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अमरकांत की कहानी ‘हत्यारे’ और आज का समय: मार्तण्ड प्रगल्भ

 बात तो करनी है ‘अमरकांत की कहानी ‘हत्यारे’ और आज का समय’ पर और इसी कहानी पर विचार करके मैं आया था। लेकिन कल की कुछ चर्चाएं जो खासतौर से यथार्थवाद के सम्बन्ध में या सत्य के सम्बन्ध में या यथार्थ और रचना के सम्बन्ध में हुई थीं उनके बारे में भी मैं इस कहानी के संदर्भ से कुछ सोच रहा था. जिसे मैं आगे स्पष्ट करूँगा. चर्चा का प्रस्तुत विषय गंभीर तो है ही मनोरंजक भी है। गंभीर क्यूं है इस पर थोड़ा बाद में चर्चा की जाएगी। पहले, मनोरंजक क्यूं है इसकी थोड़ी चर्चा कर ली जाए। आज का जो विषय है, इस विषय के साथ दिक्कत यह है कि आप जहां चाहे इस विषय को फिट कर सकते हैं। समाजशास्त्र का कोई सेमिनार हो, (तो) उसमें भी यह विषय आ जाएगा। दरअसल हुआ क्या है कि आलोचना की जो समाजशास्त्रीय पद्धति है उसने विषयों का टोटा खत्म कर दिया है और इस तरह के शीर्षक की आवाजाही बेरोकटोक चलती रहती है। जैसे, बहुत सारे शोधार्थी इसी तरह के शोध विषय चुन लेते हैं; कोई रचना ले ली और उसमें आज का समय या रचना का समय जोड़ दिया और पूरा एक शोध प्रबंध तैयार हो गया! इसके चलते, इस तरह के विषयों की पुनरावृत्ति बढ़ी है जिससे विषय की गंभीरता एक यांत्रिक पुनरुत्पादन में नष्ट हो जाती है और कई बार हम चीजों को ठेठ समाजशास्त्रीय व्याख्या तक सीमित कर लेते हैं। मानो किसी समय का जो अर्थशास्त्र है उसके बारे में जान लेना (ही विषय को समझने के लिए पर्याप्त) है , कि नेहरू युग के अवसान के समय क्या स्थितियां थीं उसकी थोड़ी चर्चा कर ली जाए और (रचना तथा उन स्थितियों) दोनों में ऐतिहासिक सम्बन्ध जोड़ लिया जाए और इस प्रकार आज के समय में हत्यारे कहानी की सार्थकता सिद्ध हो जाती है। इस पद्धति के चलते जो गंभीर और सारगर्भित सवाल हैं वो ढंक दिए जाते हैं।  # लेखक 

अमरकांत

अमरकांत

रचना और आलोचना के प्रश्न जीवन के प्रश्न होंगे कि नहीं!

By मार्तण्ड प्रगल्भ

हर सचेत और क्रियावान मनुष्य अपने समय की जटिलता को समझना चाहता है। उस समय को समझना चाहता है जिससे उसके अंग-प्रत्यंग-अनुषंग परिस्थिति विशेष में निर्मित हो रहे हैं। मनुष्य के वर्तमान की वर्तमानता (प्रजेन्स ऑफ प्रजेन्ट) क्या है? इस प्रश्न को लेकर वह कई जगह भटकता फिरता है. और ऐसे ही संकट के समय कोई कहानी या कविता या कोई अन्य कलारूप अपने भीतर के अदम्य आकर्षण से उसे अपनी ओर खींच लेते हैं। महान रचनाएं वक्त-बेवक्त ऐसा ही अदम्य आकर्षण पैदा करती हैं। तो सवाल यह है कि ‘हत्यारे’ कहानी का हम कथा आलोचकों-कथाकारों की सभा में क्या महत्त्व है। या हम सरीखों के लिए ‘हत्यारे’ की उपयोगिता क्या है? क्षमा करेंगे, यहां उपयोगिता किसी उपयोगवाद के अर्थ में नहीं है बल्कि मार्क्स जिसे उपयोग-मूल्य कहते हैं उसके अर्थ में है। दरअसल यह कहानी-कला और कथा आलोचना दोनों के लिए गंभीर सवाल है।

कल की चर्चा में समकालीनता और आज के समय के बारे में हमारे समय के महत्त्वपूर्ण आलोचक (रविभूषण) अपनी बात रखते हुए कल कह रहे थे कि 1944 से हमें अपना समय मानना चाहिए। उस साल एक किताब आयी थी- रोड टू सर्फडम; वहां से एक नए ऐतिहासिक युग ‘बाजारवाद की केंद्रीयता’ की शुरुआत होती है और उसको एक विभाजक रेखा माननी चाहिए। चूंकि वे अध्यक्ष हैं, इसलिए मैं क्षमा मांगते हुए कहना चाहता हूं कि यह काल निर्धारण की हेगेलियन पद्धति है, जहां विचार की प्रमुखता से इतिहास का मूल्यांकन किया जाता है। अब 1944 में किताब आयी और वहां से नए समय की शुरुआत हो तब तो उदारतावाद की शुरुआत लास्की आदि से ही हो जाएगी। अगर इतिहास विचारों की क्रमबद्धता, गत्यात्मकता और द्वन्द्वात्मकता में निहित है तो यह हेगेलियन पद्धति है। 44 में शेखर एक जीवनी का दूसरा खण्ड आता है। प्रयोगवाद, तारसप्तक ऐसी बहुत सारी चर्चाएं शुरु होती हैं। उनमें से किसको अपने समय का आधार बनाया जाए यह एक प्रश्न है। दूसरा प्रश्न, क्या अर्थशास्त्र के अनुशासन से चलकर साहित्य के लिए काल निर्धारण सम्भव है? अगर अर्थशास्त्र से इतिहास में परिवर्तन के चरणों को समझना है तो प्रभात पटनायक इसके लिए ज्यादा मुफीद होंगे। साहित्य के आलोचक के लिए ये प्रश्न महत्त्वपूर्ण क्यों हैं और फिर इतिहास निर्माण की जो वास्तविक शक्तियां हैं, जिनके प्रति हम अपनी प्रतिबद्धता भी व्यक्त करते हैं, वे इतिहास के निर्धारक बिंदु होंगे या कोई शिकागो स्कूल निर्धारक बिंदु होगा! कहने का तात्पर्य यह कि जैसे हमारा नया समय हमारी परिस्थितियों के अनुरूप भारतीय कम्युनिस्ट आंदोलन का भी एक नया समय था और वह नक्सलबाड़ी के आंदोलन से शुरु होता है तो इसे भी कोई कह सकता है कि यह हमारा अपना समय है। दृष्टि भेद का अंतर है। बहरहाल, सवाल है- आज का समय से मतलब क्या है? क्या आज की कहानी और कथा आलोचना का समय आज का समय है! और यदि यह सवाल है तो सवाल फिर रचना-प्रक्रिया का होगा अर्थात् प्रश्न आज के कलाकार की रचना-प्रक्रिया का है। यहां रचना-प्रक्रिया से तात्पर्य आज की कहानी की रचना-प्रक्रिया से है। सीधे शब्दों में कहें तो हत्यारे की रचना-प्रक्रिया हम सरीखों के लिए क्यों महत्त्वपूर्ण है। कहानीकार की तरफ से भी, पाठक की तरफ से भी और (ध्यातव्य है कि) आलोचक भी सबसे पहले एक पाठक ही होता है। इस रचना-प्रक्रिया को प्रारम्भिक रूप से आलोचक पाठक की ही हैसियत से समझेगा. कथाकार की तरफ से यह प्रक्रिया थोड़ी भिन्न होगी। इस भिन्नता की प्राथमिक पहचान कथाकार को होगी। लेकिन शीघ्र ही आलोचक पाठक की हैसियत से तटस्थ होगा और कथाकार लेखक की हैसियत से। यह तटस्थता कथाकार और आलोचक दोनों को कहानी के एक वस्तुनिष्ठ आकलन और मूल्यांकन की ओर प्रेरित करेगा। आकलन और मूल्यांकन के इसी क्रम में हत्यारे कहानी और आज के समय के जटिल अंतरसंबंधों की पहचान हम लोग शायद कर पाएं।

बहरहाल, कहानी पाठ की जो सबसे आम पद्धति है- वह समाजशास्त्रीय पद्धति है। जिसमें आप रचना से समाज, समाज से रचना में बराबर आवाजाही करते हैं और यह अच्छी बात भी है। कहानी के ‘आडियन्स’ की भिन्नता से इस तरह की समझ को विकसित करने का और इस समझ के चलते आडियन्स को, पाठक को विकसित करने की प्रक्रिया चलनी चाहिए। जैसे, सन् ’62 में अमरकांत की कहानी ‘हत्यारे’ आती है। यह नेहरू युग के अवसान और उसके मोह भंग का संधिकाल है और अगर हम ध्यान दें तो यह नई कहानी और अकहानी के संधिकाल की भी कहानी है और इस लिहाज खुद यह कहानी अमरकांत की कहानी यात्रा में एक ‘ब्रेक’ की तरह है। दो नायक हैं या खलनायक हैं। खलनायकत्व नायकत्व प्राप्त कर रहा है। दोनों नायकों को यदि गौर से देखें तो एक गोरा है, ऊंचा है। दूसरा सांवला है, ठिगना है। दोनों एक ही तरह की वेशभूषा में इलाहाबाद विश्वविद्यालय के आस-पास किसी बाजार में टहल रहे होते हैं और उनकी बातचीत जब शुरु होती है तो ठेठ लहज़े में, ‘हलो, सन!..इतना लेट क्यों, बेटे?’ इस तरह की एक बातचीत शुरू होती है। हमारे विमर्शों का जो दबाव है उसकी तरफ से अगर हम इस कहानी में एक संभावना की बात करें तो जो सांवला है वह भिन्न वर्ग का है, कहानी की संभावना है क्योंकि कहानी में कहीं-कहीं स्टेटमेंट्स (बयान) भी ऐसे आते हैं कि ‘तुमको सेक्रेटेरियट का भंगी बनाऊंगा!’ गोरा गुरु है। सांवला चेला है। गुरु उसको शिक्षित करता है। ठीक उसी प्रक्रिया में जैसे घीसू माधव को शिक्षित करता है. हत्यारे कहानी में जब गिलास में दोनों शराब बांटते हैं तो सांवला चुपके से अपनी शराब गोरे के गिलास में डाल देता है। (इस पर गोरा कहता है) ‘लेकिन जब तुम इतनी पी नहीं सकते तो अवसर आने पर घूस कैसे लोगे. जालसाजी कैसे करोगे, झूठ कैसे बोलोगे? फिर देश की सेवा क्या करोगे, खाक!’ सांवला अभी सीख रहा है। औरत के पास जाना अभी तक सीखा नहीं है. और फिर गोरा कहता है, ‘आज तो कुछ रचनात्मक कार्य होना चाहिए!’ तो रचनात्मक लीडरशिप क्या है? रिक्शा मजदूरों की बस्ती की तरफ चलता है। बस्ती के शुरु में ही पान की छोटी सी दुकान है। जिस पर पान-सिगरेट तो मिलती ही है रोजमर्रा की और सारी चीजें भी मिलती हैं, और वे दोनों मजदूरों की बस्ती आरम्भ होते ही जो पहली झोपड़ी है उसमें  घुस जाते हैं। एक महिला चूल्हे पर खाना बना रही होती है। उसके देखते ही गोरा मुस्कुराकर बोला, ‘ये विश्व लोफर संघ के अध्यक्ष हैं। इनको हर तरह से तुम्हें खुश करना है.’ दोनों औरत के साथ सम्बन्ध बनाते हैं। पैसा नहीं देते हैं और जब औरत कहती है, ‘लाइए मैं (पैसे का खुदरा करवा कर) ले आती हूं.’ तो गोरा बोलता है, ‘तुम तो पूंजीपति हो! तुमको किस बात की कमी है।…अरे, तुम देश की महान कार्यकत्री हो, तुम कहाँ कष्ट करोगी?’ और आगे बढ़ता है कहता है, ‘साले जूते निकालकर हाथ में लेलो! सांवला बोला ‘क्यों?’…(गोरा कहता है) ‘भाग साले! आर्थिक और सामाजिक क्रांति करने का समय आ गया है!’ दोनों भागना शुरु करते हैं। औरत बाहर निकल कर कहती है- ‘अरे, लूट लिया हरामी के बच्चों ने!’ मजदूरों की बस्ती से कुछ लोग उसके पीछे दौड़ पड़ते हैं। दोनों अरबी घोड़े की तरह सरपट भागे जा रहे हैं। कभी बाएं घूम जाते हैं। कभी दाएं घूम जाते हैं। इतने में मजदूरों का एक लड़का फुर्ती से सांवले की तरफ तीर की तरह बढ़ता चला जाता है और लगता है उसको पकड़ ही लेगा। ऐसे में गुरु गोरा रुक जाता है। जेब से चाकू निकालकर खोल लेता है और पीछा करते हुए आ रहे मजदूर के पेट में घोंप देता है और फिर भाग जाता है। कोलतारी सड़क पर आगे की स्ट्रीट लाइट में दोनों के सुंदर और पुष्ट शरीर पर पसीने की बूंदें छरछरा रही हैं; यह युद्ध का सिम्बल है ‘सिम्बलाइजेशन ऑफ पॉवर’ है, और वे फिर न जाने कहां अंधेरे में गुम हो जाते हैं. यह पूरी कहानी है। ध्यान दें कि जो नेहरूवियन आदर्शवाद है उसकी खोल के भीतर से जो फासिज्म पैदा हो रहा है यूथ के बीच में, वह उसी आदर्श की भाषा में ही पैदा हो रहा है. फासिज्म के साथ दिक्कत यही है, उसको आना तो हमारी ही भाषा में पड़ेगा। सामाजिक, आर्थिक क्रांति की भाषा में, लेकिन वो रूपवाद है। उसका यथार्थ फासिज्म है। आदर्श के उस रूपवाद का यथार्थ फासीवाद है और इसी फासीवादी टेन्डेन्सी की कहानी ‘हत्यारे’ है। और यह फासीवादी टेन्डेन्सी यूथ में व्याप्त हो रही है, जबकि हमारा देश सबसे नौजवान है, मोदी युवाओं को लेकर बड़े प्रसन्नचित हैं; एक युवा देश के भीतर, खुद युवा वर्ग के भीतर तरह-तरह के विभाजन हैं। इसको अगर ध्यान में न रखा जाएगा तो दिक्कत की बात होगी और अमरकांत की खासियत यही है। उनकी चिंता हमेशा ही परिवर्तनकारी शक्तियों के पहचान में आने वाले संकट को कहानी में रखने की है। बहरहाल, चूंकि मजदूरों की बस्ती में जा करके वह हत्या करता है। इसलिए वहां जा कर कहानी एलीगरी में बदलती है और यह मूल्य-निर्णय शामिल होता है कि फासीवादी चरित्र हमेशा ही वर्किंग क्लास (मजदूर वर्ग) के विरोध में होगा।

 बहरहाल, ये तो कहानी का एक सिंपल पाठ है। लेकिन क्या इसीलिए हत्यारे कहानी हमारे लिए महत्त्वपूर्ण है। फासीवाद के इस नए दौर के चरित्र के बारे में, उपभोक्ता समाज के बनने की प्रक्रिया के बारे में, बहुत सारी बातें इस कहानी को पढ़े बिना ही हम समझ भी रहे थे। क्या जरूरत थी कि इसको पढ़ा जाए! एक सचेत बुद्धिजीवी, एक एक्टीविस्ट जो सचमुच में परिवर्तन लाना चाहता है। जो परिवर्तन चाहता है। यथार्थ में परिवर्तन की गति को पहचानना चाहता है। उनके लिए केवल  कहानी का सामान्य पाठ ही होगा तो यह महत्त्वपूर्ण नहीं होगा।

यहाँ मैं संक्षेप में हिंदी के चार आलोचकों की चर्चा करना चाहूंगा, जिन्होंने ‘हत्यारे’ कहानी के बारे में लिखा है या अमरकांत के बारे में लिखा है। विश्वनाथ त्रिपाठी समाजशास्त्रीय, राजनीति के अपराधीकरण से लेकर अपराध के राजनीतीकरण और स्टूडेन्ट पॉलिटिक्स की वह पूरी प्रक्रिया जो जेपी मूवमेंट के भीतर से निकली है उसके ‘रिप्रजेन्टेशन’ के बतौर हत्यारे कहानी की अच्छी व्याख्या करते हैं। लेकिन वह एक सवाल उठाते हैं कि अमरकांत के पात्र कहीं भी संघर्ष क्यों नहीं करते हैं? अगर समाज में संघर्ष है तो अमरकांत के पात्र संघर्ष करते हुए क्यों नहीं दिखते। अजीब बात यह है कि ठीक यही आलोचना राजेन्द्र यादव भी अमरकांत के बारे में करते हैं कि अमरकांत की कहानी का कोई भी पात्र संघर्ष नहीं करता है। वहां आस्तित्व की समस्या महत्त्वपूर्ण है, आस्था का प्रश्न महत्त्वपूर्ण नहीं है। लेखकीय आस्था एक ओढ़ी हुई चीज है. मनुष्य के अस्तित्व की लड़ाई ज्यादा महत्त्वपूर्ण है और इसलिए अमरकांत अस्तित्ववादी कथाकार हैं। अब विश्वनाथ त्रिपाठी तो यह नहीं कहेंगे कि वे अस्तित्ववादी कथाकार हैं लेकिन हाँ, यह कहेंगे कि संघर्ष करता हुआ पात्र नहीं दिखता है। संघर्ष करते हुए पात्रों को दिखाना चाहिए। समाजवादी यथार्थवादी की जो अपेक्षा है वह अमरकांत के ऊपर विश्वनाथ त्रिपाठी की तरफ से (लागू की जाती है) और राजेन्द्र यादव हत्यारे को अस्तित्ववाद की कहानी मान लेते हैं। ‘हत्यारे’ नाम से सार्त्र की भी एक कहानी है और अगर समय हो तो संक्षेप में सार्त्र की ‘हत्यारे’ कहानी के अस्तित्ववाद का अमरकांत से क्या अंतर है इसे मैं देखना चाहूंगा और वह अंतर अपने अंतिम रूप में किसका अंतर होगा। बहरहाल, द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद का समय है। ब्रिटेन की एक कोर्ट में एक ऐसे केस की सुनवाई होनी है, जिसका जीतना तय है और वह बात यह है कि एक टी.बी. का डाक्टर है। एक दिन उसके पास बहुत अमीर आदमी आता है। लेकिन वह टी.बी. से बुरी तरह ग्रस्त है। बहुत बूढ़ा हो गया है। चल-फिर नहीं पा रहा है। दोनों फेफड़े उसके खराब हो चुके हैं और वह डाक्टर के पास बैठता है। डॉक्टर कहता है अब कोई उपाय नहीं है। तो मरीज बहुत विनती करता है। डॉक्टर कहता है, लगता है बड़े पैसे वाले हो। मरीज स्वीकार करता है तो डाक्टर उसे सलाह देता है कि तुम आज से कुछ खाओ-पीओ मत और अब सिर्फ पानी का सेवन करो और दूर कहीं चले जाओ। छः महीने गुजर जाते हैं। एक दिन अचानक वह आदमी हट्टा-कट्टा, सूटेड-बूटेड डॉक्टर के क्लीनिक में प्रवेश करता है। डॉक्टर पहचान नहीं पाता है। तब मरीज पूरी बात डॉक्टर को फिर से बताता है और डॉक्टर को बहुत सारा पैसा देने की बात कहता है। डॉक्टर चिंतित हो जाता है। वह मेज की दराज में रिवाल्वर निकाल कर अमीर आदमी को गोली मार देता है और उसका फेफड़ा निकाल कर टेबल रख कर पर निरीक्षण करने लगता है और कहता है कि इससे मनुष्य का विज्ञान पर से विश्वास ही उठ जाएगा। इसलिए मनुष्य समाज के कल्याण में उसकी हत्या कर देनी पड़ी और यह केस कोर्ट में गया है और लोग मान रहे हैं कि डॉक्टर जीत जाएगा। यह अस्तित्ववाद की कहानी है। अस्तित्व की समस्या का जो दर्शन फैलाया गया, इतिहास मुक्त व्यक्ति के स्वतंत्र अस्तित्व का प्रश्न, वह सार्त्र की कहानी में है। अमरकांत की कहानी में वह नहीं है।

यहां अमरकांत की कहानी के संदर्भ में संक्षेप में सुरेंद्र चौधरी और नामवर सिंह के पाठों के अंतर के बारे में एक बात करना चाहूंगा। सुरेंद्र चौधरी ने कहा कि हत्यारे कहानी में हत्या नहीं हुई होती तो यह बहुत महत्त्वपूर्ण कहानी होती। क्यों? क्योंकि हत्या वहां अतिनाटकीयता का प्रयोग मात्र है. जिससे कहानी में एक मादक भंगिका तो पैदा हुई है लेकिन वह कुछ कहानी में नया नहीं जोड़ती है और यह अच्छा हुआ कि अमरकांत ने आगे ऐसा प्रयोग नहीं किया। उन्होंने कहा जो परिवर्तनकारी प्रक्रिया है उसमें जो प्रच्छन्न खतरे छुपे हुए हैं वह अमरकांत की कहानी में ज्यादा बेहतर आता अगर वह हत्या नहीं हुई होती। यानि एक नपुंसक, बड़बोली, ऐय्याश युवा पीढ़ी का ज्यादा सही चित्रण हुआ होता अगर ये हत्या नहीं हुई होती। नामवर सिंह ने कहा अगर इस कहानी में हत्या नहीं हुई होती तो यह कहानी इतनी महत्त्वपूर्ण नहीं होती। उन्होंने कहा कि कहानी में हत्यारे के द्वारा की गई हत्या कहानीकार का या रचना का मूल्य-निर्णय है। एक वैल्यू जजमेंट है। अगर रचना की प्रक्रिया में यह वैल्यू जजमेंट (मूल्य-निर्णय) नहीं है, यह मैं अपनी भाषा में बोल रहा हूं एक इंटरव्यू में नामवर सिंह ने चलते हुए यह बात कही थी, तो रचना जो फासिस्ट टेन्डेन्सी दिखाना चाह रही है, जो आज एक अजीब तरह की प्रवृत्ति पैदा हो रही है ,उसे दिखाया नहीं जा सकता. युवाओं के आदर्श का अतीत में स्वतंत्रता आंदोलन का एक पूरा दौर है. पर वह आदर्श दूसरे थे। यह आदर्श दूसरे हैं। इन आदर्शों के रेहटारिक में जो कंटेंट है उसके प्रति मूल्य-निर्णय कीजिएगा कि नहीं यह एक रचना-प्रक्रिया का सवाल है। सुरेंद्र चौधरी के लिए कहानी में हत्या कहानी को अतिनाटकीय बना देती है, दूसरी ओर नामवर सिंह के लिए महत्त्वपूर्ण। दो मार्क्सवादी ओलोचकों की दृष्टि में यह भेद क्यों है? क्या यह यथार्थवाद की दो भिन्न दृष्टियां हैं? क्या यथार्थवाद बीसवीं सदी के साथ गुजरी हुई बात हो गई है! इसका हम सरीखों के लिए क्या कोई महत्त्व नहीं है? यह हमारे लिए भिन्न चर्चा का बिंदु है। यहां मैं अभी तफ्सील नहीं करना चाहूंगा, वक्त कम है। परंतु हमारे समय के एक प्रमुख चिंतक फ्रेडरिक जेम्सन के लिए यह बीती बात नहीं है। इसी साल उनकी एक पूरी किताब यथार्थवाद पर आयी है। यह किताब यथार्थवाद के साथ एक प्रयोग के लिए आमंत्रित करती है और खुद यथार्थवाद के भीतर विकसित होती आयी विरोधी प्रविधियों के द्वन्द्वात्मक चिंतन को विकसित करने का प्रयास करती है। मैं अंग्रेजी में जेम्सन को थोड़ा पढ़ना चाहूंगा अगर आप चाहें तो.

बीसवीं सदीं के इतिहास की आंतरिकता को कैसे समझा जाए इसी क्रम में जेम्सन लिखते हैं, ‘My experiment here claims to come at realism dialectically, not only by taking as its object of study the very antinomies themselves into which every constitution of this or that realism seems to resolve: but above all by grasping realism as a historical and even evolutionary process in which the negative and the positive are inextricably combined, and whose emergence and development at one and the same time constitute its own inevitable undoing, its own decay and dissolution. The stronger it gets, the weaker it gets; winner loses; its success is its failure. And this is meant, not in the spirit of the life cycle (“ripeness is all”), or of evolution or of entropy or historical rises and falls: it is to be grasped as a paradox and an anomaly, and the thinking of it as a contradiction or an aporia. Yet as Derrida observed, the aporia is not so much “an absence of path, a paralysis before roadblocks” so much as the promise of “the thinking of the path.” For me, however, aporetic thinking is precisely the dialectic itself; and the following exercise will therefore be for better or for worse a dialectical experiment.’

(मेरा प्रयोग यथार्थवाद तक द्वंद्वात्मक तरीके से पहुँचने का है. यह प्रयोग यथार्थवाद के इस या उस विरोधाभासी युग्मों के अध्ययन तक ही अपने को सीमित नहीं करता है, वरन् यथार्थवाद को एक ऐतिहासिक और विकासमान प्रक्रिया के रूप में देखने का हिमायती है. इस प्रक्रिया में यथार्थवाद के नकारात्मक और सकारात्मक पक्ष साथ-साथ अंतर्गुम्फित रहते आये हैं। अपने उदय और विकास की इस प्रक्रिया में ही वह अपना क्षय और अपनी मृत्यु भी रचता चलता है। ज्यों-ज्यों वह मजबूत होता है त्यों-त्यों वह कमज़ोर होता चलता है। विजेता पराजित हो जाता है। इसकी जीत में ही इसकी हार शामिल है। जीवन-चक्र के अर्थ में नहीं, उद्विकास के अर्थ में नहीं, किसी एन्ट्रापी के अर्थ में नहीं न ही किसी ऐतिहासिक उत्थान पतन की दास्तान के अर्थ में. बल्कि एक विरोधाभास की तरह अंतर्विरोध के अर्थ में इसे सोचने का प्रयोग. एक द्वंद्वात्मक प्रयोग।)

इस विचारोत्तेजक प्रयोग में हम सब यदि शामिल हों तो हमारी कहानी आलोचना के लिए और शायद उनके लिए भी अच्छा होगा जो आज यथार्थवाद के पीछे डण्डा लिए दौड़ रहे हैं। जी, मेरा इशारा हिंदी कहानी के पिछले 25 सालों के विकास पर बात करने वाले आलोचना के कुछ नए राजकुमारों की तरफ भी है। बहरहाल, यह कहानी फिर कभी।

हत्यारे कहानी में जो मूल्य-निर्णय है वह हत्या की घटना में है। जरूरी नहीं कि हर कहानी में यह मूल्य-निर्णय आये ही। लेखकीय मूल्य-निर्णय कोई अनिवार्यता नहीं है। परंतु अपराध की इस मनोवृत्ति के बारे में, इस फासीवादी प्रवृत्ति के बारे में अगर कहानी के भीतर उसके मजदूर वर्ग का विरोधी होने का निर्णय नहीं होता तो यह कहानी इतनी मूल्यवान नहीं होती। वह पेटी बुर्जुआ की जो एक खास प्रवृत्ति है- नपुंसक, बड़बोली, ऐय्याश युवा पीढ़ी का चरित्र-चित्रण मात्र बन कर रह जाती। ऐसे चरित्रों के भावी विकास का, गहरे खलनायकत्व का उद्घाटन वहां नहीं हो पाता। यह पीड़ा भरी प्रतीक्षा के प्रतिक्रियावादी रूपांतरण की कहानी है। विद्रूप विडंबनाओं के नायक घीसू और माधव लुम्पेन सर्वहारा हैं और हत्यारे कहानी के नायक या खलनायक, यदि कहने की अनुमति दें, तो लुम्पेन पेटी बुर्जुआ हैं। कहानी के भीतर का यह मूल्य-निर्णय दरअसल रचना-प्रक्रिया का एक अहम हिस्सा है।

 हमारे आज के कथालोचक यह दावा कर रहे हैं कि जन-जीवन में जब कोई यूनिंगफाइंग फैक्टर नहीं है तो कहानी के भीतर वह कहां से होगा। किसी यूनिंगफाइंग फैक्टर के बिना कहानी की रचना-प्रक्रिया में कोई मूल्य-निर्णय तो आ ही नहीं सकता। फिर क्या किया जाए! यूनीफाइंग फैक्टर मतलब -विश्वदृष्टि या जीवन दृष्टि। लेकिन यथार्थ के असम्बद्ध होने की चर्चा पहली बार तो नहीं हो रही है। और हम अपने अनुभव से जानते हैं कि समाज के संक्रमण काल में हमेशा ही ऐसी बातें होती रही हैं। ऐसी बातों में हमारे समय के एक प्रमुख चरित्र की ईमानदार स्वीकारोक्ति भी होती है। याद करें कि आधुनिकतावाद की धारा के एक आदि नायक टी.एस. इलियट ‘डीसोसिएशन ऑफ सेंसबिलटी’ की चर्चा किया करते थे। पिछले 20-25 सालों के तीव्र परिवर्तन ने हमारी संवेदनाओं में एक असम्बद्धता तो पैदा की ही है। जैसे इलियट के समय में भी हुई थी। आज हम तेजी से उपभोक्तावादी समाज में बदलते जा रहे हैं। हमारी पिछली पीढ़ी के महान सिनेमाकार और राजनीतिक कार्यकर्ता पियरे पाउलो पासोलिनी ने फासीवाद के नए स्वरूप को उपभोक्तावाद में बदलते देखा था। देख लिया था, इसलिए उनकी हत्या कर दी गई. और फासीवाद के इस आसन्न संकट के काल में पुराने और नए के संधिकाल में हमारी भी चेतना आक्रांत है. इसलिए मानव विरोधी विचारधाराओं के द्वारा चेतना पर छायी इस धुंध को और अधिक मिस्टीफाई (रहस्यात्मक) करने का षडयंत्र रचा जा रहा है। खण्ड-खण्ड पाखण्ड की दृष्टि एक ऐसी ही मानव विरोधी विचारधारा है। ताज्जुब नहीं, इस विचारधारा का पहला हमला यथार्थवाद पर है। ऐसा क्यूं है कि मानव विरोधी विचारधाराओं का पहला हमला समय-समय पर यथार्थवाद के खिलाफ होता है! क्योंकि यथार्थवाद और चाहे जो हो उसके मूल में है मानव-विरोधी मिस्टीफिकेशन को, उसके धुंध को साफ कर देना। डी-मिस्टीफिकेशन यथार्थवाद की एक प्राथमिक शर्त है। जहां से बुर्जुआ सोसायटी के लिए अपने-आप यह शैली खतरनाक सिद्ध हुई है। बहरहाल, उसके अलग-अलग ट्रेडीशन हैं, अंग्रेजी ट्रेडीशन, फ्रेंच ट्रेडीशन खैर! लेकिन सीधे डी-मिस्टीफिकेशन एक महत्त्वपूर्ण काम है। मूल्य-निर्णय का सम्बन्ध क्या इस डी-मिस्टीफिकेशन से है? डी-मिस्टीफिकेशन की यह प्रक्रिया बदलाव की नई ताकतों के प्रति रचना-प्रक्रिया में मूल्यबोध की तरह आती है। लेखक की प्राथमिक संवेदना से लेकर पाठ की प्रक्रिया तक इसका निरंतर विकास होता है। ब्रेख्त के लिए रचना-प्रक्रिया के साथ चलने वाला यह डी-मिस्टीफिकेशन एक क्रियावान, उत्कंठापूर्ण और प्रयोगात्मक भी है. या दुसरे शब्दों में कहें तो सामाजिक संस्थाओं और भौतिक दुनिया के प्रति वैज्ञानिक दृष्टि का उन्मेष है। यथार्थवाद इसी वैज्ञानिक दृष्टि को प्रोत्साहित करता है, प्रयोग के स्तर पर भी। और यह प्रक्रिया त्रिस्तरीय है। पहली, रचना में पात्रों और उसकी काल्पनिक दुनिया के बीच। दूसरी, रचना और पाठक के बीच। तीसरी, रचना-रचनाकार का अपने कच्चे माल और टेक्निक के बीच। यथार्थवाद का यह त्रिआयामी व्यवहार (प्रैक्सिस) परंपरागत अनुकरणों और उनके शुद्ध प्रतिनिधिमूलक केटेगरी को ध्वस्त कर देता है. जिसके प्रभाव में आजकल का अधिकांश दलित लेखन है। फिर बकौल जेम्सन ‘रीडिंग इज ए सिम्बोलिक एक्ट’। इस ‘सिम्बोलिक एक्ट’ के प्रति सजग होना, आत्म सजग होना जरूरी है। यह सजगता एक सचेतन क्रिया है। इस क्रिया में अपने राजनीतिक अवचेतन की संरचना के प्रति सजगता भी शामिल है। दिक्कत यह है कि क्या हमारा लेखन और हमारी आलोचना खुद आत्म सजग है! ‘हत्यारे’ कहानी का पाठ आज के समय में यही चुनौती हमारे समक्ष रखता है। बात सिर्फ रचना के क्लास मोटिफ को उद्घाटित करने या अलग-अलग विमर्शों के  लिहाज से उसकी व्याख्या का नहीं है . अर्थात् रचना के बाहर की दुनिया का प्रतिबिम्ब और उसकी व्याख्या का नहीं है। बल्कि रचना की विकासमान सम्पूर्णता का है। इसीलिए उसकी हिस्टोरीसिटी का है। विषय से विचार तक की यात्रा का खतरा दरअसल हिस्टोरीसिटी के अन्वेषण का खतरा है। अमरकांत की कहानी में यह हिस्टोरीसिटी उसके मूल्य-निर्णय की प्रक्रिया में आयी है। यह हिस्टोरीसिटी न केवल समकालीनता का यूनीफाइंग फैक्टर है वरन् हमारे और रचना के कालांतर का भी एक यूनीफाइंग फैक्टर है। यह रचना से पाठक तक लगातार जारी है. इस अर्थ में यह हिस्टोरीसिटी विद्आउट हिस्ट्री है .और इसी अर्थ में यह वर्तमान की वर्तमानता है। इसी अर्थ में हत्यारे कहानी खुद अमरकांत की कहानी-कला की आलोचना है। उसमें एक ब्रेक है. अमरकांत के कहानी संसार में एक घटना की तरह। हत्यारे कहानी का अंत कुछ इस तरह होता है, ‘झोपड़ियों से कुछ व्यक्ति निकलकर युवकों के पीछे दौड़े। तारकोल की सड़कें जन-शून्य थी। दोनों युवक अरबी घोड़ों की तरह दौड़ रहे थे। वे कभी बाएं घूम जाते, कभी दाएं। पीछा करने वालों में एक फुर्तीबाज व्यक्ति तीर की तरह उनकी ओर बढ़ रहा था।…जो व्यक्ति ‘हाय मार डाला’ कहके लड़खड़ा कर गिर पड़ा। इसके बाद दोनों पुनः तेजी से भाग चले। तब बिजली का खम्भा आया तो रोशनी में उनके पसीने से लथपथ ताकतवर शरीर बहुत सुंदर दिखाई देने लगे। फिर वे न मालूम किधर अंधेरे में खो गए!’ जिस अंधेरे में दोनों न जाने कहां गुम हो गए यह वही अंधेरा है जो मुक्तिबोध के ‘अंधेरे में’ है। जहां वे डोमा जी उस्ताद को देख लेते हैं। हम अपने अंधेरे में क्या देख रहे हैं! यह क्या हमारे मूल्य-निर्णय से तय नहीं होता!

दो अवांतर प्रसंग छोटे-छोटे- एक, हमारा एक कलाकार मित्र अनुपम मूवमेंट में पेंटिंग्स करता है। उसकी एक समस्या है। हालांकि यह कहानी के बाहर का प्रसंग है लेकिन कला का महत्त्वपूर्ण प्रश्न है और यथार्थवाद का भी एक महत्त्वपूर्ण प्रश्न है। वह कहता है कि हम जिस शैली में अब तक पेंटिंग्स बनाते आए हैं अब यथार्थ उसी शैली में बद्ध होकर हमारे सामने आ रहा है। याद कीजिए मुक्तिबोध की भी यही समस्या थी। वह कहता है कि मैं अपने ही शिल्प में बंधने के चलते यथार्थ को नहीं देख पा रहा हूं- यह जो परिवर्तनशील यथार्थ है। वह अपना एक अनुभव बताता है कि वह एक बार एक स्त्री के जीवन की किसी परिस्थिति पर बड़े भावावेग से एक चित्र बना रहा होता है। पेंटिंग्स पूर्ण नहीं हो पा रही है। वह परेशान है। अचानक इस परेशानी में वह अपना शरीर काटकर खून से पेंटिंग का एक हिस्सा बना देता है और अपने बाल नोचकर पेंटिंग्स में जहां-तहां चिपका देता है और कहता है कि मुझे बहुत शांति मिली है। कलाकार रचना में अपने बॉडीली प्रजेन्स (शरीरी उपस्थिति) को खोजना चाह रहा है। पेंटर पेंटिंग्स में अपनी उपस्थिति खोजने की कोशिश में है। यह बॉडली प्रजेन्स का क्राइसिस कला का एक वास्तविक अनुभव तो है, लेकिन यह मिसप्लेस्ड क्वेश्चन है। यह प्राब्लम मिसप्लेस्ड है क्योंकि पॉलिटिक्स में जैसे वह अपनी प्रजेन्स को आंदोलन के भीतर देख रहा है; रचना, जो प्रोटेस्ट के भीतर से निकलने वाली रचना है इसलिए महत्त्वपूर्ण भी है, के भीतर भी अपना बॉडली प्रजेन्स ढूंढ़ रहा है। राजनीति की दुनिया का कला की दुनिया से जो सम्बन्ध होगा, वह क्या होगा? क्या रचना-प्रक्रिया में जिसको मुक्तिबोध कहते हैं, जब तक तटस्थता नहीं होगी तब तक तदाकारिता सम्भव नहीं है। प्रश्न वहां अटैच होकर के बॉडली प्रजेन्स का, स्वानुभूति का नहीं है प्रश्न डिटैचमेंट का है। यह डिटैचमेंट लग सकता है कि कोई आधुनिकवादी तर्क हो, उपभोक्तावादी सर्जक मन का। खैर, इस पर चर्चा कहीं और।

दूसरा प्रसंग, नामवर सिंह ने हाल-फिलहाल पप्पू यादव की किताब का लोकार्पण किया। पप्पू यादव हत्यारे कहानी के नायक भी हैं। प्रश्न है, उन्होंने हत्यारे कहानी के बारे में कहा कि वहां मूल्य-निर्णय महत्त्वपूर्ण है. यह बात तो सही है कि दुनिया भर में अपराधियों की डायरियां आदि काफी लोकप्रिय हुई है;  उस पर विचार करना एक अलग बात है. लेकिन उसकी किताब का लोकार्पण करना एक राजनीतिक काम है। इसमें आपका मूल्य-निर्णय होगा कि नहीं! यानि रचना और आलोचना के प्रश्न जीवन के प्रश्न होंगे कि नहीं! यह एक महत्त्वपूर्ण सवाल है। शायद इसी अर्थ में प्रेमचंद कहते थे कि हर कोई चाहता है कि मेरा जीवन एक कहानी बन जाए।

मार्तण्ड प्रगल्भ

मार्तण्ड प्रगल्भ

छात्र राजनीति और संस्कृति-कर्म में व्यस्त रहने वाले मार्तण्ड प्रगल्भ जे.एन.यू. के भारतीय भाषा केंद्र में पी.एच.डी. के लिए शोधरत  हैं। उनसे mpragalbha1@gmail.com पर संपर्क संभव है

(जन संस्कृति मंच के कथा समूह के प्रथम आयोजन ‘कथा मंच’ के तृतीय सत्र में कथाकार मार्तण्ड द्वारा ‘अमरकांत की कहानी हत्यारे और आज का समय’ पर इलाहाबाद में दिनांक 22 दिसंबर, 2013 को प्रस्तुत व्याख्यान। लिप्यावतरण- श्रीकांत पाण्डेय।)

सुरेन्द्र चौधरी- विराट ऐतिहासिक संदर्भों से समृद्ध आलोचक: मार्तंड प्रगल्भ

सच्ची आलोचना किस कदर गंभीर वैचारिक संघर्ष का परिणाम होती है इसे सुरेन्द्र चौधरी के लेखन में स्पष्ट ही देखा जा सकता है। रचना के प्रति  जिस संवेदनशीलता की जरूरत होती है और असहमति के क्षणों में भी आलोचना की भाषा में  जो विनम्रता होनी चाहिए इसे भी इनके यहाँ देखा जा सकता है। सुरेन्द्र चौधरी पर बहस एक ऐतिहासिक ज़रुरत है। ज़रुरत है हिंदी की प्रगतिशील आलोचना की एक दूसरी परम्परा से संवाद की। बौद्धिक समाज क्या इसके लिए तैयार है? विचारहीनता और तात्कालिकता के दबाव के बीच हिंदी आलोचना की समृद्ध प्रगतिशील परंपरा क्या सुरेन्द्र चौधरी से संवाद नहीं करेगी? ऐतिह्यता का प्रश्न सुरेन्द्र चौधरी के लेखन का मूल प्रश्न है। इसलिए समकालीनता और तात्कालिकता से उनकी मुठभेड़ ही उनकी आलोचना बनाती चलती है। यह अकारण नहीं कि इतिहास के प्रश्नों से उलझने वाला यह आलोचक साहित्य के आख्यान रूपों पर अपनी विशेष दृष्टि रखता है। पर कविता के संबंद्ध में उनका छिटपुट लेखन किसी भी बड़े काव्य आलोचक के लिए इर्ष्या का कारण बन सकते है।  बहरहाल। 

BY मार्तंड प्रगल्भ 

सबसे पहले डॉ॰ चौधरी की पुस्तक ‘इतिहास: संयोग और सार्थकता’ से उनके कुछ निष्कर्षों-स्थापनाओं को उद्धृत करना चाहता हूँ-

  •  ‘‘स्पष्ट है कि हिंदी साहित्य में आधुनिकता दो महायुद्धों के बीच उत्पन्न अवस्था नहीं है और न वह मात्र ‘मूल्यबोध और विराट विघटन’ के तनाव के बीच की उपलब्धि है। हिंदी में आधुनिकता की प्रतिष्ठा इस ‘विराट विघटन’ के नारे से लगभग 80-90 वर्ष पूर्व हो चुकी थी। हिंदी में आधुनिकता बोध का संस्कार आत्मचेता से अधिक वस्तुसत्य चेता है।’’ (पृ.219 खंड1) (ध्यान दें कि आधुनिकतावाद शब्द का इस्तेमाल न करते हुए भी, आधुनिकता, आधुनिकताबोध के अपने आशयों को यहां मिलाकर प्रयोग किया गया है। परंतु महायुद्धों की चर्चा से स्पष्ट है कि आधुनिकतावाद शब्द के अपने अर्थों में ही इसे पढ़ना चाहिए। इन शब्दों के अपने अर्थ पश्चिमी हैं परंतु डॉ॰ चौधरी भारतीय परिस्थितियों में इसे समझने की कोशिश कर रहे हैं।)
  •  ‘‘भारतीय परिस्थितियों में ‘उदारतावादी चेतना’ चूंकि रोमैंटिक दृष्टिविस्तार का परिणाम थी और बौद्धिक उद्बोध की परिणति थी इसलिए आधुनिक इतिहास में वह अपने ढंग की अकेली है। …भारत में आधुनिकता पश्चिमी राज्यसत्ता की क्रांतिकारी भूमिका से नहीं आई और न वह भारत में उनकी शैक्षणिक नीति से आई। वह भारतीय बुद्धिजीवी के उद्बोध से उत्पन्न हुई। …वस्तुतः भारत में आधुनिकता का उत्थापन अंग्रेजों की प्रत्यवस्थान शक्ति से भारतीय पूंजी के प्रतिरोध से होता है। इस अर्थ में भारतीय पूंजीपति की राष्टीय भूमिका अपने उत्थापन युग में क्रांतिकारी जनहितपरक, और राष्टीय स्वार्थ से अनिवार्यतः प्रेरित रही है। भारतेंदु युग का संपूर्ण साहित्य अपने जन चारित्र्य के व्याख्यान के द्वारा यह स्पष्ट करता है कि इस युग में भारतीय बुद्धिजीवी का स्वार्थ अविकल रूप से भारतीय जनता से जुड़ा हुआ था। इस काल का वर्गसंघर्ष चरित्रतः उपनिवेशविरोधी और आभिजात्यविरोधी है। यही कारण है कि संपूर्ण युग की विचार पद्धति में उपनिवेशविरोध और आभिजात्यविरोध की चिंतासरणि प्रधान है।’’ (पृ.219-20-21,खंड1)
  • ‘‘ऐसा लगता है कि ‘भाग्यवती’ के लेखक ने अकेले भाग्यवती से सारी भूमिकाएं संपन्न करवाने का व्रत ले लिया है, फिर भी इतना तो निश्चित है कि हिंदी उपन्यास साहित्य में भाग्यवती आधुनिक युग की यूलिसिस है।’’ (पृ.222, खंड1) (यूलिसिस और जेम्स ज्वाएस की अपनी पश्चिमी उपस्थिति और आयरलैंड की औपनिवेशित दासता जिस ढंग से अंतर्विरोधी साम्राज्यवादी चरित्र का क्रिटिक है, उसे भारतीय संदर्भों में भाग्यवती से तुलना करना एक प्रमुख वैचारिक प्रस्थान है। ‘माडर्निस्ट’ पेपर में संकलित फ्रेडरिक जेमसन के लेखों में इस आधुनिकतावाद के सहारे साम्राज्यवाद के चरित्र को समझने का प्रयास किया गया है।)
  • ‘‘उदारता की चेतना, मेरी छोटी धारणा के अनुसार, एक विशेष वर्ग की जीवन परिस्थितियों की द्वंद्वात्मकता की मांग है। यह वर्ग अपने प्रारंभिक उत्थापन के युग में निश्चित रूप से क्रियाशील, अथवा प्रगतिशील रहता है। भारतेंदु युग अपनी उदारचेता जीवन-विधा के कारण और विचार सरणि के कारण क्रियाशीलता और प्रगति का युग है। इस युग की सबसे बड़ी विशेषता इसका ‘आधुनिकता बोध’ नहीं है, बल्कि आधुनिकता की मांग को क्रियात्मक पूर्णता देने की तत्परता है। यह युग, जहां एक अभावात्मक परिस्थिति का निषेध करता है (निगेशन ऑफ निगेशन) वहीं इसका अंतर्विरोध सार्थक हो जाता है।’’ (पृ.223,खंड1)
  • ‘‘भारतेंदु युग की सारी परिस्थितियां रोमांटिक धारणा के अनुकूल होकर भी रोमैंटिक उद्बोध में असफल रहीं। इसका एकमात्र कारण राजनीतिक सत्ता का अंतर्विरोध था। भारत उस उत्थान विशेष में औपनिवेशिक व्यवस्था के रूप में परिणति ग्रहण कर रहा था, फलतः भारतीय बुद्धिजीवी उस अदम्य असीमित इच्छाशक्ति के बोध को व्यावहारिक परिणति देने में असमर्थ था। राजनीतिक  परतंत्रता ने भारत के प्रथम आत्मोद्बोध को व्यंग्यात्मक परिणति दे दी। किंतु यह राजनीतिक परतंत्रता देश की प्रथम जागृति को बहुत दिनों तक व्यंग्यात्मक दृष्टिकोण के घेरे में बंधे रहने तक विवश नहीं कर सकी। निर्विशेष राष्टीयता बनकर यह जागृति श्रीधर पाठक, राम नरेश त्रिपाठी और मैथिलीशरण गुप्त के साहित्य में उत्थापित हुई। हिंदी में छायावाद इसी निर्विशेष जागृति का परिणाम है। उसकी अवाचकता का यही रहस्य है। (पृ.226, खंड1)
  •  ‘‘कविता के आश्रय पक्ष की जितनी समृद्ध भक्ति काल के पश्चात छायावाद के उत्थान में देखी जा सकती है वह न इन दो कालों के अंतराल में संभव है और न उसके पश्चात ही। व्यक्ति की इच्छाशक्ति जितने विविध धरातलों पर छायावाद युग में बोध (रियलाइजेशन) ढूंढती है, उतनी किसी परवर्ती उत्थान में नहीं।’’ (पृ. 227, खंड1)
  •  ‘‘प्रसाद ने न केवल गुप्त युग की गाथाएं गाईं, बल्कि उस युग की कला, संस्कृति का दैवीकरण किया। उन्होंने भारतीय इतिहास की गति का अतीत की ओर मोड़ना चाहा…। प्रसाद शात्योब्रां की तरह स्वच्छंदतावाद की प्रतिक्रियात्मक सरणि के अनुगामी है। राजनीतिक धारणा के क्षेत्र में साम्राज्य वैभववादी, धर्म के क्षेत्र में सनातनी और दर्शन के क्षेत्र में सांस्कृतिक स्पर्श के साथ प्रसाद स्वच्छंदतावादी हैं।’’ (पृ.228, खंड1)
  •  ‘‘महादेवी इस धारा की सबसे कमजोर कवयित्री हैं क्योंकि उनका उद्बोध न अतीत की भूमि पर संतुलित हो पाता है और न इतिहास की वर्तमान गति का अनुसरण कर पाता है। अतीत से विच्छुरित और वर्तमान में अप्रतिष्ठित कवयित्री की आत्मा संतुलन के लिए मात्र अवाचक का सहारा लेती रह जाती है। उनका दुखवाद इसलिए (मेरी दृष्टि में) उनके व्यक्तिगत कारणों से अधिक दृष्टिकोण की अस्पष्टता का परिणाम है। महादेवी निरर्थक आत्मचेतना का दैवीकरण करती हैं।’’ (पृ.228, खंड1)
  •  ‘‘पंत जी का रोमैंटिक दृष्टिकोण अपनी ही द्विरूपता के कारण उलझ जाता है। ‘गुंजन’ के उपरांत निरंतर वे पश्चिम और पूर्व के बीच अपनी चेतना का समझौता करने को आकुल हैं। भौतिकता और आध्यात्मिकता उनके लिए समस्याएं (इनिग्मा) उलझनें बन जाती हैं। भावसत्ता और वस्तुसत्ता के बीच कृत्रिम विभाजन करने को वे आकुल हैं। ऐसा कृत्रिम विभाजन निराला ने नहीं किया; महादेवी ने भौतिक धरातल का बलात् निषेध-आग्रह रखा, प्रसाद ने ‘कामायनी’ में इस विरोध का संतुलन कल्पित रूप से कर लिया। पंत जी किसी भी कल्पित भूमि पर ऐसा समझौता कर नहीं पाते, अरविंद के सर्वचेतनवाद की शरण में जाकर भी नहीं। (उदाहरणार्थ ‘कला और बूढ़ा चांद’)। वे चेतना के धरातल पर दो बिंदुओं को सरल रेखा से मिलाना चाहते हैं, यथार्थ अंतर्विरोध बन जाता है। फलतः वे प्रसाद की तरह नव्य श्रेण्यता (निओ क्लासिसिज्म) को स्वीकार करने में भी अक्षम रहते हैं और शुद्ध रोमैंटिक उद्बोधों को भी सहेज नहीं पाते। निराला और प्रसाद से वे इसी अर्थ में न्यून सिद्ध होते हैं।’’ (पृ.231, खंड1)
  • ‘‘मेरी दृष्टि में छायावाद के प्रारंभिक उत्थान में नाटकीय संवादी स्वर नहीं है। यह शुरू होती है बच्चन, भगवती चरण वर्मा, दिनकर और नवीन के साथ। इन कवियों में अधिकांश के पास कोई दृष्टि ही नहीं है, उनके पास केवल प्रतिरोधजन्य नाटकीयता है जो कभी दृष्टि बन ही नहीं सकती। उस अर्थ में इनमें जो सहजता है, उसे विशिष्ट मनोभूमि की सहजता मानने का खतरा केवल साही साहब ले सकते हैं। जितना शक्ति प्रवाह बच्चन और वर्माजी की रचनाओं में नहीं है, उतना साही साहब में है जिसके बहाव में वे साहित्य के सहज विकास के सूत्रों को छोड़कर कैलिडोस्कोपिक विविध्ता में खो जाते हैं।’’ (पृ.233, खंड1) (‘लघु मानव के बहाने हिंदी कविता पर एक बहस’ में उल्लिखित छायावादी विजन के टूटने के संदर्भ में पढ़ा जाए।)
  •  ‘‘चाहे प्रगतिवादी आंदोलन ने साहित्य में कोई महान भूमिका न भी पूरी की हो मगर इतना तो मानना पड़ेगा कि उसने क्षयी रोमांस का रचनात्मक धरातल पर विरोध किया और हिंदी नवलेखन को मध्य वर्ग की पतनशीलता की तस्वीर बन जाने से बहुत हद तक बचा लिया। हिंदी नवलेखन अगर ‘गुनाहों के देवता’ की पूजा और ‘अंधा युग’ के विक्षिप्त बोध से बच सका तो इसका कारण मैं यशपाल, अश्क, नागार्जुन, त्रिलोचन और केदारनाथ अग्रवाल के सशक्त रचनात्मक लेखन को मानता हूँ।’’ (पृ.235, खंड1)
  •  ‘‘तृतीय दशक में रोमैंटिक दृष्टि जिस प्रकार अपनी विशिष्ट असंगतियों के कारण पतनशील हो गई थी। उसकी प्रतिक्रिया की जमीन अलग-अलग है, एक ओर अज्ञेय के साथ व्यक्तित्व का उत्थापन और दूसरी ओर मानववाद की परंपरा के विकास की तत्परता। संपूर्ण चतुर्थ दशक और पंचम दशक में व्यक्तिवाद से मानववाद की टकराहट होती रही और उसकी अनुगूंज साहित्य के क्षेत्र में सुनाई पड़ती रही। इस दरम्यान व्यक्तिवाद न बर्गशां से लेकर सार्त्र तक के नकाब बदले, मगर उसका संकट समाप्त नहीं हुआ।’’ (पृ. 236)
  •  ‘‘1950-60 तक नवलेखन ने एक व्यापक आंदोलन का स्वरूप धारण कर लिया लेकिन इससे यह नहीं मान लेना चाहिए कि नवलेखन पर व्यक्तिवाद का प्रभाव शेष ही नहीं रहा था। कवियों का एक समुदाय ऐसा था जो अब भी बदले हुए स्वर में पुराना राग अलाप रहा था। कहानियों में व्यक्तियों की आत्मकेंद्रता के साथ एक समानान्तर स्वर भी उभरता है जिसे प्रकाश में लाने की आवश्यकता है। यह स्वर हमारे स्वातंत्रयोत्तर नवजागरण से जुड़ा हुआ है। (डॉ॰ नामवर सिंह की शब्दावली में)” (पृ.237, खंड1)

    Surendra Choudhary 13 जून 1933- 09 मई 2001

    Surendra Choudhary
    13 जून 1933- 09 मई 2001

क्या आधुनिक हिंदी साहित्य के इतिहास को देखने की एक नयी दृष्टि का उन्मेष इन उद्धरणों से होकर नहीं जाता? बौद्धिक समाज क्या इसके लिए तैयार है? विचारहीनता और तात्कालिकता के दबाव के बीच हिंदी आलोचना की समृद्ध प्रगतिशील परंपरा क्या सुरेन्द्र चौधरी से संवाद नहीं करेगी? ऐतिह्यता का प्रश्न सुरेन्द्र चौधरी के लेखन का मूल प्रश्न है। इसलिए समकालीनता और तात्कालिकता से उनकी मुठभेड़ ही उनकी आलोचना बनाती चलती है। यह अकारण नहीं कि इतिहास के प्रश्नों से उलझने वाला यह आलोचक साहित्य के आख्यान रूपों पर अपनी विशेष दृष्टि रखता है। पर कविता के संबंद्ध में उनका छिटपुट लेखन किसी भी बड़े काव्य आलोचक के लिए इर्ष्या का कारण बन सकते है।  बहरहाल।

 सुरेंद्र चौधरी के लिए भारतीय इतिहास की धारा जातीयता के निर्माण के प्रश्न से तय होती मालूम होती है। जातीय निर्माण की प्रक्रिया संबंधी यह चिंतन हिंदी में राम विलास शर्मा की देन है। जातीय निर्माण की अवधारणा को भाषा से जोड़ते हुए डॉ॰ शर्मा ने एक किताब लिखी थी-‘भाषा और समाज’। इसमें उन्होंने कुछ महत्वपूर्ण मुद्दे उठाए थे। लघु जातियों के निर्माण संबंधी अवधारणा को प्रस्तुत करते हुए शर्मा ने बताया था कि किस प्रकार जनपदों के विकास से भिन्न वस्तुगत आधार लेकर मध्यकाल में जातियों का निर्माण हुआ। यह निर्माण हिंदी की भिन्न बोलियों के विकास के साथ हुआ था और दोनों में कापफी सारे संबंध सूत्र उन्होंने खोजे थे। स्तालिन के महाजाति की निर्माण संबंधी धारणा और उसके भाषा विषयक चिंतन का प्रभाव यहां स्पष्ट रूप से लक्षित किया जा सकता है। इसे आधुनिक काल में तथा उससे पहले व्यापारिक पूंजीवाद के साथ जोड़ते हुए महाजाति और राष्ट्रभाषा की अवधारणा डॉ॰ शर्मा ने रखी थी। इतिहास की यह अवधारणा दोषयुक्त है परंतु उसके अपने ऐतिहासिक आधार भी हैं। और इसका एक सिरा राष्ट्रवादी इतिहास लेखन और मार्क्सवादी इतिहास लेखन के घालमेल में खोजा जा सकता है। बहरहाल, नवजागरण और जातीय निर्माण संबंधी प्रक्रिया के चिंतन का एक स्वरूप और उसका प्रभाव ग्रहण चौधरी के लेखन में स्पष्टतया देखा जा सकता है। इसी संदर्भ में औपनिवेशिक चिंतन को एक चुनौती भी मिलती रही है। डॉ॰ चौधरी ने 1857 के महाविद्रोह के बाद चलनेवाली जातीयताओं के नवगठन को औपनिवेशिक प्रशासकीय नीति के लिए एक खतरा माना था। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में लिखा कि उर्दू को इलाकाई जबान बताकर अलगाने की कोशिशें हुईं, बंगाल विभाजन हुआ, मराठा क्षेत्र को तोड़ा गया और उड़ीसा के साथ विभाजक नीति अपनाई गई। ‘‘ऐसी स्थिति में भारत की एकता, कौमियतों की नकार से सिद्ध करने के बजाय उसके सहकार में सिद्ध करने का स्तर जनवादी है।’’ (पृ.122, खंड1) इतिहास में जनवादी मूल्यों की पहचान हमेशा एक चुनौती रही है। रेडिकल इतिहास लेखन कई बार अतिवाद का शिकार होता रहा है। इस अतिवाद के मूल में एक ऐसी इतिहास दृष्टि काम करती है जो नितांत समकालीन विमर्शों का प्रक्षेप अतीत के किसी कालखंड में करता है। ठेठ समकालीन विमर्शों को आधार बनाकर इतिहास की व्याख्याएं  गलत निष्कर्षों तक पहुंच जाती हैं। हिंदी नवजागरण संबंधी चिंतन के साथ यही होता रहा है। सांप्रदायिकता के प्रश्नों से जूझते हुए कुछ विचारक हिंदी नवजागरण को नितांत हिंदू नवजागरण सिद्ध करते हैं। ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य की सीमाओं को ध्यान में न रखने के कारण ही ऐसा होता है। भारतेंदुयुगीन नववैष्णवता को पुनरुत्थानवादी बताना भी ऐसी ही दृष्टि का फल है। वास्तविकता यह है कि जिस वैष्णवता को भारतेंदु भारतीयता का आधार बता रहे थे, वह कोई मध्ययुगीन अवधारणा न थी। धर्मांधता और सांप्रदायिकता के बरक्स यह धर्म और लोक में प्रेम की महत्ता को स्वीकार करते हुए अलगाववादी ताकतों के खिलाफ एक मॉडल था। राज्य और जाति संबंधी पश्चिमी अवधारणा के समानांतर यह राष्ट्र-राज्य के अपने निर्धारक तत्वों को पहचानने की कोशिश थी। डॉ॰ चौधरी ने ‘स्वाधीनता संग्राम और हिंदी साहित्य’ नामक लेख में डॉ॰ राम विलास शर्मा की मान्यताओं से सहमति जताई है। बाद में इस नववैष्णवता के जनवादी स्वरूप की पहचान डॉ॰ नामवर सिंह ने ‘हिंदी नवजागरण की समस्याएं’ नामक अपने लेख में की है। अमेरिकी स्वाधीनता आंदोलन के वक्त जिस प्रकार नव ईसाई विचारधारा की नैतिकता कोई बाधक तत्व नहीं थी और मैक्स बेबर से लेकर व्हिटनी ग्रिसगोल्ड तक इसका समर्थन कर रहे थे, उसी प्रकार भारतेंदु मंडल की वैष्णव नैतिकता ‘क्रिस्तान, मुसलमान और ब्राहम धर्मों के प्रेम मार्ग’ को इस विचारधारा से जोड़ने का जनवादी प्रयास था। और यह अकारण न था कि नववैष्णवता की यह धारा गांधी के ‘हिंद स्वराज’ के लोकचिंतन का आधार भी बना था। पश्चिमी आधुनिकता के मूल्यों में छिपे प्राच्यवादी षड्यंत्र के सामने भारतीयता की पहचान एक समस्या है। ‘हिंद स्वराज’ के सौ वर्ष पूरे होने पर जो चिंतन दोबारा भारतीय आधुनिकता की खोज कर रही है, वह इस नववैष्णवता के महत्व को खारिज नहीं कर सकती। डॉ॰ चौधरी ने लिखा था-‘‘बचकाने किंतु उत्साही मार्क्सवादी को इसे संदर्भ से जोड़ने की जरूरत है। स्वाधीनता आंदोलन और साहित्य की प्रेरक परिस्थितियों का यह ताना-बाना बहुत महत्वपूर्ण है और किसी निर्णायक दिशा के लिए आधार का काम करता है। नववैष्णवता न पुनरुत्थानवादी है, न पुराणपंथी और न वह शुद्ध मध्ययुगीन ही है। उसमें वर्तमान के अनुरूप धार्मिक सहिष्णुता, उदारता और प्रेम मार्ग पर चलकर उस एकता की आकांक्षा है जो उसकी मुक्ति का उपनिवेश और पिछड़ेपन का बायस बन सकती है। धर्म बुद्धि साहस की स्वीकृति और आलस्य त्याग के साथ इस नववैष्णवता का वही संबंध हो सकता है जो कॉलविनवादियों का न्यू इंग्लैंड से बना था।’’ (पृ.125, खंड1)

आगे डॉ॰ चौधरी नववैष्णवता के अंतर्विरोधों को पहचानने के लिए ‘इंदु’ और ‘सरस्वती’ के लेखों का हवाला भी देते हैं। हरिऔध, मैथिलीशरण गुप्त और प्रसाद के विचारों की समीक्षा का आग्रह करते हैं। ‘जनमेजय का नागयज्ञ’ में कृष्ण का मानवता की घोषणा और ‘कंकाल’ में गोस्वामीजी के भाषणों में इस नववैष्णवता के अनुगूंज है। ‘‘आज हम धर्म के जिस ढांचे के शव को घेरकर रो रहे हैं, वह उनका (कृष्ण) धर्म नहीं है।’’ पंडित माध्व प्रसाद मिश्र के लेखों में नववैष्णवता के प्रश्नों पर चिंतन है। ग्रियर्सन की क्रिस्टोमायथी से पहले श्री ब्रहमानंद जी 1897 में निबंधावली में क्रिश्चियन विश्वासों का नववैष्णव संदर्भ दिखाया था। स्वदेश भक्ति का भावना के रसात्मक रूप का नववैष्णवता से क्या संबंध हो सकता है, यह भी डॉ॰ चौधरी की चिंता का विषय है। क्या नववैष्णवता का प्रेमचंद पर भी प्रभाव था या फिर निराला का नववेदांत पुनरुत्थानवादी था? ऐसे प्रश्नों पर फिर से विचार की आवश्यकता है।

