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भाषा में समाया ब्राह्मणवाद: रामजी राय

संस्कृत से शब्द लेते-लेते, ‘संस्कृत के पेट से जनमी हिंदी’, संस्कृत के पेट में समाने लगी। कुछ और ज्यादे बदशक्ल होकर। शब्द भंडार संस्कृत का, वाक्य प्रकार अंग्रेजी का। रंग नारंगी का और ढंग फिरंगी का। मुस्टंडे को क्या चाहिए तो हाथ में एक डंडा। और राष्ट्रीय एकता का डंडा लेकर घूमने लगी हिंदी, अपनों से भी बेगानी बनकर। अब अगर डंडा मारकर आप लोगों को स्वर्ग में ही सही ले जाएं तो कौन जाएगा भला।

By रामजी राय

संस्कृत कौन देस को बानी उर्फ  भाषा में समाया ब्राह्मणवाद

Magura Cave in north western Bulgaria

Magura Cave in north western Bulgaria

कबीर ने कहा ‘संसकीरत है कूप जल भाखा बहता नीर।’ अर्थात संस्कृत जीवित आदमियों की भाषा नहीं है। तुलसी इस झगड़े में पड़ना ही नहीं चाहे– ‘का भाखा का संसकिरत प्रेम चाहिए सांच।’ अर्थात बीच का रास्ता निकाला और सरक लिए। लिखा अवधी में, मंगलाचरण गाया संस्कृत में। हमारी सरकार ने इस बाबत सबसे न्यारा रास्ता अपनाया। जिन 15 जीवित भाषाओं को संवैधानिक दर्जा दिया उनमें से एक संस्कृत भी है। इसका तर्क क्या है यह अपन को आज तक समझ न आया। चलो माना कि यह एक पुरानी शास्त्रीय भाषा है, इसमें हमारी प्राचीन संस्कृति की बेशकीमती धरोहर दबा के रखी हुई है, इसे जाने बगैर हम अपनी जड़ों से कट जाएंगे। फिर तो इसे ढंग से पढ़ने-पढ़ाने का इंतजाम करने से काम नहीं चलेगा। जड़ों से जुड़े रहने के लिए ‘मरों’ से जुड़े रहना भर ही नहीं, उन्हें जीवित मान कर चलना भी जरूरी बना दिया जाएगा?

                लीजिए जनाब, अब संस्कृत में समाचार सुनिए। सुनिए अब आकाशवाणी से देववाणी में समाचार। यह भी अपन को किसी कदर पल्ले नहीं पड़ता कि इसकी क्या जरूरत? वे कौन लोग हैं भई जिनको संस्कृत में खबरें सुनाई जा रही हैं। शायद पितरों को। यहीं आकर निर्मल वर्मा का कहा साफ समझ आता है कि ‘अतीत हमारे यहां व्यतीत नहीं, वह हमेशा जीवित वर्तमान होता है।’

                बचपन से यही सुनते आए हैं कि संस्कृत को किसी ने नहीं जना। यह देवताओं की वाणी है। जिस पुस्तक से संस्कृत का परिचय कराया गया उस पाठ्य-पुस्तक का भी नाम था देववाणी परिचायिका। संस्कृत सीधे देवताओं के मुंह से निकली है जैसे ब्रा से ब्राह्मण। इसलिए इसे किसी ने नहीं जना। बल्कि यही सभी भाषाओं की जननी है। यह जुमला इतना सार्वभौमिक बना दिया गया है कि इसको लेकर दिमाग में कोई और ख्याल ही नहीं आता। हिंदी के परम भाषाविद किशोरी दास बाजपेयी कहते-कहते मर गए लेकिन किसी ने उनकी एक न सुनी कि भैया हिंदी संस्कृत से नहीं निकली है। उसका स्वतंत्र, भिन्न आधार है। नहीं तो संस्कृत में रामः गच्छति और सीता गच्छति अर्थात राम (पुलिंग और सीता (स्त्रीलिंग) दोनों के लिए गच्छति तो वह किस व्याकरण के किस नियम से हिंदी में राम जाता है और सीता जाती है हो जाता है यह कोई हमें बताए। उनको तो किसी ने नहीं बताया। हां उनके जीवन के अंतिम दिनों में एक बार इलाहाबाद में मैंने उनसे यह सवाल उठाया तो बकौल किशोरी दास बाजपेयी “जब कभी अपनी देशी सरकार (राष्ट्रीय सरकार) आएगी तो उसे हमारी बात जरूर समझ में आएगी।” तो क्या यह सरकार विदेशी है? रंग-रूप से भले न सही ढब-ढंग से तो विदेशी ही लगती है। ज्यादा नहीं तो कम से कम भारोपीय के वजन पर यूरोइंडियन तो लगती ही है, आपको शक है?

                भक्ति आंदोलन ने भारतीय भाषाओं, बोलियों को फूलने-फैलने का अवसर मुहैया किया। संस्कृत के एकछल प्रभाव को तोड़ा, उसे कूप जल घोषित किया। यह कुआं कहिए तो ‘ठाकुर का कुआं’ रहा जहां से दूसरा कोई पानी नहीं ले सकता था। वह बंधा पानी था। सरब-सुलभ बहता नीर नहीं। एकनाथ ने कहा “भगवान भाषाओं में भेदभाव नहीं करता। किसी को कम किसी को ज्यादा मान्यता नहीं देता।” लेकिन हमारी सरकार ऐसा करती है, कहती भले नहीं, और यही करते थे अंग्रेज।

                आजाद भारत में जब सरकार के सामने भारतीय भाषाओं की विविधता, उनकी अलग-अलग स्वतंत्र सत्ता को स्वीकृत करने का सवाल आया तो उसने विविधता की जगह मानकीकरण (स्टैंडर्डाइजेशन) पर बल दिया। विविधता को दरकिनार कर उनके एकता के पहलू खोजने के जरिए मानकीकरण करने पर बल देना दरअसल उनकी स्वतंत्र हैसियत को नकारना था। यह भेद-भाव की नीति की उपज थी। इसी नीति के तहत वह संस्कृत को भाषाओं की भाषा का दर्जा देती है। फिर तो आप मानकीकरण में समाए इस भाव के अपने-आप शिकार हो जाते हैं कि कुछ भाषाएं उच्च कुल की हैं, कुछ नीच कुल की और कुछ पिछड़े कुल की। और इस तरह भाषाओं के भीतर अगड़ा-पिछड़ा, दलित भाषाओं का भेद पैदा होने लगता है। और यह हुआ भी है।

                संस्कृत को न केवल जीवित भाषा का दर्जा दिया गया बल्कि अन्य भाषाओं को यह नसीहत भी दी गई कि वे ज्यादा से ज्यादा शब्द संस्कृत से लें। संस्कृत से लेकर अपना शब्द भंडार बढ़ाने को राष्ट्रीय एकता मजबूत बनाने का पर्याय बना दिया गया। और इस हिसाब से हिंदी को सबसे अग्रगणी घोषित किया गया क्योंकि यह माना गया कि हिंदी सीधे संस्कृत के पेट से निकली है। जैसे साझा संस्कृति या कहिए सांस्कृतिक एकता का भार संस्कृत ढोती थी उसी तरह आधुनिक भाषा में राष्ट्रीय एकता का भार हिंदी ढोएगी। इस समूचे चक्कर को बाकायदा संवैधानिक रूप दे दिया गया। इस निर्देश के साथ कि हिंदी अपने शब्द भंडार का विस्तार खास तौर पर संस्कृत के शब्द भंडार से शब्द लेकर करेगी।

                लेकिन हुआ क्या? संस्कृत से शब्द लेते-लेते, ‘संस्कृत के पेट से जनमी हिंदी’, संस्कृत के पेट में समाने लगी। कुछ और ज्यादे बदशक्ल होकर। शब्द भंडार संस्कृत का, वाक्य प्रकार अंग्रेजी का। रंग नारंगी का और ढंग फिरंगी का। मुस्टंडे को क्या चाहिए तो हाथ में एक डंडा। और राष्ट्रीय एकता का डंडा लेकर घूमने लगी हिंदी, अपनों से भी बेगानी बनकर। अब अगर डंडा मारकर आप लोगों को स्वर्ग में ही सही ले जाएं तो कौन जाएगा भला।

