Archive for the tag “नए शेखर की जीवनी”

एक और जिंदगी ‘सिर्फ तुम’ की प्रिया गिल जैसी: अविनाश मिश्र

आभासी पटल (सोशल साइट्स) के बाहर ‘कुंठित मन’ की ‘निर्लज्ज अभिव्यक्तियाँ’ कितनी अमानवीय होती हैं, वह जानी-पहचानी है. अविनाश के पास ‘कूटनीति’ की भाषा नहीं है, जिसका सबसे सजग इस्तेमाल आभासी लोक-वृत्त के दायरे में किया जाता है. जिस दिन उसके पास यह आ जायेगी, वह ख़त्म हो जाएगा.  यह आभासी-व्यवहार और कुछ नहीं, बल्कि हाल-चाल, दुआ-सलाम की भाषा को पाने का ही करतब है. यह भाषा आदमी को दलाल, अवसरवादी, व्यवसायी बना सकती है लेकिन रचनाकार नहीं. यह ‘सर्वधर्म-समभाव’ की सबसे उपजाऊ जमीन है. जहाँ भाषा गूगल-ट्रांसलेट हो जाती है.

अविनाश मिश्र इस समय का रचनात्मक, खतरनाक और ‘आत्मघाती’ स्फुटन है. तमाम आपत्तियों और बदनामियों के बावजूद उसे पसंद किया जाता है. तिरछीस्पेल्लिंग पर अविनाश की  ‘नए शेखर की जीवनी’ की  पहली  प्रस्तुति  और दूसरी  प्रस्तुति  आप पढ़ चुके हैं, यह तीसरी प्रस्तुति है. 

the-king-of-habana-2015

स्नैपशॉट- द किंग ऑफ़  हवाना  (2015)

By अविनाश मिश्र

नए शेखर की जीवनी

घर मैंने छोड़ दिया

कोई मूल्यवान चीज

मैंने नहीं छोड़ी

@धूमिल

 

एक नए नगर में बहुत सारी जगहों का कोई इतिहास नहीं है.वे धीरे-धीरे अपना इतिहास अर्जित कर रही हैं. नई जिंदगियों के लिए इतिहास को झेलना बहुत मुश्किल है, क्योंकि इतिहास में सब कुछ हो सकता है —सच्चाई भी—लेकिन जिंदगी नहीं.

शेखर इतिहास गंवा चुका है. अब वह चाहता है केवल इतनी अस्मिता कि एक नए नगर में बस सके.

नए नगर बेहद संभावनाशील प्रतीत होते हैं. उनकी सरहदों में घुसते ही उम्मीद और यकीन की नई इबारतें खुलती हैं. वहां भाषा की सबसे ज्यादा जरूरत होती है. वहां सजगता की सबसे ज्यादा जरूरत होती है. वहां जागरूकता की सबसे ज्यादा जरूरत होती है. वहां लोगों की सबसे ज्यादा जरूरत होती है. वहां सबसे कम जरूरत उस चीज की होती है जिसे शेखर गंवा चुका है. फिर भी वह वहां अर्जित करेगा, वह सब कुछ जो वह गंवा चुका है.

*

शेखर अब एक नए नगर में है. इस नए नगर में एक कमरा है. एक झाड़ू है. एक बिस्तर है. एक स्त्री है. इस एकवचन में बहुवचन हैं इस स्त्री की आंखें.

ये आंखें शेखर को बहुत उम्मीद से देखती हैं. वह नहीं चाहता कि यह उम्मीद कोई शक्ल ले. लेकिन लापरवाहियां शेखर के शिल्प में हैं. इसलिए ही ये आंखें उम्मीद से हो गईं.

शेखर के बाबा तब मरे जब मुल्क में आपातकाल था और शेखर के जनक तब, जब मुल्क में यह जांचा जा रहा था कि कौन कितनी देर खड़ा रह सकता है.

 शेखर के बाबा नारे लगाते हुए मरे और जनक पुराने बंद हो चुके चंद नोट किनारे लगाते हुए.

 लेकिन शेखर अभी मरना नहीं चाहता—न अपने बाबा की तरह, न अपने बाप की तरह.

अभी तो एक और जिंदगी उसकी प्रतीक्षा में है. अभी तो आस-पास का सब कुछ इस जिंदगी का स्वप्न है. इस इंतजार को वह खोना नहीं चाहता. इस इंतजार में सुख है.

शेखर उत्सुकता को अपराध की सीमा तक बुरा मानताहै.

बीत चुकी स्थानीयताओं में यानी अपने बचपन के नगर में जब भी वह किसी ऑटो में बैठा, उसे यही गीत सुनने को मिला :

मेरी आंखों में जले तेरे ख्वाबों के दिए 

कितनी बेचैन हूं मैं यार से मिलने के लिए’

एक और जिंदगी ‘सिर्फ तुम’ की प्रिया गिल जैसी होगी. जब भी कोई उससे पूछेगा कि क्या चाहती हो? वह कहेगी : ‘सिर्फ शेखर.’

अभी तो जो जिंदगी है उसमें प्रशंसा का पहला वाक्य आत्मीय लगता है, लेकिन प्रशंसा के तीसरे वाक्य में प्रशंसा का तर्क भी हो तब भी उससे बचने का मन करता है, क्योंकि प्रशंसा के दूसरे वाक्य से ही ऊब होने लगती है.

अभी तो जो जिंदगी है वह शेखर से कहती है कि वह उसके भाई जैसा है और यह सुनते ही वह समझ जाता है कि इस जिंदगी के फायदे दूसरे हैं. ये जिंदगी भी पुरुषों की तरह क्रूर, कुटिल, अवसरवादी, धूर्त और धोखेबाज है.

शेखर चाहता है कि जिन जिंदगियों से उसके रक्त के रिश्ते नहीं, वे उसे उसके सही नाम से पुकारें—शेखर…

इतनी जिंदगियों पर इतने अत्याचार देखे हैं और इतनी अत्याचारी जिंदगियां देखी हैं कि अपने जीवित होने से घृणा हो गई है शेखर को. लेकिन फिर भी जब कोई जिंदगी शेखर को शेखर पुकारती है, उसे लगता है कि वह क्रूरता से कोमलता की ओर, कुटिलता से सहृदयता की ओर, अवसरवादिता से ईमानदारी की ओर, धूर्तता से समझदारी की ओर और धोखेबाजी से विश्वसनीयता की ओर एक जरूरी कदम बढ़ा चुकी है.

इस जिंदगी से शेखर पूछता है कि कहां जाऊं जो बर्बरता के स्रोत पीछा न करें?

जिंदगी : जनपथ से राइट लो.

 शेखर : अगर दिल्ली विश्वविद्यालय से केंद्रीय सचिवालय जाऊं तो मेट्रो बदलनी तो नहीं पड़ेगी न?

 जिंदगी : बहुत विद्वतापूर्ण बातों का वक्त बीत गया.

 शेखर : मुझे लगता नहीं कि मैं दूर तक जा पाऊंगा. 

इस जिंदगी में जिसे देखो वही पूछता है कि कहां क्या मिल रहा है?

कोई नहीं पूछता :

‘कहां जाऊं

और दे दूं

खुद को.’

इस जिंदगी में खुद को दे देने के लिए शेखर बहुत जल्दी में रहता है. वह जल्दी-जल्दी चलता है, खाता है, पीता है. उसे लगता है कि कहीं कुछ छूट रहा है जो पीछे नहीं आगे है. वह उसे पकड़ने के लिए जल्दी में रहता है.

वह जानता है कि एक दिन लोग कहेंगे :‘अगर शेखर ने जल्दी न की होती, तब वह पहुंच गया होता.’

*

यह जिंदगी तब की पैदाइश है, जब लोग अपना जन्मदिन इतना नहीं मनाते थे. जब अंग्रेजी इतनी नहीं बोली जाती थी. जब लोगों की आंखें भरी और कान खाली रहते थे और उन्हें धीरे से भी पुकारो तो वे सुन लेते थे. तब तकनीक थोड़ी कम थी और निरर्थकता भी.

शेखर बहुत पहले का नहीं है, लेकिन न जाने क्यों उसे लगता है कि पहले सब कुछ ठीक था और आगे सब कुछ ठीक हो जाएगा.

शेखर पागल थोड़ा नहीं है, अर्थात् बहुत है.

लेकिन शेखर केवल ताली बजाने के लिए नहीं बना है, उसने रची है अपने ही हाथों से यह दुनिया भी और इस दुनिया में एकसौगजकाप्लॉटभी—दिल्लीसेकुछहटकर.

इस प्लॉट को एक आवास की शक्ल देने के सिलसिले में वह बेचैन रहता है. लेकिन आर्थिक आपातकाल ने एक आवास के स्वप्न को खुले आवासीय यथार्थ में बदल दिया.

जम्बो सर्कस हो या गैंग रेप या अवैध कोकीन बरामद हो, ट्रक-मर्सिडीज भिड़ंत हो या पप्पू खंजर की गिरफ्तारी… सब कुछ अब शेखर के इस सौ गज के प्लॉट के आस-पास ही होता है.

शेखर के जनक की मृत्यु और शेखर का खुद जनक होना नवंबर’16 की उन तारीखों में हुआ जब पूरा मुल्क कतारों में खड़ा था.

सारी कतारें शेखर के सौ गज के प्लॉट पर आकर खत्म होने लगीं. सारी बातें वह घसीट कर सौ गज के दायरे में ले आने लगा.

सीमेंट, मोरम, रेत, गिट्टियां, ईंट, मार्बल, सरिया, लोहा, लकड़ी, मिट्टी… वह संवाद के सारे मुद्दों को इनमें मिक्स करने लगा.

मय्यतों और सत्संगों में भी वह इस प्लॉट का जिक्र छेड़ बैठता.उसे पुश्तैनियत में कुछ नहीं मिला पपीते के एक पेड़ और आपातकाल की कुछ बुरी यादों के सिवाय. इसलिए वह जानता था करोड़ों-करोड़ बेघरों के बीच में एक सौ गज के प्लॉट के मायने. करोड़ों-करोड़ कीड़ों-मकौड़ों को रौंदने के बाद एक इतनी बड़ी जगह पर काबिज होकर,वह थोड़ा खुश होना चाहता था.

वह अपने नवजात शिशु से इस प्लॉट से संबंधित अभूतपूर्व योजनाओं पर चर्चा किया करता. वह अपने शिशु को समझाता कि असंतुष्टियों के असीमित और अर्थवंचित आयामों से बच कर चलना मेरे बच्चे.

शेखर ने प्रवचनों में सुना था :

सब कुछ माया है…

यह वाक्य दिन-ब-दिन अब और चमकीला होता जा रहा है.

आने वाले वक्त में जब शेखर का नवजात शिशु कुछ बड़ा होगा, सब तरफ बेइंतिहा चमक होगी. लेकिन सब कुछ ठीक-ठीक देख पाना वैसे ही असंभव होगा जैसे कि आज इस अंधेरे में जहां शेखर रहता है—एक अधूरे सौ गज के प्लॉट पर, एक और जिंदगी के इंतजार में…

***

 

शाश्वत अराजकता और विचारधारा की नग्नता: अविनाश मिश्र

आभासी पटल (सोशल साइट्स) के बाहर ‘कुंठित मन’ की ‘निर्लज्ज अभिव्यक्तियाँ’ कितनी अमानवीय होती हैं, वह जानी-पहचानी है. अविनाश के पास ‘कूटनीति’ की भाषा नहीं है, जिसका सबसे सजग इस्तेमाल आभासी लोक-वृत्त के दायरे में किया जाता है. जिस दिन उसके पास यह आ जायेगी, वह ख़त्म हो जाएगा.  यह आभासी-व्यवहार और कुछ नहीं, बल्कि हाल-चाल, दुआ-सलाम की भाषा को पाने का ही करतब है. यह भाषा आदमी को दलाल, अवसरवादी, व्यवसायी बना सकती है लेकिन रचनाकार नहीं. यह ‘सर्वधर्म-समभाव’ की सबसे उपजाऊ जमीन है. जहाँ भाषा गूगल-ट्रांसलेट हो जाती है.

अविनाश मिश्र इस समय का रचनात्मक, खतरनाक और ‘आत्मघाती’ स्फुटन है. तमाम आपत्तियों और बदनामियों के बावजूद उसे पसंद किया जाता है. वह रेयर है. तिरछीस्पेल्लिंग पर अविनाश की  ‘नए शेखर की जीवनी’ की  पहली प्रस्तुति  आप पढ़ चुके हैं, यह दूसरी प्रस्तुति है.

स्नैपशॉट- टिम्बकटू (2014)

स्नैपशॉट- टिम्बकटू (2014)

नए शेखर की जीवनी

By अविनाश मिश्र

बहुत बार वह कहानियां सुनाने लगता है बहुत बार कविताएं बहुत बार बहुत तकलीफ होती है बहुत बार वह बहुत चुप रहता है बहुत बार बहुत तस्वीर-सा लगता है बहुत सीधी बहुत सरल एक बात बहुत सीधे बहुत सरल ढंग से नहीं कह पाता बहुत बार बहुत ढंग से उलझाने लगता है

नए शेखर के जीवन में नए रहस्य हैं और यह रहस्यों का दुर्भाग्य है कि वे शेखर के जीवन में हैं।

*

भय शेखर को नहीं सताता है। भय उसमें आबाद है। भय को हत्याएं पसंद हैं। लेकिन शेखर ने भय को पालतू बना लिया है। इससे शेखर ने एक ऐसी सजगता अर्जित की है जिसमें हत्या की आशंका प्रत्येक क्षण सक्रिय रहती है। फिलहाल भय शेखर के काबू में है। शेखर उसे शाकाहारी बना रहा है।

*

बी.ए. के बाद शेखर ने एम.ए. नहीं किया। इसलिए वह उसके साथ कैसे होता जो एम.ए. के बाद होता है। बड़े राजनीतिक बदलाव हुए समाज में, लेकिन उसने खुद को खबरों से दूर रखा। घुस गया अजायबघरों में और देखता रहा जंग लगी हुईं तलवारें। पुस्तकालयों से वह वैसे ही गुजरा जैसे वेश्यालयों से— एकदम बेदाग। उसने कुछ भी जानना नहीं चाहा। उसने कुछ भी बदलना नहीं चाहा। उसने नहीं किया मतदान। नहीं बनवाया आधार-कार्ड। स्मार्ट-फोन तक नहीं खरीदा उसने। किसी आग्रह की विषय-वस्तु में वह नहीं उलझा। जब तक प्यार ने उसे नहीं छोड़ा, तब तक उसने भी प्यार को नहीं छोड़ा। यूं साथ और सफर तवील हुआ। लेकिन बहुत कुछ आखिर नहीं हुआ, जैसे बी.ए. के बाद एम.ए. नहीं हुआ।

*

अराजकता को अंतत: शाश्वत होना था और ‘विचारधारा’ को नग्न और निर्मूल्य। इस दृश्य में वहां जाना था, जहां रंगों को किसी ध्वज में इस्तेमाल न किया जा सके।

लेकिन वह वहां से आया था जहां एक पार्क में खाकी रंग की नेकर और आधी बाजू की सफेद कमीज पहनकर गोल-गोल भागते हुए उसकी देह स्वेद से भीग जाती थी।

उन दिनों खेलों में इतना दुर्निवार आकर्षण था कि उनके लिए भविष्य तक ले जाने वाली कक्षाएं तक भंग की जा सकती थीं। पुस्तकें परीक्षाओं से कुछ क्षण पूर्व खोली जाती थीं। उनके पृष्ठों के आपसी सौहार्द को बहुत मृदुलता के साथ चाकू, ब्लेड या फुटे से अलग करना होता था।

चाकू, ब्लेड या फुटा दैनिक प्रयोग की वस्तुएं थीं। रस्सी, सीढ़ी, कुदाल, फावड़ा, कुल्हाड़ी, करनी, बल्लम, बसूला… दैनिक प्रयोग की वस्तुएं थीं। नाव, नदियों का पानी, धर्मस्थलों की सीढ़ियां और मशाल दैनिक प्रयोग की वस्तुएं थीं। जहालत और मुशायरे, फतवे और वुजू, फटी हुईं टोपियां, छोटे पायजामे, काले बुर्के, मोहम्मद रफी के नगमे और तंग, अंधेरी, बदबूदार गलियां, खत और खुदा हाफिज… दैनिक प्रयोग की वस्तुएं थीं।

इस सबके समानांतर विध्वंस था जहां घृणा के नैरंतर्य में रूपक भ्रष्ट हो गए थे और आग बराबर फैलती जा रही थी। वह आग को मनुष्यता के लिए अनिवार्य समझता था, लेकिन आग ने सारा सद्भाव और उसकी सारी संभावनाएं नष्ट कर दी थीं। मंगलेश डबराल की कविता में दर्ज एक बयान के मुताबिक :

पहले भी शायद मैं थोड़ा-थोड़ा मरता था

बचपन से ही धीरे-धीरे जीता और मरता था

जीवित रहने की अंतहीन खोज ही था जीवन

जब मुझे जलाकर पूरा मार दिया गया

तब तक मुझे आग के ऐसे इस्तेमाल के बारे में पता नहीं था

मैं रंगता था कपड़े ताने-बाने रेशे

टूटी-फूटी चीजों की मरम्मत करता था

गढ़ता था लकड़ी के हिंडोले और गरबा के रंगीन डांडिये

अल्युमिनियम के तारों से बच्चों के लिए छोटी-छोटी साइकिलें बनाता

इसके बदले में मुझे मिल जाती थी एक जोड़ी चप्पल एक तहमद

अपनी गरीबी में दिन भर उसे पहनता रात को ओढ़ लेता

आधा अपनी औरत को देता हुआ

 

मेरी औरत मुझसे पहले ही जला दी गई

वह मुझे बचाने के लिए मेरे आगे खड़ी हो गई थी

और मेरे बच्चों को मारा जाना तो पता ही नहीं चला

वे इतने छोटे थे उनकी कोई चीख भी सुनाई नहीं दी

मेरे हाथों में जो हुनर था पता नहीं उसका क्या हुआ

मेरे हाथों का ही पता नहीं क्या हुआ

वे अब सिर्फ जले हुए ढांचे हैं एक जली हुई देह पर चिपके हुए

उनमें जो हरकत थी वही थी उनकी कला

और मुझे इस तरह मारा गया

जैसे एक साथ बहुत से दूसरे लोग मारे जा रहे हों

मेरे जीवित होने का कोई बड़ा मकसद नहीं था

लेकिन मुझे इस तरह मारा गया

जैसे मुझे मारना कोई बड़ा मकसद हो

…जारी विध्वंस और नरसंहारों के एक अंतराल में वह उस पार्क में है जहां खाकी रंग की नेकर और आधी बाजू की सफेद कमीज पहनकर गोल-गोल भागते हुए उसकी देह स्वेद से भीग जाती थी। शुरुआत को एक अंतराल से देखकर विकास जांचा का सकता है।

वह इस पार्क से बाहर जाना चाहता है। यहां जन्मीं सारी कल्पनाओं, यहां देखे गए सारे स्वप्नों, यहां आए सारे विचारों से बाहर जाना चाहता है। इसके सारे रंगों और सारे रूपकों से बाहर जाना चाहता है। इस पार्क में ही खड़े होकर किसी पद के लिए किसी उम्मीदवार को चुनने की बजाए वह अपनी व्यस्कता का दैनिक प्रयोग डूबते हुए केसरिया सूरज को देखने में करना चाहता है…।

‘राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ’ का कॉडर कैसा होता है, यह शेखर जानता है।

शेखर के मत के बगैर भी चुनी जाती हैं सरकारें पूर्ण बहुमत से, यह शेखर जानता है।

*

शेखर के पास बड़े वाक्य नहीं हैं। बड़े वाक्यों से दुर्घटनाएं होती हैं। छोटे मुंह से निकले बड़े वाक्यों की असावधानी पकड़ में आ जाती है। जीवन बड़े वाक्यों से नहीं चलता। कभी-कभी वह बगैर वाक्यों के भी बहुत बेहतर ढंग से चलता है और कभी-कभी केवल प्रतीकों से ही बन जाते हैं रास्ते, जिन पर बगैर हांफे भर उम्र दौड़ता रहता है जीवन…।

‘‘शेखर जून की गर्मी में प्यासा भटक रहा है।’’

‘‘वह घर जाकर पानी पीना चाहता है।’’

‘‘बाद इसके पंखे की हवा में सुखाना चाहता है पसीना।’’

जीवन में ऐसे ही छोटे वाक्यों से राहत मिलती है। जैसे :

—‘‘मुझे पांच हजार रुपए की जरूरत है।’’

—‘‘मेरे पास नहीं हैं भाई।’’

—:-(

—‘‘लेकिन मैं कुछ इंतजाम करता हूं।’’

इस सच्चाई को ऐसे कहने से क्या फायदा :

‘‘जून की एक तपती दुपहरी में जब महानगर अपनी बैचेनियों से चिपचिपा रहा है और इस प्रतीक्षा में है कि धूप का रंग दिन पर से उतर जाए और सांझ कुछ अपने विवेक से काम ले वह उस घर में पहुंचकर जहां वह वर्षों से एकांतवास करता आ रहा है सुराही से उस पानी को पीना चाहता है जो वह सुबह भरकर गया था और जो अब तक इस तपिश में सूखने से बचा रहा आया वह पानी पीने के बाद और पंखा खोलने और उसकी हवा में अपना पसीना सुखाने से पहले समाचार सुनना चाहता है लेकिन अचानक उसे इलहाम होता है कि वह समाचार सुनते हुए भी पसीना सुखा सकता है और यह भी इलहाम ही है कि इतनी गर्मी में समाचार से सुनने से क्या होगा काश इस पंखे में तीन की जगह चार पर होते या चार हजार तो वह सारा पसीना अब तक सूख गया होता जिससे जल्द ही कोई निजात नहीं…’’

बड़े वाक्यों से केवल निराशा मिलती है। जैसे :

—‘‘मुझे बहुत जरूरत है भाई अगर आप मुझे पांच हजार रुपए उधार दे दें जो कि मुझे जैसे ही कहीं और से उधार मिलता है मैं बगैर देर किए आपको लौटा दूंगा क्योंकि मैं सदा आपका अभिन्न और विश्वसनीय बना रहना चाहता हूं ताकि जब भी मुझे कोई उलझन आ पड़े जो पांच हजार रुपए से ही सुलझेगी तो आप मुझे उधार दे सकें…’’

—”देखिए मैं आपको मना नहीं करता और दे देता आप मेरे बहुत अभिन्न और विश्वसनीय हैं लेकिन इस वक्त तो इतनी गर्मी पड़ रही है आप देख ही रहे हैं कि सारा व्यापार चौपट है क्या आप समाचार नहीं सुनते…’’

शेखर समाचार नहीं सुनता। शेखर के पास समाचार नहीं हैं। जीवन समाचारों से नहीं चलता। समाचारों से केवल दुर्घटनाएं चलती हैं। जीवन छोटे-छोटे वाक्यों से चलता है। जैसे :

‘‘शांत हो जाइए।’’

‘‘कहीं कुछ नहीं हुआ है।’’

‘‘यह एक अफवाह है।’’

‘‘यह शेखर ने फैलाई है।’’

शेखर पागल थोड़ा नहीं है, अर्थात् बहुत है।

*

संप्रभुओं के जघन्य अपराधों से भरे हुए ये वे क्षण हैं, जब भाषाएं संक्रमित हो रही हैं और क्षेत्रीयता क्षेत्र के बाहर भी इस कदर उपलब्ध है कि उसे देखकर उबकाई आती है। बोलियां रफ्ता-रफ्ता नष्ट हो रही हैं या अधिग्रहित, उन्हें बोलने वाले उन्हें बचा नहीं पा रहे हैं। ‘बचाना’ अतीत की एक क्रिया है और अतीत आराम चाहता है।

शेखर अब जो भी बोलता उसे उसका मूल्य चुकाना पड़ता है।

*

शेखर समाज को देखता है, उसे बदलता नहीं।

जो समाज को बदल रहे हैं, वे देख नहीं रहे हैं समाज को।

*

बहुत कम वक्त में शेखर ने बहुत महत्वपूर्ण कार्य किए। इनमें दो बार आत्महत्या की कोशिशों को भी गिना जाए। ये कोशिशें अगर कामयाब होतीं तो वक्त कुछ इस तरह का था कि इस कामयाबी का औचित्य सिद्ध किया जा सकता था।

प्रतिभावानों की नहीं, आज्ञाकारियों की जरूरत थी। इस दृश्य में वह इस कदर चुपचाप इस वक्त से गुजर जाना चाहता था कि किसी को कोई तकलीफ न हो। वह अधिक जानता था और अधिक जानकारी के लिए उसने कहीं संपर्क नहीं किया।

सारे रास्ते अगर योग्यताओं को ही मिल जाते तो मूर्खताएं कहां जातीं?

*

शेखर अकेलेपन के बारे में जो जानता है, वह महत्वपूर्ण नहीं है। महत्वपूर्ण है वह जो वह सामूहिकता के बारे में जानता है। जो सीढ़ियां वह वर्षों से चढ़ता-उतरता आया, उनके बारे में बताने को कुछ भी नहीं है उसके पास। वे सारे रास्ते काबिले-जिक्र हैं जो उससे छूट गए।

अधूरे बिंब ही फैले हुए हैं जीवन के गद्य में… कैसी सुंदर आयु होती अगर शब्दों की जरूरत न होती।

***

बेरोजगारी में स्त्रियां और नौकरी में क्रांति : अविनाश मिश्र

आभासी पटल (सोशल साइट्स) के बाहर ‘कुंठित मन’ की ‘निर्लज्ज अभिव्यक्तियाँ’ कितनी अमानवीय होती हैं, वह जानी-पहचानी है. अविनाश के पास ‘कूटनीति’ की भाषा नहीं है, जिसका सबसे सजग इस्तेमाल आभासी लोक-वृत्त के दायरे में किया जाता है. जिस दिन उसके पास यह आ जायेगी, वह ख़त्म हो जाएगा.  यह आभासी-व्यवहार और कुछ नहीं, बल्कि हाल-चाल, दुआ-सलाम की भाषा को पाने का ही करतब है. यह भाषा आदमी को दलाल, अवसरवादी, व्यवसायी बना सकती है लेकिन रचनाकार नहीं. यह ‘सर्वधर्म-समभाव’ की सबसे उपजाऊ जमीन है. जहाँ भाषा गूगल-ट्रांसलेट हो जाती है.

अविनाश मिश्र इस समय का सबसे रचनात्मक, खतरनाक और ‘आत्मघाती’ स्फुटन है. तमाम आपत्तियों और बदनामियों के बावजूद उसे पसंद किया जाता है. वह रेयर है. तिरछीस्पेल्लिंग पर अविनाश की यह पहली प्रस्तुति है.

A screen shot from Un Chien Andalou

A screen shot from Un Chien Andalou

नए शेखर की जीवनी

By अविनाश मिश्र

…कई कविताओं की राख से एक जीवन पैदा हुआ। जीवित रहने के लिए कविताएं जलानी पड़ती हैं। जीवन सारी योजनाओं के केंद्र में नजर आता है और कविताएं सारी योजनाओं से बाहर। जीवन को बनाया जाता है और कविताएं खुद बन जाती हैं। खुद बनना संसार में सम्मान का सबब है। लेकिन खुद बनना सारी योजनाओं से बाहर होना है।

***

एक अर्से से शेखर के अतीत में किसी ने रुचि नहीं ली। सब उसके भविष्य की योजनाएं जानना चाहते हैं। …और उसका वर्तमान, वह कुछ ऐसा है, जैसे आंखें बहुत वक्त तक अंधेरे में रहने के बाद जल्द ही उजाले की अभ्यस्त नहीं हो पातीं। नाजिम हिकमत की जुबां में :

उसे नहीं मालूम क्या है उसके भविष्य के भीतर

वह तो मैं ही जानता हूं उसका भविष्य

क्योंकि मैंने जिएं हैं वे सभी विश्वास जिन्हें जिएगा वह

मैं उन शहरों में रह चुका हूं जहां रहेगा वह

मैं उन औरतों से कर चुका हूं प्रेम जिनसे करेगा वह

मैं सो चुका हूं उन जेलों में जहां सोएगा वह

मैं झेल चुका हूं उसकी तमाम बीमारियां

उसकी तमाम नींदें सो चुका हूं

देख चुका हूं उसके तमाम स्वप्न

आखिरकार वह खो देगा वह सब कुछ

जो मैंने खोया है जीवन भर

***

‘भावनात्मक भूलें भविष्य को स्वर्णिम बनाएंगी’ यह यकीन शेखर के अद्यतन में अतीत हो गया है। भविष्य भावनाओं को रौंद देता है। गहरे आत्मान्वेषण के क्षण भी विदा होते हैं। अनियमितताएं नियमित हो जाती हैं। रातें अपनी कहलाती हैं, लेकिन उनका होना बेवक्त हो जाता है।

***

शेखर ने सीखा है कि प्रेम के तनाव अंतत: सुखद होते हैं। प्रेम में ‘नहीं’ से सही और कोई शब्द नहीं। जब कोई पूछे, ‘‘प्रेम करते हो या नहीं?’’ तब ‘नहीं’ से सही और कोई शब्द नहीं।

***

हे प्रभु !

बिल्लियों को आवारगी दो

और शेखर को वे रास्ते जो वे काट देती हैं।

***

जल कभी लौटता नहीं और यही उसके अस्तित्व का वैभव है।

***

नदी का सुख जल नहीं यात्रा है।

***

शेखर ‘कहीं नहीं’ गया। ‘कहीं नहीं’ जाना सही से जाना है। कई बार ‘कहीं नहीं’ जाना भर पर्याप्त होता है, मूर्खों के प्रति अपनी असीम घृणा अभिव्यक्त करने के लिए।

***

 

शेखर ने प्रेम के बहाने किए और रुका वहां, जहां रुकना चाहता था। अपने पैदल साथियों को छोड़कर वह कभी कार की तरफ नहीं लपका। रेलगाड़ियां उसे ले जाना चाहती थीं न जाने कहां, लेकिन उसने नफरत के रास्ते नहीं चुने। प्रेम के बहाने किए और रुका वहां, जहां रुकना चाहता था। शेखर पागल थोड़ा नहीं है, अर्थात् बहुत है।

***

शेखर 18 दिन से एक ही जींस पहन रहा है और तीन साल से एक ही चप्पल। घर में पत्नी उससे खुश है और बाहर मोची। मकान-मालिक उससे संसार की तरह नाखुश है।

***

शेखर जब 12वीं में पढ़ता था, तब उस लड़की के साथ भागा था जो आज उसकी पत्नी है। उसकी पत्नी को बड़ी झाड़ू चाहिए थी। उसने कहा, ‘‘शेखर, आस-पास और समाज में गंदगी बहुत है। मुझे एक बड़ी झाड़ू चाहिए।’’ उन दिनों वह अजय देवगन जैसा लगता था और अजय देवगन उसके जैसा— प्रेमी, आशिक, आवारा, पागल, मजनूं, दीवाना… ‘फूल और कांटे’ उसने 11 बार देखी थी। ‘फूल और कांटे’ टाइप फिल्मों के आशिक बहुत बदतमीज होते थे। वे लड़कियों को सरेआम जलील करते थे। लेकिन लड़कियां अंततः इन्हीं बदतमीजों से शादी करती थीं, क्योंकि ये बदतमीज खलनायकों से नहीं डरते थे। ऐसे आशिक बुराई पर बदतमीजी की जीत के उदाहरण थे और ऐसी लड़कियां बुराई पर झाड़ू की जीत की प्रतीक थीं।

***

शेखर को श्रम अच्छा लगता है, स्वीकृति नहीं। तनख्वाह अच्छी लगती है, पुरस्कार नहीं। शेखर अपने अधिकारों से ज्यादा अपनी जिम्मेदारियों के बारे में सोचता है। वह रविवार से ज्यादा सोमवार के बारे में सोचता है। वह जानता है कि नौकरियां बदलने से दुनिया नहीं बदलती।

…जब शेखर बेरोजगार था तब एक दोस्त ने उससे कहा कि जब नौकरी करोगे तो सारी क्रांति हवा हो जाएगी। दोस्तों की दुनिया में क्रांति नहीं थी। क्रांति केवल स्त्रियों की दुनिया में थी। स्त्रियां दोस्त नहीं थीं। दोस्त क्रांतिहीन और नौकरीशुदा थे। वे एकांत में कभी-कभी क्रांति करने की कोशिश करते थे, लेकिन इसके लिए उन्हें स्त्रियों की जरूरत पड़ती थी। कहने का आशय यह कि बेरोजगारी और स्त्रियों के बगैर क्रांति संभव नहीं थी। लेकिन बेरोजगारी में स्त्रियां और नौकरी में क्रांति संभव नहीं थी।

शेखर को नौकरी अच्छी लगती है, नौकरशाह नहीं। शेखर पागल थोड़ा नहीं है, अर्थात् बहुत है।

***

महत्वाकांक्षा अच्छी चीज है, लेकिन शेखर में नहीं है— उन सारी चीजों की तरह जो अच्छी समझी जाती हैं, लेकिन शेखर में नहीं हैं। वह होश संभालते ही हिसाब में कमजोर हो गया। अब सारा संसार उसे उलझाता रहता है। उसे कदम-कदम पर चौराहे मिलते हैं…।

***

शेखर अब ज्यादा पी नहीं पाता। ऊब जाता है।

वह इससे व्याकुल नहीं है, व्याकुल है इससे कि यह तथ्य अब गोपनीय नहीं है।

***

शेखर जब भी एक उल्लेखनीय शास्त्रीयता अर्जित कर संप्रेषण की संरचना में लौटा है, उसने अनुभव किया है कि सामान्यताएं जो कर नहीं पातीं उन्हें अपवाद मान लेती हैं और जो उनके वश में होता है उसे नियम…। वह मानता है कि प्रयोग अगर स्वीकृति पा लेते हैं, तब बहुत जल्द रूढ़ हो जाते हैं। इससे जीवन-संगीत अपने सतही सुर पर लौट आता है। इसलिए वह ऐसे प्रयोगों से बचता है जो समझ में आ जाएं।

शेखर बहुत-सी भाषाएं केवल समझता है, बोल नहीं पाता। शेखर पागल थोड़ा नहीं है, अर्थात् बहुत है।

***

मुश्किल में फंसे लोगों को शेखर कभी अपना उदाहरण नहीं देता। दूसरे उसका उदाहरण देते हैं, लेकिन वह खुद नहीं देता। वह बीमारों को दवा देता है, उनसे यह नहीं कहता कि मैं भी कभी बीमार था और कोई नहीं था मेरे सिरहाने। बाद में ये बीमार दूसरे बीमारों को शेखर का उदाहरण देते हैं, लेकिन वह खुद नहीं देता। वह बीमारों को दवा देता है, उदाहरण नहीं।

***

सारी घड़ियों में कोई शेखर का पीछा करता है। घर से निकलता है वह तो पड़ोस से भी निकलता है एक आदमी और कुछ दूर तक पीछे आ अदृश्य हो जाता है। एक लड़की साथ पकड़ती है बस और भर सफर साथ रहती है। वह जाना चाहती है उससे आगे, वह जाती है उससे आगे— उसकी शुभकामनाओं के बगैर भी। …आदेश, योजनाएं, कार्रवाइयां, धमकियां और बीमारियां पीछा करती हैं। खबरें पीछा करती हैं। स्वार्थ पीछा करते हैं। कुंठाएं, आशंकाएं, समीक्षाएं, कलाएं और स्मृतियां पीछा करती हैं। जहां भी जाता है कोई न कोई, कुछ न कुछ पीछा करता है— नींद में भी भागता है, जागता है पसीने से तर-ब-तर, एक दु:स्वप्न पीछा करता है।

***

शेखर मानता है कि ईश्वर को न मानना एक अवगुण है। उसे उन सारे विचारों से घृणा है जो उससे उसका ईश्वर छीनते हैं। उसका ईश्वर दर्शक-दीर्घा में हंसता हुआ एक त्रासद व्यक्तित्व और एक प्रतिभावान निर्देशक है। इस निर्देशन में शेखर जो कर चुका है, वह एक असफल फिल्म है। जहां ठहरा हुआ है, वह एक प्रदीर्घ मध्यांतर है। जहां जाना चाहता है, वह एक तनावपूर्ण कलाइमेक्स है।

शेखर के हाथों में चीजें कम हैं, पैरों में ज्यादा।

***

 

[ इस कथ्य के शीर्षक के लिए अज्ञेय के दो खंडों में प्रकाशित उपन्यास ‘शेखर : एक जीवनी’ और नाजिम हिकमत की कविता-पंक्तियों के अनुवाद के लिए लेखक वरिष्ठ कवि मंगलेश डबराल का कृतज्ञ है ]

Post Navigation

%d bloggers like this: