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स्त्री विमर्श: इससे दयनीय कोई दूसरा विमर्श नहीं है हिंदी में: वीर भारत तलवार

मैं स्त्री सवाल पर आपसे कुछ बातें करना चाहता हूं। दलित विमर्श और आदिवासी विमर्श ऐसा विमर्श है, जो हिंदुस्तान में ही चला,  किस वैश्विक आंदोलन या विचारधारा का अंग नहीं बन पाया। लेकिन स्त्री-विमर्श एक वैश्विक विचारधारा है। लेकिन विडंबना कि  बात यह  है कि हिंदी में जो स्त्री विमर्श चल रहा है, उसका इस वैश्विक विचारधारा से बहुत कम लेना-देना है, नहीं के बराबर है। एक-दो अकादमिक लोगों की बात नहीं करता हूं, जो इस चीज के बारे में ज्यादा जानकारी रखते हैं। हिंदी में जो स्त्री-विमर्श चलता है, जिसमें मैत्रेयी पुष्पा और लता शर्मा और मनीषा और रोहिणी अग्रवाल जैसे लोगों को हम पढ़ते रहते हैं। ये लोग सबसे ज्यादा मुखर हैं स्त्री विमर्श पर, तो लगता है कि स्त्री विमर्श से दयनीय कोई दूसरा विमर्श नहीं है हिंदी में। यानी एक तो इस स्त्री विमर्श का कहीं भी उस वैश्विक विचारधारा के विकास से, उसकी सैद्धांतिकी से जो इतने वर्षों से विकसित हुई है दुनिया में, कुछ भी लेना-देना नहीं है। पश्चिम में नारीवादी आंदोलन की एक लंबी पंरपरा रही है, सैकड़ों वर्ष की। मताधिकार आंदोलन (Suffragist movement) उन्निसवीं सदी से चला आ रहा है। आज वहां इतना जो कुछ भी हासिल किया गया है, लड़ कर किया है, समाज लड़ाई से बदलता है, आंदोलन से बदलता है, सिर्फ कानून बनाने से नहीं बदलता है समाज। इसलिए पश्चिम में स्त्री के अधिकार की चेतना बिल्कुल नीचे तक गई है। हिंदुस्तान में स्त्री-मताधिकार के लिए 1918 ई. में कांग्रेस ने एक बैठक बुलाई और एक प्रस्ताव पारित कर दिया कि स्त्रियों को भी मताधिकार दिया जाएगा और पारित हो गया,  मदन मोहन मालवीय को छोड़कर सबने उसका समर्थन किया। पारित हो गया। यहां किसी स्त्री में यह चेतना जगाने की जरूरत ही नहीं पड़ी कि तुम्हें मताधिकार हासिल करना है और इसके लिए तुम्हें लड़ना है। बैठे-बैठाए सब मिल गया। रावण न मरा, लंका न जली, खुद घर लौट आई जनकनंदिनी। तो इस प्रकार का जहां आंदोलन होगा, वहां कोई चेतना नहीं हो सकती है। स्त्री विमर्श को लेकर इतनी महत्वपूर्ण सैद्धांतिकी का विकास हुआ, 1970 के दशक में ‘सेक्सुअल पॉलिटिक्स’ नाम की एक किताब लिखी गई थी और अभूतपूर्व क्रांतिकारी किताब थी। ये जो स्त्री पुरुष आपस में सेक्स संबंध बनाते है, सेक्स करते हैं, वो सेक्स संबंध असल में एक पावर डिस्कोर्स होता है उसके बीच। पुरुष किस प्रकार से इंटरकोर्स करता है, उसका क्या नजरिया होता है, क्या हरकतें होती हैं उसकी,  कौन से शब्द बोलता है उस समय, किस भाषा में बात करता है, यह सब एक पावर डिस्कोर्स है। पहली बार इतने डिटेल में उन्होंने इस चीज को रखा, कि सेक्स सिर्फ का आनंद नहीं, उसके अहं की तुष्टि का, उसके पुरुषार्थ की तुष्टि का भी आनंद है और वह स्त्री को एक पैसिव चीज समझता है जिसका खंडन बहुत पहले सिमोन द बोउवा कर चुकी थीं- सेकेंड सेक्स लिखकर कि सेक्स में स्त्री पैसिव नहीं होती है। लेकिन पुरुष उसी को मानना चाहता है कि पैसिव ही है। और वो एक पावर डिस्कोर्स करता है। इस तरह की किताब 1970 में लिखी गई। हिंदी में कोई इस चीज की चर्चा नहीं करता कि सेक्सुअल बिहैवियर में हमारा पावर डिस्कोर्स क्या है?DSC_0106

इसी प्रकार से 1980 के दशक में मुझे याद है, जब मैं नारीवादी विचारों की ओर झुका, तो बड़ी महत्वपूर्ण किताब आई थी और हम सब वामपंथी उसको पढ़ते थे, Sheila Rowbotham की किताब थी- Beyond The Fragments. Sheila Rowbotham की किताब थी। Sheila Rowbotham एक यूरोपियन मार्क्सवादी हैं और यूरोपियन मार्क्सवादियों ने नारीवाद को लेकर भी बहुत सारी सैद्धांतिकी का विकास किया। दुर्भाग्य से कुछ भी जानने की जरूरत हम महसूस नहीं करते। उन्होंने एक नई कान्सैप्ट दी। उन्होंने कहा- Prefigurative movement यानी प्रारूप आंदोलन। हम कैसा समाजवाद लाना चाहते हैं, उस समाजवाद में स्त्री-पुरुषों के हम कैसे संबंध बनाना चाहते हैं, उसका प्रारूप आंदोलन हमें करना चाहिए। हम अपने संगठन में पहले उसके प्रारूप का प्रयोग करें, अगर हम उसको लाना चाहते हैं तो। इस  Prefigurative movement की कान्सैप्ट उन्होंने दी थी। हिंदी के नारीवाद में, नारी विमर्श में कहीं भी इस तरह की किसी अवधारणा का जिक्र आपको नहीं मिलेगा।

हिंदी में जो नारी विमर्श है उसकी सबसे बड़ी समस्या यह है कि वह सिर्फ साहित्यिक दायरे तक सिमटा हुआ है। उसके बाहर कुछ एनजीओ स्त्रियों के नाम पर चल रहे हैं, वो चल रहे हैं, लेकिन कोई नारीवादी आंदोलन उनके बाहर नहीं दिखाई देता है। सामाजिक आंदोलनों से इस चल रहे नारीवादी विमर्श का क्या संबंध है? कोई संबंध नहीं है। इतना बड़ा जो अभी आंदोलन हुआ दिल्ली में 16 दिसंबर के रेपकांड के बाद उसमें स्त्री संगठनों की क्या भूमिका थी? मैं आपको एक तुलनात्मक उदाहरण देता हूं। 1970 के दशक में महाराष्ट्र में मथुरा रेप केस हुआ, एक मशहूर रेपकेस है, जहां पुलिस कान्सटेबल ने मथुरा के साथ रेप किया, एक दलित स्त्री के साथ, और सुप्रीम कोर्ट तक ने बरी कर दिया उन कांस्टेबलों को कि ये लड़की जो है, चरित्रहीन है। उसी के बाद कानून में बदलाव हुआ कि लड़की के चरित्र का सवाल नहीं उठाया जाएगा। इस केस के खिलाफ बड़ी जागृति हुई और उसमें वो सारी जागृति का श्रेय बंबई के नारीवादी संगठनों को था। उन्होंने रेप और ऑपरेशन के खिलाफ एक फोरम बनाया और उस फोरम को आधार बनाके डेढ़ सौ-दो सौ कर्मठ नारीवादी कार्यकर्ताओं ने मिलकर इस आंदोलन को खड़़ा किया जिसका प्रभाव बाद में दिल्ली, कलकत्ता सब जगह पड़ा और 8 मार्च वीमेन्स डे के दिन वह आंदोलन देश में भी फैला। स्त्री संगठनों की वजह से फैला। इस बार दिल्ली में जो आंदोलन हुआ इतना बड़ा, इसमें स्त्री संगठन थी नहीं, फिर भी यह आंदोलन इतना फैल कैसे गया, जबकि महाराष्ट्र का मथुरा केस का आंदोलन इतना नहीं फैला। उसकी बहुत बड़ी वजह थी ये कि वो सिर्फ स्त्री संगठनों का आंदोलन, जिसको कोई राजनीतिक सपोर्ट नहीं था महाराष्ट्र में। लेकिन इस आंदोलन में ये जो भारत की कम्युनिस्ट पार्टी- माले है, इसका जो स्त्री मोर्चा है, ऐपवा, उसकी बड़ी महत्वपूर्ण भूमिका थी, खासकर उसकी नेता कविता कृष्णन की। तो इस राजनीतिक समर्थन की वजह से यह  आंदोलन इतने बड़े जनांदोलन में बदल गया और पूरे देश में फैला। तो पोलिटिकल सपोर्ट एक मूवमेंट को कितना फैला सकता है, अगर वो मिल जाए उसको, इसका एक बहुत बड़ा उदाहरण है यह मूवमेंट।