                कुछ लोगों को यह हिंदी की अपनी निजी प्रकृति लगती है। लेकिन यह हिंदी की अपनी प्रकृति नहीं है। यह पाई प्रकृति है जिसे हिंदी को ओढ़ा दिया गया है। याद रखिए आप किसी भाषा से सिर्फ शब्द भंडार नहीं ले सकते। उसके साथ आपको कमोबेश उसका समूचा संसार, उसकी संस्कृति, उसका संस्कार भी बरबस लेना पड़ता है। संस्कृत के साथ हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं का बैठाया गया यह रिश्ता एक सोची-समझी नीति का परिणाम है। भाषा के भीतर समाया यह ब्राह्मणवाद है जिसका शिकार सबसे ज्यादा हिंदी हुई है, इससे निजात पाना भाषाओं के प्रति जनतांत्रिक रवैया अपनाने के लिए बेहद जरूरी है। प्रसंगवश यह भी कि इस ब्राह्मणवाद की दूसरी भुजा हिंदू सांप्रदायिकता भी है। इसका भाषाई प्रमाण भी आप देखें तो हिंदी न केवल अपनी बोलियों से दूर जा बैठी बल्कि उर्दू से बैर मोल लेने की हद तक जा पहुंची है। उसी उर्दू से जिसकी वह सहोदर है, जिन्हें कभी एक ही नाम से जाना जाता था। प्रतिक्रिया में उर्दू के भीतर मुल्लावाद ने सर उठाया। वह फारसी होने लगी। आखिर ब्राह्मणवाद, मुल्लावाद भी तो सहोदर हैं।

                जब हमारे शासक वर्ग को यह लगने लगा कि अपने इस रूप में हिंदी बोझ बनने लगी है तो उसमें सुधार के लिए चट उसने दूसरा नुस्खा थमाया। हिंदी को चाहिए कि वह अपना शब्द भंडार अंग्रेजी और अन्य दूसरी भारतीय भाषाओं से भी ले। अन्य भारतीय भाषाओं से भी …. करनी में होना है अंग्रेजी से लेना। और आजकल टीवी धारावाहिकों और अन्य कार्यक्रमों में जिस तरह की हिंदी अख्तियार की जा रही है, उसे लोग हिंगरेजी कहने लगे हैं। तो जनाब अब भी आपको यह मानने में शक है कि हमारा शासक वर्ग मिजाज से यूरोइंडियन है?

                लेकिन जनजीवन के स्तर पर हिंदी ने दूसरा ही रास्ता अख्तियार कर रखा है। हिंदी का बिहारी रूप, बिहारी हिंदी के बतौर तो खासा परिचित है ही। इसी राह पर उसके और भी किसिम-किसिम के रूप आप देख सकते हैं। कहीं बंगाली हिंदी, कहीं मेघालयी और कहीं तमिल हिंदी आदि रूपों में। फिल्मी हिंदी से तो शायद ही कोई अपरिचित हो। अपने जन चरित्र को विकसित करने में हिंदी को किसी बनावटी शुद्ध रूप की चिंता नहीं है। यही उसका मूल स्वभाव रहा है। भक्ति आंदोलन से उपजा हिंदी-उर्दू का यह स्वभाव ही आजादी के दिनों में सबके दुलार का कारण बना था। इससे अलग होकर वह सबके हिकारत का पात्र बन रही है। खुद उनके हिकारत का भी जिनके बीच वह बोली जाती है। अपने इस जीवन-रूप के लिए ‘हिंदी अधिकारियों’, ‘हिंदी सेवकों’, ‘संवैधानिक व्यवस्थाओं’ की मुहताज नहीं है। इसका जीवन-रूप संवैधानिक व्यवस्था के खिलाफ विद्रोह करके ही विकसित हुआ है। वरना हिंदी सेवकों ने इसे मार डालने में कोई कसर बाकी नहीं छोड़ रखी है।

                भाषा में समाया ब्राह्मणवाद हिंदी तक ही नहीं सीमित है। इसका असर कमोबेश सभी प्रांतीय भाषाओं पर भी है। भाषायी आधार पर राज्यों का गठन एक स्तर पर कमोबेश हुआ। लेकिन यह अंत नहीं है। हर प्रदेश की राज्य भाषा अपने प्रदेश की अन्य दूसरी भाषाओं, बोलियों के साथ भेदभाव बरतती दिखती है। इस प्रक्रिया में उनका भी विकास पथरा रहा है, लेकिन उनका भी जीवनगत रूप दूसरा ही रास्ता अख्तियार कर रहा है, वैसा ही जैसा हिंदी ने अपना रखा है। भारतीय भाषाओं के बीच यह रिश्ता ही भविष्य की एकता का नया आधार है।

                भाषाओं का जनतंत्र जनता के जनतंत्र से सीधे जुड़ा हुआ है। तत्सम के खिलाफ देशज का विद्रोह आज सभी भारतीय भाषाओं, खासकर हिंदी का जीवन-स्रोत है वरना वह राम-प्यारी हो जाएगी।

रामजी राय

रामजी राय

रामजी राय  बहुत कम और तीखा लिखने के साथ-साथ अपनी राजनीतिक सक्रियताओं के लिए जाने जाते हैं। समकालीन जनमत के प्रधान संपादक। जन संस्कृति मंच से जुड़ाव।

आभार-  समकालीन जनमत  (16 जनवरी- 31 जनवरी, 1994)

Shabdanushasan (शब्दानुशासन) – Galauj(गलौज) or Galauca (गलौच) : Ravish K. Chaudhary

Debates presuppose perspectives, the contestation of two different perspectives.A debate has emerged in social media between an editor and a teacher: The contestations of correct usage of words! The editor prescribes what he believes ‘correct’ in accordance with instructions of lexicons and negates the incorrect. The teacher describes what he finds in the current practice of language irrespective of the authority of lexicons.  The contestation is of descriptive vs prescriptive  understanding of language (and grammar). The debate is about shabdanushasan (शब्दानुशासन).

courtesy- Nabu Press

courtesy- Nabu Press

 Galauj(गलौज) or Galauca (गलौच)!

By Ravish K. Chaudhary

A passage from Mahabhasya is worth mentioning.

एवं हि कश्चिद्वैयाकरण आह I कोऽस्य रथस्य प्रवेतेति I सूत आह I आयुष्मन्नहं प्राजितेति I अपशब्द इति I सूत आह I प्राप्तिज्ञो देवानांप्रियो न त्विष्टिज्ञ इष्यत एतद्रूपमिति I वैयाकरण आह I आहो खल्वनेन  दुरूतेन वाध्यामह इति I सूत आह I न खलु वेञः सूतः सुवतेरेव सूतो यदि स्रुवते: कुत्सा  प्रयोक्तव्या दुःसूतेनिति वक्तव्यम् I (Mahabhasya ed. Kielhorn Vol I, 1880, p. 488)

Let’s now read the same in English with little elaboration:

‘ In.this way, as is known, a certain grammarian said : * Who is the pravetr” driver ” of this chariot ?’ The charioteer said : * O long living one, I am the prajitr ** driver ” ‘. The grammarian said : ‘This is an apasabda ” incorrect word”. The charioteer said : ‘Your Honour is praptijna ” one who knows (the outcome of) the application ( of the rules ) “, but not istijna” one who knows the desired usage “. This form (prajitr) is desired ‘. The grammarian said :’ Well, by that Duruta we are pressed hard indeed . The charioteer said: ‘ Certainly, (the word) sitta” charioteer” is not (a derivation) from ( su + utaderived from the verbal base ) veH” to weave “, but suta( is derived) from (the verbal base ) su- ” to set in motion ” only. If your abusive term (had been derived) from sit-, you should have used (the correct form)duhsWa“a bad charioteer “. (Paspasahnika trans: Joshi &Roodbergen University of Poona 1986, p.142)

The passage offers a nice illustration of the point of acceptability and grammaticality. The grammarian who knows the rules (of derivation) is honoured by praptijna.  He is not a person to whom ista(desired) usage is to be asked. The grammarian has no authority on desired usage. Mahabasya suggest that even though the rules of grammar derive what the grammarian has uttered, it is the charioteer whose utterance shall have precedence over the derived word. The grammarian, who only knows Panini’s rule, wrongly believes prajitr to be an apasabda. Indeed the term uttered by the charioteer is desired (isyata etad rupam). The user (of the language), the charioteer in response, to the preaching of grammarian, with a hint of sarcasm, says that the trouble with the grammarian is that he does not know usage.

It is important to find that Mahabhasya prefer the usage of native speaker over the rules of Astadhayayi. It signifies that grammar shall follow the language of native user. Language with its internal dynamics shall mould itself and grammar and lexicons shall follow this flowing current of langauge. Historically, all known languages in its due course have abandoned some words, adopted, formed some new ones, altered some others in its usage or have changed meaning of some of its words. Fluidity is inherent to languages. Languages have adequately borrowed from other languages. Even classical language like Sanskrit and Greek has borrowed from each other. Some examples can be  Pancha (पंच) Pente (Πέντε) Five, Kendra(केद्र) Kentro (κέντρο) Center, Dwi(द्बि) Dio (δύο) Two etc. Mahabhasya also refers to some words of Persian origin which were in use but had become obsolete in time. Some words have reversed its meaning in due course of time. An example is Sanskrit word साहस which is bravery in current use. Earlier the term was used for ‘insulting women’s dignity.  It is possible for a grammarian to derive these words from the rules of language and justify its meaning in the current use? These words are to be used in accordance with the current usage of its native speaker.

Then native users of language use the language with innate competence and not by the instructions of grammarians. The usage of words with this innate competence decides the correct usage of words. In this regard grammarians have no authority. Mahabhasya (81) mentions this view in the passage quoted below:

यल्लोकेऽर्थमुपादाय शब्दान्प्रयुञ्जते, नैषां निर्वृत्तौ यत्नं कुर्वन्ति I ये पुनः कार्या भावा निर्वृत्तौ तावत्तेषां यत्नः क्रियते I तद्यथा-घटेन कार्येकरिष्यन् कुम्भकारकुलं गत्वाऽऽह-कुरू घटं कार्यमनेन करिष्यामीति I न तद्वच्छब्दान्प्रयुयुक्षमाणो वैयाकरणकुलं गत्वाऽऽह्- कुरू शब्दान्प्रयोक्ष्य इति I  तावत्येवार्थमुपादाय शब्दान्प्रयुञ्जते I

(Because, in daily life, having brought to mind different-things(people) use words. They do not put in an effort to make these(words). On the other hand, they do put in an effort to makethings which are karya‘ to be produced . For instance, one whoneeds a pot for some purpose, goes to the house of a potter andsays : ‘ You make a pot. I need a pot for some purpose ‘. (But) one who wants to use words does not go to the house of a grammarian and say : ‘ You make words. I want to use them ‘. (On the contrary,) having brought to mind (a thing), without further ado, he uses words.)

Words are not used by instruction of grammarians. Regarding the origination and the use of words grammar has no authority. No one goes to a grammarian for a word. The (native) speaker who uses the language is the only authority as far as the laukik language is concerned.  No native speaker of a language refers to the lexicons while choosing the words in daily use. Even words of foreign origin have been adopted in languages without the approval of grammarians. English language has adopted words like juggernaut (जगन्नाथ) and satrap of different cultural origin without any grammatical exercise and usage of these words are equally acceptable with words of Greek and Latin origin.

Whether knowledge is the basis of correct usage (शिष्टप्रयोग) or the correct usage (शिष्टप्रयोग)   is the basis of grammatical knowledge has always been the point of contestation. This quest has been in the centre of grammatical studies for time immemorial.  We can infer from the passages, mentioned above, that the early tradition of grammarians suggests correct usage as the basis of grammatical knowledge. That a language and the correct (शिष्ट) use of the language is not dependent upon the knowledge of grammarians. It is the innate competence of the native speakers that make the correct usage. The early traditions of grammarian suggest a prescriptive understanding of language.

 If it is the innate competence of native speakers that decide the correctness of words, then what is शब्दानुशासन all about? If loka prayoga is the pramana in ‘instruction in words’, what does shastra do ? what is grammar good for ? According to Mahabhasya, Shastra provides us dharmaniyama of words used in loka.

लोकतोऽर्थप्रयुक्ते शब्दप्रयोगे शास्त्रेण धर्मनियमः I(Mbh 83)

That the role of shastra is in the dharmaniyama of the words in usage.  What is dharma niyama ? The term dharmaniyama is an ambigious term in the corpora of snaskrit literature. In different context it carries different meanings. It can have multiple connotations depending upon the context. To resolve this we can refer to Kaiyata who is an authority on Mahabhasya with his celebrated tika called Mahabhasya-Pradeep. Kaiyata explains this in following manner: धर्मप्रयोजन इति I लिङादिविषयेण नियोगाख्येन धर्मेण प्रयुक्त्ः इत्यर्थः I i.e. dharma forms the domain of the verb endings called IN,etc. in Panini’s grammar.  That grammar has an assigned role of the analysis.  The earlier tradition, as we can see, assigns the grammarians the role of analyst and not of instructor. The tradition of grammarian in India favours a descriptive understanding of language and grammar.

This is not to say that prescriptive view of language and grammar is the only view available in the tradition of grammarians. BhattojiDikshita’s SiddhantaKaumudi or “Illumination of the established (position)” (17th century) is perhaps the first text in this regard which prescribes the correct usages to the learners of Sanskrit language. The context of this prescription needs explanation. It is important to underline that prescription presupposes something static, already established and unchangeable without having its own dynamics. Surely this not applicable to a language which is active and changing itself by its own inherent dynamics in a given social-cultural context. As discussed earlier, that was case with the language on which Panini and Patanjali were writing sutras and commentary. The language they were dealing with had its regional variants, known to both the scholars. They were even aware of obsolete usage or changed meaning of words. The case with Bhattoji Dikshita was quite different. He was required to teach Sanskrit to   non-native speakers of this particular language. Texts available in the traditions of grammarian were the only means to learn this language. No wonder, prescription of words and rules were inevitable in this particular case.

The prescriptive understanding of language and the attitude of learning correct usage from texts and rules already established has dominated the later Sanskrit traditions.  This attitude has also silently slipped to the grammarians of later Indian languages. Grammarians of later Indian languages, under the dominance of prevalent practice of later Sanskrit grammarians have allowed prescription to be the rule of regulation of their languages without much reflection on the subject. Frequent references to lexicons and grammatical rules to derive words are penchant to align with the tradition of later Sanskrit grammarians without differentiating the context of languages. To some extent it is a  Brahmincal exercise to establish the hierarchy of language, words in use and of the users on the basis of usage. Contrary to this, we can see that for  Panatnjali no word was apraukta as all words have a potential to be used and without the knowledge of a grammarian can be used in different time-space and different regional variants of a language.

In sum, prescription in language cannot be logical if the language is live and dynamic and is actually used by millions of native speaker. It is inherent to the language that its users in due course of time shall modify, alter and change its terms/words/phrases and also the meanings of the words from its present usage. The language in its internal dynamics will change its own shape. It shall borrow, include and exclude words from other languages and alter its form in accordance with its own nature.  Grammarian can not intervene in this process. Any intervention from of a grammarian to prevent this dynamics shall be a futile exercise.  Grammarians are mere spectator and analyst of this dynamics.  The grammarian and lexicons are bound to accept both Galauj(गलौज) or Galauca(गलौच) if found in current use of native speakers.

The very adherence to the correct usage of words has its own problematic from the class perspective. I shall restrain to comment upon that, have heard the editor is anti-Marxist.

ravish

Ravish is an engineering graduate and master in Sanskrith from  JNU. He briefly pursued philosophy at JNU, and is  now an engineering personnel with the ONGC, Mehasana. He has also been involved in the cultural politics. You can contact him through  sampark.ravish@gmail.com.

नाले और रखवाले –एक असाहित्यिक की डायरी: मार्तंड प्रगल्भ

एक साहित्यिक की डायरी’ से तो आप सब परिचित हैं. मुक्तिबोध की इस रचना ने इतनी प्रसिद्धि पाई की असाहित्यिक लोगों ने डायरियां  लिखना ही लगभग बंद कर दिया . इधर एक असाहित्यिक की डायरी हमारे हाथ लगी .इसमें कुछ हालिया घटनाओं और बहसों के हवाले हैं. दिलचस्प लगे तो पढ़ लीजिए . लेकिन याद  रहे , डायरी है , सम्पादकीय नहीं .

