Archive for the tag “प्रगतिशील लेखक संघ”

प्रगतिशील आंदोलन के ७५ साल: प्रणय कृष्ण

By प्रणय कृष्ण

स्व.सुरेंद्र चौधरी ने लिखा था,” स्वतंत्रता  और  मुक्ति की इच्छा की जो  लड़ाई सदी भर से चली आ रही थी, उसका एक सुफल भारतीय मानस को यह प्राप्त हुआ था कि उसने अपनी अजेय शक्ति को पहचानने की दिशा में एक कदम और आगे बढ़ाया  था. किसान-मज़दूर और मध्यवर्ग  का विशाल मोर्चा  तैयार हो रहा था……… प्रगतिशील लेखक संघ का विशाल राष्ट्रीय मोर्चा उसी का एक नाभिक था.  ऐसा विशाल मोर्चा सन 1946 के बाद फिर कभी न बना.”(“स्वाधीनता संग्राम और हिंदी साहित्य”(1994) शीर्षक लेख, इतिहासः संयोग और सार्थकता, पृ 128-132)

courtesy: sahmatThose who attendedthe formation conference of the Progressive Writers’ Association in Lucknow.

courtesy: sahmatThose who attendedthe formation conference of the Progressive Writers’ Association in Lucknow.

आज प्रगतिशील लेखक संघ के 75वे साल में उस परिघटना को याद करना आज की परिस्थिति में वैसे विशाल मोर्चे को तैयार करने के कार्यभार के प्रति फिर से समर्पित होना है. यह तब के मुकाबले आज  और भी मुश्किल कार्यभार है. लेकिन इतिहास जब भी कोई चुनौती फेंकता है, मानवेच्छा स्वभावत: उसे स्वीकार करती है. प्रगतिशील लेखक संघ जिस खमीर से पैदा हुआ था , उसका दायरा देश-काल में उस नाम के संगठन से बहुत बडा था. सज्जाद ज़हीर के1936 में बनाए गए संगठन का मह्त्व यह था कि वह पहला महान प्रयास था जिसने इस पूरे दायरे की रचनात्मक-क्रांतिकारी सम्भावना को चरितार्थ करने का सपना दिखाया और उसे हकीकत में बदलने की पुरज़ोर कोशिश की. आज अगर एकाधिक संगठन (प्रलेस,जलेस,जसम और दूसरे भी कई संगठन ) इस दिशा में सक्रिय हैं तो यह उस स्वप्न की विराटता का ही सबूत है, उसके अपूर्ण कार्यभार  का भी और उसके आत्मसंघर्ष का भी. यों ही नहीं है कि जब साहित्य में आधुनिकतावाद और व्यक्ति-स्वातंत्र्य के दबदबे के दौर में त्रिलोचन, केदार,नागार्जुन जैसे बड़े कवि उपेक्षित और अलक्षित किए गए, तो सत्तर के दशक में नक्सलबाड़ी और निरंकुशता विरोधी आन्दोलनों के उभार ने इन्हें फिर केंद्र में ला बिठाया. उनका केंद्र में आना नए जनांदोलनों की चेतनागत ज़रुरत थी. ‘इप्टा’ के स्वर्णिम युग के बाद जन नाट्य मंच, बादल सरकार के तीसरे थियेटर और बिहार के किसान संघर्षों के इलाकों में युवानीति जैसे समूहों ने जगह खाली न रहने दी. जब फिल्मों में बलराज साहनी , ए.के. हंगल, ख्वाजा अहमद अब्बास की पीढी के बाद कमर्शियल सिनेमा की तूती बोल रही थी, तब १९८० के दशक में अचानक ही निहलानी, बेनेगल से लेकर सईद मिर्ज़ा तक न्यू वेव सिनेमा के उन्नायकों की कतार सामने आ गयी. यदि आज चित्रकला की दुनिया के चरम व्यावसायिकता के दौर में हमारे कुछ साथी चित्त प्रसाद, सोमनाथ होड़ और जैन-उल-आबेदीन की विरासत की नए सिरे से आवाज़ दे रहे हैं , तो यह अकारण नहीं है.

पाकिस्तान में तो न केवल कम्युनिस्ट पार्टियां प्रतिबंधित हुईं , बल्कि तरक्कीपसंद तहरीक का हर तरीके से दमन किया गया. बावजूद इसके फैज़ और जालिब जैसे शायर जनता की अंतरात्मा की आवाज़ बन गए. अदब ने वहां वो किया , जो राजनीति नहीं कर सकी. इस्लाम की रामनामी ओढ़ तानाशाह जब जनता को गुमराह कर रहे थे, तो जनता को सजग करने वाले ये कवि ही थे-

ख़तरा है जरदारों को
गिरती हुई दीवारों को
सदियों के बीमारों को
ख़तरे में इस्लाम नहीं

सारी जमीं को घेरे हुए हैं आख़िर चंद घराने क्यों

नाम नबी का लेने वाले उल्फ़त से बेगाने क्यों

ख़तरा है खूंखारों को
रंग बिरंगी कारों को
अमरीका के प्यारों को
ख़तरे में इस्लाम नहीं
(हबीब जालिब )

कहने का मतलब यह कि प्रगतिशील आन्दोलन महज इतिहास नहीं , बल्कि एक जीती-जागती परम्परा है जिसकी ज़रुरत आज के हमारे समाज को और भी ज़्यादा है.

सच कहा जाए तो प्रगतिशील लेखक संघ संगठन से ज़्यादा आन्दोलन था. उसने सामाजिक यथार्थ, इतिहास-दृष्टि और मेहनतकश समुदाय के नेतृत्व में मानव  मुक्ति की विचारधारा को  पूरे उपहादीप के साँस्कृतिक परिवेश का अपरिहार्य और जीवंत अंग बना दिया. देश बंटे, पार्टिया बंटी, लेकिन  यह साँस्कृतिक समझ और उसकी क्रियागत परिणति नाम-रूप बदल-बदल कर अपने वजूद का प्रमाण देती रही. जनता के साथ कंधे से कंधा मिलाकर  लडने वाले कलाकार और लेखक, जनांदोलनो से अपने व्यक्तित्व और कृतित्व को समृद्ध करनेवाले बौद्दिक और यहाँ तक कि जेल जाने से लेकर लडते हुए शहीद हो जानेवाले संस्कृतिकर्मियो की लम्बी कतार  देश की आज़ादी और तक्सीम के बाद भी यदि जारी रही,तो यह इसी आंदोलन की उपलब्धि है, नाम गिनाने की ज़रूरत नहीं.  सबसे बड़ी बात कि इस आन्दोलन के साथ चलनेवालों नें उच्चतम इंसानी मूल्यों की प्रतिष्ठा की, साधारणता में महानता को लक्षित किया, समकालीन और कालजयी की दूरी पाट दी, सभ्यता के जंगलों की परिक्रमा की, अपने रचनाकार व्यक्तित्व में नए के जन्म की प्रसव पीड़ा भोगी-

” आगे-आगे माँ
पीछे मैं;
उसकी दृढ़ पीठ ज़रा सी झुक
चुन लेती डंठल पल भर रुक
वह जीर्ण-नील-वस्त्रा
है अस्थि-दृढ़ा
गतिमती व्यक्तिमत्ता
कर रहा अध्ययन मैं उसकी मज़बूती का
उसके जीवन से लगे हुए
वर्षा-गर्मी-सर्दी और क्षुधा-तृषा के वर्षों से
मैं पूछ रहा –
टोकरी-विवर में पक्षी-स्वर
कलरव क्यों है
माँ कहती –
‘सूखी टहनी की अग्नि क्षमता
ही गाती है पक्षी स्वर में
वह बंद आग है खुलने को।’
(एक अंतर्कथा-२, मुक्तिबोध)

इस पत्रिका के पिछले दो अंको में हमारे दो सम्मानित अग्रजो ने विस्तार से बताया है कि कैसे इस आंदोलन की व्याप्ति साहित्य, सिनेमा, थियेटर,चित्रकला और यहाँ तक कि आज़ाद उपमहाद्वीप के इतिहास-लेखन, मानविकी, दर्शन और सामाजिक विग्यानो तक रही. उन्हें दोहराने की ज़रुरत नहीं.

आज़ादी के बाद जनवादी क्रान्ति के लक्ष्यों की पेचीदगी से वास्तविक सामना हुआ. प्रगतिशील आन्दोलन ने अपनी सामंतवाद और साम्राज्यवाद-विरोधी भूमिका के निर्वाह में अनेक अंतर्विरोधों का सामना किया, तीसरी दुनिया के देशों ,खासतौर पर एफ्रो-एशियाई देशों के लेखकों के अंतर्राष्ट्रीय मोर्चे से जुड़ा, प्रतिक्रया की ताकतों से शीत-युद्ध के दौर में जूझा, उप-महाद्वीप की जनवादी सांस्कृतिक परम्परा का नव-संधान किया,भारतीयता के साम्राज्यवादी-औपनिवेशिक भाष्य पर करारा पलट-वार किया (याद करें रामविलास शर्मा का कृतिव).

किन्तु शीत-युद्ध के बाद की स्थितियां काफी बदली हुई हैं. दुनिया का शक्ति-संतुलन बदला हुआ है. नई साम्राज्यवादी विश्व-व्यवस्था ने विकल्पहीनता के मिथक को गढा, लेकिन उसे तत्काल ही लैटिन अमरीकी मुल्कों से चुनौती मिली. विश्व-पूंजी के मुनाफे दी दर घटते जाने से वह और खूंखार होकर अल्पविकसित और विकास-शील देशों की गरीब जनता पर टूट पडी है. इन देशों के हुक्मरानों ने कारपोरेट हितों में जनता की एकता को तोड़ने के हज़ार हथकंडे अपना लिए हैं. पस्तहिम्मत लोगों की नयी सोच है-‘ इफ यू कांट बीट देम, ज्वायन देम’. लेकिन फिर भी हम भारत में ही देख सकते हैं कि सैकड़ों छोटे-बड़े आन्दोलन फूट पड़े हैं. आदिवासी और किसान बगैर किसी संगठित बैनर के भी व्यवस्था से, कारपोरेट लुटेरों से टकरा जा रहे हैं. लड़ने के तरीके सही हों या गलत,जिनकी जान पर बन आई है, वे सही विकल्प और नेतृत्व का इंतज़ार कहाँ तक करें? क्या ज़रूरी नहीं हो गया है कि प्रगतिशील सांस्कृतिक आन्दोलन उस बौद्धिक, सांस्कृतिक आबोहवा का निर्माण करे जिससे इन तमाम आन्दोलनों का दम न घुटे और वे सही विकल्प की दिशा में अग्रसर हो सकें?

हम नहीं कहते कि इस आन्दोलन में अंतर्विरोध नहीं रहे या नहीं हैं, यह भी नहीं कहते कि वह कभी गतिरुद्ध नहीं हुआ. आन्दोलन ने गलतियां भी कीं और उनसे सीखा भी और कई बार सीख के भुला भी दिया. मुगालते भी पाले और झटके भी खाए. संकीर्णता और उदारतावाद के आत्मघाती दौर भी आए. लेकिन कोइ ज़रुरत तो है इतिहास और समाज की जिसके चलते यह आन्दोलन खुद को टिकाए रख सका है. आज के दौर में तमाम सवाल प्रगतिशील आन्दोलन के समक्ष मुंह बाए खड़े हैं. सांस्कृतिक प्रतिरोध् के कौन से रूप हो सकते हैं? संस्कृति या कला के राजनीतिकरण की दिशा क्या हो सकती है? किस तरह की संस्थाएं हम बना सकते हैं? क्या प्रतिरोधी सांस्कृतिक कर्म का जनांदोलनों से रिश्ता वैसा है जैसा कि कभी रहा था या जैसी आज की परिस्थिति की मांग है?  क्या साहित्य, कला, संगीत, सिनेमा, नाटक या फिर बौद्धिक विमर्शों के क्षेत्र में काम कर रहे लोग व्यवस्था-विरोधी आंदोलनों की चेतना को बड़े पैमाने पर अभिव्यक्त कर पा रहे हैं? देश के गरीबों का एक बहुत बड़ा तबका अपनी-अपनी जाति के बड़े लोगों के पीछे अपने सांस्कृतिक-वैचारिक पिछड़ेपन के कारण घिसट रहा है। जाहिर है यह स्थिति गरीबों  को सचेतन वर्ग के रूप में राजनीतिक रूप से गोलबंद होने से रोकती है। क्या हमारा संस्कृतिकर्म उन वैचारिक और सांस्कृतिक जंजीरों से उन्हें मुक्त करने में कोई भूमिका निभा रहा है जिनमें जकड़े हुए वे अपने ही शोषकों को मजबूत करने को अभिशप्त हैं?जिनके पास संघर्षों के अनुभव हैं उनके पास अभिव्यक्ति के साधन नहीं और जिनके पास अभिव्यक्ति के साधन और कौशल है उनके पास उन अनुभवों का आत्मीय परिचय नहीं। क्या औपनिवेशिक समय से ही मौजूद इस खाईं को हमारा साहित्य पाट पाया है?क्या लेखकों के विचारधारात्मक रूपान्तरण, अंतर्वस्तु और रूप के द्वंद्वात्मक संबंध् तथा संप्रेषण की
समस्या को हमने सुलझा लिया है? यह समस्या कहीं और पेचीदा तो नहीं हो चली है ?