बिना स्त्री संगठन के ये हिंदी में नारीवादी विमर्श जो लोग चला रहे हैं, वो कहीं इस आंदोलन के नेतृत्व में नहीं थे, जो कि दिल्ली में हुआ। जुलूस रोज-रोज नहीं निकलते हैं, लेकिन विचारधारात्मक संघर्ष रोज-रोज होता है और होना चाहिए। विचारधारात्मक संघर्ष कई रूपों में होता है। साहित्य में होता है, कला में होता है, संगीत में होता है,  तरह-तरह के सृजनात्मक प्रयोगों में होता है। नारीवादी विमर्श उसी प्रकार का विमर्श है।

महाराष्ट्र में मैं आपको बहुत हाल का उदाहरण दूं। डॉक्टर अंबेडकर की बनाई हुई एजुकेशन सोसाइटी का एक कॉलेज है, कॉलेज ऐंड कॉमर्स ऐंड इक्नोमिक्स, वडाला में। वहां की जो वाइस प्रिन्सिपल हैं डॉक्टर ललिता, उनहोंने एक कैलेंडर बनाया है, जो मेरे पास भेजा गया है और जिसको मैंने सबसे आगे बढ़के आंदोलन का नेतृत्व करने वाले आइसा को भेंट किया। वह कैलेंडर जेंडर इक्विलिटी के सवाल पर उन्होंने बनाया। हर महीने के पेज पर स्त्री से संबंधित मुद्दों को उठाया गया। उसकी क्लिपिंग दी गई और फिर मांग रखी गई और नीचे तारीख दी गई। बारह महीने आपको याद दिलाया जाएगा, स्त्रियों के सवाल पर आपका नजरिया कितना गलत है और क्या होना चाहिए। और उन्होंने एक नारा भी दिया, बहुत अच्छा, जिस प्रकार आइसा ने एक नारा दिया स्त्री आंदोलन के बारे में- बेखौफ आजादी, स्त्री के लिए बेखौफ आजादी होनी चाहिए, जहां भी वो जाए वहां वो सुरक्षित रहे, तो फ्रिडम विदाउट फीयर, उसी प्रकार से उस कैलेंडर में भी एक नारा दिया गया, वो भी उतना ही सही है- वीमेन्स राइट इज ह्यूमन राइट। स्त्री के अधिकार मनुष्य के अधिकार हैं, इस नारे के साथ वो पूरा कैलेंडर है।

अभी महाराष्ट्र में एक कार्यक्रम हुआ, ज्योतिबा फुले की पत्नी सावित्री बाई कविताएं लिखती थीं। स्त्री-चेतना जगाने के लिए, बहुत सारी कविताएं उन्होंने लिखी हैं। उन कविताओं पर महाराष्ट्र की एक स्त्रीवादी कलाकार झेलम परांजपे ने एक नृत्य नाटिका बनाई। हिंदी में किसी नारीवादी कलाकार ने बनाई हो एक भी नृत्य नाटिका इस प्रकार की या एक भी कैलेंडर इस प्रकार का बनाया हो, तो बताइएगा! महाराष्ट्र की एक नारीवादी मित्र कहती हैं कि स्त्री विमर्श तो बहुत हुआ, अब पुरुष विमर्श होना चाहिए। पुरुषों को भी बहुत कुछ बताने-समझाने की जरूरत है। दरअसल उन्हीं को बहुत कुछ समझाने-बताने की जरूरत है। ये बात हंसी की लग ही है आपको, लेकिन ये बात बहुत ही गंभीर है और बहुत वास्तविक है। महाराष्ट्र में जब 80 के दशक में मथुरा रेप केस को लेकर स्त्रीवादी आंदोलन या संगठनों ने आंदोलन किया, उनके बहुत से वामपंथी पुरुष मित्र बहुत प्रभावित हुए और इन वामपंथी पुरुषों ने मैन अगेंस्ट वायलेंस अंगेस्ट वीमेन- स्त्री पर होने वाली हिंसा के विरोधी पुरुषों का संगठन बनाया। काउंसलिंग एक चीज होती है, जो देखिए बहुत जरूरी होती है, और वैचारिक संघर्ष को आगे बढ़ाती है। एक-एक इनडिविजुअल से संपर्क करके स्त्रियों ने रेप के खिलाफ फोरम बनाया। उसमें वो क्या करती थीं? उससे मिलती थीं, उससे बात करती थीं, उसके अंदर की हीनता को दूर करती थीं, उसके अंदर के शर्म को दूर करती थीं, उसके गौरव को जगाती थीं- तुम्हारा कुछ नुकसान नहीं हुआ, तुम्हारे साथ अन्याय हुआ है, अपराध हुआ है, तुम लड़ोगी, हम तुम्हारे साथ हैं, ये सब काउंसलिंग करती थीं उसकी। और ये पुरुष क्या करते थे, जिन पुरुषों ने संगठन बनाया? जो पुरुष औरतों से इस प्रकार बर्बरता से पेश आते हैं, उन पर हिंसा करते हैं, अपनी पत्नियों को पिटते हैं, बलात्कार करते हैं, उनके घर जाकर उन पुरुषों से मिलकर उनकी काउंसलिंग करते थे, कि तुम क्या गलत कर रहे हो? तुमको समझना चाहिए। मैं इसी चीज की बात कर रहा हूं कि एक वैचारिक संघर्ष को आगे ले जाने के लिए पचासों तरीके होते हैं। वो तरीके हिंदी क्षेत्र में, हिंदी के नारी विमर्श में कहां हैं? हम कितनी उथली और सीमित जमीन पर खड़े होकर ज्यादा बड़ी-बड़ी बातें कर रहे हैं?

हिंदुस्तान में संस्कृति को बदलने की लड़ाई शुरू हुई है 16 दिसंबर के आंदोलन के बाद से। हमारे देश के समाज की जो संस्कृति है, इसमें बहुत गहरी बुनियादी तब्दीलियों की जरूरत है। खासकर संस्कृति की सबसे बड़ी समस्या स्त्री के बारे में नजरिया है। उस नजरिये के बारे में कोई चेतना नहीं है हिंदी के स्त्री विमर्श में। हिंदी का स्त्री विमर्श, कुछ स्त्रियों की जिनका मैंने नाम भी लिया, इनके अपने पूर्वाग्रहों, विश्वासों और इनकी मांगों का एक विस्फोट होकर रह गया है। मैत्रेयी पुष्पा जिस तरह के लेख लिखती हैं और हम उनको पढ़ते रहते हैं, जिस प्रकार की वो आलोचना करती हैं, कौन संस्कृति है जो नारीवादी कहलाएगी? कोई औब्जैकटिव कैरेटेरिया नहीं है। आपको अच्छा लगा और आपके मन में यही बात है, तो वो नारीवादी है। मैत्रेयी पुष्पा ने हिंदी में जो नारीवादी आलोचना लिखी है, उसमें कामायनी को उन्होंने हिंदी की सबसे प्रगतिशील कृति बताया,  जो कामायनी बहुत सारे स्तरों पर सामंती संस्कारों से ग्रस्त कृति है। उस ‘कामायनी’ को आपने साबित कर दिया, आपको वो पसंद आया, आपके नारीवाद के कुछ तर्क हैं जिससे आपको लग गया। तो इसी प्रकार की आलोचना है। जो बुनियादी सवाल है, जो स्त्री की स्थिति को हमारे समाज में नियंत्रित और निर्धारित करते हैं, हिंदी के नारीवादी विमर्श में उनको नहीं उठाया जाता। ये कौन सी संस्थाएं हैं जो हमारे समाज में औरत बनाने का काम करती है? परिवार है, शिक्षा प्रणाली है, राज्य है, कानून है, धर्म है, कलाएं हैं, मीडिया है- ये सारी संस्थाएं हैं समाज की, जो मादा को स्त्री बनाती हैं। आप सभी जानते हैं कि स्त्री पैदा नहीं होती, बनायी जाती है, मार-मार के बनाया जाता है उसको स्त्री। और ये संस्थाएं है जो स्त्री बनाती हैं उसको, स्त्री की स्थिति को तय करती हैं ये। इनकी कोई चेतना हिंदी के नारीवादी विमर्श में अगर हो तो कोई कहीं दिखा दे मुझे।

स्त्री विमर्श का एक बहुत बड़ा सवाल है मर्दवाद। इसकी क्या आलोचना है हिंदी में? मैं आपको बताउंगा कि कैसे अच्छे-अच्छे नारीवादियों ने मर्दवाद को कैसे आत्मसात कर रखा है। मर्दवाद जो स्त्री प्रश्न की एक सबसे बड़ी बुनियादी विरोध की अवधारणा है और उसके साथ स्त्रीत्व के सवाल पर आऊंगा। रोहिणी अग्रवाल हिन्दी की बड़ी नारीवादी आलोचक समझती जाती हैं। उन्होंने कई किताबें लिखी हैं। तस्लीमा नसरीन की एक कविता को उन्होंने उद्धृत किया है कि ये पुरुष जो है न स्त्रियों को खरीद के लाते हैं, घर में उसका मनमाना इस्तेमाल करते हैं और उसके बाद लात मारकर भगा देते हैं उसको। उसने कहा, मेरी भी इच्छा होती किसी लड़के को ऐसे ही लाऊं। और ऐसा ही उसका उपभोग करूं, मेरी बड़ी इच्छा होती है, लड़के खरीदने की, जवान लड़के, छाती पर उगे घने बाल, उन्हें खरीदकर, पूरी तरह रौंदकर, उनके सिकुड़े हुए अंडकोष पर जोर से लात मारके कहूं- भाग साले। ये कविता तस्लीमा नसरीन ने लिखी, एक नारीवादी ने। दूसरी नारीवादी ने आलोचना लिखी- कैसी आग उगलती कविता है, फायर गर्ल है तस्लीमा। अब तो उल्टा खेल खेलने की जरूरत है। पुरुषों को समझ में नहीं आता कि स्त्रियों को ऐसे रौंदकर जब हम लात मारकर भगाते हैं, तो कैसा महसूस होता है। हम उनको महसूस कराएंगे ऐसे। उनकी दुनिया में तभी हाहाकार मचेगा। मगर जरा ठहर के सोचिए कि ये एक स्त्री शोषण के सवाल पर एक तात्कालिक आवेगपूर्ण प्रतिक्रिया, एक उग्र प्रतिक्रिया के अलावा इसमें और क्या है? किस लड़के को खरीदकर ले आएगी तस्लीमा नसरीन? हमें आपको तो नहीं खरीद सकती? किसी कमजोर गरीब घर के, किसी आदिवासी-दलित लड़के को लेके आएगी, क्योंकि लड़कियां भी तो उसी प्रकार की पाते हैं पुरुष। तो आप एक कमजोर और गरीब लड़के को वैसे ही खरीद के ले आओगे, जैसे कमजोर और गरीब लड़कियों को लेकर कोई ले आता है? ये कोई नारीवाद नहीं है। ये एक घटना की प्रतिक्रिया हो सकती है, लेकिन इसी उग्र प्रतिक्रिया में आप उस मर्दवादी अवधारणा को आत्मसात कर ले रही हैं, जो मर्दवादी धारणा शरीर का इस प्रकार का उपभोग करके लात मारके उसको भगा देती है।

मर्द को मुक्त समझना और मर्द के जैसा बनने की कोशिश करना नारीवाद नहीं है। मर्दवाद अपने आप में घृणित चीज है। पुअर बॉय्ज़ डोंट क्राई- लड़के रोते नहीं हैं। हममें से कोई नहीं होगा, जिसने बचपन में एक-दो बार ये वाक्य न सुना हो। खेल से लौट के या झगड़े से घर जब भी हम आते थे, हमारी मां बहने कोई न कोई हमसे जरूर कहता था- ए लड़का होके रोता है। लड़कियों की तरह से रोने बैठ गया। हमें जो मर्द होना सिखाया जाता है बचपन से। ये मर्दवाद सबसे ज्यादा खतरनाक अवधारणा है, नर को मर्द बनाना, मादा को स्त्री बनाना, ये हमारे समाज की संस्कृति की बहुत बुनियादी समस्या है। न लड़के रोते हैं, न लड़कियां रोती हैं, मनुष्य रोता है। मनुष्य होने के कारण हम रोते हैं। ये स्त्री पुरुष का विभाजन सबसे झूठा और मिथ्या विभाजन है। ये उतना ही मिथ्या विभाजन है जितना मिथ्या विभाजन जाति का विभाजन है। तुमी देखो नारी-पुरुष, आमी देखी सिगोई मानुष- तुम हर जगह स्त्रियों और पुरुषों को देख रहे हो, मैं तो सिर्फ मनुष्यों को देख पा रहा हूं।

स्त्री पुरुष की अवधारणा एक झूठी अवधारणा है। दोनों मनुष्य हैं, दोनों ही की जरूरत एक है। दोनों की भावना एक है। शरीर की बनावट से इस चीज में कोई फर्क नहीं पड़ता। इसलिए मैं समझता हूं कि हमारे देश में और पूरी दुनिया में संस्कृति को बदलने की जो लड़ाई है, उसका एक बुनियादी मुद्दा होना चाहिए स्त्री और पुरुष के विभाजन को खत्म करना। जहां भी स्त्री और पुरुष का विभाजन आप देखें, उसका विरोध करें। जिस प्रकार मर्दवाद एक झूठी अवधारणा है, जो नर को खूंखार बनाती है, उसी प्रकार स्त्रीत्व की अवधारणा भी इतनी ही गलत और बेबुनियाद अवधारणा है, जो स्त्री को घुटनाटेकु बनाती है। उन्हें स्त्री-पुरुष बनाके हम उनकी मनुष्यता को उनसे छीन लेते हैं।

आप जानते हैं ये रेप वगैरह जो है कैसे मर्दानगी का काम समझा जाता है। सावरकर ने एक किताब लिखी- Six Golden Epochs of Indian History भारतीय इतिहास के छह स्वर्णिम अध्याय। शिवाजी पर उन्होंने लिखा है कि शिवाजी जैसे महान प्रतापी राजा ने भी कैसी गलतियां कीं, जब उन्होंने मुगलों को हरा दिया और मुगल सेना भाग गई और उन सबकी स्त्रियां हमारे चंगुल में आ गई थीं, तब शिवाजी ने उनको अपने हरम में लाने और सबके साथ आनंद लेने के बजाए उनको मुक्त कर दिया। ये पुरुषार्थ की कमी शिवाजी ने क्यों दिखाई? आप सोचिए कि शिवाजी ने स्त्रियों का आदर किया, मुस्लिम स्त्रियों को, उनको छोड़ दिया, कुछ भी नहीं किया उनके साथ, बल्कि अपने सैनिकों से कहा कि वे इज्जत के साथ इनको घर पहुंचा आएं। तो ये शिवाजी ने पुरुषार्थ का काम नहीं किया! पुरुषार्थ का काम होता अगर वे उन सबसे बलात्कार करवाते अपने सैनिकों से। ये पुरुषार्थ की अवधारणा है! लेकिन ये पुरुषार्थ की अवधारणा हमेशा ऐसी खूंखार नहीं होती है। जो लोग बलात्कार की बात नहीं करते हैं, जो लोग यौन हिंसा की बात नहीं करते हैं, वे भी उतने ही मर्दवादी हैं। समाज में ऐसी संस्थाएं हैं, बहुत सी संस्थाएं, भद्र लोग, हमारे घर के लोग, वो थोड़े कहते हैं कि स्त्रियों से बलात्कार करो या उन पर हिंसा करो। वो कहते हैं- स्त्रियों के साथ अच्छा बर्ताव करना चाहिए। मर्यादा का पालन करना चाहिए और स्त्रियों को भी मर्यादा में ही रहना चाहिए। सबको अपनी मर्यादा का पालन करना चाहिए। ज्यादातर पुरुष समाज जो है यही बात करता है, इससे मर्दवाद में कोई फर्क नहीं पड़ता। ये भी वही बात कह रहे हैं लेकिन बहुत दूसरे तरीके से। मर्दवाद का मतलब ये नहीं कि वो जो बलात्कार करेगा और हिंसा करेगा, खूंखार रूप में तभी वो मर्दवाद होगा, नहीं, वो स्त्री से बहुत अच्छा बर्ताव करते हुए भी….

तुम घर में रहो, काम करो, बाहर भी जाओ, समय पर आ जाया करो बेटे। ज्यादा अंधेरे में बाहर नहीं रहना और देखो दोस्तों के साथ ज्यादा नहीं जाना, तुम आ जाओ घर में, हमलोग सब तुम्हारे साथ हैं। ये भी उसी चीज को बहुत अच्छे ढंग से कह रहे हैं। और बाहर जाओगी तो फिर…..अगर ये हमारी बातें नहीं मानोगी, इस मर्यादा को नहीं मानोगी, तो फिर वही होगा जो बाहर होता है और जिसके लिए वीर सावरकर ने कहा। तो एक ही सिक्के के दोनों पहलू हैं। इसी प्रकार से मैं कहना चाहूंगा कि स्त्रीत्व की धारणा भी उतनी ही बेबुनियाद है, जिसमें बहुत सारी स्त्रियां स्वाभाविक रूप से विश्वास करती हैं। स्त्रियों के अंदर करुणा होती है, स्त्रियां ममतामयी होती हैं। उनके अंदर अपने बलिदान की भावना भरी होती है- ये सब स्त्रियों को बनाया जाता है। इस प्रकार से उनकी मनुष्यता को, उनकी स्वाभाविक आकांक्षाओं को, उनकी स्वाभाविक प्रकृति को उनसे ही छीन लिया जाता है। उनको स्त्री के रूप मे ढाला जाता है। तो यह  मनुष्य की संस्कृति की बहुत बुनियादी समस्या है। और ये खाली समाजवाद के आ जाने से, खाली बुनियादी आधार बदल जाने से हल नहीं हो जाएंगी। संस्कृति की लड़ाई बहुत लंबी लड़ाई है। जब तक आप विचारधारात्मक संघर्ष इस पर नहीं चलाएंगे, आपसे वो कभी हल होने वाली नहीं हैं। माओत्से तुंग का जो आखिरी इंटरव्यू एडगर स्नो ने लिया था 72-73 के आसपास, उसमें उन्होंने माओ से पूछा- चीन में समाजवाद तो आ गया, ये बताइए स्त्री और पुरुष की बराबरी चीन में कब तक आएगी, आपको क्या लगता है? माओत्से तुंग ने कहा- चार-पांच सौ साल से पहले नहीं आने वाली।