By Michele Meister

By Michele Meister

 

By मार्तंड प्रगल्भ

मेरा एक मित्र है . बेरोजगार है. आजकल दिल्ली में मुनिरका की गलियों में गाहे-बगाहे दिख जाता है. बेरोज़गारी और ज़माने की चिंता से थोडा सनकी भी हो चला है. पढ़ा-लिखा है. बतकही का रस जानता है. साहित्य में रुचि है. और सच पूछिए तो हम-आपसे कुछ ज्यादा ही गंभीरता से लेता है साहित्य को. पिछली बार देखा था दिसंबर की ठंढ में. गुस्से से भरा उसका चेहरा अभी भी याद है मुझे. विश्वविद्यालय के गेट पर मिला था. ज़ल्दी में था. कह रहा था इस रेप काण्ड के विरोध में जनता सड़क पर है , संस्कृति-कर्मियों को भी वहाँ होना चाहिए. कला और साहित्य में सत्ता-विरोध और सड़कों पर कलाकारों-साहित्यकारों का सामूहिक प्रतिरोध एक दूसरे के विरोधी नहीं बल्कि पूरक हैं. कहते-कहते बस आ गयी और वह बस के भीतर गुम हो गया. दूसरे दिन मेरे मोबाइल पर उसका सन्देश मिला था कि अमुक दिन इंडिया गेट पर विरोध प्रदर्शन के लिए ज़रूर आयें. मैंने भी मन में ठान लिया था कि जाऊँगा ही. पर अंत समय में गया नहीं. प्रदर्शन हुआ और लगातार हुआ. किसी और ने फेसबुक पर विरोध-प्रदर्शन की तस्वीरें भी मुझे बाद में दिखायी थीं.

मेरा मित्र परितोष  एक वामपंथी सांस्कृतिक मंच से जुड़ा है. उस दिन के बाद मैंने उसे विश्वविद्यालय के आस-पास फिर देखा नहीं. हांलाकि मेरी बड़ी  इच्छा थी कि मिलता तो कुछ बात करता. इस इच्छा का एक फौरी संदर्भ भी था. एकाध सप्ताह बाद ही एक हिंदी दैनिक ‘घनसत्ता’ के सम्पादक ने उसी सांस्कृतिक संगठन को कोसते हुए एक अजीबोगरीब, लगभग विद्वेषपूर्ण ,सम्पादकीय लिखा था. सम्पादक साहेब का आरोप था कि कोई भी लेखक संगठन वहां दिल्ली की सडकों पर नहीं था! असल में वामपंथी लेखक-सांस्कृतिक संगठनों की मिशनरी  आलोचना और लेखकों के मार्क्सवाद-प्रेम का प्रतिरोध  इनका प्रिय  शगल रहा है. अखबार में आरोप था कि अमुक लेखक संगठन के महासचिव या किसी  अन्य पदाधिकारी का चेहरा या उसका बैनर उन्हें नहीं दिखा. बाद में कुछ दुष्टों  ने अख़बारों और सामाजिक मीडिया में छपी तस्वीरों और रिपोर्टों का हवाला उन्हें दिया. शायद उनके ही अखबार के दीगर संस्करणों की ख़बरों को उनके फेसबुक पर चस्पां किया. पर लाहौर से तुरत-फुरत आये सम्पादक ने इन तस्वीरों में दिख रहे चेहरों को पहचानने से इनकार कर दिया . और उनका ‘मार्क्सवादी’ – विरोध अक्षत बना रहा ! पर अपन जैसे लोगों ने उन्हें कोई महत्व नहीं दिया. बात शायद आई -गई  हो गयी. पर मैं अपने मित्र से मिलना चाहता था. उसके बाद भी लगातार गोष्ठियों, सेमिनारों,काव्य-पाठों और विरोध-प्रदर्शनों वाले उसके सन्देश मेरे मोबाइल पर आते रहे थे ज़रूर. एकाध जगह मैं गया भी था. उसे उन आयोजनों में अतिव्यस्त देख मेरा जी नहीं हुआ उसे टोकने और बतियाने का. बहरहाल परसों शाम (हाँ शाम ही को तो) वह मुझे विश्वविद्यालय के कैंटीन पर दिख गया.

देखता हूँ बड़ी क्षिप्र  गति से वह मेरी ओर ही चला आ रहा है. उसने भी शायद मुझे देख लिया था. आते ही मेरे सामने बैठ गया और एक सिगरेट सुलगा ली. दो कश लेने के बाद अचानक बोल पड़ा ‘आ परितोषाद्विदुषां न साधु मन्ये प्रयोगविज्ञानम् ।बलवदपि शिक्षितानामात्मन्यप्रत्ययं चेतः’. ज्ञान के क्षेत्र में विद्वानों की संतुष्टि ज़रूरी है. बड़े से बड़ा सिद्ध  भी केवल आत्म -प्रमाण  पर विश्वास नहीं कर सकता. कालिदास ने ऐसा कहा है. पर जब विद्वानों के बीच किसी शब्द प्रयोग को लेकर असहमति हो तब?” मैंने सन्दर्भ के प्रति अपनी अनभिज्ञता विस्मय से प्रगट की. कहने लगा अरे ,अभी सन्दर्भ को मारो गोली . तुम क्या कहते हो? मैंने थोडा हकलाते हुए कहा कि महाभाष्यकार के अनुसार तो लोक ही प्रमाण होगा तब. “बस यही तो मैं सोच रहा हूँ”. उसने जैसे मुट्ठियाँ भांजते हुए कहा. परन्तु मैं अब थोडा स्थिर हो चुका था. बात को पकड़ते हुए मैंने भी सवाल फेंका . “लेकिन अगर लोक में भी अनेक प्रयोग मिलें तो.” उसने कहा तो सभी रूप मान्य होंगे. “लेकिन भाषा में निबद्ध ज्ञान -परम्परा के लिए तो इतनी छूट तो भारी पड़ेगी मित्र” मैंने तनिक  मजा लेते हुए कहा. मैंने फिर कहा “और यही वजह है कि व्याकरण-ग्रंथों और कोशों की ज़रुरत होती है”. “इससे मेरा भी इनकार नहीं है. मैं भाषा के मानकीकरण के खिलाफ नहीं हूँ.” वह भी अब विवाद में गंभीर हो चला था. कहने लगा “परन्तु समय-समय पर लोक-प्रयोगों और तदनुरूप साहित्यिक-प्रयोगों के परिवर्तन को व्याकरण ग्रंथों और कोशों में प्रतिबिंबित होना चाहिए. भाषा तो बहता नीर है. बाँधोगे तो या तो सूख जाएगी या फिर उसके वेग से तुम्हारे बने बाँध टूट जाएँगे. और हिंदी जैसी भाषा की जीवन्तता और उसका वेग तो जनपदीय बोलियाँ ही हैं. एक बार उनसे कटे तो गए. संस्कृत के साथ हुआ, प्राकृतों और अपभ्रंशों के साथ हुआ तो कोई आश्चर्य नहीं कि तुम्हारी बंधी-बंधाई , ‘राष्ट्रीय-कृत’ हिंदी के साथ भी वही हो”. वह शायद भाषा –पावित्र्य –संरक्षिणी सभा के किसी सभापति  से भिड़ आया था. मैंने उसकी आँखों में झलकते गुस्से को नज़दीक से देखा और सच पूछिए तो जैसे कोई कड़वी सचाई मुझे भी कंपा गयी. वह कहता गया. “अब देखो भाषा का निर्माण एक सामाजिक प्रक्रिया है. हिंदी के विशाल प्रदेश में बहुसंख्यक जनता जिस भाषा में सोचती-विचारती काम करती है, हिंदी का भविष्य वहां है.”

मेरे दिमाग में हिंदी भाषा के विकास की एक संक्षिप्त रूप-रेखा कौंध गयी. इसी तरह की बातें तो चन्द्रधर शर्मा गुलेरी , प्रेमचंद, हजारीप्रसाद द्विवेदी, किशोरीदास वाजपेयी ,रामविलास जी और राहुल जी जैसे विद्वानों ने भी की थी. उस वक़्त भी भाषा की शुद्धता के पैरोकार हिंदी को संस्कृत की पुत्री बनाने पर तुले थे. संविधान सभा की बहसें भी दिमाग में घूम गयीं. दावं-पेंच, शक्ति सम्बन्ध और ‘राष्ट्रवाद’( सांस्कृतिक  ही न!). हुआ वही जो कुछ लोग चाहते थे. और बदले में मिली रघुवीरी हिंदी! उर्दू से कन्नी काट कर आज़ाद हुए ही थे और अब बाकियों के साथ भी वही सलूक . भाषा की राजनीति से राजनीति की भाषा तय होने लगी थी.  परितोष अपनी ही रौ में था. “एक तरफ बाज़ार है . कार्पोरेट मीडिया और सरकार . उसी  का एक बढती रूप है हमारा बॉलीवुड . दूसरी ओर मजदूरों के विशाल जत्थे हैं . पटना से लेकर अहमदाबाद और लुधियाना-अमृतसर तक, गौहाटी से लेकर मुंबई –सूरत तक. आज गुडगाँव में हैं कल धर्मशाला तो परसों नागपुर. इनकी भाषा क्या है ? हिंदी ही तो है. बन रही है हिंदी इनसे. जो साहित्य इनके बीच से आरहा है , इनके बारे में आ रहा है , इनके प्रति प्रतिबद्ध है. हिंदी भी उनसे ही बन रही है. तो कोशकार क्या करेगा? कोर्पोरेट मीडिया और बॉलीवुड से प्रयोग स्थिर करेगा या संस्कृत में गोते खाएगा या फिर कामगार जनता की तरफ मुंह करेगा. एक ही रास्ता है और वह है जनता की ओर जाने का. इस मामले में कोई आगे नहीं बढ़ता. ले-दे कर सत्तर-अस्सी साल पुराने कोशों की शरण में जाना होता है. और बढे भी कैसे ! जनता से वास्तविक संपर्क हो तब न! और तुर्रा यह कि जनता के संगठन इन्हें भीड़ लगते हैं या फिर तानाशाह ! और कहेंगे कि हम हैं सबसे बड़े लोकतांत्रिक!” वह लगभग हांफ रहा था.

कुछ देर तक हम दोनों चुप रहे . बिना कुछ कहे मैं उठा और चाय लेने कैंटीन के काउंटर की तरफ बढ़ गया. परितोष  ने अचानक कहा “मेरे लिए काली लेना अदरक वाली. अच्छा रुको , मैं भी चलता हूँ.” दोनों चाय लेकर रिंग रोड पर निकल आये . गरमी कुछ कम हो चली थी. पर बीच-बीच में गर्म हवा के झोंके आ जाते थे. छुटियाँ शुरू थी इसलिए भीड़-भाड़ थोड़ी कम हो चली थी. सुबह जो अमलतास के पीले फूल चमकदार और ऐश्वर्य से भरे थे उनमें अधिकांश तो झड़ गए थे . जो बचे थे, मुरझाये थे और ढलते सूरज की किरणों में मन को उदास करने वाले थे. हाँ प्रोफेसरों के क्वाटरों के पीछे आम की छोटी-छोटी अमौरियाँ मन प्रसन्न करने वाली थीं. हमलोग जब कुछ एकांत में निकल आये तो उसने फिर से बात आरम्भ की. “ देखो , बात दरअसल भाषा के प्रति दो भिन्न दृष्टियों की है. एक है भाषा के शुद्धिकरण की , संस्कृतीकरण की, और शुद्ध भाषा के सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की. पहली दृष्टि का एक और भेद है जो ऊपर-ऊपर से शुद्धिकरण का विरोधी दीखता है , अपने को शुद्धिवादी कहे जाने पर ऐतराज करता है ,पर है नहीं. यह है बहुभाषावाद. इसे बहुसंस्कृतिवाद या अमेरिकी मल्टीकल्चरलिज़म का ही विस्तार मानो. संसदीय लोकतंत्र का यह नवउदारवादी युग इसी नारे के साथ है और भाषाओं की गैरबराबरी के खिलाफ चलने वाले प्रगतिशील आन्दोलनों को अपने उदार आवरण में पालतू और भ्रष्ट बनाता है. यह भाषाओं की अस्मिता की राजनीति से अपना कारोबार चलाता है और विश्वबाजार को नए-नए दुकान उपलब्ध करवाता है. ठेठ राजनीतिक सन्दर्भ दूं तो भाजपा, कांग्रेस और दक्षिणपंथी क्षेत्रीय दल- मायावती से लेकर नितीश कुमार तक- इस पहली दृष्टि के प्रतीक हैं. इनके लिए लोकतंत्र का नारा सबसे कारगर है. साहित्य में भी लोकतंत्र का नारा लगाने वाले अधिकाँश कलावादी और व्यक्तिस्वातंत्र्य  के वादी यथास्थितिवाद के घोर समर्थक हैं. और भाषा की शुद्धि के भी! और अकारण नहीं कि एक ‘लोकतांत्रिक’ सम्पादक पूरी मानवता को सी.आई.ए का ऋणी मानता है!” वह चलते –चलते रुक गया था. सडक के किनारे पत्थर की एक बेंच थी. किनारा  कुछ-कुछ पहाड़ी घाटी का भ्रम पैदा करता था. नीचे ढलान थी और जो जंगल में गुम हो जाती थी. घाटीनुमा उस अवकाश के उस पार विश्विद्यालय की नौ मंजिली लाइब्रेरी दृष्टि को रोक लेती थी. हवाई जहाज़ लगातार सर के ऊपर से गुजरते रहते . उसकी भयानक गड़गड़ाहट पहले सोने न देती थी. अब भी यदा-कदा जब विचारों की किसी अमूल्य श्रृंखला को भंग कर देती तो मन चिड़चिड़ा  हो उठता था.

उसने जब उस लोकतांत्रिक सम्पादक का ज़िक्र किया तो अचानक से अपन ने सन्दर्भ पा लिया. और शाम से ही मित्र की उद्विग्नता का पूरा चित्र मेरी आँखों में घूम गया. मन ही मन में मुझे उसकी प्रकृति पर हलकी -सी  हँसी आ गई. पर वह पहले की ही  भांति कह रहा था “ और दूसरी दृष्टि है भाषा के जनवाद की.” मैंने उसे बीच में ही टोका. “ देखो तुम जिस राजनीतिक स्वरुप की चर्चा कर रहे हो उससे मैं पूरी तरह सहमत हूँ. भाषाओं के इतिहास में भी संक्रमण के दौर आये हैं. अब जिसे हम भक्तिकाल कहते हैं या ठीक उसके पहले का जो काल है, हजार इसवी के आस-पास का, बहुत बड़ा परिवर्तन हो रहा था पूरे उपमहाद्वीप में . देशी भाषाओं ने धीरे-धीरे संस्कृत –प्राकृत-अपभ्रंश को उनके साहित्यिक भाषा के गौरवमय  आसन से नीचे धकेल दिया. ऐसा नहीं था कि इन देशी भाषाओं का अस्तित्व पहले था ही नहीं. लोग इन्हीं भाषाओं के अपने पुराने –नए रूपों में दुनिया को देखते- समझते थे. पर साहित्य और ज्ञान के लिए इन भाषाओं का प्रयोग वर्जित था. साहित्य और ज्ञान की एक आधिकारिक भाषा थी, लम्बे समय तक वह संस्कृत ही रही बाद में गौण रूप से प्राकृत और अपभ्रंशों को यह आसन मिला. जो लोग यह समझते हैं कि अपभ्रंश से देशी भाषाओं का उद्गम हुआ है , वो बहुत बड़ी भूल करते हैं. ये देशी भाषाओं का बढता दबाव था कि अपभ्रंशों के अलग अलग रूपों में हमें देशीपन के उदाहरण मिलने लगते हैं. इसलिए ‘हिंदी के विकास में अपभ्रंश का योग’ एक भ्रामक इतिहास दृष्टि है. दरअसल होना चाहिए था ‘अपभ्रंश के विकास में हिंदी का योग’. और यह बड़ा परिवर्तन राज्य और काव्य के बदलते रिश्तों और नए सांस्कृतिक वातावरण, अर्थात इस्लाम  की संश्लिष्ट अंतर-क्रियाओं का परिणाम थी. बाबा फरीद और मुल्ला दाउद से लेकर संत कवियों ने देशी भाषाओं में साहित्यिक अभिव्यक्तियाँ की. यह उनके भिन्न सांस्कृतिक पृष्ठभूमि और नए सामाजिक स्तर के कारण प्राप्त आत्मविश्वास का परिणाम थीं. उसके बाद लम्बे समय के परिवर्तनों ने रीतिकाल तक आते-आते साहित्यिक भाषा के रूप में ब्रज को स्थिर कर लिया. खड़ी बोली,हिन्दवी, हिन्दुई ,उर्दू आदि सम्बन्धी विवाद मैं यहाँ दुहराना नहीं चाहता. अंग्रेजी राज में भाषा को लेकर विवाद हुए , राजनीति हुई ,पर कभी ऐसा नहीं था कि जनता की आमफहम भाषा साहित्य से एकदम बाहर रही. भाषा की यह दूसरी परम्परा संस्कृति के शुद्धिकरण के खिलाफ सितारेहिंद,भारतेंदु, अयोध्याप्रसाद खत्री , प्रेमचंद, गुलेरी ,किशोरीदास वाजपेयी ,फिराक, शिवदान सिंह चौहान , रामविलास शर्मा, राहुल सांकृत्यायन आदि के साथ चली आई है. पर इस दूसरी परम्परा के भीतर भी विवाद और मतांतर रहे आये हैं. पर आमतौर पर यह भाषा की प्रगतिशील परम्परा है. इनके आपसी विवाद रोचक और ज़रूरी हैं पर अभी मैं उसमें पड़ना नहीं चाहता.” थोडा रुक कर मैंने फिर शुरू किया “ अस्सी के दशक के आखिर से जो नवउदारवाद आया, संचार माध्यमों में जो व्यापक परिवर्तन हुए उससे परिस्थितियाँ बदल गयी हैं. नयी सदी के दूसरे दशक तक आते-आते तकनीक जब से फेसबुक जैसे माध्यमों तक पहुंची  है, भाषा- प्रयोगों में उथल- पुथल- सी मच गयी है. अभिव्यक्ति अब प्रिंट-पूँजी के भरोसे नहीं है. इस आभासी माध्यम ने अभिव्यक्ति  के नए रास्ते खोल दिए हैं. अभिव्यक्ति  के इस बढ़ते जनाधार ने भाषा की  शुद्धि-चिंताओं को परेशान कर दिया है. मैं इन माध्यमों की सीमाओं को जानता हूँ. पर यह एक प्रगतिशील बात तो हुई ही. मानकीकरण की प्रक्रिया भी ज़रूरी है. और यहाँ मैं तुम्हारी बात से फिर सहमत हूँ कि उस मानकीकरण की प्रगतिशील और जनवादी प्रक्रिया का विकास करना ऐतिहासिक ज़रुरत है.”

इतना लंबा बोलने के बाद मैंने उसकी तरफ देखा तो वह मुस्कुरा रहा था. “ तुमने मेरी बात को ऐतिहासिक सन्दर्भ दे दिया” हंसते हुए परितोष ने कहा. अभी पहली बार उसके चेहरे पर हँसी देख कर सच पूछिये तो मुझे बहुत अच्छा लगा. हमलोग बात करते-करते हॉस्टल के गेट तक आ गये थे. मौन सहमति  से हमारे कदम खुद-ब-खुद कमरे की ओर चल पड़े. मैंने सिगरेट सुलगा ली थी. मेरे मित्र ने इतनी देर से कोई सिगरेट नहीं निकाली थी. इसका मतलब था उसके पास पैसे नहीं हैं. सोचा सिगरेट के साथ रात का खाना भी यहीं मेस में खिलाना होगा. पर यह मुझे अच्छा ही लग रहा था. मैंने उससे सम्पादक के बारे में पूछा. बोला छोडो यार. उन की याद मत दिलाओ. “अब देखो न उसी दैनिक के सम्पादक थे प्रकाश जोशी. राजनीतिक रूप से मैं उन्हें पसंद नहीं करता. पर उन्होंने हिंदी पत्रकारिता को सहज भाषा के पक्ष में रखा. और उनकी क्रिकेट पर लेखनी तो वाकई युगांतकारी है. अफ़सोस! इस तुरत-फुरत वाले बाज़ारू मनोरंजन, और तीन घंटे के मसाला शो ने जब क्रिकेट को ही बदल दिया तो अब उस भाषा का क्या किया जाएगा. वह तो प्रकाश  जी के साथ ही चली गयी.”

हमलोग सिगरेट बुझा कमरे में दाखिल हुए. इस दौरान मेरा मन रामविलास जी को याद कर रहा था. मैंने ‘भारतेंदु युग और हिंदी भाषा की विकास परम्परा’ को आलमारी से निकाल लिया. मैंने उसमें से दो उद्धरण परितोष को पढ़ कर सुनाये. .”दरार आम जनता में नहीं थी.दरार थी उच्च वर्गों में.फिर उन्हीं उच्च वर्गों का सहारा लेकर भाषा समस्या कैसे हल होती.उच्च वर्गों का यह दृष्टिकोण भाषा के परिष्कार के नाम पर उसे जनपदीय बोलियों से और शहरी बोलचाल से दूर ठेल रहा था और यह सिलसिला अंग्रेजी राज के खत्म होने के  पच्चीस साल बाद भी जारी है.” “पच्चीस नहीं साठ साल बाद भी” हंसते हुए उसने कहा. दूसरा उद्धरण यूँ था- “भाषा का परिनिष्ठित होना एक प्रक्रिया है जिसमे अनकों रूपों और प्रयोगों में कुछ छाँट लिए जाते है, शेष छोड़ दिए जाते है…किन्तु जो छोड़ दिए जाते है वो सदा नष्ट नहीं हों जाते वरन बोलियों में बने रहते हैं.आगे चलकर जब लोग बोलियों का अध्ययन करते है तब उन्हें पुराने कोशों,व्याकरणों और लिखित साहित्य में ना पाकर कल्पना करते है कि परिनिष्ठित रूपों के ये अपभ्रंश रूप है जो अशिक्षित लोगों की भाषा में प्रचिलित हों गए हैं”. “ये मारा” उसने लगभग मुझे गले लगाते हुए हवा में मुट्ठियाँ भांजी. मैंने किताब वापस रखते हुए कहा “जानते हो सम्पादक का कॉलम मैंने देखा था. मुझे उसी वक़्त कुछ शंका हुई थी. आजकल तो अखबार में ‘मार्क्सवादी’-  विरोध का जलसा चल रहा है. मुझे लगता है दिसंबर से कोई जख्म  जाग  रहा है. पचास-साठ के दशक में जो बहसे हुई थीं उसकी तलछट सम्पादक ढो रहे  हैं . जनता को भीड़ कहना , वो क्या है मुक्तिबोध की लाइनें…’डार्क मासेज़ ये मॉब हैं.’ है ना. और कलाकार की स्वतंत्रता  और अभिव्यक्ति की इमानदारी, लेखक-सांस्कृतिक संगठनों को तानाशाह बताना , सृजनात्मक लेखन की राह में रोड़ा डालने वाला कहना आदि-आदि. अब ये केवल संयोग नहीं कि तब भी वही खेमा ये सब कह रहा था आज भी वही खेमा ऐसा कह रहा है. कारण तो स्पष्ट है मित्र . मार्क्सवाद की दुनिया भर में जो वापसी हुई है , कुछ लोगों की सत्ता को डरा रही है . सता रही है. अब अगर ऐसा है तो मार्क्सवाद तो जवाब देगा. जनता जबाव देगी. कई बार जबाव सुनकर लोग कहते हैं कि वही पुरानी बात कह रहे हो. पर जानते हो ऐसे लोगों को हॉब्सबाम क्या जबाव देते थे….कहते थे कि साहेब जब लौट-लौट कर वही सवाल कीजियेगा तो जवाब भी तो वही मिलेगा.” हमदोनो ठठाकर हंस पड़े. परितोष ने कहा “ वो मुक्तिबोध की पंक्तियाँ ,जो तुम्हारी फेवरिट हैं , पढने को मन कर रहा है और ऊँची आवाज़ में पढने लगा –

“सब चुप, साहित्यिक चुप और कविजन निर्वाक्

चिन्तक, शिल्पकार, नर्तक चुप हैं

उनके ख़याल से यह सब गप है

मात्र किंवदन्ती।

रक्तपायी वर्ग से नाभिनाल-बद्ध ये सब लोग

नपुंसक भोग-शिरा-जालों में उलझे।

प्रश्न की उथली-सी पहचान

राह से अनजान

वाक् रुदन्ती।

चढ़ गया उर पर कहीं कोई निर्दयी,…

भव्याकार भवनों के विवरों में छिप गये

समाचारपत्रों के पतियों के मुख स्थल।

गढ़े जाते संवाद,

गढ़ी जाती समीक्षा,

गढ़ी जाती टिप्पणी जन-मन-उर-शूल ।

बौद्धिक वर्ग है क्रीतदास,

किराये के विचारों का उद्भास।

बड़े-बड़े चेहरों पर स्याहियाँ पुत गयीं।

नपुंसक श्रद्धा

सड़क के नीचे की गटर में छिप गयी…

धुएँ के ज़हरीले मेघों के नीचे ही हर बार

द्रुत निज-विश्लेष-गतियाँ,

एक स्प्लिट  सेकेण्ड में शत साक्षात्कार।

टूटते हैं धोखों से भरे हुए सपने।

रक्त में बहती हैं शान की किरनें

विश्व की मूर्ति में आत्मा ही ढल गयी.”

और फिर मैंने पढ़ा “कविता में कहने की आदत नहीं, पर कह दूँ

वर्तमान समाज में चल नहीं सकता।

पूँजी से जुड़ा हुआ हृदय बदल नहीं सकता,

स्वातन्त्र्य व्यक्ति का वादी

छल नहीं सकता मुक्ति के मन को,

जन को।“

मेस का टाइम हो चला था. मैंने उससे कहा आज रात यहीं रूक जाओ. उसने इनकार कर दिया. “ नहीं यार , वापस जाऊँगा . कल सुबह ही कबीर कलामंच के साथियों की रिहाई के अभियान को लेकर एक प्रदर्शन है. समय मिले तो सुबह तुम भी आ जाना. कॉफ़ी हॉउस के पास सुबह नौ बजे.” थोडा रुक कर सर को झटक कर बड़े दृढ स्वर में कहता गया . “फासीवादी उभार है. लड़ने के सिवा चारा नहीं.” फिर एकाएक मुस्कुराते हुए बोला-“ जानते हो जब से मैं ने एक  शीर्षक ‘नीर और नाले’ देखा है एक गीत बेइन्तिहाँ याद आ रहा है- ओ दुनिया के रखवाले! सुन दर्द भरे मेरे नाले….” और मैंने कहा “रखवाला कौन है , पता है !” और दोनों ने एक साथ कहा “ यह भी कोई पूछने की बात है कि दुनिया का रखवाला , ‘आतंक’ के विरुद्ध युद्ध छेड़नेवाला , कौन है ! और फिर ठठा कर हंस पड़े.

मार्तंड प्रगल्भ

मार्तंड प्रगल्भ

मार्तंड प्रगल्भ जे.एन.यू. के भारतीय भाषा केंद्र में पी.एच.डी. के लिए शोधरत  हैं। फिलहाल लिडेन (नीदरलैण्ड) में अध्ययन-प्रवास कर रहे हैं। उनसे mpragalbha1@gmail.com पर संपर्क संभव है।

 

 

नीर और क्षीर: आशुतोष कुमार

(प्रभाष  जोशी विचारों से  वामपंथी न थे . लेकिन उन्होंने जनसत्ता के जरिये बौद्धिक और नैतिक साहस को पत्रकारिता के बुनियादी मूल्य के रूप में स्थापित किया . असहमति के साथ संवाद का वातावरण निर्मित किया . यही वज़हें थीं कि जनसत्ता सती -समर्थन के अग्निकुंड में गिर कर भी जीवित रह गया . 

इधर मौजूदा जनसत्ता -सम्पादक ने वामपंथी लेखकों और संगठनों के खिलाफ मोर्चा खोल रखा है . अखबार के अलावा सामाजिक मीडिया में भी वे वामपक्ष के खिलाफ तर्क -प्रमाण -हीन विद्वेषपूर्ण टिप्पणियाँ लिख -लिखवा रहे हैं . सामाजिक मीडिया में बहस का अवकाश रहता है , इसलिए वहाँ माकूल जवाब मिल जाता है . लेकिन अखबार उनकी मज़बूत जागीर है . वहाँ  वे नाम ले कर हमारे खिलाफ अखबार के आधे पेज का ‘अनंतर’  लिखते हैं , और लगातार अपनी जयजयकार कराते लेख लिखवाते -छापते जाते हैं . 

हमने प्रत्युत्तर उसी हफ्ते भेज दिया था. देर हो गयी है , कह कर अगले हफ्ते छापने का आश्वासन भी हमें मिला . फिर  शब्द- सीमा का हवाला दे कर कहा गया कि लेख वगैर ‘काटछाँट’ के नहीं छप सकता . जनसत्ता बहस का मंच बना रहे , यही सोच कर हमने शब्दसीमा की शर्त भी मंजूर कर ली . अपने लेख को  प्रस्तावित शब्द -सीमा के दायरे में भी ले आये . हमारा आग्रह केवल यह था कि हमारे नाम से  हमारे द्वारा सही किया गया प्रारुप ही छपेगा . लेकिन संपादक महोदय हमारी ‘उम्मीद’ से बढ़ कर ‘कायर’ निकले .वे  खाप – हत्याओं की वकालत करने वाले और  कम्युनिस्टों पर नरभक्षी होने के इलज़ाम लगाने वाले लेख छाप सकते हैं , लेकिन अपनी तर्कपूर्ण आलोचना का सामना नहीं कर सकते. यह हमारे  उसी लेख का अंतिम प्रारूप है . — आशुतोष कुमार )

By Michele Meister

By Michele Meister

By  आशुतोष कुमार 

बहस दो हर्फों के बीच नहीं, भाषा और संस्कृति के बारे में दो नजरियों के बीच है 

 ’गाली -गलौज’ कोशसिद्ध  है , प्रयोगसिद्ध भी .  मैंने ‘ गाली -गलौच ” लिखा. बहुत से लोग लिखते -बोलते हैं . ओम जी के हिसाब से यह गलत है .शिक्षक ऐसी गलती करें  , यह और भी गलत है . गलती कोई भी बताए ,  आभार मानना चाहिए .  निरंतर सीखते रहना शिक्षक की पेशागत जिम्मेदारी है .

जिम्मेदारी या जिम्मेवारी ? कोश या कोष ?

ओम जी को ‘जिम्मेवारी ‘ पसंद है . फेसबुक पर फरमाते हैं , कोश में तो ‘ज़िम्मेदारी’ ही है. फिर भी , अपने एक सहयोगी का  यह ख़याल उन्हें गौरतलब लगता है कि ‘जिम्मेदारी’ का बोझ घटाना हो तो उसे जिम्मेवारी  कहा जा सकता है .  लेकिन इसी तर्ज़  पर हमारा यह कहना  उन्हें बेमानी लगता है कि गलौच बोलने से ‘गाली- गलौज’ लफ्ज़ की  कड़वाहट कम हो जाती है . कि गलौज से गलाज़त झाँकती है,जबकि गलौच से , हद से हद , गले या गालों की मश्क .   भोजपुरी में गलचउर और हिन्दी में  गलचौरा   इसी अर्थ में प्रचलित हैं.  हो सकता है इनका आपस में कोई सम्बन्ध न हो . लेकिन वे एक दूसरे की याद तो दिलाते ही हैं . सवाल बोलचाल में दाखिल दो  प्रचलित शब्दों में से एक को चुनने का है . चुनाव का मेरा तर्क  अगर गलचउर है तो ओम जी का भी गैर -जिम्मेदाराना. (गैर -जिम्मेवाराना नहीं .)

 हिंदी में , तमाम भाषाओं में ,एक दो नहीं, ढेरों ऐसे शब्द होते हैं  जिनके एक से अधिक उच्चारण / वर्तनियाँ प्रचलित हों .  श्यामसुन्दर दास के प्रसिद्द ‘ हिंदी शब्दसागर’ में एक ही अर्थ में शब्दकोष और  शब्दकोश दोनों मौजूद हैं . भाषा में इतनी लोच जरूरी है .यह भाषाओं के बीच परस्पर आवाजाही का नतीजा भी है ,  पूर्वशर्त भी. आवाजाही ओम जी का चहेता  शब्द है .  क्या यह सही शब्द है ? हिंदी के सर्वमान्य वैयाकरण किशोरीदास वाजपेयी  और उनकी रचना ‘ हिंदी शब्दानुशासन ‘ के अनुसार हरगिज नहीं .  उनके लिए राष्ट्रभाषा हिंदी का शब्द है – आवाजाई . वे मानते हैं कि हिंदी का यह शब्द पूरबी बोलियों से प्रभावित है . लेकिन हिंदी की प्रकृति के अनुरूप है. (शब्दानुशासन  , पृ. 522, सं.-1998.)

आचार्य की रसीद के बावजूद  आवाजाई समाप्तप्राय  है,  आवाजाही चालू. हिंदी के सामाजिक  अध्येता  रविकांत  के मुताबिक  भाषाएँ बदचलनी से ही पनपती हैं . शुद्ध हिंदी के हिमायती सुन लें तो कैसा हड़कंप मचे ! हड़कंप ? या  ’भड़कंप’ ? वाजपेयी  जी का शब्द  ’ भड़कंप ‘है . (वही , पृ. 02). आज  सभी  हड़कंप लिखते हैं .  ‘ बदचलनी ‘  चलन बदलने का निमित्त है. समय के साथ  जो चले गा , वही  बचे गा.  चले गा ? या चलेगा ? ‘शब्दानुशासन’ में अधिकतर पहला रूप है . कहीं कहीं दूसरा भी है . क्या मैं किशोरीदास वाजपेयी पर गलत हिंदी लिखने का इल्जाम लगा रहा हूं ? उनका अपमान कर रहा हूँ ?

मैं ने कहा था – अज्ञेय ने भी गाली -गलौच लिखा है . फेसबुक पर मौजूद हिंदीप्रेमी मित्रों ने  मूर्धन्य लेखकों की रचनाओं से ‘गाली -गलौच ‘ के ढेरों उदाहरण पेश कर दिए . आप ने पुस्तकालय की तलाशी ली और संतोष की गहरी प्रसन्न सांस लेते हुए घोषित किया – सब की सब  प्रूफ की गलतियाँ हैं . लेखकों के जीवित रहते छपे  संस्करणों में ‘गलौज’ लिखा  है .

 शोध के लिए किताबों की धूल झाड़ना जरूरी है.     लेकिन अक्ल की धूल झाड़ लेना पहले जरूरी है .  मान भी लें कि बाद की तमाम किताबों के   ढेर सारे संस्करणों में गलौच का आना महज़ प्रूफ की गलती है . लेकिन  सारे के सारे प्रूफ-रीडर एक ही गलती क्यों  करते  हैं? कोई असावधान प्रूफ-रीडर गलौझ या गलौछ क्यों नहीं लिखता ? क्योंकि कोशकारों के अनजाने – अनचाहे गलौच  अपनी जगह बना चुका है .

बेशक  भाषा के मामले में  लोच  की एक लय  होती ही है . बदचलनी की  भी  नैतिकता होती  है . अंग्रेज़ी में इसे  ’पागलपन में छुपी  पद्धति’ कहते हैं .भाषाएँ नयी ‘चाल’ में ढलती हैं .लेकिन  चरित्र और चेहरा उस तरह  नहीं बदलता.  व्याकरण शब्दानुशासन है . अनुशासन शासन नहीं है. अनुसरण भी नहीं है . भाषा के चरित्र और चेहरे की शिनाख्त है .  अंतर्निहित लय की पहचान है . उस के स्व-छंद की खोज है . इसी अर्थ में वह स्वच्छंद भी है , अनुशासित भी. चाल , चरित्र , चेहरा , छंद और लय -इन्ही तत्वों से  भाषा की ‘प्रकृति’ पहचानी जाती है .वैयाकरण  का काम है , भाषा की प्रकृति की पहचान कर भाषा के नीर -क्षीर विवेक को निरंतर जगाये रखना .

 हिंदी की प्रकृति को परिभाषित करनेवाली एक विशेषता यह है कि वह  ’ हिंदी  भाषा -संघ ‘ में शामिल  है . ‘हिन्दी भाषा- संघ’ आचार्य किशोरीदास वाजपेयी की सुविचारित  अवधारणा है. एक भाषा के मातहत अनेक बोलियों का परिवार  नहीं , ‘बराबरी’ पर आधारित  संघ .   ‘संघ’ की सभी  भाषाओं में शब्दों, मुहावरों, भावों , विचारों और संस्कारों की  निरंतर परस्पर आवाजाही  रही है .  लेकिन  इस तरह , कि भाषा विशेष की   प्राकृतिक विशेषताएं प्रभावित न हों .   इन्ही  भाषाओं ने   कुरु जनपद की ‘खड़ी बोली ‘ को  छान -फटक,  घुला -मिला , सजा -संवार  व्यापक जनभाषा का  रूप दिया.  यों ही नहीं  मुहम्मद हुसैन ‘आज़ाद ‘ने उर्दू अदब के बेहद मकबूल इतिहास  ’आबे हयात ‘ की शुरुआत इस वाक्य से की  –”यह बात तो सभी जानते हैं कि उर्दू भाषा का उद्गम ब्रजभाषा है .!” जानते तो लोग यह हैं कि उर्दू / हिन्दी की आधार बोली ब्रजभाषा नहीं .दिल्ली -मेरठ  की बोली है . फिर भी ‘आज़ाद’  ब्रजभाषा को  हिन्दी / उर्दू की गंगा की  गंगोत्री के रूप में रेखांकित करते हैं .   जबकि  जनसत्ता – संपादक को डर है कि  बोलियों के  बेरोकटोक हस्तक्षेप से  हिंदी की  स्वच्छ नदी  गंदे  ’नाले ‘ में बदल जायेगी . कहते हैं -’पंजाबी में कीचड़ को चीकड़ , मतलब को मतबल , निबंध को प्रस्ताव कहते हैं . क्या हम इन्हें भी अपना लें ?’  न अपनाइए . चाह कर भी अपना न सकेंगे . चीकड़ ,  मतबल , अमदी , अमदुर , चहुंपना आदि  भोजपुरी में अनंत काल से प्रचलित हैं .  लेकिन हिंदी  की प्रकृति के अनुरूप नहीं हैं. सो हिंदी के न हो सके . ध्वनि-व्यतिक्रम हिंदी की विशेषता नहीं है .  लोकाभिमुखता , सरलता और मुख -सुख है . आए कहीं से भी  लेकिन चले वे ही  हैं , जो यहाँ के लोगों की उच्चारण- शैली में  ढल गए . कुछ दिन  पहले मेरे ही अदर्शनीय मुँह से  पंजाबी का  ’ हरमनप्यारा ‘ लफ्ज़ सुन कर पाव भर आपका खून बढ़ गया था  .  ’आकर्षण’ के लिए पंजाबी में शब्द है -खींच !खींच में अधिक खींच है या आकर्षण में ? पंजाबी ने हिंदी -संघ की भाषाओं के साथ अधिक करीबी रिश्ता बनाए रखा , इसलिए आज उसके  पास अधिक रसीले – सुरीले शब्द  हैं. हम पहले संस्कृत और अरबी -फारसी और अब अंग्रेज़ी का मुँह ज़्यादा जोहते रहे , सो जोहड़  में पड़े हैं .

 ’गलौच ‘के बारे में एक कयास यह है कि यह पंजाबी से आया  है . पंजाबी में लोग  गलोच  लिखते- बोलते हैं .  हिंदी ने गलोच को अपने हिसाब से ढाल कर चुपचाप  गलौच बना लिया . यानी हिंदी पड़ोसी  भाषाओं की छूत से  नाले में न बदल जायेगी .   आप ‘शुद्धिवादी’  न हों , लेकिन  ’ नाला ‘  खुद एक प्रकार के पवित्रतावादी नज़रिए की ओर इशारा करता है . नाला मतलब अपवित्रता , गन्दगी और  धर्म-भ्रष्टता . भाषा की  पवित्रतावादी दृष्टि हिंदी के ऊपर सांस्कृतिक या भाषाई राष्ट्रवाद के आरोप लगाने वालों का हौसला बढ़ाती है . इसके दीगर खतरे भी हैं .

जनसत्ता ने  मेरे एक  लेख में आये ”कैननाइजेशन ‘ ‘ शब्द को  बदल कर ‘प्रतिमानीकरण ‘ कर दिया  था . इस तरह एक परिचित परिभाषित शब्द की हिंदी तो कर दी गयी , लेकिन इस हिंदी  को समझने के लिए  पहले अंग्रेज़ी शब्द जानना जरूरी है , यह न सोचा गया.  हिंदी का अंग्रेज़ीकरण जितना बुरा है , उतना ही संस्कृतीकरण या अरबी-फारसीकरण. ये सारे ‘करण’  सत्ताओं और स्वार्थों के खेल हैं.  लेकिन भाषा की प्रकृति को कृत्रिम रूप से बदलने की असली प्रयोगशाला शब्द नहीं , वाक्य है.  औपनिवेशिक प्रभाव के चलते अंग्रेज़ी वाक्यविन्यास , मुहावरे , अंदाज़ और आवाज़ ने हिंदी को कुछ वैसा ही  बना दिया है, जैसा   मैकाले ने अंग्रेज़ी शिक्षा के बल पर हिंदुस्तानियों को बनाना चाहा था . ऊपर से भारतीय, लेकिन भीतर से अँगरेज़ .

आपने भी लिखा है –”… (अमुक ) कुमार यह बोले :” मुझे मालूम था कि बात प्रूफ पर आयेगी .”

यह हिन्दी का वाक्य- विन्यास है या  अंग्रेज़ी का ?

 आशुतोष कुमार

आशुतोष कुमार

आशुतोष कुमार.  चर्चित युवा आलोचक.  हिंदी विभाग, दिल्ली विश्वविद्यालय में सहायक प्रोफ़ेसर. जन संस्कृति मंच से जुड़ाव. इनसे  ashuvandana@gmail.com  पर संपर्क संभव है।

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