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नींबू पानी पैसा : शंकर हल्दर

यह स्तम्भ  (घुसपैठिये)दिल्ली और आसपास की कामगार बस्तियों के तरुण-युवा लेखकों की प्रतिनिधि रचनाएं आप तक पहुंचाएगा. ये लेखक और इनका लेखन बने-बनाए खांचों में नहीं समाते. ‘घुसपैठिये’ स्तम्भ के लेखक अभी-अभी जवान हुए हैं या हो रहे हैं. एकाध को छोड़कर इसके सभी संभावित लेखकों की उम्र २0 वर्ष के अंदर ही है। लेकिन इन सब में कुछ सामान्य विशेषताएँ भी हैं. सभी की आर्थिक-सामाजिक पृष्ठभूमि लगभग समान हैं। इससे भी बड़ी विशेषता यह है कि इनके लिए बचपन की किताबें कागजों से उतनी नहीं बनती हैं जितनी उनके संघर्ष, मोहल्लों, माहौल और जगह से बनती हैं. उनकी लिखाई में वे जगहें आपको सुरक्षित मिलेंगी। आप शायद महसूस करें कि साहित्य के उत्पादक और उपभोक्ता, अभिलेखन/रिकाॅर्डिंग और सृजन, कि़स्सा और तथ्य के बीच के अंतर यहाँ धुंधले पड़ जाते हैं साहित्य के सुरक्षित-आरक्षित डिब्बे में घुस आये इन घुसपैठियों को आप कैसे बरतेंगे, यह आप ही को तय करना है.

बाल दिवस के अवसर पर प्रस्तुत  हैं, शंकर हल्दर की कहानी ‘नींबू पानी पैसा’.

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नींबू पानी पैसा

 BY शंकर हल्दर  

पाँच साल हो गए पर कर्ज अभी तक दूर नहीं हुआ, राम चाचा की यह चिंता हर रोज़ उनकी लुंगी उतार देती है। इसी चिंता के साथ एक दिन वे मंदिर जाते हैं और भगवान से बोलते हैं, ‘हे भगवान तू मेरा कर्जा दूर कर दे मैं तेरे को एक नहीं एक हजार नारियल चढ़ाऊँगा; पर तेरे मंदिर में तो इतनी जगह ही नहीं! इसलिए मैं आपको नींबू-पानी चढ़ाऊंगा। गंगाजल या नारियल तो सभी चढ़ाते ही हैं।’

भगवान चिल्ला कर बोले, ‘चुप हो जा मानव! सब हमारी पूजा करते हैं, हमे प्यार करते हैं, गंगाजल चढ़ाते हैं और तू नींबू-पानी चढ़ाएगा? हम तुझे श्राप दे देंगे!’ ‘अरे नहीं भगवान नहीं, मेरे पास पहले से ही बहुत साँप है कल ही मुझे एक अनाकोंडा ने काट लिया था।’ ‘अरे बुद्धू, मैं श्राप बोल रहा हूँ श्राप, कभी लंबा न हो पाओ वैसा वाला श्राप दे देंगे।’ भगवान फिर से चिल्लाये।

राम चाचा बोले, ‘भगवान ये कौन-सा साँप हैं? कोई नयी कंपनी का साँप है क्या?’ ‘अरे मूर्ख, श्राप, श्राप.. जो एक ऋषि ने हनुमान को दिया था।’ ‘अरे नहीं, भगवान मुझे वह वाला श्राप नहीं देना, आप जो कहोगे मैं वही करूंगा।’ ‘पहले वादा कर! तू कभी भी हम पर नींबू-पानी नहीं चढ़ाएगा।’ भगवान बोले।

