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पढ़ने वाले की आँख निकल कर पेपर पर गिर पड़ती है: पीयूष राज

‘वह भी कोई देश है महाराज’ की समीक्षा लिखते हुए स्तंभकार, पटकथा लेखक और अभिनेता मयंक तिवारी कहते हैं कि अनिल यादव का लिखते रहना हिंदी में एक नयी जान फूंक सकता है. बीबीसी के वरिष्ठ पत्रकार राजेश जोशी का भी यही मानना है. ज्ञानरंजन तो लगभग फतवे के अंदाज में कहते हैं कि अनिल किसी बने-बनाये पथ के अनुगामी नहीं हैं और उनका मन  इस किताब (वह भी कोई देश है महाराज) को तरह-तरह से प्रचारित करवाना-करना चाहते हैं. यह किताब सचमुच में  हिंदी की पैठ को गैर-हिंदी और साहित्येत्तर इलाकों में करवाती है. इसके क्या कारण हो सकते हैं? पीयूष राज ने सुरेन्द्र चौधरी के बहाने सच ही कहा है कि ‘इस किताब में व्यक्त यथार्थ बिल्कुल भिन्न तरह का  है , जो सत्ता और जनता के अंतर्विरोध के साथ-साथ जनता के आपसी अंतर्विरोधों की प्रस्तुति करता है . प्रख्यात आलोचक  सुरेन्द्र चौधरी के शब्दों में यह ‘समकालीन यथार्थवाद’ है ‘ यह पुस्तक सत्य और असत्य, पक्ष और विपक्ष जैसे पहले से अवस्थित रूढ़ प्रारूपों के कहीं बीच रास्ते  बनाती हुयी  निकल जाती है. 
सूचना है कि अनिल यादव इन दिनों एक उपन्यास लिखने में व्यस्त हैं, तिरछिस्पेल्लिंग की तरफ से उन्हें शुभकामनायें, और पाठकों के अधीर होने से पहले पूरा करने की गुजारिश भी है. 

'वह भी कोई देश है महाराज' के आवरण पृष्ठ

‘वह भी कोई देश है महाराज’ के आवरण पृष्ठ

मधुमक्खियों के डंक झर तो नहीं जाते

(‘वह भी कोई देश है महाराज’ की समीक्षा )

By पीयूष राज 

क्या आप साहित्यिक विमर्शों से चट चुके हैं ? वैचारिक आग्रहों के बोझ से लदे चमत्कारपूर्ण वाक्य-विन्यासों से आपका सिर दर्द हो रहा है? और हर रोज बाज़ार आ रही नई-नई किताबों की तूफान में भी आपका दम घुट रहा है ? ऐसी स्थिति में अनिल यादव की किताब ‘वह भी कोई देश है महाराज’ ऑक्सीजन की सिलेंडर की तरह तुरंत राहत प्रदान करेगी . ऐसा इसलिए नहीं कि यह पुस्तक किसी पुरानी साहित्यिक जमीन को तोड़ती है और कुछ असाधारण रच देने का भाव लिए हुए है . बल्कि यह साधारणत्व के सौन्दर्य का पुनः सृजन है . इस किताब का अनूठापन इसी में छिपा है . लेखक के कथनानुसार यह यात्रा-वृतांत है (अगर इस तथ्य को उजागर नहीं किया जाए तो यह पुस्तक किसी लम्बी कहानी या उपन्यास की तरह है) और पूर्वोत्तर भारत पर केंद्रित है . यह यात्रा लेखक ने पुस्तक रचना के क़रीब दस साल पूर्व छः महीने की अवधि में की थी .पुस्तक पढ़कर ही यह समझा जा सकता है कि छः महीने के अनुभवों को समेटने में दस वर्ष का अन्तराल क्यों है . मुक्तिबोध के शब्दों में कहा जाए तो यह अन्तराल ‘संवेदनात्मक ज्ञान’ के ‘ज्ञानात्मक संवेदना’ में परिणत होने में लगा अन्तराल है .यह पुस्तक भावों के ठोस और पके रूप का सुन्दर उदाहरण है . इसके बिना यह पुस्तक पूर्वोत्तर की  कोई सामान्य सी यात्रा-वृत्तान्त  होती, बिल्कुल आज कल  अखबारों और पत्रिकाओं में छपने वाले यात्रा-वृत्तांतों की तरह जो  रूमानियत भरी अखबारी  रिपोर्टिंग से अधिक नहीं होती . अपने देखे-सुने और अनुभव किये भावों अर्थात् ‘संवेदनात्मक ज्ञान’ को रचनात्मक रूप देना एक कठिन कार्य होता है और पुस्तक के लेखक ने दस वर्षों में इस कार्य को सफलतापूर्वक अंजाम दिया. लेखक की पूर्वोत्तर यात्रा का सीधा उद्देश्य वहाँ की रिपोर्टिंग करके अपने पत्रकार कैरियर की बेरोजगारी समाप्त करना था. लेकिन बहुधा ऐसा होता है कि अपने पूर्व ज्ञान के आधार पर आपने जो सोच रखा था या किसी खास भौतिक परिस्थिति के बारे में आपकी जो बनी बनायी धारणा थी , आप उससे भिन्न परिस्थितियों का सामना करते हैं . संचित और शास्त्रीय सत्य  से ‘आँखिन देखी’ सत्य  के कारण उत्पन्न ज्ञान-भंग एक रचनात्मक तटस्थता का निर्माण करती है . इसके कारण अवलोकन का प्रस्थान बिंदु पूर्व निर्मित चेतना, विचार या विचारधारा की जगह भौतिक परिस्थिति हो जाती है. पूर्वोत्तर की यात्रा में लेखक के साथ भी यही रचनात्मक प्रक्रिया घटित हुई . इस पुस्तक में पूर्वोत्तर का इतिहास, संस्कृति, राजनीति, भूगोल, पर्यावरण सब कुछ समाहित है लेकिन ये किसी विषय की तरह अपने उपस्थित होने का आभास तक नहीं देते. पुस्तक को पढ़ते समय आपने कब लेखक के साथ-साथ राजनीति से इतिहास और इतिहास से लोककथाओं , मिथकों  से गुजरते हुए पूरे पूर्वोत्तर भौगोलिक-सांस्कृतिक और राजनीतिक यात्रा कर ली , इसका भान भी नहीं होता. किसी  त्रिविमीय फिल्म (थ्री डी मूवी) की तरह यहाँ पाठक भी यात्रा का सहभागी महसूस करता है .

           दरअसल  यह  पुस्तक का बहुकोणीय चित्रों की एक श्रृंखला का निर्माण करती है. हर चित्र अपने आप में संपूर्ण भी है और इसमें क्रमबद्धता भी है. उदाहरण के लिए पूर्वोत्तर के विभिन्न राज्यों और जगहों के वर्णन में उनकी अपनी अलग पहचान भी  है और एक अंतः संचरित एकता भी . यह पहचान और एकता पूर्वोत्तर के अपने विशिष्ट अंतर्विरोधों के कारण हैं . सामान्यतः यह माना जाता है कि पूर्वोत्तर के राज्यों का भारतीय शासन व्यवस्था से मुख्य अंतर्विरोध है . ‘पेट्रोल , डीजल , गैस , कोयला ,चाय देने वाले पूर्वोत्तर को हमारी सरकार बदले में वर्दीधारी फौजों की टुकड़ियाँ भेजती रही हैं’. इस तथ्य से किसी को इंकार नहीं है , परन्तु पूर्वोत्तर भारत का यह एक मात्र सत्य या अंतर्विरोध नहीं है . वहाँ की जनजातियों के आपसी अंतर्विरोध और भी गहरे हैं . एक जगह जो समुदाय शोषित-पीड़ित दिखता है दूसरी जगह वही  शोषक भी है . इस यथार्थ की खूबसूरत प्रस्तुति लेखक की रचनात्मक तटस्थता के कारण संभव हो पाई है. यह यथार्थवाद बिल्कुल भिन्न तरह का यथार्थवाद है , जो सत्ता और जनता के अंतर्विरोध के साथ-साथ जनता के आपसी अंतर्विरोधों की प्रस्तुति करता है .प्रख्यात आलोचक  सुरेन्द्र चौधरी के शब्दों में यह ‘समकालीन यथार्थवाद’ है . इस तरह के यथार्थ को रचनात्मक रूप देना लेखकीय तटस्थता से ही संभव है . विचारजन्य आत्मीयता की जगह परिस्थितिजन्य आत्मीयता से लेखक ने पूरे पूर्वोत्तर के दर्द को इतिहास, संस्कृति और भूगोल के माध्यम से पाठक के सामने मूर्त रूप दिया है . पूर्वोत्तर की बदलती संस्कृति ,नए-पुराने , भीतरी-बाहरी इस सब द्वंद्वों को पाठक भी महसूस करता है  .इस प्रक्रिया में  रस के सभी स्थायी भाव पाठक के ह्रदय में उद्बुद्ध होते हैं . उत्साह , क्रोध, जुगुप्सा , रति , विस्मय ,भय ,शोक , शांत जैसी भावनाओं का  निरंतर गतिशील प्रवाह पाठक के भीतर चलायमान रहता है . ऐसा वर्णन के लिए आत्मीय भाषा के प्रयोग से ही संभव हो सका है . एक पौराणिक कथावाचक या सूत्रधार की तरह लेखक आपके सामने प्रकट होता है और कथा का पात्र होते हुए भी परिदृश्य से गायब हो जाता है . शब्दों के माध्यम से लेखक पाठक का सीधा साक्षात्कार पूर्वोत्तर से करता है . पाठक को ऐसा भान होता है कि लेखक नहीं बल्कि वह स्वयं यात्रा पर है .

     इस पुस्तक की एक अन्य खासियत यह है कि बहुत दिनों बाद सामान्य बातचीत की भाषा की शक्ति का उपयोग साहित्यिक भाषा में किया गया है . उदाहरण के लिए ब्रहम्पुत्र मेल बाहरी आवरण के वर्णन को पढ़ने से उत्पन्न जुगुप्सा के बाद शायद ही आप उस ट्रेन से यात्रा करना पसंद करें –‘अँधेरे डिब्बों की टूटी खिड़कियों पर उल्टियों से बनी धारियाँ झिलमिला रही थीं जो सूख कर पपड़ी हो गईं थीं.’ लेखक द्वारा गौ मांस खाने का वर्णन भी अद्भुत है .यहाँ परम्परा-संस्कार टूटने की भावना को संवेदनपूर्ण शब्द प्रदान किया गया है . मनुष्य-मनुष्य के द्वंद्व को ही नहीं बल्कि प्रकृति और मनुष्य के द्वंद्व को भी लेखक ने उसी आत्मीयता से शब्द दिए हैं . माजुली, नामदाफ, चेरापूंजी और लोकटक को बिगाड़ने, बचाने और संवारने की कवायद की निरर्थकता को यह पुस्तक बहुत ही सामान्य भाषा में बयान करती है .इस पुस्तक की भाषा के बारे में अगर एक पंक्ति में कुछ कहना हो तो इसी पुस्तक का एक वाक्य सटीक है कि ‘पढ़ने वाले की आंख निकल कर पेपर पर गिर पड़ती है.’

यह पुस्तक राजनीति, इतिहास, वर्तमान ,भूगोल, परम्परा, संस्कृति , मिथक, लोकगाथा आदि का साहित्यिक अन्तर्गुम्फन है .पुस्तक पढ़ते समय आप कब कहाँ हैं , निश्चय नहीं कर पाएँगे . ‘सजल वैशाख’ के विस्मय से शुरू हुई यात्रा ‘रबर के बागानों की मधुमक्खियों के डंकों’ के विस्मय पर समाप्त  होती है , परन्तु विस्मय का अंत नहीं होता क्योंकि पूर्वोत्तर के बारे में हमारे संचित ज्ञान भंडार को यह पुस्तक विस्मृत कर देती है . इसके बाद पाठक सिर्फ यही कह सकता है –‘मारिए वह भी कोई देश है महाराज !’

पीयूष राज

पीयूष राज

पीयूष राज भारतीय भाषा केंद्र, जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय के युवा शोधार्थी हैं, छात्र राजनीति से गहरे रूप से जुड़े हैं और छात्रसंघ के पदाधिकारी रह चुके हैं. उनसे , मोबाइल नंबर -09868030533 , ईमेल आईडी – piyushraj2007@ग्मैल.com पर संपर्क सम्भव है.   

 

पुस्तक परिचय – वह भी कोई देश है महाराज , लेखक- अनिल यादव , अंतिका प्रकाशन , गाजियाबाद , मूल्य-सजिल्द संस्करण 295/-

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वह भी कोई देश है महाराज: ट्रेवेल्स विथ हेरोडोटस

By उदय शंकर 

अनिल यादव का यात्रा संस्मरण, ‘वह भी कोई देश है महाराज’, आज ही खत्म किया. खत्म करते ही गच्च से एक सन्नाटे का शिकार हो गया.

वह भी कोई देश है महाराज

वह भी कोई देश है महाराज

सात बहनों का वह देश कितना मनभावन लगता है. वहां का मुख्य मंत्री हवाई जहाज लिए गायब हो जाता है और हम इंडियन आइडियल के बिग बॉस नुमा तोंद सहलाते हुए, अपने ही डकार की बदबू में सहज हुए मलेशियन एयरलाइन्स के बारे में चिंतित चिप्स खा रहे होते हैं. सारी फजिहत का रामवाण ‘रामदेव पाचन पाउडर’ पी रहे होते हैं. सारी गलाजत और बदहजमी अपने में ही देखने के ऐसे आदि हुए कि सात बहनें और ध्रुव तारा सभी को स्वर्गादपि गरीयसी ही समझते रहे.

इक्की-दुक्की खबरें ऐसे पहुँचती हैं मानो शांत और स्थैर्य चित्त वाली बहनों ने बहुत दिन बाद स्त्रियोचित मर्यादाओं को ताक पर रख कर कोई छींक मार दी हो. यादव जी का यह पूरा संस्मरण उस छींक में सना हुआ है जो हमें सहज नहीं रहने देता है. यदा-कदा वाली छींक नहीं महराज, बल्कि छींकों का नैरन्तर्य है- वह देश.

ज्ञानरंजन ने इस पुस्तक के बारे में बहुत ही अर्थपूर्ण टिपण्णी की है- लेखक पथ का दावेदार नहीं है, वह जीवनदायी अन्वेषण करता है. यह हिंदी साहित्य की अकेली कृति है, इसके जोड़ या तोड़ की कोई और रचना अभी तक नहीं हुयी है, यही ज्ञानरंजन जी का कहना है. और यह सच भी है. इसे लिखने या अनुभव करने के लिए जिस तरह का फक्कड़पन और निस्सारता वाला अंदाज चाहिए वह अनिल यादव में है. यादव की कहानियों के सन्दर्भ अशोक भौमिक ने एक बात कही थी कि लेखक लिखने में रस लेने लगता है. यह संस्मरण जिस तटस्थता और रूखेपन से लिखा गया है, वह इस पुस्तक की गजब की पूंजी है.  अपने आप से,  दृश्यों से, घटनाओं से यह विलगाव विपस्सना के असर की याद दिलाती है, जिसका इस पुस्तक में जिक्र भी है- ‘विपस्सी अपनी मृत्यु को भी आते और खुद को ले जाते हुए तटस्थ भाव से देखता है.’ इतनी सारी बंदूके, हत्याएं, ध्रूमपान – नशाखोरी की तरकीबें और वेश्याएं,  क्या यह कम है किसी लेखक को भटकाने के लिए,  लेकिन यह अनिल यादव की ही खासियत है कि वह ऐसे दृश्यों को बहुत ही ठंडेपन से एक पंक्ति में निपटा कर अग्रिम यात्राओं के लिए अपनी ऊर्जा को बचा लेता है.

अनिल यादव के इस संस्मरण को पढ़ते हुए मुझे न तो हिंदी का कोई लेखक याद आया न ही पत्रकार. हिंदी में बौद्धिक जुगाली और उससे निर्मित अमर पक्षधरता एक ऐसी कुंजी है जिससे हम अपने पसंदीदा और आदर्श रचनात्मक संसार को खोल कर कबाड़खाने में सुरक्षित करते चलते हैं. ऐसे-ऐसे लेखक और पत्रकार हमारे आदर्श हैं जिनकी कूल जमा पूंजी उनकी बौद्धिक तलवार है और उसके चलने और न चलने को जांचने वाला कोई भी मानक इस ‘स्थिर समाज’ में नहीं है.

जेनुइन बौद्धिक तलवार सिर्फ विचारों को ही नहीं काटती बल्कि वह आत्मघाती भी होती है, आत्मघाती का अर्थ नैराश्य वाले दार्शनिक आधार में नहीं ढूंढा जाए- सीधा, सरल अर्थ यह कि तलवार की धार पे धावनो है. यह आत्मघाती तलवार इन तथाकथित आदर्शों में से किसी के पास नहीं है. वे सब हाई स्कूल में होने वाले भाषण-प्रतियोगिता के धुरंधर हैं जहाँ इच्छा से एक पक्ष चुन लेना होता है. अनिल यादव के पास ऐसा कोई भी पक्ष नहीं है, और जो तलवार है, वह भी आत्मघाती है.

अनिल यादव के इस यात्रा संस्मरण को पढ़ते हुए मुझे सिर्फ एक आदमी की याद आती रही, वह अनिल की तरह ही पत्रकार और धुरंधर यात्री था- रिजार्ड कपूसिंस्की. एकमात्र कम्युनिस्ट जिसे पोलैंड ने स्वीकार किया और सम्मान दिया. वह दुनिया भर के 27 क्रांतियों का साक्षी बना, 40 बार जेल गया और 4 बार फांसी की सजा हुयी और हर बार एक आश्चर्य की तरह महाभिनिष्क्रमण करता नज़र आया. वह आज़ादी के कुछ ही वर्षों बाद भारत आया था, उसे न तो अंग्रेजी आती थी और न ही अन्य भारतीय भाषाएँ. संवादविहीनता की स्थिति में भी वह किस तरह की संवेदनाएं पिरो गया, उसे उसकी पुस्तक- ट्रेवेल्स विथ हेरोडोटस में देखा जा सकता है. उसकी कुछ पंक्तियाँ-

I arrived in Calcutta from Benares by train, a progress, as I was to discover,from a relative heaven to an absolute hell….Usually,a different color skin attracts attention here; but nothing distracts the denizens of Sealdah Station, as they seem already to settle into a realm on the other side of life. An old woman next tome was digging a bit of rice out of the folds of her sari. She poured it into a little bowl and started to look around,perhaps for water, perhaps for fire, so that she could boil the rice. I noticed several children near her, eyeing the bowl. Staring—motionless, wordless.This lasts a moment, and the moment drag son. The children do not throw themselves on the rice; the rice is the property of the old woman, and these children have been inculcated with something more powerful than hunger.

A man is pushing his way through the huddled multitudes. He jostles the old woman, the bowl drops from her hands, and the rice scatters onto the platform, into the mud, amidst the garbage. In that split second, the children throw themselves down, dive between the legs of those still standing,dig around in the muck trying to find the grains of rice. The old woman stands there empty-handed, another man shoves her.The old woman, the children, the train station,everything—soaked through by the unending torrents of a tropical downpour. And I too stand dripping wet, afraid to take a step; and anyway, I don’t know where to go.

अनिल यादव में विवरण की ऐसी ही ताकत है और ऐसी ही संवेदनशील भाषा, जो कभी भी व्यक्त होने में ना-नुकुर नहीं करती है. और ‘अनिश्चितता ऐसी जैसे जरुरी आत्मविश्वास को पाने का चक्कर हो.’ अनिल यादव में हिंदी के रिजार्ड कपूसिंस्की होने की भरपूर संभावना को अक्षुण्ण पाता हूँ और ज्ञानरंजन के ही शब्दों में मेरा भी मन ‘वह भी कोई देश है महाराज’ को तरह-तरह से विज्ञापित करने का करता है.

पुस्तक को मंगाने हेतु अंतिका प्रकाशन से इस पते पर संपर्क किया जा सकता है – अंतिका प्रकाशन सी-५६/यूजीएफ़-४ शालीमार गार्डन, एक्सटेंशन-II ग़ाज़ियाबाद-२०१००५ (उ.प्र.) antika56@gmail.com]

श्रीनगर उर्फ काहे का स्वर्ग: उस्मान ख़ान

विश्वविद्यालय की दीवार के किनारे-किनारे मैं चलता रहा। रुमी गेट के थोड़ा ही आगे दीवार पर किसीने मोटे मोटे हरुफ़ में ‘वेलकम तालीबान’ लिखा हुआ था। पढ़कर पहले तो अजीब लगा, फिर उतना भी अजीब नहीं रहा। नौजवान लड़के-लड़कियाँ विश्वविद्यालय की तरफ जा रहे थे। मैं एक झील के किनारे बने बागीचे में जाकर बैठ गया। देखता रहा चीनार, औरतें, आदमी, बच्चे, पहाड़ी।

……यहाँ और भी खराब

BY उस्मान ख़ान

“What is “there” becomes “here” when you reach it; likewise your today disguises itself in the form of tomorrow”. – Bedil[1]

A snap shot from a film by Majid Majidi

A snap shot from a film by Majid Majidi

दिल्ली

पसीने से तरबतर हम दोनों ऑटो  में ही बैठे रहे। लम्पट लड़कों का एक दल मुमताज़ भाई का अभिवादन कर मैदान की ओर चला गया। मुमताज़ भाई ने सिगरेट एक लड़के की ओर बढ़ाई, जो उस दल से कटकर रुक गया था। ‘सादिक कहाँ हैं?’ मुमताज़ भाई ने उस लड़के से पुछा। लड़के ने इतना लम्बा कश खींचा कि एक चैथाई सिगरेट फर से राख हो गई, उसने मैदान की तरफ जाते लड़कों की तरफ देखा। ‘स्टेशन पर ‘काम’ करने गया है।’ उसने जवाब दिया। ‘ये क्या हुआ?’ उसके चोंट खाए दाएं हाथ की तरफ देखते हुए एक मुस्कान उसी के चेहरे पर उभर आई। ‘साले ने खिड़की से कुचल दिया।’ ‘कैसे?’ मुमताज़ भाई ने हैरत और चुटकी लेने के अन्दाज़ में पुछा। ‘चैन खींच रहा था। इतने में पास वाले हरामी ने खिड़की नीचे कर दी। दो-तीन बार ज़ोर-ज़ोर से पटक दी। बहिनचैद!’ मुमताज़ भाई ने धीरे से मुसकुराते हुए, अपने मुँह में जीभ फेरी और आखरी कश के लिए सिगरेट उसकी तरफ बढ़ा दी। ‘वो लोग क्या दारु पीने गए हैं?’ लड़के ने हामी में सिर हिलाया। ‘सादिक भी उनके साथ ही है क्या?’ मुझे लगा मुमताज़ भाई को उसकी बात पर यकीन नहीं हुआ था। ‘पता नहीं।’ कहते हुए लड़के ने सिगरेट का सुलगता ठूँठ नाली में फेंक दिया और मुमताज़ भाई का अभिवादन करता हुआ, मैदान की ओर चल पड़ा। शायद उसे भी कोई फर्क नहीं पड़ा कि पहले उसने क्या कहा था।

हम दोनों गर्मी के मौसम को गाली देते हुए बैठे रहे। लोगों के दल के दल स्टेशन की ओर बढ़े जा रहे थे। कोई किसीको नहीं जानता और सब एक जैसे थे। मुमताज़ भाई के लिए सब सवारी, मेरे लिए सब चरित्र। शहरी, कस्बाई, ग्रामीण। तमील, बंगाली, पंजाबी, बिहारी। धोती, पाजामा, जिंस, फ्रॉक, साड़ी, सलवार। सब अलग और सब एक जैसे। यात्री! मैं भी इसी रेले में उतरने वाला था।

मैं सोचने लगा, उस लड़के के दाएं हाथ के पहुँचे की हड्डी टूट गई थी। कितना भयानक दृष्य रहा होगा। एक लड़का किसी रेल में बैठी औरत के गले से चैन खींच रहा है, उसका हाथ अचानक खिड़की से दबता है, और फिर लगातार खिड़की के प्रहार सहता है। लेकिन अपनी बात कहते वक़्त लड़के के चेहरे पर कोई शिकन नहीं थी। रिस्क में ही बरकत है, बिना रिस्क लिए बिहार से दिल्ली पहुँचे ये लड़के, जो दिन-रात नशा और चोरी करते हैं, अपना जीवन नहीं बिता सकते। सच, रिस्क में ही बरकत है। ये लड़के हर रोज़ नए रोमांचों से दो-चार होते हैं। मैंने सोचा कि मुमताज़ भाई से पुछूँ, क्या वो लड़का स्कूल जाता है? और फिर अपने ही बेमानी सवाल से लज्जित होकर चुप मार गया। स्कूल! थू!

रेल आने में अभी भी आधा घंटा बाकी था। मैंने सोचा एक सिगरेट और पी जाए। मैं सिगरेट लेने के लिए ऑटो  से निकला। ‘किधर।’ मुमताज़ भाई की आवाज़ थी। ‘सिगरेट ले आता हूँ!’ ‘आँहाँ, रुकिए!’ और खुद आॅटो से निकलकर वह सिगरेट वाले के पास गया और बोला, ‘ओरिजिनल देना हो भाई!’ और उस लड़के ने मुस्कुराकर नीचे रखे एक डिब्बे से सिगरेट निकालकर उसे दी। हम दोनों ने सिगरेट खतम की और मैं, अपना बेग जिसमें मेरे एम.फिल., पीएच.डी. के पोथे रखे थे, लेकर स्टेशन की तरफ चल दिया।

रेल प्लेटफॉर्म पर खड़ी थी। उत्तर संपर्क क्रांति। वही अनजाने चेहरे, जो बाहर हड़बड़ाहट और आष्चर्य का भाव लिए चले जा रहे थे, प्लेटफॉर्म पर भी चले जा रहे हैं। रेल के आगे वाले जनरल डिब्बे में मैं घुस गया। वही हमेशा का हाल, पैर रखने की भी जगह नहीं थी। मैं प्लेटफॉर्म के दूसरी तरफ वाले दरवाजे़ पर जाकर खड़ा हो गया। देखा एक आदमी पास वाले ट्रैक पर बैठा पेप्सी में व्हिस्की मिला रहा है। उसने मेरी ओर देखा। ‘लोगे।’ मैंने मुस्कुराते हुए उसे टाल दिया। ‘कहाँ तक जाना है?’ ‘जम्मू-तवी!’ मैंने कहा। ‘अच्छा जम्मू।’ ‘और आप?’ मैंने पूछा। ‘जहाँ तक ट्रेन जाएगी।’ उसने कहा। ‘उधमपुर।’ मैंने उसकी ओर देखा। उसने सशंकित नज़रों से मेरी ओर देखा। मैंने भी उसकी उपेक्षा की।

मैं रात-भर दरवाज़े के पास सिकुड़कर बैठा रहा और आस-पास वालों के लिए तकिए का काम करता रहा। सुबह होते-होते सिट का एक कोना बैठने के लिए मिल गया। एक स्टेशन पर रेल रुकी और धड़-धड़ करती हुई बुढ़ी औरतों की एक टोली उस डिब्बे में घुस गई। सभी यात्री, जो पहले से आराम की भंगिमा को प्राप्त कर रहे थे। हड़बड़ाने लगे। ये औरतें उड़ीसा की थीं। तीर्थ के लिए जा रही थीं। दो तो इतनी बुढ़ी कि लौटेंगी यह भी कहना मुश्किल लग रहा था। खैर!

जम्मू

रेल ने ठीक समय पर जम्मू उतार दिया। स्टेशन के बाहर जाते ही लगा मैं किसी आर्मी कैम्प में आ गया हूँ, स्टेशन के बाहर बने बागीचे के पास आर्मी के जवान बन्दूक लिए बैठे थे। उनमें से दो चाय पी रहे थे, एक अधेड़ और एक 25-26 साल का जवान। उनके आगे कँटीले तार की फेंस थी। जैसे ही उधर से कुछ हो, इधर से गोली चलाने को मुस्तैद सैनिक।

मैंने स्टेशन के इस आशंका भरे माहौल को पार किया और स्टेशन के बाहर नाले पर लगी चाय की दुकान पर चाय पीने लगा। 7 रुपये की चाय। जैसे-तैसे अपनी भूख दबाते हुए, मैं श्रीनगर जाने वाली गाड़ी के बारे में पुछने लगा। पुछते-पाछते एक गाड़ी मिली – 800 रुपये, इससे कम में भी गाड़ी मिल सकती थी, ये मुझे बाद में पता चला। तो, मैं श्रीनगर की ओर चल दिया। गाड़ी में दो आर्मी कैम्प में काम करने वाले जवान बैठे थे। सादे कपड़े, पहचानना भी मुश्किल कि ये उन्हीं बन्दूकधारियों के हमजोली हैं, जिन्हें देखकर आशंका होती है – अब क्या होगा!

गाड़ी का चालक एक सिक्ख था। मैंने अपनी सिगरेट पीने की इच्छा को गाड़ी रुकने तक दबा देना ही उचित समझा। रास्ते में एक जगह उसने गाड़ी खड़ी की, बाकी लोग खाने लगे, लेकिन अपनी जेब तो हल्की थी। सो, मैंने एक चाय ली और सिगरेट पीने लगा। गाड़ी चालक मुझे घुर कर देखने लगा। ‘जल्दी करलो।’ उसने कहा। जैसे मेरी ही वजह से गाड़ी रुकी हुई थी। ‘दूसरे लोगों को भी आ जाने दीजिए।’ मैंने कहा। वह दुकान के अंदर बैठी सवारियों की ओर बढ़ गया।

जैसे-जैसे हम आगे बढ़ते जा रहे थे, पंजाबी बोलने वालों से दूर होते जा रहे थे और एक मिश्रित भाषा, जिसमें पंजाबी के शब्द बीच-बीच में उछल आते थे, मेरे कानों में पड़ रही थी। कुछ शब्दश् समझ आते थे, बाकि भाव से काम चलाना पड़ रहा था।

गाड़ी में मेरे दोनों ओर आर्मी के जवान थे। उनमें से एक से बात होने लगी। यह व्यक्ति बंगाल का था, उसे जैसे ही पता चला मैं, प्राध्यापक के साक्षात्कार के लिए जा रहा हूँ। उसने अपने दोस्त का किस्सा सुनाना षुरू कर दिया, कैसे दोनों साथ खेलते थे, साथ पढ़ते थे, फिर उसे रुपया कमाने का शौक हो गया और वह आर्मी में आ गया, उसका दोस्त पढ़ता रहा और आज प्राध्यापक है। उसकी बातों से साफ था कि वह रीतिकालिन कवियों से भी अधिक अतिशयोक्तिपूर्ण वर्णन करने में माहिर था। उसने खुब रुपया कमाया और उड़ाया है, उसका कहना था। हालाँकि मैं देख चुका था, कि वह गाड़ी-चालक से 50 रुपये को लेकर हुज्जत कर रहा था। वह कहने लगा कि उसने वायुयान में भी यात्रा की है, और वो तो आज इस जीप में जा रहा है, जबकि वह चाहता तो आज भी वायुयान में जा सकता था। लेकिन इच्छा ही नहीं हुई। खैर, उसे संतुष्टि थी, कि उसका प्राध्यापक दोस्त आज भी उसकी गालियाँ हँसकर सुनता है।

फिर वही जवाहर टनल, घुप्प अँधेरी टनल, जिसमें घुसते ही कुरोसावा के ड्रिम्स की टनल याद आने लगी। पता नहीं कब वह सैनिक टनल पार कर निकलेगा और फिर पिछे मुड़कर देखेगा – टनल का घुप्प अँधेरा और सुनेगा – फौजी बुटों की टाप। पता नहीं जब इस टनल से आखरी सैनिक बाहर होगा तो वह क्या सोचेगा! इस टनल के उस पार वह क्या कर रहा था?

सड़क गाडि़यों से भरी हुई थी, लग रहा था, लोगों का एक रेला श्रीनगर की ओर जा रहा है। हमारी गाड़ी में पीछे चार लड़के बैठे हुए थे। उम्र – 14-15 साल। उनमें से एक को उलटी हो गई। ये चारों लड़के मध्यप्रदेश से कश्मीर मज़दूरी करने के लिए जा रहे थे। दो पहले से वहाँ काम कर रहे थे और दो पहली बार जा रहे थे। अपने बारे में कुछ भी बोलते हुए वे हिचक रहे थे, जैसे कुछ अनहोनी होने वाली हो। उन लड़कों को देख मेरा मन एक बार और आशंका से भर गया। उलटी करने वाला लड़का सीट पर लेटे-लेटे सो गया था।

पास बैठा जवान भारत के विभिन्न इलाकों में अपनी पोस्टिंग और अनुभव बताता चल रहा था। मैं भी हाँ-हूँ कर रहा था, ताकि मेरा ध्यान बँटा रहे। रास्ते में एक जगह ट्राफिक जाम था। आर्मी के जवान चारों और घुम रहे थे। पहले मुझे लगा कुछ दुर्घटना हो गई है। फिर पता चला, सड़क बनाने के लिए रास्ता साफ किया जा रहा है, जिसके लिए एक बड़ा पेड़ काटा जा रहा था। आर्मी के जवान सड़क साफ करने में मदद कर रहे थे। ज़्यादातर इतने काले कि वहाँ की स्थानीय आबादी से फूल कांट्रास्ट में।

सड़क साफ हुई तो हमारी गाड़ी भी धीरे-धीरे खिसकने लगी। हमारा गाड़ी-चालक वैसे भी बहुत धीरे गाड़ी चला रहा था। पंजाबी पॉप संगीत चलाकर वह धीरे-धीरे आगे बढ़ रहा था। क़ाज़ीगुंड में एक जगह गाड़ी खड़ी कर चालक मेवों की एक दूकान पर चला गया और चाय पीने लगा। पहले ही इतना धीरे-धीरे वह हमें ले जा रहा था, कि लग रहा था ये सफर खतम ही नहीं होगा। किसी अनजाने रास्ते पर चलते हुए यह अक्सर ही लगता है, कि सफर बहुत लम्बा है। हर शहरनुमा जगह पर मुझे लगता था, अब आ गया श्रीनगर, लेकिन नहीं। बाहर रुई के फाहों की तरह की कोई चीज़ उड़ रही थी। बंगाली हमसफर ने कहा, ये अगर नाक में चली गई तो चार घंटे छिंकते रहोगे। मैंने अपनी दूसरी ओर बैठे सैनिक से खिड़की के शीशे ऊपर कर लेने को कहा। उसने शीशा चढ़ा लिया। तब भी एक दो फाहे अंदर आ चुके थे और गाड़ी में बेमुरव्वती से गष्त लगा रहे थे।

एक गाँव में उसने गाड़ी फिर रोक दी। इस बार उसने बिना उतरे ही पिछे मुड़कर दोनों सैनिकों को सलाह दी। यही आखरी गाँव है। इस गाँव में भी चारों तरफ सैनिक खड़े और घुमते दिखाई दे रहे थे। मुझे समझ नहीं आया, वह क्या कहना चाह रहा था। मेरे दाईं तरफ वाला सैनिक नीचे उतर गया और थोड़ी देर में हँसता हुआ अपनी जेब पर हाथ रखे लौट आया। इसके आगे शराब नहीं मिलती है। बंगाली सैनिक ने कहा। मुझे लगा वह मज़ाक कर रहा है। अब तक मुझे गुजरात के बारे में ही यह पता था, कि वहाँ शराब नहीं मिलती है। दूसरा सैनिक कहने लगा, पहले मिलती थी, अभी सब दूकाने तोड़-ताड़ दी है। मुझे बस्ती का वह दृष्य याद आ गया, जब पाकिस्तान में शराब की दूकाने तोड़कर गैलनों शराब नालियों में बहा दी गई थी। बेचारे मण्टो का पाकिस्तान!

धीरे-धीरे गाड़ी फिर खिसकने लगी। देखा एक और टनल लगभग बनकर तैयार हो चुकी है, ये नई टनलें 90 कि.मी. का फासला कम कर देंगी। और सुना रेल के लिए भी एक नया ट्रैक बिछाया जा रहा है, जो सफर को आसान और ट्राफिक को कम कर देगा। और टूरिस्ट और सैनिक।

अपने बंगाली हमसफ़र की बातें सुनते-सुनते, जिसमें पंजाबी पाॅप खुद-ब-खुद घुलता जा रहा था। चालक महोदय को अचानक जाने क्या सुझी, वो कहने लगा, ‘ये झेलम है।’ मुझे उस पर पुरा शक हुआ। और उसके पॉप संगीत को सुनते-सुनते मैं मन ही मन झल्ला चुका था, मुझे लगा कि कहूँ, तो मैं क्या करूँ, कुद जाऊँ, झेलम है! हँह!! मैंने देखा एक नदी है, झेलम ही होगी।

 खै़र, आखिरकार गाड़ी ने मुझे एक चैराहे पर छोड़ा। मैंने एटीएम तलाश किया और कुछ रुपया निकाला, ताकि आगे का काम आराम से चल सके। और एक मिनी बस में बैठ गया, जो मुझे डल गेट उतारने वाली थी।

श्रीनगर

गोधूली बेला का समय था। मैं मिनी बस से एक चैराहे पर उतरकर खड़ा था। एक सिगरेट वाले की दूकान पर पहुँचा, सिगरेट ली और उससे पुछा, ‘यहाँ रात भर रुकने के लिए सस्ता कमरा कहाँ मिलेगा।’ उसने कहा, ‘रुकिए, अभी दिखा देते हैं।’ मैं रुका रहा, 5-7 मिनट में ही एक अधेड़ मोटा-सा आदमी आया, और मुझसे कहने लगा, ‘कितने दिन के लिए चाहिए?’ मैंने कहा, ‘बस रात भर के लिए, इंटरव्यू देने आया हूँ, देकर कल ही चला जाऊँगा।’ उसने एक लड़के को बुलाया, और मेरी तरफ देखकर कष्मीरी में कुछ कहा, पता नहीं वह कश्मीरी भी थी या नहीं।

                रात पुलिया पर उतर आई थी और मैं उस लड़के के साथ पुलिया पर चले जा रहा था। मैंने उससे कहा, ‘सिगरेट पिते हो!’ उसने कहा ‘नहीं, मैं कोई भी नशा नहीं करता।’ ‘ठीक है।’ मैंने कहा। उसका नाम गुलज़ार था। वह एक शिकारे पर मुझे लेकर गया, जो उसी पुलिया के नीचे लगा हुआ था। मैंने देखा शिकारा ठीक है, कमरा भी रहने लायक। फिर वही किराये को लेकर हुज्जत। आखिरकार 300 रुपये में रात भर रहना तय पाया गया।

गुलज़ार को जब पता चला कि मैं विश्वविद्यालय में पढ़ाने के लिए इंटरव्यू देने आया हूँ, तो पहले तो उसे विश्वास नहीं हुआ। वह हैरत से मेरा मुँह देखने लगा। फिर बोला, ‘तुमको तो लड़के पीट देंगे।’ मैंने कहा ‘क्यों?’ बोला, ‘यूनिवर्सिटि के लड़के खराब हैं।’ मैंने कहा, ‘अच्छा!’ फिर उसने बताया कि वह भी 8वें दर्जे में अपने मास्टर को पीट चुका है। और उसके बाद से उसने पढ़ाई भी छोड़ दी अब शिकारा चलाता है और मज़दूरी करता है। उसकी छोटी बहन और भाई पढ़ रहे हैं, लेकिन उसे विश्वास था कि उसका भाई भी किसी मास्टर को पीटकर एक दिन उसके साथ ही काम करने लगेगा। कहने लगा, ‘हमारा भाई हमसे भी ज़्यादा गुस्से वाला है।’

गुलज़ार को चाय पीने का बहुत शौक था। उसने ग्लास भर के चाय बनाई और पीने लगा। मैं लम्बे सफ़र की थकान से चुर था, साबुन, तैल ढुँढ़ने बाज़ार की तरफ जाना चाहता था, लेकिन देखा कि गुलज़ार मुझे जाने नहीं देना चाहता, पहले तो मुझे शक हुआ, पुरा वातावरण ही आशंकापूर्ण था, फिर वह बोला, ‘यहाँ बाज़ार जल्दी बंद हो जाता है, यहाँ का माहौल नहीं पता है तुमको।’ मैंने उसकी बात अनसुनी कर दी और यह कहते हुए कि मैं थोड़ी ही देर में आ जाऊँगा, मैं बाज़ार की तरफ चल दिया। पुलिया पार कर मैं एक चैराहे पर पहुँचा, जहाँ कुछ दूकाने थी। लेकिन तैल का पाउच कहीं नहीं मिला। मैं साबुन लेकर लौट आया। नहाया तो कुछ ताज़गी महसूस हुई। मैंने कहा, ‘खाने के लिए कहाँ जाना चाहिए।’ वह बोला, ‘यहीं रुको, खाना हम लेकर आएगा। क्या खाएगा तुम?’ मैंने कहा, ‘कुछ भी, सादा-सा, चावल-दाल।’ उसने कहा, ‘चटनी भी लेगा।’ मैंने कहा, ‘हाँ, मिल जाए तो।’ बोला, ‘अस्सी रुपये दे दो।’ मैंने उसे सौ रुपये दिये और कहा, ‘अगर तैल का पाउच मिले तो लेते आना।’ वह रुपये लेकर मुझे शिकारे पर ही रहने की हिदायत देता हुआ चला गया। मैं शिकारे के एक कोने में लेटकर, जो बाहर की तरफ खुलता था, सिगरेट जलाकर झील में जलती हुई बत्तियों का प्रतिबिंब देखता रहा। थोड़ी देर में तीन आदमी एक नाव लिए जाल बटोरते हुए पास से गुज़रे। तीनों ही हड्डी के ढाँचे।

गुलज़ार लौटा तो मैंने खाना खाया। और फिर वह भी खाना खाकर जाने लगा। मैंने पुछा ‘कहाँ?’ तो कहने लगा, ‘मज़दूरी।’ मैंने कहा, ‘रात को।’ उसने कहा, ‘हाँ रात भर सवारियाँ आती रहती है, हम काम करता है, नहीं तो घर नहीं चलेगा।’ मुझे लगा, वह मुझ पर ही व्यंग्य कर रहा है।

सुब्ह हुई, सब कुछ रौशन हुआ, तो देखा झील बहुत दूर तक खींची हुई है। मैंने कहा, ‘मैं 2 बजे तक लौट आऊँगा।’ गुलज़ार कहने लगा, ‘रजिस्टर में साइन कर दो, और हमको 4 सौ रुपये और दे दो।’ मैंने ज़्यादा हुज्जत न करते हुए, उससे कहा कि मैं अपना सामान लेकर ही चला जा रहा हूँ, अगर आज ही नहीं लौटा, तो फिर तुम्हारे पास आ जाऊँगा। लेकिन वह लड़का बड़ा हुज्जती था। मैंने उसे टालते हुए अपना बैग उठाया और शिकारा छोड़ दिया।