विचारधारात्मक अंतर्विरोधों के कौन से सूत्र हिंदी नवजागरण के प्रारंभिक चरण को भाषा के सांप्रदायीकरण की ओर ले जाते हैं, इसे डॉ॰ चौधरी नहीं बताते। भारतेंदुयुगीन राजभक्ति बनाम देशभक्ति के द्वैत को व्याख्यायित न कर डॉ॰ चौधरी इतिहास की मौखिक परंपरा के क्रांतिकारी होने के मिथक को तोड़ने के लिए तत्कालीन पत्रिकाओं में छपे लेखों की ओर जाते हैं और शोध कार्य का आहवान करते हैं।

इस संदर्भ में कुछ बिंदुओं की ओर ध्यान दिलाना आवश्यक है। पहला यह कि डॉ॰ चौधरी का लेख ‘स्वाधीनता संग्राम और हिंदी साहित्य’ अक्टूबर-दिसंबर 1986 की आलोचना में प्रकाशित नामवर सिंह के लेख ‘हिंदी नवजागरण की समस्याएं’ में निकाले गए निष्कर्षों की असहमति में लिखा गया है। नामवर सिंह का मानना है कि हिंदी साहित्य का प्रत्यक्षततः संबंध बांग्ला नवजागरण से है जबकि डॉ॰ चौधरी इसे अनिवार्यतः 1857 के साम्राज्यवाद विरोधी-उपनिवेशवाद विरोधी चरित्र से जोड़ते हैं। नवजागरण और भाषा के संबंध पर नामवर सिंह ने ठोस प्रतिक्रिया दी और उसके सांप्रदायिक आधार की ओर इशारा किया है। इसलिए वहां नववैष्णवता की प्रगतिशीलता के अंतर्विरोधों को भाषा की समस्या से समझने पर बल है। यह बात सुरेंद्र चौधरी नहीं करते हैं। हिंदी नवजागरण में राजनीतिक चिंतन या सत्ता परिवर्तन की अनुगूंज मद्धिम हो जाती है और वह मूलतः सांस्कृतिक नवजागरण हो जाता है। इसलिए ‘स्वत्व निज भारत गहै’ (नामवर इसे आधुनिक शब्दावली में आइडेंटिटी से जोड़ते हैं) के स्वत्व प्राप्ति के राजनीतिक स्वाधीनता वाला पक्ष जरूरी होते हुए भी यहां तथ्यात्मक रूप से परोक्ष ही था। नामवर सिंह ने लिखा है-‘‘राजनीतिक स्वाधीनता इस स्वत्व प्राप्ति की पहली शर्त है। नवजागरण के उन्नायक इस आवश्यकता का अनुभव न करते रहे होंगे, यह सोचना कठिन है, फिर भी तथ्य यही है कि नवजागरणकालीन प्रकाशित साहित्य में राजनीतिक स्वाधीनता का स्पष्ट स्वर कम ही सुनाई पड़ता है। पहले ईस्ट इंडिया कंपनी और फिर महारानी विक्टोरिया के शासन काल में राज के विरुद्ध निश्चय ही किसानों के छिटपुट विद्रोह बराबर होते रहे जिनमें सबसे संगठित और सशक्त सन सत्तावन की राज्यक्रांति है फिर भी समकालीन शिष्ट साहित्य में उसकी गूंज सुनाई नहीं पड़ती-लोक साहित्य भले ही प्रचुर मात्र में मौखिक रूप में रचा गया। यह स्थिति सन सत्तावन के पहले तो थी ही, उसके बाद कम से कम तीन दशकों तक बनी रही। आर्थिक शोषण के खिलाफ जरूर लिखा गया, पुलिस तथा अफसरों के अत्याचार और अन्याय की भी शिकायत की गई, पर राजसत्ता पलटने के विचार को जैसे अंतर्गुहावास दे दिया गया।’’ (हिंदी का गद्यपर्व, नामवर सिंह, पृ.87, राजकमल प्रकाशन, 2010) मानो इसी का जवाब देते हुए सुरेंद्र चौधरी ने लिखा-‘‘जनता के चित्त में स्वदेशी-स्वराज का भाव 1857 की देन है, इसे स्वीकार करने में कठिनाई नहीं होनी चाहिए। संभवतः इसी शक्ति संबल को पहचानकर स्वदेशी की भावना के लिए भारतेंदु युग के कवियों को देश निकाला तो न दिया गया, पर वर्नाकुलर प्रेस पर अनेक बंदिशें डाली गईं। स्वदेशी के प्रति इस राज के रुख ने स्वतंत्रता के राग को बल दिया, इस पर बहस नहीं की जा सकती। …सत्ता परिवर्तन की आकांक्षा नारों में अवश्य प्रकट नहीं हुई। ‘अंग्रेजों भारत छोड़ो’ जैसा नारा भारतेंदु युग में न लगा था, मगर सत्ता परिवर्तन को भी गुहावास न दिया गया था।’’ और इसके प्रमाण में डॉ॰ चौधरी ने ‘नागरनैया जाला काले पनिया रे ना!’ जैसे गीतों का उदाहरण दिया है। उन्होंने बताया है कि राज-रजवार और विष्णु सिंह के गीत मगध में गाए जाते थे, बाबू कुंअर सिंह की मुसलमान प्रेमिका के गीत सारे भोजपुर में गाए जाते थे। हरेंद्र देव के काव्य में उसकी आवृत्तियां हैं। फिर अवध बुंदेलखंड से निकलकर सुदूर गया जिले तक इसकी अंतरध्वनियों की पहचान वह करते हैं।

तो क्या हिंदी जाति के साहित्य में 1857 के महाविद्रोह का मूल स्वर भारतेंदु युग में सुनाई पड़ता है? और क्या यह नवजागरण उसी चेतना का विस्तार है? क्या सचमुच हिंदी नवजागरण 1857 में व्यक्त जनजागरण की ही अगली ऐतिहासिक अवस्था है और हिंदी नवजागरण के शिष्ट साहित्य में व्यक्त विचार से नामवर सिंह का क्या अभिप्राय है? क्या भारतेंदु मंडल की विचारधारा 1857 की चेतना से भिन्न स्वर अख्तियार करती है तथा जनसमुदाय की संवेदना 1857 के साथ है? क्या मौखिक परंपरा साम्राज्यवाद उपनिवेशवाद विरोध की राजनीतिक आकांक्षा को कायम रखती है और हिंदी (या बांग्ला या मराठी) नवजागरण के नेताओं या उनके लक्ष्यीभूत श्रोता या पाठक जिस नवनिर्मित मध्यवर्ग से थे, उस मध्यवर्ग का मानस 1857 की मूलभूत चेतना से दूर पड़ता है?

डॉ॰ चौधरी और डॉ॰ नामवर सिंह दो भिन्न दृष्टियों से उस काल को देख रहे हैं। मध्यवर्गीय/भद्रलोक के शिष्ट साहित्य के अंतर्विरोधी या नवजागरण के नेताओं की अंतर्विरोधी यह साफ इशारा करती है कि वहां 1857 के दो प्रमुख गुण सांप्रदायिक एकता और औपनिवेशिक सत्ता के प्रति सचेत वैरभाव (कांसस हास्टेलिटी) का अभाव है। रंजीत गुहा मानते हैं कि ‘यह सचेत वैरभाव संघर्ष में हिस्सा लेनेवालों तक ही सीमित नहीं था’ बल्कि एक कन्पेफडरेट नेशनेलिज्म के जरिए हिंदू मुसलिम संघर्ष के सिद्धंत का समाधान भी था। इसके बदले नवजागरण कालीन नेताओं में और इसलिए साहित्य में भी वैरभाव की जगह ‘कांसस लायलिटी ऑफ द टेक्स्ट’ (देखें, रंजीत गुहा, द इंडियन हिस्टोग्रापफी ऑफ इडियाः ए नाइन्टीन्थ सेंचुरी एजेंडा एण्ड इट्स इम्प्लीकेशंस; सीएसएसएस, कलकत्ता, 1987, पृ.54) मिलता है। देशभक्ति और राजभक्ति की यह विभाजित चेतना जितना भद्रवर्गीय हितों से चालित थी, उतनी ही राष्टीय स्वरूप की निर्मिति में अदरनेस को परिभाषित करने में भी थी। डॉ॰ चौधरी लोकचेतना को 1857 का विकास मानते वक्त इस तथ्य को नजरअंदाज करते हैं। लोक की असंबद्ध यद्यपि प्रतिरोधी विचारधारा को हिंदी नवजागरण का प्रमुख स्वर मान लेना ठीक नहीं मालूम पड़ता। लोक साहित्य में 1857 की वीरता के स्मृति चिन्ह शेष थे। गीत गाए जाते थे परंतु वहां राज के प्रति कोई सचेत वैरभाव नहीं रह गया था। इसके बदले अतीत की मोहक स्मृति ही प्रधान थी। इस गौण धारा को प्रमुखता देने से नवजागरण के संष्लिष्ट चरित्र की व्याख्या उसी अतिरेकवादी उत्साही जनवाद से ग्रसित हो जाती है जिसकी खिलाफत डॉ॰ चौधरी लगातार करते रहे थे।

डॉ॰ चौधरी अगर भाषा और नवजागरण के संबंधों की पड़ताल करते तो शायद इस ओर उनका ध्यान जरूर जाता। 19वीं सदी के उतररार्द्ध का पूरा काल भारतीय राष्टीयता के निर्माण का गर्भकाल था। भारतीय राष्टीयता के तमाम अंतर्विरोधों का उत्स भी यही है। 1920 के दशक में रूप लेनेवाली सांप्रदायिकता और 20वीं सदी में लगातार बदलते राष्ट्रवादी चिंतन की रूपरेखा में अपने प्रारंभिक रूप में यहीं दिखाई पड़ती है। हिंदी और उर्दू राष्टीयताओं को उसके धार्मिक प्रतीकों के साथ पढ़ने की कोशिश हमें नवजागरण के पूरे संदर्भ को समझने पर मजबूर करता है। भारतेंदुयुगीन जातीयता हिंदू-मुसलमान भद्रवर्गीय हितों से चालित था, जहां भाषा को लगातार एक हथियार की तरह इस्तेमाल करते हुए पूरे समुदाय की पीडि़त ग्रंथि (विक्टिम कॉम्प्लेक्स) को निर्मित किया गया और इसी के सहारे जातीय गोलबंदी की गई। उस वक्त राष्टीयता का सवाल अंग्रेजों के विरुद्ध अपने आपको किस प्रकार परिभाषित किया जाए-इस प्रश्न से जुड़ी थी। इसलिए भारतेंदु और अन्य हिंदी आंदोलन के नेताओं के साथ कई उदारपंथी नेता जैसे बिशन नारायण डर (लखनऊ के सम्मानित वकील, भारतीय  राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष भी रहे तथा उर्दू के शाय तथा  मुसलमानों के मित्र के रूप में प्रसिद्ध और बंगाल के आर्थिक इतिहासकार विक्टोरियन उदारपंथी तथा प्रगतिशील राष्ट्रवादी रोमेश चंद्र दत्त ने लगातार हिंदू-मुस्लिम एकता की बात भी की और राष्ट्र की एकता के हिंदुओं की एकता की भी चर्चा की (देखें, ज्ञानेंद्र पांडेय; दी कन्स्ट्रकशन ऑफ कम्युनलिज्म इन कॉलोनियल नॉर्थ इंडिया, आक्सफोर्ड, 2006, पृ.218)। इस दौर की जातीयता में हिंदू जाति के संगठन और उत्थान का महत्व दिया गया तथा अंडरटोन के रूप में यह पहचान की राजनीति मुसलमानों को सामने रखकर निर्मित की गई। परंतु तब राष्ट्र के उत्थान का मतलब था, अलग-अलग समुदायों का उत्थान। हिंदू-मुसलमान-ईसाई-सिख आदि मिलकर राष्ट्र का निर्माण करते हैं, ऐसा माना जा रहा था। (देखें, वही, पृ. 223) भारतेंदु और सर सैयद अहमद खां के वक्तव्यों में भी इसकी अनुगूंज स्पष्ट ही देखी जा सकती है।

साठ के दशक की पूरी पीढ़ी जिस यातना, संत्रस, संशय, सिनिक, नकार विद्रोह आदि से गुजर रही थी, उसका और उसके कारणों की पड़ताल डॉ॰ चौधरी निरंतर अपने लेखन में करते हैं। डॉ॰ चौधरी ने लगातार नई पीढ़ी और बीच की पीढ़ी के अंतर्विरोधों को रेखांकित किया है। बिचली पीढ़ी के अवसरवाद तथा तटस्थता को नकारकर नवलेखन ने ‘प्रतीक्षा’ के मोहभंग के कारण एक निषेध और नकार की मुद्रा अख्तियार की थी। यह मुद्रा केवल एक भंगिमा मात्र न थी। इस नकार के वस्तुगत कारण थे और रचनात्मक मानस को ये उद्वेलित भी कर रहे थे। एक संवादी आलोचक की भांति इस नई पीढ़ी की रचनाशीलता को संभावनाओं के रूप में समझने की जरूरत थी। डॉ॰ चौधरी इसे पूरा करने की कोशिश करते हैं। स्वातंत्रयोत्तर दो दशकों में लगातार वर्ग संघर्ष की शिथिलता के कारण मध्यवर्गीय लेखक सामान्य जनजीवन से दूर होते गए। इस शिथिलता के साथ भारतीय सत्ता तंत्र की नीतियों और जनतंत्र के पीड़ादायी अनुभव ने एक ऐसी पीढ़ी को जिसने अपनी आंखें नए और स्वतंत्र भारत में खोली थीं, उमस से भर दिया। आजादी के बाद जन आंदोलनों का दौर एक तरह से रुक गया था। इसने कहीं न कहीं मध्यवर्गीय अलगाव का जन्म दिया। प्रतीक्षा और अलगाव के अंतर्विरोध में कुछ लोगों ने आत्म समर्पण कर दिया और अपनी राजनीतिक चेतना गिरवी रख दी। नवलेखन जब अलगाव और अस्तित्व के संकट की घोषणा कर रहा था तो इसे हमारे कुछ पुराने आलोचकों ने अंतर्राष्टीय नारों का प्रभाव कहकर खारिज कर दिया था। लेखन के बीज शब्द के रूप में स्वतंत्रता नई पीढ़ी के लिए महज नारा न था। लेकिन इसे मानवीय अस्तित्व की स्वतंत्रता के व्यापक फलक पर देखने के बजाय तत्कालीन प्रगतिशीलों ने भी अमेरिकी कल्चरल प्रफीडम के शीतयुद्धकालीन विचारधारा का प्रभाव माना और इसे भाववाद की इकहरी संकल्पना में ढालने की कोशिश की। दूसरी ओर, लेखक की स्वतंत्रता के नाम पर रूपवादियों खासकर परिमलवादियों और अज्ञेयवादियों ने इसे बल प्रदान किया। सुरेंद्र चौधरी ने ऐसी स्थिति को अधूरा और भ्रामक मानते हुए नवलेखन को एक बंद पद्धति मानने से इनकार किया था। आलोचना को नई पीढ़ी से बातचीत का दरवाजा खोलना चाहिए। इस मान्यता से वह कभी पीछे नहीं रहे। उन्होंने जोर देकर कहा कि नई पीढ़ी का संकट उतना निजी नहीं था जितना वह उपरी दृष्टि से मालूम पड़ता था। ‘नकार’ की दृष्टि किस ऐतिहासिक संकट में पैदा हो रही थी, उसे समझना जरूरी था। स्थिति को केवल नकारते हुए लड़ा नहीं जा सकता। यह सही था लेकिन नकार की भी एक सच्चाई तो होती ही है। इसी सच्चाई और यंत्रणा के दोहरे दबाव के बीच उस वक्त की रचनादृष्टि सार्थकता पाती है। और ‘‘जो लोग इस दुहरे दबाव को नहीं महसूस करते हैं वे या तो मुहावरे चुराते हैं, या फिर पूरी पीढ़ी के साथ एक व्यावसायिक खेल खेल रहे हैं। हमारी पीढ़ी की रचनात्मक लड़ाई का यह एक आंतरिक आयाम है।’’ (खंड तीन, पृ.146)

स्वतंत्रता के बाद की बिचली पीढ़ी ने देह को लेकर नई पीढ़ी की रचनादृष्टि को ‘ऐय्यास प्रेतों’ की तरह ट्रीट किया था। चौधरी ने देह की इस राजनीति को इसकी ऐतिहासिक भूमिका में समझने का प्रयास किया। उन्होंने स्पष्ट किया, ‘‘हम अदेह राजनीति के धर्मवीर नहीं हैं। चूंकि देह हमें देह हमें दुनिया में गोचर करती है, इंद्रियग्राहय अनुभवों से संपन्न करती है और दुनिया के मूर्त रिश्तों के बीच प्रतिष्ठित करती है, इसलिए हमारी राजनीति देह को नकारती नहीं है…। प्रश्न केवल देह की अमूर्त परिभाषा का नहीं, देह और देह के बीच मूर्त रिश्तों का है। हमारे लिए देह की अनेक यातनाएं हैं, वह हमें मूर्त-अमूर्त सभी देशों में आज गति दे रही है, इसलिए देह को हम अस्पृश्य नहीं मानेंगे। देह का दुरुपयोग करने में जैनेंद्र और अज्ञेय से कमलेश्वर और भारती भिन्न नहीं हैं। … बिचली पीढ़ी के आर्यसमाजी आलोचक देह की राजनीति को तो देखते हैं मगर उसके विस्तार को नहीं देख पाते। यह विस्तार हमें जीवन की वास्तविकताओं से जोड़ता है। देह में ही पेट भी है, इसे हम भूले नहीं हैं! आवेश के शुद्ध भावनात्मक रिश्ते आज की दुनिया में बन पाते हैं, इसमें अगर हमें विश्वास नहीं है तो जिम्मेदारी हमारी है…। चेतना अथवा संस्कारजन्य नैतिकता के सारे नियम देह पर ज्यों के त्यों लागू नहीं किए जा सकते…। देह की अपनी समस्याएं हैं, अपने स्वतंत्र नियम हैं। देह की इन ठोस मूर्त समस्याओं को नजरअंदाज कर उस पर टिप्पणी करना मुझे उचित नहीं मालूम पड़ता।’’ (वही, पृ. 147) देह की इस राजनीति को उस वक्त इतने बड़े परिपे्रक्ष्य में और किसी ने देखा हो, ऐसा मुझे मालूम नहीं। नामवर सिंह ने ‘मुक्ति प्रसंग’ के संदर्भ में लिखा था कि उस कविता में ‘‘बीच-बीच में सेक्स के खुले शब्दों से भद्र रुचि को ध्क्का देने की शोखी या शरारत है।’’ लेकिन इस देह की राजनीति का व्यापक आधार क्या है, इसकी बात उन्होंने भी न की। कापफी समय बाद फ्रेडरिक जेमेसन ने देह की इस राजनीति के ठोस द्वंद्वात्मक समझ को एक भिन्न संदर्भ में पेश किया। उत्तर आधुनिक दौर में ‘देह का आना एक वर्चुअल दुनिया में यथार्थ की विजय है। अपनी संकीर्णता और वस्तुपूजा के बावजूद देह की प्रधानता मोहक वर्चुअल रियलिटी के बीच मानवीय संवेदनाओं के हस्तक्षेप की तरह है। क्या मोहभंग से उपजे आक्रोश के दौर में नई पीढ़ी का स्वप्न को नकारकर देह की सत्ता और उसकी चुनौतियों को खुलकर व्यक्त करना इसी प्रकार का एक प्रयास न था!

नई पीढ़ी के बारे में डॉ॰ चौधरी आशान्वित थे और कृत्रिम भावनात्मक सत्य के बरक्स अपने को ही बार-बार तोड़ते, नकारते और लांघते चलने के क्रम में प्राप्त मानवीय वास्तविकता को महत्वपूर्ण मानते थे। ‘हम कुछ न बनाते हुए भी चीखने को विवश हैं’। घटित का यही मर्म कहीं न कहीं स्पर्श भी करता है और धूमिल ने ता लिखा ही था-‘‘मगर यह वक्त घबराए हुए लोगों की शर्म आंकने का नहीं है।’’ अपने को बार-बार तोड़कर अर्जित सत्य के बारे में बात करते हुए डॉ॰ चौधरी के दिमाग में रघुवीर सहाय की ये पंक्तियां जरूर रही होंगी-

‘‘कुछ होगा, कुछ होगा अगर मैं बोलूंगा

न टूटे न टूटे तिलिस्म सत्ता का

मेरे अंदर का एक कायर टूटेगा टूट

मेरे मन टूट एक बार सही तरह

अच्छी तरह टूट मत झूठ-मूठ उफब मत रूठ

मत डूब सिर्पफ टूट’’ (आत्महत्या के विरुद्ध्द्ध

परंतु बड़े आश्चर्य की बात है कि रघुवीर सहाय की इन कविताओं में उन्हें ‘आत्मीयता’ का स्पर्श नहीं मिला। और ये महज ‘रक्तचापहीन पीली पत्रकारिता’ की कविता जान पड़ी। टूटने से ज्ञात मानवीय सत्य दूसरी जगह उन्हें सपाटबयानी लगी। ऐसी सपाटबयानी ‘‘कल्पित दर्द के रिहटोरिक को तोड़ने का सबसे नाटकीय और तात्कालिक माध्यम बन जाती है। समस्या एक दूसरे स्तर पर फिर भी बनी रह जाती है। सपाटबयानी आवेश के निरंतर अंदाज को तोड़कर अगर कहीं स्थिर हो जाती है तो यह उसकी अशक्यता ही होती है। यह अशक्यता पहले रिहटोरिक को तोड़ती है फिर अपने को तोड़ते चलना उसकी नियति हो जाती है। कोई कवि मुहावरे के लंगड़े दरवाजे से आसानी से फैशन में आ जाता है और कविता को अनुभव की प्रामाणिकता से छलने लगता है…। अपने को ही बार-बार तोड़ते रहने की रघुवीर सहाय की नियति है क्योंकि उन्हें किसी शर्त पर उस जंगल से निकलना स्वीकार्य नहीं है…। मुझे लगता है कि ‘आत्महत्या के विरुद्ध’ की अधिकांश कविताएं एक अजीब रौ में लिखी गई हैं। उनमें न तो विजयदेव नारायण साही की कविताओं की आत्मीयता है और न राजकमल का वेग।’’ (वही, पृ. 63-69) मतलब इन कविताओं में आत्मीयता नहीं है और परिवेश से संपृक्ति भी नहीं है और टूटना एक मुहावरा भर है-एक रेहटोरिक को तोड़कर दूसरा रेहटोरिक गढ़ना-वास्तविक कर्मक्षेत्र की संवेदना से व्यवस्था को तोड़कर विद्रोही बनना और मुहावरों से युग को तोड़कर आततायी कहलाने का जो अंतर है, उसे आत्महत्या के विरुद्ध की कविताएं साथ-साथ व्यक्त करती हैं। आखिर क्या कारण है कि एक जगह सैद्धंतिक रूप से स्वयं को तोड़ने की महत्ता को स्वीकार करने के बावजूद डॉ॰ चौधरी को दूसरी जगह व्यवस्था को तोड़ने की इच्छा उसमें दिखाई नहीं पड़ी। उसमें आत्मीयता नहीं मिली-वह मिली भी तो विजयदेव नारायण साही की कविता में। कहीं ऐसा तो नहीं था कि पत्रकारिता की भाषा के विरोध ने उन्हें सपाटबयानी के विरोध तक पहुंचा दिया था। अनात्मीयता तथा परिवेश असंपृक्ति के अनुभव के पीछे सपाटबयानी संबंधी धारणा काम कर रही थी। काव्य भाषा संबंधी चिंतन मे ही कहीं कोइ दोष तो नही था!

रघुवीर सहाय की कविताओं में आत्मीयता नहीं मिलने पर डॉ॰ चौधरी ने जो आक्षेप लगाए थे, उसका उत्तर ‘कविता के नए प्रतिमान’ में नामवर सिंह ने दिया भी था। परिवेश को रचनात्मक रूप देने के लिए नाटकीयता कैसे काम करती है और वहां कविता के भीतर का नाटकीय नायक, जो प्राइवेट से ज्यादा सामान्य यथार्थ के किसी निजी साक्षात्कार का एक राजनीतिक व्यक्तित्व के साथ अपनी उपस्थिति दर्ज कराता है। नामवर सिंह ने लिखा था कि आत्महत्या के विरूद्ध की कविताएं ऐसे ही आत्मीय राजनीतिक व्यक्तित्व की कविताएं हैं।

निर्वैयक्तिकता की अपनी घोषणाओं के बावजूद ‘प्रगीतात्मक’ आत्मीयता का बोध और तदनुरूप काव्य भाषा का मोह डॉ॰ चौधरी को ‘आत्महत्या के विरुद्ध’ की कविताओं में ‘रक्तचापहीन पीली पत्रकारिता के मुहावरों के खतरनाक प्रयास को देख लेती है। 1970 में जब ‘कविता के नए प्रतिमान: विसंगति और विडंबना का सौन्दर्यशास्त्र’ शीर्षक आलेख में डॉ॰ चौधरी ने ‘कविता के नए प्रतिमान’ की समीक्षा की तो फिर से अपनी पुरानी धारणा का ही समर्थन करते हुए लिखा-‘‘पत्रकार की नाटकीय आत्मीयता में सबकुछ एक ‘मैं’ के अधीन होता है। इसमें की कीमियागिरी में घुलनशील तत्व: मैं बने की घोल में सारा तथ्य घुल जाता है-उसकी स्वतंत्रता और वास्तविकता समाप्त हो जाती है। ‘आत्महत्या के विरुद्ध’ में एक नाटकीय ‘मैं’ का ऐसा ही स्फार है जिसमें तथ्यों की वस्तुनिष्ठता घुलती रहती है। सबकुछ ‘मैं’ के गुंजलक में कैद हो जाता है और सारे करतब के साथ यही ‘मैं’ स्थितियों, घटनाओं और संबंधें पर गुंजलक मारकर बैठा शेष रह जाता है। इतिहास को नचाता हुआ, इतिहास के बीच गतिशील इकाई के रूप में नहीं, सर्वतंत्र स्वतंत्र सत्ता के विस्पफोट के रूप में। इस अनात्म ‘मैं’ का यही रहस्य है जिसकी ओर मैंने इशारा किया था। ‘मैं’ के स्पफार की यह मुद्रा आत्मीय नहीं हो सकती।’’ (खंड1, पृ. 211)

‘कविता के नए प्रतिमान’ की आलोचना उन्होंने दो लेखों में की है। ‘समकालीन कविता: अंधेरे से साक्षात्कार’ शीर्षक लेख में यद्यपि उन्होंने ‘कविता के नए प्रतिमान’ का नाम नहीं लिया है लेकिन विसंगति, विडंबना, नाटकीयता, सपाटबयानी और काव्यभाषा संबंधी नामवर सिंह की स्थापनाओं की आलोचना इसमें है जबकि ‘कविता के नए प्रतिमान: विसंगति और विडंबना का सौन्दर्यशास्त्र’ नामवर सिंह की किताब की समीक्षा है। ‘कविता के नए प्रतिमान’ की इससे अच्छी समीक्षा मेरे देखे में नहीं आई। डॉ॰ चौधरी ने शुरू में ही बताया है कि किस प्रकार छायावाद के ऐतिहासिक पतन पर अपनी दृष्टि केंद्रित न करके नामवर सिंह ने विजयदेव नारायण साही की इस स्थापना का समर्थन किया कि छायावाद का अंतर्विरोध उसके नैतिक विजन के टूट जाने तक सीमित था। उन्होंने आरोप लगाया कि नामवर सिंह ने इसे ज्यों का त्यों स्वीकार करते हुए भावना बुद्धि का एक हीगेलियन डाइलेक्टिक्स गढ़ लिया है। इसी का परिणाम है-काव्य संवेदना का विभाजन। डॉ॰ चौधरी ने लिखा कि नामवर सिंह की इस पुस्तक में ‘‘विवाद शैली के आतंक में इतिहास का परिप्रेक्ष्य डूबता नजर आता है… ‘कविता के नए प्रतिमान’ में जो सबसे बड़ा दोष है, वह परिप्रेक्ष्य के खो जाने का नहीं है, इतिहास के अदृश्य रह जाने का है।’’ (खंड 1, पृ. 206)

‘कविता के नए प्रतिमान’ में इतिहास के अदृश्य रह जाने के कारण नागार्जुन, त्रिलोचन, केदार और सुमन जैसे दूसरे कवि प्रतिमानों के निर्माण से गायब हैं। ‘कविता के नए प्रतिमान’ का परिप्रेक्ष्य निश्चित रूप से मुक्तिबोध हैं लेकिन ‘परिवेश और मूल्य’ में जिस इतिहास को दिखाने की कोशिश नामवर सिंह कर रहे थे, वह उन्हीं के शब्दों में अपूर्ण है और जिसकी क्षतिपूर्ति ‘अंधेरे में पुनश्च’ नामक अध्याय भी नहीं कर पाया। डॉ॰ चौधरी ने यह भी बताया है कि नई कविता के अनुभव संसार की वर्गीय संरचना को लक्ष्य करते हुए मुक्तिबोध ने जो कुछ भी लिखा, उसके बावजूद उनकी भावधारा अपनी विचारधारा से संगत न हो पाई। कला के तीसरे क्षण वाला उनका सिद्धांत उनकी अपनी काव्य प्रक्रिया का अंतर्विरोध भी है। ‘‘कला के जिस तीसरे क्षण को वे संपूर्ण रचनात्मक क्षण सिद्ध करते हैं, क्या वह ‘आत्मपूर्ण तात्कालिकता’ का पर्याय नहीं है। क्या यह ‘आत्मपूर्ण तात्कालिकता सारे कला सत्य को अपने भीतर की परिस्थितियों में या परम स्थिति में फ्रीज नहीं कर देती? सारे विकास को अपने भीतर ही नहीं समेट लेती? यह इतिहास का निषेध है और बर्गशैनियन गुणात्मक काल संरचना से मुक्तिबोध की भावधारा पीडि़त रही। इससे इनकार नहीं किया जाना चाहिए।’’ (खंड 1, पृ. 209)

डॉ॰ चौधरी ने यह भी आरोप लगाया कि विसंगति और विडंबना को जब नामवर सिंह समकालीन इतिहास की मूल लाक्षणिकता के रूप में प्रस्तुत करने लगते हैं तो वह विसंगति और विडंबना को गहरे अर्थ से काटकर फ्राइवालस बना देते हैं। बुर्जुआ सौंदर्यशास्त्र से लड़ने के क्रम में जिन रूपवादी औजारों की सहायता नामवर सिंह लेते हैं, कहीं न कहीं उन औजारों के खुद ही शिकार हो जाते हैं। डॉ॰ चौधरी ने खुद ही लिखा-‘‘कविता के मूल्यांकन में संरचनावादी दृष्टि कहां मार्क्सवादी सौंदर्यशास्त्र से टकराती है, इसे जानना हो तो नामवर की यह पुस्तक महत्वपूर्ण उदाहरण बन सकती है। जिस तरह हीगेलियन द्वंद्ववाद विचारों की गत्यात्मकता पर आश्रित है और कालचाप से आपकी प्रत्यवस्थाएं निर्मित कर उन्हें एक उच्च संश्लेष में बदल लेता है, उसी तरह नामवर का संरचनावादी दृष्टिकोण भी एक कल्पित पूर्णता का संश्लेष बनकर रह जाता है जिसका इतिहास, अनुभव और मानवीय कार्य व्यापारों तथा भावनाओं के मूर्त विश्व से कोई सीधा संबंध नहीं है। … ‘कविता के नए प्रतिमान’ वस्तुतः प्रतिमानों की भीड़ है जिसमें सही प्रतिमान दबा पड़ा रह जाता है।’’ (खंड 1, पृ. 213)

