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कबीर का करघा और मुक्तिबोध का वामपंथी इन्टेलेक्ट: विष्णु खरे

यह बात-चीत इसी साल जनवरी की है. मौका था जयपुर समानांतर साहित्य उत्सव का. विष्णु खरे भी वहां आये हुए थे. बात-चीत में अनिल यादव, रवि प्रकाश, सुधांशु, अविनाश और उदय शंकर भी शामिल थे. # मार्तंड प्रगल्भ

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साहित्यकार विष्णु खरे. (जन्म: 9 फरवरी 1940 – अवसान: 19 सितंबर 2018) (फोटो साभार: हिंदी कविता/यूट्यूब

 

 

विष्णु खरे के साथ एक अधूरी बातचीत: मार्तंड प्रगल्भ

प्रश्न मुक्तिबोध को लेकर अभी जो उत्सव चल रहा है, और जैसा कि मनमोहन कह रहे थे कि यह उत्सव और विस्मृति दोनों का साथ-साथ चलना है, यह दोनों दरअसल एक ही सिक्के के दो पहलू हैं, तो इसी सिलसिले में इन सब के बीच मुक्तिबोध को लेकर आपकी अपनी जीवन-प्रक्रिया और रचना-प्रक्रिया में ही जो अनुभव रहे हैं उसे थोड़ा साझा करते हुए, उनसे जो पहली मुठभेड़ है, उसे बताएं!

वि.ख. मुक्तिबोध का जो पहला संग्रह आया था तो मैं शायद उसे पहले पढने वालों में से एक था. बाद में मैंने अपने कॉलेज, रतलाम कॉलेज में एक छात्र से उसपर एम्.फिल. भी करवाया था, हिंदी में. वह मुक्तिबोध पर पहला एम्.फिल. है, पैंसठ में. कहने का मतलब है कि मुक्तिबोध का बहुत गंभीर प्रभाव मुझ पर तभी था. मुक्तिबोध का असर कोई नयी चीज़ नहीं है. मेरे यहाँ तो अभी तक चालू है. अभी कम नहीं हुआ है. उसकी वजह शायद यह है कि मैं खुद लिखने वाला हूँ और मैं एक कमिटेड राइटर भी हूँ, मुक्तिबोध हमारे लेखक हैं. हमलोग वामपंथी लोगों के वे कवि हैं. तब से लेकर अब तक मुक्तिबोध मेरे जीवन में और मेरे लेखन में केन्द्रीय रहे हैं. लेखन माने उनका जो आईडियोलॉजिकल असर है, उनका कमिटमेंट है, वह हमारे लिए एक लाइट हाउस की तरह है. हांलांकि यह भी सच है कि मुक्तिबोध की आमद के पहले ही मैं वामपंथी था. मुक्तिबोध से मेरे वामपंथ को ताकत मिली है. मैं उनको पढ़ कर वामपंथी नहीं हुआ. मैं पहले से था. मुझ पर मैक्सिम गोर्की का असर था. मुक्तिबोध बाद में आते हैं. लेकिन आजतक मुक्तिबोध के बिना मैं कुछ भी साहित्यिक सोच नहीं पाता. यह एक तरह से ऐसी उपस्थिति है जो कभी कम नहीं होती है.

प्र. मुक्तिबोध की राजनीतिक प्रतिबद्धता निश्चित रूप से एक लम्बे ट्रेडीशन में है. वामपंथ एक वैश्विक परम्परा थी जिससे मुक्तिबोध अपने तईं नया रचने की कोशिश कर रहे थे. हिंदी या भारतीय या इस पूरे उपमहाद्विपीय संदर्भ में राजनीतिक प्रतिबद्धता के कवि के रूप में मुक्तिबोध प्रगतिशील आंदोलन में नया पक्ष क्या रख रहे थे?

वि.ख. मुक्तिबोध ऐज़ सच प्रगतिशील आंदोलन में नहीं थे. मुक्तिबोध की सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि वे किसी भी इस तरह के मूवमेंट से अलग रहते हुए अपनी केन्द्रीय जगह बनाए हैं. यह बहुत आश्चर्य की बात है. यह हिंदी की ताकत की बात भी है कि मुक्तिबोध को समझने में हिंदी को किसी वामपंथी धारे की ज़रुरत नहीं पड़ी और वह मुक्तिबोध को मुक्तिबोध बनाने में कोई बैसाखी नहीं बनी. यह बहुत बड़ी बात है. मुक्तिबोध अभी भी इंडिपेंडेंट हैं. मुक्तिबोध को आप किसी भी इस तरह के स्कूल में बाँध नहीं सकते. मुक्तिबोध का जो पूरा होना है वह मृत्यु के बाद का है. एक बड़ी विचित्र बात है कि हिंदी में कोई लेखक मृत्यु के इतने दिनों बाद तक बना रहा. मुक्तिबोध मरता नहीं है. मुक्तिबोध की प्रतिष्ठा में, मुक्तिबोध के फेम में, मुक्तिबोध के एक्सेप्टेंस में कोई फ़र्क नहीं आया है बल्कि मुक्तिबोध निर्बाध बढ़ रहा है. आप देखिये न मुक्तिबोध के ज़माने का, और उनके पहले का भी, पूरा प्रगतिशील स्कूल नष्ट हो गया. इनके पहले के बड़े-बड़े कथित प्रगतिशील कवि खत्म हो गए. मुक्तिबोध का मुक्तिबोध होना और इतने बड़े कवि-समुदाय द्वारा स्वीकृत होना अजीब है. हमलोग कह सकते हैं कि हमने मुक्तिबोध को सबसे पहले समझा. मुक्तिबोध अगर हमारे बगैर भी इतना बड़ा हो गया और होता जा रहा है तो मुक्तिबोध की ताकत का वह रेशा ढूंढना चाहिए कि वह क्यों एक्सेप्टेड है. क्योंकि मुक्तिबोध की ईमानदारी टोटली ट्रांसपैरेंट है. टोटली. वहां पर कोई ओपेक्नेस है ही नहीं…ट्रांसपैरेंट है.

प्र. यह जो इंडिपेंडेंट लेफ्ट की बात आप कह रहे हैं कि जितनी भी प्रगतिशील परम्पराएं थीं मुक्तिबोध उनसे अलग रह कर, बिना स्कूल का अनुकरण किये, और बिना किसी स्कूल का पालन किये या बिना किसी मठ में गए और बिना कोई मठ बनाने की प्रक्रिया में शामिल हुए, जिस इंडिपेंडेंट लेफ्ट की धारा को प्रेरणा देते हैं, उनकी प्रतिबद्धता का यह अंश आपको प्रेरणा कैसे देता है?

वि.ख. टोटली.

प्र. अभी के समय में अगर कहें कि इस तरह के किसी इंडिपेंडेंट लेफ्ट की जगह अगर बन रही है तो उसका स्वरुप या उसकी पॉलिटिक्स को हमलोग कैसे समझ पायेंगे?

वि.ख. देखिये जिस तरह आप मुक्तिबोध की पॉलिटिक्स को समझते हैं वैसे ही आपको हमलोगों की भी पॉलिटिक्स समझनी पड़ेगी. अगर आप मुक्तिबोध को समझते हैं और हमलोग उनके आस-पास भी कहीं हैं, तभी आप हमें समझेंगे. अगर हमलोग बेईमान हैं तो आप समझ जायेंगे कि यह बेईमानी है. उसका कोई फ़ॉर्मूला नहीं हो सकता है. यह अजीब बात है कि मुक्तिबोध आपको खुद अपना जज होने के लिए प्रेरित करता है. वह फ़ॉर्मूला नहीं देता. वह कह रहा है कि तुम जज करो…मुझे भी जज करो. तो यह जो अपने प्रशंसकों को भी खुला छोड़ना, चुनाव के लिए, जजमेंट के लिए, यह बहुत बड़ी बात है. अच्छा पर यह ज़रूर कहूँगा कि जो आपने बात की न इंडिपेंडेंट लेफ्ट… तो ऐसा कोई मूवमेंट मुक्तिबोध ने नहीं चलाया, न हमलोग चला रहे हैं. हमलोग टोटली लेफ्ट हैं, ऐसा सोचते हैं. लेकिन बाकी जो अपने आप को लेफ्टिस्ट क्लेम करने वाले लोग हैं उनसे हम अलग हैं.

प्र. यहाँ हम इसी अंतर को थोड़ा और मूर्त तरीके से समझना चाह रहे हैं!

वि.ख. मुक्तिबोध एक तरीके से टोटल आर्टिस्ट था. टोटल आर्टिस्ट. वह यह नहीं देखता कि कौन सुनता है, क्या करता है. वह लिखता था और अपना पूरा लिखता था. इसी तरह आपको यह देखना पड़ेगा कि आज का कौन सा कवि है जो इंडिपेंडेंट लिख रहा है और मुक्तिबोध के वैल्यू से डिग के नहीं. हो सकता है कि हममें से कोई मुक्तिबोध से भी आगे जाय, सोच में. यह पॉसिबल है क्योंकि दुनिया बदल रही है और बदल रही है तो मुक्तिबोध को भी बदलना पड़ेगा. आज जहाँ मुक्तिबोध है, आज से बीस साल बाद मुक्तिबोध रह नहीं सकते. लेकिन कोई आदमी आएगा या कुछ लोग आयेंगे, कई आदमी आयेंगे जिनमें मुक्तिबोध दिखेगा आपको. पूजन के सेन्समें नहीं  , विचारधारा के सेन्स में, कमिटमेंट के सेन्स में, आप ऑलरेडी देखते हैं, और साफ़ है कि हमारे लोग मुक्तिबोध के हैं और कई लोग नहीं हैं. जो हमारे साथ नहीं है, मुक्तिबोध के साथ नहीं है, वे भी बुरे नहीं हैं. यह हम मानते हैं कि मुक्तिबोध के साथ रह कर आप कहीं ज्यादा सीखते हैं, कहीं ज्यादा बड़े होते हैं. हम मुक्तिबोध को छोड़ नहीं सकते अकेले क्योंकि वह हमें नहीं छोड़ता. वह हमारे पीछे पड़ा हुआ है. लगातार. क्योंकि मुक्तिबोध को समझना बाक़ी है. मुक्तिबोध को पूरा पढ़ा जाना बाक़ी है.

प्र. मुक्तिबोध की दो प्रचलित छवियों की बात करें तो एक ओर उनका शहीदी चित्र खींचा जाता है- असद ज़ैदी और कई अन्यों की स्मृति में मुक्तिबोध की शहादत की मुहर है, और दूसरी ओर उन्हें ब्रह्मराक्षस की सीमाओं में बाँधने की कोशिश की जाती है, ब्रह्मराक्षस की छवि गढ़ी जाती है. इन छवियों की आलोचना आप कैसे करते हैं?

वि.ख. देखिये इन दोनों छवियों को मैं सही नहीं मानता. कारण ये है कि मुक्तिबोध शहीद नहीं थे इस तरह से. मुक्तिबोध को शहीद मानकर केवल रफा-दफा किया जा सकता है. मुक्तिबोध की व्याख्या उनके टोटल वर्क पर होनी चाहिए. उनकी शहादत हमें भूलनी पड़ेगी. वरना हम उनके पूजक बन के रह जायेंगे. मुक्तिबोध हमारे पास एक बहुत बड़ी सम्पदा हैं. आज भगत सिंह को कौन मानता है? कोई नहीं मानता. भगत सिंह भगत सिंह बना दिए गए बस. शहीद-ए-आज़म बन गए. मुझे मुक्तिबोध को हिंदी कविता का या हिंदी साहित्य का शहीदे-आज़म नहीं बनाना है. वह जिंदा हैं. अपने वर्क में जिंदा हैं, हमारे जीवन में जिंदा हैं. क्योंकि वह हमारे जीवन के लिए यूजफुल है. आज भगत सिंह यूजफुल नहीं रहे. लेकिन मुक्तिबोध हमारे लिए क़दम-क़दम पर यूजफुल हैं. इसलिए मैं न शहीद और न ही उन्हें ब्रह्मराक्षस मानता हूँ. यह एक तरह से मुक्तिबोध को मिस्टीफाई करने की बात है, बिला वजह. मुक्तिबोध को ब्रह्मराक्षस मानना, उनको भाजपा की गोद में डाल देना है. मुक्तिबोध के साथ कुछ भी मिस्टिक नहीं किया जा सकता. वह मिस्टेरियस आदमी नहीं था. मिस्टिक नहीं था वह. वह तांत्रिक नहीं था. उसके पास सभी अलामतें थीं कि वह दुनिया देख रहा था. अब आप कहेंगे मुक्तिबोध खुद तांत्रिक हो गए थे, यह बेवकूफी है. मैं इन दोनों खेमों को मुक्तिबोध के लिए बहुत हानिकारक मानता हूँ, और मुक्तिबोध के लिए क्या, जो मुक्तिबोध को पढ़ते हैं उनके लिए. मुक्तिबोध पर हमले की कोशिश जो लोग कर रहे हैं, वह मैं समझता हूँ ब्रह्मराक्षस वाला खेमा है. अब दिक्कत क्या है कि बहुत सारे लोग हैं हिंदी कविता के वे मुक्तिबोध को बड़ा मानना नहीं चाहते अपने से. इन्हें लगता है कि अगर मुक्तिबोध ही मुक्तिबोध रहेगा तो हम कहाँ जायेंगे. मुझे लगता है कि असद ज़ैदी वगैरह लोगों में यही ग्रंथि है कि भाई हम भी कुछ हैं. कुछ हमारी बात भी बने. मुक्तिबोध क्या होता है! और कब तक रहोगे मुक्तिबोध के! मेरी बात तो यह है कि मैं मुक्तिबोध से आगे जाते हुए भी उनका गुलाम हूँ. यह सब कुछ उसी से सीखा है. उससे प्रेरित हुए हैं, तो कैसे कह दें कि भाई वह शहीद हो गया. शहीद हो गए? अरे वह जिंदा है. शहीद हुआ होगा तुम्हारे लिए. वह तो हिंदी के लिए भी शहीद नहीं हुआ. क्योंकि वह जिंदा रहना चाहता है भाई, काम करते हुए, तो उसको आप शहादत मत दीजिये. मेरा कहना यह है कि उन्हें कोई शहीद न माने और जो मानता है वह अपराधी है. मुक्तिबोध को शहीद मानना अपराध है. उसको मानो कि वह जिंदा है और हमारे बीच है. हम ज़िंदा हैं. मैं कहता हूँ कि मैं मुक्तिबोध हूँ, चलिए बहस कीजिये. हममें से जो भी फील करता है कि वह मुक्तिबोध का है- उसके अन्दर मुक्तिबोध बैठा है. यह बात है.

प्र. मुक्तिबोध की रचना-प्रक्रिया की विशिष्टता आखिर क्या थी या किस तरीके से वह प्रैक्टिस, वह विश्वदृष्टि हम तक अबाधित चली आ रही है?

वि.ख. मुक्तिबोध एक्चुअली एक विश्वचेता कवि थे. उनको सिर्फ भारतीय कवि मानना बड़ा गलत है. ‘बाचीज़ा-ए-अतफ़ाल है दुनिया मिरे आगे’. वह तमाशे की बात नहीं करता था. वह अकेला कवि है कबीर के बाद. कबीर ब्रह्मांडीय कवि हैं. मैंने कहा भी है कि कबीर का जो करघा है, माने जुलाहे का जो करघा है एक पूरी कायनात है. तो एक ओर कबीर का जुलाहापन और उसका करघा और फिर उसके बाद मुक्तिबोध का इन्टलेक्ट, वामपंथी इन्टलेक्ट. वामपंथी आदमी पूरी कायनात को इकठ्ठा देखेगा ही. वह अभिशप्त है. वह बिना दुनिया का जायज़ा लिए बल्कि कहिये कि बिना कॉसमॉस का जायज़ा लिए हो ही नहीं सकता.

प्र. कबीर के बाद मुक्तिबोध- अर्थात जिसे आरंभिक आधुनिक काल कहा जाता है वहाँ एक जुलाहे की, दस्तकार की, आर्टीजन कवि की विश्वदृष्टि और उनकी साधना के बाद मुक्तिबोध!

वि.ख. मैं आपसे कह रहा हूँ कि उस ज़माने की सबसे बड़ी टेक्नोलोजी करघा थी, करघे से बड़ी कोई टेक्नोलोजी थी नहीं पूरे विश्व में. कबीर उसका एक्सपर्ट है. वह समझता है सब चीज़.

प्र. लेकिन कबीर की आर्टीजनशिप की दुनिया और मुक्तिबोध की औद्योगिक सभ्यता की दुनिया में जो लीप है, ब्रह्मांडीय दृष्टि में जो यह लीप है, उसी संदर्भ में कि एक श्रमिक-कवि या कवि-कामगार जो अपने चारों ओर की दुनिया में सक्रिय है और इस वक़्त की ‘टेक्नोलोजी’ के सहारे जेनेरिक मनुष्यता की आत्मा को बनाने में लगा है- कॉसमॉस के भीतर, वैसी स्थिति में एक कवि-कामगार की राजनीति को रचनाप्रक्रिया में कैसे स्पष्ट करेंगे?

(यहाँ हमारी बात-चीत रुक जाती है. विष्णु-खरे का कोई पुराना मित्र उनसे मिलने आ चुके थे. आज जब कि खरे हमारे बीच नहीं है इसलिए इस बात-चीत को इसी रूप में आगे जारी रखना संभव नहीं है.)

मार्तण्ड प्रगल्भ

 

छात्र राजनीति और संस्कृति-कर्म में व्यस्त रहने वाले मार्तण्ड प्रगल्भ जे.एन.यू. के भारतीय भाषा केंद्र से पी.एच.डी. हैं. फ़िलहाल  रेडिकल नोट्स कलेक्टिव  के साथ कार्यरत हैं. उनसे mpragalbha1@gmail.com पर संपर्क संभव है            

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रोहित वेमुला की घटना और वेलीवाड़ा: मार्तंड प्रगल्भ

मुक्तिकामी शिक्षा की एक नितांत भिन्न छवि को संजोये किसी आदर्शवादी नौजवान को वर्तमान विश्वविद्यालयों के भीतर भी उसी सर्वग्रासी अवमूल्यन को जन्म देने वाली अलगाव और जड़ता की पारिस्थितकी के पीड़ादायी अनुभवों से गुजरने को बाध्य होना पड़ता है. दलित समाज के लिए ये अनुभव उनकी चेतना की व्यवस्था में ऐतिहासिक रूप से पुरुत्पादित होते आये हैं. यह अकारण नहीं कि ‘रोहित वेमुला’ की घटना के बाद उभरा आन्दोलन विश्वविद्यालय में वेलीवाड़ा को पुनर्न्वेषित करता है. विद्रोह के लिए ज़रूरी स्पेस के रूप में वेलीवाड़ा न केवल विश्वविद्यालय की सीमाओं को स्पष्ट करता है वरन् समाज में हर जगह व्याप्त वेलीवाड़ा के व्यापक संघर्ष का हिस्सा बन जाता है. #लेखक 

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A sculpture at University of Hyderabad . Credit: Javed Iqbal, via The Wire

रोहित वेमुला की घटना और वेलीवाड़ा

By मार्तंड प्रगल्भ

रोहित वेमुला के पहले और आखिरी पत्र[1] को पढ़ते वक़्त एक आदर्शवादी नौजवान की छवि उभर आती है. वह अपने जीवन-अनुभवों से जानता है कि हमारी ह्रासग्रस्त मानवीय सम्बन्धों से बनने वाली पूरी पारिस्थितिकी बनावटी, झूठी, कृत्रिम और भयोत्पादक हो गयी है. “ हमारा प्रेम बनावटी है, हमारी मान्यताएं झूठी हैं, हमारी मौलिकता वैध है बस कृत्रिम कला के ज़रिये, यह बेहद कठिन हो गया है कि हम प्रेम करें और दुखी न हों.” मनुष्य होने की हर संभव कोशिश और उत्साह रोज़मर्रा की ज़िन्दगी में शामिल गहरे अवमूल्यन से मुठभेड़ करती है. मनुष्यों के मूल्यांकन की उनकी परिभाषाओं की एक दूसरी दुनिया का स्वप्न अपने आसपास के अवमूल्यित मूल्यों से विद्रोह करने को बाध्य है. एक ऐसी दुनिया के लिए जहाँ प्रेम दुःख न पैदा करे. आज की दुनिया में मनुष्यों का मूल्य,“ इंसान की उपयोगिता उसकी तत्कालीन पहचान तक सिमट कर रह गयी है और उसकी नजदीकी संभावना तक ही सीमित कर दिया गया है … एक आंकड़ा है मनुष्य- महज एक वस्तु … आदमी को कभी भी उसके दिमाग के हिसाब से नहीं आंका गया. एक ऐसी चीज़ जो स्टारडस्ट से बनी थी, हर क्षेत्र में, अध्ययन में, गलियों में, राजनीति में, मरने में और जीने में.” दिमाग जो स्वप्न देख सकता है. विज्ञान का स्वप्न. केवल तात्कालिक संभावना के विरुद्ध भविष्य के दिक्-काल की असीम संभावनाओं का स्वप्न. वास्तविक मनुष्य को वस्तुवत करने की मूल्यव्यवस्था के खिलाफ मनुष्य होने की अनंत संभावना को जीवन मूल्य के रूप में जीने वाले लोगों के लिए अनिवार है कि वे आपस में मिलकर जीवन की पारिस्थतिकी के आमूलचूल परिवर्तन में जुड़ जाएँ. स्वयं को उस परिवर्तन के हथियार के रूप में रूपांतरित करें. अलगाव और जड़ता की सर्वग्रासी सभ्यता जीवन के बीजों को नष्ट करने का कारखाना बन चुकी है. मनुष्यता का विद्रोह और नए के निर्माण का संकल्प प्रत्येक क्षण इस झूठ को महसूस करने में इसके अंत को जीता है. “मैं मृत्यु के बाद की कहानियों पर विश्वास नहीं करता, भूत और आत्मा. अगर कुछ है जिस पर मैं भरोसा करता हूँ, वह है कि मैं सितारों की सैर करूँगा और दूसरी दुनिया के बारे में जानूंगा”.

मुक्तिकामी शिक्षा की एक नितांत भिन्न छवि को संजोये किसी आदर्शवादी नौजवान को वर्तमान विश्वविद्यालयों के भीतर भी उसी सर्वग्रासी अवमूल्यन को जन्म देने वाली अलगाव और जड़ता की पारिस्थितकी के पीड़ादायी अनुभवों से गुजरने को बाध्य होना पड़ता है. दलित समाज के लिए ये अनुभव उनकी चेतना की व्यवस्था में ऐतिहासिक रूप से पुरुत्पादित होते आये हैं. यह अकारण नहीं कि ‘रोहित वेमुला’ की घटना के बाद उभरा आन्दोलन विश्वविद्यालय में वेलीवाड़ा को पुनर्न्वेषित करता है. विद्रोह के लिए ज़रूरी स्पेस के रूप में वेलीवाड़ा न केवल विश्वविद्यालय की सीमायों को स्पष्ट करता है वरन् समाज में हर जगह व्याप्त वेलीवाड़ा के व्यापक संघर्ष का हिस्सा बन जाता है. समाज के अदृश्य और अस्पृश्य का विश्वविद्यालय के भीतर दृश्य और भौतिक होना न केवल समाज के पुनर्संयोजन की दृष्टि देता है वरन् शिक्षा के नए सैद्धांतिक व्यवहारों की प्रेरणा भी प्रदान करता है. ऐतिहासिक रूप से संतों के सामाजिक-सांस्कृतिक प्रयासों और अम्बेडकर के राजनीतिक व्यवहारों में दलितवाड़ा या वेलीवाड़ा के सामाजिक स्पेस को सामाजिक क्रान्ति के आधार क्षेत्र के रूप में रूपांतरित होता हुआ हम देखते हैं. इस अर्थ में ‘वेलीवाड़ा’ दलित मुक्ति के ऐतिहासिक प्रयोगों की परम्परा में है. यह कोई फिक्स मॉडल नहीं वरन् एक आन्दोलन है जिसका उद्देश्य है जातियों का नाश और श्रम-विभाजन को श्रमिकों के विभाजन से मुक्त करना. दूसरे शब्दों में वेलीवाड़ा समानता और न्याय के वास्तव को समाज में स्थापित करते जाने वाला आन्दोलन है. यह नए गणराज्य की इकाई नहीं वरन् गणराज्य को चुनौती है.

पिछले कुछ सालों से देश भर की उच्च शिक्षण संस्थाएं हमारी संसदीय सरकारों के निशाने पर हैं. निशाने पर हैं और बहुत संस्थागत रूप से उच्च शिक्षा के लोकतांत्रिक आदर्श को नष्ट करने की शक्तियों के खिलाफ संघर्ष कर रहे हैं. किसी न किसी तरीके से विश्वविद्यालय की सम्पूर्ण पारिस्थितिकी को बचाने की जद्दो-जहद भी तेज हो रही है. कुछ गिने-चुने विश्वविद्यालय या शोध की उच्च शिक्षण संस्थाएं बची हैं जो आज भी नए भारत के स्वप्न को बचाने की कोशिश कर रही हैं. नए भारत के निर्माण और शिक्षा के व्यवहार के विमर्श में नए समाज के निर्माण का आदर्श भी जिंदा है. नवउदारवाद के हिंसक और हमलावर दौर में इन विश्वविद्यालयों का लोकतांत्रिक व्यवहारों और शिक्षा के वैश्विक प्रयोगों के सहिष्णु विमर्श की जगह के रूप में खुद को बचाए रखने की राजनीति अपवाद चिह्नित हो रही है. पिछले तीस-चालीस सालों में सम्पूर्ण शिक्षा-व्यवस्था का पुनर्संयोजन होता गया है. गाँव, कस्बों और छोटे-बड़े शहरों में यह पुनर्संयोजन स्वीकार्य बना दिया गया. इसलिए आज जब जवाहरलाल नेहरु या हैदराबाद विश्वविद्यालय पर प्रायोजित हमले हो रहे हैं ऐसे में उनकी पारिस्थितिकी असुरक्षित महसूस कर रही है. यह असुरक्षा देशभर की शैक्षणिक पारिस्थितिकी में संपन्न मूलगामी दरार के खिलाफ शिक्षा की नयी व्यवस्था की लड़ाई में सहभागिता-निर्माण के संकट के चलते है. संघर्ष के अपने अपवाद चरित्र के कारण ‘save या बचाओ’ का नारा निर्माण की कार्य-नीति के लिए जरूरी हो उठा है.

उच्च शिक्षा की स्थानीय पारिस्थितिकी का एक ऐसा मॉडल जो स्वतः और संतुलित संचालन का भी मॉडल हो अब संभव नहीं रह गया है. मार्क्स पूँजीवाद के विकासक्रम में पैदा होने वाले सम्पूर्ण मानवीय सामाजिक-चयापचय(सोशल मेटाबोलिज्म) के रिफ्ट की चर्चा करते हैं. मनुष्य जीवन की सम्पूर्ण पारिस्थितिकी में उत्पन्न यह भ्रंश (रिफ्ट) अलगाव और जड़ता को ऐसी अपूरणीय क्षति में बदल देता है जहाँ से पुनर्वापसी संभव नहीं रह जाती. यह भ्रंश अनिवार्यतः और सतत वैश्विक संकट है. इसलिए विश्विद्यालय की पारिस्थितिकी-भ्रंश के खिलाफ संघर्ष अपनी चौहद्दी में असंभव नए प्रयोगों से मुकर नहीं सकता. रोहित वेमुला की घटना के बाद यह संघर्ष विश्वविद्यालयों की पारिस्थितिकी में दलित जीवन के संकट को समझने और व्यापक संकट के खिलाफ क्रांतिकारी नव-निर्माण के व्यवहारों में सहभागी आन्दोलनों का रूप ग्रहण करने की चेष्टा कर रहा है. सहभागी स्थानीय आन्दोलनों के भीतर व्यवहारों के लोकतांत्रिक स्वरूप को लेकर बहस पहले से कहीं तेज हो उठी है. वास्तविक समानता या जिसे अंग्रेजी में sabstantive eqality कहा जाता है उसके स्थानीय प्रयोग लोकतंत्र के आंदोलनात्मक चरित्र को व्यावहारिक बनाने का प्रयास कर रही है. इन प्रयासों को भी अम्बेडकर के राजनीतिक व्यवहारों से प्रेरणा मिलती है. लोकतंत्र उनके लिए सरकार की एक व्यवस्था मात्र नहीं थी. लोकतांत्रिक समाज एक गतिशील समाज है. स्वतंत्रता, समानता और भाईचारे के मूल्यों को आचरण में उतारने के लिए ज़रूरी समाज. यहाँ साहचर्य या संगठन के अन्य रूपों से संवाद संभव है. भाईचारा हर व्यक्ति या विचार को मूल्यवान मानने में है, अगर वह व्यक्ति और विचार वास्तविक जीवन में समानता का आचरण करता है या उसकी प्रेरणा देता है. “ दूसरे शब्दों में, समाज के भीतर संपर्क का सर्वत्र प्रसार होना चाहिए. इसी को भाईचारा कहा जाता है और यह प्रजातंत्र का दूसरा नाम है. प्रजातंत्र सरकार का एक स्वरुप मात्र नहीं है. यह वस्तुतः साहचर्य की स्थिति में रहने का एक तरीका है, जिसमें सार्वजनिक अनुभव का समवेत रूप से सम्प्रेषण होता है.”[2] आरक्षण-केन्द्रित सुधारवादी प्रयोगों ने साहचर्य और भागीदारी के लोकतंत्र को कुछ एक व्यक्तियों के इर्द-गिर्द सीमित कर दिया . ‘सार्वजनिक अनुभव का समवेत रूप से सम्प्रेषण’ जीवन के अन्य क्षेत्रों की तरह विश्वविद्यालयों के भीतर भी असंभव होता गया है. छात्र राजनीति से निकले प्रगतिशील मूल्यों वाला लोकतांत्रिक मॉडल भी साहचर्य में वास्तविक समानता के सामाजिक परिवर्तन को सत्ता प्राप्ति की होड़ के हवाले कर देता है. दलित राजनीति अपने समय के सभी सामाजिक सुधारवादी माडलों के अन्दर समानता और भाईचारे के आचरण का अभाव महसूस करती है. इसका अर्थ है कि छात्र राजनीति के परम्परागत संगठनात्मक अनुभवों में जाति के नाश की किसी ईमानदार कोशिश का अभाव है. इसलिए जब कैम्पस-लोकतंत्र को बचाने की बात की जाती है तो यह दलित राजनीति के सामने ‘किस लोकतंत्र’ को बचाने का सवाल बन जाता है. विश्वविद्यालय की पारिस्थितिकी को बनाने वाले छात्रों, शिक्षकों, कर्मचारियों, कामगारों के रोज़मर्रा के जीवन में समानता और भाईचारे के नाम पर केवल उंच-नीच का व्यवहार है. दलित राजनीति उंच-नीच की इस उत्पीड़क व्यवस्था का वास्तव में नाश चाहती है. यही कारण है कि लोकतांत्रिक मॉडलों के नाम पर चलने वाली उत्पीड़क व्यवस्था से संघर्ष साहचर्य और सामाजिक संगठन के ज्यादा समतामूलक रूपों की तलाश भी है.

जातिगत शोषण दलित जीवन का यथार्थ है. ऐतिहासिक रूप से जाति की व्यवस्था ने समाज को न केवल विद्रूपित किया है बल्कि इसने सभ्यतामूलक बर्बरता को समाज व्यवस्था की केन्द्रीय शक्ति बना दिया है. इस सभ्यतामूलक बर्बरता के खिलाफ समतापरक समाज के आदर्श वाली दलित राजनीति के भीतर वाम छात्र-आंदोलनों के लोकतांत्रिक-सांस्थानिक व्यवहारों के प्रति एक स्वाभाविक अस्वीकार है. अस्वीकार की यह स्वीकृति केवल विचारधारा के लिए ही ज़रूरी नहीं है बल्कि इस अस्वीकार की रौशनी में नए विश्वविद्यालय तक अपना सफ़र तय करना हमारी आवश्यकता भी है. दलित राजनीति यह वाजिब सवाल उठाती है कि प्रगतिशील छात्र आंदोलनों ने विश्वविद्यालय के पारितंत्र में दलित जीवन को सम्यक ढंग से संबोधित क्यों नहीं किया? या ऐसा वो क्यों नहीं कर पाए? बचाने से परिरक्षण और पुनर्निर्माण क्योंकर होगा? और यह सवाल एक बारगी मुक्तिकामी राजनीति की सम्पूर्ण परम्परा को चुनौती है. चुनौती के इसी व्यवहार में दलित और प्रगतिशील सहभागिता विकसित हो सकती है. रोहित वेमुला का अस्वीकार दलित और प्रगतिशील ताकतों की सहभागी परम्परा को चुनौती देने वाला अस्वीकार है. उच्च शिक्षण-संस्थाएं संघर्ष, ज्ञान और संगठन के जिन स्वप्न-आदर्शों को संबोधित करती हैं उनके टूटने का अस्वीकार और नवनिर्माण की चेतना है रोहित वेमुला. अम्बेडकर की उन्मूलनपरक दृष्टि और शिक्षा के मुक्तिदायक रूपों पर जोर आज ‘रोहित वेमुला’ के स्वप्न-आदर्शों में नए अर्थग्रहण कर रहा है. यह अर्थ-ग्रहण क्रमिक मोह-भंगों के खिलाफ होने वाले वास्तविक आन्दोलनों से पृथक पहचाना नहीं जा सकता.

वेलीवाड़ा और साहचर्य

कबीरा यह घर प्रेम का खाला का घर नाहीं / शीश उतारे भूईं धरे तब पैसे घर माहीं”

वेलीवाड़ा के संदर्भ में कबीर का घर याद आना अनायास नहीं है. इस घर में प्रेम के नियम को छोड़ कर कोई अन्य सामाजिक नियम लागू नहीं है. प्रेम भी कोई नैतिक विधि-शास्त्र से संचालित अलंकरण नहीं बल्कि साहचर्य की रचना-प्रक्रिया. इस घर में प्रवेश के लिए ज़रूरी है तत्कालिक पहचान से मुक्त होना. एक ऐसा सामाजिक स्पेस जो निश्चित हदों के बदले अनहद हो. लोकतंत्र का ऐसा अनहद चरित्र ही वेलीवाड़ा है. यह अनहद ‘सार्वजनिक अनुभवों का समवेत सम्प्रेषण’ है. यह सम्प्रेषण सामाजिक सुधार के सतही प्रयासों के लिए अस्वीकार्य है. इस अस्वीकार्यता के चलते यह मूलगामी राजनीति का संयोजक हो उठता है. वेलीवाड़ा सामूहिक स्वामित्व और सामूहिक अभिव्यक्ति ( ओनरशिप और ऑथरशिप) दोनों है. अम्बेडकर के राजनीतिक प्रयासों से दो उदाहरण इसकी ऐतिहासिक परम्परा को स्पष्ट करते हैं. देवदासियां मंदिरों से निकल कर मुंबई के कामतीपूर में सेक्स-मजदूरी करने लगीं. शहर उन्हें आत्म-मर्यादा नहीं दे पाया. वह अपनी अस्पृश्यता और अपने अपमान से मुक्त नहीं हुई. उनका प्रेम, मातृत्व, कामना और अपने सम्पूर्ण जीवन पर अधिकार न पहले था और न सेक्स-मजदूर बनने के बाद. अम्बेडकर इनसे बात-चीत करने गए एक नए घर का स्वप्न ले कर. शहर की मलिन बस्तियों के भीतर एक सर्वथा भिन्न पारिस्थितिकी का स्वप्न लेकर. गोपाल गुरु ने ध्यान दिलाया है कि अम्बेडकर के लिए श्रम-शक्ति ही देहों में मूर्त होती है. यह श्रम-शक्ति बलात् मजे की वस्तु होने से इनकार करती है. “ अम्बेडकर इसलिए सलाह देते हैं कि आत्म-मर्यादा मूलतः उस प्रक्रिया से निकलती है जिसमें ये अस्पृश्य महिलायें अपने श्रम को भौतिक गुणों जैसे प्रकृति, भूमि या उद्योग से घुला मिला सकें.”[3]  आत्म-मर्यादा केवल एक विचारधारा नहीं बल्कि एक भौतिक प्रक्रिया है. शादी अम्बेडकर के लिए मुक्त साहचर्य की ऐसी प्रक्रिया थी जहां सामूहिक श्रम-शक्ति अपनी भौतिक दुनिया के साथ घुल-मिल कर सामूहिक भलाई की स्वतंत्र इकाई हो जाए. श्रम-शक्ति की स्वतंत्र और ठोस अभिव्यक्ति के लिए ज़रूरी है कि भौतिक गुण सार्वजनीन हों. निजी संपत्ति को बचाए रखने की व्यवस्था श्रम-शक्ति का बलात् दोहन करती है. अस्पृश्यों के आत्मसम्मान और आत्म-मुक्ति के लिए ज़रूरी प्रक्रिया है प्रकृति और समाज के ऊपर किसी भी तरीके के निजी संपत्ति का क्षरण. स्त्रियाँ तो श्रम-शक्ति का उत्पादन भी करती हैं. ऐसी स्थिति में दलित और मलिन बस्तियों की अस्पृश्य महिलायें सामाजिक पुनुरुत्पादन की दूसरी रीति के लिए संघर्ष में ही आत्म-मर्यादा भी हासिल कर सकती हैं. साहचर्य यहाँ व्यक्तिगत उत्पादकों के स्वतंत्र साहचर्य के लिए ज़रूरी संघर्ष की एकता में है. अम्बेडकर ने इस संघर्ष को जारी रखने वाले आत्मबल के लिए दलित गृहस्थ की एक नयी कल्पना सामने रखी. बहुत कुछ कबीर के घर की तरह.

कबीर की तरह अम्बेडकर भी जानते थे कि जो अपना पुराना घर नहीं जला सकता वह इस नए साहचर्य में शामिल नहीं हो सकता. ‘जात-पात तोड़क मंडल’ का हिन्दू सुधारवादी प्रयास अम्बेडकर को अपने घर में अध्यक्ष बना कर पंजाब के दलितों का अभिभावक बनना चाहता था. यह प्रतिनिधित्व को प्रतीकात्मक बनाना था. पंजाब का दलित जन-गण अम्बेडकर के जाति-विनाश या उन्मूलन की दृष्टि को पहचानना चाहती थी. आत्म-परिचय की यह सामूहिक चेतना स्वाभाविक रूप से मंडल को बाध्य कर रही थी कि वह लाहौर में अपने सभा की वार्षिक कांफ्रेंस का अध्यक्ष बम्बई के एक उन्मूलनवादी डॉक्टर साहेब को बनाये. सवर्ण सुधारकों का वैष्णव घर ऐसे अस्पृश्य को बिना किसी शुद्धि के प्रवेश नहीं दे सकता था. अम्बेडकर ने मंडल के साथ अपने पत्राचार में लगातार शुद्धि के वैष्णव आग्रहों को अस्वीकार किया. अपने पर्चे के किसी अभी अंश या विचार से उन्होंने समझौता नहीं किया. अम्बेडकर जानते थे कि ऐसे सुधारवादी बिना अपने वैष्णव घर को जलाए उनके सहचर नहीं बन सकते. मंडल की सामाजिक संरचना की आलोचना करते हुए अम्बेडकर गुरु और अंत्यज के अंतर्विरोध को बहुत तीव्र कर देते हैं. गुरु के रूप में एक अस्पृश्य को स्वीकार करने का अर्थ था समानता के आदर्श को आचरण में उतारना. यह आचरण नए सामाजिक सम्बन्धों की स्वीकृति है. साहचर्य के लिए जातिप्रथा का ज़रूरी ध्वंस स्वीकार करने में मंडल असमर्थ था. हिन्दू-धर्म और जातिव्यवस्था की प्रभुत्वशाली दुनिया में अम्बेडकर हमेशा बहिष्कृत थे. अपने बलात् बहिष्कार के हिंसात्मक-अहिंसात्मक अनुभवों के सहारे ही वह जाति-उन्मूलन की अपनी नयी सैद्धांतिकी भी रचते हैं. यह सैद्धांतिक व्यवहार स्वयं राजनैतिक हो उठता है. कबीर आदि संतों को भी ज्ञानी और गुरु के रूप में स्वीकार करना वैष्णव मन के खिलाफ था. इनकी आलोचना इतनी प्रखर थी कि वे किसी भी तरीके से वैष्णव विश्वदृष्टि में समंजित नहीं हो सकते थे. वह एक नयी विश्वदृष्टि का उन्मेष था. कबीर कभी किसी शिष्य को संबोधित नहीं करते. या तो अपने धुर विरोधी पांडे-मौलवियों का मजा लेते या फिर साधना पथ के सहयात्रियों साधू-असाधु, अवधू आदि को संबोधित करते है. साहचर्य के बाहर सद्गुरु का कोई अर्थ नहीं. यह सद्गुरु साथी कामगार है. वह प्रेम और सबद की साधना का सहचर-मित्र है.

मंडल के अस्वीकार के लिए अम्बेडकर पहले से ही तैयार थे. वह देख रहे थे कि संत रामदास की वाणी असत्य नहीं हो सकती. संत कवियों के सत्य को वह अपने राजनीतिक जीवन में पुनर्न्वेषित करते हैं. गुरु और अंत्यज के सम्बन्धों की सभी हिन्दू या वैष्णव कल्पनाओं और परिकल्पनाओं की आलोचना करते हुए वह समाज में शिक्षक की भूमिका पर भी विचार कर रहे थे. बौद्ध-मठों और विश्वविद्यालयों के इतिहास में उनकी अंतर्दृष्टि आवयविक या सहज बुद्धिजीवियों के संगठनात्मक व्यवहार की परम्परा का अन्वेषण करती है. सहज या आवयविक बुद्धिजीवी उनके लिए बौद्ध-भिक्षुओं का तात्कालिक या आधुनिकतम रूपांतरण थे[4]. बौद्ध संघों और विश्वविद्यालयों से विद्रोह करने वाले सरहपा आदि सिद्धों की परम्परा कबीर आदि संतों के यहाँ नवीन जीवन-दृष्टि का उन्मेष बन जाती है. महाराष्ट्र की संत-परम्परा अम्बेडकर की अंतर्दृष्टि में स्वाभाविक थी. उन्होंने अपने पर्चे में लिखा था कि अगर उन्हें अपने वर्तमान सामजिक संरचना वाले मंडल के सम्मलेन में  अध्यक्षीय वक्तव्य का मौक़ा मिल जाता तो संत रामदास की वाणी असत्य हो जाती. अम्बेडकर ‘सार्वजनिक अनुभवों के समवेत सम्प्रेषण’ को राजनीति का आधार बना रहे थे. मंडल के अस्वीकार ने अम्बेडकर को सहज या आवयविक बुद्धिजीवी के रूप में पुनः रेखांकित किया. दलितवाड़ा या वेलीवाड़ा की पारिस्थितिकी से आवयविक या सहज जुड़ाव उत्पादकों की तरह ही संभव है. ब्राह्मणवाद और पूंजीवाद की संश्लिष्ट उत्पादन-प्रक्रिया से बनने वाले सामाजिक सम्बन्धों के भीतर वेलीवाड़ा एक रिक्त स्थान है. यह उत्पादकों के नितांत भिन्न सामाजिक संगठन होने की प्रक्रिया है. वह प्रभुत्वशाली सामाजिक सम्बन्धों द्वारा अप्रोप्रिएशन की हर संभव चेष्टा की कांट-छांट में सक्षम है. इसी अर्थ में वह एक गतिशील लोकतांत्रिक समाज है. यह बहिष्कृतों और अस्पृश्यों का लोकतंत्र है.

वेलीवाड़ा और व्यवहार का दर्शन

सहज बुद्धिजीवी के संगठन पर विचार करने वाले ग्राम्शी से अम्बेडकर के प्रयासों की फौरी एकता भी शिक्षाप्रद है. अम्बेडकर और ग्राम्शी दोनों ही अपने सामाजिक-धार्मिक आन्दोलनों के इतिहास की जांच करते हुए आवयविक बुद्धिजीवी की संकल्पना तक पहुँच रहे थे. अपने राष्ट्रीय इतिहासों में दलित और सबाल्टर्न की तार्किक इयत्ता बहुत भिन्न नहीं है. संत कवियों का अनुभव-सम्मत विवेकवाद एक नयी विश्वदृष्टि की प्रस्तावना करती है जिसे ग्राम्शी के शब्दों में व्यवहार का दर्शन कह सकते हैं. यह दर्शन सम्पूर्ण प्रभुत्वशाली धार्मिक विश्वदृष्टि का विकल्प देती है. उत्पादकों के अनुभव की एकता जब अपनी अभिव्यक्ति के संकट से गुज़र रही होती है तब यह निश्चित है कि सम्पूर्ण सामाजिक सम्बन्ध एक बड़े परिवर्तन की पीड़ा से गुज़र रहा है. ऐसे समय में प्रभुत्वशाली विश्वदृष्टि अपने सामाजिक आधार को विचारधारा के सीमेंट और गारे से जोड़े रखने में अक्षम हो जाती है. संकट के इस काल में उत्पादकों के अनुभवों की एकता दो नितांत विरोधी विश्वदृष्टि में बंट जाती है. इन विरुद्धों का सामंजस्य धार्मिक विचारधारा को पुनर्जीवित करने जुड़ जाता है. जबकि विरुद्धों के संघर्ष की तार्किक परिणति धर्म मात्र का विनाश हो जाती है. संतों का सच धर्म का सच नहीं है जिसका प्रचार सामंजस्य की वैष्णव विचारधारा करती है. वैष्णव विचारधारा उत्पादन को गुणों के अधीन करती है जबकि कबीर आदि संत उत्पादन को गुणातीत बताते हैं.

सरहपाद जैसे सिद्धों का नालंदा विश्वविद्यालय के प्रति विद्रोह और फिर से सिद्धांत और व्यवहार की एकता का प्रयास यह बताता है कि उस समय के संस्थानिक बौद्धिकों की दूरी जन साधारण से कितनी बढ़ गयी थी. संस्थानों को भी आतंरिक विच्छेद के भय से गुजरना पड़ रहा था. सिद्धों या संतों को अपने समय के सामान्य-बोध की आलोचना करनी पड़ी थी. यह आलोचना उन्होंने सामान्य-बोध की जगह पर ही खड़े होकर की थी. जनसमूह के सामान्य-बोध में जो साधु-बोध का ‘स्वस्थ-केन्द्रक’ था, ये संत उसे संबोधित करते थे. कबीर आदि संतों ने सामान्य-बोध की जगह से सामान्य-बोध की आलोचना करते हुए लोगों को विश्वास दिलाने की कोशिश की कि कोई भी ‘ज्ञानी’ हो सकता है. या ग्राम्शी के शब्दों में कहें तो “हर कोई दार्शनिक” है. इसे स्पष्ट करने के लिए ही आरम्भ में सामान्य-बोध की जगह से ही ऐसी आलोचना आवश्यक है. आरम्भ में यह प्रक्रिया व्यक्ति केन्द्रित ही होती है. अलग-अलग व्यक्ति ही इसे अपने स्तर पर आरम्भ करते हैं. कह सकते हैं कि यह आरम्भ में वैयक्तिक साधना के रूप में विकसित होती है. ऐसी स्थिति में प्रभुत्वशाली संस्था या धर्म मत या शास्त्रों के सामने ‘सहज’ या ग्राम्शी जिसे ‘सिम्पल’ कहते हैं उसका संकट पैदा हो जाता है. प्रभुत्वशाली परंपरा कोशिश करती है कि बौद्धिकों पर कठोर नियंत्रण बनाये रखा जाए, ताकि वे अपनी सीमा का अतिक्रमण न करने पायें. इस अतिक्रमण से अखंडता में पड़ी दरार विस्फोटक और विनाशकारी हो सकती है. दूसरी ओर यह भी संभव नहीं कि ‘सहज’ को ही बौद्धिक घोषित कर इस दरार को पाट दें.

कबीर आदि संत ‘सहज’ को उनके आरंभिक दार्शनिक ‘सामान्य-बोध’ के स्तर पर ही नहीं छोड़ते. वह ‘सहज’ को एक उच्च जीवन-विवेक बनाने की साधना करते हैं. ये सहज और बौद्धिक के बीच एकता इसलिए नहीं बना रहे थे कि विवेकवान क्रियाओं की साधना का एक घेरा बना कर अलग पंथ निकाल लें और जनता के बीच ‘सहज’ के नाम पर एक क्षीण एकता बनी रहे. वह चाहते थे कि एक ‘नैतिक और बौद्धिक ब्लाक’ बनाया जाये, ताकि जनता का बौद्धिक विकास संभव हो न कि केवल बौद्धिकों के छोटे से हिस्से का आतंक कायम हो. कबीर के शब्दों में कहें तो ‘सहज’ की पहचान इसी अर्थ में कठिन साधना की पहचान थी. ज्ञान के हाथी पर कबीर इसी सहज का दुलीचा डाल कर चढ़ने कहते थे. निम्नवर्गीय सामाजिक समूहों के ठोस ब्लाक के निर्माण के प्रयास के कारण संतों की साधना वैष्णव प्रभुत्व की विरोधी प्रक्रिया थी. इस अर्थ में ये न केवल व्यवहार का नया दर्शन बनाने की कोशिश कर रहे थे वरन् दर्शन का नया व्यवहार भी सामने रख रहे थे. दोनों ही अर्थों में यह दर्शन और व्यवहार की पुरानी सारी परंपराओं के साथ-साथ वैष्णव भक्ति के रूप में सिद्धांत और व्यवहार की नई प्रभुत्वशाली धारा की आलोचना भी कर रहे थे. सामान्य-बोध की यथार्थ दृष्टि की आलोचना के क्रम में संतों ने एक नई यथार्थ दृष्टि का उन्मेष किया था. यह यथार्थ की आलोचकीय दृष्टि थी.

ग्राम्शी लिखते हैं कि आलोचकीय आत्मचेतस् प्रयासों द्वारा राजनीतिक और ऐतिहासिक रूप से बौद्धिकों का एक अभिजात्य (elite)[5]भी निर्मित होता जाता है. यहाँ ‘अभिजात्य’ शब्द को उसके प्रतिक्रियावादी अर्थ में नहीं प्रयोग किया गया है. यह ग्राम्शी के यहाँ हिरावल के अर्थ में प्रयुक्त हुआ है. ग्राम्शी लिखते हैं : “कोई मानव जनसमूह व्यापक अर्थों में खुद को संगठित किये बिना खुद को ‘पृथक्’ नहीं कर सकता, अपनी जगह पर स्वतंत्र नहीं हो सकता; और कोई संगठन बिना संगठनकर्ता या नेतृत्व के यानी बिना बौद्धिकों के संभव नहीं; दूसरे शब्दों में कहें तो सिद्धांत या व्यवहार के सम्बन्ध (नेक्सस) के सैद्धांतिक पक्ष का पृथक् जनसमूह जो विचारों की अवधारणात्मक या दार्शनिक व्याख्या में ‘प्रवीण’ हो उसके वास्तविक अस्तित्व के बिना.”[6]

इस प्रकार सहज साधना कवि-बौद्धिकों के रूप में संतों के लिए एक द्वंद्वात्मक रचना प्रक्रिया थी. बौद्धिकों और जनता के बीच बनते रहने वाली सहज साधना. यह वेलीवाड़ा की आतंरिक गतिशीलता है. कबीर आदि संत इस प्रक्रिया को बनाने वाले और खुद उससे बनने वाले थे. इस प्रक्रिया में लगातार उन क्षणों की पुनरावृत्ति होती रहती है जहाँ जनता और बौद्धिकों के बीच की दूरी बढ़ने लगती है. इस संबंध के पतन से यह धारणा घर करने लगती है कि सिद्धांत अनावश्यक, गैर ज़रूरी और महज व्यवहार का पूरक है. वह व्यवहार के अधीन है. सिद्धांत और व्यवहार को न केवल भिन्न माना जाने लगता है वरन् उन्हें अलगाकर दो भिन्न अवयवों में तोड़ दिया जाता है. व्यवहार रूढ़ियों के पालन में बंद कर दिया जाता है. इस यांत्रिकता की बार-बार पुनरावृत्ति का मतलब है “कि कोई अपेक्षाकृत आदिम ऐतिहासिक अवस्था से गुजर रहा है.”[7] सिद्धांत और व्यवहार की इस विलगता के बीच ही कबीर आदि के प्रयासों पर प्रभुत्व की वैष्णव दृष्टि का प्रवेश होता जाता है. दूसरी ओर उनके व्यवहार के सिद्धांत में अन्तर्निहित समानता के आदर्श के साथ नए उभरते वणिक समुदाय की संवेदना और पैसे के व्यावहारिक सिद्धांत और दर्शन का घालमेल करने की कोशिशें होने लगती है. कबीर निर्गुण राम के सगुण वैष्णव अवतार बन जाते हैं और मठों को बनियों और मध्यवर्ती जातियों का संरक्षण मिलने लगता है. यहाँ ध्यान रखना चाहिए कि यांत्रिक, निर्धारणवादी या भाग्यवादी अवयवों का सबल होना व्यवहार के दर्शनों की आन्तरिकता रही है. ग्राम्शी लिखते हैं कि किसी सामाजिक श्रेणी के “सबाल्टर्न” चरित्र की यह आवश्यक और इतिहास सम्मत विशेषता बनी रही है.[8]

कबीर आदि संतों का अनुभवसम्मत विवेकवाद ‘सिद्धांत और व्यवहार’ की एकता के प्रयास में है. ग्राम्शी कहते हैं कि यांत्रिक विश्वदृष्टि ही निम्नवर्गों का धर्म हो जाता है. कबीर आदि संत इन अर्थों में ही धर्म बनने के पहले के सिद्धांतकार हैं और इसी अर्थ में ठेठ राजनीतिक भी हैं. यांत्रिक दुहराव की प्रक्रिया दरअस्ल इतिहास की आदिमता की ओर लौटना है. व्यवहार के दर्शन के आरंभिक बौद्धिकों के रूप में कबीर आदि संत राजनीतिक अर्थों में ही प्राक्-धार्मिक हैं . कबीर के यहाँ काम की एकता की कौंध वह आधारभूमि है जिसे वह ‘निर्गुण राम’ कहते हैं. काम का विभाजन उनके गुणों के आधार पर नहीं हो सकता. वह निर्गुण हो कर भी विश्व को लगातार नए-नए रूपों में सृजित करता रहता है. विश्व को बदलता रहता है. निर्गुण सर्जना की वैश्विकता प्रभुत्व की विचारधारा द्वारा थोपे गए सारे भेद परक प्रवर्गों को चुनौती देती है. कबीर की ‘आँखिन देखि’ का ‘अनभै सच’ काम की यही सार्वजनीनता है.

वेलीवाड़ा और अनुभववाद की सैद्धांतिक सीमाएं

मूलगामी अनुभववाद आज एक विचारधारात्मक शक्ति बन गया है. इस विचारधारा के अनुसार पूँजी का धार्मिक और जातिवादी चरित्र जिस इतिहास से बनता है दलित एकता उस प्रभुत्वशाली इतिहास से सर्वथा भिन्न इतिहास दृष्टि रखती है. वह पूँजी के इतिहास की शुरुआत से ठीक पहले है और इसलिए अपने अनुभव की संरचना में प्राक्-धार्मिक भी है. यह अनुभववाद आधुनिकतावाद की मूलगामी आलोचना करती है. वह आधुनिकतावाद को ब्राह्मणवादी- हिंदूवादी और ज्ञानमीमांसात्मक साम्राज्यवाद की विचारधारा के रूप में आलोचित करती है. भारत में समाज-विज्ञानों का चरित्र आज एक आतंरिक प्राच्यवाद से ग्रसित है और समानता के व्यवहार को यहाँ वास्तव करने के लिए दलित अनुभवों के सैद्धांतिक अप्रोप्रियेसन से लड़ना ज़रूरी है. इस उद्देश्य का एक नैतिक आग्रह भी है. यह नैतिक आग्रह दलित अनुभवों की अपनी सैद्धांतिकी विकसित होने के लिए ज़रूरी है. मिलिंद वाकाणकर[9] डा. धर्मवीर के प्रबल अनुभववाद को रेखांकित करते हैं. डा. धर्मवीर अपने प्रबल अनुभववाद के कारण ही कबीर के सम्बन्ध में हजारीप्रसाद द्विवेदी की मूलगामी आलोचना में समर्थ हुए. परन्तु उनका मूलगामी अनुभवाद धार्मिक विचारधारा का विकल्प नहीं दे पाया. कबीर स्वयं एक नए धर्म के प्रवर्तक बन उठे. यह उनकी सैद्धांतिक सीमा है. वाकणकर कबीर और दलित जनमन के रिश्तों के ऐतिहासिक पुनुरुत्पादन का एक प्रतिइतिहास लिखने की कोशिश करते हैं.

