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पेरूमल मुरुगन और वन पार्ट वुमन: प्रणय कृष्ण

मुरुगन ने किसी प्रथा पर कोई मूल्य निर्णय नहीं दिया है, अच्छा या बुरा नहीं कहा है, उन्होंने सिर्फ एक कोमल कहानी कही है जो एक समाज में जन्मी है. उस समाज की कुछ प्रथाएं और मान्यताएं हैं जो उस समाज में जी रहे लोगों के जीवन से लिपटी हैं, उन्हें कोई कथाकार, इतिहास-लेखक या नृतत्वशास्त्री कृत्रिम ढंग से काट कर अलग नहीं कर सकता. ऐसा करना खुद को झूठा साबित करना है, कला और समाज दोनों से गद्दारी है. मुरुगन ने ऐसा करने से इनकार किया है, लेखक की मृत्यु की कीमत चुका कर भी. लेकिन पाठकों और जागरूक नागरिकों का प्यार उन्हें वापस लौटा लाएगा. ज़रूर ही लौटा लाएगा. #लेखक _80236804_modhorupaganfinalcurved

तमिल लेखक पेरूमल मुरुगन पुनरुज्जीवित होंगे

By प्रणय कृष्ण

तमिल लेखक पेरूमल मुरुगन ने १४ जनवरी को फेसबुक पर लिखा, लेखक पेरूमल मुरुगन मर गया. वह भगवान नहीं है, लिहाजा वह खुद को पुनरुज्जीवित नहीं कर सकता. वह पुनर्जन्म में भी विश्वास नहीं करता. आगे से, पेरूमल मुरुगन सिर्फ एक अध्यापक के बतौर ज़िंदा रहेगा, जो वह हरदम रहा है.” अब तक मुरुगन के खिलाफ धर्म और जाति के स्वयंभू ठेकेदारों से लेकर उनकी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के हक़ में आवाज़ उठाने वाले लोगों ने लाखों शब्द व्यय किए होंगे, लेकिन लेखक की पीड़ित अंतरात्मा की यह तीन पंक्तियां सब पर भारी हैं. लेखक मर गया, लेकिन २०१५ के हिन्दुस्तान के राज और समाज की हिंसक दयनीयता जी रही है. मुरुगन का वक्तव्य ऐसे वक्त पर टिप्पणी है जिसमें जनता की वंचनाओं और हाहाकार को एक सामूहिक पागलपन की ओर मोड़ देने की पुरजोर कोशिशें हो रही हैं. अतीत की रमणीय कपोल-कल्पनाओं और भविष्य के मादक सपनों की गरज के बीच आज के भारत की कराह सुनाई देनी बंद होती जा रही है. वे सारे परदे जिनपर चित्र और चलचित्र दिखाई देते हैं और वे सारे यंत्र-तंत्र जिनसे आवाजें सुनी जाती है, झपट लिए गए हैं. मानव विकास सूचकांक में दुनिया के १३५वें पायदान पर खड़े भारत की वर्तमान वास्तविकता, वास्तविक अतीत तथा यथार्थपरक भविष्य के चित्र और स्वर अदृश्य और गूंगे बनाए जा रहे हैं.

आस्था में चार साल की देरी से आए उबाल के तहत मुरुगन के जिस उपन्यास को पिछले दिसंबर महीने से   निशाना बनाया गया है, वह २०१० में प्रकाशित हुआ था जिसका अंग्रेज़ी अनुवाद ‘वन पार्ट वुमन’ के नाम से २०१३ में पेंग्विन से छप कर आया. रोचक यह है कि इस उपन्यास में न तो ईशनिंदा है और न ही किसी धर्म या उसकी प्रथाओं का विरोध. उपन्यासकार ने उनपर व्यंग्य भी नहीं किया है, न कोई भंडाफोड़ किया है. उपन्यास का संवेदनात्मक उद्देश्य ही अलग है. मुरुगन की इतिहास-दृष्टि और सामाजिक चेतना मिथकों और आस्थाओं में लिपटे जीवन की वास्तविक धड़कनों और मर्म को इस उपन्यास में प्रत्यक्ष कर देती है, उनके दुश्मनों की निगाह में यही उनका अपराध है. उन्हें मुरुगन की कथा-सृष्टि भी सच की तरह डराती है. सच से ऐसा डर ही उन्हें सामाजिक सच्चाइयों के हर अनुसंधान या साहित्यिक पुनर्रचना को आस्था की तोपों से मार गिराने का अभ्यस्त बनाता है. सत्य से सत्ता का युद्ध बड़ा पुराना है, लेकिन हम जिस २०१५ के भारत में रह रहे हैं, वहां सच के आखेटक पहले से अधिक मूर्ख, किन्तु प्रशिक्षित हैं.

घटनाएं

२७ दिसंबर, २०१४ के ‘द हिन्दू’ अखबार के अनुसार तिरुचेंगोडे नगर की आर.एस.एस. इकाई के अध्यक्ष महालिंगम ने २६ दिसंबर के दिन ५० से अधिक लोगों का जुलूस निकाला और मुरुगन के इस उपन्यास की प्रतियां जलाई. भाजपा, आर.एस.एस. तथा कुछ अन्य हिंदूवादी संगठनों ने लेखक की गिरफ्तारी की मांग भी की (हालांकि अब जबकि लेखक के समर्थन में भी आवाजें तेज़ हो रही हैं, ये संगठन समूचे घटनाक्रम में अपनी भूमिका नकार रहे हैं). इसी रिपोर्ट के मुताबिक़ बीस दिन पहले से मुरुगन को धमकियां मिल रही थीं. बाद में उपन्यास के विरोधस्वरूप शहर बंद भी कराया गया. १२ जनवरी को नमक्कल के जिला प्रशासन ने लेखक को उनके विरोधियों के साथ शान्ति वार्ता के लिए बुलाया. यहाँ प्रशासन ने मुरुगन को ‘बिनाशर्त माफी’ माँगने, अगले संस्करण में उपन्यास में वर्णित स्थानों का नाम बदलने और उसके ‘आपत्तिजनक अंशों’ को हटाने, वर्तमान संस्करण की अनबिकी प्रतियों को बाज़ार से वापस लेने और भविष्य में ऐसी कोई हरकत न करने का वचन देने संबंधी हलफनामे पर दबाव देकर दस्तखत कराया. इस प्रकार सरकारी देख-रेख में संविधान की धारा १९(१)(ए) की धज्जियां उड़ाई गयीं. ध्यान रहे मुरुगन जिस अंचल के लेखक हैं, उसी अंचल के एक सपूत थे ‘पेरियार’. जातिप्रथा-विरोधी, अंधश्रद्धा-विरोधी, सेक्युलर और नास्तिक ‘पेरियार’ की कर्मभूमि पर एक लेखक के साथ यह सब कुछ होना भारी विडम्बना है. द्रविड़ आन्दोलन के साथ पेरियार की विरासत जुडी हुई है, लेकिन उसी आन्दोलन से निकली एक पार्टी तमिलनाडू की सत्ताधारी पार्टी है और दूसरी मुख्य विपक्षी पार्टी. सत्ताधारी पार्टी की भूमिका नमक्कल प्रशासन की  हरकतों से ज़ाहिर है और विपक्षी पार्टी की भूमिका इस प्रकरण पर उसकी चुप्पी से. ( मामला तूल पकड़ने पर इस पार्टी ने लेखक के पक्ष में एक-दो बयान जारी करके छुट्टी पा ली है) अनेक लेखकों ने ठीक ही लक्ष्य किया है यह प्रकरण द्रविड़ पार्टियों की पस्ती के दौर में हिंदुत्व की ताकतों द्वारा तमिलनाडू में पाँव पसारने की कवायद का सूचक है. एक जागरूक नागरिक के रूप में मुरुगन अपने इलाके में शिक्षा की दुकानदारी के खिलाफ लिखते रहे हैं और पर्यावरण की धज्जियां उड़ानेवालों के खिलाफ भी. यह सारे निहित स्वार्थ भी उनके खिलाफ परदे के पीछे सक्रिय हैं.

४८ वर्षीय मुरुगन नमक्कल में शासकीय कला विद्यालय में तमिल पढ़ाते हैं. उन्होंने अबतक ३५ पुस्तकें लिखीं है जिनमें ७ उपन्यास और तमिलनाडू के कोंगू (पश्चिम) क्षेत्र की बोलियों का शब्दकोष भी शामिल है.

उपन्यास का कथानक

यह उपन्यास कोंगू अंचल के जन-जीवन का अत्यंत संवेदनशील चित्र प्रस्तुत करता है. इस अंचल के जंगल, पहाड़, वनस्पति, पशु-पक्षी, मेले, नृत्य, संगीत, खेल-तमाशे, हाट-बाज़ार, खान-पान, पहनावा, देवस्थान और उनसे जुडी आस्थाएं, लोकविश्वास और किसान जीवन को कथा में जीवंत इसीलिए किया जा पाया है कि उपन्यासकार उस अंचल का मार्मिक जानकार ही नहीं, गंभीर अध्येता भी है.

उपन्यास के इसी आंचलिक परिवेश में निस्संतान किसान दंपत्ति पोन्ना(पत्नी) और काली(पति) की कोमल कथा प्रवाहित है. दोनों एक दूसरे को बेहद प्यार करते हैं. लेकिन उनके paraparpapअकुंठ प्यार पर निस्संतान होने का ग्रहण लग जाता है. रिश्तेदारों, दोस्तों और पड़ोसियों के ताने पोन्ना को ज़्यादा सुनने पड़ते है. तीज-त्यौहार और मांगलिक अवसरों पर कर्मकांडों के वक्त ‘बाँझ स्त्री’ के प्रति अपमानजनक व्यवहार के चलते वह धीरे-धीरे अपने घर की चहारदीवारी में सिमटती चली जाती है. काली को भी समय समय पर किसी न किसे प्रकरण में लज्जित होना पड़ता है. उसका भी सामाजिक जीवन सीमित होता जाता है. उसकी नपुंसकता की चर्चाएँ भी होती हैं. निस्संतान दंपत्ति की संपत्ति पर रिश्ते-नातेदारों ही नहीं, पड़ोसियों की भी निगाह है. काली को उसकी मां और दादी दूसरा विवाह करने की सलाह देती हैं. इस प्रस्ताव पर पोन्ना के मां- बाप को भी कोई ऐतराज़ नहीं है, वे इतने में ही संतुष्ट हैं कि दूसरी स्त्री के साथ उनकी बेटी भी उसी घर में रहे, निकाली न जाए. पोन्ना और काली भी कभी कभी एक दूसरे का मन टोहने या चिढाने के लिए आपस में दूसरे विवाह की बात करते हैं. पोन्ना सदैव ही भारी मन से ही सही, यह कहती है कि काली की खुशी के लिए वह इसके लिए भी तैयार है. वास्तव में दोनो ही एक दूसरे से इतना प्यार करते हैं कि मन बांटने के लिए इस प्रस्ताव पर चाहे जो चर्चा करते हों, उसकी वास्तविक संभावना को कभी मन में स्वीकार नहीं करते. काली की मां और दादी उनके परिवार पर देवी -देवताओं का श्राप मानती हैं. निर्वंश होने के श्राप से मुक्ति के लिए काली और पोन्ना वर्षानुवर्ष न जाने कितने देवी-देवताओं, मंदिरों-मठों का चक्कर लगाकर, न जाने कितनी पूजा-पाठ, व्रत-अनुष्ठान करके थक चुके हैं. काली की मां और दादी के पास परिवार पर श्राप के अलग अलग किस्से हैं. वे हर किस्से के अनुरूप श्रापमुक्ति के उपाय करते हैं. पाठक इन किस्सों में उस अंचल के तमाम सामाजिक संबंधों की भी झांकी पाता है. ये किस्से अलग-अलग जातियों के बीच, अलग अलग तबकों के बीच, आदिवासियों और गैर-आदिवासियों के बीच, स्त्री और पुरुष के बीच, औपनिवेशिक समय में अंग्रेजों और देशियों के बीच, मनुष्य और देवता के बीच संबंधों की झलक दिखलाते है. ये किस्से उस अंचल के ऐतिहासिक-सामाजिक जीवन की मिथकीय अभिव्यक्तियाँ हैं. ऐसे किस्सों और लोकविश्वासों को पिरोने और अंचल के जीवंत नृवंशीय चलचित्र प्रस्तुत करने का हुनर मुरुगन अपने अनेक उपन्यासों में पहले भी दिखला चुके हैं. अपने अंचल के प्रति गंभीर ऐतिहासिक दायित्व का निर्वाह करते हुए उन्होंने अतीत के लेखकों द्वारा उस अंचल पर लिखी गई चीज़ों की खोज की और उन्हें दो खण्डों में प्रकाशित किया. उन्होंने टी.ए. मुथूसामी कोनार द्वारा इस अंचल पर लिखे इतिहास-ग्रन्थ जिसे लुप्त मान लिया गया था, उसे खोजकर पुनर्प्रकाशित कराया. ( देखें ए.आर. वेंकट चेलापति का लेख, ‘द हिंदु’, १२ जनवरी)

       एक भरा-पूरा, सुन्दर और संतुष्ट वैवाहिक जीवन सामाजिक मान्यताओं के चलते किस तरह अवसादग्रस्त होता है, लेकिन अवसाद के आगे पराजय नहीं मानता, इसे मुरुगन ने बहुत कोमल और संवेदनशील रंग-रेखाओं में अंकित किया है. काली और पोन्ना का निश्छल और उन्मुक्त प्यार समाज की मान्यताओं के टकराकर कैसे कैसे अंतर्द्वंद्वों से गुज़रता है, उसके सूक्ष्म से सूक्ष्म कंपन को उपन्यासकार की लेखनी पकड़ लेती है. वे तत्व जो इन पात्रों के मन की सुन्दर गहराइयों में लेखक की उंगली पकड़ कर उतरने की जगह उन सुन्दर उँगलियों को ही तोड़ देने को पुरुषार्थ समझे बैठे हैं, उनका कलेजा सचमुच काठ का बना है. उपन्यास का अंत ट्रैजिक है. काली के दूसरे विवाह के प्रस्ताव और श्रापमुक्ति के सभी उपाय विफल होने पर पोन्ना और काली दोनों की मांएं एक अलग योजना बनाती हैं. अर्द्धनारीश्वर के स्थानीय मंदिर में हर साल तमिल वैकासी महीने ( मई-जून) में १४ दिन का मेला लगता है. चौथे दिन पहाड़ों से देवता उतरते हैं और उनकी रथ की सवारी अगले दस दिन निकलती रहती है, अंतिम दिन वे वापस चले जाते हैं. अंतिम दिन मेले में भारी भीड़ होती है और माना जाता है कि इस दिन मेले में उपस्थित सभी पुरुष देवता होते हैं. निस्संतान स्त्रियों के लिए यह दिन भाग्यशाली होता है, जहां वे किसी देवता से समागम कर संतान-प्राप्ति कर सकती हैं. ऐसी संतानें देवता का प्रसाद या देव-संतानें मानी जाती हैं. काली की मां इस दिन पोन्ना को मेले में भेजे जाने के लिए काली को सहमत नहीं कर पाती. एक साल बीत जाता है. अगले साल मेला शुरू होने के समय काली का साला मुथु (जो उसका बाल-सखा भी है) बहन-बहनोई को इसके लिए राजी करने उनके घर आता है. मंदिर पोन्ना के घर से नज़दीक है. हर साल मेले के समय काली पोन्ना को लेकर अपने ससुराल जाया करता था और वहीं से वे मेला घूमने जाते थे. ऐसे में मुथु के आग्रह पर काली पोन्ना को तत्काल उसके साथ भेजने को राजी हो जाता है और खुद मेले के १४वे दिन आने का वादा करता है. लेकिन पोन्ना को देव-समागम के लिए भेजे जाने से वह इनकार कर देता है. मुथु बहन से झूठ बोलता है कि बहनोई काली ने इस बात की अनुमति दे दी है. पोन्ना को इसकी तस्दीक खुद काली से करने का वक्त नहीं मिलता, फिर भाई की बात पर अविश्वास का कोई कारण नहीं था क्योंकि काली और मुथु साले-बहनोई ही नहीं बाल-सखा भी थे. एक नाटकीय घटनाक्रम में चौदहवें दिन काली के ससुराल पहुँचाने के बाद मुथु सदा की तरह काली को लेकर खाने-पीने, मौज-मस्ती करने घर से खूब दूर ले जाता है, ताकि अगली सुबह तक दोनों लौट न पाएं. उधर पोन्ना के मां-बाप उसे लेकर बैलगाड़ी में मेले की ओर चल देते है. काली और मुथु दूरस्थ स्थान पर खाने-पीने के बाद सो जाते हैं. लेकिन काली की नींद आधी रात के बाद खुल जाती है. वह वापस ससुराल की ओर चल पड़ता है. भोर में वहां पहुँच कर जब उसे ताला जडा मिलता है, तो उस पर वज्रपात सा होता है. उसकी भावनाएं पछाड़ खाकर गिरती हैं. उसे लगता है कि पोन्ना ने उसके साथ धोखा किया है. यहीं उपन्यास ख़त्म होता है.

ट्रेजेडी का भाव सघन इसलिए होता है कि दरअसल किसी ने किसी को धोखा नहीं दिया. मुथु, काली की माँ, उसके सास-ससुर- सभी काली और पोन्ना का दुःख दूर करना चाहते हैं. मुथु ने इसी खातिर बहन से झूठ बोला. पोन्ना मेले में जाने को खुद तत्पर नहीं है. वह काली को खुश देखना चाहती है, उसके किए बड़ा से बड़ा त्याग करने को तैयार है, ऐसे में उसकी रजामंदी जानकार वह मेले में जाने को तैयार होती है. यह निश्छल भावनाओं की ऐसी दुनिया है जहां हरेक व्यक्ति जो कर रहा है वह दूसरे की खुशी के लिए कर रहा है, लेकिन परिणाम वह निकलता है जो किसी ने न चाहा था. मेले की भीड़ में ‘देवता’ से उसकी भेंट सुगम हो सके, इसके लिए पोन्ना को अकेला छोड़ जब उसकी माँ गायब हो जाती है, तब के बाद का वर्णन उपन्यासकार की सामर्थ्य का सबसे ताकतवर साक्ष्य है. पोन्ना की मार्फ़त पाठक तमाम स्थानीय सांस्कृतिक कला-रूपों, नाटकों और रिवाजों की दृश्यावली से गुज़रता है, लेकिन सबसे बड़ा नाटक तो पोन्ना के मानसपटल पर अभिनीत हो रहा है. भारी भीड़ में अकेले होने के भय से शुरू करके अपरिचितों के बीच अनाम होने की खुशी तक उसके मन में अनेक भाव आते और जाते हैं. परिचय की दुनिया की हर नज़र उसे छेदती थी, क्योंकि वह निस्संतान थी. मेले में भीड़ का हिस्सा होकर वह ऐसी हर नज़र से आज़ाद थी, जहां न वह किसी को जानती थी और न कोई उसे. लेकिन अवचेतन के सह-सम्बन्ध और संस्कार उसकी निगहबानी बदस्तूर कर रहे थे. जब भी कोई ‘देवता’ उसकी ओर रुख करता, उसके और अपरिचित देवता के बीच काली का चेहरा परिचिति या स्मृति की छाया सा झिलमिला उठाता, क्योंकि पति से भी ज़्यादा काली वह व्यक्ति है जिससे वह सबसे ज़्यादा प्यार करती है. एक छोटे से स्वप्न-दृश्य में बचपन के प्यार का एक चेहरा भी कौंधता है. यह कोई नैतिक द्वंद्व नहीं है. काली के विपरीत पोन्ना के मन में इस प्रथा पर आस्था का कोई संकट नहीं है. काली की खुशी के लिए और अपने जानते में उसकी ‘अनुमति’ से ही वह ‘देवता’ की खोज में आई है, लेकिन क्या एक क्षण को भी काली को भूले बगैर ‘देवता’ से मिलन संभव हो पाएगा? इस द्वंद्व को उपन्यासकार ने चेतन और अचेतन के बीच, परिचित और अनजाने के बीच, सम्बन्ध-भावना और स्वातंत्र्य-कामना के बीच, मानवीय भाव-यंत्र और देवत्व के तसव्वुर के बीच – एक साथ अनेक स्तरों पर अभूतपूर्व संवेदनशीलता से अंकित किया है. अंततः पोन्ना इस द्वंद्व से पार जाती है, इसका संकेत करके उपन्यासकार आगे बढ़ जाता है. समागम का दृश्य उपस्थित करने और पाठक को गुदगुदाने की उसकी कोई इच्छा ही नहीं है.    

कहानी का अंत नहीं हुआ, लौटेगा कहनेवाला

  उपन्यास के अंतिम दृश्य में काली को तड़पता देख पाठक की उत्कंठा बढ़नी स्वाभाविक है, लेकिन उपन्यास ख़त्म हो जाता है. पाठक के ज़ेहन में ढेरों सवाल हैं? क्या पोन्ना और काली का सम्बन्ध-विच्छेद हो जाएगा? क्या काली यह जान कर कि पोन्ना को उसकी ‘अनुमति’ की झूठी जानकारी थी, उसे अपना लेगा? क्या पोन्ना यह जानकार कि उससे झूठ बोला गया था, अपराधबोध या आत्महंता भाव से ग्रस्त हो जाएगी? ऐसे में अपने माँ-बाप और भाई के प्रति उसका क्या रुख होगा? यदि वह अपने माँ-बाप और भाई को क्षोभ में त्याग दे और काली उसे फिर से न अपनाए, तो वह कहाँ जाएगी? यदि उसे देव-संतान होती है, तो उस संतान का भविष्य क्या है? श्री चेलापति ने अपने लेख में लिखा है कि ढेरों पाठकों ने लेखक को पोन्ना और काली की आगे की कहानी बताने के लिए अनेक पत्र लिखे. जवाब में लेखक ने उपन्यास को आगे के दो खण्डों में जारी रखने का वादा किया है, दोनों खण्डों के शीर्षक भी बताए हैं. मुरुगन को यह वादा निभाना ही पडेगा. लेखक की मृत्यु की घोषणा के बावजूद उसे खुद को पुनरुज्जीवित करना होगा. पाठक ज़रूर उन ताकतों से लड़ेंगे और जीतेंगे जो कि लेखक के पुनरुज्जीवन में बाधा हैं.

मुरुगन के लेखक को मार देनेवाली ताकतों को इस उपन्यास की मूल संवेदना से कुछ लेना लादना नहीं है. उनके लिए निस्संतान स्त्रियों द्वारा एक स्थानविशेष के मंदिर के मेले में आपसी सहमति से विवाह-बाह्य, धर्मानुमोदित और सामाजिक स्वीकृति प्राप्त यौन-सम्बन्ध बनाने की प्रथा का उपन्यास में कथात्मक विनियोग ‘आपत्तिजनक’ है. इसे वे धर्मविरुद्ध, स्त्रियों की मर्यादा के विरुद्ध और उस इलाके के लिए अपमानजनक मानते हैं. क्या उपन्यासकार ने इस प्रथा की वकालत की है या उसका अनुमोदन किया है? ज़ाहिर है ‘नहीं’. कहानी की तर्क-योजना और संवेदनात्मक  उद्देश्य में उक्त प्रथा की हिमायत या आलोचना का कोई काम ही नहीं है. लेकिन ज़रा प्राचीन ग्रंथों पर नज़र डालें और देखें कि ‘नियोग’ की प्रथा को कितने धर्मशास्त्रों की सम्मति प्राप्त थी. भारतरत्न पंडित पांडुरंग वामन काणे ने गौतम, वसिष्ठ, बौधायन, याज्ञवल्क्य, नारद, कौटिल्य आदि धर्मसूत्रकारों की सम्मतियों उद्धृत की है तथा महाभारत के आदिपर्व, अनुशासनपर्व और शांतिपर्व में नियोग के उदाहरणों और संकेतों की चर्चा की है. (धर्मशास्त्र का इतिहास-प्रथम भाग) मुरुगन की पुस्तक जलानेवाले तत्व इन धर्मसूत्रों और महाभारत के बारे में क्या ख्याल रखते हैं? शास्त्र और लोक की बात छोड़ भी दें, तो क्या मानवशास्त्र का अध्ययन यह नहीं बताता कि ऐसी प्रथाएं लगभग सभी प्राक-आधुनिक समाजों में रही आई हैं? यह भी कि आधुनिक समय में भी तमाम प्राक-आधुनिक प्रथाएं रूप बदलकर क्या अपनी निरंतरता नहीं बनाए रखतीं? मुरुगन ने किसी प्रथा पर कोई मूल्य निर्णय नहीं दिया है, अच्छा या बुरा नहीं कहा है, उन्होंने सिर्फ एक कोमल कहानी कही है जो एक समाज में जन्मी है. उस समाज की कुछ प्रथाएं और मान्यताएं हैं जो उस समाज में जी रहे लोगों के जीवन से लिपटी हैं, उन्हें कोई कथाकार, इतिहास-लेखक या नृतत्वशास्त्री कृत्रिम ढंग से काट कर अलग नहीं कर सकता. ऐसा करना खुद को झूठा साबित करना है, कला और समाज दोनों से गद्दारी है. मुरुगन ने ऐसा करने से इनकार किया है, लेखक की मृत्यु की कीमत चुका कर भी. लेकिन पाठकों और जागरूक नागरिकों का प्यार उन्हें वापस लौटा लाएगा. ज़रूर ही लौटा लाएगा.

प्रणय कृष्ण

प्रणय कृष्ण

इलाहाबाद युनिवर्सिटी और जेएनयू से अध्‍ययन. प्रखर हिंदी आलोचक. जन संस्‍कृति मंच के महासचिव. देवीशंकर अवस्‍थी सम्‍मान  से सम्मानित .

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विडंबनात्मक परिवेश की रूपक-कथा है ‘आस्था’: प्रणय कृष्ण

अगर आधुनिकता की यह विडंबना आधारभूत है, तो कोई न कोई तबका हर समाज में ऐसा होगा जो इस विडम्बना को सबसे पहले और सबसे ज़्यादा गहराई से अभिव्यक्त करेगा। हिंदुस्तान में यह तबका कौन-सा है? ‘आस्था’ फिल्म का जवाब है कि यह तबका है महानगरों में रहनेवाली मध्यवर्गीय युवा औरतें। फिल्म की नायिका उन्हीं का प्रतिनिधित्व करती है। ऐसा नहीं कि दूसरे सभी तबके इस विडंबना से अछूते हैं, लेकिन इतिहास का निरंकुश चुनाव इसी तबके का है। मध्यवर्ग के महानगरीय आदमी की पितृसत्तात्मक सुरक्षा इस विडंबना से बचने की एक ढाल है। उसके तरकश में आदर्शवाद के तीर इस विडंबना से निपटने के लिए अभी बाकी हैं। लेकिन एक स्त्री जरूर तैयार होती गई है जिसकी परिभाषा परिवार, परंपरा और आदर्शवाद के दायरे में संभव नहीं है। # लेखक 04257290

फिल्म ‘आस्था’ से गुज़रते हुए

1. कहानी– मानसी एक सुन्दर-सी बेटी की मां और एक नेकदिल प्रोफेसर पति का प्रेम पाने वाली पत्नी है। घर की ज़़रूरतें पति की आय से पूरी हो जाती हैं, लेकिन ख्वाहिशें नहीं। बेटी को जूते की ज़रूरत है। मानसी जूते खरीदने जाती है, लेकिन जो जूता पसंद आता है वह उसके बजट से बाहर है। दुकान में उपस्थित एक महिला रीता जूते बंधवा देती है और बाकी के पैसे चुकता कर देती है। फिर वह उसे अपनी गाड़ी में बिठा कर होटल लाती है और एक पुरुष के हवाले कर देती है, इस हिदायत के साथ कि नई है। इस पुरुष से मानसी को मिलता है ढेर सारा रुपया और (प्रतिरोध के बाद) संतुष्टि। घर लौटती हुई मानसी में आत्मग्लानि है। घर लौटने पर बेटी जूते पाकर खुश है, पति से वह सब कुछ बताना चाहती है, लेकिन कह नहीं पाती और बात बदल देती है। फिर तो ना-नुकुर करते हुए भी बिज़नेस का यह सिलसिला शुरू हो जाता है। सहेली के घर देखी गई ब्लू फिल्म के नाम पर वह पति को भी नए तरीकों से सुखी करती है। अंततः एक छात्रा के सामने पोल खुलने पर उसी छात्रा के माध्यम से और कहानी के रूप में पति को सारी बात बताती है। पति एक ऐसे आदर्श पति की भूमिका निभाता है जो पत्नी के हालात को समझने की कोशिश करे और इस तरह वह बाज़ार से मुक्त होकर घर की होकर रह जाती है।

 2. कहानी का पाठ (या शायद अतिपाठ): इस कहानी को हम आधुनिकता के विडंबनात्मक परिवेश की रूपक-कथा के रूप में देखने की कोशिश करें। पहले कुछ कविताओं के टुकड़े-

(अ) मिट्टीपन मिटाए नहीं मिटता/ आकाशपन हटाए नहीं हटता/आकाश और मिट्टी के इस संघर्ष के बीच/ मेरे ज़ख्मों का कजऱ् चुकाए नहीं चुकता

-मराठी कवि कुसुमाग्रज की कविता का एक अंश

(आ) कभी किसी को मुकम्मल जहां नहीं मिलता

कभी ज़मीं तो कभी आस्मां नहीं मिलता।

-हिंदवी कवि ‘शहरयार’

ऊपर के दोनों उद्धरण आधुनिकता की आधारभूत विडंबना पेश करते हैं- यहां ज़मीन या मिट्टी का अर्थ है सुरक्षा (भौतिक और मनोवैज्ञानिक), जुड़े होने की इच्छा (बिलांगिंगनेस), निरंतरता (कन्टीन्यूटी) और अस्मिता (आइडेंटिटी)। आसमान का अर्थ है- अभिलाषाओं का संसार, ख्वाहिशों की उड़ान, फैल जाने की इच्छा। प्राक्-आधुनिक इंसान को परिवार, समुदाय, परंपरा और धर्म के रूप में ज़मीन मिली हुई थी। उसकी जड़े पुख्ता थीं, उसकी संवेदना स्थानीकृत थी, आकाशधर्मा नहीं, सभ्यता के विकास ने उसकी उत्पादन क्षमता को कल्पनातीत ढंग से बढ़ा दिया और उसकी इच्छाओं को उड़ने के लिए आसमान दिया।

‘हज़ारों ख्वाहिशें ऐसी कि हर ख्वाहिश पे दम निकले‘ -गालिब

आधुनिक मनुष्यता में जड़ों और इच्छाओं, ज़मीन और आसमान का विभेद पैदा हुआ। भौतिक विकास ने इच्छाओं को कल्पना से बाहर निकालकर वास्तविकता में पूरा करने का आश्वासन दिया। आधुनिक मनुष्य के चार आर्य सत्य है- (1) इच्छाएं हैं। (2) इच्छाओं का कारण है। (3) इच्छाओं की पूर्ति है। (4) इच्छाओं की पूर्ति का मार्ग है।

लेकिन दिक्कत ये है कि इच्छाओं की पूर्ति का मार्ग बाज़ार से होकर जाता है। बाज़ार यानि भौतिक प्रगति के वितरण का तरीका। इस वितरण पर जिन शक्तियों का नियंत्रण है, वे वितरण को असमान बनाती है, लेकिन इच्छाओं की भौतिक पूर्ति संभव है, इस संभावना का सार्वभौम असर होता है। आधुनिक विकासक्रम में समाज को संगठित करने की पुरानी सभी संस्थाओं में जो कुछ नहीं था, वह सब बाज़ार में उपलब्ध है, लेकिन बाज़ार खुद, सबको सब कुछ नहीं दे सकता।

कविता में ज़मीन और आसमान एक साथ न मिल जाने की आधुनिक विडंबना कविता में एक बोध के रूप में व्यक्त हुई है, जबकि फिल्म ‘आस्था’ इस जटिल यथार्थ को फिल्म माध्यम के सारे ही संसाधनों की सहायता से उसके सारे वस्तुगत आयामों में घटनाओं का आधार देकर विकसित करती है। हालांकि आधुनिकता का यह द्वंद्व अनेकशः रूमानी कविताओं, मनोविश्लेषण और अस्तित्ववाद के माध्यम से व्यक्त होता रहा है। भारत में यह द्वंद्व अब अधिक वयस्क हुआ है, ’80 और ’90 के दशक में। पूंजीवाद की आयु दुनिया के स्तर पर बढ़ी है और इसी अनुपात में आधुनिक चेतना का विभाजन गहराता गया है।

हमने ज़मीन और आसमान के ये प्रतीक लिए ही नहीं होते यदि ‘आस्था’ फिल्म में नायिका ने एक संवाद में अपनी व्यथा इन्हीं प्रतीकों में व्यक्त न की होती। शायद इसलिए भी कि ये प्रतीक सार्वभौम हैं।

3. इस विडंबना का वाहक कौन है?

अगर आधुनिकता की यह विडंबना आधारभूत है, तो कोई न कोई तबका हर समाज में ऐसा होगा जो इस विडम्बना को सबसे पहले और सबसे ज़्यादा गहराई से अभिव्यक्त करेगा। हिंदुस्तान में यह तबका कौन-सा है? ‘आस्था’ फिल्म का जवाब है कि यह तबका है महानगरों में रहनेवाली मध्यवर्गीय युवा औरतें। फिल्म की नायिका उन्हीं का प्रतिनिधित्व करती है। ऐसा नहीं कि दूसरे सभी तबके इस विडंबना से अछूते हैं, लेकिन इतिहास का निरंकुश चुनाव इसी तबके का है। मध्यवर्ग के महानगरीय आदमी की पितृसत्तात्मक सुरक्षा इस विडंबना से बचने की एक ढाल है। उसके तरकश में आदर्शवाद के तीर इस विडंबना से निपटने के लिए अभी बाकी हैं। लेकिन एक स्त्री जरूर तैयार होती गई है जिसकी परिभाषा परिवार, परंपरा और आदर्शवाद के दायरे में संभव नहीं है। ‘रोज़ा’ फिल्म का गीत याद आता है-

दिल है छोटा सा, छोटी सी आशा

मस्ती भरे मन की, भोली सी आशा

चांद तारों को छूने की आशा

आसमानों में उड़ने की आशा-

इस उड़ने की आशा को भला कौन-सा मध्यवर्गीय आदर्शवाद समेट पाएगा? कौन-सा परिवार और कौन-सी परंपरा इस चांद सितारों को छूने की इच्छा को पचा पाएंगे? एक तरफ सीता-सावित्री का कैंप है, दूसरी ओर मिस इंडिया, मिस यूनिवर्स का। बीच में एक लंबा दायरा है इतिहास, समाज और पीढि़यों का जिसमें एक बड़ा काफिला युवा स्त्रियों का चला जा रहा है- सीता के कैंप से मिस यूनिवर्स के कैंप की तरफ, एक तीसरे कैंप की तलाश में तमाम आंवागार्द लोग, महिलाओं के जनसंगठन, समाजवादी राजनीति करने वाले, सभ्यता समीक्षक, कलाकार और विचारवंत चले जा रहे हैं, लेकिन हैरत है कि सीता-सावित्री वाले कैंप और मिस वर्ल्ड वाले कैंप में फिर भी एक संवाद है, तीसरे कैंप के अन्वेषी तो कहीं संवाद में ही नहीं।

बाज़ार ने बोतल में बंद एक जिन्न को आज़़ाद कर दिया है- वह जिन्न जो मनुष्य की दमित आज़ादी है,  उसका अपूर्ण संसार है। यह जिन्न उस पर ज़्यादा चढ़ेगा जिसकी चेतना में वह सर्वाधिक कैद था।

इस फिल्म का एक दृश्य है जो दर्शकों की समूची सांस्कारिकता को तेज़ आघात देकर विजड़ित कर देता है। एक तरफ पति अपने मित्र के साथ किसी गांव में पंचायत की कार्यवाही देख रहा है जहां औरत विक्रय की वस्तु है, लेकिन पेट में बच्चा होने के नाते पंचायत उसकी भी राय जानना चाहती है कि वह किसके पास जाना चाहेगी। दूसरी ओर पत्नी को फुसलाकर एक दलाल महिला एक धनी व्यक्ति के बिस्तर में पहुंचा देती है। एक ओर पंचायती न्याय में तन्मय पति, दूसरी ओर परपुरुष की वासना का प्रतिरोध करती, छटपटाती पत्नी, दोनों ही दृश्य तेज़ी से एक दूसरे के समानांतर दिखाए जाते हैं। नेपथ्य में तेज़ संगीत बज रहा है। मानो कि उसी के शोर से पति को पत्नी का आर्तनाद नहीं सुनाई पड़ रहा। ज़रा सोचिए दर्शक की हालत।यह दृश्य उसके सांस्कारिक मन की पीड़ा को गहराता चला जाता है।

वे जो ‘आस्था’ फिल्म का ‘जलती जवानी’ टाइप पोस्टर देखकर फिल्म देखने चले आते हैं, इस दृश्य संयोजन से वे भी स्तब्ध थे। लेकिन वास्तविक आघात तो तब लगता है जब चरमोत्तेजन की ओर अग्रसर वह घरेलू पत्नी प्रतिरोध करना बंद करके, आनंद लेने लगती है। एक आनंद जो उसके वैवाहिक जीवन में उसे कभी नहीं मिला था, एक परपुरुष ने उसे दे दिया था। हिंदी फिल्मों में इतना तनावयुक्त शायद ही कोई दूसरा दृश्यांकन हुआ होगा। पूरे हॉल में स्तब्धता छा जाती है। यहां यह कह देना आवश्यक है कि चरमोत्तेजन (Orgasm) को एक नितांत जैविक तथ्य के रूप में लेना घातक है। यहां चरमोत्तेजन एक रूपक है उस मुक्ति का जो उसे एक नीरस पारिवारिकता से मिलती है। यहां गौरतलब है कि यह परिवार कोई संयुक्त परिवार नहीं, जिसका बोझा औरतें ढोती हैं। पति भी कोई सामंत नहीं, बल्कि आधुनिक सोच बरतने वाला पढ़ा-लिखा समझदार व्यक्ति है। फिर वह क्या है जो नायिका को एक अलगाव में ले जाता है? उसके पति की पुस्तकें, उसकी विद्वता और लोकप्रियता, उसका हंसमुख और मिलनसार स्वभाव सभी कुछ पत्नी से यह अपेक्षा करता है कि पत्नी अपने व्यक्तित्व को उसी में लय कर दे। जब पत्नी कहती है कि ‘इनकी मर्जी के बगैर इस घर में सूई भी इधर से उधर नहीं हो सकती’, तो वह अपने इसी भयानक अलगाव को व्यक्त कर रही होती है। असल में यह औरत अपने जि़ंदा हस्ती के लिए स्वायत्त लिविंग स्पेस खोज रही है। पति का सारा आदर्शवाद जो इस स्त्री के स्वाधीन व्यक्तित्व की अवहलेना पर टिका है; वह आदर्शवाद स्त्री की संवेदना, उसके भावनात्मक संसार, स्वप्न और अभिलाषाओं के प्रति अंधा है। पुरुष होने के नाते परिवार के बाहर भी उसकी एक दुनिया है, लेकिन स्त्री के लिए छत, दीवार, घरेलू काम, भोजन, बच्ची और पति मिलकर उसके अस्तित्व के अधूरेपन का गायन करते हैं, उसे सेलेबे्रट करते हैं; यहीं आकर यह फिल्म आदर्शवाद पर टिके मध्यवर्गीय एकल परिवार (न्यूक्लियर फैमिली) के खोखले स्त्री-पुरुष संबंधों का भाष्य बन जाती है। इन संबंधों में बहुत-सा आदर्शवाद, आवेग (पैशन) और अनुभव की साहसिकता (एडवेंचर) के ज़बर्दस्त अभाव पर पर्दा नहीं डाल पाता। यही कारण है कि यह परिवार बाज़ार के सामने इतना असहाय है।

4. तुम्हीं से जनमूं तो शायद मुझे पनाह मिले-

इस फिल्म के आखीर में एक खूबसूरत गीत फिल्माया गया है जिसकी टेक है- ‘तुम्हीं से जनमूं तो शायद मुझे पनाह मिले।’ इस फिल्म की नायिका ने बाज़ार में ज़रूरतों से आगे ख्वाहिशों के एक संसार को अपना इंतज़ार करते पाया, लेकिन इन ख्वाहिशों की पूर्ति को वैधता नहीं प्राप्त है। बाजार उसके व्यक्तित्व की न पाई गई अभिव्यक्ति को स्वायत्त करता है, लेकिन जड़ों से उसे उखाड़कर, उसकी संबंध भावना की विशिष्टता छीनकर, उसके निरंतरताबोध को विघटित करके। उसकी नई पाई गई आज़ादी वैधता के लिए भटकती है। अजीब दयनीय है यह आज़ादी जिसने उसके व्यक्तित्व को विभाजित कर दिया है। एक तनी हुई रस्सी पर विभाजित व्यक्तित्व के दोनों हिस्से एक दूसरे से मिलने के लिए दिन-रात चलते हैं। भटकती हुई आत्मा अपनी मुक्ति का स्तोत्र पढ़ती है- ‘‘तुम्हीं से जनमूं तो शायद मुझे पनाह मिले…’’ क्या यह प्रेतमुक्ति संभव हो पाएगी?

इस गीत के दृश्यांकन में आदमी-औरत के पारंपरिक रिश्तों का इतिहास बजता है। गीत के दौरान ओमपुरी की भंगिमा हिंदी फिल्मों के न जाने कितने आदर्शवादी नायकों को एक साथ उपस्थित कर देती है। अपनी ही ज्वाला में धधकती भटकन को रेखा उतनी ही खूबसूरती के साथ चेहरे में उतार देती है। सब्र और ज़ब्त का प्रतीक बना नायक नायिका के समूचे आवेग को अपने हिमालय जैसे मजबूत कंधे पर सांत्वना की ठंडी थपकी देता है। अजीब विडंबना है कि आवेग और साहसिकता की ज्वाला बर्फ जैसे ठंडे और धैर्ययुक्त आदर्शवाद से मांग करती है- ‘तुम्हीं से जनमूं तो शायद मुझे पनाह मिले’- इस गीत का पुरुष पहाड़-सा धीरज है और औरत है बहाव से युक्त सरिता। पहाड़ से नदी निकलती है, इस युग-युग की स्वाभाविकता को फिर से पाने की कोशिश है, लेकिन प्रतीक बदल गए हैं- पहले जो पहाड़ था, वह आज भी बर्फ है। किंतु पहले जो नदी थी, आज वह ज्वाला है। इस गीत के फिल्मांकन से लगता है कि ज़मीन फिर पंरपरा में खोजी जा रही है, लेकिन ‘शायद’ नहीं। ‘तुम्हीं से जनमूं तो शायद मुझे पनाह मिले’- इस पंक्ति का भेद खोलने वाला शब्द है ‘शायद’, जो कि पूरे दृश्यांकन में नायक और नायिका की पूरी संकल्पना के बीच दरार की तरह सक्रिय है। आधुनिकता ने ज़मीन और आसमान, ज़रूरत और अभिलाषा, परिवार और बाज़ार, आदर्शवाद और आवेग, तर्कसम्मत और अतक्र्य के बीच जो विभाजन पैदा किया है, वह किसी उच्चतर क्रांतिकारी रूपांतरण में हल होगा, अथवा वापसी संभव है? कुछ लोग परिवार को पवित्र गाय मानते हैं। उनसे इतना ही कहना पर्याप्त होगा कि एकल परिवार खुद बाज़ार के दबाव से पैदा हुई है। संयुक्त परिवार बाज़ार के दबाव में ही टूटा था। इसलिए एकल परिवार को बाज़ार के ऊपर कोई नैतिक व्यवस्था मानना गलत है।

अपने ही जीवन की कथा, पति की कहानी में सुनने के बाद एक दृश्य में जब बिस्तर में नायिका उससे पूछती है कि यदि यह कहानी सचमुच सही हो, और कहानी की नायिका वास्तविकता में वह स्वयं हो, तो क्या उसी विशालहृदयता के साथ वह उसे समझने की कोशिश करेगा? ओमपुरी का जवाब है- ‘कुछ भी हो सकता है।’ जी हां! कुछ भी हो सकता है। जिन्न को पकड़कर वापस बोतल में भेजने की कोशिश भी हो सकती है। विकसित पूंजीवादी देशों के नेता परंपरा और परिवार को बचाने की चीख पुकार मचा ही रहे हैं। लेकिन, दूसरी ओर आदर्शवाद की खोल उतारकर इंसान और जिन्न अर्थात् इंसान और उसका ही सद्यःमुक्त रूप जो जिन्न की तरह उसकी चेतना में कैद था, उन दोनों का मिला-जुला रूप भी पैदा हो सकता है। रास्ता खुला है। रास्ता फिल्म में नहीं, जि़ंदगी और इतिहास की गतियों में है। शुक्र है कि ‘इतिहास’ का अभी तक ‘अंत’ नहीं हुआ है।

प्रणय कृष्‍ण। इलाहाबाद युनिवर्सिटी और जेएनयू से अध्‍ययन। प्रखर हिंदी आलोचक। जन संस्‍कृति मंच के महासचिव।  देवीशंकर अवस्‍थी सम्‍मान  से सम्मानित ।

प्रणय कृष्ण की सद्य प्रकाशित पुस्तक ‘प्रसंगवश: साहित्य और समाज की चंद बहसें’ से साभार
(लोकयुद्ध , 16 मार्च -17 अप्रैल, 1997)

नबारून दा: ज्वालामुखी के दहाने खलबला रही चाय का आमंत्रण

प्रणय कृष्ण द्वारा शायद यह पहला प्रयास है हिंदी में, जहाँ नबारून भट्टाचार्य की चर्चा उनके समूचे रचनात्मक व्यक्तित्व के प्रसंग में की गयी है. हिंदी में क्रांतिकारी राजनितिक सक्रियता के स्तर पर जो पीढ़ी सक्रिय थी, उनके यहाँ नबारुण की रचनात्मक छबि ‘यह मृत्यु उपत्यका नहीं है मेरा देश’ तक ही सीमित है. यह एक स्तर पर सच भी है कि नबारुण दा की शुरूआती पहचान इसी काव्य-पुस्तिका के सन्दर्भ में स्थापित हुयी थी. लेकिन इस पहचान को स्थिर करने का काम नबारुण के गद्य-लेखन ने किया है. नबारुण दा का यही गद्यकार व्यक्तित्व बंगाली युवकों-युवतियों के बीच लोकप्रियता के चरम पर स्थित है. नबारुण की चर्चा उनके उपन्यास ‘हार्बर्ट’ (१९९३) और ‘काँगाल मालसाट’ (२००३) के बिना अधूरा ही नहीं बल्कि एकांश भी नहीं है. साथ ही साथ पुरंदर भाट नामक कवि नायक (जो की काँगाल मालसाट का एक चरित्र है) की काव्य-पंक्तियों के बिना नबारुण की जीवंतता और तिक्तता को समझना और भी मुश्किल काम है. @तिरछीspelling 

मेरे द्वारा निर्मित शब्दों का घर/ टूट जायेगा रूदन से/ मेरे मरने के बाद/ वैसे अचंभित होने जैसा कुछ भी नहीं है इसमें/ पुछ जाऊंगा घर के आईने से/ दीवारों पर नहीं होंगे मेरे चित्र/ वैसे दीवार अच्छा नहीं लगा कभी मुझे/ अब आकाश ही मेरा दीवार होगा/ जिस पर चिमनियों के धुँए से/ पंछी मेरा नाम लिखेंगे/ आकाश ही मेरे लिखने का टेबिल होगा अब/ ठंडा पेपरवेट होगा चाँद/ काले मखमली कुशन में तारे टिमटिमायेंगे/ मुझे याद कर के/ दुखी होने की जरूरत नहीं है तुम्हें/ इन बातों को लिखते हुए मेरे हाँथ नहीं काँप रहे/ पर जब पहली बार थामा था तुम्हारे हाथों को/ कुछ आवेग और कुछ झिझक में/ मेरे हाँथ जरूर काँपे थे/ मेरी सुन्दर पत्नी मेरी प्रेयषी/ मेरी यादें तुम्हें घेरे रहेंगी/ जरूरी नहीं है जकड़ी रहो तुम भी उनमें/ गढ़ना अपना जीवन खुद/ मेरी यादें होंगी तुम्हारा साथी/ तुम करो यदि प्रेम किसी से/ दे देना इन सारी यादों को उसे/ कॉमरेड बना लेना उसे अपना/ हाँ मैं जरूर सबकुछ तुम पर छोड़े जा रहा हूँ/ मेरा विश्वास है कि गलतियाँ नहीं करोगी तुम/ तुम मेरे बेटे को/ अक्षरज्ञान के समय/मनुष्य धूप और तारों से प्रेम करना सिखाना/ वह मुश्किल से मुश्किल गणित सुलझा पायेगा तब/ क्रांति का एलजेब्रा भी/ वह मुझसे बेहतर समझेगा/ चलना सिखायेगा मुझे जुलूसों में/ पथरीले जमीन पर और घास पर/ हाँ! मेरी कमियों के बारे में भी बताना उसे/ पर ध्यान रहे वह मुझसे नफरत न करे/ कोई बड़ी बात नहीं है मेरा मरना/जानता था/ बहुत दिनों तक जिंदा रहने वाला नहीं हूँ मैं/ पर समस्त तरह के मृत्यु का अतिक्रमण कर/ हर तरह के अन्धकार को अस्वीकार कर/ मेरा विश्वास कभी नहीं डिगा/ क्रांति हमेशा दीर्घायु हुई है/क्रांति हमेशा चिरजीवी हुई है

(नबारून दा की ‘अंतिम इच्छा’ (শেষ ইচ্ছে) शीर्षक कविता, बांग्ला से अनुवाद- राजीव राही)

Photo Courtesy Q

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By प्रणय कृष्ण

क्या ऐसी ‘अंतिम इच्छा’ आपने किसी की सुनी है? कैसा रहा होगा वह जीवन जिसकी ‘अंतिम इच्छा’ ऐसी हो? ३१ जुलाई, २०१४ को जब हम सब अपने अपने शहरों में प्रेमचंद जयन्ती मना रहे थे, नबारून दा दुनिया को चुपचाप लगभग साढ़े चार बजे अलविदा कह गए. पिछली २३ फरवरी को पटपड़गंज, दिल्ली के मैक्स हास्पिटल में अंतिम बार भेंट हुई थी. लोकसभा चुनाव, वाम एकता और कुछ हंसी-दिल्लगी की बातों के बीच बमुश्किल उनके स्वास्थ्य पर बात टिक पा रही थी. कह रहे थे कि रेडियोथेरेपी के बाद यदि ट्यूमर छोटा हो जाता है, तो ऑपरेशन संभावित है. यह भी कि शायद कुछ कहानियों और एक उपन्यास को वे पूरा कर पाएँगे.