नामवर सिंह पर भाववादी चिंतन के प्रभाव के रूप में कहानी आलोचना संबंधी कुछ निष्कर्ष लगातार डॉ॰ चौधरी की आलोचना के केंद्र में रहे हैं। निर्मल वर्मा के कहानी संग्रह ‘परिंदे’ को नई कहानी की पहली कृति कहना और उसे ‘कालातीत कलादृष्टि’ से विभूषित करना ऐसा ही एक प्रयास था। डॉ॰ चौधरी लिखते हैं कि ‘परिंदे’ संग्रह की कहानियों में ताजगी थी मगर यह ताजगी कतई इस कारण नहीं थी कि निर्मल वर्मा ने इन कहानियों में अपने समय के इतिहास की उस विराट नियति को पहचान लिया था जो मनुष्य को अकेला करती है। ‘‘तमाम कुशलता के बावजूद ‘परिंदे’ जैनेंद्र का अतिक्रमण नहीं करती थी। इतना अवश्य था कि लतिका का पिंजरा बड़ा हो गया था, मगर कैच 22 वह तब भी न बन पाया था। फिर भी नई स्थितियों में स्त्री की यह नियति एक पैराडॉक्स खड़ा करती थी। लतिका को पिंजड़े से ज्यादा उसका अपना नैतिक आवेश बांधता है- इसी बिंदु पर उसकी अपनी पहली और आखिरी पहचान संभव है। … यूरोप की पतनशील परंपरा के आघात को नई कहानी का उद्घोष मानना वैचारिक दिवालियेपन के अतिरिक्त कुछ नहीं कहा जा सकता। बिंब, ध्वनियां, रंग ऐंद्रियबोध को गहरा करते हैं, मगर इससे यथार्थ का ऐतिहय ढांचा कालचाप भी प्राप्त कर लेता है-इसे नहीं माना जा सकता। शायद इस महत्वपूर्ण तथ्य की परीक्षा नहीं की जा सकी। ये विचारधाराएं आंतरिकता को तथ्यबद्ध दायरे से निकालकर जिस अगोचर भावभूमि पर ले जाती हैं, उनका सत्य क्या है। उनका सत्य लौकिक भावभूमि के विरोध में प्रकट हुआ है। यह सत्य जो एक लौकिक भावभूमि को तोड़कर प्रकट हुआ था, किसी कालजयी दृष्टि का परिणाम न था। बल्कि कालचाप से निर्वासित मध्यवर्ग की आत्मचेतना का परिणाम था! उस पर बुर्जुआ विचारधारा का ताजा रंग चढ़ आया।’’ (खंड 2, पृ. 26 व 127-28)

डॉ॰ चौधरी समकालीनता के प्रस्थान बिंदु के रूप में आजादी को रखते हैं। उनके लिए यह आजादी कालगत परिवर्तन के बजाय देश में होने वाला एक परिवर्तन था। यह देशगत परिवर्तन न केवल विभाजन की पीड़ा से ग्रसित था वरन भारतीय जीवन को जो वृहत्तर यथार्थ गांव और शहर की सीमा को तोड़कर राष्ट्रीय धारा में एक होना चाहते थे, वहां गांधीजी की परिकल्पना खंडित हुई थी और निश्चित रूप से गांव और शहर दो भिन्न यथार्थ से रूबरू थे। सुरेंद्र चौधरी ने नेहरू युग के अंतर्विरोधें को अलग-अलग तरीकों से लगातार व्याख्यायित करने की कोशिश की और इसके साथ रचनाशीलता की संलग्नता को चिन्हित भी किया। इन अंतर्विरोधें को पाटने की समस्या ही तात्कालिकता के समक्ष सबसे बड़ी चुनौती थी। स्वातंत्रयोत्तर हिंदी कहानी में जो तथ्य नई कहानी को कहानी से अलग करता था, वह निश्चित रूप से मध्यवर्ग का आत्मकेंद्रण था। ’62 के राष्ट्रीय हादसे से पहले दशक में निश्चित रूप से एक नवरोमैंटिक उत्थान था (नामवर सिंह के शब्दों में)। मगर जिसे पीड़ाभरी प्रतीक्षा कहा जाता है, उसके इतर इस प्रतीक्षा की सीमाओं को तोड़कर मुक्तिबोध वृहत्तर ऐतिहासिक अंतर्विरोधें से जूझ रहे थे। उनका सिनिकल और संशयवादी होना केवल आवेशजन्य नहीं था। ‘विपात्र’ और ‘क्लाड ईथरली’ की पीड़ा  प्रतिरोध, विद्रोह और स्वतंत्रता की एक पूरी दुनिया को रूपकों में ढालने का प्रयास था। अपने प्रयास में मुक्तिबोध जरूर अकेले थे लेकिन वहां निर्मल वर्मा का अकेलापन नहीं था। डॉ॰ चौधरी जोर देकर कहना चाहते हैं कि नई कहानी की संष्लिष्टता और उसका नयापन जिस रास्ते होकर आजादी के बाद की रचनात्मक परिस्थितियों और उसके अंतर्विरोधें को कैच करने की कोशिश कर रहा था, उसकी दुनिया मुक्तिबोध के रूपकों में ही साकार होती है। जिस प्रकार कविता मुक्तिबोध के यहां सारे रोमैंटिक आवेश उतार देती है, उसी प्रकार कहानीकार मुक्तिबोध के यहां भी भावुकता से उठनेवाली टीस और पीड़ाभरी प्रतीक्षा के बदले आहत नैरंतर्य का संकट केंद्रियता पाता है। नई कहानी की रचनाशीलता के केंद्र में व्यतीत होती व्यवस्था और चरित्रों के प्रति एक व्यथा भरा मोह है जो परिवार-समाज के अंतर्विभाजन के कारण पैदा हुई थी। ‘‘मुझे याद है कि पश्चिम में कथा साहित्य की बहस में जहां जॉर्ज स्पाइनर महाकाव्यात्मक और नाटकीय के बहाने दो सदियों की कथा यात्र के रचनात्मक सार पर बहस कर रहे थे, वहीं मार्क स्पिनका ने डिकेंस और काफ्का की आधुनिकता के केंद्र में परिवार-समाज को रखकर देखा था। ऐसे प्रयत्न अपने यहां न दिखाई पड़े। नामवर जी नई कहानी की बहस में परिवार, समाज को विशेष महत्व देते दिखाई न पड़े। (खंड 2, पृ. 28)

परिवार-समाज की इस केंद्रीयता का कोई कहानीकार था तो वो अमरकांत था। छोटे-छोटे क्रियाकलापों में कितने गहरे भावात्मक अर्थ छिपे रहते हैं, अपनी इसी पहचान के कारण अमरकांत की कहानियां अलग पड़ती हैं। परिवार के भीतर के जीवित रेशों से बनी कहानियां और परिवार के भीतर की भयावहता-दोनों कैसे राष्ट्रीय संदर्भ से जुड़कर भय और त्रास के बावजूद अपने संघर्ष को जीवित रखने की जातीय जिजीविषा से लैस हो सकती है- इसका विश्वास केवल अमरकांत की कहानियां देती हैं। ‘अमरकांत: जीवन की संभावनाओं के लिए संघर्ष’ शीर्षक आलेख नई कहानी के सबसे सशक्त कहानीकार को दुबारा देखने की एक कोशिश है। बड़े ताज्जुब की बात है कि अमरकांत पर कोई स्वतंत्र लेख न तो नामवर सिंह ने उस दौर में लिखा, न ही किसी और ने। डॉ॰ चौधरी का यह लेख उस महती आवश्यकता की पूर्ति करता है।

दूसरे खंड में संकलित डॉ॰ चौधरी के लेख एक बार फिर यह साबित करते हैं कि वह हिंदी के शीर्षस्थ कथा आलोचक हैं। ‘हिंदी कहानीः प्रक्रिया और पाठ’ के साथ कहानी के स्थापत्य को समझने का जो प्रयास उन्होंने शुरू किया था, वह उनके बाद के लेखन में भी लक्षित किया जा सकता है। प्रस्तुत संकलन के लेखों से गुजरते हुए हम लगातार उत्तरशती की कथायात्र करते हैं। इस कथायात्र में समकालीन से जूझते हुए कहानियों का भिन्न भिन्न रचना संदर्भ और उन रचना संदर्भों से झांकते हुए कहानी के स्थापत्य की भिन्न भिन्न भंगिमाएं मिलती हैं। प्रेमचंद के संदर्भ में उन्होंने जिस प्रकार कथावाचन को महत्व दिया था, उसी प्रकार बाद के कहानीकारों के यहां कथावाचक का हासिया किस प्रकार कहानी की रचना परिस्थिति को समृद्ध करता है, उसे भी समझने का प्रयास है। कला और जनवाद के रिश्ते भी डॉ॰ चौधरी के लेखन में निरंतर केंद्रीयता पाते रहे हैं। कथ्य की मार्मिक पहचान केवल नारों से तय नहीं होती। कहानी के भीतर जनवादी आंदोलन की अधिकांश कहानियां गढ़े गए यथार्थ की कहानियां हैं जो निश्चित रूप से यथार्थ के आतंक से पलायन है। अभिधत्मक पहचान और सर्वव्यापी चेतना कलारूपों के लिए मिथकों का आश्रय नहीं लेती। व्यापक और जटिल अनुभवों तक पहुंचने का एक रास्ता मिथकों को तोड़कर भी तय किया जा सकता है। इसके अमरकांत लगातार सिद्ध करते रहे।

सुरेंद्र चौधरी की कथा आलोचना पर विस्तृत बहस की जरूरत है। ये बहस हिंदी कथा आलोचना को नई दिशा दे सकती है। प्रस्तुत आलेख में उन सारे बिंदुओं को समाहित करना संभव नहीं है। खंड दो में मुक्तिबोध, भीष्म साहनी, प्रेमचंद और रेणु की कहानियों की विस्तृत समीक्षा के अलावा मार्क्सवादी सौन्दर्यशास्त्र पर भी एक बहस है। ‘हिंदी व्यंग्य की जातीय परंपरा और परसाई’ शीर्षक आलेख में एक विधा के रूप में व्यंग्य की आवश्यकता और शक्ति-दोनों को पहचानने का भी एक प्रयास है। समाज की विडंबना और उसके अंतर्विरोध जब तर्क की संगति से आगे निकलकर सादृश्यमूलक कल्पना का आधार लेती है तो वह व्यंग्य की बनावट में अपनी पहचान बनाती है। यह व्यंग्य दृष्टि परसाई के यहां अपने आलोचनात्मक यथार्थवाद के कारण ही केवल हास्य का माध्यम नहीं रह जाती। परसाई का व्यक्तित्व अपने युग के आत्मसंशय से ऊपर है। इसलिए वह ओजपूर्ण ढंग से अंतर्विरोधी स्थितियों पर प्रतिक्रिया करता है। एक नैतिक ऊर्जा की मद्धिम आंच में परसाई अपने चरित्रों और परिस्थितियों को पकाते हैं जिससे उनकी शैली तो अलग होती ही है, उसमें नया तासीर भी पैदा होता है। परसाई का व्यंग्य और उनकी गद्यशैली ठेठ अर्थों में हिंदी की जातीय परंपरा का निर्वाह करती है।

’90 के बाद की हिंदी कहानियों में घटना संकुलता के बीच से नई परिस्थितियों का कहानी में सार्थक उपयोग किस प्रकार हो- इस पर डॉ॰ चौधरी विस्तृत विवेचन करते हैं। सांप्रदायिकता जैसी थीम को ले करके फैशनपरक कहानियों का दौर भी चला था। डॉ॰ चौधरी कहते हैं कि तात्कालिकता के मोह में बाजार का गुलाम बनना एक बात है और विराट ऐतिहासिक संदर्भ को कहानियों में ढालना दूसरी बात। मानवीय गरिमा को केंद्र में रखकर लिखी गई दो कहानियों को डॉ॰ चौधरी अपनी समीक्षा का आधार बनाते हैं। प्रियंवद की कहानी ‘वे वहां कैद हैं’ एक पूरी पीढ़ी की दुश्चिंताओं और उलझनों को अपने केंद्र में रखती है। यहां उलझन, दुश्चिंताओं का कारण है या परिणाम-ये तो तय नहीं होता, परंतु तर्क और आवेशजन्य अपराध किस प्रकार मानवीय परिस्थितियों को एक मिथक में बदल देता है-वह पफर्क सामने आया है। छोटे-छोटे प्रसंगों से कैसे बड़ी पृष्ठभूमि का निर्माण होता है-प्रियंवद ने इसे अपनी कहानी कला में साधा है। डॉ॰ चौधरी लिखते हैं-‘‘कहानी के गद्य में प्रियंवद की अपनी अलग पहचान है। संवाद और दृश्य-दोनों इस गद्य से सजीव हो उठते हैं। मनुष्य की जटिल भावनाओं को नैतिक आवर्तों में डालकर देखने की एक विशेष कुशलता उनमें दिखाई पड़ेगी। न्याय और करुणा की सरहदों से एक साथ टकराता हुआ उनका गद्य संसार अथक और अक्षय शक्ति की सूचना देता है। अपनी पीढ़ी के वे अकेले गद्य लेखक हैं जिनमें मुझे ये विशेषताएं लक्षित होती हैं। कविता के मुहावरे में वे नहीं उछालते, जैसा उनके कुछ समकालीन उछालते हैं पर गद्य की पूरी काठी में लिरिक का स्पर्श होता है। (खंड 2, पृ. 265)

दूसरी कहानी है उदय प्रकाश की ‘और अंत में प्रार्थना’। व्यक्तिगत और अवांतर प्रसंगों से सार्वजनिक विडंबना को कैसे सामने लाया जाता है-इसे इस कहानी के संदर्भ में समझा जा सकता है। विषय साधारण ही हो, सारे क्रियाकलाप दैनिक जीवन के ही हों परंतु फिर भी उसमें कलात्मक उन्मेष कैसे हो सकता है-इसे प्रस्तुत कहानी से समझा जा सकता है। विभाजन के प्रेतों से लड़ता हुआ वाकणकर का व्यक्तित्व जिस आत्मसाक्ष्य की पीड़ा से गुजरता है, वह आधुनिक इतिहास में राष्ट्रीयता, वर्ण और ध्र्म तथा पूंजीवादी दुष्चक्र के जटिल संबंधें को कथा के भीतर मूर्त करता है। डॉ॰ चौधरी लिखते हैं-‘‘राज्यसत्ता के चरित्र को परोक्ष रूप से कहानी के गठन के साथ इस ऊंचे स्तर पर उजागर करने वाली कुछ ही कहानियां मैंने पढ़ी हैं। हिंदी कहानियों में किया गया ढेर सारा राजनीतिक लेखन इस स्तर तक नहीं उठता, इसके आसपास तक भी नहीं पहुंचता। उनमें क्रांति की उतावली में पूरी प्रक्रिया का सहज विसर्जन देखा जा सकता है।’’ (खंड 2, पृ. 272)

यह आधी अधूरी रूपरेखा मात्र है एक भुला दिए गए आलोचक के विशाल और सजग आलोचना कर्म का।  सच्ची आलोचना किस कदर गंभीर वैचारिक संघर्ष का परिणाम होती है इसे सुरेन्द्र चौधरी के लेखन में स्पष्ट ही देखा जा सकता है। सुरेन्द्र चौधरी पर बहस एक ऐतिहासिक ज़रुरत है। ज़रुरत है हिंदी की प्रगतिशील आलोचना की एक दूसरी परम्परा से संवाद की। बाकी फिर कभी।

(सुरेन्द्र चौधरी से संबंद्धित सारे उद्धरण अंतिका प्रकाशन से तीन खंडों में प्रकाशित उनके रचना संचयन से लिए गए हैं। विवरण नीचे उपलब्ध है। इस लेख का संशोधित-संपादित अंश अकार में प्रकाशित हो चुका है। मैं इसके लिए अकार का आभारी हूँ।)

मार्तंड प्रगल्भ

मार्तंड प्रगल्भ

मार्तंड प्रगल्भ जे.एन.यू. के भारतीय भाषा केंद्र में पी.एच.डी. के लिए शोधरत  हैं। फिलहाल लिडेन (नीदरलैण्ड) में अध्ययन-प्रवास कर रहे हैं। उनसे mpragalbha1@gmail.com पर संपर्क संभव है।

Published Books Of Surendra Chaudhary: 

  •  Hindi Kahani : Prakriya Aur Path (Hindi), Radhakrishna Prakashan, 1963, 1995
  • Phanishwar Nath Renu, Sahitya Academy, 1987
  • Itihas : Sanyaog Aur Sarthakata(I), Antika Prakashan, 2009
  • Hindi Kahani : Rachana Aur Paristhiti(II), Antika Prakashan, 2009
  • Sadharan Ki Pratigya : Andhere Se Sakshatkar(III), Antika Prakashan, 2009

नाले और रखवाले –एक असाहित्यिक की डायरी: मार्तंड प्रगल्भ

एक साहित्यिक की डायरी’ से तो आप सब परिचित हैं. मुक्तिबोध की इस रचना ने इतनी प्रसिद्धि पाई की असाहित्यिक लोगों ने डायरियां  लिखना ही लगभग बंद कर दिया . इधर एक असाहित्यिक की डायरी हमारे हाथ लगी .इसमें कुछ हालिया घटनाओं और बहसों के हवाले हैं. दिलचस्प लगे तो पढ़ लीजिए . लेकिन याद  रहे , डायरी है , सम्पादकीय नहीं .

By Michele Meister

By Michele Meister

 

By मार्तंड प्रगल्भ

मेरा एक मित्र है . बेरोजगार है. आजकल दिल्ली में मुनिरका की गलियों में गाहे-बगाहे दिख जाता है. बेरोज़गारी और ज़माने की चिंता से थोडा सनकी भी हो चला है. पढ़ा-लिखा है. बतकही का रस जानता है. साहित्य में रुचि है. और सच पूछिए तो हम-आपसे कुछ ज्यादा ही गंभीरता से लेता है साहित्य को. पिछली बार देखा था दिसंबर की ठंढ में. गुस्से से भरा उसका चेहरा अभी भी याद है मुझे. विश्वविद्यालय के गेट पर मिला था. ज़ल्दी में था. कह रहा था इस रेप काण्ड के विरोध में जनता सड़क पर है , संस्कृति-कर्मियों को भी वहाँ होना चाहिए. कला और साहित्य में सत्ता-विरोध और सड़कों पर कलाकारों-साहित्यकारों का सामूहिक प्रतिरोध एक दूसरे के विरोधी नहीं बल्कि पूरक हैं. कहते-कहते बस आ गयी और वह बस के भीतर गुम हो गया. दूसरे दिन मेरे मोबाइल पर उसका सन्देश मिला था कि अमुक दिन इंडिया गेट पर विरोध प्रदर्शन के लिए ज़रूर आयें. मैंने भी मन में ठान लिया था कि जाऊँगा ही. पर अंत समय में गया नहीं. प्रदर्शन हुआ और लगातार हुआ. किसी और ने फेसबुक पर विरोध-प्रदर्शन की तस्वीरें भी मुझे बाद में दिखायी थीं.

मेरा मित्र परितोष  एक वामपंथी सांस्कृतिक मंच से जुड़ा है. उस दिन के बाद मैंने उसे विश्वविद्यालय के आस-पास फिर देखा नहीं. हांलाकि मेरी बड़ी  इच्छा थी कि मिलता तो कुछ बात करता. इस इच्छा का एक फौरी संदर्भ भी था. एकाध सप्ताह बाद ही एक हिंदी दैनिक ‘घनसत्ता’ के सम्पादक ने उसी सांस्कृतिक संगठन को कोसते हुए एक अजीबोगरीब, लगभग विद्वेषपूर्ण ,सम्पादकीय लिखा था. सम्पादक साहेब का आरोप था कि कोई भी लेखक संगठन वहां दिल्ली की सडकों पर नहीं था! असल में वामपंथी लेखक-सांस्कृतिक संगठनों की मिशनरी  आलोचना और लेखकों के मार्क्सवाद-प्रेम का प्रतिरोध  इनका प्रिय  शगल रहा है. अखबार में आरोप था कि अमुक लेखक संगठन के महासचिव या किसी  अन्य पदाधिकारी का चेहरा या उसका बैनर उन्हें नहीं दिखा. बाद में कुछ दुष्टों  ने अख़बारों और सामाजिक मीडिया में छपी तस्वीरों और रिपोर्टों का हवाला उन्हें दिया. शायद उनके ही अखबार के दीगर संस्करणों की ख़बरों को उनके फेसबुक पर चस्पां किया. पर लाहौर से तुरत-फुरत आये सम्पादक ने इन तस्वीरों में दिख रहे चेहरों को पहचानने से इनकार कर दिया . और उनका ‘मार्क्सवादी’ – विरोध अक्षत बना रहा ! पर अपन जैसे लोगों ने उन्हें कोई महत्व नहीं दिया. बात शायद आई -गई  हो गयी. पर मैं अपने मित्र से मिलना चाहता था. उसके बाद भी लगातार गोष्ठियों, सेमिनारों,काव्य-पाठों और विरोध-प्रदर्शनों वाले उसके सन्देश मेरे मोबाइल पर आते रहे थे ज़रूर. एकाध जगह मैं गया भी था. उसे उन आयोजनों में अतिव्यस्त देख मेरा जी नहीं हुआ उसे टोकने और बतियाने का. बहरहाल परसों शाम (हाँ शाम ही को तो) वह मुझे विश्वविद्यालय के कैंटीन पर दिख गया.

देखता हूँ बड़ी क्षिप्र  गति से वह मेरी ओर ही चला आ रहा है. उसने भी शायद मुझे देख लिया था. आते ही मेरे सामने बैठ गया और एक सिगरेट सुलगा ली. दो कश लेने के बाद अचानक बोल पड़ा ‘आ परितोषाद्विदुषां न साधु मन्ये प्रयोगविज्ञानम् ।बलवदपि शिक्षितानामात्मन्यप्रत्ययं चेतः’. ज्ञान के क्षेत्र में विद्वानों की संतुष्टि ज़रूरी है. बड़े से बड़ा सिद्ध  भी केवल आत्म -प्रमाण  पर विश्वास नहीं कर सकता. कालिदास ने ऐसा कहा है. पर जब विद्वानों के बीच किसी शब्द प्रयोग को लेकर असहमति हो तब?” मैंने सन्दर्भ के प्रति अपनी अनभिज्ञता विस्मय से प्रगट की. कहने लगा अरे ,अभी सन्दर्भ को मारो गोली . तुम क्या कहते हो? मैंने थोडा हकलाते हुए कहा कि महाभाष्यकार के अनुसार तो लोक ही प्रमाण होगा तब. “बस यही तो मैं सोच रहा हूँ”. उसने जैसे मुट्ठियाँ भांजते हुए कहा. परन्तु मैं अब थोडा स्थिर हो चुका था. बात को पकड़ते हुए मैंने भी सवाल फेंका . “लेकिन अगर लोक में भी अनेक प्रयोग मिलें तो.” उसने कहा तो सभी रूप मान्य होंगे. “लेकिन भाषा में निबद्ध ज्ञान -परम्परा के लिए तो इतनी छूट तो भारी पड़ेगी मित्र” मैंने तनिक  मजा लेते हुए कहा. मैंने फिर कहा “और यही वजह है कि व्याकरण-ग्रंथों और कोशों की ज़रुरत होती है”. “इससे मेरा भी इनकार नहीं है. मैं भाषा के मानकीकरण के खिलाफ नहीं हूँ.” वह भी अब विवाद में गंभीर हो चला था. कहने लगा “परन्तु समय-समय पर लोक-प्रयोगों और तदनुरूप साहित्यिक-प्रयोगों के परिवर्तन को व्याकरण ग्रंथों और कोशों में प्रतिबिंबित होना चाहिए. भाषा तो बहता नीर है. बाँधोगे तो या तो सूख जाएगी या फिर उसके वेग से तुम्हारे बने बाँध टूट जाएँगे. और हिंदी जैसी भाषा की जीवन्तता और उसका वेग तो जनपदीय बोलियाँ ही हैं. एक बार उनसे कटे तो गए. संस्कृत के साथ हुआ, प्राकृतों और अपभ्रंशों के साथ हुआ तो कोई आश्चर्य नहीं कि तुम्हारी बंधी-बंधाई , ‘राष्ट्रीय-कृत’ हिंदी के साथ भी वही हो”. वह शायद भाषा –पावित्र्य –संरक्षिणी सभा के किसी सभापति  से भिड़ आया था. मैंने उसकी आँखों में झलकते गुस्से को नज़दीक से देखा और सच पूछिए तो जैसे कोई कड़वी सचाई मुझे भी कंपा गयी. वह कहता गया. “अब देखो भाषा का निर्माण एक सामाजिक प्रक्रिया है. हिंदी के विशाल प्रदेश में बहुसंख्यक जनता जिस भाषा में सोचती-विचारती काम करती है, हिंदी का भविष्य वहां है.”

मेरे दिमाग में हिंदी भाषा के विकास की एक संक्षिप्त रूप-रेखा कौंध गयी. इसी तरह की बातें तो चन्द्रधर शर्मा गुलेरी , प्रेमचंद, हजारीप्रसाद द्विवेदी, किशोरीदास वाजपेयी ,रामविलास जी और राहुल जी जैसे विद्वानों ने भी की थी. उस वक़्त भी भाषा की शुद्धता के पैरोकार हिंदी को संस्कृत की पुत्री बनाने पर तुले थे. संविधान सभा की बहसें भी दिमाग में घूम गयीं. दावं-पेंच, शक्ति सम्बन्ध और ‘राष्ट्रवाद’( सांस्कृतिक  ही न!). हुआ वही जो कुछ लोग चाहते थे. और बदले में मिली रघुवीरी हिंदी! उर्दू से कन्नी काट कर आज़ाद हुए ही थे और अब बाकियों के साथ भी वही सलूक . भाषा की राजनीति से राजनीति की भाषा तय होने लगी थी.  परितोष अपनी ही रौ में था. “एक तरफ बाज़ार है . कार्पोरेट मीडिया और सरकार . उसी  का एक बढती रूप है हमारा बॉलीवुड . दूसरी ओर मजदूरों के विशाल जत्थे हैं . पटना से लेकर अहमदाबाद और लुधियाना-अमृतसर तक, गौहाटी से लेकर मुंबई –सूरत तक. आज गुडगाँव में हैं कल धर्मशाला तो परसों नागपुर. इनकी भाषा क्या है ? हिंदी ही तो है. बन रही है हिंदी इनसे. जो साहित्य इनके बीच से आरहा है , इनके बारे में आ रहा है , इनके प्रति प्रतिबद्ध है. हिंदी भी उनसे ही बन रही है. तो कोशकार क्या करेगा? कोर्पोरेट मीडिया और बॉलीवुड से प्रयोग स्थिर करेगा या संस्कृत में गोते खाएगा या फिर कामगार जनता की तरफ मुंह करेगा. एक ही रास्ता है और वह है जनता की ओर जाने का. इस मामले में कोई आगे नहीं बढ़ता. ले-दे कर सत्तर-अस्सी साल पुराने कोशों की शरण में जाना होता है. और बढे भी कैसे ! जनता से वास्तविक संपर्क हो तब न! और तुर्रा यह कि जनता के संगठन इन्हें भीड़ लगते हैं या फिर तानाशाह ! और कहेंगे कि हम हैं सबसे बड़े लोकतांत्रिक!” वह लगभग हांफ रहा था.

कुछ देर तक हम दोनों चुप रहे . बिना कुछ कहे मैं उठा और चाय लेने कैंटीन के काउंटर की तरफ बढ़ गया. परितोष  ने अचानक कहा “मेरे लिए काली लेना अदरक वाली. अच्छा रुको , मैं भी चलता हूँ.” दोनों चाय लेकर रिंग रोड पर निकल आये . गरमी कुछ कम हो चली थी. पर बीच-बीच में गर्म हवा के झोंके आ जाते थे. छुटियाँ शुरू थी इसलिए भीड़-भाड़ थोड़ी कम हो चली थी. सुबह जो अमलतास के पीले फूल चमकदार और ऐश्वर्य से भरे थे उनमें अधिकांश तो झड़ गए थे . जो बचे थे, मुरझाये थे और ढलते सूरज की किरणों में मन को उदास करने वाले थे. हाँ प्रोफेसरों के क्वाटरों के पीछे आम की छोटी-छोटी अमौरियाँ मन प्रसन्न करने वाली थीं. हमलोग जब कुछ एकांत में निकल आये तो उसने फिर से बात आरम्भ की. “ देखो , बात दरअसल भाषा के प्रति दो भिन्न दृष्टियों की है. एक है भाषा के शुद्धिकरण की , संस्कृतीकरण की, और शुद्ध भाषा के सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की. पहली दृष्टि का एक और भेद है जो ऊपर-ऊपर से शुद्धिकरण का विरोधी दीखता है , अपने को शुद्धिवादी कहे जाने पर ऐतराज करता है ,पर है नहीं. यह है बहुभाषावाद. इसे बहुसंस्कृतिवाद या अमेरिकी मल्टीकल्चरलिज़म का ही विस्तार मानो. संसदीय लोकतंत्र का यह नवउदारवादी युग इसी नारे के साथ है और भाषाओं की गैरबराबरी के खिलाफ चलने वाले प्रगतिशील आन्दोलनों को अपने उदार आवरण में पालतू और भ्रष्ट बनाता है. यह भाषाओं की अस्मिता की राजनीति से अपना कारोबार चलाता है और विश्वबाजार को नए-नए दुकान उपलब्ध करवाता है. ठेठ राजनीतिक सन्दर्भ दूं तो भाजपा, कांग्रेस और दक्षिणपंथी क्षेत्रीय दल- मायावती से लेकर नितीश कुमार तक- इस पहली दृष्टि के प्रतीक हैं. इनके लिए लोकतंत्र का नारा सबसे कारगर है. साहित्य में भी लोकतंत्र का नारा लगाने वाले अधिकाँश कलावादी और व्यक्तिस्वातंत्र्य  के वादी यथास्थितिवाद के घोर समर्थक हैं. और भाषा की शुद्धि के भी! और अकारण नहीं कि एक ‘लोकतांत्रिक’ सम्पादक पूरी मानवता को सी.आई.ए का ऋणी मानता है!” वह चलते –चलते रुक गया था. सडक के किनारे पत्थर की एक बेंच थी. किनारा  कुछ-कुछ पहाड़ी घाटी का भ्रम पैदा करता था. नीचे ढलान थी और जो जंगल में गुम हो जाती थी. घाटीनुमा उस अवकाश के उस पार विश्विद्यालय की नौ मंजिली लाइब्रेरी दृष्टि को रोक लेती थी. हवाई जहाज़ लगातार सर के ऊपर से गुजरते रहते . उसकी भयानक गड़गड़ाहट पहले सोने न देती थी. अब भी यदा-कदा जब विचारों की किसी अमूल्य श्रृंखला को भंग कर देती तो मन चिड़चिड़ा  हो उठता था.

उसने जब उस लोकतांत्रिक सम्पादक का ज़िक्र किया तो अचानक से अपन ने सन्दर्भ पा लिया. और शाम से ही मित्र की उद्विग्नता का पूरा चित्र मेरी आँखों में घूम गया. मन ही मन में मुझे उसकी प्रकृति पर हलकी -सी  हँसी आ गई. पर वह पहले की ही  भांति कह रहा था “ और दूसरी दृष्टि है भाषा के जनवाद की.” मैंने उसे बीच में ही टोका. “ देखो तुम जिस राजनीतिक स्वरुप की चर्चा कर रहे हो उससे मैं पूरी तरह सहमत हूँ. भाषाओं के इतिहास में भी संक्रमण के दौर आये हैं. अब जिसे हम भक्तिकाल कहते हैं या ठीक उसके पहले का जो काल है, हजार इसवी के आस-पास का, बहुत बड़ा परिवर्तन हो रहा था पूरे उपमहाद्वीप में . देशी भाषाओं ने धीरे-धीरे संस्कृत –प्राकृत-अपभ्रंश को उनके साहित्यिक भाषा के गौरवमय  आसन से नीचे धकेल दिया. ऐसा नहीं था कि इन देशी भाषाओं का अस्तित्व पहले था ही नहीं. लोग इन्हीं भाषाओं के अपने पुराने –नए रूपों में दुनिया को देखते- समझते थे. पर साहित्य और ज्ञान के लिए इन भाषाओं का प्रयोग वर्जित था. साहित्य और ज्ञान की एक आधिकारिक भाषा थी, लम्बे समय तक वह संस्कृत ही रही बाद में गौण रूप से प्राकृत और अपभ्रंशों को यह आसन मिला. जो लोग यह समझते हैं कि अपभ्रंश से देशी भाषाओं का उद्गम हुआ है , वो बहुत बड़ी भूल करते हैं. ये देशी भाषाओं का बढता दबाव था कि अपभ्रंशों के अलग अलग रूपों में हमें देशीपन के उदाहरण मिलने लगते हैं. इसलिए ‘हिंदी के विकास में अपभ्रंश का योग’ एक भ्रामक इतिहास दृष्टि है. दरअसल होना चाहिए था ‘अपभ्रंश के विकास में हिंदी का योग’. और यह बड़ा परिवर्तन राज्य और काव्य के बदलते रिश्तों और नए सांस्कृतिक वातावरण, अर्थात इस्लाम  की संश्लिष्ट अंतर-क्रियाओं का परिणाम थी. बाबा फरीद और मुल्ला दाउद से लेकर संत कवियों ने देशी भाषाओं में साहित्यिक अभिव्यक्तियाँ की. यह उनके भिन्न सांस्कृतिक पृष्ठभूमि और नए सामाजिक स्तर के कारण प्राप्त आत्मविश्वास का परिणाम थीं. उसके बाद लम्बे समय के परिवर्तनों ने रीतिकाल तक आते-आते साहित्यिक भाषा के रूप में ब्रज को स्थिर कर लिया. खड़ी बोली,हिन्दवी, हिन्दुई ,उर्दू आदि सम्बन्धी विवाद मैं यहाँ दुहराना नहीं चाहता. अंग्रेजी राज में भाषा को लेकर विवाद हुए , राजनीति हुई ,पर कभी ऐसा नहीं था कि जनता की आमफहम भाषा साहित्य से एकदम बाहर रही. भाषा की यह दूसरी परम्परा संस्कृति के शुद्धिकरण के खिलाफ सितारेहिंद,भारतेंदु, अयोध्याप्रसाद खत्री , प्रेमचंद, गुलेरी ,किशोरीदास वाजपेयी ,फिराक, शिवदान सिंह चौहान , रामविलास शर्मा, राहुल सांकृत्यायन आदि के साथ चली आई है. पर इस दूसरी परम्परा के भीतर भी विवाद और मतांतर रहे आये हैं. पर आमतौर पर यह भाषा की प्रगतिशील परम्परा है. इनके आपसी विवाद रोचक और ज़रूरी हैं पर अभी मैं उसमें पड़ना नहीं चाहता.” थोडा रुक कर मैंने फिर शुरू किया “ अस्सी के दशक के आखिर से जो नवउदारवाद आया, संचार माध्यमों में जो व्यापक परिवर्तन हुए उससे परिस्थितियाँ बदल गयी हैं. नयी सदी के दूसरे दशक तक आते-आते तकनीक जब से फेसबुक जैसे माध्यमों तक पहुंची  है, भाषा- प्रयोगों में उथल- पुथल- सी मच गयी है. अभिव्यक्ति अब प्रिंट-पूँजी के भरोसे नहीं है. इस आभासी माध्यम ने अभिव्यक्ति  के नए रास्ते खोल दिए हैं. अभिव्यक्ति  के इस बढ़ते जनाधार ने भाषा की  शुद्धि-चिंताओं को परेशान कर दिया है. मैं इन माध्यमों की सीमाओं को जानता हूँ. पर यह एक प्रगतिशील बात तो हुई ही. मानकीकरण की प्रक्रिया भी ज़रूरी है. और यहाँ मैं तुम्हारी बात से फिर सहमत हूँ कि उस मानकीकरण की प्रगतिशील और जनवादी प्रक्रिया का विकास करना ऐतिहासिक ज़रुरत है.”

इतना लंबा बोलने के बाद मैंने उसकी तरफ देखा तो वह मुस्कुरा रहा था. “ तुमने मेरी बात को ऐतिहासिक सन्दर्भ दे दिया” हंसते हुए परितोष ने कहा. अभी पहली बार उसके चेहरे पर हँसी देख कर सच पूछिये तो मुझे बहुत अच्छा लगा. हमलोग बात करते-करते हॉस्टल के गेट तक आ गये थे. मौन सहमति  से हमारे कदम खुद-ब-खुद कमरे की ओर चल पड़े. मैंने सिगरेट सुलगा ली थी. मेरे मित्र ने इतनी देर से कोई सिगरेट नहीं निकाली थी. इसका मतलब था उसके पास पैसे नहीं हैं. सोचा सिगरेट के साथ रात का खाना भी यहीं मेस में खिलाना होगा. पर यह मुझे अच्छा ही लग रहा था. मैंने उससे सम्पादक के बारे में पूछा. बोला छोडो यार. उन की याद मत दिलाओ. “अब देखो न उसी दैनिक के सम्पादक थे प्रकाश जोशी. राजनीतिक रूप से मैं उन्हें पसंद नहीं करता. पर उन्होंने हिंदी पत्रकारिता को सहज भाषा के पक्ष में रखा. और उनकी क्रिकेट पर लेखनी तो वाकई युगांतकारी है. अफ़सोस! इस तुरत-फुरत वाले बाज़ारू मनोरंजन, और तीन घंटे के मसाला शो ने जब क्रिकेट को ही बदल दिया तो अब उस भाषा का क्या किया जाएगा. वह तो प्रकाश  जी के साथ ही चली गयी.”

हमलोग सिगरेट बुझा कमरे में दाखिल हुए. इस दौरान मेरा मन रामविलास जी को याद कर रहा था. मैंने ‘भारतेंदु युग और हिंदी भाषा की विकास परम्परा’ को आलमारी से निकाल लिया. मैंने उसमें से दो उद्धरण परितोष को पढ़ कर सुनाये. .”दरार आम जनता में नहीं थी.दरार थी उच्च वर्गों में.फिर उन्हीं उच्च वर्गों का सहारा लेकर भाषा समस्या कैसे हल होती.उच्च वर्गों का यह दृष्टिकोण भाषा के परिष्कार के नाम पर उसे जनपदीय बोलियों से और शहरी बोलचाल से दूर ठेल रहा था और यह सिलसिला अंग्रेजी राज के खत्म होने के  पच्चीस साल बाद भी जारी है.” “पच्चीस नहीं साठ साल बाद भी” हंसते हुए उसने कहा. दूसरा उद्धरण यूँ था- “भाषा का परिनिष्ठित होना एक प्रक्रिया है जिसमे अनकों रूपों और प्रयोगों में कुछ छाँट लिए जाते है, शेष छोड़ दिए जाते है…किन्तु जो छोड़ दिए जाते है वो सदा नष्ट नहीं हों जाते वरन बोलियों में बने रहते हैं.आगे चलकर जब लोग बोलियों का अध्ययन करते है तब उन्हें पुराने कोशों,व्याकरणों और लिखित साहित्य में ना पाकर कल्पना करते है कि परिनिष्ठित रूपों के ये अपभ्रंश रूप है जो अशिक्षित लोगों की भाषा में प्रचिलित हों गए हैं”. “ये मारा” उसने लगभग मुझे गले लगाते हुए हवा में मुट्ठियाँ भांजी. मैंने किताब वापस रखते हुए कहा “जानते हो सम्पादक का कॉलम मैंने देखा था. मुझे उसी वक़्त कुछ शंका हुई थी. आजकल तो अखबार में ‘मार्क्सवादी’-  विरोध का जलसा चल रहा है. मुझे लगता है दिसंबर से कोई जख्म  जाग  रहा है. पचास-साठ के दशक में जो बहसे हुई थीं उसकी तलछट सम्पादक ढो रहे  हैं . जनता को भीड़ कहना , वो क्या है मुक्तिबोध की लाइनें…’डार्क मासेज़ ये मॉब हैं.’ है ना. और कलाकार की स्वतंत्रता  और अभिव्यक्ति की इमानदारी, लेखक-सांस्कृतिक संगठनों को तानाशाह बताना , सृजनात्मक लेखन की राह में रोड़ा डालने वाला कहना आदि-आदि. अब ये केवल संयोग नहीं कि तब भी वही खेमा ये सब कह रहा था आज भी वही खेमा ऐसा कह रहा है. कारण तो स्पष्ट है मित्र . मार्क्सवाद की दुनिया भर में जो वापसी हुई है , कुछ लोगों की सत्ता को डरा रही है . सता रही है. अब अगर ऐसा है तो मार्क्सवाद तो जवाब देगा. जनता जबाव देगी. कई बार जबाव सुनकर लोग कहते हैं कि वही पुरानी बात कह रहे हो. पर जानते हो ऐसे लोगों को हॉब्सबाम क्या जबाव देते थे….कहते थे कि साहेब जब लौट-लौट कर वही सवाल कीजियेगा तो जवाब भी तो वही मिलेगा.” हमदोनो ठठाकर हंस पड़े. परितोष ने कहा “ वो मुक्तिबोध की पंक्तियाँ ,जो तुम्हारी फेवरिट हैं , पढने को मन कर रहा है और ऊँची आवाज़ में पढने लगा –

“सब चुप, साहित्यिक चुप और कविजन निर्वाक्

चिन्तक, शिल्पकार, नर्तक चुप हैं

उनके ख़याल से यह सब गप है

मात्र किंवदन्ती।

रक्तपायी वर्ग से नाभिनाल-बद्ध ये सब लोग

नपुंसक भोग-शिरा-जालों में उलझे।

प्रश्न की उथली-सी पहचान

राह से अनजान

वाक् रुदन्ती।

चढ़ गया उर पर कहीं कोई निर्दयी,…

भव्याकार भवनों के विवरों में छिप गये

समाचारपत्रों के पतियों के मुख स्थल।

गढ़े जाते संवाद,

गढ़ी जाती समीक्षा,

गढ़ी जाती टिप्पणी जन-मन-उर-शूल ।

बौद्धिक वर्ग है क्रीतदास,

किराये के विचारों का उद्भास।

बड़े-बड़े चेहरों पर स्याहियाँ पुत गयीं।

नपुंसक श्रद्धा

सड़क के नीचे की गटर में छिप गयी…

धुएँ के ज़हरीले मेघों के नीचे ही हर बार

द्रुत निज-विश्लेष-गतियाँ,

एक स्प्लिट  सेकेण्ड में शत साक्षात्कार।

टूटते हैं धोखों से भरे हुए सपने।

रक्त में बहती हैं शान की किरनें

विश्व की मूर्ति में आत्मा ही ढल गयी.”

और फिर मैंने पढ़ा “कविता में कहने की आदत नहीं, पर कह दूँ

वर्तमान समाज में चल नहीं सकता।

पूँजी से जुड़ा हुआ हृदय बदल नहीं सकता,

स्वातन्त्र्य व्यक्ति का वादी

छल नहीं सकता मुक्ति के मन को,

जन को।“

मेस का टाइम हो चला था. मैंने उससे कहा आज रात यहीं रूक जाओ. उसने इनकार कर दिया. “ नहीं यार , वापस जाऊँगा . कल सुबह ही कबीर कलामंच के साथियों की रिहाई के अभियान को लेकर एक प्रदर्शन है. समय मिले तो सुबह तुम भी आ जाना. कॉफ़ी हॉउस के पास सुबह नौ बजे.” थोडा रुक कर सर को झटक कर बड़े दृढ स्वर में कहता गया . “फासीवादी उभार है. लड़ने के सिवा चारा नहीं.” फिर एकाएक मुस्कुराते हुए बोला-“ जानते हो जब से मैं ने एक  शीर्षक ‘नीर और नाले’ देखा है एक गीत बेइन्तिहाँ याद आ रहा है- ओ दुनिया के रखवाले! सुन दर्द भरे मेरे नाले….” और मैंने कहा “रखवाला कौन है , पता है !” और दोनों ने एक साथ कहा “ यह भी कोई पूछने की बात है कि दुनिया का रखवाला , ‘आतंक’ के विरुद्ध युद्ध छेड़नेवाला , कौन है ! और फिर ठठा कर हंस पड़े.

मार्तंड प्रगल्भ

मार्तंड प्रगल्भ

मार्तंड प्रगल्भ जे.एन.यू. के भारतीय भाषा केंद्र में पी.एच.डी. के लिए शोधरत  हैं। फिलहाल लिडेन (नीदरलैण्ड) में अध्ययन-प्रवास कर रहे हैं। उनसे mpragalbha1@gmail.com पर संपर्क संभव है।

 

 

अकथ कहानी प्रेम की: संतो धोखा कासूं कहियो-2 : मार्तंड प्रगल्भ

(‘संतों धोखा कासूं कहियो’ के पहले भाग पर व्यापक प्रतिक्रियाएं हुईं. सहमती-असहमति दोनों स्वरों को सुना-पढ़ा गया. अधिकांश प्रतिक्रियाएं मौखिक रूप में ही आयीं. लेकिन, जो भी आयीं उनके माध्यम से लेख के कुछ-एक महत्वपूर्ण अभाव उभर कर सामने आये.  कबीर की कविता को पढने में या कवि कबीर को खोजने में पुरुषोत्तम अग्रवाल जी की पुस्तक कितनी मदद करती है, जैसे बिंदु अछूते रह गए थे. समीक्षा के बहाने इस लेख में मार्तंड ने कबीर के कविपक्ष और उस कविपक्ष के प्रति अग्रवाल जी के व्यवहार को खंगालने की कोशिश की है. अभी तक अग्रवाल जी की कोई भी टिपण्णी इस लेख के सन्दर्भ में सामने नहीं आयी है, समीक्षा-लेख की इस धारावाहिकता को समृद्ध करने में उनकी टिपण्णी एक महत्वपूर्ण भूमिका अदा करेगी, ऐसी उम्मीद अभी शेष है!)

By  मार्तंड प्रगल्भ

एक आलोचक-विचारक के रूप में पुरुषोत्तम अग्रवाल हमेशा प्रभावित करते रहे हैं. और जैसा हर आलोचक-विचारक के साथ होता है, पुरुषोत्तम अग्रवाल की चिंतन धारा में भी अलग-अलग पड़ाव आये हैं. अलग-अलग काल खण्डों में जो कुछ वैचारिक दुनिया में घटता जाता है आलोचक-विचारक उससे संवाद भी करता जाता है. इस क्रम में कभी वह समकालीन चिंतन की आलोचना करता है ,कभी उसको एक हद तक स्वीकार करता है, कभी मुखामुखम से चिंतन की नयी दिशा पाता है, और कभी समकालीन विमर्शों के हाथों पराजित सा महसूस करते हुए अपनी चिन्ताधारा को उनके आगे नतमस्तक कर देता है. अग्रवाल जी की किताब ‘अकथ कहानी प्रेम की ..’ को अर्चना वर्मा ने ‘पुरुषोत्तम के प्रेम की अकथ कहानी’ के रूप में देखा है. मैं भी चाहता हूँ कि इस किताब को खुद पुरुषोत्तम जी के चिंतन की कहानी की तरह देखा जाए. हाँ फिलवक्त उस चिंतन के केंद्र में कबीर ही होंगे.

किताब बार-बार घोषणा करती है  कि वह पुरुषोत्तम जी के पिछले तीस वर्षों के अथक परिश्रम का फल है. और यह भी कि इस किताब में आई स्थापनाएं और अवधारणाएं बीज रूप में वही हैं  जो ‘विचार के अनंत’ में थीं. क्या सचमुच ऐसा है? पहले हम यह देखते हैं कि इस किताब में कबीर विषयक स्थापनाएं क्या हैं. फिर थोड़ी चर्चा ‘विचार के अनंत’ के बीज विचारों की होगी ,ताकि पुरुषोत्तम जी के दावों को जांचा-परखा जाए. इसके साथ ही साथ यह तो देखने का प्रयास चलता ही रहेगा कि उनके तीस वर्षों के इस अथक परिश्रम ने कबीर को हमारे सामने किस रूप में उपस्थित किया है और इस प्रकार उनकी ‘कवि कबीर की खोज’ ने कबीर की कविता के बारे में हमारे मूल चिंतन में कैसा परिवर्तन किया है. इसी चर्चा में हमें आलोचक-विचारक पुरुषोत्तम की चिंतन की दिशा और उनकी हताशा का भी साक्षात्कार शायद हो जाए!

पूरी किताब मोटे तौर पर दो भागों में है. पहला और बड़ा हिस्सा कबीर के वक्त को पहचानने के लिए इतिहास और समाज विज्ञान की मान्यताओं से जिरह का भ्रम पैदा करती है. और दूसरा हिस्सा कबीर की कविताई पर है. यह देखना मनोरंजक है कि पहले हिस्से की मान्यताओं का दूसरे हिस्से की व्याख्याओं से रिश्ता दूर-दूर का ही है. पर रिश्ता तो है. क्योंकि कबीर की कविता तक पहुँचने के लिए , उसको पूरा पाने के लिए समय के विस्तार को और उसकी कारस्तानियों को समझना तो होगा. और पुरुषोत्तम का दावा है कि इसे समझने में जो सबसे बड़ी रुकावट है, वह है औपनिवेशिक काल में रची गयी और अब बद्धमूल हो गयी हमारी दृष्टि. जिसे वह ‘औपनिवेशिक ज्ञान-कांड’ कहते हैं. उनका दावा है कि इस ‘ज्ञान-कांड’ से मुक्त हो के देखें तो साफ़ दीखता है कि कबीर वैष्णव थे! और उनकी काव्य संवेदना के मूल में बनियों की संवेदना है!

किताब में कहीं लिखा है कि कबीर अपने को “जाति-कुल निरपेक्ष वैष्णवता के सर्वाधिक निकट पाते हैं- ‘भगती नारदी मगन सरीरा| इहि विधि भव तरे कबीरा’, कारण यह कि वैरागी जात-पांत की परवाह नहीं करते थे- ‘इन मुन्डीयन मेरी जात गंवायी|’ (पृष्ठ-१६३) फिर कुछ पृष्ठों बाद लिखते हैं- “शाक्त-साधना कबीर की जिज्ञासा का आरंभ या एक पड़ाव ही हो सकती थी, परिणति नहीं| वहाँ से शुरू करके वे नाथों, सूफियों के रास्ते से भी गुजरे और आखिरकार जो पहचान  उनके साथ चली, जिसे उन्होंने खुद अपनाया, वह वैष्णव की ही थी”.(पृष्ठ-१८६) अर्थात कबीर वैष्णव ही थे. ये रामानंदी वैष्णव थे , स्मार्त नहीं. स्मार्त वैष्णव तो तुलसीदास थे. रामानंदी वैष्णव तो जाति-कुल निरपेक्ष थे. परन्तु अग्रवाल जी ने कहीं ये नहीं दिखाया है कि भक्ति के अलावा भी क्या रामानंदी वैष्णव जीवन के हर क्षेत्र में जाति व्यवस्था को नकार देते थे. जैसा कि नाथों के यहाँ था. कबीर के जिन पदों का हवाला अग्रवाल  देते हैं उनमें किसी भी पद में कबीर सीधे सीधे खुद को वैष्णव उसी तरह नहीं कहते जैसे खुद को जुलाहा कहते हैं. फिर वैष्णवों को भी धिक्कारते हुए कहते ही हैं कि ‘ वैष्णव भया तो क्या भया, बूझा नहीं विवेक’. पूरी किताब में उस विशेष परिस्थिति और सन्दर्भ की अनदेखी है जहां से कबीर नारद भक्ति और रामानंदी वैष्णवता दोनों की आलोचना करते हुए भक्ति और व्यक्ति दोनों की और इस प्रकार अपने आस-पास के व्यापक समाज की मूलगामी व्याख्या करते हैं. अग्रवाल जी ने नीची जातियों के बीच वैष्णवता की स्वीकार्यता के साक्ष्य के लिए विलियम क्रुक का उदाहरण दिया है. और इस जगह अग्रवाल कहीं ये सवाल  नहीं उठाते कि खुद क्रुक अग्रवाल के अनुसार बताई गयी रामानंदी वैष्णवता को कैसे समझ रहे थे. दरअसल यह भी एक विशेष चयन है. बाकी चिन्तक जो उपनिवेश काल में भक्ति और जाति पर विचार कर रहे थे वो तो खैर गैर ऐतिहासिक और ‘औपनिवेशिक- ज्ञानकाण्ड’ की तैयारी में थे, परन्तु क्रुक की बातें रोज़मर्रा की वास्तविकता को  देख रही थी. इसलिए “ ‘निम्न’ जातियों के वैष्णव पंथों की विशेषता विलियम क्रुक ने बिलकुल ठीक पहचानी थी- “ ब्राह्मणों के वर्चस्व और विशेषाधिकारों का विरोध करते हुए, सार्वजनिक उपासना के पवित्रतर और अधिक बौद्धिक रूपों की प्रतिष्ठा”. इस प्रकार कबीर के समय को और क्रुक के समय को लगभग एक मानते हुए अग्रवाल जी सामाजिक परिवर्तन की गैर ऐतिहासिक समझदारी तक पहुँच जाते हैं. अगर क्रुक की बात सही थी तो यह भी सही था कि कबीर और अन्य निर्गुनियों ने वर्णाश्रम  की जो मूलगामी आलोचना की थी वह सगुण भक्ति के प्रभाव और ब्राह्मण धर्म के १७वीं सदी के अंत और १८वीं सदी में होने वाले पुनरुत्थान के बाद भी अपनी विशेषताएं बहुत हद तक बचाए रखा था. अकारण  नहीं कि ऊपर से खुद को वैष्णव मानते हुए भी ये ‘निम्न जातियां’ ब्राह्मण धर्म  के बरक्स अपने को ज्यादा ‘प्रगतिशील’ बनाए रखीं थीं. वैसे यह भी जानने लायक है कि क्या सचमुच ये जातियां खुद को वैष्णव कहती थीं? या फिर क्रुक ने अपनी तरफ से इन्हें वैष्णव मान लिया था? क्रुक उन्नीसवीं सदी के अंतिम दशक में नोर्थ वेस्ट प्रोविंस और अवध का सर्वेक्षण कर रहे थे. २०वीं सदी के पहले दशक के शुरुआत में ही ग्रियर्सन को किसी मिशनरी मि. डन ने चिट्ठी लिखा  था. मि. डन ने इलाहाबाद ,दिल्ली और गुडगाँव जिलों के अपने १९ साल के अनुभव के आधार पर तुलसी के बारे में ग्रियर्सन की बात की पुष्टि की, तथा लिखा की तुलसी के दोहे या चौपाइयों को सुनांने से प्रशासकों का काम कितना आसान हो जाता है क्योंकि लोग तब उनसे अपना जुड़ाव महसूस करते हैं. लेकिन उसने अपने पत्र में यह भी बताया था कि कबीर के दोहे भी उतने ही लोकप्रिय हैं. हिंदू ब्राह्मण और बनियों के बीच तुलसी ज्यादा स्वीकार्य थे जबकि The influence of Kabir is, I think fully important, in fact, Kabir touches races and castes who have little in common with Krishanism and who know little of राम दशरथ का बेटा, but much of राम जग का करता, as they phrase it (and pronounce it too.) Kabir is, if I mistake not the great Guru of kolis and chamars as well as many higher in the scale. (pp.462-63)(Appendix 1 , On The Influence Exercised by Tulasi Das in Western Hindostan .JRAS- 1903.) मि. डन को ये निम्न जातियां वैष्णव नहीं लगी थीं!

द्विवेदी जी के यहाँ कबीर ‘अवैष्णव नहीं थे’. अग्रवाल जी के यहाँ वह सीधे वैष्णव हो गए. सामाजिक और धार्मिक पहचानों की ऐसी व्याख्याएं कबीर के भीतर के उस ऐतिहासिक क्षण को अनदेखा करता है जहां श्रम में निहित विचारधारा, उधार ली गयी विचारधाराओं पर विजय पा लेती है. कबीर के भीतर का जुलाहा अपने श्रम की विचारधारा जब पहचान जाता है तो उसके लिए धर्म और वर्णाश्रम जैसे भेदपरक प्रवर्ग और शोषणपरक व्यवस्थाओं का सच भी सामने आ जाता है. कबीर के काव्य में जो निषेधपरक शब्दावलियों की इतनी भरमार है वह उनके चिंतन पद्धति की भी एक खास विशेषता है. और वह है सत्य को निषेध के निषेध के रूप में पहचानने और समझने की कोशिश. कबीर की सहज दृष्टि, उनके सहज तर्क और प्रत्यक्ष अनुभव को महत्व देने की घोषणा अर्थात उनके अनुभव सम्मत विवेकवाद ने ‘निषेध के निषेध’ को उनकी काव्य युक्ति में बदल लिया है. और जहां तक वैष्णव होने की बात है ,कबीर का यह पद हमें कुछ और ही बता रहा है-

माटिक कोट पषानक ताला, सोई बन सोई रखवाला|
सो बन देखत जीव डेराना, ब्राह्मण वैष्णव एकै जाना|
जौ रे किसान किसानी करई, उपजै खेत बीज नहिं परई |
छांड़ि देहु नर झेलिक झेला, बूडे दोऊ गुरु औ चेला|
तीसर बूडे पारधि भाई, जिन बन डाहो दावा लाई|
भूँकि भूँकि कूकुर मरि गयऊ, काज न एक सियार से भयऊ|
मूस बिलाय एक संग, कहु कैसे रहि जाय|
अचरज एक देखहु हो संतो, हस्ती सिंघाहि खाय||(रमैनी ६०,रामकिशोर शर्मा संपादित)

मिट्टी के किले पर पत्थर का ताला लगा है. चारो तरफ साधनाओं का जंगल है . इनको देख के जीव डरता है. साधनाओं के इस जंगल के अलग-अलग रखवाले हैं. और सब जड़ हैं पत्थर के ताले जैसे हैं. फिर वो ब्राह्मण हो या वैष्णव. ये खुद भी डूबेंगे और अपने चेलों को भी डुबायेंगे. ये अपना फायदा खोजने वाले सियार हैं जिनसे किसी काम के संभव होने की आशा करना भी मूर्खता है. कबीर किसी संशय में नहीं थे. उन्हें साफ़ पता था कि ऊपर-ऊपर की भिन्नता रखने वाले ब्राह्मण या वैष्णव, सब माया के जंजाल के वशीभूत हैं. इनके सहारे मुक्ति की आशा व्यर्थ है. इनकी साधना झूठी है. ऎसी स्थिति में कबीर के कुछ पदों में वैष्णवों के प्रति थोड़ी सहानुभूति देख कर अग्रवाल जी कबीर को भी वैष्णव घोषित कर देते हैं. और हमारी समझ से यह भूलवश नहीं है. इसके पीछे भी एक राजनीतिक दृष्टि है. और वह है गांधी के वैष्णवता को कबीर से जोड़ने की राजनीति. इस किताब में कम से कम तीन जगहों पर ‘देशज आधुनिकता’ और गांधी के दर्शन की साम्यता तो स्पष्ट की ही गयी है. लब्बो लुआब यह है कि ‘औपनिवेशिक ज्ञान कांड’ का सार्थक प्रतिउत्तर गाँधी के देशज आधुनिकता में है, और यह ‘देशज आधुनिकता’ कबीर की ही परम्परा में है. कबीर वैष्णव थे और ‘वैष्णव जन ते..’ गाने वाले गांधी सच्चे कबीर पंथी!

पुरुषोत्तम जी ने यह भी दिखाया है कि मध्यकाल में व्यापार के विकास ने बनियों को एक समृद्धि और रूतबा दिया. इस कारण बनियों के यहाँ मिलने वाला ‘फेयर प्ले’ का एथिक्स समाज में भी अपनी उपस्थिति दर्ज कराता है. और इस प्रकार वर्णाश्रम को चुनौती देते हुए जन्म-आधारित भेद भाव को चुनौती देता है. बनिया समाज दरअसल पुरुषोत्तम जी की ‘देशज आधुनिकता’ का अग्रदूत था. और इस प्रकार कबीर की ‘आधुनिक चेतना’, उनका वर्णाश्रम विरोध, समानता की घोषणा बनिया समाज के एथिक्स का ही काव्य संवेदन में रूपांतर था. और पुरुषोत्तम जी ने साबित करना चाहा है कि कंजूस बनियों का मिथक तो औपनिवेशिक काल की उपज है. वरना कबीर ने तो खुद अपने साईं को ही बनिया कहा था. बेवकूफ बनियों का मिथक झूठा है. पुरुषोत्तम जी दस्तकारों और ‘निम्न जातियों’ की संवेदना को कबीर में रूपांतरित होने पर चलताऊ ढंग से टिप्पणी करते चलते हैं जबकि बनियों कि संवेदना और कबीर पंथ में उनकी उपस्थिति पर विस्तार से और जब भी मौक़ा मिलता है चर्चा करते हैं. बालाघात का यह अंतर निम्न जातियों से आने वाले दस्तकारों के आत्मविश्वास और उस आत्मविश्वास में निहित क्रान्तिकारी चेतना से कबीर की काव्य-संवेदना को अलग करने की प्रक्रिया में है. अग्रवाल जी लिखते हैं- “व्यापारी और दस्तकार उस कवि से निश्चय ही अपनापा महसूस कर सकते थे, जो अपने राम को, साईं को कभी रंगरेज बना देता था, कभी ‘बाणियाँ’. जो कविता में भी अपनी कल्पना तरह-तरह की दस्तकारी के काम करने वाले कारीगर के रूप में भी करता था, और दूकानदार व्यापारी के रूप में भी. जो सार्थक जीवन बिताने के संतोष को उस दुकानदार की भाषा देता था, जिसने सौदा पूरा बेच लिया है, इसलिए जिसे हाट में दुबारा आने की ज़रूरत नहीं रही-“ पूरा किया बिसाहुणाँ,बहुरि न आवौं हट्ट.” और जो जीवन व्यर्थ गवां देने की चूक को भी वाणिज्य का अवसर गवां देने के रूपक में ही बांधता है- “कहे कबीर कछू बनिज न कीयौ, आयौ थौ इहि हाटि’ (ग्रंथावली, राग केदारी,१४) जो अपने मन को, लाभ के लोभ में मूल ही न गवां बैठाने की चेतावनी भी सावधान व्यापारी के लहजे में ही देता है-“मन बंजारा जागी न सोई| लाहे कारनि मूल न खोई” (ग्रंथावली,राग बिलाबल,६) “(पृष्ठ-१४४) कविता के रूपकों और प्रतीकों को अगर इस तरीके से पढ़ा जाए तो फिर निम्न पद का क्या मतलब निकलेगा –

मन बनियाँ बनिज न छोड़ै|
जनम जनम का मारा बनियाँ, अजहूँ पूर न तौले |
पासंग के अधिकारी लैले,    भूला    भूला    डोलै|
घर में दुविधा कुमति बनी है, पल पल में चित तोरै|
कुनबा वाके सकल हरामी,  अमृत  में  विष   घोलै|
तुमहीं जल में तुमहीं थल में , तुमही घट घट बोलै |
कहै कबीर या वा सिष को डरिये, हिरदे गाँठि न खोलै | (कबीर-वाणी, १५९)

क्या यहाँ ‘कबीर की संवेदना और व्यापारियों के बीच आत्मीयता पर रोशनी’ पड़ रही है? साई को बनिया बताने वाले कबीर, मन को भी बनिया बताते हैं. हमेशा डाँड़ मारने वाला बनिया. कभी पूरा न तौलने वाला बनिया. कुमति का मारा बनिया. अमृत में भी विष घोलने वाला बनिया. मिलावट का व्यापार करने वाला बनिया. ऐसे बनियों का तो पूरा कुनबा ही ‘हरामी’ है. इन ‘हिरदे गाँठि न खोलै’ बनियों से तो हमेशा डरना चाहिए. अब अगर पुरुषोत्तम जी के ही तर्क पर चलें तो बनियों के ‘फेयर-प्ले’ के एथिक्स का तो कबीर ने चिंदी-चिंदी कर डाला है इस पद में. और कंजूस बनियों के छवि निर्माता ‘औपनिवेशिक आधुनिकता’ से उसका यह महान योगदान छीन लेते हैं कबीर! कवि कबीर की खोज क्या ऐसे ही आधारहीन साक्ष्यों पर होगी! वास्तव में पुरुषोत्तम जी को बनियों के एथिक्स के सहारे कबीर की कविता के मूल में निहित उस क्रांतिकारी संवेदना से ध्यान हटाना था जिसे हम ‘अनुभवसम्मत विवेकवाद’ कहते हैं. और यह ‘अनुभवसम्मत विवेकवाद’ शास्त्रों के विवेकवाद को नकारने वाला और ‘आखिन देखि’, प्रत्यक्ष अनुभव को अभिव्यक्त करने वाला ‘निम्न जातियों’ से आये कामगारों के यहाँ ही संभव था. वर्णाश्रम की मूलगामी आलोचना और धर्म मात्र की मूलगामी आलोचना के पीछे भी इसी को मानना चाहिए. और हाँ कबीर की काव्य संवेदना को बनियों की संवेदना बताने के खतरनाक खेल से बाज आना चाहिए. और कबीर की कविता को अपनी मान्यताओं की पुष्टि के लिए इस्तेमाल करने की साजिश का विरोध करने वाले पुरुषोत्तम जी के खुद के वैचारिक पूर्वग्रह भी यहाँ स्पष्ट ही हैं. और कौन जाने जैसे जैनियों को बनियों ने संरक्षण दे कर उसकी क्रांतिकारी अंतर्वस्तु को खान पान तक की शुद्धता और अहिंसा तक सीमित किया कहीं वही हाल कबीर पंथों में बनियों की उपस्थिति ने तो पैदा नहीं किया! बहरहाल यह शोध का विषय है. इस ओर थोडा इशारा मोनिका हर्टस्मान ने भी किया ही था.(देखें संवेद, जुलाई २०१०. पृष्ठ-१९२-१९३)

