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भारत माता: आनंद कुमारस्वामी

आनंद कुमारस्वामी की एक किताब है ‘ऐसेजइन नेशनल आयडिलिज्म’. जीए नेटसन एंड कंपनी, मद्रास से 1909 में प्रकाशित इस किताब में संकलित एक आलेख का नाम है- माता भारत! आलेख अनूठा है, इस अर्थ में कि उसमें पहली दफे भारतमाता की कथा कही गयी है. 
बंकिमचंद्र ‘वंदे मातरम्’ गीत में भारतमाता का आद्यरूप गढ़ चुके थे, इस आद्यरूप को अबनींद्रनाथ टैगोर की तूलिका ने अपने कैनवस पर मूर्तिमान किया लेकिन, गीत और चित्र से उठनेवाले अर्थों की प्रामाणिक व्याख्या अभी शेष थी. व्याख्या का यही काम भारतीय संस्कृति के मर्मज्ञ आनंद कुमारस्वामी ने अपने ‘माता भारत’ शीर्षक लेख में किया.
 
कुमारस्वामी के आलेख की शुरुआत इन पंक्तियों से होती है- ‘कभी की बात है, एक स्त्री थी- लंबी और गोरी. एकदम निर्मल, धैर्य और कृपा की प्रतिमूर्ति…! ’ आलेख में आगे प्राचीन, मध्यकालीन और आधुनिक भारत का संकेत करते हुए लिखा गया है कि विद्या-बुद्धि के मामले में यह स्त्री विश्वगुरु थी, बहुतों ने उसका हाथ मांगना चाहा और इनमें से एक जिससे उसे रंचमात्र ही प्रेम था, बरसों तक उसकी काया का स्वामी बना रहा. फिर एक और आया, इस अनजान प्रणय-याचक ने वादे किये स्वतंत्रता और शांति के, उसकी संतानों की सुरक्षा के. और, उसने विश्वास करके उसे अपना हाथ सौंप दिया…! 
 
इसके बाद आलेख में सन् 1857 का जिक्र आता है कि स्त्री के कुछ बच्चे नये स्वामी के विरुद्ध उठ खड़े हुए. उन्हें लगा कि उनकी ताकत छिनी जा रही है और उनके आपस के बात-व्यवहार जिन नियम-कायदों से संचालित होते हैं, उनके साथ छेड़छाड़ की जा रही है. भारतमाता की इस कथा में एक नया मोड़ आता है, जब 1857 के बाद के मध्यवर्गीय मानस के दोहरेपन को इंगित करते हुए कुमारस्वामी लिखते हैं कि नये स्वामी से माता ने एक संतान जना और स्वामी खुश था कि वह (एक कन्या का जन्म) उसके रंग-ढंग की होगी, उसके अपने लोगों की कन्या के समान.
 
वह धनवान और रूपवान होगी, उसके अपने लोगों के पुत्र की दुल्हन बनेगी. लेकिन जब इस संतान का जन्म हुआ, तो माता जैसे स्वप्न से जागी और सिर्फ अपनी बेटी की खातिर जीने लगी. बड़ी होती बेटी मां को उसके यौवन के दिनों की याद दिलाती थी. वह विदेशी स्वामी की पक्षधर नहीं थी, तो भी उसमें उस (विदेशी स्वामी) जैसी ऊर्जा और व्यावहारिक मामलों की चतुराई थी. मां चुपके से बेटी को प्राचीन ज्ञान सिखाती और बेटी का हृदय अपने पिता, उसके लोगों और उनके आचार-व्यवहार से दूर होता चला गया. 
 
कथा के आखिर में आता है कि बेटी की आचार-व्यवहार से माता को संतोष था, अब उसके केश उजले हो चले थे, उम्र के हाथों वह कमजोर हो चली थी और एक समय आया जब वह नहीं रही, क्योंकि उसका काम पूरा हो चुका था. बेटी को पिता की निरंकुशता जरा भी बर्दाश्त नहीं थी. 
 
उसे सभी माता कहते थे, और वह अपने से पहले जन्म लेनेवाले बच्चों की भी मां थी, कुमारस्वामी लिखते हैं कि ‘इस माता (क्योंकि उसने कहा कि वह सबकी मां होगी लेकिन ब्याहता किसी की नहीं) ने सब संतानों की मदद की. उसने सबको एक-दूसरे से प्रेम करना और एक-दूजे की मदद करना और अपने को मां पुकारना सिखाया.’ 
 
यह कथा बार-बार याद की जानी चाहिए, क्योंकि आज एक राज्य का मुख्यमंत्री कह रहा है कि भारत माता की जय नहीं बोलनेवालों को इस देश में रहने का अधिकार नहीं है. दूसरे राज्य में एक वरिष्ठ नेता स्कूल-कॉलेज चलानेवाले एक ट्रस्ट का संचालक है. वह नियम बना रहा है कि ट्रस्ट के स्कूल-कॉलेज के प्रवेश फाॅर्म पर भारत माता की जय नहीं लिखा, तो प्रवेश नहीं मिलेगा. 
 
तीसरे राज्य में धर्म की एक संस्था फतवा जारी करती है कि मुसलमान जिस तरह वंदे मातरम् नहीं बोल सकते, इसी तरह भारत माता की जय भी नहीं बोल सकते. जहरबुझी बयानबाजियों के बीच ऐसा लगता है यह 21वीं सदी के दूसरे दशक का नहीं 1930-40 का भारत है, जब एक देश के भीतर धर्म-केंद्रित दो राष्ट्रीयताओं के सिद्धांत ने जोर पकड़ा था. इतिहास दोहराने के आतुर इन बयानवीरों में से क्या किसी को भारतमाता की कथा याद है? 
 
आनंद कुमारस्वामी की भारतमाता की कथा किसी एक धर्म की कथा नहीं है, वह धार्मिकताओं के समाहार की कथा है. इस कथा की पहली सीख है कि अतीत में लौटना नहीं हो सकता और दूसरी सीख है कि भारतमाता स्वयं स्वामिनी (संप्रभु) हैं, सब ही उनकी संतान हैं, सो कोई एक अपने को वारिस बता कर शेष पर भारतमाता के नाम से हुक्म के कोड़े हांकने की निरंकुशता नहीं बरत सकता. # चंदन  श्रीवास्तव 

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भारत माता, चित्रकार-शारदाचरण

माता भारत

By आनंद कुमारस्वामी

कभी की बात है, एक स्त्री थी- लंबी और गोरी. एकदम निर्मल, धैर्य और कृपा की प्रतिमूर्ति ! ना, वह युवती नहीं थीऐसा तो कोई सोच भी नहीं सकता। बीते बरसों में उसकी विद्या-बुद्धि की धूम थी, दुनिया भर से ज्ञानीजन आते, उसके चरणों में बैठते और उसकी सीख दुनिया के कोने-कोने में ले जाते. लेकिन अब उसकी उम्र ढलान पर थी, तनिक थकान हावी होने लगी थी और उसकी आंखों की ज्योति किसी ध्रुवतारे की तरह बस उन्हीं चंद सयानों को राह दिखा पा रही थी जो अब भी आभास के पीछे का यथार्थ देख पाने में सक्षम थे. लेकिन, वह धनी थी और बहुतों ने उसका हाथ मांगना चाहा और इनमें से एक जिससे उसे रंचमात्र ही प्रेम था, बरसों तक उसकी काया का स्वामी बना रहा. फिर एक और आया, इस अनजान प्रणय-याचक ने वादे किए स्वतंत्रता और शांति के, उसकी संतानों की सुरक्षा के. और, उसने विश्वास करके उसे अपना हाथ सौंप दिया..

कुछ समय तक ठीक चला. शांति थी, उपेक्षा से उपजी हुई. उसका नया स्वामी उसके खजाने के धन-दौलत को पाकर संतुष्ट था. लेकिन जल्दी ही उसने अपनी नव ब्याहता और उसकी संतानों में ज्यादा रुचि दिखानी शुरु कर दी और स्वयं से कहा,  “इस स्त्री के आचार-विचार विचित्र जान पड़ते है, ना तो मेरी तरह हैं और ना ही मेरे लोगों की तरह, उसके विचार मेरे विचार से मेल नहीं खाते; लेकिन उसे प्रशिक्षित किया जाएगा, उसे शिक्षा दी जायेगी ताकि जो मैं जानता हूं उसे वह भी जान सके और दुनिया कहे कि मैंने उसके मन को मोड़ कर प्रगति की राह पर लगा दिया है.” वह उसकी पुराचीन ज्ञानराशि को नहीं जानता था, वह उसे दिमाग से सुस्त जान पड़ती थी और अपनी जिस व्यवहारकुशलता पर उसे गर्व था उसकी उसमें कमी जान पड़ती थी.

और ये विचार अभी उसके मन में चल ही रहे थे कि उसके(स्त्री) कुछ बच्चे उसके(नये स्वामी) विरुद्ध उठ खड़े हुए कि उनकी ताकत छिनी जा रही है और उनके आपस के बात-व्यवहार जिन नियम-कायदों से संचालित होते हैं उनके साथ छेड़छाड़ की जा रही है. इन संतानों को भय था कि उनकी प्राचीन विरासत हमेशा के लिए खत्म हो जायेगी. माता को अब भी शांति की आशा थी. उसने अपनी संतानों की पुकार नहीं सुनी बल्कि संतानों के हठ के शमन में मददगार बनी और जल्दी ही फिर शांति छा गई लेकिन जिद्दी बच्चे अपने नये पिता से प्यार नहीं करते थे और वे अपनी माता की बात समझ ना सके. उनके नये पिता ने दूसरा तरीका अपनाया, बच्चों को स्कूल में भेजा जहां उन्हें उसकी भाषा और उसके विचार सिखाये गये, बताया गया कि उसके लोग कितने महान और आत्म-दानी थे, बताया गया कि बिना किसी लाभ या प्राप्ति के उनकी माता को कैसी अशांति और दैन्य से रक्षा की गई है. बच्चों को यह भी सिखाया गया कि वे अपने प्राचीन वैभव  को भूल जायें और नई सीख की ऊंची चोटी पर चढ़ प्राचीन रंग-ढंग को तिरस्कार के भाव से देखें..

लेकिन अब एक और बात हुई, नये स्वामी से माता ने एक संतान जना और स्वामी खुश था कि वह( क्योंकि एक कन्या का जन्म हुआ था) उसके रंग-ढंग की होगी, उसके अपने लोगों की कन्या के समान. वह धनवान और रुपवान होगी, उसके अपने लोगों के पुत्र की दुल्हन बनेगी. लेकिन जब इस संतान का जन्म हुआ तो माता जैसे स्वप्न से जागी और सिर्फ अपनी बेटी की खातिर जीने लगी. बड़ी होती बेटी मां को उसके यौवन के दिनों की याद दिलाती थी. वह विदेशी स्वामी की पक्षधर नहीं थी तो भी उसमें उस(विदेशी स्वामी) जैसी ऊर्जा और व्यवहारिक मामलों की चतुराई थी. माता उससे खूब बातें करतीं, गहरी बातें! विदेशी स्वामी से यह छिपा नहीं था लेकिन उसने यह सब चलने दिया, उसने सोचा कि मैं तो बहुत महान हूं और इस महानता का तकाजा है कि जैसा चल रहा है वैसा चलने दिया जाय. उसने शिक्षक रखे, कन्या को उसने अपने लोगों के रंग-ढंग की शिक्षा दी. लेकिन मां चुपके से बेटी को प्राचीन ज्ञान सिखाती और बेटी का हृदय अपने पिता, उसके लोगों और उनके आचार-व्यवहार से दूर होता चला गया. माता को (इस बाते से) संतोष था, अब उसके केश उजले हो चले थे, उम्र के हाथो वह कमजोर हो चली थी और एक समय आया जब वह नहीं रही क्योंकि उसका काम पूरा हो चुका था. और विदेशी स्वामी भी तनिक थक चला था क्योंकि उसके अपने देश में कलह-कोलाहल था और कहा जाने लगा था कि वह पराये की जमीन पर एक निरंकुश की भांति रह रहा है. इस बात से उसे पीड़ा होती, वह सोचता कि क्या मैंने अपना जीवन दूसरों के हित ही नहीं जीया और क्या ये मजूरे लोग उसकी ताबेदारी के ही लायक नहीं?  लेकिन बेटी दृढ़ से दृढ़तर होती गई, उसे पिता की निरंकुशता जरा भी बर्दाश्त नहीं थी और वह अपने से पहले जन्म लेने वाले बच्चों के बच्चों की भी मां थी, उसे सभी माता कहते थे.  एक दिन संतानों में पुराने दिनों की तरह कोलाहल उठा. उन्होंने कहा कि राजस्व वसूलने और हमारे मस्तिष्क पर सीखे उकेरने वाले इस विदेशी स्वामी की हमें जरुरत नहीं. लेकिन बड़ी सख्ती से उन्हें कुचल दिया गया, कुछ को जेल हुई, कुछ के साथ इससे भी बुरा हुआ क्योंकि पिता पराने रंग-ढंग(दंड और पुरस्कार की नीति पर चलने वाला) का था. उसे लगता मातहत लोगों की जीवन और मृत्यु पर उसका अधिकार नहीं होना अनुचित है. लेकिन बच्चे अब उसकी निरंकुशता सहने को तैयार नहीं थे क्योंकि उसने स्वयं ही भूलवश सिखा दिया था कि राजा-रजवाड़े के दिन अब खत्म हो चुके हैं. उसने स्वतंत्रता के सपने देखना सिखा दिया था.

ये सारी दुश्वारियां उस पर सवार थीं, वह बूढा होकर थक चला था और नवयुवती माता( क्योंकि उसने कहा था कि वह सबकी मां होगी लेकिन ब्याहता किसी की नहीं) ने सब संतानों की मदद की. उसने सबको एक-दूसरे से प्रेम करना और एक-दूजे की मदद करना और अपने को मां पुकारना सिखाया. उसने विदेशी स्वामी को छोड़ दिया और अलग जाकर रहने लगी जहां बच्चे उससे राय-सलाह के लिए आते. और जब तक विदेशी स्वामी इसे रोकता, वह वहां नहीं रहती बल्कि कहीं और चली जाती. ऐसा जान पड़ता कि वह ना यहां है ना वहां बल्कि वह हर जगह है.

यह कहानी अभी समाप्त नहीं हुई है लेकिन अंत दूर नहीं है और उसे देखा जा सकता है..

( ऐसेज इन नेशनल आयडिलिज्म– आनंद कुमारस्वामी, 1909, जी ए नेटसन एंड कंपनी, मद्रास में संकलित एक आलेख और इसका हिंदी अनुवाद चंदन श्रीवास्तव द्वारा किया गया है.  )

‘निपट मानव, अतर्क्य’ गांधी: चंदन श्रीवास्तव

महात्मा गांधी से प्रभावित अंग्रेजों की ना तो गांधी के जीवित रहते कमी थी और ना ही आज. और, गांधी-कथा का वैचित्र्य देखिए कि गांधी के असर में आये अंग्रेजों को, ब्रिटिश सत्ता से लड़ाई के उन दुश्वार दिनों में भी लगता था कि गांधी को समझना मुश्किल है और यही स्थिति आज भी है, जब भारत आजाद होकर ब्रिटिश-साम्राज्य के अधीन रहे ‘राष्ट्रकुल’ के देशों में प्रेम-भाव से शामिल है. मिसाल के लिए आज की ब्रिटिश संसद के नेता-प्रतिपक्ष जेरेमी कोर्बिन या बीते कल में ब्रिटिश-सत्ता का हिस्सा रहे साहित्यकार-पत्रकार जार्ज ऑरवेल का नाम लिया जा सकता है. #लेखक 

By R.K. Lakshman

By R.K. Lakshman

गांधी: प्रश्न भी, समाधान भी !
जेरेमी कोर्बिन ब्रिटेन की लेबर पार्टी के नये नेता चुने गये हैं. इस साल सितंबर के पूरे महीने हिन्दुस्तानी अखबारों के विदेश से संबंधित पन्नों पर कोरिबन की चुनावी जीत की खूब चर्चा हुई. तकरीबन तीन दशक से ब्रिटेन के हाऊस ऑफ कॉमन्स में सांसद की हैसियत से मौजूद जेरेमी कोर्बिन की जीवन-कथा के अनेक प्रसंग अनायास ही गांधी की याद दिलाते हैं. गांधी के बारे में मशहूर है कि वे भरसक रेलगाड़ी के साधारण डिब्बे में चलना पसंद करते थे और यही हाल कोर्बिन का है. वे साइकिल से चलते हैं, कार नहीं रखी और चुनाव-प्रचार की घड़ी में एक तस्वीर ऐसी भी छपी जिसमें वे ब्रिटेन की भीड़ भरी लेटनाइट बस में जन-साधारण के बीच इस इंतजार में खड़े नजर आये कि कोई सीट खाली हो तो छियासठ साल के अपने बुढ़ापे की थकान को उसपर संयत कर सकें. गांधी ने बैरिस्टरी की पढ़ाई के लिए ब्रिटेन जाने को आतुर अपने बड़े बेटे हरीलाल को रोककर पारिवारिक जीवन में कटुता पैदा की. उन्हें लोगों से कहना पड़ा कि ‘हरीलाल की परेशानी से पार पाना उनके लिए आजादी की लड़ाई लड़ने से ज्यादा कठिन है’. बच्चे की पढ़ाई को लेकर कोर्बिन ने भी अपने पारिवारिक जीवन में कड़वाहट घोली है. पत्नी से उनकी अनबन इस बात को लेकर हुई कि पढ़ाई के लिए बच्चे का नाम किस स्कूल में लिखवायें. पत्नी एक महंगे स्कूल में बच्चे का नाम लिखवाना चाहती थीं जबकि कोर्बिन सरकारी स्कूल में नाम लिखवाने के हक में थे. समाजवाद के अपने सिद्धांत से निजी जीवन में ना डिगने का व्रत लिए बैठे जेरेमी कोर्बिन का इस बात पर पत्नी से मतभेद इतना बढ़ा कि नतीजा तलाक के रुप में सामने आया.
गांधी निजी और सार्वजनिक जीवन में बाकी बातों के साथ-साथ अपनी किफायतशारी के लिए भी जाने जाते हैं.गांधी-प्रेमी बताते हैं कि गांधीजी ने अनेक चिट्ठियां इस्तेमालशुदा लिफाफों की खाली जगह पर लिखी और फाउंटेन पेन आ जाने के बावजूद सैकड़ों चिट्ठियों को लिखने में दावात में डुबोकर लिखनेवाली कलम का ही इस्तेमाल किया कि खर्चा कम पड़ेगा. कम-खर्ची गांधी की राजनीति से इस हद तक बंधी है कि स्वराज्य के मायने तलाशने के लिए 21 वीं सदी में बारंबार पढ़ी जाने वाली उनकी किताब हिन्द-स्वराज में आता है—‘जब तक हम हाथ से आलपिन नहीं बनायेंगे तबतक हम उसके बिना काम चला लेंगे. झाड़-फानूस को आग लगा देंगे. मिट्टी के दीये में तेल डालकर और हमारे खेतों में पैदा हुई रुई की बत्ती बनाकर दीया जलायेंगे. ऐसा करने से हमारी आंखे(खराब होने से) बचेंगी, पैसे बचेंगे, हम स्वदेशी रहेंगे, बनेंगे और स्वराज की धूनी रमायेंगे..’ कोर्बिन की किफायतशारी इस दर्जे की तो नहीं तब भी इतनी तो है ही कि ब्रिटेन के अख़बारों ने उन्हें निजी जरुरत के नाम पर राजकोष से सबसे कम खर्च लेने वाले सांसद के रुप चिह्नित किया . सांसदों के अनाप-शनाप खर्च के दावों और घोटालों से जूझती ब्रिटेन की संसद से जेरेमी कोर्बिन ने साल 2010 में  मई से अगस्त के बीच एक सांसद के रुप में अपने प्रिन्टर के लिए सिर्फ स्याही का खर्चा मांगा था.
जेरेमी कोर्बिन के जीवन-प्रसंगों से गांधी के जीवन-प्रसंगों के बीच तारतम्य बैठाने की यह कोशिश अगर ठीक ना लगे तो यह सोचकर दिल बहलाया जा सकता है कि दोनों के बीच एक रिश्ता फिर  भी बनता है क्योंकि कोर्बिन कोगांधी फाउंडेशन ने दो साल पहले अपने अंतर्राष्ट्रीय शांति सम्मान से नवाजा और प्रशस्ति में कहा कि कहा कि यह सम्मान कोर्बिन को सांसद के रुप में तीस साल तक  ‘सामाजिक न्याय और अहिंसा जैसे गांधीवादी मूल्यों के लिए लगातार कोशिश’ करते रहने के लिए दिया जा रहा है. सम्मान को स्वीकार करते वक्त कोर्बिन ने अपने गांधी-प्रेम में जो कुछ कहा उसमें मार्के की एक बात यह भी शामिल थी कि ‘गांधी उन लोगों में एक हैं जिनको लेकर  लगता है कि हम तो उन्हें जानते हैं लेकिन गांधी को जितना पढ़ो उतना ही मन में यह बोध गहरा होता जाता है गांधी के बारे हम बहुत कम जानते और समझते हैं ’.
जेरेमी कोर्बिन का एक अनौपचारिक रिश्ता जार्ज ऑरवेल से भी बनता है. नौजवान होते कोर्बिन को पिता ने सोलहवें जन्मदिन पर ऑरवेल के लेखों की एक किताब भेंट की थी. यह तो दावा नहीं किया जा सकता कि गांधी की आत्मकथा की समीक्षा के बहाने लिखा गया ‘रिफ्लेक्शन्स ऑन गांधी’ नाम का ऑरवेल का लेख उस किताब में शामिल था या नहीं लेकिन यह जरुर कहा जा सकता है कि गांधी को लेकर जैसा ऊहा-पोह कोर्बिन के भाषण में है कुछ वैसी ही मनोदशा लेख में ऑरवेल की है. ऑरवेल गांधी को शब्द-बद्ध करने के लालच से बच भी नहीं सकते थे. आखिर उनका जन्म इंडियन सिविल सर्विस के एक महकमे(अफीम) में करने वाले नौकरशाह के घर बेटे के रुप में हुआ और खुद भी म्यांमार(तत्कालीन बर्मा) में इंडियन इम्पीरियल पुलिस में एक वक्त तक मुलाजिम थे.( नियति का विधान कहिए कि ऑरवेल का जन्म मोतिहारी में हुआ जहां से गांधी की आंदोलन-भूमि रहे चंपारण की दूरी कायदे से पचास किलोमीटर भी नहीं). गांधी की आत्मकथा को पढ़कर ऑरवेल के मन में वही शंका जागती है जो शासक और संत या कह लें त्याग और भोग के बीच फर्क देखने वाले लोगों के मन में जागा करती है. उनका लेख इस केंद्रीय प्रश्न से शुरु होता है कि गांधी संत हैं या राजनेता. ऑरवेल को लगता है गांधी का मूल्यांकन यह प्रश्न पूछकर होना चाहिए कि इन बुजुर्ग ने चटाई पर पालथी मार, प्रार्थना में डूबकर हासिल की जाने वाली ‘अध्यात्म की शक्ति से ब्रिटिश-साम्राज्य को कहां तक हिलाया और “राजनीति में घुसकर, जो कि स्वभाव से ही ताड़न और छल-छद्म से बंधी है अपने सिद्धांतों के साथ कहां तक समझौता किया.” ऑरवेल को लगता है कि गांधी ने आत्मकथा अपनी संतई के पक्ष में लिखी है क्योंकि वह पाठक को “याद दिलाती है कि इस संत के भीतर बहुत चतुर और समर्थ आदमी छुपा था जो चाहता तो एक सफल वकील, प्रशासक या फिर बनिया बनकर उभरता.” गांधी को संसारी बनाम संन्यासी के द्वैत में देखने के कारण ऑरवेल को इस बात का मलाल है कि पश्चिम की वामधारा की राजनीति में यह मानने का फैशन-सा चल पड़ा है कि गांधी उसके एक तरह से ‘अविभाज्य हिस्से हैं. खासकर, शांतिवादी और अराजकतावादी यह देखकर कि गांधी केंद्रीकरण और राजसत्ता के हिंसाचार के विरोधी थे, उन्हें अपना मान बैठते हैं और गांधी के सिद्धांतों के अ-संसारीपन और मानवता-विरोधी प्रवृतियों की अनदेखी करते हैं.’ कहना मुश्किल है कि पश्चिम की वामधारा की राजनीति से जुड़े कोर्बिन के मन में गांधी के सिद्धांतों के संदर्भ में ऑरवेल द्वारा प्रयुक्त शब्द ‘मानवता-विरोधी’ को पढ़कर क्या प्रतिक्रिया होगी लेकिन अगर यह शब्द आंखों को खटके तो फिर खटक को दूर करने का एक सूत्र ऑरवेल के लेख में ही मौजूद है. गांधी की संतई पर कटाक्ष करते हुए ऑरवेल लिखते हैं- ‘ बेशक, दारु, तंबाकू जैसी चीजों से किसी संत को जरुर ही बचना चाहिए लेकिन संतई ऐसी शै है जिससे मनुष्य-मात्र को बचना चाहिए.’
अगर गांधी के संदर्भ में बहु-प्रयुक्त संत बनाम राजनेता का यही द्वैत विदेश में आज के कोर्बिन और बीते कल के ऑरवेल के लिए गांधी को अबूझ बनाता है तो देश में गांधी की राजनीति के संगी-साथियों या फिर संगी-साथियों से समानान्तर दूरी बनाकर गांधी की राजनीति को साक्षी-भाव से देखने वाले साहित्यकारों को भी. नेहरु ने स्वीकार किया है कि ‘गांधी को समझ पाना बहुत मुश्किल है. कभी-कभी उनकी भाषा एक औसत आधुनिक के लिए तकरीबन अबूझ हो जाती है.’’ ब्रिटिश प्रधानमंत्री रैम्जे मैक्डोनाल्ड ने जब वंचित तबकों के लिए पृथक निर्वाचक-मंडल की मंजूरी दी और गांधी ने विरोध में आमरण-अनशन की ठानी तो नेहरु को अचरज हुआ. गांधी के इस फैसले को याद करते हुए उन्होंने लिखा है- “राजनीतिक प्रश्नों पर उनके धार्मिक और भावुक रुख और इस मामले में बार-बार ईश्वर की दुहाई देने को लेकर मुझे  क्रोध आता था. वे तो  यह जताता जान पड़ते थे कि ईश्वर ने उन्हें उपवास के दिन के बारे में संकेत किया है. कितनी खराब बात है यह !.”
‘संत होकर आधुनिक नहीं हुआ जा सकता और चूंकि आधुनिक नहीं हुआ जा सकता इसलिए व्यक्ति-सत्ता को प्रतिष्ठित करने वाली लोकतांत्रिक राजनीति भी नहीं की जा सकती’—इस सोच ने गांधी के संगी-साथियों की आंखों में गांधी को अबूझ बनाया. नेहरु के प्रतिस्पर्धियों में से एक आचार्य कृपलानी की गांधी पर लिखी किताब ‘गांधी: हिज लाइफ एंड थॉट’ के एक अध्याय का शीर्षक ‘वाज गांधीजी माडर्न’ बहुत कुछ यही बताता प्रतीत होता है. कृपलानीगांधी के अन्यतम साथियों में हैं. ‘भारत का भावी प्रधानमंत्री कौन’- इस सवाल पर आजादी की विहान-वेला में जब कांग्रेस के भीतर मतदान हुआ तो सरदार पटेल के बाद आचार्य कृपलानी के पक्ष में सर्वाधिक मत पड़े थे लेकिन गांधीके निर्देश पर दोनों ने नेहरु के पक्ष में अपना नाम वापस लिया था. कहते यह भी हैं कि गांधी के ‘गांव-गणराज्य’ के सपने से कांग्रेस को दूर जाता देखकर उन्होंने पार्टी छोड़ी और अपने को ‘कुजात गांधीवादी’ कहने वाले लोगों की राजनीतिक-धारा में शामिल हुए. जीवन की आखिरी सांस भी उन्होंने साबरमती आश्रम में ली.
नेहरु की पश्चिमी तर्ज की आधुनिकता पर किसी और को कोई शक हो तो हो लेकिन कृपलानी के मन में रंच-मात्र ना था. उन्होंने नेहरु की पश्चिमी काट की आधुनिकता को गांधी की देशज आधुनिकता के बरक्स रखकर चुटकी लेते हुए लिखा है—“जवाहरलाल के सोच की धारा पश्चिमी थी, उनकी जीवन-दृष्टि दोलायमान थी, कभी भारत की तरफ डोल जाती थी तो कभी पश्चिम की तरफ. जन-साधारण के मुहावरे में व्यक्त गांधीजी के विचार पश्चिम से बहुधा प्रभावित होने के बावजूद मुख्य रुप से भारतीय थे.” दिलचस्प यह है कि गांधी को आधुनिक बताने के लिए जब वे दलील देते हैं तो उनका चित्त भी उसी तरह दोलायमान होता है जैसा कि उन्होंने नेहरु के संदर्भ में लक्ष्य किया है और वे गांधी के ‘सत्य’ की खोज को गुण-धर्म में प्रयोगशालाओं की परखनली में खोजे जाने वाले वैज्ञानिकों के सत्य के बराबर मान बैठते हैं, मानो अंतिमत्ता का दावा ना करने भर से प्रयोगशालाओं का सत्य उसी तरह ईश्वर में विश्वास की निष्पत्ति हो जैसे कि गांधी का सत्य.
कृपलानी लिखते हैं कि गांधीजी अरुप ईश्वर के विश्वासी थे लेकिन “क्या ईश्वर में विश्वास तर्कयुक्ति(रैशनलिटी) और विज्ञान(साईंस) के विरुद्ध है? सभी महान वैज्ञानिक नास्तिक हैं. वे मानते हैं कि सब कारणों के एकमात्र कारण जो स्वयं कारणहीन हैं, से विज्ञान का कोई लेना-देना नहीं है. दरअसल, आज के वैज्ञानिकों ने तो कारणता के विचार को ही छोड़ दिया है. वे मात्र परिवर्तन की प्रक्रियाओं को खोजते और पकड़ते हैं. न्यूटन, आईन्सिटीन, जे सी बोस, रमण और कई अन्य ईश्वर में विश्वास के पक्षधर हैं, वे सिर्फ प्रयोगशालाओं के भीतर ईश्वर को लेकर नहीं जाते और उनकी खोज सत्य की खोज थी जो कि गांधी के अनुसार ईश्वर है !” चूंकि विज्ञान का सत्य प्रयोग का विषय है, उसका बारंबार प्रक्रियाबद्ध अनुसंधान किया जाता है, वह अंतरिम ही होता है, अंतिम नहीं और गांधी के सत्य के प्रयोग में भी अनिवार्य रुप से यही गुण मिलते हैं इसलिए गांधी आधुनिक मानव हैं, चिर-पुरातन का साक्ष्य देते महात्मा नहीं— कृपलानी के इस तर्क का एक इस्तेमाल गांधी के अध्येता भीखू पारेख ने भी किया है. इस तर्क की मुश्किल यह है कि अंतिम तौर पर वह आधुनिकता के मूल्यों को विज्ञान से ही सिद्ध मानता है धर्म से नहीं और दूसरे स्वयं गांधी का लिखा-कहा इस स्थापना से मेल नहीं खाता. गांधी सत्य की अपनी तलाश को ईश्वर की अपनी धारणा की अनिवार्य निष्पत्ति बताते हैं.
गांधी के सत्य के बारे में जो बात राजनेता आचार्य कृपलानी और राजनीति-विज्ञानी भीखू पारेख नहीं लक्ष्य कर पाये आश्चर्यजनक तौर पर वह बात गांधी-भावी साहित्यकार जैनेन्द्र ने भांप ली थी. लगभग पाँच दशक पहले छपी किताब ‘अकालपुरुष गांधी’ में जैनेन्द्र के गांधी विषयक सोच-विचार संकलित हैं. किताब की प्रस्तावना के लेखक धर्मवीर ने नोट किया है कि जैनेन्द्र की गिनती हालांकि गांधीवादियों में होने लगी है लेकिन वादी तो क्या जैनेन्द्र अपने को ‘गांधी का अनुयायी कहने में भी संकोच’ करते हैं और जैनेन्द्र की विशिष्टता के उल्लेख में लिखा है कि वे ‘उन चिन्तक साहित्यकारों में हैं जिन्होंने अपनी निजता खोये बिना गांधी-विचार को जांचा परखा है ’. किताब में एक लेख है ‘निपट मानव गांधी’. लेख का शीर्षक अपने आप में इस बात की सूचना है कि लेखक ने गांधी के ऊपर महात्मा का चोला नहीं ओढ़ाया बल्कि उन्हें ‘निपट मानव’ ही मानकर सोच-विचार किया है. गांधी ने स्वयं के किसी अनूठेपन या मौलिकता का दावा नहीं किया लेकिन जैनेन्द्र को गांधी में अनूठापन दिखता है अनूठापन इस बात का कि गांधीको “विज्ञान और शास्त्र ना ढंक पाता है, ना खोल ” पाता है. इसलिए “गांधी को वैज्ञानिक प्रणालियों से पाना अंसभव” है  जैनेन्द्र को लगता है कि गांधी सांसारिक नियमों के अनुसार नहीं हैं. सांसारिकों के बारे में तो “मनस्तत्व विज्ञानी वे नियम प्रस्तुत कर सके हैं जो बता देते हैं कि एक आदमी और सब आदमी क्यों और किन प्रेरणाओं के अधीन विविध वर्तन कर रहे हैं ” लेकिन गांधी बारे में यह नहीं बताया जा सकता. गांधी विरले लोगों में हैं, जैनेन्द्र के शब्दों में—“अतर्क्य पुरुष” जिनकी “कुंजी लाख खोजने पर भी दुनिया की नजर में नहीं चढ़ती ”.
गांधी को अतर्क्य पुरुष क्यों कहा जैनेन्द्र ने ? वे गांधी का ईश्वर विषयक कथन उद्धृत करते हैं—“गांधीजी ने एक बार कहा मेरा सबकुछ ले लो मैं रहूंगा. हाथ काट लो, आँख कान ना रहें तब भी रहूंगा. सिर जाये तब भी कुछ पल रह जाऊं. पर ईश्वर गया कि तब तो मैं उसी दम मरा हुआ हूं.” गांधी का ईश्वर विषयक यह कथन ही उनके अतर्क्य होने का कारण है. जैनेन्द्र के शब्द हैं- “यह बात पढ़ने में चमत्कारी लगती है पर समझ में भी वह बंधकर बैठती है क्या. ईश्वर के मंदिर हों और उसकी पूजा हुआ करे, यहां तक तो ठीक है. इससे आगे नित्य-प्रति के काम से संबंध रखने वाली बुद्धि और तर्क की भाषा इस ईश्वर को अपने में कहां बैठाये. परिणाम यह कि समूचे जीवन की वह नीति जो ईश्वर-पूर्वकता से आरम्भ होती है गांधीजी तक सीमित जान पड़ती है. व्यवहार से गांधी जी की समाज-नीति अनमिल और असिद्ध लग आती है. उसमें तर्क का साफ सूत नहीं मिलता. लौकिक और गांधीजी के बीच का यह भेद मौलिक है. किसी तरह के ऊपरी तर्क से इस भेद को उड़ा देना खतरनाक हो सकता है.”
इस भेद को दुनिया उड़ा देती है इसी कारण गांधी को समझ नहीं पाती—“धर्मवादी और ईश्वरवादी जो संसार को बंधन मानकर उनसे उत्तीर्ण होना चाहता है गांधीजी की तरफ आशा भरी निगाह से देखता है. पर यही पवित्रता का साधक उस समय गांधीजी को नहीं समझ पाता जब वे राजनीति के प्रपंचों में दीखते हैं और तरह तरह के कर्म की विराट योजनाओं का संचालन करते हैं. दूसरी और संसार में(उसके सुधार में) लगे हुए प्रकार-प्रकार के वादी कर्मीजन इस कर्मण्य और प्रतापी पुरुष गांधी को देखकर उत्साहित होते हैं. जो सत्ता उन्हें इष्ट है वह गांधी जी को सिद्ध है. फिर भी राज को लेकर जो तरह-तरह के तंत्रवाद मिलते हैं और समाज के निमित्त से जो समाजवाद और साम्यवाद मिलते हैं,उनमें से किसी एक को छोड़कर किसी दूसरे का समर्थन गांधीजी से नहीं मिलता.” जैनेन्द्र का निष्कर्ष है कि “जीवन के विभक्त दर्शनों के लिए, अध्यात्मवाद और भौतिकवाद के लिए, गांधी एक ही साथ प्रश्न और समाधान हैं. राजनीति और धर्म में भेद है, विग्रह भी है. लेकिन गांधीजी उन दोनों के अभेद हैं और संग्रह हैं. वह जीवित उदाहरण हैं इस सत्य के कि जीवन संयुक्त, समग्र और सिद्ध है तो वहां जहां वह निस्व है…इस मूल निष्ठा को पाकर फिरगांधीजी का बस एक प्रयत्न रहा है. वह यह कि अपने समूचेपन और तन को लेकर उस निष्ठा से तत्सम हो जायें…इस तरह दुनिया में रहकर गांधीजी सदा परीक्षा में हैं और उनके हाथो में राजनीति भी सदा परीक्षा में.”
अद्भुत रुप से जैनेन्द्र के इस गांधी-विवेचन में गांधी के एक आत्म-वक्तव्य की गूंज सुनायी देती है. ‘निपट मानवगांधी’ शीर्षक लेख के लिखे जाने के बरसों पहले यह आत्म-वक्तव्य गांधी ने डा. सर्वपल्ली राधाकृष्णन को उनके प्रश्न के उत्तर के रुप में दिया था. यह छपा ‘कंटेपररी इंडियन फिलॉस्फी’ नाम की किताब में. किताब लंदन में 1936 में डा राधाकृष्णन के संपादन में छपी. छापने का उद्देश्य था “पूरब और पश्चिम के समग्र मानस की श्रेष्ठतर पारस्परिक समझ” बनाना. और इस उद्देश्य की पूरा करने के लिए भारत के तत्कालीन प्रतिनिधि दार्शनिक के तौर पर महात्मा गांधी, रबीन्द्र टैगोर, स्वामी अभेदानंद, हरिदास भट्टाचार्य, के सी भट्टाचार्य, जी सी चटर्जी, आनंद कुमारस्वामी, एन जी दामले, भगवान दास, रास बिहारी दास और सुरेन्द्रनाथ दासगुप्ता समेत पच्चीस चिन्तकों के आलेख छापे गये.  पहला ही तकरीबन 500 शब्दों का आलेख आत्म-वक्तव्य के रुप में गांधी का है. गांधी के इस आत्म- वक्तव्य को महत्वपूर्ण मानने की वजह है इसका परिवेश. गांधी ने यह आत्म-वक्तव्य किसी तात्कालिक राजनीतिक समस्या के दबाव में प्रस्तुत नहीं किया था. ना ही यह वक्तव्य पक्ष-प्रतिपक्ष के वैसे द्वन्द्व का परिणाम है जैसा कि गांधी की किताब हिन्द स्वराज में देखने को मिलता है. हिन्द-स्वराज के पात्र ‘संपादक’ और ‘पाठक’  के वाद-विवाद अपने पैनेपन में भले बेजोड़ लगें लेकिन वहां तर्कों का पैनापन प्रतिपक्षी को तर्क के सहारे ध्वस्त करने की मंशा का परिणाम है, सत्य के भावना-निरपेक्ष अनुसंधान का नहीं. हिन्द-स्वराज में घोषित तौर पर द्वन्द्व पूरब और पश्चिम के बीच है जबकि ‘कंटेपररी इंडियन फिलॉस्फी’ का घोषित उद्देश्य ‘पूरब और पश्चिम के समग्र मानस की श्रेष्ठतर समझ’ बनाना है.
‘कंटेपररी इंडियन फिलॉस्फी’ के लिए राधाकृष्णन ने गांधी से तीन सवाल पूछे थे- (क) आपका धर्म क्या है, (ख) आप धर्म में कैसे प्रवृत्त हुए, और (ग) सामाजिक जीवन पर इसका क्या असर रहा है ? प्रश्नों की प्रकृति से ही संकेत मिलते हैं राधाकृष्णन ने गांधी को धर्मप्राण मानकर सवाल किए. गांधी का उत्तर इसके अनुकूल ही था. गांधी ने पहले सवाल के जवाब में लिखा “मैं धर्म से हिन्दू हूं जो मेरे लिए मानवता का धर्म है और जिसमें मुझे ज्ञात सारे धर्मों का श्रेष्ठतम् शामिल है. ” दूसरे प्रश्न के उत्तर में बताया—“मैं इस धर्म में सत्य और अहिंसा यानी व्यापक अर्थों में प्रेम के रास्ते प्रवृत्त हुआ. यह कहने की जगह कि ‘ईश्वर सत्य है’, हाल-फिलहाल मैंने अपने धर्म को परिभाषित करने के लिए ‘सत्य ईश्वर है’ कहना शुरु किया है… क्योंकि ईश्वर का नकार तो ज्ञात है लेकिन सत्य का नकार नहीं. यहां तक कि मनुष्यों में जो सर्वाधिक अज्ञानी हैं, उनमें भी कुछ सत्य है. हम सब सत्य की कौंध हैं. इस कौंध का सकल-समग्र अनिर्वचनीय -अब तक अज्ञात सत्य, जो कि ईश्वर है. मैं अनवरत प्रार्थना के सहारे रोज ही इसके निकट पहुंचता हूं.” और तीसरे प्रश्न के उत्तर में गांधी ने बिल्कुल उसी शब्द का प्रयोग किया जिसका अपने गांधी-विवेचन में जैनेन्द्र ने किया है.गांधी ने कहा—“ऐसे धर्म के प्रति सच्चा होने के लिए प्रत्येक जीवन की अनवरत-अविराम सेवा में स्वयं को निस्व करना पड़ता है. सत्य का साक्षात्कार जीवन के अनंत सागर में विलीन हुए और इससे तदाकार हुए बिना असंभव है, इसलिए समाज-सेवा से मेरी निवृति नहीं है.”
गांधी नाम की जो पहेली गांधी के अनुगामियों और अध्येताओं के बीच उलझती जाती है, जैनेन्द्र जैसा सरीखा अपनी निजता को बरकरार रखने वाला साहित्यकार उसे सुलझा लेता है. क्या यह भी कवि के रवि से आगे होने का एक साक्ष्य नहीं है !

चंदन श्रीवास्तव

चंदन श्रीवास्तव

मूलतया छपरा (बिहार) के निवासी, पिछले पंद्रह सालों से दिल्ली में। आईआईएमसी और जेएनयू में पढ़ाई। “उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध में हिन्दी लोकवृत्त का निर्माण” शीर्षक से पीएचडी, दिल्ली के कॉलेजों में छिटपुट अध्यापन, फिर टीवी चैनल की नौकरी और अब विकासशील समाज अध्ययन पीठ (सीएसडीएस) की एक परियोजना इंक्लूसिव मीडिया फॉर चेंज से जुड़े हैं। इनसे  chandan@csds.in पर संपर्क संभव है। 

रुपकों-प्रतीकों का आख्यान और दिल्ली चुनाव: चंदन श्रीवास्तव

By चंदन श्रीवास्तव

जब जनता जागती है

किसी को लगा यह दीये और तूफान की लड़ाई थी, किसी ने कहा एक कंकड़ पहाड़ से भिड़ गया है, कोई बोल रहा था दसलखा सूट से डेढ़ सौ रुपल्ली का मफलर उलझ गया है। लोग साल भर से दिल्ली में जनता की सरकार देखने को आतुर थे और ज्यों-ज्यों मतदान का दिन नजदीक आ रहा था वे दिल्ली में सरकार बनाने की लड़ाई को रुपकों और प्रतीकों में बाँधकर आपस में बोल-बतिया रहे थे, अपने-अपने मुहावरे में उसके अर्थ निकाल रहे थे। दिल्ली विधान-सभा के चुनाव के नतीजों के अर्थ पार्टियों को हासिल मत-प्रतिशत के विश्लेषण से नहीं बल्कि इन रुपकों और प्रतीकों को समझने से खुलते हैं। कारण यह कि आम आदमी पार्टी ने दिल्ली विधानसभा चुनावों में जो जीत हासिल( कुल मतों का 54 प्रतिशत) की है उस जीत को वह खुद भी चाहे तो अब भविष्य में नहीं दोहरा सकती। आम आदमी पार्टी की इस सुनामी सरीखी जीत को सिर्फ दीया और तूफान या फिर कंकड़ और पहाड़ के रुपक के विश्लेषण के सहारे समझा जा सकता है। यह रुपक दिल्ली के मतदाताओं के मानस के बारे में बताता है। लोगों को लग रहा था कि यह पार्टियों की चुनावी लड़ाई नहीं बल्कि दो शख्शियतों नरेन्द्र मोदी और अरविन्द केजरीवाल की लड़ाई है, एक ऐसी लड़ाई जिसमें सेर की भिड़ंत सवा सेर नहीं बल्कि मामला हाथी के जोर के आगे एक चींटी के अड़ जाने का है। राजनीतिक जोर के मामले में एकदम से गैर-बराबर जान पड़ती इस लड़ाई में लोगों ने उसका साथ दिया जो सबसे निर्बल जान पडा रहा था। नतीजा आपके सामने है- ‘चींटी शक्कर ले चली- हाथी के सर धूलि!’

By Anindito Mukherjee, reuters

By Anindito Mukherjee, reuters

यह जीत दरअसल भारत के अंतिम जन के भीतर पलती उस नैतिकता की जीत है जो अपने मन को सदियों से यह कहकर समझाता आया है कि ‘निर्बल के बल राम’। उत्तर भारत के गांवों में कहते हैं ‘ना अन्हरा गैया(अंधी गाय) के राम रखवईया’। और अपनी इसी नैतिकता के तकाजे से जनता ने आम आदमी पार्टी का साथ दिया क्योंकि अरविन्द केजरीवाल अपनी कथनी और करनी से बीते एक साल से लोगों को जताते-बताते आ रहे थे कि लोकतंत्र में जनता ही जनार्दन होती है। उन्होंने लोगों का विश्वास हासिल हुआ क्योंकि वे निस्संकोच कहते रहे कि केजरीवाल महत्वपूर्ण नहीं है, आम आदमी पार्टी भी महत्वपूर्ण नहीं है, बल्कि लोकतंत्र में जनता और उसकी जरुरतों का ही प्राथमिक तथा अंतिम तौर पर महत्व है। आम आदमी पार्टी का यही संदेश दिल्ली विधानसभा चुनावों में जीत गया है। लोगों ने आम आदमी पार्टी को नहीं बल्कि खुद को वोट दिया है, स्वयं ही को जिताया है।

भाजपा से सबसे बड़ी चूक इसी मोर्चे पर हुई। उसकी मजबूती ही उसकी सबसे बड़ी कमजोरी बन गई। फिर से यह बात सच हुई कि जो किसी ने नहीं हारता वह आखिर को खुद ही से हार जाता है। भाजपा मान चुकी थी कि पार्टी नहीं जीतती पार्टी का चेहरा जीतता है। उसका यह विश्वास लाजिम था क्योंकि नरेन्द्र मोदी के चेहरे को आगे करके भाजपा मई महीने से लेकर अब तक लगातार चुनाव जीतती आ रही थी। भाजपा को विश्वास था, जनता खुद से कोई निर्णायक राय नहीं बना सकती बल्कि रणनीतिक कौशल और प्रबंधन के बूते उसे भाजपा के पक्ष में राय बनाने के लिए विवश किया जा सकता है।भाजपा के भीतर यह विश्वास रणनीतिक कौशल के उस्ताद अमित शाह ने भरा था। अपने इसी विश्वास के बूते उसने दिल्ली में अपनी राज्य इकाई को हाशिया पर धकेलते हुए आंदोलनकारी की छवि बना चुकी किरन बेदी को साथ लिया। किरन बेदी ने लोगों से कहा आप एक वोट देंगे तो आपको दो-दो चीजें मिलेंगी। प्रधानमंत्री से विकास मिलेगा, किरने बेदी से सुरक्षा मिलेगी। चूक इस सोच से हुई। इस सोच ने भाजपा को चुनाव लड़ने वाली एक मशीन में तबदील किया । इस सोच ने लोगों को बताया कि भाजपा जनता को जनार्दन नहीं बल्कि प्रजा मानकर चल रही है, प्रजा जो दाता के आगे हाथ पसारे खड़ी रहती है, दाता के भरोसे रहती है। प्रधानमंत्री ने पार्टी की तरफ से प्रचार करते हुए इस सोच में योगदान दिया। उन्होंने अपने को ‘नसीबवाला’ साबित किया। लोगों का लगा प्रधानमंत्री अपने निजी नसीब से ‘देश के नसीब’ को जोड़कर देख रहे हैं।, दिल्ली के लोगों ने प्रजा की तरह नहीं बल्कि स्वतंत्र नागरिक की तरह आचरण किया और देश की किस्मत को किसी एक व्यक्ति की किस्मत से जोड़कर देखने वाली इस सोच को ही हरा दिया।

बिहार और बंगाल में होने वाले अगामी विधानसभा चुनावों के लिए दिल्ली की मतपेटियों से निकला जनादेश महत्वपूर्ण साबित हो सकता है। इस जनादेश की गूंज देश में एक नई राजनीति की इबारत लिख सकती है। इस जनादेश से बिहार, बंगाल और यूपी सरीखे राज्यों की राजनीति के लिए दो संदेश निकले हैं। एक संदेश यह कि मीडिया केंद्रित राजनीति और मुखड़ा-केंद्रित पार्टी के इस दौर की काट की जा सकती है। लोगों के कंधे पर सहानुभूति के हाथ रखकर उन्हें जताया जा सकता है कि लोग किसी एक पार्टी के बंधुआ नहीं बल्कि सचमुच सत्ता-परिवर्तन की ताकत रखते हैं। दूसरा संदेश यह कि लोगों को सिर्फ विकास भर नहीं चाहिए। लोग रोटी, कपड़ा, मकान, सेहत, शिक्षा तो सरकार से चाहते ही हैं, उनके भीतर एक न्यायबोध भी होता है। वे चाहते हैं कि संसाधनों का बंटवारा न्यायसंगत ढंग से हो। बिहार, बंगाल और यूपी के गैर भाजपा शासित दल इन दो संदेशों के आधार पर अपनी जमीन पर भाजपा के बरक्स विपक्ष का एक कारगर विचार गढ़ सकते हैं। वे दिल्ली के जनादेश से हासिल आत्मविश्वास के सहारे साबित कर सकते हैं कि विपक्ष का विचार अभी धूमिल नहीं पडा। अगर ऐसा होता है तो माना जाएगा कि भारत में लोकतंत्र अब भी पार्टी या व्यक्ति केंद्रित नहीं बल्कि जनता-केंद्रित है!

चन्दन श्रीवास्तव

चन्दन श्रीवास्तव

चन्दन श्रीवास्तव,  मूलतया छपरा(बिहार) के निवासी, पिछले पंद्रह सालों से दिल्ली में। पहले आईआईएमसी और फिर जेएनयू में पढ़ाई। “उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध में हिन्दी लोकवृत्त का निर्माण” शीर्षक से पीएचडी के बाद दिल्ली के कॉलेजों में छिटपुट अध्यापन, फिर टीवी चैनल की नौकरी और अब विकासशील समाज अध्ययन पीठ (सीएसडीएस) की एक परियोजना इंक्लूसिव मीडिया फॉर चेंज से जुड़े हैं। इनसे  chandan@csds.in पर संपर्क संभव है। 

खुशवंत सिंह- अब मैं नाच्यो बहुत गोपाल : चंदन श्रीवास्‍तव

उम्र के एक कम सौ साल पूरा करके दुनिया से रुख्सत होने वाले खुशवंत सिंह ने महज दो साल पहले फैसला किया कि अब नहीं लिखूंगा..बावजूद इसके उनका लिखना-छपना जारी रहा. यह वही अंदाज था जिसे तौबा मेरी जाम-शिकन, जाम मेरी तौबा-शिकन कहकर याद किया जाता है.  खुशवंत का पत्रकारीय लेखन और बड़े हद तक जिंदगी को लेकर उनका फलसफा भी इसी अंदाज का परिचय देता है। यहां हम श्रद्धांजलि स्वरुप दैनिक भास्कर में  पूर्व-प्रकाशित चंदन श्रीवास्‍तव  का यह आलेख दे रहे हैं जिसमें खुशवंत के लेखनि को याद किया गया था..)singh in a bulb

गो हाथ को जुंबिश नहीं आंखों में तो दम है

By चंदन श्रीवास्‍तव 

अख़बार के पन्नों पर लगातार सत्तर सालों तक चलने वाली कलम एक दिन अपनी उम्र का हिसाब जोड़े और “अब मैं नाच्यो बहुत गोपाल” के से वैरागी-भाव से कह दे कि ‘बहुत हुआ..अब और नहीं..कि मेरा समय यहीं समाप्त होता है’.. तो सहसा यकीन करना मुश्किल हो जाता है। इस हफ्ते(अक्तूबर 2011) एक अंग्रेजी पत्रिका ने लिखा है कि सरदार खुशवंत सिंह का बहुचर्चित स्तंभ अब अखबारों में नहीं दिखाई देगा। पत्रिका ने खुशवंत सिंह को यह कहते हुए उद्धृत किया है- “मैं 97 साल का हूं..अब किसी भी दिन मौत आ सकती है..। ” लेकिन अदा देखिए कि अपने लेखन में खुद को हमेशा “ एक शरारती बुजुर्ग ” के रुप में दिखाने के लिए सजग रहने वाले खुशवंत सिंह ने जब कलम हमेशा के लिए रख देने की घोषणा की है तब भी शायद ही कोई कह सके कि वैराग्य की इस वेला में उनका बांकपन चला गया। अगर बांकपन चला गया होता तो खुशवंत सिंह यह ना कहते कि लेखनि को विराम देने के बाद मुझे बहुत याद आयेंगे वे रुपये जो मिला करते थे और “वे लोग जो अपने बारे में लिखवाने के लिए मेरी चापलूसी किया करते थे ”।

कहां ढ़लती उम्र और मौत की अनसुनी आहट को भांपने की कोशिशों के बीच यह बोध कि अब लिखा ना जा सकेगा और कहां इस वैरागी-बोध के बीच रह-रह कर कोंचने वाली यह दुनियावी याद कि बहुत याद आयेंगे शब्द संवारने के मेहनताने के रुप में मिले रुपये और वह चापलूसी जो लोग अपने बारे में लिखवाने के लिए किया करते थे। पावनता के बीच किसी क्षुद्रता की यह छौंक या कह लें एक खास किस्म का बांकपन ही खुशवंत सिंह के पत्रकारीय शब्द-संसार की जान है। इसलिए, स्तंभ ना लिखने के उनके फैसले को पढ़कर कोई बहुत कोशिश करे तो भी उनके बारे में भर्तृहरि की वह पंक्ति ना याद करना चाहेगा जिसमें अफसोसनाक मंजूरी के स्वर में कहा गया है कि कालो ना याति वयमेव याता..समय नहीं बीतता हम ही बीत जाते हैं, तृष्णा जीर्ण नहीं होती हम ही जीर्ण-शीर्ण हो जाते हैं। हां, नियमित स्तंभलेखन से विदा लेते खुशवंत सिंह के बयान को पढ़कर भारतीय साहित्य के एक सर्वमान्य “शरारती” बुजुर्ग गालिब जरुर याद आयेंगे जो कह गए कि- “गो हाथ को जुम्बिश नहीं, आंखों में तो दम है,रहने दो अभी सागरो-मीना मेरे आगे।”

छोड़ दें खुशवंत सिंह के साहित्यकार, इतिहासकार और अनुवादक के रुप को और अपने को केंद्रित करें सिर्फ उनके पत्रकारीय कर्म पर तो इस भारतीय पत्रकारिता के इस बुजुर्ग के बारे में नजर आएगा कि उसकी “ शरारत ”  सिर्फ हंगामा खड़ा करने के मकसद से नहीं थी, बल्कि उसमें कोशिश हमेशा व्यवस्था खामियों से असंतुष्ट की तरह यही रहती थी कि “ यह सूरत बदलनी चाहिए ।” लेकिन उनकी शैली किसी मिशनरी पत्रकार की शैली नहीं थी जो इस या उस विचारधारा के चश्मे से सामने पड़े तथ्यों को देखता और सच्चाई के अपने मनचीते रुपाकार में फिट करता है। गैर-पत्रकारीय प्रतिबद्धताओं के साथ खुशवंत सिंह की कलम ने समझौता नहीं किया। उन्होंने बड़े-बड़ों को अपने कॉलम में उनकी क्षुद्रताओं के लिए कोसा लेकिन कुछ इस तरह की वह “गुदगुदी” और “चिकोटी” और “गप्प”जान पड़े। उन्होंने अपने से छोटों को कुछ बड़ा करने का उकसावा दिया लेकिनप्रेरणादायी प्रवचन की शैली उस शैली में नहीं जिससे उनका गुरुडम झांकता हो बल्कि कुछ इस तरह की सीख लेने वाले को लगे कि अरे यह तो मैं पहले से ही जान रहा था। खुशवंत सिंह ऐसा कर पाये क्योंकि वे पत्रकार को ना तो समाज-सुधारक की भूमिका में देखने के हामी रहे ना ही इस या उस राजनीतिक पंथ के भक्त या गुरु के रुप में देखने के पैरोकार। पत्रकारीय कर्म की अपनी स्वयात्तता होती है, घनघोर प्रतिबद्धताओं से उपजा लेखन पक्षपाती और इसी कारण मुद्दे की समग्रता को किसी हड़बड़ाई हुए एकहरेपन में समेटने वाला लेखन भी होता है- खुशवंत सिंह अपने स्तंभ में हमेशा याद दिलाते रहे।

अपने पत्रकारीय कर्म की स्वायत्तता की रक्षा में ही उन्होंने “ गप्प, गुदगुदी और शरारत ” वाली शैली विकसित की। राजनीतिक प्रतिबद्धताओं की दुहाइयों से पटे पड़े पत्रकारीय संसार में अकसर यह बात भुला दी जाती है कि बतरस किसी चीज का साधन नहीं, बल्कि स्वयं में एक साध्य हो सकता है। और, शब्दशिल्पी जानते हैं कि बतरस उस दिन से साध्य रहा है जिस दिन किसी गोपी ने कृष्ण की मुरली खास बतरस के ही लालच में छुपा दी थी- “बतरस लालच लाल की मुरली दई लुकाय”। शब्द कोई पत्थर नहीं कि उसे निशाना ताक कर किसी पर मारा जाय और कलम आखिर तक कलम ही रहती है उसे तोप या तलवार के मुकाबिल समझने के दिन मसीहाओं के साथ लद गए– खुशवंत सिंह के भीतर का शब्द-शिल्पी इस सहज स्वीकार के साथ अपनी कलम उठाता था। उनसे संबंधित हाल की दो घटनाओं के जिक्र से यह बात स्पष्ट हो जाएगी।

ज्यादा दिन नहीं हुए जो नीरा राडिया टेप-कांड में बरखा दत्त का जिक्र कारपोरेटी महात्वकांक्षाओं से ऊपजी पत्रकारिता की मलिनताओं की मिसाल के रुप में सामने आया। टेप के सार्वजनिक हो जाने के बाद आम राय यह बनी कि महत्वपूर्ण पद पर बैठे पत्रकार पत्रकारिता से एतर भी सत्ता-समीकरणों पर गोट इधर से उधर करने का काम करते हैं। पत्रकारिता की मलिनताओं के इस शोर के बीच यह खुशवंत सिंह का सजग विवेक था जिसने याद दिलाया कि यह कहानी प्रहसन से ज्यादा कुछ नहीं है क्योंकि टेप में “ एक अग्रणी चैनल के एंकर को एक महत्वाकांक्षी राजनेता के लिए सिफारिश करने को कहा जा रहा है। यह कहानी पूरी तरह से प्रहसन जान पड़ती है क्योंकि (राजसत्ता के लिए) पत्रकार की सिफारिश कोई मायने नहीं रखती।”  दूसरी घटना बरखा दत्त और राजदीप सरदेसाई की कार्यक्रमों की प्रशंसा से जुड़ी है। इसी साल मई महीने में उन्होंने हिन्दुस्तान टाइम्स में अपने स्तंभ में लिखा कि “ बरखा और राजदीप सरदेसाई अपने कार्यक्रम में आमंत्रित अतिथियों से सही सवाल पूछने के लिए भरपूर होमवर्क करते हैं। यह भी ध्यान रखते हैं कि कार्यक्रम में परस्पर विरोधी राय रखने वाले महत्वपूर्ण व्यक्ति शामिल हों ताकि दर्शक को निजी राय बनाने से पहले विभिन्न विचारों की जानकारी हो जाय।”  कोई चाहे तो इन पंक्तियों में पत्रकारिता के गुणों को लक्ष्य कर सकता है जिसके बूते वह बाकी विधाओं से अलग और स्वायत्त है।

किसी को खुशवंत सिंह के लेखन से असहमति हो सकती है, लेकिन अपने सत्तर साल के पत्रकारीय कर्म में उन्होंने पत्रकारिता के जिन विधानों (जानकारी, शिक्षा और मनोरंजन को एकरुप बनाना) का पालन किया उससे असहमत होना मुश्किल है।  हालांकि साल 1969 से इलेस्ट्रेटेड वीकली ऑव इंडिया से शुरु होने वाला उनका नियमित स्तंभ 40 सालों के अपने सफर में दर्जनों पत्रों की यात्रा करने के बाद अब मौन हो गया है लेकिन इस कॉलम ने उन्हें जो हैसियत बख्शी है वह किसी पत्रकार के लिए लंबे समय तक दुर्लभ रहेगी। पत्रकार खुशवंत सिंह की हैसियत की ही मिसाल है कि आज जब उन्होंने अपनी कलम रख दी है तो भी गुजरी 19 तारीख(अक्तूबर 2011) को द हिन्दू ने उनकी चिट्ठी को अपने लिए एक प्रमाणपत्र मानकर बॉक्स-आयटम में छापा है। कारण, इस चिट्ठी में खुशवंत सिंह वह लिखा है जो किसी भी अखबार के लिए एक मुंहमांगी मुराद की तरह है। उन्होंने द हिन्दू के लिए लिखा है-  संपादक महोदय, आप और आपके कर्मचारीगण देश को दुनिया का सबसे पठनीय अख़बार देने के लिए बधाई के पात्र हैं। ”

चन्दन श्रीवास्तव

चन्दन श्रीवास्तव

चन्दन श्रीवास्तव,  मूलतया छपरा(बिहार) के निवासी, पिछले पंद्रह सालों से दिल्ली में। पहले आईआईएमसी और फिर जेएनयू में पढ़ाई। “उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध में हिन्दी लोकवृत्त का निर्माण” शीर्षक से पीएचडी के बाद दिल्ली के कॉलेजों में छिटपुट अध्यापन, फिर टीवी चैनल की नौकरी और अब विकासशील समाज अध्ययन पीठ(सीएसडीएस) की एक परियोजना इंक्लूसिव मीडिया फॉर चेंज से जुड़े हैं। इनसे  chandan@csds.in पर संपर्क संभव है। 

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