धूमिल के गाँव खेवली( बनारस) में सन २००8 में जन संस्कृति मंच के राष्ट्रीय सम्मेलन में उनसे आग्रह किया गया कि वे ‘यह मृत्यु उपत्यका नहीं है मेरा देश’ ( मंगलेश डबराल कृत हिन्दी अनुवाद) ज़रूर पढ़ें. दो पंक्तियाँहिन्दी में पढ़ने के बाद उन्होंने बांगला में शेष कविता पढ़नी शुरू की. लगा मानों मेघ गड़गड़ा रहे हैं. उस काव्यपाठ कीयाद अभी भी सिहरन पैदा करती है.

एक मार्क्सवादी बुद्धिजीवी के रूप में नबारून दा के चरित्र की दृढ़ता उनके एक्टिविज्म और रचनाकर्म में ही नहीं, देश-दुनिया में दमन-शोषण और मानवद्रोह की तमाम वारदातों के खिलाफ व्यक्तिगत स्तर पर भी निर्भीकता के साथ उठ खड़े होने में दिखाई देती है. उन्होंने सच कहने के लिए किसी के अनुमोदन का इंतज़ार कभी नहीं किया. पश्चिम बंगाल विधानसभा के पिछले चुनावों से पहले का वाकया याद आता है. सिंगूर-नंदीग्राम के बाद इन चुनावों में वाममोर्चा की हार तय दीख रही थी. दशकों से वाम प्रतिष्ठान का संरक्षण पाए बौद्धिक भी ‘माय, माटी, मानुष’ की ममतामयी पुकार लगा रहे थे. तमाम भूतपूर्व और ‘अ’भूतपूर्व क्रांतिकारी बौद्धिक और खुद को माओवादी बतानेवाले भी ममतामय हुए जा रहे थे. नबारून अकेले ही यह कहने को उठ खड़े हुए कि वाममोर्चा का विकल्प ममता नहीं, बल्कि एक क्रांतिकारी वाम विकल्प ही हो सकता है. यदि वह बंगाल में अभी उपलब्ध नहीं है तो क्या मार्क्सवादी बुद्धिजीवियों को उसे बनाने के काम में नहीं लगना चाहिए? उपलब्ध बूर्जुआ विकल्पों में से किसी एक के पीछे खड़ा हो जाना एक बुद्धिजीवी द्वारा अपने दायित्व का विसर्जन है. यह वही व्यक्ति कह सकता था जिसने ‘नक्सलबाड़ी विद्रोह’ को खड़ा करने और उसके सन्देश को जनता में पहुँचाने में बुद्धिजीवियों की भूमिका को देखा था और खुद इस भूमिका में खड़ा हुआ था.

 नबारून न केवल वाममोर्चा के लिए, बल्कि ममता-राज के लिए भी भारी असुविधा खड़ा करने वाले बुद्धिजीवी थे. अकारण नहीं कि उनके २००३ में लिखे उपन्यास ‘कोंगाल मालसाट’ ( भिखारियों का रणघोष) पर जब २०१३ में सुमन मुखोपाध्याय ने फिल्म बनाई, तो ममता बनर्जी सरकार उसे सहन न कर पाई. उसे सेंसर की तमाम आपत्तियां झेलनी पडीं. मूल उपन्यास में चोकटोर (काला जादू करने वाले) और फ्यातरू (उड़ने वाले मानव) ऐसे काल्पनिक पात्र हैं जिन्होंने सत्ता के खिलाफ युद्ध छेड़ रखा है. इन विद्रोहियों को दंडबयोष ( चिर-पुरातन, सतत बतियाता रहनेवाला कव्वा) और बेगम जानसन के भूत ने प्रशिक्षित किया है. ये पात्र पारंपरिक योद्धाओं की तरह नहीं हैं, बल्कि आजीविका के लिए ये छल-कपट, झूठ-फरेब भी करते हैं, शराब भी पीते हैं. ये दबे-कुचले लोगों के जीवन के निर्मम यथार्थ को प्रतिबिंबित करते हैं. नबारून दिखाना चाहते हैं कि जनता ही विद्रोह की ताकत है, चाहे वह जितनी भी खराब भौतिक और भावपरक स्थितियों में हो. चंद शुद्ध और आदर्श क्रांतिकारी उसकी जगह नहीं ले सकते. इन विद्रोहियों के पास कोई अत्याधुनिक हथियार नहीं , बल्कि कुदाल, छुरा, सब्जी काटनेवाला चाकू, टूटे फर्नीचर के टुकड़े जैसे हथियार ही इनके पास हैं. इन्हें अतिप्राकृतिक सहायता के तौर पर छोटी-छोटी उड़नतश्तरी जैसी वस्तुएं भी हासिल हैं जो शत्रु की गर्दन धड़ से अलग कर देने की क्षमता रखती हैं. २०१३ में बनी फिल्म में मूल उपन्यास के बरअक्स स्क्रीन-प्ले में कुछ महत्वपूर्ण परिवर्तन किए गए. बंगाल के सत्ता -परिवर्तन को ध्यान में रखते हुए चोकटोर और फ्यातरू जैसे चरित्र जो कभी विद्रोह के प्रतिनिधि थे, उन्हें सत्ता, सम्मान और वित्तीय सुरक्षा के लिए सत्ता-प्रतिष्ठान का अंग बनते दिखाया गया है. इसीलिए दंडबयोष कहता है, ” लड़ाई जारी रहेगी, यह तो (सत्ता-परिवर्तन) सामयिक है.” इसलिए भले ही ममता सरकार और फिल्म बोर्ड ने आपत्ति गाली-गलौज की भाषा, आन्दोलन की हंसी उड़ाने, ममता बनर्जी का शपथ-ग्रहण दिखाने और उस पर आपत्तिजनक टिप्पणियाँ करने पर की, लेकिन वास्तविक आपत्ति तो इस बदली हुई अंतर्वस्तु पर ही थी.

नबारून बिजॉन भट्टाचार्य और महाश्वेता देवी के पुत्र ही नहीं, बल्कि वाम संस्कृतिकर्मियों की एक महान परम्परा के वारिस थे, जिसका अहसास उन्हें हर पल था.जन संस्कृति मंच के १३वें राष्ट्रीय सम्मेलन (२०१०, दुर्ग-भिलाई) को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा, “….मुझको ही पूछता हो, तुम तो तुम्हारा… जब तुम बच्चा थे, तब से बहुत लोग को देखा, तुम बिजॉन भट्टाचार्य का बेटा हो, उसके साथ था, तुम उत्पल दत्त को देखा, ऋत्विक घटक की फिल्म में तुम रिफ्लेक्टर..दिया है, तुम मानिक बाबू को देखा, तुम अरुण मित्र, विष्णु डे को, सुभाष मुखोपाध्याय को देखा, मखदूम मोहियुद्दीन को देखा, बलराज साहनी को देखा, Now how do you plan to re-view life? तुम क्या करोगे अब?….Should I go and join the market forces and create something for the market? Might be that will fetch me some money. Actually I require money, but I cannot afford to earn it by indecent means…क्योंकि आप लोग ये समझें कि .. मेरा एक नावेल है ‘ऑटो’ .. एक  auto-driver को लेकर. तो उसपर तो मैंने एक young aspiring filmmaker को बोल दिया कि तुम इसको बनाओ. उसका dreamहै filmबनाना.. और उसके बाद बंगाल का जो सबसे बड़ा heroहै, उसका जो industrial  production house है वो मुझको बोला -हमको’auto’दे दो , तुम को बहुत अच्छा ‘ये’ मिलेगा-‘price’. But I told him that, ‘Bhai! this is not for sale. It is my word  as given to him and he is a young man. If I don’t help the young man, he will reject me and all the youth will reject me in future.’ That is one thing I am afraid of. I don’t want two face. That will be ‘पाप’. Our Indian concept- ‘पाप’-Certain things should be renounced to gain something.और एक बात है …कि एक French intellectualथे Guy Debord. बहुत पगला था. मेरा याद में…Suicideकिया. उसका एक bookहै-‘The Society of the Spectacle’…..This damn bloody capitalist society is always trying to create spectacles. …. This society of spectacles must be challenged and that is the risk. That is what, not only our forefathers have done, it is also done by the international literati…. a great man like Aragon, like Eluard, like Neruda, like … everyone, so we belong to a very great heritage which we cannot renounce.”

नबारून दा के पास सिर्फ क्रान्ति की उल्लासमयी कल्पना ही न थी, उन्होंने क्रान्ति के दमन को, बुरी तरह से कुचले जाने के बाद, विभ्रम और विकृति की और ढकेले जाने के बाद भी, फिर फिर ‘हठ इनकार का सर’ तानते देखा. विश्व-क्रांतिकारी प्रयासों का उन्होंने भीषण शोध किया था. उपरोक्त भाषण में ही उन्होंने कहा था, ” And this is the heritage we must keep alive and this is the struggle in which we cannot lose… May be, we will die. You see, defeat is nothing, defeat is nothing.All the wars cannot be won. Che-Guevara didn’t win, but he has won it forever. That is the main thing.We must keep everything in perspective. We must fight globalization, we must fight local reaction, we must fight the show of military state power in the adivaasi area and we must protest everything illegal, evil and pathetic  that is happening in my country. “

 नबारून बंगाल के नक्सल आन्दोलन के आवयविक बुद्धिजीवी थे, जिसकी मूल प्रतिज्ञा और आशय को बदलती विश्व-परिस्थिति में सतत पुनर्नवा करते जाने की उनकी क्षमता अपार थी. ‘यह मृत्यु उपत्यका नहीं है मेरा देश’ जैसी कविताएँ और ‘आमार कोनो भय नेई,तो?’ सरीखी तमाम कहानियां वास्तविक घटनाओं से प्रेरित हैं जिन्हें उन्होंने देखा भी था और भोगा भी था. महाश्वेता देवी ने अपने कालजयी उपन्यास ‘१०८४ वें की मां’ की निर्माण प्रकिया के बारे में अमर मित्र और सब्यसाची देब से बातचीत के दौरान कहा था कि, “….बारासात और बड़ानगर के दो जनसंहारों के बारे में हमें जानकारी थी. इन जगहों पर नक्सल युवकों का कत्लेआम हुआ था. लेकिन इससे पहले विजयगढ़ के पास श्री कॉलोनी में एक ह्त्या हुई. मेरे छात्र सुजीत गुप्ता की ह्त्या हुई थी, जिसके पिता एक डॉक्टर के कम्पाउण्डर थे. घटना के एक हिस्से की मैं साक्षी थी. बाकी बातें मुझे मेरे बेटे नबारून और दूसरे लोगों से पता चलीं. नबारून कम्युनिस्ट पार्टी से जुड़ाव रखते थे. उन्होंने अनेक तरीकों से नक्सलपंथियों की मदद करने की कोशिश की.” (Mahasweta Devi: In Conversation with Amar Mitra And Sabyasachi Deb(Indian Literature, Vol. 40, No. 3 (179), (May – June1997)

नबारून दा के लिए नक्सलबाड़ी कभी भी विगत रोमान नहीं रहा. उन्होंने उस आन्दोलन के ऐतिहासिक आशय को आत्मसात किया, नयी से नयी परिस्थिति के बीच उसकी विकासमानता को, भारत के वामपंथी आन्दोलन की परम्परा और दुनिया भर में चले क्रांतिकारी प्रयासों की विरासत के परिप्रेक्ष्य में उसको परखा और अपने कलाकार के लिए भी जीवित सच्चाई के रूप में सतत उसका नवोन्मेष किया.

उन्हें निरंतर उद्वेलित कलाकार का हृदय मिला था, जिसके चलते वे तमाम विधाओं में लगातार आवाजाही करते थे. फिल्म, थियेटर, कथा और कविता में बहुधा विधाओं के तटबंध तोड़ती हुई उनकी रचना-धारा प्रवाहित होती थी.  नबारून दा का कथाकार अमानवीय व्यवस्था पर मारक हमले संगठित करता है. उनकी कहानियों और उपन्यासों में कथा का ढांचा टूट-फूट जाता है, आख्यान विश्रंखलित होकर दूसरे आख्यानों में मिल जाते  है, पात्रों की आतंरिक  दुनिया भी भीषण रूप से विभाजित है, मानो वे एक साथ कई दुनियाओं में रहते और उनसे निर्वासित होते रहते हों, उनके कार्य-व्यापार और संवाद भी ऊपरी तौर पर असंगत और अतर्क्य (किन्तु अयथार्थ नहीं) लगते हैं, तब जो चीज़ उनके कथा-संसार को संरचना और उद्देश्य की एकता प्रदान करती है, वह है कथाकार की प्रचंड व्यस्था-विरोधी युयुत्सु चेतना जिसका निर्माण ‘७० और ‘८० के दशक के नक्सल आन्दोलन की आंच में हुआ है. उनका कथाकार जादू और फैंटेसी के हथियारों से लैस है. अपने समाज के कारोबार को नज़दीक से देखना ‘खतरनाक’ है क्योंकि इस तरह देखने से इस समाज(पूंजी की दुनिया) की निरंकुशता, अतार्किकता और असंगति साफ़ नज़र आती है. इस दुनिया को चलानेवाले मुट्ठी भर तत्व अपने मनमानेपन, व्यभिचार और अपराध को जब तर्क और यथार्थ के परदे से ढँक लेते हैं तब क्या तार्किक है, क्या अतार्किक, क्या यथार्थ है और क्या अयथार्थ, यह जानना सामान्य समझ से परे प्रतीत होता है. पूंजी की दुनिया ने तर्क और यथार्थ का जो कवच पहन रखा है, उसे भेदने के लिए ही महान कलाकारों ने जादू और फैंटेसी के हथियारों का सहारा लिया है.

नबारून दा हमारे समय में जीवित और कर्मरत ऐसे ही महान कलाकार थे. उनके पात्रों की हंसी-दिल्लगी उस रुग्णता और विकृति में लिथड़ी हुई है जिसमें रहने को इस दुनिया के अश्लील नियंताओं ने उन्हें विवश कर रखा है. उनके पात्रों की विकारग्रस्त दिल्लगी भी ज़िंदगी की तर्कहीनता और क्रूरता को उघाड़ कर रख देने की कला है. ‘हार्बर्ट’ (१९९३) और ‘काँगाल मालसाट’ (२००३) जैसे उनके उपन्यास उनकी इसी कलानिष्ठा के नमूने हैं.’हार्बर्ट’ के नायक ‘हार्बर्ट सरकार’ कायह नाम इसलिए पड़ा क्योंकि वह गोरा है. उत्तरी कोलकाता में पला बढ़ा हार्बर्ट यतीम है. वह असुरक्षित, अकेला, खुद से घृणा करनेवाला, अधपगला, मृतात्माओं से संवाद करने का स्वघोषित माध्यम और खराब कवि है. जीवन में उसका एकमात्र प्रेम एकसाथ दुखांत और हास्यास्पद है. वह एक ऐसा पात्र प्रतीत होता है जिसकी नियति है असफलता और गुमनामी, लेकिन वह अपने झक्कीपने और बाजीगरी से पाठक को लगातार चौंकाता है. मानो कह रहा हो कि कोई भी जीवन कितना भी टूटा, बिखरा, अभिशप्त और हास्यास्पद क्यों न हो, वह बेमतलब नहीं है, उसमें मौलिक होने की अपार संभावना है. उपन्यास हार्बर्ट की आत्महत्या से शुरू होकर फ्लैशबैक में उसकी ज़िंदगी में उतरता है, न केवल अपने नायक के जीवन में बल्कि कोलकाता शहर के कई दशकों के अद्भुत जीवन तथा संस्कृति, राजनीति और मानव-स्वभाव की गहराइयों में उतरता चला जाता है, देश-काल के अनेक संस्तरों में आवाजाही निरंतर चलती रहती है. हार्बर्ट ने मृतात्माओं से संवाद के स्वघोषित हुनर से जो किस्मत बनाई थी, उसे तर्कबुद्धिवादियों द्वारा  फर्जी घोषित किए जाने और कानूनी कार्रवाई की धमकी दिए जाने के बाद, सदमें में वह आत्मघात कर लेता है. लेकिन जैसे ही इलेक्ट्रिक शवदाह के चैंबर में उसके शरीर को रखा जाता है, एक भीषण धमाका होता है और पूरी इमारत दरक जाती है , अनेक लोग जो आस-पास हैं, वे घायल होते हैं. अखबारों की सुर्ख़ियों में हार्बर्ट के मरणोपरांत उसकी ‘आतंकवादी’ गतिविधि की सुर्खियाँ हैं, जिसका रहस्य जानने के लिए उच्च स्तरीय जांच बैठाई जाती है. उसकी चमत्कारिक शक्तियों की विस्फोटक छाप उसकी मृत्यु के क्षण में और भी गहरा जाती है. इस जादुई यथार्थवाद के प्रतीकार्थ को न जाने कितने कोणों से कोई व्याख्यायित कर सकता है. नबारून दा की कला का मरणोपरांत जादू भी अमिट है और निस्संदेह उनकी कला शासक जमातों को उनके मरणोपरांत सदैव आतंकित करती रहेगी, चाहे वे जितनी जांच बैठा लें.

