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ग्लोबल गांव और गायब होता ‘देश’: चंदन श्रीवास्तव

बौद्धिक-दरिद्रता के हिंदी-समय में ‘बौद्धिक’ सी लगने वाली सूचनाएं भी किस तरह आक्रान्त करती हैं यह देखना हो तो रणेंद्र के उपन्यासों यथा, ‘ग्लोबल गांव के देवता’ और ‘गायब होता देश’ के इर्द-गिर्द होने वाली बहुसंख्यक चर्चाओं को देख सकते हैं. चर्चाओं में उफान ऐसा है मानों रेणु के बाद ग्राम्य-अंचल की आत्मा को उकेरने वाला कोई उपन्यासकार हुआ तो बस रणेन्द्र और मैला आँचल के बाद अगर आंचलिकता की सतरंगी चूनर कहीं बुनी गई तो सिर्फ ‘ग्लोबल गांव के देवता में’। इन चर्चाओं के पीछे के मनोविज्ञान को भी समझने की जरुरत है. यह मनोविज्ञान ‘राजनीतिक सहानुभूति’ मात्र को कला का स्थानापन्न मानने का हामी है जबकि हिंदी कथा-साहित्य के एक मूर्धन्य और विश्वसनीय आलोचक सुरेंद्र चौधरी ने कहीं कहा है कि ‘राजनीति को आप सहानुभूति दें, इससे बेहतर ये है कि राजनीति को जीएं, जीने वाले चरित्र गढ़ें, जीने वाली परिस्थितियाँ तैयार करें.’ रणेंद्र संबंधी तमाम चर्चाओं से जो बाते सिरे से गायब दिखती है वे हैं, उपन्यास की बुनावट, आख्यान का निर्वाह और कहानीपन। चंदन श्रीवास्तव अपने इस आलेख में इन्हीं झोलों पर से पर्दा उठाने का काम करते हैं. उपन्यासकार जितनी मेहनत अपने लिपिक-व्यक्तित्व से करवाता है उसका दसवां भी कथा गढ़ने में मदद करने वाली कल्पना के तंतुओं से नहीं करवा पाता है. इन उपन्यासों में कल्पना के तंतुओं का सिरे से स्थगन दिखता है. पठार की किस्सागोई ‘पठार का धीरज’ की भी मांग करती है जबकि रणेन्द्र के दोनों उपन्यास ‘तुरंता-फुरंता’ हरकत से पीड़ित हैं। #तिरछीस्पेल्लिंग 

By उदय शंकर

By उदय शंकर

राजनीतिक नक्शे में गायब होता उपन्यास

By चंदन श्रीवास्तव

कथा को परखना हो तो बेहतर यही है कि नजर कथा पर हो ना कि कथाकार पर। कथाकार पर नजर टिकाकर कथा परखने की कई मुश्किलें हैं, जैसे कथाकार अज्ञात भी हो सकता है और अगर अज्ञात ना हो तो भी झंझट बनी रह सकती है बशर्ते अपने लिखे को लेकर उसका नजरिया हमारे पास मौजूद ना हो।  लेखक अज्ञात ना हो, लिखे को लेकर उसका नजरिया मालूम हो तो भी मुश्किल खत्म नहीं होती। एक कठिनाई तो यही देखने की आन खड़ी होती है कि अपनी लिखाई में कथाकार रचना विषयक अपनी दृष्टि को ठीक-ठीक पिरो पाया है कि नहीं और जो ठीक-ठीक अपनी रचना-दृष्टि को कथाकार कथा में पिरो पाया हो तो भी यह सवाल तो बना ही रहेगा कि खुद कथाकार की रचनादृष्टि को उसकी कथा के बारे में निर्णय देते हुए महत्वपूर्ण क्यों मानें ? लिहाजा, अच्छा तो यही होगा कि ‘ग्लोबल गांव के देवता’ या ‘गायब होता देश’ पढ़ते हुए आप रचनाकार रणेन्द्र को भुलाये रखें लेकिन ये उपन्यास और रणेन्द्र दोनों ऐसा होने नहीं देते। वजह, ‘ग्लोबल गांव के देवता ’ और ‘गायब होता देश’ की संज्ञानात्मक बनावट अपने रचनाकार रणेन्द्र के राजनीतिक मानस की बनावट से एकदम बंधी हुई है। चाहें तो कह लें कि इन उपन्यासों और उपन्यासकार की एक दलील यह भी है कि रचनाकार के राजनीतिक मानस को परखने के साथ उसकी रचना के औचित्य को भी परखना संभव हो जाता है।

दोनों उपन्यासों के रचना-संदर्भ के रुप में रणेन्द्र के राजनीतिक मानस की बनावट को समझने के लिए एक पत्रिका में प्रकाशित उनके साक्षात्कार की पंक्तियां सहायक हो सकती हैं। तहलका पत्रिका ने 31 मार्च 2014 के अंक में रणेन्द्र से प्रश्न किया कि ‘आज आदिवासी समाज के संकट और उनकेसंघर्ष देश के व्यापक समाज के संकट और संघर्षों के प्रतिनिधि लगते हैं, ऐसा क्यों ? रणेन्द्र को इस प्रश्न के उत्तर में अर्थशास्त्री अमित भादुड़ी का एक पद ‘विकास का आतंकवाद’ याद आया और ‘विकास के आतंकवाद’ की अपनी व्याख्या में उन्होंने जो कहा उसका सार-संक्षेप यह कि आजादी के तुरंत बाद नेहरू-महालानोबिस मॉडल की विशालकाय परियोजनाएं आधुनिक तीर्थस्थल बन कर अवतरित हुईं। इस विकास की बलिवेदी पर जिस समुदाय ने सबसे ज्यादा शहादतें दीं वह आदिवासी समुदाय था.1991 के बाद विकास की गति बहुत ज्यादा तेज हो गई है. वैश्वीकृत बाजार में मध्यवर्ग की घोषणाएं आसमान छू रही हैं। अतः सारा लौह अयस्क, बॉक्साइट, तांबा, यूरेनियम आज ही चाहिए. नतीजतन 1991 ईस्वी के पहले कंपनियों को निर्गत खनन पट्टों की संख्या कुछ सौ थी वह बढ़कर आज कुछ हजार हो गई है।  रणेन्द्र को लगता है कि “जितने मेमोरेंडम ऑफ अंडरस्टेंडिंग झारखंड, छत्तीसगढ़, उड़ीसा, मध्य प्रदेश, कर्नाटक आदि राज्यों में हुए हैं, अगर वे जमीन पर उतर गए तो विस्थापन नहीं विपदा आ जाएगी, एक जलजला आ जाएगा।”

‘विकास के आतंकवाद’ के कल और आज में रणेन्द्र फर्क करते हैं। उन्हें लगता है कि जब तक बड़े बांधों, कारखानों, खनन परिसरों के लिए आदिवासी इलाकों में जमीनें जबरिया छीनी जा रही थीं तो मुख्यधारा को कोई फर्क नहीं पड़ रहा था लेकिन “आज तो रियल एस्टेट का दिल भी ‘मोर-मोर’ मांग रहा है. सरकारें स्पेशल इकोनॉमिक जोन के लिए जमीनें अधिगृहीत कर रही हैं और उसे रियल एस्टेट इकोनॉमिक जोन को हस्तांतरित कर रही हैं। न जाने कितने हजार बहुफसली सिंचित कृषि भूमि इस ‘विकास के आतंकवाद’ की अजगरी आंत मे समा गई है और कितनी और निगली जानी बाकी हैं। अब जाकर मुख्यधारा को लघु-सीमांत किसानों का जीवन-आधार, भूख के विस्तार, खेत के जबरिया छीने जाने की पीड़ा की गहराई का अहसास हो रहा है. इन्हीं कारणों से आदिवासी इलाके का संकट और संघर्ष व्यापक समाज के संकट और संघर्ष का प्रतिनिधि बनता लगने लगा है।”

दोनों उपन्यास विकास के आतंकवाद की रणेन्द्र की इस व्याख्या के अनुकूल लिखे गये हैं। यों ‘ग्लोबल गांव के देवता ’ के परिचय के रुप में जिल्द पर छपी पंक्तियों को पढ़कर लग सकता है कि उपन्यास सिर्फ आग और धातु की खोज करनेवाली, धातु पिघलाकर उसे आकार देनेवाली कारीगर असुर जाति के “जीवन का संतप्त सारांश” है क्योंकि उसे “सभ्यता, संस्कृति, मिथक और मनुष्यता सबने मारा है” लेकिन उपन्यास के आखिर के पन्नों पर यह बात बिल्कुल जाहिर हो जाती है कि रचनाकार की मंशा असुर जनजाति के इस ‘शोक-संतप्त सारांश’ को ‘व्यापक समाज के संकट और संघर्ष का प्रतिनिधि’  बनाकर पेश करने की है। उपन्यास के आखिर के पन्नों पर दो मुख्य किरदार इस बात से सहमत हैं कि “ग्लोबल गांव के आकाशचारी देवता और राष्ट्र राज्य दोनों एक दूसरे से घुलमिल गये हैं। दोनों को अलगाना अब मुश्किल है..सामान्य तौर पर इन आकाशचारी देवताओं को जब अपने आकाशमार्ग से या सेटेलाइट की आंखों से छत्तीसगढ़, उड़ीसा, मध्यप्रदेश, झारखंड आदि राज्यों की खनिज संपदा, जंगल या अन्य संसाधन दिखते हैं तो उन्हें लगता है कि अरे, इन पर तो हक हमारा है। उन्हें मालूम है कि राष्ट्र-राज्य तो वे ही हैं, तो हक तो उनका ही हुआ। सो इन खनिजों पर, जंगल में, घूमते हुए लंगोट पहने असुर-बिरजिया, उरांव-मुंडा, आदिवासी, दलित-सदान दिखते हैं तो उन्हें बहुत कोफ्त होती है। वे इन कीड़ों-मकोड़ों से जल्द निजात पाना चाहते हैं। तब इन इलाकों में झाड़ू लगाने का काम शुरु होता है।”

और, उपन्यास की जिद है कि झाड़ू लगाने के काम के महाविस्तार को पाठक पूरे देश में फैला हुआ देखे। अपनी जिद के अनुकूल उपन्यास आखिर के पन्नों पर “अख़बार और पत्रिकाओं की इस तरह की खबरें” सिलेसिलेवार बताता चलता है कि “छत्तीसगढ़ के रायगढ़ जिले से होकर बहने वाली एक बड़ी नदी शिवनाथ एक इंडस्ट्री समूह को बेंच दी गयी थी। कई गांवों के लोग, मवेशी, चिरई-चुनमुन, खेत-बघार सब पानी के लिए छछन रहे थे। बोन्दा टीकरा गांव के लोग राजधानी में जाकर अनशन पर बैठे..।” इसके तुरंत बाद उपन्यास में याद दिलाया जाता है कि “मणिपुर की राजधानी इम्फाल से मात्र पन्द्रह किलोमीटर दूर मलोम कस्बे की पिता इरोम नन्दा, मां इरोम सखी की 34 वर्षीया बेटी इरोम शर्मिला, सशस्त्रबल के विशेषाधिकार कानून के विरोध में पिछले लगभग सात वर्षों से आमरण अनशन पर हैं….केरल की सी के जानू, वन विभाग की जिद के कारण तिरपन हजार बेघर आदिवासी परिवारों की लड़ाई की अगुआ, वायन्द जिले के गैरमजरुआ जमीन पर बसने की बात सोचते-सोचते पुलिसिया बर्बरता का शिकार होती है…. महाराष्ट्र कोंकण में बघर तेरह हजार आदिवासी परिवारों की लड़ाई लड़ती सुरेखा दलवी, मध्यप्रदेश रीवां जिले में संघर्ष करती दुवसिया देवी, छिन्दवाड़ा गोंड गांव की दयाबाई..किसकी किसकी कथा कही जाय और कितनी कही जाय। ”

यों तो संघर्षों के इस सिलसिले को उपन्यास में यह बताने के लिए दर्ज किया गया है कि “शायद स्त्री ही स्त्री की व्यथा समझती है” तो भी उपन्यास के आखिर में आयी इन पंक्तियों को चूंकि असुर जनजाति के अस्तित्व को बचाने के लिए संघर्ष करते पात्र (ललिता) की जबानी कहलवाया गया है इसलिए यह निष्कर्ष निकालना बेजा ना होगा कि उपन्यास की इच्छा असुर जनजाति के संघर्ष को ‘व्यापक समाज के संकट और संघर्ष का प्रतिनिधि’ मानकर पेश करने की है।

इस बात के संकेत ऊपर उद्धृत रणेन्द्र के साक्षात्कार में भी हैं। मसलन रणेन्द्र को यह तो लगता है कि “आदिवासी, दलित, स्त्री, पिछड़े मुसलमान आदि हाशियाकृत समुदायों अस्मिताओं की अपनी विशिष्ट समस्याएं रही हैं. वे अलग से रेखांकित किए जाने की प्रतीक्षा कर रही थीं पर कई कारणों से उपेक्षित रहीं” लेकिन साथ में वे यह भी जोड़ते हैं कि “अस्मितावादी आंदोलन कोई निश्छल भाव से चलने वाला आंदोलन नहीं है. वैश्विक पूंजीवादी राजनीति उसके पीछे खड़ी है” जिसे ‘सर्वहारा के महाआख्यान’ के खिलाफ खड़ा करने के लिए काफी समर्थ और प्रतिबद्ध विचारक-दार्शनिक मिले। रणेन्द्र को अस्मितावादी आंदोलन ‘अन्य’ या ‘अदर्स’ की पहचान और उसके खिलाफ सैद्धांतिक दर्शन गढ़कर “पूरी ताकत और घृणा” के साथ चलाया जाने वाला अभियान प्रतीत होता है जो कि अंतत “होलोकॉस्ट की ओर” ही ले जाती है। उनका प्रश्न यह है कि “वंचित-शोषित-हाशियाकृत तबकों को अपनी विशिष्ट समस्याओं के रेखांकन के बाद संघर्ष के लिए इकट्ठा एक मंच पर न जुटने दिया जाए तो लाभ किसे है?” अचरज नहीं कि जिस उपन्यास की शुरुआत “बदहाल ज़िंदगी गुज़ारती संस्कृतविहीन, भाषाविहीन, साहित्यविहीन, धर्मविहीन” असुर जनजाति के लिए इस पीड़ा से होती है- “छाती ठोंक ठोंककर अपने को अत्यन्त सहिष्णु और उदार करनेवाली हिन्दुस्तानी संस्कृति ने असुरों के लिए इतनी जगह भी नहीं छोड़ी थी। वे उनके लिए बस मिथकों में शेष थे। कोई साहित्य नहीं, कोई इतिहास नहीं, कोई अजायबघर नहीं। विनाश की कहानियों के कहीं कोई संकेत्र मात्र भी नहीं’ वही उपन्यास अपने आखिर में जिस प्रश्न पर आकर अटकता है वह प्रश्न असुर संज्ञा का लोप कुछ इस भंगिमा के साथ करता है- “क्या मृत्यु का भी कोई आकर्षण है? या नियत पराजय भी आमंत्रित करती है? मैं सोचता रहता। फिर क्यों, न केवल कीकट प्रदेश के बरवे जिले में बल्कि देशके कई-कई राज्यों में हाशिया पर पड़े समुदाय संघर्षरत थे। क्या सभी अपनी अपूर्ण मृत्यु की और बढ़ रहे थे। मेरे अख़बार, पत्र-पत्रिकाएं इस तरह की कई खबरें मुझ तक पहुंचा रही थीं।”

कथा के निभाव के हिसाब से सोचें तो दरअसल इस उपन्यास की दिक्कत भी यही है कि वह शुरु तो होती है “असुर समुदाय की गाथा पूरी प्रामाणिकता व संवेदनशीलता के साथ” बताने के वादे से लेकिन उपन्यासकार ने अपने में कथा के लिए जो राजनीतिक नक्शा तैयार कर रहा है, वह नक्शा इस वादे को पूरा नहीं होने देता। अपने नक्शे के अनुकूल असुर जनजाति के “संतप्त  सारांश” को चूंकि उसे देश के “कई-कई राज्यों में, हाशिए पर पड़े समुदाय” की संघर्ष-गाथा के रुप में भी पेश करना है, सो उपन्यास को शुरुआत से ही एक हड़बड़ी घेर लेती है। सौ पृष्ठों के कलेवर में कथा किसी बुलेट-ट्रेन सी भागती है, कथा को अपनी मंजिल का पता जो है। मंजिल की ओर बुलेट-रफ्तार से भाग रही कथा रास्ते में पड़ने वाले किसी भी ठौर-ठीहे को नजदीक से देखने के लिए उतरने का अवकाश नहीं देती। पाठक कथा के किसी भी अंश पर ठहरे इससे पहले ही कथा का कोई और अंश उसकी आंखों के आगे आ जाता है। यह तेज-रफ्तारी उपन्यास के किसी ब्यौरे को साहित्य के अंश में नहीं बदलने देती और पूरा उपन्यास रचनात्मक तनाव को ना साध पाने के कारण ना तो असुर जनजाति की संवेदनशील कथा बन पाता है ना ही इस कथा को “व्यापक समाज  के  संघर्ष और संकट का प्रतिनिधि”  बना पाता है।

मिसाल के लिए हम यही सवाल करें कि ‘ग्लोबल गांव के देवता ’ असुर समुदाय की भाषा-संस्कृति-धर्म के बारे में पाठक को जिस तरह सूचित करती है? यह प्रश्न पूछा जा सकता है क्योंकि ग्लोबल गांव के देवता की एक टेक है कि ‘मुख्यधारा पूरा निगल जाने में ही विश्वास करती है’ और इसने असुर समुदाय को ‘संस्कृतविहीन, भाषाविहीन, साहित्यविहीन, धर्मविहीन’ बना दिया है। इस प्रश्न का उत्तर उपन्यास में किसी कथा के रुप में हमारे सामने नहीं आता बल्कि इसे एक नृशास्त्रीय या फिर ऐतिहासिक ब्यौरे के रुप में पेश किया गया है। स्कूल टीचर के रुप में असुर जनजाति के एक इलाके में पदस्थापित कथा के नायक को असुर जनजाति का एक पढ़ा-लिखा सदस्य रुमझुम मित्र-भाव से बताता है कि “हम असुर लोग मोटा-मोटी तीन भाग में बंटे हैं.. बीर असुर, अगरिया असुर और बिरिजिया असुर। हालांकि बीर यहां बहादुर के सेंस में नहीं आया  बल्कि जंगल के अर्थ में आया है। लेकिन प्राचीन असरिया बेलीलोन सभ्यता में असुर का अर्थ बलवान पुरुष ही होता है। अपने यहां भी सायणाचार्य असुरों को बलवान प्रज्ञावान शत्रुओं का नाश करने वाला और प्राणदाता पुकारते हैं। ऋग्वेद के प्रारंभ के लगभग डेढ़ सौ श्लोकों में असुर देवताओं के रुप में हैं। मित्र, वरुण, अग्नि, रुद्र, सभी असुर ही पुकारे जा रहे हैं. बाद में यह अर्थ बदलने लगता है और असुर दानव के रुप में पुकारे जाने लगते हैं। ”

“अंगिरा या अंगिरस ऋषि  और अगरिया में एकापन भी ध्यान खींचता है।.. अंगिरा ऋषि भी अपने को आग से उत्पन्न बताते है और अगरियों की भी पैदाइश आग ही से हुई है। यह अंगिरा ही हैं जिन्होंने सबसे पहले आग की खोज की थी। आग की खोज और देवताओं से लड़ाई की कहानी कई जगह प्रचलित है। ग्रीक कथाओं में भी प्रमथ्यू स्वर्ग से आग चुराकर लाता है तो देवता उसे सज़ा देते हैं।सींगबोंगा, सुर देवताओं द्वारा असुरों को सज़ा देने की कथा प्रचलित है किन्तु यह सुर-असुर लड़ाई एक जटिल पहेली है। कभी हमलोग स्थिर में बैठकर इसे सुलझायेंगे। क्या यह पाषाणकालीन लोगों का धातु पिघलाने वाले लोगों से संघर्ष था? सुर में ‘सु’ शामिल है जिसका अर्थ उत्पादन होता है, इसलिए क्या जंगलों को काटकर उत्पादन यानि खेती करने वालों और सखुआ पेड़ के कोयले पर आश्रित लोहा पिघलाने वालों के बीच की लड़ाई है… ”

असुर जनजाति के बारे में उपन्यास में दर्ज इस ब्यौरे को कौन सी बात साहित्य में तब्दील करती है ? चूंकि रणेन्द्र स्वयं भी झारखंड एन्साइक्लोपीडिया(चार खंड) का संपादन कर चुके हैं इसलिए उनसे बेहतर कौन जानता होगा कि असुर जनजाति के बारे में ये सूचनायें समाज-विज्ञान की किताबों में सहज ही उपलब्ध हैं। असुर जनजाति के समाज-वैज्ञानिक ब्यौरे को कथा के किसी पात्र से कहलवा देने भर से वह ब्यौरा साहित्य नहीं बन जाता। साहित्य तो तब बनता जब “मित्र, वरुण, अग्नि, रुद्र, सभी असुर”  पुकारे जाने वाली सत्ताओं के बरक्स असुरों के “दानव के रुप में पुकारे” जाने के बीच जो अर्थ-परिवर्तन या कह लें सत्ता-परिवर्तन घटित होता है इसे उपन्यासकार अपनी कल्पना के जोर से एक जीवंत कथा के रुप में ढालता। असुर जनजाति से संबंधित समाज-विज्ञान के ब्यौरों में ऐसी संभावनाएं पूरमपूर हैं। मिसाल के लिए, वेरियर एल्विन की पुस्तक ‘द अगरिया’ को ही देखा जा सकता है। शरत् चंद्र राय इस पुस्तक की भूमिका में लिखते हैं कि अगरिया जनजाति के मिथकों का अध्ययन बड़ा मनोग्राही है। जनाब अल्विन ने दिखाया है कि कैसे अगरिया समाज के धार्मिक और आर्थिक संरचना तथा सामाजिक संबंधों की बुनियाद मिथक हैं। जीवन और प्रकृति से संबंधित जिन विचारों की भावराशि ने अगरिया-मानस पर अपनी छाप छोड़ी है, उन विचारों का खुलासा इन मिथकों से होता है..। ” अगर कोई समाज-विज्ञानी रणेन्द्र से बहुत पहले असुर जनजाति की एक शाखा अगरिया के धार्मिक-सामाजिक-आर्थिक जीवन-यापन और जीवन तथा प्रकृति विषयक उसके भावराशि का निर्माण में मिथकों की इतनी महत्वपूर्ण भूमिका रेखांकित कर गया है तो फिर ऐसी कौन-सी रचनात्मक बाधा थी जिसने ‘ग्लोबल गांव के देवता’ को अपना घोषित लक्ष्य( असुर जनजाति की प्रामाणिक व संवेदनशील तथा संतप्त गाथा) पूरा करने के लिए इन मिथकों के सहारे अपना आख्यान तैयार करने से रोक दिया ?

ब्यौरे को साहित्य में तब्दील ना कर पाने की एक और मिसाल गौरतलब है। कथा का नायक अपने घर से ढाई तीन सौ किलोमीटर दूर बरबे जिलाके प्रखंड कोयलाबीघा का भंवरापाट में पहाड़ के ऊपर जंगलों के बीच बने आवासीय विद्यालय में नौकरी के लिए पहुंचता है तो मध्यवर्गीय जरुरतों को पूरा करने वाली सुविधाओं से एकदम ही वीरान उस जगह पर उसकी दशा “कब खूँटा उखाड़ूं और भाग निकलूं” की है। लेकिन बाद को उसकी मनोदशा कुछ ऐसे बदलती है-“रहते रहते अपना भौंरापाट स्कूल मुझे अच्छा लगने लगा था। हेडमिस्ट्रेस और टीचर्स अच्छी लगने लगी थीं, और क्लास की बच्चियां अच्छी लगने लगी थीं। साहूजी किरानी की थोड़ी बहुत चालाकी अच्छी लगने लगी। एतवारी तो अच्छी थी ही, उसका आदमी गंदूर भी अच्छा लगने लगा। “कब खूँटा उखाड़ूं और भाग निकलूं” से सबकुछ ‘अच्छा” लगने  की दशा में आये नायक से उम्मीद की जा सकती है कि अब वह असुर जनजाति के रोजमर्रा को नजदीक से देखने की स्थिति में होगा और आत्मीयता की आँख से उस समाज की बातें बता पाएगा। लेकिन नायक की आत्मीय आंखें असुर जनजाति की रोजमर्रा की जिन्दगी के बारे में जो ब्यौरे पाठक को बताती हैं वे ब्यौरे विशिष्टता से खाली हैं, कह लें कि थोड़े से हेरफेर के साथ उन ब्यौरों को किसी भी जनजाति पर फिट किया जा सकता है। जैसे, नायक भंवरापाट में रहते-रहते सबकुछ अच्छा लगने की अपनी मनोदशा में पाठक को बताता है कि “ बैगा-पुजार पाहन, पर्व-त्यौहार, नक्षत्र- काल देख सरना-स्थल पर पूजापाठ करते। पाट देवता, सरना माई, महादनिया महादेव, सिंगबोंगा गांव घर पर प्रसन्न रहते। खेत-खलिहान, गाय-गोरु, बाल-बच्चा, परिवार-टोला सबका कुशल-मंगल हो, यही हर पूजा की कामना होती। गांव के सीमान के देव, दरहा की पूजा कर गांव निश्चिंत होकर सोता..।” नायक की नजर गांव से हटकर घरों के अंदर जाती है तब भी वह इतना ही बता पाता है कि “ बाहर की दीवारों को बड़े जतन से महिलायें लीपती थीं। महिलायें इस समाज में सियानी कहलाती थीं जनानी नहीं। जनानी शब्द कहीं ना कहीं केवल जनन, जन्म देने की प्रक्रिया तक उन्हें संकुचित करता जबकि सियानी शब्द उनकी विशेष समझदारी, सयानेपन को इंगित करता मालूम होता। सियानीमन, महिला लोगों को यह पता रहता था कि घर लीपने वाली काली, पीली सफेद मिट्टियां कहां मिलती हैं, किस टांड़ में, किस दोन में..।” दीवारों को लीपने की पूरी प्रक्रिया के साथ अगर उपन्यास का यह भावपूर्ण हिस्सा जोड़ दें कि “हमारा पूरा ब्रह्नांड हमारी अपनी आकाशगंगा और पूरे कायनात की लाखों करोड़ों अकाशगंगाओं के अनंत ब्रह्रांड सबके सब किसी स्त्री की हथेलियों से घूमेड़ लेकर आदि अनंत काल से नाचते जा रहे हैं” तो भी इस ब्यौरे से असुर जनजाति की स्त्रियों के रोजमर्रा के किसी अदेखे सुख-दुःख की कथा इस ब्यौरे से नहीं निकलती।

‘ग्लोबल गांव के देवता’ असुर जनजाति की शोक-संतप्त कथा कहने के वादे से शुरु होती है और आखिर को एक अर्जी में बदल जाती है, एक ऐसी अर्जी जिसका फैसला उपन्यासकार के अनुसार इतिहास-धारा कब का सुना चुकी है। उदाहरण के तौर पर उपन्यास के आखिर का वह अंश देखा जा सकता है जो प्रधानमंत्री को लिखी एक चिट्ठी के रुप में दर्ज है- “हमारे पूर्वजों ने जंगलों की रक्षा करने की ठानी तो उन्हें राक्षस कहा गया, खेती के फैलाव के लिए जंगल के काटने जलाने का विरोध किया तो दुष्ट दैत्य कहलाये। उनपर आक्रमण हुआ और लगातार खदेड़ा गया।… लेकिन बीसवीं सदी की हार हमारी असुर जाति की अपने पूरे इतिहास में सबसे बड़ी हार थी। इस बार कथा-कहानी वाले सिंगबोंगा ने नहीं टाटा जैसे कंपनियों ने हमारा नाश किया।..बाक्साइट के वैध-अवैध खदान, विशालकाय अजगर की तरह हमारी जमीन को निगलता बढ़ता आ रहा है। हमारी बेटियां और हमारी भूमि हमारे हाथों से निकलती जा रही हैं।.. हम असुर अब सिर्फ आठ नौ हजार ही बचे हैं। हम बहुत डरे हुए हैं.। हम खत्म नहीं होना चाहते।” और उपन्यास में इस चिट्ठी के ठीक आठ पन्नों बाद एक प्रवचननुमा फैसला दर्ज है- “राज्य राष्ट्र की हिंसा का कोई जवाब ही नहीं हो सकता।.. राज्य की नींव में ही केवल हिंसा की ईंटे नहीं लगी हैं बल्कि उसके महल की हिंसा ईंटों से ही चिनाई हुई है।यही एकमात्र संस्था है जिसने हिंसा को भी सांस्थानिक रुप दिया है। उसकी सेना, सशस्त्र बल, पुलिस, सब सैद्धांतिक तौर पर हिंसा के लिए ही प्रशिक्षित हैं..। ”

‘गायब होता देश’  का प्रकाशन-वर्ष(2014) ‘ग्लोबल गांव के देवता से पाँच साल बाद का है। इन पाँच साल में उपन्यासकार ना तो अपनी कथा-भूमि बदल पाया है ना ही कथा को अपने राजनीतिक नक्शे में फिट करने का आग्रह।  कथाभूमि और राजनीतिक आग्रह का एका दोनों उपन्यासों में इतना गहरा है कि ‘गायब होता देश’  को ‘ग्लोबल गांव के देवता’ के विस्तार के रुप में पढ़ा जा सकता है। इस उपन्यास के आरंभ में एक ‘सोना लेकन दिसुम’ नाम का स्वर्ग है और इस स्वर्ग के नष्ट होने से उपजा शोक है।‘ग्लोबल गांव के देवता की तरह ‘गायब होता देश’  में भी स्वर्ग को नष्ट करने वाला राष्ट्र-राज्य ही है, ऐसा राष्ट्र-राज्य जिसने वैश्विक पूंजी से हाथ मिला लिया है। उपन्यास में स्वर्ग इस रुप में आता है- “सोने के कणों से जगमगाती स्वर्णकिरण स्वर्णरेखा, हीरों की कौंध से चौंधियाती शंखनदी, सफेद हाथी श्यामचंद्र और सबसे बढ़कर हरे सोने, शाल-सखुआ के वन, यही था मुंडाओं का सोना लेकन दिसुम। ”

यह स्वर्ग नष्ट हुआ क्योंकि “ इंसान थोड़ा ज्यादा समझदार हो गया। उसने बंदरगाह बनाने, रेल की पटरियां बिछाने, फर्नीचर बनाने मकान बनाने केलिए अंधाधुन्ध कटाई शुरु की। मरांग बुरुबोंगा की छाती की हर अमूल्य निधि धातु-आयस्क उसे आज ही अभी ही चाहिए था। नहीं तो उसे पिछड़ जाने का भय था।इन्हीं जरुरतों से ज्यादा समझदार इंसानों की अंधाधुन्ध उड़ान के उठे गुब्बार बवंडर में सोना लेकन दिसुम गायब होता जा रहा था। ”

सोना लेकन दिसुम के गायब होने का एक साक्षी पत्रकार किशन विद्रोही है और उपन्यास का आरंभ किशन विद्रोही की हत्या की खबर से होता है,, एक ऐसी हत्या जिसकी गुत्थी का सुलझना शेष है “क्योंकि ना तो कोई चैनल ना कोई अखबार पूरी गारंटी से कहने को तैयार था कि हत्या हुई है।” पाठक शुरुआती पन्नों पर किशन विद्रोही के बारे में जान पाता है कि वह “ भूमिहीन मजदूरों द्वारा मठ की जमीन को जोतने के संघर्ष में शामिल ” था और उसे तब लोकनायक जेपी का आशीर्वाद भी हासिल हुआ था। विद्रोही की हत्या की गुत्थी सुलझाने के क्रम में प्रशिक्षु पत्रकार राकेश को डायरी, जेरॉक्स और अखबार के जो पन्ने हासिल होते हैं। इन पन्नों से किशन विद्रोही की त्रासदी की कथा की शुरुआत होती है, यही त्रासदी उपन्यास में ‘सोना लेकन दिसुम’ के गायब होते जाने की तफ्सील भी है।

तफ्सील यों है कि किशनपुर एक्सप्रेस के पत्रकार के रुप में परमवीर चक्र प्राप्त परमेश्वर पाहन की हत्या/मुठभेड़ की गुत्थी सुलझाने के लिए किशन विद्रोही हीराहोतु जाता है और इसी क्रम में उस पर अखबार के प्रबंधन का दबाव बनता है कि वह ऐसी खबरों को ज्यादा तवज्जो नहीं दे। उसे बदलने का उपदेश मिलता है कि ‘केके बदलो यार। समय के साथ कदम से कदम मिलाकर चलना ही बुद्धिमानी है। प्रोफेशनल लाइफ में अड़ियलपन से काम नहीं चलता। आगे दूर तक देखिए। स्थानीयता में मत उलझिए। राष्ट्रीय दृष्टि से परिघटनाओं का विश्लेषण कीजिए।‘और यह भी कि “पाठक गरीबी, बदहाली,भूख, बेकारी, विस्थापन, आदिवासी-दलितों की कहानियां पढ़-पढ़कर बोर हो गया है। ”

किशन विद्रोही के माध्यम से उपन्यासकार वंचितों की व्यथा-कथा की खोज खबर देने क्रम में यह बताता प्रतीत होता है कि आदिवासियों का संघर्ष कुछ वैसा ही है जैसा कि भारतीय जनता का ब्रितानी साम्राज्यवाद से था- “लग ही नहीं रहा था कि 2000 ईस्वी में हो। लग रहा था कि 13 फरवरी 1832 हो। कप्तान इंपे की बंदूकें गोलियां बरसा रही हों। वीर बुधु भगत के साथ-साथ पूरा सिलगई शहीद हुए जा रहा हो या 9 जनवरी 1900 हो और सईल रकब पर मुंडाओं की बैठकी पर गोलियां बरसायी जा रही हों। गोलियां चल रही थीं जिंदा हंसते गाते इंसान शहीद हुए जा रहे थे।”

इस स्थिति के बरक्स आदिवासियों का संघर्ष किस मुकाम पर है ? उपन्यास आदिवासियों के संघर्ष की व्याख्या के लिए कुछ फार्मूलों की सहायता लेता है जैसे यह कि आदिवासी, आखिर को आदिवासी भर कहां हैं वे तो अगल-अलग पहचानों में बंटे हैं इसलिए उनका संघर्ष टुकड़ों में बंटा है और असफल होने को अभिशप्त है- “अब सौंसार आदिवासी हैं तो का, वीरेन तो मुंडा है,हम संताल हैं,उरांव हैं, खड़िया हैं, खेरवार हैं, लोहरा हैं, हम काहे को उसको लीडर मानें। हम सौंसार हैं तो मिशन लोग के साथ नयं बैठेंगे।” आदिवासी समाज के एका के अभाव की व्याख्या में उपन्यासकार आर्थिक आधार तलाशता है – “दूसरे ही दिन सोलह फ्लैट के लिए बत्तीस ग्राहक। सबके सब आदिवासी साहब सूबा लोग..ऐसन लंबी-लंबी गाड़ी सब में एतना ट्रायबल अफसर एके साथ पहली बार देख रहे थे। सौ किलो- सवा सौ किलो के भी साहब। सरनेम है तिग्गा, तिर्की, खलको, लकड़ा बाकिर कुठुख(उरांव जनजाति की भाषा) में गोठियाने लगे तो लगा सब मुंह फाड़ के भकुआ टाईप देखने..।बाबा! हम तो सोचते थे कि हमहीं पुराना पापी हैं। समाज के गद्दार..खाली नामे भर के आदिवासी है ई लोग बाबा। कल रिजर्वेशन खत्म कर दीजिए तो अपना के आदिवासी कहने में भी शरमाएगा ई लोग। ” उपन्यास के इस अंश पर पहुंचकर पाठक को तहलका पत्रिका में प्रकाशित रणेन्द्र के साक्षात्कार की इन पंक्तियों की याद आ जाय तो क्या अचरज- “वंचित-शोषित-हाशियाकृत तबकों को अपनी विशिष्ट समस्याओं के रेखांकन के बाद संघर्ष के लिए इकट्ठा एक मंच पर न जुटने दिया जाए तो लाभ किसे है ? ” सो, ‘गायब होता देश’ में भी उपन्यासकार की जिद आदिवासियों के संघर्ष को एक व्यापक संघर्ष के हिस्से के रुप में देखने की है और ठीक इसी वजह से उपन्यास आदिवासी जन-जीवन के बारे में कुछ भी ऐसा नहीं बता पाता जो खनन, भूमि-अधिग्रहण या फिर मानवाधिकारों केमुद्दे पर सक्रिय स्वयंसेवी संस्थाओं के प्रकाशनों अथवा आंदोलनधर्मी अखबारों/पत्रिकाओं में ना मिलता हो।

हद तो यह है कि उपन्यासकार आदिवासी जन-जीवन के संघर्ष में ऐतिहासिक निरंतरता दिखाने के लिए जिस जादुई लोक ‘लेमुरिया’ की रचना करता है, उस लेमुरिया के वासी अपने आचारण में या तो वैदिक ऋषियों की छायाप्रति लगते हैं या फिर देश की आजादी के वक्त के मध्यवर्ग की आचार-संहिता के एक वाक्य- ‘सादा जीवन उच्च विचार’ के अनुयायी। आदिवासियों की आदिभूमि लेमुरिया को उपन्यास के तर्क से एक मध्यवर्गीय प्रातमिकताओं को तरजीह देने वाले राष्ट्र-राज्य का एक प्रतिस्थापन्न होना चाहिए था लेकिन लेमुरिया मध्यवर्गीय राष्ट्र-राज्य की एक प्रतिलिपि बनकर रह जाता है। उसमें मध्यवर्गीय राष्ट्रराज्य की सारी चाहनाएं मौजूद हैं। सादा जीवन है, उच्च विचार है, संपदा का संरक्षण और संवर्धन है और इन सबसे बढ़कर है लेमुरिया का उपयोगितावादी ज्ञान-विज्ञान। मिसाल के लिए उपन्यास के इस अंश को देखा जा सकता है-  “सोमेश्वर मामू तो पंडित हैं, वो तो पूरी लंबी-चौड़ी कहानी सुनाने लगेगा लेमुरिया का। कैसे मुंडा लोगों का मूल स्थान समुद्र में समा गया और हमलोगों के पूर्वजों का ढेर ज्ञान भी बिला गया। नयं तो केतना ज्ञानी थे मुंडा लोग।धरती माता, सरना माई, सिंगबोंगा से जो भी सीखा था उसे संजो कर रखे थे। सबकी इज्जत करना,सम्मान करना, कम से कम में संतोष करना और ज्ञान बढ़ाना यही जिंदगी का मकसद था लेमुरिया मुंडाओं का। लेकिन ताकत इक्कठ्ठा करने वाले, धन इक्टठा करने वाले उन्हें अपना दुश्मन मानते थे।… उनकी दूसरी कोशिश थी कि सारे ज्ञान को क्रिस्टल मणि का रुप दे दिया जाय और उन्हें हीरों के रुप में धरती के अंदर छुपा दिया जाय और पानी डूब से बचने का सबसे बड़ा उपाय हमारे पूर्वजों ने किया कि धरती के ऊर्जा केंद्र से दूसरे ऊर्जा केंद्रों के बीच भूमिगत सुरंगे बनायी..।”

यों तो रणेन्द्र ने तहलका पत्रिका के साक्षात्कार में अपनी मजबूरी बतायी थी कि “मेरा जो अनुभव संसार है वह मुख्य रूप से आदिवासी समाज का ही है। यहां समस्याएं इतनी जटिल, जीवन इतना कठिन, दबाव इतना चौतरफा है कि इन्हें चाहकर भी किसी दूसरी विधा में नहीं अंटा सकते ” लेकिन ‘ग्लोबल गांव के देवता’ या फिर ‘गायब होता देश’ नाम के उपन्यास में जो वे अंटा पाये हैं वह आदिवासी समाज की समस्याओं की जटिलता नहीं बल्कि उसकी एक सरलीकृत झांकी भर है, ऐसी झांकी जो कहीं अर्जी, कहीं प्रवचन तो कहीं सपाट फैसले पर आकर रुक जाती है।

चन्दन श्रीवास्तव

चन्दन श्रीवास्तव

चन्दन श्रीवास्तव,  मूलतया छपरा(बिहार) के निवासी, पिछले पंद्रह सालों से दिल्ली में। पहले आईआईएमसी और फिर जेएनयू में पढ़ाई। “उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध में हिन्दी लोकवृत्त का निर्माण” शीर्षक से पीएचडी के बाद दिल्ली के कॉलेजों में छिटपुट अध्यापन, फिर टीवी चैनल की नौकरी और अब विकासशील समाज अध्ययन पीठ (सीएसडीएस) की एक परियोजना इंक्लूसिव मीडिया फॉर चेंज से जुड़े हैं। इनसे  chandan@csds.in पर संपर्क संभव है। 

प्रतिमान पत्रिका में प्रकाशन के लिए स्वीकृत

बूढ़ों का वसंत और लोलितागिरी: डॉ. विनय कुमार

सत्तर पार का एक बूढ़ा ‘सुपरस्टार’ है, उसे विश्वास है कि उसे सप्तर्षियों में से एक मान लिया गया है,सो मृत्यु उसे नहीं व्यापेगी।यह बूढ़ा हालांकि मुंह के भीतर नकली दाँत और माथे के ऊपर नकली केश लगाता है, जब तब बीमार पड़ते रहता है, तो भी सोलह साल की लड़की से प्रेम का नाटक करने के लिए हमेशा तैयार रहता है। बूढ़ा प्रयोगों का शौकीन है। उसे लगता है, प्रयोग करते रहने से आदमी हमेशा जवान बना रहता है। अपनी उम्र को जीत लेने का नाटक करते-करते इस बूढ़े ने साबित किया है कि सचमुच उम्र को जीता जा सकता है। वैसे अपनी उम्र को जीतने के लिए यह बूढ़ा एक खास किस्म का शहद भी खाता है। यह शहद पुणे के एक बाग़ में तैयार होता है। यह शहद या तो सिर्फ यह बूढ़ा खाता है या फिर मधुमक्खियों पर राज करने वाली रानी मधुमक्खी, बाकी जो कोई इस शहद को खाना चाहता हो उसे उस क्लब में शामिल होना पड़ेगा जो कि रानी मधुमक्खी का क्लब होता है। यह क्लब अकसर आईपीएल की टीमों के खरीदारों और उनके दोस्तों से बनता है। साठ पार कर चुका एक और बूढ़ा है। यह बूढ़ा ‘सर्वशक्तिमान’ है। इस बूढ़े के पास एक नुस्खा है। बूढ़ा रानी मधुमक्खी के क्लब में शामिल होने का नुस्खा बताता है। इस बूढ़े ने भी उम्र को जीत लिया है।यह बूढ़ा अपने शरीर को सोने से मढ़वा देना चाहता है। सोना मढ़वाये सूट को धारण करने वाला बूढ़ा अपने को रॉकस्टार कहलवाने का शौकीन है, उसे रॉकस्टार कहा भी जा रहा है। साठ साल के इस लोकतंत्र पर इक्कीसवीं सदी में बरस इक्कीसवे बरस की जवानी छा रही है। सारे बूढ़े जवान हो गये हैं, सारे बच्चे भी जवान हो गये हैं, और जो जवान हैं, उनसे कहा जा रहा है कि अब आप चिरयौवन की अनंत आकाशगंगा में टहल लगाने को तैयार हैं। यंगिस्तान कहलाने वाले इस देश में अब कोई नहीं मरता। यहां रोग-शोक-दुःख-मृत्यु कुछ भी नहीं है। यह सब उस दौर की बातें हैं जब ग्रोथ-रेट के साथ किसी पुछल्ले की तरह हिन्दू शब्द जुड़ा होता था। यह ‘हिन्दू’ शब्द उस युग की इकॉनॉमी में इस देश के आदमी को आदिमानव बताने के लिए प्रयोग किया जाता था। आदिमानव ने छलांग लगायी है, अब वह महामानव है या फिर महामानव बनने को तैयार खड़ा है। महामानवत्व के सुखसागर में डूबते उतराते इस माहौल में यह लेख कह रहा है कि भाई साहेब, ये तो एक रोग है…! यह तो सिर्फ एक भूमिका है, पृष्ठभूमि है..आख्यान आगे है। डॉ. विनय कुमार की लेखनी में नयापन क्या है? नयापन वही है जो हिंदी के समकालीन रचनात्मक परिदृश्य से गायब है। नई सूचनाएं, नए ज्ञान ताकि हम बाकी संसार के साथ कदमताल कर सकें! अंग्रेजी या विदेशी साहित्य-लेखन से सहज लोगों के लिए विनय कुमार का लेखन नया नहीं बल्कि एक तरह का दुहराव भी लग सकता है, लेकिन इसे एक तरह की शुरुआत माननी चाहिए। समकालीन हिंदी कथेत्तर गद्य हिंदी का सबसे गरीब संस्करण हो गया है। डॉ. विनय की पुस्तक ‘एक मनोचिकित्सक के नोट्स’ इस गरीबी को कुछ कम ही करता है। प्रस्तुत है इसी पुस्तक से छोटे-छोटे दो गद्यांश। @चंदन श्रीवास्तव 

Sugar Daddy (1976)-Poster

Sugar Daddy (1968)-Poster


By डॉ. विनय कुमार

 चीनी कम होने की निःशब्दता

 
चीनी कम

मादरे-वतन में अगर मनमोहनॉमिक्स की इन्द्रधनुषी छटा का नूर न होता तो हमें ‘प्रिविलेज्ड बूढ़ों के वसंत’ और ‘लोलितागिरी’ पर चर्चा की जरुरत महसूस न होती… ‘निःशब्द’ और ‘चीनी कम’ पर चर्चाएँ कहाँ हो रही हैं? क्या उस भारत में जो अनुसरण करता है या उस छोटे भारत में जो नेतृत्व करता है. जो भारत ‘भूख-भय-भ्रष्टाचार’ की मार से खुद ‘निःशब्द’ है और जिसकी किस्मत में यूँही ‘चीनी कम’ है उसे यह विलासितापूर्ण सहूलियत कहाँ कि प्रेम और विवाह की तरह-तरह की रेसिपि को चटखारे लेकर पढ़े. वृद्ध और युवती के प्रेम, साहचर्य और विवाह का मुद्दा गर्म हो रहा है या गरमाया जा रहा है? सोचने की बात है. सोचने का फैशन न रहने के बावजूद इस पर सोचने की जरुरत है.

वृद्ध का युवती से विवाह भारत के लिए कोई नई बात नहीं है. दक्षिणभोगी नीतिकार कह गए ‘वीरभोग्या वसुंधरा’ और सेनाओं के सहारे वीरता सिद्ध करने वाले सत्तावान हत्यारों को भोग का सिद्धांत मिल गया. महलों के भीतर रानियों के मोहल्ले से लेकर नगर तक बसने लगे. जरा सोचकर देखिये कि कृष्ण की साथ हजार रानियों का खर्चा कैसे चलता होगा. सिर्फ इच्छा की पूर्ति के लिए कृष्ण को प्रजा से कितना वसूलना पड़ता होगा. सत्ता और धन की गोटियों से खेला जाने वाले यह खेल नन्द और यशोदा की विरासत के बूते तो कतई संभव न था.

अब इस मुद्दे को स्त्रियों की दृष्टि से देखें. तरह-तरह के स्वाभाविक और आरोपित सीमाओं के बावजूद स्त्रियाँ सभ्यता-यात्रा में बराबर की भागीदार रही हैं. कल से आज तक जीवन और वर्चस्व की लड़ाइयों में वे अपनी तरह से शरीक रही हैं. हल और हथियार भले ही कम उठाती रही हैं, मगर श्रम के स्वेद और युद्धों के आँसूं और रक्त से कम नहीं भींगती रही हैं. नर और मादा की तरह जंगलों में भटकती मानवजाति ने जब ‘घर’ बनाया तो उनकी भूमिका इस कदर बदली कि उनका मनोविज्ञान पुरुषों से काफी अलग हो गया. घर और तन से चिपके बच्चों ने उन्हें सुरक्षा की आवश्यकता का पाठ पढ़ाया. अन्न और मांस कमाकर लौटे पुरुष को जब भूख और थकान से राहत मिलने लगी तो वह स्त्री को पहले ‘जरुरत’ फिर ‘जायदाद’ की तरह प्यार करने लगा. परिणाम यह हुआ कि स्त्रियाँ ‘कृपाकांक्षिणी’ और ‘सुरक्षाकामिनी’ हो गईं. शायद यही कारण है कि स्त्रियाँ पुरुषों की उम्र से अधिक उनकी सामर्थ्य को अहमियत देने लगीं.

स्त्री के मनोविज्ञान की इस विशिष्ट पहचान के पक्ष में सबसे बड़ा जैविक प्रमाण (बायोलॉजिकल एविडेंस) यह है कि स्त्रियों की यौनिक उत्तेजना का सबलतम कारक है—पुरुष प्रदत्त देखभाल और सुरक्षा. याद करें प्रकाश झा की फिल्म ‘दिल क्या करे’. इस फिल्म की नायिका चलती ट्रेन में बलात्कार की कोशिश करने वाले गुंडों से बचाने वाले अजनबी को थोड़ी ही देर के बाद बेहद ‘निःशब्द’ तरीके से अपनी देह सौंप देती है और यात्रा के अंत में अजनबी के प्रति आँखों से आभार प्रकट करते हुए विदा हो जाती है. इतना कुछ हो जाने के बावजूद अजनबियत बरकरार रहती है. ऐसा क्यों? क्योंकि सिलसिले खतरनाक भी हो सकते हैं. अजनबियत अपने आप में एक सुरक्षा कवच है. इस प्रसंग को सुरक्षा के प्रति स्त्री के मनोवैज्ञानिक (सायकोबायोलॉजिकल) प्रतिक्रिया के रूप में देखें.

अगर स्वतंत्रता पूर्व के भारत की बात करें तो मुग्धाओं के प्रेम की सुविधा सामंतों, सेठों और वाग्वीर ज्ञानिओं के ही भाग्य में थी. लोकतांत्रिक भारत में इसमें ‘प्रिविलेज्ड क्लास’ के नेता और आला अफसर भी शामिल हो गए. अब जबकि उदारीकरण की मीठी छुरी से अच्छी-बुरी पुरानी मान्यताएं हँस-रोकर हलाल हो रही हैं, एक नए सोशल आर्डर को मान्यता दिलाने की कोशिश सर उठा रही हैं. एक फिल्म में सुबह की दौड़ लगाते हुए अमिताभ आते हैं ‘जब तक जाँ में है जाँ तब तक रहे जवां, रोज सुबह से माँगें नई-नई खुशियाँ.’ इस फिल्म में बुढ़ाते जाने के बावजूद वे विवाह नहीं करते. मगर उदार भारत में शताब्दी के महानायक कामनाओं के नदी में ‘निःशब्द’ बहते नज़र आए. ‘निःशब्द’ में थोडा अपराधबोध हुआ और ख्याल-ए-ख़ुदकुशी से उबरे तो तय किया कि तीस पार की कुड़ी से कुड़माई की जाये. इस ढीठ बदलाव के मनोविज्ञान की व्याख्या वैश्वीकरण और उदारीकरण की रोशनी में ही संभव है.

जब पश्चिम में औद्योगिक क्रान्ति हुई तो सत्ता और अर्थ के समीकरण बदले. पुराने सामन्तों और सेठों की जगह उद्यम से उभरे नवधनाढ्यों ने ली. उद्योगों ने पूंजी के नए पहाड़ बनाए, ऐश्वर्य और सुख की नई परिभाषाएँ विकसित कीं और एकदम नए किस्म की कुलीनों की जमात खाड़ी की. उद्यम और उत्पादन बहादुरों की जमात पूंजी के नशे में ‘जब तक है जाँ तब तक लुटें मजा’ की राह पर चल पड़ी. तबसे आज तक यूरोप और उसके सारे उपनिवेश में ‘एन्जॉय योर सेल्फ’ का नारा गूंज रहा है. भोग के प्रयोग ने स्त्रियों के सामने भी यह विकल्प प्रस्तुत किया कि वे चाहें तो अमीर बूढ़ों की सहचरी बन सकती हैं. धन और सत्ता का सुख किसे नहीं चाहिए. स्त्रियाँ अपवाद नहीं हैं. उनमें से कुछ को लगा कि अमीर बूढ़ों के प्रति आकर्षित होना एक सुरक्षित, आरामदेह और शक्ति एवं ऐश्वर्य प्रदान करने वाला बेहतर विकल्प है. यहीं से खड़ी हुई प्रिविलेज्ड प्रेमियों की एक नई जमात. अमेरिका में इस जमात को ‘शुगर डैडीज’ कहा जाता है. अब तो आप मानेगें कि बूढ़ों का यह वसंत ‘ग्लोबलाइजेशन का बाई प्रोडक्ट’ है और उसे फैशन शो की तरह प्रायोजित किया जा रहा है, भारत के नए उद्यम-वीरों के लिए. कुल मिलाकर वृद्ध-युवती साहचर्य का यह फैशन पूंजी के पहाड़ों से उठने वाली पुरानी पछुआ हवा का यह पुरवैया झोंका है.

जो पश्चिम में हो चूका वह भारत में हो रहा है. मगर जो जो भारत में हो रहा है वह पश्चिम में नहीं हो रहा है. पश्चिम में स्त्री-पुरुष संबंधों के समीकरण बदल गये हैं. वहाँ स्त्री सशक्तिकरण का दौर सफल हो चुका है. काफी तादात में स्त्रियाँ ज्ञान, धन, शासन-सत्ता की स्वामिनी हो चुकी हैं. नई रायशुमारियाँ बताती हैं कि अब समृद्ध और सत्तावान प्रौढ़ाएँ भींगती मसों के युवक से प्रेम और विवाह करने लगी हैं. आज नहीं तो कल भारत में यह हो सकता है. ‘चीनी कम’ की सफलता की कामना करने वाले शुगर डैडीज सोच लें.

निःशब्द

हमारे समय में शहरी और कस्बाई भारत में प्रेम पर चर्चा कोई अजूबा नहीं है. महामायावी मीडिया की कृपा से हम तरह-तरह के प्रेम पर होने वाली तरह-तरह की चर्चाओं के अनिवार्य घेरे में हैं. मोनिका-क्लिंटन और जूली-मटुकनाथ जैसी कथाएँ चाट मसाले की तरह हमरे खाने की प्लेटों में अनिवार्य रूप से छिड़की जा रही है और चूँकि हम भूखे नहीं रह सकते इसीलिए उसे चखने को विवश हैं. प्रेम का हो या न हो यह ‘प्रेम’ के अहर्निश उच्चारण से उठने वाले शोर का समय अवश्य है और ऐसे समय में आई है एक फिल्म ‘निःशब्द’. एक ‘टीन’ (युवती) और एक वक्त की मार से छीजे हुए ‘टिन’ (वृद्ध) की प्रेमकथा को लेकर.

इस फिल्म के पहले इस पर चर्चाएँ आईं और खूब आईं, जिनका लब्बोलुआब यह था कि भारत बदल रहा है- इंडिया प्वायज्ड टु बिकम बोल्ड एंड ब्यूटीफुल, देखो तो सही क्या मणिकांचन संयोग है- ओल्ड बिग बी और कमसिन ब्यूटीफुल जिया. सुपरस्टार की लोलितागिरी. जिया देखोगे तो जिया धड़क-धड़क जाएगा. तो ‘निःशब्द’ से पहले आई शब्दों की भीड़ इश्तेहार की तख्तियां उठाये. और जब फिल्म आई तो आई और आकर चली गयी. पटना में मटुक-जूली का तड़का भी भीड़ न बटोर पाया.

दरअसल ‘निःशब्द’ आकर्षण और प्रेम से अधिक त्रासदियों की कथा है. नायिका खंडित परिवार से आती है. पिताओं से भरे समाज में वह पिता के प्रेम से वंचित है. यह अभाव उसके मनोयौनिक (सायकोसेक्सुअल) विकास में अपनी भूमिका निभाता है. चूँकि किसी चीज की इच्छा उसकी कमी से ही पैदा होती है इसलिए उसके अचेतन में पितृपुरुष के लिए चाह का मौजूद होना कोई अजूबा नहीं. यहाँ प्रश्न उठता है कि उसने सहेली के पिता को पिता की तरह क्यों नहीं चाहा. ऐसा इसलिए कि वह पिता-पुत्री के संबंधों के व्याकरण से अनभिज्ञ थी. हर शिशु नर या मादा पैदा होता है. संबंधों की समझ तो परिवार और परिवेश के साथ ‘इंटरएक्शन’ से विकसित होती है. नायिका की समस्या यह है कि जब संयोग उसे अबाधित एकांत में नायक को समझने का अवसर प्रदान करता है और उसके अचेतन में पितृपुरुष को पाने की इच्छा सिर उठाती है तो वह स्वयं को एक पुत्री की तरह अभिव्यक्त नहीं कर पाती क्योंकि उसे वह मनोवैज्ञानिक भाषा ही नहीं पता जिसमें एक पुत्री अपने पिता से बात करती है. उसकी इच्छा उसके बचपन के अभाव से उठती है, मगर व्यक्त होती है युवा भाषा में. यह त्रासदी नहीं तो और क्या है! नायक अपनी तरह की त्रासदी का शिकार है, विवाहित होकर दाम्पत्य प्रेम से वंचित. दाम्पत्य की विडंबना यह है कि वह प्रेमहीन होकर भी संतानवान हो सकता है. नायक तृप्त पिता है मगर एक अतृप्त पुरुष. फिल्म में संयोग उसके अतृप्त पुरुष का कद इतना बढ़ा देता है कि पिता बौना हो जाता है. अतृप्त पुरुष की भाषा के शोर में पिता की भाषा खो जाती है. अगर सही-गलत के पारंपरिक और समाजसम्मत नजरिये से सोचें तो यह दायित्व नायक का ही था कि वह नायिका के हित में सही भाषा में बात करता. क्योंकि नायिका भले ही पुत्री की भाषा नहीं जानती थी, नायक तो पिता की भाषा जानता था. वह निःशब्द की ‘जिया’ के मोह को गुड्डी की ‘जया’ के मोह की तरह भंग कर सकता था. मगर इच्छाओं को बहकाते-दहकाते ग्लोबलाइज्ड समाज में यही, शायद यही हो सकता था. यह त्रासदी नहीं तो और क्या है?

अगर मिथकों पर रत्ती भर भी यकीन करें तो मानना होगा कि भारत शांतनु और ययाति का देश है. स्मरण है कि कमसिन कायालोलुप राजाओं की वासना की वासना को सैद्धांतिक आधार प्रदान करने के लिए लोभी शास्त्रकारों ने सोलह की उम्र को अक्षत सौन्दर्य के भोग का प्रवेशद्वार घोषित कर दिया था. ‘स्वीट सिक्सटीन’ का जूमला तो बहुत बाद की चीज है. आज चिकित्सा विज्ञान सोलह की उम्र को मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण से अपरिपक्व मानता है. सोलह और अठारह में फासला ही कितना है. ‘निःशब्द’ के बहाने से ही सही, यहाँ यह कहना होगा कि अठारह वर्षीय युवती के लिए साठ वर्ष के पुरुष के मन में उमड़ा प्रेम उस कंगन की तरह होता है, जिसके सहारे वह पंचतंत्र के बूढ़े शेर की तरह अपने शिकार को फंसाने की कोशिश करता है. मीडिया और जूली को मटुक जी भी ‘निःशब्द’ के नायक की तरह अपने दाम्पत्य-जीवन को असफल बताते हैं. यहाँ उनसे यह पूछना दिलचस्प होगा कि जूलिगिरी उनकी आदत तो नहीं.

‘सठियाना’ एक फब्ती भर नहीं है. बढ़ती उम्र के लोगों की रक्त-नलिकाएं संकरी हो जाती हैं, इस कारन मस्तिष्क में रक्त-संचार कम हो जाता है. कभी-कभी मस्तिष्क में फैली रक्त-नलिकाओं में थक्का बन जाता है और मस्तिष्क के किसी ख़ास हिस्से को रक्त मिलना बंद हो जाता है. अगर यह दुर्घटना मस्तिष्क के ‘फ्रंटल लोब’ नामका हिस्से में घटित होती है, तो ग्रसित व्यक्ति वर्जनाहीन/अनैतिक व्यवहार कर सकता है. ‘जूलियों’ को ‘मटुकों’ से प्यार करने के पहले उनके मस्तिष्क का सीटी स्कैन कराकर देख लेना चाहिए कि ‘फ्रंटल लोब’ सिकुड़ तो नहीं रहा. सनद रहे की छाती में धडकने वाला दिल एक पम्पिंग सेट-भर है, वह दिल जो भावनाओं का केंद्र है, उसका निवास मस्तिष्क में ही होता है.

…साठ और अठारह का अंतराल सिर्फ उम्र का अंतराल नहीं होता, यह उर्जा, क्षमता और भविष्य का अंतराल भी होता है. टेस्टोस्टेरोन नामक पुरुष हार्मोन पच्चीस वर्ष में अपने शिखर पर होता है जबकि साठ वर्ष की उम्र में घाटी में घसीटता दीखता है. प्लैटोनिक प्रेम तो हार्मोन के मदद के बगैर भी शिखर पर पहुँच सकता है, मगर प्लैटोनिक फेज ख़त्म होने के बाद क्या- क्या होगा- यह भी सोचना चाहिए. अब आयें भविष्य पर.

अठारह की उम्र के भविष्य का अर्थ है सुबह के आठ आठ बजे और साठ का समय है शाम के पांच बजे. साठ वाला डूब जाएगा अठारह वाली के दिन कैसे कटेंगें! इसे भी सोचा जाना चाहिए!

vinay kumar

डॉ. विनय कुमार मनोवेद माइंड हॉस्पिटल, पटना में मनोचिकित्सक हैं.  हिंदी साहित्य से लेकर साहित्येत्तर सांस्कृतिक रुचियों तक को बहुत नजदीक से परखते हैं. नॉन फिक्शनल हिंदी की अकाल वेला में अद्भुत चमक के अधिकारी हैं. हाल ही आई पुस्तक ‘एक मनोचिकित्सक के नोट्स’ से खासे चर्चित. उनसे dr.vinaykr@gmail.com पर संपर्क संभव है. 

केजरीवाल की टोपी या किसान का साफा: चंदन श्रीवास्तव

By चंदन श्रीवास्तव 

अब से पहले इतना जिम्मेदार कहां था सवा अरब लोगों का यह लोकतंत्र? बीस सालों में तीन लाख तीस हजार किसानों के आत्महत्या कर लेने के बाद फिर से एक किसान ने आत्महत्या की है। गजेन्द्र की मौत आत्महत्या के आंकड़े में एक अंक का इजाफा भर होकर रह सकती थी। लेकिन नहीं, गजेन्द्र की आत्महत्या अनंत की और बढ़ती एक संख्या भर होकर नहीं रह सकी। उसकी आत्महत्या से एकाएक सबका जमीर जाग गया है!  सब अपनी भूमिका पूरी जिम्मेदारी से निभा रहे हैं।

By Katrina Miller

By Katrina Miller

विपक्ष जानता है कि सदन में अब सिर्फ सत्तापक्ष शेष बचा है। तो भी, सदन में इस बचे-खुचे विपक्ष को अपनी जिम्मेदारी याद आई। उसने समवेत स्वर में कहा- प्रश्नकाल स्थगित हो, किसान की आत्महत्या पर तुरंत चर्चा करवायी जाय। लेकिन अध्यक्ष का आसन नहीं डोला। दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र की संसद के अध्यक्ष ने भी संसदीय कार्यवाही की गरिमा निभायी। उसे लगा लोकतंत्र तो क्रियाविधि से चलता है, लोकतंत्र में प्रक्रियाओं का बड़ा ही महत्व है। सो, उसने प्रक्रियाओं के महत्व की रक्षा की, अपनी जिम्मेवारी निभायी।

प्रश्नकाल स्थगित नहीं हुआ तो सदन में रस्म के मुताबिक हल्ला उठा। सदन के रस्म की रक्षा हुई। रस्म के मुताबिक ही सदन बीस मिनट स्थगित रहा। रस्म के मुताबिक ही कुछ ने वाकआऊट किया, कुछ ने अध्यक्ष के आसन के समीप नारेबाजी की। अध्यक्ष शांत-धीर बैठा रहा जैसा कि उसे आसन की गरिमा का ख्याल करते हुए करना चाहिए था। अध्यक्ष ने अपने पद की गरिमा के अनुरुप कहा “किसानों की आत्महत्या का मामला गंभीर है, इसका राजनीतिकरण मत कीजिए। उसे लगा सदन में समूचा विपक्ष किसान की आत्महत्या की राजनीति कर रहा है। सदन में मौजूद सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी के नेता को लगा कि प्रश्नकाल तो स्थगित होना ही चाहिए क्योंकि किसानों की आत्महत्या का मुद्दा प्रश्नकाल से ज्यादा महत्वपूर्ण है। सदन फैसला नहीं कर सका कि लोकतंत्र में कौन सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण है? वह प्रश्नकाल ज्यादा महत्वपूर्ण है जिसमें प्रश्न पूछने और उत्तर देने की रस्म निभायी जाती है या किसान की आत्महत्या पर चर्चा ज्यादा महत्वपूर्ण है जिसमें रस्म के मुताबिक ही किसानों की आत्महत्या पर सामूहिक रुप से शोक-संताप-संवेदना व्यक्त की जाती है! यह स्वस्थ लोकतंत्र की पहचान है। स्वस्थ लोकतंत्र किसी भी प्रश्न पर तुरंत निर्णय नहीं देता, वह उत्तरों को स्थगित रखता है।

सदन के स्थगन के बाद कार्यवाही फिर शुरु हुई। इस बार सरकार ने अपनी सफाई दी। गृहमंत्री ने सर्टिफिकेट दिया कि पुलिस अपनी जिम्मेवारी का निर्वाह कर रही थी।गृहमंत्री ने कहा कि पुलिस मुस्तैद थी, किसान गजेन्द्र सिंह को आत्महत्या से बचाने के लिए दिल्ली “पुलिस लोगों को ताली बजाने से रोक रही थी क्योंकि लोग आम आदमी पार्टी की सभा में बात-बात पर ताली बजा रहे थे, शोर मचा रहे थे।” गृहमंत्री का जमीर जाग चुका था। गजेन्द्र की आत्महत्या के बाद उसे यह भी लगा कि देश में बीते सत्तर साल से कुछ ऐसा चल रहा है जो 60 करोड़ से ज्यादा लोगों के विरुद्ध है। उसने सदन से कहा कि ‘हम सबको एक साथ बैठकर सोचना चाहिए कि क्यों देश के साठ फीसदी लोग इस दशा में हैं कि उन्हें अब भी खाद्य-सुरक्षा की जरुरत पड़ती है। गृहमंत्री का यह कहना सरकार के जमीर के जागने का सूचक था। आखिर सरकार एक किसान की आत्महत्या के बाद सोचना चाहती थी कि इस देश के नौ करोड़ किसान परिवारों में से पचास फीसदी से ज्यादा परिवार क्योंकर इज्जत-आबरु के साथ दो जून की रोटी नहीं जुटा सकते ? सरकार ने जो सत्तर सालों में नहीं सोचा उसे अब सोचना चाह रही थी। वह लगातार सोचे जा रही थी, उसे खुद को नैतिक और वैध साबित करने के लिए लगातार सोचते चले जाने का आभास भर देना होता था। हां, सोचने की इस सतत साधना में बस कोई समाधान नहीं दिख रहा था।

सदन से बाहर भी सब अपनी जिम्मेवारियां निभा रहे थे। जैसे कि आम आदमी का नाम जपकर मुख्यमंत्री की गद्दी पर बैठा वह परम ईमानदार नौकरशाह जो अपनी साफ-सुथरी छवि पर इतना मुग्ध था कि अपनी टोपी पर भी अपनी ही फोटो लगाता था, खुद भी पहनता और किसी पवित्र कर्मकांड की तरह शेष सबको पहनाता था। इसी मुख्यमंत्री ने किसानों के हक में एक सभा की थी। इसी सभा में एक किसान गजेन्द्र ने जान दी थी। गजेन्द्र की जान जाने के बाद यह मुख्यमंत्री अपने मंत्रिमंडल समेत किसानों के हक के लिए मंच पर घंटों जमा रहा। भाषण देता रहा। उसे लगा भाषण देने से किसानों के हक की रक्षा होगी। अब उसे लग रहा है कि उससे गलती हुई, वह माफी मांग रहा है। इस मुख्यमंत्री ने देश के लोकतंत्र में बहुत बड़ा योगदान किया है। उसने भूल-गलती-माफी, धरना-प्रदर्शन आदि को एक अपशब्द में बदल डाला है। एक अपशब्द, जिसमें एक ही साथ दो काम सधते हैं। दूसरे के भरोसे को गाली देना संभव हो जाता है और गाली की जिम्मेवारी से जान छुड़ाना भी संभव हो जाता है। इस मुख्यमंत्री ने गजेन्द्र की जान की कीमत दस लाख लगायी है। यह एक जिम्मेदार मुख्यमंत्री की पहचान है। मुख्यमंत्री जानता है, गजेन्द्र जैसा छोटा-मोटा किसान सारी उम्र खेतों में खटनी करे तो भी खेती की लागत और कीमत के हिसाब से दस लाख नहीं कमा सकता। इस पार्टी का एक प्रवक्ता टेलीविजन पर पूरे देश के सामने रो रहा है। गजेन्द्र की मौत ने उसे भीतर तक झकझोरा है, वह लोगों को बताना चाह रहा है कि गजेन्द्र मौत जितनी सच्ची थी, उसके आंसू भी उतने ही सच्चे हैं। वह इस मौत की सच्चाई को मिटाने के लिए पूरी जिम्मेदारी के साथ अपनी आँख से सच्चे आंसू निकाल रहा है।

गृहमंत्री ने पुलिसिया जांच के और मुख्यमंत्री ने मैजिस्ट्रेटी जांच के आदेश दिए हैं। पुलिस जांच करेगी कि आत्महत्या के लिए गजेन्द्र को किसी ने उकसाया तो नहीं था। मैजिस्ट्रेट जांच करेगा कि गजेन्द्र को किसी ने सभा बिगाड़ने के ख्याल से पेड़ पर चढ़ाया तो नहीं था। टेलीविजन चीख रहा है, वह अपनी जिम्मेदारी निभा रहा है। उसका जोर यह बताने पर है कि गजेन्द्र पगड़ी बांधने में पारंगत था, उसकी रौबीली मूंछे भी थीं, वह मरने से ऐन पहले तक हताश कत्तई नहीं था। टेलीविजन बताना चाह रहा है कि वैसे तो इस देश में किसान आत्महत्या कर रहे हैं लेकिन गजेन्द्र वैसे किसानों में नहीं था जो आत्महत्या कर लें। टेलीविजन गजेन्द्र की मौत पर शोक मनाने से पहले यह सुनिश्चित कर लेना चाहता है कि दिल्ली के जंतर-मंतर पर आम आदमी की सभा में जो हुआ वह किसी किसान का आत्महत्या करना ही था।

देश का प्रधानमंत्री, राज्य का मुख्यमंत्री, मंत्रिमंडल और पार्टी प्रवक्ता, मीडिया और उसके दर्शक-पाठक सब सन्न और शोक-संतप्त हैं, अपनी भूमिका निभा रहे हैं। बस, एक किसान है जिसकी मौत इस सजग लोकतंत्र में थामे नहीं थम रही है। शायद, देश मान चुका है कि जैसे जन्म लेने वाले की मृत्य़ु ध्रुव है वैसे ही किसान का आत्महत्या करना भी अटल सत्य है।

चन्दन श्रीवास्तव

चन्दन श्रीवास्तव

चन्दन श्रीवास्तव,  मूलतया छपरा(बिहार) के निवासी, पिछले पंद्रह सालों से दिल्ली में। पहले आईआईएमसी और फिर जेएनयू में पढ़ाई। “उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध में हिन्दी लोकवृत्त का निर्माण” शीर्षक से पीएचडी के बाद दिल्ली के कॉलेजों में छिटपुट अध्यापन, फिर टीवी चैनल की नौकरी और अब विकासशील समाज अध्ययन पीठ (सीएसडीएस) की एक परियोजना इंक्लूसिव मीडिया फॉर चेंज से जुड़े हैं। इनसे  chandan@csds.in पर संपर्क संभव है। 

रजनी कोठारी और भारतीय लोकतंत्र: चंदन श्रीवास्तव

रजनी कोठारी : भारतीय लोकतंत्र का पहला पन्ना

By चंदन श्रीवास्तव

दिल्ली विश्वविद्यालय के कंधे पर किसी तिल की तरह चमकता एक संस्थान है विकासशील समाज अध्ययन पीठ यानि सीएसडीएस। यों अकादमिक संस्थानों के नाम और काम में इस देश का आम आदमी खास दिलचस्पी नहीं रखता, और उसे रखना भी क्यों चाहिए। आखिर, अकदामिक संस्थान कोई सरकार तो हैं नहीं कि उसकी जिंदगी के रोजमर्रे को निर्णायक ढंग से प्रभावित करते हों। लेकिन, सीएसडीएस इस मामले में एक अपवाद की तरह है। इस देश का आदमी चाहे और किसी बात में रुचि ना रखे लेकिन बात चुनावों की हो तो वह इसकी चर्चा चटखारे लेकर करता और सुनता है। और बेखटके कहा जा सकता है कि भारत में चलने वाली चुनावी-चर्चा को उसका मुहावरा या कह लें एक पारिभाषिक शब्दकोश देने का काम सीएसडीएस ने किया है।

Source: Illustrated by C R Sasikumar

Source: Illustrated by C R Sasikumar

पार्टियों की हार-जीत आंकड़ा कितनी सीटों तक पहुंचेगा , मतदान का प्रतिशत अगर घटा तो क्यों और बढ़ा तो क्यों, किसी पार्टी को मिले वोटों का प्रतिशत ज्यादा होने के बावजूद उसके सीटों की संख्या क्यों कम रह गई और पार्टियों के बदलते जातिगत-वर्गगत आधार ने वोटों के स्विंग का किसी चुनाव में कैसा खेल खेला- अगर हम चुनावों की चर्चा कुछ ऐसे ही मुहावरों में करते हैं तो इसलिए कि सीएसडीएस ने बीते पचास सालों से भारत में इलेक्शन स्टडी को ना सिर्फ विधागत रुप दिया है बल्कि उसे भारत की राजनीतिक सच्चाइयों को दिखाने वाले एक आईने के रुप में भी स्थापित किया है। आज अगर इलेक्शन स्टडी एक शास्त्र है और इस शास्त्र में अपना-अपना जोर दिखाने वाले खूब सारे ‘शास्त्री’ हैं तो इसलिए कि कभी सीएसडीएस में ही इस विधा का व्याकरण रचा गया था। तो आखिर किसने रचा था यह व्याकरण?

बात आज से तकरीबन पचपन साल पहले की है। तब 1928 में जन्मा का एक नौजवान, जो स्वतंत्रता संग्राम का हिस्सेदार था और रॉयल इंडियन नेवी विद्रोह (1946) में शिरकत करने के कारण अंग्रेजी-जेल की हवा खा चुका था, सत्ताईस-अट्ठाईस की उम्र में लंदन स्कूल ऑव इकॉनिमिक्स से अर्थशास्त्र की डिग्री लेकर भारत लौटा और एम एस यूनिवर्सिटी वडोदरा में शिक्षक नियुक्त हुआ। वह दौर शिक्षण संस्थानों से लेकर बहस-मुबाहिसे की सार्वजनिक दुनिया तक अर्थशास्त्र के ही दबदबे का दौर था। राजनीति में मान लिया गया था कि देश की सारी समस्याओं का समाधान सही आर्थिक-मॉडल अपनाने से हो सकता है और इसी के अनुरुप तत्कालीन राजनीति अपना भरोसा पंचवर्षीय योजनाओं पर जता रही थी, राष्ट्र-निर्माण के इस दौर में जोर साइंटिफिक टेम्परामेंट के अनुकूल हरकुछ को साईंस में तब्दील करने का था और विश्वविद्यालयों के समाज-विज्ञान के विभाग एडम स्मिथ, रिकार्डो और कार्ल मार्क्स के अर्थशास्त्रीय चश्मे से सारा कुछ देखने-समझने की कोशिश में लगे थे।

वडोदरा में रहते कांग्रेस की स्थानीय राजनीति को इस नौजवान ने गौर से देखा और उसे लगा कि विश्वविद्यालयों में जैसा राजनीति-विज्ञान पढ़ाया जा रहा है, उसके किसी भी सिद्धांत से ना तो इस देश में कांग्रेस के राजनीतिक वर्चस्व की व्याख्या हो सकती है और ना ही कांग्रेस के भीतर चलने वाली उस खींच-तान की जो उसे पार्टी से ज्यादा अलग-अलग हित-समूहों के लोकतांत्रिक संघर्ष का एक प्लेटफार्म बनाती हैं। अपने इस अनुभव को इस नौजवान ने एक लेख का रुप दिया और यह लेख छपा तब के इकॉनॉमिक वीकली( अब इसका नाम इकॉनॉमिक एंड पॉलिटिकल वीकली है) में। लेख का शीर्षक था- ‘फार्मस् एंड सब्सटांस ऑव इंडियन पॉलिटिक्स’ यानि भारतीय राजनीति का रुप और अंतर्वस्तु। यह लेख एक लेखमाला में तब्दील होकर पत्रिका के अगले पाँच अंकों तक जारी रहा और इस लेखमाला ने सनसनी मचायी। पंचायती राज, संसदीय व्यवस्था, प्रशासनिक राजनीति, दलीय-व्यवस्था ही नहीं भारतीय लोकतंत्र की दशा और दिशा जैसे शीर्षकों से सोचने वाले लोगों के लिए यह लेख-माला नए सिरे से प्रश्नों को तय करने और उत्तर तलाशने की जमीन साबित हुई। लेख ने तब के समाज-विज्ञानियों का ही नहीं जयप्रकाश नारायण और अशोक मेहता सरीखे राजनेताओं का भी ध्यान खींचा और भारत की राजनीति में दिलचस्पी रखने वाले पश्चिमी मुल्क के विद्वानों का भी। ऐसे ही एक अमेरिकी विद्वान रिचर्ड पार्क ने अपने एशिया फाऊंडेशन की तरफ से इस नौजवान को सत्तर हजार रुपये दिए यह कहकर कि अपना शोध जारी रखो। लेख साल 1961 में छपा था और अगले दो सालों में इस नौजवान ने रिचर्ड पार्क के दिए इन सत्तर हजार रुपयों को समाज-विज्ञान के क्षेत्र में शोध करने वाली श्रेष्ठ संस्था यानि सीएसडीएस के रुप में तब्दील कर दिया। इस नौजवान का नाम था रजनी कोठारी और सीएसडीएस सरीखी संस्था कायम करने वाले रजनी कोठारी की उम्र तब महज 33 साल की थी।

33 साल की उम्र में एक अकादमिक संस्था की नींव रखने का साहस रजनी कोठारी के भीतर किस आशय से जन्मा होगा ? यह बात सही है कि सेंटर का मुख्य सरोकार शुरुआती दिनों में आधुनिकीकरण की प्रक्रिया को समझने का रहा। यह बात भी सच है कि शुरुआती दिनों में कोठारी किसी उदारवादी की तरह पश्चिमी लोकतंत्र को बहुत अच्छा समझते थे लेकिन उस दौर में ही ये बात साफ हो गई थी कि सेंटर में कार्यरत समाज विज्ञानी आधुनिकीकरण की किसी बंधी-बंधायी परिभाषा से संतुष्ट नहीं है। वे लोग अपने लेखन में ‘विकास’, ‘राष्ट्र-निर्माण’ और ‘सामाजिक परिवर्तन’ जैसे पदों का प्रयोग करते थे लेकिन उनके जेहन में यह बात कौंध रही थी कि एक समाज-विज्ञानी के रुप में उनका काम अमेरिकी विहेवियरलिज्म को भारतीय संदर्भ में अनूदित करना मात्र नहीं है बल्कि भारतीय समाज की अपनी विशेषताओं को समझने के लिए अवधारणा और पद्धति के स्तर पर उचित औजार तलाशने जरुरी हैं। रजनी कोठारी के ही शब्दों में कहें तो – “आर्थिक मॉडल को केंद्रीय मान लेने के कारण उस वक्त ज्ञान के विविध अनुशासनों की सीमाएं धुंधली पड़ रही थीं। अर्थशास्त्र के बर्चस्व ने ज्ञान का एक पदानुक्रम रच दिया था और किसी सामाजिक परिघटना को समझने के लिए किए जाने वाले अनुसंधान के तरीकों पर भी उसका गहरा असर था। मिसाल के लिए, किसी समाज के अजेंडे, मुद्दे और सरोकारों को गढ़ने में राजनीति की भूमिका को दरकिनार करते हुए, सिर्फ तवज्जो आर्थिक गतिविधियों को दी जाती थी। ” और ठीक इसी कारण रजनी कोठारी को लगा कि “ज्ञान के मौजूदा तौर-तरीकों को आलोचना की नजर से देखना जरुरी है।”

रजनी कोठारी की अगुवाई में सीएसडीएस ने आधुनिक भारत को भारतीय पदों में समझना शुरु किया। बौद्धिक और सांस्कृतिक आत्मविश्वास से भरा रजनी कोठारी का माथा इस बात को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं था कि आधुनिकता भारत में यूरोप से लाकर रोपी गई कोई चीज है। रजनी कोठारी ने अपने बौद्धिक उपक्रम से आधुनिक भारत को परिभाषित करने वाली तत्कालीन पूर्व-सहमतियों का आधार ही बदल दिया। रजनी कोठारी से पहले भारतीय लोकतंत्र को यूरोपीय देशों में विकसित लोकतंत्र का असहज विस्तार मानने की प्रवृति थी। कुछ ऐसे भी थे जो इस धारणा की काट में यह कह रहे थे कि भारतीय लोकतंत्र एकदम ही अनूठी परिघटना है। इन दो प्रवृतियों से अलग रजनी कोठारी ने साबित किया कि भारतीय समाज का राजनीतिकरण समान रुप से उसके आधुनिकीकरण की परियोजना है। लोकतंत्र नाम की परिघटना हर देश की परिस्थिति के अनुरुप नया रुप लेती है, और उसके नए रुप की किसी और जगह के लोकतंत्र से तुलना तो की जा सकती है ताकि दोनों परस्पर एक-दूसरे के अनुभवों से समृद्ध हो सकें लेकिन यह नहीं कहा जा सकता कि दुनिया में हर जगह लोकतंत्र का स्वरुप एक जैसा होना चाहिए और जहां नहीं है, वहां का लोकतंत्र दोषपूर्ण है। इसी सिलसिले में रजनी कोठारी ने भारतीय राजनीति में जाति की भूमिका को एक नए सिरे से देखना सिखाया, उसे हित-समूह माना ना कि भारतीय लोकतंत्र के पिछडेपन की पहचान और पूरे विश्वासपूर्वक यह साबित किया कि भारतीय राजनीति में जाति-व्यवहार परंपरागत वर्ण-व्यवहार से अलग हितगत प्रतिस्पर्धा का व्यवहार है। इस दौर की उनकी प्रसिद्ध पुस्तकें पॉलिटिक्स इन इंडिया(1970) और कास्ट इन इंडियन पॉलिटिक्स(1973) हैं।

कोठारी की इस सोच ने बौद्धिक जगत में भारी उलट-फेर पैदा किया। वामधड़े के बुद्धिजीवी मानते थे कि सर्वे रिसर्च के नाम पर रजनी कोठारी अपना एक अलग ही अजेंडा बढ़ाने में लगे हैं और नये विचारों के विरोधी हैं। सेंटर चूंकि भारतीय राजनीति के अनुभवगम्य साक्ष्य जुटाने की कोशिश में अपने सर्वेक्षण करता था, सो मार्क्सवादी चिन्तकों में कुछेक को यह बात अटपटी लगती थी।उनकी विचार-योजना में ‘पार्टी’ भारत में क्रांति की अगुआ थी और इसलिए लोगों के विचार, सोच, राजनीतिक पसंद-नापसंद को जानने की खास जरुरत नहीं। दूसरे, कोठारी को यह भी लगता था कि 1960 के दशक में बहुत से मार्क्सवादी बुद्धिजीवी पश्चिम को राजनीतिक और बौद्धिक नवाचार की जन्मभूमि के रुप में देखते थे। तब के दौर में मार्क्सवादी खेमे के बुद्धिजीवियों की सोच में था कि पश्चिम में लोकतंत्र, उदारवाद या फिर मार्क्सवाद का जो अनुभव रहा है, भारत जैसे समाजों को ठीक वैसे ही अनुभवों की नकल करनी चाहिए ताकि एक भारतीय क्रांति की संभावना के बारे में सोचा जा सके। इसी के अनुकूल हाब्स, लॉक और मार्क्स पर राजनीतिक चिन्तन में जोर था। ऐसे बुद्धिजीवियों की सैद्धांतिक बहसों में चुनाव और उससे जुड़े सर्वे पर आधारित निष्कर्ष एकदम से मायने नहीं रखते थे।जबकि सर्वे का उद्देश्य भारतीय यथार्थ की जटिलता की व्याख्या करना था।शब्द के परंपरागत अर्थों में कोठारी राष्ट्रवादी कत्तई ना थे और ना ही पश्चिमी राजनीतिक चिन्तन से पूरी तरह संतुष्ट। वे भारत में राजनीति की भूमिका का अध्ययन करना चाहते थे। चूंकि उनपर विचारधारा का कोई दबाव नहीं था इसलिए वे पश्चिम की आँख से भारतीय राजनीतिक यथार्थ को देखने वाले बुद्धिजीवियों के तर्कदोष देख सके।

भारतीय लोकतंत्र की अपनी समझ को वे आगे और विस्तार दे पायें इसके पहले ही देश के मानस को झकझोर देने वाली घटना घटी। देश में आपात्काल लागू हुआ और रजनी कोठारी के भीतर का डेमोक्रेट एकबारगी स्तब्ध रह गया। उन्होंने अपनी स्थापनाओं पर पुनर्विचार का साहस दिखाया और ‘स्टेट अगेन्स्ट डेमोक्रेसी’ लिखकर भारतीय राजसत्ता के लोकतंत्र-रोधी तत्वों की एक तरह से समीक्षा प्रस्तुत की। गैर-दलीय जिस राजनीति को आज हम जन-आंदोलन और नागरिक संगठनों की राजनीतिक सक्रियता के नाम से जानते हैं उस राजनीति का व्याकरण रजनी कोठारी ने ही तैयार किया। 1970 के दशक में सेंटर राजसत्ता के विरोध की पुरजोर आवाज बनकर उभरा। राजनेता, जन-आंदोलनों से जुड़े लोग, पत्रकार, वकील, बुद्धिजीवी तथा विभिन्न राजनीतिक विचारधाराओं से जुड़े लोग इंदिरा गांधी की ‘इमर्जेंसी’ के विरोध में एकजुट हुए। सेंटर ने इन लोगों को एक प्लेटफार्म प्रदान किया और लोकतंत्र पर जारी बहस का नये सिरे से बौद्धिक दिशा-निर्देशन किया। ‘सेंटर’ ने अब तक अपने को इलेक्शन स्टडी तक ही सीमित रखा था लेकिन अब सेंटर ने चुनाव प्रक्रिया को जमीन पर चलने वाली विचार-प्रक्रियाओं से जोड़कर देखना शुरु किया। कार्यकर्ता और बुद्धिजीवियों के आपसी संवाद का परिणाम ‘लोकायन’ के रुप में सामने आया। मुबाहिसे के मंच के रुप में ‘लोकायन’ देश में सक्रिय नागरिक-सगठनों की नर्सरी साबित हुआ। आज जिन्हें हम सक्रिय सामाजिक कार्यकर्ता के रुप में पहचानते हैं जैसे मेधा पाटकर और वंदना शिवा, वे सब कभी लोकायन के सक्रिय सदस्य थे और वहीं उन्हें अपनी वैकल्पिक राजनीति के बुनियादी मुहावरे मिले।

संक्षेप में कहें तो रजनी कोठारी ज्ञान और कर्म के बीच की दूरी पाटने वाले उन विरली प्रतिभाओं में से एक थे जिनके लिए अंतिम जन का अधिकार लोकतंत्र की परीक्षा की अंतिम कसौटी है और जो स्वयं इस कसौटी पर खड़ा उतरने के लिए सीधी राजनीतिक भागीदारी करने से कभी गुरेज नहीं करते। खुद उन्हीं के शब्दों में- “ विचारों का जगत और राजनीति का जगत आपसे में संबद्ध हैं और एक-दूसरे पर असर डालते हैं। मौजूदा सामाजिक-राजनीतिक व्यवस्था की समीक्षा करने और उसकी समझ बनाने के लिए बुद्धिजीवियों को चाहिए कि वे राजनीतिक प्रक्रियाओं के महत्व को समझें। साथ ही राजनीति के क्षेत्र में जो लोग सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं उन्हें भी विचारों का महत्व समझना चाहिए। मुखामुखम की इस प्रक्रिया में मेरा विश्वास है कि हाब्स, लॉक, मिल और मार्क्स जैसे महान चिन्तकों के राजनीतिक विचार ही प्रासंगिक नहीं होते बल्कि विचारधारा का सवाल भी एक महत्वपूर्ण संदर्भ-बिन्दु बनकर उठ खड़ा होता है। बहरहाल मेरे विचार से बुद्धिजीवियों का काम महज विभिन्न स्तरों पर राजनीति द्वारा निभायी जा रही निर्णायक भूमिका का अध्ययन करना भर नहीं होता बल्कि उन्हें मौजूदा राजनीति की आलोचना भी विकसित करनी पड़ती है। मेरा यह भी कहना है कि बुद्धिजीवी को बहस में अपने आलोचनात्मक विचारों के जरिए योगदान देते हुए राजनीतिक प्रक्रिया में हस्तक्षेप करना चाहिए। मेरा यह भी विश्वास है कि हमारी सोच में आत्मसमीक्षा और आलोचना का स्थान होना चाहिए। यदि हम आलोचना का स्पेस बंद करते हैं तो राजनीतिक प्रक्रिया और विचार का अंतराल बढ़ता जाएगा। यह एक बुद्धिजीवी के रुप में हमारी भूमिका को सीमित करेगा। ”

भारतीय लोकतंत्र की समझ और शक्ति को अपने विचार और काम से कोसो आगे ले जाने वाले रजनी कोठारी एक समय से उम्र के हाथो मजबूर थे। उनकी बनायी संस्था जब अपने नये अवतार में स्वर्ण-जयंती वर्ष मना रही थी तो लोगों ने उन्हें व्हील-चेयर पर चलते देखा था, भीड़ में एकदम ही अकेला। बरसो बीमार रहने के कारण आवाज इतनी मद्धम हो गई थी कि बात करना हो तो अपने कान उनके चेहरे के पास ले जाना पड़ता था। कभी आने-जाने वाले की भीड़ से भरा रहने वाला उनका दिल्ली वाला मकान लगातार सूना रहने लगा था। वे एक केयरटेकर के भरोसे थे। केयरटेकर खूब देखभाल करता था लेकिन यह भी सच है कि उसे कहीं बाहर जाना हो तो वह सुरक्षा के लिहाज से घर का दरवाजा बाहर से बंद करके जाता था और व्हीलचेयर पर बैठे रजनी कोठारी अपनी शांत-मुद्रा में उसके आने का इंतजार करते रहते थे। बाहर देश में लोकतंत्र का संघर्ष जल-जंगल-जमीन के आंदोलन के रुप में सतत जारी था लेकिन इस संघर्ष को सबसे पहले और सबसे गहरे अर्थों में समझने वाला उम्र के हाथो बेबस अपने कमरे में अकेला अब चुप बैठा रहता था।

ज्ञान को कर्म से जोड़ने वाला भारतीय राजनीति का यह सितारा आज नहीं है तो भी आंदोलनों से जन्मी एक नई-नई पार्टी उसके विचार-सरणि में नये शब्द भरकर दिल्ली विधान सभा का चुनाव लड़ा और जीता है। कौन जानता है, शायद यही रजनी कोठारी की आखिरी इच्छा हो।

चन्दन श्रीवास्तव

चन्दन श्रीवास्तव

चन्दन श्रीवास्तव,  मूलतया छपरा(बिहार) के निवासी, पिछले पंद्रह सालों से दिल्ली में। पहले आईआईएमसी और फिर जेएनयू में पढ़ाई। “उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध में हिन्दी लोकवृत्त का निर्माण” शीर्षक से पीएचडी के बाद दिल्ली के कॉलेजों में छिटपुट अध्यापन, फिर टीवी चैनल की नौकरी और अब विकासशील समाज अध्ययन पीठ (सीएसडीएस) की एक परियोजना इंक्लूसिव मीडिया फॉर चेंज से जुड़े हैं। इनसे  chandan@csds.in पर संपर्क संभव है। 

साभार- हंस (मार्च, २०१५ अंक)

चॉकलेटी समय में एक गुलमिर्च: चंदन श्रीवास्तव

दो दिन पहले ही किसी एक अनाम/रहस्मय कथाकार का एक पोस्ट लगाया था- एक मिट्टी दो पौधे: मेघना राव उर्फ गोदावरियम्मा और अमेरिका यादव. इस कथा-अंश को प्राप्त करने की प्रक्रिया के बारे में भी आपको अवगत कराया था. हिंदी का औसत बौद्धिक-समाज (क्रांतिकारी/गैर क्रांतिकारी तमाम) एक अवसरवादी समाज है ,  हमारी इस मान्यता को चन्दन श्रीवास्तव ने ध्वस्त किया है.  उन्होंने बिना इस बात की परवाह किये कि यह रचना किसकी है, किसकी हो सकती , एक बेवाक टिपण्णी भेजी है. हिंदी समाज अब कयास भी लगाने को तैयार नहीं है, उसे किसी का नाम चाहिए ताकि हमारा एक-एक शब्द-वाणी बिना सटीक निशाने के जाया न हो, बिना चापलूसी के तर हुए वापस न आये. हमारा मानना है कि चंदन श्रीवास्तव हिंदी बौद्धिक-वृत्त के उन कुछ चुनिंदा लोगों में से हैं, जिन्होंने अवसरवादी/चेला-चुहुलवादी चकल्लसों के विपरीत अपनी एक नियति तय की है. उनकी आंखें सही अर्थों में पुस्तक पगी हैं,  पुस्तकों से आँखों के पगने का मतलब धूर्त, यारबाजी से तरबतर बौद्धिक ऐय्यारियाँ नहीं होती हैं. चन्दन श्रीवास्तव का लेखन और व्यवहार अक्सर इसे साबित करता है. तिरछीस्पेल्लिंग उनके इस स्टैंड और बौद्धिक त्वरा को लेकर अक्सर आभारी रहेगा. 

ब्रूनो द्यूमों निर्देशित एक धारावाहिक का दृश्य

ब्रूनो द्यूमों निर्देशित एक धारावाहिक का दृश्य

By चंदन श्रीवास्तव 

हिन्दी में साहित्य के स्पेस को पत्रकारिता ने हथिया लिया है। पत्रकारों को कहा जाता है, ऐसी भाषा लिखो कि उसे चबाना नहीं पड़े, मुंह में पड़े और घुल जाये। साहित्यकार से कहा जाता है- पत्रकारों वाली भाषा लिखो क्योंकि पत्रकारिता बढ़ रही है, उस सरीखी भाषा लिखने से साहित्य भी बढ़ेगा, फले-फूलेगा। कुल मिलाकर साहित्य और पत्रकारिता नाम के भाषाई उपक्रम के लिए जोर मुंह में जाते ही घुल जाने वाली भाषा पर होता है..गोया भाषा ना हुई, चॉकलेट हुई!

साहित्य की भाषा पर पड़ते इस दबाव ने साहित्य से विचारशीलता को खत्म किया है.. चॉकलेट तैयार करने की कला खूब परवान चढ़ रही है..ब्लॉग और फेसबुक सरीखे मर्तबान आ गये हैं, चॉकलेट वहां रोज धरे और सजाये जा रहे हैं..इंटरनेट गजब का कारखाना है, चॉकलेट-कर्म में इसने कमाल का इजाफा किया है..

‘तिरछी’ पर लगा यह पोस्ट चॉकलेट चुभलाने की अभ्यस्त होती जा रही हिन्दी की जीभ पर गुलमिर्च रखती है..यह हिन्दी साहित्य के भीतर विचारशीलता की वापसी का उपक्रम है और मजा देखिए कि लेखक ने यह किया है पत्रकारिता(जिन्हें इस शब्द से परहेज है वे यहां मीडिया पढें) की भाषा में ही। सहारा लिया है ईमेल का और सजाया है उसे ब्लॉग के मर्तबान में ही..लेकिन घर में घुसकर, घरऊ बनकर पूरे घर को बदलने की कोशिश है यह…

पहली ही पंक्ति देखिए– “र्स्टेशन शहर के पिछवाड़े है जहां टैक्सी, आटो और रिक्शा स्टैंड है, गांव की तरफ एक छोटा सा बाजार है जहां मिठाई के मर्तबानों, यहां तक की तीखी पकौड़ियों और लोगों के सिरों तक पर गहरे कत्थई हड्डे मंडराते रहते हैं, उन्हें देखते हुए लगता है जैसे भुने हुए चने के दानों को पंख लग गए हों.”

फिलहाल इस एक वाक्य पर सोचें. पोस्ट किए गए कथा-अंश की बनावट में यह वाक्य क्यों महत्वपूर्ण है, इसपर यहां नहीं लिखकर फिलहाल इतना ही सोचना ठीक होगा कि यह एक वाक्य वाक्य चॉकलेटी वृतांतों के विरुद्ध कैसे विचारशीलता को खड़ा करता है, आत्ममुग्ध होने पर विवश करते मीडियाई उपकरणों के बरक्स कैसे आत्म के संघटन का प्रयत्न करता है..

यह वाक्य कुछ-कुछ वैसा ही जैसे कोई कैमरा लेकर चले और पूर्वापर क्रम से ठौर-ठिकानों का भूगोल दिखाये—- शहर..शहर के पिछवाड़े स्टेशन..टैक्सी ऑटो और रिक्शा-स्टैंड… फिर छोटा सा बाजार और बाजार के पार गांव..गांव के संकेत के रुप में बाजार का ठहराव एक दुकान पर..दुकान में मिठाई के मर्तबान..और फिर यहां रंगों का संयोजन— कत्थई हड्डा–भुने हुए चने के दानों को जैसे पंख लगे हों.. और हड्डे का अर्थ विस्तार कुछ ऐसे— ‘तीखी पकौड़ियों पर ही नहीं बल्कि लोगों के सर तक पर मंडराते हैं…’

सिर पर मंडराना एक मुहावरा है- आसन्न खतरे की सूचना..कायदे से हड्डे को मिठाई पर मंडराना था..वह तीखी पकौड़ियों पर ही नहीं बल्कि लोगों के सर पर भी मंडरा रहा है..उसकी शक्ल कैसी है? ऐसी कि जैसे भुने हुए चने को पंख लग गये हैं..एक बार फिर से मुहावरा..(गौर यह भी करें कि मुहावरे झमाके से नहीं, आहिस्ते से आ रहे हैं, बिना किसी पूर्व सूचना के और ऐसा खास मकसद से हो रहा है, लेकिन इस पर अभी नहीं..).

क्या यहां खड़ा हुआ यह पूरा चित्र गांव में समाती जा रही भूख की सूचना है, ग्रामवासिनी भारतमाता की संतानों के क्षुधातुर होते जाने की सूचना..? क्या यह पूरा चित्र इस बात की पेशबन्दी है कि भूख(विपन्नता) से बिलबिलाकर कुछ विप्लवी निकलेंगे(कथा में आया पीलिया का मारा छात्र अमेरिका यादव)?..क्या यह चित्र इस बात की सूचना है कि “रूरल मार्केट को विजिट कर लोगों को कंपनी के उत्पादों से परिचित” कराने का उद्देश्य पूरा करने के लिए “कम्पेन टीम के लड़के रेकी” करके लौट चुके हैं और दरअसल रेकी वाले लड़के और उनसे लगा-बंधा पूरा इंतजाम(प्रबंधन) ही वह हड्डा है जो पूरे रुरल को मार्केट बनाकर उसपर मंडरा रहा है? या, फिर यह चित्र कथा में आगे आने वाले एक और चित्र की सूचना है..इस बात की सूचना कि इदरीस की दुकान पर मेघना राव नाम की एक मिठाई बैठेगी..सौन्दर्य लोलुप पुरुषों का वहां नागिन डांस होगा..मेघना राव नाम की मिठाई पर अमेरिका यादव नाम का हड्डा मंडराएगा, हड्डे के डंक के रुप में एक गोली चलेगी ?

कैमरे से फिल्माने चलेंगे तो परस्पर संबद्ध ये बातें उसकी पकड़ से बाहर निकल जायेंगी..वह एक चित्र-परिवेश खड़ा करके इतनी बातों को बांध नहीं सकता..कुछ चीजों को सिर्फ कलम पकड़ सकती है। मतलब, पहला काम तो लेखक ने छपे हुए शब्द की स्वायत्तता के कोण से किया। चलंत-चित्र की भाषा के दबदबे के आगे झुका नहीं, छवियां बनायी जरुर मगर उतनी और वैसी ही जितनी और जैसे से वह अपना मनचीता अर्थ-आग्रह खड़ा कर सके.

छवि छुपाती है। एक ऐसे दौर में जब सारा कुछ HD फार्मेट में देखा जा रहा..जिस दौर की सबसे बड़ी समस्या चेहरे के पिम्पल्स हैं, जहां जोर ‘स्कॉर’ छुपाने और अपने भीतर के ‘स्टार’ को दिखाने पर है..(एक विज्ञापन में लड़की कहती है, प्लीज मेरे पिक्स अपलोड मत करना, लड़की हाई डिफिनिशन और मेगापिक्सल की ताकत जानती है) .. जब सबकुछ माइक्रोस्कोपिक डेप्थ और टेलिस्कोपिक लेंग्थ में दिखाया जा रहा है ताकि आपकी आंखों से छुपाने के लिए कुछ भी ना रहे( एक विज्ञापन की लाइन है—‘जब छुपाने के लिए कुछ भी नहीं’) , तब भी बहुत कुछ छुपा हुआ है, छुपाया जा रहा है और यह छुपाना अपने आप में आपराधिक है—- दूसरा काम लेखक ने यह खोजने- दिखाने का किया है। जो चीजें इतनी ज्यादा नजर आती हैं कि फिर उनके भीतर का चौंकाऊपन चूक जाता है और ठीक इसी कारण कारण दृश्य बनने की उनके भीतर योग्यता तक नहीं रह जाती, लेखक ने ऐसी चीजों को दृश्यमान किया है, उन्हें चौंकाऊ बनाया है, कह लें जिसे मुर्दा मान लिया गया था उसे जिन्दा किया है। ऐसी चीजों पर छपे निशानों को खोजा है लेखक ने।

यह काम कथा के पहले वाक्य से शुरु हो जाता है.और लगातार चलता है.(इसकी एक चुभती हुई मिसाल है वह पंक्ति जो ‘मिस नार्थ ऑफ फन रिपब्लिक’ प्रतियोगिता के बारे में एक पात्र के जबान से फिसलती है– “गलत है, सरे नौ से गलत भाईजान, इतनी दूर से ककड़ी की बतिया जैसी लड़कियों के रोएं दिखाई दे रहे हैं, वे ठीक से जवान नहीं हो पाई हैं, जरूर उनके वालिदैन ने उमर का गलत सर्टिफिकेट दिया होगा.”)

चीजों को गौर से देखिए, उसपर सिर्फ अपने समय की ही छाप नहीं होती बल्कि अपने समय के छाप के विरोध में भी एक छाप होती है. चीजें अपने स्वभाव के विरुद्ध होने से इनकार करती हैं. शायद यह बताने की कथा-युक्ति है यह।

लेकिन अभी इतना ही… क्योंकि शायद यह कथा किसी भावी उपन्यास का अंशमात्र है

(पुनश्च—सरसरी निगाह से पढ़ा तो भी यह अटका कि कुछ वाक्य विचार का बोझ नहीं संभाल पाये हैं, सो विचार-भार से उनका व्याकरण लचक रहा है. कहीं-कहीं अगले वाक्य में जाने की हड़बड़ी है. इस फेर में अर्थ का संघनन बाधित हो रहा है. मैं मानकर चल रहा हूं, कथाकार कथा कहने का उस्ताद है और पत्रकारिता के अदब में खूब गहरे पगा हुआ, सो, वह अपने इदरीस भाई की कैंची लेकर जरुरी कतर ब्यौंत करके फाइनल प्रिन्ट मंजर-ए-आम करेगा. रफ कट देखकर फिलहाल के चलन के हिसाब से यह फिल्मी गाना याद आ रहा– जब रात है ऐसी मतवाली तो सुब्ह का आलम क्या होगा)

चन्दन श्रीवास्तव

चन्दन श्रीवास्तव

चन्दन श्रीवास्तव,  मूलतया छपरा(बिहार) के निवासी, पिछले पंद्रह सालों से दिल्ली में। पहले आईआईएमसी और फिर जेएनयू में पढ़ाई। “उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध में हिन्दी लोकवृत्त का निर्माण” शीर्षक से पीएचडी के बाद दिल्ली के कॉलेजों में छिटपुट अध्यापन, फिर टीवी चैनल की नौकरी और अब विकासशील समाज अध्ययन पीठ(सीएसडीएस) की एक परियोजना इंक्लूसिव मीडिया फॉर चेंज से जुड़े हैं। इनसे  chandan@csds.in पर संपर्क संभव है। 

खुशवंत सिंह- अब मैं नाच्यो बहुत गोपाल : चंदन श्रीवास्‍तव

उम्र के एक कम सौ साल पूरा करके दुनिया से रुख्सत होने वाले खुशवंत सिंह ने महज दो साल पहले फैसला किया कि अब नहीं लिखूंगा..बावजूद इसके उनका लिखना-छपना जारी रहा. यह वही अंदाज था जिसे तौबा मेरी जाम-शिकन, जाम मेरी तौबा-शिकन कहकर याद किया जाता है.  खुशवंत का पत्रकारीय लेखन और बड़े हद तक जिंदगी को लेकर उनका फलसफा भी इसी अंदाज का परिचय देता है। यहां हम श्रद्धांजलि स्वरुप दैनिक भास्कर में  पूर्व-प्रकाशित चंदन श्रीवास्‍तव  का यह आलेख दे रहे हैं जिसमें खुशवंत के लेखनि को याद किया गया था..)singh in a bulb

गो हाथ को जुंबिश नहीं आंखों में तो दम है

By चंदन श्रीवास्‍तव 

अख़बार के पन्नों पर लगातार सत्तर सालों तक चलने वाली कलम एक दिन अपनी उम्र का हिसाब जोड़े और “अब मैं नाच्यो बहुत गोपाल” के से वैरागी-भाव से कह दे कि ‘बहुत हुआ..अब और नहीं..कि मेरा समय यहीं समाप्त होता है’.. तो सहसा यकीन करना मुश्किल हो जाता है। इस हफ्ते(अक्तूबर 2011) एक अंग्रेजी पत्रिका ने लिखा है कि सरदार खुशवंत सिंह का बहुचर्चित स्तंभ अब अखबारों में नहीं दिखाई देगा। पत्रिका ने खुशवंत सिंह को यह कहते हुए उद्धृत किया है- “मैं 97 साल का हूं..अब किसी भी दिन मौत आ सकती है..। ” लेकिन अदा देखिए कि अपने लेखन में खुद को हमेशा “ एक शरारती बुजुर्ग ” के रुप में दिखाने के लिए सजग रहने वाले खुशवंत सिंह ने जब कलम हमेशा के लिए रख देने की घोषणा की है तब भी शायद ही कोई कह सके कि वैराग्य की इस वेला में उनका बांकपन चला गया। अगर बांकपन चला गया होता तो खुशवंत सिंह यह ना कहते कि लेखनि को विराम देने के बाद मुझे बहुत याद आयेंगे वे रुपये जो मिला करते थे और “वे लोग जो अपने बारे में लिखवाने के लिए मेरी चापलूसी किया करते थे ”।

कहां ढ़लती उम्र और मौत की अनसुनी आहट को भांपने की कोशिशों के बीच यह बोध कि अब लिखा ना जा सकेगा और कहां इस वैरागी-बोध के बीच रह-रह कर कोंचने वाली यह दुनियावी याद कि बहुत याद आयेंगे शब्द संवारने के मेहनताने के रुप में मिले रुपये और वह चापलूसी जो लोग अपने बारे में लिखवाने के लिए किया करते थे। पावनता के बीच किसी क्षुद्रता की यह छौंक या कह लें एक खास किस्म का बांकपन ही खुशवंत सिंह के पत्रकारीय शब्द-संसार की जान है। इसलिए, स्तंभ ना लिखने के उनके फैसले को पढ़कर कोई बहुत कोशिश करे तो भी उनके बारे में भर्तृहरि की वह पंक्ति ना याद करना चाहेगा जिसमें अफसोसनाक मंजूरी के स्वर में कहा गया है कि कालो ना याति वयमेव याता..समय नहीं बीतता हम ही बीत जाते हैं, तृष्णा जीर्ण नहीं होती हम ही जीर्ण-शीर्ण हो जाते हैं। हां, नियमित स्तंभलेखन से विदा लेते खुशवंत सिंह के बयान को पढ़कर भारतीय साहित्य के एक सर्वमान्य “शरारती” बुजुर्ग गालिब जरुर याद आयेंगे जो कह गए कि- “गो हाथ को जुम्बिश नहीं, आंखों में तो दम है,रहने दो अभी सागरो-मीना मेरे आगे।”

छोड़ दें खुशवंत सिंह के साहित्यकार, इतिहासकार और अनुवादक के रुप को और अपने को केंद्रित करें सिर्फ उनके पत्रकारीय कर्म पर तो इस भारतीय पत्रकारिता के इस बुजुर्ग के बारे में नजर आएगा कि उसकी “ शरारत ”  सिर्फ हंगामा खड़ा करने के मकसद से नहीं थी, बल्कि उसमें कोशिश हमेशा व्यवस्था खामियों से असंतुष्ट की तरह यही रहती थी कि “ यह सूरत बदलनी चाहिए ।” लेकिन उनकी शैली किसी मिशनरी पत्रकार की शैली नहीं थी जो इस या उस विचारधारा के चश्मे से सामने पड़े तथ्यों को देखता और सच्चाई के अपने मनचीते रुपाकार में फिट करता है। गैर-पत्रकारीय प्रतिबद्धताओं के साथ खुशवंत सिंह की कलम ने समझौता नहीं किया। उन्होंने बड़े-बड़ों को अपने कॉलम में उनकी क्षुद्रताओं के लिए कोसा लेकिन कुछ इस तरह की वह “गुदगुदी” और “चिकोटी” और “गप्प”जान पड़े। उन्होंने अपने से छोटों को कुछ बड़ा करने का उकसावा दिया लेकिनप्रेरणादायी प्रवचन की शैली उस शैली में नहीं जिससे उनका गुरुडम झांकता हो बल्कि कुछ इस तरह की सीख लेने वाले को लगे कि अरे यह तो मैं पहले से ही जान रहा था। खुशवंत सिंह ऐसा कर पाये क्योंकि वे पत्रकार को ना तो समाज-सुधारक की भूमिका में देखने के हामी रहे ना ही इस या उस राजनीतिक पंथ के भक्त या गुरु के रुप में देखने के पैरोकार। पत्रकारीय कर्म की अपनी स्वयात्तता होती है, घनघोर प्रतिबद्धताओं से उपजा लेखन पक्षपाती और इसी कारण मुद्दे की समग्रता को किसी हड़बड़ाई हुए एकहरेपन में समेटने वाला लेखन भी होता है- खुशवंत सिंह अपने स्तंभ में हमेशा याद दिलाते रहे।

अपने पत्रकारीय कर्म की स्वायत्तता की रक्षा में ही उन्होंने “ गप्प, गुदगुदी और शरारत ” वाली शैली विकसित की। राजनीतिक प्रतिबद्धताओं की दुहाइयों से पटे पड़े पत्रकारीय संसार में अकसर यह बात भुला दी जाती है कि बतरस किसी चीज का साधन नहीं, बल्कि स्वयं में एक साध्य हो सकता है। और, शब्दशिल्पी जानते हैं कि बतरस उस दिन से साध्य रहा है जिस दिन किसी गोपी ने कृष्ण की मुरली खास बतरस के ही लालच में छुपा दी थी- “बतरस लालच लाल की मुरली दई लुकाय”। शब्द कोई पत्थर नहीं कि उसे निशाना ताक कर किसी पर मारा जाय और कलम आखिर तक कलम ही रहती है उसे तोप या तलवार के मुकाबिल समझने के दिन मसीहाओं के साथ लद गए– खुशवंत सिंह के भीतर का शब्द-शिल्पी इस सहज स्वीकार के साथ अपनी कलम उठाता था। उनसे संबंधित हाल की दो घटनाओं के जिक्र से यह बात स्पष्ट हो जाएगी।

ज्यादा दिन नहीं हुए जो नीरा राडिया टेप-कांड में बरखा दत्त का जिक्र कारपोरेटी महात्वकांक्षाओं से ऊपजी पत्रकारिता की मलिनताओं की मिसाल के रुप में सामने आया। टेप के सार्वजनिक हो जाने के बाद आम राय यह बनी कि महत्वपूर्ण पद पर बैठे पत्रकार पत्रकारिता से एतर भी सत्ता-समीकरणों पर गोट इधर से उधर करने का काम करते हैं। पत्रकारिता की मलिनताओं के इस शोर के बीच यह खुशवंत सिंह का सजग विवेक था जिसने याद दिलाया कि यह कहानी प्रहसन से ज्यादा कुछ नहीं है क्योंकि टेप में “ एक अग्रणी चैनल के एंकर को एक महत्वाकांक्षी राजनेता के लिए सिफारिश करने को कहा जा रहा है। यह कहानी पूरी तरह से प्रहसन जान पड़ती है क्योंकि (राजसत्ता के लिए) पत्रकार की सिफारिश कोई मायने नहीं रखती।”  दूसरी घटना बरखा दत्त और राजदीप सरदेसाई की कार्यक्रमों की प्रशंसा से जुड़ी है। इसी साल मई महीने में उन्होंने हिन्दुस्तान टाइम्स में अपने स्तंभ में लिखा कि “ बरखा और राजदीप सरदेसाई अपने कार्यक्रम में आमंत्रित अतिथियों से सही सवाल पूछने के लिए भरपूर होमवर्क करते हैं। यह भी ध्यान रखते हैं कि कार्यक्रम में परस्पर विरोधी राय रखने वाले महत्वपूर्ण व्यक्ति शामिल हों ताकि दर्शक को निजी राय बनाने से पहले विभिन्न विचारों की जानकारी हो जाय।”  कोई चाहे तो इन पंक्तियों में पत्रकारिता के गुणों को लक्ष्य कर सकता है जिसके बूते वह बाकी विधाओं से अलग और स्वायत्त है।

किसी को खुशवंत सिंह के लेखन से असहमति हो सकती है, लेकिन अपने सत्तर साल के पत्रकारीय कर्म में उन्होंने पत्रकारिता के जिन विधानों (जानकारी, शिक्षा और मनोरंजन को एकरुप बनाना) का पालन किया उससे असहमत होना मुश्किल है।  हालांकि साल 1969 से इलेस्ट्रेटेड वीकली ऑव इंडिया से शुरु होने वाला उनका नियमित स्तंभ 40 सालों के अपने सफर में दर्जनों पत्रों की यात्रा करने के बाद अब मौन हो गया है लेकिन इस कॉलम ने उन्हें जो हैसियत बख्शी है वह किसी पत्रकार के लिए लंबे समय तक दुर्लभ रहेगी। पत्रकार खुशवंत सिंह की हैसियत की ही मिसाल है कि आज जब उन्होंने अपनी कलम रख दी है तो भी गुजरी 19 तारीख(अक्तूबर 2011) को द हिन्दू ने उनकी चिट्ठी को अपने लिए एक प्रमाणपत्र मानकर बॉक्स-आयटम में छापा है। कारण, इस चिट्ठी में खुशवंत सिंह वह लिखा है जो किसी भी अखबार के लिए एक मुंहमांगी मुराद की तरह है। उन्होंने द हिन्दू के लिए लिखा है-  संपादक महोदय, आप और आपके कर्मचारीगण देश को दुनिया का सबसे पठनीय अख़बार देने के लिए बधाई के पात्र हैं। ”

चन्दन श्रीवास्तव

चन्दन श्रीवास्तव

चन्दन श्रीवास्तव,  मूलतया छपरा(बिहार) के निवासी, पिछले पंद्रह सालों से दिल्ली में। पहले आईआईएमसी और फिर जेएनयू में पढ़ाई। “उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध में हिन्दी लोकवृत्त का निर्माण” शीर्षक से पीएचडी के बाद दिल्ली के कॉलेजों में छिटपुट अध्यापन, फिर टीवी चैनल की नौकरी और अब विकासशील समाज अध्ययन पीठ(सीएसडीएस) की एक परियोजना इंक्लूसिव मीडिया फॉर चेंज से जुड़े हैं। इनसे  chandan@csds.in पर संपर्क संभव है। 

हिन्दी सिनेमा की भाषा- एक के भीतर अनेक: चन्दन श्रीवास्तव

By चन्दन श्रीवास्तव 

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हंस फरवरी-2013- हिन्दी सिनेमा के सौ साल

मौका हिन्दी-दिवस का था, चूंकि हिन्दी-दिवस पर दस्तूर ‘हिन्दी-हित-चिन्ता’ का है सो एक मशहूर दैनिक(हिन्दुस्तान) ने अपने वेबपेज पर‘हिन्दी फिल्में, कितनी हिन्दी’ शीर्षक से एक पोस्ट लगायी। जैसा कि शीर्षक से ही जाहिर है, अख़बार ने इस पोस्ट में बड़े संताप के स्वर में जानना चाहा कि हिन्दी फिल्म इंडस्ट्री में ‘हिन्दी से भरपूर नाम-दाम कमाने वाले अपने कामकाज और जीवन में हिन्दी को कितना सम्मान देते हैं, कितना अपनाते हैं ? ”

अख़बार की इस ‘हिन्दी-चिन्ता’ में जावेद अख्तर यह कहते हुए शामिल हुए कि “ इधर हमारी फिल्म इंडस्ट्री में अंग्रेजी का बोलबाला है।..ज्यादातर हिंदी फिल्मों में स्क्रिप्ट की जो हालत हो रही है, उससे मैं बहुत दुखी हूं। ” जावेद साहब ने अपने दुःख के दो कारण गिनवाये। एक तो यह कि “आज अंग्रेजी के लोग हिंदी फिल्मों के पटकथा लेखन में अपना योगदान दे रहे है ” जबकि  हिंदी या उर्दू का उन्हें “समुचित ज्ञान” नहीं है। दूसरे, जावेद साहब के हिसाब से हिन्दी फिल्मों की स्क्रिप्ट की दुर्दशा के लिए आज के अभिनेता “ज्यादा जिम्मेदार” हैं क्योंकि “उनकी(सिने-अभिनेता की) सबसे बड़ी परेशानी यह है कि वो हिंदी या उर्दू साहित्य के जरा भी नजदीक नहीं है। उर्दू की बात जाने दें, हिंदी पढ़ने में भी उन्हें खासी दिक्कत होती है। इसका सीधा असर अच्छी स्क्रिप्ट पर पड़ता है।” इन दो वजहों से जावेद अख्तर को लगता है कि बॉलीवुड में “हिंदी फिल्में सही हिंदी में कम ही लिखी जाती हैं। सरल हिंदी में लिखी पटकथा में भी बीच-बीच में अंग्रजी शब्दों का उपयोग जम कर किया जाता है। ऐसी स्क्रिप्ट यहां कम ही देखने को मिलती है, जिसमें अंग्रेजी शब्दों के मोह से बचते हुए शुद्ध हिंदी या उर्दू के शब्दों का उपयोग किया जाता हो।”

जैसे आज कुछ लोगों को ‘हिन्दी सिनेमा’ की ‘हिन्दी’ पर अंग्रेजी का बोलबाला नजर आता है वैसे ही बीते वक्त में कुछ लोगों को हिन्दी सिनेमा के साथ ‘उर्दू’ का जिक्र गवारा ना था। पोस्ट में कही गई जावेद अख्तर की बातों को पढ़कर सिने-इतिहास के गंभीर अध्येता रविकांत(सीएसडीएस स्थित सराय वाले) का वह आलेख याद आया जिसे उन्होंने कभी शिमला स्थित भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान की एक संगोष्ठी में पढ़ा था। “सिनेमा, भाषा, रेडियो: एक त्रिकोणीय इतिहास” शीर्षक इस लेख में छोटा-सा जिक्र आता है कि हिन्दी फिल्मों को बेशुमार अमर गीत देने वाले साहिर लुधियानवी सन् 1960 के दशक में एक दफे बिहार गए थे और किसी मुशायरे में कह दिया था कि हिन्दी फिल्मों की भाषा 97 फीसदी उर्दू है। फिल्मों से जुड़ी पत्रकारिता के मामले में जिस “माधुरी’ ( इसका शुरुआती नामी सुचित्रा था, माधुरी नाम बाद में पडा) पत्रिका को मील का पत्थर माना जाएगा वही साहिर लुधियानवी के पीछे पड़ गई।

पत्रिका के  ‘चले पवन की चाल’ नाम के पन्ने पर एक चिट्ठी छपी। इसके लिखने वाले ने अपना नाम लिखा था ‘फिल्मेश्वर’ और चिट्ठी का शीर्षक था- ‘ हिन्दी और उर्दू के नाम पर नफरत के शोले भड़काने वाले अवसरवादी साहिर के नाम एक खुला पत्र ।’ चिट्ठी दिलचस्प है क्योंकि उसके मुताबिक साहिर फारसी लिपि में लिखे होने के कारण जिसे उर्दू समझ रहे हैं वह दरअसल हिन्दी ही है। इस चिट्ठी का एक अंश है- “यह जानकर वाकई बड़ा आश्चर्य हुआ कि आप समझते हैं कि आपने एक फिल्म में हिन्दी गीत लिखे हैं। लेकिन आपने हिन्दी पर यह अहसान पहली ही बार नहीं किया है। आप इससे पहले भी हिन्दी में ही लिखते रहे हैं। आपने फिल्मों में आने से पहले भी जो कुछ लिखा था, वह हमारी निगाह में तो हिन्दी ही थी..यह जरुर है कि आपने जब वह सब कलमबंद किया था जो फारसी लिपि इस्तेमाल की थी। यूं देखा जाय तो अपनी चितरलेखा के गीत भी आपने अपनी तरफ से चाहे हिन्दी में लिखे हों लेकिन कागज पर उतारा उन्हें फारसी लिपि में ही था।इतनी छोटी सी बात का मतलब आप जैसा बड़ा और दानिशमंद शायर शायद फौरन समझ गया होगा- दो लिपियों से भाषा दो नहीं हो जाती और एक ही लिपि में कई भाषाएं भी लिखी जा सकती हैं। ” वैसे साहिर लुधियानवी को फिल्मेश्वर का यह तर्क गले उतरा होगा ऐसा नहीं लगता क्योंकि भाषा के मामले में साहिर का पक्ष बड़ा साफ है। आजादी के बाद के वक्त में जिस वक्त सरकार को गालिब के मजार के जीर्णोद्धार की फिक्र हुई थी उन दिनों साहिर लुधियानवी ने लिखा था-

जिन शहरों में गूंजी थी गालिब की नवा बरसों- उन शहरों में अब उर्दू बे-नामो निशां ठहरी

आजादि-ए-कामिल का ऐलान हुआ जिस दिन- मातूब जबां ठहरी, गद्दार जबां ठहरी।

जिस अहद-ए-सियासत ने ये जिन्दा जबां कुचली- उस अहद-ए-सियासत को मरहूमों का गम क्यों है

गालिब जिसे कहते हैं उर्दू ही का शायर था- उर्दू पे सितम ढाकर गालिब पर करम क्यों है।

sahir-ludhyanvi

साहिर लुधियानवी

और साहिर ही क्यों, हिन्दी-सिनेमा को केंद्र में रखकर हुए अंग्रेजी-लेखन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा यही मानकर चलता है कि हिन्दी-सिनेमा की भाषा मुख्य रुप से उर्दू रही है। इस सोच की एक मिसाल मुकुल केशवन का बहुउद्धृत आलेख- उर्दू, अवध एंड तवायफ- द इस्लामिकेट रुटस् ऑव हिन्दी सिनेमा- है। यह आलेख यही साबित करने के लिए लिखा गया है कि- “ हिन्दी-सिनेमा का महल बहुमंजिला तो है लेकिन इसका स्थापत्य इस्लामी रुपाकारों से प्रेरित है। इन इस्लामी रुपकारों का सबसे प्रकट उदाहरण है उर्दू। विडंबनापूर्ण लेकिन सच बात यह है कि आजाद भारत में उर्दू का आखिरी मजबूत मकाम हिन्दी-सिनेमा ही साबित हुआ, भाषाई हठधर्मिता के सागर में उर्दू का आखिरी स्वर्ग। और जो ऐसा हुआ तो यह सही ही है क्योंकि हिन्दी सिनेमा की काया उर्दू की जबांदानी और लोकाचारी संस्कारों से बनी है। ” इसी बात का एक विस्तार नसरीन मुन्नी कबीर की किताब ‘टॉकिंग फिल्मस्: कॉन्वर्सेशनस् ऑन हिन्दी सिनेमा विद् जावेद अख्तर’  में मिलता है। इसमें जावेद अख्तर एक जगह कहते हैं- “भारत की बोलती फिल्मों ने अपना बुनियादी ढांचा उर्दू फारसी थियेटर से हासिल किया। इसलिए बोलती फिल्मों की शुरुआत उर्दू से हुई। यहां तक कि कलकत्ता का नया थियेटर भी उर्दू के लेखकों का इस्तेमाल करता था। बात यह है कि उत्तर भारत के शहरी इलाके में उर्दू देश के बंटवारे से पहले बोल-चाल की जबान थी और इसे ज्यादातर लोग समझते थे और यह पहले की तरह आज भी बड़ी नफीस जबान है जिसके भीतर हर तरह के जज्बात और ड्रामे की तर्जुमानी की सलाहियत है।”

ऐसा कहते हुए मुकुल केशवन या फिर जावेद अख्तर कुछ बातों की अनदेखी करते हैं। एक तो यही कि हिन्दी-सिनेमा के भीतर एक लंबी कड़ी हिन्दू-धर्मकथाओं पर आधारित फिल्मों की रही है और उनकी संवाद-भाषा आजादी से पहले और बाद में भी संस्कृत की तरफ झुकी रही। इसके लिए ज्यादा उदाहरण ना देते हुए जिस दशक में फिल्म शोले(1975) बनी थी उसी दशक की दो फिल्मों हरिदर्शन(1972) और जय़ संतोषी मां(1975) को याद कर लेना काफी होगा। फिल्म हरिदर्शन में लक्ष्मी विष्णु के वाराह रुप धारण करने पर अचरज में पड़े नारद से कहती हैं- “  प्रभु तो जैसा कारण हो वैसा ही रुप लेकर पापियों के पास जाते हैं। आप उनके प्रिय प्रतिनिधि होकर भी ये नहीं जान पाये।’’ और ‘जय संतोषी मां’ फिल्म की शुरुआती पंक्ति ही है- “संतोषी मां की महिमा अपार है। हर भक्त ने उनकी महिमा का गुणगान अपने अपने ढंग से किया है।इस चित्र की कथा भी कुछ धार्मिक पुस्तकों और लोककथाओं के आधार पर है। आशा है, आप इसे सच्ची भावना से स्वीकार करेंगे।”

दूसरी बात पारसी थियेटर से हिन्दी फिल्मों के रिश्ते से जुड़ी है। हरीश त्रिवेदी ने अपने आलेख- ऑल काईंड ऑव हिन्दी: द इवॉल्विंग लैंग्वेज ऑव हिन्दी सिनेमा- में ध्यान दिलाया है कि पारसी थियेटर के लिए नाटक लिखने वालों में सिर्फ आगा हश्र कश्मीरी का ही नाम नहीं आता, नारायण प्रसाद ‘बेताब’ और पंडित राधेश्याम कथावाचक का भी आता है। नारायण प्रसाद ‘बेताब’ ने अपने नाटकों के लिए जो भाषा नीति बनायी वह उन्हीं के शब्दों में कुछ ऐसी थी-“ना ठेठ हिन्दी ना खालिस उर्दू,जुबान गोया मिली जुली हो- अलग रहे दूध से ना मिश्री, डली-डली दूध में घुली हो । ” बहरहाल, नारायण प्रसाद बेताब की भाषा का एक छोर फारसीनिष्ठ था तो दूसरा छोर संस्कृतिनिष्ठ। वे ‘रुस्तम व सोहराब’के लिए  यह लिख सकते थे- “अगर तुम मादरे-ईरान के फरजंद होते तो मैं कनीज बनकर तुम्हारी खिदमत में अपनी जिंदगी..” तो भीष्म-प्रतिज्ञा के लिए ऐसी भाषा भी गढ़ सकते थे- “जिस स्त्री के पास रुप है हृदय नहीं है, सेवा है प्रेम नहीं है, पुत्र की लालसा है किन्तु पुत्र की ममता नहीं है- उसके पास दया !”  और तीसरी बात थोड़ी महीन है, जिसकी तरफ इतिहासकार विनय लाल ने अपने लेख हिन्दुईज्म एंड बॉलीवुड- अ फ्यू नोटस् में ध्यान दिलाया है। विनय लाल की मानें तो हिन्दी सिनेमा का एक बड़ा हिस्सा हिन्दू-मानस और संस्कृति का झरोखा है। ‘अमर अकबर एंथोनी’, ‘कुली’ और ‘मर्द’ सरीखी हिट फिल्मों के निर्देशक मनमोहन देसाई को विनयलाल ने यह कहते हुए उद्धृत किया है कि मेरी फिल्में महाभारत की कथाओं पर आधारित हैं। विनयलाल की मान्यता है कि हिन्दी फिल्में हिन्दू-धर्म के मिथकों का पुनराख्यान हैं। वे इस कोटि में श्याम बेनेगल की फिल्म कलयुग(1980) को भी ऱखते हैं (क्योंकि इसमें महाभारत की ही कथा के समान दो व्यवसायी घरानों की दुश्मनी को दिखाया गया है) तो  “हम पाँच” (1980) को भी( क्योंकि इसमें पांडव सरीखे पाँच भाइयों की टक्कर दुर्योधन सरीखे जमींदार वीरप्रताप और शकुनि सरीखे उसके लाला मामा की कुटिल चालों से होती है)। और हिन्दी-फिल्मों के कथा-काया के भीतर हिन्दू मिथकों की आत्मा खोजने वाले अकेले विनय लाल ही नहीं हैं, उनसे मिलती-जुलती बात संस्कृति-मनोविज्ञानी सुधीर कक्कड़ भी कहते हैं। सुधीर कक्कड़ की मानों तो हिन्दी फिल्मों के नायकों का छलिया और खिलंदड़ रुप( जैसे फिल्म राजा बाबू में गोविन्दा) कृष्ण के चरित्र पर गढ़ा गया वैसे ही धीरोदात्त रुप( जैसे फिल्म जंजीर में अमिताभ) राम के चरित्र पर।

बात आज के जावेद अख्तर की हो या कल के साहिर लुधियानवी अथवा किसी छद्मनामधारी ‘फिल्मेश्वर’ की – सभी मानकर चलते हैं कि नाम अगर ‘हिन्दी सिनेमा’ है तो जो कथा दर्शक को दिखाई जा रही है उसमें बोली जाने वाली भाषा का रुप जरुरी तौर पर कोई एक ही होगा।‘फिल्मेश्वर’ की नजर में यह भाषा हिन्दी है, साहिर लुधियानवी की नजर में उर्दू और जावेद अख्तर के हिसाब से हिन्दी/उर्दू। हिन्दी फिल्मों के संवाद-पक्ष बारे में प्रगतिशील इदारे में ज्यादातर बातें इसी मान्यता की छांव में होती हैं। बस अन्तर इतना रहता है कि नफासत की नोंक चूंकि वहां ज्यादा ही बारीक होती है इसलिए हिन्दी फिल्मों की भाषा को ‘हिन्दुस्तानी’ कह दिया जाता है, यानि एक ऐसी भाषा जो चले हिन्दी-व्याकरण की पटरियों पर और शब्द ना तो संस्कृत के लादे और ना ही फारसी के। इस भाषा को इंगित करने के लिए कभी इसे ‘आम-फहम’ कहा जाता है तो कभी ‘बोल-चाल’ की भाषा और जोर यह दिखाने पर रहता है कि यह भाषा तद्भव-प्रेमी है- उन्हीं शब्दों को अपने भीतर समेटती है जिसके नक्काशीदार कोने जनता की जुबान पर घिस गए हों, चाहे ये शब्द पूरबिया गांवों के हों, संस्कृत और फारसी के या फिर अंग्रेजी के।

‘हिन्दी फिल्मों के संवाद हिन्दुस्तानी में लिखे जाते हैं या उन्हें हिन्दुस्तानी में होना चाहिए’- यह बात जैसे ही कोई कहता है, बात भाषा से उठकर भारतीय राष्ट्रवाद के मनचीते स्वरुप पर चली आती है। भारत के सेकुलरवाद की कुश्ती ज्यादातर धर्मगत(हिन्दू-मुसलमान) पहचानों से रही और इसी के अनुकूल ‘देश के बंटवारे’ की लहुलुहान चादर ओढ़कर आजादी के शुरुआती दशकों में देश के भावी नागरिक से चाहा यह गया कि- तू हिन्दू बनेगा ना मुसलमान बनेगा, इंसान की औलाद है, इंसान बनेगा-  और इस मुकाम तक पहुंचने के पहले के सोपान के तौर पर सोचा गया कि- हिन्दू-मुसलिम-सिक्ख ईसाई- आपस में हैं भाई-भाई। पीछे से चला आ रहा भाषाई इतिहास-बोध कहता था कि हिन्दी संस्कृत से निकली है, वेद संस्कृत में हैं और वेद चूंकि हिन्दुओं का आदिग्रंथ है इसलिए हिन्दी हिन्दुओं की भाषा है।इस सोच का एक और संस्करण था (और यह ज्यादातर मौन रहा क्योंकि पाकिस्तान बन चुका था और उस राष्ट्र की भाषा उर्दू घोषित हो चुकी थी) जो मन ही मन मानता था कि उर्दू का रिश्ता अरबी से, अरबी का रिश्ता कुरान से और कुरान का अनिवार्य रिश्ता मुसलमान से है। हिन्दू-हिन्दी बनाम मुसलिम-उर्दू के इस तनाव को कैसे साधा जाय- भारतीय सेकुलरवाद की बड़ी चिंता तो यह थी। विकल्प के तौर पर तान अंग्रेजी पर जाकर टूटी क्योंकि पश्चिमी काट की ‘आधुनिकता’ ने पहले से स्थापित कर रखा था कि सारे पौराणिक पहचानों से परे वह जो एक ‘इंसान’ होता है- वह सिर्फ तर्कबुद्धि की भाषा बोलता-लिखता है और तर्कबुद्धि की भाषा अगर कोई है तो अंग्रेजी। नए आजाद देश में यह बात धमाके से कही नहीं जा सकती थी क्योंकि मान्यता यह रही कि राष्ट्र बनना है तो राष्ट्रभाषा होनी ही चाहिए। विकल्प के तौर पर एक प्रत्यय गढ़ा गया ‘साझी संस्कृति’ का और इस साझी संस्कृति को बाकी बातों के अलावा भाषा में भी खोजा गया- एक ऐसी भाषा जिसमें अपनी-अपनी ‘रुढियां’ यानि संस्कृत और अरबी-फारसी खोकर, हिन्दू-मुसलमान दोनों अपनी अभिव्यक्तियों के लिए एक नया घर बना सकें। यह खोज आखिर को जिस भाषा पर खत्म हुई उसे 1930 के दशक में हिन्दुस्तानी कहा जा चुका था और महात्मा गांधी की मेहरबानी से उसकी चाल-ढाल भी तय की जा चुकी थी। आजादी के बाद के शुरुआती दशक में चूंकि बड़ी तेजी से संस्कृतनिष्ठ सरकारी हिन्दी का प्रचलन हुआ, इसलिए हिन्दुस्तानी के कंधे पर एक तमगा और जुड़ा कि यह  हिन्दू-वर्चस्व वाली प्रतिगामी भाषा नहीं है- बल्कि सत्ता के विरोध की भाषा है। सेकुलरवादी सोच की इसी भाषाई प्रसंग के भीतर हिन्दी फिल्मों की भाषा को प्रगतिशील इदारों में ‘हिन्दुस्तानी’ कहकर याद किया गया।

हिन्दी फिल्मों में चलने वाली इस हिन्दुस्तानी भाषा के उदाहरण बहुतेरे हैं, मिसाल के लिए याद करें फिल्म दीवार का वह यादगार संवाद जिसमें शिव की मूर्ति के आगे अमिताभ बच्चन को यह कहते हुए दिखाया गया है- “आज, खुश तो बहुत होगे तुम। देखो, जो आज तक तुम्हारें मंदिर की सीढियां नहीं चड़ा। जिसने आज तक तुम्हारे सामने सर नहीं झुकाया। जिसने आज तक कभी तुम्हारे सामने हाथ नहीं जोड़े। वो आज तुम्हारे सामने हाथ फ़ैलाए खड़ा है। बहुत खुश होगे तुम। बहुत खुश होगे कि आज मैं हार गया। लेकिन तुम जानते हो कि जिस वक्त मैं यहाँ खड़ा हूँ, वो औरत जिस के माथे से तुम्हारे चौखट का पत्थर घिस गया, वो औरत जिस पर ज़ुल्म बढ़े तो उसकी पूजा बढ़ी, वो औरत जो ज़िंदगी भर जलती रही लेकिन तुम्हारे मंदिर में दीप जलाती रही, वो औरत। वो औरत आज ज़िंदगी और मौत के सरहद पर खड़ी है। और.. ये तुम्हारी हार है…।” इस संवाद में जुल्म और जिंदगी सरीखे उर्दू-परंपरा के शब्द आते हैं तो मंदिर और दीप सरीखे हिन्दी-परंपरा के शब्द भी। आगे इसी संवाद में जुर्म और सज़ा जैसे शब्द आते हैं तो सुहागन और विधवा जैसे शब्द भी।

हिन्दी फिल्मों के संवादों की भाषा को हिन्दी-उर्दू-हिन्दुस्तानी अथवा अंग्रेजी के झगड़े से दूर ले जाकर सोचें तो नजर आएगा कि यह एक बहुलस्वरी दुनिया है, नजर आएगा कि ‘हिन्दी फिल्म’ शब्द एक व्युत्तपत्तिमूलक शब्द(जेनरिक टर्म) भर है- एकभाषा के आवरण में बहुभाषा को समेटने वाला शब्द।। हम यह देख पायेंगे कि हिन्दी-सिनेमा के संवाद ‘साझी संस्कृति’ के तकाजे से ही नहीं गढ़े जाते बल्कि कथा में आये पात्र को विश्वसनीय बनाने के लिए भी गढ़े जाते हैं और कथा के पात्रों को गढ़ा जाता है उस ‘औसत दर्शक’ की कल्पना से जो कालक्रम में हमेशा बदलते रहा है। इस कोने से देखें तो पता चले कि फिल्म मुगले-आजम में दिलीप कुमार का अगर उर्दूं-छौंक वाला यह संवाद है कि-‘मुझ पे जुल्म ढाते हुए आपको जरा ये सोचना चाहिए कि मैं आपके जिगर का टुक़ड़ा हूं कोई गैर या कोई गुलाम नहीं’ तो उसके सामने खड़ी दुर्गा खोटे का संस्कृत की कुरुणा से सना यह वाक्य भी – ‘नहीं सलीम नहीं..तुम हमारी बरसों की प्रार्थनाओं का फल हो।’ याद आएगा कि मुगले-आजम की बहुलस्वरी दुनिया में सिर्फ यही नहीं गाया गया कि- ‘जब रात है ऐसी मतवाली तो सुबह का आलम क्या होगा’ बल्कि उसमें किसी का यह स्वर भी शामिल था- ‘मोहे पनघट पर नंदलाल छेड़ गयो रे..। ’ बहुभाषिकता के कोने से देख सकें तो तुलना कर पायेंगे मुगले-आजम में बोले हुए दिलीप कुमार के संवाद( ‘तकदीरें बदल जाती हैं, जमाना बदल जाता है..मगर इस बदलती दुनिया में मोहब्बत जिस इनसान का दामन थाम लेती है वो इनसान नहीं बदलता’) की फिल्म ‘गंगा-जमुना’ में उन्हीं पर फिल्माये हुए गीत से( ‘रुप को मन मा बसई ब त बुरा का होईहैं, कोहू सो प्रीत लगईब त बुरा का होईहैं’)। याद आएगा कि अमिताभ ने अपनी फिल्मों अगर यह कहा है कि ‘मर्द को दर्द नहीं होता’  तो ‘माई नेम ईज एंथोनी गॉनसाल्विस’ भी। हम देख पायेंगे कि हिन्दी फिल्मों में अगर ‘फिरऔनों के गरुर’ को उनके ही महल में अपने पाँव के खून से कुचलती हुई एक ‘पाकीजा’ औरत है तो वह ‘टोपोरी’ भी जो कहता है- ‘आती क्या खंडाला’।

हमें बीते वक्त का अफसोस चाहे जितना हो लेकिन इस अफसोस से हिंदी-सिनेमा की भाषा(ओं) को नहीं पढ़ा जा सकता क्योंकि इस विधा को हमेशा अपने औसत दर्शक का अनुमान ठीक-ठीक लगाना पड़ता है।1990 के दशक के आते-आते हिन्दी-सिनेमा ने ठीक पहचाना कि उसका औसत दर्शक बदल चुका है। मध्यवर्ग का आकार ही नहीं बढ़ा साथ-साथ उसके स्वाद बढ़े हैं और वह अपने स्वाद को महत्वाकांक्षा की भाषा हिंग्लिश में पहचानता है, उस हिंग्लिश को जिसे अख़बारों के समाचार से लेकर टीवी पर चलने वाले विज्ञापनों तक ने गढ़ा है। ऐसे में यह अफसोस क्यों कि ‘हिन्दी फिल्मों पर अंग्रेजी का बोलबाला’ है ?

हिन्दी और उर्दू के नाम पर नफरत के शोले भड़काने वाले अवसरवादी साहिर के नाम एक खुला पत्र

शायरे इन्कलाब,

साहिर लुधियानवी

सबसे पहले आपको इस बात का धन्यवाद कि आपको अपने राष्ट्र की भाषा हिन्दी से प्यार है और इस बात का भी आप हिन्दी साहित्य से प्यार करते हैं। आपने बड़े गर्व के साथ यह फरमाया कि जरुरत पड़ने पर आप हिन्दी में गीत भी लिखते हैं और अपने चित्रलेखा(वह चित्रलेखा जिसे लोगों ने चितरलेखा समझा) के गीतों का उदाहरण भी दिया। यह जानकर वाकई बड़ा आश्चर्य हुआ कि आप समझते हैं कि आपने एक फिल्म में हिन्दी गीत लिखे हैं। लेकिन आपने हिन्दी पर यह अहसान पहली ही बार नहीं किया है। आप इससे पहले भी हिन्दी में ही लिखते रहे हैं। आपने फिल्मों में आने से पहले भी जो कुछ लिखा था, वह हमारी निगाह में तो हिन्दी ही थी..यह जरुर है कि आपने जब वह सब कलमबंद किया था जो फारसी लिपि इस्तेमाल की थी। यूं देखा जाय तो अपनी चितरलेखा के गीत भी आपने अपनी तरफ से चाहे हिन्दी में लिखे हों लेकिन कागज पर उतारा उन्हें फारसी लिपि में ही था।इतनी छोटी सी बात का मतलब आप जैसा बड़ा और दानिशमंद शायर शायद फौरन समझ गया होगा- दो लिपियों से भाषा दो नहीं हो जाती और एक ही लिपि में कई भाषाएं भी लिखी जा सकती हैं। हिन्दुस्तान के जिस प्रदेश में आपका जन्म हुआ उस पंजाब के वारिस ने अपनी पंजाबी भाषा की हीर फारसी लिपि में  लिखी थी, यह भी आप जानते ही होंगे क्योंकि आप जैसे धरती के शायर अपनी संस्कृति की इतनी बात तो जानते ही हैं। जिसे आप आज उर्दू कहते हैं उसके महान कवि गालिब अपने आपको हिन्दी में लिखने वाला कहते थे, यह भी आप उस मुशायरे में  भूले नहीं होंगे जहां आपने हिन्दी साम्राज्यवाद की भयावनी तस्वीर खींची थी

आपने जनता को इस दिन यह भी बताया था कि हिन्दी नाम से जानी-जाने वाली 97 फीसदी फिल्में उर्दू की होती हैं। तो भाईजान, झगड़ा कहां रहा? जिसे आप उर्दू कहते हैं उसे 99.9 फीसदी लोग हिन्दी कहते हैं। तो दोनों एक ही चीज रही न? उन फिल्मों की नामावली अंग्रेजी में होती है तो आपको अंग्रेजी का साम्राज्यवाद नजर नहीं आता? आपको- यानी उस महान आदमी को जिसने साम्राज्यवाद के प्रति विद्रोह का परचम उठा रखा था। नागरी लिपि में आते ही वह साम्राज्यवाद हो गया। उस नागरी लिपि में जिसमें आपके कविता-संग्रह उर्दू लिपि से भी ज्यादा बिके हैं।जब आपके संग्रह नागरी लिपि में छपे थे तो क्या उनका हिन्दी में अनुवाद किया गया था या हू-ब-हू आपके लिखे जैसे ही छापे गए थे और उन्हें हिन्दी के पाठकों ने पूरी तरह समझकर भरपूर रस नहीं लिया था? उनका हिन्दी में प्रकाशन हिन्दी का साम्राज्यवाद नहीं था?

आखिर बात क्या है? हिन्दी और उर्दू की? या हिन्दी और उर्दू के नाम पर संप्रदाय की? इस धर्मनिरपेक्ष राज्य में आजादी के बीस सालों ने इतना तो करिश्मा किया ही है कि हमारे अंदर ही अंदर जो संकुचित भावनाओं की आग फूट रही है, हमने उसे उसके सही नाम से पुकारना बंद कर दिया है और उसे हिन्दी-उर्दू का नाम देकर हम उसे छुपाने की कोशिश करते करते हैं।

आप अपनी भावुक शायरी में कितनी लफ्फाजी करते रहते हों, यह भी सही है यह भी सही है कि आपके दिल में एक दिन इंसान के प्रति प्रेम भरा था।आप सब दुनिया के लोगों को एकसाथ कंधे से कंधा मिलाकर खुशहाली की मंजिल की तरफ बढ़ते हुए देखना चाहते थे। लेकिन दोस्त, आज ये क्या हो गया? इनसान को इनसान के करीब लाने के बजाय आप हिन्दी-उर्दू की आड़ में किस नफरत के शोले से खेलने लगे? सच कहूं तो आज आपकी आवाज से जमाते-इस्लामी की घिनौनी बू आती है। आपने पिछले दिनों वह शानदार गीत लिखा था-

नीले गगन के तले,

धरती का प्यार पले।

यह पत्र लिखते लिखते मुझे उस गीत की याद हो आई। इसलिए आपको देशद्रोही कहने को मन नहीं होता पर मुशायरे में आपकी तकरीर को पढ़कर आपको क्या कहूं यह समझ में नहीं आता। पूरे हिन्दुस्तान की एक पीढ़ी जिसमें पाकिस्तान की भी वही पीढ़ी शामिल की जा सकती है, आपकी कलम पर नाज करती थी, आपके खयालों से( खयालों उर्दू का नहीं हिन्दी का शब्द है, उर्दू में इसे खयालात कहते हैं हुजूरेवाला) प्रभावित थी। आपने उस पीढ़ी की तमाम भावनाओं को अपनी सांप्रदायिकता की एख झलक दिखाकर तोड़ दिया।

जिस भाषा को आप उर्दू कहते हैं और जिसके लिए आज आंध्र, बंगाल,महाराष्ट्र, मैसूर और केरल- सब जगह दूसरी भाषा का दर्जा दिलवाना चाहते हैं वह इन जगहों में भी उतनी ही परदेशन है जितनी पश्चिमी पाकिस्तान में। उर्दू संस्कृति में अपने बच्चों को पालने के लालच में हिन्दुस्तान छोड़ने वाले महान कवि जोश मलीहाबादी तक खुद मानते हैं कि पाकिस्तान में उर्दू का भविष्य डांवाडोल है क्योंकि वह वहां की भाषा नहीं है। पर वे खुश हैं। क्यों?  इसलिए नहीं कि वहां उर्दू पनप रही है बल्कि इसलिए कि वे एक सांप्रदायिक संस्कृति के बीच में पहुंच गए हैं(हालांकि वे अपने को अनीश्वरवादी कहते हैं)। है न कमाल की बात। आपने एक बार लिखा था-

तू हिन्दू बनेगा ना मुसलमान बनेगा

इनसान की औलाद है इनसान बनेगा

लेकिन आपकी आजकल की गतिविधि देखते हुए तो ऐसा लगता है ये आपकी अपनी भावनाएं नहीं थी, आप सिर्फ फिल्म के एक पात्र की भावनाएं लिख रहे थे। आप एक जमाने में वक्त को बदलने की बात लिखा करते थे। फिर भी फिल्मी आवश्यकता के वशीभूत आपने लिखा था-

कल जहां बसती थीं खुशियां-आज है मातम वहां

वक्त लाया था बहारें- वक्त लाया है खिजां

आदमी को चाहिए वक्त से डरकर रहे

कौन जाने किस घड़ी वक्त का बदले मिज़ाज

सारे हिन्दुस्तान में फिल्मोद्योग कम से कम एक ऐसी जगह थी जहां जाति प्रदेश और धर्म का भेदभाव काम के रास्ते में नहीं आता था, मेलजोल के रास्ते में नहीं आता था। और आप इनसानियत के हामी थे। पर आपने इस वातावरण में सांप्रदायिकता का जहर घोल दिया।

लगता है इनसान की औलाद का भविष्य आपकी नजरों में सिर्फ यह है-

तू हिन्दू बनेगा तू मुसलमान बनेगा

शैतान की औलाद है शैतान बनेगा

मैं आखिर में इतनी ही दुआ करना चाहता हूं: खुदा उर्दू को आप जैसे हिमायतियों से बचाये।

फिल्मेश्वर

( यह चिट्ठी माधुरी के 30 जुलाई 1965 के अंक में छपी। चिट्ठी सिने-इतिहासकार रविकांत जी की सहायता से हासिल हुई। प्रस्तुतकर्ता इसके लिए उनका कृतज्ञ है)

5205826_photo3चन्दन श्रीवास्तव,  मूलतया छपरा(बिहार) के निवासी, पिछले पंद्रह सालों से दिल्ली में। पहले आईआईएमसी और फिर जेएनयू में पढ़ाई। “उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध में हिन्दी लोकवृत्त का निर्माण” शीर्षक से पीएचडी के बाद दिल्ली के कॉलेजों में छिटपुट अध्यापन, फिर टीवी चैनल की नौकरी और अब विकासशील समाज अध्ययन पीठ(सीएसडीएस) की एक परियोजना इंक्लूसिव मीडिया फॉर चेंज से जुड़े हैं। इनसे  chandan@csds.in पर संपर्क संभव है। 

साभार- हंस- फरवरी- 2013- हिन्दी सिनेमा के सौ साल

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