे निकल जाते थे और मैं सारा दिन कमरे में अकेला पड़ा हुआ मृत्‍यु चिंतन में लीन रहता. शराब पीने के बाद मरने की इच्‍छा अधिक प्रबल हो उठती थी. एक दिन मैंने अपनी मृत्‍यु संबंधी सारी कविताओं को एक डायरी में उतारा और डायरी के पहले पृ्ष्‍ठ पर लिखा– ‘मैं मरना चाहता हूं.’ इसके बाद मैंने लिखा– ‘अब मुझसे जीने के लिए कहना किसी सम्राट से मूंगफली बेचने के लिए कहना है.’ यह एक जापानी उपन्‍यासकार के पत्र का अंश था, जो उसने आत्‍महत्‍या करने से पहले अपनी बहन को लिखा था. मैंने इसके नीचे अपने हस्‍ताक्षर किए और डायरी सिरहाने रखकर सो गया .

दूसरे दिन आंख खुलने पर जब मैंने इस डायरी को पढ़ा तो बड़ा अटपटा सा लगा. फिर मुझे हंसी आ गई. बाहर दरवाजे पर दूध वाला घंटी बजा रहा था. हॉकर ने नीचे से अखबार फेंका जो मेरे सर से आकर टकराया. मैंने अपनी उस डायरी को कमरे के ऊपरी कोने में बनी ताख पर फेंक दिया और खिड़की के पास आया. बाहर रास्‍ते में एक दस बारह साल का चरवाहा हाथ में एक बेंत लेकर बकरियों के रेवड़ को हांकता हुआ पहाडि़यों की तरफ ले जा रहा था. शर्माजी अभी सोए हुए थे. मैं जल्‍दी-जल्‍दी तैयार हुआ और बाहर निकल आया. यह उसी दिन की बात है, जब मैं कॉफी हाउस से उठन्‍नी उछाल रहा था और जिस दिन पहली बार उस सस्‍ते शराबघर में गया था. उसी दिन वहां से बाहर निकलकर मैंने कहा था, ‘मैं अभी जीना चाहता हूं.’

मैं तेज तेज कदमों से चलकर शर्माजी के पास तक आ गया. हम एक चाय की थड़ी पर बाहर पड़े मूढ़ों पर बैठ गए. शर्माजी ने पूछा, ‘रात को बाबू खां पेंटर तुमसे क्‍या कह रहा था?

‘बाबू खां ने मुझे काम के लिए बुलाया है. उसने कहा है कि मैं उसके होर्डिंग रंग दिया करूं.’ मैंने कहा .

शर्माजी यह तो जानते ही थे कि मैं पिछले छह महीने से जिस प्रेस में जाकर प्रुफ पढ़ता हूं, वह काम मुझे रामदयाल फोरमेन ने दिलवाया था. रामदयाल से भी मेरी मुलाकात यहीं हुई थी. शर्माजी यह भी जानते थे कि आजकल सफेद बालों वाला बूढ़ा शराबी घर से हर रोज टिफिन लाता है और मुझे कॉफी हाउस में प्रेस में ढूंढता रहता है और धमकाकर पूछता है, ‘खाना खाया या नहीं?’

और तुम उस बढ़ई से क्‍या पूछ रहे थे ॽ’ शर्माजी रात को सचमुच ज्‍यादा पी गए थे और उन्‍हें रात की कोई बात याद नहीं.

मैं उससे पूछ रहा था कि एक डबल बेड का क्‍या खर्चा बैठता है?’ मैंने उत्‍तर दिया.

शर्माजी एक रहस्‍यभरी दृष्टि से मेरी तरफ देखकर चाय की चुस्कियां लेने लगे. मैंने सामने देखा, सफाई मजदूर अपने कंधों पर बांसझाड़ू लटकाए शहर की तरफ बढ़ रहे थे. वे अब शहर की गंदगी साफ करेंगे. देशी दारू का एक तेज भभका हवा में तैर गया.

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कृष्ण कल्पित. यह तब के आस-पास की ही तस्वीर है जब उन्होंने यह कहानी लिखी होगी. उनसे मोबाइल-9968312514 और ईमेल- krishnakalpit@gmail.com पर संपर्क संभव है.

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