क्या साहित्य और संस्कृति के समाजशास्त्र,उसकी राजनीति और सामाजिकता, संस्कृति विमर्श के समकालीन संदर्भ, साम्राज्यवाद के सांस्कृतिक हमले के दौर में जनभाषाओं की चुनौतियों, साहित्य में वर्ग की अवधरणा को आज के सन्दर्भ में हम परिपक्व सैद्धांतिक स्तर पर सूत्रबद्ध कर पाए हैं? क्या स्त्री , दलित, आदिवासी, अल्पसंख्यक समूहों की अस्मिता के साहित्य के वर्गसार को हम वैचारिक स्तर पर विश्लेषित कर उन्हें गरीब तबकों के संघर्षों की वर्गसचेतन अभिव्यक्ति की दिशा में प्रेरित कर सके हैं? क्या हमने फौरी कार्यभारों के अलावा नागरिक समाज की तमाम संस्थाओं में हस्तक्षेप की किसी दूरगामी योजना के लिए कोइ होमवर्क किया है? इन सवालों पर गंभीरता से सोचें तो कार्यभार हमारे सामने खुद ब खुद स्पष्ट होता चला जाएगा.

यह आन्दोलन इतने उतार -चढ़ाव देख चुका है कि न तो कोई भ्रम इतना बड़ा हो सकता है कि हमें अपनी कमजोरियों से गाफिल कर दे और ना ही कोइ नाउम्मीदी ऐसी हो सकती है जो हमें चुनौतियों से ही विमुख कर दे. बकौल फैज़,

‘यूँ ही हमेशा उलझती रही है ज़ुल्म से ख़ल्क़
न उनकी रस्म नई है, न अपनी रीत नई
यूँ ही हमेशा खिलाये हैं हमने आग में फूल
न उनकी हार नई है न अपनी जीत नई’

Pranay Krishna, Photo By Vijay Kumarप्रणय कृष्‍ण। इलाहाबाद युनिवर्सिटी और जेएनयू से अध्‍ययन। प्रखर हिंदी आलोचक। जन संस्‍कृति मंच के महासचिव।  देवीशंकर अवस्‍थी सम्‍मान  से सम्मानित ।

(यह लेख प्रगतिशील आंदोलन के ७५ साल होने पर ‘पब्लिक एजेंडा’ पत्रिका द्वारा चलाई गई लेखमाला के अंतर्गत प्रकाशित हुआ था. लेखमाला में पहला लेख श्री विश्वनाथ त्रिपाठी का, दूसरा श्री मुरली मनोहर प्रसाद सिंह तथा तीसरा श्री प्रणय कृष्ण का लेख था. यह तीसरा लेख यहाँ दिया जा रहा है)

Advertisements

Post Navigation

%d bloggers like this: