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निकानोर पार्रा उर्फ़ ‘जनता के धैर्य की ऐसी की तैसी’: रॉबर्तो बोलान्यो

रॉबर्तो बोलान्यो, मार्खेज के बाद का सबसे बड़ा अफसानानिगार, और आज की तारीख में उतना ही लोकप्रिय है. कवि के सच्चे अर्थों में वह निकानोर पार्रा को स्पेनिश/लातिनी अमरीकी संसार का एक मात्र महान कवि मानता था. यह अद्भुत संयोग है कि दोनों नोबेल पुरस्कार को डिजर्व करते थे और दोनों को नहीं मिला. पार्रा जीते-जी (क्योंकि शायद ही कोई कवि इतना जी पाया) लीजेंड की छवि को प्राप्त कर लिए थे और इसके लिए उन्हें काफी संघर्ष करना पड़ा, अगर वह सामान्य उम्र पाते तब उसकी लीजेंड छवि बोलान्यो की तरह ही मरने के बाद उभरती. जब बोलान्यो मरा तब पार्रा ने लिखा, “रॉबर्तो हमें पछाड़ गया/ चिली के लिए अभूतपूर्व क्षति/ मेरे स्वयं के लिए अभूतपूर्व क्षति/ हर किसी के लिए अभूतपूर्व क्षति/ शेष मौन हैं/ एक महान ह्रदय विस्फ़ोट कर गया/ मेरे प्यारे राजकुमार, शुभरात्री/ परियों के गान  का समवेत स्वर तुझे लेने बाहर आ गया है.

2003 के पहले से ही रॉबर्तो बोलान्यो निकानोर पार्रा को अपना गुरु मानते हुए उन्हें याद किया करता था, उनके बारे में बोलता था, लिखता था. यहाँ प्रस्तुत बोलान्यो के इस लेख को निकानोर पार्रा के लिए श्रद्धांजली स्वरुप पेश बहुतेरे लेखों में सबसे महत्वपूर्ण मान सकते हैं. इसके हिन्दी अनुवाद के लिए संतोष झा और उदय शंकर के हम आभारी हैं. #तिरछीस्पेल्लिंग

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रॉबर्तो बोलान्यो और निकानोर पार्रा 

निकानोर पार्रा के साथ आठ सेकंड

By रॉबर्तो बोलान्यो

निकानोर पार्रा की कविता के बारे में, इस नई शताब्दी में, मैं निश्चित तौर पर कह सकता हूँ कि यह टिकाऊ होगी। ज़ाहिर है कि यह कहने का कोई ख़ास अर्थ नहीं है; और इस बात से सबसे ज्यादा वाकिफ खुद पार्रा ही हैं। हालांकि, पार्रा की कविताओं का यह टिकाउपन होर्खे लुईस बोर्खेस, फ़ेसर वायेहो, लुईस सरनोदा और कुछ अन्य लोगों की कविताओं के साथ बरकरार रहेगा। लेकिन, हमें यह कहना पड़ेगा कि इससे बहुत ज़्यादा फ़र्क़ नहीं पड़ता है।

पार्रा के दांव, भविष्य की ओर फेंके गए उसके अन्वेषण को यहां समझना काफी जटिल काम है। यह उतना ही ओझलपूर्ण भी है। यह ओझलता गति की ओझलता है। हालांकि बोलता हुआ, अपनी भंगिमाओं को साधता हुआ वह अभिनेता रंगपटल पर पूरी तरह से दृश्यमान है। उसकी खूबी, उसके परिधान, उसके साथ आने वाले प्रतीक, जैसे फोड़े में प्रवाहित विद्युत्-तरंग: वह एक कवि है, जो कुर्सी पर बैठे-बैठे सो जाता है, एक कमांडर, जो क़ब्रिस्तान में खो जाता है, सम्मेलन का एक वक्ता, जो अपने बालों को हाथ से झटकते-झटकते उन्हें खींचने लग जाता है, अपने घुटनों पर टिका एक बहादुर आदमी, जो मूतने की हिम्मत करता है, एक तपस्वी, जो समय को बरसों-बरस गुज़रते देखता है, एक अभिभूत सांख्यिकीविद्; ये सारी छवियाँ दृश्यमान हैं। पार्रा को पढ़ने से पहले इस सवाल पर सोचना ज्यादती नहीं होगी, वही सवाल जो विटिंग्सटाइन हमसे और स्वयं से भी पूछता हैः क्या यह हाथ, एक हाथ है या यह हाथ नहीं है? (किसी के हाथ को देखते हुए यह सवाल पूछना चाहिए।)

मैं खुद से पूछता हूं कि पार्रा की वह किताब कौन लिखेगा, जिसके बारे में उसने सोचा और कभी नहीं लिखाः यातनाशिविर-दर-यातनाशिविर, जंग-दर-जंग के विस्तृत आख्यान अथवा रुदाली से भरा द्वितीय विश्व युद्ध का इतिहास; एक कविता जो नेरुदा के कैंटो जनरल के ठीक विपरीत हो। नेरुदा के कैंटो जनरल के ठीक विपरीत वाली कविता की किताब से केवल एक हिस्सा ही पार्रा अपने नाम सुरक्षित कर सके और वह है, मॅनीफेस्टो। इसी मॅनीफेस्टो में वह अपने काव्यात्मक सौंदर्यबोध को प्रस्तुत करता है, हालांकि पार्रा को जब भी जरुरत महसूस हुयी उसने उस सौंदर्यबोध को ख़ुद ही अनदेखा किया। क्योंकि सौंदर्यबोध सच्चे लेखकों के गुहांधकार पर हल्की रौशनी डालता है और एक अस्पष्ट विचार बनाने में मदद करता है; और  अक्सरहां यह संभव भी नहीं हो पाता क्योंकि जोखिम और संकट की ठोस जमीन उभर आने के समय यह लगभग बेकार का अभ्यास बन जाता है।

युवाओं को पार्रा के अनुयायी बनने दीजिए। केवल युवा ही बहादुर होते हैं, उन्हीं की आत्माओं में पवित्रता है। इसके बावजूद, पार्रा जवानी के जोश या होश खोने की कविता नहीं लिखता है, वह पवित्रता के बारे में नहीं लिखता है। वह तो पीड़ा और एकांत के बारे में, निरर्थक और अनिवार्य चुनौतियों के बारे में, आदिवासियों की तरह बिखर जाने को अभिशप्त शब्दों के बारे में लिखता है। पार्रा ऐसे लिखता है जैसे वह कल बिजली के तार को पकड़कर झूलने जा रहा है। जहां तक मुझे याद है, मैक्सिकन कवि मारियो सैंटियागो ही एकमात्र व्यक्ति था जिसने पार्रा की रचनाओं का विषद अध्ययन किया था। हममें से बाक़़ी लोगों ने केवल एक स्याह पुच्छल तारे को देखा है। किसी उत्कृष्ट कृति की पहली अनिवार्यता है, किसी की नज़र की तपिश महसूस किये बिना गुज़र जाना।

एक कवि की यात्रा में ऐसे क्षण आते हैं, जब उसके पास खुद को सुधारते रहने के सिवा कोई दूसरा विकल्प नहीं बचता है। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि वह कवि,  गोन्ज़़ालो दे बर्थ्यो को मुंहज़बानी सुनाने में सक्षम है या वह हेप्टा-सिलेबल्स और गार्थिलासो के 11-सिलेबल् छंदों को किसी के बनिस्पत ज़्यादा अच्छी तरह जानता है। इन सब के बावजूद जीवन में ऐसे क्षण आते हैं, जब केवल एक चीज करने को बचती है और वह यह कि ख़ुद को अतल खाई में झोंक देना है या चिली के संभ्रांत घरानों के सामने नंगे खड़े हो जाना है। बेशक, उसे यह पता होना चाहिए कि सामने आने वाले भयंकर नतीजों का सामना कैसे करें। किसी उत्कृष्ट कृति की पहली अनिवार्यता है, किसी की नज़र की तपिश महसूस किये बिना गुज़र जाना।

एक राजनीतिक टिपण्णी:

पार्रा ज़िन्दा बने रहने में सक्षम है। इसमें ऐसी कोई बड़ी या महान बात नहीं है, लेकिन बात तो है। दक्षिणपंथ की तरफ स्पष्ट झुकाव रखने वाला चिली का वामपंथ उसे हरा नहीं पाया, न ही नव-नाज़ी और चिली का भ्रामक दक्षिणपंथ ही उसका कुछ बिगाड़ पाया। हाल ही में अघोषित मिलीभगत से अंजाम दिए गए दमन और नरसंहार को अपवाद मान लें तो लातिन अमरीकी स्टालिनवाद भी उसे पराजित न कर सका, न ही वैश्वीकृत हो चुका लातिन अमरीकी दक्षिणपंथ। अमरीकी विश्वविद्यालय के कैंपसों के तुच्छ (मीडियाकर) लातिन अमरीकी प्रोफेसर उसे शिकस्त नहीं दे पाए, न ही सैंटियागो के गांवों में भटकने वाले जॉम्बिज़। यहां तक कि पार्रा के चेले भी पार्रा को मात देने में कामयाब नहीं हो सके। इन सबके बावजूद और अपने अति-उत्साह में ही सही मैं कहूँगा कि न सिर्फ पार्रा बल्कि उसके भाई-बहन, प्रसिद्धि की चरम पर विराजमान उसकी बहन वायलेता और उसके विद्रोही माता-पिता सभी ने कविता की सार्वकालिक सर्वश्रेष्ठ महत्वाकांक्षाओं में से एक को अपने-अपने व्यवहार में अपनाया है, और वह है, जनता के धैर्य की ऐसी की तैसी।

“सितारे (स्टार्स) कैंसर का इलाज करने में सक्षम हैं, यह एक ग़लतफ़हमी है”, “तुम बंदूक की बात करते हो, मैं याद दिलाना चाहता हूँ कि आत्मा अमर है” अव्यवस्थित ढंग से चुनी गईं ये काव्य-पंक्तियाँ पार्रा की हैं। वह एक फ़कीर की तरह सच्चा है, और हम, कौन जियेगा और कौन मर गया की परवाह किये बिना, चलते चले जा सकते हैं । पार्रा एक मूर्तिकार और विज़ुअल आर्टिस्ट भी है, इसके बावजूद मैं यह याद दिलाता चलूँ कि ऐसे स्पष्टीकरण निहायत बेहूदा हैं। पार्रा एक साहित्यिक आलोचक भी है। उसने चिली के पूरे साहित्यिक इतिहास को एक बार तीन छंदों में समेट दिया: “चिली के महान कवि चार/ तीन हैं:/ एलोन्सो दे अर्थिया और रुबेन दारियो।’’

जैसा कि कथा-साहित्य में हम पहले से ही देख रहे हैं, 21 वीं सदी के आरंभिक वर्षों की कविता एक हाइब्रिड कविता होगी। नए औपचारिक झटकों की ओर संभवतः हम बढ़ भी चुके हैं लेकिन भयावह सुस्ती से लैस। उस अनिश्चित भविष्य में हमारे बच्चे एक कवि, जो कि कुर्सी पर बैठे-बैठे सो जाता है, के ऑपरेटिंग टेबल पर हुए वैचारिक मुठभेड़ पर चिंतन करेंगे और, रेगिस्तान के उस काले पक्षी पर भी विचार करेंगे, जिसका चारा ऊंट की देह से खून चूसने वाला परजीवी हैं। अपने जीवन के अंतिम क्षणों में किसी समय ब्रेटन ने बताया था कि अवैध और गुप्त कारवाईयों के लिए सर्रियलिज़्म की कितनी आवश्यकता है, ताकि शहरों के नालों और पुस्तकालयों को शरणगाह बनाया जा सके। यह कह चुकने के बावजूद दुबारा इस विषय को उसने अपना शरण नहीं बनाया। यह किसने कहा इससे आज कोई फ़र्क नहीं पड़ता है: वह वक़्त कभी नहीं आएगा, जब आतिश-ए-लब ख़ामोश रहे।

 

यह लेख रॉबर्तो बोलान्यो के लेखों, निबंधों और भाषणों के संकलन की पुस्तक के अंग्रेजी अनुवाद Between Parentheses: Essays, Articles and Speeches, 1998-2003  से लिया गया है.

हिंदी अनुवाद: संतोष झा और उदय शंकर

संतोष झा, हिरावल, पटना से सम्बद्ध मशहूर संस्कृति कर्मी, नाट्यकर्मी और अद्भुत संगीतकार हैं, साहित्य में रूचिवश उन्होंने यह अनुवाद किया है. इनसे आप hirawal@gmail.com के द्वारा संपर्क कर सकते हैं.

उदय शंकर जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय ,नयी दिल्ली से डॉक्टरेट हैं. हिंदी के शोधार्थी और आलोचक हैं. हिंदी के महत्वपूर्ण आलोचक  सुरेंद्र चौधरी की रचनाओं को तीन जिल्दों में संपादित किया है. इनसे  udayshankar151@gmail.com पर बात की जा सकती है.

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गंदगी से लाचार लिबास एवं अन्य कवितायें: रॉबर्तो बोलान्यो

“सत्तर के शुरू की बात है शायद। मेक्सिको शहर में, या शायद कोई और लातिन अमेरिकी शहर रहा होगा, एक कवि सम्मलेन हो रहा था. कवि आते जा रहे थे, कविता कभी निलंबित, कभी ज़लील  होती जा रही थी. तमाशे के आदी लोग, जो कुछ सुनाई दे रहा था उसे कविता जान खुश थे.  अचानक सभा में एक बरगलाया सा लौंडा ऐसे घुसा मानो अभी अपने बस्ते से बन्दूक निकाल सब कवियों का मुँह वन्स एंड फॉर आल बंद कर देगा। जैसे ही लौंडे ने हाथ बस्ते में डाला चूहों और कवियों में फर्क में करना कठिन हो गया. थैंकफुल्ली चूहे मौका देख फरार हो गए. लौंडे की आँखों में खून था — कुछ नशे के कारण कुछ नींद के.  उसने बस्ते में हाथ डाला और एक कागज़ का परचा निकाल उसे से जोर जोर से पढ़ने लगा. लौंडा कवि निकला। चीख चीख कर लौंडा जिसे पढ़ रहा था वह उसकी कविता नहीं, बल्कि भविष्य की  उसकी कविताओं का घोषणापत्र था. लौंडा पढ़ता रहा, लोग सुनते रहे. फिर अंतरिक्ष के किसी दूर कोने से आये धूमकेतु की तरह अपना प्रकाश बाँट लौंडा अंतर्ध्यान हो गया. वह लौंडा बोलान्यो था. ” मयंक तिवारी की कही इन्हीं पंक्तियों के साथ लीजिये प्रस्तुत है  उदय शंकर द्वारा अनुदित रॉबर्तो  बोलान्यो की  तीन  कवितायें .

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Snap Shot- Endless Poetry (2016)

By रॉबर्तो  बोलान्यो

लिजा उवाच

मेरी दुनिया वहीं,

टेप्याक के पुराने गोदाम वाले टेलीफोन बूथ में

ख़त्म हो गई,

जब लिजा ने बताया कि वह किसी और के साथ सोयी.

लंबे बाल और बड़े लंड वाला वह दुबला-पतला लौंडा

उसे चोदने के लिए एक और डेट की भी मोहलत नहीं ले सका.

उसने बताया कि इसमें इतना गंभीर होने वाली बात कुछ भी नहीं है, लेकिन

तुझे अपने जीवन से निकालने के लिए इससे बेहतर कोई और उपाय भी नहीं है.

पारमेनीडेस गार्सिया साल्दाना लंबे बाल रखता था

उसमें लिजा के प्रेमी होने की संभावनाएं थीं

सालों बाद पता चला कि वह एक पागलखाने में मर गया

या खुद से ही खुद को मार डाला.

लिजा अब किसी भी गांडू के साथ सोना नहीं चाहती थी.

कभी-कभी वह सपने में आती है

और मैं देखता हूँ कि

लवक्राफ्टियन मैक्सिको में

वह खुश और शांत है.

हमने संगीत सुना (टैंड हीट, जो कि पारमेनीडेस गार्सिया साल्दाना का प्रिय बैंड था)

और तीन बार सम्भोग किया.

पहली बार वह मेरे भीतर उतर आया

फिर मुँह में

और तीसरी बार पानी के धागे से बंधी बंसी की तरह

मेरी छातियों के बीच फंस गया.

यह सब हुआ सिर्फ दो घंटों में, लिजा ने कहा.

मेरी जिन्दगी के बदतरीन दो घंटे,

मैंने फ़ोन के दूसरी छोर से कहा.

लिजा की याद

रात के अंधेरों से छनती

लिजा की यादें फिर से झरती हैं.

एक जंजीर, उम्मीद की एक किरण:

मैक्सिको का एक आदर्श गाँव,

बर्बरता के समक्ष लिजा की मुस्कान,

लिजा की एक स्थिर तस्वीर,

लिजा के खुले फ्रिज से एक धुंधली रौशनी

बेतरतीब कमरे में झड़ रही है,

जब कि मैं चालीस का हो रहा हूँ,

वह बरबस चिल्लाती है

मैक्सिको फ़ोन करो, शहर मैक्सिको फ़ोन करो,

अराजकता और सौंदर्य के बीच बड़बड़ाते

अपनी  एक मात्र सच्ची प्रेमिका से बात करने के लिए

फ़ोन बूथ के चक्कर लगाने वाले

रॉबर्टो बोलानो को फ़ोन करो.

गंदगी से भरपूर लाचार लिबास

कुत्तागिरी के दिनों में,

मेरी आत्मा मेरे दिल से पसीज गयी.

तबाह, लेकिन जीवित,

गंदगी से भरपूर लाचार लिबास,

फिर भी, प्यार से भरपूर.

कुत्तागिरी, जहाँ कोई भी अपनी

उपस्थिति दर्ज कराना नहीं चाहता.

जब कवि कुछ भी करने लायक नहीं रह जाते हैं

तब कुत्तागिरी की उपस्थिति-पंजि में

सिर्फ उनके ही नाम अंकित होते हैं.

लेकिन मेरे लिए अभी भी बहुत कुछ करना शेष था!

फिर भी, उजाड़ गाँवों से गुजरते हुए

मैं वहां गया,

लाल चींटियों, और तो और काली चींटियों द्वारा

अपनी मृत्यु के लिए अभिशप्त:

यह डर बढ़ता ही गया,

जब तक कि उसने तारों को चूम नहीं लिया.

मैक्सिको में पढ़ा एक चिलीयन

कुछ भी झेल सकता है,

मेरी समझ से यह सच नहीं है.

रात के अंधेरों में मेरा हृदय विलाप किया करता था.

एक रूहानी नदी तपते होठों को गुनगुनाती थी,

बाद में पता चला कि वह मैं था-

रूहानी नदी, रूहानी नदी,

इस बुद्धत्त्व ने इन उजाड़ गाँवों के किनारों से

खुद को एकमेक कर लिया.

धातुई यथार्थ के बीच

तरल वास्त्विकाताओं की तरह

उभरते हैं,

गणितज्ञ और धर्माचार्य

ज्योतिषी और डाकू.

सिर्फ जोश और कविता,

सिर्फ प्रेम और स्मृति ही दृष्टि देती है,

न कि यह कुत्तागिरी

न ही सामान्य राहगीरी.

न ही यह भूलभुलैया.

यह मैं तभी तक मानता रहा जब तक

मेरी आत्मा मेरे दिल से पसीज नहीं गयी थी.

यह सच है कि यह बीमार मानसिकता थी,

लेकिन फिर भी जिन्दादिली इसी में थी.

उदय शंकर द्वारा अनुदित ये कवितायें लोरा हेल्ली के अंग्रेजी अनुवादों पर आधृत हैं.

बोलान्यो दि बाप: मयंक तिवारी

By मयंक तिवारी 

जैसा मैं दिखता  हूँ, वैसा मैं लिखता हूँ. जी चाहे पढ़ लो, जी चाहे लड़ लो. पहले ऐसा कहते कुछ संकोच होता था. मैं लेखक हूँ कि नहीं? हूँ तो कैसा हूँ?  मगर बोलान्यो पढने के पश्चात हाल कुछ  ऐसा है मानो सीने  में  किसी ने तरस खा कर हिम्मत का इन्जेक्शन ठोंक दिया हो. वाकई,  बोलान्यो  बाप  है. और मेरे जैसे कुंठित, अपनी सड़ती जड़ो से पीठ फेरे, अपने इतिहास से अनभिज्ञ, अंग्रेजी में अपने आप को तोलने वाले लेखक के लिए तो बोलान्यो बाप से भी बढ़ कर है.

कितना आसान है किसी लेखक पर बकैती झाड़ना। दो चार किताबे पढ़ो, थोड़ा पकाओ, थोड़ा पचाओ, और उगल दो. आजकल सुनते है बकैती के लिए किताब की भी आवश्यकता नहीं है. लड़की से भी काम चल जाता है. साहित्य और सेक्स में फर्क केवल फॉर्म का रह गया है. अंग्रेजी साहित्य का तो यही हाल है.  हिंदुस्तान मे अंग्रेजी साहित्य मेट्रो का वह डब्बा है जिसमें  बैठकर कनॉट प्लेस ट्राफलगर स्क्वायर लगता है. यही कारण है कि अपने लेखको पर लिखने की मेरी कभी हिम्मत नहीं हुई. बोलान्यो की बात और है. बोलान्यो जवानी में अपनी तरह ही नशेबाज था. मर चुका है अब. शायद इसलिए अब बिलकुल बकवास नहीं करता। ईमानदार जिया, ईमानदार मरा. roberto

सत्तर के शुरू की बात है शायद। मेक्सिको शहर में, या शायद कोई और लातिन अमेरिकी शहर रहा होगा, एक कवि सम्मलेन हो रहा था. कवि आते जा रहे थे, कविता कभी निलंबित, कभी ज़लील  होती जा रही थी. तमाशे के आदी लोग, जो कुछ सुनाई दे रहा था उसे कविता जान खुश थे.  अचानक सभा में एक बरगलाया सा लौंडा ऐसे घुसा मानो अभी अपने बस्ते से बन्दूक निकाल सब कवियों का मुँह वन्स एंड फॉर आल बंद कर देगा। जैसे ही लौंडे ने हाथ बस्ते में डाला चूहों और कवियों में फर्क में करना कठिन हो गया. थैंकफुल्ली चूहे मौका देख फरार हो गए. लौंडे की आँखों में खून था — कुछ नशे के कारण कुछ नींद के.  उसने बस्ते में हाथ डाला और एक कागज़ का परचा निकाल उसे से जोर जोर से पढ़ने लगा. लौंडा कवि निकला। चीख चीख कर लौंडा जिसे पढ़ रहा था वह उसकी कविता नहीं, बल्कि भविष्य में उसकी कविताओं का घोषणापत्र था. लौंडा पढ़ता रहा, लोग सुनते रहे. फिर अंतरिक्ष के किसी दूर कोने से आये धूमकेतु की तरह अपना प्रकाश बाँट लौंडा अंतर्ध्यान हो गया. वह लौंडा बोलान्यो था.  मगर मैं भी हो सकता था.  इसलिए कहता हूँ, बोलान्यो बाप है.

अचानक कलम रुक गई.
कभी कभी रुकनी चाहिए कलम को.
लेट जानी चाहिए सफ़ेद पृष्ठ पे निढाल।
केवल ताड़े, कलम कवि को, कवि कलम को.

२०१३ की एक सितम्बरी शाम. एक बुकशॉप. मैं वक़्त को, वक़्त मुझे ज़ाया कर रहा था. मैं किताब चुराने आया था. ऐसा पहले दो बार कर चुका था. ‘फूको’ और ‘स्चोपेन्हौरेर’. तीसरी किताब खोज रहा था. मिली, मगर साली को खरीदना पड़ा. बोलान्यो की सैवेज डिटेक्टिव. उस दिन कोई ढंग की किताब मिल नहीं रही थी. फिलॉसोफी का खाना खाली सा था. वहां अमिश त्रिपाठी की किताबों का ढेर जमा था. चुराने लायक किताब कोई नज़र नहीं आ रही थी. कॉलेज की लड़कियों ने ऊधम मचा रखा था. तब अचानक याद आया कुछ दिन पहले फ़ोन पर उदय शंकर किसी लेखक के बारे में कह रहे थे. मैं उन्हें डेविड फोस्टर वॉलेस के किस्से सुना रहा था, वह मुझे विनोद कुमार शुक्ल पड़ने को उकसा रहे थे.  उस दिन गांजा ज्यादा हो गया था. अक्षर मुँह फांद फूट पड़े. क्या रखा है साहित्य में? क्यों पढ़े हम शुक्ल को, काफ्का को, हज़ारी परसाद द्विवेदी को, डेविड फोस्टर वॉलेस को.… जवाब में भाईजी ने गूगली फ़ेंक दी. “बोलान्यो पढ़ो समझ आ जाएगा।” बुकशॉप  से मैंने भाईजी को फिर फ़ोन किया. “… नाम भूल गया था.…” “बोलान्यो,” भाईजी ने प्रेम पूर्वक याद कराया। अगले दो घंटे मैंने बुकशॉप छान मारा मगर बोलान्यो न मिला। आखिर थक कर जब मैं जा रहा था तब बुकशॉप की एक महिला कार्यकरता  पास आई और कहने लगी की अक्सर जो कोई और नहीं ढूंढ पाता, मैं खोज लेती हूँ. सैवेज डेटेक्टिवेस, मैं बोला। महिला दफा हो गई. दो मिनट बाद बोलान्यो और बिल दोनों थमा दिये। खर्चा करके मैं कई अरसे बाद खुश हुआ था. सैवेज डेटेक्टिवेस का  सीधा सीधा अनुवाद दो जाहिल जासूस हो सकता है। अगर मुझे हिंदी में अनुदित करने को मिले तो मेरा टाइटल होगा: जवानी ज़िंदाबाद. किताब पड़ते पड़ते मैं कई बार रोया। ऐसा क्यों है आप किताब पड़कर ही समझ सकते है. किताब ख़त्म होते ही मैंने फ्लिपकार्ट पे दे दना दन बोलान्यो का सारा साहित्य जो कि अंग्रेजी मैं मौजूद था आर्डर कर दिया। पैसे कम थे इसलिए अगले ही दिन 2666 छोड़ सभी आर्डर रद्द कर दिये। 2666. उस झटके से मैं अब तक नहीं उबार पाया हूँ. मैंने साहित्य से आज तक जो जो सवाल किये, उन सब का जवाब 2666 में मौजूद है.

पठन-पाठन की दुनिया में ज्यादातर सभी मेरे दुश्मन है. मुझे भक्ति नहीं आती द्वेष भक्ति आती है. अंग्रेजी में लिखता हूँ और गुस्सा होने के लिए इतना काफी है. अंग्रेजी साहित्य गुंडा साहित्य है. मैं अंग्रेजी साहित्य को गुंडा इसलिए कह रहा हूँ क्योंकि मैं उससे डरता हूँ. इतना डरता हूँ की टट्टी लगने पे लैट्रिन कहना छोड़, लू लू करता फिर रहा हूँ. अंग्रेजी साहित्य गुंडा है क्योंकि इससे पहले हम उससे बदले वह हमें बदल देता है. अंग्रेजी साहित्य जितना खोखला होता गया उतना और फैल गया, चौड़ा हो गया.  शायद इसी लिए भारत में वह बहुत मशहूर है. मैं साहित्य की बात कर रहा हूँ, भाषा की नही. (भाषा में इतनी हिम्मत होती तो प्रसून जोशी को कौन नौकरी देता?) आज के अपराधी समय में साहित्य गुंडागर्दी न करे तो करे क्या, इस तर्ज़ पर भी बहस की जा सकती है. मगर ऐसा करने में मेरी कोई रूचि नहीं है. जिनकी हो उन्हें मेरी शुभकामनाएं। वह इस पठन को स्थगित कर गुंडे साहित्य पर क्राइम रिपोर्टिंग करे.

बोलान्यो पढ़ मेरा गुस्सा कुछ कुछ शांत सा होने लगा है. एक दिशा सी दिखने लगी. कविता फिर चालू हो गई है. सिर्फ ईमानदार रहना चाहता हूँ. किसके प्रति, अपने, आपके, या साहित्य के, यह अभी तय नहीं कर पाया हूँ. मगर लिखूंगा। जब तक दम है कलम चलेगी। मुश्किल वक़्त, कमांडो सख्त. अभी बोलान्यो मिले साल भर भी नहीं हुआ है और यह हाल है. इसीलिए कहता हूँ, बोलान्यो बाप है.

मयंक तिवारी

मयंक तिवारी

मयंक तिवारी अद्भुत पढ़ाकू आदमी हैं. अंग्रेजी अखबार डीनए में कॉलम और फिल्मों के लिए पटकथा लिखते हैं, फिल्म रागिनी एमएमएस से चर्चित. अंग्रेजी की मंचीय कविताओं वाले जमात में भी इनकी अच्छी खासी घुसपैठ है. फिल्म ‘सुलेमानी कीड़ा’ के मार्फ़त अभिनय की भी शुरुआत कर चुके हैं और कॉमेडी के कार्यक्रमों में भी अपना जलवा दिखा चुके हैं. उनसे mayankis@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है

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