आइये थोडा रुक कर बात कबीर की नारदी भक्ति पर भी करते चलते हैं. पुरुषोत्तम जी का कहना है कि कबीर खुद अपनी भक्ति को नारदी मानते हैं. ‘भक्ति नारदी मगन सरीरा’. जायसी कहते हैं कि कबीर नारदी भक्ति के इतने बड़े साधक थे कि इस साधना में खुद नारद भी उनसे पीछे छूट गए. ‘ना नारद तब रोइ पुकारा, एक जुलाहे सो मैं हारा’. यह बात पुरुषोत्तम जी को नामवर जी ने एक निजी बातचीत में कहा था. किताब के दूसरे संस्करण में इसका उल्लेख पुरुषोत्तम जी ने किया है. रुक कर सोचने वाली बात यह है कि जायसी ने कबीर को नारदीय भक्ति के आदर्श नारद से भी आगे जाने वाला क्यूँ कर कहा है. कबीर की भक्ति में वो कौन सी बात है जो उसे नारद सूत्र में निरुपित भक्ति से भी आगे ले जाती है. कबीर क्यूँ कर नारदीय भक्ति को ट्रांसैन्ड कर पाए. नारद भक्ति सूत्र उस प्रक्रिया की ओर इशारा करता है जो १०वीं सदी के अनन्तर समूचे यूरेशिया में घटित हो रहा था. इसे द्विवेदी जी शास्त्रों का लोक की तरफ झुकना कहते हैं. और शेल्डन पोलक देश्यभाषाकरण की व्यापक प्रक्रिया के सहारे व्याख्यायित करते हैं. जिस प्रकार संस्कृत- अपभ्रंश की सार्वत्रिक और अर्द्ध सार्वत्रिक संस्कृति को विस्थापित कर देशी भाषाओं में साहित्य रचना शुरू हुई उसी प्रकार धर्म साधनाओं के पुराने शास्त्रों को स्थानीय धर्ममतों ने चुनौती दी. इस प्रक्रिया में ही भक्ति संबंधी पुराने शास्त्रीय चिन्तनों को ज्यादा लोकोन्मुख और स्थानीय विशेषताओं से जोड़ने की कोशिशें भी हुई. यह एक दुहरी प्रक्रिया थी जहां लोक का शास्त्रीकरण भी ओ रहा था और शास्त्रों का लौकिकीकरण भी. उत्तर भारत में देश्यभाषाकरण की प्रक्रिया जैसे तुर्क सत्ता और उसके साथ आये इस्लाम और सूफी तत्वों के भिन्न सांस्कृतिक-राजनीतिक हस्तक्षेप से शुरू हुई उसी प्रकार भक्ति आदि के चिंतन के लौकिकीकरण पर भी इस भिन्न सांस्कृतिक हस्तक्षेप का प्रभाव पड़ा. मध्यकाल के वैष्णव भक्त विश्वनाथ ने कहा कि ‘प्रेम ही परम पुरुषार्थ है- प्रेमाः पुमर्थो महान्’. ऐसा पहले कभी नहीं कहा गया था. चार पुरुषार्थों के अतिरिक्त प्रेम न केवल पांचवां पुरुषार्थ माना गया वरन् इसे अन्य पुरुषार्थों से ज्यादा श्रेष्ठ भी कहा गया. भक्तों के लिए और सारे पुरुषार्थ कोई अर्थ नहीं रखते. क्या यह सूफियों का प्रभाव नहीं था. उसी तरह नारद भक्ति सूत्र में भी भक्ति को ‘परप्रेमरूपा’(२) ‘अमृतस्वरूप च’ (३) कहा गया. यहाँ अनिर्वचनीय को सीधे प्रेमस्वरुप ही माना गया.( अनिर्वचनीयं प्रेम्स्वरूपम् .५१.) प्रेम की ऎसी प्रतिष्ठा में सूफियों का प्रभाव था. चाहे पाकपत्तन के बाबा फरीद हों या लोरिक चन्दा की प्रेमकहानी गाने वाले मुल्ला दाउद. देशी भाषाओं में प्रेम को प्रतिष्ठित करने वाले ये सूफी ही उत्तरभारत की देशी भाषाओं के पहले पहल कवि थे. बहरहाल चाहे वो विश्वनाथ हों या नारद भक्ति सूत्रकार, भक्ति और प्रेम की यह जाति-कुल निरपेक्षता भक्ति के विशेष क्षेत्र में ही सीमित था. रोज़मर्रा की आम ज़िंदगी में वैष्णवों को शास्त्र-सम्मत आचरण करने होते थे. ऐसा नारद भक्ति सूत्रों से भी स्पष्ट है.  कबीर ने नारदीय भक्ति को ठीक वैसे ही स्वीकार नहीं किया. नारद भक्ति सूत्र में भक्ति के लिए जाति-कुल और कर्मकांड तथा लोक-वेद दोनों को अस्वीकार किया था, ऐसा उन सूत्रों को समग्रता में पढने पर सही नहीं लगता. भक्ति के क्षेत्र में समानता की चर्चा तो एक हद तक रामानुजम के यहाँ भी थी.फिर भक्ति के आदर्श उदाहरण के रूप में गोपियों की कृष्ण के प्रति प्रेम को बताया गया है. लेकिन ये प्रेम कैसा होगा और किस तरीके से होगा इसका उल्लेख नहीं किया गया है क्यूंकि यहाँ सूत्रकार सीधे भागवत में वर्णित गोपी-कृष्ण लीला को अप्रत्यक्ष रूप से संदर्भित मान रहा होता है. इसके अलावा निम्न सूत्रों को पढ़ने से हमें धर्म और वर्णाश्रम की कबीर द्वारा की गयी मूलगामी आलोचना और नारद भक्ति सूत्रों के अंतर का भी पता चलता है.

११.लोकवेदेषु तदानुकूलाचारणं तद्विरोधिषूदासीनता ||
१२.भवतु निश्चयदाढ्रयांदृध्व शास्त्ररक्षणम् ||
१३. अन्यथा पतित्यशंकया ||
१४. लोकोऽपि तावदेव भोजनादि व्यापारस्त्वाशरीरधारणावधि||
६१. न तदसिद्धौ लोकव्यवहारो हेयः किन्तु फलत्यागस्तत्साधनं च कार्यमेव||
६२. स्त्रीधननास्तिकचरित्रं न श्रवणीयम्|| (फिर भी स्त्री विरोधी दृष्टि के पीछे नाथपंथियों का प्रभाव बताते हैं अग्रवाल!,जबकि वर्णाश्रम की कठोर आलोचना करने वाले नाथों के बदले जाति-निरपेक्ष भक्ति के लिए नारदीय भक्ति सूत्र को ज़िम्मेदार मानते हैं! प्रेम के लिए भी नारदीय सूत्र, सूफियों का प्रभाव नहीं! यह उलटबांसी नहीं तो क्या है.)
७३. वादो नाव्लम्ब्यः ( कबीर खूब वाद करते हैं, और यह अग्रवाल जी के लिए नाथों का प्रभाव नहीं है!)
७६. भक्तिशास्त्राणि माननीयानि तादुद्धोधककर्माणि करणीयानि||

दस्तकारों और कामगारों के बढ़ते दबाव ने भक्ति के क्षेत्र में समानता को सामाजिक क्षेत्र में समानता के दावों में रूपांतरित किया. अकारण नहीं कि रामानंद के पहले निम्न जातियों के कामगारों की इतनी स्वीकृति नहीं थी. और कबीर ने इस दबाव को काव्य में रूपांतरित करते हुए धर्म और वर्णाश्रम की मूलगामी आलोचना की. यह अंतर इतना स्पष्ट है कि इसे किसी भी प्रकार से नारदीय भक्ति के पूर्ण स्वीकार में रिड्यूस नहीं किया जा सकता है. और न ही रामानंदी वैष्णवता की चादर में छुपाया जा सकता है. प्रेम अगर भक्ति है और केवल यही भक्ति है तो सहज प्रेम में रूकावट डालने वाले सारे मिथ्या जंजालों को भी खतम किया जाना ज़रूरी है. कबीर ने अपनी पिछली सारी परम्पराओं की आलोचना अपने सहज कामगार चित्त से की थी. और यही कारण है कि वो नाथों से लेकर नारद भक्ति और रामानंदी वैष्णवता सबको ट्रांसैंड कर जाते हैं. पुरुषोत्तम इसे बताना नहीं चाहते लेकिन प्रेम के अमर गायक जायसी इसे देख भी रहे थे और कह भी रहे थे. यहीं आकर वो उस जुलाहे से हार मान लेते हैं. कबीर के इस क्रिटिक का अग्रवाल के वैष्णव थीसिस में कोई जगह नहीं है. लेकिन कबीर पंथियों की सहज चेतना में यह लगातार रहता आया है. कई तरह के दबाव और अप्प्रोप्रियेशन के बाद भी. क्षितिमोहन सेन ने कबीर पंथी साधुओं से सुन कर जो पद इकट्ठे किये थे उनमें कबीर के नाम से यह पद भी शामिल था. कबीर यहाँ खुद नारद को संबोधित करते हैं-

नारद, प्यार सो अंतर नाहीं |
प्यार जागै तौही जागूं  प्यार सोवै तब सोऊँ ||
जो कोई मेरे प्यार दुखावै जड़ा-मूल सों खोऊँ||
जहां मेरा प्यार जस गावै तहां करौं मैं बासा||
प्यार चले आगे उठ धाऊँ मोहि प्यार की आसा||
बेहद्द तीरथ प्यार के चरननि कोट भक्त समाय||
कहैं  कबीर प्रेम  की महिमा प्यार देत बुझाय|| (२-१११, कबीर वाणी)

जो कोई भी मेरे प्यार को कष्ट देगा , उसके रास्ते में बाधा डालेगा, मुझसे दूर करने की कोशिश करेगा, दुनिया के जंजाल में फाँसेगा, अलग-अलग पंथों में भटकायेगा, ऊंच नीच का बाज़ार चलाएगा, बाह्याचार में उलझायेगा फिर चाहे वो ब्राह्मण हो या वैष्णव, शाक्त हो या वैरागी, योगी हो या अवधू , हिंदू हो या तुरक, काजी हो या पंडित, उसे मैं जड़-मूल से वंचित कर देता हूँ. नारद! प्रेम में अंतर नहीं होता, भेद नहीं होता. अर्थात नारद भक्ति में जो प्रेम का अंतर दिखाया गया है या उसका पालन किया जाता रहा है ,कबीर को वह स्वीकार नहीं. कबीर की मूलगामी आलोचना की यह प्रखरता कबीर पंथी साधुओं के चित्त से पूरी तरह धुल नहीं गयी थी. भले ही पुरुषोत्तम जी ‘औपनिवेशिक ज्ञानकाण्ड’ के सहारे यह मनवाने की कोशिश करते हों. भले ही पुरुषोत्तम गांधी को वैष्णव कबीर की परम्परा में शामिल करने का मिथ्या भ्रम फैलाते हों.

कबीर और नारद भक्ति के बीच के इस अंतर को समझने पर हमें यह भी समझ आने लगता है कि क्यों पुरुषोत्तम जी भक्ति के निर्गुण-सगुण विभाजन के बदले शास्त्रोक्त और काव्योक्त भक्ति के विभाजन को प्रस्तावित करते हैं. निर्गुण और सगुण भक्ति के साथ भक्ति के सामाजिक आधारों की स्पष्ट पहचान जुडी है. एक बार अगर यह पहचान इससे अलग कर दिया जाए तो कबीर आदि निर्गुनियों की प्रखर चेतना का महत्व भी धूमिल  हो जाएगा. पुरुषोत्तम जी कहते हैं कि नारद भक्ति सूत्र में प्रस्तावित भक्ति दरअसल शास्त्र से मुखामुखम करती कविता की स्वतंत्र संवेदना वाली भक्ति है. इसी भक्ति को रामानंद ने भी स्वीकार किया था. इसलिए यह गीता या भागवत में वर्णित भक्ति से अलहदा है. इस प्रकार नारद भक्ति सूत्र काव्योक्त भक्ति की प्रस्तावना रखता है. अगर केवल इसी मान्यता को ध्यान में रखें तब तो हिंदी के सारे भक्त कवि काव्योक्त भक्ति में समाहित हो जाएंगे. क्या सूर सिर्फ भागवत में वर्णित लीलाओं का अनुवाद कर रहे थे? या तुलसी ही ‘नानापुराण निगमागम सम्मत’ कहने मात्र से अपनी कविता में शास्त्रों का अनुवाद कर रहे थे? अगर वह अनुवाद मात्र होता तो कविता की लिहाज से कतई महत्वपूर्ण नहीं रह जाता. दरअसल जिसे काव्योक्त भक्ति कहा जा रहा है उस लिहाज से हिंदी के सारे भक्त कवि काव्योक्त भक्ति के अंतर्गत ही आ जायेंगे. इसलिए यह विभाजन निर्गुण भक्ति काव्य में निहित उस क्रांतिकारी चेतना की अवहेलना है जिसके दांत सगुण भक्ति ने उखाड़ दिए थे. पुरुषोत्तम जी का कहना है कि भक्ति काल में निर्गुण और सगुण का वैसा विभाजन नहीं था जैसा बाद में पंथों ने खडा किया था. तो क्या दार्शनिक स्तर पर सूर के भ्रमर गीतों की प्रखर निर्गुण आलोचना और सामाजिक स्तर पर  साखी,सबदी दोहरा गाने वाले निर्गुनियों को तुलसी की फटकार महज धोखा है? खुद पुरुषोत्तम जी १९९२ में जब ‘भक्ति संवेदना: शास्त्र और काव्य का मुखामुखम’ लिख रहे थे तो सर्जनात्मक शब्द के व्यापक पोलिटिक्स को शास्त्रों के बरक्स केंद्र में रखने की अपील कर रहे थे. उनके ध्यान में राम के नाम पर होने वाली हिंदू फासिस्ट राजनीति के समक्ष खुद सर्जनात्मक शब्द की राजनीति को रखने का आग्रह था. आग्रह था कि ‘हिंदू’ जाति की जो एक समस्याविहीन,आतंरिक संघर्षरहित राजनीतिक इकाई के रूप में जो राष्ट्रीय आख्यान  रचा गया था उसने साहित्यिक विरासत का मूल्यांकन करने के जो ‘नोर्म’ बनाए थे उसके सामने भक्ति काव्य की सर्जनात्मक चेतना को प्रतिष्ठित किया जाए. भक्तिकाव्य के ऊपर हिंदी-हिंदू का समीकरण लादने के बजाये, “हिंदू जातिपरक नार्म के समक्ष इसे नतमस्तक करने की बजाय यदि इसके अपने स्वरुप को परखा जाए तो स्पष्ट होगा कि इसमें समाज के आतंरिक उपनिवेशीकरण की तीखी आलोचना व्यक्त हुई है”( विचार का अनंत, पृष्ठ-१३०). इस प्रकार हिंदू फासीवादी राष्ट्रीय आख्यान के उत्तर में वह आतंरिक रूप से विभाजित हिंदू अस्मिता और उसके भीतर के उपनिवेशीकरण की तीखी आलोचना करने वाली निर्गुण काव्य संवेदना को सामने रखने की कोशिश कर रहे थे. और उनका आग्रह था कि ‘साहित्य की अन्याभिमुखता को श्रेयस्कर मानने वाली साहित्यिक दृष्टि का भद्रलोकीय आत्मछवियों से जो गहरा सम्बन्ध’ रहता आया है, वह भद्र लोक ‘उपनिवेशीकरण से अत्यंत क्षुब्ध है, लेकिन आतंरिक उपनिवेशीकरण से सर्वथा बेखबर’. आज जब खुद पुरुषोत्तम आतंरिक उपनिवेशीकरण को भूल कर उपनिवेशीकरण से ही केवल क्षुब्ध हैं. जब आतंरिक उपनिवेशीकरण के ब्राह्मणवाद रुपी विचारधारा को खुद ही उपनिवेशीकरण की उपज बता रहे हैं, तब कबीर आदि के सर्जनात्मक शब्द को, उनकी प्रखर ब्राह्मणवाद-विरोधी चेतना को, ‘देशज आधुनिकता’ जैसे मुल्लमे से छुपाने की कोशिशों को क्या कहा जाएगा! अगर वो सचमुच अन्याक्रांत न होकर समाज को आगाह करने और सर्जनात्मक सब्द को स्थापित करने का दावा कर रहे हैं तो फिर उन्हीं के शब्दों में कहना होगा कि “इस दायित्व को निभाने की उत्सुकता और साहित्य के स्वत्व की चिंता यदि सच्ची है तो फिर मुक्तिबोध के मुहावरे का सहारा लेकर यही कहा जा सकता है कि ‘पार्टनर पहले अपनी पॉलिटिक्स साफ़ कर लो” (वही, पृष्ठ- १३१)

कबीर की कविता धर्मसत्ता के बरक्स धर्मेतर अध्यात्म को प्रतिष्ठित करने वाली कविता है. अग्रवाल जी की यह स्थापना सचमुच विचारोत्तेजक है . लेकिन दुर्भाग्य यह है कि पूरी बात-चीत में धर्म और धर्मेतर अध्यात्म दोनों ही एक पार-ऐतिहासिक(transhistorical) पद की तरह आये हैं. ठीक उसी तरह जैसे फायरबाख के यहाँ आये थे. मार्क्स की १८४४ की आर्थिक और दार्शनिक पांडुलिपियों में आये धर्म संबंधी चिंतन को उनके बाकी लेखन से काट कर पढ़ने पर ऐसे निष्कर्ष आते रहे हैं. वह भी तब जब पुरुषोत्तम जी के लिए श्रम के अलगाव से मुक्ति का ऐतिहासिक सन्दर्भ या मार्क्सवाद महज पश्चिमी प्रबोधन के बाध्यकारी आख्यान दिखते हों. बहरहाल ज्यादा विस्तार में न जाते हुए मैं उसी पाण्डुलिपि के सहारे अपनी बात रखने की कोशिश करता हूँ. पूरे विवाद के लिए अलग से किसी लेख की ज़रूरत है.

अग्रवाल जी ने बड़ी चालाकी से मार्क्स का सहारा लेकर श्रम और आध्यात्मिकता के अलगाव और उनके वस्तूकरण को दो अलग अलग घेरों के रूप में व्याख्यायित किया है. हांलाकि बाद में यह जोड़ना नहीं भूलते कि दोनों परस्पर सम्बंधित हैं. कैसे सम्बंधित हैं इस पर विचार नहीं है. और जहां मार्क्स ने विचार किया भी है उस हिस्से को अपने हिसाब से उपयोग में लाते हैं. मैं इस बात को दिखाने के लिए पहले अग्रवाल जी को उद्धृत करूँगा फिर मार्क्स को. मार्क्स को सीधे अंग्रेजी में उद्धृत करूँगा ताकि अनुवाद की दिक्कत से अर्थ सम्प्रेषण में दिक्कत न हो जाए. अग्रवाल लिखते हैं-

मनुष्य की आत्मसत्ता प्रकृति को ज्यों का त्यों अपना लेने की बजाय, उसके साथ आवयविक अस्तित्व में बने रहने की बजाय प्रकृति के साथ सह-अस्तित्व, प्रेम और संघर्ष के रूप में फलीभूत होती है. इस क्रम में सामजिक संगठन भी बनता है और मनुष्य की स्वतः स्फूर्त गतिविधियां –कल्पना और श्रम- उसके लिए परी हो जाती है; और तब : “मनुष्य की प्रजाति सत्ता (स्पेसीस बीइंग) भी उससे छीन  जाती है. उसकी प्रकृति और मनुष्य होने के नाते उसकी प्रजाति की विशिष्ट संपदा- आध्यात्मिकता- दोनों उससे छीन जाती हैं. दोनों(उसका स्वभाव न रहकर) उसके व्यक्तिगत अस्तित्व का साधन-मात्र रह जाती हैं. मनुष्य की देह पराई हो जाती है और ठीक उसी तरह पराई हो जाती है : उसकी बाहरी प्रकृति तथा उसकी अध्यात्म सत्ता- उसकी मनुष्य सत्ता.(पृष्ठ-३२४)

अब मैं मार्क्स को सीधे उद्धृत करता हूँ. ध्यान दे कि श्रम से अलगाव का रिश्ता आध्यात्मिक अलगाव से कैसे जुडता है और अग्रवाल कहाँ उसे अलग कर रहे होते हैं.

It is just in his work upon the objective world, therefore, that man really proves himself to be a species-being. This production is his active species life. Through this production, nature appears, as his work and his reality. The object of labour is, therefore, the objectification of man’s species-life: for he duplicates himself not only, as in consciousness, intellectually, but also actively, in reality, and therefore he sees himself in a world that he has created. In tearing away from man the object of his production, therefore, estranged labour tears from him his species life, his real objectivity as a member of the species, and transform his advantage over animals into the disadvantage that his inorganic body, nature, is taken away from him.
Similarly, in degrading spontaneous, free activity to a means, estranged labour makes man’s species-life a means to his physical existence.
The consciousness which man has of his species thus transformed by estrangement in such a way that species [-life] becomes for him a means.
Estranged labour turns thus:
(3)Man’s species-being, both nature and his spiritual species-property, into a being alien to him, into a means for his individual existence. It estranges from man his own body, as well as external nature and his spiritual aspect, his human aspect.”(EPM, pp. 74,progress publishers,1977.)

अपने श्रम के उत्पाद से, अपने जीवन के क्रिया-कलापों से, अपने प्रजाति सार से अलगाव का तत्काल परिणाम होता है मनुष्य का मनुष्य से अलगाव. जो सम्बन्ध किसी मनुष्य का अपने काम से होता है, अपने श्रम के उत्पाद से होता है वही सम्बन्ध उसका दूसरे मनुष्यों से भी होता है, दूसरे मनुष्यों के श्रम से होता है और उस श्रम की वस्तु से होता है.

Hence within the relationship of estranged labour each man views the other in accordance with the standard and the relationship in which he finds himself as a worker.(pp.75)

इस प्रकार श्रम के परायेपन की अभिव्यक्ति और उपस्थिति वास्तविक जीवन में कैसे होती है ? मार्क्स यह सवाल करते हैं. अगर श्रम का उत्पाद हमसे अलग है एलियन है तो आखिर है किसका? अगर हमारी अपनी क्रियाएँ हमारी नहीं है, किसी के द्वारा मजबूर की गयी हैं,  तो वह दूसरा कौन है. एक सत्ता (बीईंग) जो मैं नहीं है. कौन है वह सत्ता? मार्क्स कहते हैं वह सत्ता इश्वर है. जो अपने वास्तविक एजेन्ट पुरोहितों आदि से हमारे आत्म पर कब्जा जमाए बैठा रहता है. (pp.75-76) इतिहास के अलग-अलग काल खण्डों में यह इश्वर श्रम के दूसरे ठेकेदारों से समझौता करता चलता है. कबीर के समय केवल इश्वर की सत्ता थी. उस सत्ता के वास्तविक एजेंट अलग-अलग संप्रदायों के ठेकेदार थे. मनुष्य-से मनुष्य को बांटने वाला वर्णाश्रम था. ब्राह्मणवादी सत्ता तंत्र था. अपने श्रम के अलगाव को समझने और मुक्त होने के क्रम में ही इस पूरी व्यवस्था का मूलभूत नकार कबीर के यहाँ संभव हुआ. इसी ने उनके प्रजाति-सत्ता को मुक्त किया. इसी कारण उनकी कविता ,उनकी कला में आध्यात्मिक अलगाव से भी मुक्ति है. कबीर सम्पूर्ण श्रम को मुक्त नहीं कर पाए. खुद के अभिज्ञान को ज़रूर उन्होंने कला में रूपांतरित किया. या रूपांतरित करने की कोशिश की. उनका अध्यात्म और प्रेम इसी मौलिक अभिज्ञान के कारण इतना सहज और विशिष्ट लगता है. अग्रवाल इस सच्चाई को समझ नहीं पाए. फिलवक्त इस अलगाव के पीछे काम करने वाला पूंजीवाद धर्मसत्ता के साथ नए राजनीतिक सम्बन्ध में है. नए सम्बन्ध बनाता जा रहा है. कबीर के समय वैश्विक दृष्टि का भ्रम केवल धर्म की भाषा में व्यक्त होता था. इसलिए उसकी आलोचना भी उसी भाषा में थी. आज वह धर्म और पूंजी के संश्लिष्ट रिश्तों में है. पूंजी से मुक्ति के लिए श्रम संघर्षरत है. इसलिए इस आध्यात्मिक अलगाव से मुक्ति की भाषा और संवेदना पूंजीवादी राजनीतिक से लड़कर ही हो सकती है. श्रम के अलगाव को दूर करने वाली राजनीति की भाषा में ही हो सकती है. अग्रवाल या तो इसे समझते नहीं हैं या समझना नहीं चाहते.

कबीर की कविताई पर अग्रवाल जी ने सहृदयता से विचार किया है. लेकिन पूरे किताब की स्थापनाओं का उसमे कोई योगदान नहीं है. मृत्यु और प्रेम संसार की सभी श्रेष्ठ कविताओं के विषय रहे आये हैं. भिन्न-भिन्न ऐतिहासिक पलों में इनका भिन्न-भिन्न तरीकों से कवियों ने अपनी काव्य अनुभूतियों में अनुवाद किया है. शब्द की महत्ता कविता पहचानती है. और वह जीवन के ज्यादा नजदीक भी होती है. इसलिए वह केवल दर्शन नहीं है. दर्शन से ज्यादा जीवन है. कबीर की कविता के पास हमें आज भी जाना होता है और आगे भी जाना होगा. पता नहीं अग्रवाल जी की स्थापनाएं कुछ दिनों बाद खुद कबीर की कविता के सामने बेबस नज़र आने लगें!

  मार्तंड प्रगल्भ जे.एन.यू. के भारतीय भाषा केंद्र में पी.एच.डी. के लिए शोधरत  हैं.

संतों धोखा कासू कहियो-1 (पुरुषोत्तम अग्रवाल की किताब ‘अकथ कहानी प्रेम की..’ की समीक्षा)) : मार्तंड प्रगल्भ

By  मार्तंड प्रगल्भ
 

कबीर वैष्णव थे . आरंभिक आधुनिक काल में विकसित होती देशज आधुनिकता ने जो मूल्य सामने रखा कबीर उसके अग्रदूत थे, इनकी भक्ति काव्योक्त थी. और इनकी वैष्णवता जाति-कुल निरपेक्ष थी. कबीर के समय से विकसित होती देशज आधुनिकता को अवरुद्ध किया औपनिवेशिक शासन ने. इस औपनिवेशिक शासन ने अपना एक ज्ञान-कांड रचा जिसके प्रभुत्व में फिर से जाति व्यवस्था  प्रतिष्ठित हुई. इस ज्ञानकाण्ड ने देशज ज्ञान के विकास को रोक दिया. इसने पूरे भारतीय चिंतन में एक विच्छेद पैदा किया. और इस प्रकार पश्चिमी या यूरोपीय आधुनिकता के बाध्यकारी मूल्यों को हमारे यहाँ प्रतिष्ठित करने की कोशिश की गयी. लेकिन कबीर के समय से विकसित होती देशज आधुनिकता को औपनिवेशिक शासन के खिलाफ लड़े जा रहे राजनीतिक संघर्ष में पुनः स्थापित करने की कोशिश गांधी ने की. गांधी भी वैष्णव थे. जाति-कुल निरपेक्ष कबीर की वैष्णवता को ‘वैष्णव जन ते…’ के रूपक में उन्होंने लोकप्रिय किया. इसकी ग्राह्यता खुद इसकी लोकप्रियता में थी. जिस प्रकार कबीर शाक्त को नकार कर वैष्णव हुए थे, उसी प्रकार जिन क्रान्तिकारियों ने शाक्त चिंतन से प्रेरणा ली उसकी बनिस्पत वैष्णव गांधी की देशज आधुनिक मुहावरों को जनता ने अपने ज्यादा करीब पाया क्योंकि जनता के धार्मिक अस्तित्व ने पहले ही गैर- वैष्णव परम्परा को एक लिहाज से अस्वीकार कर दिया था. इस प्रकार गांधी ने औपनिवेशिक ज्ञान मीमांसा के प्रतिरोध का नेतृत्व किया. आज भी हमें गांधी के इस चिंतन पद्धति को समझना होगा तभी कल्याण है. पुरुषोत्तम अग्रवाल की अकथ कहानी यही है. और इस कहानी में रूकावट डालने वाले तत्वों खासकर ‘मार्क्सवाद’ और गौण रूप से वर्त्तमान दलित चिंतन को कथित रूप से ‘औपनिवेशिक’ ज्ञानकाण्ड की उपज बता दिया गया है. कुछ लोगों ने ध्यान दिलाया है कि इस अकथ कहानी में जासूसी कहानियों का सा प्रभाव है. और जासूसी कहानियाँ तो लोकप्रिय हुई उन्नीसवीं सदी के अंत और बीसवीं सदी के आरम्भ में अंग्रेजी कहानियों की नक़ल से और उस नक़ल के बांगला संस्करणों के अनुवाद से. अब अगर आख्यान रूपों का कुछ ऐतिहासिक सन्दर्भ होता है तो इस जासूसी कहानी का भी सन्दर्भ है ,और कहना होगा कि यह सन्दर्भ औपनिवेशिक ही है. पश्चिमी ही है. यूरोपीय ही है. लेकिन काल में बिलकुल हमारे आपके साथ. इस नवउपनिवेशवाद और वैश्विक आवारा पूंजी के दौर में!