मैं फिर उसी चैराहे पर पहुँच गया, जहाँ कल मुझे मिनी बस ने उतारा था। पुछने पर पता चला, यहीं से बस मिलेगी, जो सीधे कश्मीर विश्वविद्यालय उतार देगी। मैं बस का इंतज़ार करने लगा। कुछ नौजवान लड़के बस-स्टॉप पर बैठे सिगरेट पी रहे थे। वहीं पास में खड़ा होकर मैं भी सिगरेट पीने लगा। बस आई और मैं उसमें बैठ गया। बस श्रीनगर में घुमती हुई चलने लगी। झील और बागीचों के बीच होटलें, रेस्टोरेंट, घर, दफ़्तर और सैनिक। बस ने मुझे रुमी गेट पर उतार दिया। यह यूनिवर्सिटी का मुख्य द्वार नहीं था। मैंने अंदर जाकर पुछा, तो पहरेदार ने बताया, ‘अभी तो 9 बजा है, 10 बजे तक इंटरव्यू षुरू होगा।’

तब तक मैंने इधर-उधर घुमने की योजना बनाई और निकल पड़ा। विश्वविद्यालय की दीवार के किनारे-किनारे मैं चलता रहा। रुमी गेट के थोड़ा ही आगे दीवार पर किसीने मोटे मोटे हरुफ़ में ‘वेलकम तालीबान’ लिखा हुआ था। पढ़कर पहले तो अजीब लगा, फिर उतना भी अजीब नहीं रहा। नौजवान लड़के-लड़कियाँ विश्वविद्यालय की तरफ जा रहे थे। मैं एक झील के किनारे बने बागीचे में जाकर बैठ गया। देखता रहा चीनार, औरतें, आदमी, बच्चे, पहाड़ी।

फिर देखा 10 बज गई है। तो रुमी गेट से ही फिर विश्वविद्यालय में दाखिल हुआ। साक्षात्कार वाइस चांसलर के दफ़्तर के पास प्रशासन भवन में होना था। वहाँ पहुँचा, तो देखा साक्षात्कार देने के लिए मेरे अलावा और 11 लोग बैठे थे। अलीगढ़ विश्वविद्यालय, बनारस हिंदू विश्वविद्यालय, जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय, ग़रज़ कि देश भर से इस विश्वविद्यालय में हिंदी पढ़ाना चाहने वाले नौजवान और अधेड़। कुछ के पास किताबों और लेखों का ऐसा ज़खीरा कि देखते ही लगे कि इन्होंने अपनी उमर इसी काम में झोंक दी है। मैं समझ गया, बेटा तेरी दाल यहाँ नहीं गलनी है। अलीगढ़ से पढ़े एक साहब ने मेरे करीब बैठते हुए मुझसे बड़ी ही शाइस्तगी से हाथ मिलाया और धीरे से पुछा, ‘कहाँ के रहने वाले हैं खान साहब!’ मैंने कहा, ‘मध्यप्रदेश!’ ‘हम जे.एन.यू. गए थे एक बार, लेकिन अपना वाला कोई मिला नहीं।’ मेरे कान में धीरे-धीरे ज़हर घुलने लगा। ‘अब आप से मिलेंगे अगर कभी आए तो!’ मैंने कहा, ‘ठीक है!’ और वहाँ से उठने लगा। उन्होंने फिर अपने नरम हाथों से मेरा हाथ पकड़कर रोका, ‘अपना कांटैक्ट नंबर दीजिए।’ मैंने उन्हें एक फर्जी नंबर थमाया और उठकर दूसरी जगह बैठ गया। देखा मेरे सामने एक सज्जन बैठे हुए थे। साफ़ सफ़ेद कुर्ता-पाजामा, जिस पर भूरे रंग की बंडी। चुटियाधारी ये सज्जन अपने सामने अपनी प्रकाशित सामग्री का ढेर लिए बैठे थे। और ख़ालिस हिंदी में बात कर रहे थे। हजारीप्रसाद द्विवेदी पर उनका शोध-प्रबंध था। मेरे पास बैठे एक व्यक्ति ने बताया कि वह उनके साथ पहले भी एक साक्षात्कार दे चुका है। कहने लगा, ‘उस इंटरव्यू में तो ये धोती-कुर्ता पहनकर आए थे। तब उनसे बात कर एक्सटर्नल ने कहा था, लगता है साक्षात् द्विवेदीजी से ही बात कर रहे हैं।’ सच में, लगता भी होगा। अंतर्वस्तु का पता नहीं, रूप तो वही था।

इंटरव्यू खत्म होते-होते पता चला कि कल श्रीनगर बंद रहेगा। किसने ‘कॉल’ दिया है, पुछने पर कोई कुछ बोला नहीं। तो उसी शाम गाड़ी से जम्मू के लिए निकलना था। इस बीच मैंने खाना खाया और एक बागीचे में जाकर बैठ गया। देखा कुछ लड़कियाँ फूटबॉल खेल रही थीं। दूर से उन्हें देखता मैं सिगरेट पीने लगा। अब जाकर मुझे लग रहा था मैं श्रीनगर में हूँ। सोचने लगा इस जगह के बारे में क्या-क्या सुनता आया था और ये जगह कुछ अलग तो नहीं है। वही परेशानियाँ यहाँ के नौजवानों की आँखों में भी घुम रही हैं, जो दिल्ली के नौजवानों की आँखों में तैरती रहती हैं। फिर ये काहे का अलग से स्वर्ग! दिमाग़ में लगातार एक शेर का मिसरा ए सानी घुमता रहा – ‘चारों तरफ खराब यहाँ और भी खराब।’ ‘चारों तरफ खराब यहाँ और भी खराब।’ लेकिन दिमाग़ पर बहुत ज़ोर देने के बाद भी मिसरा ए उला याद नहीं आ रहा था। शायद मैदान में फूटबॉल खेलती हुई किसी कमसीन को याद था! पर मैं पुछ नहीं पाया…


[1]  डॉ. इक़बाल का अनुवाद

उस्मान ख़ान

उस्मान ख़ान

उस्मान ख़ान समकालीन हिंदी कविता के अलहदा कवि हैं. चर्चाओं और पुरस्कारों की भीड़ से अलहदा…छपाऊ मानसिकता से भी अलहदा..जे.एन.यू. के हिंदी विभाग से मालवा के लोक-साहित्य पर शोधरत हैं. इनसे usmanjnu@gmail.com पर संपर्क कर सकते हैं.

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