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बलराज साहनी- जो बात तुझमें है तेरी तस्वीर में नहीं: चंदन श्रीवास्तव

By चंदन श्रीवास्तव

अभिनय महान कहलाएगा बशर्ते अभिनेता किरदार को ऐसे निभाये कि उसका अपना व्यक्तित्व तिरोहित हो जाय, वह ना रहे, निभाया गया किरदार ही रहे। इस पंक्ति को पढ़कर किसी को कबीर याद आ जायें तो क्या अचरज- ‘जब मैं था तब हरि नहीं- अब हरि हैं हम नाहीं ’! अचरज कीजिए कि बलराज साहनी के अभिनय की ऊंचाई को ठीक-ठीक इसी कसौटी पर महान ठहराया जाता है, यह भूलते हुए कि कबीर का समय बलराज साहनी के समय से अलग है, और ठीक इसीलिए 15 वीं सदी के भक्त का अपनी भाव-वस्तु से जो तादात्म्य संभव रहा होगा वह शायद बीसवीं सदी के किसी अभिनेता का अपने किरदार के साथ संभव ना भी हो । आख़िर चेतना का वस्तूकरण, व्यक्तित्व का विघटन, संवेदना का विच्छेद जैसे पद बीसवीं सदी के मनुष्य को समझने-समझाने की गरज से आये थे। अचरज कीजिए कि खुद बलराज साहनी ने भी अपनी तरफ़ से अभिनय की महानता की कसौटी प्रस्तुत करने की कोशिश की तो किरदार के साथ अभिनेता के एकात्म को ज़रुरी शर्त माना, भले ही अभिनय के दौरान उन्हें इससे तनिक अलग भी अनुभव हुआ हो। इस आलेख का विषय बलराज साहनी के इस ‘अलग अनुभव ’ की तरफ़ संकेत मात्र करना है, ताकि इस आम सहमति को तनिक प्रश्नाकुल होकर कुरेदा जा सके कि किरदार से अभिनेता का एकात्म ही अभिनय की महानता की एकमात्र कसौटी है।

बलराज साहनी

बलराज साहनी

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आम सहमति यही है कि ‘ बलराज साहनी कई चेहरों वाला अभिनेता ’ थे। ‘ कई चेहरों वाला अभिनेता ’ कहने के पीछे मंशा यह बताने की होती है कि “अधिकतर अभिनेता विभिन्न पात्रों के रोल करने पर भी अपने ख़ुद के चेहरे को छिपा नहीं पाते हैं और सही अर्थों में उन पात्रों को साकार करने में असमर्थ रहते हैं..” जबकि बलराज साहनी ने विभिन्न पात्रों की भूमिका इस तरह निभायी कि “ ख़ुद की शख़्सियत को उन पात्रों में उजागर नहीं होने दिया, इसीलिए वे पात्र इतने सजीव होकर होकर साकार हुए। ”(1) । बलराज साहनी के अभिनय के संदर्भ में ‘ कई चेहरों वाला अभिनेता ’ का रुपक इतना प्रभावशाली है कि थोड़े हेर-फेर के साथ हर समीक्षक इस बात को दोहराना जरुरी समझता है। मिसाल के लिए जन्मशती के इस साल में बलराज साहनी के अभिनय की विशेषता को याद करते हुए एक सुधी समीक्षक ने उनकी तुलना यूनान के पौराणिक पात्र प्रोतेउस से की क्योंकि एक तो वह किसी के पकड़ में नहीं आता और आ भी जाय तो “ऐसी रफ़्तार से इतने वास्तविक-से चोले बदलने लगता है कि पकड़नेवाला घबरा कर उसे छोड़ देता है और वह फिर फ़रार हो जाता है। ”(2)कमोबेश ऐसी ही बात अपने इस सहोदर भाई के बारे में भीष्म साहनी भी कहते हैं- “ बलराज की सफलता का राज था कि वे किसी किरदार को निभाते वक्त उसमें अपना दिल ही नहीं, आत्मा भी झोंक देते थे। काबुलीवाला फ़िल्म करते वक्त उन्होंने पठान काबुलीवाला के जीवन को नजदीक से जानने के लिए उसका गहन अध्ययन किया। यही कारण है कि जब आप बलराज की किसी फ़िल्म को याद करते हैं, तो बलराज याद नहीं आते वह किरदार याद आता है। हर किरदार अपने आप में अलग नजर आता है। अभिनेता बलराज गायब हो जाता  है। वह अपनी पहचान को किरदार में घुला देते थे। यह इस कारण होता था क्योंकि वे किरदार से गहरे स्तर पर जुड़ जाते थे. बलराज कहते थे कि एक्टिंग सिर्फ कला नहीं है, यह एक विज्ञान भी है.”(3)

भीष्म साहनी ने जिस बात को संक्षेप में लिखा है, उसका विस्तार बलराज साहनी पर केंद्रित ख्वाजा अहमद अब्बास के एक संस्मरण में मिलता है। इस संस्मरण में अभिनेता बलराज साहनी से जुड़ी कई कहानियां हैं, ऐसी कहानियां जो अभिनय के प्रति बलराज साहनी की निष्ठा का साक्ष्य तो हैं ही, पाठक के मन में अभिनेता बलराज के प्रति श्रद्धा-भाव जगाती हैं। अब्बास साहब लिखते हैं- “ 1945 में इप्टा ने जब फ़िल्म धरती के लाल बनायी, जिसमें सारे के सारे गैर-पेशेवर अभिनेता-अभिनेत्री थे, उसके लिए लंबे-तड़ंगे तथा नफीस बलराज साहनी ने, जो बीबीसी में दो बरस काम करने के बाद कुछ ही अर्सा हुए लंदन से वापस लौटे थे,खुद को ऐसे आधे-पेट खाकर गुजर करते बंगाली किसान में बदला,जैसे वह अकाल के मारे लाखों किसानों में से ही एक हों। वह महीनों तक सिर्फ एक वक्त खाकर गुजारा करते रहे थे ताकि कैमरे के सामने उनकी अधनंगी देह,अपने भूख के मारे होने की गवाही दे। और हर रोज कैमरे के सामने जाने से पहले वह अपनी धोती,समूचे शरीर और चेहरे पर भी,कीचड़ मिले पानी का छिडक़ाव कराते थे ताकि हर तरह से अकिंचनता प्रकट हो। ”(4)

‘दो बीघा ज़मीन’ के बारे में तो ख़ैर, यह बात प्रसिद्ध है ही कि इस फ़िल्म के किरदार को निभाने के लिए बलराज साहनी कई हफ्ते तक कलकत्ता में रिक्शा खींचने वालों की बस्ती में रहे थे। यहां उन्होंने रिक्शा खींचने के लिए खुद को प्रशिक्षित ही नहीं किया था बल्कि रिक्शा खींचने वालों के तौर-तरीके भी सीखे थे। ‘दो बीघा ज़मीन ’ के किरदार को निभाने के लिए बलराज साहनी ने क्या-क्या किया इसका एक ब्यौरा खुद बलराज साहनी की जबानी सुनिए- “बम्बई शहर से बाहर जोगेश्वरी के इलाके में उत्तर प्रदेश और बिहार के भैंसे पालने वाले भैया लोगों की बहुत बड़ी बस्ती है। मैं अगले दिन से वहां के चक्कर लगाने लगा। मैं भैया लोगों के साथ बैठता, उनकी बातें सुनता, उन्हें काम करते हुए देखता। वे कैसे चलते हैं, क्या पहनते हैं, क्या खाते हैं, कैसे उठते-बैठते हैं- यह सब मैं बड़े गौर से देखता और अपने मन में बैठाता। भैया लोगों को सिर पर गमछा लपेटने का बहुत शौक होता है और हर कोई उसे अपने ही ढंग से लपेटता है। मैंने भी एक गमछा खरीद लिया और घर में उसे सिर पर लपेटने का अभ्यास करने लगा। लेकिन वह खूबसूरती पैदा न होती। मेरे सामने यह एक बहुत बड़ी समस्या थी, जिसे हल करने की मैंने पूरी कोशिश की। ‘दो बीघा जमीन’ में मेरी सफलता ज्यादातर इसी अध्ययन का नतीजा है।”(5)

एक बार फिर से प्रसंग पर लौटते हुए बात ख्वाजा अहमद अब्बास के संस्मरण की करें। अब्बास साहब ने तफ्सील से बताया है कि बलराज साहनी द्वारा अभिनीत किरदार अगर प्रसिद्ध हुए तो इसलिए कि उनका अभिनय कौशल “मानव व्यवहार के सहानुभूतिपूर्ण प्रेक्षण और यथार्थवाद के लिए गहरे लगाव,ब्यौरों के प्रति तथा चरित्र व व्यक्तित्व एक एक-एक रग-रेशे के प्रति आश्यचर्यजनक ईमानदारी ” से भरा था। अब्बास साहब लिखते हैं- “काबुलीवाला में,रवींद्रनाथ टैगोर के रचे बहुत ही भोले पठान के प्यारे से पात्र को साकार करने के लिए,उन्होंने रावलपिंडी में गुजरे अपने बचपन की स्मृतियों को फिर से जगाया था,जहां सीमांत क्षेत्र से आने वाले पठान सहज ही और रोजमर्रा के जीवन का हिस्सा होते थे। इसके अलावा उन्होंने स्थानीय पठानों से संपर्क कर उनसे उनकी बोल-चाल सीखी थी,उनका प्रिय साज़ रबाब बजाना सीखा था और पश्तो के गीत गाना सीखा था। उन्होंने पठानों की हिंदुस्तानी की बोल-चाल की ध्वनि और उसके लालित्य को सीखा था। ..वर्षों तक वह जहां भी जाते थे, उनके चाहने वाले उनका स्वागत काबुलीबाला के बोलने के तरीके की उनकी प्रस्तुति की नकल कर के किया करते थे। ” (6) । इसी तरह इप्टा के नाटक आखिरी शमा में बलराज साहनी द्वारा अभिनीत मिर्जा गालिब के चरित्र के की तैयारी के बारे में अब्बास साहब ने लिखा है कि “इस पात्र की प्रस्तुति को पूर्णतम बनाने में.. उन्होंने अपने दोस्तों से देहली की उर्दू इस तरह सीखी थी, वह इस जुबान में वैसे ही बोल सकते थे, जैसे गालिब बोलते रहे होंगे। उन्होंने मुशाइरा शैली में शाइरी पढ़ने की नफीस कला भी घोंटकर पी ली थी। गालिब के पात्र की उनकी प्रस्तुति इतनी विश्वसनीय तथा जीवंत थी कि गालिब के एक महान पारखी तथा गालिब साहित्य के विद्वान ने कहा था: ‘‘जाहिर है कि महान शायर को मैंने कभी देखा तो नहीं था, पर मैं इतना जरूर जानता हूं कि गालिब ऐसे ही नजर आते,ऐसे ही शायरी पढ़ते और नाटक में चित्रित विभिन्न हालात में उनकी ऐसी ही प्रतिक्रिया रही होती।’’(7)