अभी तो उनकी पार्थिव अनुपस्थिति भी ज्वालामुखी के दहाने पर रखी चाय की केतली में खलबला रही चाय पर हम सब को आमंत्रित कर रही है-

कलम को काग़ज़ पर फेरते हुए/ आप दृष्टि को/ बड़ा नहीं कर सकते/ क्योंकि कोई नहीं कर सकता।/ दृश्य के नीचे जो बारूद और कोयला है/ वहाँ एक चिनगारी/ जला सकेंगे आप?/ दृष्टि तभी बड़ी होगी/लहलहाते/फूल फूलेंगे धधकती मिट्टी पर/फटी-जली चीथड़े-चीथड़े ज़मीन पर/ फूल फूलेंगे।/ ज्वालामुखी के मुहाने पर/ रखी हुई है एक केतली/ वहीं निमन्त्रण है आज मेरा/चाय के लिए।/हे लेखक, प्रबल पराक्रमी कलमची/ आप वहाँ जायेंगे?

( जन संस्कृति मंच की ओर से प्रणय कृष्ण द्वारा जारी )

जातीय गठन का प्रश्न और रामविलास शर्मा: प्रणयकृष्ण

(2012-2013 रामविलास शर्मा का जन्म-शताब्दी वर्ष है। रामविलास शर्मा के ऊपर अपना व्याख्यान देते हुये वीर भारत तलवार ने कहा है कि रामविलास शर्मा की मृत्यु ने हिन्दी मीडिया को झकझोर कर के रख दिया था। वे बोलते हैं-“रामविलास जी की मृत्यु के बाद जो हिन्दी अखबार प्रकाशित हुए, उन सबों ने मुख्य पृष्ठ पर उनकी मृत्यु के समाचार को प्रमुखता से जगह दी।…बड़ी-बड़ी सुर्खियां लगाईं। ऐसा कि 11 सितंबर को वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर जो हमला हुआ था, उसकी भी सुर्खियां ऐसी न थी। हिन्दी के किसी अन्य साहित्यकार को यह यह सम्मान प्राप्त नहीं है। ।…मुझे  नहीं लगता कि पूरे हिन्दी साहित्य में भारतेन्दु की मृत्यु के बाद किसी और की मृत्यु के समाचार को इतनी प्रमुखता मिली होगी जितनी रामविलास जी की। ” इससे हम रामविलास शर्मा की लोकप्रियता और उनके जाने से हुए क्षति दोनों का अंदाजा लगा सकते हैं।  तेज-तर्रार युवा आलोचक प्रणय कृष्ण इस इस जन्म-शताब्दी वर्ष के बहाने लगातार रामविलास शर्मा पर लिख-बोल रहे हैं। उनके दो लेख हम पहले भी प्रकाशित कर चुके हैं(पूर्व प्रकाशित दोनों लेख इस प्रकार हैं-अपने अपने रामविलास- प्रणय कृष्ण और उपनिवेशवाद / साम्राज्यवाद कभी प्रगतिशील नहीं होता (रामविलास शर्मा की याद )। प्रस्तुत है उनका यह तीसरा लेख।)

निराला और रामविलास शर्मा

निराला और रामविलास शर्मा

By  प्रणयकृष्ण 

‘भाषा और समाज’ नामक पुस्तक में ‘जातीय निर्माण के उपकरण’ शीर्षक अध्याय में रामविलास जी ने लिखा, ” आधुनिक जातियों के निर्माण के लिए सामान्य भाषा, सामान्य प्रदेश, सामान्य आर्थिक जीवन और सामान्य संस्कृति आवश्यक तत्व माने गए हैं”, यही स्टालिन की प्रस्थापना है. रामविलास जी इसकी व्याख्या करते हुए महत्वपूर्ण बात यह कहते हैं कि जिन तत्वों से जन का निर्माण होता है, उन्हीं से सामंतयुगीन लघु जाति का और पूंजीवादी महाजाति का निर्माण होता है. पार्थ चटर्जी ने १९७५ में प्रकाशित ‘बंगाल: एक जातीयता का उदय और विकास’ (सोशल साइंटिस्ट, खंड चार, अंक १), शीर्षक अपने एक लेख की पाद टिप्पणी में लिखा है कि उपरोक्त विशेषताएं जिन्हें स्टालिन ने दुर्भाग्य से आधुनिक राष्ट्र अथवा जाति (रामविलास जी  के शब्दों में ‘महाजाति’ की विशेषताएं बताया है, वे सही अर्थों में ‘जातीयताओं’ (लघुजातियों) पर ही लागू होतीं हैं. इसके चलते खुद स्टालिन के विवेचन में तमाम तरह की अवधारणात्मक दिक्कतें पैदा हुई हैं. रामविलास जी काफी पहले यानी ‘भाषा और समाज’ नामक पुस्तक में १९६१ में प्रकारांतर से यही  कह रहे हैं, अंतर यह है कि वे  यह मानते हैं कि  सामान्य भाषा, प्रदेश, आर्थिक जीवन और संस्कृति जातीय निर्माण की हर अवस्था में पाए जाने वाले उपकरण हैं लेकिन हर अवस्था में इनके गुण और परिमाण में अंतर होता है.  स्टालिन के यहाँ तो जातीय निर्माण की अनेक काल-क्रमिक अवस्थाएं हैं ही नहीं. जन, लघुजाति और महाजाति, ये तीनों ही संज्ञाएँ मेरी समझ में आधुनिक राष्ट्र-राज्य से अलग हैं. राष्ट्र राज्यों का गठन पश्चिमी योरप में पूंजी के युग की परिघटना है. उदीयमान पूंजीपति वर्ग के नेतृत्व में  राष्ट्रीय आन्दोलन के ज़रिए संपन्न की गई पूंजीवादी क्रांतियों ने सामंतवाद को समाप्त कर राष्ट्र राज्यों की स्थापना की. यह राष्ट्रीय आन्दोलन पूंजीपति वर्ग द्वारा क्षेत्रीय स्तर पर सुपरिभाषित घरेलू बाज़ार और राजसत्ता पर कब्ज़े की मांग से पैदा हुआ था.  मुश्किल यह हुई  है कि स्टालिन ने इस आधुनिक पूंजीवादी राष्ट्र की विशेषताएं वे बताई जो उसके अस्तित्व में आने से पहले ही दुनिया भर की तमाम जातीयताओं में विद्यमान थीं. आधुनिक राष्ट्र और जातीयताओं के बीच जो अंतर स्टालिन से पहले के मार्क्सवादी चिंतन में (एंगेल्स, मार्क्स, लेनिन के यहाँ) कमोबेश स्पष्ट था, भले ही अंग्रेज़ी शब्द  ‘नेशन’ कई बार जातीयता (नेशनैलटी) के अर्थ में प्रयुक्त होता हो, स्टालिन के विवेचन में गड्ड- मड्ड हो जाता है. जातीयताओं और राष्ट्र में अंतर यह नहीं है कि जातीयताएं सिर्फ  प्राक-पूंजीवादी, प्राक-आधुनिक सामाजिक गठन का रूप हैं और राष्ट्र आधुनिक.
राष्ट्र-राज्य  निश्चय ही आधुनिक और पूंजीवादी परिघटना है, लेकिन जातीयताएं आधुनिक और पूंजीवादी दौर में भी परिवर्तित रूप में बनी रहती हैं. कुछ जातियां अपने पूंजीपति वर्ग के नेतृत्व में आधुनिक राष्ट्र राज्यों में तब्दील हो जाती हैं . दूसरी ओर, बहुजातीय राष्ट्र राज्य, चाहे वे बुर्जुआ क्रान्ति के ज़रिए योरपीय देशों (पूर्वी ही नहीं, पश्चिमी भी) में अस्तित्व में आए हों  अथवा तीसरी दुनिया के भारत जैसे देश जहां साम्राज्यवाद-विरोधी लड़ाई के ज़रिए वे अस्तित्व में आए हों, सभी जगह उनके भीतर राष्ट्रीय स्तर के पूंजीपति वर्ग के उदय हो जाने के बाद भी जातीयताएं आधुनिक रूप ग्रहण करके बनी रही हैं. बावजूद इसके कि उनमें से हरेक का स्वतन्त्र, संप्रभु राज्य नहीं होता. पिछले कई दशकों का दुनिया का इतिहास यह दिखाता है कि जब ऐसे बहुजातीय राष्ट्र-राज्य विघटित होते हैं, तो उनमें निहित अलग अलग जातीयताएं जिनमें किसी भी हद तक आधुनिक पूंजीवादी विकास हो चुका होता है, वे अलग अलग स्वतन्त्र संप्रभु राष्ट्र-राज्यों के रूप में तब्दील हो जाती हैं. बुर्जुआ राष्ट्र-राज्यों के ही साथ ऐसा होता हो सिर्फ ऐसा नहीं,  बल्कि सोवियत संघ जैसे समाजवादी गणराज्य के विघटन के बाद भी ऐसा ही हुआ है.
रामविलास जी के  हिन्दी जाति के निर्माण संबंधी चिंतन का सैद्धांतिक महत्त्व भारत के बहुजातीय संप्रभु राष्ट्र राज्य बनने तक जातीय विकास की प्रक्रियाओं को समझने से ताल्लुक  रखता है. लेकिन उसके बाद के दौर की जो जटिलताएं हैं, उन्हें समझने और हल करने के लिए रामविलास जी के काम को आगे बढाने की ज़रुरत है, सिर्फ उनकी स्थापनाओं के मूल्यांकन या पुनर्मूल्यांकन से बात बनेगी नहीं. जब कोई काम आगे बढ़ता है तो पीछे हुए कामों में खुद -ब-खुद कई तरह की तरमीम होती चलती है.
जब वे कहते हैं कि  महाजाति का  निर्माण एक सुदीर्घ  प्रक्रिया है, तो ज़ाहिर है कि वे सामंती युग में ही लघुजातियों से महाजातियों की तरफ लम्बे संक्रमण की बात कर रहे हैं जो सामंती युग समाप्त होने के पहले ही शुरू होता है और बाद भी जारी रहता है. रामविलास शर्मा के सामने यहीं वह समस्या खड़ी होती है जो स्टालिन के विवेचन ने पैदा की है और वह है; ‘नेशनैलिटी’ और ‘नेशन’ में भेद को धूमिल करने की समस्या. चूँकि स्टालिन के लिए जाति और राष्ट्र प्रायः एक हैं, अतः वे जातीय गठन को पूंजीवाद और आधुनिकता से अनिवार्यतः जोड़ देते हैं. जबकि  सामान्य भाषा, आर्थिक जीवन, प्रदेश और संस्कृति की विशेषता जो भारत के अनेक समुदायों में पंद्रहवीं शताब्दी में ही दिखाई देती हैं, उन्हें जाति न मानने का कोई कारण नहीं दिखता, लेकिन समस्या यह उत्पन्न होती है कि इसे पूंजी के युग की घटना या आधुनिक परिघटना कैसे माना जाए. रामविलास जी हिन्दी जाति के निर्माण को सौदागरी पूंजी के विकास से उचित ही जोड़ते हैं, लेकिन उनका आग्रह यह हो जाता है कि सौदागरी पूंजी को पूंजीवाद की ही एक अवस्था माना जाए. इससे हिन्दी या अन्य भारतीय जातियों के उदय की यह शर्त पूरी हो जाती है जो स्टालिन के विवेचन में विद्यमान है .
रामविलास जी महाजाति शब्द  को ‘नेशन’ के अर्थ में प्रयुक्त करते हैं, उन्हीं विशेषताओं को ध्यान में रखकर जिन्हें स्टालिन ने गिनाया है, लेकिन अपने भारतीय अनुभव से जानते हैं कि इसके गठन का आरम्भ भारत के सामंत काल में शुरू हो गया था.  इस अंतर्विरोध को हल करने के क्रम में वे  हिन्दी और अन्य भारतीय महाजातियों  के निर्माण को आधुनिक काल कहते हैं. दरअसल ‘आरंभिक आधुनिकता’ को आजकल उत्तर सामंत काल और व्यापारिक पूंजी से जोड़ कर देखने का खासा अकादमिक रिवाज़ है. इस मामले में यदि रामविलास जी हिन्दी जाति के निर्माण काल को आधुनिक बताते हैं, तो एक तरह से वे बाद के ‘आरंभिक आधुनिकता’ के शास्त्रकारों को पूर्वाषित करते हैं. आधुनिकता और पूंजीवाद को सहवर्ती मानने की धारणा चलती रही है. लेकिन आधुनिकता ठीक-ठीक एक मूल्य और उन मूल्यों को उत्पन्न करने वाली भौतिक परिस्थितियों के रूप में कई जगह औद्योगिक  पूंजीवाद से पहले ही  अस्तित्व में आ गई हो, तो यह कोई अनहोनी बात नहीं है. आज के ‘आरंभिक आधुनिकता’ के व्याख्याता मोटे तौर पर सन १५०० से लेकर सन १८०० तक के काल को आरंभिक आधुनिकता का काल बताते हुए लगभग उन सारे ही तर्कों का सहारा लेते हैं जिन्हें रामविलास शर्मा उनसे दशकों पहले प्रस्तुत करते हैं. ये अध्येता भारत के सम्बन्ध में मुग़ल काल को आरंभिक आधुनिकता का काल  बताते हैं जो रामविलास जी के विवेचन का स्वाभाविक निष्कर्ष है. यह रामविलास जी की  जातीय गठन को समझने के लिहाज से एक महत्वपूर्ण मौलिक सैद्धांतिक स्थापना है जिसे विश्व अकादमी ने अन्यान्य स्रोतों से पाया और बहुत बाद में अपने विमर्शों में शामिल किया.
जहां तक जातीय गठन के पूंजीवाद के साथ सम्बन्ध का सवाल है, रामविलास शर्मा इस ‘आरंभिक आधुनिक काल’ को एक साथ सामंती और पूंजीवादी, दोनों मानते प्रतीत होते हैं. सामंती खोल में व्यापारिक और सूदखोर पूंजी का विकास मार्क्स के विवेचन में औद्योगिक पूंजीवाद की पूर्वपीठिका है या उसके लिए आवश्यक परिस्थितियों में से एक है. लेकिन मार्क्स इस व्यापारिक पूंजी के दौर को पूंजीवाद की अवस्था नहीं मानते, क्योंकि यह सामंती दौर में अंतर्भूत है. रामविलास शर्मा व्यापारिक पूंजी के दौर को पूंजीवाद की ही अवस्था मानते है और उनकी योजना के अनुसार इस दौर में सामंतवाद और पूंजीवाद एक तरह से ओवरलैप करते हैं. फिर भी नाम ही देना हो, तो रामविलास जी इस दौर को पूंजीवादी दौर कहना तय करते हैं. मार्क्स यदि इसे सामंतवाद  का दौर  (औद्योगिक पूंजीवाद से पहले सौदागरी पूंजी के संचय का दौर) ही मानते हैं, तो इसलिए कि वे उत्पादन-पद्धति को किसी ऐतिहासिक चरण की पहचान का केन्द्रीय तत्व मानते हैं, जबकि रामविलास जी इस प्रसंग में विनिमय पर अधिक जोर देते हैं. मैं उनकी इस स्थापना के सैद्धांतिक मूल्य पर कोई टिप्पणी कर सकने में सक्षम नहीं हूँ.
अगर महाजातियों के निर्माण की रामविलास जी की धारणा को हम गंभीरता से पढ़ें तो उनके लिए महाजाति के निर्माण का एक चरण सामंती काल में व्यापारिक पूंजी के माध्यम से आकार ग्रहण करता है, जबकि दूसरा चरण औद्योगिक पूंजी के दौर में पूंजीपति वर्ग की मुख्य भूमिका के साथ आकार ग्रहण करता है. इस दौर में आकर वह राष्ट्र या नेशन का रूप अख्तियार करती है. मेरे पढने के मुताबिक़, उनकी महाजाति की धारणा में ‘नेशनैलिटी’ और ‘नेशन’ एक continuum की तरह आते हैं जबकि स्टालिन के यहाँ ये पद लगभग समानार्थी लगते हैं.  रामविलास जी स्टालिन से  अलग इस बात में भी हैं कि  वे जातीय विकास को सिर्फ औद्योगिक पूंजीवाद की परिघटना नहीं मानते, बल्कि उसकी दीर्घ प्रक्रिया को रेखांकित करते हैं जो उनकी धारणा के अनुसार सामंती और व्यापारिक पूंजीवाद के ओवरलैप के दौर से लेकर औद्योगिक और महाजनी पूंजी के दौर तक चलती रहती है और  समाजवादी दौर तक भी. वे स्टालिन से इस मामले में भी अलग हैं कि वे मानते हैं कि जातीय गठन की प्रक्रिया में, सभी परिस्थितियों में आर्थिक जीवन की नियामक भूमिका रहे, यह ज़रूरी नहीं.
बंगाली जातीयता के निर्माण के सन्दर्भ में पार्थ चटर्जी लक्ष्य करते हैं कि आठवीं सदी से पूर्वी सागरों पर अरब व्यापारियों का कब्ज़ा हो गया और बंगाल का भारत के  समुद्री व्यापार में हिस्सा गिरता गया. राजसत्ता और समाज पर जो दबदबा व्यापारियों और बैंकरों का पांचवीं-छठी शताब्दी में था, वह अब न रह गया. लेकिन  कई शताब्दियों तक व्यापारियों की भूमिका काफी घट जाने के बावजूद, सामंतों की  विघटनकारी खींचतान आदि के होते हुए भी स्वतन्त्र राजवंशों के अधीन बंगाली राष्ट्रीयता का निर्माण जारी रहा. बंगाली सांस्कृतिक समुदाय का राजनीतिक एकीकरण पाल और सेन वंशों से लेकर स्वतंत्र सुल्तानों  के अधीन जारी रहा. ज़ाहिर है कि बंगाली राष्ट्रीयता के गठन की इन परिस्थितियों में आर्थिक जीवन नियामक नहीं रहा.  यह उदाहरण रामविलास जी की उस धारणा की भी तस्दीक करता  है जो उनके जातीयता संबंधी चिंतन को स्टालिन से सर्वाधिक अलग करता है, वह यह कि जाति/महाजाति के गठन में सामंती राजसत्ता भी सहायता करती है. यह अलग बात है कि पार्थ चटर्जी जहां महज ‘जातीयता’  या ‘नैशनैलिटी’ के सन्दर्भ में विचार करते हैं, वहीं रामविलास शर्मा महाजाति के गठन में Nationality- Nation Continuum का सन्दर्भ लेते हैं. इसीलिए पार्थ चटर्जी के विवेचन में बांग्ला जाति या लघुजाति के गठन में सौदागरी पूंजी के अभाव में भी सामंती राजवंश प्रमुख भूमिका निभाते हैं, जबकि रामविलास जी के विवेचन में सामंती राजसत्ता महाजातीय निर्माण में सहायता करती है, ख़ासकर एक सुकेंद्रित और निरंकुश राजसत्ता व्यापार के प्रसार से महाजाति के गठन और फलतः जातीय भाषा के गठन और प्रसार में सहायता करती है. रामविलास जी के सामने तुर्क, पठान और खासकर मुग़ल राजसत्ता का उदाहरण है. ‘भाषा और समाज’ लिखे जाने तक और उसके काफी बाद तक स्टालिन के प्रभाव में बहुतेरे भारतीय मार्क्सवादी चिन्तक यह मानते रहे कि औपनिवेशिक युग से पहले भारत में राष्ट्रीयताओं के अस्तित्व की बात करना ठीक नहीं है. हालांकि ऐसा नहीं है कि सभी मार्क्सवादी चिंतकों की धारणा यही रही हो. उदाहरण के लिए ई. एम. एस नम्बूदिरीपाद ने १९५२ में ही ‘केरल’ जाति का निर्माण काल चौदहवीं सदी से बताया था.
हम देखते हैं कि गुप्त साम्राज्य के पराभव के बाद अनेक ऐसे राजवंशों की स्थापना होती है जिनका राजनीतिक और सैनिक सत्ता संबंधी दृष्टिकोण शायद ही कभी उनकी  सीमित क्षेत्रीय सरहदों से परे जा पाता हो. आठवीं शती से भारतीय कला की स्थानीय या क्षेत्रीय शाखाएँ विकसित होने लगती हैं. बारहवीं सदी से नागरी, बांग्ला, गुजराती आदि  एक दूसरे से अलग पहचानी जा सकने वाली  लिपियों के आरंभिक रूप मिलने लगते हैं. पद्रहवीं शती तक उत्तर और पश्चिम भारत की सभी आधुनिक भाषाओं की लिपियों का पूर्ण विकास हो जाता है. चौदहवीं  सदी तक सारी ही आधुनिक भारतीय भाषाएँ पूरी तरह बन चुकी हैं और सभी में रचनात्मक  साहित्य का निर्माण शुरू हो जाता है. इस समय तक अलग अलग क्षेत्रों के साहित्य और कलाओं की  विशिष्ट सौन्दर्यशास्त्रीय परम्पराएं मिलने लगती हैं. चौदहवीं सदी से ही भारत में सांस्कृतिक अभिव्यक्तियाँ प्रमुखतः क्षेत्रीय भाषाओं और साहित्यों के इर्द-गिर्द होती हैं न कि संस्कृत या फारसी के इर्द-गिर्द, कुछ अपवादों को छोड़कर.  मोटे तौर पर आठवीं से लेकर चौदहवीं शती के बीच भारत में सामंती युग के दौरान लघुजातियों का निर्माण होता है और चौदहवीं तथा पंद्रहवीं शताब्दी से महाजातियों  के निर्माण की और संक्रमण का दौर  शुरू  हो जाता है.
यदि रामविलास जी की भारत में जाति गठन संबंधी धारणाओं की योजना में थोड़ी तबदीली की जुर्रत की जाए तो, यह योजना इस प्रकार बन सकती है-
१. आठवीं से चौदहवीं सदी तक मूलतः सामंती युग में लघु जातियों का निर्माण.
२. चौदहवीं-पद्रहवीं सदी से अठारहवीं सदी तक महाजातियों के बनने का लंबा संक्रमण काल जिसमें मुख्यतः सौदागरी पूंजी, कारीगरों की भूमिका और सहायक रूप में सुगठित केन्द्रीय सामंती सत्ता की भूमिका भी रहती है. इसे  आरंभिक आधुनिकता का काल कहा जा सकता है. इसमें जातीयता की विशेषताएं भी रहती हैं और आधुनिक राष्ट्र के बीज भी होते हैं. हिन्दी जाति के सन्दर्भ में इसे रामविलास जी के ही शब्दों में जनजागरण का काल कह सकते हैं. यहाँ हम इस बहस में नहीं उलझते की इसे भी पूंजीवाद का या सामंती और पूंजीवादी दौर के ओवरलैप का काल कहें या न कहें.
३. उन्नीसवीं सदी से आरम्भ होने वाला महाजाति के निर्माण का अगला चरण जिसमें मुख्य भूमिका भारत के सन्दर्भ में अखिल भारतीय पूंजीपति वर्ग की है, जो सामंती अवशेषों और विदेशी पूंजी पर निर्भरता के बावजूद औपनिवेशिक शासन के विरोध और मोल-तोल की जटिल प्रक्रिया से गुज़रते हुए  अनेक जातियों को एक आधुनिक बुर्जुआ राष्ट्र राज्य में एकीकृत करता है. यहाँ यह भी ध्यान देने की ज़रुरत है कि जहां एक भौगोलिक संस्कृति इकाई के बतौर भारतवर्ष की कल्पना समाज के ऊपरी वर्गों में उस दौर से मिलती है जब संस्कृत संपर्क भाषा थी, या आगे चलकर खुसरो आदि ने ‘हिन्दुस्तान’ की महिमा के गीत गाए, वहीं यह उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध और बीसवीं सदी के पूर्वार्द्ध में ही संभव हुआ कि भारतेंदु और द्विवेदी युग के तमाम लेखकों ने बड़े पैमाने पर भारत या हिन्दुस्तान के लिए कौम, वतन, राष्ट्र, जाति, नेशन आदि शब्दों का इस्तेमाल किया. यह महाजाति के आधुनिक पूंजीवादी राष्ट्र-राज्य का स्वरूप अख्तियार करने की संभावना का का सूचक  है. अजीमुल्ला खान ने १८५७ में जो राष्ट्र-गीत लिखा था, उसमें भी यही बात है-
हम हैं मालिक इसके हिन्दोस्तां हमारा
पाक वतन है कौम का, जन्नत से भी न्यारा’