मैं समझता हूं कि उसे आप चार-पांच सौ साल से भी ज्यादा सोच सकते हैं। क्योंकि यह संस्कृति की लड़ाई है। स्त्री विमर्श पूरे समाज के लोकतांत्रिक रूपांतरण और समाजवाद की भी एक बहुत बुनियादी लड़ाई है। अगर स्त्री विमर्श इस सवाल का सामना नहीं करता है, दो-चार नहीं होता,  तो वो कितना संकीर्ण रह जाएगा, हम समझ सकते हैं।

प्रो.वीर भारत तलवार

प्रो.वीर भारत तलवार

प्रो.  वीर भारत तलवार,  प्रख्यात हिन्दी आलोचक, जेएनयू में प्राध्यापक। उनसे virbharattalwar@gmail.com पर संपर्क संभव है। 

हैदराबाद में दिये गए व्याख्यान का अंतिम अंश।
साभार समकालीन जनमत 
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आदिवासी विमर्श: धर्म, संस्कृति और भाषा का सवाल कहाँ है?: वीर भारत तलवार

BY वीर भारत तलवार 

आदिवासी विमर्श पर मैं विस्तार से बिल्कुल नहीं कहूंगा। हिंदी में जो सबसे नया विमर्श और सबसे कमजोर और थोड़ा सा मुश्किल विमर्श है, वह आदिवासी विमर्श है। आदिवासी विमर्श की स्थिति यह है कि मैं हरिराम जी की किताब देख रहा था कि कितने उपन्यास आदिवासियों पर लिखे गए, जो खुद आदिवासी लेखकों के चार उपन्यास उन्होंने बताए, हो सकता है थोड़ा और खोजा जाए तो पांच-दस हो जाएं, कुछ दूसरे लोगों ने भी आदिवासियों पर उपन्यास लिखे हैं। उनमें से कुछ उपन्यास तो सच पूछिए इतने आदिवासी विरोधी हैं, कि उनको क्या कहा जाए! आदिवासियों पर जो भी उपन्यास लिखे गए हैं, वो खाली रिसर्च करने वाले लोग उनको जानते हैं, उनको कोई पढ़ता नहीं है। कितने लोग पढ़ते हैं आदिवासियों पर लिखे गए उपन्यासों को और खुद आदिवासियों के लिखे उपन्यासों को कितने लोग पढ़ते हैं? पीटर पालीन का उपन्यास कितने लोगों ने पढ़े हैं या मंगल मुंडा का उपन्यास कितने लोगों ने पढ़ा है? अभी हाल में मैंने एक उपन्यास पढ़ा मलयाली भाषा का, नारायण, जो कि इडिकी जिले के हैं और पोस्ट ऑफिस डिपार्टमेंट में काम करते हैं,  उनहोंने ‘कोच्चारती’ एक उपन्यास लिखा। 1998 में छपा है। केरल साहित्य अकादमी का पुरस्कार मिला है उसको। और वो इतना महत्वपूर्ण उपन्यास है, और मैं समझता हूं कि उसे बहुत कम लोगों ने पढ़ा है। हम अन्य भारतीय भाषाओं की बहुत सारी रचनाओं को नहीं जानते हैं। हमारे देश में इतने महान उपन्यासकार हुए जिन्होंने आदिवासियों पर लिखा, उडि़या में हुए हैं, गोपीनाथ मोहांती के अमृत संतान और प्रजा जैसे उपन्यास। किस्सागो को नोबेल पुरस्कार मिल गया। यह उपन्यास अमृत संतान के आगे कुछ नहीं है। उनके पांच लोगों ने उनको पुरस्कार दे दी और उनको  तख्ती मिल गया। लेकिन हिंदुस्तान में आदिवासियों पर लिखे हुए उपन्यास को हिंदी का साहित्यिक समाज बहुत कम पढ़ता है। अभी मारंगगोड़ा और ग्लोबल गांव के देवता वगैरह की चर्चा चल पड़ी है। वर्ना इससे पहले बहुत कम हैं। ‘धूणी तपे तीर’ की बाजार में जो सफलता है, वो राजस्थान के एक बहुत बड़े आंदोलन से जुड़े होने के कारण है। लेकिन हिंदी में आदिवासी साहित्य को कितना आदरपूर्ण स्थान मिला है, यह उसका सबूत नहीं है।

हिंदी में आदिवासी विमर्श एक कमजोर स्थिति में है। उसके कारण बहुत स्पष्ट हैं। आदिवासी विमर्श करने के लिए आदिवासियों के बारे में जानना बहुत जरूरी है। और आदिवासियों के बारे में जानने के लिए उनके बीच जाना बहुत जरूरी है। हिंदी में प्रणय कृष्ण जैसे बुद्धिजीवी बहुत कम हैं जो आदिवासियों के सवाल को इतनी सहानुभूति और संवेदना के साथ समझने की कोशिश करते हैं। बड़े-बड़े लेखक हैं, जिन्होंने आदिवासियों पर कुछ लिख मारा है, बिना आदिवासी समाज को गहराई से समझे। मैं नाम लेकर कहूंगा कि महाश्वेता देवी का जो साहित्य है, वह आदिवासियों के बारे में सतही साहित्य है । बहुत दूर खड़े रहकर जो चीज दीख जाती है, वह यह कि उनका बड़ा आर्थिक शोषण होता है। वही ये लोग लिख सकते हैं। लेकिन उसमें आदिवासी समाज की आत्मा नहीं है। उसका अंतःकरण नहीं है। एक आदिवासी की मानसिक बनावट आपको कहीं नहीं मिलेगी। इसीलिए हिंदी में आदिवासी विमर्श हिंदी के साहित्यकार लोग नहीं चला सकते, क्योंकि उनको आदिवासी समाज का कोई ज्ञान नहीं है। और जिन लोगों ने लिखा भी है आदिवासी विमर्श के नाम पर, वो क्या लिखते हैं! आदिवासियों के विस्थापन के सवाल पर ही लिखेंगे, इससे ज्यादा नहीं लिखेंगे। दूसरी तरफ वामपंथी हैं जो  विस्थापन का सवाल भी इसलिए उठाते हैं, क्योंकि उनकी उन बहुराष्ट्रीय कंपनियों और स्टेट से नफरत है, जो आदिवासियों को बड़े पैमाने पर विस्थापित कर रही है। अन्यथा, आदिवासियो की जमीन तो पिछले डेढ़ सौ सालों से जा रही है, कानूनी सूराखों की वजह से, कानून का पालन नहीं करने की वजह से। गवर्नर को सारे अधिकार हैं, लेकिन गवर्नर कुछ नहीं करना चाहता। आदिवासी समाज बहुत ज्यादा संकट में फंस चुका है। आज उसके पास समय ही नहीं है अपनी स्थिति को बदलने के लिए, अपने को बचाने के लिए। यह कवि की समस्या नही बनी। आदिवासी विमर्श का विषय नहीं बना। आज जब बहुराष्ट्रीय कंपनियां इतने पैमाने पर उसको उजाड़ रही हैं। आदिवासी लोग इस तरह से विमर्श नहीं करते हैं। आदिवासी के गांव मे समस्या होगी तो वो किसी पहाड़ या अखाड़ा में उनकी  पंचायत बैठेगी, विचार-सभा करेगी। अगर अर्जी देनी है तो अर्जी देंगे, नहीं तो फिर हथियार लेकर लड़ेंगे। आदिवासी विमर्श तो इसी प्रकार से होता है। लेकिन अंग्रेजी में कुछ लोगों ने आदिवासियों पर लिखकर के जो सनसनी और एक चिंता भी फैलाई है, उसमें कुछ पढ़े-लिखे हिंदी के लेखकों ने योगदान किया और थोड़े से पढ़े-लिखे आदिवासियों ने भी। लेकिन ये इस विमर्श के बहुत छोटे दायरे को सूचित करता है।chittaprosad

आदिवासी विमर्श के बहुत सारे मुद्दे अभी तक ठीक से उठाए ही नहीं गए हैं। जैसे आदिवासी संस्कृति का सवाल, आदिवासियों की भाषाओं का सवाल, उनके धर्म का सवाल कभी किसी ने नहीं उठाया। मैं आपको एक उदाहरण दूं, आदिवासी संस्कृति की कोई गहरी जानकारी गैर-आदिवासियों को नहीं है। उनका एक नितांत अलग दृष्टिकोण आदिवासियों की संस्कृति के बारे में बना हुआ है। इसलिए हम उस सवाल को उठा ही नहीं सकते। और मैंने जैसा कहा कि आदिवासी खुद उस प्रकार से विमर्श नहीं करते हैं कि एक विमर्श खड़ा हो। धर्म के सवाल को कभी भी उठाया नहीं गया। एक बुद्धिजीवी थे रामदयाल मुंडा, उन्होंने धर्म के सवाल को उठाया। उसका एक कारण है। रामदयाल मुंडा खुद एक पाहन के बेटे हैं, एक पुजारी के बेटे रहे और धर्म में उनकी बचपन से दिलचस्पी रही। उनके इलाके में खासकर हिंदू धर्म का काफी प्रभाव रहा है। लेकिन फिर भी वह हिंदू की ओर तो नही गए। ये एक अच्छी बात है। उन्होंने आदिवासी धर्म का ही सवाल उठाया। उनका प्रयास था कि हिंदुस्तान के तमाम आदिवासियों को मिलाकर एक उनका अखिल भारतीय धार्मिक स्वरूप खड़ा किया जाए। इसकी वजह थी। वजह यह थी कि हमारा संविधान कहता है कि आदिवासी इस देश के एक विशिष्ट सांस्कृतिक समुदाय हैं। उनका अपना वैशिष्ट्य है। वो एक विशिष्ट सांस्कृतिक समुदाय है, उसका कोई धर्म है भी या नहीं? हिंदुस्तान में सरकार के आदेश से जनगणना होती है उसमें आदिवासी का क्या धर्म लिखाया जाता है? उससे पूछा जाता है कि तुम हिंदू हो कि नहीं? मुसलमान हो, ईसाई हो, सिक्ख हो? नहीं? ठीक है, अन्य हैं। ‘अन्य’ उसका धर्म लिखा जाता है। अगर वो हिंदू नहीं है, इस्लाम नहीं है, सिक्ख नहीं, ईसाई नहीं तो वो ‘अन्य’ हैं। ये ‘अन्य’ क्या है? उसका कोई धर्म नहीं है और वो हिंदुस्तान का एक विशिष्ट सांस्कृतिक समुदाय है!

इस स्थिति को बदलने के लिए रामदयाल ने धर्म के सवाल को उठाया, आदिवासी विमर्श में इन सवालों की चर्चा नहीं होती। धर्म अच्छी चीज है, बुरी चीज है, वो नहीं हम कह रहे हैं। इस संविधान में धर्म का एक अधिकार दिया हुआ है। उस धर्म का अधिकार आदिवासी को है या नहीं। सरकार के पास उसके धर्म की कोई मान्यता है या नहीं, सवाल इसका है। रामदयाल का सवाल यह भी था कि आदिवासी को अपने धर्म में कितना आत्मविश्वास है, क्या वह धर्म को लेकर हीनभाव से ग्रस्त है! यह सवाल उनको सवाल मथता था। इस सवाल की कुछ पेचीदगियां हैं। धर्म को एक राष्ट्रीय रूप देना! उनका सदाशय जो भी रहा हो, लेकिन धर्म को एक राष्ट्रीय रूप प्रदान करना थोड़ा मुश्किल मामला है। चाहे वो आदिवासी के ही मामले में क्यों न हो? और धर्म को लेकर कुछ और देने की कोशिश झारखंड में आरएसएस ने की है। सरना पेड़ों के नीचे उन्होंने बड़े-बड़े जमावड़े लगाने शुरू किए आदिवासियों के, उनके धार्मिक समूहों के रूप में। और ये धर्म को सामूहिक रूप प्रदान करना कभी भी खतरे से खाली नहीं है, इसकी बहुत गलत दिशा है। लेकिन मैंने आपसे बताया कि यह एक सवाल आदिवासी विमर्श में आपको कहीं नहीं मिलेगा। इसी प्रकार उनकी संस्कृति का सवाल नहीं मिलेगा, भाषाओं का सवाल नहीं उठाया जा रहा है।

महाराष्ट्र में आदिवासी बहुत ताकतवर हैं। झारखंड के बाद शायद वहीं ज्यादा ताकतवर हैं। आदिवासियों के बड़े-बड़े साहित्य सम्मेलन होते हैं। अब तक 9 आदिवासी सम्मेलन हो चुके हैं महाराष्ट्र में, 9 आदिवासी सम्मेलन! लेकिन महाराष्ट्र के ज्यादातर आदिवासी मराठी भाषा में अपना साहित्य लिखते हैं। बहुत कम लोग हैं जिन्होंने अपनी आदिवासी भाषा में साहित्य लिखा और जो लिखा वह भी बहुत कम लेखकों ने लिखा। उनकी भाषाओं का सवाल इस विमर्श में कहीं नहीं आया। झारखंड में संथाली साहित्य सम्मेलन होते हैं, विश्व साहित्य सम्मेलन होता है संथालियों का, क्योंकि वो हिंदुस्तान के आसपास के भी कुछ देशों में मौजूद हैं। लेकिन संथालियों को अपनी भाषा पर बहुत गर्व है। संथाली अपनी भाषा में लिखते हैं, संथालियों का सम्मेलन होता है, तो वहां संथाली भाषा के कम से कम 500 प्रकाशन आते हैं। 500 प्रकाशन संथाली भाषा के! हिंदुस्तान के तमाम आदिवासियों ने मिलकर उतना साहित्य नहीं लिखा अपनी भाषा में, जितना अकेले संथालियों ने अपनी संथाली भाषा में लिखा है। ये असमानता तो है। लेकिन भाषाओं का सवाल बहुत महत्वपूर्ण है। सुनीति कुमार चटर्जी जो इतने बड़े भाषाविद् हुए उन्होंने ये भविष्यवाणी कर रखी है कि आदिवासी भाषाएं अपनी मौत मरती जाएंगी, दो-तीन सौ साल में खत्म हो जाएंगी। इसका जवाब आदिवासी विमर्श को देना है कि क्या ये भाषाएं खत्म हो जाएंगी, मर जाएंगी या आदिवासियों के जीवन में उनकी संस्कृति के लिए इसका कोई महत्व है। आदिवासी विमर्श को बड़ी गंभीरता से सोचने की जरूरत है कि अपनी भाषा के बिना वो अपनी संस्कृति को कब तक बचाकर रख सकते हैं?

आदिवासी समाज की एक जो बहुत बड़ी समस्या है, वह है शिक्षित लोगों की अपने समाज और संस्कृति के प्रति हीन भावना। मैं इतने करीब उनके रहा और रांची में देखता हूं कि पढ़े-लिखे आदिवासी हैं जो कॉलेजों से, यूनिवर्सिटी से पढ़कर निकलते हैं, अपनी भाषा नहीं बोलते हैं। अपनी भाषा बोलना नहीं चाहते हैं। जवाहरलाल नेहरू विवि. में कई आदिवासी हैं, झारखंड से आकर पढ़ते हैं। उनहोंने अपना एक संगठन भी बना रखा है- अल्ल झारखंड स्टूडेंट्स यूनियन और उनकी सभाएं करते हैं और टूटी फूटी अंग्रेजी में बोलने की कोशिश करते हैं, जो उनको नहीं आती है। हिंदी भी नहीं बोलना चाहते, हॉल से बाहर निकले ही जिसमें वे आपस में बात करते हैं, वो नहीं बोलते हैं। टूटी-फूटी गलत-सलत अंग्रेजी बोलते हैं और आदिवासी भाषा तो भूलकर नहीं बोलते हैं। ये जो हीनता की भावना है और जो पैदा भी की गई है उनकी भाषाओं के प्रति, उनकी संस्कृति के प्रति, कुछ व्यक्ति के रूप से इससे उबरे हुए लोग जरूर हैं आदिवासी विमर्श में, लेकिन आदिवासियों की सामान्य भावना हीनता की भावना है। एक आत्मसम्मान का आंदोलन, जो अंबेडकर ने दलितों में चलाया और सफल हुए, वो आदिवासियों में अभी तक नहीं है, इसलिए वहां अस्मिता के आंदोलन का बड़ा महत्व है आजकल।

प्रो.वीर भारत तलवार

प्रो.वीर भारत तलवार

प्रो.  वीर भारत तलवार,  प्रख्यात हिन्दी आलोचक, जेएनयू में प्राध्यापक। उनसे virbharattalwar@gmail.com पर संपर्क संभव है। 

हैदराबाद में दिये गए व्याख्यान का दूसरा अंश। शेष अगले किश्त में। 
साभार समकालीन जनमत 

दलित विमर्श: सिर्फ अपनी मुक्ति की सोच से उत्पीडि़त समाजों-समुदायों की मुक्ति नहीं हो सकती: वीर भारत तलवार

प्रोफेसर वीर भारत तलवार, हिन्दी के उन चंद आलोचकों में अग्रगण्य हैं, जो सामाजिक-सांस्कृतिक सरोकारों से एक जेनुइन जुड़ाव रखते हैं। हिन्दी की जोड़-तोड़ और छद्म-पूजनपंथी संस्कृति से दूर यह आलोचक आज लोगों के लिए आकर्षण का कारण इसीलिए भी बना है कि दिल्ली में समूहिक बलात्कार की घटनाओं ने इस आलोचक को इतना विचलित कर दिया है कि  वे इधर लगातार अस्मिता-प्रश्नों पर नए सिरे से विचार कर रहे हैं। हिन्दी में जो तीन मूल अस्मिता-विमर्श चलते हैं- दलित-स्त्री-आदिवासी विमर्श, उस पर उन्होंने विस्तार से विचार किया है। हमारी योजना है कि उन तीनों विमर्शों को धारावाहिक रूप में आपके समक्ष प्रस्तुत करूँ।

By वीर भारत तलवार
हमारे देश में इस समय ये जो तीन विमर्श चल रहे हैं। इनमें सबसे जो कारगर और प्रभावशाली विमर्श है, वह तो दलित विमर्श ही है। वो सचमुच एक ऐसा विमर्श है जिसकी एक वास्तविक सत्ता बन चुकी है। और इस विमर्श का महत्व भी बहुत है। इस विमर्श ने हमारे देश में, समाज में एक ऐसे सवाल को खड़ा किया जिस सवाल को लेकर बड़े-बड़े महात्मा आज तक आते रहे और अपनी सारी सदाशयता और अपनी इच्छाओं के बावजूद कुछ नहीं कर सके। वो है जाति का सवाल। जाति का सवाल जिसको लोहिया जी कहते थे कि कोढ़ है इस समाज का, एक ऐसी निराधार अवधारणा है जिसका कोई आधार नहीं है, कोई विवेक सम्मत तर्क नहीं है जिसके पीछे। एक अहंकारपूर्ण मिथ्या चेतना है वो। लेकिन उस चेतना से प्रेरित होकर करोड़ों लोग अपना जीवन जीते हैं, उसमें आस्था रखते हुए। और उस आस्था से प्रेरित होकर दूसरों की जान ले लेते हैं, हत्या करते हैं, हिंसा करते हैं। ऐसी निराधार विवेकहीन अहंकारपूर्ण मान्यता पर पहली बार कारगर ढंग से इस देश में सवाल खड़ा किया दलित विमर्श ने, जिसका श्रेय है बाबा साहब डॉक्टर अंबेडकर को। और ज्योतिबा फुले और सावित्री बाई को। ज्योतिबा फुले का साथ सावित्री बाई का नाम मैं साथ-साथ लेना चाहता हूं, क्योंकि उन्होंने जो कुछ किया, एक साथ मिलके किया। वो सिर्फ ज्योति बा फुले का ही योगदान नहीं था, उसमें सावित्रीबाई का योगदान शामिल है। इसलिए उसे स्वीकार करना चाहिए, जैसे आप मार्क्स-ऐंगल्स बोलते हैं, ऐसे ही ज्योतिबा फुले और सावित्री बाई जो हिंदुस्तान के मेरी नजर में पहले आधुनिक स्त्री-पुरुष थे। उनके संबंध स्त्री-पुरुषों के दृष्टिकोण से एक आदर्श संबंध थे। और जब हम स्त्री-पुरुष के आधुनिक संबंधों के बारे में विचार करते हैं तो हम ज्योति बा फुले और सावित्री बाई की मिसाल सामने रख सकते हैं।

courtesy- google image

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तो दलित विमर्श ने सबसे महत्वपूर्ण काम किया कि इस देश में जाति के सवाल को इस तरह से खड़ा कर दिया कि उसे कोई भी नजरअंदाज नहीं कर सकता। उससे आंखें नहीं चुरा सकते, उसका जवाब दिए बिना आप आगे नहीं बढ़ सकते। ये बहुत असाधारण बात हुई है। युगांतरकारी बात हुई है। ये दलित जाति का सवाल जो है, आज हमारे देश में देशज आधुनिकता की कसौटी बन चुका है। मॉडर्न आदमी, आधुनिक व्यक्ति कौन है, कल तक हमारे पास इसकी कोई कसौटी नहीं थी, हम पश्चिम की मुताबिक ढलने को ही मॉडेरनिटी समझते थे। लेकिन आज इस देश में एक कसौटी है हमारे पास, जाति प्रथा में विश्वास करते हुए कोई आधुनिक नहीं हो सकता। आप चाहे बाकी कितनी बातें करें, बहुत महीन काटते रहिए आप, लेकिन अगर आप जाति में विश्वास करते हैं, तो आपका सारा पिछड़ापन, आपकी सारी जहालत सामने आ जाएगी। तो ये हमारी देशज आधुनिकता की सबसे बड़ी कसौटी आज बन चुकी है, जिसने जाति प्रथा को निस्सार घोषित कर दिया है। जाति प्रथा खत्म हो चुकी है, ऐसा नहीं है। लेकिन उसी रास्ते पर है वो। और इस दलित विमर्श का बहुत बड़ा योगदान है हिंदी समाज में। और इसके साथ ही दलित विमर्श ने एक और काम किया और उसका भी श्रेय डॉ. अंबेडकर को है, धर्म की आलोचना। जिस धर्म की आलोचना करने वाले कल तक नास्तिक कहलाते थे, और वेदों में सबसे बड़ा पाप नास्तिकता है। और आर्य समाज के इतने बड़े सुधारक थे, दयानंद सरस्वती, जातिप्रथा के भी खिलाफ थे, लेकिन वे भी नास्तिक व्यक्ति को देशनिकाला देने की बात कहते थे। तो जिस देश में धर्म की आस्था पर सवाल करना मुश्किल था, वहां उस देश में धर्म की इतनी विस्तार से आलोचना डॉ.अंबेडकर ने की, जिसको लेकर दलित विमर्श जो हैं, आगे बढ़ा है। ये एक दूसरी विडंबना है कि डॉ. अंबेडकर की विचारधारा के लोगों पर प्रभाव के बावजूद अधिकांश दलित समाज अभी अंधविश्वासों में जी रहा है और धर्म की बहुत सारी कुरितियों में फंसा हुआ है। लेकिन उससे लड़ने का रास्ता भी इसी दलित विमर्श के भीतर है, डॉ. अंबेडकर की विचारधारा के अंदर है। इसके अलावा साहित्य में जो दलित विमर्श हिंदी में हुआ है, मैं दूसरी भाषाओं के विमर्शों के बारे में इतना नहीं जानता हूं। सिर्फ सूचनाएं हैं, वो भी हमारे बजरंग बिहारी तिवारी जी जो इतना अच्छा काम कर रहे हैं, पूरे हिंदुस्तान के विभिन्न प्रदेशों के दलित विमर्श का एक तुलनात्मक अध्ययन वो कर रहे हैं जो हिंदुस्तान में किसी बहुत बड़ी संस्था का काम है। वो अकेले दम पर कर रहे हैं। तो उनके लेखों को जरूर पढ़ना चाहिए उससे कई महत्वपूर्ण उपयोगी जानकारी मिलती है।
तो ये जो दलित साहित्य ने हिंदी में एक और काम किया कि जो हमारी साहित्यिक परंपरा थी, जो कि मुख्य रूप से द्विज आलोचकों की ही बनाई हुई थी। द्विज आलोचकों का उसमें होना बहुत स्वाभाविक है, इसलिए कि इस देश में शिक्षा पर उन्हीं का अधिकार था, जाहिर है कि साहित्य हो, विज्ञान हो, जो भी हो, वो चाहे मार्क्सवाद  और कम्युनिज्म ही क्यों न हो, उसमें द्विज लोग ही सबसे पहले आगे रहते, ये एक स्वाभाविक सी बात थी। तो वो जो परंपरा है जिस पर उनके द्विज संस्कार भी बहुत हावी हैं, उनके द्विज पूर्वाग्रह भी बहुत हावी हैं, और हिंदी साहित्य के बहुत सारी विद्यार्थी इन बातों को जानते हैं, उस परंपरा पर, उस इतिहास पर, उसमें जो मूल्यांकन का क्रम है, उसमें जो जगहें तय हैं साहित्यकारों की, कवियों की, लेखकों की, उस पर दलित साहित्य ने सर्वाधिक सवाल खड़े किए। और ये सवाल किसी हिंदी के आलोचक की तरह से नहीं खड़े किए। उन्होंने  ऐसी भाषा में खड़े किए कि लोग तिलमिला उठे और उसका जवाब देते हुए बना नहीं, तो खीज गए लोग और उनको लगा कि ये तो गाली गलौज की भाषा बोल रहे हैं। मैं ये नहीं कहता कि सारी की सारी आलोचना उनकी वाजिब है और मान ली जानी चाहिए, लेकिन उन्होंने ये सवाल बड़े कारगर तरीके से खड़े किए और हिंदी साहित्य में पहली बार एक खलबली मच गई। जो काम मार्क्सवादी आलोचकों को करना चाहिए था और जिसमें वो चूक गए थे, ऐसे बहुत से सार्थक सवालों को दलित आलोचकों ने, साहित्यकारों ने हिंदी में खड़ा किया। चाहे कबीर को लेके हो, हजारी प्रसाद द्विवेदी को लेके हो, तुलसीदास को, प्रेमचंद को, निराला को, बहुत सी निरर्थक भी बात हो सकती है, लेकिन बहुत से सार्थक सवाल भी उन्होंने खड़े किए और अब आप उससे आंख नहीं चुरा सकते हैं। दलित विमर्श के कारण आज हिंदी में दलित लेखकों की एक स्थिति बनी है जो पहले नहीं थी। दलित लेखकों के किसी हद तक संगठन बने हैं। और किसी हद तक वे एक आवाज बने हैं, जिसको सुना जाता है, जिसको सुनना पड़ता है। दलित विमर्श का हिंदी में बहुत बड़ा योगदान है। इस दलित विमर्श की सफलता तो आप इससे देखिए, कि आज दलित साहित्य को कितना बड़ा बाजार उपलब्ध है, उसके प्रकाशक को, उसके साहित्य को, जो किसी और साहित्य को उपलब्ध नहीं है। दलित लेखकों को छापने के लिए बड़े-बड़े प्रकाशक बड़ी तत्परता से तैयार हो जाते हैं। और उनकी किताबें बाजार में खूब बिकती हैं, कई-कई संस्करण निकल जाते हैं। ये हिंदी में दलित विमर्श की एक सफलता है। दूसरे प्रदेशों के दलित विमर्श की तुलना में हिंदी का दलित विमर्श कैसा है, बहुत सारी बातें नहीं कह सकता मैं। लेकिन जो थोड़ी बहुत सूचनाएं मिली हैं, तमिल, तेलगु, मराठी वगैरह को देखते हुए, तो उससे तो यही लगता है कि हिंदी में उनकी तुलना में दलित साहित्य अभी भी सीमित दायरे में है। और उसका एक उदाहरण यही है कि आज भी हिंदी में यही सवाल दलित विमर्श में महत्वपूर्ण बना हुआ है कि दलित साहित्य कौन लिख सकता है? वो सिर्फ दलित ही लिख सकते हैं या गैरदलित भी लिख सकते हैं। मैं भी एक समय में इसका बड़ा समर्थक रहा कि दलित ही दलित साहित्य लिख सकता है, पर मुझे अब इसमें शंका होती है। मैं समझता हूं कि किसको हम दलित साहित्य कहेंगे, उसका एक आब्जेक्टिव कैरिटेरिया होना चाहिए। न कि आप जाति का पता लगाकर ये पता लगाएंगे कि वो दलित साहित्य है या नहीं। दलित साहित्य किसे माना जाए और किसे नहीं माना जाए, इसकी कुछ वस्तुगत कसौटियां बननी चाहिए। इसके कुछ मापदंड निर्धारित होने चाहिए। और उन्हीं के आधार पर ये तय होना चाहिए कि ये दलित साहित्य है, इस प्रकार के सैद्धांतिकरण में कोई दिलचस्पी दलित लेखक नहीं रखते हैं। इसका कारण क्या है? बहुत से कारण हो सकते हैं। उसमें से एक कारण दलित साहित्य के अपने बाजार को सुरक्षित रखना भी हो सकता है। पर वो एक कारण हो सकता है। दूसरे कारण तो विचारधारात्मक ही हो सकते हैं। लेकिन इस सवाल पर सोचने की जरूरत है। और यही कारण है कि दलित साहित्य के मूल्यांकन के लिए दलित लेखक पूरी तरह से गैर-दलित द्विज आलोचकों की ओर देखते हैं। वो इसी की वजह से है। दलित साहित्य में उपन्यास लिखे जा रहे हैं, कविताएं, कहानियां लिखी जा रही हैं, पर आलोचना का, खासकर दलित साहित्य की आलोचना का उस प्रकार से विकास नहीं हो रहा है। उसके लिए वो फिर उन्हीं लोगों को देखते हैं, जिनसे वो बहुत सहमत नहीं है या जिनको विरोधी समझते हैं। इसका कारण यही है क्योंकि हमारे पास दलित साहित्य को निर्धारित करने वाले मापदंड नहीं हैं। दलित साहित्य का सौंदर्य किस बात में है, उसकी भाषा की ताकत किस बात में है, एक दलित साहित्य की रचना में किस तत्व पर जोर दिया जाना चाहिए? ये सारे सवाल आज के दलित साहित्यकारों की चिंता के विषय नहीं बने हैं। और इसीलिए दलित साहित्य में आलोचना का कोई विकास नहीं हुआ है। जो गैरदलित लेखक हैं, वे दलित साहित्य नहीं लिख सकते हैं। इसलिए नहीं लिख सकते हैं, क्योंकि उनके अनुभवों की एक सीमा है।उन्हें दलित जीवन का वो अनुभव नहीं है। वे सहानुभूति रख सकते हैं, सहानुभूति के साथ साहित्य लिख सकते हैं। ये बात तो दलित लेखक के साथ भी लागू हो सकती है कि अगर वो ऐसे विषय पर लिखना चाहे, युद्ध के विषय पर, और वो स्वयं युद्ध में कभी न गया हो, तो यह उस पर भी लागू होती है। लेकिन देखना यह चाहिए कि जो व्यक्ति उन अनुभवों को हासिल करता है और करने के बाद लिखता है। मुल्कराज आनंद ने ‘अछूत’ उपन्यास लिखा है, बहुत महत्वपूर्ण उपन्यास है। हिंदी में एक लेखक है- मदन दीक्षित, मोरी की ईंट उनका बहुत ही महत्वपूर्ण उपन्यास है, सफाई कर्मचारियों के समाज पर लिखा गया, उतना अच्छा दूसरा कोई उपन्यास नहीं मिलेगा आपको। इतने भीतर के अनुभवों को हासिल करके उन्होंने ये लिखा, लेकिन चूंकि दलित साहित्य की कोई वस्तुगत कसौटी निर्धारित नहीं है, इसलिए उस उपन्यास पर चुप्पी साध ली जाती है, उसके महत्व को स्वीकार नहीं किया जाता, उस पर चुप हो जाते हैं लोग।