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 बलराज साहनी के अभिनय के बारे में प्रचलित ये सत्यकथाएं क्या एक अभिनेता के कौशल का साक्ष्य मात्र हैं, या इन कथाओं की एक अंदरुनी राजनीति है? क्या इन कथाओं के भीतर एक प्रेरणा यह सिद्ध करने की है कि अभिनय तभी श्रेष्ठ हो सकता है जब अभिनेता निभाये जा रहे किरदार की वास्तविक ज़िंदगी में उतरकर उसके सुख-दुःख को भोगे? दूसरे शब्दों में, क्या बलराज साहनी के अभिनय-कौशल को सिद्ध करने के लिए बहुधा उद्धृत की जाने वाली इन कथाओं के भीतर एक मंशा यह साबित करने की होती है कि यह कलाकार समाजवादी समाज-रचना के सिद्धांतों के प्रति निष्ठावान था और उसकी अभिनय कौशल एक तो इस निष्ठा का ही सबूत है और दूसरे उसका अभिनय-कौशल समाजवादी समाज-रचना की दिशा में किया गया कृत्य होने के नाते महान है ? लग सकता है कि यहां महानता की बड़ी और जटिल कथा का एक छोटे-से वाक्य में लाघवीकरण हो रहा है, मगर ऊपर की कथाओं में इस प्रश्न का उत्तर हां में देने के पर्याप्त साक्ष्य मौजूद हैं। मिसाल के लिए, जिस सुधी समीक्षक ने बलराज साहनी के अभिनय कौशल को सराहते हुए उसकी तुलना रुप बदलने वाले पौराणिक पक्षी प्रोतेऊस से की है, उसने लिखा है कि नैचुरल एक्टिंग की यह सिफअत वैसे तो अशोक कुमार और मोतीलाल में भी मौजूद थी, लेकिन “अशोक कुमार और मोतीलाल की सीमा यह थी वे ऊँचे या दरमियानी समाजी दरजे से अलग दिख नहीं पाते थे – उनमें आप उन्हें जो चाहे बना डालिए. उनके चेहरे सिर्फ़ ख़वास के रहे, अवाम के न बन पाए. हिंदी सिनेमा की इस ख़ला को भरा बलराज साहनी ने.” (8)

भीष्म साहनी अपने सहोदर भाई के अभिनय-कौशल को जब याद करते हैं तो यह जोड़ना जरुरी समझते हैं कि “ इससे ( किरदार के साथ एकात्म) बढ़कर भी शायद एक चीज थी, वह था बलराज का सामाजिक सरोकार। वे किसी किरदार को उसके सामाजिक संदर्भो से जोड़ कर देखते थे. उन्होंने मार्क्सवाद के महत्व को स्वीकार किया ”। और अपनी बात की पुष्टि में एक वाक़ये का ज़िक्र करते हैं कि कैसे ‘दो बीघा ज़मीन” की शूटिंग के दौरान बलराज साहनी मुलाकात कलकत्ते में बिहार से आये एक रिक्शेवाले से हुई और उन्होंने उसे फ़िल्म की कहानी सुनाई तो वह यह कहकर रोने लगा कि- “यह तो बिल्कुल मेरी कहानी है. उसके पास भी दो बीघा ज़मीन थी, जो उसने एक जमींदार के पास गिरवी रखी थी और वह उसे छुड़ाने के लिए पिछले पंद्रह साल से कलकत्ता में रिक्शा चला रहा था. हालांकि उसे उम्मीद नहीं थी कि वह उस ज़मीन को कभी हासिल कर पायेगा. इस अनुभव ने उन्हें बदल कर रख दिया। उन्होंने ख़ुद से कहा कि ‘मुझ पर दुनिया को एक गरीब, बेबस आदमी की कहानी बताने की जिम्मेदारी डाली गयी है, और मैं इस जिम्मेदारी को उठाने के योग्य होऊं या न होऊं, मुझे अपनी ऊर्जा का एक-एक कतरा इस जिम्मेदारी को निभाने में खर्च करना चाहिए ’।(9)

और ख्वाजा अहमद अब्बास के जिस संस्मरण का जिक्र आलेख में ऊपर आया है वह तो लिखा ही गया है इस पैरोकारी के साथ कि- “अगर भारत में कोई ऐसा कलाकार हुआ है जो ‘‘जन कलाकार’’ के ख़िताब का हकदार है, तो वह बलराज साहनी ही हैं। उन्होंने अपनी ज़िंदगी के बेहतरीन साल, भारतीय रंगमंच तथा सिनेमा को घनघोर व्यापारिकता के दमघोंटू शिकंजे से बचाने के लिए और आम जन के जीवन के साथ उनके मूल, जीवनदायी रिश्ते फिर से कायम करने के लिए समर्पित किए थे। ” फ़िल्म के पर्दे पर बलराज साहनी का चेहरा ‘ख्वास का नहीं अवाम का चेहरा ’ बन सका तो इसलिए कि ‘उन्होंने मार्क्सवाद के महत्व को स्वीकार किया था ’-  ख्वाजा अहमद अब्बास का उपरोक्त संस्मरण शायद इस बात को सबसे दमदार ढंग से प्रस्तुत करता है। उनका तर्क है- “ बलराज साहनी कोई यथार्थ से कटे हुए बुद्धिजीवी तथा कलाकार नहीं थे। आम आदमी से उनका गहरा परिचय (जिसका पता उनके द्वारा अभिनीत पात्रों से चलता है), स्वतंत्रता के लिए तथा सामाजिक न्याय के लिए जनता के संघर्षों में उनकी हिस्सेदारी से निकला था। उन्होंने जुलूसों में, जनसभाओं में तथा ट्रेड यूनियन गतिविधियों में शामिल होकर और पुलिस की नृशंस लाठियों और गोलियां उगलती बंदूकों को सामना करते हुए यह भागीदारी की थी। गोर्की की तरह अगर जिंदगी उनके लिए एक विशाल विश्वविद्यालय थी, तो जेलों ने जीवन व जनता के इस चिरंतन अध्येता, बलराज साहनी के लिए स्नातकोत्तर प्रशिक्षण का काम किया था। ”(10)

समाजवादी सिद्धांतों के प्रति निष्ठा ने बलराज साहनी को श्रेष्ठ अभिनेता बनने की ज़मीन मुहैया करायी, ऐसा सिर्फ उनके अभिनय को सराहने वाले सुधी समीक्षक ही नहीं बल्कि ख़ुद बलराज साहनी भी मानते हैं, लेकिन किसी घोषणा के अंदाज में नहीं बल्कि उस संयम के साथ जो उनके अभिनय की एक खास पहचान है। वे लिखते हैं- “यह कहना कि कलाकार को हर समय अपनी कला का ही ध्यान रहता है, और देश या समाज की समस्याओं से वे बिल्कुल अलग रहते हैं, बड़ी भारी भूल है। अभिनेता जनता के सामने जीवन नहीं पेश करता,दूसरों के जीवन की तस्वीर पेश करता है। हमलोग फ़िल्म में मैंने एक पढ़े-लिखे बेरोजगार नौजवान का पार्ट अदा किया, दो बीघा जमीन में एक दुःखी किसान का, औलाद में एक घरेलू नौकर का, सीमा में एक विद्वान समाज सेवक का, टकसाल में करोड़पति का और काबुली वाला में एक मुफलिस पठान का। सब रोल एक दूसरे से जुदा थे। अगर मैं किसानों, मजदूरों, पठानों वग़ैरह का जीवन क़रीब से जाकर नहीं देखता तो कभी यह संभव नहीं हो सकता था कि मैं यह पार्ट अदा कर सकता। अगर उन्हें क़रीब से देखना उचित था तो उनके जीवन की आर्थिक सामाजिक और राजनीतिक समस्याओं को जानना और समझना भी मेरा फ़र्ज़ था, तभी मैं उनके दिलों की धड़कनों को अपनी आंखों और अपने शब्दों में अभिव्यक्त कर सकता था, वरना बात अधूरी रह जाती। ” (11)

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“जीवन की आर्थिक सामाजिक और राजनीतिक समस्याओं को” जाने-समझे बगैर किसी अभिनेता के लिए किरदार को निभा पाना संभव नहीं- इस निष्कर्ष पर बलराज साहनी कैसे पहुंचे ? क्या इस वजह से कि अभिनेता बनने के बावजूद उनका खुद के बारे में ख्याल यही रहा कि वे प्राथमिक रुप से एक साहित्यकार हैं ? शायद हां, क्य़ोंकि वे अपने साहित्यकार होने और अभिनेता होने को अनिवार्य-संबंध की एक कड़ी के रुप में देखते थे। इस बात को अलग-अलग रुपों में उन्होंने स्वीकार किया है कि “अगर मैं साहित्यकार ना होता तो इतना अच्छा अभिनेता नहीं बन पाता..”। (12) । फ़िल्म-अभिनेता बनने के पीछे जो कारण उन्होंने गिनाये हैं उसमें एक है पैसों की तंगी तो दूसरा है, साहित्य की दुनिया से बेवजह ठुकरा दिए जाने का मलाल। अपने बारे में वे किंचित गर्व से बताते हैं कि विलायत(बीबीसी लंदन में एनाऊंसर की नौकरी के लिए) जाने से “पहले मेरी कहानियां ‘हंस’ में बाकायदा प्रकाशित होती रहती थी. मैं उन भाग्यशाली लेखकों में से था, जिनकी भेजी हुई कोई भी रचना अस्वीकृत नहीं हुई थी। ” बीबीसी में नौकरी के दौरान उन्होंने एक भी कहानी नहीं लिखी और जब भारत लौटने पर इस “टूटे अभ्यास” को जारी रखने के लिए  उन्होंने एक कहानी हंस पत्रिका में भेजी तो वह लौटा दी गई। ख़ुद उन्हीं के शब्दों में- “मेरे स्वाभिमान को गहरी चोट लगी. इस चोट का घाव कितना गहरा था, इसका अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि उसके बाद मैंने कोई कहानी नहीं लिखी .चेतन के फ़िल्मों में काम करने के निमन्त्रण ने जैसे इस चोट पर मरहम का काम किया. फ़िल्मों का मार्ग अपनाने का कारण यह अस्वीकृत कहानी भी रही। (13)