वाकणकर कहते हैं कि कबीर से आज के दलित आन्दोलन को दो चीजें उपहार में मिली हैं. एक चमत्कार और दूसरी हिंसा. वाकणकर कबीर के नाम के सहारे लगातार बनते रहने वाली कविताओं का सामाजिक इतिहास लिखने का प्रयास करते हैं. ‘कहत कबीर’ किस प्रकार कबीर से अपना रिश्ता प्रकट करने वाली एक टेकनीक बन गयी थी और मठों के भीतर या बाहर भी लगातार दलित सामूहिकता को संगठित करती रही थी, उसे समझने की कोशिश. दूसरे शब्दों में कहें तो मठों के भीतर कबीरपंथियों में और दलित आन्दोलन में काम करने वाली धार्मिक भावनाओं की राजनीतिक परीक्षा उनका उद्देश्य है. वाकणकर ऐतिहासिक धर्मों की प्रभुत्वशाली इतिहासदृष्टि या कहें कि वैष्णव कबीर के रूप में कबीर को देखने की इतिहासदृष्टि की उल्टी धारा में जाकर यह देखने का प्रयास करते हैं कि ऐतिहासिक धर्मों में कबीर का एप्रोप्रिएशन या पुनर्प्रस्तुति के ठीक पहले वह क्या था जिसने किसी दलित को इतना सशक्त बनाया कि वह ‘कहत कबीर’ के नाम से अपनी कविता करता है. वाकणकर वर्तमान सभी धर्मों को ऐतिहासिक धर्म ही मानते हैं. कबीर के सहारे वह इन ऐतिहासिक धर्मों का एक प्राक् इतिहास लिखने की कोशिश कर रहे हैं जहाँ ईश्वर के जन्म से पहले अर्थात् ऐतिहासिक धर्म बनने के ठीक पहले ‘ईश्वर के आने की ख़बर’ में छुपी चमत्कार की तात्कालिकता एक निम्नवर्गीय सामूहिकता को संगठित कर लेती है. वाकणकर दलित आन्दोलन में सक्रिय अम्बेडकरवादी विचारधारा की दो प्रवृत्तियों की आलोचना करते हैं. एक प्रवृत्ति दलित धर्म की तलाश करती है जो कभी बौद्ध धर्म में तो कभी कबीर धर्म में प्रकट होती है. दूसरी ओर कैसे दलित आन्दोलनों के अन्दर से उभरी प्रतिनिधित्व या रिप्रेजेंटेशन की राजनीति वस्तुतः चुनावी जोड़ तोड़ की राजनीति में बदल जाती है. वाकणकर के अनुसार ऐतिहासिक धर्मों का इतिहास जिन घटनाओं के इर्द गिर्द शुरू होता है, उस घटना को संभव करने वाली निम्नवर्गीय चेतना के भीतर शामिल स्वतः स्फूर्त क्षमता को दमित करके आगे बढ़ता है. वह धर्मों का एक संपूर्ण इतिहास है जबकि विधर्मी या अपधर्मी परंपरा के इतिहास को कभी भी ऐतिहासिक धर्म की पूर्णता के मॉडल में देखना संभव नहीं है. भक्ति को धार्मिक विचारधारा कहने से हम केवल प्रभुत्वशाली वैष्णव धारा का ही इतिहास समझ सकते हैं. परन्तु जिस ‘घटना’ के आलोक में वैष्णव धर्म लोकप्रिय धार्मिक विचारधारा में रूपांतरित होता है अर्थात् निम्नवर्गीय दलित सामूहिकता की जिस विधर्मी परंपरा में नया क्षण कबीर लेकर आते हैं, उस धुंधले क्षण का इतिहास वाकणकर लिखने की कोशिश करते हैं. मूल कवि और उसके अनुयायी दलित कवि अर्थात् ‘हस्ताक्षर’ और ‘प्रतिहस्ताक्षर’ के द्वारा कबीर कैसे नया सन्दर्भ ग्रहण करते चलते हैं, उसका इतिहास. दूसरे शब्दों में, मूल कवि के प्रति सच्ची श्रद्धा और कृतज्ञतावश जब कोई दलित कवि अपनी कविता पर कबीर की मुहर लगाता है तो लगभग वही कर रहा होता है जिसे हम ‘भक्ति’ कहते हैं. पर वाकणकर इसे ऐतिहासिक धर्मों की तरह नहीं मानते जहाँ कबीर भगवान् हो जाते हैं. डा. धर्मवीर के ‘कबीर भगवान्’ और ‘दलित धर्म’ की चर्चा के सन्दर्भ में वाकणकर उसी प्रक्रिया का दुहराव देखते हैं. दलित अपधर्मी परंपरा वस्तुतः जब ‘दलित सशक्तिकरण’ के रूप में पुनर्प्रस्तुत होती है तो वह प्रभुत्वशाली परंपरा ही हो जाती है. डा. धर्मवीर के भीतर जो अपधर्मी, निम्नवर्गीय स्वाभाविकता है, उसे तो वाकणकर स्वीकार करते हैं परंतु ऐतिहासिक धर्म के मॉडल से बाहर न निकल पाने की आलोचना भी करते हैं. इसलिए वाकणकर के अनुसार डा. धर्मवीर द्विवेदी जी के ‘ब्राह्मणवादी’ मॉडल की आलोचना करते हुए भी ऐतिहासिक धर्मों की प्रभुत्वशाली परंपरा में ही अंतर्भुक्त हो गए. ठीक उसी तरह, जब दलित आन्दोलन अम्बेडकरवादी इतिहासदृष्टि में अंतर्भुक्त हो जाता है तो आन्दोलन में अन्तर्निहित दलित सामूहिकता या ‘दलित, मुस्लिम, आदिवासी’ सामूहिकता प्रतिनिधिमूलक राजनीति में विकृत होकर स्वयं प्रभुत्वशाली परंपरा बन जाती है. वाकणकर कहते है कि ‘दलित, आदिवासी, मुस्लिम’ जीवन में रोजमर्रा की हिंसा और मृत्यु की अनवरत उपस्थिति ने उनकी स्मृतियों में सामाजिकता की एक पूर्णतः भिन्न छवि संजोये रखी है. यह किसी आन्दोलन की आकस्मिकता के बीच अचानक से पुनर्संयोजित होकर आन्दोलन के सामाजिक चरित्र का निर्माण करती है. दिक्कत उसको प्रतिनिधित्व देने वाली प्रक्रिया में आती है जहाँ पहले से ही प्रभुत्वशाली धार्मिक या राष्ट्रीय या कोई अन्य विचारधारा एप्रोप्रिएशन के लिए तैयार है. इस प्रक्रिया को वाकणकर ‘राजनीतिक समाज’ (पोलिटिकल सोसाइटी) के निर्माण की प्रक्रिया कहते हैं. ‘नागरिक समाज’ की मध्यस्थता के चलते दलित समुदायों और राज्य के बीच सीधा राजनीतिक संवाद नहीं बन पाता है. उनका कहना है कि पार्था चटर्जी आदि के द्वारा प्रस्तावित इस ‘राजनीतिक समाज’ के लिए जरूरी है कि दलित आन्दोलन को इस प्राक् इतिहास में अन्तर्निहित सम्भावना की ओर लगातार ध्यान दिलाते रहा जाये.

गोपाल गुरु के लिए यह प्रबल अनुभववाद जिस बाह्य और प्राक् का सिद्धांत देता है उस सिद्धांत की वस्तु दलित जनमन को प्रतीकात्मक बना देती है. यह यथार्थ के संश्लिष्ट अनुभवों के द्वंद्वात्मक विश्लेषण में असमर्थ है. साहित्यिक उत्पादनों को आधार बना कर जब सिद्धांत निर्माण होता है तो वह दलित अनुभवों को महज सौंदर्यशास्त्र की वस्तु बना देता है. गुरु कहते हैं- “लेकिन कविता सिद्धांत का स्थानापन्न नहीं हो सकती…[लेकिन] कविता के पास विशिष्ट को सामान्य और सामान्य को विशिष्ट करने वाली संकल्पनात्मक क्षमता नहीं है. इसमें द्वंद्वात्मक शक्ति नहीं है.” अनुभववाद की आलोचना में गुरु की यह प्लेटोनिक भंगिमा ध्यान देने लायक है. सत्य के धारण की द्वंद्वात्मक क्षमता को कविता के बाहर का क्षेत्र घोषित किया गया. यह दलित सैद्धांतिकी को तात्कालिक प्रदर्शन की प्रवृत्ति से मुक्त करने वाली भंगिमा है. साहित्यक आलोचना से समाज विज्ञान के अनुशासन को स्वायत्त करने के लिए यह कतई आवश्यक नहीं था कि कविता मात्र को द्वंद्वात्मक शक्ति से रहित मान लिया जाय. अनुभव प्रसूत रचना-प्रक्रिया के दो रूपों के बीच मूल्यगत अंतर को स्थापित करके स्वायत्ता और समानता का आग्रह अनुभव की अवधारणा में उलझने को बाध्य है. इस उलझन को सुलझाने के क्रम में ही अनुभव सिद्धांत-निर्माण का एथिक्स बन जाता है. गुरु अनुभव की मौलिकता को स्वीकार करते हैं पर सिद्धांत को आवश्यक मानते हैं. दलित सिद्धान्तकारों की स्वायत्ता एक नैतिक अर्थशास्त्र की प्रस्तावना करती है. यह नैतिक अर्थशास्त्र एक मनुष्य एक मूल्य वाली व्यवस्था है जहाँ कोई नैतिक अधिशेष मूल्य का शोषण संभव नहीं[10]. पर वास्तव में गुरु अनुभव की आरम्भिक और स्वाभाविक ऊर्जा को ज्ञानमीमांसक व्यवस्था के अंतर्भुक्त करते हैं. सत्य के दावे का यह ज्ञानात्मक एकाधिकार अनुभवों का अभिग्रहण एक ख़ास विश्वदृष्टि से करने लगता है. साहित्यिक और सैद्धांतिक उत्पादकों की भिन्नता का यह नैतिक आग्रह सत्य के प्रति साहित्य के दावे को निर्मूल करता है. यह एक किस्म के यांत्रिक यथार्थवाद को जन्म देती है. यह यांत्रिक यथार्थवाद साहित्य और कला की राजनीति को अद्वान्द्वात्मक और तात्कालिक मानता है. सिद्धांत निर्माण के लिए हद से हद इसकी उपयोगिता महज संवेदनात्मक होने में है. गुरु दलित साहित्य या साहित्य मात्र को विशिष्ट अनुभवों पर आधारित सौन्दर्यबोध की दृष्टि मानते हैं जिसका उपयोग सिद्धांत निर्माण के लिए ज़रूरी सार्वभौमिक का निर्देशात्मक स्तर होने की संभावना तक सीमित है.[11] इस प्रकार कलाकार सहज और आवयविक बुद्धिजीवी के सैद्धांतिक उत्पादन से बाहर हो जाता है.

वेलीवाड़ा रचना-प्रक्रिया की इस श्रेणीबद्धता के खिलाफ है. रोहित वेमुला की घटना के आलोक में स्पष्ट है कि न तो वाकणकर के अर्थों में मृत्युशोकगीत की सामूहिकता वेलीवाड़ा है और न गुरु के अर्थों में समाज-वैज्ञानिक मात्र सत्य के गणराज्य का आवयविक बुद्धिजीवी है. वेलीवाड़ा नैतिक को राजनैतिक का विकल्प नहीं देखता. वहां राजनीति की नैतिकता से बनने वाला उत्पादकों का संगठन है. सांस्कृतिक श्रेणी-क्रम को चुनौती देने के लिए ज़रूरी है कि सम्पूर्ण सांकृतिक उद्योग के तर्क का निषेध संभव हो. वेलीवाड़ा सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक क्रान्ति का त्रिविमीय चरित्र है. अनुभवप्रसूत यह वेलीवाड़ा जितना तार्किक है उतना ही वास्तविक भी.

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मार्तण्ड  प्रगल्भ

मार्तण्ड प्रगल्भ

छात्र राजनीति और संस्कृति-कर्म में व्यस्त रहने वाले मार्तण्ड प्रगल्भ जे.एन.यू. के भारतीय भाषा केंद्र से पी.एच.डी. हैं. फ़िलहाल  रेडिकल नोट्स कलेक्टिव  के साथ कार्यरत हैं. उनसे mpragalbha1@gmail.com पर संपर्क संभव है

 

 

 

सन्दर्भ:

[1]  रोहित वेमुला का पत्र (१८-१०-२०१७ को ब्राउज़)

[2] डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वांङ्मय, खंड-१, पृष्ठ: ७८. डॉ. अम्बेडकर प्रतिष्ठान, नई दिल्ली- २०१३.

[3] गोपाल गुरु, गोपाल गुरु-सुन्दर सरुकई; क्रैक्ड मिरर: अन इंडियन डिबेट ऑन एक्सपीरियंस एंड थ्योरी ; पृष्ठ ९९; ओयूपी, दिल्ली- २०१२.

[4] देखें, मई १९५० वैशाख अंक, महाबोधि सोसाइटी जर्नल. अम्बेडकर ‘बुद्धा एंड द फ्यूचर ऑफ़ हिज रिलिजन’. बौद्ध धर्म विषयक उनके अन्य लेखन में भी उक्त विचारों को देखा जा सकता है.

[5] ‘elite’ शब्द पर टिप्पणी करते हुए ‘जेल नोटबुक’ के संपादक ने नोट किया है:- “élite.” As is made clear later in the text, Gramsci uses this word (in French in the original) in a sense very different from that of the reactionary post-Pareto theorists of “political élites”. The élite in Gramsci is the revolutionary vanguard of a social class in constant contact with its political and intellectual base. पृष्ठ- ३३४, पाद टिप्पणी-१८, अंतोनियो ग्राम्शी, सेलेक्सन्स फ्रॉम द प्रिज़न नोटबुक्स. (सं. और अनु.) क़ुइन्तिन होअरे और ज्योफ्रे नोवेल स्मिथ. ओरिएंट ब्लैकस्वान, दिल्ली- १९९६.

[6] वही

[7] वही. पृष्ठ-३३५

[8] “It should be noted how the deterministic, fatalistic and mechanistic element has been a direct ideological “aroma” emanating from the philosophy of praxis, rather like religion or drugs (in their stupefying effect). It has been made necessary and justified historically by the “subaltern”character of certain social strata.” पृष्ठ-३३६.

[9] देखें: मिलिंद वाकणकर, सबॉलटर्निटी एंड रिलिजन : प्रीहिस्ट्री ऑफ़ दलित एम्पावरमेंट इन साउथ एशिया. रूटलेज: लन्दन, २०१०. मिलिंद वाकाणकर के विचारों की विस्तृत समीक्षा के लिए देखें:  (मार्तंड प्रगल्भ, दलित आधुनिकता और कबीर की सहज साधना पर कुछ विचार , रैडिकल नोट्स. ) २०-१०-२०१७ को ब्राउज़.

[10] गोपाल गुरु, गोपाल गुरु-सुन्दर सरुकई; क्रैक्ड मिरर: अन इंडियन डिबेट ऑन एक्सपीरियंस एंड थ्योरी ; पृष्ठ- २०६; ओयूपी, दिल्ली- २०१२

[11] वही, पृष्ठ २३.

तुलसी के हनुमान् अका फ़ादर कामिल बुल्के: मार्तंड प्रगल्भ

बुल्के के लिए नैतिकता पूरी तरह धार्मिक थी। वह राज्य के विकास के साथ इसी धार्मिकता को स्वर्ग के राज्य में रूपांतरित देखना चाहते थे। अंबेडकर की तरह यहाँ भी नैतिकता और धार्मिकता में कोई फर्क नहीं था। धर्म स्वयं में पवित्र और सार्वजनीन नैतिकता है। विश्वबंधुत्व स्वयं नैतिकता है। विश्वबंधुत्व की इस पवित्र नैतिकता के दर्शन बुल्के को तुलसी के मानस में होता है। वह बुद्ध के बदले उत्तरभारत की जनता के बीच इस पवित्र सामान आचार-संहिता की पूर्व-उपस्थिति और उसके सर्वोत्तम विकास का पूर्व-स्वप्न तुलसीदास के यहाँ देखते हैं। उनके लिए तुलसी स्वयं एक आश्चर्य थे। वैसे ही जैसे इवोर ब्राउन के लिए शेक्सपियर. #लेखक 

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Camille Bulcke

बुल्के की रामकथा : आकर्षण और इतिहास

By मार्तंड प्रगल्भ

फ़ादर कामिल बुल्के को केदारनाथ सिंह तुलसी के हनुमान् की संज्ञा देते हैं। यह एक अद्भुत बिम्ब है। आखिर क्या सोचकर कवि केदारनाथ ऐसा कहते हैं? भक्ति के आदर्श हनुमान्! तुलसीदास से पहले भक्त के रूप में हनुमान् की कोई विशेष छवि नहीं थी। महाकवि तुलसी का ही प्रताप था कि उन्होंने प्रतापी हनुमान् को भक्त शिरोमणि में बदल दिया! खुद राम के चरित में “अग्या सम न सुसाहिब सेवा” के भक्ति आदर्श को चरितार्थ करने वाले हनुमान्! आजीवन ब्रह्मचर्य का पालन करने वाले हनुमान्! माता सीता के भी परम सेवक और हृदय में युगल भगवान् की छवि हमेशा धारण करने वाले हनुमान् खुद भी उस चित्र में शामिल हो गए थे। भक्त से स्वयं लोकमानस के भगवान् में बदल जाने वाले हनुमान्। चिर सानिध्य के आदर्श। यह स्वयं तुलसी की आत्म छवि थी। तुलसीदास को स्वयं के आदर्श पर कितना विश्वास था इसका पता हमें ‘विनयपत्रिका’ या ‘हनुमन‍्‍बाहुक’ जैसी रचनाओं से चलता है। भक्त की यह आत्म छवि तुलसीदास के द्वारा उत्तर भारत की हिंदी पट्टी को दिया गया अनुपम और अद्वितीय उपहार था। शुक्लजी ने भक्ति के इसी आदर्श को सैद्धांतिक रूप दिया था। जिस सेना की सहायता से अन्धकार पर विजय पानी थी उस सेना के सबसे मधुर चरित्र हनुमान् थे। भरत भले ही राजा के आदर्श थे पर साधारण मनुष्यों के तो हनुमान् ही थे। जो सेना भक्ति के धागे से बंधी होगी वही चिरविजयी होगी! सच्चाई का धर्मचक्र हमेशा गतिशील रहेगा अगर शासक भरत जैसा भक्त हो और जनता के हृदय में हमेशा भरत मिलाप का दृश्य। भक्ति के लिए आत्मदैन्य का चरमबोध और एक मिशनरी व्यक्तित्व दोनों जरूरी हैं। शुक्ल जिसे भक्ति का सैद्धांतिक आधार प्रदान कर रहे थे उसे बुल्के ने जीवन में उतार लिया था। परन्तु दोनों भिन्न दिशाओं से चलकर इस आदर्श तक पहुंचे थे। शुक्ल भारतीय आत्म की खोज करते हुए और बुल्के ईसाई आत्म की तलाश में चलते हुए। दोनों ही नैतिकता और सार्वभौमिकता का स्वयं में एक अनिवार्य संबंध मानते थे। व्यावहार की नैतिकता स्वभावतः सार्वभौमिक मूल्यों की तरफ ले जाने वाली होनी चाहिए। ऐसा नहीं कि दोनों में फर्क नहीं है। शुक्ल होते तो बुल्के की आलोचना करुणा और दुःख के अतिवाद के सन्दर्भ में करते। जबकि बुल्के शुक्ल के रसवाद की हरसंभव आलोचना में रत थे। दोनों के अवतारवाद के आदर्श में अंतर था। बुल्के के लिए ईश्वर मनुष्य के रूप में था, केवल लीला या अभिनय का पात्र नहीं। शुक्ल के लिए बाहरी विश्व का प्रपंच रसों की व्यवस्था ही है, जहाँ स्वयं रस स्वरूप ईश्वर है। बुल्के ईश्वर की इस रसवादी व्याख्या से संतुष्ट नहीं थे। उनका विश्वास था कि सांसारिक व्यावहार में एक ऐसी समाज व्यवस्था संभव है जहाँ करुणा और प्रेम के सहारे ईश्वर का राज्य वास्तविक हो। बुल्के की आस्था में एक ‘सांप्रदायिक गंध’ थी, जिसे शुक्लजी हमेशा की तरह अपनी आलोचना का निशाना बनाते। परन्तु बुल्के ने जितनी सेवा चर्च के लिए की थी, उतनी ही भक्ति रामकथा, तुलसी और हिंदी की भी की थी। बुल्के के लिए इन दोनों में कोई अंतर्विरोध नहीं था। शुक्ल इस चरित्र की आलोचना कैसे करते यह सोचना ज्यादा कठिन नहीं है। शुक्लजी का विश्वास आधुनिक- पूर्व के सामाजिक सम्बंधों की सामूहिकता और उसकी बनी बनाई व्यवस्था की क्रियाशीलता में था। सर्वथा नई व्यवस्था शुक्ल को वास्तविक और व्यावहारिक नहीं लगती थी। हमने देखा था कि विल्सन, मोनिर विलियम्स या ग्रियर्सन के यहाँ भी करुणा, नैतिकता और संघबद्ध धर्म की समरूपता के चलते बौद्ध और ईसाई धर्मों का एक नैकट्य निरुपित किया गया था। सामान्यतः भक्ति बौद्ध ज्ञानवाद में करुणामय ईश्वर का संयोग था जिसका वास्तविक मनुष्य रूप ईसामसीह में उन्हें दिखाई देता था। ग्रियर्सन, शुक्ल जी और बुल्के तीनों वैष्णव भक्ति और तुलसीदास की सर्वोच्चता के प्रति एकमत से सहमत हैं। सबसे श्रेष्ठ भाव के रूप में करुणा को नकारना किसी के लिए संभव नहीं था। ईश्वर के अनंत करुणानिधान तुलसी और भवभूति दोनों का आदर्श था। शुक्ल व्यवहार में अद्वैत को स्वीकार्य नहीं मानते थे। शुक्लजी के लिए अद्वैत प्रक्रिया का निष्कर्ष है स्वयं प्रक्रिया में अद्वैत नहीं हो सकता। शुक्ल रस निष्पत्ति में आलाम्बनत्व धर्म की सार्वभौमिकता को स्वीकार करते थे और इसलिए साधारणीकरण के किसी सम्प्रदायवाद के खिलाफ थे। क्योंकि वहां आश्रय के तादात्म से साधारणीकरण संभव माना जाता है। प्रक्रिया पर जोर देने से शुक्ल जी के यहाँ आश्रय और पाठक या सहृदय के ध्रुवीकरण से तो रस सिद्धांत को मुक्ति तो मिली लेकिन वहां से वास्तविक मनुष्य गायब हो गया। वास्तविक, क्रियाशील, व्यावहारिक मनुष्य केवल भावों की रस निष्पत्ति से संतुष्ट नहीं हो सकता था, उसे वास्तविक मुक्ति भी चाहिए थी। यह मुक्ति शुक्लजी के लिए नैतिकता और धर्म नियमों के क्षेत्र में ही संभव थी। राजनीतिक जीवन और साहित्य का क्षेत्र इन दोनों के बीच संबंध शुक्लजी के लिए केवल पैशन का था, यह हमने पीछे देखा है। बुल्के के लिए जीवन, धर्म और कर्म तीनों की एकता उन्हें वास्तविक जीवन में अनंत करुणानिधान का सन्देश लगती थी। उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में संत कवि की भूमिका में गीदो गैज़ेल की कविताएँ और उनका संत जीवन चरित फ्लेमिश-डच सांस्कृतिक और राष्ट्रवादी आंदोलन में बहुत प्रभावशाली भूमिका निभाता था। कामिल बुल्के का युवा जीवन इस सांस्कृतिक नेतृत्व से अभिभूत था।

गीदो गैज़ेल प्रगीत और प्रकृति के कवि थे। नवरोमानवाद और आध्यात्मिकता के साथ-साथ बीसवीं शताब्दी के अंवागार्द कवियों पर भी उनका काफी प्रभाव था। सूक्ष्म से सूक्ष्म भावों में अर्थ की तलाश, एक ‘पूज्य बुद्धि’ और मननशील मन की मांग करती है। गीदो की कविताएँ इन दोनों का समन्वय करती थीं। मध्यवर्गीय परिवार में पले-बढ़े गीदो के पिता एक कुशल माली थे। ईसाई परिवेश और कृषक जीवन का मधुर सौन्दर्य इन दोनों के बीच गीदो की आरंभिक अनुभूतियों का निर्माण हुआ था। परिवार को लेकर और खासकर अपनी माता को लेकर गीदो अनन्य प्रेम और श्रद्धा रखते थे। फ्लेमिश आन्दोलन से जुड़ने के क्रम में ही गीदो के छात्र जीवन में उच्च आदर्शों के क्रियान्वयन के लिए जीवन के कठोर निर्णय का वक़्त भी उनके सामने आया। पिता के निर्देश में उन्हें ईश्वर का निर्देश मिला और उन्होंने पुरोहित का जीवन अपने लिए चुन लिया। कविता, साहित्य और मातृभाषा के सम्मान की लड़ाई तथा पुरोहित कर्म की एकता उन्हें ईश्वर का संकेत मालूम पड़ती थी। गीदो हमेशा पुरोहित-कवि-फ्लेमिश के रूप में नौजवान कवियों, देशप्रेमियों और पुरोहितों के बीच लोकप्रिय रहे थे। उनके लिए कला, ‘कला नहीं बल्कि ईश्वर की भेंट’ थी। यंत्रणाओं और दुखों के बीच कला गीदो के लिए एक फलदायी क्रिया थी। करुण, शांत और आस्थावान फ्लेमिश-डच कृषक जीवन के प्रगीत लोगों में प्रेरणा और सुख का संचार करती थी। कविता के अलावा गैज़ेल ने पत्रकारिता, अनुवाद और लोकगीतों के संग्रह का काम भी किया था। उनकी तुलना कई बार अंगेज कवि हॉपकिंस के साथ भी होती है। हॉपकिंस के साथ गैज़ेल के व्यक्तित्व का मेल केवल प्रगीतकार और पुरोहिती का ही नहीं बल्कि यौन भावनाओं के संकट का भी है। दोनों ही एक सारसंग्रही प्रयोगकर्ता भी थे। गैज़ेल की विश्वदृष्टि में एक सर्ववादी चेतना और प्रयोग का साहस देख चर्च के उच्च पुरोहित वर्ग में एक विरोध भी था। प्रथम विश्वयुद्ध के अनंतर फ्लेमिश राष्ट्रवादी आन्दोलन और अवांगर्द कविता आन्दोलन के प्रेरणास्रोत के रूप में गैज़ेल जितना स्थानीयता से जुड़े थे उतने वैश्विक भी थे। गीदो की दो कविताएँ उनके काव्य संसार का कुछ कुछ परिचय दे सकती हैं :

“मैं था/ नहीं तब/ और, “तुम हो,/ मेरे बच्चे”/ ईश्वर ने कहा,/ और वह देखो!/ मैं हूँ!” दूसरा उदाहरण –

सरल है बहुत, वादा करना/ और बोना देश के बाहर खूबसूरत शब्द/ जैसे, खूब सवेरे बोलना/ मुर्गों का, ओह ! कितना अच्छा लगता/ महज शब्द के उच्चारित करने से नहीं/ फ़ायदा होगा अपने फ्लैंडर्स का ;/ जो चाहता है मदद करना हमारे लोगों की/ उसे प्रजनन का दुःख उठाना होगा।[1]

गीदों के इस व्यक्तित्व का बुल्के के अपने जीवन पर तुलसी से कम प्रभाव नहीं था। ऐसा भी कहा जा सकता है कि बुल्के के लिए गीदों प्रेम और तुलसी प्रेम अलग- अलग नहीं थे। कृषक जीवन और ईसाई आस्था के बीच पले-बढ़े बुल्के को गीदो की कविताओं में स्वयं की भावनाएं ही प्रतिबिंबित दिखती थीं। बुल्के अपने आरम्भिक जीवन को याद करते हुए हमेशा कहते थे कि “पिता से मुझे मिला जीवन की गुरुता का विशिष्ट बोध, वत्सल माता से मिली प्रफुल्लित व्यावहारगत स्वप्निलता”। गरीब और असहायों के प्रति असीम करुणा का बोध उनको मध्यवर्गीय कृषक जीवन के यथार्थ के करीब ले जाता था। उनके लिए पूरा गाँव एक संयुक्त परिवार की तरह ही था, बाद में एक वृहत्तर फ्लेमिश संस्कृति भी उन्हें एक बड़े संयुक्त परिवार की संस्कृति की तरह  दिखती थी। अपने गाँव के संस्मरण में बुल्के अपने ‘मसीहाई लोगों’ को लक्ष्य करते हुए लिखते हैं : “वे दुःख को चुपचाप सहते हैं क्योंकि मसीह का क्रॉस उनके लिए जीवंत वास्तविकता है। उनके जीवन के सब दिन ईश्वर के सान्निध्य में व्यतीत होते हैं और उनकी कठिनाइयाँ ईश्वर में लीन हो जाती हैं… वे कतई रहस्यवादी नहीं हैं… उनमें जीवन  के प्रति उदासीनता नहीं है। … सृष्टि से प्यार करने के चलते उनका जीवन सहज हो जाता है और वे सृष्टि के रहस्य समझ जाते हैं।”[2] इन ‘मसीही लोगों’ में बुल्के मध्यकाल की झलक देखते हैं। बालोचित भोलेपन की यह जीवनदृष्टि ऐसी है जिसमें ‘ईश्वर और जगत, प्रकृति और भगवत् कृपा में कोई द्वंद्व नहीं’ है। विद्यार्थी जीवन के आरम्भ से ही संत पौलुस के पत्रों में उनकी असीम रूचि थी। भारत आने के पहले उन्होंने आइन्स्टीन के सापेक्षतावाद और उच्च गणित का भी विशेष अध्ययन किया था। जर्मन भाषा के किसी ग्रन्थ में मानस के कुछ उद्धृत अंशों को पढ़कर उन्हें एक अद्वितीय अनुभव हुआ और भारत के विषय में सबकुछ जान लेने की इच्छा जाग गयी। “जब से मैंने जर्मन भाषा में अनूदित हिन्दुओं के धर्मग्रन्थ रामचरितमानस से उद्धृत अंश पढ़े हैं, तब से मैं भारत के विषय में सबकुछ जान लेना चाहता हूँ। अरे हाँ, उन अंशों का सारांश था- पृथ्वी पर उसी व्यक्ति का जीवन धन्य है जिसको देखकर उनका पिता हर्षित हो। पिता पुत्र के सबंध की इतनी मर्मिक गहन अनुभूति अन्य किसी साहित्य में नहीं देखी है।”[3]

सन् १९३५ में जब बुल्के भारत आये उस समय भारत में भी भारतीय स्वतंत्रता आन्दोलन का ज़ोर था। बुल्के ने राष्ट्रीय सम्मान के संघर्ष को और भारतीयों की घोर दुर्दशा, दोनों का साक्षात्कार किया। अपने देश की राजनीतिक स्थिति से तुलना करते हुए बुल्के लिखते हैं, “मुझे विश्वास हो चला है कि भारतीयों ने अंग्रेज आकाओं को प्रसन्न रखने के प्रयोजन से अंग्रेजी पहनावा, भाषा और तौर तरीके भी अपना लिए हैं। बिलकुल मेरे देश के बुर्जुआ वर्ग की तरह।”[4] बुल्के शुरू से ही प्रखर सामाजिक चेतना, विद्या और आस्था के भीतर कोई अंतर्विरोध नहीं देखते थे। उनके अनुसार धार्मिक विश्वास केवल तर्क- वितर्क की चीज नहीं है। “मैं समझता हूँ कि भौतिकवाद मानव जीवन की समस्या हल करने में असमर्थ है। मैं यह भी मानता हूँ कि धार्मिक विश्वास तर्क-वितर्क का विषय नहीं है इतना ही निवेदन है कि मुझे ईसा की शिक्षा से प्रेरणा और सुख शांति मिलती है।”[5] यह बात बुल्के उनसे बार-बार पूछे जाने वाले इस सवाल के जवाब में कहते थे कि धर्म और ईश्वर तथा आधुनिक विवेकवाद का अविरोध वह कैसे देखते हैं। बुल्के के लिए परम दयालु ईश्वर में आस्था से बढ़कर जीवन में ‘आशावाद’ का कोई स्रोत नहीं था। बुल्के अपनी जीवन साधना के तीन घटक ईसा, हिंदी और तुलसीदास को मानते थे। वह इनके बीच कोई विरोध नहीं बल्कि एक गहरा अंतर्संबंध देखते थे। यह अंतर्संबंध उन्हें स्वयं ईश्वर का संकेत मालूम पड़ता था। भारत में आने की इच्छा को तुलसीदास की कविता में छिपे ईश्वरीय संकेत की तरह ही बुल्के ने ग्रहण किया था। रामकथा पर शोध के लिए प्रेरित करने वाले जिन तीन तत्वों का उल्लेख बुल्के करते हैं वे हैं, हिंदी प्रेम, तुलसी के प्रति श्रद्धा और डा. धीरेन्द्र वर्मा की उदारता। रामचरित मानस और तुलसी के बारे में जानकारी के लिए बुल्के रामचंद्र शुक्ल से भी विचार विमर्श कर आये थे। परन्तु ऐसा लगता है कि उन्हें बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय के बदले इलाहाबाद का वातावरण ज्यादा पसंद आया था। हिंदी के साहित्यकारों के बीच बुल्के जल्द ही घुल- मिल गए थे। मैथिलीशरण गुप्त से जाकर उनके गाँव में ही मिल आये थे। महादेवी वर्मा से उनका इतना गहरा संबंध बन गया था कि वे उन्हें दीदी कहकर पुकारने लगे थे। इलाहबाद शहर के वातावरण में एक आधुनिक सार्वजनीनता बुल्के को पसंद थी। धीरेन्द्र वर्मा और माताप्रसाद जैसे शिक्षकों का उन्हें सान्निध्य मिला था। परिमल की बैठकों में भी बुल्के की शिरकत रहती थी। दूसरे शब्दों में कहें तो हिंदी की साहित्यिक दुनिया और हिंदी के विभागों के बीच बुल्के  की एक सक्रिय उपस्थिति थी। रांची के सेंट जेवियर कॉलेज में हिंदी के विभागाध्यक्ष रहते हुए कॉलेज को और अपने ‘मनरेसा हाउस’ के निजी पुस्तकालय को बुल्के ने देश विदेश के लिए आकर्षण का केंद्र बना दिया। बुल्के की स्नेहिल, आशीषमयी और प्रखर विद्वता की छवि के इर्द गिर्द हिंदी शोधार्थियों और अध्यापकों की एक मंडली ही बन गयी थी।

 हिंदी और तुलसीसेवा के काम का ही एक विस्तार बुल्के की लम्बी साइकिल यात्राएँ भी थी। रांची के आसपास के आदिवासी इलाकों में बुल्के अपने साइकिल के साथ निकल जाते, जहाँ वे ईसा और तुलसी के सन्देश सुनाते और उनकी रोजमर्रा की समस्याओं और कष्टों के समाधान का प्रयास करते। तथाकथित भोले-भाले, निरीह, सौम्य, सहज प्राकृतिक जीवन में रचे-बसे इन आदिवासियों में बुल्के को अपने गाँव के लोगों की छवि दिखती थी और वह स्वयं उनसे प्रेरणा ग्रहण करते थे। धीरे-धीरे झारखण्ड की कई बोलियों और भाषाओं के अध्ययन के साथ- साथ आदिवासी संस्कृति के अध्ययन के लिए बुल्के स्वयं एक शोध संस्था में बदलते गए। ये सारे काम उन्हें अपने पुरोहिती, धार्मिक कामों से अलग नहीं लगते थे। संघ भी बुल्के की इच्छाओं का कभी अनादर नहीं करता था। मूल ग्रीक से बाइबिल के ओल्ड और न्यू टेस्टामेंट का अनुवाद बुल्के ने अपनी आत्मा का पूरा जोर लगाकर किया था। अपने अनुवादों को संघ के बाकी पुरोहितों या भाइयों को वह सुनाते और उनकी प्रतिक्रिया के बिना आगे नहीं बढ़ते थे। बाइबिल के हिंदी अनुवादों का इतिहास कम से कम डेढ़ सौ साल पुराना तो था ही। परन्तु उन अनुवादों में बाइबिल के उच्च साहित्यिक गुणों का पूरा निदर्शन नहीं होता था। उनमें ज्यादातर कामचलाऊ प्रयास थे। बुल्के के लिए बाइबिल की आस्था उसके उच्च कलात्मक मूल्यों की आस्था भी थी। उन्हें विश्वास था कि मसीह का सन्देश व्यावहारिक रूप से भी प्रेम और करुणा से इतना भरा है कि एक बार उन भावों का सम्प्रेषण हो जाये तो कोई भी उसे अपने हृदय से नहीं निकाल सकता। बुल्के को अलग-अलग शहरों के संघ बंधुओं से बाइबिल के अनुवाद की श्रेष्ठता और उसकी सहज संप्रेषणीयता का सन्देश लगातार मिलता रहता था। आगे चलकर बुल्के की मृत्यु के बाद उनके स्मृति ग्रन्थ के लिए शमशेर बहादुर सिंह ने दिनेश्वर प्रसाद को संबोधित करते हुए ‘एक पत्र’ लिखा था। दिनेश्वर प्रसाद इसे ‘संस्मरणात्मक- आशंसात्मक’ पत्र की तरह याद करते हैं। शमशेर और बुल्के का परिचय इलाहबाद में ही शायद डा. रघुवंश के कारण हुआ था। शमशेर के अनुसार बुल्के, रघुवंश के बहुत ‘घनिष्ठ और हार्दिक विद्वान् मित्र’ थे। शमशेर लिखते हैं कि हिंदी के विद्वान मित्रों का संपर्क और स्वयं की “उनकी अपनी (एडवांस्ड) साहित्यिक सुरुचि, लगन और अनथक श्रम ने उन्हें (बुल्के) हिंदी साहित्य में दीक्षित किया था, विशेषकर भक्ति साहित्य और रामचरितमानस के अनेक गूढ़ तत्वों में। अगर मैं यह कहूँ कि भारतीय परिवेश में रामचरितमानस उनके लिए बाइबिल के न्यू टेस्टामेंट का दर्पण बन गया था, तो मैं शायद बहुत गलत न हूँगा।”[6] शमशेर बुल्के के ‘एडवांस्ड साहित्यिक सुरुचि’ से बखूबी परिचित थे। स्वयं शमशेर बाइबिल कई हिस्सों का साहित्यिक अनुवाद करना चाहते थे। “एक बार यूनानी भाषा सीखने का बाल प्रयास करते हुए एक पाठ में बाइबिल के उद्धृत अंश पढ़कर तीव्र इच्छा हुई थी कि इस आध्यात्मिक ग्रन्थ का आस्वादन तो मूल में ही किया जाये, तभी संतोष हो सकता है।”[7] शमशेर की यह आकांक्षा तो पूरी नहीं हो पाई पर बुल्के के अनुवाद से उन्हें लगभग मूल को पढ़ने जैसा ‘सुख और संतोष’ मिलता था।

निश्चित रूप से शमशेर को यह ‘सुख और संतोष’ स्वयं बाइबिल के पवित्र और महान् होने के बदले उसकी ‘प्रवाहमयता, सरसता और हृदय को छूने वाली’ साहित्यिक विशेषताओं के कारण मिलता था, शमशेर का ‘मन तृप्त हो जाता’ था। वह इसी पत्र में लिखते हैं कि उन्होंने कई बार बुल्के के अनुवाद पढ़े हैं और बार-बार पढ़ने की इच्छा होती है। इन अनुवादों से, “ईसामसीह का पूरा शहीदी चरित्र आँखों के सामने साकार हो उठता है। कैसी घोर विरोधी परिस्थितियों में कठमुल्ला, ढोंगी, पाखंडी तथाकथित धर्माचारियों के समक्ष मसीह की खरी शुद्ध आत्मा सूर्य के प्रकाश की तरह चमकती है। हिंदी में यह सब एक सफल अनुवाद के कारण ही संभव हुआ है।”[8] यह बाइबिल की साहित्यिक श्रेष्ठता के प्रति एक साहित्यिक आस्था थी। साहित्य के रूप में धर्मग्रन्थ के संपूर्ण इहलौकीकरण का यह प्रयास स्वयं आधुनिकतावाद की एक प्रमुख विशेषता थी। शमशेर और मुक्तिबोध दोनों ही मानस के उच्च साहित्यिक गुणों से परिचित थे। मुक्तिबोध के लिए मानस का सर्वश्रेष्ठ हिस्सा वह है जहाँ वह सामंती समाज की सीमाओं के भीतर मनुष्यता का विकास दिखाते हैं। मुक्तिबोध लिखते हैं, “तत्कालीन मानव संबंध, विश्वदृष्टि तथा जीवन मूल्यों के सर्वोच्च प्रतीक राम की मानवता हमें प्रभावित करती है। तुलसीदासजी तथा रामचंद्रजी की वह सचेष्ट आन्तरिकता (जो तत्कालीन आदर्शों से बनी हुई थी) हम पर छा जाती है। वे नियम-विधान, वे आचार-विचार, अब आज त्याज्य हो चुके हैं; किन्तु उनके भीतर जो तत्कालीन मानव-संबंध हैं उनको कहीं भी भंग न करते हुए, राम ने निषाद और गुह से भी आलिंगन किया, शबरी के बेर खाये, केवट से दोस्ती की, वनवासी असभ्यों को गले लगाया- तत्कालीन मानव- संबंधों का वास्तविक निर्वाह उन्होंने अपने इन्हीं आदर्श- क्षणों में किया। उनसे वे मानव संबंध अधिक घनीभूत ही हुए। निषाद निषाद ही रहा, गुह गुह ही, और राम का रामत्व अपने संपूर्ण सामंती मानवादर्शों में जगमगा उठा। तत्कालीन मानव-संबंधों के घेरे के भीतर मानवता की जितनी भी सर्वोच्चता संभव थी, उतनी तुलसीदास के राम में समा गयी। इसलिए तत्कालीन समाज के आदर्श चरित्र राम हैं। राम की इस आदर्शमयी आन्तरिकता के चित्र = उनकी भीतरी मानवता के शिखर- हमें आज भी द्रवीभूत करते हैं।”[9]

शुक्लजी के यहाँ साहित्यिकता और धार्मिकता की पृथकता और समानांतरता एक ही आचार- संहिता के दो पक्ष थे। जब धार्मिक ग्रन्थ के रूप में मानस पर गलत नैतिकता के समर्थन का आरोप लगता तो वह साहित्यिकता की बात करते थे और जब साहित्यिकता के आधार पर किसी को ख़ारिज करना होता तो नैतिक आचार-संहिता की बात करते थे। इन दोनों आचार संहिताओं की एकता कबीर की आलोचना में सबसे स्पष्ट थी। बुल्के के यहाँ दो भिन्न आचार संहिताओं का प्रशन नहीं था। वहां ‘कला नहीं ईश्वर की देन’ ही महत्वपूर्ण थी। कला और साहित्य की एडवांस्ड रुचियों में मानवतावादी विचारों की यह समकालीनता हिंदी में आधुनिकतावाद और पश्चिमी मार्क्सवाद की मानवतावादी धारा के साथ जुड़ी भी थी। यह न केवल स्व-भाव था और न केवल प्र-भाव। यह स्वाभाव और प्रभाव की वैश्विकता भी थी। बुल्के के परिमल प्रेम को इसी सन्दर्भ में देखा जा सकता है। बुल्के शुद्ध आत्मा के प्रकाश की वास्तविकता मसीह के सांसारिक राज्य में देखते थे। तुलसी की युगीन सीमा और श्रेष्ठता दोनों ही बुल्के के लिए इसी बात में थी कि तुलसी के साहित्य के भीतर वह सबकुछ मौजूद था जो स्वाभाविक रूप से मसीह को प्राप्त करने वाला है। तुलसी के यहाँ मसीह के यथार्थ का स्वप्न था। बुल्के के लिए यह यथार्थ स्वप्न से भी ज्यादा वैभवशाली और कारुणिक है। बुल्के के उच्च मूल्य वाले साहित्यिक अनुवादों में यही आस्था थी।

फ़िलहाल हम उनके शोध प्रबंध की ओर वापस लौटते हैं। हमने देखा था कि रामकथा को लेकर बुल्के की प्रेरणा तीन तत्वों से बनी थी- हिंदी प्रेम, तुलसी के प्रति श्रद्धा और डा. धीरेन्द्र वर्मा की उदारता। संघ से शोध की अनुमति मिलते ही बुल्के इलाहाबाद विश्वविद्यालय पहुंचे। शोध के विषय के रूप में डा. धीरेन्द्र वर्मा ने उन्हें मध्यकालीन ब्रजभाषा साहित्य पर काम करने का सुझाव दिया। बुल्के इस सुझाव को सुनकर चुप रह गए। धीरेन्द्र वर्म समझ गए थे कि यह विषय बुल्के की आत्मा के अनुरूप न था। उन्हें पता था कि बुल्के तुलसी से प्रेम करते हैं। इसलिए उन्होंने तुरंत ही दूसरा विषय सुझाया और कहा कि आप मानस की रामकथा पर काम कीजिये। माताप्रसाद गुप्त के निर्देशन में काम आरम्भ करने के बाद बुल्के ने रामकथा सम्बन्धी इतनी सामग्री जुटा ली कि ‘भूमिका’ को ही पूर्ण शोध बनाना पड़ा। इस प्रकार ‘रामकथा : उत्पत्ति और विकास’ के रूप में हिंदी में लिखा पहला शोध प्रबंध सामने आया।

‘रामकथा : उत्पति और विकास’ लगातार संशोधित और परिवर्धित होता रहा। सन् १९४९ में शोध प्रबंध जमा करने के बाद भी बुल्के रामकथा और रामभक्ति संबंधी सामने आने वाली हर नई जानकारी या उसके इतिहास को लेकर किसी नई प्रस्तावना का वैज्ञानिक विश्लेषण भी नए संस्करणों में जोड़ते चले गए। रामकथा के विकास को इतिहास और भूगोल के इतने बड़े फलक पर शोध की वैज्ञानिक वस्तुनिष्ठता और साहित्यिकता की पहचान के साथ विश्लेषण बुल्के से पहले किसी ने नहीं किया था। कृष्ण चरित और कृष्णभक्ति को लेकर प्राच्यविद्याविदों के बीच जितनी बहस हुई थी और उसके इतिहास निरूपण का जितना प्रयास हुआ था, उस हिसाब से रामकथा और रामभक्ति के विकास का निरूपण नहीं हुआ था। अकारण नहीं कि धीरेन्द्र वर्मा इसे ‘रामकथा का विश्वकोश’ कहते थे। शोध में बुल्के ने रामकथा के ऐतिहासिक विकासक्रम के निरूपण और मूल रामकथा संबंधी कई पुराने पूर्वग्रहपूर्ण निष्कर्षों से अपनी असहमति व्यक्त की है। बुल्के लिखते हैं कि रामकथा के मूलस्रोत संबंधी मतों में मूल का पता लगाने के लिए प्रायः विद्वानों द्वारा ‘दो या तीन स्वतंत्र वृत्तांतों’ की कल्पना कर ली जाती है। बुल्के के अनुसार इस प्रवृत्ति के मूल में दशरथ जातक संबंधी डा. वेबर का मत था। पुराने मतों का उल्लेख करते हुए बुल्के लिखते हैं : “रामकथा का मूल रूप बौद्ध दशरथ- जातक के गद्य में सुरक्षित है; इस जातक में सीता हरण और युद्ध वर्णन का अभाव है। अतः इन दोनों का आधार संभवतः होमर के काव्य में ढूंढना चाहिए, यह डा. वेबर का विचार है। श्री दिनेशचन्द्र सेन की धारणा है कि वाल्मीकि ने पहले पहल (दशरथ, रावण तथा हनुमान् संबंधी) तीन नितांत स्वतंत्र वृत्तांत मिलाकर रामकथा की सृष्टि की है। डा. यकोबी के अनुसार रामायण की कथावस्तु के स्पष्टतया दो स्वतंत्र भाग हैं- प्रथम भाग अयोध्या से संबंध रखता है और ऐतिहासिक घटनाओं पर निर्भर है; द्वितीय भाग की आधिकारिक कथावस्तु (सीताहरण तथा रावणवध) का मूल रूप वैदिक साहित्य में विद्यमान है। सीता, राम तथा रावण का व्यक्तित्व क्रमशः वैदिक सीता (कृषि की अधिष्ठात्री देवी), इंद्र तथा वृत्रासुर से विकसित हुआ है। सीताहरण का मूल स्रोत प्राणियों द्वारा गायों का अपहरण है तथा रावणवध वृत्तासुर- वध का विकसित रूप मात्र है।”[10]

बुल्के इन दो या तीन स्वतंत्र वृत्तांतों के सिद्धांत के बदले रामकथा की समस्त आधिकारिक कथावस्तु, न केवल राम का निष्कासन वरन् सीताहरण और रावणवध का भी एक ‘मूल ऐतिहासिक आधार’ मानना स्वाभाविक बताते हैं। इस प्रकार बुल्के के लिए एक मूल ऐतिहासिक घटना के आख्यान चरित काव्यों के आधार पर वाल्मीकि ने अपनी रचना की थी। बौद्ध त्रिपिटकों की ‘एकाध गाथाएं’ और महाभारत में द्रोण तथा शांतिपर्व की अत्यंत संक्षिप्त रामकथाएं उनके अनुसार वाल्मीकि-पूर्व प्रचलित रामकथा संबंधी आख्यान काव्य पर आधारित हैं। इनमें से स्वयं कोई भी मूल कथावस्तु नहीं है। ‘मूल ऐतिहासिक घटना’ से विकसित होते राम के चरित्र पर बाद में बौद्ध और भागवत धर्मों का प्रभाव पड़ा था। बौद्ध रामकथाओं में ‘दशरथ जातक की समस्या’ पर बुल्के ने विशेष ध्यान दिया है। उनके अनुसार ‘दशरथ जातक की रामकथा न केवल ब्राह्मण रामकथा का विकृत रूप है, वरन् उसका रचनाकाल वाल्मीकि के बहुत सी शताब्दियों बाद माना जाना चाहिए।”[11] बुल्के वाल्मीकि पूर्व रामकथा आख्यान को मूलतः ब्राह्मणीय रामकथा मानते हैं। इस मूल की विकृति दशरथ जातक की रामकथा है। संक्षिप्त और गद्यात्मक होने के चलते बुल्के इसपर वाल्मीकिकृत रामायण की कोई छाप नहीं देख पाते। इस आधार पर उन्होंने ये अनुमान लगाया कि यह वाल्मीकि रामायण पर नहीं बल्कि उसके पूर्व के रामाख्यान काव्य पर आधारित हो सकता है। इस प्रकार मूल प्राचीन ऐतिहासिक घटना से निकला मूल ब्राह्मण आख्यान काव्य और उसे महाकाव्यात्मक संगठन देने वाले हुए आदिकवि वाल्मीकि : बुल्के ने रामकथा की उत्पत्ति का निरूपण इसी क्रम में किया है। मूल ऐतिहासिक घटना संबंधी उनकी मान्यता इतनी प्रबल थी और उसमें उन्हें इतना विश्वास था कि वह अयोध्या की खुदाई से इसके निश्चित प्रमाण मिलने की आशा रखते थे। ‘मानस कौमुदी’ में बुल्के लिखते हैं “राम संबंधी प्राचीन गाथा साहित्य का आरम्भ ऐतिहासिक घटनाओं के आधार पर हुआ होगा…। यदि प्राचीन अयोध्या की खुदाई की जाए, तो यह सिद्ध हो जाएगा कि नवीं शताब्दी ईस्वी पूर्व में वहां एक नगर था। हाल में अपने देश के विख्यात पुरातत्त्वज्ञ डा. हंसमुख धीरज सांकलिया ने ‘रामायण : मिथ ऑर रियलिटी’ नामक पुस्तक में यह विचार प्रकट किया है कि कम से कम आठ सौ ई.पू. तक अयोध्या बसायी जा चुकी थी।”[12]

हम स्पष्टतः देखते हैं कि ऐतिहासिक चरितकाव्यों की ऐतिहासिकता के निरूपण का प्रयास देशी भाषा साहित्यों के इतिहास से होते हुए एक ठेठ ऐतिहासिक घटना के अनुमान तक पहुँच चुका था। मध्यकाल के ऐतिहासिक चरितकाव्यों के आधार पर इतिहास की वास्तविक घटनाओं तक पहुँचने के इस मार्ग की आलोचना उसी समय ‘हिंदी साहित्य का आदिकाल’ में द्विवेदीजी कर रहे थे। जहाँ द्विवेदी कथा की संरचना और मोटिव के सहारे आख्यान काव्यों से इतिहास की पुनर्रचना के बदले आख्यान काव्यों की ऐतिहासिक पुनर्रचना का प्रश्न सामने रखते हैं। बुल्के के सामने समस्या यह थी कि रामकथा के इतिहास में वाल्मीकि के रामायण की कथा का मूलस्रोत न तो वेदों में दिख रहा था, न जातक कथाओं में और न ही किसी ज्ञात ऐतिहासिक घटना में। प्राचीन इतिहास के इस धुंधलके के भीतर उन्होंने यही अनुमान स्थिर किया कि वाल्मीकि के रामायण का जो ढांचा प्राचीन और अर्वाचीन, देशी विदेशी रामायणों की मूलभूत एकता बनाने वाला है, वह किसी वास्तविक मूल ऐतिहासिक घटना पर आधारित है और जिसे वाल्मीकि ने अपने पूर्व प्रचलित लोक आख्यान काव्य से ग्रहण किया है। बुल्के के लिए यह सर्वाधिक विज्ञानसम्मत अनुमान था। एक वास्तविक ऐतिहासिक घटना का अनुमान जहाँ राम को अयोध्या से निकाला जाना, सीताहरण और रावण विजय मूलतः ऐतिहासिक घटनाएँ थीं। ठीक उसी तरह जैसे पृथ्वीराजरासो की मूल ऐतिहासिक घटनाओं की तलाश वैज्ञानिक पाठ निर्धारणों के ज़रिये किया जा रहा था। ‘मूल ऐतिहासिकता’ की रक्षा के लिए हनुमान् के आदिवासी या मूल निवासी उद्गम की कल्पना बुल्के के लिए असंगत नहीं थी। ‘आर्य-अनार्य’ युद्ध के रूपक के रूप में राम कथा की व्याख्या पहले से ही हो रही थी, वैसे ही जैसे पृथ्वीराजरासो का संबंध ‘हिन्दू-मुसलमान’ संघर्ष का अनिवार्य रूपक मान लिया गया था। हनुमान् ‘वानर गोत्रीय’ आदिवासी थे जिन्हें आगे चलकर रामकथा के अन्य आदिवासियों के साथ सचमुच का वानर मान लिया गया था। प्रचलित रामायणों में हनुमान् के ‘वानरत्व- विषयक विशेषणों’ का बाहुल्य देखकर वह इस अनुमान पर पहुंचे थे कि हनुमान् संबंधी यह धारणा वाल्मीकि के समय के पूर्व ही मान्यता पा चुकी थी।[13] उनके अनुसार प्रारंभ में हनुमान् को जो वायुपुत्र कहा गया वही उसकी कथा का आधार है। बुल्के वायुपुत्र शब्द के अनार्य मूल की ओर ध्यान दिलाते हैं जहाँ इसका अर्थ ऐन्द्रजालिक अथवा विद्याधर है। सुमग्ग जातक में वायुस्स पुत्त नामक विद्याधर का उल्लेख है जो वास्तव में जादूगर है। अन्यत्र भी इसका अर्थ जादूगर है जो हनुमान् के तीव्र बुद्धि संपन्न होने का एक प्रतीक भी है।[14] बुल्के के अनुसार हनुमान् के जन्म की कोई ऐसी कथा नहीं मिलती जो वाल्मीकि रामायण की कथा से बहुत स्वतंत्र और अलग रूप से निर्मित हुई हो। ‘वानर गोत्रीय’ का अर्थ यह है कि जिस मध्य भारतीय आदिवासी समाज के हनुमान् थे, उनका टोटेम ‘वानर’ था। झारखण्ड के उरांव, मुंडा आदि आदिवासी समाजों में ‘हेलेमान’ या ‘गाड़ी’ जैसे टोटेम से उन्हें अपनी धारणा को बल मिलता था। वाल्मीकि कृत रामायण से विकसित हनुमान् के चरित्र का विकासक्रम कुछ यूँ है-  वाल्मीकि कृत आदिरामायण में सुग्रीव के पराक्रमी तथा बुद्धिमान मंत्री (बुद्धिमत्ता और पराक्रम के मूल रूप में ) उसके बाद ‘चिरंजीवत्व’ (वरदानों में सबसे प्राचीन हनुमान् की कीर्ति से सम्बंधित), ब्रह्मचर्य (प्राचीनतम उल्लेख स्कन्द पुराण में ), शैव अवतार से होते हुए मध्यकालीन भक्ति में रामभक्त के रूप में पूर्ण विकसित चरित्र। इन विशेषणों का मूल स्रोत भी बुल्के के अनुसार आदिरामायण ही है परन्तु परवर्ती साहित्य में बढ़ते क्रम में है। हनुमान् की अंतिम विशेषता उनका देवत्व है। बुल्के दिखाते है कि ईसा की आठवीं शताब्दी के अनंतर हनुमान् को रुद्रावतार माना जाने लगा था। इसी के साथ ‘हनुमन् भक्ति’ की भावना का भी विकास शुरू हुआ जिसके प्रारंभिक साक्ष्य शैव ग्रंथों में ही उपलब्ध हैं। दसवीं से पंद्रहवीं शताब्दी के बीच हनुमन् भक्ति का पूर्ण विकास हुआ। पंद्रहवीं शताब्दी के बाद हनुमान् का ‘संकटमोचन’ रूप सबसे लोकप्रिय हुआ। अर्वाचीन साहित्य में उनकी महिमा क्रमशः बढ़ती गयी और उन्हें ‘पापमोचक, मुक्तिदाता भगवान्’ की उपाधि मिलती गयी। बुल्के इसमें तुलसी के महत्वपूर्ण योगदान को रेखांकित करते हैं (संकट सोच विमोचनी मूरती)। संकटमोचक, मुक्तिदाता, मंत्रदाता रूप का संबंध बुल्के प्राचीन ‘यक्षपूजा’ से जोड़ते हैं। बुल्के के लिए अत्यंत प्राचीन और गाँव- गाँव प्रचलित ‘यक्षपूजा’ की लोकप्रियता के साथ हनुमान् की लोकप्रियता का बनना स्वाभाविक था। बुल्के लिखते हैं “इस अत्यंत  प्राचीन पूजा पद्धति  से संबंध हो जाने पर हनुमान् की लोकप्रियता बहुत ही बढ़ गयी। और उस समय तक जिस उद्देश्य से और जिस रूप में यक्षों की पूजा होती रही अब उसी उद्देश्य और उसी रूप में महावीर हनुमान् की भी पूजा होने लगी। हनुमान् के संकटमोचन और द्वारपाल वाला रूप वीरपूजा से संबंध रखता है। प्राचीन वीरपूजा और हनुमत्पूजा के उद्देश्यों में जो सादृश्य है वह उपर्युक्त विकास की वास्तविकता को प्रमाणित करता है।”[15]

बुल्के के अनुसार हनुमान् के चरित्र के विकास में भक्ति और लोकपूजा रूपों का यह अद्भुत मेल जो पंद्रहवीं शताब्दी के बाद हुआ इन सब के मूल में वाल्मीकिकृत रामायण के कुछ मूल तत्त्व हैं। इसी प्रकार रामायण के अन्य चरित्रों और घटनाओं का भी विकास, विस्तार और विकृति के मूल तत्वों की एकता उन्होंने वाल्मीकि रामायण से ही निर्धारित की है। हनुमान् के मामले में रामकथा से पृथक किसी और कथा परंपरा का वाल्मीकि-पूर्व रूप के निर्धारण को बुल्के आवश्यक मानते हैं। और इस प्रकार हनुमान् भी एक ऐतिहासिक चरित्र ठहरते हैं।