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दलित विमर्श की जो सीमाएं हिंदी में दिखाई देती हैं उसमें एक बड़ा महत्वपूर्ण सवाल है कि देश की जो बाकी परिस्थितियां हैं, जो परिवर्तन हो रहे हैं देश में, जो आंदोलन हो रहे हैं देश में, उनके बारे में दलित विमर्श का क्या दृष्टिकोण है? इराक युद्ध है, अफगानिस्तान युद्ध है, भूमंडलीकरण है, बाजारवाद है, बहुराष्ट्रीय कंपनियों का दबदबा है, इन सबके बारे में दलित विमर्श का कोई दृष्टिकोण होगा या नहीं होगा? ये सवाल अभी तक अनुत्तरित है। और इससे भी बड़ा सवाल है कि दलित विमर्श में जो जाति का प्रश्न है, उसका दलित के जीवन के आर्थिक प्रश्न से क्या संबंध है? जाति के प्रश्न का वर्ग के प्रश्न से क्या संबंध है? अभी भी इसको खुलकर और एक स्थापित तथ्य की तरह से स्वीकार नहीं किया गया है। ये कहा गया है कि सामाजिक बेइज्जती मूल समस्या है दलित विमर्श की, गरीबी नहीं। सामाजिक बेइज्जती अखरती है, गरीबी नहीं। गरीब ब्राह्मण की बेइज्जती नहीं होती है, दलित की होती है। ये तर्क बिल्कुल सही है। हिंदुस्तान में जाति प्रथा के आधार पर शोषण की प्रणाली हिंदुस्तान की एक ऐसी मौलिक विशेषता है, जो हमारे जानते और किसी समाज में नहीं दिखाई देती। और यही कारण है कि मार्क्सवाद जो पूरे विश्व के मेहनतकश लोगों के लिए एक मुक्तिकामी दर्शन है और आज भी है, उस मार्क्सवाद को जब हम भारत में  लागू करने की कोशिश करते हैं, तो उसमें ये दलित प्रश्न बाहर रह जाता है। क्योंकि मार्क्सवाद में इसका कोई विवेचन नहीं है। मार्क्सवाद की इस कमी को अंबेडकर के बिना पूरा कर नहीं सकते। हिंदुस्तान में उत्पादन में अतिरिक्त मूल्य के आधार पर होने वाले शोषण के अलावा हिंदुस्तान में शोषण की एक अपनी देशज प्रणाली रही है, जो धर्म, संस्कृति और समाज के आधार पर खड़ी की गई है। उसमें आर्थिक शोषण भी है। और ये जो शोषण की प्रणाली है इसे सबसे पहले बहुत विस्तार के साथ ज्योतिबा फुले ने दिखाया था। ज्योति बा फुले का एक नाटक है- तृतीय रत्न, आज के हर नागरिक को ये नाटक पढ़ना चाहिए। ये नाटक ‘तृतीय रत्न’ और उनकी किताब ‘गुलामगिरी’- ये दो किताबें ऐसी हैं, जो हमें बताती हैं, कि ये जाति के आधार पर शोषण की जो प्रणाली है, जिसे हम ब्राह्मणवाद का नाम देते हैं, ये ऐज ए सिस्टम कैसे काम करता है, ये फंक्शन कैसे करता है, ये सिस्टम है क्या, ये पहली बार ज्योतिबा फुले ने बताया। और अंबेडकर दूसरे व्यक्ति हैं, जिन्होंने इस चीज को एक शास्त्र तक पहुंचा दिया। वैज्ञानिक विवेचन जो समाजवाद के विभिन्न विचारों को लेकर मार्क्स ने किया, एक वैज्ञानिक समाजवाद का दर्शन रखा, वो काम हिंदुस्तान में जाति को लेकर जो शोषण का जो पूरा तंत्र है, उसको अंबेडकर ने सबसे वैज्ञानिक रूप में पेश किया। और इस संदर्भ में भारतीय परिस्थितियों में ये ज्योतिबा फुले और अंबेडकर मार्क्स के जैसे ही हैं हमारे लिए, ये हमें समझ लेना चाहिए। हिंदुस्तान में मार्क्सवादी आधार पर क्रांति करने के लिए फुले और अंबेडकर की विचारधारा को शामिल करके, जोड़कर ही हम आगे बढ़ सकते हैं, इस चीज को बहुत से मार्क्सवादी स्वीकार करने लगे हैं, महसूस करते हैं, लेकिन जो ऑफिसयल मार्क्सिज़्म है, उसमें वो चीज अभी भी आई नहीं है और वो बहुत सारे वैचारिक उहापोह में हैं कि इसको कैसे शामिल किया जाए? जब मार्क्स अपनी विचारधारा के विकास के लिए हेगल जैसे सामंतों के पुरोहित प्रोफेसर से, राज्य के अपने आदमी से उसके दर्शन की विशिष्टताओं को ले सकते थे कि हमारा दर्शन पूर्ण हो, तो हम अंबेडकर और फुले से क्यों नहीं ले सकते? जबकि अंबेडकर और फुले की तो वर्गीय स्थिति वैसी नहीं है, जैसी हिगेल के थी। उनकी तुलना में ये बहुत प्रगतिशील लोग हैं।
तो मित्रो, जाति और वर्ग का सवाल हिंदुस्तान में सामाजिक परिवर्तन के लिए बहुत अहम सवाल है। ये मैं इसलिए कह रहा हूं, क्योंकि जिस तरह अंबेडकर को छोड़कर हिंदुस्तान में सामाजिक परिवर्तन नहीं किया जा सकता, उसी तरह से मैं इतनी ही कड़वी सच्चाई है कि हिंदुस्तान में सामाजिक परिवर्तन करने के लिए सिर्फ अंबेडकर काफी नहीं होंगे, उनसे आगे जाना होगा। और वो आगे जो हम जाएंगे, उसमें मार्क्सवाद हमारी बहुत मदद करता है। देखिए ज्ञान का जो विकास होता है, वो कैसे होता है? ज्ञान कोई एक बनी बनाई स्थिर चीज नहीं है, कि किताबों में बंद कर दिया गया है और ज्ञान उतना ही रहेगा, ऐसा नहीं है। ज्ञान का विकास विभिन्न स्रोतों से होता है। समाज के सामने जो समस्याएं खड़ी होती हैं, उनको समझने के लिए होता है, उन समस्याओं का हल करने के लिए होता है। हिंदुस्तान में अगर हम क्रांति करना चाहते हैं, हम एक समतामूलक समाज कायम करना चाहते हैं तो हमें अंबेडकर और ज्योतिबा फुले और मार्क्स- तीनों के महत्व को समझना होगा, इस वैचारिक विकास को हमें करना होगा, वर्ना हम हिंदुस्तान को नहीं बदल सकते। हम एक समतामूलक समाज नहीं कायम कर सकते।दलित की जो सामाजिक बेइज्जती है, उसके आर्थिक स्रोत भी होते हैं। उसकी जो आर्थिक विवशता है, उसके पास कुछ भी नहीं है। अंबेडकर ने इसी चीज की ओर तो ध्यान खींचा हमारा कि मध्यकाल के संत लोगों ने  लिखा कि ईश्वर के बनाए हुए सब बंदे हैं इसलिए सब बराबर हैं। पर सवाल ईश्वर के बनाए हुए बंदों की समानता का नहीं है। सवाल इस समाज में कायम भौतिक असमानता का है। एक दलित को उन सारे अधिकारों से, संपत्ति के अधिकारों से वंचित करके रखा गया है, सवाल उसके मानवाधिकारों का है। सवाल उसके लोकतांत्रिक-नागरिक अधिकारों का है, सवाल समाज के उत्पादन में उसके हिस्से का है। और ये जो वो वंचित है सब चीजों से, यह भी उसकी सामाजिक बेइज्जती का एक स्रोत है बहुत बड़ा। जिस दलित के पास कुछ भी नहीं होगा, उसकी तो सामाजिक बेइज्जती हर तरह से होगी। जब तक वो आर्थिक रूप से मजबूत नहीं होगा, उसकी आर्थिक मुक्ति नहीं होगी। जब तक एक शोषित वर्ग के रूप में वह मुक्त नहीं होगा, तब तक उसकी बेइज्जती खत्म नहीं होगी। और यहाँ मार्क्स  की  जरूरत हमें पड़ेगी।

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एक आखिरी जो सवाल मैं उठाना चाहता हूँ, इस पर हिंदी का दलित विमर्श नहीं ध्यान देता है । किसी भी उत्पीडि़त समुदाय की मुक्ति के लिए यह बहुत महत्वपूर्ण सवाल है कि दूसरे उत्पीडि़त समाजों की मुक्ति के बारे में वो क्या सोचता है? कोई भी उत्पीडि़त समाज अगर सिर्फ अपनी मुक्ति के बारे में सोचता है, वो कभी मुक्त नहीं हो सकता, जब तक कि वो दूसरे उत्पीडि़त समाजों की मुक्ति के बारे में भी न सोचे, उनके प्रति एक सही रवैया न रखे, उनके साथ मिलकर चलने को तैयार न हो। ये पांडिचेरी में प्रोफेसर हैं मुरुशेखर साहब, कई लोगों ने उनके एक नाटक की चर्चा की है, बलि का बकरा, तमिल के अच्छे, बहुत अच्छे लेखक हैं, नाटक लिखते हैं- बलि का बकरा। देवी का रथ जो खींचा जाता है वर्ष में एक बार, गांव में ब्राह्मणों के द्वारा, तो उसको खींचते हुए रस्सी टूट गई, रस्सा टूट गया, तो देवी को बहुत कोप आया। देवी अब श्राप देती इस गांव को। तो उससे कैसे बचा जाए? ब्राह्मणों की सभा होती है, तो उस सभा में ये तय होता है, कि देवी के कोप से बचने के लिए, देवी को प्रसन्न करने के लिए अब एक बलि उसको देनी जरूरी है। किसकी बलि दी जाए? सारे ब्राह्मण पीछे हट जाते हैं, छुप जाते हैं। अंत में एक दलित युवक को खोज लिया जाता है इस बलि के लिए। और उस दलित युवक को पकड़ के लाया जाता है कि चलो तुमको गांव के लिए बलि होना है, तभी देवी शांत होंगी। वो मजबूर आदमी, उसका अपने जीवन पर कोई अधिकार नहीं। उसकी पत्नी रोती-कलपती पीछे आती है, कि मेरे पति को छोड़ दो, बहुत कुछ कहती है, लेकिन ब्राह्मणों का दिल नहीं पसीजता है। लेकिन उसके पति के दिमाग में एक बात आती है, वो कहता है, दलित ही की बलि देनी है न, ठीक है, ये मेरी पत्नी है, मैं बोलता हूं इसकी बलि दे दो। मुझे जाने दो। जिस व्यक्ति का अपने जीवन पर कोई अधिकार नहीं है, वह दूसरे के जीवन पर इतना अधिकार जमा रहा है, कि उसकी बलि दे दो!ये जो दूसरा व्यक्ति है, स़्त्री, दलित-स्त्री, इसकी आवाज हमारा दलित विमर्श उसी तरह से नहीं उठाता है। वो उसे इनकार तो नहीं करते हैं, लेकिन वो बहुत कम्फर्टेबुल भी फील नहीं करते। असुविधा महसूस करते हैं। और इसीलिए ये दलित स्त्री विमर्श की आवाज उठेगी। तो दलित समाज, दलित विमर्श अगर दलित स्त्री की मुक्ति के सवाल पर नहीं सोचेगा, उस सवाल को मान्यता नहीं देगा, तो वह अपनी भी मुक्ति नहीं कर सकता। और दुर्भाग्य से हिंदी दलित विमर्श में ये घटना वास्तविक रूप से घटी है कि दलित विमर्श की एक धारा, इतनी स्त्री विरोधी हो चुकी है वो धारा कि मैं समझता हूं कि वो दलित समाज की मुक्ति से भी बहुत दूर हो चुकी। अंबेडकर इतने महत्वपूर्ण व्यक्ति थे, उन्होंने स्त्रियों के सवाल पर बहुत लिखा, फुले ने बहुत लिखा, शाहू ने बहुत लिखा, पेरियार ने बहुत लिखा, मैंने किसी दलित लेखक को नहीं देखा कि उनके साहित्य का विवेचन करे स्त्री के प्रश्न पर। इसलिए स्त्रियों को यह सवाल अलग से उठाना पड़ रहा है। इतनी सी बातें तो मैं दलित विमर्श के बारे में कहना चाहता था।
प्रो.वीर भारत तलवार

प्रो.वीर भारत तलवार

प्रो.  वीर भारत तलवार,  प्रख्यात हिन्दी आलोचक, जेएनयू में प्राध्यापक। उनसे virbharattalwar@gmail.com पर संपर्क संभव है। 
हैदराबाद में दिये गए व्याख्यान का पहला अंश। शेष अगले किश्तों में। 
साभार समकालीन जनमत 

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