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हंस में ‘घुसपैठिये’ के दो साल: पीयूष राज

‘घुसपैठिये’ स्तंभ की कहानियाँ न तो भाव-शिल्प की जटिलता में फंसती हैं और न ही इनके सरलीकरण में. उनके समाज में जितने तरह के अन्तर्विरोध हैं, उन्हें ये रचनाएँ सहजता से उनके स्वाभाविक रूप में पूरी डिटेलिंग के साथ रखती हैं. यही कारण है कि भाव और भाषा का दुहराव इनके यहाँ नहीं है. यहाँ भले ही इन कहानियों के कुछ उद्धरणों को उदाहरण के रूप में दिया गया है, लेकिन इन कहानियों की एक विशेषता यह भी है कि इनको पूरा पढ़कर ही इसके समग्र प्रभाव को समझा जा सकता है. # लेखक 

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प्यास और पानी, सौजन्य: अंकुर

‘घुसपैठिये’ के दो साल 

By पीयूष राज

हंस में ‘घुसपैठिये’ नामक स्तम्भ के दो साल पूरे हो गए हैं. इस स्तंभ में मजदूर बस्तियों में रहने वाले किशोर उम्र के बच्चों की कहानियाँ छप रही हैं. इन ‘अभी-अभी जवान हुए या हो रहे’ बच्चों की किसी खास तरह की साहित्यिक या वैचारिक ट्रेनिंग नहीं है. इनकी कहानियाँ देखे और भोगे गए जीवनानुभव की रचनात्मक अभिव्यक्ति हैं. लगभग 60 के दशक से ही ‘भोगे हुए यथार्थ’ के नाम पर लिखी गई रचनाओं को कभी किसी साहित्यिक आन्दोलन या किसी अस्मितावादी साहित्यिक आन्दोलन के नाम पर हिन्दी साहित्य में सराहना मिलती रही है. 80 के दशक के बाद तो ‘अनुभव या अनुभूति  की प्रामाणिकता’ अस्मितामूलक साहित्य का पर्याय बन गई. आलोचना की हर तरह की धारा ने इन अस्मितामूलक साहित्य को अब स्वीकार कर लिया है. इन विमर्शों की रचनाओं के साहित्यिक मूल्यांकन हेतु नए तरह के सौंदर्यशास्त्र और सौन्दर्यबोध को गढ़ने का आग्रह किया जाता है खासकर रचनात्मक उत्कृष्टता के सन्दर्भ में. अगर किसी को शिल्प या भाव के दृष्टिकोण से इन विमर्शों की रचनाएँ कमजोर लगती हैं तो यह तर्क दिया जाता है कि अभी-अभी तो इन्होंने लिखना शुरू किया है, अब तक ये हाशिये के लोग कहानियों में पात्र ही रहे हैं, अभी तक तो कोई और इनकी कहानी लिख रहा था, अब इन्होंने अपनी कहानी अपनी जुबानी लिखना शुरू किया है तो इनसे भाव और शिल्प की प्रगाढ़ता एवं विविधता की बहुत अधिक उम्मीद ठीक नहीं है आदि-आदि. मेरा सवाल यह है कि क्या ‘घुसपैठिये’ स्तम्भ के कहानीकारों के सन्दर्भ में इनमें से कई बातें लागू नहीं होती हैं? ‘घुसपैठिये’ की कहानियों के भाव और शिल्प पर मैं आगे अपने विचार रखूँगा. लेकिन क्या जो मानदण्ड विमर्शों को हिन्दी साहित्य या साहित्य में स्थान देने के लिए अपनाए गए हैं क्या वो ‘घुसपैठिये’ पर लागू नहीं होता? क्या कारण है कि विमर्श के नाम पर किसी भी तरह की रचना की वाहवाही करने वाले आलोचक इन कहानियों पर कुछ नहीं बोल रहे?

‘हंस’ जैसी प्रसिद्ध हिन्दी पत्रिका जिसे मेरी जानकारी के अनुसार हिन्दी साहित्य के साधारण पाठक से लेकर वरिष्ठ आलोचक तक पढ़ते हैं. ऐसी स्थिति में ‘घुसपैठिये’ पर हिन्दी समाज की चुप्पी आश्चर्य का विषय है. ऐसा इसीलिए भी है कि ‘हंस’ द्वारा इससे पहले इस तरह के किए गए प्रयासों को हिन्दी समाज और हिन्दी आलोचकों ने हाथों-हाथ लिया है. कामगार बस्तियों के इन किशोर रचनाकारों की रचनाओं पर चर्चा के लिए मैंने अन्य विमर्शों का जिक्र इसीलिए किया क्योंकि ‘घुसपैठिये’ की हिन्दी आलोचना द्वारा उपेक्षा उसके दोहरे मानदण्ड की परिचायक है. अन्य विमर्शों के तहत एक ही तरह की भाव और भाषा में लिखी जाने वाली रचनाओं की ‘स्वानुभूति’ के नाम पर जरूरत से अधिक प्रशंसा और ठीक उसी वक्त में भाव और भाषा की विविधता से परिपूर्ण अपनी स्वानुभूति को रचनात्मक अभिव्यक्ति देती रचनाओं पर दो शब्द तक नहीं कहना उपर्युक्त बात की पुष्टि के लिए पर्याप्त है. आखिर ‘साहित्य के आरक्षित डब्बों में घुस आए’ इन घुसपैठियों से किन्हें खतरा है? मेरा साफ-साफ़ मानना है कि विमर्श और समकालीनता के नाम पर एक ही तरह की भावबोध वाली रचनाओं को इनसे खतरा है. ऐसा नहीं है कि विमर्श के नामपर लिखी लिखी जा रही सभी रचनाओं में कोई विविधता नहीं है. लेकिन अधिकांश रचनाएँ एक ही तरह की हैं. इसका कारण यह दिया जाता है कि इन रचनाकारों की सामाजिक-सांस्कृतिक पृष्ठभूमि एक ही तरह की है इसीलिए इनकी रचनाओं में भाव और शिल्प की समानता देखने को मिलती है. अब अगर ‘घुसपैठिये’ के रचनाकारों की के सन्दर्भ में देखें तो इनकी भी सामाजिक-सांस्कृतिक-आर्थिक पृष्ठभूमि एक ही है. यहाँ तक कि ये रचनाकार कमोबेश एक ही उम्र के हैं. लेकिन इनकी रचनाओं में अनुभव को अभिव्यक्त करने का तरीका बिल्कुल भिन्न है. भाव और भाषा दोनों स्तरों पर. इसका कारण यह है कि वे एक साथ इन कामगार बस्तियों के जीवन के भोक्ता भी हैं और दर्शक भी. भोक्ता इस अर्थ में कि वे इन कामगार बस्तियों में रहते हैं और दर्शक इस अर्थ में कि वे स्वयं श्रमिक नहीं हैं. श्रमिक उनके माता-पिता या सम्बन्धी हैं. इस कारण वे इस जीवन में लिप्त रहने के बावजूद रचना करते समय एक तटस्थ दृष्टिकोण रखने में सफल हैं. उनकी रचनाओं में विविधता का मूल स्रोत यही तटस्थ दृष्टिकोण है.

इनकी रचनाओं के बारे में यह बिल्कुल सही मूल्यांकन है कि ‘साहित्य के उत्पादक और उपभोक्ता, अभिलेखन/रिकॉर्डिंग और सृजन, किस्सा और तथ्य के बीच के अंतर यहाँ धुंधले पड़ जाते हैं.’ इनका जीवनानुभव कृत्रिम, बनावटी या अतिशयोक्तिपूर्ण नहीं है. शोषित-पीड़ित होते हुए इनकी रचना का लक्ष्य आत्मपीड़ा का प्रकाशन नहीं है. ऐसा नहीं है कि जीवन की विसंगतियां और बिडम्बना इनकी रचनाओं में नहीं है लेकिन वे रचना करने से पहले ऐसा पूर्व निश्चय करके नहीं चलते कि उन्हें इस पहलू को हरहाल में उजागर करना है. उनका जीवन ही ऐसा है कि उनके इस जीवन की विसंगतियाँ और बिडम्बनाएं स्वतः ही उनकी रचनाओं का हिस्सा बन जाती हैं. ऐसा इसलिए भी है कि उनका जीवन घटनापूर्ण है. कामगार बस्तियों में रहने वाले लोगों के दैनिक जीवन में ही तेजी से घटनाएँ घटती हैं. सुबह उठकर दैनिक क्रियाकर्म से ही इन घटनाओं की शुरुआत हो जाती है-

‘सुबह के साढ़े पाँच बजे, जब अँधेरा भूरा होने लगता है और सपाट आसमान में हल्के नीले बादल दरारें बनाकर उभरने लगते हैं तब अंसारी जी के मोहल्ले में सब कुछ रोज़ाना वाली एक-सी धुन में शुरू हो जाता है। घुर्र-घुर्र करती पानी की मोटरों से घरों की दीवारें और ज़मीन झन्नाटें लेने लगती हैं। चबूतरों पर पानी की बाल्टियाँ उड़ेल दी जाती हैं, नहीं तो पाइप से छूटती ताजे पानी की दूधिया धार सारा आँगन भिगोती हुई गली में उतर आती हैं और सींक वाली झाडुओं का ज़बरदस्त संगीत एक साथ नहीं तो एक के बाद एक सुनाई देने लगता। इस बीच अंसारी जी उबासियाँ लेते हुए अपने पुराने, जर्जर मकान की बालकनी पर खड़े होकर मोहल्ले भर को निहारते हैं।’ (अंसारी जी )

मध्यवर्ग और उच्चवर्ग का जीवन इतना अधिक घटनापूर्ण नहीं होता. यह वर्ग  अपने जीवन में घटनाओं को अंजाम देने की कोशिश करता है जबकि कामगार बस्तियों में घटनाएँ ही श्रमिक-जीवन को संचालित करती हैं. इसी कारण ‘घुसपैठिये’ के रचनाकारों की एक बड़ी विशेषता है- छोटी-छोटी घटनाओं की भी सूक्ष्मता से विस्तृत वर्णन. घटनाएँ इतनी तेजी से घटित होती हैं कि साधारण किस्म के अभिलेखन से इसे रचनात्मक तौर पर सम्भालना नामुमकिन है. इसके संतुलन के लिए ये अपनी कहानियों के लिए फैंटसी, डायरी-लेखन या रिपोर्ताज की शैली अपनाते हैं. कामगार-बस्तियों की जीवन शैली अपने-आप में व्यवस्था की आलोचना है. जब इस जीवन शैली को फैंटसी, डायरी-लेखन या रिपोर्ताज शैली में ये रचनाकार अभिव्यक्त करते हैं तो उसमें व्यवस्था की आलोचना समाहित होती है. रचना की शैली कुछ भी हो पर व्यंग्य का सटीक प्रयोग इनके यहाँ व्यवस्था की विद्रूपता के लिए देखा जा सकता है. उदाहरण के लिए इन कहानियों के कुछ कथनों को देखिए– “ अरे तूने मुझे कहाँ पाला है? मुझे तो अमेरिकन कुत्ते ने पाला था और उस एहसान का कर्ज मैं अभी तक चुका रहा हूँ.’ तिहाई लाल ने पूछा ने पूछा ‘कैसे’? ‘अरे क्या तुझे याद नहीं जब तेरे अमेरिकन कुत्ते की नई-नई शादी हुई थी तो वह मेरी लूँगी चुराकर भाग गया था. बदले में मैंने उसकी बीबी की पाँच रुपये वाली साड़ी फाड़ दी थी, बाद में पता चला कि वह पाँच रुपये की नहीं पाँच हजार की थी. उस साड़ी का कर्ज मैं अभी तक चुका रहा हूँ.”  (‘नींबू-पानी पैसा’)

–“अरे छोड़, जो कभी रामभक्त नहीं बना वो देशभक्त कैसे बनेगा?” (‘नींबू-पानी पैसा’)

–“‘सरकारी नौकर हैं’ कहकर ख़ुद को देश की सेवा में लगा बताते हैं और अंसारी जी पाँच बजे तक की ड्यूटी पूरी लगन से निपटाकर दो बजे ही लौट आते हैं.” (सुबह वाकई बेनकाब थी उर्फ अंसारी जी)

उपर्युक्त उद्धरणों से स्पष्ट है कि व्यवस्था और समाज की विसंगतियों को इतनी सूक्ष्मता से ये रखते हैं कि पाठक को कहीं से ये ऊपर से लादा हुआ या किसी वैचारिक बोझ से लदा हुआ नहीं लगता है. ऐसा आजकल की रचनाओं में बहुत कम देखने को मिलता है.

फैंटसी या कल्पना की सहायता से अभी तक ‘अँधेरे’ का प्रयोग व्यवस्था की सच्चाई को बयान करने के लिए किया जाता रहा है. लेकिन ‘घुसपैठिये’ के रचनाकारों ने ‘अंधेरे’ को सकारात्मक रूप में दिखाया है. इसका कारण यह है कि वर्किंग क्लास की इच्छाएँ-आकांक्षाएँ दिनभर के काम के बाद अंधेरे में ही आकार लेती हैं-

‘रोजान की आदत से सभी जग तो रहे थे लेकिन अंधेरा होने की वजह से सभी आँख बंद करके दोबारा से सो जाते थे, अरे अभी अंधेरा है, एक नींद और मार लेते हैं। आज तो सभी की मम्मियाँ और घरवालियाँ अगड़ाइयाँ लेकर सो रही थीं। बच्चों के तो मजे आ गए थे। सावदा मे पढ़ाने वाले टीचर ने जब सावदा मे इंट्री लिया तो पता चला कि यहाँ तो अभी रात है, सभी ने अपनी-अपनी घड़ी पर नजर गड़ाया और देखा कि उनका टाइम तो सही है पर चौकीदार अभी तक सोया पड़ा है। सावदा से जाने वाली बसें लाईट जलाए खड़ी हैं। भटटू के पापा ने अपनी बीबी को जगाया, ‘अरे भगवान, अब तो जग जाइए, सुबह हो गई है।’ ‘अरे कैसी बात करते हैं, आप भी सो जाइए रात काफी बची है। आपको नींद क्यों नहीं आ रही है।’ ‘आप को रात लग रही है बाहर के लोग सावदा में आने लगे हैं।’

बाहर के लोग भी यहाँ आकर चक्कर मे फंस गए हैं, अरे सावदा को क्या हो गया है? सावदा के बच्चे अभी अपने घरो में सोये हुए पड़े हैं। रोज ड्यूटी जाने वाले लोग भी बेखबर सोये पड़े हैं।’ (अंधेरा)

यहाँ अंधेरा इसलिए खास है क्योंकि यही इनके जीवन का ऐसा पल है, जहाँ ये थोड़े बेफिक्र हो पाते हैं. भागदौड़ भरी जिंदगी जहाँ ठहर जाती है और इन्हें लगता है कि काश ‘इस रात की कोई सुबह न हो’।

दिन की शुरुआत उनके लिए युद्ध जैसी होती है. जहाँ पानी जैसी चीज के लिए ‘जलविद्रोह’ होता है और वैसी ‘दोस्ती’ जिसे धार्मिक-आस्था नहीं तोड़ पाती उसे पानी की धार तोड़ देती है.

“बन्नो बाजी को पाइप खोले पानी भरते देख उन दोनों को मानो चपेट पड़ गया। दोनों आंटियां बन्नो बाजी पर बरस पड़ी। अपनी बहन को दो जंगली कुत्तियों की भांति आंटियों के बीच अकेले जूझते देख बन्नो बाज़ी की दो बहनें पीछे रह सकती थीं क्या? वह भी तीनों के बीच घुस गईं। ये वही तीन हमशक्ल बहनें हैं जिनका ज़िक्र मैंने पहले किया था और जो कुछ मैंने कहा था काफ़ी हद तक इन बहनों ने उसे साकार कर दिखाया। इन तीनों बहनों ने मिलकर उन दोनों आंटियों को बैकफुट पर धकेल दिया। इसी के साथ बहुत सी औरतें इन पांचों की मौजूदगी के कारण अपने ख़ाली डिब्बे लिए लौट रही थीं।”

आस्था और जेंडर-सम्बन्धी प्रश्न किसी भी समाज के मूलभूत प्रश्न हैं. ‘घुसपैठिये’ की कहानियाँ बहुत ही बारीकी से आस्था और जेंडर के प्रश्नों को उठाती है. ‘रात और दिन’ और ‘नींबू-पानी पैसा’ जैसी कहानियाँ आस्था की जड़ों को हिलाने वाली हैं. दूसरी ओर ‘सुबह वाकई बेनकाब थी उर्फ अंसारी जी’, ‘लड़की की डायरी’, ‘पहचान’, ‘वंश’ जैसी कहानियाँ जेंडर-सम्बन्धों के अन्तर्विरोधों को बारीकी से रखती हैं.

‘सुबह वाकई बेनकाब थी उर्फ अंसारी जी’ के इन दो उद्धरणों में वर्किंग क्लास के भीतर जेंडर की समझ के पहलू को पकड़ा जा सकता है.

‘अम्मी, अब्बू अच्छा शौहर कहाँ से लायेंगे? ये अच्छा शौहर क्या होता है?’

‘नहीं मिलेगा अच्छा शौहर! क्योंकि तुम्हारे अब्बू उसे पहचानते ही नहीं है इसलिए तुम सिर्फ़ तरकारी काटो, तुम्हें ही अच्छी बेगम बनना पड़ेगा।’ कहकर शबनम फिर से चूल्हा जलाने लगी, पर अंदर से जैसे भभक उठी थी। (अंसारी जी)

अपनी हँसी को विराम और गले को आराम देकर उन्होंने कुछ दम भरते हुए कहा, ‘हाँ, हाँ, ज़रूर! क्यों नहीं! अच्छा शौहर भी ले आयेंगे हम!’ सुनकर मासूमा ने अगला सवाल किया, ‘पर अब्बू, पहले बताइये कि अच्छा शौहर होता क्या है?’ मासूमा की आँखों में जिज्ञासा साफ़ नज़र आ रही थी। अब्बू ने उसकी कलाई पकड़कर पास खिसकाते हुए उसे बोले, ‘अच्छा शौहर वह होता है जो हमारी मासूमा को बेइंतहा मोहब्बत करे। उसकी सारी ख्वाहिशें पूरी करे। उसका अपने से भी ज़्यादा ध्यान रखे और हमेशा उसे खुश रखे।’ जवाब सुनकर खामोश मासूमा जैसे अब्बू की आँखों में कुछ टटोलने लगी पर अंसारी जी तो इस बेहद सच्चे जवाब के साथ ख़ुद को ख़ाली कर चुके थे। ज्ञान और धर्म की कोई अनमोल बात किसी को बताते हुए जैसा आनंद कोई गुरू महसूस करता है कुछ वैसे ही फक्र का अहसास अंसारी जी के चेहरे पर नज़र आ रहा था। मासूमा एकटक अपने अब्बू की आँखों में झाँक रही थी कि तभी उसने फिर से अब्बू को पुकारा और कहा, ‘अब्बूजान क्या आप भी एक अच्छे शौहर हैं?’ सवाल सुनकर अंसारी जी के मुँह से निकलने वाली ‘हाँ’ अंदर ही कहीं घुट कर रह गई और स्तब्ध से मासूमा को देखते रहे। चाहकर भी अपना जवाब बुनने के लिए शब्द नहीं खोज पाए। (अंसारी जी)

एक तरफ मासूमा की माँ शबनम का खुद के अनुभव के आधार पर कहना है कि क्योंकि अंसारी जी खुद अच्छे शौहर नहीं है तो वह उसके लिए कैसे अच्छा शौहर ढूंढ पाएंगे. यह अनुभव अधिकतर औरतों का है. लेकिन जब यही सवाल मासूमा ने अंसारी जी से किया तब वे असहज हो गए. अंसारी जी अभी तक स्त्री-पुरुष संबंध को सिर्फ पति-पत्नी के संबंध के रूप में ही देखते आए थे, जहाँ उन्हें कुछ भी करने की स्वतन्त्रता थी. लेकिन जब संदर्भ उनकी बेटी का आया तब उन्हें इस संबंध में औरत की पीड़ा का अंदाजा हुआ. अंसारी जी के माध्यम से यह पाठकों को भी इस संबंध में सोचने को विवश करता है.

‘अच्छा शौहर कैसा होता है?’ या ‘क्या आप अच्छे शौहर हैं?’ या ‘वो बेटा है या बेटी?’ या ‘अगर बेटा है तो क्यों है और बेटी है तो क्यों है?’ या ‘दोनों में फर्क क्या है?’ या ‘कपड़े अलग क्यों हैं?’ या ‘खेल अलग क्यों हैं?’ जैसे कौतूहलपूर्ण प्रश्नों से ये कहानियाँ, किसी आम पाठक को भी जेंडर सम्बन्धित सम्बन्धों पर सोचने को विवश कर देती हैं. इसका मूल कारण है कि इन रचनाओं में ये प्रश्न बहुत ही सहज और स्वाभाविक रूप से आए हैं और पाठक के भीतर भी उसी सहजता से पैठ जाते हैं.

उदारीकरण, बाजारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण के समाज पर पड़े प्रभावों खासकर ‘वर्किंग क्लास’ पर पड़े प्रभावों के बारे में अभी तक जितना भी साहित्य में लिखा गया है वो ज्यादातर बाहर से साफ़-साफ़ दिखने वाले प्रभावों के बारे में है. इस परिप्रेक्ष्य में ‘घुसपैठिये’ की रचनाएँ व्यक्ति नहीं समाज की मानसिक अवस्था को रचनात्मक अभिव्यक्ति देती हैं. ‘निरुमा’ और ‘माल की महफिल’ जैसी कहानियों में  वर्किंग क्लास सामाजिक मनोदशा को जितने बेहतर ढंग से रखा गया है वो उदारीकरण को केन्द्र में रखकर लिखी जा रही समकालीन रचनाओं में दुर्लभ है. इस सामाजिक मनोदशा के साथ सबसे खास तथ्य यह है कि नई पीढ़ी की का मानसिक विकास किस दिशा में हो रहा है, इसके बारे में ये कहानियाँ संकेत देती हैं. ‘वंश’ , ‘पहचान’, ‘एक लड़की की डायरी’, ‘मुस्कान’ जैसी कहानियाँ जहाँ बच्चों और किशोरों के भीतर जेंडर संबंधी समझ के अंतरविरोधों को बड़ी बारीकी से पेश करती हैं. इन कहानियों में सिर्फ उन बच्चों या किशोरों के मन में चलने वाले अंतरविरोधों को एकांगी रूप से नहीं वर्णित किया गया है बल्कि इस मानसिक टकराहट को सामाजिक अंतरविरोधों के बरक्स रखने का प्रयास इन कहानियों में है, जो  जेंडर संबंधी एक भिन्न किस्म के संघर्ष की स्थिति को पैदा करता है.

इसके अलावा ‘घुसपैठिये’ की कहानियाँ इस उदारीकरण के दौर में दम तोड़ते सहज मानवीय संबंधों के बीच नए तरह के मानवीय संबंधों की भी खोज करते हैं. इसका मुख्य कारण यह है कि इसके रचनाकार अभी किशोर हैं जो अपने आसपास खत्म होते मानवीय संबंधों को देख रहे हैं. ‘जन्मदिन’, ‘ख्याली मूर्ति’, ‘लंहगा’, ‘मातारानी’ जैसी कहानियाँ तेजी से सिमटती जा रही दुनिया के भीतर भावनाओं के एक नए संसार की तलाश हैं. पीड़ा, दुःख, गरीबी और शोषण इस दुनिया में भी है लेकिन इससे जूझने और मानवीय संबंधों को हर-हाल में बचाने की जीवटता भी है.

‘घुसपैठिये’ स्तंभ की कहानियाँ न तो भाव-शिल्प की जटिलता में फंसती हैं और न ही इनके सरलीकरण में. उनके समाज में जितने तरह के अन्तर्विरोध हैं, उन्हें ये रचनाएँ सहजता से उनके स्वाभाविक रूप में पूरी डिटेलिंग के साथ रखती हैं. यही कारण है कि भाव और भाषा का दुहराव इनके यहाँ नहीं है. यहाँ भले ही इन कहानियों के कुछ उद्धरणों को उदाहरण के रूप में दिया गया है, लेकिन इन कहानियों की एक विशेषता यह भी है कि इनको पूरा पढ़कर ही इसके समग्र प्रभाव को समझा जा सकता है. इस प्रभाव की थोड़ी-बहुत तुलना ‘औदात्य’ की परिभाषा से भी की जा सकती है. यानी कब रचना आपको अपने प्रभाव में ले लेती है आपको इसका भान नहीं होता. इस स्तंभ के सभी रचनाकारों का अपना कलेवर है. यह भिन्नता कामगार बस्तियों के जीवन के विविध पहलुओं को ही हिन्दी समाज के सामने रखने का एक सफल माध्यम है. ये अपनी बात ऐसी भाषा में कह रहे हैं जो निःसंदेह इनके बारे में एक बार सोचने को मजबूर करता है.

पीयूष राज. भारतीय भाषा केंद्र, जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय से पीएचडी. फिलहाल फर्स्टपोस्ट हिंदी में पोस्टेड हैं. उनसे , मोबाइल नंबर -09868030533 , ईमेल आईडी – piyushraj2007@gmail.com पर संपर्क सम्भव है.

साभार: हंस, अप्रैल, 2017

 

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पढ़ने वाले की आँख निकल कर पेपर पर गिर पड़ती है: पीयूष राज

‘वह भी कोई देश है महाराज’ की समीक्षा लिखते हुए स्तंभकार, पटकथा लेखक और अभिनेता मयंक तिवारी कहते हैं कि अनिल यादव का लिखते रहना हिंदी में एक नयी जान फूंक सकता है. बीबीसी के वरिष्ठ पत्रकार राजेश जोशी का भी यही मानना है. ज्ञानरंजन तो लगभग फतवे के अंदाज में कहते हैं कि अनिल किसी बने-बनाये पथ के अनुगामी नहीं हैं और उनका मन  इस किताब (वह भी कोई देश है महाराज) को तरह-तरह से प्रचारित करवाना-करना चाहते हैं. यह किताब सचमुच में  हिंदी की पैठ को गैर-हिंदी और साहित्येत्तर इलाकों में करवाती है. इसके क्या कारण हो सकते हैं? पीयूष राज ने सुरेन्द्र चौधरी के बहाने सच ही कहा है कि ‘इस किताब में व्यक्त यथार्थ बिल्कुल भिन्न तरह का  है , जो सत्ता और जनता के अंतर्विरोध के साथ-साथ जनता के आपसी अंतर्विरोधों की प्रस्तुति करता है . प्रख्यात आलोचक  सुरेन्द्र चौधरी के शब्दों में यह ‘समकालीन यथार्थवाद’ है ‘ यह पुस्तक सत्य और असत्य, पक्ष और विपक्ष जैसे पहले से अवस्थित रूढ़ प्रारूपों के कहीं बीच रास्ते  बनाती हुयी  निकल जाती है. 
सूचना है कि अनिल यादव इन दिनों एक उपन्यास लिखने में व्यस्त हैं, तिरछिस्पेल्लिंग की तरफ से उन्हें शुभकामनायें, और पाठकों के अधीर होने से पहले पूरा करने की गुजारिश भी है. 

'वह भी कोई देश है महाराज' के आवरण पृष्ठ

‘वह भी कोई देश है महाराज’ के आवरण पृष्ठ

मधुमक्खियों के डंक झर तो नहीं जाते

(‘वह भी कोई देश है महाराज’ की समीक्षा )

By पीयूष राज 

क्या आप साहित्यिक विमर्शों से चट चुके हैं ? वैचारिक आग्रहों के बोझ से लदे चमत्कारपूर्ण वाक्य-विन्यासों से आपका सिर दर्द हो रहा है? और हर रोज बाज़ार आ रही नई-नई किताबों की तूफान में भी आपका दम घुट रहा है ? ऐसी स्थिति में अनिल यादव की किताब ‘वह भी कोई देश है महाराज’ ऑक्सीजन की सिलेंडर की तरह तुरंत राहत प्रदान करेगी . ऐसा इसलिए नहीं कि यह पुस्तक किसी पुरानी साहित्यिक जमीन को तोड़ती है और कुछ असाधारण रच देने का भाव लिए हुए है . बल्कि यह साधारणत्व के सौन्दर्य का पुनः सृजन है . इस किताब का अनूठापन इसी में छिपा है . लेखक के कथनानुसार यह यात्रा-वृतांत है (अगर इस तथ्य को उजागर नहीं किया जाए तो यह पुस्तक किसी लम्बी कहानी या उपन्यास की तरह है) और पूर्वोत्तर भारत पर केंद्रित है . यह यात्रा लेखक ने पुस्तक रचना के क़रीब दस साल पूर्व छः महीने की अवधि में की थी .पुस्तक पढ़कर ही यह समझा जा सकता है कि छः महीने के अनुभवों को समेटने में दस वर्ष का अन्तराल क्यों है . मुक्तिबोध के शब्दों में कहा जाए तो यह अन्तराल ‘संवेदनात्मक ज्ञान’ के ‘ज्ञानात्मक संवेदना’ में परिणत होने में लगा अन्तराल है .यह पुस्तक भावों के ठोस और पके रूप का सुन्दर उदाहरण है . इसके बिना यह पुस्तक पूर्वोत्तर की  कोई सामान्य सी यात्रा-वृत्तान्त  होती, बिल्कुल आज कल  अखबारों और पत्रिकाओं में छपने वाले यात्रा-वृत्तांतों की तरह जो  रूमानियत भरी अखबारी  रिपोर्टिंग से अधिक नहीं होती . अपने देखे-सुने और अनुभव किये भावों अर्थात् ‘संवेदनात्मक ज्ञान’ को रचनात्मक रूप देना एक कठिन कार्य होता है और पुस्तक के लेखक ने दस वर्षों में इस कार्य को सफलतापूर्वक अंजाम दिया. लेखक की पूर्वोत्तर यात्रा का सीधा उद्देश्य वहाँ की रिपोर्टिंग करके अपने पत्रकार कैरियर की बेरोजगारी समाप्त करना था. लेकिन बहुधा ऐसा होता है कि अपने पूर्व ज्ञान के आधार पर आपने जो सोच रखा था या किसी खास भौतिक परिस्थिति के बारे में आपकी जो बनी बनायी धारणा थी , आप उससे भिन्न परिस्थितियों का सामना करते हैं . संचित और शास्त्रीय सत्य  से ‘आँखिन देखी’ सत्य  के कारण उत्पन्न ज्ञान-भंग एक रचनात्मक तटस्थता का निर्माण करती है . इसके कारण अवलोकन का प्रस्थान बिंदु पूर्व निर्मित चेतना, विचार या विचारधारा की जगह भौतिक परिस्थिति हो जाती है. पूर्वोत्तर की यात्रा में लेखक के साथ भी यही रचनात्मक प्रक्रिया घटित हुई . इस पुस्तक में पूर्वोत्तर का इतिहास, संस्कृति, राजनीति, भूगोल, पर्यावरण सब कुछ समाहित है लेकिन ये किसी विषय की तरह अपने उपस्थित होने का आभास तक नहीं देते. पुस्तक को पढ़ते समय आपने कब लेखक के साथ-साथ राजनीति से इतिहास और इतिहास से लोककथाओं , मिथकों  से गुजरते हुए पूरे पूर्वोत्तर भौगोलिक-सांस्कृतिक और राजनीतिक यात्रा कर ली , इसका भान भी नहीं होता. किसी  त्रिविमीय फिल्म (थ्री डी मूवी) की तरह यहाँ पाठक भी यात्रा का सहभागी महसूस करता है .

           दरअसल  यह  पुस्तक का बहुकोणीय चित्रों की एक श्रृंखला का निर्माण करती है. हर चित्र अपने आप में संपूर्ण भी है और इसमें क्रमबद्धता भी है. उदाहरण के लिए पूर्वोत्तर के विभिन्न राज्यों और जगहों के वर्णन में उनकी अपनी अलग पहचान भी  है और एक अंतः संचरित एकता भी . यह पहचान और एकता पूर्वोत्तर के अपने विशिष्ट अंतर्विरोधों के कारण हैं . सामान्यतः यह माना जाता है कि पूर्वोत्तर के राज्यों का भारतीय शासन व्यवस्था से मुख्य अंतर्विरोध है . ‘पेट्रोल , डीजल , गैस , कोयला ,चाय देने वाले पूर्वोत्तर को हमारी सरकार बदले में वर्दीधारी फौजों की टुकड़ियाँ भेजती रही हैं’. इस तथ्य से किसी को इंकार नहीं है , परन्तु पूर्वोत्तर भारत का यह एक मात्र सत्य या अंतर्विरोध नहीं है . वहाँ की जनजातियों के आपसी अंतर्विरोध और भी गहरे हैं . एक जगह जो समुदाय शोषित-पीड़ित दिखता है दूसरी जगह वही  शोषक भी है . इस यथार्थ की खूबसूरत प्रस्तुति लेखक की रचनात्मक तटस्थता के कारण संभव हो पाई है. यह यथार्थवाद बिल्कुल भिन्न तरह का यथार्थवाद है , जो सत्ता और जनता के अंतर्विरोध के साथ-साथ जनता के आपसी अंतर्विरोधों की प्रस्तुति करता है .प्रख्यात आलोचक  सुरेन्द्र चौधरी के शब्दों में यह ‘समकालीन यथार्थवाद’ है . इस तरह के यथार्थ को रचनात्मक रूप देना लेखकीय तटस्थता से ही संभव है . विचारजन्य आत्मीयता की जगह परिस्थितिजन्य आत्मीयता से लेखक ने पूरे पूर्वोत्तर के दर्द को इतिहास, संस्कृति और भूगोल के माध्यम से पाठक के सामने मूर्त रूप दिया है . पूर्वोत्तर की बदलती संस्कृति ,नए-पुराने , भीतरी-बाहरी इस सब द्वंद्वों को पाठक भी महसूस करता है  .इस प्रक्रिया में  रस के सभी स्थायी भाव पाठक के ह्रदय में उद्बुद्ध होते हैं . उत्साह , क्रोध, जुगुप्सा , रति , विस्मय ,भय ,शोक , शांत जैसी भावनाओं का  निरंतर गतिशील प्रवाह पाठक के भीतर चलायमान रहता है . ऐसा वर्णन के लिए आत्मीय भाषा के प्रयोग से ही संभव हो सका है . एक पौराणिक कथावाचक या सूत्रधार की तरह लेखक आपके सामने प्रकट होता है और कथा का पात्र होते हुए भी परिदृश्य से गायब हो जाता है . शब्दों के माध्यम से लेखक पाठक का सीधा साक्षात्कार पूर्वोत्तर से करता है . पाठक को ऐसा भान होता है कि लेखक नहीं बल्कि वह स्वयं यात्रा पर है .

     इस पुस्तक की एक अन्य खासियत यह है कि बहुत दिनों बाद सामान्य बातचीत की भाषा की शक्ति का उपयोग साहित्यिक भाषा में किया गया है . उदाहरण के लिए ब्रहम्पुत्र मेल बाहरी आवरण के वर्णन को पढ़ने से उत्पन्न जुगुप्सा के बाद शायद ही आप उस ट्रेन से यात्रा करना पसंद करें –‘अँधेरे डिब्बों की टूटी खिड़कियों पर उल्टियों से बनी धारियाँ झिलमिला रही थीं जो सूख कर पपड़ी हो गईं थीं.’ लेखक द्वारा गौ मांस खाने का वर्णन भी अद्भुत है .यहाँ परम्परा-संस्कार टूटने की भावना को संवेदनपूर्ण शब्द प्रदान किया गया है . मनुष्य-मनुष्य के द्वंद्व को ही नहीं बल्कि प्रकृति और मनुष्य के द्वंद्व को भी लेखक ने उसी आत्मीयता से शब्द दिए हैं . माजुली, नामदाफ, चेरापूंजी और लोकटक को बिगाड़ने, बचाने और संवारने की कवायद की निरर्थकता को यह पुस्तक बहुत ही सामान्य भाषा में बयान करती है .इस पुस्तक की भाषा के बारे में अगर एक पंक्ति में कुछ कहना हो तो इसी पुस्तक का एक वाक्य सटीक है कि ‘पढ़ने वाले की आंख निकल कर पेपर पर गिर पड़ती है.’

यह पुस्तक राजनीति, इतिहास, वर्तमान ,भूगोल, परम्परा, संस्कृति , मिथक, लोकगाथा आदि का साहित्यिक अन्तर्गुम्फन है .पुस्तक पढ़ते समय आप कब कहाँ हैं , निश्चय नहीं कर पाएँगे . ‘सजल वैशाख’ के विस्मय से शुरू हुई यात्रा ‘रबर के बागानों की मधुमक्खियों के डंकों’ के विस्मय पर समाप्त  होती है , परन्तु विस्मय का अंत नहीं होता क्योंकि पूर्वोत्तर के बारे में हमारे संचित ज्ञान भंडार को यह पुस्तक विस्मृत कर देती है . इसके बाद पाठक सिर्फ यही कह सकता है –‘मारिए वह भी कोई देश है महाराज !’

पीयूष राज

पीयूष राज

पीयूष राज भारतीय भाषा केंद्र, जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय के युवा शोधार्थी हैं, छात्र राजनीति से गहरे रूप से जुड़े हैं और छात्रसंघ के पदाधिकारी रह चुके हैं. उनसे , मोबाइल नंबर -09868030533 , ईमेल आईडी – piyushraj2007@ग्मैल.com पर संपर्क सम्भव है.   

 

पुस्तक परिचय – वह भी कोई देश है महाराज , लेखक- अनिल यादव , अंतिका प्रकाशन , गाजियाबाद , मूल्य-सजिल्द संस्करण 295/-

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