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‘रंगून’ वंडरलैंड से वंडरलैंड की यात्रा है: तत्याना षुर्लेई

विशाल भारद्वाज की बहुप्रतीक्षित फिल्म ‘रंगून’ दर्शकों के समक्ष आ चुकी है. बहुप्रतीक्षित इसलिए भी कि भारद्वाज हिंदी सिनेमा के सबसे प्रतिभाशाली निर्देशक हैं और एक कला-रूप के साथ-साथ लोकप्रियता के पैमाने पर भी उनका स्ट्राइक रेट अन्य निर्देशकों के बनिस्पत अधिक रहा है. यह समीक्षा उनके लिए है जो फिल्म देख चुके हैं, उनके लिए नहीं जो इसे पढ़कर फिल्म देखने जाएँ या न जाएँ का फैसला करें. विशाल की फिल्म लोगों द्वारा देखे जाने और उस पर गंभीर प्रतिक्रिया के लिए लोगों को उकसाती हैं. विशाल दर्शकों के साथ-साथ फिल्म आलोचकों के भी प्रिय फिल्मकार रहे हैं. फिल्म आलोचक तत्याना षुर्लेई की यह तात्कालिक-प्रतिक्रया इसी की एक कड़ी है. #तिरछीस्पेल्लिंग

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Rangoon (2017) Film-Poster

‘रंगून’: वंडरलैंड से वंडरलैंड की यात्रा 

By  तत्याना षुर्लेई

विशाल भारद्वाज की नयी फ़िल्म ‘रंगून’ युद्ध के बारे में है. शुरुआत में दर्शकों को लड़ाई के दो रास्तों के बारे में बताया जाता है, एक महात्मा गाँधी का अहिंसा वाला और दूसरा सुभाष चन्द्र का हिंसा वाला. ऐसा लगता है जैसे फ़िल्म की कहानी कुछ दार्शनिक होने वाली है और इसका आधार ‘युद्ध की वैधता’ होगी. लेकिन फ़िल्म के दुसरे भाग में पता चलता है कि यह देशभक्ति-श्रृंखला वाली फ़िल्म है, जिसमें इतनी सारी चीज़ें डाल दी गई हैं कि नायकों के चरित्र और उनके चारित्रिक बदलाव को दिखाने के लिए ज़्यादा स्थान बचा ही नहीं है. फलस्वरूप फ़िल्म न तो देशभक्ति और गद्दारी के बारे में कोई दिलचस्प कहानी कह पाती है और न ही एक कठिन और नामुमकिन प्यार के बारे में. फिर भी,‘रंगून’ की बुनियाद में एक खुबसूरत आईडिया दिखाई देता है.

फ़िल्म की नायिका, मिस जूलिया (कंगना रानौत) ऐलिस की तरह एक वंडरलैंड जानेवाली है, जहाँ आम दुनिया के नियम बिलकुल नहीं चलते हैं. जंगल के कैम्प में रहनेवाले सिपाहियों को दिलासा देने और उनका मनोरंजन करने के लिए वह सुरक्षित और आरामदेह (कम्फर्टेबल) बॉम्बे से बर्मा जा रही है. यद्यपि लेविस कैरोल की ऐलिस और मिस जूलिया में यही अंतर है कि विशाल भारद्वाज की नायिका वंडरलैंड (बर्मा) जाने से पहले भी एक दुसरे तरह की वंडरलैंड (बॉम्बे) की निवासी है. बम्बइया सपनों का कारखाना वास्तविकता से बहुत अलग है, लेकिन यह अलगाव ही वह कारण है जिसके चलते मिस जूलिया और वहाँ काम करने वाले अन्य लोगों के लिए यह वंडरलैंड सुरक्षित है. फ़िल्म वाले फ़िल्म के सब से अच्छे गाने, ‘जूलिया’ के सीक्वेंस में दिखाते हैं. उनका सिर्फ एक प्यार है, मिस जूलिया और चिंता भी सिर्फ एक है कि मिस जूलिया का नेक्स्ट शॉट और अच्छा हो सकता था. इस दुनिया में बुराइयाँ तो ज़रूर होती हैं लेकिन सब को पता है कि अंत में मास्क पहननेवाली फीयरलेस हीरोइन आ जाएगी और सब को बचा लेगी, पर नए वंडरलैंड में ऐसा नहीं होगा.

विशाल भारद्वाज उन दो अजीब दुनियाओं पर खुद को ज़्यादा केन्द्रित नहीं कर पाया है. यह बात अजीब इसलिए भी है कि ‘रंगून’ की कहानी में यह अच्छी तरह दिखाई देता है कि जूलिया के फ़िल्म या फिल्म-शूटिंग वाले सारे दृश्य क़ुरबानी और देशभक्ति वाले प्लॉट से ज़्यादा अच्छे हैं, ऐसा लगता है जैसे भारद्वाज खुद ही असमंजस में है कि उसको अपनी कहानी से क्या-क्या अपेक्षाएं हैं! फ़िल्म का दूसरा भाग पहले से कमज़ोर है. दुसरे भाग में ट्रेजेडी तो है लेकिन इसके बावजूद भी ये सारी मौतें और डिस्टर्बिंग सीन्स वास्तव में कुछ ख़ास डिस्टर्बिंग नहीं हैं, और ‘तलवार’ वाले प्लॉट में कोई थ्रिल ही नहीं है. सच्चाई यह है कि इस तलवार वाली कहानी में कोई बड़ा सरप्राइज आता ही नहीं है.