बुल्के के पास एक आधुनिक और वैज्ञानिक शोध पद्धति थी। इस पद्धति के सहारे वह धर्म-मतों और कथाओं की विविधता को स्वीकार करते हुए उस विविधता के भीतर एकत्व स्थापित करने वाले एक मूल ढांचे की खोज करते हैं। मूल ढांचे की यह खोज इसके इहलौकिक कारण की तलाश थी। रामकथा की व्यापकता और भारतीय उपमहाद्वीप के साथ-साथ दक्षिण पूर्व के एशियाई देशों में मिलने वाली इसकी प्रचुर विविधता को नकारना किसी के लिए भी संभव न था। रामकथा के आधार पर विकसित रामकथा का ठोस वस्तुगत आधार इतिहास में जरूर होना चाहिए। बुल्के इतिहास के इसी प्रश्न के साथ शोध में प्रवृत्त हुए थे। शोध की ओर प्रवृत्त करने वाले तीन तत्त्वों में तुलसी के प्रति अगाध श्रद्धा शायद सबसे महत्वपूर्ण थी और उन्होंने शोध भी शुरू किया था मानस की रामकथा पर ही। पर भूमिका के लिए इकट्ठी की गयी सामग्री ने उनके शोध प्रश्न को नए प्रकाश से आलोकित कर दिया। रामकथा की उत्पत्ति और विकास का यह दीर्घ इतिहास उसकी दीर्घकालीन लोकप्रियता और व्यापकता का स्वयं प्रमाण थी। बौद्ध जातकों आदि में जो स्वीकार्य ऐतिहासिक आख्यान के मूल तत्त्वों से विकृति थी उसी कारण उनकी लोकप्रियता धीरे धीरे कम होती गयी, बुल्के को अपने इस अनुमान की निरर्थकता का बोध शायद था। इसलिए अपने अनुमान की पुष्टि के लिए उन्होंने अलोकप्रियता के दो और कारण गिनाये। एक उनकी भाषा (पाली, चीनी आदि) दूसरी इनकी विधा (पद्य)! सारतः यह प्रमाणित हुआ कि मूलकथा ब्राह्मणीय कथा थी, जैसे जैसे ब्राह्मणीय धर्म स्वयं लोकप्रिय वैष्णव धर्म में बदलता गया वैसे वैसे रामकथा से रामभक्ति कथा के रूप में वह विकसित होता गया। बुल्के का हिंदी प्रेम उनके संस्कृत प्रेम से अलग नहीं था। उन्हें भारतीय संस्कृति और संस्कृत भाषा के आपसी ‘एकत्व’ का अहसास था। हिंदी को वह संस्कृत की पुत्री ही मानते थे। संस्कृत केन्द्रित भारतीयता बुल्के को कल्पित प्रतीत नहीं हुई। विविधताएँ उनके लिए एक संस्कृत केंद्र से संकेंद्रित वृत्तों के रूप में विकसित होती गयी थी। शोधकार्य की सामग्री जो अधिकांशतः संस्कृत में ही उपलब्ध थी, उनके सामने बुल्के को पाली या चीनी की अलोकप्रियता भी एकदम स्वाभाविक लगती थी। वाल्मीकि रामायण के राम के चरित्र में बुद्ध के प्रभाव को बुल्के अस्वीकार नहीं करते परन्तु वह प्रभाव वाल्मीकि की साहित्यिक प्रतिभा में निहित था जिसने बुद्ध के लोकप्रिय करुण रूप को राम के चरित्र में समाहित कर लिया था। महाभारत के ‘बुद्ध राम संवाद’ की तरह वाल्मीकि रामायण में कहीं भी बुद्ध का कोई चरित्र नहीं है। केवल एक बार बुद्ध का उल्लेख हुआ है ‘जाबालि’ वृत्तान्त के अंतर्गत जहाँ राम बुद्ध को चोर और नास्तिक कहते हैं।[16] इसके अलावा बुद्ध संबंधी श्लोक न तो गौड़ीय पाठ में मिलता है और न ही पश्चिमोत्तरीय पाठ में। “अतः आदि रामायण में न तो बुद्ध का कोई उल्लेख हुआ था और न बौद्ध धर्म के प्रत्यक्ष प्रभाव का कहीं भी असंदिग्ध निर्देश मिलता है।”[17] परोक्ष प्रभाव के प्रश्न का निराकरण उन्होंने दो अनुमानों के आधार पर किया। महाभारत में रामायण की अपेक्षा जो कहीं अधिक ‘कटुभाव, उग्र रणोत्सुकता, घोर युद्ध, अदमनीय विद्वेष’ आदि दिखाई देते हैं उसका कारण बौद्ध धर्म का प्रभाव नहीं वरन् उसकी भौगौलिक विशिष्ट अवस्थिति है। महाभारत की घटना पश्चिम में हुई थी जबकि रामायण की कौशल प्रदेश में, ‘जहाँ सभ्यता और संस्कृति का विकास आगे बढ़ चुका था’। इस तरह करुणा और अहिंसा जो कि सभ्यता और संस्कृति के आगे बढ़े हुए भाव हैं, वे आदिकवि को बौद्धों के प्रभाव के चलते नहीं वरन् स्वाभाविक रूप से प्राप्त था! दूसरा अनुमान और भी महत्त्वपूर्ण है। बुल्के कहते हैं कि रामायण के रचनाकाल में कौशल में बौद्ध धर्म का पर्याप्त प्रचार हो गया था। वह लिखते हैं: “अतः यह असंभव नहीं कि वाल्मीकि ब्राह्मण धर्म के प्रभाव में रहते हुए भी परोक्ष रूप से बौद्ध आदर्श से प्रभावित हुए थे। सीता का हिंसा के विरुद्ध भाषण (रौद्रं पर प्राणाभि हिंसनम् आदि ), जो बौद्ध अहिंसा का स्मरण दिलाता है, प्रक्षिप्त माना जा सकता है। लेकिन राम का अत्यंत शांत और कोमल स्वाभाव, उनकी सौम्यता आदि ध्यान में रखकर स्वीकार करना पड़ता है कि वे मुनि पहले हैं, क्षत्रिय बाद में। अतः इनके चरित्र चित्रण में किंचित बौद्ध प्रभाव देखना निर्मूल कल्पना नहीं प्रतीत होती है।”[18]इस प्रकार बुल्के राम के चरित्र पर ‘किंचित् बौद्ध प्रभाव’ स्वीकार करते हुए दशरथ जातक की समस्या का जो समाधान प्रस्तुत करते हैं, वह बुल्के के आतंरिक अंतर्विरोधों को भी स्पष्ट करता है। भारत के लोकप्रिय धार्मिक रूपों के बीच बौद्ध धर्म को ‘मूल भारतीयता’ के प्रश्न से जोड़ने वाली एकदम विपरीत प्रवृत्ति का पता हमें अम्बेडकर के यहाँ मिलता है। इस विषय पर थोड़ी और चर्चा हम आगे करेंगे।

वाल्मीकि कृत आदि रामायण से विकसित होती रामकथा का सर्वोच्च रूप रामभक्ति और तुलसीदास में बुल्के दिखाते हैं। अनेक रामायण उस एक रामायण का विकास है जो स्वयं लोक आख्यान के रूप में एक ऐतिहासिक घटना के सुदृढ़ आधार पर विकसित हुआ था। एक प्रकार से यह महाकाव्यात्मक एकता थी। इस एकता के वाहक बुल्के के अनुसार ‘काव्योपजीवी कुशीलव’ होते थे। इन कुशीलवों का काम होता था कि वे आदि रामायण की कथा समस्त देश में घूम घूमकर प्रचारित करें और इसी के सहारे जीविकोपार्जन करें। आधुनिक विद्वान् इसे संस्कृत शास्त्रीय काव्य की सार्वदेशिक संस्कृति से जोड़कर देखते हैं।[19] शेल्डन पोलॉक संस्कृत की सार्वदेशिक संस्कृति को राज्य और काव्य के संबंधों के माध्यम से देखने की कोशिश करते हैं। संस्कृत काव्य और राज्य की सार्वदेशिक संस्कृति के साथ साथ प्राकृत और अपभ्रंश की अर्द्ध सार्वदेशिक संस्कृतियों का प्रभाव हज़ार ईस्वी के आसपास देशी भाषाओं की ‘स्थानीयता और सार्वदेशिकता’ की आत्माभिव्यक्ति के दबाव के चलते समाप्त हो गया। पोलॉक इसे महाकाव्यों की स्थानीयता के साथ बनने वाली देशी भाषाओं की सहस्त्राब्दी के रूप में व्याख्यायित करते हैं। बुल्के ने भी ध्यान दिलाया था कि आधुनिक भारतीय भाषाओं के पहले पहल लिखे गए काव्यों में रामकथा या रामायण ही थी। बुल्के की अपेक्षा पोलॉक अपने तथ्यों को ज्यादा ठोस और वस्तुनिष्ठ बताते हैं, जहाँ वे काव्य के साथ साथ दक्षिण पूर्व एशिया में विस्तृत शिलालेखों और अभिलेखों का साक्ष्य भी प्रस्तुत करते हैं। इस प्रकार काव्य और राज्य के सम्मिलित इतिहास के लिए पोलॉक के पास ज्यादा ठोस आधार है, जिसके सहारे वह धर्म के इतिहास से मुक्त इतिहास दृष्टि का विकास करना चाहते हैं। बुल्के ने आधुनिक भारतीय भाषाओं में रामकथा की व्यापकता का कारण भक्ति के विकास को बताया था। बुल्के की रामकथा के विकास का द्वितीय सोपान वह था जहाँ रामकथा का आदर्श, क्षत्रिय चरित्र मात्र न रहकर विष्णु की अवतारलीला के रूप में परिणत हो गया था। बौद्धों और जैनियों के साहित्य को छोड़कर बुल्के राम के इस रूप को सर्वस्वीकृत मानते थे। परन्तु इस द्वितीय सोपान में जनता की धार्मिक चेतना के भीतर राम के लिए कोई विशेष आग्रह न था। न ही इस समय तक रामभक्ति का अविर्भाव हुआ था। धार्मिक साहित्य की अपेक्षा इस दूसरे सोपान में तत्कालीन ललित साहित्य के भीतर ही रामकथा की व्यापकता और लोकप्रियता मिलती है। ललित साहित्य अधिकाशतः ‘शास्त्रीय संस्कृत काव्य’ की परंपरा थी। यहाँ राम का चरित्र साहित्यिक था, धार्मिक नहीं। बुल्के ध्यान दिलाते हैं कि “रामभक्ति के आविर्भाव के पूर्व रामकथा का यह साहित्यिक रूप विदेश में फैल गया और उसपर बाद में रामभक्ति का प्रभाव नहीं पड़ा, इसलिए समस्त विदेशी रामकथा साहित्य में रामभक्ति का प्रायः अभाव है।”[20] इस तरह विदेशों में रामकथा का प्रसार धार्मिक कम साहित्यिक ज्यादा था।

रामकथा के विस्तार को कुछ विद्वान एक ही कथा का अलग-अलग संस्कृतियों में इम्प्रोवाईजेशन होना बताते हैं, जिसमे राजनीतिक सत्ता और लोक संस्कृति दोनों की भूमिका थी। कुशीलवों के कव्योपजीवी वर्ग के साथ पांडुलिपियों की नक़ल की तकनीक, राज्य निर्मित शिलालेखों- अभोलेखों का परम्परित आदर्श मॉडल आदि मिलकर कथाओं का एक सुनिश्चित तंत्र बनाती थी। लोकमानस के बीच अगर कथा के धार्मिक रूपों का अभाव था भी तब भी यह नहीं कहा जा सकता कि साहित्य नितांत अधार्मिक था। कथाओं का सुनिश्चित तंत्र लोकमानस, सत्ता और काव्य के रिश्तों को बनाने वाले एक सक्रिय काव्योपजीवी वर्ग पर निर्भर करता था। इस वर्ग का जीविकोपार्जन मुख्यतः राज्यसत्ता या धर्म संस्था पर निर्भर करता था और कहना न होगा कि बदले में इन सत्ता संस्थाओं को अपनी जनस्वीकृति और लोकप्रियता के लिए इन वर्गों पर निर्भर होना पड़ता था। इसलिए राज्य और धर्म संस्था के अपने हितों से भी ये कथाएं अछूती नहीं थीं, उनमें प्रक्षेप और परिवर्तन होता रहता था और कहीं-कहीं एकदम नए रूपों का निर्माण हो गया था।

रामकथा की लोकप्रियता आरम्भ से ही इतनी थी कि उसे विष्णु का अवतार, बौद्ध धर्म में बोधिसत्व तथा जैन धर्म में आठवें बलदेव की तरह स्वीकार किया गया था। संस्कृत शास्त्रीय ललित-साहित्य के भीतर वाल्मीकि की कथा का साहित्यिक रूपांतरण और उसका विदेशों में विस्तार और अंत में भक्ति के साथ जुड़कर लोकप्रिय धार्मिकता के सर्वोच्च रूप में विकसित होना। संक्षेप में रामकथा की उत्पत्ति और विस्तार की कहानी यही थी। इस विकास की मौलिक एकता के दोनों ध्रुवों पर, रामकथा के विकास, प्रसार और विविधता को आतंरिक एकता और संगति प्रदान करने वाले दो महाकवि थे। यह नेहरू युगीन अनेकता में एकता के मॉडल से अभिन्न है। अकारण नहीं कि बुल्के हिंदी भाषा का एक ठोस संस्कृत आधारित मानक बनाने के प्रबल पक्षधर थे।

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हुसैन की रचना

हिन्दू धर्म और अवतारवाद

बुल्के बराबर कहा करते थे कि वर्षों तक संस्कृत और हिंदी साहित्य पढ़ते-पढ़ते उनका मन पूरी तरह भारतीय हो गया है। लोगों की नजरों में बुल्के आधुनिक संत की तरह थे। आधुनिक भारत के निर्माण का उद्देश्य बुल्के के अनुसार प्राचीन और नवीन का समन्वय होना चाहिए। यह बात उन्होंने ‘हिंदी के प्रति हिंदी भाषियों का कर्तव्य’ बतलाते हुए कही थी। भाषा आन्दोलनों की उग्रता को लक्ष्य करते हुए उन्होंने कहा कि यह उग्रता निरे अंग्रेजी विरोध के कारण है। भाषा का सम्मान और मानसिक सांस्कृतिक जागरण एक दूसरे से अलग नहीं हो सकते। उन्होंने कहा कि अहिंसक सत्याग्रह हमारा कर्तव्य है। हिंदी भाषा उनके लिए एक ‘संगठित शक्ति’ थी। उत्तर भारत के विभिन्न बोलियों के सम्मान की लड़ाई को बुल्के वहीं तक स्वीकार करते थे जहाँ तक यह लड़ाई हिंदी भाषा की ‘संगठित शक्ति’ को बढ़ाने में मददगार हो। उन्होंने कहा कि हिंदी की ‘संगठित शक्ति’ अगर बोलियों में बिखर जाये तो उसका परिणाम उत्तर भारत के लिए बहुत घातक होगा। हिंदी भाषा और साहित्य के पिछले चार सौ सालों के इतिहास में इस ‘संगठित शक्ति’ का इतिहास भी वह देखते थे। फ्लेमिश जातीयता की तरह विकसित होती एक हिंदी जातीयता ! नए पुराने के समन्वय का निर्णय उनके लिए कभी उग्र नहीं हो सकता था। उन्होंने कहा कि भारत में इतिहास कभी भी जड़ नहीं था और न ही कभी किसी रूढ़िगत जड़ता की जगह ही भारतीय इतिहास में रही है। बुल्के के लिए नये पुराने के निर्णय का आधार कालिदास के इन शब्दों में था- ‘पुराणमित्येव न साधु सर्वं न चापि काव्यं नवमित्यवद्यम्। संत परीक्ष्य अंतरद् भंजते मूढ़ पर प्रत्ययनेवबुद्धः’, अर्थात् पुराना हो जाने से ही न तो कोई काव्य अच्छा हो जाता है और न ही नया होने से ही बुरा हो जाता है। समझदार लोग दोनों को परखकर किसी एक को अपनाते हैं। जो मूर्ख है वही दूसरों के कहने पर चलता है। इस तरह प्राचीन की परीक्षा और आधुनिकता के बीच वह कोई विरोध नहीं मानते थे। अतीत के भंडार से “किसी काल विशेष के कुछ ही सिद्धांत निकालकर उन्हें भारतीयता की एकमात्र प्रतिनिधि उपलब्धि ठहराना, भारत की शताब्दियों तक निरंतर आगे बढ़ती हुई उदार संस्कृति के प्रति घोर अन्याय ही है।”[21] संस्कृति के प्रति इसी उदार दृष्टि से ही उन्होंने रामकथा की उत्पत्ति और विकास का निरूपण किया था। जातीयता की संगठक शक्ति के रूप में रामकथा का इतिहास भारतीय संस्कृति की एक उदार विश्व दृष्टि का भी विकास था। भारतीय संस्कृति की इस उदार विश्वदृष्टि में स्वयं को नवीन करते चलने की अपार क्षमता है। प्रेमचंद के बारे में बुल्के ने कहा कि उनकी कहानी कला का मूल स्रोत तो विदेशी है किन्तु उन्होंने उसे अपनी मौलिक प्रतिभा के सांचे में ढालकर एक स्वाभाविक भारतीय रूप प्रदान किया है। प्रेमचन्द की इस कहानी कला के मूल स्रोत अर्थात् यथार्थवादी कहानी कला को सम्बोधत करते हुए उन्होंने लिखा कि बहुत से यथार्थवादी उपन्यासों में जीवन की क्रूरता, देश की कुंठा और मनुष्य की पाशविक वृत्तियों का चित्रण मात्र किया जाता है। इसे वह उद्देश्यहीन यथार्थवाद कहते हैं और “इस प्रकार का उद्देश्यहीन यथार्थवाद भारत की साहित्यिक परंपरा से मेल नहीं खाता। यथार्थ को दिशा देना, कुंठा के अंधकार से निकलने का मार्ग दिखाना, मनुष्य को पशुतुल्य धरातल से ऊपर उठाना, यह भारतीय दृष्टिकोण के अनुसार साहित्य का उद्देश्य है।”[22]  बुल्के के लिए सोद्देश्य यथार्थवाद की भारतीय परंपरा थी ‘कीरति भनिति भूति भली सोई..’। भारतीय साहित्य के इस स्वाभाविक विकास की गति अर्थात् सोद्देश्य यथार्थवाद की उदार विश्वदृष्टि को ही वह  प्रेमचंद में नवीन होता देख रहे थे।

साहित्य की तरह संस्कृति और धर्म के प्रति बुल्के की उदार विश्वदृष्टि को भी हम उन्हीं के शब्दों में ‘सोद्देश्य यथार्थवाद’ की दृष्टि कह सकते हैं। अपनी इसी दृष्टि से बुल्के अवतारवाद की भारतीय विचारधारा को समझने का प्रयास करते थे। अवतार का भी एक निश्चित उद्देश्य था। वह उद्देश्य था धर्म की स्थापना। धर्म की स्थापना के उद्देश्य से अवतारों की इच्छा को बुल्के ने भारतीय जनता की वास्तविक इच्छाओं का स्वप्न कहा था। इस तरह बुल्के के लिए राम की भक्ति ‘निर्बलों की आह’ को संगठित करने वाली धार्मिक विचारधारा का प्रतिनिधित्व करती है, क्योंकि इस भक्ति में एक सोद्देश्य यथार्थवाद है। निस्संदेह बुल्के के लिए यह सोद्देश्य यथार्थवाद प्रेमचंद के ठीक विपरीत एक धार्मिक व्यावहारिक विचारधारा थी। बुल्के ने हिंदी विभागों से भगवतीचरण वर्मा के उपन्यास ‘चित्रलेखा’ को इसीलिए हटाने का अनुरोध किया था, क्योंकि वहां कुमारगिरी जैसे योगी का चित्रलेखा के सामने झुक जाना उन्हें अच्छा नहीं लगता था। बुल्के के लिए ब्रह्मचर्य का आदर्श एक उच्च आदर्श था और स्त्री सौन्दर्य के सामने उसकी पराजय उनके अनुसार बीए के छात्रों को गलत सन्देश देती थी, इसलिए पाठ्यक्रम से उसे हटाना जरूरी था! अवतारवाद की विचारधारा के विकास में कृष्णभक्ति के योगदान को बुल्के-सीधे सीधे नकार नहीं सकते थे। राधा कृष्ण की रासलीलाओं और अवतारवाद की नैतिकता के बीच का अंतर्विरोध बुल्के के लिए ठीक वैसी ही उलझन पैदा करने वाला था जैसी ग्रियर्सन या शुक्ल जी के यहाँ। सामान्यतः हिन्दू धर्म के बारे में बुल्के का विचार डा. राधाकृष्ण के विचारों से अभिन्न है। वह ईसाई धर्म की तरह ही हिन्दू धर्म को भी एक विशेष जीवन व्यवहार की दृष्टि मानते थे। अंतर केवल उसकी परिणति का है। बुल्के हिन्दूओं के जीवन व्यवहार को स्वभावतः ईसाई धर्म में पर्यवसित होता हुआ देखते थे।

पिछले तीन हज़ार सालों से निरंतर विकसित होते हिन्दू धर्म को, वह यहाँ के लाखों हिन्दुओं की निरंतर विकसित होती धार्मिकता की तलाश की तरह देखते हैं। इस दीर्घ इतिहास में उन्हें किसी ऐसी केंद्रीय सत्ता (अथॉरिटी) का अभाव मिलता है जो नई प्रवृत्तियों और व्यवहारों की जाँच कर सके। जबतक कोई नया धर्मगुरु खुलकर वेदों को नहीं नकारता तब तक वह मोक्ष के नए मार्ग और उस नए मार्ग के अपने अनुयायियों के साथ हिन्दू धर्म के भीतर जगह पा जाता था। बुल्के कहते हैं कि समन्वय की इसी क्षमता के सहारे वेदों का खुलकर विरोध करने वाले बौद्ध और जैन धर्म भी आजकल हिन्दूवाद की शाखा मात्र में बदल गए हैं। इस प्रकार यह हिन्दू धर्म असंख्य मतों और पंथों और धार्मिक व्यवहारों से युक्त एक जटिल व्यवस्था के रूप में प्रकट होती है। बुल्के देखते थे कि पढ़े लिखे हिन्दुओं के बीच भी हिन्दू धर्म की पहचान को लेकर कोई मतैक्य नहीं था। एक लोकप्रिय राष्ट्रीय पत्रिका के पत्राचार कॉलम की एक बहस का हवाला बुल्के देते हैं, जहाँ हिन्दू धर्म के बारे में व्यक्तिगत विचारों पर एक लम्बी बहस हुई थी। उस लम्बी बहस का अंतिम निर्णय था : हिन्दू एक ऐसा व्यक्ति है जिसका जन्म हिन्दू परिवार में हुआ है और जिसने कभी खुलकर अपने धर्म का परित्याग नहीं किया है।[23] उनके यहाँ हिन्दू धर्म की इस अपरिभाषेय संश्लिष्टता का इतिहास पहले के प्राच्यविद्याविदों के वर्णन से बहुत भिन्न नहीं थी। ई.पू. की तीसरी और दूसरी सस्त्राब्दियों में आर्यों का भारत आगमन हुआ। इन आर्यों ने अपने साथ ‘प्रकृति-पूजक’ धर्म भी साथ लाया। आर्यों की जो शाखा यूरोप पहुंची थी उनका धर्म भी मुख्यतः ‘प्रकृति पूजा’ ही था। आरंभिक ऋग्वेद की सुन्दर ऋचाओं से होते हुए बाद के तीनों वेद मिल कर हिन्दुओं के दूसरे पवित्र ग्रंथों का आधार बनते हैं। बुल्के का सुझाव है कि बाद के तीनों वेदों की प्रकृति को बेहतर ढंग से समझने के लिए हमें उत्तर भारत में आर्य और अनार्य आबादियों की आपसदारी के परिणाम के रूप में उन्हें देखना चाहिए।

बुल्के लिखते हैं कि आरंभिक आर्यों में मुख्यतः तीन श्रेणियां थीं: पुजारियों की, आधिकारिक योद्धाओं की और सामान्य कबीलीयाई मनुष्यों की। उत्तर भारत में पहले से रह रही जनता के संपर्क और उनपर विजय के दौरान धीरे-धीरे ये श्रेणियां कठोर होती गयीं और उन्हें धार्मिक मान्यता भी मिलती गयी। ब्राह्मणीय कर्मकांडों के आसपास पुरोहित वर्ग ने एक विशेषाधिकार संपन्न स्थिति हासिल कर लिया। इन कर्मकांडों के विधि-निर्देशों और धार्मिक अर्थों के निर्देश के लिए ब्राह्मण ग्रन्थ लिखे गए। यहाँ पहली बार हिन्दू धर्म की आरंभिक गाथाओं का संकलन मिलता है। पुरोहितों के अलावा क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र जातियों के कठोर बन्धन निर्धारित हुए। शूद्र अधिकांशतः अनार्य जनता थी जो सेवा कार्यों के निमित्त सामाजिक संरचना में शामिल कर लिए गए थे। इनमें में अनेक ऐसे थे जिन्हें जाति बाह्य भी समझा जाता था।[24] जाति का नियम शादी के नियमों से बंधा था। इसके अलावा खान-पान और व्यवसाय के कठोर नियम थे। अपनी जाति के बाहर शादी और व्यवसाय का स्वप्न देखना, हिन्दू व्यवस्था के भीतर संभव नहीं था और जाति बाह्य होने के डर से धर्मान्तरण हमेशा से मुश्किल रहा है। बुल्के लिखते हैं कि सामाजिक व्यवस्था में जातिवाद इतनी गहराई तक व्याप्त है कि इसे बदलने में अभी बहुत वक़्त लगेगा।

जन्म-जन्मान्तर तक व्याप्त कर्म-बंधन का सिद्धांत ब्राह्मण ग्रंथों के पुनर्जन्म की मान्यता से विकसित होता गया था। उनके अनुसार कर्म-बंधन का यह सिद्धांत व्यावहारिक रूप से लगभग हर हिन्दू मानता है। कर्म-बंधन का यह सिद्धांत कहता है कि किसी का वर्तमान अस्तित्व अपने सभी सुखों और दुखों के साथ पूर्वजन्म के कर्मों का फल है और भविष्य के जन्म का आधार। असंख्य आत्माएं पुनर्जन्म के इस बंधन में भटक रही हैं और इसकी न तो कोई शुरुआत है और न ही कोई अंत। परन्तु कुछ लोग हमेशा ही इस भवचक्र से मुक्ति पाते रहेंगे। बुल्के लिखते हैं कि इस प्रकार यह सिद्धांत संपूर्ण ब्रह्मांड को एक नैतिक सिद्धांत के अधीन करता है जहाँ हर अच्छे काम को पुरस्कृत और बुरे काम को दण्डित होना पड़ता है। इस ब्रह्मांडीय नियम के अन्दर देवता भी शामिल हैं। दर्शनों में इस कर्म बंधन पर अंतहीन बहसें हुई हैं। पर लगभग सभी इस बात पर सहमत हैं कि आत्मानुशासन या ईश्वर के आशीर्वाद से प्राप्त आत्मज्ञान से मुक्ति संभव है। बुल्के ने महसूस किया था कि पुनर्जन्म के इस बंधन का सिद्धांत बहुत हताशाजनक है। उन्होंने हिन्दू विश्वविद्यालय के अपने एक विद्यार्थी का एक संस्मरण सुनाया जिसने बुल्के के सामने द्रवित हृदय से अपने पापों का ज़िक्र किया और अंत में कहा कि उसने अपना यह जन्म गँवा दिया है, और अब इसकी भरपाई इस जन्म में संभव नहीं। हताशाजनक इस सिद्धांत के कारण वर्तमान जन्म ही अंतिम जन्म है, इसकी कल्पना से ही लोग डरते हैं। अपने पापों के प्रति इतने सचेत लेकिन पश्चाताप की कोई आशा नहीं। इस प्रकार हिन्दुओं की जीवन दृष्टि में एक चरम निराशावाद की झलक दिखती है।

बुल्के ने लिखा कि असंख्य देवी-देवताओं के बीच एक ही परमात्मा पर विश्वास केवल शिक्षित हिन्दुओं के बीच मान्य है। पर इन शिक्षितों के बीच बहुत कम ऐसे हैं जो शंकर को समझने का दावा कर सकते हैं, परन्तु शंकर की तरह ही वे एक निर्वैयक्तिक परमात्मा पर विश्वास करते हैं। अलग-अलग ईश्वर उस एक ही ब्रह्म के निरूपण हैं। भक्त कवियों के आधिभौतिक सार को वह इन शब्दों में रखते हैं : “जब वे अटकल लगते हैं तो उनका झुकाव अद्वैतवाद की तरफ होता है, लेकिन उनकी तीव्र धार्मिक अन्तःप्रज्ञा हमेशा एक वैयक्तिक ईश्वर की ओर उन्हें खींच लेती है।”[25] ईसा पूर्व छठी शताब्दी में उठे आस्तिक आन्दोलन के परिणामस्वरूप भगवद्गीता का जन्म होता है जिसे वे हिन्दुओं की सबसे पवित्र और लोकप्रिय पुस्तक मानते हैं। उनके अनुसार भगवद्गीता की अद्वैतवादी व्याख्याओं से हटकर जब हम उसका पूर्वग्रहहीन पाठ करते हैं, तो पाते हैं कि वहां कृष्ण के प्रति वैयक्तिक भक्ति और आत्मसमर्पण है, जो पूर्वजन्म के चक्र से मुक्ति का मार्ग दिखाता है। पुराणों की अपेक्षा भगवद्गीता में उच्च नैतिक मूल्यों की केन्द्रीयता है। बुल्के लिखते हैं कि एक गंभीर हिन्दू ने उन्हें कभी कहा था कि भारत में कृष्ण को इतना सम्मान और इतनी भक्ति कभी नहीं मिलती अगर वह पहली बार अपनी गोपाल लीलाओं के द्वारा जाना जाता। दक्षिण भारत के शैव संतों की शिव आराधनाओं में भी भगवद्गीता की तरह गंभीर और सच्ची आध्यात्मिकता के दर्शन होते हैं। बाद में यह सच्ची धार्मिकता रामभक्ति में ही सबसे सुन्दर और हृदयग्राही रूप ग्रहण करती है। इन सबके अलावा हिन्दू धर्म का मतलब हजारों की संख्या में घूमने वाले साधु-संन्यासियों, हजारों मंदिरों, सैकड़ों तीर्थों और लाखों भक्त हिन्दू स्त्रियों के दैनिक व्रतों और उपवासों के ज़िक्र के बिना अधूरा है। हजारों की संख्या में घूमने वाले और आम लोगों के दान पर निर्भर रहने वाले साधु आधुनिक हिन्दू धर्म की एक दुखद प्रवृत्ति को व्यक्त करते हैं। बुल्के के अनुसार भारत में एक ‘शिक्षित हिन्दू पुरोहित वर्ग’ का अभाव बहुत खटकने वाली बात है।

निष्कर्षतः बुल्के मानते हैं कि ईश्वर की खोज का जैसा भावावेगपूर्ण इतिहास हिंदुस्तान में मिलता है। उतना शायद विश्व के किसी देश में नहीं। परन्तु दूसरी ओर भारत के ऋषियों और ज्ञानियों ने हमेशा इस बात पर जोर दिया कि परमात्मा की प्रकृति को पूरी तरह जानने में मनुष्य की बुद्धि अक्षम है। महाभारत में कहा गया है कि शास्त्र और परंपरा हमें कई परस्पर विरुद्ध कथनों के सामने ला खड़ा करते हैं, हर ऋषि के पास अपना कोई भिन्न सिद्धांत है और धर्म का रहस्य गुहा में छिपा है। हिन्दू धर्म के इस संशयवाद को बुल्के आधुनिक हिन्दुओं में भी पैठा हुआ देखते हैं। भारत में व्याप्त धार्मिक तटस्थतावाद के लिए बुल्के आंशिक रूप से इस संशयवाद को जिम्मेदार ठहराते हैं। सभी धर्म समान रूप से अच्छे हैं, सारी नदियाँ समुद्र में मिल जाती हैं आदि निष्कर्ष इसी धार्मिक संशयवाद का परिणाम है।[26]

अवतारवाद और रामभक्ति दो ऐसी चीजें हैं जो उनके अनुसार आधुनिक हिन्दू धर्म को एक करती है। अवतारवाद की भावना बुल्के के लिए एक वैयक्तिक ईश्वर की चाह की भावना थी। दूसरे शब्दों में एक सच्चे एकेश्वरवादी धर्म की आन्तरिकता का इतिहास अवतारवाद का इतिहास है। हमने पीछे देखा कि शुक्ल जी के व्यावहारिक उभयस्वरूप ब्रह्म के सिद्धांत से उन्हें तोष नहीं था। भक्ति कविता में उन्होंने भक्तों की इस प्रबल आकांक्षा की ओर ध्यान दिलाया था। अवतार की इसी प्रबल आकांक्षा के कारण तुलसीदास पिछले कवियों से अलग थे। अनुमान और दर्शन में भले ही तुलसी ‘सगुनहि अगुनहि नहिं कछु भेदा’ कहते हों लेकिन वहां वैयक्तिक राम का आग्रह इतना प्रबल है कि कभी-कभी राम अपना परब्रह्म रूप छोड़कर मनुष्यों की तरह वास्तविक सुख-दुःख का अनुभव करने लगते हैं। यह महज लीला का आनंद नहीं है। वरन् वास्तविक मनुष्य में वास्तव होने की वेदना है। रामकथा सच्चे अवतार का पूर्वस्वप्न है। यह भारतीय ईसाइयत का आतंरिक इतिहास था जो वास्तव में तुलसीदास का हाथ पकड़कर ईसाइयत की वैश्विकता पा लेगा। बुल्के अवतारवाद के विकास में कृष्णभक्ति की प्रकृति पर विस्तार से चर्चा करते हैं। कृष्णभक्ति की अनैतिकता अन्य प्राच्यविद्याविदों और शुक्ल जी के साथ-साथ बुल्के की आलोचना का केंद्र बनी रही। इन नैतिक मूल्यों का संबंध समाज में यौनिकता के गहरे स्तरों से था, जिसे  हमने द्विवेदी जी की चर्चा के दौरान पीछे देखा है। बुल्के एकदम शुक्ल जी की तरह ही रामभक्ति पर कृष्णभक्ति के प्रभावों की आलोचना करते हैं। राम-सीता की माधुर्य भक्ति में राम और सीता के चरित्र की विकृति बुल्के के अनुसार खुद हिन्दू अवतारवाद की अवधारणा में अन्तर्निहित है। दूसरी ओर दार्शनिक व्याख्याओं के लिए जितने शास्त्र उपलब्ध हैं, वे सभी कृष्णभक्ति पर केन्द्रित हैं। कृष्णभक्ति से जुड़े इन दार्शनिक ग्रंथों में अवतारवाद को लीलावाद में बदल दिया है। शुक्ल इसी को ‘लोकमंगल की सिद्धावस्था’ कहते थे। बुल्के के अनुसार कृष्णभक्ति की दार्शनिक व्याख्याओं में नैतिकता की रक्षा का ऐसा प्रयास पहले भी हुआ था, लेकिन वह कभी भी प्रभावी नहीं हो सका। इसका कारण है कि भारतीय अवतारवाद की धारणा में नैतिकता और धार्मिकता के बीच हमेशा ही एक जरूरी पार्थक्य बनाये रखा गया है। ईश्वर का सत्-चित्-आनंद रूप जब धार्मिक व्यावहार के लिए प्रयुक्त होता है तब उसमें विकृति आती है। यहाँ नैतिक-अनैतिक के निर्णय का कोई प्रश्न ही नहीं रह जाता, क्योंकि सच्चिदानंद स्वरूप ईश्वर नैतिक-अनैतिक निर्णय से बाहर है। कहा जा सकता है कि व्यावहारिक सत्य के रूप में बुल्के के लिए मसीह का चरित्र सत्-चित्-आनंद स्वरूप नहीं बल्कि ‘सत्-चित्-वेदना’ के स्वरूप में वास्तविक होता है।

अवतार के जिम्मे कई अनैतिक कार्यों का ज़िक्र स्वयं महाभारत में था। कृष्ण का चरित्र वहां पूरी तरह नैतिक नहीं बना रहता। गीता में अवतार के दो उद्देश्य बताये गए हैं। पहला ईश्वर के प्रति पूर्ण समर्पण, दूसरा भक्त की मुक्ति। बाद की कृष्णाश्रयी धाराओं में पहली को छोड़ केवल दूसरी पर ध्यान दिया गया। जबकि बुल्के कहते हैं कि ईश्वर के प्रति पूर्ण समर्पण ही मुक्ति का रास्ता है। इसे छोड़ कर मोक्ष पर ध्यान लगाना नैतिकता और धार्मिकता के अलगाव को जन्म देना। दूसरे शब्दों में कहें तो पूर्ण समर्पण की नैतिकता मूल और आरंभिक है, उसे छोड़ कर सीधे मोक्ष पर ध्यान लगाने से विकृति आती है। मोक्ष एक प्रक्रिया है जिसकी पहली शर्त है पूर्ण समर्पण। यह पूर्ण समर्पण एक उच्च नैतिक मूल्यों वाले शहीदी चरित्र में मसीह ने वास्तव किया था।

वेदना और करुणा की कथाओं में मसीह के चरित्र का सार है। बुल्के पुनर्जागरण या पुनरुथान के मसीही शहादत को गोस्पेल की कथाओं में अभिव्यक्त मानते थे। इसलिए वहां दैनिक व्यावहारिक नैतिकता पर जोर था। हमने देखा था कि कृषक जीवन और औद्योगिक जीवन की विकृतियों के बीच वह मसीही करुणा का प्रचार ज़रूरी मानते थे। कारीगरी (आर्टीजनशिप) वाले सामाजिक सम्बन्धों से बनने वाली सामूहिकता में वह जीवन का आदर्श देखते हैं। गोस्पेल की कथाओं की कारुणिकता में अवतारवाद का सार देखना, जेसुइटपंथियों की अपनी मान्यता थी। वे जेसुइट सम्प्रदाय से थे और बाइबिल या न्यूटेस्टामेंट की साहित्यिकता के महत्त्व को जानते थे। कहने का अर्थ यह है कि बुल्के मसीही अवतारवाद की एक भिन्न परम्परा से आते थे। सामूहिक परिवार सामुदायिक जीवन की पहली पाठशाला मानी जाती है और इस जीवन के रोज़मर्रा के दृश्यों में करुणा की असंख्य अभिव्यक्तियाँ होती हैं। इस जीवन में मसीही करुणा सीमेंट की तरह काम करती है। बुल्के साहित्यिकता का उद्देश्य इस जीवन में मसीही करुणा के प्रचार प्रसार में देखते थे। मसीही अवतारवाद की इसी वैश्विकता के प्रचार के लिए बुल्के स्वयं मिशनरी कार्यों का एक आदर्श स्थापित कर रहे थे।[27] बुल्के का मानस उनके शब्दों में पूर्ण भारतीय हो गया था। इसी भारतीय मानस से वह भारतीय अवतारवाद की आलोचना करते हैं। परहित और विश्वमानवतावाद की विचारधारा चालीस और पचास के दशक में जोर-शोर से प्रचारित हुई थी। १९५६ के बाद रूसी कम्युनिस्ट पार्टी की आत्मालोचनाओं से भी इस विचारधारा को काफी बल मिला था। जीवन-जगत में हिंसा के विकृत और बर्बर रूपों को सामने कर सामाजिक व्यवस्था के रूप में औद्योगिक सभ्यता या पूंजीवादी सभ्यता से मुक्ति के सारे प्रयासों को निरर्थक घोषित किया जाने लगा था। पूँजी के भीतर एक बेहतर दुनिया की संभावना के लिए जेसुइट मिशनरी भी अपनी मसीहाई करुणा को लेकर बहुत सक्रिय थी। मसीही अवतारवाद के करुण पक्ष को लेकर संघों में समर्पित पुजारियों का एक नया दल उत्साहित होकर लग गया था। यह ईसाई धर्म की व्यावहारिकता और ईश्वर के राज्य के विकल्प का प्रचार करने में सबसे आगे था। ये मिशनरी उच्च नैतिक मूल्यों को सामने रख समाज में शान्ति और सुख की वास्तविकता के स्वप्न को यथार्थ करने की कोशिश कर रहे थे। इस मानवतावादी धार्मिक विचारधारा का प्रचार मार्क्सवाद को भी प्रभावित कर रहा था। ऐसे ही वक़्त में आरंभिक मार्क्स की रचनाओं को आधार बना कर पश्चिमी मार्क्सवाद की एक प्रवृत्ति के रूप में, मानवतावादी मार्क्सवाद का भी जन्म हुआ था। करुणा की सार्वभौमिकता का आधार श्रम के अपने अलगाव में निहित था। ‘आर्थिक और दार्शनिक पांडुलिपियों’ में मार्क्स ने पहली बार अमूर्त मनुष्य के बदले जीते-जागते श्रमशील मनुष्य की पूर्णता को दर्शन के केंद्र में लाया था। मनुष्य का अपने प्रजातीय सत्ता से अलगाव की व्याख्याओं में मनुष्य के आदिम अलगाव की व्याख्या देख, ईसाई धार्मिक विचारधारा ने मार्क्स की व्याख्याओं में अन्तर्निहित नैतिकता को ईसाई नैतिकता से एक कर दिया। इस वैचारिक परिदृश्य में ही एक करुण और अहिंसक मार्क्सवाद की कल्पना के लिए भी अवकाश मिल गया था। बुल्के व्यक्तिवाद या मसीह की वैक्तिकता की धारणा में हिंसा का पूर्ण निषेध देखते थे। पूंजीवादी व्यक्तिवादी विचारधारों की आलोचना के साथ-साथ वह दैवीय हिंसा की धारणा के भी आलोचक थे। बुल्के संघ के उद्देश्यों को यथार्थवादी मानते थे। संघ के भीतर व्यक्तिवाद की रक्षा को वह सत्य से जोड़ कर ही देखते थे। मसीह के करुण सन्देश की वास्तविकता का प्रचार-प्रसार कभी भी उन्हें व्यक्तिस्वातंत्र्य के आड़े आने वाला प्रतीत नहीं हुआ। बल्कि उन्हें लगता था कि संघ के भीतर ही व्यक्तिस्वातंत्र्य का सर्वोत्तम रूप सामने आता है। यहाँ स्वतंत्र सत्य के बल से संगठित होती है और अन्दर-बाहर का द्वैत पूर्णतः मिट जाता है। धार्मिकता और नैतिकता का यह संयोग उन्हें ईसाई नैतिकता की स्वाभाविक वैश्विकता प्रतीत होती थी। फ्लेमिश और भारतीय बुर्जुआजी के चरित्र की एकता में बुल्के को जनता के कष्टों के बीज दिखाई देते थे। जनता के कष्टों से निजात के लिए साधन और साध्य दोनों की पवित्रता आवशयक थी। हिंसा को नैतिक रूप से स्वीकार करना बुल्के के लिए असंभव था। साधन और साध्य दोनों की पवित्रता में वह धार्मिकता और नैतिकता की एकता देखते थे।

हिन्दू अवतारवाद में साध्य की पवित्रता से साधन की नैतिकता तय होती है। बुल्के ‘अंत भला तो सब भला’ के विचार को नहीं स्वीकार करते। साधन की अपवित्रता से साध्य भी अपवित्र हो जाता है। साध्य तभी न्यायसंगत हो सकता है जब साधन भी न्यायसंगत हो। साधन और साध्य की इस प्राकृत-कानूनवादी व्याख्या को बुल्के मसीही अवतारवाद की मौलिकता मानते थे। तुलसी के यहाँ हिंसा और युद्ध के बदले आत्मसमर्पण की केन्द्रीयता थी। बुल्के ने कई ऐसे प्रसंगों का ज़िक्र किया है जहाँ तुलसी हिंसा को आत्मसमर्पण की नैतिक सीमा में मोक्ष का कारण बना देते हैं। हिंसा को मुक्ति का कारण बताकर उसे नैतिक बनाने के इस प्रयास में बुल्के भारतीय अवतारवाद की सीमा देखते थे। बुल्के ने भारतीय अवतारवाद और ईसाई मसीही अवतारवाद (इनकार्नेशन) के बीच पांच समानताएं गिनाई हैं:-[28]

  • मसीही और भारतीय दोनों अवतारों का मतलब है- धरती पर ईश्वर का मुक्त प्रवेश।
  • दोनों तंत्र यह बताते हैं कि इस मुक्त प्रवेश से ईश्वर अपना पारब्रह्म चरित्र नहीं खोता। अर्थात् उसकी पारलौकिकता या सर्वभूतात्मकता का लोप नहीं हो जाता। उसका ईश्वरत्व अविकृत रहता है।
  • दोनों तंत्र अवतार के उद्देश्यों में अभिन्न हैं- ‘धर्मसंस्थाप्नाय’। दोनों तंत्रों में ईश्वर के परमप्रेमनिधान और अनंतकरुणानिधान रूप को बहुत महत्त्व दिया गया है। वह मनुष्य की मुक्ति के लिए अवतरित होते हैं और मुक्ति को सरल बना देते हैं। भगवान् मनुष्य का सुखदाता, सखा और सहचर हो जाता है।
  • परमदयालु करुणानिधान के प्रति पूर्ण समर्पण और अवतार के प्रति प्रेममयी श्रद्धा या भक्ति दोनों तंत्रों में है।
  • मोक्ष का अर्थ दोनों जगह अनंतकाल तक भगवान् के साथ आनन्दमय सान्निध्य में है। (बुल्के के अनुसार यह शंकर की वही बात है जहां ‘आत्मचेतना’ लुप्त हो जाती है।)

दोनों तंत्रों के बीच मौलिक अंतर इस प्रकार है:-

नर प्रकृति के यथार्थ को लेकर:

भारतीय अवतार की परम्परा को वह ईसाई धर्म में ‘ईशदर्शन’ (थेईफैनी) की परम्परा की तरह देखते हैं। मसीह पूर्ण ईश्वर और पूर्ण मनुष्य दोनों है; पवित्र त्रित्व का दूसरा व्यक्ति जो ईश्वर और नर प्रकृति को अवधारणा में एक करता है। नर प्रकृति बनती है वास्तविक आत्मा और शरीर से, उसे दुःख या पीड़ा की वास्तविक अनुभूति होती है। वह सीमित और ससीम है। भारतीय अवतार नर प्रकृति के क्षेत्र में कभी वास्तविक नहीं होता। उसका शरीर, जब वह नर रूप में आता है, तब भी वास्तविक हाड़-मांस से बना शरीर नहीं होता बल्कि शुद्ध आध्यात्मिक पदार्थ का बना होता है। इसलिए वह प्रकृति के नियमों से बाहर होता है। वह वास्तविक मनुष्य नहीं होता। इसलिए उसकी सारी पीड़ा, सारे सुख और उसके सारे नैतिक-अनैतिक कर्म सब अभिनय में बदल जाते हैं। अवतार वहां लीला मात्र है। तुलसीदास के यहाँ भी अक्सर इस बात पर जोर दिया गया है कि राम स्वयं कष्ट नहीं भोग रहे बल्कि मंच के अभिनेता की तरह अनुभूतियों का प्रदर्शन मात्र कर रहे हैं और शब्द कह रहे हैं। बुल्के तुलसी को उद्धृत करते हैं:-

भगत हेतु भगवान् प्रभु, राम धरेउ तनु-भूप।

किये चरित पावन परम प्राकृत नर अनुरूप।।

जथा अनेक वेश धरि नृत्य करइ कर करेई ।

सोई सोई भाव देखावाइ, आपुन होइ न सोइ।।

पर बुल्के के अनुसार लोकप्रिय विश्वास में यही चला आया है कि राम का वास्तव में जन्म हुआ था। वह मनुष्यों के बीच जिंदा थे और उन्हीं के बीच उनकी मृत्यु हुई। एक मौके पर तो तुलसी भी अपना दर्शन भूल गए और कहा कि भगतों के हित राम ने अनेक कष्ट झेले हैं:-

राम भगत हित नर तनु धारी।

सहि संकट किए साधु सुखारी।।

हिन्दू दर्शन में यह सर्वस्वीकृत है कि ईश्वर कभी वास्तविक मनुष्य नहीं हो सकता। उसकी प्रकृति कभी नर प्रकृति नहीं हो सकती। अपने इस निष्कर्ष के समर्थन में उन्होंने हिन्दू दर्शन के विख्यात विद्वान् राधाकृष्णन को उद्धृत किया: “एक कष्ट भोगता ईश्वर, काँटों के ताज का देवता कभी धार्मिक आत्मा को संतोष प्रदान नहीं कर सकता।” बुल्के इस मत से पूरी तरह असहमत हैं और कहते हैं कि पिछली बीस सदियों का इतिहास गवाह है कि एक कष्ट भोगता ईश्वर धार्मिक आत्मा को शांति दे सकता है।

बुल्के आगे लिखते हैं कि “क्रिसमस की कहानियां मनुष्यों के हृदय को ज्यादा आसानी से पकड़ लेती हैं बनिस्पत पुनरुथान के आख्यान के; गुड़ फ्राइडे का भावेग मनुष्य हृदय पर अपनी छाप कहीं गहरे छोड़ता है, बनिस्पत ईस्टर सन्डे की महिमा के; ईसाई श्रद्धा सलीब से ज्यादा प्रेरित होती है बनिस्पत मसीह के चमत्कारों से; महान् परीक्षाओं के वक़्त हमें शान्ति स्वर्ग के विचारों से नहीं बल्कि कलवारी के सलीब से मिलती है; सलीब हमें आंसू बहाने पर मजबूर करता है न केवल प्रेम के बल्कि सहानुभूति और करुणा के भी।”[29] जेसुइट मत के साथ-साथ यह बुल्के का अपना अनुभूतिगम्य ईसाई धर्म है। यहाँ चमत्कार या पुनरुत्थान के बदले सहानुभूति और करुणा का जीवन मसीही अवतार के केंद्र में है। ईश्वरीय प्रेम पूरी तरह मसीही अवतार में ही प्रकट होता है। वहां मनुष्य के लिए मनुष्य की तरह मसीह खुद पीड़ा सहता हुआ मनुष्य के जीवन के साथ है। उस मनुष्य के लिए जिसे उसने ‘कुछ नहीं’ से पैदा किया। कृष्ण के चरित्र में ऐसा कुछ नहीं है। आत्मविसर्जन वाला भारतीय प्रेम का आदर्श भी ईसा में ही है।

मोक्ष या उद्धार की प्रकृति:

  •  ईसा ने नरप्रकृति धारण किया और सलीब पर अपने बलिदान द्वारा पाप और मृत्यु से इसे मुक्ति प्रदान किया। इससे मनुष्यों की आत्मा और उसका शरीर दोनों उच्चतर भूमि तक उठ गए और वह दैवीय जीवन में भागीदारी के योग्य हो गए। दैवीय जीवन में भागीदारी को बुल्के ईश्वर के चिर सान्निध्य की तरह देखते हैं। भारतीय अवतार तंत्र में नर प्रकृति के उद्धार की जगह नहीं है और न ही वहां शरीर के पुनरुत्थान की महिमा है। “जैसे ईश्वर मनुष्य नहीं हो सकते वैसे ही मनुष्य (यानी कि मानव प्रकृति) भी कभी ईश्वरत्व नहीं पा सकती।
  •  ईसा ने एक बार विश्व का उद्धार कर हमेशा के लिए उसका उद्धार कर दिया और अंत में सब कुछ ईसा में वापस स्थित हो जाएगा। वह मनुष्य इतिहास का संहार है। दूसरी ओर हिन्दू अवतार तंत्र में विश्व अनादि और अनंत है। वहां अवतारों की ज़रूरत हमेशा बनी रहेगी। अनंत काल तक उसका हर कल्प में आविर्भाव होता रहेगा और हर बार कुछ आत्माएं पुनर्जन्म के बंधन से मुक्ति पाते रहेंगे। भवबंधन में पड़े असंख्य जीवों के साथ यह प्रक्रिया चलती रहेगी।

नैतिक और धार्मिक चरित्र:

  •  नीतिशास्त्र: स्वयं नर प्रकृति में ईसा का जीवन नैतिक जीवन का आदर्श है। इस अर्थ में कर्तव्य के नियमों के पालन का वह जीता जागता उदाहरण है। क्योंकि वह ईश्वर का अवतार था इसलिए पापी नहीं हो सकता था। इस प्रकार वह प्रकृति और चुनाव दोनों ही स्थितियों में पाप-मुक्त था। “आखिर कौन मुझ पर पाप का आरोप लगाएगा?” भारतीय अवतार तंत्र में ईश्वर स्वयं धर्म के अनुपालन से स्वतंत्र है। वह पाप-पुण्य से परे है। वह स्वयं नैतिक मानदंडो से ऊपर और स्वतंत्र है। बुल्के उदाहरण देते हैं- परशुराम ने क्षत्रियों से बदला लेने के लिए २१ बार उनकी हत्या की, वाल्मीकि की कविता में राम का चरित्र उदात्त है पर बाद के प्रक्षेपों और अन्तःक्षेपों में कई बातें उसके चरित्र से जुड़ गयी जो न्यायसांगत नहीं है, जैसे बालि-वध, सीता की अग्नि-परीक्षा आदि। बाद के भक्ति सम्प्रदायों में उन्हें कृष्ण का अनुकरणकर्ता दिखाया गया। कृष्ण का गोपियों के साथ रास कहीं से भी नैतिक नहीं। बुद्ध अवतार तो गलत शिक्षाओं के प्रचार के लिए ही माना गया है। बुल्के लिखते हैं कि धर्म और नीतिशास्त्र का अलगाव भारतीय अवतारवाद का ‘खतरनाक सिद्धांत’ है। भक्ति संप्रदाय के सिद्धान्त में भी इस अलगाव की व्याख्या मिलती है। इस पृथकता के कारण ही कई सारे भक्ति संप्रदाय भ्रष्टाचार के गढ़ बनते गए। इसकी स्वीकृति स्वयं रामानुज के यहाँ है। रामानुज ने कहा था कि यह सही है विष्णु को बारिश से बचने के लिए अपने सहयोगियों के साथ शिव-मंदिर में शरण लेनी पड़ी थी, पर इसका यह मतलब नहीं कि भक्त भी शैवों की मदद ले। रामानुज ने कहा अगर राजा अपनी किसी गणिका के साथ सम्भोग करता है, तो इसका यह मतलब नहीं कि राजा की पतिव्रता स्त्री भी अपने किसी सभासद से सम्भोग कर सकती है। गोविन्दाचार्य ने इसका मतलब बताते हुए कहा कि राजा या भगवान् कोई काम करते हैं तो इसका मतलब यह नहीं कि भक्त भी वैसा ही काम करने को स्वतंत्र है। भक्त हर काम में भगवान् का अनुकरण नहीं कर सकता। बुल्के रामानुज सम्प्रदाय की उस अद्भुत मान्यता का उल्लेख करते है, जहाँ भक्त भगवान् या उनके भक्त को प्रसन्न करने के लिए पाप करता है। रामानुज के अनुरंजन के लिए एक महिला अपना शरीर भी बेचने को तैयार हो जाती है। उसका तर्क था कि “रामानुज जैसे अतिथि के सम्मान के लिए मैं व्याभिचार को भी प्रस्स्तुत हूँ… मैं अपना शरीर बीच कर उस शरीर से उनकी भक्ति करुँगी। क्योंकि स्वयं भगवान् ने कहा है कि- मेरे लिए किये जाने वाले तुम्हारे पाप भी पुण्य हो जाते हैं, जबकि मेरे सन्दर्भ से हीन तुम्हारे सरे गुण भी व्याभिचार मात्र हो जाते हैं।” पतिव्रत और स्त्रीधर्म के इस दुहरे चरित्र को भारतीय भक्ति में और इस प्रकार हिन्दू अवतार तंत्र में जगह प्राप्त है। भारतीय अवतार तंत्र में हर जगह इस धार्मिक और नैतिक द्वैत का पता मिलता है।
  •  धार्मिकता: वास्तविक मनुष्य की तरह ईसा के पास स्वयं की एक अपनी धार्मिकता है। वह पापमुक्त है फिर भी ईश्वर की प्रार्थना करता है। वह सभी वस्तुओं में स्वयं को ईश्वर के प्रति समर्पित करता है। “मैं पिता से आया हूँ”, “मैं पिता में हूँ”, “मैं पिता के पास जाता हूँ”। भारतीय अवतार तंत्र में अवतार के लिए स्वयं साधना की जगह नहीं है। इसलिए वह मनुष्यों की साधना या उसके आध्यात्मिक जीवन की वास्तविक प्रेरणा नहीं हो सकता। न ही धार्मिक और न ही नैतिक आचरण में।

ऐतिहासिकता:

ईसा एक ठेठ ऐतिहासिक चरित्र है और गोस्पेल की कहानियों में उसके जीवन के ऐतिहासिक तथ्यों का पता मिलता है। बुल्के कहते हैं कि ईसा के चरित्र को मिथ बनाने का प्रयास धर्म के दुश्मनों का है ताकि ईसायत को धर्म के नाम पर बुरा-भला कहा जा सके। दूसरी ओर भारतीय अवतार तंत्र में अवतार की सारी कहानियाँ मिथ हैं। बुल्के राम, परशुराम या कृष्ण की ऐतिहासिकता को अस्वीकार न करते हुए भी इनकी कथाओं को बाद की कल्पना और विकास बताया है। इन चरित्रों ने खुद को कभी दैवीय नहीं कहा। रामकथा के ऐतिहासिक विकास का निरूपण कर उन्होंने स्वयं इन कहानियों के विकास समझने की कोशिश की थी। इन कहानियों के बदलाव या फेर-फार के पीछे बुल्के किसी ठोस ऐतिहासिक चेतना का अभाव पाते हैं। अर्थात् इन कहानियों में ऐतिहासिकता की रक्षा के लिए किसी ठोस केन्द्रीय सत्ता का आभाव है।

बुल्के भारतीय अवतारों की कल्पना में एक सच्ची धार्मिक अन्तःप्रेरणा देखते हैं। एक शुद्ध और सहज मानवीय आकांक्षा, जहाँ ईश्वर मनुष्यों के पापमय, दुखमय, कष्टमय जीवन के उद्धार के निमित्त ही धरा-धाम पर अवतरित होता है। यद्यपि यह सही है कि अवतार की कहानियाँ मिथकीय हैं और उनमें ऐतिहासिकता का अभाव है परन्तु “यह वासना, यह अन्तःप्रेरणा, ईश्वर के प्रति यह विश्वास, यह आस्था गलत नहीं है, ईश्वर के अवतार की आकांक्षा में वे सही थे। यहाँ तक कि उनके मिथ भी पूरी तरह गलत नहीं हैं; वे सभी ईसा मसीह में वास्तव हुई हैं। उनके (भारतीयों के) सबसे सुन्दर स्वप्न की अपेक्षा यह यथार्थ कहीं ज्यादा उदात्त है- ईश्वर पूर्ण रूप से मनुष्य बन कर सारी पीड़ा को वास्तव में भोगता हुआ अपनी मृत्यु के बाद सभी मनुष्यों का उद्धार संभव करता है। यह हम पर निर्भर है कि हम अगाध श्रद्धा और सच्ची सहानुभूति के सहारे दिखा पायें कि उनके स्वप्नों का यथार्थ ही हमारा ईसा मसीह है।”[30]

अवतारवाद और अवतार की भक्ति के बारे में ये सारी बातें बुल्के अपने जेसुइट संघ बंधुओं के लिए कर रहे थे। निश्चित रूप से धर्म के प्रचार के लिए सच्ची प्रेरणा ज़रूरी थी, और बुल्के ईसाई धर्म और अपनी जेसुइट व्याख्या का निचोड़ भारतीय और ईसाई अवतार के सिद्धांतों में अंतर करते वक़्त सामने रख रहे थे। दो चीजें जिस पर बुल्के का सबसे ज्यादा जोर है, वह है हिन्दू धर्म में नैतिकता और धर्म का अलगाव तथा अवतार का अवास्तविक या अनैतिहासिक स्वरूप, जिससे प्रेम या भक्ति का वास्तविक इहलौकिक आधार संभव नहीं हो पाता। दूसरे शब्दों में कहें तो रोज़मर्रा के जीवन में शामिल आचार-संहिता का अभाव जो एक ही साथ व्यक्तिगत और सार्वभौमिक दोनों हो। पूर्ण पवित्र आचार-संहिता के इस अभाव के कारण हिन्दू समाज में जाति और वर्णव्यवस्था की जगह बची हुई है, इसे बुल्के और जेसुइट संघ के दूसरे सदस्य बखूबी जानते थे। मिशनरी का काम मुख्यतः समाज के निचले तबकों और जनजाति-आदिवासी जनसंख्या के बीच था। उनके अनुभव में भारतीय वर्णव्यवस्था का चरित्र स्पष्ट था। धर्म और नीतिशास्त्र के पृथकता की चर्चा, हिन्दू धर्म की आलोचना करते समय पीछे भी यूरोपीय प्राच्याविद्याविद और ईसाई मिशनरियां करती आई थीं। यहाँ तक कि शुक्ल जी भी धर्म की चर्चा मुख्यतः नीतिशास्त्र के संबंध में ही करते हैं। उच्च नैतिक मूल्यों के मामले में बौद्ध धर्म का महत्त्व भी यूरोपीय विद्वानों ने स्वीकार किया था। पर बौद्ध धर्म के प्रति शुरूआती आकर्षण धीरे-धीरे मध्यकालीन वैष्णव भक्ति के आकर्षण में बदल गया था। बुल्के जिस समय जेसुइट संघ के आदर्श प्रचारक के रूप में धर्म का उच्च आदर्श सामने रख रहे थे, उसी वक़्त अंबेडकर बौद्ध संघ के पुनरुत्थान और संघ के मिशनरी स्वरूप का आदर्श बताते समय जेसुइट कार्यकर्ताओं का उदाहरण दे रहे थे।[31] बुल्के ने हिन्दू धर्म में सुयोग्य पुरोहित-तंत्र का अभाव देखा था। अंबेडकर भी भिक्षु संघ के पुनरुत्थान के लिए जेसुइट मिशनरी की तरह एक सुयोग्य पुरोहित तंत्र की ज़रूरत महसूस करते थे। विद्वता, सामजिक सेवा, और उच्च नैतिक जीवन के संयोग के बिना भिक्षु संघ की पुरानी महिमा का नवोत्थान अंबेडकर असंभव मानते थे। बौद्ध धर्म के प्रति आस्था के प्रचार के लिए संघ के सदस्यों को जिस निःस्वार्थ सेवा और वैज्ञानिक चेतना को साधना ज़रूरी था, अंबेडकर उसका प्रत्यक्ष उदाहरण एशिया में ईसाई धर्म के प्रचार और उनमें जेसुइट पादरियों या संघ के सदस्यों के योगदान में देखते हैं। ऐसी ही तुलना वह पुराने नालंदा और तक्षशिला के उदाहरणों को सामने रख कर भी करते हैं।

अंबेडकर के लिए धर्म और धम्म के बीच सबसे बड़ा फर्क नैतिकता को लेकर ही था। हिन्दुवाद में धर्म और नैतिकता का अलगाव था जबकि धम्म और कुछ नहीं नैतिकता थी। बौद्ध धर्म नैतिकता की सार्वभौमिकता और भिक्षु-संघ के रूप में नए समाज का निर्माण, इन दोनों को साथ-साथ लेकर चलता है। अंबेडकर धम्म या बुद्धवाद को ‘प्रज्ञा और करुणा’ पर आधारित समानता की वैश्विक संस्कृति का वास्तविक इहलौकीकरण मानते हैं। वहां कोई ईश्वर या अवतार नहीं है। वह शुद्ध विश्वबंधुत्व है जो कि नैतिकता है और वही धम्म है। अंबेडकर भक्ति को राजनीतिक जीवन में ‘व्यक्ति-पूजा’ की प्रवृत्ति की तरह देखते हैं जिसका अंतिम रूप तानाशाही है। उनके अनुसार किसी के प्रति हमारी अगाध श्रद्धा एक चीज़ है लेकिन उसकी आज्ञा का पालन बिलकुल दूसरी चीज़। श्रद्धा किसी उच्च आदर्श के शरीर रूप के प्रति होती है और यह महत्वपूर्ण चीज़ है, जबकि उसका आज्ञापालक होना दासत्व है।[32] हमने पीछे देखा था कि बौद्ध धर्म में हृदय के आभाव और उसके शुष्क बुद्धिवाद को कारण बता कर उसकी लोकप्रियता के ह्रास को समझा गया था। अंबेडकर को बौद्ध पुनरुत्थान के लिए लोकप्रियता एक बड़ी चुनौती लगती थी। बौद्ध भिक्खु संघ के आदर्श विकास के लिए क्या ज़रूरी था और क्यों ज़रूरी था, इसे अंबेडकर स्पष्ट करते हुए सबसे पहली और सबसे महत्वपूर्ण चीज़ बताते हैं- एक बौद्ध बाइबिल का लिखा जाना। दूसरी चीज़ है भिक्खु संघ के उद्देश्य, संगठन और उद्देश्यों को बदलना और तीसरी एक विश्व बौद्ध मिशन की स्थापना। ये सब बातें वह भिक्खु संघ के सदस्यों को संबोधित करते हुए कह रहे थे। अंबेडकर कहते हैं कि हर महान् धर्म आस्था या विश्वास पर टिका है। लेकिन आस्था केवल शुद्ध विमर्श या अमूर्त्त डॉग्मा पर नहीं टिक सकती। शुष्क सिद्धांत कथनों से आस्था पैदा नहीं होती और बिना आस्था के धर्म का प्रचार संभव नहीं होता। कल्पना को टिकने के लिए कुछ न कुछ चाहिए- मसलन कोई मिथक, कोई महाकाव्य या गोस्पेल (जीवनचरित या लीलाचारित)। ‘जिसे पत्रकारिता की भाषा में कहानी कहते हैं’। अमूर्त्त विश्वासों को मूर्त्त किये बिना या किसी रसमय साहित्यिक अभिव्यक्ति के बिना आस्था का टिकना मुश्किल है। इसलिए अंबेडकर को पुराने धम्मपद के बदले एक सरस, प्रवाहमयी, हृदयग्राही और एक ‘सम्मोहिनी शक्ति’ से युक्त, हर जगह अपने साथ रखने सकने योग्य, सुवह्य ‘बुद्ध चरित’ की सख्त ज़रूरत महसूस हो रही थी। वह एक ऐसे ‘बुद्ध-चरित’ में चार चीजें आवश्यक मानते थे। :- १.बुद्ध का संक्षिप्त जीवन परिचय, २. चीनी धम्मपद,३. बुद्ध के कुछ प्रमुख संवाद, ४. बौद्ध उत्सव, जन्म-मृत्यु, विवाह आदि के संस्कार। बाइबिल के गोस्पेल के उच्च साहित्यिक गुणों के बारे में हमने पीछे चर्चा की थी और आस्था के महत्त्व को भी रेखांकित किया था। साहित्यिक आस्था एक चीज़ है और धार्मिक एकदम दूसरी। अंबेडकर धर्म के प्रचार के लिए आस्था और आस्था के लिए साहित्यिकता की भूमिका दोनों महत्वपूर्ण मानते थे। साहित्यिकता धार्मिक आस्था के सन्दर्भ में यहाँ वैसे ही है जैसे बुल्के के लिए। दूसरे शब्दों में, अंबेडकर को भी ‘धर्म की रसात्मक अभिव्यक्ति’ की ज़रूरत महसूस हो रही थी। इस अर्थ में यह भक्ति साहित्य था, और धर्म का प्रचार भक्ति के बिना असम्भव था। भक्ति एक ‘सम्मोहिनी शक्ति’ थी, जो खुद धर्म के वशीभूत थी। बाइबिल का यह रूप बुद्ध को लगभग अवतार बनाता है। ऐतिहासिक तो बुद्ध थे ही।

भिक्खु संन्यासी या साधु की तरह संसार से विरक्त रहने वाला व्यक्ति नहीं होता बल्कि इसी जीवन के भीतर संघर्षरत होता है। इस जीवन के अतिरिक्त उसे किसी पारलौकिकता की कामना नहीं होती। बुल्के जिस अर्थ में कर्मबन्धन और पुनर्जन्म के विश्वास के कारण कर्म की निष्कामता को हिंन्दु धर्म और अवतारवाद का दोष मानते थे, अंबेडकर भी उन्हीं अर्थों में ‘मुक्ति की इहलौकिकता’ के लिए एक ही जीवन और उसी जीवन में मुक्ति के बौद्ध-मत को संघ के भिक्खु का आदर्श बताते हैं। मुक्ति के लिए केवल पैशन नहीं बल्कि धर्म के संगठित प्रचार की सक्रियता ज़रूरी थी। वास्तव में एक नए समाज का निर्माण उनका उद्देश्य था। बुद्ध को इन्हीं अर्थों में संघ की ज़रूरत महसूस हुई थी। अंबेडकर कहते हैं कि साधारण मनुष्य केवल आस्था के सहारे मुक्ति नहीं पा सकता। उसे वास्तविक सामाजिकता में बदलने के लिए ही संघ की स्थापना की गयी है। एक ऐसा मॉडल समाज जससे सामान्य जन प्रेरणा पा सके, शिक्षा पा सकें और धम्म की वास्तविकता में उनकी आस्था दृढ़ होती जाये। दूसरे शब्दों में कहें, तो बौद्ध धर्म का इहलौकिक समाजीकरण संभव हो पाए। यह संपूर्ण धर्मान्तरित सक्रिय समाज का आदर्श बन सके। इसी आवश्यकता के चलते बुद्ध ने संघ की स्थापना की और उसे विनय के नियमों से बाँध दिया। विनय के नियम संघ के सामाजिक जीवन की नैतिक आचार-संहिता थी।

अंबेडकर कहते हैं कि इसके अलावा भी संघ का एक महत्वपूर्ण उद्देश्य था। वह संघ को बौद्धिकों का एक ऐसा संगठन बनाना चाहते थे जो साधारण जनों का सच्चा और निष्पक्ष निर्देशन कर सके। संघ सक्रिय बौद्धिकों का संगठन था। इन बौद्धिकों का काम शुद्ध मनन-चिंतन करना नहीं बल्कि समाज सेवा और धम्म की सच्ची शिक्षा का प्रचार करना है। ये दोनों काम अलग-अलग संभव नहीं हैं। उसी प्रकार वैज्ञानिक चेतना के प्रसार के बिना धम्म की रक्षा और उसका प्रसार असम्भव है। भिक्खु अपने समय के ज्ञान-विज्ञान के अधुनातन निष्कर्षों का और उसकी प्रामाणिकता और सत्यता का प्रचार कर, मिथ्या विचारधाराओं के धुंध को जनता के चित्त से दूर करता है। उनका कहना था कि इस महती उद्देश्य के लिए बुद्ध भिक्खुओं के लिए संपत्ति का निषेध करते हैं। बुद्ध जानते थे कि स्वतंत्र चिंतन और निष्पक्ष विचारों के लिए सबसे बड़ी बाधा संपत्ति थी। जनता की स्वतंत्र सेवा के लिए संपत्ति का त्याग बहुत ज़रूरी था। बुद्ध भिक्खुओं को शादी न करने और आजीवन ब्रह्मचर्य के पालन का निर्देश भी इसी सेवा के लिए देते थे। हालाँकि संघ में स्त्री और पुरुष की समानता का सिद्धांत था। अंबेडकर ब्रह्मचर्य के उच्च आदर्श और स्त्री-पुरुष समानता के सिद्धांत के बीच कोई अंतर्विरोध नहीं देखते थे। वैसे भी बुद्ध के समय तक स्त्रियों को भी संपत्ति माना जाने लगा था!

 बौद्धिकों के सक्रिय संगठन के मॉडल के लिए ही वह जेसुइट संघ से सीखने की सलाह दे रहे थे। अंबेडकर लिखते हैं कि पीड़ित मानवता की सेवा के लिए अगर आज कोई कुछ करना चाहता है तो उसके सामने ‘राम कृष्ण मिशन’ को छोड़ कर और कोई रास्ता नहीं मिलता। ऐसे में संघ की आवश्यकता समाज के अंदर महसूस भी हो रही है लेकिन कोई और उदाहरण समाज के सामने नहीं है। ईसाई मिशनरियों के वह खिलाफ थे क्योंकि वहां भी ईश्वर मौजूद था। धम्म के सिवा विश्वमानवता के सामने कोई और रास्ता संभव नहीं दिख रहा था। इसलिए अंबेडकर हजारों श्रद्धालुओं के बदले थोड़े लेकिन आस्थावान-विद्वान्-सक्रिय भिक्खुओं की परम आवश्यकता को सामने रह रहे थे। उच्च शिक्षित ऐसे भिक्खुओं की एक छवि हम बुल्के में भी देखते हैं जिसकी तरफ अंबेडकर इशारा कर रहे थे। क्या यह केवल संयोग है कि केदारनाथ सिंह के भक्त हनुमान् और अंबेडकर के उच्च शिक्षित भिक्षु दोनों रूपों में बुल्के की छवि हमारे सामने प्रकट होती है !

 बुल्के के लिए नैतिकता पूरी तरह धार्मिक थी। वह राज्य के विकास के साथ इसी धार्मिकता को स्वर्ग के राज्य में रूपांतरित देखना चाहते थे। अंबेडकर की तरह यहाँ भी नैतिकता और धार्मिकता में कोई फर्क नहीं था। धर्म स्वयं में पवित्र और सार्वजनीन नैतिकता है। विश्वबंधुत्व स्वयं नैतिकता है। विश्वबंधुत्व की इस पवित्र नैतिकता के दर्शन बुल्के को तुलसी के मानस में होता है। वह बुद्ध के बदले उत्तरभारत की जनता के बीच इस पवित्र सामान आचार-संहिता की पूर्व-उपस्थिति और उसके सर्वोत्तम विकास का पूर्व-स्वप्न तुलसीदास के यहाँ देखते हैं। उनके लिए तुलसी स्वयं एक आश्चर्य थे। वैसे ही जैसे इवोर ब्राउन के लिए शेक्सपियर।[33]

सन्दर्भ :

[1] फ़ादर क्विराइन, गीदो गैज़ेल, डा. बुल्के स्मृति ग्रन्थ (सं. दिनेश्वर प्रसाद और श्रवण कुमार गोस्वामी), पृष्ट २१२-२१३, डा. बुल्के स्मृति ग्रन्थ समिति, रांची, १९८७

[2] फ़ादर कामिल बुल्के : भारतीय संस्कृति के अन्वेषक, शैल सक्सेना, पृष्ठ १७, प्रिय साहित्य सदन, दिल्ली, २०१४

[3] वही, पृष्ठ ३४

[4] वही, पृष्ठ ३७

[5] बुल्के, ‘एक ईसाई की आस्था, हिंदी प्रेम और तुलसी’, हिंदी चेतना, अंक- जुलाई-अगस्त २००९, पृष्ठ- ३३

[6] बुल्के स्मृति ग्रन्थ, पृष्ट ४३८

[7] वही.

[8] वही, पृष्ठ ४४०

[9] समाज और साहित्य, मुक्तिबोध रचनावली, खंड पांच, पृष्ठ ५४-५५

[10] रामकथा, कामिल बुल्के, पृष्ठ ५७९; हिंदी परिषद् प्रकाशन, इलाहबाद विश्वविद्यालय, इलाहबाद– २०१२

[11] वही, पृष्ठ ५८१

[12] मानस कौमुदी, डा. कामिल बुल्के, डा. दिनेश्वर प्रसाद; पृष्ठ ४-५, अनुपम प्रकाशन, पटना – १९८४

[13] रामकथा, पृष्ठ ५३४

[14] हनुमान् की जन्मकथा, बुल्के, हिंदी अनुशीलन, वर्ष ३, अंक ३, २००७ विक्रमी

[15] रामकथा, पृष्ठ ५४९

[16] वही, पृष्ठ ७८

[17] वही

[18] वही

[19] देखें शेल्डन पोलॉक, द लैंग्वेज ऑफ़ द गॉड्स इन द वर्ल्ड ऑफ़ मेन, विशेष रूप से अध्याय पांच, यूनिवर्सिटी ऑफ़ कैलिफोर्निया प्रेस, लन्दन २००६

[20] रामकथा, पृष्ठ ५९१

[21] बुल्के, हिंदी के प्रति हिंदी भाषियों का कर्तव्य, पृष्ठ ४०

[22] वही

[23] रामकथा एंड अदर एसेज, कामिल बुल्के, (सं.) डा. दिनेश्वर प्रसाद, पृष्ठ १५८, वाणी प्रकाशन, दिल्ली २०१०

[24] बुल्के लिखते हैं कि इन जाति बाह्य वर्गों के आधुनिक उत्तराधिकारी करीब पचास मिलियन की आबादी वाले हैं. बीस मिलियन से अधिक आबादी उन जनजातियों की है जिन्हें आर्य जीत नहीं पाए और जो आने वाली अनेक सदियों तक खुद क आर्यों के संपर्क से दूर जंगलों में अपने आप को बचाती और रहती आ रही हैं. जनजातियों या आदिवासियों की इतिहास विहीन छवि बुल्के के लिए भी मान्य थी. इसके हिसाब से ही वह आदिवासियों की समस्याओं पर विचार करते हैं. देखें, वही, पृष्ठ-१५७

[25] वही, पृष्ठ- १६०

[26] “I have often tried to make them realise their resposibility towards the truth by saying; “You believe in rebirth, I believe that there is no rebirth, one of us is wrong.” When they hear this they are shocked, shake their head and answer: “It is not as simple as all that.”” pp 162

[27] यह बात ध्यान देने लायक है कि ग्राम्शी जेसुइट ईसायत को लोकप्रिय जनता के लिए शुद्ध नार्कोटिक कहते हैं. देखें: प्रिज़न नोटबुक्स. पृष्ठ-३३८.

[28] अवतार एंड इनकार्नेशन, रामकथा एंड अदर एसेज, कामिल बुल्के, (सं.) डा. दिनेश्वर प्रसाद, पृष्ठ -१६८-१९४. वाणी प्रकाशन, दिल्ली २०१०

[29] वही- १७८.

[30] वही.

[31] “We want fewer Bhikkhus and we want Bhikkhus highly educated, Bhikkhu Sangha must borrow some of the features of the Christian priest-hood particularly the Jesuists. Christianity has spread in Asia through service-educational and medical. This is possible because the Christian priest is not merely versed in religious lore but because he is also versed in Arts and Science.”  B.R. Ambedkar in Buddha and Future of His Religion.Published inMay 1950 Vaishaka issue of the Maha Bodhi Society journal. (http://www.clearviewproject.org/engagedbuddhistwriting/buddhaandthefutureof.html)

[33] रामकथा एंड अदर एसेस. पृष्ठ-१४४.

मार्तण्ड  प्रगल्भ

मार्तण्ड प्रगल्भ

छात्र राजनीति और संस्कृति-कर्म में व्यस्त रहने वाले मार्तण्ड प्रगल्भ जे.एन.यू. के भारतीय भाषा केंद्र से पी.एच.डी. हैं. फ़िलहाल  रेडिकल नोट्स कलेक्टिव  के साथ कार्यरत हैं. उनसे mpragalbha1@gmail.com पर संपर्क संभव है.

प्लाथ की कवितायें, स्त्री व्यक्तित्व के दुहरे आत्मनिर्वासन की सच्चाई: मार्तंड प्रगल्भ

सिल्विया प्लाथ अमेरिका की लेखिका थीं. ऑस्ट्रियन मूल की पर दो पीढ़ी पहले से अमेरिकी हुए परिवार से प्लाथ की मां आयीं थी और पिता जर्मन थे. १९३२ में जन्मी सिल्विया प्लाथ ने काफी कम उम्र से ही लेखन को गंभीरता से लेना शुरू कर दिया था. पिता यूनिवर्सिटी में जीवविज्ञान के प्रोफेसर और प्रसिद्ध कीटविज्ञानी थे और प्लाथ के जीवनीकार बताते हैं की प्लाथ का उनसे रिश्ता तनाओं भरा था. तीस साल की उम्र में जब प्लाथ का त्रासद अंत हुआ प्लाथ का प्रकाशित-अप्रकाशित विपुल लेखन अस्तित्व में आ चुका था. कवि टेड ह्युग्स के साथ प्लाथ को प्रेम हुआ,उससे शादी हुई और वह दो बच्चों की मां भी बनी. अंत के दिनों में उनका संबंद्ध- विच्छेद हो गया था पर उसका कानूनी साक्ष्य नहीं है. प्लाथ के मित्रों में ज़्यादातर अमेरिकी और इंग्लिश लेखक थे. पहले अमेरिका के स्मिथ कॉलेज में प्लाथ ने अकादमिक एक्सलेंस के साथ दोस्तोवस्की के उपन्यासों में द्विधाविभक्त चरित्रों के ऊपर अपना अंडरग्रेजुएट थीसिस जमा किया, बाद में वजीफे के साथ कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी चली आई. आमतौर पर आलोचकों ने प्लाथ की रचनाओं को ‘आत्म-स्वीकारात्मक कविता’ (कन्फेसनल पोएट्री) को आगे बढ़ाने वाला माना है. अपने छोटे जीवन-काल में प्लाथ को भयानक अवसाद के दौर से भी गुजरना पड़ा था. वह अंतिम दिनों में अनिद्रा और गंभीर अवसाद से जूझ रही थी. प्लाथ ने तीन बार आत्महत्या की कोशिश की. अंतिम बार उसने यह कोशिश ११ फरवरी १९६३ को की. #लेखक

Sylvia Plath

Sylvia Plath

 

व्यक्ति स्वातंत्र्य की त्रासदी और सिल्विया प्लाथ की कविताएँ

By मार्तंड प्रगल्भ

प्लाथ की आरंभिक कविताओं में उसके पसंदीदा कवियों की छाप दिखती है. परन्तु इन कविताओं में भी सिल्विया प्लाथ की एकान्तिक काव्य यात्रा के निशान मिलते हैं. किसी पेंटिंग या प्राकृतिक दृश्य के प्रभाव से या रोज़मर्रा के अन्य जीवनानुभव और उनके संदर्भों से शुरू होने वाली कविताओं में एक धूसर-काली मनोदशा आकार ग्रहण करती है. ये मनोदशाएँ विकृत मानवीय सम्बन्धों के बीच अपने अस्तित्व की तलाश के क्रम में बनने वाली मनोदशाएँ हैं. इन मनोदशाओं में अस्तित्व की सार्थकता अपनी आत्म-पहचान की खोज में बदलती जाती है. दोस्तोवस्की के उपन्यासों में ‘डबल’ या आत्मा की दुई के बारे में प्लाथ का अध्ययन आत्म और उसकी पहचान की ज्ञानात्मक संवेदना के सैद्धांतिक आयाम का पता देती हैं. स्वतंत्र मनुष्य का रूप कैसा होगा, यह प्रश्न नाज़ी होलोकास्ट और द्वितीय विश्वयुद्ध की छाया से आक्रान्त था. स्वतंत्र मनुष्य के बने बनाए मॉडल के ध्वंस के बीच बन रही ये मनोदशाएँ अपनी अभिव्यक्ति का रास्ता तलाशती हुई मिथकीय सन्दर्भों से जुड़ती चली जाती है. ये मिथकीय सन्दर्भ ज़्यादातर प्रेम, मृत्यु और पुनर्जीवन के हैं. धीरे-धीरे मिथकीय चेतना का अनवरत दुहराव प्लाथ के लिए एक बंद घेरे में बदलता गया. एक बंद घेरे वाली एकांतिकता का निर्माण वहां होता है जहाँ अनुभव प्रसूत काव्य संवेदनाएं आत्म की दो विरोधी गतियों से संघर्ष करती हुई इन विरोधी गतियों के अतिक्रमण के लिए स्वयं मिथकीय संवेदना में रूपांतरित होती जाती है. रचनाकार इस चक्र से निकलने के लिए आवेगमय प्रतिक्रियाएं करती है. इन प्रतिक्रियाओं की परिणति जीवन में और रचना के भीतर निर्णय लेने में होती है. प्लाथ की रचनाओं में हम इन निर्णयों को आसानी से पहचान सकते हैं. उसकी काव्य-नायिकाओं की आत्महंता आस्था मृत्यु के निर्णय में परिणत होती है.

फ़ासिस्म की मिथकीय चेतना से संघर्षरत प्लाथ के काव्य की मिथकीयता वस्तुतः एक दूसरे की पूरक बन गयी है. चेतना की इन दो विरोधी धाराओं में मृत्यु के दृश्याभास या स्पेक्टेक्ल का साझा है. ध्वंसावशेष के रूप में वर्तमान व्यक्ति-मुक्ति के बुर्जुआ स्वप्नों का भी ध्वंसावशेष था. व्यक्ति रचनाकार का अंतर्मन मुक्ति के स्वप्नों के पूरा होने से पहले ही उन स्वप्नों के ध्वंसावशेष को अपने सामने यथार्थ पाता है. स्त्री-पुरुष सम्बन्धों में यह ध्वंसावशेष प्रेम के स्वप्न का ध्वंसावशेष है. प्रेम का निर्णय और व्यक्ति-स्वातंत्र्य की आवेगमय कामना दोनों विध्वंस के दुहराव में उलझ जाती है. प्लाथ की काव्य-नायिकाएं इस ध्वंस की त्रासद मनोदशा से संघर्ष करती हैं, निर्णय लेती हैं और बार-बार पराजित होती हैं. प्लाथ के एक आरंभिक सोनेट से इस मनोदशा के निर्माण का कुछ पता मिलता है. इस सानेट की प्रेरणा प्लाथ को इटैलियन चित्रकार ज्योर्जिओ दे सिरीको की एक पेंटिंग से मिली. पेंटिंग का शीर्षक ही कविता का भी शीर्षक है: ‘ध्वंसावशेषों की आपसी बातचीत’. पेंटिंग में दूर-दूर तक फैले पथरीले बियाबान में बिना छत बिना दीवारों का एक कमरा है. कमरे के खम्भे टूट गए हैं. दरवाजा है जिसकी केवल चौखट ही बची है. दरवाजे के दोनों पल्ले समानांतर खुले हैं. दरवाजे की तरफ मुंह किये एक संभ्रांत महिला शास्त्रीय परिधानों में सजी धजी बैठी है. उसकी गर्दन बायीं ओर हलकी सी मुड़ी है और वह एक सूटेड-बूटेड पुरुष की आँखों में देख रही है. पुरुष के ठीक पीछे एक अलमारी है और उससे लगा एक टूटा हुआ खम्भा जिससपर किसी यूनानी हीरो की तस्वीर है जो हुबहू पुरुष की तरह दिखता है और चित्र में उसी मुद्रा में कुछ देख रहा है जिस मुद्रा में वह पुरुष उस संभ्रांत महिला को देख रहा था. प्लाथ की कविता में इस चित्र के निर्माण की फैंटेसी बनती है. चित्र की संभ्रांत महिला प्लाथ की काव्य-नायिका में बदल जाती है. वह स्वयं उस चित्र के ट्रैजिडी का इतिहास पुरुष को बता रही है. दरवाजे के सामने बैठी वह पुरुष को अपने वैनेले आवेश के साथ अपने भव्य घर की पोर्टिको से ‘रौबदार’ गुजरते देख रही थी. वह गुजरता जाता था:

… छिन्न भिन्न करते जाल को

शिष्टाचार के सारे नियमों के जो बवंडर को पीछे

थामे रखते हैं

और बवंडर उसके पीछे विध्वंस करता आ रहा था. शानदार तम्बूरे और मोर नष्ट हो गए, फलों के बाग़ उजाड़ हो गए और अब भव्य दीवारें ढह गयीं हैं. भयानक खंडहरों के ऊपर कौए शोर करते हैं और तुम्हारी तूफानी आँखों की उजाड़ दृष्टि का जादू वैसे ही उड़ान भरता है जैसे पहली किरण के साथ कोई चुड़ैल महल से उड़ जाती है. चट्टानी बियाबान टूटे खम्भों के फ्रेम में जड़ है और


जब तुम कोट और टाई में धीरोदात्त खड़ो हो, मैं बैठी

ग्रेसियन ट्यूनिक और साइकी-नॉट में सजी-धजी

तुम्हारी काली आँखों में जड़वत, नाटक त्रासद हो गया:

हमारी उजाड़ रियासत पर ऐसे कठोर तुषारापात के बीच

शब्दों का कैसा उत्सव इस विनाश को ढँक सकता है?

अन्दर बाहर के इस भयावह बियाबान में प्लाथ की काव्य-नायिकाएं वृहत्तर दुःख और पीड़ा को स्वानूभुत कर उसकी सच्चाई को अपनी पहचान में पक्का करना चाहती हैं. इस पीड़ा या दुःख की चरम परिणति मृत्यु के अनुभव की प्रबल होती आकांक्षा है. जो जिंदा है किसी न किसी तरह से दुःख का कारक भी है. व्यक्ति-अनुभूत पीड़ा और पीड़ित का द्वैध इन काव्य-नायिकाओं की आत्मा में दुई पैदा करती है. जहाँ एक ओर उत्पीड़क संरचना यथार्थ है वहीँ दूसरी ओर व्यक्ति-केंद्रित सच्ची अनुभूति की खोज एकान्तिक उत्पीड़कों/उत्पीड़ितों की पहचान के द्वंद्व में उलझ जाती है. ऐसी स्थिति में पीड़ित के अनुभवों की ईमानदारी और पीड़ित का विरोध ये दोनों ही मृत्यु संदर्भित हो जाते हैं. अंग्रेज़ी दुनिया में अमेरिकी उदार व्यक्तिवाद अपनी सार्थकता के लिए होलोकास्ट की मृतक छाया से व्यक्ति-मुक्ति के वास्तविक प्रश्नों को ढँक देती थी. यह संभव होता था मृत्यु को स्पेक्टेकल बना कर पेश करने से. प्लाथ की काव्य-नायिकाएं इस अमेरिकी जीवन-पद्धति के आक्रामक स्वरुप से भी विद्रोह करती हैं. यह विद्रोह देह-विद्रोह में रूपांतरित होता है. इन नायिकाओं के लिए व्यक्ति स्वातंत्र्य की उदारता उत्पीड़ितों को न केवल आत्मसमर्पण के लिए बाध्य करती है वरन उसे सुखी जीवन का आदर्श मॉडल भी साबित करती है. यह उदारता उन काव्य-नायिकाओं के लिए फासिस्ट हिंसा का ही दूसरा पहलू है. इनका द्विधा-विभक्त आत्म जिस गिरह से बंधा है वह हिंसा की ही गिरह है. सभ्यता के गर्भ में छिपी हिंसा से जुड़ कर वह प्रासंगिक हो उठी है. प्रेम, मातृत्व और घर की ओर वापसी जैसे उनके निर्णय हमेशा द्विधा-विभक्त अनिर्णय के साथ आने से कविता में अतिरिक्त आवेगमय शक्ति के रूप में प्रकट हुए हैं. ‘द स्नोमन ऑन द मूर’ कविता की काव्य-नायिका अपने प्रेमी से निरंतर युद्ध्मान स्थितियों के एक क्षण में विजय की अपनी तीव्र आकांक्षा के साथ विच्छेद को स्वीकार करती है. वह तमतमाई हुई जब कमरे से बाहर बियाबान में निकलती है तो उसका अंतिम क्रोध भरा ताना है- ‘आओ मुझे खोज लो’. उसे विश्वास है कि बाहर के बर्फीले-उजाड़-बियाबान से गुजरते हुए भी वह जीतेगी और एक दिन वह घुटनों के बल उसके सामने बैठा होगा. दुनिया के सफ़ेद किनारे पर खड़ी वह सारे नरक को बुलावा देती है उस उद्दंड आदमी की सत्ता की घेरे-बंदी के लिए. और दूर सामने से आता एक शैतान दीखता है उसे. कोई आग उगलने वाला, क्रोधोन्मत्त और गर्वोन्नत राक्षस नहीं बल्कि संयमी, हृष्ट-पुष्ट, गंभीर और डरावनी कद काठी का वह शैतान लाश की तरह सफ़ेद दिखाई पड़ा. प्रेमविहीन आँखों वाले इस शैतान के क़दमों की धाक से दर्जनों पखेरूओं की लाश हवा में बिखर जाती थी. पर इससे भी बुरी बात यह थी कि उसने


… काँटों जड़ी पट्टी पर झूलते देखा

औरतों की नाचती खोपड़ियाँ

शोक से सूखी जीभों से कलकलाती अपने अपराध:

‘हमारी बुद्धि ने मूर्ख बनाया

राजाओं को, राजाओं के दुर्बल बेटों को: हमारी प्रतिभाओं ने

दरबारों का दिल बहलाया:

उसी शेखी के लिए , हम इन लौह जंघाओं से नथे हैं.’

राज सिंहासन पर विराजमान धंसा हुआ

एक बर्फीले तूफ़ान में, अपने चमकते विजय-चिह्नों के साथ वह शैतान दहाड़ उठा.

कुल्हाड़ी की मार के आवेग से

वह लजा कर पीछे हट गयी: एक सफ़ेद सनसनी! और वह शैतान, चलते हुए

धुंध में खो गया.

विनीत तब, और रोती हुई,

वह लड़की घर की ओर मुड़ गयी, लबालब भरी हुई भली बातों

और नम्र अनुपालन से.

प्लाथ की काव्य-नायिकाओं के लिए घर से संबंद्ध-विच्छेद मृत्यु की स्वीकारोक्ति भी है. पर ये जानती हैं कि यह सब कुछ सच नहीं है. यह सब नैसर्गिक नहीं है. एक गहन संदेह के खिलाफ इन्हें तलाश है किसी विश्वास की, जो दिया हुआ कहीं नहीं है. उसे शुद्ध मस्तिष्क रच नहीं सकता. उसके खिलाफ देह विद्रोह होगा और उसकी सत्ता मिट जायेगी. ‘नैसर्गिक इतिहास’ कविता में यह विश्वास अपने वृहत्तर ऐतिहासिक परिपेक्ष्य में व्यक्त हुआ है. ‘उन्मत्त सम्राट, दिमाग एक उजाड़ देश पर राज करता. मलमल पर सोने वाला और कबाब में धंसे हुए उस सूअर का प्रेम केवल शुद्ध दर्शन में लीन होना था. जब उसकी प्रजा भूखी और नंगी थी वह तारों और फरिश्तों के संग बातें कर रहा था. पर ऐसा वह जारी नहीं रख सकता:


…अपने राजा की दुष्ट दैवीय वायु से तंग ,

धरती से जन्मे वे सामान्य जन एक शरीर में

उठ खड़े हुए और शाही धमनियों को बंद कर दिया…

स्वयं में सर्व शक्तिमान की सत्ता टिक नहीं सकती. सामान्य जन का शरीर उसे एक करेगा और वह विद्रोह करेगा. देहविद्रोह की सत्यता नैसर्गिक है. यहाँ दिमाग शुद्धात्मवादी का प्रतीक भी है. शुद्धात्मवादी दिमाग खुद को ब्रह्म समझने लगता है. उसे लगता है कि बाह्य यथार्थ सारा का सारा उसी के कारण है. ‘एक शुद्धात्मवादी का आत्मवक्तव्य’ शीर्षक कविता का ‘मैं’ शुद्ध नियंत्रण मात्र है. इसकी घोषणा है. यह शुद्ध शक्ति की सर्वव्याप्ति का प्रतीक है. पुरुषसत्ता और उसके अनन्तर फासीवाद की वैयक्तिक सत्ता की आत्म-मुग्धता का उद्घोष है:


मैं

घरों को सिकुड़ने देती हूँ

और पेड़ों को गायब होने

दूर जाते हुए; मेरी नज़रों की लगाम

कठपुतली-जनों को झुलाते हैं

उनको, जो नहीं जानते कि कैसे झूलते हैं,

हंसते हैं, चूमते हैं, और शराब पीते हैं

परन्तु इस निर्णय से अनुभवों की मुक्ति नैसर्गिक है. इतिहास सम्मत है. पर वह कहीं वास्तव में प्राप्य नहीं. ऐसी स्थिति में प्लाथ की कवितायें प्रेम की ओर, उसके विश्वास की ओर लौट आती हैं. इन कविताओं में प्रेम की अवश्यम्भावी विजय का उद्घोष बार-बार होता है. यह रूमानी प्रेम का आवेग, यह भाव जगत का विद्रोह झूठा नहीं है. प्लाथ की कवितायें इस सच की ‘संवाददाता’ हैं:


पत्ती की तश्तरी पर बैठे घोंघे का शब्द?

यह मेरा नहीं है. इसे स्वीकार मत करो.

एक सील्ड डिब्बे में एसिटिक एसिड ?

इसे स्वीकार मत करो. यह सच्चा नहीं है.

अपने सीने में सूरज को धारण किये सोने का छल्ला ?

कई झूठ. कई झूठ और एक विषाद.

…….

आइनों में एक विक्षोभ,

अपने धूसर को चकनाचूर करता सागर-

प्रेम करो, प्रेम करो मेरी ऋतु.

जितना प्रेम पर यह विश्वास सच्चा है उतने ही सच हैं प्रेम के खंडहर. एक मन यह भी विश्वास करता है कि बार-बार अनुभव-जगत का एक सर्वसत्ता के सामने समर्पण एक झूठ है और ‘मृत्यु’ के अनुभव की सच्ची अभिव्यक्ति के बिना प्रेम में आस्था को पुनर्जीवित नहीं किया जा सकता. सर्वथा स्वतंत्र व्यक्तिगत अनुभवों की तलाश में ये नायिकाएं मिथकीय और धार्मिक अनुभव संसार में विश्वास के लिए जाती हैं. समस्या तब और भी गहरी हो जाती है जब स्वतंत्रता की यह तलाश मिथकीय संवेदना में भी तुष्ट नहीं होती. अतिरेकवादी पूर्णता के दोनों छोर हिंसा के सिवा कुछ भी साझा नहीं रखते. असफलता के बारम्बार अनुभव से आक्रोशित आत्म अपने चरम विरोध से ही प्रेम करने को बाध्य होता है. ‘डैडी’ कविता की काव्य-नायिका कहती है:


हर महिला पूजती है एक फासिस्ट,

चेहरे पर बूट, निर्मम

निर्मम हृदय तुम्हारे जैसे किसी क्रूर का.

इस चरम विरोध से अतिक्रम के लिए, स्त्रीत्व से अतिक्रमण के लिए ये काव्य-नायिकाएं एक बेघर-बार मूल अनुभव की ओर आकर्षित होती हैं. वह बार-बार मरती हैं केवल अपने चरम-विरोधी आत्म से सारा मामला निबटा लेने को. यहाँ भी विरोधी आत्म-युग्म जर्मन-यहूदी आत्म-युग्म से जुड़ कर सभ्यता मूलक हो गया है.


एक इंजिन, एक इंजिन

हवा में एक यहूदी की तरह मुझे उड़ाते हुए.

एक यहूदी को दशाऊ, ऑश्वित्ज़, बेलमेन.

मैंने यहूदी की तरह बात करना शुरू कर दिया.

मैं सोचती हूँ यहूदी होती तो कहीं अच्छा था.

टायरोल की बर्फ, वियना की साफ़ बीयर

बहुत शुद्ध और सच्चे नहीं हैं.

अपनी जिप्सी पुरखिनियों और अपने उजड्ड भाग्य के साथ

और साथ में मेरा टारोक पैक और मेरा टारोक पैक

मैं तनिक तो यहूदी होती.

इस मूल बेघर-बार को पाने के लिए वह बार-बार मरती है. मूल विरोधी/विद्रोही/पीड़ित आत्म को पाने के लिए वह सारी मध्यस्थताओं को निरर्थक साबित करना चाहतीं हैं. वह बार-बार लौट कर अपने मूल में ही उसका विनाश करना चाहती हैं.


मैं दस की थी जब उन्होंने तुम्हें दफनाया.

बीस में मैंने मरने की कोशिश की

और तुम्हारे पास, वापस, तुम्हारे पास वापस लौटने की .

यहाँ तक कि हड्डियाँ भी ऐसा करेंगी मैंने सोचा.

विरोधी/विद्रोही मूल आत्म के खरे रूप में प्राप्त करने की यह तीव्र लालसा ‘लेडी लजारस’ नामक कविता में सबसे स्पष्ट है. लाजरस ईसा की चमत्कारपूर्ण कहानियों में मिलने वाला एक मिथकीय चरित्र है. यहाँ मृत्यु की पृष्ठभूमि में पुनर्जन्म एक स्पेक्टेकल में बदल जाता है. लजारस की बहनों ने लजारस की बीमारी की खबर ईसा को पहुंचाई थी. ईसा ने जान-बूझ कर जाने में देरी की. जब तक पहुंचे तब तक लाजरस को मरे चार दिन बीत चुके थे. ईसा ने उसे पुनर्जीवित कर दिया. इस चमत्कार से यहूदियों का विश्वास ईसा में इतना बढ़ गया की धर्माधिकारिओं ने इस विश्वास को मारने के लिए लजारस को फिर से मृत्युदंड दिया. प्लाथ की काव्य नायिका खुद को स्त्री लाजरस के रूप में पुनर्रचित करती है और उस पुनर्जीवन के चमत्कार से अपने आत्म को मुक्त करने का विश्वास व्यक्त करती है. व्यक्ति स्वातंत्र्य की आत्मगत पहचान की यह कामना बुर्जुआ स्वप्नों की भयानक त्रासदी की अभिव्यक्ति है. यह बुर्जुआ मानवीय सम्बन्धों के ‘वैम्पायर’ को मारने के लिए खुद को मार कर स्वन्त्रत होने की त्रासदी है


क बार फिर मैंने यह किया.

प्रत्येक दस में से एक साल

मैं ऐसा करती हूँ-

जैसे एक चलायमान चमत्कार, मेरा शरीर

एक नाजी लैम्पशेड सा उज्ज्वल

मेरा दाहिना पैर

एक पेपरवेट,

मेरा चेहरा एक लक्षणहीन, महीन

यहूदी लिनेने.

……..

मरना

एक कला है, जैसे बाकी सब.

मैं इसे बखूबी करती हूँ.

मैं इसे करती हूँ इसलिए यह नरक की तरह महसूस होता है.

मैं इसे करती हूँ इसलिए सच महसूस होता है

मेरा अंदाजा है तुम इसे मेरी प्रकृत नियति कहोगे.

……

श्रीमान ईश्वर, श्रीमान लूसिफर

खबरदार

खबरदार.

राख से

मैं अपने लाल केशों के साथ उठती हूँ

और मैं आदमियों को हवा की तरह खाती हूँ.

प्लाथ की कवितायें स्त्री व्यक्तित्व के दुहरे आत्मनिर्वासन की सच्चाई है. एक अप्राप्य, असंभव आत्मिक एकांतिकता का आवेगमय और रोमांटिक दुस्स्वप्न!

मार्तण्ड  प्रगल्भ

मार्तण्ड प्रगल्भ

छात्र राजनीति और संस्कृति-कर्म में व्यस्त रहने वाले मार्तण्ड प्रगल्भ जे.एन.यू. के भारतीय भाषा केंद्र से पी.एच.डी. हैं। उनसे mpragalbha1@gmail.com पर संपर्क संभव है।

अमरकांत की कहानी ‘हत्यारे’ और आज का समय: मार्तण्ड प्रगल्भ

 बात तो करनी है ‘अमरकांत की कहानी ‘हत्यारे’ और आज का समय’ पर और इसी कहानी पर विचार करके मैं आया था। लेकिन कल की कुछ चर्चाएं जो खासतौर से यथार्थवाद के सम्बन्ध में या सत्य के सम्बन्ध में या यथार्थ और रचना के सम्बन्ध में हुई थीं उनके बारे में भी मैं इस कहानी के संदर्भ से कुछ सोच रहा था. जिसे मैं आगे स्पष्ट करूँगा. चर्चा का प्रस्तुत विषय गंभीर तो है ही मनोरंजक भी है। गंभीर क्यूं है इस पर थोड़ा बाद में चर्चा की जाएगी। पहले, मनोरंजक क्यूं है इसकी थोड़ी चर्चा कर ली जाए। आज का जो विषय है, इस विषय के साथ दिक्कत यह है कि आप जहां चाहे इस विषय को फिट कर सकते हैं। समाजशास्त्र का कोई सेमिनार हो, (तो) उसमें भी यह विषय आ जाएगा। दरअसल हुआ क्या है कि आलोचना की जो समाजशास्त्रीय पद्धति है उसने विषयों का टोटा खत्म कर दिया है और इस तरह के शीर्षक की आवाजाही बेरोकटोक चलती रहती है। जैसे, बहुत सारे शोधार्थी इसी तरह के शोध विषय चुन लेते हैं; कोई रचना ले ली और उसमें आज का समय या रचना का समय जोड़ दिया और पूरा एक शोध प्रबंध तैयार हो गया! इसके चलते, इस तरह के विषयों की पुनरावृत्ति बढ़ी है जिससे विषय की गंभीरता एक यांत्रिक पुनरुत्पादन में नष्ट हो जाती है और कई बार हम चीजों को ठेठ समाजशास्त्रीय व्याख्या तक सीमित कर लेते हैं। मानो किसी समय का जो अर्थशास्त्र है उसके बारे में जान लेना (ही विषय को समझने के लिए पर्याप्त) है , कि नेहरू युग के अवसान के समय क्या स्थितियां थीं उसकी थोड़ी चर्चा कर ली जाए और (रचना तथा उन स्थितियों) दोनों में ऐतिहासिक सम्बन्ध जोड़ लिया जाए और इस प्रकार आज के समय में हत्यारे कहानी की सार्थकता सिद्ध हो जाती है। इस पद्धति के चलते जो गंभीर और सारगर्भित सवाल हैं वो ढंक दिए जाते हैं।  # लेखक 

अमरकांत

अमरकांत

रचना और आलोचना के प्रश्न जीवन के प्रश्न होंगे कि नहीं!

By मार्तण्ड प्रगल्भ

हर सचेत और क्रियावान मनुष्य अपने समय की जटिलता को समझना चाहता है। उस समय को समझना चाहता है जिससे उसके अंग-प्रत्यंग-अनुषंग परिस्थिति विशेष में निर्मित हो रहे हैं। मनुष्य के वर्तमान की वर्तमानता (प्रजेन्स ऑफ प्रजेन्ट) क्या है? इस प्रश्न को लेकर वह कई जगह भटकता फिरता है. और ऐसे ही संकट के समय कोई कहानी या कविता या कोई अन्य कलारूप अपने भीतर के अदम्य आकर्षण से उसे अपनी ओर खींच लेते हैं। महान रचनाएं वक्त-बेवक्त ऐसा ही अदम्य आकर्षण पैदा करती हैं। तो सवाल यह है कि ‘हत्यारे’ कहानी का हम कथा आलोचकों-कथाकारों की सभा में क्या महत्त्व है। या हम सरीखों के लिए ‘हत्यारे’ की उपयोगिता क्या है? क्षमा करेंगे, यहां उपयोगिता किसी उपयोगवाद के अर्थ में नहीं है बल्कि मार्क्स जिसे उपयोग-मूल्य कहते हैं उसके अर्थ में है। दरअसल यह कहानी-कला और कथा आलोचना दोनों के लिए गंभीर सवाल है।

कल की चर्चा में समकालीनता और आज के समय के बारे में हमारे समय के महत्त्वपूर्ण आलोचक (रविभूषण) अपनी बात रखते हुए कल कह रहे थे कि 1944 से हमें अपना समय मानना चाहिए। उस साल एक किताब आयी थी- रोड टू सर्फडम; वहां से एक नए ऐतिहासिक युग ‘बाजारवाद की केंद्रीयता’ की शुरुआत होती है और उसको एक विभाजक रेखा माननी चाहिए। चूंकि वे अध्यक्ष हैं, इसलिए मैं क्षमा मांगते हुए कहना चाहता हूं कि यह काल निर्धारण की हेगेलियन पद्धति है, जहां विचार की प्रमुखता से इतिहास का मूल्यांकन किया जाता है। अब 1944 में किताब आयी और वहां से नए समय की शुरुआत हो तब तो उदारतावाद की शुरुआत लास्की आदि से ही हो जाएगी। अगर इतिहास विचारों की क्रमबद्धता, गत्यात्मकता और द्वन्द्वात्मकता में निहित है तो यह हेगेलियन पद्धति है। 44 में शेखर एक जीवनी का दूसरा खण्ड आता है। प्रयोगवाद, तारसप्तक ऐसी बहुत सारी चर्चाएं शुरु होती हैं। उनमें से किसको अपने समय का आधार बनाया जाए यह एक प्रश्न है। दूसरा प्रश्न, क्या अर्थशास्त्र के अनुशासन से चलकर साहित्य के लिए काल निर्धारण सम्भव है? अगर अर्थशास्त्र से इतिहास में परिवर्तन के चरणों को समझना है तो प्रभात पटनायक इसके लिए ज्यादा मुफीद होंगे। साहित्य के आलोचक के लिए ये प्रश्न महत्त्वपूर्ण क्यों हैं और फिर इतिहास निर्माण की जो वास्तविक शक्तियां हैं, जिनके प्रति हम अपनी प्रतिबद्धता भी व्यक्त करते हैं, वे इतिहास के निर्धारक बिंदु होंगे या कोई शिकागो स्कूल निर्धारक बिंदु होगा! कहने का तात्पर्य यह कि जैसे हमारा नया समय हमारी परिस्थितियों के अनुरूप भारतीय कम्युनिस्ट आंदोलन का भी एक नया समय था और वह नक्सलबाड़ी के आंदोलन से शुरु होता है तो इसे भी कोई कह सकता है कि यह हमारा अपना समय है। दृष्टि भेद का अंतर है। बहरहाल, सवाल है- आज का समय से मतलब क्या है? क्या आज की कहानी और कथा आलोचना का समय आज का समय है! और यदि यह सवाल है तो सवाल फिर रचना-प्रक्रिया का होगा अर्थात् प्रश्न आज के कलाकार की रचना-प्रक्रिया का है। यहां रचना-प्रक्रिया से तात्पर्य आज की कहानी की रचना-प्रक्रिया से है। सीधे शब्दों में कहें तो हत्यारे की रचना-प्रक्रिया हम सरीखों के लिए क्यों महत्त्वपूर्ण है। कहानीकार की तरफ से भी, पाठक की तरफ से भी और (ध्यातव्य है कि) आलोचक भी सबसे पहले एक पाठक ही होता है। इस रचना-प्रक्रिया को प्रारम्भिक रूप से आलोचक पाठक की ही हैसियत से समझेगा. कथाकार की तरफ से यह प्रक्रिया थोड़ी भिन्न होगी। इस भिन्नता की प्राथमिक पहचान कथाकार को होगी। लेकिन शीघ्र ही आलोचक पाठक की हैसियत से तटस्थ होगा और कथाकार लेखक की हैसियत से। यह तटस्थता कथाकार और आलोचक दोनों को कहानी के एक वस्तुनिष्ठ आकलन और मूल्यांकन की ओर प्रेरित करेगा। आकलन और मूल्यांकन के इसी क्रम में हत्यारे कहानी और आज के समय के जटिल अंतरसंबंधों की पहचान हम लोग शायद कर पाएं।

बहरहाल, कहानी पाठ की जो सबसे आम पद्धति है- वह समाजशास्त्रीय पद्धति है। जिसमें आप रचना से समाज, समाज से रचना में बराबर आवाजाही करते हैं और यह अच्छी बात भी है। कहानी के ‘आडियन्स’ की भिन्नता से इस तरह की समझ को विकसित करने का और इस समझ के चलते आडियन्स को, पाठक को विकसित करने की प्रक्रिया चलनी चाहिए। जैसे, सन् ’62 में अमरकांत की कहानी ‘हत्यारे’ आती है। यह नेहरू युग के अवसान और उसके मोह भंग का संधिकाल है और अगर हम ध्यान दें तो यह नई कहानी और अकहानी के संधिकाल की भी कहानी है और इस लिहाज खुद यह कहानी अमरकांत की कहानी यात्रा में एक ‘ब्रेक’ की तरह है। दो नायक हैं या खलनायक हैं। खलनायकत्व नायकत्व प्राप्त कर रहा है। दोनों नायकों को यदि गौर से देखें तो एक गोरा है, ऊंचा है। दूसरा सांवला है, ठिगना है। दोनों एक ही तरह की वेशभूषा में इलाहाबाद विश्वविद्यालय के आस-पास किसी बाजार में टहल रहे होते हैं और उनकी बातचीत जब शुरु होती है तो ठेठ लहज़े में, ‘हलो, सन!..इतना लेट क्यों, बेटे?’ इस तरह की एक बातचीत शुरू होती है। हमारे विमर्शों का जो दबाव है उसकी तरफ से अगर हम इस कहानी में एक संभावना की बात करें तो जो सांवला है वह भिन्न वर्ग का है, कहानी की संभावना है क्योंकि कहानी में कहीं-कहीं स्टेटमेंट्स (बयान) भी ऐसे आते हैं कि ‘तुमको सेक्रेटेरियट का भंगी बनाऊंगा!’ गोरा गुरु है। सांवला चेला है। गुरु उसको शिक्षित करता है। ठीक उसी प्रक्रिया में जैसे घीसू माधव को शिक्षित करता है. हत्यारे कहानी में जब गिलास में दोनों शराब बांटते हैं तो सांवला चुपके से अपनी शराब गोरे के गिलास में डाल देता है। (इस पर गोरा कहता है) ‘लेकिन जब तुम इतनी पी नहीं सकते तो अवसर आने पर घूस कैसे लोगे. जालसाजी कैसे करोगे, झूठ कैसे बोलोगे? फिर देश की सेवा क्या करोगे, खाक!’ सांवला अभी सीख रहा है। औरत के पास जाना अभी तक सीखा नहीं है. और फिर गोरा कहता है, ‘आज तो कुछ रचनात्मक कार्य होना चाहिए!’ तो रचनात्मक लीडरशिप क्या है? रिक्शा मजदूरों की बस्ती की तरफ चलता है। बस्ती के शुरु में ही पान की छोटी सी दुकान है। जिस पर पान-सिगरेट तो मिलती ही है रोजमर्रा की और सारी चीजें भी मिलती हैं, और वे दोनों मजदूरों की बस्ती आरम्भ होते ही जो पहली झोपड़ी है उसमें  घुस जाते हैं। एक महिला चूल्हे पर खाना बना रही होती है। उसके देखते ही गोरा मुस्कुराकर बोला, ‘ये विश्व लोफर संघ के अध्यक्ष हैं। इनको हर तरह से तुम्हें खुश करना है.’ दोनों औरत के साथ सम्बन्ध बनाते हैं। पैसा नहीं देते हैं और जब औरत कहती है, ‘लाइए मैं (पैसे का खुदरा करवा कर) ले आती हूं.’ तो गोरा बोलता है, ‘तुम तो पूंजीपति हो! तुमको किस बात की कमी है।…अरे, तुम देश की महान कार्यकत्री हो, तुम कहाँ कष्ट करोगी?’ और आगे बढ़ता है कहता है, ‘साले जूते निकालकर हाथ में लेलो! सांवला बोला ‘क्यों?’…(गोरा कहता है) ‘भाग साले! आर्थिक और सामाजिक क्रांति करने का समय आ गया है!’ दोनों भागना शुरु करते हैं। औरत बाहर निकल कर कहती है- ‘अरे, लूट लिया हरामी के बच्चों ने!’ मजदूरों की बस्ती से कुछ लोग उसके पीछे दौड़ पड़ते हैं। दोनों अरबी घोड़े की तरह सरपट भागे जा रहे हैं। कभी बाएं घूम जाते हैं। कभी दाएं घूम जाते हैं। इतने में मजदूरों का एक लड़का फुर्ती से सांवले की तरफ तीर की तरह बढ़ता चला जाता है और लगता है उसको पकड़ ही लेगा। ऐसे में गुरु गोरा रुक जाता है। जेब से चाकू निकालकर खोल लेता है और पीछा करते हुए आ रहे मजदूर के पेट में घोंप देता है और फिर भाग जाता है। कोलतारी सड़क पर आगे की स्ट्रीट लाइट में दोनों के सुंदर और पुष्ट शरीर पर पसीने की बूंदें छरछरा रही हैं; यह युद्ध का सिम्बल है ‘सिम्बलाइजेशन ऑफ पॉवर’ है, और वे फिर न जाने कहां अंधेरे में गुम हो जाते हैं. यह पूरी कहानी है। ध्यान दें कि जो नेहरूवियन आदर्शवाद है उसकी खोल के भीतर से जो फासिज्म पैदा हो रहा है यूथ के बीच में, वह उसी आदर्श की भाषा में ही पैदा हो रहा है. फासिज्म के साथ दिक्कत यही है, उसको आना तो हमारी ही भाषा में पड़ेगा। सामाजिक, आर्थिक क्रांति की भाषा में, लेकिन वो रूपवाद है। उसका यथार्थ फासिज्म है। आदर्श के उस रूपवाद का यथार्थ फासीवाद है और इसी फासीवादी टेन्डेन्सी की कहानी ‘हत्यारे’ है। और यह फासीवादी टेन्डेन्सी यूथ में व्याप्त हो रही है, जबकि हमारा देश सबसे नौजवान है, मोदी युवाओं को लेकर बड़े प्रसन्नचित हैं; एक युवा देश के भीतर, खुद युवा वर्ग के भीतर तरह-तरह के विभाजन हैं। इसको अगर ध्यान में न रखा जाएगा तो दिक्कत की बात होगी और अमरकांत की खासियत यही है। उनकी चिंता हमेशा ही परिवर्तनकारी शक्तियों के पहचान में आने वाले संकट को कहानी में रखने की है। बहरहाल, चूंकि मजदूरों की बस्ती में जा करके वह हत्या करता है। इसलिए वहां जा कर कहानी एलीगरी में बदलती है और यह मूल्य-निर्णय शामिल होता है कि फासीवादी चरित्र हमेशा ही वर्किंग क्लास (मजदूर वर्ग) के विरोध में होगा।

 बहरहाल, ये तो कहानी का एक सिंपल पाठ है। लेकिन क्या इसीलिए हत्यारे कहानी हमारे लिए महत्त्वपूर्ण है। फासीवाद के इस नए दौर के चरित्र के बारे में, उपभोक्ता समाज के बनने की प्रक्रिया के बारे में, बहुत सारी बातें इस कहानी को पढ़े बिना ही हम समझ भी रहे थे। क्या जरूरत थी कि इसको पढ़ा जाए! एक सचेत बुद्धिजीवी, एक एक्टीविस्ट जो सचमुच में परिवर्तन लाना चाहता है। जो परिवर्तन चाहता है। यथार्थ में परिवर्तन की गति को पहचानना चाहता है। उनके लिए केवल  कहानी का सामान्य पाठ ही होगा तो यह महत्त्वपूर्ण नहीं होगा।

यहाँ मैं संक्षेप में हिंदी के चार आलोचकों की चर्चा करना चाहूंगा, जिन्होंने ‘हत्यारे’ कहानी के बारे में लिखा है या अमरकांत के बारे में लिखा है। विश्वनाथ त्रिपाठी समाजशास्त्रीय, राजनीति के अपराधीकरण से लेकर अपराध के राजनीतीकरण और स्टूडेन्ट पॉलिटिक्स की वह पूरी प्रक्रिया जो जेपी मूवमेंट के भीतर से निकली है उसके ‘रिप्रजेन्टेशन’ के बतौर हत्यारे कहानी की अच्छी व्याख्या करते हैं। लेकिन वह एक सवाल उठाते हैं कि अमरकांत के पात्र कहीं भी संघर्ष क्यों नहीं करते हैं? अगर समाज में संघर्ष है तो अमरकांत के पात्र संघर्ष करते हुए क्यों नहीं दिखते। अजीब बात यह है कि ठीक यही आलोचना राजेन्द्र यादव भी अमरकांत के बारे में करते हैं कि अमरकांत की कहानी का कोई भी पात्र संघर्ष नहीं करता है। वहां आस्तित्व की समस्या महत्त्वपूर्ण है, आस्था का प्रश्न महत्त्वपूर्ण नहीं है। लेखकीय आस्था एक ओढ़ी हुई चीज है. मनुष्य के अस्तित्व की लड़ाई ज्यादा महत्त्वपूर्ण है और इसलिए अमरकांत अस्तित्ववादी कथाकार हैं। अब विश्वनाथ त्रिपाठी तो यह नहीं कहेंगे कि वे अस्तित्ववादी कथाकार हैं लेकिन हाँ, यह कहेंगे कि संघर्ष करता हुआ पात्र नहीं दिखता है। संघर्ष करते हुए पात्रों को दिखाना चाहिए। समाजवादी यथार्थवादी की जो अपेक्षा है वह अमरकांत के ऊपर विश्वनाथ त्रिपाठी की तरफ से (लागू की जाती है) और राजेन्द्र यादव हत्यारे को अस्तित्ववाद की कहानी मान लेते हैं। ‘हत्यारे’ नाम से सार्त्र की भी एक कहानी है और अगर समय हो तो संक्षेप में सार्त्र की ‘हत्यारे’ कहानी के अस्तित्ववाद का अमरकांत से क्या अंतर है इसे मैं देखना चाहूंगा और वह अंतर अपने अंतिम रूप में किसका अंतर होगा। बहरहाल, द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद का समय है। ब्रिटेन की एक कोर्ट में एक ऐसे केस की सुनवाई होनी है, जिसका जीतना तय है और वह बात यह है कि एक टी.बी. का डाक्टर है। एक दिन उसके पास बहुत अमीर आदमी आता है। लेकिन वह टी.बी. से बुरी तरह ग्रस्त है। बहुत बूढ़ा हो गया है। चल-फिर नहीं पा रहा है। दोनों फेफड़े उसके खराब हो चुके हैं और वह डाक्टर के पास बैठता है। डॉक्टर कहता है अब कोई उपाय नहीं है। तो मरीज बहुत विनती करता है। डॉक्टर कहता है, लगता है बड़े पैसे वाले हो। मरीज स्वीकार करता है तो डाक्टर उसे सलाह देता है कि तुम आज से कुछ खाओ-पीओ मत और अब सिर्फ पानी का सेवन करो और दूर कहीं चले जाओ। छः महीने गुजर जाते हैं। एक दिन अचानक वह आदमी हट्टा-कट्टा, सूटेड-बूटेड डॉक्टर के क्लीनिक में प्रवेश करता है। डॉक्टर पहचान नहीं पाता है। तब मरीज पूरी बात डॉक्टर को फिर से बताता है और डॉक्टर को बहुत सारा पैसा देने की बात कहता है। डॉक्टर चिंतित हो जाता है। वह मेज की दराज में रिवाल्वर निकाल कर अमीर आदमी को गोली मार देता है और उसका फेफड़ा निकाल कर टेबल रख कर पर निरीक्षण करने लगता है और कहता है कि इससे मनुष्य का विज्ञान पर से विश्वास ही उठ जाएगा। इसलिए मनुष्य समाज के कल्याण में उसकी हत्या कर देनी पड़ी और यह केस कोर्ट में गया है और लोग मान रहे हैं कि डॉक्टर जीत जाएगा। यह अस्तित्ववाद की कहानी है। अस्तित्व की समस्या का जो दर्शन फैलाया गया, इतिहास मुक्त व्यक्ति के स्वतंत्र अस्तित्व का प्रश्न, वह सार्त्र की कहानी में है। अमरकांत की कहानी में वह नहीं है।

यहां अमरकांत की कहानी के संदर्भ में संक्षेप में सुरेंद्र चौधरी और नामवर सिंह के पाठों के अंतर के बारे में एक बात करना चाहूंगा। सुरेंद्र चौधरी ने कहा कि हत्यारे कहानी में हत्या नहीं हुई होती तो यह बहुत महत्त्वपूर्ण कहानी होती। क्यों? क्योंकि हत्या वहां अतिनाटकीयता का प्रयोग मात्र है. जिससे कहानी में एक मादक भंगिका तो पैदा हुई है लेकिन वह कुछ कहानी में नया नहीं जोड़ती है और यह अच्छा हुआ कि अमरकांत ने आगे ऐसा प्रयोग नहीं किया। उन्होंने कहा जो परिवर्तनकारी प्रक्रिया है उसमें जो प्रच्छन्न खतरे छुपे हुए हैं वह अमरकांत की कहानी में ज्यादा बेहतर आता अगर वह हत्या नहीं हुई होती। यानि एक नपुंसक, बड़बोली, ऐय्याश युवा पीढ़ी का ज्यादा सही चित्रण हुआ होता अगर ये हत्या नहीं हुई होती। नामवर सिंह ने कहा अगर इस कहानी में हत्या नहीं हुई होती तो यह कहानी इतनी महत्त्वपूर्ण नहीं होती। उन्होंने कहा कि कहानी में हत्यारे के द्वारा की गई हत्या कहानीकार का या रचना का मूल्य-निर्णय है। एक वैल्यू जजमेंट है। अगर रचना की प्रक्रिया में यह वैल्यू जजमेंट (मूल्य-निर्णय) नहीं है, यह मैं अपनी भाषा में बोल रहा हूं एक इंटरव्यू में नामवर सिंह ने चलते हुए यह बात कही थी, तो रचना जो फासिस्ट टेन्डेन्सी दिखाना चाह रही है, जो आज एक अजीब तरह की प्रवृत्ति पैदा हो रही है ,उसे दिखाया नहीं जा सकता. युवाओं के आदर्श का अतीत में स्वतंत्रता आंदोलन का एक पूरा दौर है. पर वह आदर्श दूसरे थे। यह आदर्श दूसरे हैं। इन आदर्शों के रेहटारिक में जो कंटेंट है उसके प्रति मूल्य-निर्णय कीजिएगा कि नहीं यह एक रचना-प्रक्रिया का सवाल है। सुरेंद्र चौधरी के लिए कहानी में हत्या कहानी को अतिनाटकीय बना देती है, दूसरी ओर नामवर सिंह के लिए महत्त्वपूर्ण। दो मार्क्सवादी ओलोचकों की दृष्टि में यह भेद क्यों है? क्या यह यथार्थवाद की दो भिन्न दृष्टियां हैं? क्या यथार्थवाद बीसवीं सदी के साथ गुजरी हुई बात हो गई है! इसका हम सरीखों के लिए क्या कोई महत्त्व नहीं है? यह हमारे लिए भिन्न चर्चा का बिंदु है। यहां मैं अभी तफ्सील नहीं करना चाहूंगा, वक्त कम है। परंतु हमारे समय के एक प्रमुख चिंतक फ्रेडरिक जेम्सन के लिए यह बीती बात नहीं है। इसी साल उनकी एक पूरी किताब यथार्थवाद पर आयी है। यह किताब यथार्थवाद के साथ एक प्रयोग के लिए आमंत्रित करती है और खुद यथार्थवाद के भीतर विकसित होती आयी विरोधी प्रविधियों के द्वन्द्वात्मक चिंतन को विकसित करने का प्रयास करती है। मैं अंग्रेजी में जेम्सन को थोड़ा पढ़ना चाहूंगा अगर आप चाहें तो.

बीसवीं सदीं के इतिहास की आंतरिकता को कैसे समझा जाए इसी क्रम में जेम्सन लिखते हैं, ‘My experiment here claims to come at realism dialectically, not only by taking as its object of study the very antinomies themselves into which every constitution of this or that realism seems to resolve: but above all by grasping realism as a historical and even evolutionary process in which the negative and the positive are inextricably combined, and whose emergence and development at one and the same time constitute its own inevitable undoing, its own decay and dissolution. The stronger it gets, the weaker it gets; winner loses; its success is its failure. And this is meant, not in the spirit of the life cycle (“ripeness is all”), or of evolution or of entropy or historical rises and falls: it is to be grasped as a paradox and an anomaly, and the thinking of it as a contradiction or an aporia. Yet as Derrida observed, the aporia is not so much “an absence of path, a paralysis before roadblocks” so much as the promise of “the thinking of the path.” For me, however, aporetic thinking is precisely the dialectic itself; and the following exercise will therefore be for better or for worse a dialectical experiment.’

(मेरा प्रयोग यथार्थवाद तक द्वंद्वात्मक तरीके से पहुँचने का है. यह प्रयोग यथार्थवाद के इस या उस विरोधाभासी युग्मों के अध्ययन तक ही अपने को सीमित नहीं करता है, वरन् यथार्थवाद को एक ऐतिहासिक और विकासमान प्रक्रिया के रूप में देखने का हिमायती है. इस प्रक्रिया में यथार्थवाद के नकारात्मक और सकारात्मक पक्ष साथ-साथ अंतर्गुम्फित रहते आये हैं। अपने उदय और विकास की इस प्रक्रिया में ही वह अपना क्षय और अपनी मृत्यु भी रचता चलता है। ज्यों-ज्यों वह मजबूत होता है त्यों-त्यों वह कमज़ोर होता चलता है। विजेता पराजित हो जाता है। इसकी जीत में ही इसकी हार शामिल है। जीवन-चक्र के अर्थ में नहीं, उद्विकास के अर्थ में नहीं, किसी एन्ट्रापी के अर्थ में नहीं न ही किसी ऐतिहासिक उत्थान पतन की दास्तान के अर्थ में. बल्कि एक विरोधाभास की तरह अंतर्विरोध के अर्थ में इसे सोचने का प्रयोग. एक द्वंद्वात्मक प्रयोग।)

इस विचारोत्तेजक प्रयोग में हम सब यदि शामिल हों तो हमारी कहानी आलोचना के लिए और शायद उनके लिए भी अच्छा होगा जो आज यथार्थवाद के पीछे डण्डा लिए दौड़ रहे हैं। जी, मेरा इशारा हिंदी कहानी के पिछले 25 सालों के विकास पर बात करने वाले आलोचना के कुछ नए राजकुमारों की तरफ भी है। बहरहाल, यह कहानी फिर कभी।

हत्यारे कहानी में जो मूल्य-निर्णय है वह हत्या की घटना में है। जरूरी नहीं कि हर कहानी में यह मूल्य-निर्णय आये ही। लेखकीय मूल्य-निर्णय कोई अनिवार्यता नहीं है। परंतु अपराध की इस मनोवृत्ति के बारे में, इस फासीवादी प्रवृत्ति के बारे में अगर कहानी के भीतर उसके मजदूर वर्ग का विरोधी होने का निर्णय नहीं होता तो यह कहानी इतनी मूल्यवान नहीं होती। वह पेटी बुर्जुआ की जो एक खास प्रवृत्ति है- नपुंसक, बड़बोली, ऐय्याश युवा पीढ़ी का चरित्र-चित्रण मात्र बन कर रह जाती। ऐसे चरित्रों के भावी विकास का, गहरे खलनायकत्व का उद्घाटन वहां नहीं हो पाता। यह पीड़ा भरी प्रतीक्षा के प्रतिक्रियावादी रूपांतरण की कहानी है। विद्रूप विडंबनाओं के नायक घीसू और माधव लुम्पेन सर्वहारा हैं और हत्यारे कहानी के नायक या खलनायक, यदि कहने की अनुमति दें, तो लुम्पेन पेटी बुर्जुआ हैं। कहानी के भीतर का यह मूल्य-निर्णय दरअसल रचना-प्रक्रिया का एक अहम हिस्सा है।

 हमारे आज के कथालोचक यह दावा कर रहे हैं कि जन-जीवन में जब कोई यूनिंगफाइंग फैक्टर नहीं है तो कहानी के भीतर वह कहां से होगा। किसी यूनिंगफाइंग फैक्टर के बिना कहानी की रचना-प्रक्रिया में कोई मूल्य-निर्णय तो आ ही नहीं सकता। फिर क्या किया जाए! यूनीफाइंग फैक्टर मतलब -विश्वदृष्टि या जीवन दृष्टि। लेकिन यथार्थ के असम्बद्ध होने की चर्चा पहली बार तो नहीं हो रही है। और हम अपने अनुभव से जानते हैं कि समाज के संक्रमण काल में हमेशा ही ऐसी बातें होती रही हैं। ऐसी बातों में हमारे समय के एक प्रमुख चरित्र की ईमानदार स्वीकारोक्ति भी होती है। याद करें कि आधुनिकतावाद की धारा के एक आदि नायक टी.एस. इलियट ‘डीसोसिएशन ऑफ सेंसबिलटी’ की चर्चा किया करते थे। पिछले 20-25 सालों के तीव्र परिवर्तन ने हमारी संवेदनाओं में एक असम्बद्धता तो पैदा की ही है। जैसे इलियट के समय में भी हुई थी। आज हम तेजी से उपभोक्तावादी समाज में बदलते जा रहे हैं। हमारी पिछली पीढ़ी के महान सिनेमाकार और राजनीतिक कार्यकर्ता पियरे पाउलो पासोलिनी ने फासीवाद के नए स्वरूप को उपभोक्तावाद में बदलते देखा था। देख लिया था, इसलिए उनकी हत्या कर दी गई. और फासीवाद के इस आसन्न संकट के काल में पुराने और नए के संधिकाल में हमारी भी चेतना आक्रांत है. इसलिए मानव विरोधी विचारधाराओं के द्वारा चेतना पर छायी इस धुंध को और अधिक मिस्टीफाई (रहस्यात्मक) करने का षडयंत्र रचा जा रहा है। खण्ड-खण्ड पाखण्ड की दृष्टि एक ऐसी ही मानव विरोधी विचारधारा है। ताज्जुब नहीं, इस विचारधारा का पहला हमला यथार्थवाद पर है। ऐसा क्यूं है कि मानव विरोधी विचारधाराओं का पहला हमला समय-समय पर यथार्थवाद के खिलाफ होता है! क्योंकि यथार्थवाद और चाहे जो हो उसके मूल में है मानव-विरोधी मिस्टीफिकेशन को, उसके धुंध को साफ कर देना। डी-मिस्टीफिकेशन यथार्थवाद की एक प्राथमिक शर्त है। जहां से बुर्जुआ सोसायटी के लिए अपने-आप यह शैली खतरनाक सिद्ध हुई है। बहरहाल, उसके अलग-अलग ट्रेडीशन हैं, अंग्रेजी ट्रेडीशन, फ्रेंच ट्रेडीशन खैर! लेकिन सीधे डी-मिस्टीफिकेशन एक महत्त्वपूर्ण काम है। मूल्य-निर्णय का सम्बन्ध क्या इस डी-मिस्टीफिकेशन से है? डी-मिस्टीफिकेशन की यह प्रक्रिया बदलाव की नई ताकतों के प्रति रचना-प्रक्रिया में मूल्यबोध की तरह आती है। लेखक की प्राथमिक संवेदना से लेकर पाठ की प्रक्रिया तक इसका निरंतर विकास होता है। ब्रेख्त के लिए रचना-प्रक्रिया के साथ चलने वाला यह डी-मिस्टीफिकेशन एक क्रियावान, उत्कंठापूर्ण और प्रयोगात्मक भी है. या दुसरे शब्दों में कहें तो सामाजिक संस्थाओं और भौतिक दुनिया के प्रति वैज्ञानिक दृष्टि का उन्मेष है। यथार्थवाद इसी वैज्ञानिक दृष्टि को प्रोत्साहित करता है, प्रयोग के स्तर पर भी। और यह प्रक्रिया त्रिस्तरीय है। पहली, रचना में पात्रों और उसकी काल्पनिक दुनिया के बीच। दूसरी, रचना और पाठक के बीच। तीसरी, रचना-रचनाकार का अपने कच्चे माल और टेक्निक के बीच। यथार्थवाद का यह त्रिआयामी व्यवहार (प्रैक्सिस) परंपरागत अनुकरणों और उनके शुद्ध प्रतिनिधिमूलक केटेगरी को ध्वस्त कर देता है. जिसके प्रभाव में आजकल का अधिकांश दलित लेखन है। फिर बकौल जेम्सन ‘रीडिंग इज ए सिम्बोलिक एक्ट’। इस ‘सिम्बोलिक एक्ट’ के प्रति सजग होना, आत्म सजग होना जरूरी है। यह सजगता एक सचेतन क्रिया है। इस क्रिया में अपने राजनीतिक अवचेतन की संरचना के प्रति सजगता भी शामिल है। दिक्कत यह है कि क्या हमारा लेखन और हमारी आलोचना खुद आत्म सजग है! ‘हत्यारे’ कहानी का पाठ आज के समय में यही चुनौती हमारे समक्ष रखता है। बात सिर्फ रचना के क्लास मोटिफ को उद्घाटित करने या अलग-अलग विमर्शों के  लिहाज से उसकी व्याख्या का नहीं है . अर्थात् रचना के बाहर की दुनिया का प्रतिबिम्ब और उसकी व्याख्या का नहीं है। बल्कि रचना की विकासमान सम्पूर्णता का है। इसीलिए उसकी हिस्टोरीसिटी का है। विषय से विचार तक की यात्रा का खतरा दरअसल हिस्टोरीसिटी के अन्वेषण का खतरा है। अमरकांत की कहानी में यह हिस्टोरीसिटी उसके मूल्य-निर्णय की प्रक्रिया में आयी है। यह हिस्टोरीसिटी न केवल समकालीनता का यूनीफाइंग फैक्टर है वरन् हमारे और रचना के कालांतर का भी एक यूनीफाइंग फैक्टर है। यह रचना से पाठक तक लगातार जारी है. इस अर्थ में यह हिस्टोरीसिटी विद्आउट हिस्ट्री है .और इसी अर्थ में यह वर्तमान की वर्तमानता है। इसी अर्थ में हत्यारे कहानी खुद अमरकांत की कहानी-कला की आलोचना है। उसमें एक ब्रेक है. अमरकांत के कहानी संसार में एक घटना की तरह। हत्यारे कहानी का अंत कुछ इस तरह होता है, ‘झोपड़ियों से कुछ व्यक्ति निकलकर युवकों के पीछे दौड़े। तारकोल की सड़कें जन-शून्य थी। दोनों युवक अरबी घोड़ों की तरह दौड़ रहे थे। वे कभी बाएं घूम जाते, कभी दाएं। पीछा करने वालों में एक फुर्तीबाज व्यक्ति तीर की तरह उनकी ओर बढ़ रहा था।…जो व्यक्ति ‘हाय मार डाला’ कहके लड़खड़ा कर गिर पड़ा। इसके बाद दोनों पुनः तेजी से भाग चले। तब बिजली का खम्भा आया तो रोशनी में उनके पसीने से लथपथ ताकतवर शरीर बहुत सुंदर दिखाई देने लगे। फिर वे न मालूम किधर अंधेरे में खो गए!’ जिस अंधेरे में दोनों न जाने कहां गुम हो गए यह वही अंधेरा है जो मुक्तिबोध के ‘अंधेरे में’ है। जहां वे डोमा जी उस्ताद को देख लेते हैं। हम अपने अंधेरे में क्या देख रहे हैं! यह क्या हमारे मूल्य-निर्णय से तय नहीं होता!

दो अवांतर प्रसंग छोटे-छोटे- एक, हमारा एक कलाकार मित्र अनुपम मूवमेंट में पेंटिंग्स करता है। उसकी एक समस्या है। हालांकि यह कहानी के बाहर का प्रसंग है लेकिन कला का महत्त्वपूर्ण प्रश्न है और यथार्थवाद का भी एक महत्त्वपूर्ण प्रश्न है। वह कहता है कि हम जिस शैली में अब तक पेंटिंग्स बनाते आए हैं अब यथार्थ उसी शैली में बद्ध होकर हमारे सामने आ रहा है। याद कीजिए मुक्तिबोध की भी यही समस्या थी। वह कहता है कि मैं अपने ही शिल्प में बंधने के चलते यथार्थ को नहीं देख पा रहा हूं- यह जो परिवर्तनशील यथार्थ है। वह अपना एक अनुभव बताता है कि वह एक बार एक स्त्री के जीवन की किसी परिस्थिति पर बड़े भावावेग से एक चित्र बना रहा होता है। पेंटिंग्स पूर्ण नहीं हो पा रही है। वह परेशान है। अचानक इस परेशानी में वह अपना शरीर काटकर खून से पेंटिंग का एक हिस्सा बना देता है और अपने बाल नोचकर पेंटिंग्स में जहां-तहां चिपका देता है और कहता है कि मुझे बहुत शांति मिली है। कलाकार रचना में अपने बॉडीली प्रजेन्स (शरीरी उपस्थिति) को खोजना चाह रहा है। पेंटर पेंटिंग्स में अपनी उपस्थिति खोजने की कोशिश में है। यह बॉडली प्रजेन्स का क्राइसिस कला का एक वास्तविक अनुभव तो है, लेकिन यह मिसप्लेस्ड क्वेश्चन है। यह प्राब्लम मिसप्लेस्ड है क्योंकि पॉलिटिक्स में जैसे वह अपनी प्रजेन्स को आंदोलन के भीतर देख रहा है; रचना, जो प्रोटेस्ट के भीतर से निकलने वाली रचना है इसलिए महत्त्वपूर्ण भी है, के भीतर भी अपना बॉडली प्रजेन्स ढूंढ़ रहा है। राजनीति की दुनिया का कला की दुनिया से जो सम्बन्ध होगा, वह क्या होगा? क्या रचना-प्रक्रिया में जिसको मुक्तिबोध कहते हैं, जब तक तटस्थता नहीं होगी तब तक तदाकारिता सम्भव नहीं है। प्रश्न वहां अटैच होकर के बॉडली प्रजेन्स का, स्वानुभूति का नहीं है प्रश्न डिटैचमेंट का है। यह डिटैचमेंट लग सकता है कि कोई आधुनिकवादी तर्क हो, उपभोक्तावादी सर्जक मन का। खैर, इस पर चर्चा कहीं और।

दूसरा प्रसंग, नामवर सिंह ने हाल-फिलहाल पप्पू यादव की किताब का लोकार्पण किया। पप्पू यादव हत्यारे कहानी के नायक भी हैं। प्रश्न है, उन्होंने हत्यारे कहानी के बारे में कहा कि वहां मूल्य-निर्णय महत्त्वपूर्ण है. यह बात तो सही है कि दुनिया भर में अपराधियों की डायरियां आदि काफी लोकप्रिय हुई है;  उस पर विचार करना एक अलग बात है. लेकिन उसकी किताब का लोकार्पण करना एक राजनीतिक काम है। इसमें आपका मूल्य-निर्णय होगा कि नहीं! यानि रचना और आलोचना के प्रश्न जीवन के प्रश्न होंगे कि नहीं! यह एक महत्त्वपूर्ण सवाल है। शायद इसी अर्थ में प्रेमचंद कहते थे कि हर कोई चाहता है कि मेरा जीवन एक कहानी बन जाए।

मार्तण्ड प्रगल्भ

मार्तण्ड प्रगल्भ

छात्र राजनीति और संस्कृति-कर्म में व्यस्त रहने वाले मार्तण्ड प्रगल्भ जे.एन.यू. के भारतीय भाषा केंद्र में पी.एच.डी. के लिए शोधरत  हैं। उनसे mpragalbha1@gmail.com पर संपर्क संभव है

(जन संस्कृति मंच के कथा समूह के प्रथम आयोजन ‘कथा मंच’ के तृतीय सत्र में कथाकार मार्तण्ड द्वारा ‘अमरकांत की कहानी हत्यारे और आज का समय’ पर इलाहाबाद में दिनांक 22 दिसंबर, 2013 को प्रस्तुत व्याख्यान। लिप्यावतरण- श्रीकांत पाण्डेय।)

सुरेन्द्र चौधरी- विराट ऐतिहासिक संदर्भों से समृद्ध आलोचक: मार्तंड प्रगल्भ

सच्ची आलोचना किस कदर गंभीर वैचारिक संघर्ष का परिणाम होती है इसे सुरेन्द्र चौधरी के लेखन में स्पष्ट ही देखा जा सकता है। रचना के प्रति  जिस संवेदनशीलता की जरूरत होती है और असहमति के क्षणों में भी आलोचना की भाषा में  जो विनम्रता होनी चाहिए इसे भी इनके यहाँ देखा जा सकता है। सुरेन्द्र चौधरी पर बहस एक ऐतिहासिक ज़रुरत है। ज़रुरत है हिंदी की प्रगतिशील आलोचना की एक दूसरी परम्परा से संवाद की। बौद्धिक समाज क्या इसके लिए तैयार है? विचारहीनता और तात्कालिकता के दबाव के बीच हिंदी आलोचना की समृद्ध प्रगतिशील परंपरा क्या सुरेन्द्र चौधरी से संवाद नहीं करेगी? ऐतिह्यता का प्रश्न सुरेन्द्र चौधरी के लेखन का मूल प्रश्न है। इसलिए समकालीनता और तात्कालिकता से उनकी मुठभेड़ ही उनकी आलोचना बनाती चलती है। यह अकारण नहीं कि इतिहास के प्रश्नों से उलझने वाला यह आलोचक साहित्य के आख्यान रूपों पर अपनी विशेष दृष्टि रखता है। पर कविता के संबंद्ध में उनका छिटपुट लेखन किसी भी बड़े काव्य आलोचक के लिए इर्ष्या का कारण बन सकते है।  बहरहाल। 

BY मार्तंड प्रगल्भ 

सबसे पहले डॉ॰ चौधरी की पुस्तक ‘इतिहास: संयोग और सार्थकता’ से उनके कुछ निष्कर्षों-स्थापनाओं को उद्धृत करना चाहता हूँ-

  •  ‘‘स्पष्ट है कि हिंदी साहित्य में आधुनिकता दो महायुद्धों के बीच उत्पन्न अवस्था नहीं है और न वह मात्र ‘मूल्यबोध और विराट विघटन’ के तनाव के बीच की उपलब्धि है। हिंदी में आधुनिकता की प्रतिष्ठा इस ‘विराट विघटन’ के नारे से लगभग 80-90 वर्ष पूर्व हो चुकी थी। हिंदी में आधुनिकता बोध का संस्कार आत्मचेता से अधिक वस्तुसत्य चेता है।’’ (पृ.219 खंड1) (ध्यान दें कि आधुनिकतावाद शब्द का इस्तेमाल न करते हुए भी, आधुनिकता, आधुनिकताबोध के अपने आशयों को यहां मिलाकर प्रयोग किया गया है। परंतु महायुद्धों की चर्चा से स्पष्ट है कि आधुनिकतावाद शब्द के अपने अर्थों में ही इसे पढ़ना चाहिए। इन शब्दों के अपने अर्थ पश्चिमी हैं परंतु डॉ॰ चौधरी भारतीय परिस्थितियों में इसे समझने की कोशिश कर रहे हैं।)
  •  ‘‘भारतीय परिस्थितियों में ‘उदारतावादी चेतना’ चूंकि रोमैंटिक दृष्टिविस्तार का परिणाम थी और बौद्धिक उद्बोध की परिणति थी इसलिए आधुनिक इतिहास में वह अपने ढंग की अकेली है। …भारत में आधुनिकता पश्चिमी राज्यसत्ता की क्रांतिकारी भूमिका से नहीं आई और न वह भारत में उनकी शैक्षणिक नीति से आई। वह भारतीय बुद्धिजीवी के उद्बोध से उत्पन्न हुई। …वस्तुतः भारत में आधुनिकता का उत्थापन अंग्रेजों की प्रत्यवस्थान शक्ति से भारतीय पूंजी के प्रतिरोध से होता है। इस अर्थ में भारतीय पूंजीपति की राष्टीय भूमिका अपने उत्थापन युग में क्रांतिकारी जनहितपरक, और राष्टीय स्वार्थ से अनिवार्यतः प्रेरित रही है। भारतेंदु युग का संपूर्ण साहित्य अपने जन चारित्र्य के व्याख्यान के द्वारा यह स्पष्ट करता है कि इस युग में भारतीय बुद्धिजीवी का स्वार्थ अविकल रूप से भारतीय जनता से जुड़ा हुआ था। इस काल का वर्गसंघर्ष चरित्रतः उपनिवेशविरोधी और आभिजात्यविरोधी है। यही कारण है कि संपूर्ण युग की विचार पद्धति में उपनिवेशविरोध और आभिजात्यविरोध की चिंतासरणि प्रधान है।’’ (पृ.219-20-21,खंड1)
  • ‘‘ऐसा लगता है कि ‘भाग्यवती’ के लेखक ने अकेले भाग्यवती से सारी भूमिकाएं संपन्न करवाने का व्रत ले लिया है, फिर भी इतना तो निश्चित है कि हिंदी उपन्यास साहित्य में भाग्यवती आधुनिक युग की यूलिसिस है।’’ (पृ.222, खंड1) (यूलिसिस और जेम्स ज्वाएस की अपनी पश्चिमी उपस्थिति और आयरलैंड की औपनिवेशित दासता जिस ढंग से अंतर्विरोधी साम्राज्यवादी चरित्र का क्रिटिक है, उसे भारतीय संदर्भों में भाग्यवती से तुलना करना एक प्रमुख वैचारिक प्रस्थान है। ‘माडर्निस्ट’ पेपर में संकलित फ्रेडरिक जेमसन के लेखों में इस आधुनिकतावाद के सहारे साम्राज्यवाद के चरित्र को समझने का प्रयास किया गया है।)
  • ‘‘उदारता की चेतना, मेरी छोटी धारणा के अनुसार, एक विशेष वर्ग की जीवन परिस्थितियों की द्वंद्वात्मकता की मांग है। यह वर्ग अपने प्रारंभिक उत्थापन के युग में निश्चित रूप से क्रियाशील, अथवा प्रगतिशील रहता है। भारतेंदु युग अपनी उदारचेता जीवन-विधा के कारण और विचार सरणि के कारण क्रियाशीलता और प्रगति का युग है। इस युग की सबसे बड़ी विशेषता इसका ‘आधुनिकता बोध’ नहीं है, बल्कि आधुनिकता की मांग को क्रियात्मक पूर्णता देने की तत्परता है। यह युग, जहां एक अभावात्मक परिस्थिति का निषेध करता है (निगेशन ऑफ निगेशन) वहीं इसका अंतर्विरोध सार्थक हो जाता है।’’ (पृ.223,खंड1)
  • ‘‘भारतेंदु युग की सारी परिस्थितियां रोमांटिक धारणा के अनुकूल होकर भी रोमैंटिक उद्बोध में असफल रहीं। इसका एकमात्र कारण राजनीतिक सत्ता का अंतर्विरोध था। भारत उस उत्थान विशेष में औपनिवेशिक व्यवस्था के रूप में परिणति ग्रहण कर रहा था, फलतः भारतीय बुद्धिजीवी उस अदम्य असीमित इच्छाशक्ति के बोध को व्यावहारिक परिणति देने में असमर्थ था। राजनीतिक  परतंत्रता ने भारत के प्रथम आत्मोद्बोध को व्यंग्यात्मक परिणति दे दी। किंतु यह राजनीतिक परतंत्रता देश की प्रथम जागृति को बहुत दिनों तक व्यंग्यात्मक दृष्टिकोण के घेरे में बंधे रहने तक विवश नहीं कर सकी। निर्विशेष राष्टीयता बनकर यह जागृति श्रीधर पाठक, राम नरेश त्रिपाठी और मैथिलीशरण गुप्त के साहित्य में उत्थापित हुई। हिंदी में छायावाद इसी निर्विशेष जागृति का परिणाम है। उसकी अवाचकता का यही रहस्य है। (पृ.226, खंड1)
  •  ‘‘कविता के आश्रय पक्ष की जितनी समृद्ध भक्ति काल के पश्चात छायावाद के उत्थान में देखी जा सकती है वह न इन दो कालों के अंतराल में संभव है और न उसके पश्चात ही। व्यक्ति की इच्छाशक्ति जितने विविध धरातलों पर छायावाद युग में बोध (रियलाइजेशन) ढूंढती है, उतनी किसी परवर्ती उत्थान में नहीं।’’ (पृ. 227, खंड1)
  •  ‘‘प्रसाद ने न केवल गुप्त युग की गाथाएं गाईं, बल्कि उस युग की कला, संस्कृति का दैवीकरण किया। उन्होंने भारतीय इतिहास की गति का अतीत की ओर मोड़ना चाहा…। प्रसाद शात्योब्रां की तरह स्वच्छंदतावाद की प्रतिक्रियात्मक सरणि के अनुगामी है। राजनीतिक धारणा के क्षेत्र में साम्राज्य वैभववादी, धर्म के क्षेत्र में सनातनी और दर्शन के क्षेत्र में सांस्कृतिक स्पर्श के साथ प्रसाद स्वच्छंदतावादी हैं।’’ (पृ.228, खंड1)
  •  ‘‘महादेवी इस धारा की सबसे कमजोर कवयित्री हैं क्योंकि उनका उद्बोध न अतीत की भूमि पर संतुलित हो पाता है और न इतिहास की वर्तमान गति का अनुसरण कर पाता है। अतीत से विच्छुरित और वर्तमान में अप्रतिष्ठित कवयित्री की आत्मा संतुलन के लिए मात्र अवाचक का सहारा लेती रह जाती है। उनका दुखवाद इसलिए (मेरी दृष्टि में) उनके व्यक्तिगत कारणों से अधिक दृष्टिकोण की अस्पष्टता का परिणाम है। महादेवी निरर्थक आत्मचेतना का दैवीकरण करती हैं।’’ (पृ.228, खंड1)
  •  ‘‘पंत जी का रोमैंटिक दृष्टिकोण अपनी ही द्विरूपता के कारण उलझ जाता है। ‘गुंजन’ के उपरांत निरंतर वे पश्चिम और पूर्व के बीच अपनी चेतना का समझौता करने को आकुल हैं। भौतिकता और आध्यात्मिकता उनके लिए समस्याएं (इनिग्मा) उलझनें बन जाती हैं। भावसत्ता और वस्तुसत्ता के बीच कृत्रिम विभाजन करने को वे आकुल हैं। ऐसा कृत्रिम विभाजन निराला ने नहीं किया; महादेवी ने भौतिक धरातल का बलात् निषेध-आग्रह रखा, प्रसाद ने ‘कामायनी’ में इस विरोध का संतुलन कल्पित रूप से कर लिया। पंत जी किसी भी कल्पित भूमि पर ऐसा समझौता कर नहीं पाते, अरविंद के सर्वचेतनवाद की शरण में जाकर भी नहीं। (उदाहरणार्थ ‘कला और बूढ़ा चांद’)। वे चेतना के धरातल पर दो बिंदुओं को सरल रेखा से मिलाना चाहते हैं, यथार्थ अंतर्विरोध बन जाता है। फलतः वे प्रसाद की तरह नव्य श्रेण्यता (निओ क्लासिसिज्म) को स्वीकार करने में भी अक्षम रहते हैं और शुद्ध रोमैंटिक उद्बोधों को भी सहेज नहीं पाते। निराला और प्रसाद से वे इसी अर्थ में न्यून सिद्ध होते हैं।’’ (पृ.231, खंड1)
  • ‘‘मेरी दृष्टि में छायावाद के प्रारंभिक उत्थान में नाटकीय संवादी स्वर नहीं है। यह शुरू होती है बच्चन, भगवती चरण वर्मा, दिनकर और नवीन के साथ। इन कवियों में अधिकांश के पास कोई दृष्टि ही नहीं है, उनके पास केवल प्रतिरोधजन्य नाटकीयता है जो कभी दृष्टि बन ही नहीं सकती। उस अर्थ में इनमें जो सहजता है, उसे विशिष्ट मनोभूमि की सहजता मानने का खतरा केवल साही साहब ले सकते हैं। जितना शक्ति प्रवाह बच्चन और वर्माजी की रचनाओं में नहीं है, उतना साही साहब में है जिसके बहाव में वे साहित्य के सहज विकास के सूत्रों को छोड़कर कैलिडोस्कोपिक विविध्ता में खो जाते हैं।’’ (पृ.233, खंड1) (‘लघु मानव के बहाने हिंदी कविता पर एक बहस’ में उल्लिखित छायावादी विजन के टूटने के संदर्भ में पढ़ा जाए।)
  •  ‘‘चाहे प्रगतिवादी आंदोलन ने साहित्य में कोई महान भूमिका न भी पूरी की हो मगर इतना तो मानना पड़ेगा कि उसने क्षयी रोमांस का रचनात्मक धरातल पर विरोध किया और हिंदी नवलेखन को मध्य वर्ग की पतनशीलता की तस्वीर बन जाने से बहुत हद तक बचा लिया। हिंदी नवलेखन अगर ‘गुनाहों के देवता’ की पूजा और ‘अंधा युग’ के विक्षिप्त बोध से बच सका तो इसका कारण मैं यशपाल, अश्क, नागार्जुन, त्रिलोचन और केदारनाथ अग्रवाल के सशक्त रचनात्मक लेखन को मानता हूँ।’’ (पृ.235, खंड1)
  •  ‘‘तृतीय दशक में रोमैंटिक दृष्टि जिस प्रकार अपनी विशिष्ट असंगतियों के कारण पतनशील हो गई थी। उसकी प्रतिक्रिया की जमीन अलग-अलग है, एक ओर अज्ञेय के साथ व्यक्तित्व का उत्थापन और दूसरी ओर मानववाद की परंपरा के विकास की तत्परता। संपूर्ण चतुर्थ दशक और पंचम दशक में व्यक्तिवाद से मानववाद की टकराहट होती रही और उसकी अनुगूंज साहित्य के क्षेत्र में सुनाई पड़ती रही। इस दरम्यान व्यक्तिवाद न बर्गशां से लेकर सार्त्र तक के नकाब बदले, मगर उसका संकट समाप्त नहीं हुआ।’’ (पृ. 236)
  •  ‘‘1950-60 तक नवलेखन ने एक व्यापक आंदोलन का स्वरूप धारण कर लिया लेकिन इससे यह नहीं मान लेना चाहिए कि नवलेखन पर व्यक्तिवाद का प्रभाव शेष ही नहीं रहा था। कवियों का एक समुदाय ऐसा था जो अब भी बदले हुए स्वर में पुराना राग अलाप रहा था। कहानियों में व्यक्तियों की आत्मकेंद्रता के साथ एक समानान्तर स्वर भी उभरता है जिसे प्रकाश में लाने की आवश्यकता है। यह स्वर हमारे स्वातंत्रयोत्तर नवजागरण से जुड़ा हुआ है। (डॉ॰ नामवर सिंह की शब्दावली में)” (पृ.237, खंड1)

    Surendra Choudhary 13 जून 1933- 09 मई 2001

    Surendra Choudhary
    13 जून 1933- 09 मई 2001

क्या आधुनिक हिंदी साहित्य के इतिहास को देखने की एक नयी दृष्टि का उन्मेष इन उद्धरणों से होकर नहीं जाता? बौद्धिक समाज क्या इसके लिए तैयार है? विचारहीनता और तात्कालिकता के दबाव के बीच हिंदी आलोचना की समृद्ध प्रगतिशील परंपरा क्या सुरेन्द्र चौधरी से संवाद नहीं करेगी? ऐतिह्यता का प्रश्न सुरेन्द्र चौधरी के लेखन का मूल प्रश्न है। इसलिए समकालीनता और तात्कालिकता से उनकी मुठभेड़ ही उनकी आलोचना बनाती चलती है। यह अकारण नहीं कि इतिहास के प्रश्नों से उलझने वाला यह आलोचक साहित्य के आख्यान रूपों पर अपनी विशेष दृष्टि रखता है। पर कविता के संबंद्ध में उनका छिटपुट लेखन किसी भी बड़े काव्य आलोचक के लिए इर्ष्या का कारण बन सकते है।  बहरहाल।

 सुरेंद्र चौधरी के लिए भारतीय इतिहास की धारा जातीयता के निर्माण के प्रश्न से तय होती मालूम होती है। जातीय निर्माण की प्रक्रिया संबंधी यह चिंतन हिंदी में राम विलास शर्मा की देन है। जातीय निर्माण की अवधारणा को भाषा से जोड़ते हुए डॉ॰ शर्मा ने एक किताब लिखी थी-‘भाषा और समाज’। इसमें उन्होंने कुछ महत्वपूर्ण मुद्दे उठाए थे। लघु जातियों के निर्माण संबंधी अवधारणा को प्रस्तुत करते हुए शर्मा ने बताया था कि किस प्रकार जनपदों के विकास से भिन्न वस्तुगत आधार लेकर मध्यकाल में जातियों का निर्माण हुआ। यह निर्माण हिंदी की भिन्न बोलियों के विकास के साथ हुआ था और दोनों में कापफी सारे संबंध सूत्र उन्होंने खोजे थे। स्तालिन के महाजाति की निर्माण संबंधी धारणा और उसके भाषा विषयक चिंतन का प्रभाव यहां स्पष्ट रूप से लक्षित किया जा सकता है। इसे आधुनिक काल में तथा उससे पहले व्यापारिक पूंजीवाद के साथ जोड़ते हुए महाजाति और राष्ट्रभाषा की अवधारणा डॉ॰ शर्मा ने रखी थी। इतिहास की यह अवधारणा दोषयुक्त है परंतु उसके अपने ऐतिहासिक आधार भी हैं। और इसका एक सिरा राष्ट्रवादी इतिहास लेखन और मार्क्सवादी इतिहास लेखन के घालमेल में खोजा जा सकता है। बहरहाल, नवजागरण और जातीय निर्माण संबंधी प्रक्रिया के चिंतन का एक स्वरूप और उसका प्रभाव ग्रहण चौधरी के लेखन में स्पष्टतया देखा जा सकता है। इसी संदर्भ में औपनिवेशिक चिंतन को एक चुनौती भी मिलती रही है। डॉ॰ चौधरी ने 1857 के महाविद्रोह के बाद चलनेवाली जातीयताओं के नवगठन को औपनिवेशिक प्रशासकीय नीति के लिए एक खतरा माना था। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में लिखा कि उर्दू को इलाकाई जबान बताकर अलगाने की कोशिशें हुईं, बंगाल विभाजन हुआ, मराठा क्षेत्र को तोड़ा गया और उड़ीसा के साथ विभाजक नीति अपनाई गई। ‘‘ऐसी स्थिति में भारत की एकता, कौमियतों की नकार से सिद्ध करने के बजाय उसके सहकार में सिद्ध करने का स्तर जनवादी है।’’ (पृ.122, खंड1) इतिहास में जनवादी मूल्यों की पहचान हमेशा एक चुनौती रही है। रेडिकल इतिहास लेखन कई बार अतिवाद का शिकार होता रहा है। इस अतिवाद के मूल में एक ऐसी इतिहास दृष्टि काम करती है जो नितांत समकालीन विमर्शों का प्रक्षेप अतीत के किसी कालखंड में करता है। ठेठ समकालीन विमर्शों को आधार बनाकर इतिहास की व्याख्याएं  गलत निष्कर्षों तक पहुंच जाती हैं। हिंदी नवजागरण संबंधी चिंतन के साथ यही होता रहा है। सांप्रदायिकता के प्रश्नों से जूझते हुए कुछ विचारक हिंदी नवजागरण को नितांत हिंदू नवजागरण सिद्ध करते हैं। ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य की सीमाओं को ध्यान में न रखने के कारण ही ऐसा होता है। भारतेंदुयुगीन नववैष्णवता को पुनरुत्थानवादी बताना भी ऐसी ही दृष्टि का फल है। वास्तविकता यह है कि जिस वैष्णवता को भारतेंदु भारतीयता का आधार बता रहे थे, वह कोई मध्ययुगीन अवधारणा न थी। धर्मांधता और सांप्रदायिकता के बरक्स यह धर्म और लोक में प्रेम की महत्ता को स्वीकार करते हुए अलगाववादी ताकतों के खिलाफ एक मॉडल था। राज्य और जाति संबंधी पश्चिमी अवधारणा के समानांतर यह राष्ट्र-राज्य के अपने निर्धारक तत्वों को पहचानने की कोशिश थी। डॉ॰ चौधरी ने ‘स्वाधीनता संग्राम और हिंदी साहित्य’ नामक लेख में डॉ॰ राम विलास शर्मा की मान्यताओं से सहमति जताई है। बाद में इस नववैष्णवता के जनवादी स्वरूप की पहचान डॉ॰ नामवर सिंह ने ‘हिंदी नवजागरण की समस्याएं’ नामक अपने लेख में की है। अमेरिकी स्वाधीनता आंदोलन के वक्त जिस प्रकार नव ईसाई विचारधारा की नैतिकता कोई बाधक तत्व नहीं थी और मैक्स बेबर से लेकर व्हिटनी ग्रिसगोल्ड तक इसका समर्थन कर रहे थे, उसी प्रकार भारतेंदु मंडल की वैष्णव नैतिकता ‘क्रिस्तान, मुसलमान और ब्राहम धर्मों के प्रेम मार्ग’ को इस विचारधारा से जोड़ने का जनवादी प्रयास था। और यह अकारण न था कि नववैष्णवता की यह धारा गांधी के ‘हिंद स्वराज’ के लोकचिंतन का आधार भी बना था। पश्चिमी आधुनिकता के मूल्यों में छिपे प्राच्यवादी षड्यंत्र के सामने भारतीयता की पहचान एक समस्या है। ‘हिंद स्वराज’ के सौ वर्ष पूरे होने पर जो चिंतन दोबारा भारतीय आधुनिकता की खोज कर रही है, वह इस नववैष्णवता के महत्व को खारिज नहीं कर सकती। डॉ॰ चौधरी ने लिखा था-‘‘बचकाने किंतु उत्साही मार्क्सवादी को इसे संदर्भ से जोड़ने की जरूरत है। स्वाधीनता आंदोलन और साहित्य की प्रेरक परिस्थितियों का यह ताना-बाना बहुत महत्वपूर्ण है और किसी निर्णायक दिशा के लिए आधार का काम करता है। नववैष्णवता न पुनरुत्थानवादी है, न पुराणपंथी और न वह शुद्ध मध्ययुगीन ही है। उसमें वर्तमान के अनुरूप धार्मिक सहिष्णुता, उदारता और प्रेम मार्ग पर चलकर उस एकता की आकांक्षा है जो उसकी मुक्ति का उपनिवेश और पिछड़ेपन का बायस बन सकती है। धर्म बुद्धि साहस की स्वीकृति और आलस्य त्याग के साथ इस नववैष्णवता का वही संबंध हो सकता है जो कॉलविनवादियों का न्यू इंग्लैंड से बना था।’’ (पृ.125, खंड1)

आगे डॉ॰ चौधरी नववैष्णवता के अंतर्विरोधों को पहचानने के लिए ‘इंदु’ और ‘सरस्वती’ के लेखों का हवाला भी देते हैं। हरिऔध, मैथिलीशरण गुप्त और प्रसाद के विचारों की समीक्षा का आग्रह करते हैं। ‘जनमेजय का नागयज्ञ’ में कृष्ण का मानवता की घोषणा और ‘कंकाल’ में गोस्वामीजी के भाषणों में इस नववैष्णवता के अनुगूंज है। ‘‘आज हम धर्म के जिस ढांचे के शव को घेरकर रो रहे हैं, वह उनका (कृष्ण) धर्म नहीं है।’’ पंडित माध्व प्रसाद मिश्र के लेखों में नववैष्णवता के प्रश्नों पर चिंतन है। ग्रियर्सन की क्रिस्टोमायथी से पहले श्री ब्रहमानंद जी 1897 में निबंधावली में क्रिश्चियन विश्वासों का नववैष्णव संदर्भ दिखाया था। स्वदेश भक्ति का भावना के रसात्मक रूप का नववैष्णवता से क्या संबंध हो सकता है, यह भी डॉ॰ चौधरी की चिंता का विषय है। क्या नववैष्णवता का प्रेमचंद पर भी प्रभाव था या फिर निराला का नववेदांत पुनरुत्थानवादी था? ऐसे प्रश्नों पर फिर से विचार की आवश्यकता है।

विचारधारात्मक अंतर्विरोधों के कौन से सूत्र हिंदी नवजागरण के प्रारंभिक चरण को भाषा के सांप्रदायीकरण की ओर ले जाते हैं, इसे डॉ॰ चौधरी नहीं बताते। भारतेंदुयुगीन राजभक्ति बनाम देशभक्ति के द्वैत को व्याख्यायित न कर डॉ॰ चौधरी इतिहास की मौखिक परंपरा के क्रांतिकारी होने के मिथक को तोड़ने के लिए तत्कालीन पत्रिकाओं में छपे लेखों की ओर जाते हैं और शोध कार्य का आहवान करते हैं।

इस संदर्भ में कुछ बिंदुओं की ओर ध्यान दिलाना आवश्यक है। पहला यह कि डॉ॰ चौधरी का लेख ‘स्वाधीनता संग्राम और हिंदी साहित्य’ अक्टूबर-दिसंबर 1986 की आलोचना में प्रकाशित नामवर सिंह के लेख ‘हिंदी नवजागरण की समस्याएं’ में निकाले गए निष्कर्षों की असहमति में लिखा गया है। नामवर सिंह का मानना है कि हिंदी साहित्य का प्रत्यक्षततः संबंध बांग्ला नवजागरण से है जबकि डॉ॰ चौधरी इसे अनिवार्यतः 1857 के साम्राज्यवाद विरोधी-उपनिवेशवाद विरोधी चरित्र से जोड़ते हैं। नवजागरण और भाषा के संबंध पर नामवर सिंह ने ठोस प्रतिक्रिया दी और उसके सांप्रदायिक आधार की ओर इशारा किया है। इसलिए वहां नववैष्णवता की प्रगतिशीलता के अंतर्विरोधों को भाषा की समस्या से समझने पर बल है। यह बात सुरेंद्र चौधरी नहीं करते हैं। हिंदी नवजागरण में राजनीतिक चिंतन या सत्ता परिवर्तन की अनुगूंज मद्धिम हो जाती है और वह मूलतः सांस्कृतिक नवजागरण हो जाता है। इसलिए ‘स्वत्व निज भारत गहै’ (नामवर इसे आधुनिक शब्दावली में आइडेंटिटी से जोड़ते हैं) के स्वत्व प्राप्ति के राजनीतिक स्वाधीनता वाला पक्ष जरूरी होते हुए भी यहां तथ्यात्मक रूप से परोक्ष ही था। नामवर सिंह ने लिखा है-‘‘राजनीतिक स्वाधीनता इस स्वत्व प्राप्ति की पहली शर्त है। नवजागरण के उन्नायक इस आवश्यकता का अनुभव न करते रहे होंगे, यह सोचना कठिन है, फिर भी तथ्य यही है कि नवजागरणकालीन प्रकाशित साहित्य में राजनीतिक स्वाधीनता का स्पष्ट स्वर कम ही सुनाई पड़ता है। पहले ईस्ट इंडिया कंपनी और फिर महारानी विक्टोरिया के शासन काल में राज के विरुद्ध निश्चय ही किसानों के छिटपुट विद्रोह बराबर होते रहे जिनमें सबसे संगठित और सशक्त सन सत्तावन की राज्यक्रांति है फिर भी समकालीन शिष्ट साहित्य में उसकी गूंज सुनाई नहीं पड़ती-लोक साहित्य भले ही प्रचुर मात्र में मौखिक रूप में रचा गया। यह स्थिति सन सत्तावन के पहले तो थी ही, उसके बाद कम से कम तीन दशकों तक बनी रही। आर्थिक शोषण के खिलाफ जरूर लिखा गया, पुलिस तथा अफसरों के अत्याचार और अन्याय की भी शिकायत की गई, पर राजसत्ता पलटने के विचार को जैसे अंतर्गुहावास दे दिया गया।’’ (हिंदी का गद्यपर्व, नामवर सिंह, पृ.87, राजकमल प्रकाशन, 2010) मानो इसी का जवाब देते हुए सुरेंद्र चौधरी ने लिखा-‘‘जनता के चित्त में स्वदेशी-स्वराज का भाव 1857 की देन है, इसे स्वीकार करने में कठिनाई नहीं होनी चाहिए। संभवतः इसी शक्ति संबल को पहचानकर स्वदेशी की भावना के लिए भारतेंदु युग के कवियों को देश निकाला तो न दिया गया, पर वर्नाकुलर प्रेस पर अनेक बंदिशें डाली गईं। स्वदेशी के प्रति इस राज के रुख ने स्वतंत्रता के राग को बल दिया, इस पर बहस नहीं की जा सकती। …सत्ता परिवर्तन की आकांक्षा नारों में अवश्य प्रकट नहीं हुई। ‘अंग्रेजों भारत छोड़ो’ जैसा नारा भारतेंदु युग में न लगा था, मगर सत्ता परिवर्तन को भी गुहावास न दिया गया था।’’ और इसके प्रमाण में डॉ॰ चौधरी ने ‘नागरनैया जाला काले पनिया रे ना!’ जैसे गीतों का उदाहरण दिया है। उन्होंने बताया है कि राज-रजवार और विष्णु सिंह के गीत मगध में गाए जाते थे, बाबू कुंअर सिंह की मुसलमान प्रेमिका के गीत सारे भोजपुर में गाए जाते थे। हरेंद्र देव के काव्य में उसकी आवृत्तियां हैं। फिर अवध बुंदेलखंड से निकलकर सुदूर गया जिले तक इसकी अंतरध्वनियों की पहचान वह करते हैं।

तो क्या हिंदी जाति के साहित्य में 1857 के महाविद्रोह का मूल स्वर भारतेंदु युग में सुनाई पड़ता है? और क्या यह नवजागरण उसी चेतना का विस्तार है? क्या सचमुच हिंदी नवजागरण 1857 में व्यक्त जनजागरण की ही अगली ऐतिहासिक अवस्था है और हिंदी नवजागरण के शिष्ट साहित्य में व्यक्त विचार से नामवर सिंह का क्या अभिप्राय है? क्या भारतेंदु मंडल की विचारधारा 1857 की चेतना से भिन्न स्वर अख्तियार करती है तथा जनसमुदाय की संवेदना 1857 के साथ है? क्या मौखिक परंपरा साम्राज्यवाद उपनिवेशवाद विरोध की राजनीतिक आकांक्षा को कायम रखती है और हिंदी (या बांग्ला या मराठी) नवजागरण के नेताओं या उनके लक्ष्यीभूत श्रोता या पाठक जिस नवनिर्मित मध्यवर्ग से थे, उस मध्यवर्ग का मानस 1857 की मूलभूत चेतना से दूर पड़ता है?

डॉ॰ चौधरी और डॉ॰ नामवर सिंह दो भिन्न दृष्टियों से उस काल को देख रहे हैं। मध्यवर्गीय/भद्रलोक के शिष्ट साहित्य के अंतर्विरोधी या नवजागरण के नेताओं की अंतर्विरोधी यह साफ इशारा करती है कि वहां 1857 के दो प्रमुख गुण सांप्रदायिक एकता और औपनिवेशिक सत्ता के प्रति सचेत वैरभाव (कांसस हास्टेलिटी) का अभाव है। रंजीत गुहा मानते हैं कि ‘यह सचेत वैरभाव संघर्ष में हिस्सा लेनेवालों तक ही सीमित नहीं था’ बल्कि एक कन्पेफडरेट नेशनेलिज्म के जरिए हिंदू मुसलिम संघर्ष के सिद्धंत का समाधान भी था। इसके बदले नवजागरण कालीन नेताओं में और इसलिए साहित्य में भी वैरभाव की जगह ‘कांसस लायलिटी ऑफ द टेक्स्ट’ (देखें, रंजीत गुहा, द इंडियन हिस्टोग्रापफी ऑफ इडियाः ए नाइन्टीन्थ सेंचुरी एजेंडा एण्ड इट्स इम्प्लीकेशंस; सीएसएसएस, कलकत्ता, 1987, पृ.54) मिलता है। देशभक्ति और राजभक्ति की यह विभाजित चेतना जितना भद्रवर्गीय हितों से चालित थी, उतनी ही राष्टीय स्वरूप की निर्मिति में अदरनेस को परिभाषित करने में भी थी। डॉ॰ चौधरी लोकचेतना को 1857 का विकास मानते वक्त इस तथ्य को नजरअंदाज करते हैं। लोक की असंबद्ध यद्यपि प्रतिरोधी विचारधारा को हिंदी नवजागरण का प्रमुख स्वर मान लेना ठीक नहीं मालूम पड़ता। लोक साहित्य में 1857 की वीरता के स्मृति चिन्ह शेष थे। गीत गाए जाते थे परंतु वहां राज के प्रति कोई सचेत वैरभाव नहीं रह गया था। इसके बदले अतीत की मोहक स्मृति ही प्रधान थी। इस गौण धारा को प्रमुखता देने से नवजागरण के संष्लिष्ट चरित्र की व्याख्या उसी अतिरेकवादी उत्साही जनवाद से ग्रसित हो जाती है जिसकी खिलाफत डॉ॰ चौधरी लगातार करते रहे थे।

डॉ॰ चौधरी अगर भाषा और नवजागरण के संबंधों की पड़ताल करते तो शायद इस ओर उनका ध्यान जरूर जाता। 19वीं सदी के उतररार्द्ध का पूरा काल भारतीय राष्टीयता के निर्माण का गर्भकाल था। भारतीय राष्टीयता के तमाम अंतर्विरोधों का उत्स भी यही है। 1920 के दशक में रूप लेनेवाली सांप्रदायिकता और 20वीं सदी में लगातार बदलते राष्ट्रवादी चिंतन की रूपरेखा में अपने प्रारंभिक रूप में यहीं दिखाई पड़ती है। हिंदी और उर्दू राष्टीयताओं को उसके धार्मिक प्रतीकों के साथ पढ़ने की कोशिश हमें नवजागरण के पूरे संदर्भ को समझने पर मजबूर करता है। भारतेंदुयुगीन जातीयता हिंदू-मुसलमान भद्रवर्गीय हितों से चालित था, जहां भाषा को लगातार एक हथियार की तरह इस्तेमाल करते हुए पूरे समुदाय की पीडि़त ग्रंथि (विक्टिम कॉम्प्लेक्स) को निर्मित किया गया और इसी के सहारे जातीय गोलबंदी की गई। उस वक्त राष्टीयता का सवाल अंग्रेजों के विरुद्ध अपने आपको किस प्रकार परिभाषित किया जाए-इस प्रश्न से जुड़ी थी। इसलिए भारतेंदु और अन्य हिंदी आंदोलन के नेताओं के साथ कई उदारपंथी नेता जैसे बिशन नारायण डर (लखनऊ के सम्मानित वकील, भारतीय  राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष भी रहे तथा उर्दू के शाय तथा  मुसलमानों के मित्र के रूप में प्रसिद्ध और बंगाल के आर्थिक इतिहासकार विक्टोरियन उदारपंथी तथा प्रगतिशील राष्ट्रवादी रोमेश चंद्र दत्त ने लगातार हिंदू-मुस्लिम एकता की बात भी की और राष्ट्र की एकता के हिंदुओं की एकता की भी चर्चा की (देखें, ज्ञानेंद्र पांडेय; दी कन्स्ट्रकशन ऑफ कम्युनलिज्म इन कॉलोनियल नॉर्थ इंडिया, आक्सफोर्ड, 2006, पृ.218)। इस दौर की जातीयता में हिंदू जाति के संगठन और उत्थान का महत्व दिया गया तथा अंडरटोन के रूप में यह पहचान की राजनीति मुसलमानों को सामने रखकर निर्मित की गई। परंतु तब राष्ट्र के उत्थान का मतलब था, अलग-अलग समुदायों का उत्थान। हिंदू-मुसलमान-ईसाई-सिख आदि मिलकर राष्ट्र का निर्माण करते हैं, ऐसा माना जा रहा था। (देखें, वही, पृ. 223) भारतेंदु और सर सैयद अहमद खां के वक्तव्यों में भी इसकी अनुगूंज स्पष्ट ही देखी जा सकती है।

साठ के दशक की पूरी पीढ़ी जिस यातना, संत्रस, संशय, सिनिक, नकार विद्रोह आदि से गुजर रही थी, उसका और उसके कारणों की पड़ताल डॉ॰ चौधरी निरंतर अपने लेखन में करते हैं। डॉ॰ चौधरी ने लगातार नई पीढ़ी और बीच की पीढ़ी के अंतर्विरोधों को रेखांकित किया है। बिचली पीढ़ी के अवसरवाद तथा तटस्थता को नकारकर नवलेखन ने ‘प्रतीक्षा’ के मोहभंग के कारण एक निषेध और नकार की मुद्रा अख्तियार की थी। यह मुद्रा केवल एक भंगिमा मात्र न थी। इस नकार के वस्तुगत कारण थे और रचनात्मक मानस को ये उद्वेलित भी कर रहे थे। एक संवादी आलोचक की भांति इस नई पीढ़ी की रचनाशीलता को संभावनाओं के रूप में समझने की जरूरत थी। डॉ॰ चौधरी इसे पूरा करने की कोशिश करते हैं। स्वातंत्रयोत्तर दो दशकों में लगातार वर्ग संघर्ष की शिथिलता के कारण मध्यवर्गीय लेखक सामान्य जनजीवन से दूर होते गए। इस शिथिलता के साथ भारतीय सत्ता तंत्र की नीतियों और जनतंत्र के पीड़ादायी अनुभव ने एक ऐसी पीढ़ी को जिसने अपनी आंखें नए और स्वतंत्र भारत में खोली थीं, उमस से भर दिया। आजादी के बाद जन आंदोलनों का दौर एक तरह से रुक गया था। इसने कहीं न कहीं मध्यवर्गीय अलगाव का जन्म दिया। प्रतीक्षा और अलगाव के अंतर्विरोध में कुछ लोगों ने आत्म समर्पण कर दिया और अपनी राजनीतिक चेतना गिरवी रख दी। नवलेखन जब अलगाव और अस्तित्व के संकट की घोषणा कर रहा था तो इसे हमारे कुछ पुराने आलोचकों ने अंतर्राष्टीय नारों का प्रभाव कहकर खारिज कर दिया था। लेखन के बीज शब्द के रूप में स्वतंत्रता नई पीढ़ी के लिए महज नारा न था। लेकिन इसे मानवीय अस्तित्व की स्वतंत्रता के व्यापक फलक पर देखने के बजाय तत्कालीन प्रगतिशीलों ने भी अमेरिकी कल्चरल प्रफीडम के शीतयुद्धकालीन विचारधारा का प्रभाव माना और इसे भाववाद की इकहरी संकल्पना में ढालने की कोशिश की। दूसरी ओर, लेखक की स्वतंत्रता के नाम पर रूपवादियों खासकर परिमलवादियों और अज्ञेयवादियों ने इसे बल प्रदान किया। सुरेंद्र चौधरी ने ऐसी स्थिति को अधूरा और भ्रामक मानते हुए नवलेखन को एक बंद पद्धति मानने से इनकार किया था। आलोचना को नई पीढ़ी से बातचीत का दरवाजा खोलना चाहिए। इस मान्यता से वह कभी पीछे नहीं रहे। उन्होंने जोर देकर कहा कि नई पीढ़ी का संकट उतना निजी नहीं था जितना वह उपरी दृष्टि से मालूम पड़ता था। ‘नकार’ की दृष्टि किस ऐतिहासिक संकट में पैदा हो रही थी, उसे समझना जरूरी था। स्थिति को केवल नकारते हुए लड़ा नहीं जा सकता। यह सही था लेकिन नकार की भी एक सच्चाई तो होती ही है। इसी सच्चाई और यंत्रणा के दोहरे दबाव के बीच उस वक्त की रचनादृष्टि सार्थकता पाती है। और ‘‘जो लोग इस दुहरे दबाव को नहीं महसूस करते हैं वे या तो मुहावरे चुराते हैं, या फिर पूरी पीढ़ी के साथ एक व्यावसायिक खेल खेल रहे हैं। हमारी पीढ़ी की रचनात्मक लड़ाई का यह एक आंतरिक आयाम है।’’ (खंड तीन, पृ.146)

स्वतंत्रता के बाद की बिचली पीढ़ी ने देह को लेकर नई पीढ़ी की रचनादृष्टि को ‘ऐय्यास प्रेतों’ की तरह ट्रीट किया था। चौधरी ने देह की इस राजनीति को इसकी ऐतिहासिक भूमिका में समझने का प्रयास किया। उन्होंने स्पष्ट किया, ‘‘हम अदेह राजनीति के धर्मवीर नहीं हैं। चूंकि देह हमें देह हमें दुनिया में गोचर करती है, इंद्रियग्राहय अनुभवों से संपन्न करती है और दुनिया के मूर्त रिश्तों के बीच प्रतिष्ठित करती है, इसलिए हमारी राजनीति देह को नकारती नहीं है…। प्रश्न केवल देह की अमूर्त परिभाषा का नहीं, देह और देह के बीच मूर्त रिश्तों का है। हमारे लिए देह की अनेक यातनाएं हैं, वह हमें मूर्त-अमूर्त सभी देशों में आज गति दे रही है, इसलिए देह को हम अस्पृश्य नहीं मानेंगे। देह का दुरुपयोग करने में जैनेंद्र और अज्ञेय से कमलेश्वर और भारती भिन्न नहीं हैं। … बिचली पीढ़ी के आर्यसमाजी आलोचक देह की राजनीति को तो देखते हैं मगर उसके विस्तार को नहीं देख पाते। यह विस्तार हमें जीवन की वास्तविकताओं से जोड़ता है। देह में ही पेट भी है, इसे हम भूले नहीं हैं! आवेश के शुद्ध भावनात्मक रिश्ते आज की दुनिया में बन पाते हैं, इसमें अगर हमें विश्वास नहीं है तो जिम्मेदारी हमारी है…। चेतना अथवा संस्कारजन्य नैतिकता के सारे नियम देह पर ज्यों के त्यों लागू नहीं किए जा सकते…। देह की अपनी समस्याएं हैं, अपने स्वतंत्र नियम हैं। देह की इन ठोस मूर्त समस्याओं को नजरअंदाज कर उस पर टिप्पणी करना मुझे उचित नहीं मालूम पड़ता।’’ (वही, पृ. 147) देह की इस राजनीति को उस वक्त इतने बड़े परिपे्रक्ष्य में और किसी ने देखा हो, ऐसा मुझे मालूम नहीं। नामवर सिंह ने ‘मुक्ति प्रसंग’ के संदर्भ में लिखा था कि उस कविता में ‘‘बीच-बीच में सेक्स के खुले शब्दों से भद्र रुचि को ध्क्का देने की शोखी या शरारत है।’’ लेकिन इस देह की राजनीति का व्यापक आधार क्या है, इसकी बात उन्होंने भी न की। कापफी समय बाद फ्रेडरिक जेमेसन ने देह की इस राजनीति के ठोस द्वंद्वात्मक समझ को एक भिन्न संदर्भ में पेश किया। उत्तर आधुनिक दौर में ‘देह का आना एक वर्चुअल दुनिया में यथार्थ की विजय है। अपनी संकीर्णता और वस्तुपूजा के बावजूद देह की प्रधानता मोहक वर्चुअल रियलिटी के बीच मानवीय संवेदनाओं के हस्तक्षेप की तरह है। क्या मोहभंग से उपजे आक्रोश के दौर में नई पीढ़ी का स्वप्न को नकारकर देह की सत्ता और उसकी चुनौतियों को खुलकर व्यक्त करना इसी प्रकार का एक प्रयास न था!

नई पीढ़ी के बारे में डॉ॰ चौधरी आशान्वित थे और कृत्रिम भावनात्मक सत्य के बरक्स अपने को ही बार-बार तोड़ते, नकारते और लांघते चलने के क्रम में प्राप्त मानवीय वास्तविकता को महत्वपूर्ण मानते थे। ‘हम कुछ न बनाते हुए भी चीखने को विवश हैं’। घटित का यही मर्म कहीं न कहीं स्पर्श भी करता है और धूमिल ने ता लिखा ही था-‘‘मगर यह वक्त घबराए हुए लोगों की शर्म आंकने का नहीं है।’’ अपने को बार-बार तोड़कर अर्जित सत्य के बारे में बात करते हुए डॉ॰ चौधरी के दिमाग में रघुवीर सहाय की ये पंक्तियां जरूर रही होंगी-

‘‘कुछ होगा, कुछ होगा अगर मैं बोलूंगा

न टूटे न टूटे तिलिस्म सत्ता का

मेरे अंदर का एक कायर टूटेगा टूट

मेरे मन टूट एक बार सही तरह

अच्छी तरह टूट मत झूठ-मूठ उफब मत रूठ

मत डूब सिर्पफ टूट’’ (आत्महत्या के विरुद्ध्द्ध

परंतु बड़े आश्चर्य की बात है कि रघुवीर सहाय की इन कविताओं में उन्हें ‘आत्मीयता’ का स्पर्श नहीं मिला। और ये महज ‘रक्तचापहीन पीली पत्रकारिता’ की कविता जान पड़ी। टूटने से ज्ञात मानवीय सत्य दूसरी जगह उन्हें सपाटबयानी लगी। ऐसी सपाटबयानी ‘‘कल्पित दर्द के रिहटोरिक को तोड़ने का सबसे नाटकीय और तात्कालिक माध्यम बन जाती है। समस्या एक दूसरे स्तर पर फिर भी बनी रह जाती है। सपाटबयानी आवेश के निरंतर अंदाज को तोड़कर अगर कहीं स्थिर हो जाती है तो यह उसकी अशक्यता ही होती है। यह अशक्यता पहले रिहटोरिक को तोड़ती है फिर अपने को तोड़ते चलना उसकी नियति हो जाती है। कोई कवि मुहावरे के लंगड़े दरवाजे से आसानी से फैशन में आ जाता है और कविता को अनुभव की प्रामाणिकता से छलने लगता है…। अपने को ही बार-बार तोड़ते रहने की रघुवीर सहाय की नियति है क्योंकि उन्हें किसी शर्त पर उस जंगल से निकलना स्वीकार्य नहीं है…। मुझे लगता है कि ‘आत्महत्या के विरुद्ध’ की अधिकांश कविताएं एक अजीब रौ में लिखी गई हैं। उनमें न तो विजयदेव नारायण साही की कविताओं की आत्मीयता है और न राजकमल का वेग।’’ (वही, पृ. 63-69) मतलब इन कविताओं में आत्मीयता नहीं है और परिवेश से संपृक्ति भी नहीं है और टूटना एक मुहावरा भर है-एक रेहटोरिक को तोड़कर दूसरा रेहटोरिक गढ़ना-वास्तविक कर्मक्षेत्र की संवेदना से व्यवस्था को तोड़कर विद्रोही बनना और मुहावरों से युग को तोड़कर आततायी कहलाने का जो अंतर है, उसे आत्महत्या के विरुद्ध की कविताएं साथ-साथ व्यक्त करती हैं। आखिर क्या कारण है कि एक जगह सैद्धंतिक रूप से स्वयं को तोड़ने की महत्ता को स्वीकार करने के बावजूद डॉ॰ चौधरी को दूसरी जगह व्यवस्था को तोड़ने की इच्छा उसमें दिखाई नहीं पड़ी। उसमें आत्मीयता नहीं मिली-वह मिली भी तो विजयदेव नारायण साही की कविता में। कहीं ऐसा तो नहीं था कि पत्रकारिता की भाषा के विरोध ने उन्हें सपाटबयानी के विरोध तक पहुंचा दिया था। अनात्मीयता तथा परिवेश असंपृक्ति के अनुभव के पीछे सपाटबयानी संबंधी धारणा काम कर रही थी। काव्य भाषा संबंधी चिंतन मे ही कहीं कोइ दोष तो नही था!

रघुवीर सहाय की कविताओं में आत्मीयता नहीं मिलने पर डॉ॰ चौधरी ने जो आक्षेप लगाए थे, उसका उत्तर ‘कविता के नए प्रतिमान’ में नामवर सिंह ने दिया भी था। परिवेश को रचनात्मक रूप देने के लिए नाटकीयता कैसे काम करती है और वहां कविता के भीतर का नाटकीय नायक, जो प्राइवेट से ज्यादा सामान्य यथार्थ के किसी निजी साक्षात्कार का एक राजनीतिक व्यक्तित्व के साथ अपनी उपस्थिति दर्ज कराता है। नामवर सिंह ने लिखा था कि आत्महत्या के विरूद्ध की कविताएं ऐसे ही आत्मीय राजनीतिक व्यक्तित्व की कविताएं हैं।

निर्वैयक्तिकता की अपनी घोषणाओं के बावजूद ‘प्रगीतात्मक’ आत्मीयता का बोध और तदनुरूप काव्य भाषा का मोह डॉ॰ चौधरी को ‘आत्महत्या के विरुद्ध’ की कविताओं में ‘रक्तचापहीन पीली पत्रकारिता के मुहावरों के खतरनाक प्रयास को देख लेती है। 1970 में जब ‘कविता के नए प्रतिमान: विसंगति और विडंबना का सौन्दर्यशास्त्र’ शीर्षक आलेख में डॉ॰ चौधरी ने ‘कविता के नए प्रतिमान’ की समीक्षा की तो फिर से अपनी पुरानी धारणा का ही समर्थन करते हुए लिखा-‘‘पत्रकार की नाटकीय आत्मीयता में सबकुछ एक ‘मैं’ के अधीन होता है। इसमें की कीमियागिरी में घुलनशील तत्व: मैं बने की घोल में सारा तथ्य घुल जाता है-उसकी स्वतंत्रता और वास्तविकता समाप्त हो जाती है। ‘आत्महत्या के विरुद्ध’ में एक नाटकीय ‘मैं’ का ऐसा ही स्फार है जिसमें तथ्यों की वस्तुनिष्ठता घुलती रहती है। सबकुछ ‘मैं’ के गुंजलक में कैद हो जाता है और सारे करतब के साथ यही ‘मैं’ स्थितियों, घटनाओं और संबंधें पर गुंजलक मारकर बैठा शेष रह जाता है। इतिहास को नचाता हुआ, इतिहास के बीच गतिशील इकाई के रूप में नहीं, सर्वतंत्र स्वतंत्र सत्ता के विस्पफोट के रूप में। इस अनात्म ‘मैं’ का यही रहस्य है जिसकी ओर मैंने इशारा किया था। ‘मैं’ के स्पफार की यह मुद्रा आत्मीय नहीं हो सकती।’’ (खंड1, पृ. 211)

‘कविता के नए प्रतिमान’ की आलोचना उन्होंने दो लेखों में की है। ‘समकालीन कविता: अंधेरे से साक्षात्कार’ शीर्षक लेख में यद्यपि उन्होंने ‘कविता के नए प्रतिमान’ का नाम नहीं लिया है लेकिन विसंगति, विडंबना, नाटकीयता, सपाटबयानी और काव्यभाषा संबंधी नामवर सिंह की स्थापनाओं की आलोचना इसमें है जबकि ‘कविता के नए प्रतिमान: विसंगति और विडंबना का सौन्दर्यशास्त्र’ नामवर सिंह की किताब की समीक्षा है। ‘कविता के नए प्रतिमान’ की इससे अच्छी समीक्षा मेरे देखे में नहीं आई। डॉ॰ चौधरी ने शुरू में ही बताया है कि किस प्रकार छायावाद के ऐतिहासिक पतन पर अपनी दृष्टि केंद्रित न करके नामवर सिंह ने विजयदेव नारायण साही की इस स्थापना का समर्थन किया कि छायावाद का अंतर्विरोध उसके नैतिक विजन के टूट जाने तक सीमित था। उन्होंने आरोप लगाया कि नामवर सिंह ने इसे ज्यों का त्यों स्वीकार करते हुए भावना बुद्धि का एक हीगेलियन डाइलेक्टिक्स गढ़ लिया है। इसी का परिणाम है-काव्य संवेदना का विभाजन। डॉ॰ चौधरी ने लिखा कि नामवर सिंह की इस पुस्तक में ‘‘विवाद शैली के आतंक में इतिहास का परिप्रेक्ष्य डूबता नजर आता है… ‘कविता के नए प्रतिमान’ में जो सबसे बड़ा दोष है, वह परिप्रेक्ष्य के खो जाने का नहीं है, इतिहास के अदृश्य रह जाने का है।’’ (खंड 1, पृ. 206)

‘कविता के नए प्रतिमान’ में इतिहास के अदृश्य रह जाने के कारण नागार्जुन, त्रिलोचन, केदार और सुमन जैसे दूसरे कवि प्रतिमानों के निर्माण से गायब हैं। ‘कविता के नए प्रतिमान’ का परिप्रेक्ष्य निश्चित रूप से मुक्तिबोध हैं लेकिन ‘परिवेश और मूल्य’ में जिस इतिहास को दिखाने की कोशिश नामवर सिंह कर रहे थे, वह उन्हीं के शब्दों में अपूर्ण है और जिसकी क्षतिपूर्ति ‘अंधेरे में पुनश्च’ नामक अध्याय भी नहीं कर पाया। डॉ॰ चौधरी ने यह भी बताया है कि नई कविता के अनुभव संसार की वर्गीय संरचना को लक्ष्य करते हुए मुक्तिबोध ने जो कुछ भी लिखा, उसके बावजूद उनकी भावधारा अपनी विचारधारा से संगत न हो पाई। कला के तीसरे क्षण वाला उनका सिद्धांत उनकी अपनी काव्य प्रक्रिया का अंतर्विरोध भी है। ‘‘कला के जिस तीसरे क्षण को वे संपूर्ण रचनात्मक क्षण सिद्ध करते हैं, क्या वह ‘आत्मपूर्ण तात्कालिकता’ का पर्याय नहीं है। क्या यह ‘आत्मपूर्ण तात्कालिकता सारे कला सत्य को अपने भीतर की परिस्थितियों में या परम स्थिति में फ्रीज नहीं कर देती? सारे विकास को अपने भीतर ही नहीं समेट लेती? यह इतिहास का निषेध है और बर्गशैनियन गुणात्मक काल संरचना से मुक्तिबोध की भावधारा पीडि़त रही। इससे इनकार नहीं किया जाना चाहिए।’’ (खंड 1, पृ. 209)

डॉ॰ चौधरी ने यह भी आरोप लगाया कि विसंगति और विडंबना को जब नामवर सिंह समकालीन इतिहास की मूल लाक्षणिकता के रूप में प्रस्तुत करने लगते हैं तो वह विसंगति और विडंबना को गहरे अर्थ से काटकर फ्राइवालस बना देते हैं। बुर्जुआ सौंदर्यशास्त्र से लड़ने के क्रम में जिन रूपवादी औजारों की सहायता नामवर सिंह लेते हैं, कहीं न कहीं उन औजारों के खुद ही शिकार हो जाते हैं। डॉ॰ चौधरी ने खुद ही लिखा-‘‘कविता के मूल्यांकन में संरचनावादी दृष्टि कहां मार्क्सवादी सौंदर्यशास्त्र से टकराती है, इसे जानना हो तो नामवर की यह पुस्तक महत्वपूर्ण उदाहरण बन सकती है। जिस तरह हीगेलियन द्वंद्ववाद विचारों की गत्यात्मकता पर आश्रित है और कालचाप से आपकी प्रत्यवस्थाएं निर्मित कर उन्हें एक उच्च संश्लेष में बदल लेता है, उसी तरह नामवर का संरचनावादी दृष्टिकोण भी एक कल्पित पूर्णता का संश्लेष बनकर रह जाता है जिसका इतिहास, अनुभव और मानवीय कार्य व्यापारों तथा भावनाओं के मूर्त विश्व से कोई सीधा संबंध नहीं है। … ‘कविता के नए प्रतिमान’ वस्तुतः प्रतिमानों की भीड़ है जिसमें सही प्रतिमान दबा पड़ा रह जाता है।’’ (खंड 1, पृ. 213)

नामवर सिंह पर भाववादी चिंतन के प्रभाव के रूप में कहानी आलोचना संबंधी कुछ निष्कर्ष लगातार डॉ॰ चौधरी की आलोचना के केंद्र में रहे हैं। निर्मल वर्मा के कहानी संग्रह ‘परिंदे’ को नई कहानी की पहली कृति कहना और उसे ‘कालातीत कलादृष्टि’ से विभूषित करना ऐसा ही एक प्रयास था। डॉ॰ चौधरी लिखते हैं कि ‘परिंदे’ संग्रह की कहानियों में ताजगी थी मगर यह ताजगी कतई इस कारण नहीं थी कि निर्मल वर्मा ने इन कहानियों में अपने समय के इतिहास की उस विराट नियति को पहचान लिया था जो मनुष्य को अकेला करती है। ‘‘तमाम कुशलता के बावजूद ‘परिंदे’ जैनेंद्र का अतिक्रमण नहीं करती थी। इतना अवश्य था कि लतिका का पिंजरा बड़ा हो गया था, मगर कैच 22 वह तब भी न बन पाया था। फिर भी नई स्थितियों में स्त्री की यह नियति एक पैराडॉक्स खड़ा करती थी। लतिका को पिंजड़े से ज्यादा उसका अपना नैतिक आवेश बांधता है- इसी बिंदु पर उसकी अपनी पहली और आखिरी पहचान संभव है। … यूरोप की पतनशील परंपरा के आघात को नई कहानी का उद्घोष मानना वैचारिक दिवालियेपन के अतिरिक्त कुछ नहीं कहा जा सकता। बिंब, ध्वनियां, रंग ऐंद्रियबोध को गहरा करते हैं, मगर इससे यथार्थ का ऐतिहय ढांचा कालचाप भी प्राप्त कर लेता है-इसे नहीं माना जा सकता। शायद इस महत्वपूर्ण तथ्य की परीक्षा नहीं की जा सकी। ये विचारधाराएं आंतरिकता को तथ्यबद्ध दायरे से निकालकर जिस अगोचर भावभूमि पर ले जाती हैं, उनका सत्य क्या है। उनका सत्य लौकिक भावभूमि के विरोध में प्रकट हुआ है। यह सत्य जो एक लौकिक भावभूमि को तोड़कर प्रकट हुआ था, किसी कालजयी दृष्टि का परिणाम न था। बल्कि कालचाप से निर्वासित मध्यवर्ग की आत्मचेतना का परिणाम था! उस पर बुर्जुआ विचारधारा का ताजा रंग चढ़ आया।’’ (खंड 2, पृ. 26 व 127-28)

डॉ॰ चौधरी समकालीनता के प्रस्थान बिंदु के रूप में आजादी को रखते हैं। उनके लिए यह आजादी कालगत परिवर्तन के बजाय देश में होने वाला एक परिवर्तन था। यह देशगत परिवर्तन न केवल विभाजन की पीड़ा से ग्रसित था वरन भारतीय जीवन को जो वृहत्तर यथार्थ गांव और शहर की सीमा को तोड़कर राष्ट्रीय धारा में एक होना चाहते थे, वहां गांधीजी की परिकल्पना खंडित हुई थी और निश्चित रूप से गांव और शहर दो भिन्न यथार्थ से रूबरू थे। सुरेंद्र चौधरी ने नेहरू युग के अंतर्विरोधें को अलग-अलग तरीकों से लगातार व्याख्यायित करने की कोशिश की और इसके साथ रचनाशीलता की संलग्नता को चिन्हित भी किया। इन अंतर्विरोधें को पाटने की समस्या ही तात्कालिकता के समक्ष सबसे बड़ी चुनौती थी। स्वातंत्रयोत्तर हिंदी कहानी में जो तथ्य नई कहानी को कहानी से अलग करता था, वह निश्चित रूप से मध्यवर्ग का आत्मकेंद्रण था। ’62 के राष्ट्रीय हादसे से पहले दशक में निश्चित रूप से एक नवरोमैंटिक उत्थान था (नामवर सिंह के शब्दों में)। मगर जिसे पीड़ाभरी प्रतीक्षा कहा जाता है, उसके इतर इस प्रतीक्षा की सीमाओं को तोड़कर मुक्तिबोध वृहत्तर ऐतिहासिक अंतर्विरोधें से जूझ रहे थे। उनका सिनिकल और संशयवादी होना केवल आवेशजन्य नहीं था। ‘विपात्र’ और ‘क्लाड ईथरली’ की पीड़ा  प्रतिरोध, विद्रोह और स्वतंत्रता की एक पूरी दुनिया को रूपकों में ढालने का प्रयास था। अपने प्रयास में मुक्तिबोध जरूर अकेले थे लेकिन वहां निर्मल वर्मा का अकेलापन नहीं था। डॉ॰ चौधरी जोर देकर कहना चाहते हैं कि नई कहानी की संष्लिष्टता और उसका नयापन जिस रास्ते होकर आजादी के बाद की रचनात्मक परिस्थितियों और उसके अंतर्विरोधें को कैच करने की कोशिश कर रहा था, उसकी दुनिया मुक्तिबोध के रूपकों में ही साकार होती है। जिस प्रकार कविता मुक्तिबोध के यहां सारे रोमैंटिक आवेश उतार देती है, उसी प्रकार कहानीकार मुक्तिबोध के यहां भी भावुकता से उठनेवाली टीस और पीड़ाभरी प्रतीक्षा के बदले आहत नैरंतर्य का संकट केंद्रियता पाता है। नई कहानी की रचनाशीलता के केंद्र में व्यतीत होती व्यवस्था और चरित्रों के प्रति एक व्यथा भरा मोह है जो परिवार-समाज के अंतर्विभाजन के कारण पैदा हुई थी। ‘‘मुझे याद है कि पश्चिम में कथा साहित्य की बहस में जहां जॉर्ज स्पाइनर महाकाव्यात्मक और नाटकीय के बहाने दो सदियों की कथा यात्र के रचनात्मक सार पर बहस कर रहे थे, वहीं मार्क स्पिनका ने डिकेंस और काफ्का की आधुनिकता के केंद्र में परिवार-समाज को रखकर देखा था। ऐसे प्रयत्न अपने यहां न दिखाई पड़े। नामवर जी नई कहानी की बहस में परिवार, समाज को विशेष महत्व देते दिखाई न पड़े। (खंड 2, पृ. 28)

परिवार-समाज की इस केंद्रीयता का कोई कहानीकार था तो वो अमरकांत था। छोटे-छोटे क्रियाकलापों में कितने गहरे भावात्मक अर्थ छिपे रहते हैं, अपनी इसी पहचान के कारण अमरकांत की कहानियां अलग पड़ती हैं। परिवार के भीतर के जीवित रेशों से बनी कहानियां और परिवार के भीतर की भयावहता-दोनों कैसे राष्ट्रीय संदर्भ से जुड़कर भय और त्रास के बावजूद अपने संघर्ष को जीवित रखने की जातीय जिजीविषा से लैस हो सकती है- इसका विश्वास केवल अमरकांत की कहानियां देती हैं। ‘अमरकांत: जीवन की संभावनाओं के लिए संघर्ष’ शीर्षक आलेख नई कहानी के सबसे सशक्त कहानीकार को दुबारा देखने की एक कोशिश है। बड़े ताज्जुब की बात है कि अमरकांत पर कोई स्वतंत्र लेख न तो नामवर सिंह ने उस दौर में लिखा, न ही किसी और ने। डॉ॰ चौधरी का यह लेख उस महती आवश्यकता की पूर्ति करता है।

दूसरे खंड में संकलित डॉ॰ चौधरी के लेख एक बार फिर यह साबित करते हैं कि वह हिंदी के शीर्षस्थ कथा आलोचक हैं। ‘हिंदी कहानीः प्रक्रिया और पाठ’ के साथ कहानी के स्थापत्य को समझने का जो प्रयास उन्होंने शुरू किया था, वह उनके बाद के लेखन में भी लक्षित किया जा सकता है। प्रस्तुत संकलन के लेखों से गुजरते हुए हम लगातार उत्तरशती की कथायात्र करते हैं। इस कथायात्र में समकालीन से जूझते हुए कहानियों का भिन्न भिन्न रचना संदर्भ और उन रचना संदर्भों से झांकते हुए कहानी के स्थापत्य की भिन्न भिन्न भंगिमाएं मिलती हैं। प्रेमचंद के संदर्भ में उन्होंने जिस प्रकार कथावाचन को महत्व दिया था, उसी प्रकार बाद के कहानीकारों के यहां कथावाचक का हासिया किस प्रकार कहानी की रचना परिस्थिति को समृद्ध करता है, उसे भी समझने का प्रयास है। कला और जनवाद के रिश्ते भी डॉ॰ चौधरी के लेखन में निरंतर केंद्रीयता पाते रहे हैं। कथ्य की मार्मिक पहचान केवल नारों से तय नहीं होती। कहानी के भीतर जनवादी आंदोलन की अधिकांश कहानियां गढ़े गए यथार्थ की कहानियां हैं जो निश्चित रूप से यथार्थ के आतंक से पलायन है। अभिधत्मक पहचान और सर्वव्यापी चेतना कलारूपों के लिए मिथकों का आश्रय नहीं लेती। व्यापक और जटिल अनुभवों तक पहुंचने का एक रास्ता मिथकों को तोड़कर भी तय किया जा सकता है। इसके अमरकांत लगातार सिद्ध करते रहे।

सुरेंद्र चौधरी की कथा आलोचना पर विस्तृत बहस की जरूरत है। ये बहस हिंदी कथा आलोचना को नई दिशा दे सकती है। प्रस्तुत आलेख में उन सारे बिंदुओं को समाहित करना संभव नहीं है। खंड दो में मुक्तिबोध, भीष्म साहनी, प्रेमचंद और रेणु की कहानियों की विस्तृत समीक्षा के अलावा मार्क्सवादी सौन्दर्यशास्त्र पर भी एक बहस है। ‘हिंदी व्यंग्य की जातीय परंपरा और परसाई’ शीर्षक आलेख में एक विधा के रूप में व्यंग्य की आवश्यकता और शक्ति-दोनों को पहचानने का भी एक प्रयास है। समाज की विडंबना और उसके अंतर्विरोध जब तर्क की संगति से आगे निकलकर सादृश्यमूलक कल्पना का आधार लेती है तो वह व्यंग्य की बनावट में अपनी पहचान बनाती है। यह व्यंग्य दृष्टि परसाई के यहां अपने आलोचनात्मक यथार्थवाद के कारण ही केवल हास्य का माध्यम नहीं रह जाती। परसाई का व्यक्तित्व अपने युग के आत्मसंशय से ऊपर है। इसलिए वह ओजपूर्ण ढंग से अंतर्विरोधी स्थितियों पर प्रतिक्रिया करता है। एक नैतिक ऊर्जा की मद्धिम आंच में परसाई अपने चरित्रों और परिस्थितियों को पकाते हैं जिससे उनकी शैली तो अलग होती ही है, उसमें नया तासीर भी पैदा होता है। परसाई का व्यंग्य और उनकी गद्यशैली ठेठ अर्थों में हिंदी की जातीय परंपरा का निर्वाह करती है।

’90 के बाद की हिंदी कहानियों में घटना संकुलता के बीच से नई परिस्थितियों का कहानी में सार्थक उपयोग किस प्रकार हो- इस पर डॉ॰ चौधरी विस्तृत विवेचन करते हैं। सांप्रदायिकता जैसी थीम को ले करके फैशनपरक कहानियों का दौर भी चला था। डॉ॰ चौधरी कहते हैं कि तात्कालिकता के मोह में बाजार का गुलाम बनना एक बात है और विराट ऐतिहासिक संदर्भ को कहानियों में ढालना दूसरी बात। मानवीय गरिमा को केंद्र में रखकर लिखी गई दो कहानियों को डॉ॰ चौधरी अपनी समीक्षा का आधार बनाते हैं। प्रियंवद की कहानी ‘वे वहां कैद हैं’ एक पूरी पीढ़ी की दुश्चिंताओं और उलझनों को अपने केंद्र में रखती है। यहां उलझन, दुश्चिंताओं का कारण है या परिणाम-ये तो तय नहीं होता, परंतु तर्क और आवेशजन्य अपराध किस प्रकार मानवीय परिस्थितियों को एक मिथक में बदल देता है-वह पफर्क सामने आया है। छोटे-छोटे प्रसंगों से कैसे बड़ी पृष्ठभूमि का निर्माण होता है-प्रियंवद ने इसे अपनी कहानी कला में साधा है। डॉ॰ चौधरी लिखते हैं-‘‘कहानी के गद्य में प्रियंवद की अपनी अलग पहचान है। संवाद और दृश्य-दोनों इस गद्य से सजीव हो उठते हैं। मनुष्य की जटिल भावनाओं को नैतिक आवर्तों में डालकर देखने की एक विशेष कुशलता उनमें दिखाई पड़ेगी। न्याय और करुणा की सरहदों से एक साथ टकराता हुआ उनका गद्य संसार अथक और अक्षय शक्ति की सूचना देता है। अपनी पीढ़ी के वे अकेले गद्य लेखक हैं जिनमें मुझे ये विशेषताएं लक्षित होती हैं। कविता के मुहावरे में वे नहीं उछालते, जैसा उनके कुछ समकालीन उछालते हैं पर गद्य की पूरी काठी में लिरिक का स्पर्श होता है। (खंड 2, पृ. 265)

दूसरी कहानी है उदय प्रकाश की ‘और अंत में प्रार्थना’। व्यक्तिगत और अवांतर प्रसंगों से सार्वजनिक विडंबना को कैसे सामने लाया जाता है-इसे इस कहानी के संदर्भ में समझा जा सकता है। विषय साधारण ही हो, सारे क्रियाकलाप दैनिक जीवन के ही हों परंतु फिर भी उसमें कलात्मक उन्मेष कैसे हो सकता है-इसे प्रस्तुत कहानी से समझा जा सकता है। विभाजन के प्रेतों से लड़ता हुआ वाकणकर का व्यक्तित्व जिस आत्मसाक्ष्य की पीड़ा से गुजरता है, वह आधुनिक इतिहास में राष्ट्रीयता, वर्ण और ध्र्म तथा पूंजीवादी दुष्चक्र के जटिल संबंधें को कथा के भीतर मूर्त करता है। डॉ॰ चौधरी लिखते हैं-‘‘राज्यसत्ता के चरित्र को परोक्ष रूप से कहानी के गठन के साथ इस ऊंचे स्तर पर उजागर करने वाली कुछ ही कहानियां मैंने पढ़ी हैं। हिंदी कहानियों में किया गया ढेर सारा राजनीतिक लेखन इस स्तर तक नहीं उठता, इसके आसपास तक भी नहीं पहुंचता। उनमें क्रांति की उतावली में पूरी प्रक्रिया का सहज विसर्जन देखा जा सकता है।’’ (खंड 2, पृ. 272)

यह आधी अधूरी रूपरेखा मात्र है एक भुला दिए गए आलोचक के विशाल और सजग आलोचना कर्म का।  सच्ची आलोचना किस कदर गंभीर वैचारिक संघर्ष का परिणाम होती है इसे सुरेन्द्र चौधरी के लेखन में स्पष्ट ही देखा जा सकता है। सुरेन्द्र चौधरी पर बहस एक ऐतिहासिक ज़रुरत है। ज़रुरत है हिंदी की प्रगतिशील आलोचना की एक दूसरी परम्परा से संवाद की। बाकी फिर कभी।

(सुरेन्द्र चौधरी से संबंद्धित सारे उद्धरण अंतिका प्रकाशन से तीन खंडों में प्रकाशित उनके रचना संचयन से लिए गए हैं। विवरण नीचे उपलब्ध है। इस लेख का संशोधित-संपादित अंश अकार में प्रकाशित हो चुका है। मैं इसके लिए अकार का आभारी हूँ।)

मार्तंड प्रगल्भ

मार्तंड प्रगल्भ

मार्तंड प्रगल्भ जे.एन.यू. के भारतीय भाषा केंद्र में पी.एच.डी. के लिए शोधरत  हैं। फिलहाल लिडेन (नीदरलैण्ड) में अध्ययन-प्रवास कर रहे हैं। उनसे mpragalbha1@gmail.com पर संपर्क संभव है।

Published Books Of Surendra Chaudhary: 

  •  Hindi Kahani : Prakriya Aur Path (Hindi), Radhakrishna Prakashan, 1963, 1995
  • Phanishwar Nath Renu, Sahitya Academy, 1987
  • Itihas : Sanyaog Aur Sarthakata(I), Antika Prakashan, 2009
  • Hindi Kahani : Rachana Aur Paristhiti(II), Antika Prakashan, 2009
  • Sadharan Ki Pratigya : Andhere Se Sakshatkar(III), Antika Prakashan, 2009

नाले और रखवाले –एक असाहित्यिक की डायरी: मार्तंड प्रगल्भ

एक साहित्यिक की डायरी’ से तो आप सब परिचित हैं. मुक्तिबोध की इस रचना ने इतनी प्रसिद्धि पाई की असाहित्यिक लोगों ने डायरियां  लिखना ही लगभग बंद कर दिया . इधर एक असाहित्यिक की डायरी हमारे हाथ लगी .इसमें कुछ हालिया घटनाओं और बहसों के हवाले हैं. दिलचस्प लगे तो पढ़ लीजिए . लेकिन याद  रहे , डायरी है , सम्पादकीय नहीं .

By Michele Meister

By Michele Meister

 

By मार्तंड प्रगल्भ

मेरा एक मित्र है . बेरोजगार है. आजकल दिल्ली में मुनिरका की गलियों में गाहे-बगाहे दिख जाता है. बेरोज़गारी और ज़माने की चिंता से थोडा सनकी भी हो चला है. पढ़ा-लिखा है. बतकही का रस जानता है. साहित्य में रुचि है. और सच पूछिए तो हम-आपसे कुछ ज्यादा ही गंभीरता से लेता है साहित्य को. पिछली बार देखा था दिसंबर की ठंढ में. गुस्से से भरा उसका चेहरा अभी भी याद है मुझे. विश्वविद्यालय के गेट पर मिला था. ज़ल्दी में था. कह रहा था इस रेप काण्ड के विरोध में जनता सड़क पर है , संस्कृति-कर्मियों को भी वहाँ होना चाहिए. कला और साहित्य में सत्ता-विरोध और सड़कों पर कलाकारों-साहित्यकारों का सामूहिक प्रतिरोध एक दूसरे के विरोधी नहीं बल्कि पूरक हैं. कहते-कहते बस आ गयी और वह बस के भीतर गुम हो गया. दूसरे दिन मेरे मोबाइल पर उसका सन्देश मिला था कि अमुक दिन इंडिया गेट पर विरोध प्रदर्शन के लिए ज़रूर आयें. मैंने भी मन में ठान लिया था कि जाऊँगा ही. पर अंत समय में गया नहीं. प्रदर्शन हुआ और लगातार हुआ. किसी और ने फेसबुक पर विरोध-प्रदर्शन की तस्वीरें भी मुझे बाद में दिखायी थीं.

मेरा मित्र परितोष  एक वामपंथी सांस्कृतिक मंच से जुड़ा है. उस दिन के बाद मैंने उसे विश्वविद्यालय के आस-पास फिर देखा नहीं. हांलाकि मेरी बड़ी  इच्छा थी कि मिलता तो कुछ बात करता. इस इच्छा का एक फौरी संदर्भ भी था. एकाध सप्ताह बाद ही एक हिंदी दैनिक ‘घनसत्ता’ के सम्पादक ने उसी सांस्कृतिक संगठन को कोसते हुए एक अजीबोगरीब, लगभग विद्वेषपूर्ण ,सम्पादकीय लिखा था. सम्पादक साहेब का आरोप था कि कोई भी लेखक संगठन वहां दिल्ली की सडकों पर नहीं था! असल में वामपंथी लेखक-सांस्कृतिक संगठनों की मिशनरी  आलोचना और लेखकों के मार्क्सवाद-प्रेम का प्रतिरोध  इनका प्रिय  शगल रहा है. अखबार में आरोप था कि अमुक लेखक संगठन के महासचिव या किसी  अन्य पदाधिकारी का चेहरा या उसका बैनर उन्हें नहीं दिखा. बाद में कुछ दुष्टों  ने अख़बारों और सामाजिक मीडिया में छपी तस्वीरों और रिपोर्टों का हवाला उन्हें दिया. शायद उनके ही अखबार के दीगर संस्करणों की ख़बरों को उनके फेसबुक पर चस्पां किया. पर लाहौर से तुरत-फुरत आये सम्पादक ने इन तस्वीरों में दिख रहे चेहरों को पहचानने से इनकार कर दिया . और उनका ‘मार्क्सवादी’ – विरोध अक्षत बना रहा ! पर अपन जैसे लोगों ने उन्हें कोई महत्व नहीं दिया. बात शायद आई -गई  हो गयी. पर मैं अपने मित्र से मिलना चाहता था. उसके बाद भी लगातार गोष्ठियों, सेमिनारों,काव्य-पाठों और विरोध-प्रदर्शनों वाले उसके सन्देश मेरे मोबाइल पर आते रहे थे ज़रूर. एकाध जगह मैं गया भी था. उसे उन आयोजनों में अतिव्यस्त देख मेरा जी नहीं हुआ उसे टोकने और बतियाने का. बहरहाल परसों शाम (हाँ शाम ही को तो) वह मुझे विश्वविद्यालय के कैंटीन पर दिख गया.

देखता हूँ बड़ी क्षिप्र  गति से वह मेरी ओर ही चला आ रहा है. उसने भी शायद मुझे देख लिया था. आते ही मेरे सामने बैठ गया और एक सिगरेट सुलगा ली. दो कश लेने के बाद अचानक बोल पड़ा ‘आ परितोषाद्विदुषां न साधु मन्ये प्रयोगविज्ञानम् ।बलवदपि शिक्षितानामात्मन्यप्रत्ययं चेतः’. ज्ञान के क्षेत्र में विद्वानों की संतुष्टि ज़रूरी है. बड़े से बड़ा सिद्ध  भी केवल आत्म -प्रमाण  पर विश्वास नहीं कर सकता. कालिदास ने ऐसा कहा है. पर जब विद्वानों के बीच किसी शब्द प्रयोग को लेकर असहमति हो तब?” मैंने सन्दर्भ के प्रति अपनी अनभिज्ञता विस्मय से प्रगट की. कहने लगा अरे ,अभी सन्दर्भ को मारो गोली . तुम क्या कहते हो? मैंने थोडा हकलाते हुए कहा कि महाभाष्यकार के अनुसार तो लोक ही प्रमाण होगा तब. “बस यही तो मैं सोच रहा हूँ”. उसने जैसे मुट्ठियाँ भांजते हुए कहा. परन्तु मैं अब थोडा स्थिर हो चुका था. बात को पकड़ते हुए मैंने भी सवाल फेंका . “लेकिन अगर लोक में भी अनेक प्रयोग मिलें तो.” उसने कहा तो सभी रूप मान्य होंगे. “लेकिन भाषा में निबद्ध ज्ञान -परम्परा के लिए तो इतनी छूट तो भारी पड़ेगी मित्र” मैंने तनिक  मजा लेते हुए कहा. मैंने फिर कहा “और यही वजह है कि व्याकरण-ग्रंथों और कोशों की ज़रुरत होती है”. “इससे मेरा भी इनकार नहीं है. मैं भाषा के मानकीकरण के खिलाफ नहीं हूँ.” वह भी अब विवाद में गंभीर हो चला था. कहने लगा “परन्तु समय-समय पर लोक-प्रयोगों और तदनुरूप साहित्यिक-प्रयोगों के परिवर्तन को व्याकरण ग्रंथों और कोशों में प्रतिबिंबित होना चाहिए. भाषा तो बहता नीर है. बाँधोगे तो या तो सूख जाएगी या फिर उसके वेग से तुम्हारे बने बाँध टूट जाएँगे. और हिंदी जैसी भाषा की जीवन्तता और उसका वेग तो जनपदीय बोलियाँ ही हैं. एक बार उनसे कटे तो गए. संस्कृत के साथ हुआ, प्राकृतों और अपभ्रंशों के साथ हुआ तो कोई आश्चर्य नहीं कि तुम्हारी बंधी-बंधाई , ‘राष्ट्रीय-कृत’ हिंदी के साथ भी वही हो”. वह शायद भाषा –पावित्र्य –संरक्षिणी सभा के किसी सभापति  से भिड़ आया था. मैंने उसकी आँखों में झलकते गुस्से को नज़दीक से देखा और सच पूछिए तो जैसे कोई कड़वी सचाई मुझे भी कंपा गयी. वह कहता गया. “अब देखो भाषा का निर्माण एक सामाजिक प्रक्रिया है. हिंदी के विशाल प्रदेश में बहुसंख्यक जनता जिस भाषा में सोचती-विचारती काम करती है, हिंदी का भविष्य वहां है.”

मेरे दिमाग में हिंदी भाषा के विकास की एक संक्षिप्त रूप-रेखा कौंध गयी. इसी तरह की बातें तो चन्द्रधर शर्मा गुलेरी , प्रेमचंद, हजारीप्रसाद द्विवेदी, किशोरीदास वाजपेयी ,रामविलास जी और राहुल जी जैसे विद्वानों ने भी की थी. उस वक़्त भी भाषा की शुद्धता के पैरोकार हिंदी को संस्कृत की पुत्री बनाने पर तुले थे. संविधान सभा की बहसें भी दिमाग में घूम गयीं. दावं-पेंच, शक्ति सम्बन्ध और ‘राष्ट्रवाद’( सांस्कृतिक  ही न!). हुआ वही जो कुछ लोग चाहते थे. और बदले में मिली रघुवीरी हिंदी! उर्दू से कन्नी काट कर आज़ाद हुए ही थे और अब बाकियों के साथ भी वही सलूक . भाषा की राजनीति से राजनीति की भाषा तय होने लगी थी.  परितोष अपनी ही रौ में था. “एक तरफ बाज़ार है . कार्पोरेट मीडिया और सरकार . उसी  का एक बढती रूप है हमारा बॉलीवुड . दूसरी ओर मजदूरों के विशाल जत्थे हैं . पटना से लेकर अहमदाबाद और लुधियाना-अमृतसर तक, गौहाटी से लेकर मुंबई –सूरत तक. आज गुडगाँव में हैं कल धर्मशाला तो परसों नागपुर. इनकी भाषा क्या है ? हिंदी ही तो है. बन रही है हिंदी इनसे. जो साहित्य इनके बीच से आरहा है , इनके बारे में आ रहा है , इनके प्रति प्रतिबद्ध है. हिंदी भी उनसे ही बन रही है. तो कोशकार क्या करेगा? कोर्पोरेट मीडिया और बॉलीवुड से प्रयोग स्थिर करेगा या संस्कृत में गोते खाएगा या फिर कामगार जनता की तरफ मुंह करेगा. एक ही रास्ता है और वह है जनता की ओर जाने का. इस मामले में कोई आगे नहीं बढ़ता. ले-दे कर सत्तर-अस्सी साल पुराने कोशों की शरण में जाना होता है. और बढे भी कैसे ! जनता से वास्तविक संपर्क हो तब न! और तुर्रा यह कि जनता के संगठन इन्हें भीड़ लगते हैं या फिर तानाशाह ! और कहेंगे कि हम हैं सबसे बड़े लोकतांत्रिक!” वह लगभग हांफ रहा था.

कुछ देर तक हम दोनों चुप रहे . बिना कुछ कहे मैं उठा और चाय लेने कैंटीन के काउंटर की तरफ बढ़ गया. परितोष  ने अचानक कहा “मेरे लिए काली लेना अदरक वाली. अच्छा रुको , मैं भी चलता हूँ.” दोनों चाय लेकर रिंग रोड पर निकल आये . गरमी कुछ कम हो चली थी. पर बीच-बीच में गर्म हवा के झोंके आ जाते थे. छुटियाँ शुरू थी इसलिए भीड़-भाड़ थोड़ी कम हो चली थी. सुबह जो अमलतास के पीले फूल चमकदार और ऐश्वर्य से भरे थे उनमें अधिकांश तो झड़ गए थे . जो बचे थे, मुरझाये थे और ढलते सूरज की किरणों में मन को उदास करने वाले थे. हाँ प्रोफेसरों के क्वाटरों के पीछे आम की छोटी-छोटी अमौरियाँ मन प्रसन्न करने वाली थीं. हमलोग जब कुछ एकांत में निकल आये तो उसने फिर से बात आरम्भ की. “ देखो , बात दरअसल भाषा के प्रति दो भिन्न दृष्टियों की है. एक है भाषा के शुद्धिकरण की , संस्कृतीकरण की, और शुद्ध भाषा के सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की. पहली दृष्टि का एक और भेद है जो ऊपर-ऊपर से शुद्धिकरण का विरोधी दीखता है , अपने को शुद्धिवादी कहे जाने पर ऐतराज करता है ,पर है नहीं. यह है बहुभाषावाद. इसे बहुसंस्कृतिवाद या अमेरिकी मल्टीकल्चरलिज़म का ही विस्तार मानो. संसदीय लोकतंत्र का यह नवउदारवादी युग इसी नारे के साथ है और भाषाओं की गैरबराबरी के खिलाफ चलने वाले प्रगतिशील आन्दोलनों को अपने उदार आवरण में पालतू और भ्रष्ट बनाता है. यह भाषाओं की अस्मिता की राजनीति से अपना कारोबार चलाता है और विश्वबाजार को नए-नए दुकान उपलब्ध करवाता है. ठेठ राजनीतिक सन्दर्भ दूं तो भाजपा, कांग्रेस और दक्षिणपंथी क्षेत्रीय दल- मायावती से लेकर नितीश कुमार तक- इस पहली दृष्टि के प्रतीक हैं. इनके लिए लोकतंत्र का नारा सबसे कारगर है. साहित्य में भी लोकतंत्र का नारा लगाने वाले अधिकाँश कलावादी और व्यक्तिस्वातंत्र्य  के वादी यथास्थितिवाद के घोर समर्थक हैं. और भाषा की शुद्धि के भी! और अकारण नहीं कि एक ‘लोकतांत्रिक’ सम्पादक पूरी मानवता को सी.आई.ए का ऋणी मानता है!” वह चलते –चलते रुक गया था. सडक के किनारे पत्थर की एक बेंच थी. किनारा  कुछ-कुछ पहाड़ी घाटी का भ्रम पैदा करता था. नीचे ढलान थी और जो जंगल में गुम हो जाती थी. घाटीनुमा उस अवकाश के उस पार विश्विद्यालय की नौ मंजिली लाइब्रेरी दृष्टि को रोक लेती थी. हवाई जहाज़ लगातार सर के ऊपर से गुजरते रहते . उसकी भयानक गड़गड़ाहट पहले सोने न देती थी. अब भी यदा-कदा जब विचारों की किसी अमूल्य श्रृंखला को भंग कर देती तो मन चिड़चिड़ा  हो उठता था.

उसने जब उस लोकतांत्रिक सम्पादक का ज़िक्र किया तो अचानक से अपन ने सन्दर्भ पा लिया. और शाम से ही मित्र की उद्विग्नता का पूरा चित्र मेरी आँखों में घूम गया. मन ही मन में मुझे उसकी प्रकृति पर हलकी -सी  हँसी आ गई. पर वह पहले की ही  भांति कह रहा था “ और दूसरी दृष्टि है भाषा के जनवाद की.” मैंने उसे बीच में ही टोका. “ देखो तुम जिस राजनीतिक स्वरुप की चर्चा कर रहे हो उससे मैं पूरी तरह सहमत हूँ. भाषाओं के इतिहास में भी संक्रमण के दौर आये हैं. अब जिसे हम भक्तिकाल कहते हैं या ठीक उसके पहले का जो काल है, हजार इसवी के आस-पास का, बहुत बड़ा परिवर्तन हो रहा था पूरे उपमहाद्वीप में . देशी भाषाओं ने धीरे-धीरे संस्कृत –प्राकृत-अपभ्रंश को उनके साहित्यिक भाषा के गौरवमय  आसन से नीचे धकेल दिया. ऐसा नहीं था कि इन देशी भाषाओं का अस्तित्व पहले था ही नहीं. लोग इन्हीं भाषाओं के अपने पुराने –नए रूपों में दुनिया को देखते- समझते थे. पर साहित्य और ज्ञान के लिए इन भाषाओं का प्रयोग वर्जित था. साहित्य और ज्ञान की एक आधिकारिक भाषा थी, लम्बे समय तक वह संस्कृत ही रही बाद में गौण रूप से प्राकृत और अपभ्रंशों को यह आसन मिला. जो लोग यह समझते हैं कि अपभ्रंश से देशी भाषाओं का उद्गम हुआ है , वो बहुत बड़ी भूल करते हैं. ये देशी भाषाओं का बढता दबाव था कि अपभ्रंशों के अलग अलग रूपों में हमें देशीपन के उदाहरण मिलने लगते हैं. इसलिए ‘हिंदी के विकास में अपभ्रंश का योग’ एक भ्रामक इतिहास दृष्टि है. दरअसल होना चाहिए था ‘अपभ्रंश के विकास में हिंदी का योग’. और यह बड़ा परिवर्तन राज्य और काव्य के बदलते रिश्तों और नए सांस्कृतिक वातावरण, अर्थात इस्लाम  की संश्लिष्ट अंतर-क्रियाओं का परिणाम थी. बाबा फरीद और मुल्ला दाउद से लेकर संत कवियों ने देशी भाषाओं में साहित्यिक अभिव्यक्तियाँ की. यह उनके भिन्न सांस्कृतिक पृष्ठभूमि और नए सामाजिक स्तर के कारण प्राप्त आत्मविश्वास का परिणाम थीं. उसके बाद लम्बे समय के परिवर्तनों ने रीतिकाल तक आते-आते साहित्यिक भाषा के रूप में ब्रज को स्थिर कर लिया. खड़ी बोली,हिन्दवी, हिन्दुई ,उर्दू आदि सम्बन्धी विवाद मैं यहाँ दुहराना नहीं चाहता. अंग्रेजी राज में भाषा को लेकर विवाद हुए , राजनीति हुई ,पर कभी ऐसा नहीं था कि जनता की आमफहम भाषा साहित्य से एकदम बाहर रही. भाषा की यह दूसरी परम्परा संस्कृति के शुद्धिकरण के खिलाफ सितारेहिंद,भारतेंदु, अयोध्याप्रसाद खत्री , प्रेमचंद, गुलेरी ,किशोरीदास वाजपेयी ,फिराक, शिवदान सिंह चौहान , रामविलास शर्मा, राहुल सांकृत्यायन आदि के साथ चली आई है. पर इस दूसरी परम्परा के भीतर भी विवाद और मतांतर रहे आये हैं. पर आमतौर पर यह भाषा की प्रगतिशील परम्परा है. इनके आपसी विवाद रोचक और ज़रूरी हैं पर अभी मैं उसमें पड़ना नहीं चाहता.” थोडा रुक कर मैंने फिर शुरू किया “ अस्सी के दशक के आखिर से जो नवउदारवाद आया, संचार माध्यमों में जो व्यापक परिवर्तन हुए उससे परिस्थितियाँ बदल गयी हैं. नयी सदी के दूसरे दशक तक आते-आते तकनीक जब से फेसबुक जैसे माध्यमों तक पहुंची  है, भाषा- प्रयोगों में उथल- पुथल- सी मच गयी है. अभिव्यक्ति अब प्रिंट-पूँजी के भरोसे नहीं है. इस आभासी माध्यम ने अभिव्यक्ति  के नए रास्ते खोल दिए हैं. अभिव्यक्ति  के इस बढ़ते जनाधार ने भाषा की  शुद्धि-चिंताओं को परेशान कर दिया है. मैं इन माध्यमों की सीमाओं को जानता हूँ. पर यह एक प्रगतिशील बात तो हुई ही. मानकीकरण की प्रक्रिया भी ज़रूरी है. और यहाँ मैं तुम्हारी बात से फिर सहमत हूँ कि उस मानकीकरण की प्रगतिशील और जनवादी प्रक्रिया का विकास करना ऐतिहासिक ज़रुरत है.”

इतना लंबा बोलने के बाद मैंने उसकी तरफ देखा तो वह मुस्कुरा रहा था. “ तुमने मेरी बात को ऐतिहासिक सन्दर्भ दे दिया” हंसते हुए परितोष ने कहा. अभी पहली बार उसके चेहरे पर हँसी देख कर सच पूछिये तो मुझे बहुत अच्छा लगा. हमलोग बात करते-करते हॉस्टल के गेट तक आ गये थे. मौन सहमति  से हमारे कदम खुद-ब-खुद कमरे की ओर चल पड़े. मैंने सिगरेट सुलगा ली थी. मेरे मित्र ने इतनी देर से कोई सिगरेट नहीं निकाली थी. इसका मतलब था उसके पास पैसे नहीं हैं. सोचा सिगरेट के साथ रात का खाना भी यहीं मेस में खिलाना होगा. पर यह मुझे अच्छा ही लग रहा था. मैंने उससे सम्पादक के बारे में पूछा. बोला छोडो यार. उन की याद मत दिलाओ. “अब देखो न उसी दैनिक के सम्पादक थे प्रकाश जोशी. राजनीतिक रूप से मैं उन्हें पसंद नहीं करता. पर उन्होंने हिंदी पत्रकारिता को सहज भाषा के पक्ष में रखा. और उनकी क्रिकेट पर लेखनी तो वाकई युगांतकारी है. अफ़सोस! इस तुरत-फुरत वाले बाज़ारू मनोरंजन, और तीन घंटे के मसाला शो ने जब क्रिकेट को ही बदल दिया तो अब उस भाषा का क्या किया जाएगा. वह तो प्रकाश  जी के साथ ही चली गयी.”

हमलोग सिगरेट बुझा कमरे में दाखिल हुए. इस दौरान मेरा मन रामविलास जी को याद कर रहा था. मैंने ‘भारतेंदु युग और हिंदी भाषा की विकास परम्परा’ को आलमारी से निकाल लिया. मैंने उसमें से दो उद्धरण परितोष को पढ़ कर सुनाये. .”दरार आम जनता में नहीं थी.दरार थी उच्च वर्गों में.फिर उन्हीं उच्च वर्गों का सहारा लेकर भाषा समस्या कैसे हल होती.उच्च वर्गों का यह दृष्टिकोण भाषा के परिष्कार के नाम पर उसे जनपदीय बोलियों से और शहरी बोलचाल से दूर ठेल रहा था और यह सिलसिला अंग्रेजी राज के खत्म होने के  पच्चीस साल बाद भी जारी है.” “पच्चीस नहीं साठ साल बाद भी” हंसते हुए उसने कहा. दूसरा उद्धरण यूँ था- “भाषा का परिनिष्ठित होना एक प्रक्रिया है जिसमे अनकों रूपों और प्रयोगों में कुछ छाँट लिए जाते है, शेष छोड़ दिए जाते है…किन्तु जो छोड़ दिए जाते है वो सदा नष्ट नहीं हों जाते वरन बोलियों में बने रहते हैं.आगे चलकर जब लोग बोलियों का अध्ययन करते है तब उन्हें पुराने कोशों,व्याकरणों और लिखित साहित्य में ना पाकर कल्पना करते है कि परिनिष्ठित रूपों के ये अपभ्रंश रूप है जो अशिक्षित लोगों की भाषा में प्रचिलित हों गए हैं”. “ये मारा” उसने लगभग मुझे गले लगाते हुए हवा में मुट्ठियाँ भांजी. मैंने किताब वापस रखते हुए कहा “जानते हो सम्पादक का कॉलम मैंने देखा था. मुझे उसी वक़्त कुछ शंका हुई थी. आजकल तो अखबार में ‘मार्क्सवादी’-  विरोध का जलसा चल रहा है. मुझे लगता है दिसंबर से कोई जख्म  जाग  रहा है. पचास-साठ के दशक में जो बहसे हुई थीं उसकी तलछट सम्पादक ढो रहे  हैं . जनता को भीड़ कहना , वो क्या है मुक्तिबोध की लाइनें…’डार्क मासेज़ ये मॉब हैं.’ है ना. और कलाकार की स्वतंत्रता  और अभिव्यक्ति की इमानदारी, लेखक-सांस्कृतिक संगठनों को तानाशाह बताना , सृजनात्मक लेखन की राह में रोड़ा डालने वाला कहना आदि-आदि. अब ये केवल संयोग नहीं कि तब भी वही खेमा ये सब कह रहा था आज भी वही खेमा ऐसा कह रहा है. कारण तो स्पष्ट है मित्र . मार्क्सवाद की दुनिया भर में जो वापसी हुई है , कुछ लोगों की सत्ता को डरा रही है . सता रही है. अब अगर ऐसा है तो मार्क्सवाद तो जवाब देगा. जनता जबाव देगी. कई बार जबाव सुनकर लोग कहते हैं कि वही पुरानी बात कह रहे हो. पर जानते हो ऐसे लोगों को हॉब्सबाम क्या जबाव देते थे….कहते थे कि साहेब जब लौट-लौट कर वही सवाल कीजियेगा तो जवाब भी तो वही मिलेगा.” हमदोनो ठठाकर हंस पड़े. परितोष ने कहा “ वो मुक्तिबोध की पंक्तियाँ ,जो तुम्हारी फेवरिट हैं , पढने को मन कर रहा है और ऊँची आवाज़ में पढने लगा –

“सब चुप, साहित्यिक चुप और कविजन निर्वाक्

चिन्तक, शिल्पकार, नर्तक चुप हैं

उनके ख़याल से यह सब गप है

मात्र किंवदन्ती।

रक्तपायी वर्ग से नाभिनाल-बद्ध ये सब लोग

नपुंसक भोग-शिरा-जालों में उलझे।

प्रश्न की उथली-सी पहचान

राह से अनजान

वाक् रुदन्ती।

चढ़ गया उर पर कहीं कोई निर्दयी,…

भव्याकार भवनों के विवरों में छिप गये

समाचारपत्रों के पतियों के मुख स्थल।

गढ़े जाते संवाद,

गढ़ी जाती समीक्षा,

गढ़ी जाती टिप्पणी जन-मन-उर-शूल ।

बौद्धिक वर्ग है क्रीतदास,

किराये के विचारों का उद्भास।

बड़े-बड़े चेहरों पर स्याहियाँ पुत गयीं।

नपुंसक श्रद्धा

सड़क के नीचे की गटर में छिप गयी…

धुएँ के ज़हरीले मेघों के नीचे ही हर बार

द्रुत निज-विश्लेष-गतियाँ,

एक स्प्लिट  सेकेण्ड में शत साक्षात्कार।

टूटते हैं धोखों से भरे हुए सपने।

रक्त में बहती हैं शान की किरनें

विश्व की मूर्ति में आत्मा ही ढल गयी.”

और फिर मैंने पढ़ा “कविता में कहने की आदत नहीं, पर कह दूँ

वर्तमान समाज में चल नहीं सकता।

पूँजी से जुड़ा हुआ हृदय बदल नहीं सकता,

स्वातन्त्र्य व्यक्ति का वादी

छल नहीं सकता मुक्ति के मन को,

जन को।“

मेस का टाइम हो चला था. मैंने उससे कहा आज रात यहीं रूक जाओ. उसने इनकार कर दिया. “ नहीं यार , वापस जाऊँगा . कल सुबह ही कबीर कलामंच के साथियों की रिहाई के अभियान को लेकर एक प्रदर्शन है. समय मिले तो सुबह तुम भी आ जाना. कॉफ़ी हॉउस के पास सुबह नौ बजे.” थोडा रुक कर सर को झटक कर बड़े दृढ स्वर में कहता गया . “फासीवादी उभार है. लड़ने के सिवा चारा नहीं.” फिर एकाएक मुस्कुराते हुए बोला-“ जानते हो जब से मैं ने एक  शीर्षक ‘नीर और नाले’ देखा है एक गीत बेइन्तिहाँ याद आ रहा है- ओ दुनिया के रखवाले! सुन दर्द भरे मेरे नाले….” और मैंने कहा “रखवाला कौन है , पता है !” और दोनों ने एक साथ कहा “ यह भी कोई पूछने की बात है कि दुनिया का रखवाला , ‘आतंक’ के विरुद्ध युद्ध छेड़नेवाला , कौन है ! और फिर ठठा कर हंस पड़े.

मार्तंड प्रगल्भ

मार्तंड प्रगल्भ

मार्तंड प्रगल्भ जे.एन.यू. के भारतीय भाषा केंद्र में पी.एच.डी. के लिए शोधरत  हैं। फिलहाल लिडेन (नीदरलैण्ड) में अध्ययन-प्रवास कर रहे हैं। उनसे mpragalbha1@gmail.com पर संपर्क संभव है।

 

 

अकथ कहानी प्रेम की: संतो धोखा कासूं कहियो-2 : मार्तंड प्रगल्भ

(‘संतों धोखा कासूं कहियो’ के पहले भाग पर व्यापक प्रतिक्रियाएं हुईं. सहमती-असहमति दोनों स्वरों को सुना-पढ़ा गया. अधिकांश प्रतिक्रियाएं मौखिक रूप में ही आयीं. लेकिन, जो भी आयीं उनके माध्यम से लेख के कुछ-एक महत्वपूर्ण अभाव उभर कर सामने आये.  कबीर की कविता को पढने में या कवि कबीर को खोजने में पुरुषोत्तम अग्रवाल जी की पुस्तक कितनी मदद करती है, जैसे बिंदु अछूते रह गए थे. समीक्षा के बहाने इस लेख में मार्तंड ने कबीर के कविपक्ष और उस कविपक्ष के प्रति अग्रवाल जी के व्यवहार को खंगालने की कोशिश की है. अभी तक अग्रवाल जी की कोई भी टिपण्णी इस लेख के सन्दर्भ में सामने नहीं आयी है, समीक्षा-लेख की इस धारावाहिकता को समृद्ध करने में उनकी टिपण्णी एक महत्वपूर्ण भूमिका अदा करेगी, ऐसी उम्मीद अभी शेष है!)

By  मार्तंड प्रगल्भ

एक आलोचक-विचारक के रूप में पुरुषोत्तम अग्रवाल हमेशा प्रभावित करते रहे हैं. और जैसा हर आलोचक-विचारक के साथ होता है, पुरुषोत्तम अग्रवाल की चिंतन धारा में भी अलग-अलग पड़ाव आये हैं. अलग-अलग काल खण्डों में जो कुछ वैचारिक दुनिया में घटता जाता है आलोचक-विचारक उससे संवाद भी करता जाता है. इस क्रम में कभी वह समकालीन चिंतन की आलोचना करता है ,कभी उसको एक हद तक स्वीकार करता है, कभी मुखामुखम से चिंतन की नयी दिशा पाता है, और कभी समकालीन विमर्शों के हाथों पराजित सा महसूस करते हुए अपनी चिन्ताधारा को उनके आगे नतमस्तक कर देता है. अग्रवाल जी की किताब ‘अकथ कहानी प्रेम की ..’ को अर्चना वर्मा ने ‘पुरुषोत्तम के प्रेम की अकथ कहानी’ के रूप में देखा है. मैं भी चाहता हूँ कि इस किताब को खुद पुरुषोत्तम जी के चिंतन की कहानी की तरह देखा जाए. हाँ फिलवक्त उस चिंतन के केंद्र में कबीर ही होंगे.

किताब बार-बार घोषणा करती है  कि वह पुरुषोत्तम जी के पिछले तीस वर्षों के अथक परिश्रम का फल है. और यह भी कि इस किताब में आई स्थापनाएं और अवधारणाएं बीज रूप में वही हैं  जो ‘विचार के अनंत’ में थीं. क्या सचमुच ऐसा है? पहले हम यह देखते हैं कि इस किताब में कबीर विषयक स्थापनाएं क्या हैं. फिर थोड़ी चर्चा ‘विचार के अनंत’ के बीज विचारों की होगी ,ताकि पुरुषोत्तम जी के दावों को जांचा-परखा जाए. इसके साथ ही साथ यह तो देखने का प्रयास चलता ही रहेगा कि उनके तीस वर्षों के इस अथक परिश्रम ने कबीर को हमारे सामने किस रूप में उपस्थित किया है और इस प्रकार उनकी ‘कवि कबीर की खोज’ ने कबीर की कविता के बारे में हमारे मूल चिंतन में कैसा परिवर्तन किया है. इसी चर्चा में हमें आलोचक-विचारक पुरुषोत्तम की चिंतन की दिशा और उनकी हताशा का भी साक्षात्कार शायद हो जाए!

पूरी किताब मोटे तौर पर दो भागों में है. पहला और बड़ा हिस्सा कबीर के वक्त को पहचानने के लिए इतिहास और समाज विज्ञान की मान्यताओं से जिरह का भ्रम पैदा करती है. और दूसरा हिस्सा कबीर की कविताई पर है. यह देखना मनोरंजक है कि पहले हिस्से की मान्यताओं का दूसरे हिस्से की व्याख्याओं से रिश्ता दूर-दूर का ही है. पर रिश्ता तो है. क्योंकि कबीर की कविता तक पहुँचने के लिए , उसको पूरा पाने के लिए समय के विस्तार को और उसकी कारस्तानियों को समझना तो होगा. और पुरुषोत्तम का दावा है कि इसे समझने में जो सबसे बड़ी रुकावट है, वह है औपनिवेशिक काल में रची गयी और अब बद्धमूल हो गयी हमारी दृष्टि. जिसे वह ‘औपनिवेशिक ज्ञान-कांड’ कहते हैं. उनका दावा है कि इस ‘ज्ञान-कांड’ से मुक्त हो के देखें तो साफ़ दीखता है कि कबीर वैष्णव थे! और उनकी काव्य संवेदना के मूल में बनियों की संवेदना है!

किताब में कहीं लिखा है कि कबीर अपने को “जाति-कुल निरपेक्ष वैष्णवता के सर्वाधिक निकट पाते हैं- ‘भगती नारदी मगन सरीरा| इहि विधि भव तरे कबीरा’, कारण यह कि वैरागी जात-पांत की परवाह नहीं करते थे- ‘इन मुन्डीयन मेरी जात गंवायी|’ (पृष्ठ-१६३) फिर कुछ पृष्ठों बाद लिखते हैं- “शाक्त-साधना कबीर की जिज्ञासा का आरंभ या एक पड़ाव ही हो सकती थी, परिणति नहीं| वहाँ से शुरू करके वे नाथों, सूफियों के रास्ते से भी गुजरे और आखिरकार जो पहचान  उनके साथ चली, जिसे उन्होंने खुद अपनाया, वह वैष्णव की ही थी”.(पृष्ठ-१८६) अर्थात कबीर वैष्णव ही थे. ये रामानंदी वैष्णव थे , स्मार्त नहीं. स्मार्त वैष्णव तो तुलसीदास थे. रामानंदी वैष्णव तो जाति-कुल निरपेक्ष थे. परन्तु अग्रवाल जी ने कहीं ये नहीं दिखाया है कि भक्ति के अलावा भी क्या रामानंदी वैष्णव जीवन के हर क्षेत्र में जाति व्यवस्था को नकार देते थे. जैसा कि नाथों के यहाँ था. कबीर के जिन पदों का हवाला अग्रवाल  देते हैं उनमें किसी भी पद में कबीर सीधे सीधे खुद को वैष्णव उसी तरह नहीं कहते जैसे खुद को जुलाहा कहते हैं. फिर वैष्णवों को भी धिक्कारते हुए कहते ही हैं कि ‘ वैष्णव भया तो क्या भया, बूझा नहीं विवेक’. पूरी किताब में उस विशेष परिस्थिति और सन्दर्भ की अनदेखी है जहां से कबीर नारद भक्ति और रामानंदी वैष्णवता दोनों की आलोचना करते हुए भक्ति और व्यक्ति दोनों की और इस प्रकार अपने आस-पास के व्यापक समाज की मूलगामी व्याख्या करते हैं. अग्रवाल जी ने नीची जातियों के बीच वैष्णवता की स्वीकार्यता के साक्ष्य के लिए विलियम क्रुक का उदाहरण दिया है. और इस जगह अग्रवाल कहीं ये सवाल  नहीं उठाते कि खुद क्रुक अग्रवाल के अनुसार बताई गयी रामानंदी वैष्णवता को कैसे समझ रहे थे. दरअसल यह भी एक विशेष चयन है. बाकी चिन्तक जो उपनिवेश काल में भक्ति और जाति पर विचार कर रहे थे वो तो खैर गैर ऐतिहासिक और ‘औपनिवेशिक- ज्ञानकाण्ड’ की तैयारी में थे, परन्तु क्रुक की बातें रोज़मर्रा की वास्तविकता को  देख रही थी. इसलिए “ ‘निम्न’ जातियों के वैष्णव पंथों की विशेषता विलियम क्रुक ने बिलकुल ठीक पहचानी थी- “ ब्राह्मणों के वर्चस्व और विशेषाधिकारों का विरोध करते हुए, सार्वजनिक उपासना के पवित्रतर और अधिक बौद्धिक रूपों की प्रतिष्ठा”. इस प्रकार कबीर के समय को और क्रुक के समय को लगभग एक मानते हुए अग्रवाल जी सामाजिक परिवर्तन की गैर ऐतिहासिक समझदारी तक पहुँच जाते हैं. अगर क्रुक की बात सही थी तो यह भी सही था कि कबीर और अन्य निर्गुनियों ने वर्णाश्रम  की जो मूलगामी आलोचना की थी वह सगुण भक्ति के प्रभाव और ब्राह्मण धर्म के १७वीं सदी के अंत और १८वीं सदी में होने वाले पुनरुत्थान के बाद भी अपनी विशेषताएं बहुत हद तक बचाए रखा था. अकारण  नहीं कि ऊपर से खुद को वैष्णव मानते हुए भी ये ‘निम्न जातियां’ ब्राह्मण धर्म  के बरक्स अपने को ज्यादा ‘प्रगतिशील’ बनाए रखीं थीं. वैसे यह भी जानने लायक है कि क्या सचमुच ये जातियां खुद को वैष्णव कहती थीं? या फिर क्रुक ने अपनी तरफ से इन्हें वैष्णव मान लिया था? क्रुक उन्नीसवीं सदी के अंतिम दशक में नोर्थ वेस्ट प्रोविंस और अवध का सर्वेक्षण कर रहे थे. २०वीं सदी के पहले दशक के शुरुआत में ही ग्रियर्सन को किसी मिशनरी मि. डन ने चिट्ठी लिखा  था. मि. डन ने इलाहाबाद ,दिल्ली और गुडगाँव जिलों के अपने १९ साल के अनुभव के आधार पर तुलसी के बारे में ग्रियर्सन की बात की पुष्टि की, तथा लिखा की तुलसी के दोहे या चौपाइयों को सुनांने से प्रशासकों का काम कितना आसान हो जाता है क्योंकि लोग तब उनसे अपना जुड़ाव महसूस करते हैं. लेकिन उसने अपने पत्र में यह भी बताया था कि कबीर के दोहे भी उतने ही लोकप्रिय हैं. हिंदू ब्राह्मण और बनियों के बीच तुलसी ज्यादा स्वीकार्य थे जबकि The influence of Kabir is, I think fully important, in fact, Kabir touches races and castes who have little in common with Krishanism and who know little of राम दशरथ का बेटा, but much of राम जग का करता, as they phrase it (and pronounce it too.) Kabir is, if I mistake not the great Guru of kolis and chamars as well as many higher in the scale. (pp.462-63)(Appendix 1 , On The Influence Exercised by Tulasi Das in Western Hindostan .JRAS- 1903.) मि. डन को ये निम्न जातियां वैष्णव नहीं लगी थीं!

द्विवेदी जी के यहाँ कबीर ‘अवैष्णव नहीं थे’. अग्रवाल जी के यहाँ वह सीधे वैष्णव हो गए. सामाजिक और धार्मिक पहचानों की ऐसी व्याख्याएं कबीर के भीतर के उस ऐतिहासिक क्षण को अनदेखा करता है जहां श्रम में निहित विचारधारा, उधार ली गयी विचारधाराओं पर विजय पा लेती है. कबीर के भीतर का जुलाहा अपने श्रम की विचारधारा जब पहचान जाता है तो उसके लिए धर्म और वर्णाश्रम जैसे भेदपरक प्रवर्ग और शोषणपरक व्यवस्थाओं का सच भी सामने आ जाता है. कबीर के काव्य में जो निषेधपरक शब्दावलियों की इतनी भरमार है वह उनके चिंतन पद्धति की भी एक खास विशेषता है. और वह है सत्य को निषेध के निषेध के रूप में पहचानने और समझने की कोशिश. कबीर की सहज दृष्टि, उनके सहज तर्क और प्रत्यक्ष अनुभव को महत्व देने की घोषणा अर्थात उनके अनुभव सम्मत विवेकवाद ने ‘निषेध के निषेध’ को उनकी काव्य युक्ति में बदल लिया है. और जहां तक वैष्णव होने की बात है ,कबीर का यह पद हमें कुछ और ही बता रहा है-

माटिक कोट पषानक ताला, सोई बन सोई रखवाला|
सो बन देखत जीव डेराना, ब्राह्मण वैष्णव एकै जाना|
जौ रे किसान किसानी करई, उपजै खेत बीज नहिं परई |
छांड़ि देहु नर झेलिक झेला, बूडे दोऊ गुरु औ चेला|
तीसर बूडे पारधि भाई, जिन बन डाहो दावा लाई|
भूँकि भूँकि कूकुर मरि गयऊ, काज न एक सियार से भयऊ|
मूस बिलाय एक संग, कहु कैसे रहि जाय|
अचरज एक देखहु हो संतो, हस्ती सिंघाहि खाय||(रमैनी ६०,रामकिशोर शर्मा संपादित)

मिट्टी के किले पर पत्थर का ताला लगा है. चारो तरफ साधनाओं का जंगल है . इनको देख के जीव डरता है. साधनाओं के इस जंगल के अलग-अलग रखवाले हैं. और सब जड़ हैं पत्थर के ताले जैसे हैं. फिर वो ब्राह्मण हो या वैष्णव. ये खुद भी डूबेंगे और अपने चेलों को भी डुबायेंगे. ये अपना फायदा खोजने वाले सियार हैं जिनसे किसी काम के संभव होने की आशा करना भी मूर्खता है. कबीर किसी संशय में नहीं थे. उन्हें साफ़ पता था कि ऊपर-ऊपर की भिन्नता रखने वाले ब्राह्मण या वैष्णव, सब माया के जंजाल के वशीभूत हैं. इनके सहारे मुक्ति की आशा व्यर्थ है. इनकी साधना झूठी है. ऎसी स्थिति में कबीर के कुछ पदों में वैष्णवों के प्रति थोड़ी सहानुभूति देख कर अग्रवाल जी कबीर को भी वैष्णव घोषित कर देते हैं. और हमारी समझ से यह भूलवश नहीं है. इसके पीछे भी एक राजनीतिक दृष्टि है. और वह है गांधी के वैष्णवता को कबीर से जोड़ने की राजनीति. इस किताब में कम से कम तीन जगहों पर ‘देशज आधुनिकता’ और गांधी के दर्शन की साम्यता तो स्पष्ट की ही गयी है. लब्बो लुआब यह है कि ‘औपनिवेशिक ज्ञान कांड’ का सार्थक प्रतिउत्तर गाँधी के देशज आधुनिकता में है, और यह ‘देशज आधुनिकता’ कबीर की ही परम्परा में है. कबीर वैष्णव थे और ‘वैष्णव जन ते..’ गाने वाले गांधी सच्चे कबीर पंथी!

पुरुषोत्तम जी ने यह भी दिखाया है कि मध्यकाल में व्यापार के विकास ने बनियों को एक समृद्धि और रूतबा दिया. इस कारण बनियों के यहाँ मिलने वाला ‘फेयर प्ले’ का एथिक्स समाज में भी अपनी उपस्थिति दर्ज कराता है. और इस प्रकार वर्णाश्रम को चुनौती देते हुए जन्म-आधारित भेद भाव को चुनौती देता है. बनिया समाज दरअसल पुरुषोत्तम जी की ‘देशज आधुनिकता’ का अग्रदूत था. और इस प्रकार कबीर की ‘आधुनिक चेतना’, उनका वर्णाश्रम विरोध, समानता की घोषणा बनिया समाज के एथिक्स का ही काव्य संवेदन में रूपांतर था. और पुरुषोत्तम जी ने साबित करना चाहा है कि कंजूस बनियों का मिथक तो औपनिवेशिक काल की उपज है. वरना कबीर ने तो खुद अपने साईं को ही बनिया कहा था. बेवकूफ बनियों का मिथक झूठा है. पुरुषोत्तम जी दस्तकारों और ‘निम्न जातियों’ की संवेदना को कबीर में रूपांतरित होने पर चलताऊ ढंग से टिप्पणी करते चलते हैं जबकि बनियों कि संवेदना और कबीर पंथ में उनकी उपस्थिति पर विस्तार से और जब भी मौक़ा मिलता है चर्चा करते हैं. बालाघात का यह अंतर निम्न जातियों से आने वाले दस्तकारों के आत्मविश्वास और उस आत्मविश्वास में निहित क्रान्तिकारी चेतना से कबीर की काव्य-संवेदना को अलग करने की प्रक्रिया में है. अग्रवाल जी लिखते हैं- “व्यापारी और दस्तकार उस कवि से निश्चय ही अपनापा महसूस कर सकते थे, जो अपने राम को, साईं को कभी रंगरेज बना देता था, कभी ‘बाणियाँ’. जो कविता में भी अपनी कल्पना तरह-तरह की दस्तकारी के काम करने वाले कारीगर के रूप में भी करता था, और दूकानदार व्यापारी के रूप में भी. जो सार्थक जीवन बिताने के संतोष को उस दुकानदार की भाषा देता था, जिसने सौदा पूरा बेच लिया है, इसलिए जिसे हाट में दुबारा आने की ज़रूरत नहीं रही-“ पूरा किया बिसाहुणाँ,बहुरि न आवौं हट्ट.” और जो जीवन व्यर्थ गवां देने की चूक को भी वाणिज्य का अवसर गवां देने के रूपक में ही बांधता है- “कहे कबीर कछू बनिज न कीयौ, आयौ थौ इहि हाटि’ (ग्रंथावली, राग केदारी,१४) जो अपने मन को, लाभ के लोभ में मूल ही न गवां बैठाने की चेतावनी भी सावधान व्यापारी के लहजे में ही देता है-“मन बंजारा जागी न सोई| लाहे कारनि मूल न खोई” (ग्रंथावली,राग बिलाबल,६) “(पृष्ठ-१४४) कविता के रूपकों और प्रतीकों को अगर इस तरीके से पढ़ा जाए तो फिर निम्न पद का क्या मतलब निकलेगा –

मन बनियाँ बनिज न छोड़ै|
जनम जनम का मारा बनियाँ, अजहूँ पूर न तौले |
पासंग के अधिकारी लैले,    भूला    भूला    डोलै|
घर में दुविधा कुमति बनी है, पल पल में चित तोरै|
कुनबा वाके सकल हरामी,  अमृत  में  विष   घोलै|
तुमहीं जल में तुमहीं थल में , तुमही घट घट बोलै |
कहै कबीर या वा सिष को डरिये, हिरदे गाँठि न खोलै | (कबीर-वाणी, १५९)

क्या यहाँ ‘कबीर की संवेदना और व्यापारियों के बीच आत्मीयता पर रोशनी’ पड़ रही है? साई को बनिया बताने वाले कबीर, मन को भी बनिया बताते हैं. हमेशा डाँड़ मारने वाला बनिया. कभी पूरा न तौलने वाला बनिया. कुमति का मारा बनिया. अमृत में भी विष घोलने वाला बनिया. मिलावट का व्यापार करने वाला बनिया. ऐसे बनियों का तो पूरा कुनबा ही ‘हरामी’ है. इन ‘हिरदे गाँठि न खोलै’ बनियों से तो हमेशा डरना चाहिए. अब अगर पुरुषोत्तम जी के ही तर्क पर चलें तो बनियों के ‘फेयर-प्ले’ के एथिक्स का तो कबीर ने चिंदी-चिंदी कर डाला है इस पद में. और कंजूस बनियों के छवि निर्माता ‘औपनिवेशिक आधुनिकता’ से उसका यह महान योगदान छीन लेते हैं कबीर! कवि कबीर की खोज क्या ऐसे ही आधारहीन साक्ष्यों पर होगी! वास्तव में पुरुषोत्तम जी को बनियों के एथिक्स के सहारे कबीर की कविता के मूल में निहित उस क्रांतिकारी संवेदना से ध्यान हटाना था जिसे हम ‘अनुभवसम्मत विवेकवाद’ कहते हैं. और यह ‘अनुभवसम्मत विवेकवाद’ शास्त्रों के विवेकवाद को नकारने वाला और ‘आखिन देखि’, प्रत्यक्ष अनुभव को अभिव्यक्त करने वाला ‘निम्न जातियों’ से आये कामगारों के यहाँ ही संभव था. वर्णाश्रम की मूलगामी आलोचना और धर्म मात्र की मूलगामी आलोचना के पीछे भी इसी को मानना चाहिए. और हाँ कबीर की काव्य संवेदना को बनियों की संवेदना बताने के खतरनाक खेल से बाज आना चाहिए. और कबीर की कविता को अपनी मान्यताओं की पुष्टि के लिए इस्तेमाल करने की साजिश का विरोध करने वाले पुरुषोत्तम जी के खुद के वैचारिक पूर्वग्रह भी यहाँ स्पष्ट ही हैं. और कौन जाने जैसे जैनियों को बनियों ने संरक्षण दे कर उसकी क्रांतिकारी अंतर्वस्तु को खान पान तक की शुद्धता और अहिंसा तक सीमित किया कहीं वही हाल कबीर पंथों में बनियों की उपस्थिति ने तो पैदा नहीं किया! बहरहाल यह शोध का विषय है. इस ओर थोडा इशारा मोनिका हर्टस्मान ने भी किया ही था.(देखें संवेद, जुलाई २०१०. पृष्ठ-१९२-१९३)

आइये थोडा रुक कर बात कबीर की नारदी भक्ति पर भी करते चलते हैं. पुरुषोत्तम जी का कहना है कि कबीर खुद अपनी भक्ति को नारदी मानते हैं. ‘भक्ति नारदी मगन सरीरा’. जायसी कहते हैं कि कबीर नारदी भक्ति के इतने बड़े साधक थे कि इस साधना में खुद नारद भी उनसे पीछे छूट गए. ‘ना नारद तब रोइ पुकारा, एक जुलाहे सो मैं हारा’. यह बात पुरुषोत्तम जी को नामवर जी ने एक निजी बातचीत में कहा था. किताब के दूसरे संस्करण में इसका उल्लेख पुरुषोत्तम जी ने किया है. रुक कर सोचने वाली बात यह है कि जायसी ने कबीर को नारदीय भक्ति के आदर्श नारद से भी आगे जाने वाला क्यूँ कर कहा है. कबीर की भक्ति में वो कौन सी बात है जो उसे नारद सूत्र में निरुपित भक्ति से भी आगे ले जाती है. कबीर क्यूँ कर नारदीय भक्ति को ट्रांसैन्ड कर पाए. नारद भक्ति सूत्र उस प्रक्रिया की ओर इशारा करता है जो १०वीं सदी के अनन्तर समूचे यूरेशिया में घटित हो रहा था. इसे द्विवेदी जी शास्त्रों का लोक की तरफ झुकना कहते हैं. और शेल्डन पोलक देश्यभाषाकरण की व्यापक प्रक्रिया के सहारे व्याख्यायित करते हैं. जिस प्रकार संस्कृत- अपभ्रंश की सार्वत्रिक और अर्द्ध सार्वत्रिक संस्कृति को विस्थापित कर देशी भाषाओं में साहित्य रचना शुरू हुई उसी प्रकार धर्म साधनाओं के पुराने शास्त्रों को स्थानीय धर्ममतों ने चुनौती दी. इस प्रक्रिया में ही भक्ति संबंधी पुराने शास्त्रीय चिन्तनों को ज्यादा लोकोन्मुख और स्थानीय विशेषताओं से जोड़ने की कोशिशें भी हुई. यह एक दुहरी प्रक्रिया थी जहां लोक का शास्त्रीकरण भी ओ रहा था और शास्त्रों का लौकिकीकरण भी. उत्तर भारत में देश्यभाषाकरण की प्रक्रिया जैसे तुर्क सत्ता और उसके साथ आये इस्लाम और सूफी तत्वों के भिन्न सांस्कृतिक-राजनीतिक हस्तक्षेप से शुरू हुई उसी प्रकार भक्ति आदि के चिंतन के लौकिकीकरण पर भी इस भिन्न सांस्कृतिक हस्तक्षेप का प्रभाव पड़ा. मध्यकाल के वैष्णव भक्त विश्वनाथ ने कहा कि ‘प्रेम ही परम पुरुषार्थ है- प्रेमाः पुमर्थो महान्’. ऐसा पहले कभी नहीं कहा गया था. चार पुरुषार्थों के अतिरिक्त प्रेम न केवल पांचवां पुरुषार्थ माना गया वरन् इसे अन्य पुरुषार्थों से ज्यादा श्रेष्ठ भी कहा गया. भक्तों के लिए और सारे पुरुषार्थ कोई अर्थ नहीं रखते. क्या यह सूफियों का प्रभाव नहीं था. उसी तरह नारद भक्ति सूत्र में भी भक्ति को ‘परप्रेमरूपा’(२) ‘अमृतस्वरूप च’ (३) कहा गया. यहाँ अनिर्वचनीय को सीधे प्रेमस्वरुप ही माना गया.( अनिर्वचनीयं प्रेम्स्वरूपम् .५१.) प्रेम की ऎसी प्रतिष्ठा में सूफियों का प्रभाव था. चाहे पाकपत्तन के बाबा फरीद हों या लोरिक चन्दा की प्रेमकहानी गाने वाले मुल्ला दाउद. देशी भाषाओं में प्रेम को प्रतिष्ठित करने वाले ये सूफी ही उत्तरभारत की देशी भाषाओं के पहले पहल कवि थे. बहरहाल चाहे वो विश्वनाथ हों या नारद भक्ति सूत्रकार, भक्ति और प्रेम की यह जाति-कुल निरपेक्षता भक्ति के विशेष क्षेत्र में ही सीमित था. रोज़मर्रा की आम ज़िंदगी में वैष्णवों को शास्त्र-सम्मत आचरण करने होते थे. ऐसा नारद भक्ति सूत्रों से भी स्पष्ट है.  कबीर ने नारदीय भक्ति को ठीक वैसे ही स्वीकार नहीं किया. नारद भक्ति सूत्र में भक्ति के लिए जाति-कुल और कर्मकांड तथा लोक-वेद दोनों को अस्वीकार किया था, ऐसा उन सूत्रों को समग्रता में पढने पर सही नहीं लगता. भक्ति के क्षेत्र में समानता की चर्चा तो एक हद तक रामानुजम के यहाँ भी थी.फिर भक्ति के आदर्श उदाहरण के रूप में गोपियों की कृष्ण के प्रति प्रेम को बताया गया है. लेकिन ये प्रेम कैसा होगा और किस तरीके से होगा इसका उल्लेख नहीं किया गया है क्यूंकि यहाँ सूत्रकार सीधे भागवत में वर्णित गोपी-कृष्ण लीला को अप्रत्यक्ष रूप से संदर्भित मान रहा होता है. इसके अलावा निम्न सूत्रों को पढ़ने से हमें धर्म और वर्णाश्रम की कबीर द्वारा की गयी मूलगामी आलोचना और नारद भक्ति सूत्रों के अंतर का भी पता चलता है.

११.लोकवेदेषु तदानुकूलाचारणं तद्विरोधिषूदासीनता ||
१२.भवतु निश्चयदाढ्रयांदृध्व शास्त्ररक्षणम् ||
१३. अन्यथा पतित्यशंकया ||
१४. लोकोऽपि तावदेव भोजनादि व्यापारस्त्वाशरीरधारणावधि||
६१. न तदसिद्धौ लोकव्यवहारो हेयः किन्तु फलत्यागस्तत्साधनं च कार्यमेव||
६२. स्त्रीधननास्तिकचरित्रं न श्रवणीयम्|| (फिर भी स्त्री विरोधी दृष्टि के पीछे नाथपंथियों का प्रभाव बताते हैं अग्रवाल!,जबकि वर्णाश्रम की कठोर आलोचना करने वाले नाथों के बदले जाति-निरपेक्ष भक्ति के लिए नारदीय भक्ति सूत्र को ज़िम्मेदार मानते हैं! प्रेम के लिए भी नारदीय सूत्र, सूफियों का प्रभाव नहीं! यह उलटबांसी नहीं तो क्या है.)
७३. वादो नाव्लम्ब्यः ( कबीर खूब वाद करते हैं, और यह अग्रवाल जी के लिए नाथों का प्रभाव नहीं है!)
७६. भक्तिशास्त्राणि माननीयानि तादुद्धोधककर्माणि करणीयानि||

दस्तकारों और कामगारों के बढ़ते दबाव ने भक्ति के क्षेत्र में समानता को सामाजिक क्षेत्र में समानता के दावों में रूपांतरित किया. अकारण नहीं कि रामानंद के पहले निम्न जातियों के कामगारों की इतनी स्वीकृति नहीं थी. और कबीर ने इस दबाव को काव्य में रूपांतरित करते हुए धर्म और वर्णाश्रम की मूलगामी आलोचना की. यह अंतर इतना स्पष्ट है कि इसे किसी भी प्रकार से नारदीय भक्ति के पूर्ण स्वीकार में रिड्यूस नहीं किया जा सकता है. और न ही रामानंदी वैष्णवता की चादर में छुपाया जा सकता है. प्रेम अगर भक्ति है और केवल यही भक्ति है तो सहज प्रेम में रूकावट डालने वाले सारे मिथ्या जंजालों को भी खतम किया जाना ज़रूरी है. कबीर ने अपनी पिछली सारी परम्पराओं की आलोचना अपने सहज कामगार चित्त से की थी. और यही कारण है कि वो नाथों से लेकर नारद भक्ति और रामानंदी वैष्णवता सबको ट्रांसैंड कर जाते हैं. पुरुषोत्तम इसे बताना नहीं चाहते लेकिन प्रेम के अमर गायक जायसी इसे देख भी रहे थे और कह भी रहे थे. यहीं आकर वो उस जुलाहे से हार मान लेते हैं. कबीर के इस क्रिटिक का अग्रवाल के वैष्णव थीसिस में कोई जगह नहीं है. लेकिन कबीर पंथियों की सहज चेतना में यह लगातार रहता आया है. कई तरह के दबाव और अप्प्रोप्रियेशन के बाद भी. क्षितिमोहन सेन ने कबीर पंथी साधुओं से सुन कर जो पद इकट्ठे किये थे उनमें कबीर के नाम से यह पद भी शामिल था. कबीर यहाँ खुद नारद को संबोधित करते हैं-

नारद, प्यार सो अंतर नाहीं |
प्यार जागै तौही जागूं  प्यार सोवै तब सोऊँ ||
जो कोई मेरे प्यार दुखावै जड़ा-मूल सों खोऊँ||
जहां मेरा प्यार जस गावै तहां करौं मैं बासा||
प्यार चले आगे उठ धाऊँ मोहि प्यार की आसा||
बेहद्द तीरथ प्यार के चरननि कोट भक्त समाय||
कहैं  कबीर प्रेम  की महिमा प्यार देत बुझाय|| (२-१११, कबीर वाणी)

जो कोई भी मेरे प्यार को कष्ट देगा , उसके रास्ते में बाधा डालेगा, मुझसे दूर करने की कोशिश करेगा, दुनिया के जंजाल में फाँसेगा, अलग-अलग पंथों में भटकायेगा, ऊंच नीच का बाज़ार चलाएगा, बाह्याचार में उलझायेगा फिर चाहे वो ब्राह्मण हो या वैष्णव, शाक्त हो या वैरागी, योगी हो या अवधू , हिंदू हो या तुरक, काजी हो या पंडित, उसे मैं जड़-मूल से वंचित कर देता हूँ. नारद! प्रेम में अंतर नहीं होता, भेद नहीं होता. अर्थात नारद भक्ति में जो प्रेम का अंतर दिखाया गया है या उसका पालन किया जाता रहा है ,कबीर को वह स्वीकार नहीं. कबीर की मूलगामी आलोचना की यह प्रखरता कबीर पंथी साधुओं के चित्त से पूरी तरह धुल नहीं गयी थी. भले ही पुरुषोत्तम जी ‘औपनिवेशिक ज्ञानकाण्ड’ के सहारे यह मनवाने की कोशिश करते हों. भले ही पुरुषोत्तम गांधी को वैष्णव कबीर की परम्परा में शामिल करने का मिथ्या भ्रम फैलाते हों.

कबीर और नारद भक्ति के बीच के इस अंतर को समझने पर हमें यह भी समझ आने लगता है कि क्यों पुरुषोत्तम जी भक्ति के निर्गुण-सगुण विभाजन के बदले शास्त्रोक्त और काव्योक्त भक्ति के विभाजन को प्रस्तावित करते हैं. निर्गुण और सगुण भक्ति के साथ भक्ति के सामाजिक आधारों की स्पष्ट पहचान जुडी है. एक बार अगर यह पहचान इससे अलग कर दिया जाए तो कबीर आदि निर्गुनियों की प्रखर चेतना का महत्व भी धूमिल  हो जाएगा. पुरुषोत्तम जी कहते हैं कि नारद भक्ति सूत्र में प्रस्तावित भक्ति दरअसल शास्त्र से मुखामुखम करती कविता की स्वतंत्र संवेदना वाली भक्ति है. इसी भक्ति को रामानंद ने भी स्वीकार किया था. इसलिए यह गीता या भागवत में वर्णित भक्ति से अलहदा है. इस प्रकार नारद भक्ति सूत्र काव्योक्त भक्ति की प्रस्तावना रखता है. अगर केवल इसी मान्यता को ध्यान में रखें तब तो हिंदी के सारे भक्त कवि काव्योक्त भक्ति में समाहित हो जाएंगे. क्या सूर सिर्फ भागवत में वर्णित लीलाओं का अनुवाद कर रहे थे? या तुलसी ही ‘नानापुराण निगमागम सम्मत’ कहने मात्र से अपनी कविता में शास्त्रों का अनुवाद कर रहे थे? अगर वह अनुवाद मात्र होता तो कविता की लिहाज से कतई महत्वपूर्ण नहीं रह जाता. दरअसल जिसे काव्योक्त भक्ति कहा जा रहा है उस लिहाज से हिंदी के सारे भक्त कवि काव्योक्त भक्ति के अंतर्गत ही आ जायेंगे. इसलिए यह विभाजन निर्गुण भक्ति काव्य में निहित उस क्रांतिकारी चेतना की अवहेलना है जिसके दांत सगुण भक्ति ने उखाड़ दिए थे. पुरुषोत्तम जी का कहना है कि भक्ति काल में निर्गुण और सगुण का वैसा विभाजन नहीं था जैसा बाद में पंथों ने खडा किया था. तो क्या दार्शनिक स्तर पर सूर के भ्रमर गीतों की प्रखर निर्गुण आलोचना और सामाजिक स्तर पर  साखी,सबदी दोहरा गाने वाले निर्गुनियों को तुलसी की फटकार महज धोखा है? खुद पुरुषोत्तम जी १९९२ में जब ‘भक्ति संवेदना: शास्त्र और काव्य का मुखामुखम’ लिख रहे थे तो सर्जनात्मक शब्द के व्यापक पोलिटिक्स को शास्त्रों के बरक्स केंद्र में रखने की अपील कर रहे थे. उनके ध्यान में राम के नाम पर होने वाली हिंदू फासिस्ट राजनीति के समक्ष खुद सर्जनात्मक शब्द की राजनीति को रखने का आग्रह था. आग्रह था कि ‘हिंदू’ जाति की जो एक समस्याविहीन,आतंरिक संघर्षरहित राजनीतिक इकाई के रूप में जो राष्ट्रीय आख्यान  रचा गया था उसने साहित्यिक विरासत का मूल्यांकन करने के जो ‘नोर्म’ बनाए थे उसके सामने भक्ति काव्य की सर्जनात्मक चेतना को प्रतिष्ठित किया जाए. भक्तिकाव्य के ऊपर हिंदी-हिंदू का समीकरण लादने के बजाये, “हिंदू जातिपरक नार्म के समक्ष इसे नतमस्तक करने की बजाय यदि इसके अपने स्वरुप को परखा जाए तो स्पष्ट होगा कि इसमें समाज के आतंरिक उपनिवेशीकरण की तीखी आलोचना व्यक्त हुई है”( विचार का अनंत, पृष्ठ-१३०). इस प्रकार हिंदू फासीवादी राष्ट्रीय आख्यान के उत्तर में वह आतंरिक रूप से विभाजित हिंदू अस्मिता और उसके भीतर के उपनिवेशीकरण की तीखी आलोचना करने वाली निर्गुण काव्य संवेदना को सामने रखने की कोशिश कर रहे थे. और उनका आग्रह था कि ‘साहित्य की अन्याभिमुखता को श्रेयस्कर मानने वाली साहित्यिक दृष्टि का भद्रलोकीय आत्मछवियों से जो गहरा सम्बन्ध’ रहता आया है, वह भद्र लोक ‘उपनिवेशीकरण से अत्यंत क्षुब्ध है, लेकिन आतंरिक उपनिवेशीकरण से सर्वथा बेखबर’. आज जब खुद पुरुषोत्तम आतंरिक उपनिवेशीकरण को भूल कर उपनिवेशीकरण से ही केवल क्षुब्ध हैं. जब आतंरिक उपनिवेशीकरण के ब्राह्मणवाद रुपी विचारधारा को खुद ही उपनिवेशीकरण की उपज बता रहे हैं, तब कबीर आदि के सर्जनात्मक शब्द को, उनकी प्रखर ब्राह्मणवाद-विरोधी चेतना को, ‘देशज आधुनिकता’ जैसे मुल्लमे से छुपाने की कोशिशों को क्या कहा जाएगा! अगर वो सचमुच अन्याक्रांत न होकर समाज को आगाह करने और सर्जनात्मक सब्द को स्थापित करने का दावा कर रहे हैं तो फिर उन्हीं के शब्दों में कहना होगा कि “इस दायित्व को निभाने की उत्सुकता और साहित्य के स्वत्व की चिंता यदि सच्ची है तो फिर मुक्तिबोध के मुहावरे का सहारा लेकर यही कहा जा सकता है कि ‘पार्टनर पहले अपनी पॉलिटिक्स साफ़ कर लो” (वही, पृष्ठ- १३१)

कबीर की कविता धर्मसत्ता के बरक्स धर्मेतर अध्यात्म को प्रतिष्ठित करने वाली कविता है. अग्रवाल जी की यह स्थापना सचमुच विचारोत्तेजक है . लेकिन दुर्भाग्य यह है कि पूरी बात-चीत में धर्म और धर्मेतर अध्यात्म दोनों ही एक पार-ऐतिहासिक(transhistorical) पद की तरह आये हैं. ठीक उसी तरह जैसे फायरबाख के यहाँ आये थे. मार्क्स की १८४४ की आर्थिक और दार्शनिक पांडुलिपियों में आये धर्म संबंधी चिंतन को उनके बाकी लेखन से काट कर पढ़ने पर ऐसे निष्कर्ष आते रहे हैं. वह भी तब जब पुरुषोत्तम जी के लिए श्रम के अलगाव से मुक्ति का ऐतिहासिक सन्दर्भ या मार्क्सवाद महज पश्चिमी प्रबोधन के बाध्यकारी आख्यान दिखते हों. बहरहाल ज्यादा विस्तार में न जाते हुए मैं उसी पाण्डुलिपि के सहारे अपनी बात रखने की कोशिश करता हूँ. पूरे विवाद के लिए अलग से किसी लेख की ज़रूरत है.

अग्रवाल जी ने बड़ी चालाकी से मार्क्स का सहारा लेकर श्रम और आध्यात्मिकता के अलगाव और उनके वस्तूकरण को दो अलग अलग घेरों के रूप में व्याख्यायित किया है. हांलाकि बाद में यह जोड़ना नहीं भूलते कि दोनों परस्पर सम्बंधित हैं. कैसे सम्बंधित हैं इस पर विचार नहीं है. और जहां मार्क्स ने विचार किया भी है उस हिस्से को अपने हिसाब से उपयोग में लाते हैं. मैं इस बात को दिखाने के लिए पहले अग्रवाल जी को उद्धृत करूँगा फिर मार्क्स को. मार्क्स को सीधे अंग्रेजी में उद्धृत करूँगा ताकि अनुवाद की दिक्कत से अर्थ सम्प्रेषण में दिक्कत न हो जाए. अग्रवाल लिखते हैं-

मनुष्य की आत्मसत्ता प्रकृति को ज्यों का त्यों अपना लेने की बजाय, उसके साथ आवयविक अस्तित्व में बने रहने की बजाय प्रकृति के साथ सह-अस्तित्व, प्रेम और संघर्ष के रूप में फलीभूत होती है. इस क्रम में सामजिक संगठन भी बनता है और मनुष्य की स्वतः स्फूर्त गतिविधियां –कल्पना और श्रम- उसके लिए परी हो जाती है; और तब : “मनुष्य की प्रजाति सत्ता (स्पेसीस बीइंग) भी उससे छीन  जाती है. उसकी प्रकृति और मनुष्य होने के नाते उसकी प्रजाति की विशिष्ट संपदा- आध्यात्मिकता- दोनों उससे छीन जाती हैं. दोनों(उसका स्वभाव न रहकर) उसके व्यक्तिगत अस्तित्व का साधन-मात्र रह जाती हैं. मनुष्य की देह पराई हो जाती है और ठीक उसी तरह पराई हो जाती है : उसकी बाहरी प्रकृति तथा उसकी अध्यात्म सत्ता- उसकी मनुष्य सत्ता.(पृष्ठ-३२४)

अब मैं मार्क्स को सीधे उद्धृत करता हूँ. ध्यान दे कि श्रम से अलगाव का रिश्ता आध्यात्मिक अलगाव से कैसे जुडता है और अग्रवाल कहाँ उसे अलग कर रहे होते हैं.

It is just in his work upon the objective world, therefore, that man really proves himself to be a species-being. This production is his active species life. Through this production, nature appears, as his work and his reality. The object of labour is, therefore, the objectification of man’s species-life: for he duplicates himself not only, as in consciousness, intellectually, but also actively, in reality, and therefore he sees himself in a world that he has created. In tearing away from man the object of his production, therefore, estranged labour tears from him his species life, his real objectivity as a member of the species, and transform his advantage over animals into the disadvantage that his inorganic body, nature, is taken away from him.
Similarly, in degrading spontaneous, free activity to a means, estranged labour makes man’s species-life a means to his physical existence.
The consciousness which man has of his species thus transformed by estrangement in such a way that species [-life] becomes for him a means.
Estranged labour turns thus:
(3)Man’s species-being, both nature and his spiritual species-property, into a being alien to him, into a means for his individual existence. It estranges from man his own body, as well as external nature and his spiritual aspect, his human aspect.”(EPM, pp. 74,progress publishers,1977.)

अपने श्रम के उत्पाद से, अपने जीवन के क्रिया-कलापों से, अपने प्रजाति सार से अलगाव का तत्काल परिणाम होता है मनुष्य का मनुष्य से अलगाव. जो सम्बन्ध किसी मनुष्य का अपने काम से होता है, अपने श्रम के उत्पाद से होता है वही सम्बन्ध उसका दूसरे मनुष्यों से भी होता है, दूसरे मनुष्यों के श्रम से होता है और उस श्रम की वस्तु से होता है.

Hence within the relationship of estranged labour each man views the other in accordance with the standard and the relationship in which he finds himself as a worker.(pp.75)

इस प्रकार श्रम के परायेपन की अभिव्यक्ति और उपस्थिति वास्तविक जीवन में कैसे होती है ? मार्क्स यह सवाल करते हैं. अगर श्रम का उत्पाद हमसे अलग है एलियन है तो आखिर है किसका? अगर हमारी अपनी क्रियाएँ हमारी नहीं है, किसी के द्वारा मजबूर की गयी हैं,  तो वह दूसरा कौन है. एक सत्ता (बीईंग) जो मैं नहीं है. कौन है वह सत्ता? मार्क्स कहते हैं वह सत्ता इश्वर है. जो अपने वास्तविक एजेन्ट पुरोहितों आदि से हमारे आत्म पर कब्जा जमाए बैठा रहता है. (pp.75-76) इतिहास के अलग-अलग काल खण्डों में यह इश्वर श्रम के दूसरे ठेकेदारों से समझौता करता चलता है. कबीर के समय केवल इश्वर की सत्ता थी. उस सत्ता के वास्तविक एजेंट अलग-अलग संप्रदायों के ठेकेदार थे. मनुष्य-से मनुष्य को बांटने वाला वर्णाश्रम था. ब्राह्मणवादी सत्ता तंत्र था. अपने श्रम के अलगाव को समझने और मुक्त होने के क्रम में ही इस पूरी व्यवस्था का मूलभूत नकार कबीर के यहाँ संभव हुआ. इसी ने उनके प्रजाति-सत्ता को मुक्त किया. इसी कारण उनकी कविता ,उनकी कला में आध्यात्मिक अलगाव से भी मुक्ति है. कबीर सम्पूर्ण श्रम को मुक्त नहीं कर पाए. खुद के अभिज्ञान को ज़रूर उन्होंने कला में रूपांतरित किया. या रूपांतरित करने की कोशिश की. उनका अध्यात्म और प्रेम इसी मौलिक अभिज्ञान के कारण इतना सहज और विशिष्ट लगता है. अग्रवाल इस सच्चाई को समझ नहीं पाए. फिलवक्त इस अलगाव के पीछे काम करने वाला पूंजीवाद धर्मसत्ता के साथ नए राजनीतिक सम्बन्ध में है. नए सम्बन्ध बनाता जा रहा है. कबीर के समय वैश्विक दृष्टि का भ्रम केवल धर्म की भाषा में व्यक्त होता था. इसलिए उसकी आलोचना भी उसी भाषा में थी. आज वह धर्म और पूंजी के संश्लिष्ट रिश्तों में है. पूंजी से मुक्ति के लिए श्रम संघर्षरत है. इसलिए इस आध्यात्मिक अलगाव से मुक्ति की भाषा और संवेदना पूंजीवादी राजनीतिक से लड़कर ही हो सकती है. श्रम के अलगाव को दूर करने वाली राजनीति की भाषा में ही हो सकती है. अग्रवाल या तो इसे समझते नहीं हैं या समझना नहीं चाहते.

कबीर की कविताई पर अग्रवाल जी ने सहृदयता से विचार किया है. लेकिन पूरे किताब की स्थापनाओं का उसमे कोई योगदान नहीं है. मृत्यु और प्रेम संसार की सभी श्रेष्ठ कविताओं के विषय रहे आये हैं. भिन्न-भिन्न ऐतिहासिक पलों में इनका भिन्न-भिन्न तरीकों से कवियों ने अपनी काव्य अनुभूतियों में अनुवाद किया है. शब्द की महत्ता कविता पहचानती है. और वह जीवन के ज्यादा नजदीक भी होती है. इसलिए वह केवल दर्शन नहीं है. दर्शन से ज्यादा जीवन है. कबीर की कविता के पास हमें आज भी जाना होता है और आगे भी जाना होगा. पता नहीं अग्रवाल जी की स्थापनाएं कुछ दिनों बाद खुद कबीर की कविता के सामने बेबस नज़र आने लगें!

  मार्तंड प्रगल्भ जे.एन.यू. के भारतीय भाषा केंद्र में पी.एच.डी. के लिए शोधरत  हैं.

संतों धोखा कासू कहियो-1 (पुरुषोत्तम अग्रवाल की किताब ‘अकथ कहानी प्रेम की..’ की समीक्षा)) : मार्तंड प्रगल्भ

By  मार्तंड प्रगल्भ
 

कबीर वैष्णव थे . आरंभिक आधुनिक काल में विकसित होती देशज आधुनिकता ने जो मूल्य सामने रखा कबीर उसके अग्रदूत थे, इनकी भक्ति काव्योक्त थी. और इनकी वैष्णवता जाति-कुल निरपेक्ष थी. कबीर के समय से विकसित होती देशज आधुनिकता को अवरुद्ध किया औपनिवेशिक शासन ने. इस औपनिवेशिक शासन ने अपना एक ज्ञान-कांड रचा जिसके प्रभुत्व में फिर से जाति व्यवस्था  प्रतिष्ठित हुई. इस ज्ञानकाण्ड ने देशज ज्ञान के विकास को रोक दिया. इसने पूरे भारतीय चिंतन में एक विच्छेद पैदा किया. और इस प्रकार पश्चिमी या यूरोपीय आधुनिकता के बाध्यकारी मूल्यों को हमारे यहाँ प्रतिष्ठित करने की कोशिश की गयी. लेकिन कबीर के समय से विकसित होती देशज आधुनिकता को औपनिवेशिक शासन के खिलाफ लड़े जा रहे राजनीतिक संघर्ष में पुनः स्थापित करने की कोशिश गांधी ने की. गांधी भी वैष्णव थे. जाति-कुल निरपेक्ष कबीर की वैष्णवता को ‘वैष्णव जन ते…’ के रूपक में उन्होंने लोकप्रिय किया. इसकी ग्राह्यता खुद इसकी लोकप्रियता में थी. जिस प्रकार कबीर शाक्त को नकार कर वैष्णव हुए थे, उसी प्रकार जिन क्रान्तिकारियों ने शाक्त चिंतन से प्रेरणा ली उसकी बनिस्पत वैष्णव गांधी की देशज आधुनिक मुहावरों को जनता ने अपने ज्यादा करीब पाया क्योंकि जनता के धार्मिक अस्तित्व ने पहले ही गैर- वैष्णव परम्परा को एक लिहाज से अस्वीकार कर दिया था. इस प्रकार गांधी ने औपनिवेशिक ज्ञान मीमांसा के प्रतिरोध का नेतृत्व किया. आज भी हमें गांधी के इस चिंतन पद्धति को समझना होगा तभी कल्याण है. पुरुषोत्तम अग्रवाल की अकथ कहानी यही है. और इस कहानी में रूकावट डालने वाले तत्वों खासकर ‘मार्क्सवाद’ और गौण रूप से वर्त्तमान दलित चिंतन को कथित रूप से ‘औपनिवेशिक’ ज्ञानकाण्ड की उपज बता दिया गया है. कुछ लोगों ने ध्यान दिलाया है कि इस अकथ कहानी में जासूसी कहानियों का सा प्रभाव है. और जासूसी कहानियाँ तो लोकप्रिय हुई उन्नीसवीं सदी के अंत और बीसवीं सदी के आरम्भ में अंग्रेजी कहानियों की नक़ल से और उस नक़ल के बांगला संस्करणों के अनुवाद से. अब अगर आख्यान रूपों का कुछ ऐतिहासिक सन्दर्भ होता है तो इस जासूसी कहानी का भी सन्दर्भ है ,और कहना होगा कि यह सन्दर्भ औपनिवेशिक ही है. पश्चिमी ही है. यूरोपीय ही है. लेकिन काल में बिलकुल हमारे आपके साथ. इस नवउपनिवेशवाद और वैश्विक आवारा पूंजी के दौर में!

            आइये इस कहानी को थोडा और करीब से पढ़ें. लेकिन इसके पहले मैं एक कहानी और सुनाता हूँ. भारतेंदु हरिश्चंद्र हिंदी के आधुनिक विद्वानों में सम्मानीय हैं. कुछ लोगों के लिए ‘हिंदी नवजागरण’ के अग्रदूत हैं. हिंदी साहित्य में भारतेंदु युग भी है. भारतेंदु भक्त थे. वैष्णव थे. परिवार इनका व्यापारियों का था. अग्रवाल थे. साथ ही राजभक्त भी थे. पश्चिम के ढंग की आधुनिकता भी आकर्षित करती थी. इन्होने भक्ति विषयक कवितायें लिखी हैं. साम्प्रदायिक आधार पर उत्तर-भक्तमाल की रचना भी की है. नारद भक्ति सूत्र और शांडिल्य भक्ति सूत्र का अनुवाद भी किया है क्रमशः ‘तदीय सर्वस्व’ और ‘भक्ति सूत्र वैजयंती’ के नाम से. उन्होंने ‘वैष्णवता और भारतवर्ष’ नाम से एक लेख भी लिखा था. इस लेख में उन्होंने घोषित किया कि भारत का प्रकृत धर्म वैष्णवता ही है. अभी वैष्णव धर्म में थोड़े संस्कार की ज़रूरत है क्योंकि ये बाह्य आडम्बरों में ज्यादा घिरे हैं. फिर क्रिस्तान, ब्राह्म, मुसलमान आदि में भक्ति की प्रधानता से ये सब लोग भी वैष्णवों के सादृश्य हैं. इसलिए “ बाह्य आग्रहों को छोड़कर केवल आतंरिक उन्नत प्रेममय भक्ति का प्रचार करें, देखें कि दिग्दिगंत से हरिनाम की कैसी ध्वनि उठती है और विधर्मीगण भी इसको सर झुकाते हैं कि नहीं और सिक्ख, कबीरपंथी आदि अनेक दल के हिन्दुगण भी सब आप से आप बैर छोड़ कर इस उन्नत समाज में मिल जाते हैं कि नहीं”. इस प्रकार भारतेंदु के ‘भारतवर्ष’ के लिए एक ‘प्रकृत धर्म’ चाहिए था और वह ‘राष्ट्रधर्म’ वैष्णवता थी. वैष्णव मत की उनकी समझदारी अधिकाँश में कृष्ण भक्ति संप्रदायों से बनी थी. इस समझ को उन्होंने राष्ट्र की तत्कालीन बन रही समझदारी से जोड़ दिया. वैष्णवता को उन्होंने सनातन भारतीय आत्म के रूप में समझाने की कोशिश की. इस पहचान में भारतेंदु पूर्व और उनके समकालीन पश्चिमी भारतविदों के धर्म सम्बन्धी चिंतन का प्रभाव भी है. और  इस प्रकार वैष्णवता तत्कालीन राष्ट्र सम्बन्धी चिंतन के परिप्रेक्ष्य में भारतेंदु के लिए एक राजनीतिक मुहावरा भी था. इस निबंध में भारतेंदु ने वैष्णवमत को भारत का प्रकृत धर्म बताते हुए इसके ३६ कारण भी गिनवाए हैं, यह कहते हुए कि: “जो कोई कहे कि यह तुम कैसे कहते हो कि वैष्णव मत ही भारत का प्रकृत धर्म है तो उसके उत्तर में हम स्पष्ट कहेंगे कि वैष्णव मत ही भारतवर्ष का भूत है और वह भारतवर्ष का हड्डी लहू में मिल गया है. इस के अनेक प्रमाण हैं, क्रम से सुनिए” और पहला ही प्रमाण हमारे भक्ति विषयक चिंतन के लिए मजेदार तर्क देता है जिसमे भारतेंदु कहते हैं, “पहले तो कबीर, दादू, सिक्ख, बाउल आदि जितने पंथ हैं सब वैष्णवों की शाखा प्रशाखाएँ हैं और भारतवर्ष इन पंथों से छाया हुआ है.” अभी हमने ऊपर देखा कि सिक्ख, कबीर पंथी आदि अनेक दल के हिन्दूगण वैष्णव नहीं थे अभी सब वैष्णव हो गये! और विधर्मियों को भी वैष्णव हो ही जाना चाहिए क्योंकि मूल रूप से उनकी भक्ति भी वैष्णव थी.इसी प्रकार बाकी सारे कारणों को पढ़ने से साफ़ हो जाता है कि विभिन्न धार्मिक मतों को ऐसे ही वैष्णवता के विशाल छत्र के नीचे उन्होंने एक करने की कोशिश की थी.

इसके बावजूद भारतेंदु की वैष्णवता तरल पहचान वाली थी. वैष्णवता की इस तरलता में कैथोलिक भाव का अन्वेषण और उसकी प्रतिष्ठा ग्रियर्सन ने की. ग्रियर्सन के यहाँ वैष्णव भक्ति की कृष्ण मार्गी समझदारी को राम की भक्ति के साथ मिलाकर एक भारतीय धर्म की कल्पना हुई जिसमे विक्टोरियन समर्पण की छौंक शामिल है. भक्ति के उत्स में नेस्टोरियन ईसाईयों के प्रभाव वाली मान्यता तो कड़ी आलोचनाओं के प्रभाव में उन्होंने लगभग छोड़ दी लेकिन भक्ति के आदर्श के रूप में तुलसी के राम को उन्होंने नहीं छोड़ा. तुलसी सचमुच के ‘राष्ट्रकवि’ थे और बाकी सारे कवियों में सबसे ज्यादा कैथोलिक थे. इसलिए ब्रिटिश राज को यहाँ कैथोलिक धर्म के प्रचार की और मिशनरी कार्यों की वैसी ज़रूरत नहीं है. समझना सिर्फ यह है कि इस देश के लोगों के हृदय पर राज करने वाली राम भक्ति भावना को समझा जाए और उसके सहारे कैथोलिक धर्म और राजभक्ति के सन्देश को लोगों तक ले जाया जाए[1]. औपनिवेशिक ज्ञान मीमांसा और उसके राज्य प्रचारित स्वरुप में यह एक बड़ा परिवर्तन था. भक्ति के इस ‘राष्ट्रीय चरित्र’ को बल मिला खुद हिंदी के द्विवेदीयुगीन विचारकों के द्वारा.