राम चाचा भगवान को टोक कर फिर से बोले, ‘नींबू-पानी की जगह क्या चढाऊं?’ ‘अब तू हमें गंगाजल चढ़ाएगा और नारियल की जगह कहीं नारियल का छिलका मत चढ़ा दियो, वरना हम तुझे श्राप दे देंगे। अब बोल, तेरी इच्छा क्या है?’ ‘भगवान मुझ पर बहुत कर्ज़ है।’ भगवान बीच में ही टोक कर बोले, ‘अरे तू खुद ही दुनिया पर कर्ज़ है, तेरे पे क्या कर्ज़ होगा? चल बोल।’ राम चाचा ने वही बात फिर से दोहरायी, ‘भगवान मुझ पर बहुत कर्ज़ है, इसलिए मुझे पैसे चाहिए। आप हमारी कॉलोनी में एक दिन के लिए पैसों की बारिश करवा दो।’

भगवान ने राम चाचा की यह इच्छा पूरी कर दी। घर के बाहर से अचानक आवाज़ आई, ‘राम चाचा बाहर आ कर देखो, पैसो की बारिश हो रही है।’  बाहर सच में पैसो की बारिश हो रही है। उनकी खुशी का ठिकाना नहीं रहा। वे सबके साथ गरबा डांस करने लगते हैं पर डांस करते-करते उनकी लुंगी फट जाती है। छत पर एक झण्डा लगा था। वे उसी झंडे को लुंगी बना लेते हैं।

राम चाचा नीचे आकर पैसे लपेटने लगे तभी एक अम्मा बोली, ‘अरे राम, लुंगी की जगह यह झण्डा क्यों पहन लिया? देश भक्त बन रहे हो क्या?’ तभी एक बुढ़िया बोली, ‘अरे छोड़, जो कभी राम भक्त नहीं बना वह देश भक्त कैसे बनेगा? बॉर्डर पर जाते ही इसके पैर कांपने लगेंगे। आज से इसे हम राम की जगह इंडियन लुंगी मैन बुलाएँगे।’ ‘अरे बुढ़िया चुप, ज्यादा बचर-बचर नहीं करो, वर्ना हम सब कुछ भुला कर कोई क्राइम कर देंगे। और अम्मा, तुम एक दिन की मेहमान हो इसीलिए अपना एक दिन तो सही से गुजारो; वरना हम अभी ही तेरा स्वर्गवास करा देते हैं। पैसों की इतनी अच्छी बारिश करवायी है, लूटना है तो पैसा लूटो ना, हमारी इज्जत काहे लूटती हो? अगर फिर से बचर-बचर की तो सड़े हुए टमाटर की चटनी में तुम दोनों को फ़ेक देंगे।’

कॉलोनी के सभी लोग पैसे लूट रहे थे। बाल्टी में, बर्तन में, चादर में। अपनी कागज की बोरी लिए राम चाचा भी आ गए और उसमें पैसे इकट्ठे करने लगे। वे पैसे इकट्ठे करते-करते थक गए। उन्होंने देखा कि हरीलाल की पोटली पैसों से भर गयी है। राम चाचा हरीलाल से बोले कि ‘अरे हरीलाल, जल्दी जा कर देख! तेरी बीबी चने का आटा खा कर मर गयी है।’  ‘मेरी बीबी चने का आटा खाकर कैसे मर सकती है?’ हरी लाल ने पूछा। ‘अरे धरती पर बोझ बनी तेरी बीवी ने उस चने का आटा खा लिया था जिसमें चूहे ने मूत रखा था और उस चूहे को डायबिटिज थी।’ हरीलाल पैसों की अपनी पोटली छोड़ सांढ़ की तरह घर की ओर भागा। घर जाकर देखता है तो उसकी बीवी छुपम-छुपाई की खेल रही है। हरीलाल को राम चाचा पर बहुत गुस्सा आया।

हरीलाल राम चाचा के पास भागता है पर हरी लाल का रास्ता काटने के बजाय एक काली बिल्ली हरीलाल को ही काट लेती है। तब तक राम चाचा पैसों की पोटली ले कर नौ-दो-ग्यारह हो चुके होते हैं।

राम चाचा चौक पर जाते हैं। वहां उन्हे गज़ब का नज़ारा दिखता है। चौक पर बस भीड़ ही भीड़ है। लोग पैसों के लिए लोग लड़-झगड़ रहे हैं। लोग जानवरों की तरह पैसे लूट रहे थे, सारी गाड़ियां जाम हो गयी थीं। बस वाला ड्राईवर तो पागल ही हो गया था, उसने अपनी कमीज खोल कर उसमें पैसे इकट्ठे करने लगा।