            आइये इस कहानी को थोडा और करीब से पढ़ें. लेकिन इसके पहले मैं एक कहानी और सुनाता हूँ. भारतेंदु हरिश्चंद्र हिंदी के आधुनिक विद्वानों में सम्मानीय हैं. कुछ लोगों के लिए ‘हिंदी नवजागरण’ के अग्रदूत हैं. हिंदी साहित्य में भारतेंदु युग भी है. भारतेंदु भक्त थे. वैष्णव थे. परिवार इनका व्यापारियों का था. अग्रवाल थे. साथ ही राजभक्त भी थे. पश्चिम के ढंग की आधुनिकता भी आकर्षित करती थी. इन्होने भक्ति विषयक कवितायें लिखी हैं. साम्प्रदायिक आधार पर उत्तर-भक्तमाल की रचना भी की है. नारद भक्ति सूत्र और शांडिल्य भक्ति सूत्र का अनुवाद भी किया है क्रमशः ‘तदीय सर्वस्व’ और ‘भक्ति सूत्र वैजयंती’ के नाम से. उन्होंने ‘वैष्णवता और भारतवर्ष’ नाम से एक लेख भी लिखा था. इस लेख में उन्होंने घोषित किया कि भारत का प्रकृत धर्म वैष्णवता ही है. अभी वैष्णव धर्म में थोड़े संस्कार की ज़रूरत है क्योंकि ये बाह्य आडम्बरों में ज्यादा घिरे हैं. फिर क्रिस्तान, ब्राह्म, मुसलमान आदि में भक्ति की प्रधानता से ये सब लोग भी वैष्णवों के सादृश्य हैं. इसलिए “ बाह्य आग्रहों को छोड़कर केवल आतंरिक उन्नत प्रेममय भक्ति का प्रचार करें, देखें कि दिग्दिगंत से हरिनाम की कैसी ध्वनि उठती है और विधर्मीगण भी इसको सर झुकाते हैं कि नहीं और सिक्ख, कबीरपंथी आदि अनेक दल के हिन्दुगण भी सब आप से आप बैर छोड़ कर इस उन्नत समाज में मिल जाते हैं कि नहीं”. इस प्रकार भारतेंदु के ‘भारतवर्ष’ के लिए एक ‘प्रकृत धर्म’ चाहिए था और वह ‘राष्ट्रधर्म’ वैष्णवता थी. वैष्णव मत की उनकी समझदारी अधिकाँश में कृष्ण भक्ति संप्रदायों से बनी थी. इस समझ को उन्होंने राष्ट्र की तत्कालीन बन रही समझदारी से जोड़ दिया. वैष्णवता को उन्होंने सनातन भारतीय आत्म के रूप में समझाने की कोशिश की. इस पहचान में भारतेंदु पूर्व और उनके समकालीन पश्चिमी भारतविदों के धर्म सम्बन्धी चिंतन का प्रभाव भी है. और  इस प्रकार वैष्णवता तत्कालीन राष्ट्र सम्बन्धी चिंतन के परिप्रेक्ष्य में भारतेंदु के लिए एक राजनीतिक मुहावरा भी था. इस निबंध में भारतेंदु ने वैष्णवमत को भारत का प्रकृत धर्म बताते हुए इसके ३६ कारण भी गिनवाए हैं, यह कहते हुए कि: “जो कोई कहे कि यह तुम कैसे कहते हो कि वैष्णव मत ही भारत का प्रकृत धर्म है तो उसके उत्तर में हम स्पष्ट कहेंगे कि वैष्णव मत ही भारतवर्ष का भूत है और वह भारतवर्ष का हड्डी लहू में मिल गया है. इस के अनेक प्रमाण हैं, क्रम से सुनिए” और पहला ही प्रमाण हमारे भक्ति विषयक चिंतन के लिए मजेदार तर्क देता है जिसमे भारतेंदु कहते हैं, “पहले तो कबीर, दादू, सिक्ख, बाउल आदि जितने पंथ हैं सब वैष्णवों की शाखा प्रशाखाएँ हैं और भारतवर्ष इन पंथों से छाया हुआ है.” अभी हमने ऊपर देखा कि सिक्ख, कबीर पंथी आदि अनेक दल के हिन्दूगण वैष्णव नहीं थे अभी सब वैष्णव हो गये! और विधर्मियों को भी वैष्णव हो ही जाना चाहिए क्योंकि मूल रूप से उनकी भक्ति भी वैष्णव थी.इसी प्रकार बाकी सारे कारणों को पढ़ने से साफ़ हो जाता है कि विभिन्न धार्मिक मतों को ऐसे ही वैष्णवता के विशाल छत्र के नीचे उन्होंने एक करने की कोशिश की थी.

इसके बावजूद भारतेंदु की वैष्णवता तरल पहचान वाली थी. वैष्णवता की इस तरलता में कैथोलिक भाव का अन्वेषण और उसकी प्रतिष्ठा ग्रियर्सन ने की. ग्रियर्सन के यहाँ वैष्णव भक्ति की कृष्ण मार्गी समझदारी को राम की भक्ति के साथ मिलाकर एक भारतीय धर्म की कल्पना हुई जिसमे विक्टोरियन समर्पण की छौंक शामिल है. भक्ति के उत्स में नेस्टोरियन ईसाईयों के प्रभाव वाली मान्यता तो कड़ी आलोचनाओं के प्रभाव में उन्होंने लगभग छोड़ दी लेकिन भक्ति के आदर्श के रूप में तुलसी के राम को उन्होंने नहीं छोड़ा. तुलसी सचमुच के ‘राष्ट्रकवि’ थे और बाकी सारे कवियों में सबसे ज्यादा कैथोलिक थे. इसलिए ब्रिटिश राज को यहाँ कैथोलिक धर्म के प्रचार की और मिशनरी कार्यों की वैसी ज़रूरत नहीं है. समझना सिर्फ यह है कि इस देश के लोगों के हृदय पर राज करने वाली राम भक्ति भावना को समझा जाए और उसके सहारे कैथोलिक धर्म और राजभक्ति के सन्देश को लोगों तक ले जाया जाए[1]. औपनिवेशिक ज्ञान मीमांसा और उसके राज्य प्रचारित स्वरुप में यह एक बड़ा परिवर्तन था. भक्ति के इस ‘राष्ट्रीय चरित्र’ को बल मिला खुद हिंदी के द्विवेदीयुगीन विचारकों के द्वारा.

द्विवेदी युग की मर्यादा और नैतिकता पर इस प्रचारित वैष्णव भक्ति का बहुत ही बड़ा प्रभाव पड़ा. और इस मर्यादा और नैतिकता के सबसे बड़े सिद्धांतकार के रूप में रामचंद्र शुक्ल ने वैष्णव भक्ति की कृष्णमार्गी परिभाषा में तुलसी के राम को प्रतिष्ठित किया और उसमे कैथोलिक ईसाई तत्वों के विदेशीपन को एक सिरे से नकारते हुए इसे भारत के स्वाभाविक और प्रकृत भक्ति के रूप में स्थापित कर दिया[2]. इसी वजह से कबीरादि निर्गुनियों की भक्ति को विदेशी पद्धति की भक्ति कह कर खारिज किया गया. राष्ट्र-धर्म के रूप में हिंदू सगुण  राम भक्ति को पहचान देने के साथ ही यह विदेशी राज के खिलाफ संघर्ष की एक हिंदू-राष्ट्रवादी परिणति थी. इसका राष्ट्रीय आख्यान मुसलमानों को सामने रख कर निर्मित हुआ और तात्कालिक कैथोलिक विदेशीपन को भी चुनौती मिल गयी. इस काम में द्विवेदी युगीन कवि,संपादक , विचारक सब शामिल थे. और इसी वैष्णव व्यक्ति की मुक्ति के स्वर छायावाद में भी प्रखर थे. अपने तमाम नयेपन के वावजूद छायावाद वैष्णव था. मुख्यधारा की गांधीवादी राजनीति और छायावादी साहित्य दोनों ही वैष्णव थे. देशभक्ति की परिभाषा वैष्णव थी. औपनिवेशिक राज्य से संघर्ष के हथियार भी औपनिवेशिक ज्ञानमीमांसा से ही निकले थे.

यहाँ तक कि बड़थ्वाल ने निर्गुण सम्प्रदाय के कवियों-भक्तों में एक सुचिंतित दर्शन की खोज करते हुए उसे उपनिषदों की धारा से जोड़ दिया और साबित किया कि भारत का प्रकृत धर्म यही है और यह भी वैष्णव ही है[3]. और सूफी प्रभावों को भी परोक्ष रूप से भारतीय बताया गया क्यूंकि सूफी दर्शन भी भारतीय वेदान्त से ही विकसित हुआ था! इस प्रकार कबीरादी निर्गुनिये भी मिलाजुलाकर उसी राष्ट्रीय आख्यान में शामिल कर लिए गए. भक्ति अभी भी ‘मुसलमान’ आक्रमण की प्रतिक्रिया में आई मानी जाती थी और इस प्रकार ब्रिटिश राज में भी यही भक्ति हमें संबल दे सकती थी!

हजारी प्रसाद द्विवेदी ने इस लिहाज से भक्ति संबन्धिनी चिंतन में एक पैराडाइम शिफ्ट लाया. उन्होंने भक्ति को भारतीय चिन्ताधारा के स्वाभाविक विकास के रूप में दिखाया और इस में ब्राह्मणेतर धर्मों के लोकपरक तत्वों का योगदान निरुपित किया. चूँकि यह चिन्ताधारा ईसा के हजार साल के आसपास खुद ही लोक की ओर झुकने लगी थी अतः यह भक्ति भी लोकधर्म थी. जब भक्ति लोक धर्म थी तो निश्चित ही वैष्णव धर्म भी लोक परक था.लेकिन इस बात से द्विवेदी जी पूरी तरह सहमत नहीं थे कि संतमत भी उसी तरह वैष्णव था जैसा सगुण भक्ति. द्विवेदी जी के लोकधर्म संबन्धिनी चिंतन ने उन्हें मध्यकालीन बोध को समझने के लिए मजबूर किया.और इसलिए द्विवेदी जी के पास उस तरह का कोई राष्ट्र-धर्म नहीं था. इस लोक संबन्धिनी चिंतन के कारण उनमें राष्ट्रवादी इतिहास दृष्टि से मुक्ति के प्रयास भी दिखाई पड़ते हैं. द्विवेदी जी पर मोनियर विलियम्स के पॉपुलर धर्म संबन्धिनी चिंतन का प्रभाव भी देखा जा सकता है. द्विवेदी जी ने मुसलमान आक्रमण की प्रतिक्रिया में भक्ति के उद्भव या प्रसार को नकारा और भक्ति को दक्षिण से उत्तर तक एक आंदोलन की तरह दिखाने का प्रयास किया.भक्ति को भक्ति आंदोलन के आख्यान की तरह देखने की शुरुआत तो बड़थ्वाल के यहाँ ही हो जाती है.[4]लेकिन उसका व्यापक निरूपण और उसकी सैद्धांतिकी  द्विवेदी जी के लेखन में रूप ग्रहण करती है और तब से आज तक भक्ति को एक आंदोलन की तरह ही देखा जाता है. द्विवेदी जी ने भक्ति आंदोलन को राष्ट्रीय आंदोलन के आख्यान की तरह देखा था. जिस ग्रियर्सन के हवाले से भक्ति-आंदोलन का ज़िक्र द्विवेदी जी ने किया है उस हवाले में ग्रियर्सन ने आंदोलन या मूवमेंट के बदले भक्ति को एक विचार या आईडिया लिखा था. लेकिन इस आईडिया या विचार को ‘क्रांति’ या ‘रिवोल्यूशन’ ज़रूर कहा था[5]. बहरहाल राष्ट्रीय आंदोलन के आख्यान में भक्ति को अवस्थित किया गया, दक्षिण से उत्तर में आकर नोटिस प्राप्त भक्ति के चार संप्रदायों और भक्तमाल की परम्परा ने इसमें अपना योगदान भी दिया.

औपनिवेशिक दौर के इन चिन्तनों के परिप्रेक्ष्य में अग्रवाल जी की कहानी ने नया नुक्ता ढूंढ निकाला है. पहले भक्ति के वैष्णव परिभाषा में रामभक्ति को स्थापित किया गया था. अब अग्रवाल जी का कहना है कि उसमें कबीर को रखा जाए. क्योंकि रामानंदी वैष्णवता ही देशज आधुनिकता की प्रभावी धारा है न कि स्मार्त वैष्णवता जो कि तुलसी की है. भक्ति सम्बन्धी पूर्ववर्ती सभी चिंतन औपनिवेशिक ज्ञानमीमांसा से प्रभावित हैं और इसलिए औपिवेशिक आधुनिकता के गढ़े गए आख्यान हैं. जबकि कबीर को समझने के लिए हमें देशज आधुनिकता को समझना होगा. देशज आधुनिकता की शुरुआत पंद्रहवीं सदी के आसपास हुए सौदागरी पूंजीवाद के विकास के साथ जुड़ता है. व्यापारियों की स्वायत्तता ने पुरानी वर्णव्यवस्था पर आघात किया. उनके ‘फेयर प्ले’ के एथिक्स ने आधुनिक मूल्य बोध को जन्म दिया. जहां व्यक्ति सत्ता को जन्म आधारित भेदभाव से मुक्त करने का प्रयास शामिल है. इस विकसित होती आधुनिकता में पहले से विकसित होते काव्योक्त वैष्णवता, जो नारद भक्तिसूत्र में और रामानंद के चिंतन में दिखाई देता है, का महत्वपूर्ण योगदान है. भक्ति काव्य को सगुण-निर्गुण के द्विविभाजन में देखना बाद के पंथों के साहित्य के प्रभाव में है. खुद भक्त इस विभाजन को नहीं मानते हैं. उस वक्त दरअसल एक भक्ति का लोकवृत्त बन रहा था. यह लोक वृत्त आधुनिक परिघटना है और अलग अलग समाजों में अलग अलग तरीके से उसी समय विकसित हो रहा था. यह लोकवृत्त आधिकारिक और निजी वृत्त से अलग सार्वजनिक विषयों पर स्वायत्त ढंग से चितन करता है. कबीर की बानी इसी लोकवृत्त का सबसे प्रखर स्वर था.

सौदागरी पूँजीवाद के विकास और उसके कारण संभव हुए भक्ति रूपी लोकजागरण की चर्चा रामविलास शर्मा ने विस्तार से की है. १९५० के दशक में रूसी भारतविदों के बीच यूरोपीय पुनर्जागरण या रेनेसंस के साथ भक्ति काल की सादृश्यता पर गहन और विस्तृत चर्चा हुई थी. इस विस्तृत चर्चा पर विद्वानों का ध्यान कम ही गया है. इन चर्चाओं का संक्षिप्त परिचय हमें इ.पी. चेलिशोव की किताब ‘भारतीय साहित्य की समस्याएं’ में मिलता है. कहना न होगा कि ये सभी मूलरूप से मार्क्सवादी चिन्तक ही थे. और इनमें से किसी ने भी भारतीय समाज को बर्फ में जमे समाज की तरह नहीं देखा था. लेकिन ‘आरंभिक आधुनिकता’ सम्बन्धी वर्त्तमान पश्चिमी चिंतन से ख़ासा प्रभावित पुरुषोत्तम अग्रवाल मार्क्सवादी इतिहास-दृष्टि की आलोचना पूरी किताब में करते ही चले गए हैं. लेकिन देशज आधुनिकता की अपनी ऐतिहासिक समझदारी के लिए इन्हें भी सौदागरी पूँजीवाद का सहारा लेना ही पड़ता है! सौदागरी पूंजीवाद के विकास के साथ नगरों के विकास ने दस्तकारों का जो नया वर्ग तैयार किया और साथ ही समाज के निम्न समझी जाने वाली जातियों में जो आत्मविश्वास और स्वतंत्र चेतना पैदा किया उसके साथ कबीर जैसे संत भक्तों का जो सम्बन्ध है वह केवल ‘फेयर प्ले’ के मुहावरे से नहीं समझा जा सकता है. इस सम्बन्ध की समझदारी हमें ग्राम्शी जैसे मार्क्सवादियों से ही मिल सकती है. नामवरसिंह ने बहुत पहले इस ओर संकेत भी किया था. जब तक इस महत्वपूर्ण ऐतिहासिक प्रक्रिया को नहीं समझा जाता तब तक हम यह भी नहीं समझ पायेंगे कि दसवीं शताब्दी में बनते नारद भक्ति सूत्र और रामानंद की वैष्णवता से कबीर की भक्ति कैसे ज्यादा मूलगामी हो जाती है. और तब हमें भक्ति के शास्त्रोक्त और काव्योक्त विभाजन का आशय भी स्पष्ट हो जाएगा.दरअसल भक्ति के निर्गुण और सगुण विभाजन में छिपे भक्ति के भिन्न सामाजिक आधारों को भक्ति विषयक चिंतन से विस्थापित करने का प्रयास है काव्योक्त और शास्त्रोक्त के संस्कृत काव्य शास्त्रीय मुहावरे को सामने लाना. और तब हमें यह भी समझ आएगा कि वर्णाश्रम की कठोर आलोचना करने वाले नाथपंथियों का अग्रवाल की कहानी में कोई जगह क्यूँ नहीं है. पूरी कहानी में नाथपंथ का ज़िक्र आता है केवल यह बताने में कि निर्गुण पंथियों की नारी सम्बन्धी दृष्टिकोण को नाथपंथियों का प्रभाव मानना चाहिए![6] जाति निरपेक्ष भक्ति के लिए नारदीय सूत्र और नारी विरोधी दृष्टि के लिए नाथपंथी! इस कहानी की उलटबांसी को क्या कहियेगा. प्रेम के लिए भी जिम्मेदार नारदीय भक्ति, सूफियों का प्रभाव नहीं !

आइये देखते हैं कि रामानंदी वैष्णवता के ऊपरी जाति विरोध को कबीर ने क्यूँ कर मूलगामी जातिविरोध में बदल दिया. कुछ ऐतिहासिक प्रक्रियाओं के उल्लेख उन परिवर्तनों को सामने लाने वाले क्रियाशील व्यक्तिओं के अपने वर्णन में नहीं मिलते. और ऎसी स्थिति में ही ऐतिहासिक दृष्टि की ज़रूरत होती है. ग्राम्शी ने श्रमशील समूह के खंडित विश्वदृष्टि की चर्चा अपने जेल में लिखे नोटबुक में किया है. हम यहाँ रुक कर उसे थोडा पढ़ने की कोशिश करते हैं. जेल में लिखे अपने ‘नोट-बुक’ में ग्राम्शी ने ‘व्यवहार के दर्शन’ की लंबी चर्चा की है| इस चर्चा में उन्होंने ‘सामान्य बोध’ पर विस्तार से अपनी बात रखी है|[7] ‘जनसमूह में कार्यरत व्यक्ति’, सामान्य कामगार दैनन्दिन कार्यों में लगा होता है| फिर भी इस दुनिया के बारे में उसकी कुछ अपनी समझदारी होती ही है| इसी दुनिया के बारे में जिसे वह अपने श्रम से बदलता रहता है|[8] लेकिन उसके पास ‘अपने व्यावहारिक कार्यों को लेकर कोई साफ़ सैद्धांतिक चेतना नहीं होती’| बल्कि-

“उसकी सैद्धांतिक समझदारी ऐतिहासिक रूप से उसके क्रिया-कलापों से भिन्न हो सकती है| कोई संभवतः कह ही सकता है कि उसकी दो सैद्धांतिक चेतनाएं (या एक अंतर्विरोधी चेतना) होती है: एक जो उसके क्रियाकलापों में अन्तर्निहित होती है और प्रकारांतर से उसे वास्तविक दुनिया के व्यावहारिक रूपांतरण में रत अपने सभी साथी कामगारों से एक करती है; और एक जिसे वह अतीत से बिना किसी आलोचना के ग्रहण करता है और जो सतही रूप से व्यक्त और मुखर होती है|”[9]

यह अन्तर्निहित चेतना और सतही रूप से व्यक्त चेतना का अंतर्विरोध दो विरोधी सामाजिक समूहों का प्रतिबिम्बन है| कहना न होगा कि-

“ इस प्रकार इस सामजिक समूह [व्यापक जन समूह वाला एक सबाल्टर्न समूह] की इस दुनिया के बारे में अपनी धारणा होती है,चाहे वह बीज रूप में ही हो;एक धारणा जो अपने को कर्म में अभिव्यक्त करती है ,लेकिन सामयिक रूप से और कभी कभी ही, एक कौंध बनकर- जब वह समूह एक आवयविक पूर्णता से कार्य करता है| लेकिन इसी समूह की एक और धारणा होती है जो उनकी अपनी नहीं होती और अधीनस्थता या बौद्धिक अधीनता के कारण दूसरे समूह से उधार ली गयी होती है; और यह मुखर रूप से इसी धारणा को स्वीकार करता है और खुद मानता है कि इसी का अनुकरण करता है, क्योंकि ‘सामान्य समय’ में वह इसी के अनुसार काम करता है- अर्थात जब इनका आचरण स्वतंत्र या स्वायत्त न हो कर अधीनता या मातहती(submissive and subordinate) में होता है|”[10]

इस प्रकार सबाल्टर्न वर्ग का ‘सामान्य बोध’ आतंरिक रूप से अंतर्विरोधग्रस्त और बिखरा हुआ होता है| यह सामान्य बोध द्विविधाग्रस्त,बहुआयामी और अंतर्विरोधी होता है तथा इसमे कोई परिवर्तन किसी निश्चित ऐतिहासिक प्रक्रिया में प्रभुत्वशाली और मातहत वर्गों के आपसी संबंधों के बदलाव से ही संभव होता है| ‘सामान्य-बोध’ के उस स्वायत्त तत्त्व को जो किसी सबाल्टर्न समूह के क्रियाकलापों में अन्तर्निहित होता है और उनके सभी सदस्यों में अपने श्रम के कारण दुनिया को बदलने के कारण होता है और “सामान्य समय”[11] में प्रभुत्वशाली वर्गों के विचारधारात्मक वर्चस्व के कारण प्रकट नही हो पाता, ग्राम्शी कई बार ‘साधु-बोध’(good sense) कहते हैं|[12] ‘सामान्य-बोध’ के इन दो तत्त्वों के बीच नए उभरने वाले धर्म-मतों और दर्शनों के कारण हमेशा एक गतिशील अंतर्क्रिया भी होती रहती है| जब नए उभरने वाले दर्शन और धर्म मत समाज में एक खास प्रभुत्व बना लेते हैं तो फिर इनका प्रभाव सामान्य बोध के उस तत्त्व पर पड़ता है जो उधार ली गयी होती है| हर दार्शनिक धारा और धर्म-मत की छाया और उसके कुछ अवशेष सामान्य-बोध का हिस्सा बनते चलते हैं| और इस प्रकार सामान्य बोध या ‘लोक-मत’ ऐतिहासिक रूप से रूपांतरित होता चलता है और खुद को विचारों और दर्शनों से समृद्ध भी करता चलता है| इस प्रक्रिया में कई बार लोकमत की अन्तर्निहित धारणा एक ज्यादा सुसंगत विश्वदृष्टि पाने का प्रयास करती है| ग्राम्शी ने सामान्य बोध को ‘दर्शन का लोकगीत’(फोकलोर ऑफ फिलोसोफी) कहा है|[13]सामान्य बोध भविष्य के लोकगीतों के निर्माता होते हैं| जो किसी खास देश-काल में लोकप्रिय ज्ञान का ज्यादा बद्ध(रिजिड) चरण होता है| यहाँ ग्राम्शी न केवल सामान्य बोध या लोक-मत के ऐतिहासिक प्रक्रम को रेखांकित कर रहे है बल्कि लोकगीतों के स्वरुप और उनके इतिहास के अध्ययन का भी सूत्र हमारे सामने रख रहे हैं|

            नयी धार्मिक और दार्शनिक धाराएँ प्रभुत्वशाली और अधीनस्थ वर्गों के संघर्ष से अछूती नही रहती| इन वर्गों के बीच किसी खास ऐतिहासिक क्षण में ‘परिस्थितिवश’ जब संघर्ष एक खास गतिशीलता प्राप्त कर लेता है तो सामान्य बोध का स्वायत्त तत्त्व अपनी उपस्थिति पुरजोर तरीके से अभिव्यक्त करने लगता है| यह श्रम में अन्तर्निहित धारणा की उधार ली गयी धारणा पर एक विजय होती है| यह श्रम करने वालों की परिस्थितियों में हुए एक आधारभूत परिवर्तन के कारण संभव होता है और जिसके फलस्वरूप उनकी स्थिति में आयी सापेक्षिक स्वतन्त्रता उनके सामान्य बोध के स्वायत्त तत्त्व को एक आत्मविश्वास से भर देती है| जब-जब ऐसी स्थिति आती है समाज के संकट(क्राइसिस) की अभिव्यक्ति समाज के दो भिन्न विश्वासों,दो भिन्न धर्मों और दो भिन्न विश्व-दृष्टियों में बँट जाने के डर में होने लगती है| ऐसी ही परिस्थिति में ‘लोक-धर्म’ शास्त्र का ‘विकल्प’ बन कर सामने आती है| और तब नए धर्मों और दर्शनों का फिर से बनना और अपने को पुनर्व्यवस्थित किया जाना शुरू होता है, ताकि पूरे सामाजिक व्यवस्था में फिर से एक विचारधारात्मक एका बनाया जा सके| यह या तो नए आधारों पर ज्यादा प्रगतिशील हो सकता है या फिर अपनी खोई हुई सत्ता को फिर से पाने की कोशिश में पुराने आधार की तरफ पुनरागमन हो सकता है|[14] संत-भक्ति के ज्यादा स्वायत्त और ‘अनुभवसम्मत विवेकवाद’ का धीरे-धीरे भक्ति के ज्यादा शास्त्रीय और वर्चस्व की विचारधारा में पर्यवसन ऐसी ही एक प्रक्रिया थी| इस प्रक्रिया का पहला चरण निश्चित रूप से लोक-धर्म का शास्त्र के विकल्प के रूप में सामने आना था|

            धर्म की ऊपर-ऊपर की एकता भी केवल भ्रम होती है| भक्ति युगीन वैष्णव धर्म भी कहने को ही एक ही था| न केवल उसके भीतर अनेक अंतर-धाराएँ थीं बल्कि वह समाज के भिन्न वर्गों के लिए भिन्न-भिन्न था| किसानों का वैष्णव धर्म एक था, कारीगरों का दूसर तो पंडितों का तीसरा| इसलिए चेतना के साथ धर्म के रिश्तों का अध्ययन एक ही धर्म-मत के विभिन्न रूपों के बीच की भिन्नता को ध्यान में रख कर किया जाना चाहिए| धर्मों के आतंरिक अंतर्विरोध समाज के विभिन्न वर्गों के लिए भिन्न-भिन्न अर्थ रखते हैं. एक ओर धर्म की एक प्रवृति समाज के लिए सार्वभौम नैतिक आचारसंहिता बनाने की कोशिश करती है और दूसरी ओर इस सार्वभौमिक संहिता के वर्चस्व के नकार की प्रक्रिया भी चलती रहती है. और महत्वपूर्ण यह है कि  विभिन्न सामाजिक समूहों में प्रचलित धार्मिक विश्वासों और आचार प्रक्रियाओं से उन अन्तर्निहित तत्त्वों को सामने लाना चाहिए जो धर्म के उन रूपों में वर्चस्वशाली रूप के विरोध में होते हैं. वस्तुतः द्विवेदी जी मध्ययुगीन धर्म-साधनाओं के इतिहास को लिखते समय यही काम कर रहे थे. उन प्रतिरोधी तत्त्वों की पहचान के कुछ संकेत ग्राम्शी ने किये थे| प्रत्यक्ष अनुभव को महत्व देना, ‘खास हद तक “प्रयोगात्मकता” और यथार्थ का सीधा अन्वेषण, हालांकि आनुभविक और सीमित’.[15]ये सब विशेषताएं संतों के यहाँ है. और तब हमें मानना होगा कि भक्ति का लोकवृत्त भी अंतर्विरोधों से परे नहीं था. इसलिए रामानंदी वैष्णवता को कबीर ने खासा रेडिकल बना दिया था.और इस प्रकार समाज का क्राइसिस दो भिन्न मतों में बंट गया था. निर्गुण संतमत और सगुण वैष्णवता. धीरे धीरे भक्ति के आधार क्षेत्र में जब परिवर्तन हुआ और छोटे वनिक, दस्तकारों और निम्न-अछूत जातिओं के यहाँ से निकल कर भक्ति किसानों और ब्राह्मणों के यहाँ पहुंची तो साथ ही साथ नए पुनर्व्यवस्था का प्रयास भी शुरू हुआ. बड़ा किसान वर्ग अभी भी सामंती विचारधारा के प्रभाव में था और इस प्रकार पहले से ज़ारी वर्चस्वशील धार्मिक मतों के प्रभाव में था. यह वर्ग हालाँकि दसवीं ग्यारहवीं सदी से शुरू हुई राज्य निर्माण प्रक्रियाओं और तदनुरूप स्थानीयताओं के पार-क्षेत्रीय मुहावरों और धार्मिक प्रतीकों और धर्म-मतों के प्रभाव में भी थी, और इसलिए पहले की तुलना में निर्गुण मत के लिए कहीं ज्यादा तैयार थी. परन्तु अपनी सामाजिक अवस्थिति के कारण कृष्ण या राम भक्ति के सगुण मतों की तरफ ज्यादा आकर्षित हुई. इस लिए भक्ति का लोक वृत्त भी दो भिन्न सामाजिक आधारों के लिए विमर्श के विषयों और संग्रह त्याग के निर्णयों में भी अंतर्विभाजित थी. ऐसी स्थिति में भक्ति को काव्योक्त और शास्त्रोक्त वर्गीकरणों को एक सिरे से नकारने की ज़रूरत है. और तब जाकर हमें मुक्तिबोध के यह कहने में कि सगुण भक्ति ने निर्गुण भक्ति के क्रांतिकारी दांत उखाड डाले, की सच्चाई मालूम चलती है.

भक्ति के लोकवृत्त की ज्यादा प्रभावशाली निर्गुण धारा के सगुण धारा में परिवर्तन की प्रक्रिया ऐसे ही समझ में आ सकती है. अकारण नहीं कि एक बार बड़े किसान वर्ग पर अपनी छाप छोडने के बाद धार्मिक मतों में एक व्यवस्था आ गयी और भक्ति के वास्तविक उन्मेष ने अपनी ऊर्जा खो दी. इस प्रक्रिया में देशी भाषाओं के क्रांतिकारी इतिहास ने भी एक चरण पूरा कर लिया. और साहित्यिक भाषा के रूप में ब्रज का पार-क्षेत्रीय स्वरुप स्थापित हुआ. मुग़ल सत्ता के पतन के साथ नए क्षेत्रीय राज्य अपनी वैधता के लिए ब्राह्मणों की ओर मुड़े और साहित्य लोकवृत्त से निकल कर दरबारी आधिकारिक वृत्त में चला गया. यह हिंदी की नयी साहित्यिक संस्कृति थी. और अब भक्ति का धार्मिक आवरण ज्यादा लौकिक श्रृंगार में अभिव्यक्त होने लगा. राधा-कृष्ण तो सुमिरन के बहाने थे.

परन्तु ऐसा नहीं है कि किसी समय हुए व्यापक सामजिक उथल पुथल के बाद समाज से वह चेतना गायब हो जाती है. अलग-अलग स्वरूपों में वह समाज के भीतर ज़िंदा रहती है. भक्ति के परवर्ती पंथों के स्वरुप और उन पंथों के सामजिक आधारों के विश्लेषण से इस बात का पता चलता है. हांलाकि यह एक ज़टिल प्रक्रिया है. डेविड लौरेंज़न ने ‘कबीर पंथ और सामजिक प्रतिरोध’ के अपने अध्ययन में इसे समझने की कोशिश की है. लोरेंज़न लिखते हैं: “इस अध्याय की मूल संकल्पना यह है कि कबीर की शिक्षा में सामजिक और धार्मिक विरोध के महत्वपूर्ण तत्व पाए जाते हैं. इन तत्वों का मूल अभिप्राय और प्रकार्य चाहे जो रहा हो, ये पंथ के अनुयायियों द्वारा –अधिकतर शूद्रों, अछूतों और आदिवासियों जैसे हाशिए के समूहों द्वारा –ऊंच-नीच पर आधारित जाति-व्यवस्था की कुछ पहलुओं को नकारने के लिए प्रयोग में लाये गए, साथ ही कबीरपंथ में अपनी सदस्यता के द्वारा वे उसी समाज के भीतर आत्मसात होने के अनुकूल भी बने. वो ‘संस्कृतिकरण’ के द्वारा अपनी स्थिति को ‘बदलने’ की कोशिश भी करते हैं. जितना ही वे उच्च जाति की विचारधारा को आत्मसात करते हैं उतना ही अपनी सामजिक स्थिति को ‘ऊंचा’ उठाने का प्रयास करते हैं.लेकिन वास्तव में, ये सामजिक समूह यह आशा नहीं कर सकते कि दूसरों की निगाहों में उनकी जातिगत स्थिति नाटकीय ढंग से ऊपर उठ जाएगी. फिर भी, कबीरपंथ की अधिक समतावादी विचारधारा में उन्हें एक सकारात्मक आत्मछवि प्राप्त होती है जो कि रूधिग्रस्त ब्राह्मणवादी हिंदू परम्परा के द्वारा आरोपित जन्मजात निम्न स्थिति को अस्वीकार करती है.”[16] कबीर की लोकप्रियता कबीर पंथों के बाहर भी बहुत रहती आई है. और इस मामले में भी उसके भिन्न सामाजिक आधारों को औपनिवेशिक काल में भी रेखांकित किया गया था. ऊपर ग्रियर्सन को लिखे एक मिशनरी की चिट्ठी का जो ज़िक्र पाद टिपण्णी में है उससे भी इस बात का पता चलता है.

आइये हम फिर नारद भक्ति के कबीर द्वारा स्वीकार पर कुछ करीब से विचार करते हैं. कबीर ने नारदीय भक्ति को ठीक वैसे ही स्वीकार नहीं किया. नारद भक्ति सूत्र में भक्ति के लिए जाति-कुल और कर्मकांड तथा लोक-वेद दोनों को अस्वीकार किया था, ऐसा उन सूत्रों को समग्रता में पढने पर सही नहीं लगता. भक्ति के क्षेत्र में समानता की चर्चा तो एक हद तक रामानुजम के यहाँ भी थी.फिर भक्ति के आदर्श उदाहरण के रूप में गोपियों की कृष्ण के प्रति प्रेम को बताया गया है. लेकिन ये प्रेम कैसा होगा और किस तरीके से होगा इसका उल्लेख नहीं किया गया है क्यूंकि यहाँ सूत्रकार सीधे भागवत में वर्णित गोपी-कृष्ण लीला को अप्रत्यक्ष रूप से संदर्भित मान रहा होता है. इसके अलावा निम्न सूत्रों को पढ़ने से हमें धर्म और वर्णाश्रम की कबीर द्वारा की गयी मूलगामी आलोचना और नारद भक्ति सूत्रों के अंतर का भी पता चलता है.

११.लोकवेदेषु तदानुकूलाचारणं तद्विरोधिषूदासीनता ||

१२.भवतु निश्चयदाढ्रयांदृध्व शास्त्ररक्षणम् ||

१३. अन्यथा पतित्यशंकया ||

१४. लोकोऽपि तावदेव भोजनादि व्यापारस्वत्वाशारीरधारणावधि||

६१. न तदसिद्धौ लोक्व्यवहारो हेयः किन्तु फल्त्यागास्तत्साधनं च कार्यमेव||

६२. स्त्रीधननास्तिकचरित्रं न श्रवणीयम्|| (फिर भी स्त्री विरोधी दृष्टि नाथपंथियों का प्रभाव बताते हैं अग्रवाल!)

७३. वादो नाव्लाभ्यः( कबीर खूब वाद करते हैं, और यह अग्रवाल के लिए नाथों का प्रभाव नहीं है!)

७६. भक्तिशास्त्राणि माननीयानि तादुद्द्धोधककर्माणि करणीयानि||

            भक्ति के उद्भव और प्रसार के दो आख्यान हमें पुराने वक्त में मिलते हैं. इसमे पहला संस्कृत में है और दूसरा देशी भाषा में. संस्कृत वाला आख्यान ‘भागवत महात्म्य’ में है जो कि ‘भागवत’ के पहले जोड़ा गया है और निश्चित रूप से सतरहवीं शताब्दी के आसपास से पहले का नहीं है. खुद भक्ति ने नारद को कहा था:

उत्पन्न द्रविड़ं साहम वृद्धिम कर्णाटके गता|

क्वचितक्वचित महाराष्ट्रे गुर्जर जिणॅतमगता ||

और फिर वृन्दावन में आने से वह पुनः जवान हो गयी है लेकिन उसके कर्म और ज्ञान नामक दो पुत्र अभी भी वृद्ध हैं और अचेत पड़े हैं यमुना के तट पर. इनके सुस्थित होने के लिए भी भागवत पाठ की ज़रूरत होती है.

            दूसरा है एक दोहा जिसे सब जानते हैं लेकिन कोई यह नहीं कह पाता कि इसका उल्लेख पहले पहल कहाँ हुआ था:

                                    भक्ति द्राविड़ ऊपजी  लाए रामानंद

प्रगट किया कबीर ने सप्तद्वीप नवखण्ड.

पहला दोहा तो निश्चित रूप से किसी कृष्ण भक्ति के सम्प्रदाय का लिखा हुआ है. और दूसरा शायद किसी निर्गुणपंथी का. परन्तु भक्ति के दक्षिण में उत्पन्न होने और उत्तर में आने को लेकर दोनों ही आख्यान सहमत हैं. भक्ति के इन दोनों आख्यानों से जुड़े हुए कुछ वाजिब प्रश्न हैं. अगर ये आख्यान औपनिवेशिक काल के पहले के हैं तो फिर निश्चित है कि औपनिवेशिक काल के पहले ही भक्ति के दो आख्यान थे, भक्ति के दो स्वरूपों पर चर्चा थी. एक कबीर को भक्ति का अग्रदूत बताता है दूसरा ब्रजभूमि को. हो सकता है यह केवल साम्प्रदायिक प्रतिष्ठा का सवाल हो. यह भी हो सकता है कि भक्ति के दो स्वरुप आरम्भ से ही लोगों के सामने स्पष्ट हो. इन दोनों आख्यानों से ही भक्ति के सगुण-निर्गुण स्वरूपों का प्रश्न भी जुड़ा है. कुछ विद्वान मानते हैं कि भक्त कवियों के यहाँ सगुण-निर्गुण दो भिन्न भक्ति की अवधारणाएं थीं और यह केवल भगवान के दो भिन्न स्वरूपों से आगे जाकर खास सामाजिक आधारों वाली विचारधारा थी. इन दो भिन्न भक्ति अवधारणाओं के निम्न और उच्च जातियों से स्पष्ट संबंद्ध थे. निर्गुण भक्त कवि में सामाजिक प्रतिरोध की चेतना थी. कुछ विद्वानों के अनुसार यह विभाजन पंथ-निर्माण की प्रक्रिया से जुड़े हैं और इनकी निर्मिति सतरहवीं शताब्दी के अंत और अठारहवीं शताब्दी के आरम्भ से बननी शुरू हुई थी. कुछ विद्वान इसे औपनिवेशिक ज्ञान कांड की उपज बताते हैं. मिलाजुलाकर अभी भी कोई स्पष्ट मान्यता या मोटामोटी समझदारी इस विषय पर बन नहीं पायी है. मनोरंजक बात यह है कि औपनिवेशिक काल में हुए भक्ति विषयक चिंतन में होने वाले परिवर्तनों का पैटर्न भी इन दो आख्यानों में निरुपित भक्ति के स्वरुप की ओर इशारा करते हैं. भारतेंदु के वैष्णव भक्ति से लेकर निर्गुण पंथ और संतमत के क्रांतिकारी अंतर्वस्तु की पहचान तक औपनिवेशिक काल में हुए भक्ति के माइनों में परिवर्तन में भी इन दो आख्यानों की भिन्नता दिखाई देती है. अगर ये आख्यान औपनिवेशिक काल से पूर्व के हैं तो मानना पड़ेगा कि औपनिवेशिक काल के चिंतन की दिशा भिन्न पड़ावों को पार करते हुए औपनिवेशिक पूर्व भक्ति की भिन्न-भिन्न मान्यताओं के आख्यान के करीब ही पहुँच रही थी,  निश्चित रूप से अपने नए राजनीतिक उद्देश्यों के साथ. तब फिर औपनिवेशिक पूर्व सामाजिक-राजनीतिक भिन्नताओं की एक धारा औपनिवेशिक काल में भी सक्रिय रही मानी जा सकती है जिसका अलग-अलग स्तरों पर उपनिवेशवाद विरोधी विचारधारा के साथ अलग-अलग अन्तर्क्रियाओं की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता. अर्थात औपनिवेशिक राजनैतिक कर्ता(colonial political subject) के रूप में भक्ति पर चिंतन करने वालों और व्यापक जनसमुदाय,जो उस तरह से सीधे औपनिवेशिक शासन के सब्जेक्ट नहीं थे, के चिंतन और प्रतिक्रियाओं के मनोरंजक स्वरुप सामने आ सकते हैं.

इतना तो तय है कि भक्ति के स्वरुप को लेकर चलने वाली उपनिवेशकालीन चर्चा का कुछ सम्बन्ध तो उपनिवेशपूर्व चर्चाओं के पैटर्न से भी है. यहाँ आकार यह बात और स्पष्ट हो जाती है कि जब हम औपनिवेशिक ज्ञानकाण्ड को सर्वथा आधिकारिक औपनिवेशिक संवेदना की निर्मिति से जोड़ते हैं तो उसे निहायत ही नए संबंद्ध विच्छेदक क्षण(moment of dissociation) के रूप में देखते हैं. यह उत्तरौपनिवेशिक इतिहास दृष्टि का प्राथमिक आधार है. लेकिन क्या औपनिवेशिक ज्ञानकाण्ड ने पहले की ज्ञान परम्पराओं और ज्ञान के लोकपरक आख्यानों को सचमुच ही एक सिरे से बदल दिया? इसी सवाल को रंजीत गुहा ने भी दूसरे तरीके से ‘Dominance without Hegemony’ में उठाया है.

राज की विचारधारा के मूर्तिमान ज्ञानकाण्ड के कारण शुरू हुई राजनीति और उस ज्ञानकाण्ड के बाहर पड़ी जनता के असंबद्ध विचारधारात्मक निर्मिति (loose ideological construct) के बीच क्या सचमुच कोई अंतर नहीं था? क्या सचमुच सूर के भ्रमरगीतों  और तुलसी की रचनाओं में मिलने वाला प्रखर निर्गुण विरोध (वैचारिक और सामाजिक), और बाद के पंथों की एक खास सामाजिक पृष्ठभूमि , जिसको ‘कबीरपंथ और सामाजिक प्रतिरोध’ जैसे अध्ययनों में डेविड लोरेंज़न जैसे विद्वानों ने दिखाने की कोशिश की है, का कोई अर्थ नहीं है? क्या अठारहवीं सदी में ब्राह्मणवाद और राज्य सत्ता के संबंद्ध में होने वाले नए परिवर्तनों का चरित्र हमें खुद भक्ति में निहित स्वरूपगत भेद की ओर ध्यान नहीं दिलाता? क्या तब भक्ति के किसी ऐसे लोकवृत्त की कल्पना की जा सकती है जो अंतर्विरोध से रहित हो? क्या भक्ति का सगुण वृत्त खुद आधिकारिक वृत्त के लिए वैचारिक और सामाजिक आधार नहीं रखता था? क्या औपनिवेशिक काल में भक्ति के सगुण राम भक्ति लोक वृत्त का आधिकारिक औपनिवेशिक वृत्त बनना उस खास ऐतिहासिक प्रक्रिया की तार्किक परिणति नहीं है जिसको मुक्तिबोध ने निर्गुण भक्ति के क्रांतिकारी दांत उखाड़ने वाली कह कर सगुण रामभक्ति की ओर इशारा किया था? इस प्रक्रिया को समझे बिना हम उस गलती को भी नहीं समझ पायेंगे जो रंजीत गुहा जैसे सबाल्टर्न इतिहासकार की भक्ति विषयक समझदारी से होती है. इन इतिहासकारों के लिए भक्ति की औपनिवेशिक परिभाषाएँ ही,जिसमे भक्ति को एक सगुण समर्पणवादी सामंती विचारधारा की तरह देखा गया है, व्याख्या का आधार बनती है. इसीलिए ये इतिहासकार भक्ति को सामंती अधीनस्थता की विचारधारा के रूप में देखते हैं और इस एकपक्षीय विचार के कारण औपनिवेशिक अधीनस्थता के लिए पहले से उपलब्द्ध विचारधारा के रूप में इसको निरुपित करते हैं.[17] प्रतिरोध की विचारधारा के रूप में भक्ति का वास्तविक निर्गुण आख्यान उनकी निगाह से गायब रहता है, और इसीलिए औपनिवेशिक प्रभुत्व का भी गैरद्वंद्वात्मक निरूपण हो जाता है. इसलिए ये सबाल्टर्न एक स्तर के बाद बंकिम और गांधी के माध्यम से ही निम्नवर्गीय इतिहास लेखन का दावा करते हैं. और इसी प्रवृत्ति की ओर हिंदी के कुछ विद्वान आलोचक ‘आरंभिक आधुनिकता’ के आख्यान के सहारे पहुंचते हैं. मजेदार बात है की इनके पास सामंतवाद आलोचना की कोई कैटेगरी ही नहीं होती. यहाँ यह भी देखना मजेदार होगा कि औपनिवेशिक ज्ञानकांड के प्रभाव में पैदा हुए राजनीतिक आन्दोलनों ने उपनिवेशपूर्व के सामाजिक-राजनीतिक अंतर्विरोधों को कैसे एक निश्चित दिशा प्रदान की और इनका विभिन्न सामाजिक प्रवर्गों के विश्वदृष्टि पर कैसा प्रभाव पड़ा. दरअसल औपनिवेशिक ज्ञानकाण्ड की द्वंद्वात्मकता को समझाने का प्रयास करना ही होगा.

औपनिवेशिक ज्ञानकाण्ड की द्वंद्वात्मकता को समझे बिना ही हम निकोलस डर्क्स जैसे उत्तर-औपनिवेशिक इतिहासकारों की इस मान्यता को मान लेते हैं कि ब्राह्मणवाद औपनिवेशिक प्रशासकों और हिन्दुस्तानी ओफिसिअल ब्राह्मणों की सांठ-गाँठ की उपज है. इसके चलते औपनिवेशिक काल में ब्राह्मणवाद को फिर से खोजा गया. वरना भक्ति के लोकवृत्त के कारण ब्राहमणवाद तो स्वतः ही एक नोर्मेटिव व्यवस्था से अलग कुछ नहीं थी. जातिनिरपेक्ष हिंदू परम्परा ही मुख्य थी. और देशज आधुनिकता में होने वाले परिवर्तनों की दिशा को अवरुद्ध करते हुए औपनिवेशिक ज्ञानकाण्ड ने हमारी अपनी परम्परा से हमें महरूम कर दिया और हमारी राजनितिक प्रक्रियाओं को गलत दिशा प्रदान की. इस औपनिवेशिक ज्ञानकाण्ड के खिलाफ कोई लड़े तो वह राजनीतिक और दार्शनिक स्तर पर गांधी !

 यह बात तो तय है कि ब्राह्मणवाद एक विचारधारा के रूप में कभी एक सा नहीं था. इतिहास के अलग अलग काल खण्डों में समाज के स्तरीकृत जातिभेदों में परिवर्तन होते रहे हैं. इन परिवर्तनों का सम्बन्ध भूमि पर विभिन्न समूहों के अधिकार और राज्य के निर्माण प्रक्रिया से भी जुड़ा हुआ है. भूमि संबंधों में परिवर्तन के कारण कुछ जातियां वर्णाश्रम में ऊपर चले जाते रहे हैं. नयी व्यापारिक गतिविधियों ने नयी जातियों को वर्णाश्रम में शामिल किया है. परन्तु एक पदानुक्रमिक संरचना के रूप में ब्राहमणवाद, एक शोषणकारी विचारधारा के रूप में ब्राह्मणवाद चला आया है. इस विचारधारा का सत्ता तंत्र से भी बहुत करीबी सम्बन्ध रहा है और लगातार शासकीय विचारधारा के रूप में भी प्रभावी रहा है. मध्यकाल में इस्लाम के आगमन के साथ इस शासकीय विचारधारा को पहले की अपेक्षा कहीं अधिक चुनौती मिली. परन्तु तुर्क-मुग़ल सत्ता ने भी आमतौर पर शासकीय कार्यों में इस विचारधारा को स्वीकार ही किया था. लेकिन राज्य के बदलते स्वरुप और १४वीं १५वीं सदी तक आते आते नगरीकरण और  वाणिज्यीकरण की तेज होती प्रक्रियाओं ने ब्राह्मणवादी विचारधारा को कड़ी चुनौती दी. धर्म मत के रूप में भी इस्लाम ने चुनौती पेश की. देश्यभाषाकरण की प्रक्रिया ने कुछ पहले ही साहित्यिक संस्कृति को भी संस्कृत-अपभ्रंश की सार्वत्रिकता और अर्द्ध-सार्वत्रिकता से मुक्त कर दिया था. राज्य के स्वरूपों में होने वाले परिवर्तनों के साथ इस नयी विकसित देश्यभाषाकरण का गहरा रिश्ता है जिसे शेल्डन पोलक ने समझने की कोशिश की है. परन्तु दक्षिण भारत से उत्तर भारत में देश्यभाषाकरण की प्रक्रिया भिन्न थी और इस प्रक्रिया में  तुर्कसत्ता के साथ भिन्न संस्कृति के आगमन ने बड़ी भूमिका अदा की थी. यही कारण है दक्षिण भारत की अपेक्षा उत्तरभारत की भक्ति ने भी ज्यादा रेडिकल रुख अपनाया था. वह राज्य और संस्कृति के पोलिटि के दक्षिण भारतीय रूपों से ज्यादा मुक्त भी हो पायी. इसलिए भी भक्ति के उद्भव में इस्लाम के चार आने के ‘प्रभाव’ को चार आने तक सीमित करना भूल है. और इसलिए भी भक्ति के विकास में इस्लाम की भूमिका को भी कम करके आंकना भूल है. इसलिए कबीर जैसे रेडिकल चिंतकों की अकथ कहानी में इस्लाम की भूमिका का अनदेखा किया जाना भूल है. और इसलिए भी गाँधी की देशज आधुनिकता से कबीर की ‘आधुनिकता’ भिन्न विचारसरणी वाली है.

बहरहाल ब्राह्मणवाद में जो दरार १५वीं सदी के आसपास पैदा हुई उसमे मुग़ल सत्ता के पतन के साथ बदली हुई परिस्थिति में फिर से एक पुनरुत्थान देखने को मिलता है. जो इतिहासकार उत्तर-औपनिवेशिक इतिहास दृष्टि से उतने आक्रान्त नहीं हैं, उन्होंने इस प्रक्रिया को बखूबी लक्ष्य किया है. बहुत सारे इतिहासकारों को छोड़ भी दिया जाए तो सिर्फ उमा चक्रबर्ती की ‘जेंडरिंग कास्ट’ में उन्होंने दिखाया है कि औपनिवेशिक शासकों ने १८वीं  सदी में आरम्भ हुए राज्य के ब्राह्मणीकरण की प्रक्रिया को और ज्यादा तेज किया, तथा उसे संस्कृत के उच्च पाठों के सहारे रिजिड और कोडीफाइ भी किया. लेकिन इस शासकीय प्रक्रिया के बाहर ब्राह्मणवाद का शोषणकारी स्वरुप तब भी ज़ारी था और शासकों के लिए कई जगह मुश्किल निर्णयों का सबब भी बनता था[18]. साथ ही इस शोषण से मुक्ति के संघर्ष भी चल रहे थे. फूले जैसे चिंतकों ने धार्मिक मुहावरों से बाहर जाकर पूरे ब्राह्मणीय संरचना को शोषण की संरचना के रूप में व्याख्यायित किया और उसे अस्वीकार किया. संस्कृतिकरण और सुधारवादी कर्मकांडों की आलोचना की. उन्होंने ब्राह्मणीय संरचना में बद्ध निम्न जातियों की अवरुद्ध ‘सांस्कृतिक कल्पना’ को मुक्त करने का प्रयास किया. धर्म से बाहर जाकर समाज में स्थित सामाजिक और आर्थिक अंतर्विरोधों को जाति व्यवस्था के प्रश्न के केन्द्र में लाया. उनका लेखन उन लोगों से अलग था जो अपनी-अपनी जातियों का इतिहास लिख रहे थे या फिर उच्च जातियों के उन लेखकों से जो जाति को गलत और बाध्यकारी सामंजस्य के रूप में देखते थे. आगे चलकर फूले की परंपरा में पेरियार और अम्बेडकर जैसे चिंतकों ने महती भूमिका निभाई. हम उनके विचारों से संवाद कर सकते हैं, आलोचना कर सकते हैं, उन्हें कई जगह नकार सकते हैं, लेकिन जातिगत शोषण के गांधीवादी हल से तब भी बेहतर स्थिति में उनके चिंतन को पाते हैं. यह अकारण नहीं कि ब्राह्मणवाद के शोषणकारी स्वरुप को ठेठ जिंदगियों से उठाने वाले प्रेमचंद कफ़न की मूलगामी समीक्षा तक पहुंचते हैं और इस प्रकार कोलोनिअल ज्ञानकाण्ड के बाहर पडी रोज़मर्रा की जिंदगियों में उस सत्य को देख लेते हैं जो अग्रवाल और डर्क्स जैसे उत्तरौपनिवेशिक नहीं देख पाते! जाति के साथ भूमि संबंधों को नज़रअंदाज करते हुए उत्तर-औपनिवेशिक आलोचना भी दरअसल अस्मितामूलक विमर्शकारों और राजनीतिज्ञों की गलती को ही दुहराता है. फिर उपनिवेश विरोधी आंदोलन की भिन्न ध्वनियों को भी अस्वीकार करते हुए गांधी के चिंतन में उसकी सही दिशा तलाश करता है.[19]यह औपनिवेशिक काल के पोलिटिकल कंडीशनिंग का तो नकार है ही वर्तमान पोलिटिकल कंडीशनिंग का भी नकार है. जाति से वर्ग में रूपान्तरण की प्रक्रिया को समझे बिना हम वर्तमान नवउदारवादी-नवउपनिवेशवादी कंडीशंस से लड़ नहीं सकते. और इस प्रकार भारत के अर्द्ध-सामंती अर्द्ध-औपनिवेशिक चरित्र को समझे बिना ब्राह्मणवाद को भी नहीं समझ सकते. आज कोई भी सामजिक समूह वैश्विक पूंजीवाद से बाहर नहीं है. अगर हमें इतिहास से शिक्षा लेना है तो प्रतिरोध की उस धारा से प्रेरणा लेनी होगी जो कबीर आदि के यहाँ अपने श्रम की विचारधारा में निहित थी और धर्म की मूलगामी आलोचना करती थी. जैसे फूले ने जातिव्यवस्था की सामजिक-आर्थिक कंडीशनिंग पर ध्यान दिलाया. कबीर की परम्परा कोई भी हो गांधी की नहीं है. कबीर की देशज आधुनिकता कोई भी हो गांधी की देशज आधुनिकता नहीं थी. फिलहाल इतना ही. अग्रवाल जी की कहानी के दूसरे हिस्सों पर बहस फिर कभी.


[1] कुछ विद्वानों ने ग्रियर्सन पर पश्चिमी हिन्दुस्तान में भी तुलसी के महत्व को बढ़ा-चढ़ा कर बताने का आरोप लगाया था. उसके उत्तर में ग्रियर्सन ने एक चिट्ठी का हवाला दिया था जो उसे किसी मिशनरी मि. डन ने लिखा था. मि. डन ने इलाहाबाद ,दिल्ली और गुडगाँव जिलों के अपने १९ साल के अनुभव के आधार पर तुलसी के बारे में ग्रियर्सन की बात की पुष्टि की, तथा लिखा की तुलसी के दोहे या चौपाइयों को सुनांने से प्रशासकों का काम कितना आसान हो जाता है क्योंकि लोग तब उनसे अपना जुड़ाव महसूस करते हैं. लेकिन उसने अपने पत्र में यह भी बताया था कि कबीर के दोहे भी उतने ही लोकप्रिय हैं. हिंदू ब्राह्मण और बनियों के बीच तुलसी ज्यादा स्वीकार्य थे जबकि “The influence of Kabir is, I think fully important, in fact, Kabir touches races and castes who have little in common with Krishanism and who know little of राम दशरथ का बेटा, but much of राम जग का करता, as they phrase it (and pronounce it too.) Kabir is, if I mistake not the great Guru of kolis and chamars as well as many higher in the scale”. (pp.462-63)दूसरी ओर तुलसी के प्रभाव से बाहर रहने वाले मुस्लिम समुदाय की ओर भी इशारा किया है. और इस समुदाय को प्रभावित करने के लिए प्रशासकों और मिशनरियों को उर्दू भाषा का ज्ञान होना चाहिए. “You can govern Indians through the medium of Urdu or Pedantic Hindi. If you want to win the Mohammadan you need to speak good Urdu, throwing in a quotation or two from SADI or HAFIZ. But for the real Hindu you must take the opposite line. His vernacular poets are the key to his affections, and there do occasionally come days, when the mere conscientious but unsympathetic official will be powerless”(pp.463) देखें: Appendix 1 , On The Influence Exercised by Tulasi Das in Western Hindostan .JRAS- 1903. तुलसी के सामान ही प्रभावशाली और लोकप्रिय कबीर को ग्रियर्सन ने लगभग छोड़ ही दिया है अपने भक्ति आख्यान में! साथ ही देखें, Vijay Pinch,  Bhakti and the British Empire ,Past & Present. Volume: 179. Issue: May,2003.

[2] देखें, रामचंद्र शुक्ल,२००४. सूरदास, ‘भक्ति का विकास’ में.प्रकाशन संस्थान: नयी दिल्ली.

[3] देखें पीताम्बर दत्त बडथ्वाल, १९५०, हिंदी काव्य में निर्गुण सम्प्रदाय, अनु. श्री परशुराम चतुर्वेदी, संपा.- डॉ. भागीरथ मिश्र. अवध पब्लिशिंग हाउस: लखनऊ.खास कर पृष्ठ- ८४.

[4] वही, पृष्ठ-७०, ८०. निर्गुण आन्दोलन को इन्होने पहले के वैष्णव आंदोलन से अलग करने की कोशिश इस्लाम और शुद्र जातियों के विशेष सामजिक सन्दर्भ में की है. लेकिन है ये भी वैष्णव ही. एक जगह वह लिखते हैं; “इस प्रकार हम देखते हैं कि निर्गुण मत के मूल स्रोत का पता चाहे हम जिस भी प्रकार लगाना चाहें, सबसे अधिक उस वैष्णव सम्प्रदाय में मिलाता है जो इससे अत्यंत निकट था और केवल कुछ ही बातों के लिए हमें इस्लाम तथा सूफी स्रोतों की ओर जाना पडता है.”(पृष्ठ-३२२) और उसमे भी सूफी दर्शन तो खुद ही भारतीय स्रोत से निकला है. अर्थात वैष्णव ही है.(पृष्ठ-७४)

[5] देखें ग्रियर्सन, JRAS-1903(पृष्ठ- ४४९)और JRAS-1907(पृष्ठ- ३१४) इस विषय पर विस्तृत चर्चा के लिए देखें. हावले जॉन स्ट्रैटन, introduction. International Journal of Hindu Studies 11, 3 (2007): 209–25.

[6] देखें पुरुषोत्तम अग्रवाल. अकथ कहानी प्रेम की: कबीर की कविता और उनका समय. पृष्ठ-५७.राजकमल प्रकाशन, दिल्ली-२०१०.

[7] एंटोनियो ग्राम्शी. सेलेक्सनस फ्रॉम दी प्रिजन नोटबुक्स, अनुवाद. क्युन्तिन होयरे और जयोफ्रे नोवेल स्मिथ. पृष्ठ-३२५-३४३.इन्टरनेशनल पब्लिशर,न्यू योर्क:१९७१.

[8] यहाँ ग्राम्शी मार्क्स के थेसिस ओन फायरबाख के ग्यारहवें थेसिस के सन्दर्भ में दुनिया को बदलने की चेतना को दर्शन के अर्थ में ले रहे हैं| वह दुनिया को बदलने के लिए किये जा रहे श्रम की चेतन विचारधारा के अर्थ से ‘सामान्य बोध’ को अलग करने की कोशिश करते हैं|

[9][9]  एंटोनियो ग्राम्शी. सेलेक्सनस फ्रॉम दी प्रिजन नोटबुक्स, अनुवाद. क्युन्तिन होयरे और जयोफ्रे नोवेल स्मिथ. पृष्ठ-३३३. इन्टरनेशनल पब्लिशर,न्यू योर्क:१९७१.

[10] वही,पृष्ठ-३२७.

[11] “Normal Times”: as opposed to the exceptional (and hence potentially revolutionary) moments in history in which a class or group discovers its objective and subjective unity in action.(pp.327)

[12] “Philosophy is criticism and superseding of religion and “common sense”. In this sense it coincides with “good” as opposed to “common sense”.”(pp.326)

“…Overcoming bestial and elemental passions through a conception necessity which gives a conscious direction to one’s activity. This is the healthy nucleus that exist in “common sense”, the part of it which can be called “good sense” and which deserves to be made  more unitary and coherent”(pp.328)

[13] “Every social stratum has its own ‘common sense’ and its own ‘good sense’, which are basically the most widespread conception of life and of man. Every philosophical current leaves behind a sedimentation of “common sense”. This is the document of its historical effectiveness. Common sense is not something rigid and immobile, but is continually transforming itself, enriching itself with scientific ideas philosophical opinions which have entered in ordinary life. ‘Common sense’ is the folklore of philosophy, and is always half-way between folklore properly speaking and the philosophy, science and economics of the specialist. Common sense creates the folklore of  the future, that is a relatively rigid phase of popular knowledge at a given place and time”(pp-326) (emphasis mine)

[14] मध्युगीन धर्मविरोधी आंदोलनों और चर्च के विशेष सन्दर्भ में ग्राम्शी ने इस प्रक्रिया को कुछ यूँ व्यक्त किया है-“ In the past such divisions  in the community of the faithful were healed by strong mass movements which led to ,or were absorbed in, the creation of new religious orders centered on strong personalities (St Dominic, St Francis)… The heretical movements of the Middle Ages… represented a split between masses and intellectuals within the church. The split was ‘stitched over’ by the birth of popular religious movements subsequently reabsorbed by the Church through the formation of the mendicant orders and a new religious unity”(pp331 and 331n). भारत में चूँकि चर्च जैसी कोई केंद्रीय सत्ता नहीं थी और न ही धर्म ठीक रीलिजन, इस लिए यहाँ नयी धार्मिक व्यवस्था का स्वरुप ठीक उसी तरह नहीं रहा जैसा यूरोप में बना था| अतः सगुण भक्ति के चरित्र पर बात करते हुए इस भिन्न सन्दर्भ को ध्यान में रखना चाहिए| साथ ही दसवीं से चौदहवीं सदी तक होने वाले परिवर्तनों की क्षेत्रीयता और उसके पार-क्षेत्रीय मुहावरों को भी ध्यान में रखना चाहिए| नए वैष्णव धर्म को चर्च की एकता कारी धार्मिक विचारधारा के रूप में लेने से भारी भूल की संभावना है| अकारण नही कि इस नीचे से बनते वैष्णव धर्म को द्विवेदी जी ने लोक-धर्म ही माना था| यह निश्चित है की इस प्रक्रिया में चलने वाले वर्चस्व और अधीनस्थता की प्रक्रियायों को उनके खास सामजिक वर्गों के सन्दर्भ में द्विवेदी जी नही देख पाए थे|

इस प्रक्रिया की विशेष चर्चा बंगाल वैष्णव स्कूल के सन्दर्भ में पार्था चटर्जी ने भी की है| देखें पार्था चटर्जी. ‘ ‘कास्ट एंड सबाल्टर्न कांसस्नेस’, सबाल्टर्न स्टडीज vi: रायटिंगस ओन साउथ एशियन हिस्टरी एंड सोसाइटी, एडी. बाइ रंजीत गुहा,पृष्ठ-१६९-२०९. ओ.यु.पी., नई दिल्ली:१९८९.

[15] ग्राम्शी,वही,पृष्ठ-३४८.

[16] डेविड लोरेंजन.२०१०. निर्गुण संतों के स्वप्न. अनु. धीरेन्द्र बहादुर सिंह. श्रृंखला संपादक- पुरुषोत्तम अग्रवाल. पृष्ठ-२१९. राजकमल: दिल्ली.

[17] देखें.Ranajit Guha.”Dominance Without Hegemony And Its Historiography” , in ‘Subaltern Studies VI: Writing on South Asian History and Society’; ed. by Ranajit Guha; pp. 257-265;Oxford ,New Delhi 1989. रंजीत गुहा लिखते हैं : “If the politics of collaboration was informed by the Humean idiom of obedience- however uneasy that obedience might  have been under the hushed, almost hopeless, urge for enfranchisement among the colonized- it drew its sustenance, at the same time, from a very different tradition- the Indian tradition of Bhakti. All the collaborationist moments of subordination in our thinking and practice during the colonial period were linked by Bhakti to an inert mass of feudal culture which has been reproducing loyalism and depositing it in every kind of power relation for centuries before the British conquest.”

[18] इस विषय पर विस्तृत चर्चा के लिए देखें. उमा चक्रबर्ती:२००३. जेंडरिंग कास्ट: थ्रू अ फेम्निस्ट लेंस. खास कर ये दो अध्याय. ‘प्रीकोलोनिअल स्ट्रक्चर ऑफ कास्ट एंड जेंडर:ऐन एटीन सेंचुरी इक्साम्प्ल’ और ‘कास्ट इन द कोलोनिअल पीरियड’. स्ट्रेस: कोलकाता.

[19] देखें. निकोलस डर्क्स:२००२. कास्ट्स ऑफ माइंड: कोलोनिअलिस्म एंड मेकिंग ऑफ मॉडर्न इंडिया. पृष्ठ- २९८-३०२ खास कर. परमानेंट ब्लैक: दिल्ली.

मार्तंड प्रगल्भ जे.एन.यू. के भारतीय भाषा केंद्र में पी.एच.डी. के लिए शोधरत    हैं.


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