द्विवेदी युग की मर्यादा और नैतिकता पर इस प्रचारित वैष्णव भक्ति का बहुत ही बड़ा प्रभाव पड़ा. और इस मर्यादा और नैतिकता के सबसे बड़े सिद्धांतकार के रूप में रामचंद्र शुक्ल ने वैष्णव भक्ति की कृष्णमार्गी परिभाषा में तुलसी के राम को प्रतिष्ठित किया और उसमे कैथोलिक ईसाई तत्वों के विदेशीपन को एक सिरे से नकारते हुए इसे भारत के स्वाभाविक और प्रकृत भक्ति के रूप में स्थापित कर दिया[2]. इसी वजह से कबीरादि निर्गुनियों की भक्ति को विदेशी पद्धति की भक्ति कह कर खारिज किया गया. राष्ट्र-धर्म के रूप में हिंदू सगुण  राम भक्ति को पहचान देने के साथ ही यह विदेशी राज के खिलाफ संघर्ष की एक हिंदू-राष्ट्रवादी परिणति थी. इसका राष्ट्रीय आख्यान मुसलमानों को सामने रख कर निर्मित हुआ और तात्कालिक कैथोलिक विदेशीपन को भी चुनौती मिल गयी. इस काम में द्विवेदी युगीन कवि,संपादक , विचारक सब शामिल थे. और इसी वैष्णव व्यक्ति की मुक्ति के स्वर छायावाद में भी प्रखर थे. अपने तमाम नयेपन के वावजूद छायावाद वैष्णव था. मुख्यधारा की गांधीवादी राजनीति और छायावादी साहित्य दोनों ही वैष्णव थे. देशभक्ति की परिभाषा वैष्णव थी. औपनिवेशिक राज्य से संघर्ष के हथियार भी औपनिवेशिक ज्ञानमीमांसा से ही निकले थे.

यहाँ तक कि बड़थ्वाल ने निर्गुण सम्प्रदाय के कवियों-भक्तों में एक सुचिंतित दर्शन की खोज करते हुए उसे उपनिषदों की धारा से जोड़ दिया और साबित किया कि भारत का प्रकृत धर्म यही है और यह भी वैष्णव ही है[3]. और सूफी प्रभावों को भी परोक्ष रूप से भारतीय बताया गया क्यूंकि सूफी दर्शन भी भारतीय वेदान्त से ही विकसित हुआ था! इस प्रकार कबीरादी निर्गुनिये भी मिलाजुलाकर उसी राष्ट्रीय आख्यान में शामिल कर लिए गए. भक्ति अभी भी ‘मुसलमान’ आक्रमण की प्रतिक्रिया में आई मानी जाती थी और इस प्रकार ब्रिटिश राज में भी यही भक्ति हमें संबल दे सकती थी!

हजारी प्रसाद द्विवेदी ने इस लिहाज से भक्ति संबन्धिनी चिंतन में एक पैराडाइम शिफ्ट लाया. उन्होंने भक्ति को भारतीय चिन्ताधारा के स्वाभाविक विकास के रूप में दिखाया और इस में ब्राह्मणेतर धर्मों के लोकपरक तत्वों का योगदान निरुपित किया. चूँकि यह चिन्ताधारा ईसा के हजार साल के आसपास खुद ही लोक की ओर झुकने लगी थी अतः यह भक्ति भी लोकधर्म थी. जब भक्ति लोक धर्म थी तो निश्चित ही वैष्णव धर्म भी लोक परक था.लेकिन इस बात से द्विवेदी जी पूरी तरह सहमत नहीं थे कि संतमत भी उसी तरह वैष्णव था जैसा सगुण भक्ति. द्विवेदी जी के लोकधर्म संबन्धिनी चिंतन ने उन्हें मध्यकालीन बोध को समझने के लिए मजबूर किया.और इसलिए द्विवेदी जी के पास उस तरह का कोई राष्ट्र-धर्म नहीं था. इस लोक संबन्धिनी चिंतन के कारण उनमें राष्ट्रवादी इतिहास दृष्टि से मुक्ति के प्रयास भी दिखाई पड़ते हैं. द्विवेदी जी पर मोनियर विलियम्स के पॉपुलर धर्म संबन्धिनी चिंतन का प्रभाव भी देखा जा सकता है. द्विवेदी जी ने मुसलमान आक्रमण की प्रतिक्रिया में भक्ति के उद्भव या प्रसार को नकारा और भक्ति को दक्षिण से उत्तर तक एक आंदोलन की तरह दिखाने का प्रयास किया.भक्ति को भक्ति आंदोलन के आख्यान की तरह देखने की शुरुआत तो बड़थ्वाल के यहाँ ही हो जाती है.[4]लेकिन उसका व्यापक निरूपण और उसकी सैद्धांतिकी  द्विवेदी जी के लेखन में रूप ग्रहण करती है और तब से आज तक भक्ति को एक आंदोलन की तरह ही देखा जाता है. द्विवेदी जी ने भक्ति आंदोलन को राष्ट्रीय आंदोलन के आख्यान की तरह देखा था. जिस ग्रियर्सन के हवाले से भक्ति-आंदोलन का ज़िक्र द्विवेदी जी ने किया है उस हवाले में ग्रियर्सन ने आंदोलन या मूवमेंट के बदले भक्ति को एक विचार या आईडिया लिखा था. लेकिन इस आईडिया या विचार को ‘क्रांति’ या ‘रिवोल्यूशन’ ज़रूर कहा था[5]. बहरहाल राष्ट्रीय आंदोलन के आख्यान में भक्ति को अवस्थित किया गया, दक्षिण से उत्तर में आकर नोटिस प्राप्त भक्ति के चार संप्रदायों और भक्तमाल की परम्परा ने इसमें अपना योगदान भी दिया.

औपनिवेशिक दौर के इन चिन्तनों के परिप्रेक्ष्य में अग्रवाल जी की कहानी ने नया नुक्ता ढूंढ निकाला है. पहले भक्ति के वैष्णव परिभाषा में रामभक्ति को स्थापित किया गया था. अब अग्रवाल जी का कहना है कि उसमें कबीर को रखा जाए. क्योंकि रामानंदी वैष्णवता ही देशज आधुनिकता की प्रभावी धारा है न कि स्मार्त वैष्णवता जो कि तुलसी की है. भक्ति सम्बन्धी पूर्ववर्ती सभी चिंतन औपनिवेशिक ज्ञानमीमांसा से प्रभावित हैं और इसलिए औपिवेशिक आधुनिकता के गढ़े गए आख्यान हैं. जबकि कबीर को समझने के लिए हमें देशज आधुनिकता को समझना होगा. देशज आधुनिकता की शुरुआत पंद्रहवीं सदी के आसपास हुए सौदागरी पूंजीवाद के विकास के साथ जुड़ता है. व्यापारियों की स्वायत्तता ने पुरानी वर्णव्यवस्था पर आघात किया. उनके ‘फेयर प्ले’ के एथिक्स ने आधुनिक मूल्य बोध को जन्म दिया. जहां व्यक्ति सत्ता को जन्म आधारित भेदभाव से मुक्त करने का प्रयास शामिल है. इस विकसित होती आधुनिकता में पहले से विकसित होते काव्योक्त वैष्णवता, जो नारद भक्तिसूत्र में और रामानंद के चिंतन में दिखाई देता है, का महत्वपूर्ण योगदान है. भक्ति काव्य को सगुण-निर्गुण के द्विविभाजन में देखना बाद के पंथों के साहित्य के प्रभाव में है. खुद भक्त इस विभाजन को नहीं मानते हैं. उस वक्त दरअसल एक भक्ति का लोकवृत्त बन रहा था. यह लोक वृत्त आधुनिक परिघटना है और अलग अलग समाजों में अलग अलग तरीके से उसी समय विकसित हो रहा था. यह लोकवृत्त आधिकारिक और निजी वृत्त से अलग सार्वजनिक विषयों पर स्वायत्त ढंग से चितन करता है. कबीर की बानी इसी लोकवृत्त का सबसे प्रखर स्वर था.

सौदागरी पूँजीवाद के विकास और उसके कारण संभव हुए भक्ति रूपी लोकजागरण की चर्चा रामविलास शर्मा ने विस्तार से की है. १९५० के दशक में रूसी भारतविदों के बीच यूरोपीय पुनर्जागरण या रेनेसंस के साथ भक्ति काल की सादृश्यता पर गहन और विस्तृत चर्चा हुई थी. इस विस्तृत चर्चा पर विद्वानों का ध्यान कम ही गया है. इन चर्चाओं का संक्षिप्त परिचय हमें इ.पी. चेलिशोव की किताब ‘भारतीय साहित्य की समस्याएं’ में मिलता है. कहना न होगा कि ये सभी मूलरूप से मार्क्सवादी चिन्तक ही थे. और इनमें से किसी ने भी भारतीय समाज को बर्फ में जमे समाज की तरह नहीं देखा था. लेकिन ‘आरंभिक आधुनिकता’ सम्बन्धी वर्त्तमान पश्चिमी चिंतन से ख़ासा प्रभावित पुरुषोत्तम अग्रवाल मार्क्सवादी इतिहास-दृष्टि की आलोचना पूरी किताब में करते ही चले गए हैं. लेकिन देशज आधुनिकता की अपनी ऐतिहासिक समझदारी के लिए इन्हें भी सौदागरी पूँजीवाद का सहारा लेना ही पड़ता है! सौदागरी पूंजीवाद के विकास के साथ नगरों के विकास ने दस्तकारों का जो नया वर्ग तैयार किया और साथ ही समाज के निम्न समझी जाने वाली जातियों में जो आत्मविश्वास और स्वतंत्र चेतना पैदा किया उसके साथ कबीर जैसे संत भक्तों का जो सम्बन्ध है वह केवल ‘फेयर प्ले’ के मुहावरे से नहीं समझा जा सकता है. इस सम्बन्ध की समझदारी हमें ग्राम्शी जैसे मार्क्सवादियों से ही मिल सकती है. नामवरसिंह ने बहुत पहले इस ओर संकेत भी किया था. जब तक इस महत्वपूर्ण ऐतिहासिक प्रक्रिया को नहीं समझा जाता तब तक हम यह भी नहीं समझ पायेंगे कि दसवीं शताब्दी में बनते नारद भक्ति सूत्र और रामानंद की वैष्णवता से कबीर की भक्ति कैसे ज्यादा मूलगामी हो जाती है. और तब हमें भक्ति के शास्त्रोक्त और काव्योक्त विभाजन का आशय भी स्पष्ट हो जाएगा.दरअसल भक्ति के निर्गुण और सगुण विभाजन में छिपे भक्ति के भिन्न सामाजिक आधारों को भक्ति विषयक चिंतन से विस्थापित करने का प्रयास है काव्योक्त और शास्त्रोक्त के संस्कृत काव्य शास्त्रीय मुहावरे को सामने लाना. और तब हमें यह भी समझ आएगा कि वर्णाश्रम की कठोर आलोचना करने वाले नाथपंथियों का अग्रवाल की कहानी में कोई जगह क्यूँ नहीं है. पूरी कहानी में नाथपंथ का ज़िक्र आता है केवल यह बताने में कि निर्गुण पंथियों की नारी सम्बन्धी दृष्टिकोण को नाथपंथियों का प्रभाव मानना चाहिए![6] जाति निरपेक्ष भक्ति के लिए नारदीय सूत्र और नारी विरोधी दृष्टि के लिए नाथपंथी! इस कहानी की उलटबांसी को क्या कहियेगा. प्रेम के लिए भी जिम्मेदार नारदीय भक्ति, सूफियों का प्रभाव नहीं !

आइये देखते हैं कि रामानंदी वैष्णवता के ऊपरी जाति विरोध को कबीर ने क्यूँ कर मूलगामी जातिविरोध में बदल दिया. कुछ ऐतिहासिक प्रक्रियाओं के उल्लेख उन परिवर्तनों को सामने लाने वाले क्रियाशील व्यक्तिओं के अपने वर्णन में नहीं मिलते. और ऎसी स्थिति में ही ऐतिहासिक दृष्टि की ज़रूरत होती है. ग्राम्शी ने श्रमशील समूह के खंडित विश्वदृष्टि की चर्चा अपने जेल में लिखे नोटबुक में किया है. हम यहाँ रुक कर उसे थोडा पढ़ने की कोशिश करते हैं. जेल में लिखे अपने ‘नोट-बुक’ में ग्राम्शी ने ‘व्यवहार के दर्शन’ की लंबी चर्चा की है| इस चर्चा में उन्होंने ‘सामान्य बोध’ पर विस्तार से अपनी बात रखी है|[7] ‘जनसमूह में कार्यरत व्यक्ति’, सामान्य कामगार दैनन्दिन कार्यों में लगा होता है| फिर भी इस दुनिया के बारे में उसकी कुछ अपनी समझदारी होती ही है| इसी दुनिया के बारे में जिसे वह अपने श्रम से बदलता रहता है|[8] लेकिन उसके पास ‘अपने व्यावहारिक कार्यों को लेकर कोई साफ़ सैद्धांतिक चेतना नहीं होती’| बल्कि-

“उसकी सैद्धांतिक समझदारी ऐतिहासिक रूप से उसके क्रिया-कलापों से भिन्न हो सकती है| कोई संभवतः कह ही सकता है कि उसकी दो सैद्धांतिक चेतनाएं (या एक अंतर्विरोधी चेतना) होती है: एक जो उसके क्रियाकलापों में अन्तर्निहित होती है और प्रकारांतर से उसे वास्तविक दुनिया के व्यावहारिक रूपांतरण में रत अपने सभी साथी कामगारों से एक करती है; और एक जिसे वह अतीत से बिना किसी आलोचना के ग्रहण करता है और जो सतही रूप से व्यक्त और मुखर होती है|”[9]

यह अन्तर्निहित चेतना और सतही रूप से व्यक्त चेतना का अंतर्विरोध दो विरोधी सामाजिक समूहों का प्रतिबिम्बन है| कहना न होगा कि-

“ इस प्रकार इस सामजिक समूह [व्यापक जन समूह वाला एक सबाल्टर्न समूह] की इस दुनिया के बारे में अपनी धारणा होती है,चाहे वह बीज रूप में ही हो;एक धारणा जो अपने को कर्म में अभिव्यक्त करती है ,लेकिन सामयिक रूप से और कभी कभी ही, एक कौंध बनकर- जब वह समूह एक आवयविक पूर्णता से कार्य करता है| लेकिन इसी समूह की एक और धारणा होती है जो उनकी अपनी नहीं होती और अधीनस्थता या बौद्धिक अधीनता के कारण दूसरे समूह से उधार ली गयी होती है; और यह मुखर रूप से इसी धारणा को स्वीकार करता है और खुद मानता है कि इसी का अनुकरण करता है, क्योंकि ‘सामान्य समय’ में वह इसी के अनुसार काम करता है- अर्थात जब इनका आचरण स्वतंत्र या स्वायत्त न हो कर अधीनता या मातहती(submissive and subordinate) में होता है|”[10]

इस प्रकार सबाल्टर्न वर्ग का ‘सामान्य बोध’ आतंरिक रूप से अंतर्विरोधग्रस्त और बिखरा हुआ होता है| यह सामान्य बोध द्विविधाग्रस्त,बहुआयामी और अंतर्विरोधी होता है तथा इसमे कोई परिवर्तन किसी निश्चित ऐतिहासिक प्रक्रिया में प्रभुत्वशाली और मातहत वर्गों के आपसी संबंधों के बदलाव से ही संभव होता है| ‘सामान्य-बोध’ के उस स्वायत्त तत्त्व को जो किसी सबाल्टर्न समूह के क्रियाकलापों में अन्तर्निहित होता है और उनके सभी सदस्यों में अपने श्रम के कारण दुनिया को बदलने के कारण होता है और “सामान्य समय”[11] में प्रभुत्वशाली वर्गों के विचारधारात्मक वर्चस्व के कारण प्रकट नही हो पाता, ग्राम्शी कई बार ‘साधु-बोध’(good sense) कहते हैं|[12] ‘सामान्य-बोध’ के इन दो तत्त्वों के बीच नए उभरने वाले धर्म-मतों और दर्शनों के कारण हमेशा एक गतिशील अंतर्क्रिया भी होती रहती है| जब नए उभरने वाले दर्शन और धर्म मत समाज में एक खास प्रभुत्व बना लेते हैं तो फिर इनका प्रभाव सामान्य बोध के उस तत्त्व पर पड़ता है जो उधार ली गयी होती है| हर दार्शनिक धारा और धर्म-मत की छाया और उसके कुछ अवशेष सामान्य-बोध का हिस्सा बनते चलते हैं| और इस प्रकार सामान्य बोध या ‘लोक-मत’ ऐतिहासिक रूप से रूपांतरित होता चलता है और खुद को विचारों और दर्शनों से समृद्ध भी करता चलता है| इस प्रक्रिया में कई बार लोकमत की अन्तर्निहित धारणा एक ज्यादा सुसंगत विश्वदृष्टि पाने का प्रयास करती है| ग्राम्शी ने सामान्य बोध को ‘दर्शन का लोकगीत’(फोकलोर ऑफ फिलोसोफी) कहा है|[13]सामान्य बोध भविष्य के लोकगीतों के निर्माता होते हैं| जो किसी खास देश-काल में लोकप्रिय ज्ञान का ज्यादा बद्ध(रिजिड) चरण होता है| यहाँ ग्राम्शी न केवल सामान्य बोध या लोक-मत के ऐतिहासिक प्रक्रम को रेखांकित कर रहे है बल्कि लोकगीतों के स्वरुप और उनके इतिहास के अध्ययन का भी सूत्र हमारे सामने रख रहे हैं|

            नयी धार्मिक और दार्शनिक धाराएँ प्रभुत्वशाली और अधीनस्थ वर्गों के संघर्ष से अछूती नही रहती| इन वर्गों के बीच किसी खास ऐतिहासिक क्षण में ‘परिस्थितिवश’ जब संघर्ष एक खास गतिशीलता प्राप्त कर लेता है तो सामान्य बोध का स्वायत्त तत्त्व अपनी उपस्थिति पुरजोर तरीके से अभिव्यक्त करने लगता है| यह श्रम में अन्तर्निहित धारणा की उधार ली गयी धारणा पर एक विजय होती है| यह श्रम करने वालों की परिस्थितियों में हुए एक आधारभूत परिवर्तन के कारण संभव होता है और जिसके फलस्वरूप उनकी स्थिति में आयी सापेक्षिक स्वतन्त्रता उनके सामान्य बोध के स्वायत्त तत्त्व को एक आत्मविश्वास से भर देती है| जब-जब ऐसी स्थिति आती है समाज के संकट(क्राइसिस) की अभिव्यक्ति समाज के दो भिन्न विश्वासों,दो भिन्न धर्मों और दो भिन्न विश्व-दृष्टियों में बँट जाने के डर में होने लगती है| ऐसी ही परिस्थिति में ‘लोक-धर्म’ शास्त्र का ‘विकल्प’ बन कर सामने आती है| और तब नए धर्मों और दर्शनों का फिर से बनना और अपने को पुनर्व्यवस्थित किया जाना शुरू होता है, ताकि पूरे सामाजिक व्यवस्था में फिर से एक विचारधारात्मक एका बनाया जा सके| यह या तो नए आधारों पर ज्यादा प्रगतिशील हो सकता है या फिर अपनी खोई हुई सत्ता को फिर से पाने की कोशिश में पुराने आधार की तरफ पुनरागमन हो सकता है|[14] संत-भक्ति के ज्यादा स्वायत्त और ‘अनुभवसम्मत विवेकवाद’ का धीरे-धीरे भक्ति के ज्यादा शास्त्रीय और वर्चस्व की विचारधारा में पर्यवसन ऐसी ही एक प्रक्रिया थी| इस प्रक्रिया का पहला चरण निश्चित रूप से लोक-धर्म का शास्त्र के विकल्प के रूप में सामने आना था|

            धर्म की ऊपर-ऊपर की एकता भी केवल भ्रम होती है| भक्ति युगीन वैष्णव धर्म भी कहने को ही एक ही था| न केवल उसके भीतर अनेक अंतर-धाराएँ थीं बल्कि वह समाज के भिन्न वर्गों के लिए भिन्न-भिन्न था| किसानों का वैष्णव धर्म एक था, कारीगरों का दूसर तो पंडितों का तीसरा| इसलिए चेतना के साथ धर्म के रिश्तों का अध्ययन एक ही धर्म-मत के विभिन्न रूपों के बीच की भिन्नता को ध्यान में रख कर किया जाना चाहिए| धर्मों के आतंरिक अंतर्विरोध समाज के विभिन्न वर्गों के लिए भिन्न-भिन्न अर्थ रखते हैं. एक ओर धर्म की एक प्रवृति समाज के लिए सार्वभौम नैतिक आचारसंहिता बनाने की कोशिश करती है और दूसरी ओर इस सार्वभौमिक संहिता के वर्चस्व के नकार की प्रक्रिया भी चलती रहती है. और महत्वपूर्ण यह है कि  विभिन्न सामाजिक समूहों में प्रचलित धार्मिक विश्वासों और आचार प्रक्रियाओं से उन अन्तर्निहित तत्त्वों को सामने लाना चाहिए जो धर्म के उन रूपों में वर्चस्वशाली रूप के विरोध में होते हैं. वस्तुतः द्विवेदी जी मध्ययुगीन धर्म-साधनाओं के इतिहास को लिखते समय यही काम कर रहे थे. उन प्रतिरोधी तत्त्वों की पहचान के कुछ संकेत ग्राम्शी ने किये थे| प्रत्यक्ष अनुभव को महत्व देना, ‘खास हद तक “प्रयोगात्मकता” और यथार्थ का सीधा अन्वेषण, हालांकि आनुभविक और सीमित’.[15]ये सब विशेषताएं संतों के यहाँ है. और तब हमें मानना होगा कि भक्ति का लोकवृत्त भी अंतर्विरोधों से परे नहीं था. इसलिए रामानंदी वैष्णवता को कबीर ने खासा रेडिकल बना दिया था.और इस प्रकार समाज का क्राइसिस दो भिन्न मतों में बंट गया था. निर्गुण संतमत और सगुण वैष्णवता. धीरे धीरे भक्ति के आधार क्षेत्र में जब परिवर्तन हुआ और छोटे वनिक, दस्तकारों और निम्न-अछूत जातिओं के यहाँ से निकल कर भक्ति किसानों और ब्राह्मणों के यहाँ पहुंची तो साथ ही साथ नए पुनर्व्यवस्था का प्रयास भी शुरू हुआ. बड़ा किसान वर्ग अभी भी सामंती विचारधारा के प्रभाव में था और इस प्रकार पहले से ज़ारी वर्चस्वशील धार्मिक मतों के प्रभाव में था. यह वर्ग हालाँकि दसवीं ग्यारहवीं सदी से शुरू हुई राज्य निर्माण प्रक्रियाओं और तदनुरूप स्थानीयताओं के पार-क्षेत्रीय मुहावरों और धार्मिक प्रतीकों और धर्म-मतों के प्रभाव में भी थी, और इसलिए पहले की तुलना में निर्गुण मत के लिए कहीं ज्यादा तैयार थी. परन्तु अपनी सामाजिक अवस्थिति के कारण कृष्ण या राम भक्ति के सगुण मतों की तरफ ज्यादा आकर्षित हुई. इस लिए भक्ति का लोक वृत्त भी दो भिन्न सामाजिक आधारों के लिए विमर्श के विषयों और संग्रह त्याग के निर्णयों में भी अंतर्विभाजित थी. ऐसी स्थिति में भक्ति को काव्योक्त और शास्त्रोक्त वर्गीकरणों को एक सिरे से नकारने की ज़रूरत है. और तब जाकर हमें मुक्तिबोध के यह कहने में कि सगुण भक्ति ने निर्गुण भक्ति के क्रांतिकारी दांत उखाड डाले, की सच्चाई मालूम चलती है.

भक्ति के लोकवृत्त की ज्यादा प्रभावशाली निर्गुण धारा के सगुण धारा में परिवर्तन की प्रक्रिया ऐसे ही समझ में आ सकती है. अकारण नहीं कि एक बार बड़े किसान वर्ग पर अपनी छाप छोडने के बाद धार्मिक मतों में एक व्यवस्था आ गयी और भक्ति के वास्तविक उन्मेष ने अपनी ऊर्जा खो दी. इस प्रक्रिया में देशी भाषाओं के क्रांतिकारी इतिहास ने भी एक चरण पूरा कर लिया. और साहित्यिक भाषा के रूप में ब्रज का पार-क्षेत्रीय स्वरुप स्थापित हुआ. मुग़ल सत्ता के पतन के साथ नए क्षेत्रीय राज्य अपनी वैधता के लिए ब्राह्मणों की ओर मुड़े और साहित्य लोकवृत्त से निकल कर दरबारी आधिकारिक वृत्त में चला गया. यह हिंदी की नयी साहित्यिक संस्कृति थी. और अब भक्ति का धार्मिक आवरण ज्यादा लौकिक श्रृंगार में अभिव्यक्त होने लगा. राधा-कृष्ण तो सुमिरन के बहाने थे.

परन्तु ऐसा नहीं है कि किसी समय हुए व्यापक सामजिक उथल पुथल के बाद समाज से वह चेतना गायब हो जाती है. अलग-अलग स्वरूपों में वह समाज के भीतर ज़िंदा रहती है. भक्ति के परवर्ती पंथों के स्वरुप और उन पंथों के सामजिक आधारों के विश्लेषण से इस बात का पता चलता है. हांलाकि यह एक ज़टिल प्रक्रिया है. डेविड लौरेंज़न ने ‘कबीर पंथ और सामजिक प्रतिरोध’ के अपने अध्ययन में इसे समझने की कोशिश की है. लोरेंज़न लिखते हैं: “इस अध्याय की मूल संकल्पना यह है कि कबीर की शिक्षा में सामजिक और धार्मिक विरोध के महत्वपूर्ण तत्व पाए जाते हैं. इन तत्वों का मूल अभिप्राय और प्रकार्य चाहे जो रहा हो, ये पंथ के अनुयायियों द्वारा –अधिकतर शूद्रों, अछूतों और आदिवासियों जैसे हाशिए के समूहों द्वारा –ऊंच-नीच पर आधारित जाति-व्यवस्था की कुछ पहलुओं को नकारने के लिए प्रयोग में लाये गए, साथ ही कबीरपंथ में अपनी सदस्यता के द्वारा वे उसी समाज के भीतर आत्मसात होने के अनुकूल भी बने. वो ‘संस्कृतिकरण’ के द्वारा अपनी स्थिति को ‘बदलने’ की कोशिश भी करते हैं. जितना ही वे उच्च जाति की विचारधारा को आत्मसात करते हैं उतना ही अपनी सामजिक स्थिति को ‘ऊंचा’ उठाने का प्रयास करते हैं.लेकिन वास्तव में, ये सामजिक समूह यह आशा नहीं कर सकते कि दूसरों की निगाहों में उनकी जातिगत स्थिति नाटकीय ढंग से ऊपर उठ जाएगी. फिर भी, कबीरपंथ की अधिक समतावादी विचारधारा में उन्हें एक सकारात्मक आत्मछवि प्राप्त होती है जो कि रूधिग्रस्त ब्राह्मणवादी हिंदू परम्परा के द्वारा आरोपित जन्मजात निम्न स्थिति को अस्वीकार करती है.”[16] कबीर की लोकप्रियता कबीर पंथों के बाहर भी बहुत रहती आई है. और इस मामले में भी उसके भिन्न सामाजिक आधारों को औपनिवेशिक काल में भी रेखांकित किया गया था. ऊपर ग्रियर्सन को लिखे एक मिशनरी की चिट्ठी का जो ज़िक्र पाद टिपण्णी में है उससे भी इस बात का पता चलता है.

आइये हम फिर नारद भक्ति के कबीर द्वारा स्वीकार पर कुछ करीब से विचार करते हैं. कबीर ने नारदीय भक्ति को ठीक वैसे ही स्वीकार नहीं किया. नारद भक्ति सूत्र में भक्ति के लिए जाति-कुल और कर्मकांड तथा लोक-वेद दोनों को अस्वीकार किया था, ऐसा उन सूत्रों को समग्रता में पढने पर सही नहीं लगता. भक्ति के क्षेत्र में समानता की चर्चा तो एक हद तक रामानुजम के यहाँ भी थी.फिर भक्ति के आदर्श उदाहरण के रूप में गोपियों की कृष्ण के प्रति प्रेम को बताया गया है. लेकिन ये प्रेम कैसा होगा और किस तरीके से होगा इसका उल्लेख नहीं किया गया है क्यूंकि यहाँ सूत्रकार सीधे भागवत में वर्णित गोपी-कृष्ण लीला को अप्रत्यक्ष रूप से संदर्भित मान रहा होता है. इसके अलावा निम्न सूत्रों को पढ़ने से हमें धर्म और वर्णाश्रम की कबीर द्वारा की गयी मूलगामी आलोचना और नारद भक्ति सूत्रों के अंतर का भी पता चलता है.

११.लोकवेदेषु तदानुकूलाचारणं तद्विरोधिषूदासीनता ||

१२.भवतु निश्चयदाढ्रयांदृध्व शास्त्ररक्षणम् ||

१३. अन्यथा पतित्यशंकया ||

१४. लोकोऽपि तावदेव भोजनादि व्यापारस्वत्वाशारीरधारणावधि||

६१. न तदसिद्धौ लोक्व्यवहारो हेयः किन्तु फल्त्यागास्तत्साधनं च कार्यमेव||

६२. स्त्रीधननास्तिकचरित्रं न श्रवणीयम्|| (फिर भी स्त्री विरोधी दृष्टि नाथपंथियों का प्रभाव बताते हैं अग्रवाल!)

७३. वादो नाव्लाभ्यः( कबीर खूब वाद करते हैं, और यह अग्रवाल के लिए नाथों का प्रभाव नहीं है!)

७६. भक्तिशास्त्राणि माननीयानि तादुद्द्धोधककर्माणि करणीयानि||

            भक्ति के उद्भव और प्रसार के दो आख्यान हमें पुराने वक्त में मिलते हैं. इसमे पहला संस्कृत में है और दूसरा देशी भाषा में. संस्कृत वाला आख्यान ‘भागवत महात्म्य’ में है जो कि ‘भागवत’ के पहले जोड़ा गया है और निश्चित रूप से सतरहवीं शताब्दी के आसपास से पहले का नहीं है. खुद भक्ति ने नारद को कहा था:

उत्पन्न द्रविड़ं साहम वृद्धिम कर्णाटके गता|

क्वचितक्वचित महाराष्ट्रे गुर्जर जिणॅतमगता ||

और फिर वृन्दावन में आने से वह पुनः जवान हो गयी है लेकिन उसके कर्म और ज्ञान नामक दो पुत्र अभी भी वृद्ध हैं और अचेत पड़े हैं यमुना के तट पर. इनके सुस्थित होने के लिए भी भागवत पाठ की ज़रूरत होती है.

            दूसरा है एक दोहा जिसे सब जानते हैं लेकिन कोई यह नहीं कह पाता कि इसका उल्लेख पहले पहल कहाँ हुआ था:

                                    भक्ति द्राविड़ ऊपजी  लाए रामानंद

प्रगट किया कबीर ने सप्तद्वीप नवखण्ड.

पहला दोहा तो निश्चित रूप से किसी कृष्ण भक्ति के सम्प्रदाय का लिखा हुआ है. और दूसरा शायद किसी निर्गुणपंथी का. परन्तु भक्ति के दक्षिण में उत्पन्न होने और उत्तर में आने को लेकर दोनों ही आख्यान सहमत हैं. भक्ति के इन दोनों आख्यानों से जुड़े हुए कुछ वाजिब प्रश्न हैं. अगर ये आख्यान औपनिवेशिक काल के पहले के हैं तो फिर निश्चित है कि औपनिवेशिक काल के पहले ही भक्ति के दो आख्यान थे, भक्ति के दो स्वरूपों पर चर्चा थी. एक कबीर को भक्ति का अग्रदूत बताता है दूसरा ब्रजभूमि को. हो सकता है यह केवल साम्प्रदायिक प्रतिष्ठा का सवाल हो. यह भी हो सकता है कि भक्ति के दो स्वरुप आरम्भ से ही लोगों के सामने स्पष्ट हो. इन दोनों आख्यानों से ही भक्ति के सगुण-निर्गुण स्वरूपों का प्रश्न भी जुड़ा है. कुछ विद्वान मानते हैं कि भक्त कवियों के यहाँ सगुण-निर्गुण दो भिन्न भक्ति की अवधारणाएं थीं और यह केवल भगवान के दो भिन्न स्वरूपों से आगे जाकर खास सामाजिक आधारों वाली विचारधारा थी. इन दो भिन्न भक्ति अवधारणाओं के निम्न और उच्च जातियों से स्पष्ट संबंद्ध थे. निर्गुण भक्त कवि में सामाजिक प्रतिरोध की चेतना थी. कुछ विद्वानों के अनुसार यह विभाजन पंथ-निर्माण की प्रक्रिया से जुड़े हैं और इनकी निर्मिति सतरहवीं शताब्दी के अंत और अठारहवीं शताब्दी के आरम्भ से बननी शुरू हुई थी. कुछ विद्वान इसे औपनिवेशिक ज्ञान कांड की उपज बताते हैं. मिलाजुलाकर अभी भी कोई स्पष्ट मान्यता या मोटामोटी समझदारी इस विषय पर बन नहीं पायी है. मनोरंजक बात यह है कि औपनिवेशिक काल में हुए भक्ति विषयक चिंतन में होने वाले परिवर्तनों का पैटर्न भी इन दो आख्यानों में निरुपित भक्ति के स्वरुप की ओर इशारा करते हैं. भारतेंदु के वैष्णव भक्ति से लेकर निर्गुण पंथ और संतमत के क्रांतिकारी अंतर्वस्तु की पहचान तक औपनिवेशिक काल में हुए भक्ति के माइनों में परिवर्तन में भी इन दो आख्यानों की भिन्नता दिखाई देती है. अगर ये आख्यान औपनिवेशिक काल से पूर्व के हैं तो मानना पड़ेगा कि औपनिवेशिक काल के चिंतन की दिशा भिन्न पड़ावों को पार करते हुए औपनिवेशिक पूर्व भक्ति की भिन्न-भिन्न मान्यताओं के आख्यान के करीब ही पहुँच रही थी,  निश्चित रूप से अपने नए राजनीतिक उद्देश्यों के साथ. तब फिर औपनिवेशिक पूर्व सामाजिक-राजनीतिक भिन्नताओं की एक धारा औपनिवेशिक काल में भी सक्रिय रही मानी जा सकती है जिसका अलग-अलग स्तरों पर उपनिवेशवाद विरोधी विचारधारा के साथ अलग-अलग अन्तर्क्रियाओं की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता. अर्थात औपनिवेशिक राजनैतिक कर्ता(colonial political subject) के रूप में भक्ति पर चिंतन करने वालों और व्यापक जनसमुदाय,जो उस तरह से सीधे औपनिवेशिक शासन के सब्जेक्ट नहीं थे, के चिंतन और प्रतिक्रियाओं के मनोरंजक स्वरुप सामने आ सकते हैं.

इतना तो तय है कि भक्ति के स्वरुप को लेकर चलने वाली उपनिवेशकालीन चर्चा का कुछ सम्बन्ध तो उपनिवेशपूर्व चर्चाओं के पैटर्न से भी है. यहाँ आकार यह बात और स्पष्ट हो जाती है कि जब हम औपनिवेशिक ज्ञानकाण्ड को सर्वथा आधिकारिक औपनिवेशिक संवेदना की निर्मिति से जोड़ते हैं तो उसे निहायत ही नए संबंद्ध विच्छेदक क्षण(moment of dissociation) के रूप में देखते हैं. यह उत्तरौपनिवेशिक इतिहास दृष्टि का प्राथमिक आधार है. लेकिन क्या औपनिवेशिक ज्ञानकाण्ड ने पहले की ज्ञान परम्पराओं और ज्ञान के लोकपरक आख्यानों को सचमुच ही एक सिरे से बदल दिया? इसी सवाल को रंजीत गुहा ने भी दूसरे तरीके से ‘Dominance without Hegemony’ में उठाया है.

राज की विचारधारा के मूर्तिमान ज्ञानकाण्ड के कारण शुरू हुई राजनीति और उस ज्ञानकाण्ड के बाहर पड़ी जनता के असंबद्ध विचारधारात्मक निर्मिति (loose ideological construct) के बीच क्या सचमुच कोई अंतर नहीं था? क्या सचमुच सूर के भ्रमरगीतों  और तुलसी की रचनाओं में मिलने वाला प्रखर निर्गुण विरोध (वैचारिक और सामाजिक), और बाद के पंथों की एक खास सामाजिक पृष्ठभूमि , जिसको ‘कबीरपंथ और सामाजिक प्रतिरोध’ जैसे अध्ययनों में डेविड लोरेंज़न जैसे विद्वानों ने दिखाने की कोशिश की है, का कोई अर्थ नहीं है? क्या अठारहवीं सदी में ब्राह्मणवाद और राज्य सत्ता के संबंद्ध में होने वाले नए परिवर्तनों का चरित्र हमें खुद भक्ति में निहित स्वरूपगत भेद की ओर ध्यान नहीं दिलाता? क्या तब भक्ति के किसी ऐसे लोकवृत्त की कल्पना की जा सकती है जो अंतर्विरोध से रहित हो? क्या भक्ति का सगुण वृत्त खुद आधिकारिक वृत्त के लिए वैचारिक और सामाजिक आधार नहीं रखता था? क्या औपनिवेशिक काल में भक्ति के सगुण राम भक्ति लोक वृत्त का आधिकारिक औपनिवेशिक वृत्त बनना उस खास ऐतिहासिक प्रक्रिया की तार्किक परिणति नहीं है जिसको मुक्तिबोध ने निर्गुण भक्ति के क्रांतिकारी दांत उखाड़ने वाली कह कर सगुण रामभक्ति की ओर इशारा किया था? इस प्रक्रिया को समझे बिना हम उस गलती को भी नहीं समझ पायेंगे जो रंजीत गुहा जैसे सबाल्टर्न इतिहासकार की भक्ति विषयक समझदारी से होती है. इन इतिहासकारों के लिए भक्ति की औपनिवेशिक परिभाषाएँ ही,जिसमे भक्ति को एक सगुण समर्पणवादी सामंती विचारधारा की तरह देखा गया है, व्याख्या का आधार बनती है. इसीलिए ये इतिहासकार भक्ति को सामंती अधीनस्थता की विचारधारा के रूप में देखते हैं और इस एकपक्षीय विचार के कारण औपनिवेशिक अधीनस्थता के लिए पहले से उपलब्द्ध विचारधारा के रूप में इसको निरुपित करते हैं.[17] प्रतिरोध की विचारधारा के रूप में भक्ति का वास्तविक निर्गुण आख्यान उनकी निगाह से गायब रहता है, और इसीलिए औपनिवेशिक प्रभुत्व का भी गैरद्वंद्वात्मक निरूपण हो जाता है. इसलिए ये सबाल्टर्न एक स्तर के बाद बंकिम और गांधी के माध्यम से ही निम्नवर्गीय इतिहास लेखन का दावा करते हैं. और इसी प्रवृत्ति की ओर हिंदी के कुछ विद्वान आलोचक ‘आरंभिक आधुनिकता’ के आख्यान के सहारे पहुंचते हैं. मजेदार बात है की इनके पास सामंतवाद आलोचना की कोई कैटेगरी ही नहीं होती. यहाँ यह भी देखना मजेदार होगा कि औपनिवेशिक ज्ञानकांड के प्रभाव में पैदा हुए राजनीतिक आन्दोलनों ने उपनिवेशपूर्व के सामाजिक-राजनीतिक अंतर्विरोधों को कैसे एक निश्चित दिशा प्रदान की और इनका विभिन्न सामाजिक प्रवर्गों के विश्वदृष्टि पर कैसा प्रभाव पड़ा. दरअसल औपनिवेशिक ज्ञानकाण्ड की द्वंद्वात्मकता को समझाने का प्रयास करना ही होगा.

औपनिवेशिक ज्ञानकाण्ड की द्वंद्वात्मकता को समझे बिना ही हम निकोलस डर्क्स जैसे उत्तर-औपनिवेशिक इतिहासकारों की इस मान्यता को मान लेते हैं कि ब्राह्मणवाद औपनिवेशिक प्रशासकों और हिन्दुस्तानी ओफिसिअल ब्राह्मणों की सांठ-गाँठ की उपज है. इसके चलते औपनिवेशिक काल में ब्राह्मणवाद को फिर से खोजा गया. वरना भक्ति के लोकवृत्त के कारण ब्राहमणवाद तो स्वतः ही एक नोर्मेटिव व्यवस्था से अलग कुछ नहीं थी. जातिनिरपेक्ष हिंदू परम्परा ही मुख्य थी. और देशज आधुनिकता में होने वाले परिवर्तनों की दिशा को अवरुद्ध करते हुए औपनिवेशिक ज्ञानकाण्ड ने हमारी अपनी परम्परा से हमें महरूम कर दिया और हमारी राजनितिक प्रक्रियाओं को गलत दिशा प्रदान की. इस औपनिवेशिक ज्ञानकाण्ड के खिलाफ कोई लड़े तो वह राजनीतिक और दार्शनिक स्तर पर गांधी !

 यह बात तो तय है कि ब्राह्मणवाद एक विचारधारा के रूप में कभी एक सा नहीं था. इतिहास के अलग अलग काल खण्डों में समाज के स्तरीकृत जातिभेदों में परिवर्तन होते रहे हैं. इन परिवर्तनों का सम्बन्ध भूमि पर विभिन्न समूहों के अधिकार और राज्य के निर्माण प्रक्रिया से भी जुड़ा हुआ है. भूमि संबंधों में परिवर्तन के कारण कुछ जातियां वर्णाश्रम में ऊपर चले जाते रहे हैं. नयी व्यापारिक गतिविधियों ने नयी जातियों को वर्णाश्रम में शामिल किया है. परन्तु एक पदानुक्रमिक संरचना के रूप में ब्राहमणवाद, एक शोषणकारी विचारधारा के रूप में ब्राह्मणवाद चला आया है. इस विचारधारा का सत्ता तंत्र से भी बहुत करीबी सम्बन्ध रहा है और लगातार शासकीय विचारधारा के रूप में भी प्रभावी रहा है. मध्यकाल में इस्लाम के आगमन के साथ इस शासकीय विचारधारा को पहले की अपेक्षा कहीं अधिक चुनौती मिली. परन्तु तुर्क-मुग़ल सत्ता ने भी आमतौर पर शासकीय कार्यों में इस विचारधारा को स्वीकार ही किया था. लेकिन राज्य के बदलते स्वरुप और १४वीं १५वीं सदी तक आते आते नगरीकरण और  वाणिज्यीकरण की तेज होती प्रक्रियाओं ने ब्राह्मणवादी विचारधारा को कड़ी चुनौती दी. धर्म मत के रूप में भी इस्लाम ने चुनौती पेश की. देश्यभाषाकरण की प्रक्रिया ने कुछ पहले ही साहित्यिक संस्कृति को भी संस्कृत-अपभ्रंश की सार्वत्रिकता और अर्द्ध-सार्वत्रिकता से मुक्त कर दिया था. राज्य के स्वरूपों में होने वाले परिवर्तनों के साथ इस नयी विकसित देश्यभाषाकरण का गहरा रिश्ता है जिसे शेल्डन पोलक ने समझने की कोशिश की है. परन्तु दक्षिण भारत से उत्तर भारत में देश्यभाषाकरण की प्रक्रिया भिन्न थी और इस प्रक्रिया में  तुर्कसत्ता के साथ भिन्न संस्कृति के आगमन ने बड़ी भूमिका अदा की थी. यही कारण है दक्षिण भारत की अपेक्षा उत्तरभारत की भक्ति ने भी ज्यादा रेडिकल रुख अपनाया था. वह राज्य और संस्कृति के पोलिटि के दक्षिण भारतीय रूपों से ज्यादा मुक्त भी हो पायी. इसलिए भी भक्ति के उद्भव में इस्लाम के चार आने के ‘प्रभाव’ को चार आने तक सीमित करना भूल है. और इसलिए भी भक्ति के विकास में इस्लाम की भूमिका को भी कम करके आंकना भूल है. इसलिए कबीर जैसे रेडिकल चिंतकों की अकथ कहानी में इस्लाम की भूमिका का अनदेखा किया जाना भूल है. और इसलिए भी गाँधी की देशज आधुनिकता से कबीर की ‘आधुनिकता’ भिन्न विचारसरणी वाली है.

बहरहाल ब्राह्मणवाद में जो दरार १५वीं सदी के आसपास पैदा हुई उसमे मुग़ल सत्ता के पतन के साथ बदली हुई परिस्थिति में फिर से एक पुनरुत्थान देखने को मिलता है. जो इतिहासकार उत्तर-औपनिवेशिक इतिहास दृष्टि से उतने आक्रान्त नहीं हैं, उन्होंने इस प्रक्रिया को बखूबी लक्ष्य किया है. बहुत सारे इतिहासकारों को छोड़ भी दिया जाए तो सिर्फ उमा चक्रबर्ती की ‘जेंडरिंग कास्ट’ में उन्होंने दिखाया है कि औपनिवेशिक शासकों ने १८वीं  सदी में आरम्भ हुए राज्य के ब्राह्मणीकरण की प्रक्रिया को और ज्यादा तेज किया, तथा उसे संस्कृत के उच्च पाठों के सहारे रिजिड और कोडीफाइ भी किया. लेकिन इस शासकीय प्रक्रिया के बाहर ब्राह्मणवाद का शोषणकारी स्वरुप तब भी ज़ारी था और शासकों के लिए कई जगह मुश्किल निर्णयों का सबब भी बनता था[18]. साथ ही इस शोषण से मुक्ति के संघर्ष भी चल रहे थे. फूले जैसे चिंतकों ने धार्मिक मुहावरों से बाहर जाकर पूरे ब्राह्मणीय संरचना को शोषण की संरचना के रूप में व्याख्यायित किया और उसे अस्वीकार किया. संस्कृतिकरण और सुधारवादी कर्मकांडों की आलोचना की. उन्होंने ब्राह्मणीय संरचना में बद्ध निम्न जातियों की अवरुद्ध ‘सांस्कृतिक कल्पना’ को मुक्त करने का प्रयास किया. धर्म से बाहर जाकर समाज में स्थित सामाजिक और आर्थिक अंतर्विरोधों को जाति व्यवस्था के प्रश्न के केन्द्र में लाया. उनका लेखन उन लोगों से अलग था जो अपनी-अपनी जातियों का इतिहास लिख रहे थे या फिर उच्च जातियों के उन लेखकों से जो जाति को गलत और बाध्यकारी सामंजस्य के रूप में देखते थे. आगे चलकर फूले की परंपरा में पेरियार और अम्बेडकर जैसे चिंतकों ने महती भूमिका निभाई. हम उनके विचारों से संवाद कर सकते हैं, आलोचना कर सकते हैं, उन्हें कई जगह नकार सकते हैं, लेकिन जातिगत शोषण के गांधीवादी हल से तब भी बेहतर स्थिति में उनके चिंतन को पाते हैं. यह अकारण नहीं कि ब्राह्मणवाद के शोषणकारी स्वरुप को ठेठ जिंदगियों से उठाने वाले प्रेमचंद कफ़न की मूलगामी समीक्षा तक पहुंचते हैं और इस प्रकार कोलोनिअल ज्ञानकाण्ड के बाहर पडी रोज़मर्रा की जिंदगियों में उस सत्य को देख लेते हैं जो अग्रवाल और डर्क्स जैसे उत्तरौपनिवेशिक नहीं देख पाते! जाति के साथ भूमि संबंधों को नज़रअंदाज करते हुए उत्तर-औपनिवेशिक आलोचना भी दरअसल अस्मितामूलक विमर्शकारों और राजनीतिज्ञों की गलती को ही दुहराता है. फिर उपनिवेश विरोधी आंदोलन की भिन्न ध्वनियों को भी अस्वीकार करते हुए गांधी के चिंतन में उसकी सही दिशा तलाश करता है.[19]यह औपनिवेशिक काल के पोलिटिकल कंडीशनिंग का तो नकार है ही वर्तमान पोलिटिकल कंडीशनिंग का भी नकार है. जाति से वर्ग में रूपान्तरण की प्रक्रिया को समझे बिना हम वर्तमान नवउदारवादी-नवउपनिवेशवादी कंडीशंस से लड़ नहीं सकते. और इस प्रकार भारत के अर्द्ध-सामंती अर्द्ध-औपनिवेशिक चरित्र को समझे बिना ब्राह्मणवाद को भी नहीं समझ सकते. आज कोई भी सामजिक समूह वैश्विक पूंजीवाद से बाहर नहीं है. अगर हमें इतिहास से शिक्षा लेना है तो प्रतिरोध की उस धारा से प्रेरणा लेनी होगी जो कबीर आदि के यहाँ अपने श्रम की विचारधारा में निहित थी और धर्म की मूलगामी आलोचना करती थी. जैसे फूले ने जातिव्यवस्था की सामजिक-आर्थिक कंडीशनिंग पर ध्यान दिलाया. कबीर की परम्परा कोई भी हो गांधी की नहीं है. कबीर की देशज आधुनिकता कोई भी हो गांधी की देशज आधुनिकता नहीं थी. फिलहाल इतना ही. अग्रवाल जी की कहानी के दूसरे हिस्सों पर बहस फिर कभी.


[1] कुछ विद्वानों ने ग्रियर्सन पर पश्चिमी हिन्दुस्तान में भी तुलसी के महत्व को बढ़ा-चढ़ा कर बताने का आरोप लगाया था. उसके उत्तर में ग्रियर्सन ने एक चिट्ठी का हवाला दिया था जो उसे किसी मिशनरी मि. डन ने लिखा था. मि. डन ने इलाहाबाद ,दिल्ली और गुडगाँव जिलों के अपने १९ साल के अनुभव के आधार पर तुलसी के बारे में ग्रियर्सन की बात की पुष्टि की, तथा लिखा की तुलसी के दोहे या चौपाइयों को सुनांने से प्रशासकों का काम कितना आसान हो जाता है क्योंकि लोग तब उनसे अपना जुड़ाव महसूस करते हैं. लेकिन उसने अपने पत्र में यह भी बताया था कि कबीर के दोहे भी उतने ही लोकप्रिय हैं. हिंदू ब्राह्मण और बनियों के बीच तुलसी ज्यादा स्वीकार्य थे जबकि “The influence of Kabir is, I think fully important, in fact, Kabir touches races and castes who have little in common with Krishanism and who know little of राम दशरथ का बेटा, but much of राम जग का करता, as they phrase it (and pronounce it too.) Kabir is, if I mistake not the great Guru of kolis and chamars as well as many higher in the scale”. (pp.462-63)दूसरी ओर तुलसी के प्रभाव से बाहर रहने वाले मुस्लिम समुदाय की ओर भी इशारा किया है. और इस समुदाय को प्रभावित करने के लिए प्रशासकों और मिशनरियों को उर्दू भाषा का ज्ञान होना चाहिए. “You can govern Indians through the medium of Urdu or Pedantic Hindi. If you want to win the Mohammadan you need to speak good Urdu, throwing in a quotation or two from SADI or HAFIZ. But for the real Hindu you must take the opposite line. His vernacular poets are the key to his affections, and there do occasionally come days, when the mere conscientious but unsympathetic official will be powerless”(pp.463) देखें: Appendix 1 , On The Influence Exercised by Tulasi Das in Western Hindostan .JRAS- 1903. तुलसी के सामान ही प्रभावशाली और लोकप्रिय कबीर को ग्रियर्सन ने लगभग छोड़ ही दिया है अपने भक्ति आख्यान में! साथ ही देखें, Vijay Pinch,  Bhakti and the British Empire ,Past & Present. Volume: 179. Issue: May,2003.

[2] देखें, रामचंद्र शुक्ल,२००४. सूरदास, ‘भक्ति का विकास’ में.प्रकाशन संस्थान: नयी दिल्ली.

[3] देखें पीताम्बर दत्त बडथ्वाल, १९५०, हिंदी काव्य में निर्गुण सम्प्रदाय, अनु. श्री परशुराम चतुर्वेदी, संपा.- डॉ. भागीरथ मिश्र. अवध पब्लिशिंग हाउस: लखनऊ.खास कर पृष्ठ- ८४.

[4] वही, पृष्ठ-७०, ८०. निर्गुण आन्दोलन को इन्होने पहले के वैष्णव आंदोलन से अलग करने की कोशिश इस्लाम और शुद्र जातियों के विशेष सामजिक सन्दर्भ में की है. लेकिन है ये भी वैष्णव ही. एक जगह वह लिखते हैं; “इस प्रकार हम देखते हैं कि निर्गुण मत के मूल स्रोत का पता चाहे हम जिस भी प्रकार लगाना चाहें, सबसे अधिक उस वैष्णव सम्प्रदाय में मिलाता है जो इससे अत्यंत निकट था और केवल कुछ ही बातों के लिए हमें इस्लाम तथा सूफी स्रोतों की ओर जाना पडता है.”(पृष्ठ-३२२) और उसमे भी सूफी दर्शन तो खुद ही भारतीय स्रोत से निकला है. अर्थात वैष्णव ही है.(पृष्ठ-७४)

[5] देखें ग्रियर्सन, JRAS-1903(पृष्ठ- ४४९)और JRAS-1907(पृष्ठ- ३१४) इस विषय पर विस्तृत चर्चा के लिए देखें. हावले जॉन स्ट्रैटन, introduction. International Journal of Hindu Studies 11, 3 (2007): 209–25.

[6] देखें पुरुषोत्तम अग्रवाल. अकथ कहानी प्रेम की: कबीर की कविता और उनका समय. पृष्ठ-५७.राजकमल प्रकाशन, दिल्ली-२०१०.

[7] एंटोनियो ग्राम्शी. सेलेक्सनस फ्रॉम दी प्रिजन नोटबुक्स, अनुवाद. क्युन्तिन होयरे और जयोफ्रे नोवेल स्मिथ. पृष्ठ-३२५-३४३.इन्टरनेशनल पब्लिशर,न्यू योर्क:१९७१.

[8] यहाँ ग्राम्शी मार्क्स के थेसिस ओन फायरबाख के ग्यारहवें थेसिस के सन्दर्भ में दुनिया को बदलने की चेतना को दर्शन के अर्थ में ले रहे हैं| वह दुनिया को बदलने के लिए किये जा रहे श्रम की चेतन विचारधारा के अर्थ से ‘सामान्य बोध’ को अलग करने की कोशिश करते हैं|

[9][9]  एंटोनियो ग्राम्शी. सेलेक्सनस फ्रॉम दी प्रिजन नोटबुक्स, अनुवाद. क्युन्तिन होयरे और जयोफ्रे नोवेल स्मिथ. पृष्ठ-३३३. इन्टरनेशनल पब्लिशर,न्यू योर्क:१९७१.

[10] वही,पृष्ठ-३२७.

[11] “Normal Times”: as opposed to the exceptional (and hence potentially revolutionary) moments in history in which a class or group discovers its objective and subjective unity in action.(pp.327)

[12] “Philosophy is criticism and superseding of religion and “common sense”. In this sense it coincides with “good” as opposed to “common sense”.”(pp.326)

“…Overcoming bestial and elemental passions through a conception necessity which gives a conscious direction to one’s activity. This is the healthy nucleus that exist in “common sense”, the part of it which can be called “good sense” and which deserves to be made  more unitary and coherent”(pp.328)

[13] “Every social stratum has its own ‘common sense’ and its own ‘good sense’, which are basically the most widespread conception of life and of man. Every philosophical current leaves behind a sedimentation of “common sense”. This is the document of its historical effectiveness. Common sense is not something rigid and immobile, but is continually transforming itself, enriching itself with scientific ideas philosophical opinions which have entered in ordinary life. ‘Common sense’ is the folklore of philosophy, and is always half-way between folklore properly speaking and the philosophy, science and economics of the specialist. Common sense creates the folklore of  the future, that is a relatively rigid phase of popular knowledge at a given place and time”(pp-326) (emphasis mine)

[14] मध्युगीन धर्मविरोधी आंदोलनों और चर्च के विशेष सन्दर्भ में ग्राम्शी ने इस प्रक्रिया को कुछ यूँ व्यक्त किया है-“ In the past such divisions  in the community of the faithful were healed by strong mass movements which led to ,or were absorbed in, the creation of new religious orders centered on strong personalities (St Dominic, St Francis)… The heretical movements of the Middle Ages… represented a split between masses and intellectuals within the church. The split was ‘stitched over’ by the birth of popular religious movements subsequently reabsorbed by the Church through the formation of the mendicant orders and a new religious unity”(pp331 and 331n). भारत में चूँकि चर्च जैसी कोई केंद्रीय सत्ता नहीं थी और न ही धर्म ठीक रीलिजन, इस लिए यहाँ नयी धार्मिक व्यवस्था का स्वरुप ठीक उसी तरह नहीं रहा जैसा यूरोप में बना था| अतः सगुण भक्ति के चरित्र पर बात करते हुए इस भिन्न सन्दर्भ को ध्यान में रखना चाहिए| साथ ही दसवीं से चौदहवीं सदी तक होने वाले परिवर्तनों की क्षेत्रीयता और उसके पार-क्षेत्रीय मुहावरों को भी ध्यान में रखना चाहिए| नए वैष्णव धर्म को चर्च की एकता कारी धार्मिक विचारधारा के रूप में लेने से भारी भूल की संभावना है| अकारण नही कि इस नीचे से बनते वैष्णव धर्म को द्विवेदी जी ने लोक-धर्म ही माना था| यह निश्चित है की इस प्रक्रिया में चलने वाले वर्चस्व और अधीनस्थता की प्रक्रियायों को उनके खास सामजिक वर्गों के सन्दर्भ में द्विवेदी जी नही देख पाए थे|

इस प्रक्रिया की विशेष चर्चा बंगाल वैष्णव स्कूल के सन्दर्भ में पार्था चटर्जी ने भी की है| देखें पार्था चटर्जी. ‘ ‘कास्ट एंड सबाल्टर्न कांसस्नेस’, सबाल्टर्न स्टडीज vi: रायटिंगस ओन साउथ एशियन हिस्टरी एंड सोसाइटी, एडी. बाइ रंजीत गुहा,पृष्ठ-१६९-२०९. ओ.यु.पी., नई दिल्ली:१९८९.

[15] ग्राम्शी,वही,पृष्ठ-३४८.

[16] डेविड लोरेंजन.२०१०. निर्गुण संतों के स्वप्न. अनु. धीरेन्द्र बहादुर सिंह. श्रृंखला संपादक- पुरुषोत्तम अग्रवाल. पृष्ठ-२१९. राजकमल: दिल्ली.

[17] देखें.Ranajit Guha.”Dominance Without Hegemony And Its Historiography” , in ‘Subaltern Studies VI: Writing on South Asian History and Society’; ed. by Ranajit Guha; pp. 257-265;Oxford ,New Delhi 1989. रंजीत गुहा लिखते हैं : “If the politics of collaboration was informed by the Humean idiom of obedience- however uneasy that obedience might  have been under the hushed, almost hopeless, urge for enfranchisement among the colonized- it drew its sustenance, at the same time, from a very different tradition- the Indian tradition of Bhakti. All the collaborationist moments of subordination in our thinking and practice during the colonial period were linked by Bhakti to an inert mass of feudal culture which has been reproducing loyalism and depositing it in every kind of power relation for centuries before the British conquest.”

[18] इस विषय पर विस्तृत चर्चा के लिए देखें. उमा चक्रबर्ती:२००३. जेंडरिंग कास्ट: थ्रू अ फेम्निस्ट लेंस. खास कर ये दो अध्याय. ‘प्रीकोलोनिअल स्ट्रक्चर ऑफ कास्ट एंड जेंडर:ऐन एटीन सेंचुरी इक्साम्प्ल’ और ‘कास्ट इन द कोलोनिअल पीरियड’. स्ट्रेस: कोलकाता.

[19] देखें. निकोलस डर्क्स:२००२. कास्ट्स ऑफ माइंड: कोलोनिअलिस्म एंड मेकिंग ऑफ मॉडर्न इंडिया. पृष्ठ- २९८-३०२ खास कर. परमानेंट ब्लैक: दिल्ली.

मार्तंड प्रगल्भ जे.एन.यू. के भारतीय भाषा केंद्र में पी.एच.डी. के लिए शोधरत    हैं.


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