फ़िल्मों में अभिनय करते हुए पच्चीस से ज़्यादा बरसों के गुजर जाने के बावजूद अपने बारे में उनकी मान्यता यही रही कि वे प्राथमिक रुप से एक लेखक हैं। अपने “फिल्मी जीवन की पचासवीं वर्षगांठ” पर उन्होंने लिखा कि देश के बंटवारे के काऱण मुझे पिता के धन-दौलत के आश्रय से वंचित रहना पडा और पांवों पर खड़ा होने की मजबूरी ने मुझसे जो कई काम करवाये( मिसाल के लिए फ़िल्म डिवीजन की डाक्यूमेंटरी फ़िल्मों में कमेंटरी बोलना, विदेशी फ़िल्मों की हिन्दी डबिंग में भाग लेना, गुरुदत्त द्वारा निर्देशित फ़िल्म बाजी की पटकथा और संवाद लिखना) और फ़िल्मों में काम करना भी इसी मजबूरी का हिस्सा था। फ़िल्म बाज़ी के सफल होने के बाद इस फ़िल्म के निर्माता चेतन आनंद ने उन्हें एक फ़िल्म की कथा लिखने और उसे निर्देशित करने का न्योता दिया था और उन्होंने लिखा है कि-“आज मुझे अफसोस होता है कि चेतन आनंद की इतनी अच्छी पेशकश मैंने क्यों ना शुक्रगुज़ारी के साथ क़बूल की ” क्योंकि बलराज साहनी के ही शब्दों में- “लेखक और निर्देशक बनना मेरे जैसे आलसी स्वभाव के व्यक्ति को ज़्यादा रास आता। ”(14)

खुद को प्राथमिक तौर पर लेखक मानने वाले बलराज साहनी के लिए साहित्य का उद्देश्य है- “असलियत के सामने आईना रख देना ” यानी जीवन की हू-ब-हू तस्वीर पेश करना। इस सोच के अनुकूल वे नाटको-फ़िल्मों और उनमें किए जाने वाले अभिनय के बारे में भी यही मानते थे कि उसमें कुछ भी ऐसा नहीं किया जाना चाहिए जो “कहीं भी वास्तविकता और असलियत पर अत्याचार ” सरीखा हो। कविताई में जिसे अतिशयोक्ति कहा जाता है, वही फ़िल्मों में मेलोड्रामा कहलाता है- अगर इस पंक्ति को ठीक मानें तो कहा जा सकता है कि बलराज साहनी ने अपने लिए अभिनय की जो निजी कसौटी तय की थी वह हिन्दी फ़िल्मों की इतिहास-प्रदत्त या कह लें स्वभावगत विशेषता यानी मेलोड्रामेटिक बनावट के प्रतिपक्ष में तैयार की हुई कसौटी है। यह अकारण नहीं है कि एक तरफ वे कंपनियों के पेश किए हुए नाटकों को कलात्मकता से शून्य रचना मानते हैं क्योंकि सामूहिक जीवन के मामले में “अंदर से खोखली” और बाहर के सामाजिक जीवन से बहुत गहरे ना जुड़े होने के कारण ऐसी रचना पेश नहीं कर पायीं जिनका “ असलियत से संबंध” हो और अपने दौर की फ़िल्मों को अलिफ़-लैला नुमा “उन्हीं पुराने दकियानूसी नाटकों के रुपांतरण ” मानकर उनके  “दीर्घजीवी होने पर” वह शुबहा करते हैं। अलिफ़-लैला यानी फैंटेसी की दुनिया अगर अपने को अतिशयोक्ति(मेलोड्रामा) में साकार करती हो, तो इसके लिए बलराज साहनी के व्याकरण में कोई जगह नहीं जान पड़ती। कम से कम अपनी तरफ से उन्होंने अभिनय की जो कसौटी प्रस्तुत की है, उसको पढ़कर तो यही लगता है।

गवर्नमेंट कॉलेज लाहौर से अंग्रेज़ी साहित्य में एम.ए. और फिर शांतिनिकेतन में थोड़े दिन तक अंग्रेज़ी-साहित्य का अध्यापन करने वाले बलराज साहनी अभिनय का प्रतिमान प्रस्तुत करना हो तो शेक्सपीयर के नाटक हैमलेट के तीसरे अंक को याद करते हैं जिसमें नायक हैमलेट बादशाह के दरबार में नाटक पेश करने वाले अभिनेताओं को उपदेश देते हुए कहता है- “देखो स्टेज पर खड़े होकर इस तरह बोलो कि सुनने वालों को रस आये, यह नहीं कि उनके कान फट जायें। तुम अभिनेता हो, ढिंढोरची नहीं। और देखो, हाथ को कुल्हाड़े की तरह मार-मारकर हवा को मत चीरना। अभिनेता को चाहिए कि वह अपने मन को हमेशा काबू में रखे,चाहे उसके अन्दर भावनाओं के तूफान क्यों ना उठ खड़े हों। जो अभिनेता अपनी भावनाओं को क़ाबू में रखकर उन्हें संयम से व्यक्त नहीं कर सकता, उसे चौराहे पर खड़ा करके चाबुक मारना चाहिए।..”

“..और देखो फीके भी मत पड़ जाना। अंडर ऐक्टिंग करना भी अच्छा नहीं होता। ख़ुद अपनी समझ-बूझ को अपना उस्ताद बनाओ और उसी के अनुकूल चलो। अपने चाल-ढाल को, अपने संकतो के शब्दों के अनुकूल बनाओ और शब्दों को संकेतों के अनुकूल और बराबर ख्याल रखो कि कहीं भी वास्तविकता और असलियत पर अत्याचार ना हो। अगर कहीं भी अतिशयोक्ति से काम लिया तो नाटक का सारा मनोरथ ही खत्म हो जाएगा।। याद रखो, सैकड़ों वर्षों से नाटक का मनोरथ एक ही रहा है और भविष्य में भी वही रहेगा- असलियत के सामने आईना रख देना ताकि अच्छाई अपना रुप देख सके, उतार-चढ़ाव भी उस आईने में साफ दिखाई दें..”

उनकी पेशकश में चुनौती है कि – “जरा इन पंक्तियों की कसौटी पर आप अपने देखे हुए नाटकों और फ़िल्मों को परखिए और देखिए कि वे किस हद तक पूरी उतरती हैं..” (15)

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आलेख के इस आख़िरी भाग में आइए, देखने की कोशिश करें कि क्या बलराज साहनी के सिनेमाई अनुभव के भीतर कोई फांक है, दूसरे शब्दों में क्या उनके सिनेमाई अनुभव का कोई हिस्सा अभिनय के बारे में तय किए गए अपने ही प्रतिमान को नकारता हुआ-सा प्रतीत होता है ? इस सिलसिले में पहली बात “स्वाभाविक अभिनय” से जुड़ती है। भले ही बलराज साहनी की मान्यता यह रही हो कि ‘अभिनय अगर स्वाभाविक हो तो उसे हर कोई पसंद करता है ’(और यह मान्यता बहसतलब है) लेकिन ऐसा कहने के साथ-साथ यह जोड़ना भी ज़रूरी समझते हैं कि “स्वाभाविक अभिनय एक तरह से भ्रांति पैदा करने वाली चीज है, क्योंकि दर्शकों को स्वाभाविक लगने वाला अभिनय करते समय हो सकता है, अभिनेता को कई अस्वाभाविक बातें करनी पड़ें। उसका दृष्टिकोण दर्शक के दृष्टिकोण से भिन्न होता है…”।(16) प्रश्न पूछा जा सकता है कि क्या दृष्टिकोण का यह अलगाव निभाये गए किरदार से दर्शक का एकात्म स्थापित करने में कहीं से बाधक नहीं होता ? और दूसरी बात, कलाकार अगर अपने अभिनय को स्वाभाविक बनाने के लिए कुछ अस्वाभाविक चीजें करता है तो फिर इस अस्वाभाविकता का उस भोगे हुए यथार्थ से क्या रिश्ता है जिसे खुद बलराज साहनी ने अभिनय की प्रामाणिकता के लिए जरुरी माना है ?

इस प्रश्न का सही उत्तर तो खैर हमेशा अनिर्णय की स्थिति में रहेगा कि लोकप्रियता किसी कला की महानता की एकमात्र कसौटी है या नहीं , परंतु यह बात मान ली जानी चाहिए कि कला अगर स्वान्तः सुखाय नहीं है तो फिर उसे लोक-स्वीकृति की तलब हमेशा लगी रहेगी। यह बात कम से कम फ़िल्म सरीखे जन-माध्यम के लिए तो कही ही जा सकती है क्योंकि इसका विराट दर्शक-वर्ग ‘अज्ञातकुलशील’ होता है और फ़िल्म बनाने वाले के सामने हमेशा इस बात की चुनौती होती है कि वह इस ‘ अज्ञातकुलशील ’ दर्शक की रुचि का कोई औसत मान निकालकर उस पर खड़ा उतरने की कोशिश करे। अभिनेता के दृष्टिकोण और दर्शक के दृष्टिकोण में अंतर स्वीकार करने वाले बलराज साहनी जब फ़िल्म की लोकप्रियता के बारे सोचते हैं, तो आश्चर्यजनक तौर पर अभिनय के बारे में तय किए गए अपने ही प्रतिमान से बिल्कुल अलग बात कहते हैं, कुछ ऐसी बात जो असलियत के सामने आईने रखने वाले उनके यथार्थवाद की जगह अतिरंजना और अतिशयोक्ति को प्रतिष्ठित करता प्रतीत होता है। मिसाल के लिए, अभिनय-कला शीर्षक निबंध में एक जगह उनका कहना है-“हम पढ़े-लिखे अभिनेता पुराने अभिनेताओं पर नाक-मुंह चढ़ाते हैं। हम कहते हैं कि उनका अभिनय स्वाभाविक नहीं था, उनमें बनावट होती थी, और वे बात को बहुत ज्यादा बढ़ा-चढ़ाकर पेश करते थे। लेकिन उनके अभिनय का सही मूल्यांकन करने के लिए हमें यह देखना चाहिए कि उनका दर्शकों पर कैसा प्रभाव पडता था। वे जो भाव अभिव्यक्त करते थे, वे प्रायः सच्चे होते थे, और उनकी अभिनय शैली बहुत प्रभावशाली होती थी। बाल-गंधर्व जैसे अभिनेता अपनी शैली के बहुत बड़े उस्ताद थे। आगा हश्र के नाटक दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर देते थे। ” (17)

बात बढ़ा-चढ़ाकर पेश की जाय, सच्चाई तो भी रह सकती है, ऐसी प्रभावशील सच्चाई जो मंत्रमुग्ध कर दे- ऐसा अनुभव बलराज साहनी को कई बार हुआ। इसका एक साक्ष्य उनकी आत्मकथा के शुरुआती कुछ पन्नों पर ही मौजूद हैं। अपने स्कूली दिनों को याद करते हुए वे लिखते हैं उन दिनों मैंने ‘हीर-रांझा’ और ‘अनारकली’ नाम की फिल्में देखी थीं और अनारकली के रुप में अभिनेत्री सुलोचना के सौन्दर्य से अभिभूत हो उठा था। अनारकली को जिन्दा दफ्न करने के दृश्य को याद करके मैं रो उठा था। अनारकली की दर्दनाक मौत की पीड़ा में छटपटाते बलराज की हालत यह थी -“  यदि मुझसे कोई कहता कि यह सब तो सिनेमा के ट्रिक का मामला है और कोई भी ईंट सुलोचना के चेहरे को ढंकने के लिए नहीं रखी गई तो मैं उसे थप्पड़ मार देता, जहां तक मेरा सवाल है, सुलोचना मर चुकी थी और मेरे लिए जीवन में कोई आनंद शेष नहीं रह गया था..लेकिन सुलोचना तो जिन्दा थी और कई फिल्मों में उसने मेरे साथ काम भी किया। जब भी मैं उसके प्रति अपने इस किशोरवय के प्रेम का जिक्र करता तो वह इसे हंसी में उड़ा देती। आज जबकि मैं खुद एक फ़िल्म स्टार हूं तो उसकी इस हंसी का मतलब समझ सकता हूं लेकिन तो भी यह ख्याल मैं अपने दिल से नहीं निकाल पाता कि किसी दिन उससे कहूंगा कि वह सिर्फ मूर्खतापूर्ण आसक्ति भर नहीं था बल्कि प्रेम का मेरा पहला सच्चा अनुभव था..। ” (18)

और दूसरा साक्ष्य है फ़िल्म ‘दो बीघा जमीन” की लोकप्रियता के संबंध में की गई उनकी टिप्पणी। इस फ़िल्म से जुड़ी यादों को बलराज साहनी अपनी “आखिरी सांसों तक सहेजकर” रखना चाहते थे। बावजूद इसके इस फ़िल्म का यथार्थवाद उन्हें खटकता था। उन्हें मलाल रहा कि दो बीघा जमीन को जैसी सराहना बुद्धिजीवियों में मिली वैसी आम जनता के बीच नहीं। और इसकी व्याख्या करते हुए उन्होंने इस फ़िल्म में दो दोष गिनाये हैं। एक तो यह कि इस फ़िल्म का नायक कभी भी “उस अन्याय और अत्याचार के खिलाफ आवाज बुलंद नहीं करता, जिसका उसे सामना करना होता है , ” और दूसरे यह कि “ वह अपने दोस्तों और सहकर्मियों को खुद से दूर कर देता है ” जबकि एक औसत दर्शक जो खुद को हीरो के जूते में रख कर देखना चाहता है। वह कभी भी “ खुद को इस तरह के आत्मपीड़क और अंतर्मुखी हीरो के साथ जोड़ कर देखना ” नहीं चाहेगा। इस दोष का जिम्मेदार वे सारी प्रगतिशील कला और साहित्य की उस आदत को मानते हैं जो “विदेशी मूल्य और वाद पर खड़ा उतरना चाहते हैं ना कि उन मूल्यों पर, जो हमारी अपनी धरती की उपज हैं। दो बीघा जमीन की तकनीक भी विश्व प्रसिद्ध इतालवी निर्देशक की फ़िल्म बाइसिकिल थीफ और उसमें प्रदर्शित किये गये यथार्थवाद से प्रभावित थी। यही वह कारण था कि रूसियों ने भले ही दो बीघा जमीन के बारे में अच्छी बातें कहीं, लेकिन उन्होंने अपनी सारी प्रशंसा और सम्मान राजकपूर की फ़िल्म आवारा के लिए सुरक्षित रख लिया, बल्कि वे आवारा के प्रति दीवाने से हो गये।.. हालांकि हमने उम्मीद की थी समाजवाद के इस मक्का में लोग कहीं ज्यादा सुसंस्कृत और उन्नत कला  को सम्मान देंगे , लेकिन रूसियों को आवारा के प्रति उनकी दीवानगी के लिए कसूरवार नहीं माना जा सकता। खास तौर से यह देखते हुए कि आवारा में कितने बेजोड़ तरीके से भारतीय जीवन की धड़कन को पकड़ा गया है।” (19)

इस विन्दु पर संस्कृति-मनोविज्ञानी सुधीर कक्कड़ की याद आना लाजिमी है जो लिखते हैं कि सिनेमा भारतीय उपमहाद्वीप में रहने वाले लोगों के साझा स्वप्नों(फैंटेसी) का वाहक है और एक ऐसा वैकल्पिक जगत मुहैया कराता है, जहां हम यथार्थ से अपने पुराने संघर्ष को जारी रख सकते हैं। हमारे फ़िल्म-जगत में फ़िल्म दर फ़िल्म स्वप्नों की ऐसी भारी मात्रा में नियमितता आश्चर्य में डालती है। एक तरह से जिंदगी की वास्तविक समस्याओं के ऐसे जादुई हल, भारतीय जनमानस में गहरी जमी ऐसे समाधानों की इच्छा की ओर इशारा करते हैं।.. कोई भी समझदार भारतीय यह नहीं मानता कि सिनेमा में वास्तविक जिंदगी का अंकन होता है। ” (20)

चन्दन श्रीवास्तव

चन्दन श्रीवास्तव

चन्दन श्रीवास्तव,  मूलतया छपरा(बिहार) के निवासी, पिछले पंद्रह सालों से दिल्ली में। पहले आईआईएमसी और फिर जेएनयू में पढ़ाई। “उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध में हिन्दी लोकवृत्त का निर्माण” शीर्षक से पीएचडी के बाद दिल्ली के कॉलेजों में छिटपुट अध्यापन, फिर टीवी चैनल की नौकरी और अब विकासशील समाज अध्ययन पीठ(सीएसडीएस) की एक परियोजना इंक्लूसिव मीडिया फॉर चेंज से जुड़े हैं। इनसे  chandan@csds.in पर संपर्क संभव है। 

संदर्भ

(1) बलराज-संतोष साहनी समग्र, संपादक डा. बलदेवराज गुप्त, प्रचारक ग्रंथावली परियोजना, हिन्दी प्रचारक संस्थान, वाराणसी में संकलित सुखवीर का बलराज साहनी एक चेहरा, कई चेहरे शीर्षक आलेख।

2. नवभारत टाईम्स में प्रकाशित विष्णु खरे का लेख जो चवन्नी चैप नामक ब्लॉग पर ‘बलराज साहनी पर विष्णु खरे ’ शीर्षक से उपलब्ध है

3 अखरावट ब्लॉगस्पॉट पर भीष्म साहनी की नजर से बलराज साहनी- शीर्षक पोस्ट

4 देखें पुंजप्रकाश ब्लॉग स्पॉट पर जनकलाकार बलराज साहनी- ख्वाजा अहमद अब्बास शीर्षक पोस्ट

5. लाईवहिन्दुस्तान डॉट कॉम पर 5 मई 2012 को प्रकाशित दो ‘ बीघा जमीन की एक तलाश ’ शीर्षक पोस्ट

6. देखें पुंजप्रकाश ब्लॉग स्पॉट पर जन-कलाकार बलराज साहनी- ख्वाजा अहमद अब्बास शीर्षक पोस्ट

7 उपरोक्त, वही

8  चवन्नी चैप नामक ब्लॉग पर विष्णु खरे का आलेख, उपरोक्त

9. अखरावट ब्लॉग सपॉट पर- भीष्म साहनी की नजर से बलराज साहनी शीर्षक पोस्ट

10.( देखें- लाईवहिन्दुस्तान डॉट कॉम पर, उपरोक्त)

11. देखें- बलराज-संतोष साहनी समग्र, संपादक डा. बलदेवराज गुप्त, प्रचारक ग्रंथावली परियोजना, हिन्दी प्रचारक संस्थान, वाराणसी में संकलित ‘फिल्मी-दुनिया ’ नामक निबंध

12  देखें- बलराज-संतोष साहनी समग्र में- सुखबीर का आलेख, उपरोक्त)

13. देखें चवन्नीचैप ब्लागस्पाट पर क्यों अभिनेता बने बलराज साहनी शीर्षक पोस्ट

14. देखें- बलराज-संतोष साहनी समग्र में “अपने फिल्मी जीवन की पचासवीं वर्षगांठ पर ” शीर्षक आलेख

15. देखें बलराज-संतोष साहनी समग्र में सिनेमा और स्टेज नामक निबंध

16.  देखें बलराज-संतोष साहनी समग्र में अभिनय कला नामक निबंध

17. बलराज-संतोष साहनी समग्र में अभिनय-कला नामक निबंध

18. देखें बलराज साहनी- ऐन ऑटोबॉयग्राफी, हिन्द पॉकेट बुक्स, 1979, दिल्ली

19. अखरावट ब्लागस्पॉट पर मेरी निगाह में सिनेमा : बलराज साहनी, सत्यजीत रे, अडूर गोपालकृष्णन नामक पोस्ट

20. अखरावट बलॉगस्पॉट पर सिनेमा पर सुधीर कक्कड़: भारतीय सिनेमा दिवास्वप्नों पर पलता है.. शीर्षक पोस्ट

साभार- नया पथ

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उन्नीसवीं सदी के स्वप्नदर्शियों के भग्नावशेष: बलराज साहनी और हजारी प्रसाद द्विवेदी के पत्राचार

बलराज साहनी और पंडित हजारी प्रसाद द्विवेदी

प्रस्तुति : उदयशंकर

हिन्दी साहित्य का इतिहास अगर 150 साल पुराना है, तो सिनेमा का इतिहास भी 100 साल पुराना है। हिन्दी साहित्य की प्रस्तावना में इस बात पर ज़ोर रहा कि वह सामाजिक कर्तव्यबोध को अंगीकार करे, और उस समय का कर्तव्यबोध राष्ट्रवादी आंदोलन के स्वर देना था। हिन्दी सिनेमा भी कमोवेश इसी कर्र्तव्यबोध से परिचालित हुआ, और यही कर्तव्यबोध सिनेमा और साहित्य में आवाजाही की तात्कालिक वजह थी। दादा साहेब फाल्के खुद स्वदेशी आंदोलन के प्रभाव में थे। बलराज साहनी के पारिवारिक संस्कार आर्यसमाजी रहे हैं और हिन्दू धर्म-व्यवस्था के भीतर आर्यसमाजी खुद को ‘पहला आधुनिक’ मानता है।
1 मई 1913 को  जन्में बलराज साहनी का जन्मशती वर्ष पिछले महीनों ही समाप्त हुआ है और यह संयोग ही है कि भारतीय सिनेमा का जन्मशती वर्ष 3 मई 2013 को समाप्त हुआ। इस संयोग के बड़े निहितार्थ हैं। कुछ तो बात थी, कि फिल्मों से ‘व्यवसायिक जुड़ाव’ को प्रेमचंद से लेकर हजारी प्रसाद जी तक ‘उज्जवल पेशा’ नहीं मानते थे। फिल्मों से बलराज साहनी जैसों का जुडऩा हमारे पूर्वजों का शंका-समाधान करता है, तो कहीं खरोंचे भी लगा देता है। फिल्म एक आधुनिक विधा है, जैसे कहानी और उपन्यास हैं। इसीलिए इन विधाओं की सार्थकता भी इसी में निहित है कि ये एक न्यूनतम बुर्जुआ नैतिकता की मांग करते हैं। इसका मतलब यह नहीं है कि इन तीनों विधाओं में प्रतिक्रियावादी अभिव्यक्ति संभव नहीं है, लेकिन इसके लिए एक स्तर की ‘कलात्मक चालबाजी’ की जरूरत पड़ती है। हिन्दी साहित्य में व्याप्त एक प्रकार की आलोचनात्मक समृद्धि ने अक्सर इन चालाकियाँ को पकड़ी है। गंभीर सिनेमा-समीक्षा के अकाल के कारण सिनेमा की चालबाजियाँ अक्सर सफल रही हैं, जिसके कारण साहित्य और सिनेमा के बीच आवाजाही में एक फांक उत्पन्न हुई।

बलराज साहनी का सिनेमा से जुड़ाव एक आधुनिक युवा बौद्धिक का जुड़ाव था। उनके जन्मशती के बहाने साहित्य-सिनेमा के बीच आवाजाही की जो परंपरा बलराज साहनी ने कायम की थी, उसको विमर्श का बिन्दु होना चाहिए। बलराज साहनी और हजारी प्रसाद जी के बीच की यह बातचीत इसी आवाजाही की प्रस्तावना थी। जिसकी पहलकदमी बलराज साहनी ने की थी। यह दखल किसी आउटसाइडर की तरह नहीं है, बलराज इसमें हिन्दी की साहित्यिक गतिविधियों के निष्णात नज़र आते हैं। यह बात-चीत पूर्व प्रकाशित है, लेकिन इस प्रस्तावना का जिक्र या उत्साही-स्वागत शायद ही कहीं मिलता है। द्विवेदी जी ने अपनी मुलाकात के 25 वर्ष पूरे होने के अवसर पर बलराज ने पत्राचार द्वारा यह बातचीत की थी। लेकिन 60 के दशक की ‘नई कहानियाँ’ में छपी इस बातचीत का कोई खास नोटिस नहीं लिया गया।
बलराज और हजारी प्रसाद जी इस बातचीत में लगभग हामी भरते हुये, एक दूसरे की शंकाओं को सहलाते हुए दिखते हैं। बलराज साहनी घोषित कम्यूनिस्ट के हकदार माने जाते रहे हैं और पंडित जी जो कुछ भी हों लेकिन कम्यूनिस्ट नहीं थे। बातचीत का बड़ा हिस्सा मार्क्सवाद को लेकर है और मार्क्सवाद की हिन्दी साहित्य  में प्रचलित प्रविधियों से दोनों नाखुश हैं। हिन्दी की क्लासिक कहानी ‘कफन’ को दोनों इसी प्रविधि से प्रभावित कहानी मानते हैं। इनका मानना है कि इस कहानी से साम्राज्यवादियों द्वारा भारत की ‘प्रचारित-छवि’ को हवा मिलती है। वे इसे प्रेमचंद की एक ‘गौण कहानी’ की संज्ञा देते हैं। 

क्या ऐसा नहीं लगता कि ‘दो बीघा ज़मीन’ जैसी फिल्म का भावी यथार्थ ‘कफ़न’ में प्रेमचंद व्यक्त कर चुके थे! कफ़न कहानी साहित्य की परंपरा में झटका नहीं है बल्कि परंपरा का विकास ही है। यथार्थ के स्तर पर कम से कम झटका नहीं है, दृष्टि/दर्शन के स्तर पर जरूर एक तरह का उच्चस्तरीय स्थानापन्न है। निराला 1921 में लिख चुके थे-

चाट रहे जूठी पत्तल/ वे सभी सड़क पर खड़े हुए,
और झपट लेने को उनसे कुत्ते भी हैं अड़े हुए!

प्रेमचंद 1936 में कफन में कबीर को उद्धृत करते हैं- ‘ठगिनी क्यों नैना झमकावै’ और निराला फिर 1937 में लिखते हैं-  ‘जो मार खा रोई नहीं, / सजा सहज सितार’

और, 1940 में सुमित्रा नन्दन पंत भी लिख रहे हैं-

‘तीस कोटि संतान नग्न तन,

अर्ध क्षुधित, शोषित, निरस्त्र जन,

मूढ़, असभ्य, अशिक्षित, निर्धन

जैसा कि विष्णु खरे ने 1 मई के नवभारत टाइम्स में लिखा है – ”प्राण को दादासाहेब फाल्के सम्मान देना सही हो सकता है लेकिन बलराज को वह इसीलिए नहीं दिया गया कि वे कम्युनिस्ट थे तो वह सरासर अन्याय है।” कफन को कमतर  आँकने में भी कहीं अनजाने यही तर्क तो काम नहीं कर गया कि प्रेमचंद ने ‘प्रगतिशील लेखक संघ’ के पहले अधिवेशन का उद्घाटन भाषण दिया था।
इस आत्मीय बातचीत में व्यक्तित्व की जो प्रांजलता दिखती है, वह आज छीजते-छीजते दुर्लभ ही हो गयी है। व्यक्तित्व की इस प्रांजलता के कारण ही लगता है कि ये दोनों महान विभूतियाँ अपने अंतर्विरोधों के साथ इस वार्तालाप में प्रस्तुत हैं और ऐसे अंतर्विरोध भी भावी पीढिय़ों के लिए थाती हैं। @ उदयशंकर

बलराज साहनी

बलराज साहनी

पण्डितजी,

हमारी जान-पहचान को अब 25 बरस से अधिक समय हो चुका है। समय की इस बड़ी-सी गठरी का यह तकाज़ा है कि हम सीधी दिल की बात सच्ची और खरी-खरी एक-दूसरे के साथ कहने से न झिझकें। आपकी स्पष्टवादिता से मुझे और अन्य पाठकों को भी लाभ पहुँचेगा। इसी आशा से मैंने ‘नई कहानियाँ’ के प्रश्नोत्तरी आमन्त्रण को स्वीकार किया है। अब आपसे पहला सवाल पूछता हूँ। आशा है आप मेरी विनम्र विनती पर ध्यान देंगे।
शान्तिनिकेतन में आपने मुझे पहली बार जुलाई 1937 में देखा था। मैं कलकत्ता से अपने मित्र स.ही. वात्स्यायन का आपके नाम परिचय-पत्र लेकर आया था। आप उन दिनों हिन्दी भवन की इमारत की तकमील का इन्तज़ार कर रहे थे और किसी दूसरे घर में रह रहे थे। वह घर मुझे याद नहीं आ रहा है, धुँधला-सा याद आता है, क्षिति दा के घर के कहीं  निकट था, बताने की कृपा करें। ठीक मकान को याद करके मुझे और भी बहुत-सी बातें याद आएँगी।
जिस समय मुझे नौकरी दी गई थी, उस समय शान्तिनिकेतन की आर्थिक स्थिति बहुत-कुछ गिरी हुई थी। मुझे रख लेने की गुरुदेव की उदारता और आपके हामी भरने पर अन्दर-ही-अन्दर प्रबन्धकों की ओर से विरोध किया गया होगा। क्या सचमुच ऐसा कोई विरोध उठा था? आपने उसका कैसे मुकाबला किया? मेरे अध्यापक बनने के तीसरे या चौथे दिन बोलपुर की हिन्दी सभा के तुलसी जयन्ती समागम के लिए आपने मुझे सभापति बनाकर भेज दिया, जबकि आपको तब तक मालूम हो चुका था कि मेरा हिन्दी-साहित्य या विशेषकर तुलसी-साहित्य के सम्बन्ध में परिचय न के बराबर था। क्या आपको उस समय खयाल नहीं आया कि मैं उन लोगों के सामने अपनी मूर्खता का प्रदर्शन करके शान्तिनिकेतन और हिन्दी विभाग को भी लज्जित करूँगा? आपने मुझे क्यों भेजा, चन्दोलाजी को क्यों नहीं भेज दिया?
उन दिनों आपको यह भी ज्ञात हो चुका था कि अंग्रेजी को छोड़ मैं भारत की किसी भाषा में भी सहज प्रवाह के साथ नहीं बोल सकता था, अपनी मातृभाषा पंजाबी में भी नहीं। यदि आप मुझे छोटी कक्षाएँ दे देते तो मैं काम-चलाऊ भला बुरा अध्यापक बन जाता। पर आपने तो पड़ते ही मुझे बी.ए. फाइनल क्लास को हिन्दी उपन्यास पर व्याख्यान देने पर लगा दिया। क्या आपका विचार था कि अपनी अयोग्यता का उचित एहसास जल्दी हो जाने से मैं शान्तिनिकेतन छोड़कर भाग खड़ा होऊँगा?
या क्या मैं इस अयोग्यता को जल्दी-से-जल्दी दूर करने में जुट जाऊँगा?
आपको याद होगा जब मैं यह क्लास ले रहा होता था तो आप विद्या भवन की खिड़की में बैठे दूर से मेरी वेदना देख रहे होते थे। उस समय आपके मन में कौन से विचार उठ रहे होते थे?
मेरे सौभाग्य से आपकी और भगवतीप्रसाद चन्दोलाजी के स्नेह-भरे प्रोत्साहन से मेरी नाव डूबने से बच गई थी। फिर भी आपने देखा होगा कि उस अल्हड़ उम्र में मेरे दिमाग पर अंग्रेज़ी साहित्य ही छाया हुआ था। हिन्दी तो दूर, मैं बंगला और स्वयं गुरुदेव के साहित्य को भी किसी गिनती में नहीं लाता था। फिर आपने यह भी देखा होगा कि हिन्दी की तुलना में मैं उर्दू का ज्यादा प्रशंसक था। क्या इस बात पर आपको गुस्सा नहीं आता था। अगर आता था तो आपने कभी जाहिर क्यों न किया?
यह आखिरी सवाल शायद आपके लिए मुश्किल होगा, पर चिन्ता न करें, अगर आपने 25 प्रतिशत नम्बर भी हासिल कर लिये तो मैं आपको पास कर दूँगा (आपकी उन दिनों मेरे प्रति की गई लिहाजदारियों को ध्यान में रखते हुए)।
आपको याद होगा 1937-38 के दिनों में एक प्रगतिशील आन्दोलन चला था। आपकी उसके साथ कोई सहानुभूति नहीं थी। इसका कारण उस समय मेरी समझ में नहीं आता था। पर अब मैं उस समय के आपके दृष्टिकोण की सच्चाई को अधिक गम्भीरता से समझ सकता हूँ। वास्तव में अपने को अपने देश के प्राचीन संस्कृति-पक्ष से काट लेने में ही प्रगतिशील साहित्य-सर्जना के प्रथम लक्षण देखने में आए थे। इन लोगों का चिन्तन अँग्रेजी साहित्य के नवीनतम प्रयोगों की नकल करना चाहता था, पर देश की राजनीतिक दासता इसे खुलेआम अंगीकार करने के रास्ते में बाधक थी। इसी कारण उन्होंने अपने अचेतन मनोरथ को छिपाने के लिए ऊपर से मार्क्सवाद का मुलम्मा चढ़ा लिया था, हालाँकि उस समय उनका क्रियाकलाप मार्क्सवाद के सिद्धान्तों के साथ कहीं भी मेल नहीं खाता था। वर्ग-भेद और वर्ग-संघर्ष का नारा बुलन्द करने के पीछे भारत के मज़दूर-किसान के जीवन को और स्वतन्त्रता-संग्राम में उनकी प्रभावशाली भूमिका को यथार्थ और रचनात्मक ढंग से आँकने की कोई भावना नहीं थी, बल्कि इस बहाने समाज की गन्दगी और निम्न वर्ग के जीवन को कुरूप तथा विकृत रूप में उछाला गया।
प्रेमचन्द की कहानी ‘कफन’ की, जो कुछ लोग कहते हैं कि प्रेमचन्द ने इन्हीं प्रगतिवादियों के प्रभाव के नीचे लिखी थी, उन दिनों खूब वाह-वाह की गई थी। मुझे याद है कि आपको यह कहानी तनिक भी पसन्द नहीं थी, और आप इसे प्रेमचन्द के साहित्य का सगुण प्रतीक मानने के लिए बिलकुल तैयार नहीं थे।
आज इतने सालों के बाद मैं इस बात को अपना कर्तव्य समझ स्वीकार करना चाहता हूँ कि आप सच कह रहे थे। ‘कफन’ प्रेमचन्द की एक गौण कहानी है, जिसमें उन्होंने पहली बार अपने देश के मनुष्यों को ऐसे ढंग से पेश किया है जिससे भारत-निन्दक मिस मेयो के नक्शेकदम पर चलने वाले साम्राज्य-समर्थक अंग्रेज, अमरीकी और पश्चिमी लेखकों के बयानों को समर्थन मिलता है।
ऊपर मैं उस वक्त के अपने पिछले और अंग्रेज़ी-परस्त साहित्यिक दृष्टि-कोण का वर्णन कर चुका हूँ। प्रगतिवादी धारा से एकदम और बिना सोचे-समझे प्रभावित हो जाने का अपने बारे में यही कारण मेरी समझ में आता है।
उपरोक्त उच्छृंखलता उस ज़माने के प्रगतिवादियों के व्यक्तिगत जीवन में भी छलकती थी।
इन बातों को घटे एक युग बीत चुका है। मैं यह भी जानता हूँ कि अपने को प्रगतिशील कहने वालों में बहुत से अब भी वैसे हैं जिन्होंने अपने पुराने कुसंस्कारों से अपने को मुक्त नहीं किया है। उन्होंने इस संस्था को केवल एक गुर के रूप में इस्तेमाल किया है, और उनकी असफता साहित्य-क्षेत्र में उनकी गौण उपलब्धि से स्पष्ट हो जाती है।
पर कुछ ऐसे भी है जिन्होंने समय के साथ-साथ अपने साहित्य मूल्यों को सच्चाई और निडरता के साथ जाँचा है और परीक्षण किया है, और उत्तम, सजीव साहित्य निर्माण करने की दिशा में अग्रसर हुए हैं। उन्होंने नेहरू की भाँति गहराई से अनुभव किया है कि मार्क्सवाद वास्तव में साहित्यकार को अपने देश की परम्पराओं से काटना नहीं सिखाता, बल्कि उसके साथ जोडऩा और उनके उत्तम अंशों को निखारना और विकसित करना सिखाता है। यह हमारे प्राचीन दर्शनशास्त्र का दुश्मन नहीं है, बल्कि उसी के गर्भ में से जन्म लेनेवाला एक नवीन दर्शन है, जिसके अन्दर आज के ज़माने का युगसत्य कहलाने की सामथ्र्य है। मार्क्सवादी विचारधारा, कट्टरपन्थी गुटबन्दियों की मित्र नहीं बल्कि सख्त दुश्मन है। रूढि़वाद और मार्क्सवाद का आपस में कोई मेल नहीं है।
साहित्य-साधना भी एक पवित्र तीर्थ है। यहाँ व्यक्ति राग-द्वेष से रहित होकर ही सत्यं, शिवं, सुन्दरं के साथ अपनी वृत्तियों का मेल बिठा सकता है। यदि इन विचारों से व्यक्ति मुक्त न हो तो अपना भी उतना ही नुकसान कर बैठता है जितना दूसरे का। और एक पुराने मित्र की हैसियत से मैं यह कहने का साहस किये बिना नही रह सकता कि व्यक्ति-पक्षपात में फँसकर हम सबने अपना बहुत-सा नुकसान किया है और अपने वास्तविक लक्ष्य से दूर चले गये हैं। मैं आपसे पूछना चाहता हूँ: आप प्रगतिवाद को अब किस रूप में देखते हैं? क्या आपके मन में अब भी प्रगतिवाद के प्रति उसी प्रकार की अरुचि है? क्या आप समझते हैं कि हिन्दी-साहित्य के क्षेत्र में वादविवाद और व्यक्तिगत गुटबन्दी समाप्त हो सकती है? मैं समझता हूँ कि ऐसा हो सके तो हिन्दी साहित्य बड़े लम्बे डग भरकर केवल भारत के ही नहीं बल्कि संसार-भर के साहित्य के साथ बड़े थोड़े काल में शाना-ब-शाना खड़ा होने के योग्य हो सकता है, और मैं यह भी कहने का साहस करता हूँ कि इस शुभ काम में आप, अज्ञेय, पन्तजी और यशपालजी जैसे प्रतिभाशाली और अनुभवी व्यक्ति बहुत बड़ी भूमिका अदा कर सकते हैं। नई पौध को इन समस्याओं और विचारों से बचा सकते हैं जिनमें से हमारी पीढ़ी गुज़री है। आप अपने जीवन-अनुभव के आधार पर उनका मार्गदर्शन कर सकते हैं। मैं स्वयं मुद्दत से साहित्यिक क्षेत्र से बहुत-कुछ बाहर रह रहा हूँ, बल्कि यह कहना ज्यादा सही होगा कि मार्क्सवाद और गुरुदेव टैगोर के शिक्षण, दोनों ने मिलकर मुझे अपनी मातृभाषा पंजाबी के चरणों में भेज दिया है, पर हिन्दी साहित्य के साथ मेरा पुराना प्यार है, और उसे विकास पाते देखने की मेरी आन्तरिक अभिलाषा है। इसीलिए आपसे यह कठिन प्रश्न पूछा है। आशा है सवाल की लम्बाई के लिए आप मुझे क्षमा कर अपने गम्भीर और धैर्यपूर्ण स्वभाव के अनुसार उत्तर देने का कष्ट करेंगे।
विनीत

बलराज

पंडित हजारी प्रसाद द्विवेदी

पंडित हजारी प्रसाद द्विवेदी

प्रिय भाई बलराज जी,

आपकी लम्बी प्रश्नावली भाई भीष्मजी ने मेरे पास भेजी है और अनुरोध किया है कि मैं उसका जवाब लिखकर उन्हें भेज दूँ। इन प्रश्नों का उत्तर देने के पहले थोड़ा भूमिका के रूप में कह लेना इसलिए आवश्यक है कि आपने अपनी प्रश्नावली की भूमिका में कुछ डरा देनेवाली बातें लिख दी हैं। बहुत जल्दी ही हम दोनों के परिचय के तीस वर्ष पूरे हो जाएँगे। इस बीच हम दोनों में थोड़ा-बहुत परिवर्तन भी हुआ ही होगा, लेकिन इन प्रश्नावली को देखकर ऐसा लगता है कि आप कुछ अधिक बुद्धिमान हो गए हैं और मैं जहाँ-का-तहाँ हूँ। आपकी बुद्धिमत्ता का पहला प्रमाण यह है कि बातचीत करने से पहले आपने शर्त लगा दी है कि बातें खरी-खरी होंगी, अर्थात् कोई बाद में अपनी कही बात से मुकर नहीं सकेगा। आजकल अखबारों में विभिन्न दलों और देशों के नेताओं में हुई बातचीत के जो विवरण छपते हैं उनमें इस प्रकार की शर्त प्राय: देखी-सुनी जाती है, अर्थात् यह परिपक्वता का लक्षण है। इससे पहले आपसे हमारी बीसियों बार बातचीत हो चुकी होगी, लेकिन, न कभी आपने और न मैंने खरी-खरी बात करने की प्रतिज्ञा की। ”बहु धनु ही तोर्यों लरिकाई, कबहुँ न अस रिस कीन गुसाई!” मगर मेरे प्यारे बलराजजी, मैं अब भी यह मानता हूँ कि खरी-खरी कहने की शपथ लेना कोई अच्छी बात नहीं है। जो आदमी बार-बार शपथ खा रहा हो कि मैं साफ-साफ कह रहा हूँ, उसका दिल साफ है कि नहीं, इसके बारे में मुझे बराबर सन्देह रहता है। मेरे अन्दर तो अब यह परिवर्तन हुआ है कि मैं मानने लगा हूँ कि सच्ची सच्चाई जैसी खरी कभी होती ही नहीं जैसी खरी कहने की कसम खानेवाले सोचा करते हैं। बहुत पुराने जमाने में वैदिक ऋषि ने अनुभव किया था कि विधाता ने सत्य का मुख सुनहरे ढक्कन से ढँककर रख दिया है। मनु ने बताया था कि सत्य प्रिय होना चाहिए, यही सनातन धर्म है। सो आपके प्रश्नों का उत्तर देते समय अगर मैं कोशिश करूँ कि यथाशक्ति सनातन धर्म की अवहेलना न करूँ तो क्षमा कीजिएगा। बस, इतनी-सी भूमिका के बाद मैं अब मूल विषय पर आ रहा हूँ।
सन् 1937 में आप जब अज्ञेयजी की चिट्ठी लेकर आये थे तो मैं क्या कर रहा था, यह मुझे याद नहीं। लेकिन इतना मुझे याद है कि आपसे थोड़ी-सी बातचीत करने के बाद ही मुझे बड़ी प्रसन्नता हुई थी और मुझे लगा था कि मेरे सामने एक सहज-स्वच्छ होनहार युवक खड़ा है, और यदि इस अवसर पर मैं इसकी सहायता कर सकूँ तो कदाचित् एक अच्छे साहित्यिक को साहित्य-जगत् को दे सकूँगा। मुझे जहाँ तक स्मरण है, आपकी कुछ कहानियाँ छपी थीं और आपने मुझे पढऩे को दी थीं। एक नाम तो अब भी याद है ‘जीजाजी का स्नान’। यह मुझे बहुत अच्छी लगी थी। बाद में यह जानकर और भी प्रसन्नता हुई थी कि इस कहानी के नायक और कोई नहीं, मेरे प्रिय मित्र चन्द्रगुप्त विद्यालंकारजी थे। उन कहानियों को पढ़कर मैंने मन-ही-मन एक बड़े भावी साहित्यकार की कल्पना कर ली थी। जब आप फ़िल्म की दुनिया में चले गए तो मुझे बड़ी निराशा हुई, क्योंकि दूर-दूर से मेरी ऐसी धारणा बनी हुई थी कि फिल्मी दुनिया में साहित्यकार समाप्त हो जाता है। खरी-खरी कहने की आदत उस समय भी नहीं थी, इसलिए मैंने आपको कुछ लिखा नहीं। लेकिन आपको याद होगा कि ‘दो बीघा जमीन’ में आपका अभिनय देखने के बाद मैंने आपको एक पत्र लिखा था, जिसमें लिखा था कि आपने फ़िल्म-जगत् में जाने से मुझे बड़ी निराशा हुई थी, परन्तु ‘दो बीघा ज़मीन’ में आपका अभिनय देखने के बाद मैंने अपना विचार बदल दिया है। उस अभिनय के देखने के बाद मुझे लगा था कि अगर मैंने शुरू-शुरू में खरी-खरी कहकर आपको इस क्षेत्र में जाने से रोकने का प्रयत्न किया होता तो बड़ी गलती की होती। मुझे याद आया कि एक बुजुर्ग साहित्यकार ने आपको शुरू-शुरू में निरुत्साहित भी किया था और उपदेश की मार खाकर ही आप कलकत्ता में शान्तिनिकेतन पहुँचे थे।
खैर, यह तो अवान्तर बात हुई। शुरू-शुरू में मैंने शान्तिनिकेतन में आपको पहचान अवश्य लिया था, लेकिन अपनी ही सीमाओं के कारण मैं आपके भविष्य की कल्पना ठीक-ठीक नहीं कर पाया था। उन दिनों मैं जब किसी के भविष्य को उज्जवल समझता था, तो यही कल्पना किया करता था कि वह प्रेमचन्द, गोर्की, टॉलस्टाय जैसा कुछ होगा। अभिनय के क्षेत्र में कोई बहुत बड़ा हो सकता है, यह मेरी कल्पना नहीं थी। लेकिन मैं अब भी कभी-कभी मन-ही-मन में सन्तोष अनुभव करता हूँ कि पहचानने में मुझसे चूक नहीं हुई थी। मेरे पास उस समय आपको देने योग्य काम वहीं था। मेरा क्षेत्र सीमित था, शक्ति उससे भी अधिक सीमित। मैंने बच्चों को पढ़ाने का काम देने में बड़ी झिझक और संकोच अनुभव किया था। लेकिन आपने इसे इस प्रकार लिया जैसे चारों पदार्थ मिल गए हो आपको उस स्थान पर रखने में मुझे कोई कठिनाई नहीं हुई थी। गुरुदेव मेरी बातें मान लेते थे और आपको देखकर तो वे भी बहुत प्रसन्न हुए थे। आपको यदि बताऊँ कि आपकी ‘क्वालिफिकेशन’ मैंने गुरुदेव को क्या बताई थी तो आपको आश्चर्य होगा। मैंने उनसे बड़े घटाटोप के साथ कहा — ”यह लड़का पंजाब यूनिवर्सिटी से अंग्रेजी में एम.ए. है, लेकिन छोटे-से-छोटा काम करने में आनन्द अनुभव करता है। हिन्दी की परम्पराओं से एकदम अपरिचित है और इसीलिए इसके दकियानूस होने की कोई संभावना नहीं है। आश्रम में कुछ दिन रहने के बाद बहुत अच्छा साहित्यिक हो सकेगा।” गुरुदेव का चेहरा दमक उठा, बोले, ”पका बाँस लेकर मैं क्या करूँगा? कच्चा ही अच्छा है जिसे अपने मन के अनुसार सुखाकर आश्रम के अनुकूल बनाया जा सके।”
मैं शुरू से ही ऐसा विश्वास करता आया हूँ कि हिन्दी में ऐसे नवीन प्रतिभाशाली लोगों के आने की आवश्यकता है जो विभिन्न शास्त्रीय मर्यादाओं के भीतर से गुजरे हुए हैं। केवल हिन्दी की अपनी शास्त्रीय मर्यादा के भीतर से जो लोग आये हैं वे भी साहित्य-सेवा के लिए उपयुक्त ही हैं, लेकिन वे ही एकमात्र अधिकारी हैं, ऐसा मैं नहीं मानता। आपको चुपके से यह बता देना चाहता हूँ (बिलकुल जनान्तिक में) कि मैं अपने साथियों और मित्रों को एक नारा देने लगा हूँ — ”save hindi from medrevalism” (हिन्दी को मध्ययुगीन मनोवृत्तियों से बचाओ)। आप जिन दिनों की बात कर रहे हैं उन दिनों मेरे मन में यह बात स्पष्ट नहीं थी, लेकिन थी ज़रूर। मुझे ऐसा लगता है कि आपको चुनने में मेरे मन की भावना अवश्य काम कर रही थी। मैं चाहता था (और अब भी चाहता हूँ) कि हिन्दी के विद्यार्थी विभिन्न भाषाओं के साहित्यिक अनुशासन (डिसिप्लिन) में शिक्षित लोगों का दृष्टिकोण समझें और यदि सम्भव हो तो वे लोग भी बिलकुल संस्कार-मुक्त होकर हिन्दी की विभिन्न साहित्यिक विधाओं और व्यक्तियों पर अपना मत प्रकट करें। यही कारण है कि मैं हिन्दी के विद्याथियों के सामने बंगला, उर्दू, संस्कृत और अंग्रेजी के जानकारों को ले जाया करता था। आपसे हमारे विद्यार्थी आधुनिक दृष्टि पा सकें, यह मेरी आशा थी और निस्सन्देह मेरी आशा फलवती हुई थी। आपको हिन्दी की गतिविधि से परिचित कराना मेरा एक और उद्देश्य था और आप जब हिन्दी की लम्बी शब्द-सूची लेकर मेरे पास आते थे तो मुझे बेहद खुशी होती थी। मुझे याद है कि बोलपुर वाली सभा में सभपातित्व करने के  पहले आप तुलसीदास के बारे में जानने के लिए कितना छटपटा रहे थे। आपकी छटपटाहट से मुझे एक प्रकार का दुष्टता-भरा मजा आ रहा था। यह तो मैं कभी नहीं चाहता था कि आप शान्तिनिकेतन छोड़कर चले जाएँ। वस्तुत: आपके शान्तिनिकेतन छोड़ जाने से मुझे जितना कष्ट हुआ उतना और किसी घटना से नहीं हुआ था। लेकिन यह मेरी हार्दिक इच्छा थी कि आपके समान प्रतिभाशाली आधुनिक मनोवृत्ति के युवक को कुछ पुरानी परम्परा के रसास्वादन का भी चस्का लगा दूँ। मेरा विश्वास है कि वह चस्का, थोड़ी मात्रा में ही सही, लगा अवश्य था।
प्रिय बलराजजी, पाँचवें प्रश्न में आपने कुछ ऐसी बात पूछी है जिसका उत्तर देना वस्तुत: अपने-आपको ही समझने का प्रयास है। केवल आपके बारे में ही नहीं, और कई प्रसंगों में मैंने ऐसा पाया है कि जो लोग हिन्दी की या मेरी विचार-पद्धति की उपेक्षा करते हैं वे मुझसे बहुत अधिक प्यार पा चुके हैं। मैं भरसक प्रयत्न यह करता हूँ कि घृणा किसी से न करूँ, लेकिन मेरे जीवन में ऐसे भी बहुत-से मित्र आए हैं जो हिन्दी की उपेक्षा और मेरी विचार-पद्धति का विरोध करने के कारण मुझसे दूर हो गए हैं, अर्थात् मैं उन्हें अपना प्रेम नहीं दे सकता हूँ। बहुत-से मेरे ऐसे मित्र हैं जो मेरी बातों का विरोध करते हैं और फिर भी मेरे घनिष्ठ मित्र हैं और बहुत-से ऐसे भी हैं जो बहुत दूर तक मेरे समान विचार रखनेवाले हैं, फिर भी मैं उन्हें अपना निकट का मित्र नहीं मान पाता। इसका कारण किसी बाहरी आदर्श या सिद्धान्त में न होकर मेरी प्रकृति में ही होना चाहिए। कई बार मैं स्वयं अपने इस ढंग से परेशान हुआ हूँ, लेकिन अब मैंने समझा है कि यह बात न तो मेरा गुण है न दोष। यह स्वरूप है। स्वभाव, अर्थात् अपना भाव — something  particularly my own. आपके इस पत्र के पढऩे से पहले, मैंने इस विषय पर गम्भीरता से नहीं सोचा। आज सोचने को बाध्य हुआ। ऐसा लगता है कि मुझे जो चीज आकृष्ट करती है, ईमानदारी है। जो चीज़ मुझमें नहीं है, वह जब दूसरों में देखता हूँ तो प्रभावित होता हूँ, आकृष्ट होता हूँ। इतना और भी कह दूँ कि जिस ईमानदारी की बात कह रहा हूँ, वह मेरे अपने दृष्टिकोण से देखी हुई सच्चाई है, जिसके लिए किसी वादविवाद या बहस की गुंजाइश नहीं है। मैं समझता हूँ कि इतना कह लेने के बाद आपके प्रश्न का उत्तर देना अब आवश्यक नहीं रह गया।
आपने अन्तिम प्रश्न को स्वयं बहुत कठिन बताया है और मुझे आश्वासन दिया है कि पच्चीस प्रतिशत अंक मिलने पर भी आप पास कर देंगे। वस्तुत: यह प्रश्न उतना कठिन नहीं है। मुझे कुछ ऐसी आदत-सी पड़ गई है कि जिस बात को नहीं समझता उसके बारे में बोलता ही नहीं। परन्तु मेरे मौन रहने का मतलब विरोध प्रकट करना नहीं होता। उन दिनों प्रगतिवाद का नया आन्दोलन चला था और बात पूरी तरह से मेरी समझ में नहीं आ रही थी। मैं समझने की कोशिश कर रहा था।
जो बात मेरी समझ में नहीं आ रही थी वह यह थी कि विदेशी भाषा के माध्यम से विदेश के इतिहास से ग्रहण की हुई भावधारा को प्रकट करने वाले लोग कैसे प्रगतिवादी हुए? प्रगतिवाद को मैं इतिहास की माँग समझता हूँ। वह रटी-रटाई शब्दावली से नहीं बल्कि हमारे रक्त मांस से निकलकर ही सहज ग्राह्य हो सकता है। हमारा देश कोई नौसिखुआ देश नहीं है। हमारी सहस्त्रों वर्ष की वैचारिक परम्पराएँ हैं जिनकी जड़ें बड़ी गहराई तक गई हुई हैं। हम प्रगतिवाद के नाम पर उन दिनों जो कुछ लिख रहे थे वह हमारे लिए सहज और स्वाभाविक नहीं था। बनावटी और अलग-थलग वस्तु थी। शुरू मैं ही कह चुका हूँ कि मैं खरी-खरीवालों के दल में नहीं हूँ। इसलिऐ जो चीज अच्छी न लगे, उसके खिलाफ तुरन्त कुछ लिखकर दिल के गुब्बार निकालने में मेरा एकदम विश्वस नहीं है। सो मैं इस विचारधारा को यथाशक्ति समझने का प्रयास करता रहा हूँ और जहां तक याद है सन् 1944-45 से पूर्व उसके बारे में कुछ नहीं लिखा। जिन दिनों सभी लोग कहते थे कि ‘कफन’ प्रेमचन्दजी की सबसे अच्छी कहानी है, दिनों यह बात मेरे गले के नीचे नहीं उतर पा रही थी। लेकिन आप-जैसे एक-आध अंतरंग मित्र को छोड़कर अपने मनोभावों को बाहर प्रकट नहीं होने दिया। आज मैं प्रेमचन्द को उन दिनों की तुलना में कदाचित् अधिक अच्छी तरह समझ पाता हूँ और अपने विचारों को भी अधिक स्पष्ट रूप से समझ पा रहा हूँ।
जैसा कि मैंने ऊपर लिखा है, प्रगतिशील चिन्तनधारा को मैं युग की माँग मानता हूँ। आधुनिक युग के तीन चरण बीत चुके हैं। मध्यकालीन मनोवृत्ति से मनुष्य की मुक्ति के तीन पद-चिन्ह स्पष्ट हो गये हैं, पहला यह कि मनुष्य किसी परलोक में या परजन्म में मुक्ति पाने की बात अब नहीं सोचता। इसी लोक में, इसी मत्र्यकाया में वह सब प्रकार के आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक बन्धनों से मुक्त होने को अधिक महत्वपूर्ण मानने लगा है। दूसरा यह कि मनुष्य ने ऐतिहासिक चेतना को सर्वथा अपना लिया है। सब-कुछ विकास-परम्परा के भीतर से गुज़रता आया है, गुज़रता रहेगा — धर्म भी, ईश्वर भी। इस ऐतिहासिक बोध ने हमें पुराने साहित्य और कलाकृतियों को समझने की नई स्वस्थ दृष्टि दी है। हम इतिहास के एक विशेष बिन्दु पर अपने को रखकर तात्कालिक परिप्रेक्ष्य में तुलसीदास को समझ सकते हैं, रसास्वादन कर सकते हैं, परन्तु साथ ही यह निश्चित रूप से मानते हैं कि हमारी सारी प्रशंसा और रसग्राहिता के बावजूद ऐसा ही लिखना आज के युग के लिए उपादेय नहीं भी हो सकता है। ऐतिहासिक चेतना ने हमें मध्यकालीन मनुष्य से बिल्कुल भिन्न बना दिया है। यह अधिक रूढि़मुक्त और स्वतन्त्र विचार के हो गए हैं। तीसरा चिन्ह है व्यष्टि मुक्ति के स्थान पर समष्टि मुक्ति की धारणा। हम यह अनुभव करने लगे हैं कि किसी एक व्यक्ति को भय, शोक, मोह आदि से मुक्त करना पर्याप्त नहीं है। पूरे-के-पूरे समाज-मानव को ही शेषण के भय और मोह से मुक्त करना हमारा उद्देश्य होना चाहिए। प्रच्छन्न रूप से और हमारे अनजान में यह विचारधारा सारे संसार में व्याप्त हो रही है। इसी का परिणाम है कि दुनिया का हर देश, चाहे वह डिक्टेटरशाही के अधीन ही क्यों न हो, अपने को कल्याणकारी राज्य या welfare state समझने में गौरव अनुभव करता है। सवाल यह नहीं है कि वह welfare state है या नहीं। यहाँ मेरा उद्देश्य उस वैचारिक क्रान्ति की ओर ध्यान आकृष्ट करना है जो जाने-अनजाने संसार-भर में क्रियाशील है। जो साहित्य प्रगतिशील होता है उसमें ये तीनों चिन्ह अवश्य विद्यमान रहते हैं। जो लोग व्यक्तिगत कुण्ठा को प्रगति समझते हैं या अपनी चरित्रगत कमजोरियों को ही प्रगति मान लेते हैं, वे नितान्त व्यक्तिवादी हैं। उनकी रचनाओं में मध्यकालीन मनोवृत्ति से मुक्ति का कोई लक्षण नहीं मिलता। उन लोगों को मैं प्रगतिशील नहीं मानता बल्कि सच पूछिये तो उन्हें साहित्यकार भी नहीं मानता। मेरे अब तक के कथन का अर्थ यह न समझिएगा कि मेरे विचार में दीर्घकाल से संचित और अर्जित मानवीय मूल्य बेकार हो गए हैं। बिलकुल नहीं। केवल उनका परिप्रेक्ष्य और विनियोग बदला है। मनुष्य ने दीर्घकाल की साधना से जो कुछ पाया उसमें इतना और जुड़ गया है। घर में अच्छे व्यक्तित्व वाले एक बच्चे के और आ जाने से परिवार के व्यक्तिगत सम्बन्धों में भी परिवर्तन आ जाते हैं। यहाँ तो मानवता की गोद में तीन-तीन शानदार व्यक्तित्व वाले बच्चे आ गए हैं। इसलिए सम्बन्ध तो बदलेंगे ही, बदलते ही रहते हैं। इस बार जरा ज़्यादा बदलाव अनुभव हो रहा है।
जो लोग केवल आखिरी किनारे को जानते हैं वे सही अर्थों में प्रगितिशील नहीं हैं और जो उसके शुरू या बीच के किनारों को ही जानते हैं वे भी नहीं है। प्रगतिशील चिन्तन सम्पूर्ण इतिहास की देन है। इसीलिए हर साहित्यकार से इतिहास उसकी माँग करता है।
दलबन्दी बुरी बात है। साहित्य के क्षेत्र में और भी बुरी है, लेकिन अस्वाभाविक नहीं है। किसी शक्तिशाली व्यक्तित्व के इर्द-गिर्द प्रभावित लोग अनादिकाल से इकट्ठे हो जाते रहे हैं और साहित्य में, धर्म में, राजनीति में दल बनाने का सूत्रपात करते हैं। ये दल पहले भी बन चुके हैं, अब भी बन रहे हैं और आगे भी बनेंगे। मगर आजकल हम लोग इनसे जितना चिन्तित हैं उतना कदाचित् पहले के लोग चिन्तित नहीं हुआ करते थे। आज भी जो लोग मध्ययुगीन मनोवृत्ति के हैं वे अपेक्षाकृत कम परेशान होते हैं। जिनके मन में ऊपर बताये हुए तीन लक्षण अधिक स्पष्ट हो गए होते हैं वे ही अधिक चिन्तित होते हैं। क्योंकि श्रद्धा या अन्धश्रद्धा के आधार पर गठित दल न हो ऐतिहासिक बोध के अनुकूल पड़ता है और न समष्टि चेतना के। मुझे ऐसा लगता है कि साहित्य में इन दिनों जो दलबन्दियाँ हो रही हैं वे साहित्यिक उपलब्धियों से उतना सम्बद्ध नहीं हैं जितना अन्य प्रकार की बातों से। जैसे-जैसे मनुष्य की छोटी-बड़ी भौतिक आवश्यकताओं को आसानी से पूरी करने के साधनों पर समष्टि-मानव का अधिकार बढ़ता जाएगा, वैसे-वैसे इन दलबन्दियों का डरावना और कुत्सित रूप सड़ता जाएगा और स्वस्थतर रूप प्रकट होते जाएँगे। इनको दूर करने के प्रयत्न का अर्थ है मनुष्य को अभाव और अज्ञान से मुक्त करने का प्रयत्न।
प्रिय बलराजजी, मेरा विश्वास है कि मनुष्य एक दिन क्षुद्रताओं से ऊपर अवश्य उठेगा। ये मार-काट, लड़ाई-झगड़े, दलबन्दियाँ और व्यूहबन्दियाँ सब उसी महान् लक्ष्य को प्राप्त करने के प्रयत्नों की कसमसाहट हैं। गुरुदेव की वह बात मुझे याद आती है, जो कुछ इस प्रकार की है — हम लुहार की दुकान पर बैठे हैं। ठाँय-ठाँय, खटर-खटर, गर्दो-गुब्बार देखकर घबराये हुए हैं। लेकिन अगर हमें मालूम हो कि वीणा के तार बन रहे हैं जो तैयार होने पर मधुर ध्वनि ही उत्पन्न करेंगे, तो हमारी घबराहट बहुत कम हो जाएगी। आइये, हम लोग भी विश्वास करें कि वीणा के तार तैयार हो रहे हैं। हम नहीं तो हमारे बच्चे उनसे निकली हुई मधुर ध्वनि को अवश्य सुनेंगे।
मैं सोच रहा हूँ कि मेरी इस बात को सुनने के बाद आप कहीं हँसने न लगें. यह न समझने लगें कि उन्नीसवीं शताब्दी के स्वप्नदर्शियों के भग्नावशेष आज भी बचे हुए हैं। लेकिन मैं आपको विश्वास दिलाना चाहता हूँ कि मैं वैसा स्वप्नदर्शी नहीं हूँ। उन्नीसवीं शताब्दी के स्वप्नदर्शी भौतिक विज्ञान की उपलब्धि से झूम उठे थे। मैं अपने को उनसे भिन्न मानता हूँ। भौतिक विज्ञान स्थानगत जानकारियों का विश्लेषण है, जिसे अंग्रेज़ी में special कहते हैं, लेकिन मनुष्य-जीवन कालगत अनुभूतियों का विषय है जिसे अंग्रेज़ी में temporal कहा करते हैं। इतिहास इसी श्रेणी का विज्ञान है। काव्य और संगीत इसी श्रेणी के ज्ञान हैं। मैं वैज्ञानिक विश्लेषण पर आधारित प्राविधिक सफलताओं से ही उल्लसित होकर स्वप्न नहीं देखने लगा हूँ। मेरा विश्वास इतिहास से झनकर आया है।
मैं समझता हूँ आपके प्रश्नों का 25 प्रतिशत पाने लायक उत्तर हो गया है।

– हजारी प्रसाद द्विवेदी, चंडीगढ़ ८-१०-१९६५

पीएचडी के अंतिम वर्ष में जेएनयू के शोध छात्र उदयशंकर ने इसे ‘पहल’ के लिये उपलब्ध कराया है। नई कहानियां नवम्बर 1965 के अंक से साभार।

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