इकबाल जब लिखते हैं कि- ‘हिन्दी हैं हम वतन हैं हिन्दोस्तां हमारा’ तो इन पंक्तियों में महाजातियों के आधुनिक राष्ट्र-राज्य बनने की ऐतिहासिक आकांक्षा व्यक्त होती है जो कालिदास या खुसरो के भारत वर्णन से बिलकुल अलग चीज़ है.लेकिन इस औपनिवेशिक दौर में  पूंजीपति वर्ग के नेतृत्व में चले राष्ट्रीय आन्दोलन की सबसे बड़ी कमजोरी यह रही कि वह संप्रदाय के आधार पर बंट गया और विभिन्न जातियों का जो एकीकरण जनता के स्तर पर स्वाधीनता के लिए जन-आन्दोलनों के ज़रिए हो रहा था, उन जातियों में भी सम्प्रदाय के आधार पर बंटवारा हो गया और अंततः एक नहीं, बल्कि दो बहुजातीय राष्ट्र-राज्य बन गए. यह कमोबेश वयस्क किन्तु बाद को विकलांग  आधुनिकता का काल कहा जा सकता है. रामविलास जी के शब्दों में जिसे नवजागरण कहा जाता है , वह उपरोक्त कमजोरियों के चलते जातीय जीवन की विशेषता बना नहीं रह सका. असल में यह जो तीसरा दौर है, जातीय गठन के लिहाज से सबसे जटिल दौर है.


इस दौर की जटिलता पर आने से पहले हम रामविलास शर्मा के दो व्यावहारिक  प्रस्तावों पर चंद बातें कहना चाहते हैं. पहली बात यह है कि उनकी ये बातें प्रस्ताव मात्र हैं, सैद्धांतिक प्रस्थापनाएँ नहीं हैं. एक बात यह है कि उन्होंने लिखा है कि यदि हिन्दी-उर्दू दो भाषाएँ नहीं हैं, तो क्या ही  अच्छा होता कि दोनों की एक ही लिपि यानी देवनागरी ही होती. आज जितने बड़े पैमाने पर उर्दू साहित्य की कृतियाँ देवनागरी में लिप्यन्तरित की जा रही हैं, उतने बड़े पैमाने पर किसी अन्य भाषा से अनुवाद नहीं हो रहे हैं. कारण साफ़ है. लिप्यान्तरण सहज है, भाषांतरण मुश्किल. अपने समय में रामविलास शर्मा को प्रगतिशील आन्दोलन में इस बात के लिए चाहे जितना लड़ना पड़ा  हो कि हिन्दी-उर्दू दो नहीं एक ही भाषा हैं, लेकिन बाद को  शम्सुर्रहमान  फारुकी से लेकर क्रिस्टोफर किंग तक सब यह मानते हैं कि औपनिवेशिक हस्तक्षेप से पहले ये दो भाषाएँ नहीं थीं, कि यह एक ही भाषा है और औपनिवेशिक दौर से पहले उर्दू  नाम की कोई भाषा नहीं थी. ‘ज़बान-ए-उर्दू-ए-मोअल्ला’ के कुपाठ से उर्दू संभवतः एक अलग भाषा मान ली गई. वैसे भी भाषा की पहचान क्रियापदों से होती है, जिनके क्रियापद एक हैं, वे एक ही भाषा हैं. लेकिन उनकी दो और बातों पर गौर करना चाहिए- एक यह कि हिन्दी, हिन्दवी या रेखता नाम से जो भाषा थी, उसकी लिपियाँ दो थीं. दरअसल दो लिपियाँ होते हुए भी जातीय विकास में कोई कठिनाई नहीं आई. मुल्ला दाउद, खुसरो या जायसी की प्राचीन पांडुलिपियाँ चाहे अरबी-फारसी लिपि में मिलें या देवनागरी में, उनकी भाषा जातीय भाषा ही है, लिहाजा लिपि से कोई फर्क नहीं पड़ता. रामविलास जी खुद भी यही कहते हैं. इसलिए लिपि बदलना कोई अनिवार्य चीज़ नहीं है, जातीय एकता के लिए. रामविलास जी खुद लिखते हैं, “लिपि भी संस्कृति का अंग है.” ऐसे में उनके प्रस्ताव को अरबी-फारसी लिपि को छोड़ देने के अर्थ में नहीं ग्रहण करना चाहिए, बल्कि बेहतर तो ये हो कि नागरी जाननेवालों, ख़ास कर बौद्धिकों  को प्रयास कर के अरबी-फारसी लिपि को सीख लेना चाहिए. यह जातीय एकता के लिए शुभ ही होगा. इसके अलावा यदि औपनिवेशिक हस्तक्षेप से ही सही हिन्दी- उर्दू दो भाषाएँ बन गई हैं, उनकी अलग साहित्यिक परम्पराएं दो सौ सालों में निर्मित हो गईं हैं, तो बगैर एक को दूसरे के मातहत बनाए साहित्य-संस्कृति के स्तर पर दोनों को नज़दीक लाने के  शैक्षणिक, प्रशासनिक और वैदुषिक प्रयास बढाने की दिशा में हमें काम करना चाहिए. आखीर सोवियत संघ में तो ऐसी लिपियों को भी पुनर्जीवित किया गया, जो मृतप्राय थी.


रामविलास जी का एक सुझाव यह भी था कि हिन्दीभाषी सभी प्रदेशों का एक प्रदेश बनना चाहिए. यह भी सुझाव या प्रस्ताव ही है, कोई सैद्धांतिक प्रस्थापना नहीं. वास्तव में आज के दौर में जातीय निर्माण के लिए आर्थिक जीवन ही निर्णायक तत्व बना हुआ है. उपनिवेश रहे देश आज़ाद तो हुए लेकिन विश्व-पूंजीवाद के साथ उनके शासक तबकों का निर्भरता का सम्बन्ध बढ़ता ही चला गया है. उपनिवेशवादी और साम्राज्यवाद के पुराने रूप में  एक विकसित राष्ट्र  दूसरे को प्रत्यक्षतः और राजनीतिक तौर पर गुलाम बना लेता था. तब अनेक उत्पीडित जातियां ऐसी साम्राज्यवादी शक्तियों  के खिलाफ संघर्ष में एकताबद्ध होती थीं. आज नव-साम्राज्यवाद के दौर में राष्ट्रीय स्तर का पूंजीपति वर्ग खुद दलाल के रूप में उनका हित-पोषण करता है. ऐसे में किसी बाहरी शक्ति द्वारा एक ही भौगोलिक-सांस्कृतिक क्षेत्र की तमाम जातियों का एक समान प्रत्यक्ष  शोषण नहीं होता, बल्कि इसके रूप बहुत अलग हो गए हैं. राष्ट्रीय स्तर के पूंजीपति वर्ग अपने-अपने देशों में साम्राज्यवादी देशों की प्राथमिकता के अनुकूल पूंजीवादी विकास करते हैं जो बहुजातीय राष्ट्र में कभी एक जाति की कीमत पर दूसरी जाति का विकास करने के रूप में प्रकट होता है, कभी आतंरिक उपनिवेशन के रूप में. कभी एक ही भाषिक प्रदेश के भीतर असमतल विकास के कारण विकासहीनता के शिकार लोगों का अलगाव अपना अलग प्रदेश माँगने के आन्दोलनों में प्रकट होता है, भले ही जातीय दृष्टि  से वे एक हों. यह सब कुछ विश्व पूंजी द्वारा सतत निर्मित केन्द्रों और परिधियों के बीच संघर्ष के राष्ट्र राज्य के दायरे में प्रतिफलित रूप हैं. ये केंद्र और परिधियाँ विकसित और अविकसित या विकासशील देशों के बीच, किसी भी राष्ट्र  के भीतर एक जाति  और दूसरी जाति  के बीच, किसी भी जाति  के एक क्षेत्र और दूसरे क्षेत्र के बीच, गाँव और शहर के बीच- यानी अनेक स्तरों पर दिखाई देती हैं.
ऐसे में जातीय समस्या और विकट हुई है. अलग राज्य के कई आन्दोलनों में वास्तविक वंचना के कारण ही आम लोग वहां के छोटे  पूंजीपति, स्थानीय व्यापारी  और मध्य वर्ग के पीछे गोलबंद होते हैं जैसे कि उत्तराखंड और झारखंड आन्दोलनों में हुआ. (झारखंड आन्दोलन न सिर्फ सबसे पुराना है, बल्कि उसका जातीय पक्ष भी मज़बूत था. यह आन्दोलन मूलतः आदिवासियों का था जिनकी अस्मिता जातीय गठन के सभी तत्वों को ध्यान में रखते हुए हिन्दी, बाँग्ला और उड़िया जातियों से निश्चय ही अलग है. आज का झारखंड प्रदेश सिर्फ बिहार से अलग हुए क्षेत्र से निर्मित है, जबकि झारखंडी जन के निवास-क्षेत्र का अच्छा-खासा हिस्सा अभी भी बंगाल, उड़ीसा आदि  प्रदेशों  में पड़ता है.) ऐसे आन्दोलनों को लेकर मार्क्सवादियों का दृष्टिकोण सकारात्मक होना चाहिए.  लेकिन जहां ऐसा नहीं है और शासक जमात के कुछ हिस्से सिर्फ किसी उप-राष्ट्रीयता को आधार बनाकर सत्ता में अधिक हिस्से के लिए अलग प्रांत की मांग करते हैं, वहां अक्सर ही उन्हें जन समर्थन  नहीं मिलता जैसे कि हरित प्रदेश या पूर्वांचल या भोजपुरी प्रदेश की मांग. इन फर्जी आन्दोलनों के प्रति दृष्टिकोण अलग होना चाहिए.  इस दौर  में जिस हद तक वर्ग संघर्ष तेज़ होगा, जिस हद तक साम्राज्यवाद-प्रेरित विकास के माडल के खिलाफ जन-गोलबंदी होगी, उसी हद तक जातीय समस्या  का भी निदान होता चलेगा. एक जाति का एक राज्य एक आदर्श है, यूटोपिया है, स्वप्न है जो रामविलास जी ने देखा था. लेकिन किसी भी स्वप्न को वास्तविकता में तब्दील करने के लिए वास्तविकता से ही शुरू करना होगा.
आज यह बात स्पष्ट है कि समाजवादी क्रान्ति के प्रथम प्रयोग में आरम्भ में सोवियत संघ में जातीय समस्या को जिस उदात्त, जनवादी स्तर पर हल करने की कोशिश की गई, जहां सभी जातियों को आत्मनिर्णय का अधिकार संविधान-प्रदत्त था, वहां भी आर्थिक विकास की असमानता और किसी हद तक स्टालिन के बाद रूसी जाति के राजनीतिक वर्चस्व के कारण जातीय असंतोष अच्छे-खासे स्तर तक पहुंचा हुआ था और सोवियत विघटन के अनेक कारकों  में से एक कारक  वह भी अवश्य बना. आज पड़ोसी देश नेपाल में जातीय आधार पर प्रान्तों के गठन  के वहां के माओवादियों के प्रस्ताव पर राजनीतिक सहमति न बन पाने के चलते संविधान-निर्माण का काम बाधित पड़ा  हुआ है. मुश्किल यह भी है कि इस सवाल पर नेपाली कम्युनिस्ट पार्टी (एमाले) भी माओवादियों से सहमत नहीं है. भारत में भी अलग राज्य के लिए या उप-जाति के आधार पर किसी प्रांत के भीतर  स्वायत्तशासी क्षेत्र बनाने के आन्दोलनों पर सभी कम्युनिस्ट दल एकमत नहीं होते. इन कुछ उदाहरणों से यह समझा जा सकता है कि अभी भी जातीय गठन का मुद्दा  खुद कम्युनिस्ट आन्दोलन में सैद्धान्तिक और व्यावहारिक स्तर पर समृद्ध किए जाने की मांग करता है.

 Pranay Krishna, Photo By Vijay Kumarप्रणय कृष्‍ण। इलाहाबाद युनिवर्सिटी और जेएनयू से अध्‍ययन। प्रखर हिंदी आलोचक। जन संस्‍कृति मंच के महासचिव।  देवीशंकर अवस्‍थी सम्‍मान  से सम्मानित ।

साभार- कथा-17 

प्रो. आशीष नंदी: एक ‘नकारात्मक शिक्षक’ के विचार या बकवास- प्रणय कृष्ण

BY  प्रणय कृष्ण

आशीष नंदी के बयान के कुछ सबक

 जयपुर साहित्य मेले में प्रो. आशीष नंदी के बयान और उस पर उठे विवाद के अनेक निहितार्थ हैं. अनेक बुद्धिजीवियों ने उनके समर्थन में कहा कि उनके बयान को सतही ढंग से नहीं समझना चाहिए, बल्कि उसमें निहित ‘व्यंग्यार्थ’ और ‘विडम्बना’ को समझना चाहिए ताकि उनके जैसे ‘अंतर्दृष्टि’ से संपन्न समाज-विज्ञानी के साथ अन्याय न हो. मुश्किल यह है कि सामाजिक परिघटनाओं के आकलन में अकेले ‘अंतर्दृष्टि’ से काम नहीं चलता. सामाजिक परिघटनाओं का अध्ययन वस्तुगत-तथ्यगत  आधार की मांग करता है. नंदी साहब पहले भी अन्य सन्दर्भों में इसकी अवहेलना करते आए हैं और तथ्यहीन ‘अंतर्दृष्टि’ का परिचय देते रहे हैं. देवराला सती कांड के समय नंदी साहब ने फरमाया था कि सती होना महान भारतीय परंपरा से प्रेरित एक अत्यंत साहसिक कृत्य है और रूप कुंवर की हिंसक मृत्यु आधुनिकता की ताकतों के खिलाफ परंपरा के दावे का सशक्त ‘प्रतीक’ है. एक अन्य लेख में उन्होंने  सेकुलरवाद को पश्चिमी दुनिया में आम प्रयोग में आनेवाला ऐसा शब्द बताया जिसे भारत में एक विचार की तरह आयात कर लिया गया. इतिहासकार संजय सुब्रह्मण्यम ने इसकी खिंचाई करते हुए दिखलाया कि न तो ‘सेकुलरवाद’ पश्चिम में कोई आम प्रचलन का शब्द है और न भारत में उसका वही अर्थ लिया जाता है जो योरप में. बहरहाल, नंदी साहब महज अपने वक्तव्यों में ही विडंबनात्मक शैली का इस्तेमाल नहीं करते, बल्कि उनका बौद्धिक व्यक्तित्व ही विडम्बनामय है. वे हिन्दू न होते हुए भी भारत के प्राचीन हिंदू अतीत के प्रति रूमानी मोह रखते हैं और अंग्रेज़ी ज़बान में लिखते-पढते-बोलते हुए भी देशज ‘शुद्धता’ की वकालत करते हैं. उनकी इन तमाम धारणाओं पर बहस की इस लेख में गुंजायश नहीं है.

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जयपुर में उनका बयान कितना दलित-पिछडा विरोधी या समर्थक है, कितना सपाट है, कितना व्यंग्यात्मक , इसकी जगह देखना यह होगा कि सामजिक जीवन के पहलुओं पर वे विचार कैसे करते हैं. कहा गया कि उन्होंने भ्रष्टाचार को दलित-पिछडों के सामाजिक उत्थान का एक रूप बताते हुए प्रस्तावित किया  कि जबतक भ्रष्टाचार में सवर्णों और दलित-पिछडों के बीच समानता बची हुई है, तब तक वे भारतीय लोकतंत्र को लेकर आश्वस्त हैं. मुश्किल यह है कि विद्वान नंदी साहब ने यह बताना गवारा नहीं किया कि सामाजिक उत्थान का उनका बताया रास्ता कितने दलित-पिछडों-आदिवासियों को वास्तव में उपलब्ध  है. भ्रष्टाचार करने के लिए भी सत्ता का इस्तेमाल और भ्रष्टाचार करने लायक न्यूनतम पूंजी की ज़रूरत होती है. आदिवासियों में तो लगभग ६०% गरीबी रेखा के नीचे हैं. वहीं, केन्द्रीय सामाजिक न्याय  मंत्रालय के २००४-२००५ के आंकड़ों के मुताबिक़ दलितों की शहरी आबादी का ३९.९% हिस्सा और ग्रामीण आबादी का ३६.८% हिस्सा गरीबी की रेखा से नीचे था. पिछडों की शहरी आबादी का ३१.४% हिस्सा और ग्रामीण आबादी का २६.७% हिस्सा गरीबी की रेखा से नीचे था. तब ग्रामीण आबादी के लिए गरीबी की रेखा का मतलब था ११ रूपए ८७ पैसा प्रति व्यक्ति प्रति दिन की आय जबकि शहर के लिए यह सीमा १७ रूपए ९५पैसे  की थी. मिलता जुलता आंकड़ा अर्जुन सेनगुप्ता कमेटी  रिपोर्ट का था जिसमें १९९३-९४ से लेकर २००४-२००५ के बीच के सरकारी आंकड़ों के आधार पर बताया गया था कि ८३ करोड ६० लाख हिन्दुस्तानी २० रूपए रोज पर गुजारा करते हैं. इन करोड़ों लोगों की न सत्ता में दखल है और न इनके पास भ्रष्टाचार में निवेश लायक पूंजी है.  अब नंदी जी ही ये बताएं कि भ्रष्टाचार से सामाजिक तरक्की का नुस्खा इन पर कैसे लागू हो जिनकी गरीबी के मुख्य कारणों में एक भ्रष्टाचार खुद है. फिर भ्रष्टाचार के फायदे भी छन कर नीचे तक नहीं पहुँचते, जैसा कि ‘विकास’ के बारे में कहा जाता है. बल्कि यों कहें कि ‘विकास’ के फायदे भी भ्रष्टाचार  के चलते ही छन कर नीचे नहीं पहुँच पाते. जो बीमारी है, नंदी जैसे चमत्कारी बौद्धिक वैद्य उसे ही इलाज बता रहे हैं.

नंदी जी की दिक्कत यह है कि वे किसी भी सामाजिक समूह के चंद नुमाइंदों की भ्रष्टाचार से हासिल सम्पन्नता को सारे तबके की तरक्की  मान बैठे हैं. उनका सामाजिक सिद्धांत भ्रष्टाचार करनेवालों को ध्यान में रख कर चलता है, भ्रष्टाचार के पीड़ितों को नहीं. उनके लिए यह जानना ज़रूरी था कि कौन से सामाजिक तबके भ्रष्टाचार से सर्वाधिक पीड़ित हैं. कुछ उदाहरण देखें. पैंतीस हज़ार करोड के उत्तर प्रदेश अनाज घोटाले (२००२ से २०१०) में वह अनाज जो जन वितरण प्रणाली की मार्फ़त अन्त्योदय अन्न योजना, जवाहर रोज़गार योजना और मिड-डे मील के तहत गरीबी-रेखा  के नीचे रहनेवालों में बंटना था, उसे खुले बाज़ार के हवाले कर दिया गया. अरुणांचल में १००० करोड रूपए का जन वितरण प्रणाली का घोटाला हुआ.  महाराष्ट्र में १९९५ से २००९ के बीच ४२ लाख फर्जी राशन कार्ड बना कर गरीबों के पेट पर लात मारी गई. उड़ीसा में मिड-डे मील तथा  पूरक आहार योजना में घटिया दाल सप्लाई का ७०० करोड रूपए  का घोटाला हुआ. हिमाचल प्रदेश में भी कई करोड का दाल-घोटाला हुआ. उड़ीसा, उत्तर प्रदेश,मध्य प्रदेश और झारखण्ड में महात्मा गाँधी ग्रामीण रोज़गार योजना में घोटाले हुए. किन सामाजिक तबकों के लोग हैं जिन के पेट पर लात पड़ी?  वे किस  तबके के लोग हैं जिन्हें देश के तमाम आदिवासी इलाकों में अवैध खनन करनेवाले विस्थापित करते जा रहे हैं? वे कौन लोग हैं जिन्हें कोई वेदांता, कोई पास्को, कोई एस्सार वन्य संरक्षण कानून या पर्यावरण सुरक्षा क़ानून के प्रावधानों के खिलाफ सरकारी मंजूरी प्राप्त कर के उजाड़ता है, उनकी हवा, पानी में ज़हर घोलता है? कोई बे-पढ़ा लिखा इंसान भी ये समझता है कि भ्रष्टाचार के ऐसे  सभी मामलों के शिकार वही निम्न कही जाने वाली जातियों और जनजातियों के लोग हैं, जिन्हें भ्रष्टाचार के रास्ते तरक्की का प्रस्ताव नंदी जैसे विद्वान दे रहे हैं. यदि देश के अस्सी फीसदी लोग दलित, पिछड़े और आदिवासी श्रेणी में आते हैं, तो सिद्धांततः यह मानना होगा कि कोयला घोटाला, टू-जी स्पेक्ट्रम घोटाला अथवा भ्रष्टाचार का कोई भी रूप हो , उस  के चलते सरकारी कोष को होनेवाला नुक्सान सर्वाधिक इन्हीं तबकों का नुकसान है.

नंदी की दूसरी दिक्कत यह है कि वे भ्रष्टाचार के स्वरूप और कार्य-प्रणाली को नज़र-अंदाज़ करते हैं. भारत में अपराध और भ्रष्टाचार ऐसे पेशे हैं जो धर्म और जाति का बंधन नहीं मानते. याद कीजिए बहुचर्चित चारा घोटाला जिसमें जगन्नाथ मिश्र से लेकर लालू प्रसाद तक तमाम दलों और जातियों के लोग आरोपी हैं. अपेक्षाकृत नए घोटालों को भी लें , तो सभी का यही स्वरूप है भले ही वह किसी भी  व्यक्ति के नाम से चर्चित हुआ हो. क्या नंदी जैसे विद्वानों को यह बताने की ज़रूरत है कि भ्रष्टाचार का संबंध राजनीतिक अर्थशास्त्र से ज़्यादा है, सामाजिक मनोविज्ञान या नीतिशास्त्र से कम ? यह बात व्यक्तिगत स्तर पर किए जानेवाले भ्रष्टाचार पर भी लागू होती है. यदि शासन-तंत्र और अर्थ-तंत्र में गुंजायश नहीं होगी, तो अनैतिक आदमी भी भ्रष्टाचार नहीं कर सकता.

नंदी का विवादास्पद बयान जिस चर्चा का हिस्सा था, उस चर्चा को उनसे पहले ही तहलका के संपादक तरुण तेजपाल उत्तेजक, किन्तु गलत दिशा पकड़ा चुके थे. पिछले साल के भ्रष्टाचार-विरोधी आंदोलन के वे खिलाफ थे. बहुत से लोग वाजिब कारणों से भी उसके खिलाफ हो ही सकते हैं. लेकिन तेजपाल ने अपना तर्क बनाया भ्रष्टाचार और उसके विरोध के जातिगत गणित को. जाति सामाजिक सच्चाई भी है और विश्लेषण का औजार भी. इसका अर्थ यह नहीं कि वह कोई जादू की छड़ी है जिसे घुमाते ही आसमान के नीचे सारा जगत-व्यापार हस्तामलकवत हो जाता हो. दुर्भाग्य से कुछ विद्वानों ने ऐसा ही समझ रखा है. पिछले साल चले भ्रष्टाचार-विरोधी आंदोलन के नेतृत्व या कार्य-नीति की कई वाजिब आलोचनाएं हो सकती हैं , लेकिन  कुछ बुद्धिजीवियों  ने जोर-शोर से जब यह कहना शुरू किया कि इस आंदोलन में दलित-पिछडों की कोई भागीदारी नहीं थी, तो आश्चर्य होना लाजिमी था. यदि विभिन्न दैनिक अखबारों के उन दिनों के तमाम स्थानीय संस्करण ही पढ़ लिए जाएँ, तो यह धारणा ध्वस्त हो जाए. कुछ लोग हर शहरी आंदोलन को महज सवर्ण आंदोलन समझ बैठते हैं, दूसरी ओर कुछ बौद्धिक हर शहरी आंदोलन को महज मध्यवर्गीय बताते नहीं थकते. सच यह है कि पिछले दो दशकों में शहरों की सामाजिक संरचना में बहुत से बदलाव आए हैं. शहरी मध्य-वर्ग में भले ही अक्सरियत अभी भी सवर्ण हो, लेकिन अच्छी खासी तादाद में दलित-पिछड़े समुदाय के लोग भी अब शहरी मध्य-वर्ग का हिस्सा हैं. यह भी समझना होगा कि शहरी आन्दोलनों में शहर में रहनेवाले गरीब और मेहनतकश भी हिस्सा लेते हैं जिनमें ज़्यादा तादाद दलित-पिछड़े समुदाय के लोगों की है. पिछले दिनों दिल्ली सामूहिक बलात्कार कांड विरोधी आंदोलन को फेसबुक पर सक्रिय  कई नामी-गिरामी बौद्धिकों ने प्रथम-दृष्टया शहरी-मध्यवर्गीय , अतः सवर्ण करार दिया. बाद को अनेक तथ्यों के आलोक में वे अपनी राय बदलने को विवश हुए.  कहा नहीं जा सकता कि नए सामाजिक आन्दोलनों को वे अब भी कितना समझते हैं, या कि उनके नज़रिए में कितना बदलाव आया है. प्रो. आशीष नंदी अपने बयान के ज़रिए एक नकारात्मक शिक्षक के बतौर हमारे सामने हैं. सीख यह है कि सामाजिक समूहों की वास्तविकता को अकादमिक प्रतीक-व्यवस्था में नहीं ढाला जा सकता. नंदी साहब के वकील ने सुप्रीम कोर्ट से पूछा, ‘क्या विचारों के लिए सज़ा दी जा सकती है?’ हमारी तुच्छ समझ से ‘विचार’ और ‘बकवास’ में फर्क स्पष्ट कर देना ही काफी है. लोकतंत्र में ‘बकवास’ के प्रति भी थोड़ी सहिष्णुता रहे, तो बुरा नहीं.