एक पेड़ पर हजार-हजार के दो नोट लटके हुए हैं और रुपयो को लेने के लिए एक आदमी पेड़ चढ़ता है लेकिन दूसरा आदमी उसकी पैंट खींच कर नीचे गिरा देता है। एक टीन वाले घर के ऊपर हजार का एक नोट है। एक हाथी जैसा आदमी उस छत चढ़ता है। उसका पैर फिसल जाता है और उसके गले की हड्डी टूट जाती है।

मीडिया भी आ जाती है। मीडिया की लड़की कैमरे में बोलने लगी, ‘आप देख सकते हैं इधर का नज़ारा, बस इसी कॉलोनी में पैसों की बारिश हो रही है और इन पैसों को लूटने के लिए लोग पागल हुए जा रहे हैं। क्या यह सच  है या एक चमत्कार? वह लड़की एक आदमी से पूछती है, ‘ये पैसे लुटते हुए आपको कैसा महसूस हो रहा है? पैसों की यह बारिश कैसे हो रही है?’

राम चाचा अपने दोस्त तिहाई लाल के साथ खड़े यह सब देख रहे थे, ‘टीवी पर मुझे जाना चाहिए था लेकिन यह मुच्छड़ बोल रहा है। मेहनत करें हम और अंडा खाए फकीर।… अरे तिहाई लाल, तू पैसे नहीं लूट रहा है।’ तिहाई लाल बोला, ‘ओये तू पैसे लूटने की बात कर रहा है? वहाँ मेरे बीबी बिजली के खंबे की तार से फेवीकोल की तरह चिपकी पड़ी है और स्पाइडर मैन की तरह जाल बुन कर पैसे लूट रही है और किसी को भी खंभे पर चढ़ने नहीं दे रही है।’

‘कैसे? बिजली के खंभे पर कैसे किसी को चढ़ने नहीं दे रही है? राम चाचा पूछे। ‘अरे जिस मोजे को मैंने चार साल से नहीं धोया, उसी मोजे को मेरी बीबी ने कमर में बाँध रखा है।’ ‘लगता है तेरी बीबी आज स्पाइडर मैन का रिकार्ड तोड़ देगी!’ ‘अरे, स्पाइडर मैन का रिकार्ड बना ही कब था? जो मेरी बीबी उसे तोड़ देगी? तिहाई लाल बोला। ‘अरे तूने ‘स्पायडर मैन टू’ नहीं देखी क्या? आखिरी सीन में जब वह ट्रेन रोकता है तो उसकी चड्डी खुल जाती है।’ ‘तो इसमें रिकार्ड क्या है?’ तिहाई लाल ने आश्चर्य व्यक्त किया। ‘रिकार्ड है, स्पाइडर मैन ने चड्डी खोलने का रिकार्ड बनाया है।’ ‘चल ये सब छोड़, क्या तू जानता है कि मेरी छत इतनी बड़ी है कि उस पर पैसों का हिमालय पर्वत बन चुका है। मुझे तो नेशनल बैंक का एवार्ड मिलना चाहिए। लेकिन तुम तो लोगों के पैसों की पोटलियाँ चुरा रहा है? क्या मैंने तुझे इसी दिन के लिए पाला था? तिहाई लाल बोला ने ताना मारा।

‘अरे तूने मुझे कहाँ पाला है? मुझे तो अमेरिकन कुत्ते ने पाला था और उस एहसान का कर्ज मैं अभी तलक चुका रहा हूँ।’ तिहाई लाल ने पूछा, ‘कैसे?’ ‘अरे क्या तुझे याद नहीं जब तेरे अमेरिकन कुत्ते की नई-नई शादी हुई थी तो वह मेरी लूँगी चुरा कर भाग गया था। बदले में मैंने उसकी बीबी की पाँच रूपये वाली साड़ी फाड़ दी थी, बाद मे पता चला कि वह पाँच रुपये की नहीं पाँच हजार की थी। उस साड़ी का कर्ज मैं अभी तक चुका रहा हूँ।’

तिहाई लाल बोला, ‘माफ करना मैंने तेरे लाल जख्म को फिर से हरा कर दिया। चल यह सब छोड़, पैसे की बारिश की खुशी में आज मैंने एक शानदार पार्टी रखी है। तू जरूर अईयो। डिनर में बम के पकौड़े, सीमेंट की दाल और मिर्च के रसगुल्ले हैं।’ राम चाचा बोले, ‘ठीक है। मैं जरूर आऊँगा।

राम चाचा के पास पैसों की तीन पोटलियाँ जमा हो गई थी। जमीन पर सिर्फ सिक्के पड़े थे। नोट का नामोनिशान नहीं था। मंदिर के छत के ऊपर हजार-हजार के बहुत सारे नोट गिरे थे। राम चाचा मंदिर की छत पर चढ़ गए और जैसे ही नोट उठाया, भगवान की आवाज आई, ‘अबे मानव रुक जा, भगवान का पैसा चुराता है? तूझे श्राप दे दूँगा!’ राम चाचा बोले, ‘आप भी न भगवान… कितनी बार बोलूं कि मेरे पास पहले से ही बहुत साँप हैं, कल ही मुझे एक अजगर ने काट लिया था।’ भगवान बोले, ‘पर मानव, तूने तो मुझे बोला था कि एनाकोंडा ने काटा है।’ ‘हाँ एनाकोंडा ही था, बस उसका सर नेम अजगर था। मेरी चेककप रिपोर्ट में लिखा था।’ ‘ठीक है ठीक है। पर मंदिर से पैसा मत चुरा वरना तूझे श्राप दे देंगे।’ राम चाचा अब चिल्ला कर बोले, ‘भगवान, समझते नहीं हो और जज्बाती हो जाते हो। सुबह-शाम उतारता हूँ आरती, फिर बोलते हो, अच्छी नहीं है अगरबत्ती।’

भगवान बोले, ‘अरे दुनिया के आठवें अजूबे, तूझसे तो बोलना ही बेकार है। पर अगर तूने मंदिर से पैसा उठाया तो हम तुझे दण्ड देंगे।’ ‘तो फिर मैं पैसे कहाँ से लूँ? जमीन पर सिर्फ सिक्के पड़े हैं। अपनी शादी में क्या मैं सिक्के इस्तेमाल करूंगा? पंडित दक्षिणा माँगेगा तो क्या मै पंडित को दक्षिण अमेरिका भेज दूँगा?’ राम चाचा एक सांस में भी बोल गए। भगवान बोले, ‘पर तेरी तो शादी हो चुकी थी न? और तेरी बीबी मर भी गई है!’ ‘वह मेरे बीबी ही थी, एक दिन ढोकला खा ली और मर गई।’ ‘कैसे?’ ‘अरे उस ढोकले को बिल्ली ने आँख मारी थी।’ ‘और वह दूसरी कौन है? जो नर्क में सजा काट रही है।’

राम चाचा बोले, ‘वह मेरी दूसरी बीबी है, उसे मच्छरों से नफरत होने लगी थी। एक दिन एक मच्छर उसके मुंह में सुसु करके भाग गया, उसे मलेरिया हो गया और वह भी गुजर गई।’ भगवान बोले, ‘पापी, तू उसका श्राद्ध करने के बजाय यहाँ पैसों की बारिश में नाच रहा है। मैं अभी बारिश बंद कर देता हूँ।’

 ‘भगवान, नहीं-नहीं, पैसो की बारिश बंद मत करो। मैं उन दोनों का श्राद्ध कर दूँगा।’ यह कह वे घर की ओर चल पड़े, रास्ते में जहाँ पर भी पैसे दिखते जेबों में भर लेते। तभी उन्हें बहुत ज़ोर की बाथरूम लग जाती है। भागते हुए घर जाते हैं। पर घर के सामने हरीलाल खड़ा रहता है। ‘तुम्हारी इतनी हिम्मत कि मुझसे झूठ बोलो? अब तो मैं तुम्हें छोडूंगा नहीं।’ राम चाचा बोले, ‘पहले पकड़ तो सही!’ ‘क्या कहा?’ ‘अरे हरी लाल, भड़क मत, अपनी पोटली ले और मुझे जाने दे!’ लेकिन हरीलाल ने राम चाचा की हड्डी-पसली तोड़ डाली और राम चाचा की पोटली भी छीन लिया।

राम चाचा को काफी चोट आई। इंडियन लूँगी फट कर सिर्फ लंगोटी रह गई। बिना कपड़ों के उन्हें कुछ भी अच्छा नही लग रहा था। इसलिए अपनी दादी का घाघरा-चोली पहन लिए। बाथरूम गए तो देखा कि वहाँ पर 500 का नोट पड़ा है। लैट्रिन में हाथ डालकर कर पैसा उठा लिया। जैसे ही घर से बाहर निकले तो सभी लोग हंसने लगे। ‘यह क्या? घाघरा-चोली क्यों पहन रखा है? चाची की याद आ गई क्या?’ लोगों की बातें राम चाचा को मिर्ची की तरह लगी। बीबी के बक्से में रखी साड़ी पहन कर फिर से बाहर आ गए। अब वे साड़ी के आँचल में पैसे बटोरने लगे।

राम चाचा की गली मे ही चिंटूलाल, पिंटूलाल मिले। चिंटूलाल बोला, ‘अरे राम चाची झाड़ू लगा रही हो क्या?’ ‘मैं चाची नहीं, चाचा हूँ।’ ‘तो चाची की साड़ी क्यों पहन रखी है?’ ‘यह तो 3015 का फैशन है, तुम क्या जानो इस फैशन को।’

तभी गली के सारे लोग भागते हुए दिखे तो राम चाचा ने पूछा, ‘चिंटूलाल, ये सब भाग क्यों रहे हैं?’ ‘उधर रंगीला पागल होकर टीवी टावर पर चढ़ गया है।’ सभी लोग रंगीला को देखने चले गए। इतने में रानी मौसी गली से आती हुई दिखाई दी, जिसके कंधे में पैसे से भरी थैली लटक रही थी। यह देख राम चाचा का मन ललच गया। वे उसकी थैली छीनने लगे। रानी मौसी चिलल्लाने लगी, ‘बचाओ-बचाओ….।’ पर लोग तो रंगीला को देखने गए थे। रानी मौसी कहने लगी, ‘अरे राम हमें मत छेड़ो वरना हम अपनी बड़ी बहन से शिकायत कर देंगे। वह पीट-पीट कर करेली की चटनी बना देगी।’ ‘हाँ हाँ, वह तो जापान से जूडो कराटे सीख कर आई है ना, मैं तो सिर्फ आपका हालचाल पूछ रहा हूँ। आपके बच्चे ठीक ठाक हैं न? आप तो यूंही भड़क गयी। अरे, आप तो बहुत अच्छा गाना गाती हैं।’ ‘तुम्हें गाने की पड़ी है, वहाँ रंगीला टावर पर चढ़ कर मरने वाला है।’ ‘अरे वह तो हर दूसरे दिन मरने का बहाना करता रहता है। आज ज्यादा पी लिया होगा।’ अपनी थैली से पैसे निकालते हुए रानी मौसी बोली, ‘पैसा लोगे क्या?’ राम चाचा अपनी साड़ी के पल्लू को फैलाते हुए बोले, ‘देख, मैंने भी पैसे लूटे हैं।’

रानी मौसी चली जाती है, राम चाचा सोचते हैं कि चलो, बहुत पैसे जमा हो गए, अब घर चलते हैं। राम चाचा रात भर खूब सोचते हैं। अब तो मेरे पास पैसों की बहुत सारे पोटलियाँ हो गई हैं, आधे पैसों से अपनी पत्नियों का श्राद्ध करूंगा और आधे से अपना कर्जा दूँगा। बाकी पैसे से मैं एक अच्छी लूँगी सिलवाऊंगा। यही सब सोचते हुए राम चाचा सो गए।

अगली सुबह राम चाचा उठते ही पहले मंदिर जाते हैं। राम चाचा मंदिर पहुँचते ही भगवान प्रकट होकर बोले, ‘अरे मूर्ख मानव, पुरुष होकर नारियों का वस्त्र पहनता है। घर जा, पहले ढंग के वस्त्र पहन कर आ।’ राम चाचा भागते हुए घर आए और इंडियन लूँगी खोजने लगे। राम चाचा ने अपनी फटी हुई इंडियन लूँगी को ही पहन लिया और सोचने लगे कि भगवान पर कुछ चढ़ाना भी तो होगा। चलो नींबू-पानी ले लेता हूँ। अपनी फटी हुई इंडियन लूँगी पहन और हाथ में नींबू-पानी का ग्लास ले मंदिर की ओर चल पड़े। राम चाचा ने जैसे ही शिवलिंग पर नींबू-पानी चढ़ाया तभी भगवान प्रकट होकर बोले, ‘मानव तेरा यह दु:साहस? कल ही तुझे चेतावनी दी थी कि मुझे नींबू-पानी पसंद नहीं है, उसके बावजूद तू नींबू-पानी लाया है।’

राम चाचा बोले, ‘अरे भगवान, मेरी पड़ोसन गंगा का मोटर खराब हो गया है इसलिए उसने जल नहीं दिया और इस नींबू-पानी मे मैंने घी और शक्कर डाला है, बहुत अच्छा है, पीकर तो देखो।’ भगवान बोले, ‘अरे मानव हम नदी वाले गंगाजल की बात कर रहे हैं। तेरी गंगा की नहीं, अपनी गंगा की। जा मानव, हम तूझे श्राप देते हैं कि कल पैसों की जो बारिश हुयी है, वे सारे पैसे गायब हो जाएंगे।’

सुनते ही राम चाचा की लूँगी ऊतर गई और हाथ से नींबू-पानी का ग्लास छूट गया। वे घर की तरफ भागे। घर जाकर देखे तो पोटलियाँ पड़ी थीं लेकिन पैसे गायब थे। फिर अपनी पड़ोस वाली गंगा से पूछा, ‘अरे गंगा, कल तूने जो पैसे लूटे थे वे पैसे कहा हैं? गंगा ने कहा, ‘अंदर पोटली में। ‘तो जाओ अंदर, देखो पैसे हैं या मेरी तरह ही गायब तो नहीं हो गये हैं?’ गंगा ने अंदर जाकर देखा कि पोटली खुली पड़ी थी और सारे पैसे गायब थे। गंगा शोर मचाते हुए बाहर आकर बोली, ‘मेरे भी सारे पैसे गायब हैं।’

राम चाचा ने देखा कि तिहाई लाल भागते हुए आ रहा है, पास आकर हाँफते हुए बोला, ‘पता है, मेरे पैसों का हिमालय पर्वत गायब हो गया है। अब मुझे नेशनल बैंक का एवार्ड नहीं मिलेगा।’ इतने में अम्मा फूट-फूट कर रोते हुए आई। राम चाचा ने पूछा, ‘अब क्यों रो रही हो?’ अम्मा बोली, ‘कल हमरा बेटवा नाले मे छलांग मार-मार कर जो पैसे लूटे थे वे सब गायब हो गये हैं।

सभी के पैसे गायब हो गए थे। राम चाचा यही सोच रहे थे कि अब तो मेरा कर्ज भी दूर नही हो पाएगा। मेरी बीबी उधर श्राद्ध के लिए तड़पती रहेगी और इधर मै तड़पता रहूँगा।

शंकर हल्दर

शंकर हल्दर

जन्म- 09/03/2003. पिछले तीन सालों से अंकुर किताबघर के नियमित रियाजकर्ता. किसी भी पत्र-पत्रिका में प्रकाशित होने वाली पहली रचना. पता: बी-458, सावदा-घेवरा जे.जे. कॉलोनी, दिल्ली- 110081. मोबाइल न. 9654653124.

साभार: हंस, जनवरी, 2016

 

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