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‘हिंदी मीडियम’ यानी अपने स्वनिर्मित इमेज के चमकीले नक़ल: तत्याना षुर्लेई

साकेत चौधरी ने अपनी इस नयी फ़िल्म में एस्पायरिंग मिडिल क्लास को दिखाया है. यह तबका भारतीय सिनेमा में शायद सब से कम दिखने वाला तबका है. “हिंदी मीडियम” (2017) एक नवधनाढ्य दंपति की कहानी है, ऐसे चरित्र ज़्यादातर सिर्फ झलक दिखाने के लिए हिंदी फिल्मों में आते थे (जैसे “कल हो ना हो” में रोहित पटेल का बाप था) और अपने गंवारपन से किसी भी तरह के मनोरंजन/फूहड़पन के बहाने बनकर रह जाते थे. चौधरी भी इसी तरीके से अपने चरित्र को सामने लाता है. फ़िल्म का पहला हिस्सा कहानी से ज़्यादा, मनोरंचक रेखाचित्रों का एक संग्रह लगता है. फिर भी, फ़िल्म के ये हास्यप्रद दृश्य ज़्यादा थकाऊ नहीं हैं और इस विशवास से लैश दर्शकों के लिए कि उन्हें पता है कि फ़िल्म किसके बारे में होगी, अचानक से दो ट्विस्टेड प्लाट ऐसे आते हैं जो आश्चर्यचकित कर देते हैं.  #लेखिका 

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“हिंदी मीडियम”: यानी हम सब नक़ल हैं!

By तत्याना षुर्लेई

हिंदुस्तान में पॉपुलर रही फिल्मों के लिए पश्चिम में होने वाली सबसे बड़ी आलोचना यही है कि ये वास्तविकताओं से दूर होती हैं. साथ ही साथ ‘भारतीय विषयों’ पर पश्चिम में बनने वाली फिल्में या फिर विदेशी बाजारों के लिए भारत में बनी फिल्में आम भारतीय लोगों को पसंद नहीं आती है, क्योंकि उनमें सिर्फ गरीबी और एक तरह भिन्नता (otherness) का चित्रण होता है. हिन्दुस्तान के बारें ऐसे विषय पश्चिमी फिल्म जगत में बहुत बिकाऊ हैं.

वहीं दूसरी तरफ, जो लोग गरीबी और अमीरी के बीच में पड़े हुए हैं, उन पर ज़्यादा ध्यान नहीं दिया जाता है. कभी-कभी कोई न कोई अपवाद है, ऐसे अपवाद विकास बह्ल की “क्वीन” की नायिका, रानी मेहरा है जो अपरिष्कृत ज़रूर है लेकिन असाधारण भी. एस्पायरिंग मिडिल क्लास के लिए सिनेमा की कहानियों में ही सिर्फ जगह का अभाव नहीं है, बल्कि शायद भारतीय समाज का भी यही यथार्थ है. यह समाज जहाँ आभिजात्य लोगों के समूह के प्रति बहुत ज़्यादा चापलूस और भक्ति की मुद्रा दिखता है, वहीं दूसरी ओर सब से गरीब और हाशिये के लोगों की रक्षा के लिए नियम-कानून बनाने का ढोंग भी करता है.

फ़िल्म की कहानी में यह स्पष्ट है कि मुख्य चरित्र पैसे वाला तो है लेकिन संस्कृति-शून्य (uncultured) अनाड़ी भी है. उसकी स्थिति समाज के एक बाहरी व्यक्ति के रूप में है और कभी-कभी वह गरीब बस्तियों में रहने वालों से खुद को ज़्यादा मुश्किल में पाता है. क्योंकि, उसकी रक्षा के लिए यहाँ कोई स्पष्ट विधान नहीं है और समाज की भंगिमा भी आदरपूर्ण नहीं है. ऐसे आदमी अपने पैसों की मदद से वहाँ तक तो पहुँच सकता है जहाँ दरिद्र लोग कभी नहीं जा पायेंगे, लेकिन इसकी भी अपनी विडम्बनायें हैं. यह फिल्म ऐसी विडम्बनाओं को उभारने का काम करती है.

यद्यपि यह भी सच है कि ऐसे अनाड़ी लोग जब अभिजात्य लोगों (elites) के स्तर पर पहुंचेंगे, तो वे सिर्फ एक धोखेबाज़ ही बने रहेंगे. उन्हें इस बात का ध्यान हमेशा रखना पड़ेगा कि आसपास के लोगों को कभी पता न चल सके कि उसकी जडें कहाँ हैं. यही कारण है कि आज भी भारत में कई काम ऐसे होते हैं जिनको करना अपमानजनक माना जाता है, इसीलिए यहाँ हर किसी के लिए पहले से ही भविष्य (नियति) तय है और समाज में उसका स्थान (स्टेटस) भी. ऐसे में अभिजात्य वाली ऊँचाई चढ़ना बहुत मुश्किल काम है.

फ़िल्म का नायक, राज (इरफ़ान खान) कपड़ों का एक अमीर दुकानदार है. वह किसी न रूप में अपनी दुकान के कपड़ों से मिलता-जुलता है. उसकी दुकान में बड़े-बड़े मॉडल्स, स्टार और डिजाईनर के नक़ल मिलते हैं. ये नक़ल अपने मूल से ज़्यादा चमकीले, रंग-बिरंगे और भड़कीले लगते हैं, फिर भी ये नक़ल वाले कपड़े पुरानी दिल्ली में रहनेवाली औरतों को अच्छे लगते हैं.

अपने ग्राहकों की तरह, जो रंगीन पत्रिकाओं में दर्ज कपड़ों के नकली और सस्ते संस्करण खरीदती हैं, फ़िल्म का नायक भी अपनी ज़िन्दगी से बहुत खुश है और उसको किसी और चीज की ज़रुरत नहीं है. लेकिन, उसकी पत्नी, मीता (सबा कमर) राज से कुछ अलग है. मीता अभिजात्य, सोफिस्टिकेटेड समाज का हिस्सा बनना चाहती है, वह मानती है कि बड़े लोगों के संपर्क से उसकी बेटी का भविष्य अच्छा होगा.

इन सबमें सबसे महत्त्वपूर्ण बात बच्ची को एक अच्छे स्कूल में भेजना है. इसलिए वह निराश माँ अपने पति को चांदनी चौक से वसंत विहार शिफ्ट होने और वहाँ रहनेवाले लोगों से दोस्ती करने के लिए बोलती है, क्योंकि यह कंपनी उसे अपनी  बेटी के लिए ज़्यादा उचित लगती  है.

राज और मीता वसंत विहार शिफ्ट हो जाते हैं, लेकिन यहीं पता चलता है कि सुन्दर घर में रहने मात्र से आप अपनी ‘कमजोरियों’ को नहीं छुपा सकते हैं. अंग्रेजी बोलनेवाले सोसाइटी को भी समझ में आ जाता है कि राज और मीता उनसे कुछ अलग हैं और ये हमारी नक़ल करने की कोशिश में हैं.  जाहिर है कि सोफिस्टिकेटेड समाज  के प्रतिष्ठित स्कूल में बच्ची को प्रवेश नहीं मिलता है. तब दोनों, नायक और नायिका गरीबों के बच्चों के लिए मिलने वाले आरक्षण की मदद से अपनी बेटी को अच्छे स्कूल में भेजने की कोशिश करते हैं. इसके लिए वे फिर वसंत विहार से दूसरी जगह शिफ्ट करते हैं और एक बहुत गरीब इलाके में रहने लगते हैं और इस तरह यहाँ फिर से दूसरे लोगों की नक़ल बन जाते हैं, लेकिन इस बार गरीबों की.

यह बहुत स्पष्ट है कि दूसरा नाटक पहले से ज़्यादा अच्छा है, गरीब इलाके में रहनेवाले लोग राज और मीता को वसंत विहार वालों की तुलना में आसानी से अपनाते हैं. इसके अतिरिक्त, इस बार लगता है कि दोनों, नायक और नायिका, आसपास के लोगों को थोड़ा कम धोखा देते हैं. पहले वाले नाटक में राज और मीता का चमकीला लालित्य (नकली भव्यता) और सामाजिक मेल-जोल के समय उनके द्वारा की गयी गलतियाँ बहुत ज्यादा ही दिखाई देती थीं, लेकिन दूसरे नाटक के समय गरीबों के साथ रहना उनके लिए ज़्यादा आसान लगता है.

ऐसा लगता है कि इस बार नायक और नायिका ऐसी जगह  रहते हैं जो गरीब लोगों की जगह होने के बावजूद उनके पुराने घर से मिलते-जुलते हैं, जहाँ उनके लिए एडजस्ट करना ज्यादा आसान है, लेकिन ऐसा नहीं है. इस नए इलाके में भी राज और मीता गरीब लोगों को धोखा देते हैं. अंतर बस यह है कि पिछली बार आसपास के लोग उनको नीचली नजर से देखते थे और इस बार, गरीबों लोगों से इनको आदर मिलता है. इससे उनका आत्मविश्वास बढ़ जाता है और वे खुद को आदरणीय मानने लगते हैं. इस बार उन्हें अपने किये की चिंता करने की जरुरत नहीं है, वे यहाँ कम गलतियां करते हैं. यहाँ आकर धीरे-धीरे उनका व्यवहार बदल जाता है. उनके कपड़ों का स्टाइल, जिसे पहले-पहल उन्हें सीखना पड़ा, अब नेचुरल लगता है और अमीर इलाके में फिर से वापसी  होने के बाद भी उनका आत्मविश्वास गायब नहीं होता है. प्रतिष्ठित (prestigious) स्कूल के बच्चों के अमीर अभिवावकों के सामने राज को अब अपनी कमज़ोर अंग्रेजी का इस्तेमाल करने से भी बिलकुल डर नहीं है.

भाषा का मामला फ़िल्म में बहुत महत्त्वपूर्ण है. राज सही ही बोलता है कि अगर फ्रेंच या जर्मन को अच्छी अंग्रेजी नहीं आती है तो भी भारतीय लोगों का उनके प्रति आदर कम नहीं होता है. लेकिन खुद भारतीय ही दूसरे भारतीय को अंग्रेजी जानने और न जानने के आधार पर उसकी सामाजिक हैसियत तय कर देते हैं. फिर भी, “हिंदी मीडियम” “इंग्लिश विंग्लिश” (गौरी शिंदे, २०१२) जैसी फ़िल्म नहीं है, यह फिल्म अंग्रेजी के प्रति भारतीय लोगों के अजीब रवैये के साथ-साथ धोखा देने की ज़रुरत और जुगाड़ की प्रवृति के बारे में है.

फ़िल्म का शुरूआती हिस्सा एस्पायरिंग मिडिल क्लास के बहिष्कार (exclusion) की कहानी लगती है, लेकिन बाद में यह गरीबों की झूठी रक्षा और उनके अधिकारों के हनन के बारे में एक नैतिक आख्यान बन जाती है. यह कहना मुश्किल है कि अचानक से आने वाले इस परिवर्तन के कारण क्या हैं? शायद फिल्मवालों को अचानक यह लगा कि वे गरीब लोगों को मिलने वाली सुख-सुविधाओं को नहीं बल्कि मिडिल क्लास की चीड़-फाड़ (operation) दिखाना चाहते हैं. हालाँकि यह परिवर्तन फ़िल्म की कमी बिलकुल नहीं है, उल्टे, स्कूल में राज के फाइनल स्पीच के बाद अमीर-अभिजात्य श्रोताओं का व्यवहार (स्टैंडिंग ओवेशन की कमी)  कहानी का एक मानीखेज केंद्र बन जाता है.

इसने हर दर्शक को यह समझाया कि हम सब लोगों को अपने-अपने जीवन में कुछ छोटे-छोटे नाटक, नक़ल करने हैं, आसपास के लोगों के लिए अपने व्यक्तित्व (image) को खुद ही गढ़ना है. हम सिर्फ अपने घर या परिवार के पास ही ‘सच्चा हम’ हो सकते हैं क्योंकि सिर्फ हमारे अपने लोग ही इस नाटक की सच्चाई जानते हैं या वे खुद भी इस नाटक के हिस्से  हैं.

इस तरह का एप्रोच राज द्वारा नागिन के बारे में एक टीवी सीरियल देखने वाले सीन में स्पष्ट है. यह सीन स्पष्टतः इरफ़ान खान की बाहियात फ़िल्म, और इरफ़ान खान जैसे अभिनेताओं के लिए शर्मनाक भी, “हिस्स्स” (जेनिफर लिंच, २०१०) से संबंधित है. हमें इरफ़ान खान की सिर्फ अच्छी फिल्में देखने की आदत है इसलिए हम यह मानना ही नहीं चाहते हैं कि उसने “हिस्स्स” जैसी फ़िल्म में भी एक्टिंग किया है. वास्तव में हम सभी कभी न कभी अपने स्वनिर्मित इमेज के चमकीले नक़ल होते हैं.

407990_4198265689669_2114788963_nतत्याना षुर्लेई पोलैंड की रहने वाली हैं, एक इंडोलॉजिस्ट (भारतीय उपमहाद्वीपीय भाषा और संस्कृति की जानकार)  और फिल्म आलोचक हैं. हिंदी की मशहूर पत्रिकाओं और ब्लॉग्स के लिए लिखती रही हैं. पोलैंड के शहर क्राकोव स्थित जेगिलोनियन विश्वविद्यालय से “द कोर्टसन फिगर इन इंडियन पॉपुलर सिनेमा: ‘ट्रेडिशन, स्टीरियोटाइप, मैनिपुलेशन” नामक विषय पर पीएचडी हैं. वर्तमान में मनिपाल विश्वविद्यालय, कर्नाटक के यूरोपीय अध्ययन संस्थान में पढ़ाती हैं. 

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‘रंगून’ वंडरलैंड से वंडरलैंड की यात्रा है: तत्याना षुर्लेई

विशाल भारद्वाज की बहुप्रतीक्षित फिल्म ‘रंगून’ दर्शकों के समक्ष आ चुकी है. बहुप्रतीक्षित इसलिए भी कि भारद्वाज हिंदी सिनेमा के सबसे प्रतिभाशाली निर्देशक हैं और एक कला-रूप के साथ-साथ लोकप्रियता के पैमाने पर भी उनका स्ट्राइक रेट अन्य निर्देशकों के बनिस्पत अधिक रहा है. यह समीक्षा उनके लिए है जो फिल्म देख चुके हैं, उनके लिए नहीं जो इसे पढ़कर फिल्म देखने जाएँ या न जाएँ का फैसला करें. विशाल की फिल्म लोगों द्वारा देखे जाने और उस पर गंभीर प्रतिक्रिया के लिए लोगों को उकसाती हैं. विशाल दर्शकों के साथ-साथ फिल्म आलोचकों के भी प्रिय फिल्मकार रहे हैं. फिल्म आलोचक तत्याना षुर्लेई की यह तात्कालिक-प्रतिक्रया इसी की एक कड़ी है. #तिरछीस्पेल्लिंग

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‘रंगून’: वंडरलैंड से वंडरलैंड की यात्रा 

By  तत्याना षुर्लेई

विशाल भारद्वाज की नयी फ़िल्म ‘रंगून’ युद्ध के बारे में है. शुरुआत में दर्शकों को लड़ाई के दो रास्तों के बारे में बताया जाता है, एक महात्मा गाँधी का अहिंसा वाला और दूसरा सुभाष चन्द्र का हिंसा वाला. ऐसा लगता है जैसे फ़िल्म की कहानी कुछ दार्शनिक होने वाली है और इसका आधार ‘युद्ध की वैधता’ होगी. लेकिन फ़िल्म के दुसरे भाग में पता चलता है कि यह देशभक्ति-श्रृंखला वाली फ़िल्म है, जिसमें इतनी सारी चीज़ें डाल दी गई हैं कि नायकों के चरित्र और उनके चारित्रिक बदलाव को दिखाने के लिए ज़्यादा स्थान बचा ही नहीं है. फलस्वरूप फ़िल्म न तो देशभक्ति और गद्दारी के बारे में कोई दिलचस्प कहानी कह पाती है और न ही एक कठिन और नामुमकिन प्यार के बारे में. फिर भी,‘रंगून’ की बुनियाद में एक खुबसूरत आईडिया दिखाई देता है.

फ़िल्म की नायिका, मिस जूलिया (कंगना रानौत) ऐलिस की तरह एक वंडरलैंड जानेवाली है, जहाँ आम दुनिया के नियम बिलकुल नहीं चलते हैं. जंगल के कैम्प में रहनेवाले सिपाहियों को दिलासा देने और उनका मनोरंजन करने के लिए वह सुरक्षित और आरामदेह (कम्फर्टेबल) बॉम्बे से बर्मा जा रही है. यद्यपि लेविस कैरोल की ऐलिस और मिस जूलिया में यही अंतर है कि विशाल भारद्वाज की नायिका वंडरलैंड (बर्मा) जाने से पहले भी एक दुसरे तरह की वंडरलैंड (बॉम्बे) की निवासी है. बम्बइया सपनों का कारखाना वास्तविकता से बहुत अलग है, लेकिन यह अलगाव ही वह कारण है जिसके चलते मिस जूलिया और वहाँ काम करने वाले अन्य लोगों के लिए यह वंडरलैंड सुरक्षित है. फ़िल्म वाले फ़िल्म के सब से अच्छे गाने, ‘जूलिया’ के सीक्वेंस में दिखाते हैं. उनका सिर्फ एक प्यार है, मिस जूलिया और चिंता भी सिर्फ एक है कि मिस जूलिया का नेक्स्ट शॉट और अच्छा हो सकता था. इस दुनिया में बुराइयाँ तो ज़रूर होती हैं लेकिन सब को पता है कि अंत में मास्क पहननेवाली फीयरलेस हीरोइन आ जाएगी और सब को बचा लेगी, पर नए वंडरलैंड में ऐसा नहीं होगा.

विशाल भारद्वाज उन दो अजीब दुनियाओं पर खुद को ज़्यादा केन्द्रित नहीं कर पाया है. यह बात अजीब इसलिए भी है कि ‘रंगून’ की कहानी में यह अच्छी तरह दिखाई देता है कि जूलिया के फ़िल्म या फिल्म-शूटिंग वाले सारे दृश्य क़ुरबानी और देशभक्ति वाले प्लॉट से ज़्यादा अच्छे हैं, ऐसा लगता है जैसे भारद्वाज खुद ही असमंजस में है कि उसको अपनी कहानी से क्या-क्या अपेक्षाएं हैं! फ़िल्म का दूसरा भाग पहले से कमज़ोर है. दुसरे भाग में ट्रेजेडी तो है लेकिन इसके बावजूद भी ये सारी मौतें और डिस्टर्बिंग सीन्स वास्तव में कुछ ख़ास डिस्टर्बिंग नहीं हैं, और ‘तलवार’ वाले प्लॉट में कोई थ्रिल ही नहीं है. सच्चाई यह है कि इस तलवार वाली कहानी में कोई बड़ा सरप्राइज आता ही नहीं है.

‘जूलिया’ गाने के अलावा फ़िल्म में और भी अच्छे गाने हैं जिनमें से खास तौर पर ‘टिप्पा’ और इसका ट्रेन सीक्वेंस बहुत सुन्दर है. इस गाने में लार्स वॉन ट्रायर की ‘डांसर इन द डार्क’ फ़िल्म का बड़ा प्रभाव है लेकिन कहा जाता है कि लार्स वॉन ट्रायर खुद ‘दिल से’ (1998) के ‘चल छैंया छैंया’ गाने के दृश्य से प्रेरित था. जब तक लोग कुछ नया और आर्टिस्टिक वैल्यू निकालते रहेंगे, तब तक प्रेरणा नक़ल नहीं कहलायेगा. और, ‘टिप्पा’ गाना इसी तरह का है. सुंदर दृश्यों के अलावा भी इसका एक अलग महत्व है, दर्शकों को अच्छी तरह से दो वंडरलैंड्स दिखाई देते हैं. बर्मा-यात्रा के पर्यटकीय अंदाज की सुंदरता और चाक-चौबंद सुरक्षा अचानक से खतरे में तब्दील हो जाते हैं. युद्ध की दुनिया में स्वागत आफत की दुनिया में फंसने जैसा है; बर्मा आए हुए लोगों पर लड़ाकू विमानों का हमला शुरू हो जाता है. इस दृश्य के बाद सभी को पता चलता है कि वे अब बिलकुल अलग दुनिया में आ गए हैं. एक ऐसी दुनिया, जहाँ कोई सुपर, फीयरलेस हीरोइन किसी को बचा नहीं सकती है. फिर भी, कुछ समय बाद अपने प्रेमी, नवाब मलिक (शाहिद कपूर) की जान बचाने वाली मिस जूलिया के फ़िल्मी स्टंट वाले सीन यहाँ फिर से बहुत अच्छा और ताजा लगने लगता है और यह फ़िल्म के दुसरे भाग का सब से अच्छा सीक्वेंस है, जिसमें दो वंडरलैंड्स मिल जाते हैं. सपनों की दुनिया में रहनेवाली जूलिया को इसके बावजूद भी हारना था जबकि वह मिशन में शुरू में ही सफल हो गयी थी. मिस जूलिया और क्रूर मेजर हार्डिंग (रिचर्ड मकेब) ने एक क्षण के लिए एक-दुसरे की दुनिया की अदलाबदली कर लेते हैं. मिस जूलिया सुपर-हीरोइन के कपड़े पहनकर नवाब को बचाने की कोशिश करती है, और मेजर हार्डिंग एक्टिंग का इस्तेमाल कर उसको धोखा देता है क्योंकि युद्ध युद्ध होता है, युद्ध के बारे में एक हैप्पी एंड वाली फ़िल्म नहीं. बहरहाल फ़िल्म इंडस्ट्री के बारे में एक फ़िल्म बनाकर भी विशाल भारद्वाज इस टॉपिक का पूरा इस्तेमाल नहीं कर पाया है, हालाँकि उसकी कहानी में यह स्पष्ट है कि फिल्मवाले फ़िल्मी तत्व उसको सब से अच्छे लगते हैं.

जूलिया, नवाब और जापानी सिपाही की जंगल-यात्रा भी फ़िल्म का एक अच्छा हिस्सा है, जिसमें न सिर्फ जूलिया और नवाब का प्यार होता है बल्कि दर्शकों को भी पता चलता है कि युद्ध कितना क्रूर और अमानवीय होता है, साथ ही साथ दोस्त और दुश्मन का विभाजन भी आसान नहीं होता है. लोग अपनी मर्ज़ी से सिपाही नहीं बनते हैं, वे देशभक्त होने के बावजूद भी अपने परिवारों के साथ रहना चाहते हैं. अफ़सोस की बात यह है कि कैम्प में आने के बाद ये सारी दिलचस्प बातें कहीं गायब हो जाती हैं और फ़िल्म में बिलकुल नयी कहानी आ जाती है जिससे भारद्वाज खुद थोड़ा-सा परेशान लगता है. देशभक्ति वाला भाग फ़िल्म का सब से कमज़ोर भाग है और इसमें कई ऐसे तत्व, टुकड़े हैं जो विशाल भारद्वाज के स्टैण्डर्ड से बहुत नीचे के हैं. उदहारण के लिए नवाब के राष्ट्रगीत गाने वाला दृश्य इसी तरह के एक बैड-टेस्ट का उदाहरण है, ऐसा लगता है जैसे यह विशाल भारद्वाज ने नहीं किसी और ने बनाया है. यहीं पुल वाला अंतिम सीक्वेंस भी अच्छा नहीं है. फ़िल्म के तीनों नायक-नायिका इस सीक्वेंस में कागज़ के कठपुतली लगते हैं, इसीलिए इन्हें देखते समय दया नहीं, बल्कि शर्मिंदगी का अहसास होता है.

जिनकी फ़िल्म में बिलकुल ही ज़रुरत नहीं थी, उन सारी चीजों को फिल्म में डालने के कारण कहानी में दिलचस्प और ताजे विचारों के लिए जगह ही नहीं बची थी और यह अफ़सोस की बात भी है क्योंकि ‘रंगून’ में बहुत अच्छे और दिलचस्प चरित्र हैं. मिस जूलिया दो आदमियों के रिश्ते में है जिनमें से एक, रुसी बिलीमोरिया (सैफ अली खान), बॉम्बे वाले, सुरक्षित वंडरलैंड का हिस्सा है, और दूसरा, नवाब मलिक नए और खतरनाक वंडरलैंड का. उनमें से एक का चुनाव करना एक खास ज़िन्दगी का चुनाव करना भी होता, इसलिए मिस जूलिया के लिए यह चयन इतना मुश्किल लगता है.

दुर्भाग्य से मिस जूलिया के चरित्र को विकसित करवा पाने की जगह फ़िल्म में बिलकुल ही नहीं थी, इसलिए वह फिल्म के अंत में वैसे ही भोली लगती है जैसे फिल्म के शुरू में लगती थी. अगर स्क्रिप्ट थोड़ा-सा बेहतर होता तो कंगना रानौत का प्रदर्शन और भी अच्छा होता. यहीं पर सवाल उठता है कि अभिनय-प्रतिभा को दिखाने के लिए अगर स्क्रिप्ट में कोई जगह नहीं है, तो फ़िल्म में अच्छे अभिनेता-अभिनेत्रियों की फिर क्या ही ज़रुरत है? शाहिद कपूर और सैफ अली खान को एक्टिंग के लिए कंगना रानौत से थोड़ा-सा ज़्यादा मौका मिला है, साथ ही यहीं पर एक समस्या भी दिखाई देती है. वे तीनों परदे पर बस आते हैं और बातचीत करते हैं, चरित्र के निर्माण और विकास में योगदान देने वाले स्क्रिप्ट और अभिनय के अभाव में दर्शकों को उन्हें अच्छी तरह पहचानने और समझने का मौका नहीं मिलता है. यही कारण है कि फ़िल्म देखनेवालों के लिए यह कोई बात नहीं है कि वे जीते हैं या मर जाते हैं, क्योंकि उनसे दर्शकों का कोई गहरा संबंध स्थापित ही नहीं हो पाता है.

तीनों मुख्य पात्रों के अतिरिक्त एक बहुत दिलचस्प पात्र मेजर हार्डिंग भी है. वह बिलकुल ताजातरीन और नया खलनायक है, जिसको भारतीय संस्कृति से प्यार है और जो साथ ही साथ भारतीय लोगों के प्रति नस्लवादी व्यवहार भी करता है. लेकिन यहाँ भी उसके चरित्र को दिखाने के लिए फिर से जगह नहीं है. बस अचानक से वह एक क्रूर इंग्लिशमैन बन जाता है, जो सिर्फ यह कहता है कि मैं गोरा हूँ इसलिए हमेशा सही हूँ, या फिर भारतीय लोगों को अपमानित करता है. युद्ध का विषय विशाल भारद्वाज के लिए सहज नहीं था इसलिए जो तत्व देश की आज़ादी की लड़ाई से सम्बंधित हैं, वे सब से कमज़ोर हैं. अगर युद्ध सिर्फ एक पृष्ठभूमि (बैकग्राउंड) होती या भारद्वाज इसे फ़िल्म इंडस्ट्री के परिप्रेक्ष्य में देखता (जो बार-बार कई एक दृश्यों में बहुत अच्छी तरह दिखाता भी है), तो ‘रंगून’ सचमुच बहुत अच्छी हो सकती थी, और उसके एक्टर्स भी यह साबित कर सकते थे कि वे सचमुच में कितने प्रतिभाशाली लोग हैं.

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तत्याना षुर्लेई पोलैंड की रहने वाली हैं, एक इंडोलॉजिस्ट (भारतीय उपमहाद्वीपीय भाषा और संस्कृति की जानकार)  और फिल्म आलोचक हैं. हिंदी की मशहूर पत्रिकाओं और ब्लॉग्स के लिए लिखती रही हैं. पोलैंड के शहर क्राकोव स्थित जेगिलोनियन विश्वविद्यालय से द कोर्टसन फिगर इन इंडियन पॉपुलर सिनेमा: ट्रेडिशन, स्टीरियोटाइप, मैनिपुलेशननामक विषय पर पीएचडी हैं. वर्तमान में मनिपाल विश्वविद्यालय, कर्नाटक के यूरोपीय अध्ययन संस्थान में पढ़ाती हैं.

‘रईस’ की तुलना में ‘काबिल’ अच्छी फिल्म है: तत्याना षुर्लेई

 

“रईस” की तुलना में मैं “काबिल” की ओर हूँ. यह फ़िल्म “रईस” से अच्छी इसलिए है कि “काबिल” यह दिखावा नहीं करता है कि वह कुछ नया और आर्टिस्टिक दिखानेवाला है. दोनों फिल्मों को देखकर फिर से यह दोहराना पड़ेगा कि अगर किसी को बारीक सिनेमा बनाना नहीं आता है तो उसे मुख्यधारा में ही रहना चाहिए. मुख्यधारा और मनोरंजन कोई कमतर जगह नहीं है और ऐसी फिल्मों की बड़ी ज़रुरत है. “काबिल” में कुछ न कुछ कमियां तो हैं लेकिन “रईस” से अच्छी इसलिए लगती है कि यह अपने दर्शकों के प्रति फेयर और फ्रैंक है. इसका ट्रेलर भी किसी को धोखा नहीं देता है. सब को पता है कि यह मनोरंजन के लिए बनी एक व्यावसायिक फ़िल्म है और जिसकी कहानी उम्मीद के मुताबिक ही है. #लेखक

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काबिल  पोस्टर

काबिल: मनोरंजन कोई बुरी बात नहीं है

By तत्याना षुर्लेई

फ़िल्म की कहानी रोमांटिक और मासूम प्यार से शुरू होती है, फिर इसमें दारुण दुःख पहुंचाने वाली क्रूरता, हिंसा और अन्याय आते हैं, और अंततः राहत देनेवाला बदला. फ़िल्म का नायक, रोहन भटनागर (ऋतिक रोशन) एक अँधा जवान आदमी है जो एक सुन्दर लड़की, सुप्रिया (यमी गौतम) से प्यार और शादी करता है. सिनेमा में दिखने वाले विकलांग लोगों में अक्सर किसी एक कमी की जगह उन्हें कई असाधारण क्षमताएं दी जाती हैं (न सिर्फ भारतीय फिल्मों में – ऐसा स्टीरियोटाइप दुनिया की बहुत सारी फिल्मों में प्रभुत्व रखता है). रोहन भी इसी तरह का आदमी है – उसको दिखाई नहीं देता है लेकिन इस विकलांगता के प्रतिउत्तर में वह दुसरे लोगों की आवाज़ों को अच्छी तरह नक़ल करता है. रोहन कार्टून का डबिंग करता है और इस काम में इतना प्रतिभावान है कि अकेले ही फ़िल्म के सारे नायकों की अलग-अलग आवाजें देता है. उसकी यह योग्यता बाद में बदला लेने वाले दृश्यों में उनकी बहुत मदद करेगा.

आसपास में रहनेवाले दो अपराधी, अमित (रोहित रॉय) और उसका दोस्त माधव (रोनित रॉय) बार-बार रोहन और सुप्रिया की ख़ुशी के आड़े आते हैं. इनके लिए इस जोड़ी की विकलांगता मजाक उड़ानेवाली बात है. एक दिन वे छेड़-छाड़ से आगे चले जाते हैं और सुप्रिया का बलात्कार करते हैं. अमित का भाई शहर का बड़ा आदमी है इसलिए वह आसानी से भ्रष्ट पुलिस को अपने पक्ष में कर लेता है. भ्रष्ट पुलिस हिंदी सिनेमा का सब से पसंदीदा टॉपिक है जिससे फिल्मवाले अभी तक थके नहीं हैं. लेकिन विषयों का दुहराव और दर्शकों के उम्मीदों पर खरा उतरने वाला प्लॉट मुख्यधारा की सिनेमा के सबसे जरुरी हिस्से हैं.

अपनी पत्नी की मौत के बाद, यह देखकर कि पुलिस कुछ नहीं करेगा, रोहन खुद बदला लेता है और भ्रष्ट पुलिस इंस्पेक्टर से जीतता है. यह प्लॉट बहुत टिपिकल और आसान है – ऐसी फिल्में तो बार-बार बनती हैं, फिर भी हमेशा की तरह वे अपने दर्शकों को अंत में बड़ी राहत देती हैं. “काबिल” में नयी बात यह है कि फ़िल्म की कहानी एक ही तरह के दो दृश्यों से अच्छी तरह खेलती है. उदहारण के लिए रोहन की पत्नी के बलात्कार के केस में इंस्पेक्टर बार-बार बोलता है कि सबूत के बिना वह कुछ नहीं कर सकता है, लेकिन बाद में, बदले वाले दृश्य में, फ़िल्म का नायक भी पुलिस से अपने क्राइम के सारे सबूत छुपाता है. सुप्रिया ने फँसी लगा ली तो रोहन ने माधव को भी फांसी पर लटकाया. सुप्रिया का बलात्कार करने से पहले उसको बिस्तर से बांधा और उसके मुँह में कपड़ा लगाया गया था ताकि वह कुछ बोल न सके, तो ऐसी ही स्थिति लेटाकर अमित की भी हत्या होती है. इस तरह के अलग-अलग आइने में प्रतिबिंबित होने वाले दृश्यों की तरह सारी उल्टी परछाईयाँ फ़िल्म में दिखाई गईं हैं.

रुसी लेखक, अन्तोन चेखव ने एक बार लिखा की नाटक के शुरू में दर्शकों को अगर दीवार में लटकी बन्दुक दिखाई देती है तो इसका मतलब यह है कि कहानी में इसका इस्तेमाल जरुरी है. “काबिल” में इस नियम का प्रयोग बहुत हुआ है. लगभग हर छोटे दृश्य, जैसे साईकिल वाला, या रोहन का पत्नी को घड़ी गिफ्ट करना इत्यादि. पहले तो इन सब का कोई बड़ा मतलब नहीं दिखता है, लेकिन बाद में ये सारे दृश्य वापस आते हैं और नायक अपने बदले वाले दृश्य में इन सब का कोई न कोई प्रयोग करता है.

सबसे अच्छी बात यह है कि मुख्यधारा की दूसरी फिल्मों के विपरीत “काबिल” में जब भी  किसी ऑब्जेक्ट का दुबारा इस्तेमाल है तो दर्शकों को याद दिलानेवाला बोरिंग फ्लैशबैक या ऑफ-स्क्रीन से झुंझला देने वाली आवाजें नहीं आती हैं (बस फ़िल्म के अंत में अंधे लोगों के बारे में रोहन के शब्द दोबारा आए हैं). साथ ही साथ “काबिल” अपने दर्शकों की बुद्धिमत्ता का सम्मान करता है जो कि पॉपुलर फिल्मों में अक्सर नहीं होता है.

ऋतिक रोशन ने “काबिल” से पहले भी विकलांग आदमी का अभिनय किया है. मगर इस बार उसने अच्छी तरह से अपने सबसे बड़े हुनर को अपने नायक की विकलांगता से जोड़ दिया है. ऋतिक का सब से बड़ा कौशल उसका नाच है जो इस बार ड्रीम सीक्वेंस का हिस्सा नहीं है. डांस स्कूल के सीन में ऋतिक फिर से दर्शकों को यह दिखाता है कि वह बॉलीवुड का सब अच्छा डांसर है. पुराने थिएटर में लड़ाई के सीन में नायक के अंधापन के साथ अँधेरा का भी दिलचस्प इस्तेमाल है. यह जरुर है कि नायक का कौशल कभी-कभी कुछ ज़्यादा ही दिखाया गया है जो कि विकलांग आदमी में नहीं होते हैं.

अंधे लोगों की ज़िन्दगी में जो कुछ भी अजीब चीजें, हरकतें सामान्यतः दिखती हैं, फिल्मवालों ने भरसक कोशिश की है कि उनकी व्याख्या प्रस्तुत की जाएँ. शादी की रात, नायक और नायिका के कमरे में जली हुई सारी मोमबत्तियाँ, जो ट्रेलर में भी दिखाई गईं हैं, किसी को अजीब लग सकती हैं. इसीलिए फ़िल्म में उसकी व्याख्या है कि वे क्यों आईं! यहाँ मोमबत्ती फ़िल्म में चेखव वाली चीज़ बन गयी. दिलचस्प बात यह भी है कि इस फ़िल्म में ऋतिक रोशन की दूसरी फिल्मों से अलग दर्शकों को उसके दोनों अंगूठे पुरे समय दिखाई देते हैं. यह निशान कोई विकलांगता नहीं है, बल्कि नायक के भाग्यशाली होने की निशानी है, फिर भी अपनी पुरानी फिल्मों में ऋतिक इसे छुपाता था. चूँकि “काबिल” सामन्य लोगों से अलग दिखने वाले लोगों के शांति से जीने के अधिकार और उनके प्रति होने वाले भेद-भाव के बारे में फ़िल्म है, इसीलिए दूसरों से अपनी भिन्नता दिखाना विकलांगता के पक्ष में एक मज़बूत आवाज़ है. विकलांग नायक का अभिनय करना और खुद दूसरों से कुछ अलग होना अलग-अलग बातें हैं और यहाँ ऋतिक ने फिर से अपनी एक और खासियत का अच्छा इस्तेमाल किया.

फ़िल्म में कमियां ज़रूर हैं और उनमें सब से बड़ी शायद फ़िल्म का आइटम नंबर है. इसकी ज़रुरत बिलकुल नहीं थी, क्योंकि यह गाना और परफॉरमेंस अच्छा नहीं हैं. शायद फिल्मवाले आगे आने वाली अपने नायक की अलग-अलग लड़ाइयों से पहले दर्शकों को थोडा-सा आराम देना चाहते थे, फिर भी अगर ज़रुरत थी तो इसे ज़्यादा अच्छी तरह से करना चाहिए था. सुप्रिया का भूत वाला आईडिया भी ज़्यादा अच्छा नहीं था, इससे फ़िल्म बस ज़्यादा दयनीय बन जाती. नायिका की मौत और उससे पहले उसके प्रति घटित अपराध ही इतने कष्टप्रद हैं कि इससे ज़्यादा कुछ डालने की जरुरत नहीं थी.

फ़िल्म में एक चिंताजनक बात माधव की बहन के प्रति रोहन का व्यवहार है. माधव और उसका दोस्त अमित जब सुप्रिया को छेड़ते थे तो रोहन को मालूम था कि यह महसूस करना कितना कष्टप्रद है. फिर भी अपने बदले वाले क्षण में रोहन माधव की बहन को छेड़ता है. यह ज़रूर है कि रोहन का व्यवहार उतना ख़राब नहीं है जितना अमित और माधव का था. वह बस अमित की आवाज़ का नक़ल करता है और यह दिखाने की कोशिश करता है कि यह सब बुराइयाँ अमित ही करता है. लेकिन, बाद में वह माधव को स्पष्ट करता है कि यह आईडिया उसे यह महसूस करवाने के लिए था कि जब कोई तुम्हारी प्यारी बहन को छेड़ता है तो तुम्हें कैसा लगता है. इस तरह की सोच पूरी दुनिया में बहुत पॉपुलर है– जब एक आदमी दुसरे आदमी की औरत से बदतमीजी करता है तो बदले में उसकी औरत से भी यही बदतमीजी करनी चाहिए. जबकि दोनों मामलों में औरतें एक तरह से बेकसूर होती हैं. इसीलिए आदमियों के झगड़े में उनको घसीटने और दंडित करने का यह आईडिया बहुत खतरनाक है.

अगर फ़िल्म में एक छोटा-सा स्पष्टीकरण यह होता कि अपराधी क्यों यह सब अपराध करते हैं तो यह भी कहानी के लिए और भी अच्छा होता, और आखिर में इतनी लड़ाइयों के बाद नायक के चेहरे पर ज़्यादा निशान दिखने चाहिए थे. मेनस्ट्रीम सिनेमा का हीरो सुपर हीरो की तरह होता है लेकिन फिर भी इतनी पिटाई के बाद हीरो के चेहरे में भी कोई न कोई चोट तो आता ही है. इन कमियों के बावजूद “काबिल” वीकेंड के शाम के लिए बहुत अच्छी फ़िल्म है जिसे देखते समय दर्शक रो सकते हैं, हंस सकते हैं और अंत में राहत महसूस कर सकते हैं.

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तत्याना षुर्लेई पोलैंड की रहने वाली हैं, एक इंडोलॉजिस्ट (भारतीय उपमहाद्वीपीय भाषा और संस्कृति की जानकार)  और फिल्म आलोचक हैं. हिंदी की मशहूर पत्रिकाओं और ब्लॉग्स के लिए लिखती रही हैं. पोलैंड के शहर क्राकोव स्थित जेगिलोनियन विश्वविद्यालय से “द कोर्टसन फिगर इन इंडियन पॉपुलर सिनेमा: ‘ट्रेडिशन, स्टीरियोटाइप, मैनिपुलेशन” नामक विषय पर पीएचडी हैं. वर्तमान में मनिपाल विश्वविद्यालय, कर्नाटक के यूरोपीय अध्ययन संस्थान में पढ़ाती हैं.

आत्महंता की डायरी और बेकशिंस्कि का घर: मग्दालेना जेबाउकोव्स्का

बीसवीं-इक्कीसवीं सदी के विश्वस्तरीय, चर्चित, पोलिश चित्रकार ज़्जिसुअव बेकशिंस्कि का जीवन उनकी कृतियों की तरह ही सर्रियलिस्ट-स्पर्श लिए हुए अविश्वसनीय जान पड़ता है. उन्नीस सौ अंठानवे में उनकी पत्नी की मृत्यु की होती है. उन्नीस सौ निन्यानवे के क्रिसमस की पूर्वसंध्या के अवसर पर उनका इकलौता पुत्र तोमष, जो कि बहुत ही लोकप्रिय रेडियो उद्घोषक, संगीत-पत्रकार और अनुवादक था, आत्महत्या कर लेता है. सत्रह बार चाक़ू से गोदा गया बेक्शिन्स्कि का मृत शरीर इक्कीस फ़रवरी, दो हजार पाँच को उनके ही फ्लैट में पाया जाता है. यह धत् कर्म उनके ही केयरटेकर के नाबालिग पुत्र द्वारा किया गया था. मग्दालेना जेबाउकोव्स्का ने अपनी पुस्तक बेक्शिन्स्कि: एक दोहरी तस्वीर‘ (The Beksinskis: Double Portrait[i]) में बखूबी इन दृश्यों को जगह दी है. पोलिश इंडोलॉजिस्ट तत्याना षुर्लेई ने इसी किताब के शुरूआती हिस्से को यहाँ अनुदित की है.

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बेकशिंस्कि के परिवार के चित्र

By मग्दालेना जेबाउकोव्स्का 

आत्महंता की डायरी और बेकशिंस्कि का घर

एक चिट्ठी 

प्रिय एवा! एक बुरी खबर है। तोमेक[ii] मर गया। क्रिसमस की पूर्व संध्या पर उसने आत्महत्या कर ली और क्रिसमस के दोपहर, करीब तीन बजे मुझे उसकी लाश मिली। मैं पहले ही तुमको इस संबंध में लिख चुका हूँ कि अगस्त या इससे पहले से ही रेड अलर्ट था, और अब इस तरह इसकी समाप्ति हुयी।

अभियोजन पक्ष के कार्यालय के समक्ष जाने से पहले ही मैंने सारे भौतिक सबूतों को छुपा दिया है। क्योंकि, कागज़ के एक टुकड़े पर तोमेक ने लिखा कि मेरे लिए कंप्यूटर में एक चिट्ठी और डिक्टाफोन में एक मैसेज है।  डॉक्टर के आने से पहले ही मैंने कॉपी को सुरक्षित रख कंप्यूटर से चिट्ठी को हटाया, फिर कागज़ के टुकड़े और डिक्टाफोन को जेब में छुपाया। क्योंकि, मुझे डर था कि पुलिस सब कुछ अपने कब्जे में ले लेगा और बाद में अलग-अलग अंजान लोग इसे सुनेंगे, पढ़ेंगे और इसके बारे में पीएचडी लिखेंगे। मुझे लगता है कि मैंने जो किया अच्छा किया। हालांकि, पुलिस और अभियोजन पक्ष वाली औरत यह समझ नहीं सकती थी कि उसने क्यों कोई चिट्ठी नहीं छोड़ा। उन लोगों के बीच सब से बड़ा शक इसी एक बात से पैदा हुआ।

वास्तव में, इस चिट्ठी से मुझे अधिक वस्तुगत जानकारी मिली। जैसे कि, किसको क्या देना चाहिए और कौन-से काम पुरे करने हैं। मैं यह चिट्ठी उनको दिखा सकता था, लेकिन इसे पढ़ने के लिए मेरे पास समय नहीं था। और, टेप इतना व्यक्तिगत था कि इसे सिर्फ मैंने सुना, शायद एक और बार सुनकर इसको नष्ट करूंगा, जैसी उसकी इच्छा थी। उसकी यह भी प्रार्थना थी कि उसकी टेप वाली डायरी को (सुनने या न सुनने के बाद), जिसमें बहुत सारे टेप हैं, भी नष्ट करूँ।

जोशा की मौत के बाद, पहली बार मुझे एक अजीब-सी खुशी का अहसास हुआ कि यह सब होने के पहले ही वह मर गई, क्योंकि यह उसके लिए असहनीय होता। मैं ज़्यादा सहनशील हूँ, वैसे भी अंत में यहाँ किसी का रहना जरुरी है।

सिर्फ़ मुझे मालूम था कि तोमेक के लिए जीवन मुश्किल था। अहंवादी और अहंकारी होने के बावजूद, कोई अपनी नियति खुद नहीं चुनता। लेकिन, मुझे लगता है कि यह जो कुछ भी हुआ, अच्छा हुआ।

टेप पर दर्ज उसका अंतिम संदेश यही था कि जिस दुनिया में उसको जीना पड़ता है इससे वह कितना निराश है। उसे हमेशा एक अलग दुनिया चाहिए थी, जहां के नियम सीधे होते हैं, दोस्ती हमेशा सही होती है या ऐसा कुछ…।

इस मैसेज का अंत लगभग इस तरह था, “मैं जानता हूँ कि मेरी दुनिया कल्पना की दुनिया है, लेकिन उन इकतालीस सालों में मैं भी शायद एक कल्पना था। मैं कल्पना की दुनिया में जा रहा हूँ, क्योंकि मैं सिर्फ़ वहाँ ही खुश रह सकता हूँ। हाथ जोड़कर तुमसे विनती करता हूँ कि मुझे जगाना मत।”

उसने याकूब की सीढ़ी वाला टीशर्ट पहना था, और मुझे नहीं मालूम कि इसका कोई प्रतीकात्मक अर्थ था या नहीं!

उसे डर था कि नींद की गोलियां जब तक उसे मारेगी, उससे पहले मैं आ जाऊंगा! इसलिए, उसने टेप के संदेश में कहा कि तेईस दिसम्बर से उसने कुछ नहीं खाया है ताकि गोलियां जल्दी से अपना काम करें, और गोलियों के डिब्बे को बाहर के कूड़ेदान में फेंका ताकि डॉक्टर को पता न चल सके  कि उसने क्या खाया है!

वह तेईस तारीख की शाम को ही यह करना चाहता था। लेकिन, उसे याद आया कि वह हर शुक्रवार को घर आकर अखबार में छपे टीवी-कार्यक्रम के विवरणों में से पसंदीदा फिल्मों को चिन्हित करता है। ताकि, बाद में उसे देख सके और इसके लिए प्रसारण के समय उन्हें रिकॉर्ड करना चाहिए। वह जानता था कि इस दिन अगर वह नहीं आएगा तो मैं परेशान होकर चेक करूंगा कि क्या हुआ। इसलिए चौबीस दिसम्बर को दोपहर दो बजे मेरे पास आ गया और ऐसी फिल्मों को मार्क किया जो सिर्फ उसके लिए दिलचस्प हो सकती थीं, क्योंकि मुझे वेस्टर्न पसंद नहीं हैं। यह सब कुछ मुझे दिलासा देने के लिए था ताकि मैं कुछ अनुमान न करने लगूँ, और सच में उसका यह प्रयास सफल हुआ।

गोलियाँ खाने के बाद रिकॉर्ड हुए टेप से पता चला कि उसने गोलियों को चौबीस तारीख को दोपहर के तीन बजकर पाँच मिनट पर खाया। मैं चौबीस घंटे बाद वहाँ पहुँचा। वहाँ पहुँचने से पहले मैं कुछ परेशान था क्योंकि उसकी अच्छी दोस्त, अनया ओर्तोदोक्स[iii] ने फोन की और बतायी कि जब वह मेरे घर से अपने घर वापस गया था तभी अनया ने तोमेक से बात की थी और उसे लगा कि तोमेक की तबियत ठीक नहीं है। इसलिए वह बोली कि मैं उसके पास जाऊँ या उसको अपने यहाँ बुलाऊँ।

चूँकि, तोमेक ने मुझसे कहा था कि बीमार होने की वजह से वह दो दिनों के लिए फोन को स्विच ऑफ करेगा, ताकि उसकी तबीयत में सुधार हो। शुरू में मुझे लगा कि सच में उसने यह किया। अनया से बातचीत करने के बाद मैंने तोमेक को फोन किया लेकिन सिर्फ ऑटोमेटिक और रिकॉर्ड स्वर ही सुनाई देते थे, उसका मोबाइल फोन बंद था। मैं वहाँ गया और बार-बार दरवाजे की घंटी बजाता रहा। अब मुझे याद नहीं है, लेकिन यह शायद दोपहर चार बजकर पचास मिनट या पाँच बजकर दस मिनट था। उसने दरवाजा नहीं खोला और मेरे पास चाभी नहीं थी (अगले दिन मुझे पता चला कि उसने मेरे घर में अपनी चाभियों को दिनुव[iv] से खरीदी गयी एक चीनी मिट्टी के गमले में रखा है, अन्य दूसरी चीजों के नीचे) तो मैंने सोचा कि उसने नींद की गोली खाकर और कानों में इअरफ़ोन लगा सो रहा है। दरवाजे तोड़ना मैंने ज़रूरी नहीं समझा। दूसरे दिन मुझे उसकी चाभियाँ मिली और जब मैं तोमेक के पास पहुंचा तो वह बहुत समय से मरा हुआ था। हाँ, ऐसा ही था। ठीक है, अगर तुमको कुछ और जानना चाहिए तो लिखो! सभी को नमस्कार।

ज़्जिसुअव।

वारसा: रविवार, 26 दिसम्बर, 1999, दोपहर 4:07।

***

घर

हर किसी को यह घर धोखा देता था, जो उसे पूरी तरह जानने और समझने की कोशिश करता था। उसने किसी को भी घर की पूरी तस्वीर उतारने की अनुमति नहीं दी। सिर्फ अहाते की ओर से अंदर प्रवेश पाने वाली टूटी हुई सीढ़ियों की, या बगीचे की ओर से झाड़ियों के बीच से ऊँचे उठे हुए सड़े बरामदे की, या एक दीवार पर लकड़ी के हिले हुए रेलिंग की और उपेक्षित अहाते की ही, जहाँ ऊँची छत वाला एक छोटा कुआँ था, तस्वीर खींचना संभव था। एसेनबह की दवाई की दुकान के पीछे छुपा यह घर सड़क से दिखाई नहीं देता था और पेड़ों के पीछे होने के कारण पुओव्येत्स्कि नदी की ओर से भी दिखाई नहीं देता था। शुरू-शुरू में यह घर बॉयलर के वर्कशॉप होने के रहस्य की रक्षा करता था।

हेनरिक वनिएक, ज़्जिसुअव बेकशिंस्कि का दोस्त, को यकीन है कि यह घर, बीच में एक छोटे अहाते के साथ, एक वर्ग की संकल्पना पर आधृत है; जिसमें बाहर से कोई सीधा प्रवेश-द्वार नहीं था। इसे देखकर उसे एन्फ़िलैड की याद आती है जिसमें एक कमरे से दूसरे कमरे तक जाने का रास्ता घुमावदार होता है।

लेकिन यह असम्भव है क्योंकि लकड़ी का यह घर, जिसके छत धातु के प्लेटों से बने थे, अन्य इमारतों के बगल में U आकार में खड़ा था। जो, सामने या अन्दर से एक मंजिली हवेली जैसा था और ऊपर-ऊपर से देखने पर किसी ग्रामीण घर जैसा आभासित होता था।

अतिथियों को यह घर अव्यवस्थित लगता था। मेहमान अंधेरे गलियारे में पहुँचते ही जगह और समय के बारे में भूल जाते थे। लोग स्टूडियो से बाथरूम जाना चाहते थे तो बरामदे में पहुँचते थे। बच्चे के कमरे में जाना चाहते थे और ज़ोफ़िया के कमरे में पहुँच जाते थे। रसोईघर से कोठार जाने या तोमष के कमरे से स्तनिसुआवा दादी के कमरे जाने की प्रक्रिया अक्सर घर के सभी सदस्यों को परेशान करती थी। स्टूडियो के दरवाजे को ढूँढने की प्रक्रिया में अचानक एक आलमारी सामने आ जाती थी, जिसमें प्लास्टर की ढेर सारी खोपड़ियाँ होती थीं।

बाथरूम जाने के रास्ते को ज़्जिसुअव ने छोटी-छोटी बल्बों से सजाया था, रात के समय यह सजावट मदद करने की बजाय परेशानी का सबब बन जाती थी। एक बार बेकशिंस्कि ने वनिएक को बताया कि गलियारे में लगे बल्ब उसके सपनों के जटिल मामले का एक हिस्सा है।

घर के लिए नवीनीकरण कोई मतलब नहीं रखता था, जैसे, दीवारों को अंदर और बाहर से रंगना, बरामदे के टूटे हुए रेलिंग को ठीक करना। घर को इसकी परवाह नहीं थी कि लिविंग रूम को स्टूडियो, और बेडरूम को तोड़कर दो नए कमरे बना दिए गए थे, दूर के कमरों में किरायेदार रहते थे। धीरे-धीरे झड़ते प्लास्टर के कारण दीवारें अपनी नंगी होती लकड़ियों को गोचर करती हुयीं घर की अगोचरता को लगभग नष्ट कर रही थीं।

सनोक शहर के इसी घर में बेकशिंस्कि परिवार की पाँच पीढ़ियाँ रहती थीं। सिर्फ सड़क के नाम अलग-अलग थे। गलिसिया (ऑस्ट्रियन-हंगरियन कब्जे के समय) के ज़माने में  सड़क का नाम ‘ल्वोव्सका’ था, दूसरे गणतन्त्र में ‘यागिएलोनियन’ हो गया, इसी तरह जर्मनी के कब्जे के समय इसका नाम ‘एडोल्फ हिटलर मार्ग’ और साम्यवादी ज़माने में ‘श्वियेरचेव्स्कि[v] मार्ग’।

बेकशिंस्कि परिवार का घर अब नहीं है। बीसवीं शताब्दी के सत्तर के दशक के अंत में उसे नष्ट कर दिया गया।

बेकशिंस्कि परिवार भी अब नहीं है। परिवार के अंतिम सदस्य ज़्जिसुअव की 2005 में हत्या कर दी गयी।

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Tatiana Szurlej

अनुवादक तत्याना षुर्लेई ,  एक  Indologist और फिल्म-आलोचक हैं। हंस, पाखी, पहल, अकार आदि हिंदी-पत्रिकाओं के लिए लिखती रही हैं। पोलैंड के शहर क्राकोव स्थित Jagiellonian University से  ‘The Courtesan Figure in Indian Popular Cinema : Tradition, Stereotype, Manipulation’ विषय पर पीएचडी की हैं। इनसे  tatiana.szurlej@gmail.com पर संपर्क संभव है.

 

[i] Magdalena Grzebałkowska, Beksińscy. Portret podwójny, Wydawnictwo Znak, Kraków 2014

[ii] पोलिश भाषा में लोगों के मूल नाम के अलग-अलग प्रकार हो सकते हैं जिनका इस्तेमाल परिवार या दोस्तों से किया जाता है। इसलिए मूल नाम तोमष (Tomasz) से तोमेक (Tomek) या तोमेचेक (Tomeczek) के प्रकार होते हैं, ज़ोफ़िया (Zofia) से ज़ोशा (Zosia), ज़्जिसउअव (Zdzisław) से ज़्जिसेक (Zdzisek), आदि।

[iii] अनया ओर्तोदोक्स (Anja Orthodox) क्लोस्तेर्केलर (Closterkeller) नाम के पोलिश बैंड की गायिका है।

[iv] दिनुव (Dynów) दक्षिण-पूर्व पोलैंड का छोटा शहर है।

[v] जनरल करोल श्वियेरचेव्स्कि (Karol Świerczewski) रेड आर्मी और पोलिश आर्मी का सैनिक, कम्युनिस्ट कार्यकर्ता।

हैदर और बर्फ के अंगारे: तत्याना षुर्लेई 

कलाकार की रचना-प्रक्रिया से वास्ता रखना सिर्फ एक बौद्धिक शगल नहीं होता है बल्कि इसका सीधा संबंध पाठ-प्रक्रिया से भी होता है. पाठ-प्रक्रिया को ज्यादा दूर तक खींचने की जरुरत नहीं है बल्कि इसे अभी समीपी-अध्ययन (Close Reading) तक ही सीमित रखा जाय तो बेहतर है. विशाल भारद्वाज ‘हैदर’ क्यों बनाना चाहता था? क्या इस सवाल को ढूंढें बिना ‘हैदर’ की ‘क्लोज रीडिंग’ की जा सकती है !! इसे बहुत सरल शब्दों में कहा जाए तो वह यह कि विशाल भारद्वाज शेक्सपीयर के तीन नाटकों पर फिल्म बनाना चाहता था. ‘मैकबेथ’ और ‘ऑथेलो’ पर क्रमशः ‘मकबूल’ और ‘ओमकारा’ बना चूका था. इसी प्रक्रिया को आगे बढ़ाते हुए उसने ‘हैमलेट’ को ‘हैदर’ के रूप में परदे पर रूपांतरित किया है. ‘हैदर’ की परिवेश विषयक ‘असंगतियों’ पर अथाह चर्चाएँ हो चुकी हैं और ऐसी तमाम चर्चाएँ कहीं न कहीं ‘फिल्म’ को कला के एक विधा के रूप में, एक प्रसिद्द नाटक के दृश्य में रूपांतरण के सन्दर्भ में और एक निदेशक की रचना-प्रक्रिया के सन्दर्भ में देखने में अक्षम रही हैं. तत्याना ने इन्हीं अछूते मुद्दों को बारीकी से देखने की कोशिश की है.

हैदर (२०१४)- पोस्टर

हैदर (२०१४)- पोस्टर

 By तत्याना षुर्लेई 

50 अलग अडॉप्टेशन के बाद नया और इतना अच्छा हैमलेट सिर्फ एक जीनियस बना सकता था।

हैमलेट का अभिनय करना न सिर्फ हर अभिनेता का ख्वाब होता है, बल्कि यह वह नाटक भी है जिसकी अलग-अलग व्याख्याएं हर दौर में संभव होती रहेंगी और शायद इसलिए इसका संयोजन आसान नहीं है। ‘हैदर’ विशाल भारद्वाज की ऐसी तीसरी फिल्म है जो शेक्सपीयर के नाटकों पर आधारित है और यह भी लगता है कि यह अब तक की उनकी सबसे अच्छी फिल्म है।

‘हैदर’ की कहानी कश्मीर में चल रही है, इससे अच्छी और प्रासंगिक बात कुछ और हो नहीं सकती थी। शेक्सपीयर के नाटक में कहा जाता है कि देश की स्थिति ठीक नहीं है और वह देश अक्सर जेल जैसा दिखाया जाता है। भारत में कश्मीर के अलावा वह कौन-सा प्रदेश हो सकता था जहां की स्थिति नाटक की तरह ही गड़बड़ है और जिसके नागरिक कैदी की तरह जीवन बिताते हैं? बहुत से आलोचक इस फिल्म की राजनीतिक स्थिति के बारे में लिखते हैं, लेकिन सबसे पहले यह स्पष्ट करना जरूरी है कि विशाल भारद्वाज चाहते क्या थे? वह चाहते थे कि फिल्म के दर्शक न सिर्फ ‘हैदर’ के दुःख को समझें बल्कि यह भी देखें कि वह अपने पिता की तरह ही विक्टिम बन गया है। फिल्म के निर्देशक को इतनी जटिल परिस्थितियों की तलाश इसलिए भी थी ताकि वे वास्तव में शेक्सपीयर के नाटक से मिलती-जुलती लगें। दि ट्रेजेडी ऑफ हैमलेट, प्रिंस आफ डेनमार्क में डेनमार्क न सिर्फ नायकों का देश है बल्कि पूरी दुनिया का एक निचोड़ भी पेश करता है जहां बुराई का राज है और बुरे लोग हमेशा जीतते हुए पाए जाते हैं। विशाल भारद्वाज की फिल्म में यह वक्तव्य-विवरण (statement) भी बहुत अच्छी तरह दिखाया गया है। आजकल कोई नहीं बोलेगा कि अगर धरती पर कहीं स्वर्ग है तो वह यहीं है यहीं है यहीं है, क्योंकि आज का कश्मीर एक नर्क है जहां के लोग भयरहित नहीं हैं और वहां किसी को नहीं मालूम है कि कौन दोस्त है और कौन दुश्मन। नर्क जैसे भयावह और भयानक समय-समाज में मनोरंजन (बॉलीवुड/सिनेमा) एक ख्याली पुलाव है, जहां सलमान खान के नकलची/प्रशंसक भी हत्यारे निकलते हैं और सिनेमा-घर का इस्तेमाल लोगों को मौत की सजा देने के लिए होता है। संघर्ष के दोनों पक्ष समान रूप से जालिम हैं और यह दयाहीनता हैदर और उसके पिता के अंदर भी घुसपैठ बढ़ा रही है। नायक का पिता, डॉक्टर हिलाल इंतकाम चाहता है और हैदर भी सचमुच में मानने लगता है कि इंसाफ पाने का यही एकमात्र विकल्प है, लेकिन अंत में वह समझ जाता है कि यही वह इंतकाम है जिसके चलते उसमें, कश्मीर में और पूरी दुनिया में दयाहीनता और निर्ममता या कहें कि बुराई हमेशा के लिए विद्यमान रहेगी। क्या कश्मीर के अलावा इतना प्रासंगिक कोई दूसरा उदाहरण संभव था? यह स्थान इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि फिल्म के परिवेश में व्याप्त ठंडापन और सख्ती भी शेक्सपीयर के डेनमार्क से मिलती-जुलती है जो इस बात के लिए भी उकसाती है कि विशाल भारद्वाज का रूपांतरण दि ट्रेजेडी ऑफ हैमलेट, प्रिंस ऑफ डेनमार्क से एक मायने में अलग भी है और बहुत समान भी। फिल्म में ज्यादा रंग नहीं दिखाए जाते हैं और जो हैं भी, वे धीरे-धीरे गायब हो जाते हैं। अंत में बस एक तेज रंग, लाल, ही बाकी रह जाता है जिसे फिल्म में बर्फ से भरपूर एकवर्णी दृश्य में अलग से चटखता हुआ दिखाया जाता है।

अत्यधिक ठंडे माहौल के कारण संघर्ष और खतरे का एहसास और भी जोरदार बन जाता है। विशाल भारद्वाज की इस फिल्म में कहीं भी वातानुकूल या गर्म माहौल नजर नहीं आता है। जब लोग अपने घरों में हैं तब भी उनके मुंह से भाप निकलती है। बस प्रेम-दृश्यों में यह ठंड थोड़ी-सी कम हो जाती है, और यह सिर्फ हैदर और अर्शिया के प्रेम-प्रसंगों में ही नहीं दीखता है बल्कि गजाला और खुर्रम के प्रेम-प्रसंगों में भी दर्शनीय है। इस फिल्म में नाटक से जो सबसे बड़ा अंतर दीखता है, वह यह है कि फिल्म में हैदर का चाचा उसके पिता और अपने भाई को राज्य के लिए नहीं बल्कि उसकी बीवी को पाने के लिए फंसाता है और बाद में मरवा देता है। यह बड़ा अंतर भी कुछ आलोचकों को पसंद नहीं है, लेकिन शेक्सपीयर के नाटक के आधुनिक रूपांतरण में राज्य को हड़पना दिखाना थोड़ा मुश्किल है और यह अजीब भी लग सकता है, क्योंकि वह आज के समय में बड़ी कंपनियों में चलने वाली हैमलेट की कहानी बन चुकी है… (Hamlet, Michael Almereyda, 2000) गजाला अपने पति से ज्यादा खुर्रम को प्यार करने लगती है और शायद इसलिए कि डॉक्टर हिलाल अपने काम में ज्यादा व्यस्त रहता है और खुर्रम के लिए सिर्फ गजाला सबसे महत्वपूर्ण है। यद्यपि यहां फिल्म नाटक से अलग है। एक औरत के लिए किसी को मार देना या युद्ध तक करना कोई नई बात नहीं है, न सिर्फ यूरोपीय साहित्य में बल्कि भारतीय साहित्य में भी इसे आसानी से चिन्हित किया जा सकता है। फिर भी, जो नई और दिलचस्प बात विशाल भारद्वाज की फिल्म में है, वह यह है कि मेच्योर औरत को दिखाने के इस नए तरीके के लिए बॉलीवुड के दर्शकों को ‘हैदर’ तक बहुत इंतजार करना पड़ा है। हैदर की मां अपनी ढलती उम्र के बावजूद एक सुंदर और आकर्षक औरत होने के एहसास को महसूस कर सकती है, उसे अपने प्रति एक आदमी को पागल बनाने के लिए होमर वाले ‘दी इलियड’ की हेलेन ऑफ ट्रॉय या रामायण की सीता की तरह जवान होने की आवश्यकता नहीं है, और ऐसी नायिकाएं भारतीय सिनेमा से अक्सर गायब ही दिखती हैं। फिल्म की शुरुआत में गजाला को दूसरी मुसलमान औरतों की तरह ही दिखाया जाता है, लेकिन खुर्रम के घर जाने के बाद उसके कपड़े बदल जाते हैं, बाल वह हमेशा खुले रखती है और वह सचमुच में एक लुभावनी (सिडक्टिव) औरत में तब्दील हो जाती है। गजाला को सिर्फ खुर्रम से ही प्यार नहीं है, बल्कि सबसे पहले उसे अपने बेटे से प्यार है, इसलिए उसकी आत्महत्या अर्शिया की खुदकुशी से अलग है। पिफल्म की ये दो औरतें ‘गलत प्यार’ में पड़ जाने या पिफर परिस्थितिगत विपर्यय के कारण खुद को मार लेती हैं। अर्शिया अपने पिता के खूनी से प्यार करती है, गजाला अपने पति के हत्यारे से, और यह उनके लिए असहनीय है। गजाला की मौत में क्रोध्, हलचल और नाटकीयता भी है क्योंकि वह न सिर्फ खुद को मारना चाहती है, बल्कि अपने बेटे को बचाना भी चाहती है। अर्शिया की मृत्यु अपेक्षाकृत उत्तेजनाविहीन और शांत है। अपने पिता की मौत के बाद वह नाटक की नायिका की तरह पागल हो जाती है, लेकिन दूसरों को फूल देने के बदले वह अपने पिता के लाल स्कार्फ को रेशा-रेशा बर्बाद करती हुई दिखती है। यह स्कार्फ उसने खुद ही बनाकर अपने पिता को भेंट किया था और हैदर को पकड़ते समय अर्शिया का पिता इसी स्कार्फ से हैदर की गर्दन को अपने काबू में लेता है। आज उसी स्कार्फ के रेशे-रेशे हो गए, रेशम उसके जख्मों को प्रतिबिंबित करता हुआ जान पड़ता है। इस दृश्य को विशाल भारद्वाज ने एक काव्यात्मक ऊंचाई दी है।

दि ट्रेजेडी ऑफ हैमलेट, प्रिंस ऑफ डेनमार्क को देखने वाले हमेशा दो दृश्यों का इंतजार करते हैं : पहला नायक द्वारा उच्चरित, टू बी ऑर नॉट टू बी वाला आत्मालाप और दूसरा नायक द्वारा खोपड़ी से बातचीत। फिल्म में टू बी ऑर नॉट टू बी, टू गो ऑर नॉट टू गो हो गया है जो इसे व्यंग्यात्मक और थोड़ा-सा निराशाजनक भी बनाता है, हालांकि यह शेक्सपीयर से मिलता-जुलता भी है क्योंकि उसके नाटक में बहुत सारे हास्यप्रद तत्व मिलते हैं, लेकिन खोपड़ी वाला दृश्य एक मास्टरपीस है। नाटक में कब्रिस्तान में काम करने वाले हैमलेट की प्रेमिका के लिए कब्र बना रहे हैं और फिल्म में तीन बूढ़े अपने लिए कब्र बना रहे हैं। कब्रिस्तान में गाने वाले बूढ़े प्राचीन ग्रीस के नाटकों के कोरस की तरह पूरी कहानी का समाहार पेश करते हैं। उनकी तीन कब्रें ऊपर से एक खोपड़ी जैसी दिखाई जाती हैं। वह खोपड़ी, कब्रिस्तान और थके हुए लोग, जो सोना चाहते हैं और जिनके लिए उम्मीद सिर्फ अंधेरा ही अंधेरा है, पूरे कश्मीर का रूपांतरण भी बन जाते हैं, गजाला और हुसैन मीर के शब्दों से ज्यादा मजबूत। हैदर की मां और उससे पहले हुसैन मीर कहता है कि इंतकाम से आजादी नहीं मिलती है, लेकिन वह शायद इसलिए नहीं मिलती है क्योंकि लोग सचमुच ही ज्यादा थक गए हैं।

फिल्म की संरचना को अगर बारीकी से देखें तो इसकी बुनावट में निर्देशकीय रचनात्मकता का एक सचेत प्रयास स्पष्ट ही दिखता है। इसमें बहुत से दृश्य बार-बार जोडि़यों में दिखाए जाते हैं। फिल्म की शुरुआत में डाॅक्टर के घर को बारूद से उड़ाकर धूल में मिला दिया जाता है और अंत में कब्रिस्तान में ऐसे ही एक दूसरे घर को इसी तरह से नष्ट किया जाता है। अपने घर के खंडहर में हैदर जब पहली बार अर्शिया के साथ होता है, तब लड़की का भाई आता है, जब दूसरी बार वहीं वह अपनी मां से मिलता है, तब अर्शिया का पिता आता है। मरे हुए लोगों की लाशों के ढेर से एक लड़का उठ जाता है, कब्रिस्तान में जीवित लोग कब्र में लेट जाते हैं। डॉक्टर के घर में इबादत करने वाले एक आदमी को मार दिया जाता है, बाद में खुर्रम को उसका इबादत करना ही उसे मरने से बचा लेता है। गजाला अपने शाल के नीचे छिपाए रिवाल्वर से अपने बेटे को इमोशनली ब्लैकमेल करती है और बाद में शाल के नीचे छिपाए हुए ग्रेनेडों से खुदकुशी करती है। दूसरी दिलचस्प बात फिल्म में गाने का इस्तेमाल है जो बहुत ही अच्छा बन पड़ा है। सब से जीनियस दृश्य कब्रिस्तान में होने वाला कार्य-व्यापार है जिसकी चर्चा ऊपर की गई है। हैदर द्वारा गजाला और खुर्रम को, संकेत में ही सही, संबोधित नाटकीय और कहानीनुमा गाना भी बहुत ही खास है और उसका नृत्य और चेहरे पर रंगों की लकीरें न सिर्फ जनजातीय लोगों में प्रचलित युद्ध वाले नाच जैसा है, बल्कि एक तरह से तांडव-दृश्य को रचता हुआ मालूम पड़ता है।

शुरू में मैंने लिखा कि हैमलेट का अभिनय करना हर अभिनेता का ख्वाब है और इस फिल्म में शाहिद कपूर ने न सिर्फ इस ख्वाब को निभाया है बल्कि उसने और तब्बू ने पूरी फिल्म को ही लगभग चुरा लिया है।

साभार- पाखी, नवम्बर, २०१४ 

Tatiana Szurlej

Tatiana Szurlej

तत्याना षुर्लेई एक Indologist और फिल्म-आलोचक हैं। हंस, पहल, अकार आदि हिन्दी पत्रिकाओं के लिए लिखती रही हैं। फिलहाल पोलैंड के शहर क्राकोव स्थित Jagiellonian University में The Courtesan Figure in Indian Popular Cinema:Tradition, Stereotype, Manipulation. नामक विषय पर पीएचडी के लिए शोधरत हैं। 

पोलिश मिथक और अधमताएँ: तत्याना षुर्लेई

पोलैंड में तत्याना की ख्याति भारत-विज्ञ के साथ-साथ फिल्म-आलोचक के रूप में है। वे बॉलीवुड की फिल्मों को पैशन के साथ देखती हैं । उनके शोध-विषय का एक हिस्सा बॉलीवुड के साथ जुड़ा हुआ है। उनके द्वारा मूल रूप से हिन्दी में लिखे गए पूर्व प्रकाशित लेख भी बॉलीवुड-भारतीय सिनेमा से ही संदर्भित रहे हैं । हमने उनसे आग्रह किया कि पोलिश सिनेमा के बारे में भी कुछ नयी जानकारियाँ हिन्दी के पाठकों को मिलनी चाहिए । तत्याना का यह लेख इसी आग्रह की पहली कड़ी है। यह लेख दो हिस्सों में विभक्त है । पहला हिस्सा पोलिश सिनेमा के पृष्ठभूमि को संक्षेप में सारगर्भित तरीके से स्पष्ट करता है और दूसरा पोलैंड के एक महत्वपूर्ण समकालीन फिल्मकार वोइचेह स्मजोव्स्कि की फिल्मों को विश्लेषित करता है ।

अपनी समस्याओं के जिम्मेवार तत्व के रूप में अक्सर रूस और जर्मनी और आस्ट्रिया आदि को चिन्हित करना, विश्वयुद्धों की विभिषकाओं को अपनी त्रासदियों का उत्स मानना, अधिकतर पोलिश सिनेमा के विषय-व्यवहार का हिस्सा रहा है । इसके चलते पोलिश फिल्मों में जो विविधता परिलक्षित होनी चाहिये थी, वह नहीं हो पायी । एकरसता मानों स्थायी भाव सा हो गया था । वोइचेह स्मजोविस्क की फिल्में उस एकरसता को भंग करती हैं ।

कैथोलिक चर्च के प्रभामंडल में सबसे ज्यादा आलोकित होने वाले देशों में मुख्यत: चार को उद्धृत  किया जा सकता है : इटली, स्पेन, आयरलैंड और पोलैंड । इटली पूरी तरह से और स्पेन लगभग चर्च के प्रभावशाली दुर्ग से बाहर निकल चुका है । आयरलैंड और पोलैंड अभी भी सबसे मजबूत दुर्ग के बतौर विद्यमान हैं, ये दोनों देश कहीं न कहीं जनांदोलन के भी केन्द्र रहे हैं । पोलैंड जहाँ तथाकथित कम्युनिस्ट अधिकृत शासन-व्यवस्था के विरूद्ध संघर्षरत रहा है वहीं आयरलैंड पूंजीवादी राय-व्यवस्था के प्रतिनिधि ग्रेट ब्रिटेन के विरूद्ध। विडंबना यह है कि आंदोलन के इन दोनों पहलुओं की निष्पत्ति सामाजिक-सांस्कृतिक व्यवहारों में कैथोलिक चर्च के प्रभुत्व के रूप में हुयी । चर्च के इस प्रभुत्व का असर पोलिश सिनेमा पर भी होना तय ही था, जिसके परिणामस्वरूप पोलिश फिल्मों में एक अध्यात्मिक माहौल का रचाव दिखता है, परम्परा और धार्मिक-संस्कार अनुष्ठानों का महिमा गान भी परिलक्षित होता है। वोइचेह स्मजोव्स्कि शायद पहला पोलिश निदेशक होगा जिसने पोलैंड में रहते हुए बहुत ही सफाई के साथ पोलिश-समाज की आत्मलोचना को दृश्यांकित किया है । फिल्मकार वेलरियन ब्रौव्चेक की याद आती है जो पचास के दशक में ही सीधे-सीधे चर्च से भिड़ गया था और जल्द ही निर्वासित होकर फ्रांस चला गया था । तत्याना ने बहुत ही विस्तार से उपर्युक्त सन्दर्भ-बिन्दुओं को विश्लेषित किया है ।

By तत्याना षुर्लेई

वोइचेह स्मजोव्स्कि (Wojciech Smarzowski) की फ़िल्मों में पोलिश मिथक और अधमताएँ

भारत-प्रवास के समय बहुत लोग मुझसे पोलिश सिनेमा और उसके निर्देशकों के बारे में पूछ रहे थे। इस कारण मैंने सोचा कि शायद यह विषय गैर पोलिश लोगों के लिए सचमुच दिलचस्प हो सकता है। पोलिश सिनेमा को समझना आसान नहीं है क्योंकि इसके लिए पोलैंड के बारे में थोड़ी सी जानकारी की ज़रूरत है। दूसरे महायुद्ध के बाद पोलिश सिनेमा जो युद्ध से पहले बहुत अच्छा था, बिलकुल ध्वस्त हो गया और स्टालिन की मौत तक अधिकांश फ़िल्में प्रचार (Propaganda) के लिए बनाई जाती थीं। 1953 के बाद फ़िल्मों के ऊपर नियन्त्रण (Censorship) थोड़ा कम हो गया जिसके कारण पोलिश सिनेमा अंतरराष्ट्रीय फ़िल्म समारोहों में जा पहुंची। इसी समय में पोलिश फ़िल्म स्कूल नाम की एक संस्था बनी। इस संस्था की फ़िल्मों के मुख्य विषय होते थे – युद्ध की घातक यादें, और इसके दो रूप थे: एक बहुत विलक्षण और वीरतापूर्ण जैसे अंजेई वइदा (Andrzej Wajda) की फ़िल्मों में और दुसरा, ज़्यादा कठोर और अवसादात्मक, जो कि अंजेई मुँक (Andrzej Munk) की फिल्मों में उपलब्ध है। येजि कवालेरोविच (Jerzy Kawalerowicz), कज़िम्येष कुत्स (Kazimierz Kutz), तदेउष कोन्वित्स्कि (Tadeusz Konwicki) और वोइचेह येजी हस (Wojciech Jerzy Has) पोलिश फ़िल्म स्कूल के दूसरे अन्य बहुत अच्छे निर्देशक थे। कुछ ऐसे भी निर्देशक थे जो पोलिश फ़िल्म स्कूल से संबंधित नहीं थे लेकिन वे भी दिलचस्प और प्रसिद्ध हैं जैसे: चेसुअव पेतेल्स्कि (Czesław Petelski), तदेउष ह्म्येलेव्स्कि (Tadeusz Chmielewski) और विदेशों में ज़्यादा मशहूर: रोमन पोलञ्स्कि (Roman Polański) और येजि स्कोलिमोव्स्कि (Jerzy Skolimowski).

60 और 70 के दशक में पोलिश फ़िल्म स्कूल की प्रासंगिकता धीरे-धीरे खत्म होनेवाली थी क्योंकि दूसरे महायुद्ध का ज़माना और उस समय की अवसादात्मक यादें पुरानी बात हो गई थी। आधुनिक समय इन सबसे ज़्यादा दिलचस्प लगने लगा था क्योंकि इस समय में भी बहुत सारी महत्त्वपूर्ण घटनाएँ घट रही थीं। अफ़सोस की बात यह है कि 1968 के बाद फिल्मों पर नियन्त्रण फ़िर से तीखा हो गया। इस साल में कज़िम्येष देइमेक (Kazimierz Dejmek) के निर्देशन वाले अदम मित्स्क्येविच (Adam Mickiewicz) के नाटक को पूर्वजों के त्योहार (Dziady) के पहले दिन ही नाट्यशालों में रोक दिया गया। पोलैंड के सारे विद्यार्थियों ने बड़े शहरों के सड़कों पर इस फैसले का विरोध किया। यह नाटक पोलिश संस्कृति के लिए बहुत महत्त्वपूर्ण है। मित्स्क्येविच ने इसे तब लिखा जब पोलैंड का बंटवारा किया गया। 1772, 1793 और 1795 में तीन बार पोलैंड का विभाजन हो चुका था और देश का एक हिस्सा रूस, दूसरा प्रशिया और तीसरा ऑस्ट्रीया के पास चला गया। रूस और प्रशिया पोलिश संस्कृति और भाषा को नष्ट करना चाहते थे जबकि ऑस्ट्रीया वाले हिस्से में जीवन इतना मुश्किल नहीं था और वहाँ कला का विकास संभव था। अदम मित्स्क्येविच का नाटक रूस के विरोध में है इसलिए 1968 में उसको दिखाना साम्यवादी सरकार को अच्छा नहीं लगा। विद्यार्थियों के प्रतिवादों के बाद सिनेमा की स्थिति फ़िर से मुश्किल हो गई और इसके कारण स्कोलिमोव्स्कि, पोलञ्स्कि और फ़ोर्द (Ford) पोलैंड को छोड़कर विदेश चले गये। इसी समय ऐतिहासिक सिनेमा प्रसिद्ध हो गया क्योंकि अतीत में घटित राजनीति वर्तमान को बहुत ज्यादा प्रभावित नहीं करती थी और ऐसी फ़िल्में सरकार के लिए कुशल भी थीं। इस समय में भी ऐसे निर्देशक अवश्य थे जिनकी फ़िल्में आधुनिक घटनाओं पर आधारित थीं, लेकिन ज़्यादा नहीं। इस समय में ऐसी फ़िल्में भी बनाई गईं जो रूस की सेना के दृष्टिकोण से अपनी कहानी कह जाती थीं।

70 और 80 के दशक के बीच के सिनेमा को सात्विक उत्सुकता का सिनेमा कह सकते हैं, जो कि पोलैंड के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण है। अंजेई वइदा इस दौर का भी बहुत महत्त्वपूर्ण निर्देशक था और उसके अलावा क्षिष्तोफ़ ज़नुस्सी (Krzysztof Zanussi), क्षिष्तोफ़ क्येश्लोव्स्कि (Krzysztof Kieślowski), फ़ेलिक्स फ़ल्क (Feliks Falk), फ़िलिप बयोन (Filip Bajon) और अग्ञेष्का होलांद (Agnieszka Holland)। इस समय जो फ़िल्में बनाई जाती थीं वे बहुत दुःखद और कठोर थीं इसलिए इनमें से ज़्यादातर को दिखाना उस समय में मना था। कान (Cannes) में ग्रैंड प्रिक्स जीतने वाली पहली पोलिश फिल्म को भी पोलैंड में कोई नहीं देख सकता था। ऐसी स्थितियों में पोलिश सिनेमा फ़िर से बिखर गया। कुछ निर्देशकों ने, जैसे अग्ञेष्का होलांद, पोलैंड छोड़ने का निश्चय किया। इस समय पोलैंड में प्रहसन और भावोत्तेजक फ़िल्में बनाई गईं क्योंकि इनमें तात्कालिक राजनीति की ज़रूरत नहीं थी। उन फ़िल्मों के मूल विषय धार्मिक-सांस्कृतिक रिवाज थे, जो आज भी बहुत प्रचलित प्रसंग है।

90 के दशक में फ़िल्मों के आर्थिक प्रबन्ध का तरीका बदल गया और पैसा देनेवाले अन्य स्रोत उपलब्ध नहीं थे । इस समय में बहुत ऐसी फ़िल्में बनीं जिनका विषय साम्यवाद और सैनिक कानून से संबंधित था और जो अपने समय की अलोचना प्रस्तुत करती थीं। कुछ ऐसे निर्देशक भी थे जिनके लिए राजनीति महत्त्वपूर्ण नहीं था लेकिन उनकी फ़िल्में शानदार हैं; जैसे यन यकुब कोल्स्कि (Jan Jakub Kolski) की फ़िल्में, जो भारत में भी काफ़ी लोकप्रिय हैं और अंजेई कोन्द्रत्युक (Andrzej Kondratiuk) की। उस समय में की फ़िल्में बहुत ही कठोर और निराशा भरी वास्तविकता को दिखाते हैं और जिनमें पोलैंड का चित्रण अच्छा नहीं है। उन फ़िल्मों में पोलैंड एक ऐसा देश है जो नयी जनतन्त्रीय रीति के लिए तैयार नहीं है और जहां ह्रासोन्मुख प्रवृतियाँ और अपराध हुकुमत करता है।

21 शताब्दी की शुरु में भी पोलिश सिनेमा के लिए बहुत अच्छा समय नहीं था क्योंकि ज़्यादातर फ़िल्में पोलिश साहित्य पर आधारित थीं। स्कूल में हर बच्चे को जिन किताबों को पढ़नी चाहिए थीं, उन सब पर फ़िल्में बन गईं और मज़ाक में लोग कहने लगे थे कि अब तो स्कूल के बच्चे न किताबें पढ़ते हैं न अच्छी फ़िल्में देखते हैं। कभी-कभी अच्छी फ़िल्में भी जरूर बनाई जाती थीं लेकिन वे भी खराब फ़िल्मों में डूब जाती थीं। 2005 में पोलिश फ़िल्मों का एक संस्थान बन गया जो कलात्मक फ़िल्में बनानेवालों को आर्थिक मदद देता है और जिसकी मदद से आजकल अच्छी फ़िल्में बनाई जाती हैं। मैं एक आधुनिक निर्देशक के बारे में कुछ लिखना चाहती हूँ जिसका नाम वोइचेह स्मजोव्स्कि है क्योंकि वह मुझे बहुत ही दिलचस्प लगता है। स्मजोव्स्कि बहुत अच्छी तरह से उस रीति का पालन करता है जिसमें इतिहास का मूल्यांकन संभव है और यह सब पोलैंड के लिए प्रतीकात्मक है, साथ ही साथ उसकी फ़िल्में बहुत ही ज्याद निष्ठुर और निराशावादी हैं जो कि एक नयी बात है। निराशावादी होना पोलिश सिनेमा में कोई नयी बात नहीं है लेकिन स्मजोव्स्कि की फ़िल्मों में किसी भी तरह की आशा नहीं है। स्मजोव्स्कि पोलैंड की सारी राष्ट्रीय पवित्र बातें और वर्जनाएँ दिखाता है और उनकी बहुत गहरी अलोचना करता है और इस कारण उसकी फ़िल्मों का असर बहुत तेज़ है। उसकी फ़िल्मों को अच्छी तरह समझने के लिए सब से पहले पोलिश लोकाचार को समझना चाहिए। पोलिश संस्कृति में कुछ बहुत ही बड़े घाव/निशान हैं जो साम्यवाद, युद्ध और बंटवारे से संबंधित हैं और जिनको हमेशा याद रखना चाहिए क्योंकि ये तत्व पोलिश संस्कृति के आधार हैं।

स्मजोव्स्कि की पहली फ़िल्म 1998 की है और इसका नाम है – बहिकर्ण (Małżowina) है। यह फ़िल्म एक कवि की रचनात्मक कमजोरी के बारे में है। फ़िल्म के नायक का नाम म. है और वह एक लेखक है जो किताब लिखने के लिए क्राकोव शहर (Kraków) के एक पुरानी इमारत में एक कमरा किराये पर लेता है। अफ़सोस की बात यह है कि यहाँ उसका लिख पाना असंभव है क्योंकि आसपास हमेशा कुछ ऐसा होता है जिससे वह परेशान हो जाता है। सब से बड़ी परेशानी पड़ोसियों के द्वारा खड़ी की जाती है, क्योंकि पति के शराब पीने के कारण पति-पत्नी रोज़ लड़ाई करते हैं। म. के पड़ोसी इतने आततायी हैं कि वह इस समस्या का समाधान कड़ाई से करता है। यह फ़िल्म नाटक की शैली में बनाई गई है इसलिए पूरी कहानी एक छोटे कमरे में चल रही है। फ़िल्म के नायक के अंधेरे, गंदे कमरे में दोस्त, लेनदार, मालकीन, पड़ोसी और अंत में पुलिस आते हैं। लेकिन इन सब लोगों के बावजूद फ़िल्म देखनेवालों को लगता है कि बहिकर्ण, जिसका नाम फ्रैंज काफ्का (Franz Kafka) की डायरी 1910-1923 के अवतरण से लिया गया है, के नायक ने न सिर्फ़ अपने पड़ोसियों को ईज़ाद किया बल्कि अपने पूरे अपराध को भी। चूँकि, परेशान करनेवाले लोग उसके दिमाग में घर कर गए लोग लगते हैं। इस फ़िल्म का मूल विषय कलाकर की ज़िम्मेदारी है और कलाकर का काम चरित्र और घटनाओं को उत्पन्न करने जैसा है, वह जन्मदाता है। किताबों, कविताओं, संगीत या तस्वीरों में जो लोग आते हैं वे अपना जीवन जी रहे हैं इसलिए हर कलाकर को उनके बारे में सोचना चाहिए और हर की ज़िम्मेदारी स्वयं कलाकार की ज़िम्मेदारी है। स्मजोव्स्कि की फ़िल्म एक दूसरी फ़िल्म, मार्क फोर्स्टर (Mark Forster) की स्ट्रैन्जर दैन फिक्शन (2006) से मिलती-जुलती है, और जिसका नायक एक दिन में समझता है कि वह वास्तविक आदमी नहीं है, सिर्फ़ एक किताब का नायक जिसे एक लेखिका ने अविष्कृत किया है। हालांकि बहिकर्ण में कष्टदायी पड़ोसियों का होना या न होना इतना स्पष्ट नहीं है लेकिन जब अंत में फ़िल्म का नायक अपने टंकण मशीन को फेंक देता है तो इसका मतलब यह हो सकता है कि उसने प्रतीकात्मक रूप में सचमुच अपने कल्पनाशील पड़ोसियों को मार दिया या ऐसा ही कुछ।

म. के चरित्र का अभिनय कोई पेशेवर अभिनेता नहीं करता है; इस भूमिका को मर्चिन श्व्येत्लित्स्कि (Marcin Świetlicki) ने किया और यह फ़िल्म के लिए बहुत महत्त्वपूर्ण व्यक्ति है, क्योंकि पोलिश संस्कृति में श्व्येत्लित्स्कि का योगदान बहुत ही महत्वपूर्ण है। मर्चिन श्व्येत्लित्स्कि लेखक और कवि है जिसका काम क्राकोव शहर से संबंधित है। क्राकोव पोलिश संस्कृति का केन्द्र है और वह 1795 तक पोलैंड की राजधानी थी। बाद में, बंटवारे के समय जब पोलैंड 123 सालों के लिए यूरोप से गायब हो गया; क्राकोव में, जो ऑस्ट्रीया का हिस्सा था, पोलिश संस्कृति का सब से ज्यादा विकास हुआ क्योंकि, जैसा कि मैंने ज़िक्र किया था, यह राज्य दूसरे दोनों राज्यों से ज्यादा उदार था। फिर भी, मर्चिन श्व्येत्लित्स्कि का क्राकोव बिलकुल अलग शहर है, जिसमें बहादुरी के लिए स्थान नहीं है, और वह कवि अक्सर राष्ट्रीय मिथकों और भक्तिभावना से परिपूर्ण रचनाओं की हंसी उड़ाता है। भूमिगत और साम्यवाद-विरोधी संस्थाओं से संबंध के बावजूद वह सोचता है कि सही और अच्छी कविता को हमेशा रीति-रिवाजों-परिपाटी के विरुद्ध होना चाहिए। हर तरह के रिवाज और किसी भी तरह के कानून के विरुद्ध। अपनी एक प्रसिद्ध कविता में, जिसका नाम यान पोल्कोव्स्कि के लिए है, उसने लिखा कि भक्तिभावना की रचनाएँ गुलाम की कविता है जिसके हर वृक्ष के अंदर काँटेदार तारों से बने होली क्रॉस (ईसाई धर्म-चिन्ह) छिपे होते हैं।

फ़िल्म का नायक विद्रोही कलाकर है और फिल्म में इस बात पर ज़ोर दिया गया है। जब फ़िल्म के एक प्रसंग में म. की सहेली कहती है कि अंजेई बुर्सा (Andrzej Bursa) उसके टाइपराइटर का इस्तेमाल करता था। अंजेई बुर्सा एक जवान विद्रोही कवि था। उसकी कविताओं में बहुत ही ज्यादा निराशा का माहौल था और जो अक्सर पाठकों को झटका देती थीं। क्राकोव भी, जो पोलैंड की संस्कृति का केन्द्र है इस फ़िल्म में अनजान शहर लगता है, पर्यटकों के चहेते-सुंदर स्थान से बिलकुल अलग। लगता है कि फ़िल्म के शहर में सिर्फ़ गंदे पिछवाड़े के अहाते और छोटे अँधेरे कमरे हैं और वहाँ रहनेवाले लोग सिर्फ़ वोदका और सिगरेट पीते हैं। एकरंगा दृश्य और अनाड़ी कैमरे के इस्तेमाल से फ़िल्म ज़्यादा ही निराशात्मक लगती है और यह वोइचेह स्मजोव्स्कि फिल्मों की एक लाक्षणिक विशेषता है।

निर्देशक की दूसरी फ़िल्म का नाम शादी (Wesele) है। यह फ़िल्म 2004 की है। यह फ़िल्म थोड़ी सी अलग है और दूसरे आगामी फिल्मों की तुलना में आशावादी। फ़िल्म की कहानी दक्षिण पूर्व पोलैंड में रहने वाले एक अमीर व्यापारी की बेटी की शादी के बारे में है। गाँव की शादी धुमधाम से चल रही है। जबकि दुल्हन पहले से ही गर्भवती है। गर्भवती दुल्हन से जो बच्चा होगा उसका ‘असली’ पिता विश्वविद्यालय में लड़की का दोस्त था। इसीलिए, दुल्हन का पिता गाँव में रहनेवाले एक लड़के को शादी करने के लिए रिश्वत देता है क्योंकि बिना शादी के बच्चा पैदा करना छोटे पोलिश गाँवों में आज भी बड़ी शर्म की बात है। शादी की रिश्वत जर्मनी से लायी गई एक बहुत महंगी गाड़ी है। लेकिन जल्दी ही यह पता चलता है कि गाड़ी चोरी हो गई है, जो कि पोलैंड में अक्सर ही होता है। जिन डाकुओं ने गाड़ी की चोरी की है, वे पैसे के अलावा ज़मीन भी चाहते हैं, जिसके मालिक दुल्हन के नाना जी हैं। बुढ़ा आदमी अपना ज़मीन किसी को देना नहीं चाहता है। डाकू व्यापारी की उँगली को काट देते हैं। इसके अलावा दुल्हन के बच्चे का बाप यानी दुल्हन के विश्वविद्यालय वाला दोस्त भी शादी में आता है। मेहमानों के पेट खराब हो जाते हैं क्योंकि व्यापारी ने गाँव के नज़दीकवाले शहर सनोक से सस्ता और बासी माँस खरीदा। नाना जी मर जाते हैं। अनुपयोगी पुलिस गाड़ी के नकली कागजात बनाते हैं। एक वकील जो व्यापारी का दोस्त है, प्रलोभन में आ जाता है और ज़मीन को अपने नाम हस्तांतरित करवा लेता है। फ़िल्म के अंत में व्यापारी के सारे गंदे कारनामों की पोल खुलती है। उसकी बेटी और पत्नी उसको छोड़ देती है।

शादी ऐसा नाम है जो पोलिश दर्शकों के लिए महत्त्वपूर्ण है और उनको आकर्षित करता है। क्योंकि, यह पोलैंड के राष्ट्रीय नाटक का नाम भी है जिसे स्तञिसुअव विस्प्याञ्स्कि (Stanisław Wyspiański) ने लिखा और जिसे 1901 में पहली बार दिखाया गया। विस्प्याञ्स्कि लेखक होने के अलावा मशहूर चित्रकार भी था। उसने अपना नाटक तब लिखा जब पोलैंड आज़ाद देश नहीं था। यह नाटक क्राकोव के पास एक गाँव में शादी के बारे में है। जहाँ गाँव में रहनेवाले मेहमानों के अलावा वे ऐतिहासिक व्यक्ति भी आते हैं जिनका पोलिश संस्कृति से बड़ा संबंध है। वे लोग मेहमानों को लड़ाई के लिए उत्तेजित करने की कोशिश करते हैं लेकिन उनकी चेष्टा असफल हो रही है। नाटक में जमींदार लोगों के हत्याकांड का संदर्भ है जिसे 1846 में ऑस्ट्रिया के हिस्से में रहते हुए गाँववालों ने अंजाम दिया था। ऑस्ट्रिया की सरकार को पोलिश लोगों की बगावत से डर था इसलिए उसने गाँववालों को बताया कि अमीर लोग उनको मार देना चाहते हैं। यह सब सुनकर गाँववालों ने अपने जमींदारों को मार दिया। विस्प्याञ्स्कि के नाटक में यह बात स्पष्ट है कि देशी जमींदारों और उनकी प्रजा के बीच समझौते-साझेदारी के बिना पोलैंड अपनी अज़ादी के लिए कभी लड़ाई नहीं कर सकेगा। गाँव की शादी में वेर्निहोड़ा नाम का एक भविष्यवक्ता आता है। कहावत है कि पोलैंड के बंटवारे और आज़ादी की भविष्यवाणी उसी की है। विस्प्याञ्स्कि का वेर्निहोड़ा गाँववालों को सोने का रण-सिंगा (युद्ध में बजने वाला वाद्ययंत्र) देता है, जिसमें पुरे देश को लड़ाई के लिए बुलाने की शक्ति है। अफ़सोस की बात यह है कि रण-सिंगा को एक जवान लड़का लेता है जिसका नाम यशेक है और वह थोड़ा सा चंचल है। यशेक रण-सिंगा के बारे में ज़्यादा नहीं सोचता है क्योंकि उसके लिए क्राकोव की अपनी परम्परागत, सुंदर लाल टोपी (फ़ोटो 1), जिसमें मोर के पंख हैं और जिसे उसने शादी के लिए बनवाया है, ज़्यादा महत्त्वहूर्ण है।

फ़ोटो 1.

फ़ोटो 1.

सोने का रण-सिंगा हमेशा के लिए खो जाता है। शादी के मेहमान किसी कठपुतली की तरह नाच में मतिभ्रमित हैं, व्यस्त हैं और अपने देश के बारे में नहीं सोचते हैं। शादी में पुआल की एक मूर्ति भी आती है। उस मूर्ति का रूप-आकार वैसा ही है, जैसे सर्दी के मौसम में गुलाब के पौधे को ठंड से बचाने उसमें पुआल लपेट दिया गया हो और विस्प्याञ्स्कि ने जिसका एक चित्र भी बनाया (फ़ोटो 2)। नाटक में, पुआल वाली मूर्ति गाँववालों के लिए संगीत बजाती है।

फ़ोटो 2.

फ़ोटो 2.

विस्प्याञ्स्कि का नाटक- शादी फ़िल्म के लिए बहुत ही अनुकूल विषय बन गया और जिसे अंजेई वइदा ने 1972 में चित्रित किया। स्मजोव्स्कि की फ़िल्म नाटक पर आधारित नहीं है लेकिन यहाँ भी, बिलकुल अलग कहानी होने के बावजूद बहुत ऐसे अंश हैं जो राष्ट्रीय नाटक से संबंधित हैं। फ़िल्म की कहानी आधुनिक समय में चलती है, जब पोलैंड न सिर्फ़ साम्यवाद से बाहर आया बल्कि यूरोपीय संघ का सदस्य भी बन गया। दुल्हन का बाप एक ठेठ निष्ठुर कारोबारी है जिसको मुक्त बाज़ार के लेनदेन की मदद से इतना पैसा मिला कि वह गाँव का सब से अमीर आदमी हो गया है। अपनी धन-दौलत और नई पहचान के बावजूद वह आदमी मानसिक रूप से पुराने ज़माने के परम्परागत पोलिश समाज के अनुसार सोचता है, इसलिए उसके लिए सब से महत्त्वपूर्ण बात दिखावट है और उसकी बेटी बिना शादी बच्चा पैदा नहीं कर सकती है। उसके लिए बेटी की खुशी महत्त्वपूर्ण नहीं है, क्योंकि सबसे विशिष्ट बात यह है कि पड़ोसियों और गाँव के पुजारी उसके परिवार के बारे में क्या राय रखते हैं। उसे प्रतिष्ठा खोने का डर इतना बड़ा है कि वह हर व्यक्ति को पैसे देने के लिए तैयार है ताकि प्रतिष्ठा पर आंच न आये। यह व्यवहार इसका अच्छा उदाहरण है कि राजनीतिक व्यवस्था बदलने के बावजूद पोलिश गाँवों में आज भी पैसे और वोदका के बदले सब कुछ करवाना संभव है। यह बात विस्प्याञ्स्कि के नाटक से मिलती-जूलती है क्योंकि पुराने शादी में सब लोग आज़ादी के लिए लड़ाई कर नहीं सकते थे और स्मजोव्स्कि के नायक सिर्फ़ सोचते हैं कि उनको आज़ादी मिल गई। स्वतन्त्रता और राष्ट्रीय आदर्श केवल प्रचार-वाक्य हैं जिसका कोई अर्थ नहीं है और जिसे सिर्फ़ नशे में गाया जा रहा है। एक क्षण में शादी के शराबी मेहमान प्रसिद्ध स्वदेशानुरागपूरित गाना गाते हैं जो कि पोलिश संस्कृति के एक लाक्षणिक व्यवहार के रूप व्यंजित हो चुका है। गाने में सोने के रण-सिंगा और उसके आह्वान के इंतज़ार का संदर्भ है। आह्वान के इंतज़ार के बारे में नशे की हालत में गाते सभी मेहमान ऐसे लगते हैं मानो नाटक के ही पात्रों को चरितार्थ कर रहे हों। फ़िल्म में भी विस्प्याञ्स्कि की प्रसिद्ध तस्वीर (फ़ोटो 3) दिखाई गई जो इसका सबूत हो सकता है कि स्मजोव्स्कि नाटक से बहुत अभिप्रेरित था और अपने दर्शकों को यह बताना चाहता है कि उसकी शादी ज़्यादा स्वतंत्र फ़िल्म नहीं है और उसे नाटक से जोड़ना चाहिए (फ़ोटो 4)। फ़िल्म के अंत में वोइचेह कुचोक (Wojciech Kuczok) के गोबर (Gnój) नाम के उपन्यास को प्रेरणास्रोत के बतौर दिखाया गया है जिसके अंत में सब कुछ गोबर में डूब जाता है और दुख स्मृतियों का नाश करता है।

फ़ोटो 3.

फ़ोटो 3.

फ़ोटो 4.

फ़ोटो 4.

स्मजोव्स्कि की फ़िल्म में सब लोग गोबर में नहीं फँसते हैं। लेकिन, यहाँ जो शौचालय की बदइंतजामी है, यह भी बड़ा संकेत है। बाहर में जो निकालते हैं वे भी परिवार और राष्ट्र की सारी गंदगी से ही संबंधित हैं क्योंकि वे बहुत बुरी तरह और अचानक शादी के समय में ही बाहर निकलते हैं। इस फ़िल्म में भी स्मजोव्स्कि अनाड़ी कैमरे का इस्तेमाल करता है क्योंकि शादी में फोटोग्राफर उपस्थित है। अनजाने में ही इस फोटोग्राफर की फ़िल्म में बहुत सारे धोखेबाज़ उसके फिल्म में रेकॉर्ड हो जाते हैं और दुल्हन को पता चलता है कि उसका पति उससे नहीं, गाड़ी से प्यार करता है और इसीलिए उसने यह शादी की है। नाना जी की ज़मीन के बारे में भी सच निकलता है और दुल्हन को यह भी पता चलता है कि ज़मीन इतनी महंगी इसलिए है क्योंकि वहाँ यूरोपीय संघ के पैसों के मदद से राजमार्ग बन जाएगा। शादी इतनी कठोर फ़िल्म नहीं, ज़्यादा व्यंग्यपूर्ण है। लेकिन राष्ट्रीय नाटक से स्पष्ट संबंध होने के कारण पोलिश संस्कृति के लिए बहुत ही महत्त्वपूर्ण है। साथ ही साथ इसको कुशलतापूर्वक आधुनिक समय में डालना स्टीरियोटाइप्ड पोलैंड का बहुत अच्छा चित्रण है।

स्मजोव्स्कि की तीसरी फ़िल्म का नाम डार्क हाउस (Dom zły) है और यह 2009 की है। यह बहुत ही डार्क (Dark) कहानी है जो 1982 के दक्षिणी पोलैंड के पहाड़ों में चलती है। कहानी साम्यवादी पोलैंड के ज़माने की है। वर्णन के दो स्तर हैं: एक अपराध के स्थान के निरीक्षण की प्रक्रिया है, और दुसरा, एक अवलोकन जिसके मदद से दर्शक देख सकता है कि क्या हुआ। अपराध एक छोटे घर में हुआ है जहाँ नागरिक सेना (Peoples Army) आती है, संदिग्ध अपराधी के साथ। फ़िल्म का नायक जिसका नाम एद्वर्द श्रोदोञ है। वह काम करने के लिए पहाड़ों में आया है और एक रात तेज़ बारिश में फंस कर एक दम्पति के पास पहुँच जाता है। वे लोग उसको रात को सोने के लिए अपने यहाँ शरण देते हैं और साथ में खाने-पीने का दौर चलता है। पास ही चीनी का एक करखाना है जहाँ एडवर्ड को काम मिल जाता है। उसके पहले वहाँ एक और आदमी काम करता था जिसके बारे में ज्यादा कुछ मालूम नहीं पड़ता है। आसपास के लोग कहते हैं कि उस आदमी को कारखाने के वैसे बहुत सारे बड़े भ्रष्ट लोगों के बारे में पता था, जो बड़े-बड़े भ्रष्टाचार में लिप्त थे। जब वह इन सब चीजों के बारे में लोगों को बताने लगा, तुरंत लापता हो गया। एडवर्ड को शरण देने वाले दंपति का मानना है कि यह दुर्घटना कारखाने में काम करने वालों के लिए कोई अप्रत्याशित घटना नहीं थी क्योंकि उसकी मृत्यु करखाने में चोरी करनेवालों के लिए फायदेमंद थी। घर का मालिक और उसका मेहमान शराब पीकर बहुत ही दिलचस्प बात करते हैं। घर में रहनेवाले आदमी की पहली पत्नी का एक बेटा है, जो अक्सर पूरे रात के लिए कहीं जाता है। बेटा बहुत बड़ा शराबी है और अपने पिता का बहुत सारा पैसा शराब पर खर्च करता है। अलग-अलग बातों के बारे में बतियाते हुए दोनों आदमी निश्चय करते हैं कि वे दोनों साथ-साथ काम करेंगे और घर में वोदका बनाकर स्थानीय लोगों को बेचेंगे। घर का मालिक एद्वर्द को अपना पैसा दिखाता है और यह देखकर एद्वर्द भी, जो नशे में है, उसको कहता है कि उसके पास भी बहुत पैसा है। बाद में एद्वर्द नागरिक सेना वालों को कहता है कि घर का मालिक उसके पैसे को देखने के बाद उसको मार देना चाहता था, पैसों को चुराने के लिए। मालिक का पागलपन कुछ ज्यादा ही बढ़ता जा रहा है और एडवर्ड वहाँ से भगता है। लगता है कि सारे नागरिक सेना वाले अभियुक्त की कहानी पर विश्वास नहीं करते हैं लेकिन उनमें से एक प्रतिनिधि जिसका नाम म्रुज़ है, इस मामले की जाँच अच्छी तरह करना चाहता है। सब से पहले वह चीनी के कारखाने के बारे में सोचता है और उसको वे दस्तावेज मिलते हैं, जो गाँव के पूजारी के पास थे, जिनमें इस बात सबूत है कि जो एडवर्ड और गाँववालों ने कहा वह सब कुछ सच है। म्रुज़ का काम पुरा हो नहीं सकता है क्योंकि इसी समय में अपराध के स्थान में शासक पार्टी का एक बड़ा नेता बार-बार आता है, जो म्रुज़ को बताता है कि सब लोगों के लिए यह अच्छा होगा कि वह इन जानकारियों को छुपाए क्योंकि इन सच्चाईयों को बताना उचित नहीं है। वह बड़ा नेता देख सकता है कि म्रुज़ को यह राय पसंद नहीं है इसलिए वह कुछ फ़ोटो दिखाकर, जो विवाहित औरत के साथ म्रुज़ के प्रेम सम्बन्ध के सबूत हैं, उसको ब्लैकमेल करना चाहता है। फ़ोटो देखने के बावजूद म्रुज़ कारखाने के बारे में भूलना नहीं चाहता है लेकिन ये हालात उसके लिए बहुत ही तकलीफ़देह है और वह भी दूसरों की तरह शराब पीने लगता है, जिनको इस सुनसान और सर्दी के मौसम में काम करना चाहिए (फ़ोटो 5)।

फ़ोटो 5.

फ़ोटो 5.

फ़िल्म के अंत में दिखता है कि नागरिक सेनावाले अपराध-स्थल पर कैमरे से ‘फ़िल्म’ बनाते हैं, वे म्रुज़ के लाश के पास भयभीत खड़े हुए एडवर्ड का फ़ोटो खिंचते हैं और इस तरह पूरी जांच-पड़ताल सम्पन्न होती है (फ़ोटो 6)। इसका मतलब यह हुआ कि अब पार्टी के नेता/जनप्रतिनिधि कुछ नहीं बोलेगा क्योंकि उनके पास पहले से ही एक अभियुक्त आदमी है, जिसके ऊपर एक और अपराध का दोषारोपण बड़ी समस्या नहीं होगी।

फ़ोटो 6.

फ़ोटो 6.

यह फ़िल्म शायद पोलिश की सबसे अधिक निराशाजनक और डार्क फ़िल्मों में से एक है और एक चौंकानेवाली फ़िल्म जिसे एक बार देखने के बाद दुबारा देखने की इच्छा नहीं होती है। फ़िल्म जहां अपने बहुत ही अच्छे स्क्रिप्ट के कारण उत्तम है, वहीं इसके छायांकन (Cinematography) का पक्ष बहुत ही रूखा और भद्दा है जिसमें बर्फ़ के कारण सब से प्रमुख रंग सफ़ेद है। चमचमाते अपराध-स्थल और अंधेरे घर (जहां एडवर्ड दंपति के साथ रुका था) के बीच कैमरा आवाजाही करता है। अवलोकन के दृश्यों का रंग डार्क होने के बावजूद ज़्यादा स्नेही और मानवीय है और इस अंतर्विरोध को यह फिल्म अच्छी तरह दिखलाता है कि किसी एक क्षण में जीवन कितना बदल सकता है। एडवर्ड और घर में रहनेवाला परिवार दारू पीकर नाचते हैं, हंसते हैं और साथ साथ काम करना चाहते हैं लेकिन दर्शकों को पता है कि इस घर में अपराध होगा इसलिए मासूम उत्सवी माहौल के बावजूद वह जानता है कि कुछ अनहोनी होगी। यह शायद इसलिए क्योंकि वृद्ध पति में थोड़ा सा अवहेलना का भाव है और अपनी पत्नी को देखकर अनुमान लगाता है कि वह एडवर्ड को शायद पसंद है। इस फिल्म में भूगोल फ़िर से महत्त्वपूर्ण है। कहानी ब्येष्चादि (Bieszczady) नाम के पहाड़ों में चलती है और दक्षिण-पूर्व पोलैंड के छोटे छोटे पहाड़ वे खास जगह हैं जो हमेशा से देश का सब से जंगली हिस्सा रहा है। इस स्थान में खो जाना बहुत आसान है और यहाँ की घटनाओं के बारे में कोई कभी नहीं पूछता है। यहाँ अव्यवसायी/अनाड़ी कैमरे का इस्तेमाल भी दिलचस्प है, जिसके बारे में पहले ही कहा गया और जो निर्देशक के लिए खास बात है। हालाँकि स्मजोव्स्कि ऐसे कैमरे का इस्तेमाल अक्सर करता है, लेकिन यहाँ इसका मतलब थोड़ा अलग दिखता है। पहली दोनों फ़िल्मों में, खास तौर पर शादी में अनाड़ी कैमरे की मदद से सच का बखान किया गया था। यहाँ की स्थिति अलग है और डार्क हाउस में यह कैमरा झूठ बोलता है और नागरिक सेनावाले जानबुझकर नकली फ़ोटो खींचते हैं क्योंकि ऐसा ‘सच’ उनके लिए ज़्यादा सुविधाजनक है। वे अच्छी तरह जानते हैं कि उन्होंने अगर ऐसा नहीं किया तो शायद उनकी मौत भी हो सकती है। जबकि फरमाबरदारी के परिणाम अच्छे पुरस्कार होते हैं: किसी को समृद्धि मिल जाएगी, किसी को पैसा और एक आदमी विदेश जा सकेगा क्योंकि उसको पासपोर्ट मिल जाएगी।

फ़िल्म के नाम का घर देश की स्थिति का रूपकालंकार लगता है और जैसे साम्यवादी पोलैंड के समय में पुरा देश एक बड़ा पिंजरा था। जहाँ से भागना मुश्किल है और आप लाख चाह कर भी स्वतंत्रता और सच नहीं पा सकते हैं। धोखेबाजी और सच को छुपाना वे मूख्य चीज़ें हैं जिनकी फ़िल्मों में आलोचना होती है, जो साम्यवादी पोलैंड के बहुव्यापी लक्षण थे। फ़िर भी दिलचस्प बात यह है कि अपनी अंतीम फ़िल्म में स्मजोव्स्कि इसके बारे में फ़िर से कुछ बोलना चाहता है। 2013 की फ़िल्म का नाम यातायात-पुलिस (Drogówka) है और यह कहानी डार्क हाउस से बहुत मिलती-जुलती है। इस बार सारी घटनाएँ पोलांड की राजधानी, वार्सा (Warsaw) और माजूदा समय में चलती हैं। यह फ़िल्म पुलिस के बारे में है जो यातायात की बातों के विशेषज्ञ हैं। उन लोगों को किसी को सज़ा देने का अवसर अक्सर नहीं मिलता है क्योंकि जो भी गाड़ी-चालक कोई नियम तोड़ता है वह हमेशा किसी न किसी बड़े आदमी का नजदीकी निकलता है और एक फ़ोन की मदद से सज़ा से वंचित हो सकते हैं। इस खराब स्थिति के कारण असंतुष्ट पुलिसवाले सब से गरीब लोगों पर अपना गुस्सा निकालते हैं जिनके ऐसे प्रतापी दोस्त नहीं होते हैं।

एक दिन, पता नहीं क्यों एक पुलिसवाला मर जाता है और उसकी मौत का दोष उसके दोस्त पर डाला जाता है। फ़िल्म का नायक सब को दिखाना चाहता है कि उसने यह अपराध नहीं किया और सबूत खोजने की प्रक्रिया में वह एक बड़े भ्रष्ट अधिकारी को ढूंढ निकालता है। इस भ्रष्टाचार में सरकार के लिए काम करनेवाले लोग भी संलिप्त हैं और वे यूरोपीय संघ से राजमार्ग बनाने के लिए जो पैसा आता है, उसमें उलट-फेर करते हैं। यहाँ भी, जैसे पिछली फ़िल्म में नायक अपने पार्टी के बड़े नेता द्वारा ब्लैकमेल के प्रयास को अनसुना करता है और उससे नहीं डरता है इसलिए फ़िल्म के अंत में उसको मौत मिलती है । यातायात-पुलिस डार्क हाउस जैसी अच्छी फ़िल्म नहीं है, सम्भवतः इसलिए कि ऐसी कहानी एक बार बताई जा चुकी है। इसके अतिरिक्त यातायात-पुलिस का आलेख भी उतना अच्छा नहीं, ज़्यादा आसान है और नायक को फंसाने वाला षडयंत्र बिल्कुल ही आश्चर्यचकित नहीं करता है। इस फिल्म में शायद अश्लीलता ज़्यादा है और कैमरा इतना अनाड़ी है कि देखनेवालों को थका देते हैं। ऐसा होने पर भी दोनों फ़िल्मों के बारे में साथ साथ सोचना बहुत अच्छी बात है क्योंकि इसमें, दो शादियों (स्मजोव्स्कि की शादी नामक फिल्म और इसी नाम से स्तञिसुअव विस्प्याञ्स्कि का नाटक) में जैसे बहुत स्पष्ट है कि स्मजोव्स्कि द्वारा प्रस्तुत आलोचना सिर्फ़ समकालीन समय की आलोचना नहीं है। उसकी फिल्में दुसरे पोलिश फिल्मों के विपरित हैं और फिल्मों में प्रस्तुत आलोचना सभी के प्रति निष्ठुर है। फ़िल्म का निर्देशक एक और बार यह दिखाता है कि जैसे शादी के लोग जिनको सिर्फ़ लगता है कि वे स्वतंत्र हैं और वास्तव में वे पिंजड़े में रहते हैं, यातायात-पुलिस के लोगों में भी यही समस्या है, साम्यवाद और पूंजीवाद उनके लिए एक ही है और जो वे पहले करते थे, वही हमेशा करेंगे।

अंत में एक और फ़िल्म के बारे में ज़िक्र करना चाहिए जिसका नाम रोज़ा (Róża) है और जो यातायात-पुलिस से पहले, 2011 की है। इस बार स्मजोव्स्कि युद्ध के बारे में कुछ बताना चाहता है जो पोलिश सिनेमा के लिए बहुत महत्त्वपूर्ण है और जो अक्सर फ़िल्मों की विषय-वस्तु रही है। दूसरा महायुद्ध एक ऐसी बात है जिसके बारे में पोलैंड में रहनेवाला हर व्यक्ति बार-बार कुछ कह सकता है और कभी थकता भी नहीं है। अगर इन बतकहियों के दौरान थोड़ी सी शराब हो, जो कि अक्सर होता है, तब पोलिश लोग हमेशा खुद को युद्ध के विशेषज्ञ समझते हैं। ऐसी सारी बातें युद्ध के दौरान उपजे मानसिक आघात और पोलैंड की दुर्भाग्यपूर्ण घटनाओं के बारे में हैं। स्टालिन से डरे उन मित्र देशों के बारे में जिन्होंने इस देश को तब छोड़ दिया जब उनकी सब से ज्यादा ज़रूरत थी और सोवियत संघ को बेच दिया। युद्ध के बाद सोवियत संघ ने पोलैंड का बहुत बड़ा हिस्सा ले लिया जो आजकल यूक्रेन और लिथुआनिया में हैं। यह सच है कि देश को पश्चिमी हिस्सा मिल गया जो युद्ध से पहले जर्मनी के कब्जे में था लेकिन यह हिस्सा खो चुके पूर्वी हिस्से से काफी छोटा था।

पोलैंड के सबसे लोकप्रिय एक प्रहसन फिल्म, जो कि तीन भागों में बनी है, से पोलैंड के खोये हुए पूर्वी हिस्से में रहनेवाले लोगों के बारे में सब लोग जानते हैं, जिसमें पात्रों को अपने घरों को छोड़कर रहने के लिए पश्चिमी हिस्से में आना है। यह फ़िल्म आज भी बहुत प्रचलित है और टीवी में अक्सर दिखाई जाती है। स्मजोव्स्कि की फ़िल्म भी इतिहास के इसी खण्ड के बारे में है लेकिन उसकी कहानी को फ़िर से अलग दृष्टी से दिखाई जाती है और फ़िल्म में जिसकी बहुत ही कटू अलोचना की गई है। इस बार फ़िल्म की कहानी उत्तर पोलैंड में चलती है, एक ऐसे प्रदेश में जहाँ युद्ध से पहले अलग-अलग स्थानों पर मज़ूर्या (Mazuria) नाम का जातीय अल्पसंख्यक रहता था। उन लोगों की भाषा जर्मन थी लेकिन अपने विचार के अनुसार वे न पोलिश थे और न ही जर्मन। यहाँ यह भी स्मरण कर लेना चाहिये कि दूसरे महायुद्ध के पहले पोलैंड में रहनेवाले लोग एक समान जातीय समूह के लोग नहीं थे जैसे आजकाल हैं। वहाँ न सिर्फ़ यहूदी, बल्कि दूसरे धर्मिक और जातीय अल्पसंख्यक भी थे जो युद्ध के समय मारे गए और जो बच गए उन्हें बाद में दूसरी जगहों पर से फिर से बसना था।

फ़िल्म एक औरत के बारे में है जिसका नास रोज़ा है और जो मज़ूर्या जाति से संबद्ध है। युद्ध के बाद उसके घर में एक पोलिश फ़ौजी आता है, जिसका नाम तदेउष है, जो रोज़ा के पति के साथ युद्ध में था। चूँकि रोज़ा का पति और तदेउष की पत्नी मर गई है, वह अकेली औरत को मदद करने का निश्चय करता है और उसके साथ रहने लगता है। यह समय औरतों के लिए खूंखार-समय है क्योंकि आसपास बहुत सारे फ़ौजी हैं जो औरतों का बलात्कार करते हैं। सब से खतरनाक सोवियत सेना है जो सिर्फ़ फ़िल्म की वास्तविकता नहीं, ऐतिहासिक सच है। रोज़ा के साथ इतनी बार बलात्कार हो चुका है कि उसकी हालत अच्छी नहीं है। उसके मेहमान को भी पता चलता है कि उस औरत के साथ उसकी बेटी रहती है जिसे वह लोगों से छुपाती है ताकि उसके साथ कुछ बुरा न हो जाए। कुछ समय बाद रोज़ा के बगल वाले घर में पूर्वी ज़मीन से भागे हुए लोग आते हैं। धीरे धीरे यह स्पष्ट होता है कि रोज़ा सुरक्षित नहीं है क्योंकि पोलिश लोग मज़ूर्या लोगों को उनकी भाषा और धर्म के कारण जर्मन समझते हैं। रुजा के अलावा आसपास के दूसरे मज़ूर्या लोग भी रहते हैं लेकिन उनके लिए रोज़ा एक पापी औरत है क्योंकि अनगिनत बार उसका बलात्कार हुआ है और उसने सोवियत फ़ौज़ियों को रोकने के लिए ज़्यादा प्रतिरोध नहीं किया। यह सब सही बात है लेकिन रोज़ा ने इसलिए ज़्यादा मना नहीं करती थी क्योंकि वह नहीं चाहती थी कि उन आदमियों को उसकी बेटी के बारे में पता चले, लेकिन युद्ध के बाद उसकी स्थिति बहुत खराब है क्योंकि वह न पोलिश है, न जर्मन, न मज़ूर्या के लोग ही उसे मान्यता देने को तैयार हैं। पोलिश फ़ौजी तदेउष सिर्फ़ एक आदमी है जिसके लिए रोज़ा बस मनुष्य है। मौत से पहले तदेउष की पत्नी के साथ भी बलात्कार किया गया था और फ़ौजी ने यह सब कुछ देखा इसलिए वह इसे कभी पाप या औरत की गलती नहीं समझता है। जब रोज़ा के नये पड़ोसी की पत्नी के साथ भी बलात्कार होता है तो उसका पति उसको मार नहीं सकता है, जो बहुत अच्छी तरह यह भी दिखाता है कि औरतों की स्थिति कितनी मुश्किल थी। तदेउष की स्थिति भी अच्छी नहीं है क्योंकि युद्ध के बाद राजनीतिक व्यवस्था बदल गई। युद्ध के समय पोलैंड में दो सेनाएँ थीं – एक, जो सोवियत संघ वाले हिस्से में बनी और दूसरी जो पश्चिम में(जहां वह जर्मनी से लड़ रही थी)। दोनों में पोलिश लोग थे और दोनों अपने देश के लिए संघष करना चाहती थीं। लेकिन, युद्ध के बाद पश्चिम देशों से संबंधित सेना को नये राजनीतिक परिदृश्य में देश के लिए खतरनाक मान लिया गया और वे लोग अक्सर बिना कारण से जेल जाते थे। फ़िल्म का नायक राजनीतिक कारण से अचानक पोलैंड गणराज्य के लिए काँटा बन जाता है और उसकी स्थिति के लिए यह भी अच्छी बात नहीं है कि वह एक “जर्मन” औरत के साथ रहता है इसलिए उसको गिरफ़्तार करने के बाद बहुत यातनाएँ मिलती हैं।

रोज़ा आसान फ़िल्म नहीं है क्योंकि उसको अच्छी तरह समझने के लिए पोलिश इतिहास और उसकी राजनीतिक स्थिति को जानना चाहिए, इसलिए लगता है कि यह फ़िल्म सब से पहले पोलिश दर्शकों के लिए है जो खोई हुई पूर्वी हिस्से के कारण बार-बार रोता था और कभी इसके बारे में नहीं सोचता है कि पश्चिमी हिस्से में भी युद्ध से पहले कुछ ऐसे लोग रहते थे जिनकी जन्मभूमि खो गई है। व्यक्ति, राष्ट्र, इतिहास, राजनीति, जाति आदि के बिम्ब या रूपक के बतौर उभरे पोलैंड की निष्ठुर आलोचना स्मजोव्स्कि एक बार और करता है, इस मायने में वह पक्षपाती नहीं है। ऐसी स्थिति में फ़िल्म में दिखाये गए सब लोग सही हैं और सब गलत। हर इनसान के लिए इतिहास अलग है क्योंकि हर की दृष्टी अलग है। स्मजोव्स्कि की फ़िल्म में कोई जवाब नहीं मिलता है कि कौन सही है और कौन नहीं। ज़रूर, यहाँ कुछ लोग हैं जो सिर्फ़ खलनायक लगते हैं लेकिन वे लोग इतने महत्त्वपूर्ण नायक नहीं हैं और लगता है कि वे सिर्फ़ इसलिए फ़िल्म में आते हैं कि निर्देशक अपने दर्शकों को दिखाना चाहता था कि परिस्थिति कितनी मुश्किल और उलझनदार थी। वह कोई जवाब नहीं देता है और फ़िल्म के दर्शक फ़िर से उत्तेजित होते हैं क्योंकि इस बार युद्ध के बारे में होने के बावजूद इस फ़िल्म में पोलिश लोग न तो वीरता से भरपूर हैं न ही हताहत। पोलिश फ़ौजी तदेउष स्मजोव्स्कि की सारी फ़िल्मों में एक मात्र व्यक्ति है जिसमें कोई बुराई नहीं है, बाकी सब लोग अक्सर गलतियाँ करते हैं और यह शायद इस निर्देशक की सब से बड़ी मज़बूती है और इसलिए मुझे लगता है कि उसकी फ़िल्मों के मदद से पोलिश सिनेमा के बारे में कुछ दिलचस्प कहना हो सकता है।

स्मजोव्स्कि की फ़िल्में दूसरी पोलिश फ़िल्में जैसी हैं जिनको अच्छी तरह समझने के लिए पोलिश बेचैनियों, मिथकों और अभिघातों को जानना चाहिए। स्मजोव्स्कि पोलिश सिनेमा का लाक्षणिक, इतिहास में डूबा हुआ निर्देशक है लेकिन इसी समय में वह उन सभी मिथकों की इतनी कड़ी आलोचना करता है मानो पूछना चाहता है कि पोलिश लोकाचार पर आधारित सिनेमा आज भी जीवित क्यों है!? स्मजोव्स्कि के नायकों का अधिकांश अनुपयोगी, शराबी, चोर हैं जो पोलिश लोगों का सब से पारंपरिक चित्रण है। इसी समय में भी वह बार बार पोलिश मनोभाव की विसंरचना करता है इसलिए उनकी फ़िल्मों के दर्शक हर फ़िल्म की याद करते हैं और अपने बारे में कुछ न कुछ सोच-कर सकते हैं।

तत्याना षुर्लेई

तत्याना षुर्लेई

तत्याना षुर्लेई एक Indologist और फिल्म-आलोचक हैं। हंस, पहल, अकार आदि हिन्दी पत्रिकाओं के लिए लिखती रही हैं। फिलहाल पोलैंड के शहर क्राकोव स्थित Jagiellonian University में The Courtesan Figure in Indian Popular Cinema:Tradition, Stereotype, Manipulation. नामक विषय पर पीएचडी के लिए शोधरत हैं। उनसे tatiana.szurlej@gmail.com पर संपर्क संभव है।

साभार- अकार 

 

स्त्रीविरोधी और दिशाहीन फिल्म है हाइवे: तत्याना षुर्लेई

इम्तियाज अली की  इस फ़िल्म में बहुत कमियाँ है। पहली कि शायद वह खुद नहीं जानता था कि उसकी फ़िल्म किसके बारे में होगी। क्या यह फ़िल्म एक अमीर, ऊबी हुई लड़की के बारे में है जिसको जीवन में थोड़ा सा एडवेंचर चाहिए और जिसके लिए दुनिया के बाकी लोग उसके नौकर जैसे होते हैं, क्या स्टॉकहॉम सिंड्रोम से पीड़ित व्यक्ति के बारे में है या एक ऐसी लड़की के बारे में है जो अचानक इस सच्चाई को ढूंढ लेती है कि उसको अपने झूठे परिवार की ज़रूरत नहीं है क्योंकि बाहर की दुनिया में ज्यादा अच्छे लोग रहते हैं।

Highway's Poster

Highway’s Poster

इम्तियाज अली की हाइवे  किसके बारे में है?

By तत्याना षुर्लेई

इम्तियाज अली की नयी और अत्यंत लोकप्रिय फ़िल्म हाइवे का मूल संदेश इसमें है कि उसकी नायिका, वीरा ‘खतरा/जोखिम’ से क्या समझती है। जवान लड़की अपने माँ-बाप द्वारा प्रवचित इस ज्ञान को नकारती है कि घर के बाहर की दुनिया लड़कियों के लिए बहुत खतरनाक है क्योंकि इस समय उसके लिए घर ही सबसे बड़ा खतरा है।

अली की फ़िल्म के समालोचक यह लिखकर उसको बड़ी दाद देते हैं कि आखिर पुरुष-प्रधान समाज से मुक्ति चाहने वाली नयी नायिकाएँ भारत में भी उत्पन्न हो गई हैं, जिनको हुक़्मऊदीली करने से डर नहीं है, जो उम्र में छोटी होने के बावजूद पूर्ण विकसित है। यह सब कुछ पढ़कर मैं खुद से पूछ रही हूँ कि मैंने वही फ़िल्म देखी या शायद कोई दूसरी; क्योंकि उपरोक्त दृष्टि से इस फिल्म को सिर्फ देखने में ही मैं असफल नहीं रही, बल्कि इसे देखकर मुझे लगता है कि जिस समय में महिलाओं के अधिकार के बारे में इतने सारे वाद-विवाद हो रहे हैं उस समय में यह फ़िल्म प्रतिक्रियावादी निष्कर्षों की शिकार लगती है और सब से खतरनाक बात यह कि कोई इस गलती को नहीं देखता है।

फ़िल्म की कहानी बहुत ही सरल है: वीरा बड़े घर की बेटी है और उसकी शादी होनेवाली है लेकिन वह ज़्यादा खुश नहीं लगती है। क्यों? कोई स्पष्ट कारण नहीं दिया जाता है, बस दर्शकों को मालूम हो जाता है कि उसको साँस लेने के लिए थोड़ी सी हवा चाहिए, थोड़ी सी शांति और आज़ादी भी। यह समझने वाली बात अवश्य है कि शादी की तैयारियों से वह थोड़ी सी थकी है लेकिन यह आज़ादी वाली इच्छा बिलकुल स्पष्ट नहीं है; ऐसा लगता है कि जैसे वीरा मध्ययुग में रहती है और उसके परिवार में अभी तक परदा-प्रथा का चलन है। नहीं तो वे कौन से कारण हैं कि इतने बड़े बाप की बेटी घर से बाहर नहीं निकल सकती है। हाँ, फ़िल्म की कहानी में यह स्पष्ट है कि वीरा आज़ाद लड़की है लेकिन उसकी आज़ादी की सीमाएँ भी बड़ी हैं। इतनी बड़ी कि वह अकेली कहीं नहीं जाती है, खुद गाड़ी नहीं चलाती है, साँस लेने के लिए भी लड़के के साथ बाहर निकलती है। लड़का अच्छी तरह जानता है कि आलीशान बंगलों से बाहर की दुनिया अमीर लोगों के लिए बहुत खतरनाक है – और कैसे न होगा? यही तो भारत है और सब को मालूम है कि यहाँ रात को क्या क्या होता है और वह भी तब जब जवान लड़की सड़क पर निकल आई हो, लेकिन वीरा साहसी और स्वतंत्र है न? समस्या यही है कि लड़के के साथ गाड़ी में बैठने के लिए ज़्यादा बहादुर होने की जरूरत नहीं है इसलिए पेट्रोल पम्प आने के बाद दुस्साहसिक अभियान (adventurous journey) की प्यासी वीरा गाड़ी से बाहर निकल जाती है। लड़का उसको वापस बुला रहा है लेकिन खुद नहीं निकलता है क्योंकि वह अच्छा लड़का है, नियमों को तोड़ने वाला नहीं है (क्या आजकल बड़े घर के लड़के भी परदों के पीछे बैठने लगे हैं?)। वीरा वापस आना नहीं चाहती है और इसी समय पेट्रोल पम्प लूटने आए डकैत उसका अपहरण कर लेते हैं। इतना सब कुछ हो जाने के बावजूद घर वापस आते ही वीरा अपने माँ-बाप को क्यों बोलती है कि घर के बाहर के खतरे के बारे में आप लोगों की बातें झूठी हैं? वह घर से निकली और उसका अपहरण हो गया। अनजान अत्याचारी पुरुषों ने उसे बार-बार पीटा और बाल पकड़कर अपने साथ दौड़ाया। क्या खतरे का यह रूप काफ़ी या अपमानजनक नहीं था? क्या औरतों के संदर्भ में घटित हिंसा का संबंध सिर्फ़ अस्मत से ही होता है, क्या हिंसा के बाकी रूप मामूली होते हैं? फ़िल्म के अधिकांश हिस्से में वीरा के चेहरे पर चोट के निशान दिखते हैं जो डकैतों के हिंसक व्यवहार को याद दिलाने के लिए काफी है, इसके बावजूद वह अपहरणकर्ता, महावीर उस लड़की को अपना रक्षक लगता है और वीरा उसके साथ रहना चाहती है।

कुछ लोग बोलते हैं कि फ़िल्म स्टॉकहॉम सिंड्रोम के बारे में है और इसलिए वीरा का व्यवहार थोड़ा सा अजीब लग सकता है लेकिन बात यह है कि मुझे इस स्टॉकहॉम सिंड्रोम में विश्वास भी नहीं है। फ़िल्म में एक बहुत महत्त्वपूर्ण दृश्य है जब वीरा अपहरणकर्ताओं के चंगुल से भागना चाहती है लेकिन शोर हो जाने के कारण जल्दी पकड़ी जाती है। महावीर लड़की को भागने की सज़ा देता है और इसके बाद लड़की को कहता है कि भाग जाओ। वह अच्छी तरह जानता है कि वह वापस आ जाएगी। हाँ, यही सच है क्योंकि यहाँ रूपक के बतौर फिल्म को देखना एक भयंकर भूल होगी। क्यों? क्योंकि इसमें फ़िर से अच्छी तरह दिखाया जाता है कि बाहर की दुनिया लड़कियों के लिए खतरनाक है। वीरा बाहर निकल जाती है लेकिन वहाँ कोई मदद करनेवाला नहीं है और औरत को हमेशा किसी की मदद चाहिए। वह उतनी ही स्वतंत्र हो सकती है जितनी अनुमति उसके साथ वाला पुरुष उसे देगा। पहला निष्क्रमण एक पुरुष के साथ हुआ और दुसरा महाभिनिष्क्रमण भी पुरुषों की सहायता के बिना संभव नहीं हो सकता है। इसी कारण वीरा वापस आ जाती है और यह कदम उसकी अधीनता का सबसे बड़ा सबूत दे जाती है। इसलिए मेरी समझ में यह नहीं आता कि इस दृश्य को देखकर लोग कैसे विश्वास कर सकते हैं कि यह फ़िल्म एक ज़ोरदार और आज़ाद ख्याल की एक महिला के बारे में है और वीरा के वापस आने के बाद, महावीर की व्यंग्यपूर्ण टीका-टिप्पणी सुनकर सिनेमाघर में बैठे हुए लोग हँस कैसे सकते हैं?

 दर्शकों को जल्द ही पता चलता है कि वीरा का बचपन बहुत ही दमघोंटू घटनाओं के बीच बीता है। उसका अंकल उसे बचपन से ही मोलेस्ट (यौन हिंसा/छेड़-छाड़) करता आया है। वीरा ने अपनी माँ को सब कुछ बताया लेकिन माँ ने मदद करने के बजाय बेटी को ही चुप रहने को कहा। शायद इसीलिए जब महावीर उसको अपने ही आदमी से बचाता है (जो वीरा के साथ ज़ोर-जबर्दस्ती करने की कोशिश करता है) तब वीरा अचानक बदल जाती है। महावीर का यह छोटा व्यावसायिक-कर्तव्य (जिसका संबंध अपहरण उद्योग की नैतिकता से भी है) उसके लिए ही काफ़ी है, इसके बाद लड़की का डर अपने आप गायब हो जाता है और वीरा अपहरणकर्ताओं से बातचीत करनी शुरू कर देती है। उसके लिए यह काफ़ी है कि वे लोग उसकी अस्मत लूटनेवाले नहीं हैं और जो आदमी अस्मत की लूटपाट नहीं करता है, वह अपहरण करने, थप्पड़ मारने या बाल खींचने के बावजूद अच्छा है।  इसलिए वीरा निश्चय करती है कि वह उन लोगों के साथ जाएगी। उसको पता नहीं है कि वे कहाँ जा रहे हैं, वह ट्रक के पीछे बंद हो जाती है, ज्यादा कुछ भी नहीं देख सकती है लेकिन फिर भी, न जाने क्यों आज़ाद महसूस करती है। वह न वापस आना चाहती है और न ही मंज़िल पर पहुँचना – उसको बस, रास्ता, फ़िल्म के टाइटल वाला हाइवे पसंद है जिसका स्पष्ट मतलब यह है कि जब से वीरा को पता चला कि जो लोग उसके साथ हैं वे उसकी अस्मत लूटने वाले नहीं हैं, अच्छे लोग हैं, बस यही सब उसके लिए एक साहस बन जाता है।

फ़िल्म के शुरुआती अंश के दृश्य उदासीन और डार्क है लेकिन जब से वीरा के विचार में यात्रा ज़्यादा खतरनाक नहीं है, तब से फ़िल्म में ज़्यादा रंग और प्रकाश, गाने और सरसो के फूलों के खेत भी आते हैं। लेकिन स्टॉकहॉम सिंड्रोम कहाँ चला गया? मुझे लगा कि एक जटिल प्रेम संबंध देखूँगी जिसमें एक जवान लड़की खतरनाक आदमियों की रखैल बनना चाहती है लेकिन फ़िल्म एक बिगड़ैल लड़की के बारे में है जो दो आदमियों की लाड़ली गुड़िया बन जाती है और उनके साथ घूमती है। हाँ, एक आदमी थोड़ा सा सनकी और खतरनाक लगता है लेकिन दूसरा अच्छा अंकल जैसा है। वीरा खुद भी बदल जाती है और पश्चिमी कपड़े देशी में बदल जाते हैं। लेकिन यहाँ भी उसका व्यवहार ज़्यादा स्वभाविक नहीं है, टुरिस्ट जैसा है– उसको पता नहीं है कि वह भारत के किस प्रदेश में है, दूसरी भाषा के अक्षर नहीं पहचानती है, गरीबों के घर और छोटे-छोटे गंदे सड़क उसको ज्यादा अच्छे लगते हैं, एक डिस्को गाना बजाकर आदमियों के सामने नाचती है। इन सब का मतलब यही हो सकता है कि वह अच्छी तरह जानती है कि उसके साथ कुछ भी बुरा नहीं होगा या इतनी वेबकूफ़ है कि अपराधियों के साथ सफ़र करते हुये भी खतरों से अनजान है। कहने का मतलब कि यह जो भी है लेकिन स्टॉकहॉम सिंड्रोम नहीं है। फ़िल्म की सबसे बड़ी कमजोरी यह है कि उसके पात्रों का मनोवैज्ञानिक चित्रण बहुत ही सतही है।

फ़िल्मवालों ने ब्यूटी ऐन्ड दी बीस्ट के आदिरूप से प्रेरणा ले लिया है। लड़की जवान, सुंदर और मासूम है और आदमी हिंसक, तीखा और खतरनाक। लेकिन इतना नहीं। महावीर वीरा को ज़बरदस्ती अपने पास रखता है लेकिन लड़की अच्छी तरह जानती है कि बीस्ट के अंदर एक खूबसूरत और अच्छा राजकुमार बंद है। वीरा से बातचीत करने का महावीर का तरीका अच्छा नहीं है लेकिन लड़की बार-बार उसके संपर्क में आने की कोशिश करती है, यह जानकर कि अंदर से वह ज़रूर बहुत अच्छा आदमी है। वह ऐसा क्यों करती है? इसलिए नहीं कि वह महावीर से भावनात्मक रूप से जुड़ी हुयी है, लगता है कि वह अपने सफ़र को खत्म करना नहीं चाहती है और सफ़र के लिए आदमी की ज़रूरत है। वीरा अच्छी तरह जानती है कि अपहरण के कारण महावीर का जीवन खतरे में है और यह भी अच्छी तरह जानती है कि ऐसे किसी अवश्यंभावी आपदा के बाद खुद उसे कुछ नहीं होगा क्योंकि वह बस पीड़िता है, इसके बावजूद वह महावीर को जाने नहीं देती है और वे दोनों पहाड़ जाते हैं। इस नयी जगह में भी लड़की का व्यवहार टुरिस्ट जैसा है जो झोपड़ी में रहने के खेल से खुश है। शायद इस मामले में भी वह फिर से इतनी भोली थी कि सचमुच उसको लगने लगा कि महावीर को अब कुछ नहीं होगा। महावीर की मौत के बाद, एक अनूठे और बहुत अच्छे दृश्य में उसका सच्चा दुख प्रकट होता है, यह जानकर कि यह सब कुछ उसकी गलती थी या शायद वह सचमुच अपहृत होकर खुश थी और अगर खुश थी तो बस इसलिए कि महावीर नौकर की तरह वह सब कुछ करता था, जो वह चाहती थी।

भारतीय सिनेमा ऐसी कहानियों को दिखा चुका है जिनमें औरत को अपने अपहरणकर्ता से प्यार हो जाता है और इतिहास में भी ऐसी बहुत सी कहानियाँ हैं जिनमें औरत अपने अपहरणकर्ता से शादी कर लेती है और वापस आना नहीं चाहती है। इन फिल्मों और कहानियों से यहाँ अंतर यह है कि वीरा महावीर से शादी करना नहीं चाहती है – वह उसके लिए बस एक दुस्साहसिक-अभियान (adventurous journey) था। लड़की का परिवार उसको वापस स्वीकर करता है, होनेवाला पति रिश्ता तोड़ना नहीं चाहता है। सब कुछ ठीक है लेकिन वीरा फ़िर से भागना चाहती है; अंकल के बारे में सच्चाई-वमन, चिल्लाना उसके लिए काफी नहीं है। अंततः पता नहीं चलता कि परिवार वालों ने वीरा के आरोपों का विश्वास किया कि नहीं या मान्सून वेडिंग के परिवार की तरह अश्लील अंकल से रिश्ता तोड़ लिया। लगता है कि ऐसा कुछ नहीं हुआ, इसलिए वीरा वापस पहाड़ आती है लेकिन अपने सपने की झोपड़ी के लिए नहीं बल्कि इससे ज़्यादा सुविधा-सम्पन्न और बड़े घर में रहने। उस घर को देखकर लगता है कि अमीर बाप से भी रिश्ता तोड़ना असंभव था क्योंकि जिस लड़की को किसी पुरुष की मदद नहीं मिलती है, उसके लिए बाहर की दुनिया बहुत खतरनाक है।

इम्तियाज अली की फ़िल्म में बहुत कमियाँ है। पहली कि शायद वह खुद नहीं जानता था कि उसकी फ़िल्म किसके बारे में होगी। यह फ़िल्म न एक अमीर, ऊबी हुई लड़की के बारे में है जिसको जीवन में थोड़ा सा एडवेंचर चाहिए था और जिसके लिए दुनिया के बाकी लोग उसके नौकर जैसे होते हैं, न स्टॉकहॉम सिंड्रोम से पीड़ित व्यक्ति के बारे में है और न ही एक ऐसी लड़की के बारे में है जो अचानक इस सच्चाई को ढूंढ लेती है कि उसको अपने झूठे परिवार की ज़रूरत नहीं है क्योंकि बाहर की दुनिया में ज्यादा अच्छे लोग रहते हैं। जो भी है, नायिका के “विद्रोही” व्यक्तित्व के अतिरिक्त पता नहीं क्यों फ़िल्म महावीर के वंचित/दमित बचपन को और उसके अपने माँ से मज़बूत रिश्ते को दिखाने की कोशिश करती है– उन सब दृश्यों की ज़रूरत नहीं थी, छोटी लड़की के फ़्लैशबैक वाले दृश्य के साथ, क्योंकि सस्ता और सतही मेलोड्रामा के अलावा उनका कोई इस्तेमाल नहीं है। लगता है कि सच्चे विद्रोही और आज़ादी का थोड़ा सा और इंतज़ार करना पड़ेगा। दुख की बात यह है कि हाइवे के लोकप्रियता का अर्थ यह नहीं है कि दर्शक विद्रोही नायिका को देखने के लिए तैयार है बल्कि वे हँसते-हँसते एक अविकसित, नासमझ  लड़की के खेल को उतना ही देखते हैं जितना उसके आसपास के पुरुषों ने उसको खेलने दिया।

तत्याना षुर्लेई

तत्याना षुर्लेई

तत्याना षुर्लेई एक Indologist और फिल्म-आलोचक हैं। हंस, पहल, अकार आदि हिन्दी पत्रिकाओं के लिए लिखती रही हैं। फिलहाल पोलैंड के शहर क्राकोव स्थित Jagiellonian University में The Courtesan Figure in the Iconography on Indian Popular Cinema:Tradition, Stereotype, Manipulation.  नामक विषय पर पीएचडी के लिए शोधरत हैं। उनसे tatiana.szurlej@gmail.com पर संपर्क संभव है।

समाज के हाशिए का सिनेमाई हाशिया: तत्याना षुर्लेई


 सिनेमा के सौ साल के इतिहास में  दलितों  के बारे में ज़्यादा फ़िल्में नहीं हैं। शुरू में ऐसा लगा कि गाँधी जी और उनके तरह के दुसरे सुधारकों की मदद से यह विषय लोकप्रिय होगा लेकिन जल्दी ही ऐसी फ़िल्में मुख्यधारा के विषय से बाहर चली गयीं। क्या भारतीय दर्शक ऐसी फ़िल्मों के लिए तैयार नहीं हैं? मुझे लगता है कि आधुनिक सिनेमा में सब कुछ दिखाया जाता है इसलिए इस विषय से इतना डर ज़्यादा अजीब लगता है। जब हम बॉलीवुड फ़िल्मों की संख्या के बारे में सोचेंगे तो यह देखेंगे कि दलित न सिर्फ़ जाति के वरीयता-क्रम से बाहर हैं बल्कि सिनेमा से भी बाहर हैं। 100 करोड़ से उपर की जनसंख्या वाले देश के सिनेमा में बहुजन-जीवन के स्वाभाविक-चित्रण का अभाव चिंताजनक है और इसका एक बड़ा कारण संभवतः यह है कि बहुजनों का बड़ा हिस्सा अभी भी सिनेमा के उपभोक्ता समुदाय में तब्दील नहीं हुआ है। यह तब तक नहीं बदलेगा जब तक उनकी परिस्थितियों को स्वभाविक तरीके से नहीं दिखाया जाएगा। अगर हम दलित-समस्या पर ही केन्द्रित रहेंगे और सिर्फ़ सुधार के आग्रही के बतौर ही दलितों का चित्रण करेंगे तो वे कभी समाज के स्वाभाविक हिस्से की तरह कभी नहीं दिखेंगे।

अछूत कन्या

अछूत कन्या

समाज के हाशिए का सिनेमाई हाशिया

भारतीय व्यावसायीक फ़िल्मों में दलितों की अनुपस्थिति।

BY तत्याना षुर्लेई

एक पुरानी कहानी है – थाइलैंड में रहनेवाली एक राजकुमारी एक बड़ी नदी में जहाज पर यात्रा करती थी। नदी के किनारे खड़ी भीड़ तालियां बजाकर राजकुमारी और उसके साथ जाने वाले नौकरों का स्वागत करती थी। यह सब देखकर राजकुमारी अतिउत्साह में भीड़ की ओर कुछ ज्यादा ही झुक जाती है और जहाज़ से बाहर गिरकर पानी में डूब जाती है। जहाज़ और किनारे पर खड़े लोगों में से किसी ने उसकी मदद नहीं की। ऐसा क्यों हुआ? इन सारे लोगों में से किसी ने उसकी मदद क्यों नहीं की? राजकुमारी उस जहाज़ में बहुत सारे नौकरों के साथ यात्रा करती थी। उन नौकरों और किनारे पर खड़े लोगों से कोई न कोई तो मछुआरा ज़रूर रहा होगा जिसको अच्छी तरह तैरना भी आता होगा। इसका जवाब बहुत आसान है – राजकुमारी दुसरे लोगों से इतनी ऊपर थी कि किसी को उसको छूना मना था[1]।

अस्पृश्यता के अलग अलग प्रकार होते हैं।  Brian De Palma की फ़िल्म के द्वारा चर्चित ‘अस्पृश्यता’ के अलावा एक और का ज़िक्र करना चाहिए क्योंकि इसके बारे में सब लोगों को पता है। दूसरा मामला भारत से संबंधित है जहाँ एक दुसरे से छू जाना भयावह माना जाता है। दोनों में डर बराबर है मगर आधार अलग। देवी बनी हुई राजकुमारी या खतरनाक माफ़िया से डर और उनकी अस्पृश्यता भारतीय दलितों की अस्पृश्यता से बहुत दूर है।

बहुत सारे सुधारक जो भारत में रहते थे अछूतों की ज़िंदगी को बदलने की कोशिश करते थे लेकिन अजीब बात यह है कि इस काम में उन में से किसी ने फ़िल्म का इस्तेमाल नहीं किया। भारतीय निर्देशकों के लिए भी फ़िल्म अधिप्रचार (PROPAGANDA) के लिए उचित साधन नहीं लगता था। यह भी एक अजीब बात है क्योंकि अधिप्रचार के लिए फ़िल्म सब से अच्छा साधन है। फ़िल्म बनानेवाले लोग समाज सुधारकों के साथ काम नहीं करते थे। इसी प्रकार गाँधी जी जो अछूतों के लिए बहुत काम करना चाहते थे और करते भी थे लेकिन फ़िल्म की मदद से अपने सुधारों के बारे में कुछ नहीं बताते थे। उनके लिए फ़िल्म कभी अच्छी चीज़ नहीं थी और उन्होंने कभी पसंद  भी नहीं किया। उनके लिए फ़िल्में पतनशील पश्चिमी सभ्यता का एक और उदाहरण था या फिर साधारण मनोरंजन का एक छोटा सा साधन जिसका ज़िंदगी में कोई महत्त्व नहीं है। उन्होंने स्वीकार किया कि उन्होंने सिर्फ़ एक फ़िल्म देखी है। यह फ़िल्म 1943 वाली विजय भट्ट की ‘राम राज्य’ थी और शायद इसीलिए उन्होंने कभी नहीं सोचा कि यह मनोरंजन करने वाला, साधारण लोगों का तमाशा अपने पैदाइश से ही वह सब कुछ दिखाता जिसके बारे में वे बताते हैं[2]।

उदाहरण के लिए फ़िल्म की दुनिया में अलग अलग धर्म के लोग साथ साथ रहते हैं और यह बात किसी को कभी अजीब नहीं लगती थी। शुरू से ही ऐसी स्थिति थी कि अक्सर हिंदू धर्म के देवताओं या राजाओं का अभिनय मुसलमान अभिनेता करते थे और मुसलमान के पीरों या सम्राटों का अभिनय हिंदू अभिनेता। यह भी कोई नयी बात नहीं है और न कभी थी कि किसी समय में सब से लोकप्रिय अभिनेता मुसलमान होते हैं और दुसरे समय में हिंदू। ‘तीन खानों’, यानी आमीर खान, शाहरुख़ खान और सलमान खान की लोकप्रियता जो 1990 के दशक में थी, इसका अच्छा उदाहरण हो सकता है। इसी समय में ‘कुछ लोगों’ के लिए ऋतिक रोशन की सम्भावना का हिंदू धर्म से स्पष्ट संबंध था। उन ‘कुछ लोगों’ के लिए ऋतिक तीन खानों से जीतने के लिए आ गया और हिंदू धर्म मुसलमानों से जीतने के लिए[3], लेकिन ऐसा नहीं हुआ। ऋतिक की लोकप्रियता के अतिरिक्त बाकी तीनों अभिनेता फ़िर भी मशहुर रहे। शाहरुख़ खान के साथ एक ध्यान देने योग्य घटना हुयी जो कि बहुत अच्छा उदहारण है। वह काम करने के बाद बहुत थके होने के कारण एक गाँव के पास गाड़ी में ही सो गया। जब उठा तो उसने गाँववालों की भीड़ देखा। गाँववाले आग्रह कर उसे एक घर में ले गए और वहाँ यज्ञ-वेदी के स्थान पैर  उसने अपनी तस्वीर देखी[4]। एक और ऐसी ही कहानी जिसके बारे में बताना मुझे उचित लगता है अशोक कुमार की है। वह अभिनेता जो विभाजन के बाद अपने स्टुडियो ‘बॉम्बे टाकीज’ में बहुत से मुसलमानों को काम देता था। एक बार वह अपने एक दोस्त के साथ स्टुडियो से घर जा रहा था। रास्ते में मुसलमानों का इलाका पड़ता था, जहाँ एक एक बारत जा रही थी। अशोक के दोस्त को डर लगा की बारत वाले उनके साथ कुछ बुरा बर्ताव करेंगे लेकिन भीड़ के लोगों ने अशोक कुमार को पहचान लिया, उन दोनों को स्वागत किया और उनको सब से अच्छा रास्ता दिखाया। दोस्त आश्चर्यचकित हो गया लेकिन अशोक कुमार ने उसको कहा कि मुझे एक क्षण के लिए भी डर नहीं था क्योंकि कलाकारों की कोई जाति या धर्म नहीं होता है[5]।

स्पष्ट रूप से फिल्मी- दुनिया की स्थिति इतनी अच्छी नहीं थी, जितनी आशोक कुमार के विचार में थी। उदाहरण के लिए देवानन्द धर्म के कारण सुरया से शादी नहीं कर सकता था। सुरया के परिवार ने उसको देव को छोड़ने का हुक्म दिया, क्योंकि देव हिंदु था। कुछ समय बाद सुरया को अफ़सोस हुआ लेकिन फैसला बदलने के लिए देर हो चूका था[6]। इसी तरह जब 1957 में नर्गिस को ‘मदर इंडिया’ में काम मिल गया तो कुछ लोगों को यह अच्छा नहीं लगा। वे नहीं चाहते थे कि देश का प्रतिरूप एक मुसलमान औरत हो[7]। फ़िर भी, हम यह कह सकते हैं कि ये सिर्फ़ छोटे उदाहरण हैं। फ़िल्म की दुनिया में धर्म का उतना महत्त्व नहीं था जैसे मामूली जीवन में।

इन उदाहरणों में हम लोग देख सकते हैं कि फ़िल्म में ‘अनुदारता से लड़ाई और कुछ अलग दुनिया दिखाने की कोशिश’ हमेशा कहानियों की स्तर पर होती थी। फ़िर भी, इसका मतलब यह नहीं है की ऐसी फ़िल्में कभी नहीं बनाई जाती थीं जिनकी कहानियों में अलग-अलग पूर्वाग्रहों से, दुर्गुणों से लड़ाई होती थी (धर्म के क्षेत्र से अलग)! इस तरह हम यह कह सकते हैं कि पहती फ़िल्म जो अस्पृश्यता के बारे में थी जो कि गाँधी जी के सुधार-आन्दोलन से प्रेरित थी Franz Osten की ‘अछूत कन्या’ जो 1936 में बनाई गई। यह फ़िल्म प्रताप नाम के ब्राहमण लड़का और कस्तुरी नाम की अछूत लड़की की एक दारुण प्रेम-कहानी है। कस्तुरी के पिता, जिनका नाम दुखीजा है, एक स्टेशन-मास्टर हैं और प्रताप के पिता की एक दुकान है। दुखीजा ने एक बार प्रताप के पिता की जिन्दगी बचायी और इस घटना से उन दोनों की बहुत अच्छी दोस्ती है। उनका अपने बच्चों की दोस्ती से कोई विरोध नहीं है लेकिन जब प्रताप और कस्तुरी की दोस्ती से प्रेम उत्पन्न होता है तो अचानक उन दोनों की जातियों का अंतर दिखाई देता है। यह अंतर जो पहले बिलकुल प्रकट नहीं था। प्रताप की अपनी जाती की एक लड़की से शादी की जाती है और यह शादी कस्तुरी के लिए कोई चौंकानेवाली या गज़ब बात नहीं है। अछूत लड़की के लिए यह सब इतना स्वाभाविक है कि वह प्रताप की पत्नी – मीरा से दोस्ती करती है। प्रताप के पिता की अछूतों से दोस्ती गाँववालों को पसंद नहीं है और जब इस कारण से उसके साथ दुर्घटना होती है तो दुखीजा उसके लिए जल्दी दवा लाना चाहता है और जाती हुई रेलगाड़ी को रोकता है। दुर्भाग्या से उसको न दवा मिलती है न कोई पुरस्कार मिलता है, बल्कि वह अपने काम से निकाला जाता है। उसके स्थान पर एक जवान लड़का आता है जिसका नाम मनु है। दुखीजा मनु और कस्तुरी की शादी करवाता है। दुर्भाग्यपूर्ण कि लड़की शादी को स्वीकार करती है और कोई फ़रियाद नहीं करती, तब भी जब उसको पता चलता है कि मनु की एक और शादी हो चूकी थी और उसकी पत्नी – कजरी उनके साथ रहने के लिए आ जाती है। कस्तुरी कजरी को दीदी बुलाती है और कभी कोई बुराई नहीं करती है। फ़िर भी मनु की दुसरी पत्नी को बड़ी ईर्ष्या है क्योंकि मनु सिर्फ़ कस्तुरी से प्रेम करता है। मीरा कजरी की सहेली है। पहली मुलाकात में प्रताप की पत्नी कजरी को कहती है कि उसका पति भी सिर्फ़ कस्तुरी से प्यार करता है। कजरी के मन में कस्तुरी को निकलाने की अशुभ राय आती है और दोनों औरतों की चुगली के कारण प्रताप और मनु के बीच बहुत बड़ा झगड़ा होता है। वे दोनों रेल की पटरी पर मार-पीट करते हैं और आनेवाली गाड़ी पैर ध्यान नहीं देते हैं। रेलगाड़ी को रुकवाने के चक्कर में कस्तुरी की मौत होती है। इस लज्जाजनक विषय को दिखाने के लिए, जो पहले किसी से नहीं दिखाया गया, इस फ़िल्म को बहुत सारी प्रशंसाएँ मिली[8]। वास्तव में 1936 में ऐसे विषय के बारे में बताना बहुत बड़ी बहादुरी थी। अफ़सोस की बात सिर्फ़ यह है कि इतने सालों में किसी दुसरे निर्देशक ने कुछ ऐसा नहीं किया। शायद Franz Osten के लिए ऐसी कहानी को दिखाना इतनी मुशकिल बात नहीं थी क्योंकि वह जर्मनी से भारत आया था और जिसके लिए यह विषय कोई बड़ा निषेध नहीं था। हमें फ़िर भी यह स्वीकार करना होगा कि फ़िरंगी होने के बावजूद Osten ने अपने दर्शकों को जो दिखाया उसके लिए उसने भारतीय समाज का बड़ी गहराई से अध्ययन और अनुभव किया। Osten का अनुभव उन स्थानों में अच्छी तरह दिखाई देता है जहाँ फ़िल्म के नायक और नायिका बिना किसी झिझक के अपने उपर आरोपित भाग्य को स्वीकार करते हैं और अपनी खुशी और सन्तुष्ट भविष्य के लिए लड़ाई नहीं करते हैं। दिलचस्प बात यह है कि फ़िल्म अपने दर्शकों को भी बहुत अच्छी लगी। हमें यह भी याद रहना चाहिए कि अच्छी व्यावसायीक फ़िल्म वह होती है जो सब को पसंद हो, सीधे-सादे लोगों को भी जो कि अक्सर बहुत रूढ़िवादी होते हैं। अगर ऐसे दर्शकों को अचानक विवादग्रस्त कहानी देखने की इच्छा होती है और देखने के बाद यह कहानी उनको पसंद है तो इसका मतलब यह है कि वे दर्शक कुछ न कुछ परिवर्तनों के लिए तैयार हैं। हो सकता है कि Osten की फ़िल्म उसी समय में लोगों को इसलिए पसंद थी क्योंकि वे गाँधी जी के दबाव में थे लेकिन यह भी सच है कि फ़िल्म का निषेध बिल्कुल हटा नहीं हुआ। प्रताप और कस्तुरी के बीच में प्रेम है और लड़का अपनी प्रेमिका को अक्सर छूता है। प्रताप के पिता अपनी दुकान की सब चीज़ें कस्तुरी को बेचते हैं। बहुत आश्चर्यचकित बात यह है कि एक क्षण में प्रताप कस्तुरी के साथ गाँव से भागना चाहता है और लड़की के इनकार के बाद भगवान को पूछता है कि उसने उसको भी अछूत क्यों नहीं बनाया! ऐसा उत्कर्षण एकदम नयी बात है जो अक्सर नहीं मिलती है। यह भी बुद्धिमानी वाली बात है जिसकी सहयता से हर दर्शक देख सकता है कि सिर्फ़ अछूत होने से कोई दोष नहीं है, समस्या तब उत्पन्न हो जाती है जहाँ दो जातियों के लोग एक दुसरे से प्रेम करते हैं। शादी के लिए समाज की अनुमति का अभाव फ़िल्म की सिर्फ़ एक कठिनाई है, लेकिन सबसे बहुत महत्त्वपूर्ण कठिनाई तो वह है जो सब को याद दिलाती है कि कई ऐसे निषेध होते हैं जिनको तोड़ना असंभव है। हम देख सकते हैं कि 1936 में भारतीय समाज थोड़े परिवर्तनों के लिए तैयार था लेकिन ज़्यादा नहीं। फ़िल्म में महत्त्वपूर्ण बात यह भी है कि नियमों तोड़ने की सज़ा लड़की को मिलती है। शायद यह उस विचार से संबंधित है कि एक जाति से दुसरी जाति के बीच किसी भी तरह के अतिक्रमण की सज़ा उसको मिलती है जिसकी जाति नीची है।

फिल्म की प्रस्तुतीकरण और पारंपरिक-शैली की परवाह किए बिना ‘अछूत कन्या’ बहुत बहादुर फ़िल्म है। इस बहादुरी का सबुत सबसे पहले यह है कि दुसरी ऐसी फ़िल्म के लिए हमें बहुत इंज़ार करनी पड़ी। 1959 में बिमल राय ने ‘सुजाता’ की फ़िल्म बनाई जो फ़िर से अछूत लड़की और ब्राम्हण लड़के के प्रेम की कहानी है।

उपेन्द्रनाथ चौधरी और उसकी पत्नी चारू की एक छोटी बेटी है जिसका नाम रमा है। जब लड़की की उम्र एक साल की है तो चौधरियों के घर में एक दुसरी लड़की आती है। वह लड़की अनाथ है जिसके माता-पिता आसपास के गाँव में रहते थे। समस्या यह है कि वह लड़की अछूत है इसलिए श्रीमती चौधरी छोटी लड़की की देखभाल के लिए अपनी नौकरानी को हुक्म देती है। श्रीमती चौधरी का डर स्पष्ट है लेकिन इसी समय में आश्चर्य की बात यह है कि उसको अपनी बेटी के अपवित्र हो जाने से डर नहीं है। जबकि अछूत लड़की को वही आया को देती है जो छोटी रामा की देखभाल करती है। आया को भी इस स्थिति में कोई समस्या नहीं है और वह नयी बच्ची की देखभाल करती है यद्यपि छोटी लड़की उसकी जाति से भी नीचे की है, लेकिन ऐसा शायद इसलिए है कि आया को वही करना चाहिए जो मालिक कहते हैं और उसको किसी भी तरह की शिकायत करने का भी अधिकार नहीं है। उपेन्द्रनाथ जल्द ही अपनी पत्नी के व्यवहार से विपरीत अछूत लड़की को स्वीकार करता है और उसका नाम सुजाता रख देता है। चारू को समाज से निकलने का बहुत डर है इसलिए उसको सुजाता से अपने पति के किसी भी तरह के संपर्क बहुत बुरे लगते हैं।

सुजाता को स्वीकार करने में सब से बड़ी बाधा बुढ़ी बुआ – गिरिबाला है। वह बहुत धर्मिक औरत है इसलिए एक पण्डित के साथ चोधरियों के यहाँ आती है। पण्डित के लिए अछूत लड़की से मिलना बड़ा अपमान है। वह समझ नहीं सकता है कि ऐसी बच्ची ऊँची जाति के लोगों को साथ कैसे रह सकती है और वह चौधरियों के घर को छोड़ने का निश्चाय करता है। उसके जाने से पहले जब उपेन्द्रनाथ उसको पूछता है कि उसके विचार में सुजाता और घर के दुसरे लोगों में सचमुच कोई बड़ा अंतर है, पण्डित कहता है कि अछूतों के शरीर से जहरीली हवा निकलती है जो आसपास के लोगों के लिए बहुत खतरनाक है। उपेन्द्रनाथ को यह बहुत मज़ेदार लगता है लेकिन पण्डित कहता है कि विटामिन को भी कोई देख नहीं सकता है पर इसका मतलब नहीं है कि ऐसी कोई चीज़ नहीं होती है।

पण्डित की सोच एक दुसरे पण्डित के विचारों से मिलती-जूलती है। बटुप्रसाद शर्मा शास्त्री बनारस के एक मंदिर में गुरू है और 2007 में बनी स्टालिन कुरूप के एक वृत्तचित्र ‘India Untouched: Stories of a People Apart’ का एक चरित्र। इस पण्डित के मन में भी बहुत सारे अजीब उदहारण होते हैं जिनके अनुसार अछूतों को अपने भाग्ये को स्वीकार करना चाहिए और जीवन को बदलने के बारे में सोचना मना है। पण्डित के अनुसार जिस मनुष्य को हवाई जहाज़ को चलाना नहीं आता है वह उसे नहीं चलाएगा। वैसे ही अछूतों को सिर्फ़ यह करना चाहिए जो परंपरा के अनुसार उनको हमेशा करना था। स्टालिन कुरूप की फ़िल्म में एक और ब्रहमाण है। वह कहता है कि हर व्यक्ति अपने काम करने के लिए पैदा होता है और वह सिर्फ़ वही काम कर सकता है जो उनके पूर्वज शताब्दियों से करते आये हैं। वह ब्राम्हण है, उसको चिंतन करना अच्छी तरह आता है और यह उसके लिए आसान है जब कि दुसरों के लिए असंभव। वैसे ही सफ़ाई करनेवाला या नाई को भी ऐसे ही कौशल आते हैं जिसके बारे में ब्राम्हणों को बिल्कुल ज्ञान नहीं है। कभी कभी पश्चिम के लोगों को यह असंभव लगता है कि 21 शताब्दी में भी लोगों के अंदर इतने पूर्वाग्रह होते हैं! लेकिन, ये दो उदहारण अच्छी तरह दिखाते हैं कि बिमल राय की ‘सुजाता’ का पण्डित कोई अतिरंजित व्यक्ति नहीं है बल्कि भारत में सचमुच में ऐसे लोग हैं जो आज भी इन बेतुकी बातों पर विश्वास करते हैं.

सुजाता चौधरियों के घर में रहकर बड़ी हो जाती है लेकिन यहाँ एक और विरोधाभास दिखाई देता है। चारू लड़की को कभी नहीं छूती और अपने पति को हमेशा घुड़की देती है जब उपेन्द्रनाथ अछूत लड़की के पास जाता है। अजीब बात यह है कि इसी समय में वह अपनी बेटी रामा को सुजाता के साथ खेलने की अनुमति देती है। सुजाता की स्थिति एक उपेक्षिता सी है – वह स्कूल नहीं जाती है, घर पर मता-पिता की देखभाल करती है और उद्यान में फूलों की। सुजाता की इस हालत के बावजूद उसकी सौतेली बहन उसके प्रति कभी बुरा व्यवहार नहीं करती है, फ़िर भी दिलचस्प बात यह है कि रमा को अपनी सौतेली बहन कि स्थिति कभी भी अजीब नहीं लगती है। रमा को मालूम नहीं है कि सुजाता उसकी सौतेली बहन है फ़िर भी वह माता-पिता से कभी नहीं पूछती है कि सिर्फ़ मैं ही स्कूल क्यों जाती हूँ और केवल मेरा ही जन्मदिन क्यों मनाया जाता है! घर के लोग चाहते हैं कि रमा की शादी अधीर से होती। अधीर एक जवान लड़का है जो गिरिबाला के साथ रहता है। जब वह पहली बार चौधरियों के घर आता है तो उसको सुजाता के उपर प्रेम आता है। उसका प्यार बहुत गहरा है और वह तब भी नहीं बदलता है जब उसको पता चलता है कि सुजाता अछूत जाति की लड़की है। अधीर अपने घर को छोड़ने के लिए तैयार है क्योंकि वह सिर्फ़ सुजाता से शादी करना चाहता है। चारू सोचती है कि उसकी सौतेली बेटी ने जानबूझकर अधीर को लुभाया क्योंकि उसको रमा के प्रति ईर्ष्या थी और वह अपनी बहन से प्रतिशोध लेना चाहती थी। सुजाता पर चिल्लाने के समय चारू अचानक सिढ़ियों से गिरती है और उसकी हालत बहुत गंभीर है। चारू के इलाज के लिए रक्त-आधान की ज़रूरत है। दुर्भाग्य से पति, रमा और अधीर का ब्लड-ग्रूप चारू से नहीं मिलता है पर सुजाता का वही है जिसकी जरुरत है। इस तरह सुजाता अपनी सौतेली माँ की जिन्दगी बचा सकती है।

यह दृश्य जहाँ रक्त-आधान चल रहा है बहुत दिलचस्प है क्योंकि हम यहाँ स्पष्ट रूप से देख सकते हैं कि सुजाता के खून के बारे में सुनकर उपेन्द्रनाथ बहुत अश्चार्यचकित हो जाता है। वह आदमी हमेशा सुजाता की रक्षा करता था और पण्डित के पागल विचारों पर हंसता था लेकिन कहीं अंदर में शायद वह भी सचमुच सोचता था कि अलग अलग जातियों के लोगों में ऐसे अंतर होते हैं।

बिमल राय की फ़िल्म अछूतों की पहली फ़िल्म बहुत सालों के बाद बनाई गई लेकिन इसमें भी गाँधी जी के विचारों से स्पष्ट संबंध है। सुजाता अक्सर नदी के किनारे जाती है और वह समय बिताने के लिए उसकी सब से अच्छी जगह है। जब उसको पता चलता है कि वह अछूत जाति की एक लड़की है जिसको चारू और उपेन्द्रनाथ ने गोद में लिया है, वह निराश होकर नदी के पास आती है और तेज़ बारिश में भींग जाती है। वह आत्महत्या करने का निश्चय करती है लेकिन जब पानी की तरफ़ आती है तब उसकी साड़ी का आँचल पास ही खड़ी गाँधी जी की मूर्ती से फँस जाता है। सुजाता मूर्ती की ओर देखती है और बारिश की बूंदें जो गाँधी जी के चेहरे पर बहती हुई आँसू जैसी दिखाई देती हैं।

गाँधी जी एक मात्र सुधारक नहीं है जिनका फ़िल्म में ज़िक्र है। रमा के कॉलेज में एक नाटक दिखाया जाता है जिसे देखने के लिए वह सारे परिवार को बुलाती है। समस्या यह है कि गिरिबाला नहीं चाहती है कि सुजाता भी जाए और वह बेचारी घर पर रहती है। जो नाटक दिखाया जाता है वह रबीन्द्रनाथ ठाकूर का ‘चंदलीका’ है। नाटक देखती हुई गिरिबाला को यह बहुत उचित लगता है कि स्कूल के स्टेज पर खड़े बुद्ध अछूत लड़की के हाथों से पानी लेते हैं और सभी जातियों की बराबरी के बारे में व्याख्यान देते हैं। गिरिबाला यह नहीं देखती है कि नाटक की अछूत लड़की और सुजाता में कोई अंतर नहीं है। यह व्यंग्य ऐसे लोगों के प्रति किया गया जिनके लिए सुधार सिर्फ़ एक प्रचार वाक्य हैं। फ़िर भी फ़िल्म की अंत में गिरिबाला भी यह साबित करती है कि प्यारे अधीर के लिए वह अपने विचारों को छोड़ सकती है। जब अधीर घर को छोड़ना चाहता है तब गिरिबाला सुजाता को स्वीकार करती है और कहती है कि शायद वह सचमुच पुरानी पीढ़ी की मानसिकता की वाहक है, उसे अब युवा विचारों को जगह देनी चाहिए।

अफ़सोस की बात यह है कि वास्तविकता हमको अच्छी तरह दिखाई देती है कि युवा आदर्शवादियों के सब सुधार असफल हुए और बॉलीवुड ने फ़िर से कभी ऐसी कहानी नहीं दिखाई। ‘सुजाता’ ‘अछूत कन्या’ की ही तरह बहुत सुगम फ़िल्म थी इसके बावजूद कि बिमल राय Franz Osten से आगे चला गया और उसने अछूत लड़की का ब्राहमण लड़के से शादी को संभव बनाया। व्यावसायीक सफलता के बावजूद सिनेमा के निर्देशकों को इस विषय से बड़ा डर है। ‘सुजाता’ के समय से भारत में बहुत मजबूत फ़िल्में बनी हैं और बहुत से निषेध टूटे भी हैं। फिर भी, अंतर्जातीय और विधवा विवाह आज भी मामूली दर्शकों को अनुचित लगते हैं।

सिनेमा की मुख्यधारा से अलग रहने वाले निर्देशकों का तरीका कुछ अलग ही होता है इसलिए वे आक्सर व्यावसायीक फ़िल्मों के निर्देशकों से ज़्यादा आज़ाद होते हैं। उनके लिए दर्शकों का ख्याल इतने महत्त्वपूर्ण नहीं हैं लेकिन इसके बावजूद भी हिंदी सिनेमा में, कला फिल्मों, सामानांतर फिल्मों और स्वतंत्र फिल्मों में भी, दलित-समस्याओं के चित्रण का अभाव है। यह बात अजीब लगती है क्योंकि आज़ाद निर्देशकों के लिए औरतों की स्वतन्त्रता, धर्मों के क्षेत्र में लड़ाई या घूसखोरी दिखाने में कोई समस्या नहीं है। जाति के निषेध को तोड़ने की हिम्मत उपर्युक्त सारे क्षेत्रों से ज्यादा चुनौती-पूर्ण है.

बहु-चर्चित निर्देशक श्याम बेनेगल ने, जिन्हें कई-एक राष्ट्रीय पुरस्कार भी मिल चुके हैं, अपनी पहली फ़िल्म 1974 में बनाई। इस फ़िल्म का नाम ‘अंकुर’ है और यह भी अछूत औरत और ब्राहमण आदमी के रिश्ते की कहानी है। फ़िल्म के नायक सुर्या की शादी बचपन में हो गई है और अब उसे अपनी पत्नी का इंतज़ार करना है। वह अपने पिता जी की जमींदारी के अंतर्गत आने वाले एक छोटे गाँव में जाता है और देखता है कि उसके घर के पास एक सुंदर औरत रहती है। औरत का नाम लक्ष्मी है और वह अछूत है। उसका जीवन बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है क्योंकि उसका पति शराबी है। लक्ष्मी बच्चा चाहती है लेकिन किसी कारण से यह उसके लिए असंभव है। सुर्या चाहता है कि लक्ष्मी उसके लिए काम करे और उसको अपने लिए खाना पकाने की अनुमति देता है जो न सिर्फ़ गाँव वालों के लिए बल्कि लक्ष्मी के लिए भी आश्चर्यजनक है। एक दिन लक्ष्मी का पति कहीं जाता है और लक्ष्मी और सुर्या एक दुसरे के करीब आते हैं। आशिक़ों का संतोष अचानक नष्ट हो जाता है जब सुर्या की पत्नी गाँव में आती है। इसी समय को लक्ष्मी को पता चलता है कि वह माँ बननेवाली है। सुर्या की पत्नी को अच्छी तरह मालूम है कि उसके पति और लक्ष्मी के बीच में क्या है और वह दुसरी औरत को निकलाने की कोशिश करती है। जब सुर्या को बच्चे के बारे में पता चलता है तो वह लक्ष्मी को घर से निकलाता है। इसी समय लक्ष्मी का पति शराब छोड़कर वापस आता है। लक्ष्मी को डर है कि पति बच्चे के बारे में क्या सोचेगा लेकिन बह खुश होकर सुर्या के घर जाता है, यह सोचकर कि शायद उसको काम मिलेगा। ब्राहमण सोचता है कि अछूत आदमी उसको मारने के लिए आ रहा है और मार-पीट शुरू कर देता है। गाँव के दुसरे लोग भी इस मार-पीट में सूर्या को मदद देते हैं। जब लक्ष्मी को पता चलता है तो वह आती है और अपने पति की रक्षा करती है।

यह एक सरल कहानी है जिसमें निरंतर नैतिक शिक्षा नहीं है परन्तु फिल्म-निर्माण के लिहाज से कहानी का बहुत अच्छा चित्रांकन है। फ़िल्म में हम यह देख सकते हैं जो अक्सर पश्चिमी लोगों के लिए समझने में सब से मुश्किल है – क्या भारतीय समाज में अछूतों के प्रति सचमुच इतनी घृणा है जहाँ सेक्स करने और मारने के समय यह अस्पृश्यता खत्म हो जाती है। इस कहानी में सुधार के उपदेश या प्रचार के लिए शायद स्थान नहीं है लेकिन भारतीय समाज के जातिवादी जकड़न और ढोंग पर एक करारे व्यंग्य के कारण, जो कि भारतीय सिनेमा में अक्सर नहीं होता है, इसको याद रखना चाहिए। यह फ़िल्म मामूली दर्शकों के लिए नहीं है लेकिन सिनेमा का एक बहुत ही महत्वपूर्ण हिस्सा तो ज़रूर है।

1981 में बनी सत्यजित रायकी ‘सद्गति’ ‘शतरंज के खिलाड़ी के बाद उनकी दुसरी हिंदी फ़िल्म है। दोनों फ़िल्में प्रेमचंद की कहानी पर आधारित हैं। प्रेमचंद की कहानी ‘सद्गति’ ‘चमार’ जाति से आने वाले दुखी नाम के एक व्यक्ति के बारे में है जो अपने बेटी की शादी करवाना चाहता है और इसके लिए ब्राहमण का आशीर्वाद चाहिए ताकि वह घर आकर शुभमुहूर्त निकाल सके। वह अछूत है इसलिए उसको ब्राहमण का बहुत लंबा इंतज़ार करना है। बेचारे आदमी के पास पैसा नहीं है इसलिए ब्राहमण उसको लकड़ी काटने का हुक्म देता है। आदमी भूख के कारण कमज़ोर है इसलिए अच्छी तरह काम नहीं कर सकता है। जब आखिर में ब्राहमण जाने के लिए तैयार है वह देखता है कि दुखी मर गया है। गाँव में रहने वाले अछूत मरे हुए आदमी को लेना नहीं चाहते हैं और ब्राहमण चुपचाप दुखी की लाश को दूर ले जाता है और वापस आने के बाद नहा लेता है और इसी समय जानवर खेत में लेटे हुए लाश को खाते हैं।

फ़िल्म प्रेमचंद की कहानी के बहुत नज़दीक है। अछूत आदमी को अलगअलग हुक्म दिये जाते हैं, इसके बावजूद की उसने भैंसों के लिए घास लाया है। वह सब कुछ करता है बार-बार गाँव के केंद्र में खड़ी हुई रावण की बड़ी मूर्ती के पास जाकर, लेकिन लकड़ी को काटना उसके मौत का कारण बना।

बेचारा दुखी मर जाता है। बाकी अछूतों को इस घटना के बारे में पता चलता है। इसलिए जब ब्राहमण उनके यहाँ आता है और उनको लाश ले जाने की हुक्म देता है तो वे लोग उसको ध्यान नहीं देते हैं। दुखी के समुदाय के लोगों ने लाश नहीं उठाने का फैसला कर एक तरह से ब्राह्मण द्वारा हुए अत्याचार का विरोध करते हैं। यहाँ एक ध्यान देने वाली बात यह है कि दुखी जिस लकड़ी को काट रहा था, वह ऐसी-वैसी लकड़ीनहीं थी। वह ब्राह्मणवाद और जातिवाद का कठोर गट्ठर था और कितने दुखी को उसके लिए मरना पड़ा है।

राय की फ़िल्म और प्रेमचंद की कहानी में असाधारण अनुकूलता है जो थोड़ी सी अश्चार्यजनक है क्योंकि यह लेखक भारत में बहुत लोकप्रिय है। प्रेमचंद की कहानियों के आधार पर फ़िल्म बनाना आसान बात नहीं है क्योंकि वह आमतौर पर समाजिक-दोषों के बारे में लिखता था, लेकिन समाधान नहीं बताता था और ऐसी कहानियां व्यापारिक फ़िल्मों के लिए ज़्यादा अच्छा विषय नहीं है क्योंकि उन फ़िल्मों को स्पष्ट समाधान चाहिए। नायक द्वारा खलनायक का वध जैसी कहानियां।

1991 में बनाई हुई ‘दीक्षा’ एक और बॉलीवुड के बाहर की हिंदी फ़िल्म है जहाँ दलितों का ज़िक्र है। फ़िल्म का आलेख कर्नाटक के लेखक यू. आर. अनंतमूर्ति की कहानी पर आधारित है। 1992 में इस फ़िल्म को हिंदी की सब से अच्छी फ़िल्म के लिए पुरस्कार भी मिला लेकिन फिल्म व्यावसायीक रूप से सफल नहीं हुई। फ़िल्म का नायक एक छोटा ब्राम्हण लड़का है जिसका नाम नानी है। वह गाँव में रहने वाले एक ब्राम्हण का एक बेटा है। नानी के पाँच भाई मर गए हैं इसलिए उसका पिता निश्चय करता है कि उसको पढ़ाई के लिए पण्डित उडूप के यहाँ भेज देगा ताकि भगवान उसको जीवित रखे। पण्डित के दो वरिष्ठ शिष्य हैं जो अक्सर नानी को बहुत कष्ट पहुंचाते हैं, पर पण्डित की एक जवान बेटी यमुना भी है जो विधवा बन गई और वह नानी को अपने बेटे के समान समझती है।

जब पण्डित गाँव से कुछ दिनों के लिए कहीं जाता है तो यमुना और गाँव के अध्यापक के बीच में प्रेम उत्पन्न होता है और विधवा गर्भवती हो जाती है। पण्डित के वरिष्ठ शिष्यों के कारण गाँव के सारे लोगों को पता चलता है कि यमुना माँ बननेवाली है। यमुना पाप से बचने के लिए गर्भपात करवा लेती है। इसके बाद उसका पाप और बड़ा हो जाता है। पण्डित अपने शिष्यों को घर भेज देता है और अपनी जीवित बेटी का अंतिम संस्कार करता है।

यह फ़िल्म विधवाओं की स्थिति के बारे में है लेकिन इसमें अछूतों की स्थिति को भी दर्शाया गया है। पण्डित का नौकर कोगा अछूत है। वह हमेशा ब्राहमण लड़कों की तरह पढ़ना चाहता था। गाँव में रहनेवाले दुसरे अछूत आदमियों के लिए कोगा का व्यवहार उनकी जाति का अपमान है। वे लोग सोचते हैं कि कोगा ब्राहमण बनना चाहता है और यह उनके लिए सब से बड़ा पाप है क्योंकि हर जाति को अपना कर्तव्य करना चाहिए। इसी तरह कोगा दोहरा परित्यक्त बन जाता है, न घर का न घाट का। एक बार अपनी जाति के कारण और दुसरी बार अपने व्यवहार-विचार के कारण जो उसकी जाति के लोगों के विचारों के अनुकूल नहीं है। जब कोगा की बुआ जो उसकी एक ही रिश्तेदार थी मर जाती है अछूत आदमी पण्डित से उसके लिए अंतिम संस्कार की भीख मांगते हैं। शुरू में पण्डित के लिए यह खयाल घृणित लगता है लेकिन बाद में जो कोगा चाहता है वह करता है।

अरुण कौल की इस फ़िल्म में, जैसे पहले बिमल राय की फ़िल्म में, एक बुढ़ी औरत है जो दुसरों को पापी मानती है जबकि अपने व्यवहार में सब से दुराचारी लगती है। जब वह पण्डित को अछूत औरत के लिए अंतिम संस्कार करते हुए देखती है तो इसके बारे में दुसरे ब्राहमणों को बताती है जिसके कारण गाँववाले पण्डित उडूप पैर ध्यान रखना शुरू कर देते हैं। अच्छी बात यह है कि गाँववाले छोटे नानी को नहीं देखते हैं क्योंकि यह लड़का एक मात्र ऐसा व्यक्ति है जिसके लिए कोगा वैसा ही मनुष्य है जैसे गाँव के सब बाकी लोग। नानी के कोगा के प्रति के व्यवहार का आधार बच्चे की ‘दुनियावी अज्ञानता’ है जो अच्छी तरह दिखाता है कि लोगों में अंतर स्वभाविक नहीं होते हैं, बस संस्कृति से संबंधित। नानी कोगा की बुआ के लिए प्रर्थना करता है और नहीं समझता है कि क्यों पण्डित का व्यवहार दुसरों को इतना बुरा लगा! इस छोटे लड़के की संवेदना का एक और बहुत अच्छा उदाहरण है इस दृश्ये में है जब नानी कोगा को लड्डू देता है। अपने काम के लिए कोगा को खाना मिलता है। यमुना उसको चावल देती है ताकि वह भूख से नहीं मरे और काम कर सके लेकिन नौकर को मिठाई देना कुछ और ही इंगित करता है और अच्छी तरह दिखाता है कि छोटा लड़का बड़ों से अच्छी तरह आत्मा की अवश्यकता समझता है। नानी का व्यावहार इसका भी सबूत है कि सब पूर्वाग्रह अंतर्जात नहीं होते हैं पर संस्कृतिक विकास से संबंधित हैं।

छोटे लड़के का खुद से गहरा आकर्षण कोगा के लिए थोड़ा दहशतपूर्ण है। वह वही व्यक्ति है जिसके लिए नियमों के अनुसार व्यवहार करना जरुरी है इसलिए छोटे बच्चों को अधिकारों तोड़ने की अनुमति नहीं देता है। एक दृश्ये में नानी कोगा को तंग करता है और सारा समय उसको छूने की कोशिश करता है। बेचारे कोगा को ऊँचे ताड़ का पेड़ पर चढ़ना चाहिए। कोगा और गाँव के दुसरे अछूतों का व्यवहार यह अच्छी तरह दिखाई देता है कि अछूत लोग खुद से सोचते हैं कि पारंपरिक सोच-विचार से लड़ाई करना उचित बात नहीं है। जिसका कोगा की बुआ की मौत के बाद के दृश्य में ज़िक्र किया गया है, इस में भी कोगा पण्डित से अंतिम संस्कार मांगता है सिर्फ़ इसलिए कि इससे बुआ की आत्मा को शांति मिलेगी। कोगा सोचता है कि उसको यह करना चाहिए क्योंकि वह उसे पुरे जीवन मायूसी देता रहा। इस मायूसी का आधार यह था कि वह अपनी जाति के कर्तव्य नहीं करता था और अलग चीज़ों में दिलचस्पी रखता था। इन सब के कारण वह शायद अच्छा और संवेदनशील आदमी बन गया, लेकिन गाँव में रहनेवाले लोगों के विचार में अच्छा अछूत तो नहीं ही था और इस कारण एक हास्यस्पद व्यक्ति बन गया था।

जैसे पहले ही ज़िक्र किया गया उपर्युक्त तीनों फिल्में पुरस्कारों के बावजूद लोकप्रिय नहीं हुई। लेकिन शायद इन फ़िल्मों के कारण मुख्यधारा विषयक के निर्देशक कुछ सालों के बाद यह सोचने लगे कि इस समस्या को अपने दर्शकों को धीरे-धीरे दिखाना चाहिए। बॉलीवुड फ़िल्मों में उपदेश और नए सवालों को पूछना दो चीजें हैं । कभी पुरी फ़िल्मी कहानी किसी समस्या के बारे में होती है और इस प्रश्न को हल करने के बाद यह दिखाई देती है कि असहिष्णुता से किसनी खत्रा आती है। इसी तरह की फ़िल्म का एक अच्छा उदाहरण अनील शर्मा की ग़दर: एक प्रेम कथा है। यह फ़िल्म भारत-विभाजन के समय एक सिख लड़के और मुसलमान लड़की के प्रेम के बारे में है। लड़की के पिता को इस रिश्ते से तब तक विरोध है जब तक उसकी बेटी की दुर्घटना नहीं होती है। इस के बाद वह सोचने लगता है कि उसके कारण प्यारी बेटी की मौत हो सकती थी और यह सोचने लगता है कि धर्म इतना महत्त्वपूर्ण नहीं है। हम देख सकते हैं कि मुख्य समस्या धर्मों के अंतर का है लेकिन फ़िल्म के अंत में दर्शकों को कहा जाता है कि ऐसे अंतर समाज के लिए ठीक नहीं है।

दूसरी तरह की फ़िल्मों में भी यही होता है जिस में तकरारी बातें बिल्कुल प्राकृतिक होती हैं। ऐसी फ़िल्म का अच्छा उदाहरण मनमोहन देसाई की ‘अमर, अकबर, एंथोनी’ है। इस फ़िल्म की कहानी बॉलीवुड में लोकप्रिय खोया-पाया के सूत्र पर आधारित है। यह बचपन में खोये हुए तीन भाइयों की कहानी है जिन से एक हिंदू परिवार में बड़ा होता है, दुसरा मुसलमान परिवार में और तीसरे को इसाई धर्माचार्य गोद में लेता है। इस फ़िल्म में धर्मों के अंतर के बारे में कोई कुछ नहीं कहता है और सच के प्रकाशन के बाद किसी को अजीब नहीं लगता है कि हर आदमी का अलग धर्म है और अलग धर्म की पत्नी।

कौन सी योजना सही है यह कहना आसान नहीं है इसलिए वे इन दोनों फ़िल्मों में नहीं आती है। लेकिन लगता है कि निषेध को स्वभाविक बनाना तब तक मुमकिन होता है जब तक दर्शक इसके लिए तैयार है इसलिए दलितों के बारे में ऐसी फ़िल्में नहीं होती हैं और उनकी फिल्में तब तक सामने नहीं आएँगी जब तक लोग विशवास नहीं कर लेते कि दलित सचमुच दुसरे लोगों से बराबर हैं।

आशुतोष गोवारिकर की ‘लगान’ की कहानी अवास्तविक दुनिया में चली जाती है लेकिन ऐसी दुनिया बनाकर भी अछूतों को दुसरी जातियों से बराबर होने की अनुमति नहीं दी गई। फ़िल्म एक छोटे गाँव के लोगों के बारे में है जो अंग्रेज़ों से लड़ाई करते हैं। फ़िल्म का नायक – भुवन लगान हटाने के लिए अंग्रेज़ों से क्रिकेट खेल में जीतने की तैयारी करता है। उसका समूह भारतीय समाज का दर्पण है। इसमें अधिकांश हिंदू है लेकिन इसमें भी मुसलमान और सिख हैं। यह और बात है कि इस छोटे गाँव में मुसलमान भी रहते हैं और एक सिख कहीं दूर से अचानक आता है और इसमें कोई आश्चर्य नहीं है क्योंकि फ़िल्म की दुनिया वास्तविक नहीं है। हमको इसके बारे में भी याद करना चाहिए कि सिख और मुसलमान दोनों बहुत अच्छे खिलाड़ी हैं जिनको निकालना बहुत मुश्किल है। उन के द्वारा किए गए दोष उनके कौशल की कमी से नहीं आते हैं बल्कि विरोधियों के छल खेल या अभागी परिस्थितों के परिणाम हैं।

खेल शुरू होने से पहले एक और खिलाड़ी की ज़रूरत है। आसपास के गाँवों में रहनेवाले तैयारी को देखने को लिए आते हैं और उनमें एक अछूत आदमी भी है जिसका नाम कचरा है। एक क्षण में गेंद उसकी तरफ आता है और भुवन कचरा को इसे फेंकने को कहता है। जब कचरा गेंद को फेंकता है तो सब लोग देख सकते हैं कि वह अच्छी तरह गेंद को घुमा सकता है। भुवन कचरा को तुरंत अपने समूह में लेना चाहता है लेकिन जब वह इसके बारे में बताता है तब समूह के बाकी लोग खेलने से इंकार करते हैं। पहले वे भुवन के सब अजीब उद्देश्यों को स्वीकार करते थे लेकिन अछूत के साथ खेलना उनके लिए बहुत बड़ी बात है। भुवन कचरा को छूता है और सब को बताता है कि भारत को इसीलिए इतनी आसानी से उपनिवेश बनाया गया है क्योंकि उनके लोग एक दुसरे को साथ दे नहीं सकते हैं। अंत में कचरा अंतिम खिलाड़ी बन जाता है और खेल में आखिरी दाँव उसे ही खेलना है। उसकी दुगनी ज़िम्मेदारी है – अगर हार जाएगा तो उसका नया स्तर चला जाएगा और वह दुसरों से पहले से ज़्यादा तिरस्कृत होगा। जो गाँववाले हर दुसरे व्यक्ति को माफ़ करते हैं लेकिन कचरा को उसकी जाति के कारण सज़ा मिल सकती है! शायद यह तनाव कचरा के लिए मुश्किल है इसलिए वह असफल हो जाता है। सैभाग्य से भारत को एक और मौका दिया जाता है और इस बार भुवन को आखिरी दाँव खेलना है। भुवन को सफल होने का नसीब मिलना बहुत ही महत्त्वपूर्ण है। फ़िल्म को बनाने वालों ने अपनी कहानी के बारे में बहुत सोचा और उन्होंने बहुत अच्छी तरह से अछूतों के प्रति आदर दिखाया। भुवन और कचरा दोनों भाग्यशाली थे और इसलिए भारत जीत गया। अगर नायक के कौशल कचरा से बड़े होते तो दर्शक यह सोच सकते थे कि अछूतों को सचमुच विशवास नहीं करना चाहिए क्योंकि मुख्य क्षण में वे निराशाजनक होते हैं!

अंग्रेज़ों से लड़ाई के बारे में बनी फिल्म ‘लगान’ का भुवन आमीर खान बाद में इसी विषय पर बनी एक दुसरी फ़िल्म में भी आ गया। केतन मेहता की ‘मंगल पाण्डे: द राइजिंग’ में अंग्रेज़ लोग सब से पहले जातिवादी हैं। जब एक अंग्रेज़ी दावत के समय भारतीय नौकर से एक गोरी औरत पर शराब छलक जाता है तो उसको बहुत बड़ी सज़ा मिलती है। नौकर को पीटता हुआ अंग्रेज चिल्लाता है कि उसकी गोरी औरत को छूना मना है और उसे कुत्ते कह कर संबोधित करता है। फ़िल्म का नायक मंगल पांडे मार खा रहे नौकर की रक्षा करता है लेकिन बाद की दृश्य में वह भी दुसरों के प्रति तिरस्कार दिखाता है। वह ब्राहमण है जिसको हर सुबह नदी में नहाना है। एक दिन वापस जाने के समय वह सड़क पर सफ़ाई करनेवाले अछूत से टकराता है। मंगल का व्यवहार वैसा ही है जैसा पहले नौकर के प्रति अंग्रेज़ का था और वह भी अछूत को कुत्ते की उपाधि देता है।

हम कह सकते हैं कि फ़िल्म में दिखाए गए अंग्रेज़ लोग गोरी चमड़ी के कारण अक्सर खुद को ज़्यादा अच्छा समझते हैं लेकिन फ़िर भी उनके लिए भारतीय लोगों से सम्पर्क उतना घृणित नहीं है। अंग्रेज़ों के बड़े घरों में सारे भारतीय नौकर काम करते हैं और उनसे खाने या पीने की वस्तु लेने में कभी कोई समस्या नहीं थी।

फ़िल्म सिपाही विद्रोह के बारे में है और इसका मुख्य विषय कारतूस की समस्या है। अंग्रेज़ लोग बड़ी आसानी से भूल जाते थे कि भारतीय सिपाहियों के लिए धर्म कितना महत्त्वपूर्ण है और उनके नियमों की इज्जत नहीं करते थे। 1806 में सिपाही नयी वर्दियों का विरोध करते थे जिनके कारण वे अपनी जाति से निकाल जा सकते थे, 1825 में समुद्र पार करना जो कि समाजिक नियमों के विरुद्ध था और अफगानिस्तान के युद्ध के समय बड़ी समस्या यह थी कि हिंदू सिपाहियों के लिए रोज़ का स्नान असंभव था और उनको मुसलमानों से खाना खरीदना था। कारतूस की समस्या सच में धर्म और संस्कृति के अपराध का सिर्फ़ एक और उदाहरण था।[9]

मंगल का अंग्रेज़ी दोस्त उसको भरोसा दिलाता है कि कारतूस के बारे में जो अफ़वाह होते हैं वे सच नहीं हैं लेकिन जब सब को पता चलता है कि मंगल का अपवित्रीकरण हुआ है तो वह तुरंत अपनी जाति से निकाल जाता है। लगता है कि अंग्रेज़ अच्छी तरह नहीं समझते हैं कि यह बात कितनी महत्त्वपूर्ण है और उनकी अज्ञानता के कारण मनुष्य को समाज के बाहर जीना पड़ता है जो मौत से भी बदतर है। मंगल यह सब कुछ न सिर्फ़ अपने अंग्रेज़ दोस्तों को स्पष्ट करता है बल्कि विदेशी दर्शकों को भी जो कभी इसके बारे में कुछ नहीं जानते हैं या विशवास नहीं करते हैं कि क्या यह सब कुछ सचमुच इतना महत्त्वपूर्ण है!

अपने ऊँचे स्तर को खोने के बाद मंगल हीरा से रिश्ता बनाता है। यह भी स्पष्ट है कि अगर वह शुद्ध ब्राहमण होता तो प्यार के बावजूद वेश्या से करीबी रिश्ता कभी नहीं बनाता। और, यहाँ भी भारत और अंग्रेज़ का अंतर है। विदेशी सिपाहियों के लिए हर वेश्या लालच थामने के लिए होती है, भारतीय या कोई दुसरी वेश्याओं में उनके लिए कोई अंतर नहीं है। केतन मेहता की फ़िल्म अछूतों के प्रति के बुरे व्यवहार का विरोध नहीं करता है और सिर्फ़ यह दिखाता है कि जातियों से अंतर कितने महत्त्वपूर्ण हैं।

इसी साल में बनी हुई आशुतोष गोवारिकर की ‘स्वदेश’ में भी हम पश्चिमी दृष्टि से भारत देख सकते हैं लेकिन यह दृष्टि ‘मंगल पाण्डे: द राइजिंग’ से कुछ अलग है। फ़िल्म के नायक का नाम मोहन है और वह भारत को छोड़कर यू एस ए में रहता है जहाँ नासा में काम करता है। एक दिन वह अपने देश में वापस जाने का निश्चय करता है अपनी आया को ढूढ़ने के लिए। आया एक छोटे गाँव में रहती है जहाँ इंटरनेट नहीं है, बिजली अक्सर चली जाती है और सब लोग वैसे ही जीते हैं जैसे पुराने ज़माने में। गाँव आने के बाद मोहन का व्यवहार पश्चिमी पर्यटक जैसा है – वह काफिले में सोता है, सिर्फ़ बोतल का पानी पीता है और यह नहीं समझ सकता है कि सब लोग इस तरह गाँव में कैसे जी सकते हैं।

गाँववालों में से एक अछूत आदमी – मेला राम रोज़-रोज़ मोहन के लिए खाना लाता है क्योंकि उसको आशा है कि विदेशी मेहमान उसको अपने साथ अमरीका ले जाएगा। मोहन का व्यवहार फ़िर से विदेशी पर्यटक के जैसा है और वह बिना किसी नियंत्रण के गाँव वालों का खाना खाता है। हम यह सोच सकते हैं कि शायद उसको पता नहीं है कि मेला राम कौन-सी जाति से है लेकिन बाद में जब गाँव में रहने वाले बुढ़े लोग मोहन की आलोचना करते हैं फिर भी वह मेला राम से दोस्ती नहीं छोड़ता है। फ़िल्म में अक्सर दिखनेवाले दृश्यों में मोहन, मेला राम और डाकखाने में काम करनेवाला निवारण तीनों एक स्कूटर पर बैठकर कहीं जाते हैं। सच में मोहन बीच में बैठता है जिसके मदद से मेला राम और निवारण का स्पर्श हो नहीं सकता है लेकिन यह फ़िल्म इस उपाय का पहला उदाहरण हो सकता है जिस में कोई समस्या नहीं होता है और फ़िल्म की दुनिया का अनुक्रम प्राकृतिक, स्वाभाविक है। फ़िल्म के गाँव में अछूत दुसरे लोगों से कुछ अलग होते हैं लेकिन इतनी नहीं और अगर कोई उनसे दोस्ती करना चाहता है तो कोई उसका विरोध नहीं करेगा। यह छोटा कदम है लेकिन अच्छी तरह दिखाई देता है कि फ़िल्म वाले धीरे धीरे इस समस्या को दिखाने में साहसी हो रहे हैं।

फ़िल्म में एक और दृश्य है जिस पर हमें ध्यान देना चाहिए। गाँव में सिनेमा आता है और सब अछूत पर्दे की दुसरी ओर में बैठकर दर्पण में प्रतिवर्तन जैसा कुछ देख सकते हैं। यह बड़ी असुविधा नहीं है जब तक कि फ़िल्म को देखने के लिए उपशीर्षकों (Subtitles) की ज़रूरत नहीं है लेकिन ऊँचे और नीचों का ऐसा स्पष्ट विभाजन अपमानजनक है। फिल्म के समय बिजली फिर से चली जाती है और पर्दे के सामने बैठे हुए बच्चे रो पड़ते हैं। मोहन सब को तारे दिखाता है और इस समय गाना गाता है। गाने की पराकाष्ठा में पर्दा हटाया जाता है। मोहन अपना टेलीस्कोप लाता है और सब को तारे और चन्द्र को देखने की अनुमति देता है। सब से महत्त्वपूर्ण बात यह है कि मोहन को जातियों को बराबरी के बारे में कोई भाषण देने की ज़रूरत नहीं है जैसे पहले भुवन को था और सब लोग साथ साथ टेलीस्कोप से देखते हैं बिना किसी शिकायत के। ‘स्वदेश’ अछूतों के बारे में नहीं है लेकिन वो यहाँ भी आ गया है और इस तरह दिखाया गया है कि यह फ़िल्म अब तक की सब से बहादुर फ़िल्म है। यह भी महत्त्वपूर्ण है कि किसी ने इसके लिए फ़िल्म की आलोचना नहीं की और इसका मतलब यह है कि फ़िल्म को बनानेवाले ने कहानी में अच्छी तरह अपने विचार डाल दिए हैं जो मुख्यधारा विषयक फिल्मों के लिए बहुत ही आवश्यक हैं।

चर्चित समाजिक आलोचक, प्रकाश झा ने 1985 में ‘दामूल’ बनाई जिसमें अमीर लोगों द्वारा गरीबों का शोषण दिखाया गया है। फ़िल्म ने उसको मशहूर बनाया और फिल्म को पुरस्कार भी मिले। 2011 में उसने दलितों के बारे में ‘आरक्षण’ बनाई। यह फ़िल्म निचली जातियों की प्रतिरक्षा के बड़े दावों के बावजुद उन्हीं जातियों के बीच में विवादास्पद हो गई।

यह एक युवा– दीपक की कहानी है। बह दलित है इसलिए शिक्षित होते हुए भी उसको काम नहीं मिलता है। प्रतिष्ठित कॉलेज का मुख्य अध्यापक – प्रभाकर अनंद उसको अपने स्कूल में काम देता है क्योंकि वह आदमी सालों से सभी जातियों के गरीब तबके के युवाओं को शिक्षित करने के लिए संघर्षरत है। आरक्षण-निति की मदद से निचली जातियों को स्कूलों और विश्वविद्यालयों में स्थान मिलता है वह प्रभाकर के विचार में बहुत अच्छा समाधान है। फ़िल्म का खलनायक मिथिलेश सिंह है जिसके लिए सिर्फ़ पैसा सबसे महत्वपूर्ण है और जो प्रभाकर को नष्ट करना चाहता है। शुरू में फ़िल्म में आरक्षण की निति के बारे में एक वाद-विवाद है और आरक्षण के फ़ायदे और नुकसान बताये जाते हैं। अफ़सोस की बात यह है कि फिल्म अपने विषय से जल्दी भटक जाती है और हम दुराचार और पैसों से सच्चाई की जीत का अरुचिकर और थकाऊ धर्माचार देखते हैं जिस में ‘दामूल’ की सरलता तो बिलकुल ही नहीं है।

मिथिलेश अपना स्कूल स्थापित करता है और पैसेवाले लोगों को बताता है कि उनके बच्चों को सिर्फ़ उसके स्कूल में ऐसी शिक्षा मिलेगा जिसकी ज़िंदगी में ज़रूरत होगी। धीरे धीरे वह प्रभाकर के स्कूल के अध्यापकों को प्रलोभन देता है। प्रभाकर और दीपक गरीब-बच्चों को गोशाले में पढ़ाते हैं और अंत में जीत जाते हैं क्योंकि परीक्षा में उनके विद्यार्थियों को सब से ऊँचे अंक मिलते हैं। लगता है कि अमिताभ बच्चन ने निश्चय किया है कि अब वह भारीय समाज का अनुभवी परामर्शदाता बन जाए। माननीय अभिनेता का व्यवहार आजकल अक्सर शिष्यों को शिक्षा देनेवाले गुरु जी जैसा है और यह ख़तरनाक बात है क्योंकि इस प्रवृति के कारण उसकी फ़िल्में पहले जैसी अच्छी नहीं हैं। यह बड़ी अफ़सोस की बात है क्योंकि अमिताभ बहुत अच्छा अभिनेता है। ‘आरक्षण’ की चर्चा इसलिए करनी चाहिए क्योंकि फ़िल्म विवादग्रस्त बन गई। अगर लोगों को इस फिल्म में कहानी दिखाने-कहने का तरीका पसंद नहीं आया तो यह आश्चर्य-जनक बात नहीं होती क्योंकि इस क्षेत्र में फ़िल्म बहुत ही खराब है लेकिन दर्शकों की समस्या कुछ और ही थी। दिलचस्प बात यह है कि जिन दर्शकों को इस विषय से सम्बंधित ज़्यादा बहादुर फ़िल्में पहले ही मिल चूकी हैं उन्होंने इस फ़िल्म को देखने के बाद खुद को अपमानित महसूस किया।

निचली जातियों के दर्शकों को सब से खराब यह लगा कि फ़िल्म का नायक सैफ़ अली खान हो गया[10]। ऐसी स्थितियाँ पहले होती थीं और मैंने ‘मदर इंडिया’ का ज़िक्र किया लेकिन इस बार यह कहना मुश्किल है कि दर्शकों को अपमानित क्या लगा? क्या उनको अच्छा लहीं लगा कि अभिनेता मुसलमान है या उसका कुलीन वंश का होना जो कि फ़िल्म के उसके कार्य-भाग से संबंधित नहीं था[11]। सब से दिलचस्प बात यह है कि जिन लोगों को फ़िल्म पसंद नहीं थी वे ऐसे लोग थे जिनकी पक्षधरता का दावा फ़िल्म करती थी। दलितों के विरोध का मतलब यह हो सकता है कि आखिर में उन लोगों को अपनी नीतियों के बारे में पता है और अपनी सुविधा के लिए वे लड़ सकते हैं जो कि अच्छी बात है। फ़िर भी निराशा का कारण थोड़ा सा तकलीफ़देह लगता है अगर हम इस नायक को ध्यान से देखेंगे। दीपक बहुत अच्छा आदमी है लेकिन उसकी एक कमी है और यह ऐसी बात है कि वह बड़ी आसानी से अपना आपा खो सकता है और अकसर निराश होकर अपनी उग्रता का इस्तेमाल करता है। मिथिलेश से टकराना सब के बस की बात नहीं है, दीपक आता है और स्कूल को नष्ट करता है। पहले भी वह अक्सर दुसरों को मार देता है और उसे बोलने का सलीका नहीं है, यह सब नायक का बहुत बड़ा दोष है। दीपक की आक्रामकता का स्पष्टीकरण यह हो सकता है कि पढ़ाई के बावजुद निचली जातियों के लोग हमेशा अपरिष्कृत होंगे और शायद यह अच्छी बात है कि उन लोगों को ऊँचे स्तर का काम नहीं मिलता है क्योंकि वे खतरनाक हैं। दलितों की रक्षा करने के लिए फ़िल्म का ऐसा नायक अजीब लगता है, लेकिन समस्या है कि फ़िल्म के दर्शकों को नायक नहीं, अभिनेता पसंद नहीं था। अगर लोगों को नायक अच्छा नहीं लगता तो उनका क्रोध समझ में आने योग्य होता लेकिन अभिनेता का विरोध करना एक तरह से वही व्यवहार है जैसा दलितों के प्रति वर्षों से हो रहा है।

सब से निराशाजनक यह बात है कि कुछ भारतीय प्रदेशों में फ़िल्म को प्रतिबंधित किया गया और निर्देशक से फ़िल्म के कुछ दृश्यों को काट देने की मांग की गयी जिसका मतलब यह है कि अस्पृश्यता आजकल भी भारत में एक संवेदनशील विषय है। लेकिन अगर अछूतों की रक्षा करने के लिए बनाई हुई फ़िल्म के दृश्ये भी दलितों को अपमानित करते हैं तो दर्शकों का बिगड़ना आश्चर्यजनक बात नहीं है। इस फ़िल्म में प्यार को दिखाने की तरीका भी दिलचस्प है। प्रभाकर की बेटी और दीपक एक दुसरे से कुछ न कुछ प्यार करते हैं लेकिन उनका प्रेम फ़िल्म का मुख्य विषय नहीं है। हम यह बता सकते हैं कि नायक और नायिका की रिश्ता ऐसे उपाय का उदाहरण है जिसके अनुसार फ़िल्म कोई बात इस तरह दिखाता है मानो वे दुनिया के स्वभाविक नियम थे, लेकिन इसमें कुछ ऐसे अंश हैं जो हमको इस तरह से सोचने की इज़ाजत नहीं देती है। सब से पहले दर्शकों को पता नहीं है कि नायक और नायिका के बीच सचमुच प्यार है या सिर्फ़ गहरी दोस्ती, लगता है कि फ़िल्म बनाने वालों को ज़्यादा दिखाने से थोड़ा सा डर था और अगर ऐसा डर इस प्रकार की फ़िल्म में दिखाई देता है तो यह विषय दिखाने से कोई फ़ायदा नहीं है। दीपक और प्रभाकर की बेटी के बीच में अगर प्यार है तो इसे दर्शकों के मन में उतरना चाहिए है नहीं तो इसके होने या न होने से कोई फ़र्क नहीं पड़ता है। व्यभिचार को फ़िल्म में इतना स्थान देना और आरक्षण के बारे में स्पष्ट विचार नहीं दिखाना भी अच्छे सिद्धांत नहीं थे। फ़िल्म का रवैया इतना रक्षात्मक है कि इसे समाजिक समस्याओं में सम्बंधित बताना असंभव है, आप सभी को खुश कर के समस्याओं को संबोधित नहीं कर सकते हैं। निर्देशक को न सिर्फ़ सुधारों के बारे में बताना पर अपनी विचारों को भी दिखाने से डर है। ऐसे ही जगह में वे बहुत गंभीर और आडंबरपूर्ण भाषण डालते हैं जो शुरू में थकाऊ और बाद में हास्यास्पद होते हैं। यह फ़िल्म शायद बॉलीवुड की सबसे बेकार फ़िल्म है और इस कारण सचमुच उसको दिखाने से मना करना चाहिए था।

अंत में एक और विवादास्पद फ़िल्म की ज़िक्र करना उचित लगता है। शेखर कपूर की ‘बैन्डिट क्वीन’ 1994 में बनी हुई है और अछूतों के बारे में नहीं है लेकिन एक और समस्या का अच्छा उदाहरण है। यह फ़िल्म फूलन देवी के जीवन के बारे में माला सेन की किताब पर आधारित है। यह कहानी अच्छी तरह न सिर्फ़ यह दिखाती है कि हर व्यक्ति की ज़िंदगी में समाज की कितनी बड़ी भूमिका होती है लेकिन यह भी कि भारत जैसे देश में जहाँ समाजिक बुनावट इतना उलझा हुआ है कि अपने जीवन को तय करना बहुत मुश्किल है। फ़िल्म की फूलन देवी निचली जाति से है और गरीबी के कारण बचपन में उसकी शादी एक बुढ़े आदमी से हुयी है क्योंकि उसको लड़की के परिवार से बड़े दहेज की ज़रूरत नहीं थी। पति से लुटी हुई लड़की अपने गाँव वापस आती है लेकिन उसकी जीवन पहली जैसी हो नहीं सकती है क्योंकि पति को छोड़ने के बाद बदतहज़ीब हो गई है।

अरुंधती राय[12] एक मजेदार बात कहती है कि शेखर कपूर ने कहा था कि उसने अपने फ़िल्म में सत्य दिखाया फिर भी वह कभी फूलन देवी से मिलने नहीं गया और उस समय फूलन जीवित थी और जब वह अपनी फ़िल्म बनाता था तो उसी समय जेल से आज़ाद भी हुयी थी। निर्देशक अपनी नायिका को नहीं जानता था और उसने फूलन की जीवन की कहानी उससे कभी नहीं सुनी। फूलन की आत्मकथा माला सेन की किताब से कुछ कुछ अलग है और दोनों कपूर की फ़िल्म से बहुत अलग हैं। निर्देशक के लिए बलात्कार, बहुत सारी लूटपाट, गोलियों की आवाज़ सब से महत्त्वपूर्ण लगती हैं। यह सच ज़रूर है कि इन घटनाओं के कारण फूलन के जीवन में बहुत बदलाव आया लेकिन उसके जीवन में आये इन सारे बदलाव के मूल स्रोत इन घटनाओं में नहीं थे। फ़िल्म फूलन के परिवार की समस्याओं के बारे में कुछ नहीं कहता है। उसके जीवन की सारी दुर्भाग्यपूर्ण घटनाओं का कारण उसके चाचा का प्रतिशोध था। फ़िल्म देखते हुए कि पश्चिमी दर्शकों के लिए यह समझना मुश्किल है कि फूलन की इन सारी स्थितिओं का मूल उसकी जाति है। जिस गिरोह का नेता निचली जाति में पैदा हुआ विक्रम है और एक तरह से गिरोह की लड़ाइयों का आधार भी है लेकिन लोग सिर्फ़ अलग अलग जातियों के नाम बोलते हैं और इन सब का अर्थ पश्चिमी दर्शकों के लिए स्पष्ट नहीं है। इसी समय दिखाया जाने वाला यौन-शोषण दर्शक का ध्यान मुख्य विषय के विपरीत कर देता है। भारतीय दर्शक के लिए जातियों से संबंधित दुर्व्यवहार को समझना ज़्यादा आसान है लेकिन सिनेमा के इतिहास में पहली बार औरत के प्रति होने वाला क्रूरतम यौन-अपराध दिखाया गया। यह बात गहरी समस्याओं से आगे निकल जाती है और सब से महत्त्वपूर्ण खबर छिप जाती है। भारत में कपूर की फ़िल्म के बारे में लिखने वाले लोग अक्सर इस पर एकाग्र होते हैं कि इस फ़िल्म में पहली बार नंगी औरत दिखाई जाती है। यह सच नहीं है क्योंकि नंगी औरत को हम अंग्रेज़ी वाली गिरीश कर्नाड की ‘उत्सव’ में देख सकते हैं लेकिन निराशाजनक बात यह ज़रूर है कि कपूर की फ़िल्म की लोकप्रियता इसी के कारण हुई है। शायद यह सच है कि ऐसे विवादात्मक दृश्यों को देखने के लिए ही लोग सिनेमा जाते हैं लेकिन कभी कभी याद रखना चाहिए कि अगर ऐसी चीज़ें ज़्यादा होंगी तो दर्शक दुसरे महत्त्वपूर्ण विषय नहीं देख पाएगा और वे विषय नंगे शरीर से शायद ज़्यादा आवश्यक हैं। हिंदी सिनेमा का उदाहरण देकर हमने देखा कि सिनेमा के सौ साल के इतिहास में अछूतों के बारे में ज़्यादा फ़िल्में नहीं हैं। शुरू में ऐसा लगा कि गाँधी जी और उनके तरह के दुसरे सुधारकों की मदद से यह विषय लोकप्रिय होगा लेकिन जल्दी ही ऐसी फ़िल्में मुख्यधारा के विषय से बाहर चली गयीं। क्या भारतीय दर्शक ऐसी फ़िल्मों के लिए तैयार नहीं हैं? मुझे लगता है कि आधुनिक सिनेमा में सब कुछ दिखाया जाता है इसलिए इस विषय से इतना डर ज़्यादा अजीब लगता है। जब हम बॉलीवुड फ़िल्मों की संख्या के बारे में सोचेंगे तो यह देखेंगे कि दलित न सिर्फ़ जाति के वरीयता-क्रम से बाहर हैं बल्कि सिनेमा से भी बाहर हैं। 100 करोड़ से उपर की जनसंख्या वाले देश के सिनेमा में बहुजन-जीवन के स्वाभाविक-चित्रण का अभाव चिंताजनक है और इसका एक बड़ा कारण संभवतः यह है कि बहुजनों का बड़ा हिस्सा अभी भी सिनेमा का उपभोक्ता समुदाय में तब्दील नहीं हुआ है। यह तब तक नहीं बदलेगा जब तक उनकी परिस्थितियों को स्वभाविक तरीके से नहीं दिखाया जाएगा। अगर हम दलित-समस्या पर ही केन्द्रित रहेंगे और सिर्फ़ सुधार के आग्रही के बतौर ही दलितों का चित्रण करेंगे तो वे कभी समाज के स्वाभाविक हिस्से की तरह कभी नहीं दिखेंगे। उपर्युक्त वर्णित सारी फ़िल्मों में से ‘स्वदेश’ और ‘अंकुर’ ने सब से अच्छा काम किया है क्योंकि इन फ़िल्मों में दलितों के प्रति कोई बड़ा पूर्वाग्रह नहीं दिखाया गया है।’अछूत कन्या’ और ‘सुजाता’ में भी दलितों का जैसा चित्रण किया गया है वैसा आज दिखाना असंभव लगता है, इसलिए हमको शायद पुराने जानकारों से फ़िर से ज्ञान लेना पड़ेगा क्योंकि वे अधुनिक निर्देशकों से ज़्यादा बहादुर थे।

[1] http://whatismatt.com/thailand-urban-legends/ (13.01.2012).

[2] U. Woźniakowska, Bollywood, Pragnienie prawdy i tęsknota za    mitem, Kraków 2010, p. 48.

[3] A. Chopra, King of Bollywood, Shah Rukh Khan and the Seductive World of Indian Cinema, New York, Boston 2007, p.     187.

[4] S. Mehta, Pociąg do Bollywood, „National Geographic”, 2, 2005, p. 79.

[5] N. Ghosh, Ashok Kumar. His Life and Times, New Delhi 1995,     p. 67-68.

[6] A. Chowdhury, Dev Anand. Dashing Debonair, New Delhi, 2004,    p. 17-18.

[7] M. Bose, Bollywood. A History, Glouceshire, 2006, p. 205.

[8] R. Dwyer, 100 Bollywood Films, London 2005, p. 12-13.

[9] J. Kieniewicz, Historia Indii, Wrocław 1980, p. 608-610.

[10] http://timesofindia.indiatimes.com

[11] http://www.hindustantimes.com

[12] http://www.sawnet.org/books/writing/roy_bq1.html

Tatiana Szurlej

Tatiana Szurlej

तत्याना षुर्लेई एक Indologist और फिल्म-आलोचक हैं। फिलहाल पोलैंड के शहर क्राकोव सिथत Jagiellonian University में The Courtesan Figure in the Iconography on Indian Popular Cinema:Tradition, Stereotype, Manipulation.   नामक विषय पर पीएचडी के लिए शोधरत हैं।

साभार- हंस फरवरी 2013, सिनेमा के सौ साल 

चलती हुई तस्वीरें या सपनों का कारखाना : सिनेमा क्या है? : तत्याना षुर्लेई

(भारतीय सिनेमा के सौ साल की अभी खूब चर्चाएँ हैं. लेकिन यह सौ साल इसी साल क्यूँ? जबकि यूरोप में तो यह १९९५ में मनाया जा चुका है. इसके सैद्धांतिक आधार क्या रहे हैं/ क्या हैं? हिंदी में इसकी चर्चा नहीं के बराबर है. सिनेमा यथार्थ है या कल्पना? दस्तावेज है या रूपक? इन्हीं सवालों  को तत्याना बहुत ही बारीकी से इस संक्षिप्त से नोट में हमें बताने की कोशिश करती हैं. तिरछी स्पेल्लिंग इस अंतर-दृष्टि-परक लेख  के लिए उनका आभारी है. साथ ही साथ यह उम्मीद भी कि तत्याना के द्वारा उठाये गए प्रश्नों के आलोक में यह बहस आगे भी चले!)
By तत्याना षुर्लेई
सिनेमा बहुत पुराना आविष्कार नहीं है, उसका जन्म 28 दिसम्बर 1895 को हुआ, जब लिमिएर (Lumière) -बंधु ने पेरिस में अपना नया मशीन दिखाया। एक दिलचस्प बात यह है कि पहला शो ग्रैंड होटल के ‘इंडियन रूम’ मे किया गया। शायद यह जगह एक संकेत था कि आगे चलकर भारत फिल्मों का सब से बड़ा व्यावसायिक केंद्र बन गया। पहले शो के बाद लोगों को पता चला कि यह आविष्कार कितना अच्छा है और सारी दुनिया बंधुओं की चलती हुर्इ तस्वीरें देखना चाहती थी। आस्ट्रेलिया (Australia) जाते हुए लिमिएर-बंधुओं के सहयोगियों ने मुंबई में रुककर, 7 जून 1896 को पहली बार भारत में फिल्मों का शो किया।

 इस शो के बाद पशिचम देशों की ही तरह भारत में भी यह नया आविष्कार लोगों को बहुत अच्छा लगा। कुछ सालों बाद पहली भारतीय फिल्म 19वीं शताब्दी के अंत से पहले बनायी गयी (अलग-अलग स्त्रोतों में पहली भारतीय फिल्म बनने का काल अलग-अलग लिखा जाता है। (1897 साल से 1900 तक)। भारतीय सिनेमा के जनक सखाराम भाटवाडेकर उर्फ सवे दादा  हैं जो महाराष्ट्रा में रहने वाले एक फोटोग्राफर थे. लिमिएर-बंधुओं के मशीन से मोहित होकर उन्होनें एक कैमरा खरीदा और आस-पास में जो भी दिलचस्प लगा उसे अपने कैमरे में कैद करने लगे । इस समय की भारतीय फिल्में पश्चिम से मिलती-जुलती थीं जो कि सिर्फ वास्तविकता दिखा रही थीं।

तथापि भारत और पशिचम के देशों में एक बड़ा अंतर है। यूरोप और इंग्लैंड में सिनेमा का सौ साल  1995 को मनाया जा रहा था। जिसका मतलब यह है कि पशिचम के विचार से पहली फिल्म  लिमिएर-बंधुओं की चलती हुई तस्वीर थी। भारत की सिथति बिल्कुल अलग है। राजा हरिश्चंद्र  के पहले की किसी भी फिल्म को, जिसे सखाराम भाटवाडेकर उर्फ सवे दादा ने या दादा  साहेब  फाल्के ने बनाया था, फिल्म नहीं मानी जाती है. सिनेमा का सौ साल राजा हरिश्चंद्र का सौ साल है  जिसमें पहली बार एक कहानी दिखाया गया. ऐसा अंतर क्यों?  इस सवाल का जवाब ढूँढ़ने के लिए  हमें सब से पहले फिल्म के तत्त्वों के बारे में सोचना चाहिए। अपने इतिहास के आरंभ में फिल्म, सभी  लोगों के लिए , तस्वीर उतारने का नया तरीका माना जाता था। चलती हुई तस्वीरें इसलिए  महत्त्वपूर्ण  मानी गयीं क्योंकि वह दर्शकों को फोटो से ज्यादा वास्तविक लगती थीं। ऐसी तस्वीरें जीवन के प्रलेख मानी जाती थीं, जो सालों बाद पुराने जमाने के बारे में अगली पीढियों को सब कुछ बोलेंगी। इसीलिए, लोग मानते थे कि फिल्मों का भविष्य सिर्फ दस्तावेजीकरण से संबंधित है। आज भी कभी न कभी कहा जाता है कि फिल्मों में दस्तावेजीकरण बहुत आवश्यक है और कुछ लोगों के लिए यह सिनेमा का आधार भी है। फिर भी यहाँ एक समस्या पैदा हो जाती  है, और हम यह सवाल पूछ सकते हैं कि फिल्मों में यथार्थ है क्या? और, ऐसी चीज संभव है? हर फिल्म अपने रचयिता की दृष्टि के आधार पर बनती है और निर्देशक के भावना को दिखाती है। सवे दादा को अपनी पहली फिल्म बनाने से पहले शायद ही किसी कहानी के बारे में सोचना था, या फिर जो कुश्ती दंगल उन्होंने दिखाया, वे दोनों वास्तविक और उनकी –दृष्टि की थीं, कोई यथार्थवाद नहीं। और, इसी तरह  सारी फिल्में  बनाई जाती हैं। वे दर्शकों को सिर्फ वह देखने की अनुमति देती हैं जो उनको दिखाई जाती हैं। लोगों की आँखें वास्तव में फिल्म की आँखें हैं, निर्देशक की आँखें हैं.

सिनेमा के इसी शुरूआती दौर में, एक दूसरा विचार पैदा हुआ, भारत और पशिचम दोनों जगहों पर, जो लिमिएर-बंधु द्वारा बनी फिल्मों से बिल्कुल अलग था। यूरोप के फ्रांस में रहते हुए जॉर्ज मेलियेस(Gorges Méliès s) सिनेमा का एक जादूगर बन गया और भारत में दादा साहब फाल्के ने वही काम किया जो मेलियेस ने फ्रांस में किया। दोनों के लिए फिल्म इसलिए महत्त्वपूर्ण थी कि इसकी मदद से वे अपने दर्शकों को सपने दिखा सकते थे। इसी विचार से यूरोप में भी कुछ लोगों के लिए लिमिएर-बंधू सिर्फ कैमरे का आविष्कारक था,  जबकि असल फिल्में मेलियेस के काम से संबंधित थीं। फिल्म की शुरूआत तब हुई जब इसमें कहानी आ गयी और इस तरह फिल्म का विकास बिलकुल नए रास्ते से होने लगा। सिनेमा के इन शुरूआती महारथिओं ने कभी नहीं सोचा था कि फिल्मों की यह योग्यता सब से महत्त्वपूर्ण हो जायेगी। फिल्में लोगों के लिए सबक भी है तो यथार्थ भी, लेकिन सब से पहले दर्शकों को सपनों की एक दुनिया में ले जाने वाली वह नानी है, जिसकी उम्र सौ साल या उससे ज्यादा हो गयी है, साथ ही साथ सपनों की दुनिया में ले जाने के उसके कौशल में भी इजाफा हुआ है। फिल्मों में कुछ चीजें ऐसी हो सकती हैं जो आसपास वास्तव में नहीं होती हैं और यह सब करतब दर्शकों के लिए कभी-कभी यर्थाथ से ज्यादा आकर्षक होता है। हमने देखा कि चलती हुर्इ तस्वीरें हमेशा कोई न कोई कहानी दिखाती हैं, तो शायद भारत में फिल्मों का इतिहास इसलिए राजा हरिश्चंद्र  के समय से शुरू होता है क्योंकि पहली बार, इसमें दिखाई गयी कहानी लोगों को अदभुत लगी। क्या यही कहानीपन महत्त्वपूर्ण फिल्मों की प्रवीणता है? क्या हमारे प्रश्न का उत्तर यहाँ है?

नहीं। दादा साहब फल्के ने राजा हरिश्चंद्र से पहले भी कुछ ऐसी फिल्में बनायीं थीं, जहाँ जादूगरी से भरी कतरबें थीं जिन्हें लोग वास्तविक दुनिया में नहीं देख पाते। उन सब में शायद कोई कहानी नहीं थी लेकिन अदभुत चीजें थीं इसलिए हम पूछ सकते हैं कि उनकी कोई और फिल्म पहली भारतीय फिल्म क्यों नहीं कही जाती? मुझे लगता है कि ऐसा इसलिए हुआ कि दर्शकों के लिए आज भी इन दो चीजों की अवश्यकता है, पहला कोई अदभुत कहानी, और इसके अतिरिक्त ऐसी दुनिया जो हमारे आसपास नहीं है। अगर भारत में फिल्मों का सौ साल, पहली फीचर फिल्म का सौ साल माना जा रहा है तो इसका मतलब यह भी हो सकता है कि भारतीयों के लिए फिल्म में जो बात सब से महत्त्वपूर्ण है वह यह कि इसमें सपना बुनने की शक्ति है.

यूरोप में कुछ लोगों के लिए सिनेमा का आधार पुराने जमाने के दर्शन से संबंधित है जो प्लेटो की गुफा की तरह है। प्लटो ने जीवन और दुनिया की वास्तविकता के बारे में लिखकर एक ऐसी सिथति का वर्णन किया जहाँ कुछ लोग गुफे में बैठे हैं। वे प्रवेश-द्वार से विमुख होकर बाहर नहीं दीवार को देखते हैं। उन लोगों के पीछे कुछ हो रहा है, वास्तविक दुनिया है, वास्तविक चीजें और वास्तविक जीवन भी। लेकिन लोग जो देख पाते हैं वह केवल इस यर्थाथ की छाया है जो दीवार पर दिखायी जाती है।  यर्थाथ लोगों के पीछे है। और, जिसे वे देख सकते हैं वह यर्थाथ से मिलता-जुलता होकर भी उससे अलग ही है। सिनेमा घर कुछ लोगों के लिए ऐसी ही गुफा है। चित्रपट पर कुछ न कुछ तो दिख जाता है जो सच्चाई जैसा है। लेकिन वास्तव में, दर्शक सिनेमा के परदे पर वैसे ही देख सकते हैं जैसे गुफा में लोग दीवार पर देख सकते हैं, जो कि सच्चाई से बहुत दुर है। फिर भी यूरोप में फिल्म के दर्शकों के लिए यह सब से महत्त्वपूर्ण है कि फिल्म जिंदगी से मिलती-जुलती चीज है। जो फिल्म सपनों की तरह कहानी दिखाती है बहुत लोगों के विचार में वह कोई कला नहीं है। फिल्मों के इतिहास की शुरूआत से ही यह सब से बड़ी समस्या थी। दो तरह के विचारों के बीच टकराहट थी। आज भी उन दोनों विचारों में से एक ऐसा है जो यह मानता है कि फिल्मों को सिर्फ यर्थाथ दिखाना चाहिए और दुसरा यह कि फिल्मों में सब से अच्छी वह दूसरी दुनिया है जो वास्तविक दुनिया से बहुत अलग है।
प्लटो का विचार लेकर हम फिल्मों के बारे में यह कह सकते हैं कि वह दुनिया जो चित्रपट दिखाई जाती है सही नहीं है और वास्तव से कुछ बेकार भी है क्योंकि वास्तव से अच्छा कुछ नहीं हो सकता। भारतीय फिल्मों की सिथति यूरोप से अलग है क्योंकि इसका दर्शनिक आधार भी कुछ और है। भारतीय सिनेमा का दर्शनिक आधार जो कि प्लेटो के गुफे से मिलता-जुलता भी है और अलग भी है। हम कह सकते हैं कि अगर यह सब कुछ जो आसपास है सिर्फ माया है और फिल्मों का यर्थाथ, दुनिया से इतना अलग होता है तो शायद सिनेमा में रचा गया यर्थाथ ही मूल यर्थाथ है। शायद, सिनेमा लोगों के लिए इतना मजेदार इसलिए है क्योंकि जो वे फिल्मों में देखते हैं वह यथार्थ है, माया नहीं। यह तो सिर्फ रूपक है लेकिन इसका एक छोटा दार्शनिक आधार तो हो ही सकता है। भारत का सिनेमा जब सपनों का कारखाना बन गया तब इसे सिनेमा माना गया।

जैसे पहले बताया सब फिल्मों की कोई कहानी होती है और कोई फिल्म शुद्ध यर्थाथ दिखा नहीं सकती। अगर सारी दुनिया माया है तो वास्तविकता ढूंढने के लिए कुछ ऐसा चाहिए था जो लोगों के आसपास से बिलकुल अलग था। इसलिए फिल्मों का इतिहास फाल्के के फिल्म से शुरू हुआ। क्योंकि, सच्चा यर्थाथ सिर्फ कुछ ऐसा ही हो सकता है जिसे दर्शकों के आसपास से विरोध हो। मुझे आशा है कि इस तरह के फिल्मों का अंत कभी नहीं आएगा क्योंकि मनोरंजन और चमत्कार आज भी सिनेमा में बहुत महत्त्वपूर्ण हैं।

 तत्याना षुर्लेई एक Indologist और फिल्म-आलोचक हैं। फिलहाल पोलैंड के शहर क्राकोव सिथत Jagiellonian University में The Courtesan Figure in the Iconography on Indian Popular Cinema:Tradition, Stereotype, Manipulation.    नामक विषय पर पीएचडी के लिए शोधरत हैं।

आभार: प्रकाश के.रे , क्योंकि यह लेख उनके द्वारा शीघ्र सम्पादित स्मारिका/पुस्तक हिदुस्तानी सिनेमा के सौ बरस से उधार माँगा गया है और पत्रिका नेशन फर्स्ट ,जहाँ यह प्रकाशित  हो चुका है .

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