‘जूलिया’ गाने के अलावा फ़िल्म में और भी अच्छे गाने हैं जिनमें से खास तौर पर ‘टिप्पा’ और इसका ट्रेन सीक्वेंस बहुत सुन्दर है. इस गाने में लार्स वॉन ट्रायर की ‘डांसर इन द डार्क’ फ़िल्म का बड़ा प्रभाव है लेकिन कहा जाता है कि लार्स वॉन ट्रायर खुद ‘दिल से’ (1998) के ‘चल छैंया छैंया’ गाने के दृश्य से प्रेरित था. जब तक लोग कुछ नया और आर्टिस्टिक वैल्यू निकालते रहेंगे, तब तक प्रेरणा नक़ल नहीं कहलायेगा. और, ‘टिप्पा’ गाना इसी तरह का है. सुंदर दृश्यों के अलावा भी इसका एक अलग महत्व है, दर्शकों को अच्छी तरह से दो वंडरलैंड्स दिखाई देते हैं. बर्मा-यात्रा के पर्यटकीय अंदाज की सुंदरता और चाक-चौबंद सुरक्षा अचानक से खतरे में तब्दील हो जाते हैं. युद्ध की दुनिया में स्वागत आफत की दुनिया में फंसने जैसा है; बर्मा आए हुए लोगों पर लड़ाकू विमानों का हमला शुरू हो जाता है. इस दृश्य के बाद सभी को पता चलता है कि वे अब बिलकुल अलग दुनिया में आ गए हैं. एक ऐसी दुनिया, जहाँ कोई सुपर, फीयरलेस हीरोइन किसी को बचा नहीं सकती है. फिर भी, कुछ समय बाद अपने प्रेमी, नवाब मलिक (शाहिद कपूर) की जान बचाने वाली मिस जूलिया के फ़िल्मी स्टंट वाले सीन यहाँ फिर से बहुत अच्छा और ताजा लगने लगता है और यह फ़िल्म के दुसरे भाग का सब से अच्छा सीक्वेंस है, जिसमें दो वंडरलैंड्स मिल जाते हैं. सपनों की दुनिया में रहनेवाली जूलिया को इसके बावजूद भी हारना था जबकि वह मिशन में शुरू में ही सफल हो गयी थी. मिस जूलिया और क्रूर मेजर हार्डिंग (रिचर्ड मकेब) ने एक क्षण के लिए एक-दुसरे की दुनिया की अदलाबदली कर लेते हैं. मिस जूलिया सुपर-हीरोइन के कपड़े पहनकर नवाब को बचाने की कोशिश करती है, और मेजर हार्डिंग एक्टिंग का इस्तेमाल कर उसको धोखा देता है क्योंकि युद्ध युद्ध होता है, युद्ध के बारे में एक हैप्पी एंड वाली फ़िल्म नहीं. बहरहाल फ़िल्म इंडस्ट्री के बारे में एक फ़िल्म बनाकर भी विशाल भारद्वाज इस टॉपिक का पूरा इस्तेमाल नहीं कर पाया है, हालाँकि उसकी कहानी में यह स्पष्ट है कि फिल्मवाले फ़िल्मी तत्व उसको सब से अच्छे लगते हैं.

जूलिया, नवाब और जापानी सिपाही की जंगल-यात्रा भी फ़िल्म का एक अच्छा हिस्सा है, जिसमें न सिर्फ जूलिया और नवाब का प्यार होता है बल्कि दर्शकों को भी पता चलता है कि युद्ध कितना क्रूर और अमानवीय होता है, साथ ही साथ दोस्त और दुश्मन का विभाजन भी आसान नहीं होता है. लोग अपनी मर्ज़ी से सिपाही नहीं बनते हैं, वे देशभक्त होने के बावजूद भी अपने परिवारों के साथ रहना चाहते हैं. अफ़सोस की बात यह है कि कैम्प में आने के बाद ये सारी दिलचस्प बातें कहीं गायब हो जाती हैं और फ़िल्म में बिलकुल नयी कहानी आ जाती है जिससे भारद्वाज खुद थोड़ा-सा परेशान लगता है. देशभक्ति वाला भाग फ़िल्म का सब से कमज़ोर भाग है और इसमें कई ऐसे तत्व, टुकड़े हैं जो विशाल भारद्वाज के स्टैण्डर्ड से बहुत नीचे के हैं. उदहारण के लिए नवाब के राष्ट्रगीत गाने वाला दृश्य इसी तरह के एक बैड-टेस्ट का उदाहरण है, ऐसा लगता है जैसे यह विशाल भारद्वाज ने नहीं किसी और ने बनाया है. यहीं पुल वाला अंतिम सीक्वेंस भी अच्छा नहीं है. फ़िल्म के तीनों नायक-नायिका इस सीक्वेंस में कागज़ के कठपुतली लगते हैं, इसीलिए इन्हें देखते समय दया नहीं, बल्कि शर्मिंदगी का अहसास होता है.

जिनकी फ़िल्म में बिलकुल ही ज़रुरत नहीं थी, उन सारी चीजों को फिल्म में डालने के कारण कहानी में दिलचस्प और ताजे विचारों के लिए जगह ही नहीं बची थी और यह अफ़सोस की बात भी है क्योंकि ‘रंगून’ में बहुत अच्छे और दिलचस्प चरित्र हैं. मिस जूलिया दो आदमियों के रिश्ते में है जिनमें से एक, रुसी बिलीमोरिया (सैफ अली खान), बॉम्बे वाले, सुरक्षित वंडरलैंड का हिस्सा है, और दूसरा, नवाब मलिक नए और खतरनाक वंडरलैंड का. उनमें से एक का चुनाव करना एक खास ज़िन्दगी का चुनाव करना भी होता, इसलिए मिस जूलिया के लिए यह चयन इतना मुश्किल लगता है.

दुर्भाग्य से मिस जूलिया के चरित्र को विकसित करवा पाने की जगह फ़िल्म में बिलकुल ही नहीं थी, इसलिए वह फिल्म के अंत में वैसे ही भोली लगती है जैसे फिल्म के शुरू में लगती थी. अगर स्क्रिप्ट थोड़ा-सा बेहतर होता तो कंगना रानौत का प्रदर्शन और भी अच्छा होता. यहीं पर सवाल उठता है कि अभिनय-प्रतिभा को दिखाने के लिए अगर स्क्रिप्ट में कोई जगह नहीं है, तो फ़िल्म में अच्छे अभिनेता-अभिनेत्रियों की फिर क्या ही ज़रुरत है? शाहिद कपूर और सैफ अली खान को एक्टिंग के लिए कंगना रानौत से थोड़ा-सा ज़्यादा मौका मिला है, साथ ही यहीं पर एक समस्या भी दिखाई देती है. वे तीनों परदे पर बस आते हैं और बातचीत करते हैं, चरित्र के निर्माण और विकास में योगदान देने वाले स्क्रिप्ट और अभिनय के अभाव में दर्शकों को उन्हें अच्छी तरह पहचानने और समझने का मौका नहीं मिलता है. यही कारण है कि फ़िल्म देखनेवालों के लिए यह कोई बात नहीं है कि वे जीते हैं या मर जाते हैं, क्योंकि उनसे दर्शकों का कोई गहरा संबंध स्थापित ही नहीं हो पाता है.

तीनों मुख्य पात्रों के अतिरिक्त एक बहुत दिलचस्प पात्र मेजर हार्डिंग भी है. वह बिलकुल ताजातरीन और नया खलनायक है, जिसको भारतीय संस्कृति से प्यार है और जो साथ ही साथ भारतीय लोगों के प्रति नस्लवादी व्यवहार भी करता है. लेकिन यहाँ भी उसके चरित्र को दिखाने के लिए फिर से जगह नहीं है. बस अचानक से वह एक क्रूर इंग्लिशमैन बन जाता है, जो सिर्फ यह कहता है कि मैं गोरा हूँ इसलिए हमेशा सही हूँ, या फिर भारतीय लोगों को अपमानित करता है. युद्ध का विषय विशाल भारद्वाज के लिए सहज नहीं था इसलिए जो तत्व देश की आज़ादी की लड़ाई से सम्बंधित हैं, वे सब से कमज़ोर हैं. अगर युद्ध सिर्फ एक पृष्ठभूमि (बैकग्राउंड) होती या भारद्वाज इसे फ़िल्म इंडस्ट्री के परिप्रेक्ष्य में देखता (जो बार-बार कई एक दृश्यों में बहुत अच्छी तरह दिखाता भी है), तो ‘रंगून’ सचमुच बहुत अच्छी हो सकती थी, और उसके एक्टर्स भी यह साबित कर सकते थे कि वे सचमुच में कितने प्रतिभाशाली लोग हैं.

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तत्याना षुर्लेई पोलैंड की रहने वाली हैं, एक इंडोलॉजिस्ट (भारतीय उपमहाद्वीपीय भाषा और संस्कृति की जानकार)  और फिल्म आलोचक हैं. हिंदी की मशहूर पत्रिकाओं और ब्लॉग्स के लिए लिखती रही हैं. पोलैंड के शहर क्राकोव स्थित जेगिलोनियन विश्वविद्यालय से द कोर्टसन फिगर इन इंडियन पॉपुलर सिनेमा: ट्रेडिशन, स्टीरियोटाइप, मैनिपुलेशननामक विषय पर पीएचडी हैं. वर्तमान में मनिपाल विश्वविद्यालय, कर्नाटक के यूरोपीय अध्ययन संस्थान में पढ़ाती हैं.

विडंबनात्मक परिवेश की रूपक-कथा है ‘आस्था’: प्रणय कृष्ण

अगर आधुनिकता की यह विडंबना आधारभूत है, तो कोई न कोई तबका हर समाज में ऐसा होगा जो इस विडम्बना को सबसे पहले और सबसे ज़्यादा गहराई से अभिव्यक्त करेगा। हिंदुस्तान में यह तबका कौन-सा है? ‘आस्था’ फिल्म का जवाब है कि यह तबका है महानगरों में रहनेवाली मध्यवर्गीय युवा औरतें। फिल्म की नायिका उन्हीं का प्रतिनिधित्व करती है। ऐसा नहीं कि दूसरे सभी तबके इस विडंबना से अछूते हैं, लेकिन इतिहास का निरंकुश चुनाव इसी तबके का है। मध्यवर्ग के महानगरीय आदमी की पितृसत्तात्मक सुरक्षा इस विडंबना से बचने की एक ढाल है। उसके तरकश में आदर्शवाद के तीर इस विडंबना से निपटने के लिए अभी बाकी हैं। लेकिन एक स्त्री जरूर तैयार होती गई है जिसकी परिभाषा परिवार, परंपरा और आदर्शवाद के दायरे में संभव नहीं है। # लेखक 04257290

फिल्म ‘आस्था’ से गुज़रते हुए

1. कहानी– मानसी एक सुन्दर-सी बेटी की मां और एक नेकदिल प्रोफेसर पति का प्रेम पाने वाली पत्नी है। घर की ज़़रूरतें पति की आय से पूरी हो जाती हैं, लेकिन ख्वाहिशें नहीं। बेटी को जूते की ज़रूरत है। मानसी जूते खरीदने जाती है, लेकिन जो जूता पसंद आता है वह उसके बजट से बाहर है। दुकान में उपस्थित एक महिला रीता जूते बंधवा देती है और बाकी के पैसे चुकता कर देती है। फिर वह उसे अपनी गाड़ी में बिठा कर होटल लाती है और एक पुरुष के हवाले कर देती है, इस हिदायत के साथ कि नई है। इस पुरुष से मानसी को मिलता है ढेर सारा रुपया और (प्रतिरोध के बाद) संतुष्टि। घर लौटती हुई मानसी में आत्मग्लानि है। घर लौटने पर बेटी जूते पाकर खुश है, पति से वह सब कुछ बताना चाहती है, लेकिन कह नहीं पाती और बात बदल देती है। फिर तो ना-नुकुर करते हुए भी बिज़नेस का यह सिलसिला शुरू हो जाता है। सहेली के घर देखी गई ब्लू फिल्म के नाम पर वह पति को भी नए तरीकों से सुखी करती है। अंततः एक छात्रा के सामने पोल खुलने पर उसी छात्रा के माध्यम से और कहानी के रूप में पति को सारी बात बताती है। पति एक ऐसे आदर्श पति की भूमिका निभाता है जो पत्नी के हालात को समझने की कोशिश करे और इस तरह वह बाज़ार से मुक्त होकर घर की होकर रह जाती है।

 2. कहानी का पाठ (या शायद अतिपाठ): इस कहानी को हम आधुनिकता के विडंबनात्मक परिवेश की रूपक-कथा के रूप में देखने की कोशिश करें। पहले कुछ कविताओं के टुकड़े-

(अ) मिट्टीपन मिटाए नहीं मिटता/ आकाशपन हटाए नहीं हटता/आकाश और मिट्टी के इस संघर्ष के बीच/ मेरे ज़ख्मों का कजऱ् चुकाए नहीं चुकता

-मराठी कवि कुसुमाग्रज की कविता का एक अंश

(आ) कभी किसी को मुकम्मल जहां नहीं मिलता

कभी ज़मीं तो कभी आस्मां नहीं मिलता।

-हिंदवी कवि ‘शहरयार’

ऊपर के दोनों उद्धरण आधुनिकता की आधारभूत विडंबना पेश करते हैं- यहां ज़मीन या मिट्टी का अर्थ है सुरक्षा (भौतिक और मनोवैज्ञानिक), जुड़े होने की इच्छा (बिलांगिंगनेस), निरंतरता (कन्टीन्यूटी) और अस्मिता (आइडेंटिटी)। आसमान का अर्थ है- अभिलाषाओं का संसार, ख्वाहिशों की उड़ान, फैल जाने की इच्छा। प्राक्-आधुनिक इंसान को परिवार, समुदाय, परंपरा और धर्म के रूप में ज़मीन मिली हुई थी। उसकी जड़े पुख्ता थीं, उसकी संवेदना स्थानीकृत थी, आकाशधर्मा नहीं, सभ्यता के विकास ने उसकी उत्पादन क्षमता को कल्पनातीत ढंग से बढ़ा दिया और उसकी इच्छाओं को उड़ने के लिए आसमान दिया।

‘हज़ारों ख्वाहिशें ऐसी कि हर ख्वाहिश पे दम निकले‘ -गालिब

आधुनिक मनुष्यता में जड़ों और इच्छाओं, ज़मीन और आसमान का विभेद पैदा हुआ। भौतिक विकास ने इच्छाओं को कल्पना से बाहर निकालकर वास्तविकता में पूरा करने का आश्वासन दिया। आधुनिक मनुष्य के चार आर्य सत्य है- (1) इच्छाएं हैं। (2) इच्छाओं का कारण है। (3) इच्छाओं की पूर्ति है। (4) इच्छाओं की पूर्ति का मार्ग है।

लेकिन दिक्कत ये है कि इच्छाओं की पूर्ति का मार्ग बाज़ार से होकर जाता है। बाज़ार यानि भौतिक प्रगति के वितरण का तरीका। इस वितरण पर जिन शक्तियों का नियंत्रण है, वे वितरण को असमान बनाती है, लेकिन इच्छाओं की भौतिक पूर्ति संभव है, इस संभावना का सार्वभौम असर होता है। आधुनिक विकासक्रम में समाज को संगठित करने की पुरानी सभी संस्थाओं में जो कुछ नहीं था, वह सब बाज़ार में उपलब्ध है, लेकिन बाज़ार खुद, सबको सब कुछ नहीं दे सकता।

कविता में ज़मीन और आसमान एक साथ न मिल जाने की आधुनिक विडंबना कविता में एक बोध के रूप में व्यक्त हुई है, जबकि फिल्म ‘आस्था’ इस जटिल यथार्थ को फिल्म माध्यम के सारे ही संसाधनों की सहायता से उसके सारे वस्तुगत आयामों में घटनाओं का आधार देकर विकसित करती है। हालांकि आधुनिकता का यह द्वंद्व अनेकशः रूमानी कविताओं, मनोविश्लेषण और अस्तित्ववाद के माध्यम से व्यक्त होता रहा है। भारत में यह द्वंद्व अब अधिक वयस्क हुआ है, ’80 और ’90 के दशक में। पूंजीवाद की आयु दुनिया के स्तर पर बढ़ी है और इसी अनुपात में आधुनिक चेतना का विभाजन गहराता गया है।

हमने ज़मीन और आसमान के ये प्रतीक लिए ही नहीं होते यदि ‘आस्था’ फिल्म में नायिका ने एक संवाद में अपनी व्यथा इन्हीं प्रतीकों में व्यक्त न की होती। शायद इसलिए भी कि ये प्रतीक सार्वभौम हैं।

3. इस विडंबना का वाहक कौन है?

अगर आधुनिकता की यह विडंबना आधारभूत है, तो कोई न कोई तबका हर समाज में ऐसा होगा जो इस विडम्बना को सबसे पहले और सबसे ज़्यादा गहराई से अभिव्यक्त करेगा। हिंदुस्तान में यह तबका कौन-सा है? ‘आस्था’ फिल्म का जवाब है कि यह तबका है महानगरों में रहनेवाली मध्यवर्गीय युवा औरतें। फिल्म की नायिका उन्हीं का प्रतिनिधित्व करती है। ऐसा नहीं कि दूसरे सभी तबके इस विडंबना से अछूते हैं, लेकिन इतिहास का निरंकुश चुनाव इसी तबके का है। मध्यवर्ग के महानगरीय आदमी की पितृसत्तात्मक सुरक्षा इस विडंबना से बचने की एक ढाल है। उसके तरकश में आदर्शवाद के तीर इस विडंबना से निपटने के लिए अभी बाकी हैं। लेकिन एक स्त्री जरूर तैयार होती गई है जिसकी परिभाषा परिवार, परंपरा और आदर्शवाद के दायरे में संभव नहीं है। ‘रोज़ा’ फिल्म का गीत याद आता है-

दिल है छोटा सा, छोटी सी आशा

मस्ती भरे मन की, भोली सी आशा

चांद तारों को छूने की आशा

आसमानों में उड़ने की आशा-

इस उड़ने की आशा को भला कौन-सा मध्यवर्गीय आदर्शवाद समेट पाएगा? कौन-सा परिवार और कौन-सी परंपरा इस चांद सितारों को छूने की इच्छा को पचा पाएंगे? एक तरफ सीता-सावित्री का कैंप है, दूसरी ओर मिस इंडिया, मिस यूनिवर्स का। बीच में एक लंबा दायरा है इतिहास, समाज और पीढि़यों का जिसमें एक बड़ा काफिला युवा स्त्रियों का चला जा रहा है- सीता के कैंप से मिस यूनिवर्स के कैंप की तरफ, एक तीसरे कैंप की तलाश में तमाम आंवागार्द लोग, महिलाओं के जनसंगठन, समाजवादी राजनीति करने वाले, सभ्यता समीक्षक, कलाकार और विचारवंत चले जा रहे हैं, लेकिन हैरत है कि सीता-सावित्री वाले कैंप और मिस वर्ल्ड वाले कैंप में फिर भी एक संवाद है, तीसरे कैंप के अन्वेषी तो कहीं संवाद में ही नहीं।

बाज़ार ने बोतल में बंद एक जिन्न को आज़़ाद कर दिया है- वह जिन्न जो मनुष्य की दमित आज़ादी है,  उसका अपूर्ण संसार है। यह जिन्न उस पर ज़्यादा चढ़ेगा जिसकी चेतना में वह सर्वाधिक कैद था।

इस फिल्म का एक दृश्य है जो दर्शकों की समूची सांस्कारिकता को तेज़ आघात देकर विजड़ित कर देता है। एक तरफ पति अपने मित्र के साथ किसी गांव में पंचायत की कार्यवाही देख रहा है जहां औरत विक्रय की वस्तु है, लेकिन पेट में बच्चा होने के नाते पंचायत उसकी भी राय जानना चाहती है कि वह किसके पास जाना चाहेगी। दूसरी ओर पत्नी को फुसलाकर एक दलाल महिला एक धनी व्यक्ति के बिस्तर में पहुंचा देती है। एक ओर पंचायती न्याय में तन्मय पति, दूसरी ओर परपुरुष की वासना का प्रतिरोध करती, छटपटाती पत्नी, दोनों ही दृश्य तेज़ी से एक दूसरे के समानांतर दिखाए जाते हैं। नेपथ्य में तेज़ संगीत बज रहा है। मानो कि उसी के शोर से पति को पत्नी का आर्तनाद नहीं सुनाई पड़ रहा। ज़रा सोचिए दर्शक की हालत।यह दृश्य उसके सांस्कारिक मन की पीड़ा को गहराता चला जाता है।

वे जो ‘आस्था’ फिल्म का ‘जलती जवानी’ टाइप पोस्टर देखकर फिल्म देखने चले आते हैं, इस दृश्य संयोजन से वे भी स्तब्ध थे। लेकिन वास्तविक आघात तो तब लगता है जब चरमोत्तेजन की ओर अग्रसर वह घरेलू पत्नी प्रतिरोध करना बंद करके, आनंद लेने लगती है। एक आनंद जो उसके वैवाहिक जीवन में उसे कभी नहीं मिला था, एक परपुरुष ने उसे दे दिया था। हिंदी फिल्मों में इतना तनावयुक्त शायद ही कोई दूसरा दृश्यांकन हुआ होगा। पूरे हॉल में स्तब्धता छा जाती है। यहां यह कह देना आवश्यक है कि चरमोत्तेजन (Orgasm) को एक नितांत जैविक तथ्य के रूप में लेना घातक है। यहां चरमोत्तेजन एक रूपक है उस मुक्ति का जो उसे एक नीरस पारिवारिकता से मिलती है। यहां गौरतलब है कि यह परिवार कोई संयुक्त परिवार नहीं, जिसका बोझा औरतें ढोती हैं। पति भी कोई सामंत नहीं, बल्कि आधुनिक सोच बरतने वाला पढ़ा-लिखा समझदार व्यक्ति है। फिर वह क्या है जो नायिका को एक अलगाव में ले जाता है? उसके पति की पुस्तकें, उसकी विद्वता और लोकप्रियता, उसका हंसमुख और मिलनसार स्वभाव सभी कुछ पत्नी से यह अपेक्षा करता है कि पत्नी अपने व्यक्तित्व को उसी में लय कर दे। जब पत्नी कहती है कि ‘इनकी मर्जी के बगैर इस घर में सूई भी इधर से उधर नहीं हो सकती’, तो वह अपने इसी भयानक अलगाव को व्यक्त कर रही होती है। असल में यह औरत अपने जि़ंदा हस्ती के लिए स्वायत्त लिविंग स्पेस खोज रही है। पति का सारा आदर्शवाद जो इस स्त्री के स्वाधीन व्यक्तित्व की अवहलेना पर टिका है; वह आदर्शवाद स्त्री की संवेदना, उसके भावनात्मक संसार, स्वप्न और अभिलाषाओं के प्रति अंधा है। पुरुष होने के नाते परिवार के बाहर भी उसकी एक दुनिया है, लेकिन स्त्री के लिए छत, दीवार, घरेलू काम, भोजन, बच्ची और पति मिलकर उसके अस्तित्व के अधूरेपन का गायन करते हैं, उसे सेलेबे्रट करते हैं; यहीं आकर यह फिल्म आदर्शवाद पर टिके मध्यवर्गीय एकल परिवार (न्यूक्लियर फैमिली) के खोखले स्त्री-पुरुष संबंधों का भाष्य बन जाती है। इन संबंधों में बहुत-सा आदर्शवाद, आवेग (पैशन) और अनुभव की साहसिकता (एडवेंचर) के ज़बर्दस्त अभाव पर पर्दा नहीं डाल पाता। यही कारण है कि यह परिवार बाज़ार के सामने इतना असहाय है।

4. तुम्हीं से जनमूं तो शायद मुझे पनाह मिले-

इस फिल्म के आखीर में एक खूबसूरत गीत फिल्माया गया है जिसकी टेक है- ‘तुम्हीं से जनमूं तो शायद मुझे पनाह मिले।’ इस फिल्म की नायिका ने बाज़ार में ज़रूरतों से आगे ख्वाहिशों के एक संसार को अपना इंतज़ार करते पाया, लेकिन इन ख्वाहिशों की पूर्ति को वैधता नहीं प्राप्त है। बाजार उसके व्यक्तित्व की न पाई गई अभिव्यक्ति को स्वायत्त करता है, लेकिन जड़ों से उसे उखाड़कर, उसकी संबंध भावना की विशिष्टता छीनकर, उसके निरंतरताबोध को विघटित करके। उसकी नई पाई गई आज़ादी वैधता के लिए भटकती है। अजीब दयनीय है यह आज़ादी जिसने उसके व्यक्तित्व को विभाजित कर दिया है। एक तनी हुई रस्सी पर विभाजित व्यक्तित्व के दोनों हिस्से एक दूसरे से मिलने के लिए दिन-रात चलते हैं। भटकती हुई आत्मा अपनी मुक्ति का स्तोत्र पढ़ती है- ‘‘तुम्हीं से जनमूं तो शायद मुझे पनाह मिले…’’ क्या यह प्रेतमुक्ति संभव हो पाएगी?

इस गीत के दृश्यांकन में आदमी-औरत के पारंपरिक रिश्तों का इतिहास बजता है। गीत के दौरान ओमपुरी की भंगिमा हिंदी फिल्मों के न जाने कितने आदर्शवादी नायकों को एक साथ उपस्थित कर देती है। अपनी ही ज्वाला में धधकती भटकन को रेखा उतनी ही खूबसूरती के साथ चेहरे में उतार देती है। सब्र और ज़ब्त का प्रतीक बना नायक नायिका के समूचे आवेग को अपने हिमालय जैसे मजबूत कंधे पर सांत्वना की ठंडी थपकी देता है। अजीब विडंबना है कि आवेग और साहसिकता की ज्वाला बर्फ जैसे ठंडे और धैर्ययुक्त आदर्शवाद से मांग करती है- ‘तुम्हीं से जनमूं तो शायद मुझे पनाह मिले’- इस गीत का पुरुष पहाड़-सा धीरज है और औरत है बहाव से युक्त सरिता। पहाड़ से नदी निकलती है, इस युग-युग की स्वाभाविकता को फिर से पाने की कोशिश है, लेकिन प्रतीक बदल गए हैं- पहले जो पहाड़ था, वह आज भी बर्फ है। किंतु पहले जो नदी थी, आज वह ज्वाला है। इस गीत के फिल्मांकन से लगता है कि ज़मीन फिर पंरपरा में खोजी जा रही है, लेकिन ‘शायद’ नहीं। ‘तुम्हीं से जनमूं तो शायद मुझे पनाह मिले’- इस पंक्ति का भेद खोलने वाला शब्द है ‘शायद’, जो कि पूरे दृश्यांकन में नायक और नायिका की पूरी संकल्पना के बीच दरार की तरह सक्रिय है। आधुनिकता ने ज़मीन और आसमान, ज़रूरत और अभिलाषा, परिवार और बाज़ार, आदर्शवाद और आवेग, तर्कसम्मत और अतक्र्य के बीच जो विभाजन पैदा किया है, वह किसी उच्चतर क्रांतिकारी रूपांतरण में हल होगा, अथवा वापसी संभव है? कुछ लोग परिवार को पवित्र गाय मानते हैं। उनसे इतना ही कहना पर्याप्त होगा कि एकल परिवार खुद बाज़ार के दबाव से पैदा हुई है। संयुक्त परिवार बाज़ार के दबाव में ही टूटा था। इसलिए एकल परिवार को बाज़ार के ऊपर कोई नैतिक व्यवस्था मानना गलत है।

अपने ही जीवन की कथा, पति की कहानी में सुनने के बाद एक दृश्य में जब बिस्तर में नायिका उससे पूछती है कि यदि यह कहानी सचमुच सही हो, और कहानी की नायिका वास्तविकता में वह स्वयं हो, तो क्या उसी विशालहृदयता के साथ वह उसे समझने की कोशिश करेगा? ओमपुरी का जवाब है- ‘कुछ भी हो सकता है।’ जी हां! कुछ भी हो सकता है। जिन्न को पकड़कर वापस बोतल में भेजने की कोशिश भी हो सकती है। विकसित पूंजीवादी देशों के नेता परंपरा और परिवार को बचाने की चीख पुकार मचा ही रहे हैं। लेकिन, दूसरी ओर आदर्शवाद की खोल उतारकर इंसान और जिन्न अर्थात् इंसान और उसका ही सद्यःमुक्त रूप जो जिन्न की तरह उसकी चेतना में कैद था, उन दोनों का मिला-जुला रूप भी पैदा हो सकता है। रास्ता खुला है। रास्ता फिल्म में नहीं, जि़ंदगी और इतिहास की गतियों में है। शुक्र है कि ‘इतिहास’ का अभी तक ‘अंत’ नहीं हुआ है।

प्रणय कृष्‍ण। इलाहाबाद युनिवर्सिटी और जेएनयू से अध्‍ययन। प्रखर हिंदी आलोचक। जन संस्‍कृति मंच के महासचिव।  देवीशंकर अवस्‍थी सम्‍मान  से सम्मानित ।

प्रणय कृष्ण की सद्य प्रकाशित पुस्तक ‘प्रसंगवश: साहित्य और समाज की चंद बहसें’ से साभार
(लोकयुद्ध , 16 मार्च -17 अप्रैल, 1997)

हैदर और बर्फ के अंगारे: तत्याना षुर्लेई 

कलाकार की रचना-प्रक्रिया से वास्ता रखना सिर्फ एक बौद्धिक शगल नहीं होता है बल्कि इसका सीधा संबंध पाठ-प्रक्रिया से भी होता है. पाठ-प्रक्रिया को ज्यादा दूर तक खींचने की जरुरत नहीं है बल्कि इसे अभी समीपी-अध्ययन (Close Reading) तक ही सीमित रखा जाय तो बेहतर है. विशाल भारद्वाज ‘हैदर’ क्यों बनाना चाहता था? क्या इस सवाल को ढूंढें बिना ‘हैदर’ की ‘क्लोज रीडिंग’ की जा सकती है !! इसे बहुत सरल शब्दों में कहा जाए तो वह यह कि विशाल भारद्वाज शेक्सपीयर के तीन नाटकों पर फिल्म बनाना चाहता था. ‘मैकबेथ’ और ‘ऑथेलो’ पर क्रमशः ‘मकबूल’ और ‘ओमकारा’ बना चूका था. इसी प्रक्रिया को आगे बढ़ाते हुए उसने ‘हैमलेट’ को ‘हैदर’ के रूप में परदे पर रूपांतरित किया है. ‘हैदर’ की परिवेश विषयक ‘असंगतियों’ पर अथाह चर्चाएँ हो चुकी हैं और ऐसी तमाम चर्चाएँ कहीं न कहीं ‘फिल्म’ को कला के एक विधा के रूप में, एक प्रसिद्द नाटक के दृश्य में रूपांतरण के सन्दर्भ में और एक निदेशक की रचना-प्रक्रिया के सन्दर्भ में देखने में अक्षम रही हैं. तत्याना ने इन्हीं अछूते मुद्दों को बारीकी से देखने की कोशिश की है.

हैदर (२०१४)- पोस्टर

हैदर (२०१४)- पोस्टर

 By तत्याना षुर्लेई 

50 अलग अडॉप्टेशन के बाद नया और इतना अच्छा हैमलेट सिर्फ एक जीनियस बना सकता था।

हैमलेट का अभिनय करना न सिर्फ हर अभिनेता का ख्वाब होता है, बल्कि यह वह नाटक भी है जिसकी अलग-अलग व्याख्याएं हर दौर में संभव होती रहेंगी और शायद इसलिए इसका संयोजन आसान नहीं है। ‘हैदर’ विशाल भारद्वाज की ऐसी तीसरी फिल्म है जो शेक्सपीयर के नाटकों पर आधारित है और यह भी लगता है कि यह अब तक की उनकी सबसे अच्छी फिल्म है।

‘हैदर’ की कहानी कश्मीर में चल रही है, इससे अच्छी और प्रासंगिक बात कुछ और हो नहीं सकती थी। शेक्सपीयर के नाटक में कहा जाता है कि देश की स्थिति ठीक नहीं है और वह देश अक्सर जेल जैसा दिखाया जाता है। भारत में कश्मीर के अलावा वह कौन-सा प्रदेश हो सकता था जहां की स्थिति नाटक की तरह ही गड़बड़ है और जिसके नागरिक कैदी की तरह जीवन बिताते हैं? बहुत से आलोचक इस फिल्म की राजनीतिक स्थिति के बारे में लिखते हैं, लेकिन सबसे पहले यह स्पष्ट करना जरूरी है कि विशाल भारद्वाज चाहते क्या थे? वह चाहते थे कि फिल्म के दर्शक न सिर्फ ‘हैदर’ के दुःख को समझें बल्कि यह भी देखें कि वह अपने पिता की तरह ही विक्टिम बन गया है। फिल्म के निर्देशक को इतनी जटिल परिस्थितियों की तलाश इसलिए भी थी ताकि वे वास्तव में शेक्सपीयर के नाटक से मिलती-जुलती लगें। दि ट्रेजेडी ऑफ हैमलेट, प्रिंस आफ डेनमार्क में डेनमार्क न सिर्फ नायकों का देश है बल्कि पूरी दुनिया का एक निचोड़ भी पेश करता है जहां बुराई का राज है और बुरे लोग हमेशा जीतते हुए पाए जाते हैं। विशाल भारद्वाज की फिल्म में यह वक्तव्य-विवरण (statement) भी बहुत अच्छी तरह दिखाया गया है। आजकल कोई नहीं बोलेगा कि अगर धरती पर कहीं स्वर्ग है तो वह यहीं है यहीं है यहीं है, क्योंकि आज का कश्मीर एक नर्क है जहां के लोग भयरहित नहीं हैं और वहां किसी को नहीं मालूम है कि कौन दोस्त है और कौन दुश्मन। नर्क जैसे भयावह और भयानक समय-समाज में मनोरंजन (बॉलीवुड/सिनेमा) एक ख्याली पुलाव है, जहां सलमान खान के नकलची/प्रशंसक भी हत्यारे निकलते हैं और सिनेमा-घर का इस्तेमाल लोगों को मौत की सजा देने के लिए होता है। संघर्ष के दोनों पक्ष समान रूप से जालिम हैं और यह दयाहीनता हैदर और उसके पिता के अंदर भी घुसपैठ बढ़ा रही है। नायक का पिता, डॉक्टर हिलाल इंतकाम चाहता है और हैदर भी सचमुच में मानने लगता है कि इंसाफ पाने का यही एकमात्र विकल्प है, लेकिन अंत में वह समझ जाता है कि यही वह इंतकाम है जिसके चलते उसमें, कश्मीर में और पूरी दुनिया में दयाहीनता और निर्ममता या कहें कि बुराई हमेशा के लिए विद्यमान रहेगी। क्या कश्मीर के अलावा इतना प्रासंगिक कोई दूसरा उदाहरण संभव था? यह स्थान इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि फिल्म के परिवेश में व्याप्त ठंडापन और सख्ती भी शेक्सपीयर के डेनमार्क से मिलती-जुलती है जो इस बात के लिए भी उकसाती है कि विशाल भारद्वाज का रूपांतरण दि ट्रेजेडी ऑफ हैमलेट, प्रिंस ऑफ डेनमार्क से एक मायने में अलग भी है और बहुत समान भी। फिल्म में ज्यादा रंग नहीं दिखाए जाते हैं और जो हैं भी, वे धीरे-धीरे गायब हो जाते हैं। अंत में बस एक तेज रंग, लाल, ही बाकी रह जाता है जिसे फिल्म में बर्फ से भरपूर एकवर्णी दृश्य में अलग से चटखता हुआ दिखाया जाता है।

अत्यधिक ठंडे माहौल के कारण संघर्ष और खतरे का एहसास और भी जोरदार बन जाता है। विशाल भारद्वाज की इस फिल्म में कहीं भी वातानुकूल या गर्म माहौल नजर नहीं आता है। जब लोग अपने घरों में हैं तब भी उनके मुंह से भाप निकलती है। बस प्रेम-दृश्यों में यह ठंड थोड़ी-सी कम हो जाती है, और यह सिर्फ हैदर और अर्शिया के प्रेम-प्रसंगों में ही नहीं दीखता है बल्कि गजाला और खुर्रम के प्रेम-प्रसंगों में भी दर्शनीय है। इस फिल्म में नाटक से जो सबसे बड़ा अंतर दीखता है, वह यह है कि फिल्म में हैदर का चाचा उसके पिता और अपने भाई को राज्य के लिए नहीं बल्कि उसकी बीवी को पाने के लिए फंसाता है और बाद में मरवा देता है। यह बड़ा अंतर भी कुछ आलोचकों को पसंद नहीं है, लेकिन शेक्सपीयर के नाटक के आधुनिक रूपांतरण में राज्य को हड़पना दिखाना थोड़ा मुश्किल है और यह अजीब भी लग सकता है, क्योंकि वह आज के समय में बड़ी कंपनियों में चलने वाली हैमलेट की कहानी बन चुकी है… (Hamlet, Michael Almereyda, 2000) गजाला अपने पति से ज्यादा खुर्रम को प्यार करने लगती है और शायद इसलिए कि डॉक्टर हिलाल अपने काम में ज्यादा व्यस्त रहता है और खुर्रम के लिए सिर्फ गजाला सबसे महत्वपूर्ण है। यद्यपि यहां फिल्म नाटक से अलग है। एक औरत के लिए किसी को मार देना या युद्ध तक करना कोई नई बात नहीं है, न सिर्फ यूरोपीय साहित्य में बल्कि भारतीय साहित्य में भी इसे आसानी से चिन्हित किया जा सकता है। फिर भी, जो नई और दिलचस्प बात विशाल भारद्वाज की फिल्म में है, वह यह है कि मेच्योर औरत को दिखाने के इस नए तरीके के लिए बॉलीवुड के दर्शकों को ‘हैदर’ तक बहुत इंतजार करना पड़ा है। हैदर की मां अपनी ढलती उम्र के बावजूद एक सुंदर और आकर्षक औरत होने के एहसास को महसूस कर सकती है, उसे अपने प्रति एक आदमी को पागल बनाने के लिए होमर वाले ‘दी इलियड’ की हेलेन ऑफ ट्रॉय या रामायण की सीता की तरह जवान होने की आवश्यकता नहीं है, और ऐसी नायिकाएं भारतीय सिनेमा से अक्सर गायब ही दिखती हैं। फिल्म की शुरुआत में गजाला को दूसरी मुसलमान औरतों की तरह ही दिखाया जाता है, लेकिन खुर्रम के घर जाने के बाद उसके कपड़े बदल जाते हैं, बाल वह हमेशा खुले रखती है और वह सचमुच में एक लुभावनी (सिडक्टिव) औरत में तब्दील हो जाती है। गजाला को सिर्फ खुर्रम से ही प्यार नहीं है, बल्कि सबसे पहले उसे अपने बेटे से प्यार है, इसलिए उसकी आत्महत्या अर्शिया की खुदकुशी से अलग है। पिफल्म की ये दो औरतें ‘गलत प्यार’ में पड़ जाने या पिफर परिस्थितिगत विपर्यय के कारण खुद को मार लेती हैं। अर्शिया अपने पिता के खूनी से प्यार करती है, गजाला अपने पति के हत्यारे से, और यह उनके लिए असहनीय है। गजाला की मौत में क्रोध्, हलचल और नाटकीयता भी है क्योंकि वह न सिर्फ खुद को मारना चाहती है, बल्कि अपने बेटे को बचाना भी चाहती है। अर्शिया की मृत्यु अपेक्षाकृत उत्तेजनाविहीन और शांत है। अपने पिता की मौत के बाद वह नाटक की नायिका की तरह पागल हो जाती है, लेकिन दूसरों को फूल देने के बदले वह अपने पिता के लाल स्कार्फ को रेशा-रेशा बर्बाद करती हुई दिखती है। यह स्कार्फ उसने खुद ही बनाकर अपने पिता को भेंट किया था और हैदर को पकड़ते समय अर्शिया का पिता इसी स्कार्फ से हैदर की गर्दन को अपने काबू में लेता है। आज उसी स्कार्फ के रेशे-रेशे हो गए, रेशम उसके जख्मों को प्रतिबिंबित करता हुआ जान पड़ता है। इस दृश्य को विशाल भारद्वाज ने एक काव्यात्मक ऊंचाई दी है।

दि ट्रेजेडी ऑफ हैमलेट, प्रिंस ऑफ डेनमार्क को देखने वाले हमेशा दो दृश्यों का इंतजार करते हैं : पहला नायक द्वारा उच्चरित, टू बी ऑर नॉट टू बी वाला आत्मालाप और दूसरा नायक द्वारा खोपड़ी से बातचीत। फिल्म में टू बी ऑर नॉट टू बी, टू गो ऑर नॉट टू गो हो गया है जो इसे व्यंग्यात्मक और थोड़ा-सा निराशाजनक भी बनाता है, हालांकि यह शेक्सपीयर से मिलता-जुलता भी है क्योंकि उसके नाटक में बहुत सारे हास्यप्रद तत्व मिलते हैं, लेकिन खोपड़ी वाला दृश्य एक मास्टरपीस है। नाटक में कब्रिस्तान में काम करने वाले हैमलेट की प्रेमिका के लिए कब्र बना रहे हैं और फिल्म में तीन बूढ़े अपने लिए कब्र बना रहे हैं। कब्रिस्तान में गाने वाले बूढ़े प्राचीन ग्रीस के नाटकों के कोरस की तरह पूरी कहानी का समाहार पेश करते हैं। उनकी तीन कब्रें ऊपर से एक खोपड़ी जैसी दिखाई जाती हैं। वह खोपड़ी, कब्रिस्तान और थके हुए लोग, जो सोना चाहते हैं और जिनके लिए उम्मीद सिर्फ अंधेरा ही अंधेरा है, पूरे कश्मीर का रूपांतरण भी बन जाते हैं, गजाला और हुसैन मीर के शब्दों से ज्यादा मजबूत। हैदर की मां और उससे पहले हुसैन मीर कहता है कि इंतकाम से आजादी नहीं मिलती है, लेकिन वह शायद इसलिए नहीं मिलती है क्योंकि लोग सचमुच ही ज्यादा थक गए हैं।

फिल्म की संरचना को अगर बारीकी से देखें तो इसकी बुनावट में निर्देशकीय रचनात्मकता का एक सचेत प्रयास स्पष्ट ही दिखता है। इसमें बहुत से दृश्य बार-बार जोडि़यों में दिखाए जाते हैं। फिल्म की शुरुआत में डाॅक्टर के घर को बारूद से उड़ाकर धूल में मिला दिया जाता है और अंत में कब्रिस्तान में ऐसे ही एक दूसरे घर को इसी तरह से नष्ट किया जाता है। अपने घर के खंडहर में हैदर जब पहली बार अर्शिया के साथ होता है, तब लड़की का भाई आता है, जब दूसरी बार वहीं वह अपनी मां से मिलता है, तब अर्शिया का पिता आता है। मरे हुए लोगों की लाशों के ढेर से एक लड़का उठ जाता है, कब्रिस्तान में जीवित लोग कब्र में लेट जाते हैं। डॉक्टर के घर में इबादत करने वाले एक आदमी को मार दिया जाता है, बाद में खुर्रम को उसका इबादत करना ही उसे मरने से बचा लेता है। गजाला अपने शाल के नीचे छिपाए रिवाल्वर से अपने बेटे को इमोशनली ब्लैकमेल करती है और बाद में शाल के नीचे छिपाए हुए ग्रेनेडों से खुदकुशी करती है। दूसरी दिलचस्प बात फिल्म में गाने का इस्तेमाल है जो बहुत ही अच्छा बन पड़ा है। सब से जीनियस दृश्य कब्रिस्तान में होने वाला कार्य-व्यापार है जिसकी चर्चा ऊपर की गई है। हैदर द्वारा गजाला और खुर्रम को, संकेत में ही सही, संबोधित नाटकीय और कहानीनुमा गाना भी बहुत ही खास है और उसका नृत्य और चेहरे पर रंगों की लकीरें न सिर्फ जनजातीय लोगों में प्रचलित युद्ध वाले नाच जैसा है, बल्कि एक तरह से तांडव-दृश्य को रचता हुआ मालूम पड़ता है।

शुरू में मैंने लिखा कि हैमलेट का अभिनय करना हर अभिनेता का ख्वाब है और इस फिल्म में शाहिद कपूर ने न सिर्फ इस ख्वाब को निभाया है बल्कि उसने और तब्बू ने पूरी फिल्म को ही लगभग चुरा लिया है।

साभार- पाखी, नवम्बर, २०१४ 

Tatiana Szurlej

Tatiana Szurlej

तत्याना षुर्लेई एक Indologist और फिल्म-आलोचक हैं। हंस, पहल, अकार आदि हिन्दी पत्रिकाओं के लिए लिखती रही हैं। फिलहाल पोलैंड के शहर क्राकोव स्थित Jagiellonian University में The Courtesan Figure in Indian Popular Cinema:Tradition, Stereotype, Manipulation. नामक विषय पर पीएचडी के लिए शोधरत हैं। 

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