Pranay Krishna, Photo By Vijay Kumarप्रणय कृष्ण,  हिंदी आलोचक। असोसिएट प्रोफ़ेसर, हिंदी विभाग , इलाहाबाद विश्विद्यालय। प्रखर हिंदी आलोचक। जन संस्‍कृति मंच के महासचिव।  देवीशंकर अवस्‍थी सम्‍मान  से सम्मानित ।

प्रगतिशील आंदोलन के ७५ साल: प्रणय कृष्ण

By प्रणय कृष्ण

स्व.सुरेंद्र चौधरी ने लिखा था,” स्वतंत्रता  और  मुक्ति की इच्छा की जो  लड़ाई सदी भर से चली आ रही थी, उसका एक सुफल भारतीय मानस को यह प्राप्त हुआ था कि उसने अपनी अजेय शक्ति को पहचानने की दिशा में एक कदम और आगे बढ़ाया  था. किसान-मज़दूर और मध्यवर्ग  का विशाल मोर्चा  तैयार हो रहा था……… प्रगतिशील लेखक संघ का विशाल राष्ट्रीय मोर्चा उसी का एक नाभिक था.  ऐसा विशाल मोर्चा सन 1946 के बाद फिर कभी न बना.”(“स्वाधीनता संग्राम और हिंदी साहित्य”(1994) शीर्षक लेख, इतिहासः संयोग और सार्थकता, पृ 128-132)

courtesy: sahmatThose who attendedthe formation conference of the Progressive Writers’ Association in Lucknow.

courtesy: sahmatThose who attendedthe formation conference of the Progressive Writers’ Association in Lucknow.

आज प्रगतिशील लेखक संघ के 75वे साल में उस परिघटना को याद करना आज की परिस्थिति में वैसे विशाल मोर्चे को तैयार करने के कार्यभार के प्रति फिर से समर्पित होना है. यह तब के मुकाबले आज  और भी मुश्किल कार्यभार है. लेकिन इतिहास जब भी कोई चुनौती फेंकता है, मानवेच्छा स्वभावत: उसे स्वीकार करती है. प्रगतिशील लेखक संघ जिस खमीर से पैदा हुआ था , उसका दायरा देश-काल में उस नाम के संगठन से बहुत बडा था. सज्जाद ज़हीर के1936 में बनाए गए संगठन का मह्त्व यह था कि वह पहला महान प्रयास था जिसने इस पूरे दायरे की रचनात्मक-क्रांतिकारी सम्भावना को चरितार्थ करने का सपना दिखाया और उसे हकीकत में बदलने की पुरज़ोर कोशिश की. आज अगर एकाधिक संगठन (प्रलेस,जलेस,जसम और दूसरे भी कई संगठन ) इस दिशा में सक्रिय हैं तो यह उस स्वप्न की विराटता का ही सबूत है, उसके अपूर्ण कार्यभार  का भी और उसके आत्मसंघर्ष का भी. यों ही नहीं है कि जब साहित्य में आधुनिकतावाद और व्यक्ति-स्वातंत्र्य के दबदबे के दौर में त्रिलोचन, केदार,नागार्जुन जैसे बड़े कवि उपेक्षित और अलक्षित किए गए, तो सत्तर के दशक में नक्सलबाड़ी और निरंकुशता विरोधी आन्दोलनों के उभार ने इन्हें फिर केंद्र में ला बिठाया. उनका केंद्र में आना नए जनांदोलनों की चेतनागत ज़रुरत थी. ‘इप्टा’ के स्वर्णिम युग के बाद जन नाट्य मंच, बादल सरकार के तीसरे थियेटर और बिहार के किसान संघर्षों के इलाकों में युवानीति जैसे समूहों ने जगह खाली न रहने दी. जब फिल्मों में बलराज साहनी , ए.के. हंगल, ख्वाजा अहमद अब्बास की पीढी के बाद कमर्शियल सिनेमा की तूती बोल रही थी, तब १९८० के दशक में अचानक ही निहलानी, बेनेगल से लेकर सईद मिर्ज़ा तक न्यू वेव सिनेमा के उन्नायकों की कतार सामने आ गयी. यदि आज चित्रकला की दुनिया के चरम व्यावसायिकता के दौर में हमारे कुछ साथी चित्त प्रसाद, सोमनाथ होड़ और जैन-उल-आबेदीन की विरासत की नए सिरे से आवाज़ दे रहे हैं , तो यह अकारण नहीं है.

पाकिस्तान में तो न केवल कम्युनिस्ट पार्टियां प्रतिबंधित हुईं , बल्कि तरक्कीपसंद तहरीक का हर तरीके से दमन किया गया. बावजूद इसके फैज़ और जालिब जैसे शायर जनता की अंतरात्मा की आवाज़ बन गए. अदब ने वहां वो किया , जो राजनीति नहीं कर सकी. इस्लाम की रामनामी ओढ़ तानाशाह जब जनता को गुमराह कर रहे थे, तो जनता को सजग करने वाले ये कवि ही थे-

ख़तरा है जरदारों को
गिरती हुई दीवारों को
सदियों के बीमारों को
ख़तरे में इस्लाम नहीं

सारी जमीं को घेरे हुए हैं आख़िर चंद घराने क्यों

नाम नबी का लेने वाले उल्फ़त से बेगाने क्यों

ख़तरा है खूंखारों को
रंग बिरंगी कारों को
अमरीका के प्यारों को
ख़तरे में इस्लाम नहीं
(हबीब जालिब )

कहने का मतलब यह कि प्रगतिशील आन्दोलन महज इतिहास नहीं , बल्कि एक जीती-जागती परम्परा है जिसकी ज़रुरत आज के हमारे समाज को और भी ज़्यादा है.

सच कहा जाए तो प्रगतिशील लेखक संघ संगठन से ज़्यादा आन्दोलन था. उसने सामाजिक यथार्थ, इतिहास-दृष्टि और मेहनतकश समुदाय के नेतृत्व में मानव  मुक्ति की विचारधारा को  पूरे उपहादीप के साँस्कृतिक परिवेश का अपरिहार्य और जीवंत अंग बना दिया. देश बंटे, पार्टिया बंटी, लेकिन  यह साँस्कृतिक समझ और उसकी क्रियागत परिणति नाम-रूप बदल-बदल कर अपने वजूद का प्रमाण देती रही. जनता के साथ कंधे से कंधा मिलाकर  लडने वाले कलाकार और लेखक, जनांदोलनो से अपने व्यक्तित्व और कृतित्व को समृद्ध करनेवाले बौद्दिक और यहाँ तक कि जेल जाने से लेकर लडते हुए शहीद हो जानेवाले संस्कृतिकर्मियो की लम्बी कतार  देश की आज़ादी और तक्सीम के बाद भी यदि जारी रही,तो यह इसी आंदोलन की उपलब्धि है, नाम गिनाने की ज़रूरत नहीं.  सबसे बड़ी बात कि इस आन्दोलन के साथ चलनेवालों नें उच्चतम इंसानी मूल्यों की प्रतिष्ठा की, साधारणता में महानता को लक्षित किया, समकालीन और कालजयी की दूरी पाट दी, सभ्यता के जंगलों की परिक्रमा की, अपने रचनाकार व्यक्तित्व में नए के जन्म की प्रसव पीड़ा भोगी-

” आगे-आगे माँ
पीछे मैं;
उसकी दृढ़ पीठ ज़रा सी झुक
चुन लेती डंठल पल भर रुक
वह जीर्ण-नील-वस्त्रा
है अस्थि-दृढ़ा
गतिमती व्यक्तिमत्ता
कर रहा अध्ययन मैं उसकी मज़बूती का
उसके जीवन से लगे हुए
वर्षा-गर्मी-सर्दी और क्षुधा-तृषा के वर्षों से
मैं पूछ रहा –
टोकरी-विवर में पक्षी-स्वर
कलरव क्यों है
माँ कहती –
‘सूखी टहनी की अग्नि क्षमता
ही गाती है पक्षी स्वर में
वह बंद आग है खुलने को।’
(एक अंतर्कथा-२, मुक्तिबोध)

इस पत्रिका के पिछले दो अंको में हमारे दो सम्मानित अग्रजो ने विस्तार से बताया है कि कैसे इस आंदोलन की व्याप्ति साहित्य, सिनेमा, थियेटर,चित्रकला और यहाँ तक कि आज़ाद उपमहाद्वीप के इतिहास-लेखन, मानविकी, दर्शन और सामाजिक विग्यानो तक रही. उन्हें दोहराने की ज़रुरत नहीं.

आज़ादी के बाद जनवादी क्रान्ति के लक्ष्यों की पेचीदगी से वास्तविक सामना हुआ. प्रगतिशील आन्दोलन ने अपनी सामंतवाद और साम्राज्यवाद-विरोधी भूमिका के निर्वाह में अनेक अंतर्विरोधों का सामना किया, तीसरी दुनिया के देशों ,खासतौर पर एफ्रो-एशियाई देशों के लेखकों के अंतर्राष्ट्रीय मोर्चे से जुड़ा, प्रतिक्रया की ताकतों से शीत-युद्ध के दौर में जूझा, उप-महाद्वीप की जनवादी सांस्कृतिक परम्परा का नव-संधान किया,भारतीयता के साम्राज्यवादी-औपनिवेशिक भाष्य पर करारा पलट-वार किया (याद करें रामविलास शर्मा का कृतिव).

किन्तु शीत-युद्ध के बाद की स्थितियां काफी बदली हुई हैं. दुनिया का शक्ति-संतुलन बदला हुआ है. नई साम्राज्यवादी विश्व-व्यवस्था ने विकल्पहीनता के मिथक को गढा, लेकिन उसे तत्काल ही लैटिन अमरीकी मुल्कों से चुनौती मिली. विश्व-पूंजी के मुनाफे दी दर घटते जाने से वह और खूंखार होकर अल्पविकसित और विकास-शील देशों की गरीब जनता पर टूट पडी है. इन देशों के हुक्मरानों ने कारपोरेट हितों में जनता की एकता को तोड़ने के हज़ार हथकंडे अपना लिए हैं. पस्तहिम्मत लोगों की नयी सोच है-‘ इफ यू कांट बीट देम, ज्वायन देम’. लेकिन फिर भी हम भारत में ही देख सकते हैं कि सैकड़ों छोटे-बड़े आन्दोलन फूट पड़े हैं. आदिवासी और किसान बगैर किसी संगठित बैनर के भी व्यवस्था से, कारपोरेट लुटेरों से टकरा जा रहे हैं. लड़ने के तरीके सही हों या गलत,जिनकी जान पर बन आई है, वे सही विकल्प और नेतृत्व का इंतज़ार कहाँ तक करें? क्या ज़रूरी नहीं हो गया है कि प्रगतिशील सांस्कृतिक आन्दोलन उस बौद्धिक, सांस्कृतिक आबोहवा का निर्माण करे जिससे इन तमाम आन्दोलनों का दम न घुटे और वे सही विकल्प की दिशा में अग्रसर हो सकें?

हम नहीं कहते कि इस आन्दोलन में अंतर्विरोध नहीं रहे या नहीं हैं, यह भी नहीं कहते कि वह कभी गतिरुद्ध नहीं हुआ. आन्दोलन ने गलतियां भी कीं और उनसे सीखा भी और कई बार सीख के भुला भी दिया. मुगालते भी पाले और झटके भी खाए. संकीर्णता और उदारतावाद के आत्मघाती दौर भी आए. लेकिन कोइ ज़रुरत तो है इतिहास और समाज की जिसके चलते यह आन्दोलन खुद को टिकाए रख सका है. आज के दौर में तमाम सवाल प्रगतिशील आन्दोलन के समक्ष मुंह बाए खड़े हैं. सांस्कृतिक प्रतिरोध् के कौन से रूप हो सकते हैं? संस्कृति या कला के राजनीतिकरण की दिशा क्या हो सकती है? किस तरह की संस्थाएं हम बना सकते हैं? क्या प्रतिरोधी सांस्कृतिक कर्म का जनांदोलनों से रिश्ता वैसा है जैसा कि कभी रहा था या जैसी आज की परिस्थिति की मांग है?  क्या साहित्य, कला, संगीत, सिनेमा, नाटक या फिर बौद्धिक विमर्शों के क्षेत्र में काम कर रहे लोग व्यवस्था-विरोधी आंदोलनों की चेतना को बड़े पैमाने पर अभिव्यक्त कर पा रहे हैं? देश के गरीबों का एक बहुत बड़ा तबका अपनी-अपनी जाति के बड़े लोगों के पीछे अपने सांस्कृतिक-वैचारिक पिछड़ेपन के कारण घिसट रहा है। जाहिर है यह स्थिति गरीबों  को सचेतन वर्ग के रूप में राजनीतिक रूप से गोलबंद होने से रोकती है। क्या हमारा संस्कृतिकर्म उन वैचारिक और सांस्कृतिक जंजीरों से उन्हें मुक्त करने में कोई भूमिका निभा रहा है जिनमें जकड़े हुए वे अपने ही शोषकों को मजबूत करने को अभिशप्त हैं?जिनके पास संघर्षों के अनुभव हैं उनके पास अभिव्यक्ति के साधन नहीं और जिनके पास अभिव्यक्ति के साधन और कौशल है उनके पास उन अनुभवों का आत्मीय परिचय नहीं। क्या औपनिवेशिक समय से ही मौजूद इस खाईं को हमारा साहित्य पाट पाया है?क्या लेखकों के विचारधारात्मक रूपान्तरण, अंतर्वस्तु और रूप के द्वंद्वात्मक संबंध् तथा संप्रेषण की
समस्या को हमने सुलझा लिया है? यह समस्या कहीं और पेचीदा तो नहीं हो चली है ?

क्या साहित्य और संस्कृति के समाजशास्त्र,उसकी राजनीति और सामाजिकता, संस्कृति विमर्श के समकालीन संदर्भ, साम्राज्यवाद के सांस्कृतिक हमले के दौर में जनभाषाओं की चुनौतियों, साहित्य में वर्ग की अवधरणा को आज के सन्दर्भ में हम परिपक्व सैद्धांतिक स्तर पर सूत्रबद्ध कर पाए हैं? क्या स्त्री , दलित, आदिवासी, अल्पसंख्यक समूहों की अस्मिता के साहित्य के वर्गसार को हम वैचारिक स्तर पर विश्लेषित कर उन्हें गरीब तबकों के संघर्षों की वर्गसचेतन अभिव्यक्ति की दिशा में प्रेरित कर सके हैं? क्या हमने फौरी कार्यभारों के अलावा नागरिक समाज की तमाम संस्थाओं में हस्तक्षेप की किसी दूरगामी योजना के लिए कोइ होमवर्क किया है? इन सवालों पर गंभीरता से सोचें तो कार्यभार हमारे सामने खुद ब खुद स्पष्ट होता चला जाएगा.

यह आन्दोलन इतने उतार -चढ़ाव देख चुका है कि न तो कोई भ्रम इतना बड़ा हो सकता है कि हमें अपनी कमजोरियों से गाफिल कर दे और ना ही कोइ नाउम्मीदी ऐसी हो सकती है जो हमें चुनौतियों से ही विमुख कर दे. बकौल फैज़,

‘यूँ ही हमेशा उलझती रही है ज़ुल्म से ख़ल्क़
न उनकी रस्म नई है, न अपनी रीत नई
यूँ ही हमेशा खिलाये हैं हमने आग में फूल
न उनकी हार नई है न अपनी जीत नई’

Pranay Krishna, Photo By Vijay Kumarप्रणय कृष्‍ण। इलाहाबाद युनिवर्सिटी और जेएनयू से अध्‍ययन। प्रखर हिंदी आलोचक। जन संस्‍कृति मंच के महासचिव।  देवीशंकर अवस्‍थी सम्‍मान  से सम्मानित ।

(यह लेख प्रगतिशील आंदोलन के ७५ साल होने पर ‘पब्लिक एजेंडा’ पत्रिका द्वारा चलाई गई लेखमाला के अंतर्गत प्रकाशित हुआ था. लेखमाला में पहला लेख श्री विश्वनाथ त्रिपाठी का, दूसरा श्री मुरली मनोहर प्रसाद सिंह तथा तीसरा श्री प्रणय कृष्ण का लेख था. यह तीसरा लेख यहाँ दिया जा रहा है)

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