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प्रेमचंद की भारतीयता और हिन्दी की साहित्यिक संस्कृति: चंदन श्रीवास्तव

हिन्दी की साहित्यिक संस्कृति और प्रेमचंद, लेखक- डा. राजकुमार, निबंधों ( कुल तेरह) का संकलन है और सारे लेख प्रेमचंद-विशेषी नहीं लेकिन पुस्तक का एक महत्वपूर्ण हिस्सा (कुल चार लंबे लेख) प्रेमचंद के मूल्यांकन की समस्या से जूझते हैं. चूंकि पुस्तक में भारतीय आधुनिकता को जमीन बनाकर ‘हिन्दी की साहित्यिक संस्कृति’ को समझने-बताने की कामयाब कोशिश की गई है सो पुस्तक की वैचारिकी का दायरा बड़ा हो जाता है. प्रेमचंद, हिन्द-स्वराज, सिविलाइजिंग मिशन, अंग्रेजी की जगह, हिन्दी की शक्ति, हिन्दी का जातीय संगीत, हिन्दी साहित्य का इतिहास और साहित्य, इतिहास तथा स्वाधीनता जैसे विषयों को एक सूत्र में पिरोने की भरपूर गुंजाइश बन जाती है पुस्तक में. और, ठीक इसी गुंजाइश को देखते हुए उम्मीद की जा सकती है समीक्ष्य पुस्तक की संभावनाओं का विस्तार लेखक किसी अन्य पुस्तक में बड़े फलक पर करेंगे. #लेखक

 

हिन्दी की संस्कृति और आधुनिकता का पुनर्पाठ बरास्ते प्रेमचंद

By चंदन श्रीवास्तव

प्रेमचंद पुराने हैं, इतने पुराने तो निश्चित ही कि हम उनकी रचनाओं की शत-वार्षिकी मना सकें. लेकिन, पुराना होना मात्र ‘साधुता’ की कसौटी नहीं, परीक्षा जरुरी है. पुराणमित्येव न साधु सर्वम्..’–  हिन्दी भाषा के भीतर चलने वाली साहित्य की ‘आधुनिकता’ की बहसें आपको अपने खास अंदाज में याद दिलाती हैं कि मालविकाग्निमित्रम् का सूत्रधार ऐसा आगाह कर गया है. सो, प्रेमचंद पुराने हैं तो उनकी कृतियों के परीक्षा के प्रयास भी कम पुराने नहीं.

प्रेमचंद के अध्येता जानते हैं कि शिवदान सिंह चौहान ने मार्च 1937 (प्रेमचंद की मृत्यु-1936) के अपने लेख में उनके रचना-कर्म की ‘प्रगतिशीलता’ की चर्चा की  थी. तब से लेकर अब तक प्रेमचंद को बुद्धि-विवेक की कसौटी पर ‘कलम का सिपाही’ के रुप में पढ़ा गया है और ‘कलम का मजदूर’ के रुप में भी. मूल्यांकन के लिए रचनाकार को नहीं उसकी रचनाओं के परिवेश को देखा जाना चाहिए और सबसे ज्यादा देखा जाना चाहिए रचनाकार के युग को आविष्ट करने वाली चेतना को—इस तर्क से हिन्दी साहित्य की समालोचना की आंख ने ‘प्रेमचंद और उनका युग’ तक पर नजर डाली है. ऐसे प्रयासों से प्रेमचंद के रचना-कर्म में ‘साधु-असाधु’ खोजने की सिद्ध कसौटियां बन गई हैं और अब यानि 21 वीं सदी के दूसरे दशक में यह अपेक्षित ही है कि 20 सदी के आरंभ से अपने लेखन की शुरुआत करने वाले प्रेमचंद की कृतियों की समालोचना की सिद्ध कसौटियों पर सवाल उठाये जायें. सो, सवाल खूब उठाये जा रहे हैं.

मिसाल के लिए  हिन्दी साहित्य की अंदरुनी बहसों को अपने पन्ने पर खास जगह देने वाले अखबार ‘जनसत्ता’ के पन्ने पर 2013 में जुलाई से सितंबर महीने के बीच प्रेमचंद को लेकर चले वाद-विवाद को देखा जा सकता है. खुर्शीद अनवर ने 11 अगस्त 2013 के अपने ‘प्रेमचंद को साम्यवादी बनाने की कवायद’ शीर्षक लेख में कहा कि “ प्रेमचंद को साम्यवादी घोषित करना उसी तरह से है जैसे जवाहर लाल नेहरु को गांधी से अलग कर उनपर लाल बिल्ला लगा दिया जाय.”  प्रेमचंद को साम्यवादी ठहराने की कोशिशों की परीक्षा करते हुए खुर्शीद अनवर ने अपने लेख में ध्यान दिलाया कि बेशक यह पंक्ति प्रेमचंद की है कि ‘ धन्य है वह सभ्यता जो मालदारी और व्यक्तिगत संपत्ति का अंत कर रही है और जल्दी ही या देर से दुनिया उसका पदानुसरण करेगी.. ‘ लेकिन प्रेमचंद को साम्यवादी ठहराने के लिए इतना कहना काफी नहीं’. लेख में अनवर का सवाल था कि 1936 में हुए प्रगतिशील लेखक संघ के अधिवेशन में जहां एक ओर हसरत मोहानी जैसे व्यक्ति ने कम्युनिस्ट विचारों के प्रचार-प्रसार की बात की, वहीं प्रेमचंद ने अपने भाषण में एक बार भी ऐसा कोई वक्तव्य नहीं दिया. क्या कोई उसकी वजह बता सकता है ? अनवर का निष्कर्ष था कि “प्रेमचंद को महान कथाकार  रहने देने में हम सबका भला है. साहित्य समाज के आगे चलने वाली मशाल हमेशा ही रहेगा, इसके लिए प्रेमचंद का साम्यवादी होना जरुरी नहीं है.”

अनवर के इस लेख पर प्रेमचंद के साहित्य के मशहूर अध्येता कमल किशोर गोयनका ने लिखा कि लेख के शीर्षक (‘प्रेमचंद को साम्यवादी बनाने की कवायद’) में ‘कवायद’ की जगह ‘साजिश’ शब्द का इस्तेमाल ज्यादा अच्छा होता क्योंकि “ प्रेमचंद के ‘हंस’, जनवरी, 1936 में प्रकाशित एक लेख का शीर्षक है- ‘लंदन में भारतीय साहित्यकारों की एक नई संस्था’, जिसमें लिखा है कि मुल्कराज आनंद, केएस भट्ट, जेसी घोष, एस सिन्हा, एमडी तासीर और एसएस जहीर ने लंदन में ‘दि इंडियन प्रोग्रेसिव राइटर्स एसोसिएशन’ की बुनियाद डाली, लेकिन डॉक्टर रामविलास शर्मा (मार्क्सवादी आलोचक) ने लिखा है कि नींव प्रेमचंद ने डाली, और इस प्रकार इस झूठ को इतना विस्तार दिया गया कि प्रेमचंद ‘प्रगतिशील लेखक संघ’ के संस्थापक बना दिए गए.”  मार्क्सवाद से प्रेमचंद के अलगाव को दिखाने के लिए गोयनका ने तर्क दिया कि “प्रेमचंद ने ‘हंस’ के उसी अंक में लंदन से आया घोषणा-पत्र भी प्रकाशित किया है. इसमें एक भी शब्द, एक भी उद्देश्य का संबंध मार्क्सवाद से दूर तक नहीं है. इस घोषणा-पत्र में चार प्रमुख उद्देश्य हैं- सांस्कृतिक और सामाजिक उत्थान, भारतीय स्वाधीनता, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और इंडो-रोमन लिपि की स्वीकृति. प्रेमचंद ने अंतिम को अस्वीकार करते हुए लिखा कि शेष तीन तो उन्हें आदर्श ही रहे हैं, पर इनमें कहीं भी मार्क्सवाद नहीं है और स्पष्ट है कि प्रेमचंद ने समर्थन इसलिए किया कि वे तीस-पैंतीस वर्षों से इन्हीं उद्देश्यों को लेकर चल रहे थे और वे स्वराज और भारतीय आत्मा की रक्षा के ही उपकरण थे.”

खुद कमल किशोर गोयनका ने क्या ‘आप इस प्रेमचंद को जानते हैं’(जनसत्ता, 28 जुलाई, 2013) शीर्षक अपने लेख में प्रेमचंद की नैतिकता और आधुनिकता की भूरि-भूरि प्रशंसा करते हुए उनकी कहानी ‘बालक’ की ओर ध्यान दिलाते हुए लिखा था कि इसका “ अशिक्षित नायक विवाह के छह महीने बाद उत्पन्न बच्चे को इस तर्क से स्वीकार करता है कि मैंने एक खेत खरीदा था, उसपर किसी ने फसल बोई ही थी तो क्या वह फसल मेरी नहीं होगी .”  प्रेमचंद की कहानियों के नैतिक-भाव की श्रेष्ठता और आधुनिकता-बोध की इस प्रशंसा पर दलित-चिन्तक धर्मवीर ने अपने लेख ‘हम प्रेमचंद को जानते हैं’( 4 अगस्त, 2013) में सवाल उठाया. धर्मवीर ने लिखा कि “ गोयनका और उनके प्रेमचंद ने यह बात एक बार भी नहीं सोची कि बालक कहानी में पैदा संतान किस राष्ट्र की रक्षा के लिए अपने प्राण न्यौछावर करेगी. क्या राष्ट्रवादी होने में यह जानना जरुरी नहीं कि बच्चा अपने वास्तविक पिता को जाने ? जैविक पिता से भिन्न वैवाहिक पिता की फर्जीगीरी राष्ट्रवाद नहीं है. ऐसे समाज में शूरवीर पैदा नहीं हुआ करते ”

अस्मितापरक आंदोलन की वैचारिकी के भीतर प्रेमचंद की छवि किन रंग-रेखाओं से उकेरी जा रही है उसका एक बेहतर उदाहरण रत्नकुमार सांभरिया का आलेख ‘दलित, प्रेमचंद, तुलसीदास और शहीद भगतसिंह’ हो सकता है. लेख में प्रेमचंद के शब्द-संसार की चुनिन्दा पंक्तियों के आधार पर साबित किया गया है कि वे “ग्राम्य जीवन और लोक परंपराओं से नितांत अनभिज्ञ थे. वे घोर ईश्वरवादी, भाग्यवादी और वर्णवादी थे तथा छुआछूत और जातपांत में उनका अटूट विश्वास था… प्रेमचंद- साहित्य में श्लीलता का प्रायः अभाव है और उनकी भाषा में लियाकत नहीं होने के कारण पाठक के मन को कचोटती है. विशेषतः दलितों के बारे में वे जिस भाषा-शैली का प्रयोग करते हैं, वह हृदय ही चीर डालती है.बावजूद इसके मार्क्सवादी सोच का यह मानना है कि प्रेमचंद ने उस समय दलितों के बारे में लिखा, जब लोग उनकी छाया से भी दूर भागते थे.. क्या यह तर्क इस दायरे में नहीं आता कि कोई किसी अछूत को थप्पड़ मार दे और यह तर्क दे कर उसकी प्रशंसा की जाये देखो, ‘उसने ‘अछूत’ को छुआ तो सही, दूसरे लोग तो उसकी छाया से भी दूर भागते हैं.’

सांभरिया का निष्कर्ष है कि “ प्रेमचंद-साहित्य में न दलित नेतृत्व है, न दलित चरित्र. उनकी रचनाओं के कथानक धर्मशास्त्रों के सूक्तों से ऊपर नहीं उठ पाये हैं. शास्त्र, जो अपने अंतस में पूर्वाग्रह समाये होने के कारण शूद्रों के लिये ‘‘शस्त्रों’’ से भी ज्यादा मारक साबित हुये हैं, प्रेमचंद की कलम ‘‘शास्त्र बनाम शस्त्र’’ के गिर्द घूमती है.”

वाद-विवाद के उपर्युक्त प्रसंगों को नजर में रखें तो संक्षप में कहा जा सकता है कि प्रेमचंद के साहित्य को परखने की सिद्ध कसौटियां प्रश्नांकित की जा रही हैं, अगर साहित्य की समालोचना की किन्हीं कसौटियों के तहत यह बताया गया था कि प्रेमचंद के साहित्य में आधुनिक भाव-बोध के अनुकूल राष्ट्र और व्यक्ति दोनों ही के मुक्ति के प्रसंग हैं तो अब गंगा एकदम ही उल्टी बहती दिख रही है. प्रेमचंद को ‘कलम का सिपाही’ और ‘कलम का मजदूर’ से लेकर ‘सामंत का मुंशी’ बनाने तक की यह कहानी पहली नजर में विचारोत्तेजक जान पड़ सकती है लेकिन वाद-विवाद में समाये आवेग को एक तरफ करके देखें तो स्पष्ट होगा कि प्रेमचंद के साहित्य को लेकर बना पक्ष और प्रतिपक्ष एक ही विचार-सरणी(आधुनिकता की परियोजना) का साझीदार है और इसकी पद्धित( प्रेमचंद के साहित्य से उद्धरणों का सुविधाजनक चयन) भी एक ही है. पक्ष और प्रतिपक्ष के पास व्यक्ति, समुदाय और राष्ट्र की मुक्ति को लेकर एक तयशुदा निष्कर्ष है और प्रेमचंद के साहित्य का पाठ इस तयशुदा निष्कर्ष के अनुकूल पड़ते उद्धरणों के चयन के आधार पर किया गया है. समीक्ष्य पुस्तक ‘हिन्दी की साहित्यिक संस्कृति और भारतीय आधुनिकता’  अपने-अपने मुक्ति-प्रसंग के अनुकूल प्रेमचंद की मूर्ति गढ़ने और तोड़ने की कोशिशों का संज्ञान लेने, इस कोशिश की मूल प्रस्थापनाओं को प्रश्नांकित करने और अपनी तरफ से प्रेमचंद के ज्यादा तथ्यसंगत और इतिहास-बद्ध अध्ययन का प्रस्ताव करने के कारण महत्वपूर्ण है.

समीक्ष्य पुस्तक में प्रेमचंद से आपकी भेंट साहित्यकार, पत्रकार या स्वाधीनता-सेनानी के रुप में नहीं बल्कि एक ‘चिन्तक’ के रुप में होती है. इसकी वजह भी लेखक की नजर में बहुत स्पष्ट है और इसे पुस्तक के प्राक्कथन में यों बताया गया है कि आधुनिकता के साथ पूंजीवाद, उपनिवेशवाद, राष्ट्रवाद, विज्ञान, तर्कबुद्धि और लोकतंत्र का विकास जुड़ा हुआ है और आधुनिकता की कोई बहस मार्क्स को दरकिनार कर आगे नहीं बढ़ायी जा सकती तथा भारतीय आधुनिकता की कोई भी परिकल्पना गांधी के बगैर अधूरी है. चूंकि हिन्दी की साहित्यिक संस्कृति को इन विभूतियों के चिन्तन का लाभ मिलता रहा है सो हिन्दी की साहित्यिक मेधा ने आधुनिकता के पश्चिमी महाआख्यान को आंख मूंदकर नहीं अपनाया, उसने आधुनिकता की कुछ बातें मानी तो कुछ से इनकार किया और प्रेमचंद के लेखन में इस बात के पर्याप्त साक्ष्य मिलते हैं सो “प्रेमचंद सरीखे चिन्तक को आधुनिकता के प्रोजेक्ट के समर्थन में निशेष कर देने के बजाय उन बिन्दुओं पर पर पुनर्विचार करने की आवश्यकता है जहां ये आधुनिकता की सख्त आलोचना करते हैं. वस्तुतः हिन्दी की साहित्यिक संस्कृति(या संस्कृतियां) को समझना प्रकारांतर से इस प्रक्रिया की समग्रता, विशिष्टता और अपनी सभ्यता की आंतरिक गतिकी को भी समझना है.”

पुस्तक के प्राक्क्थन के इस अंश से स्पष्ट हो जाता है कि उसमें चर्चा भारतीय आधुनिकता की ही प्रधान है और प्रेमचंद की चर्चा ‘हिन्दी की साहित्यिक संस्कृति’ के पुनर्पाठ के मकसद की गई है. इस पुनर्पाठ के क्रम में ही पुस्तक में प्रेमचंद का एक चिन्तक के रुप में विशिष्ट योगदान रेखांकित किया गया है और हिन्दी की साहित्यिक संस्कृति की वर्चस्वशील धाराओं को प्रश्नांकित किया गया है. सवाल उठता है कि साहित्यिक संस्कृति से क्या समझें और इसके पुनर्पाठ की प्रविधि क्या हो. समीक्ष्य पुस्तक में फ्रेडरिक जेम्सन के हवाले से लिखा मिलता है कि “साहित्यिक संस्कृतियां ऐसे कोड के रुप में सामने आती हैं जिनके बारे में हम प्रायः भूल चुके होते हैं. वे एक ऐसी बीमारी के लक्षण की तरह हैं जिसे हम बीमारी के रुप में पहचानते ही नहीं., वे समग्रता के एक टुकड़े की तरह हैं जिसे देख सकने वाला अंग हम पहले ही खो चुके हैं. ये साहित्यिक रचनाएँ, सामाजिक यथार्थ को निर्मित करने वाली दूसरी वस्तुओं की तरह पुकार रही हैं कि हम उनकी टीका व्याख्या करें, उनका अर्थ करें, उनकी पहचान करें साहित्यिक आलोचना का यह दायित्व है कि वह अंतर्बाह्य अस्तित्व और इतिहास की तुलना जारी रखे. ”

लिहाजा समीक्ष्य पुस्तक के लेखक ने अपने लिए कठिन दायित्व चुना है क्योंकि साहित्यिक संस्कृति अगर समग्रता का वह टुकड़ा हो जिसे देख सकने वाला अंग पहले ही खो चुका है या फिर वह ऐसी बीमारी का लक्षण हो जिसकी बीमारी के रुप में पहचान ही ना हो तो फिर सवाल उठेगा कि सामाजिक यथार्थ का निर्माण करने वाली इस जरुरी चीज को जानने के लिए साहित्यिक आलोचना कौन-से औजार अपनाये ? लेखक ने ध्यान दिलाया है कि “औपनिवेशिक वर्चस्व के दौरान उपनिवेशित सभ्यता ऐसी विस्मृति का शिकार होती है कि अपनी सभ्यता के कोडो की उपनिवेशवाद द्वारा की गई व्याख्या को ही थोड़े बहुत हेर-फेर के साथ स्वीकार कर लेती है.” इस स्वीकार के लक्षण समीक्ष्य पुस्तक के लेखक को प्रेमचंद के मूल्यांकन को लेकर बनी कसौटियों और उन कसौटियों को प्रश्नांकित करने वाले हाल के अस्मितापरक प्रयासों में दिखते हैं.

पुस्तक के लेखक के मुताबिक अकारण नहीं है कि प्रेमचंद का अध्ययन प्रायः आधुनिकता द्वारा स्वीकृत और राजनीतिक दृष्टि से सही मुद्दों के आधार पर किया गया है. इसी कड़ी में प्रेमचंद को काल-क्रमानुसार देखने और किसी एक कालखंड की रचनाओं को समझ के करीब पड़ने के कारण विशेष तरजीह दी गई. जैसे प्रेमचंद के अंतिम दौर की रचनाओं को मार्क्सवादी विद्वानों ने ज्यादा महत्व दिया क्योंकि उनके अनुसार प्रेमचंद इस दौर में लगभग मार्क्सवादी हो गये थे. इस तरह के अध्ययन की “विडंबना यह है कि वह यह मानकर चलता है कि सच क्या यह उसे पहले से मालूम है. इस सच के समर्थन में एक गवाह के रुप में पेश करने के लिए वह प्रेमचंद को ठोक पीटकर अपने सच के अनुरुप ढालने की कोशिश करता है. यानी प्रेमचंद स्वयं में महत्वपूर्ण नहीं हैं. महत्वपूर्ण है वह सच जो उसे पहले से मालूम है. यह प्रेमचंद का रिडक्शन है. पहले से ज्ञात सच में प्रेमचंद के रचनात्मक अवदान को हजम कर लेने की कोशिश है.”

सवाल उठता है, प्रेमचंद के मार्क्सवादी अध्येताओं को कौन सा सच पहले से पता है जिसमें प्रेमचंद को रिड्यूस किया जा रहा है ? यहां बात आती है प्रेमचंद की भारत-विषयक परिकल्पना की. समीक्ष्य पुस्तक के मुताबिक प्रेमचंद एक ऐसे भारत की कल्पना करते हैं जो पश्चिम से तात्विक और बुनियादी रुप से भिन्न है. वामपंथी ऐसी भिन्नता की कल्पना नहीं कर सकते थे क्योंकि “वामपंथ के सार्वभौमिक महाआख्यान में भिन्नता के लिए खास जगह नहीं थी. भिन्नता का मतलब उनके लिए विशिष्टता नहीं, कमी थी,  जो उन्हें भारत के इतिहास में दिखायी पड़ती थी. पश्चिम के तर्ज पर भारत के इतिहास में पुनर्जागरण, ज्ञानोदय, राष्ट्रवाद, औद्योगिक क्रांति, व्यक्तिवाद वगैरह की आपेक्षिक अनुपस्थिति देख उनके ‘करुणाकलित हृदय’ में आह सी उठती थी और फिर वे इस शोध में जुट जाते थे कि क्या कारण(अर्थात् कमी थी) थे जिनकी वजह से हमारे यहां…..। कुल मिलाकर भारत के अतीत-इतिहास में गर्व करने लायक उन्हें कुछ खास नजर नहीं आता था. मार्क्स की तरह उन्हें भी लगता था कि शैतान को भी उसका जायज हक मिलना ही चाहिए. सदियों से चली आ रही अर्थव्यवस्था को नष्ट कर उपनिवेशवाद ने भारतीय इतिहास को पटरी पर ला दिया. भारत को इतिहास के राजपथ पर घसीट लाने का सेहरा उपनिवेशवाद के माथे बांध देने के बाद उपनिवेशवाद का एक प्रगतिशील पक्ष तो निकल आया लेकिन इसी के साथ भारत की इतिहास की विशिष्टता का महत्व समझने वाली दृष्टि भी गायब हो गयी. लब्बोलुआब यह कि उपनिवेशवाद आया तो भारत की जड़ता टूटी और पूंजीवाद का विकास शुरु हुआ. पूंजीवाद आ गया तो देर-सबेर समाजवाद आना ही है. यह सोचने की जहमत नहीं उठायी गई कि सभ्यताओं के विकासक्रम और जीवन-मूल्य एक जैसे नहीं होते.”

अस्मितावादी आंदोलन की वैचारिकी के भीतर प्रेमचंद के मूल्यांकन के प्रयासों को लेकर भी समीक्ष्य पुस्तक यही कमी देखती है. पुस्तक अस्मितावादी वैचारिकी की इस विडंबना की ओर ध्यान दिलाती है कि जमींदारी व्यवस्था खत्म कर किसानों में जमीन बांटने और बिना किसी भेदभाव के सभी को समान नागरिकता देने का काम उपनिवेशवाद ने नहीं राष्ट्रवाद ने किया. लेकिन दलित चिन्तकों को औपनिवेशिक शासन के सिवा बाकी सभी वर्णवादी लगते हैं– “ एकतरफा प्रेम में बौराये इन बेचारों को यह भी नहीं पता कि औपनिवेशिक शासक इनके बारे में क्या सोचते हैं. उल्लेखनीय है कि औपनिवेशिक शासक सफेद नस्ल को सर्वश्रेष्ठ मानते थे. सभी भारतीय उनकी दृष्टि में हीन प्रजाति के थे. इन हीनों में सवर्ण बेहतर थे क्योंकि वे पतित आर्य थे, दलित तो पतित आर्य भी नहीं थे. वे निकृष्टतम प्रजाति के थे. हिन्दी में इन दिनों प्रगतिशीलता का एक नया ढब निकला है. इस ढब के मुताबिक उपनिवेशवाद भारत के लिए और विशेष रुप से दलितों के लिए वरदान था. दलितों का उद्धार करने के लिए ही अंग्रेजों ने भारत को उपनिवेश बनाया था. बुरा हो राष्ट्रवादियों का जिन्होंने उन्हें ज्यादा दिन टिकने नहीं दिया. वे देर से आये और जल्दी चले गये !..”

प्रेमचंद के मूल्यांकन की कसौटियों में पेवस्त औपनिवेशिक ज्ञानकांड के रग-रेशे दिखाते हुए उसके बरक्स पुस्तक में भरपूर साक्ष्यों के साथ प्रेमचंद की पश्चिम के प्रति अवधारणा का रेखांकन किया गया है. इसी क्रम में पश्चिमी राष्ट्रवाद के बारे में प्रेमचंद की सोच और भारतीय राष्ट्रवाद से उसकी भिन्नता के बारे में विचार किया गया है फिर भारतीय राष्ट्रवाद की इकाइयों— शहर, नागरिक-समाज, गांव(पारंपरिक सामुदायिकता) और गांव में भी दलित और स्त्री के बारे में प्रेमचंद के विचारों की चर्चा है. इस चर्चा से बड़े हद तक पुस्तक की मूल स्थापना सिद्ध हो जाती है कि “प्रेमचंद सरीखे चिन्तक को आधुनिकता के प्रोजेक्ट में समर्थन में निःशेष कर देने के बजाय उन बिन्दुओं पर पर पुनर्विचार करने की आवश्यकता है जहां ये आधुनिकता की सख्त आलोचना करते हैं. वस्तुतः हिन्दी की साहित्यिक संस्कृति(या संस्कृतियां) को समझना प्रकारांतर से इस प्रक्रिया की समग्रता, विशिष्टता और अपनी सभ्यता की आंतरिक गतिकी को भी समझना है.”

इतिहास को विवेचना का विषय बनाने वाली कुछ पुस्तकें करुणा के भाव से लिखी होती हैं, कुछ सात्विक क्रोध से. न्याय की भावना दोनों ही पुस्तकों की प्रेरक होती है लेकिन इस भाव का निर्वाह दोनों में अलग-अलग होता है. करुणा के भाव से लिखी पुस्तकों में प्रिय के खो जाने का मलाल नहीं होता, बल्कि स्वीकृति होती है. ऐसी पुस्तकों में जोर अपने खोये या अधूरे पाये हुए को भरपूर ब्यौरे के साथ बताने पर होता है. कोई चीज खो गयी या अधूरी हासिल है तो इसकी वजहें क्या रहीं— ऐसी खोज करुणा भाव से लिखी किताबों में प्रधान नहीं होती. इतिहासकार सुधीरचंद्र की पुस्तक ‘गांधी-एक असम्भव सम्भावना’ करुणा के भाव से लिखी पुस्तक का एक अच्छा उदाहरण हो सकती है. सात्विक क्रोध से लिखी पुस्तकों में किसी चीज के खोने या अधूरा हासिल होने का मलाल बहुत मुखर होता है और उसके कारणों की खोज बड़ी प्रखर. जोर अपने खोये या हासिल को महीन ब्यौरे में बताने पर कम हो जाता है और कारणों की खोज पर ज्यादा. किसी प्रिय चीज के खो जाने या उसके अधूरे रुप में हासिल होने की जाहिर वजह के साथ सात्विक क्रोध से लिखी पुस्तकें बहुत ज्यादा जिरह करती हैं. सो, खोज ली गई वजहों के साथ लेखक की हमदर्दी नहीं बन पाती और इसका एक घाटा होता है— जिन बातों को किसी चीज के खो जाने या अधूरा हासिल होने की वजह के रुप देखा जा रहा है उनके दोष बड़े प्रखर होकर उभरते हैं, अगर कोई गुण है तो वह दब जाता है. समीक्ष्य पुस्तक भी सात्विक क्रोध से लिखी गई है और उसमें दोष-विवेचन जितना प्रखर है, गुणों की चर्चा या कह लें एक लें उनके साथ मुठभेड़ की कोशिश कम है.

मिसाल के लिए, समीक्ष्य पुस्तक के लेखक के इस विचार से इनकार नहीं किया जा सकता कि मार्क्स ने भारत के पुराने समाज को इतिहास-धारा से वंचित माना है और अंग्रेजी शासन को वह शक्ति जिसने अपनी तमाम बर्बरता के बावजूद भारत को इतिहास(या कह लें आधुनिकता) के प्रगति-पथ पर लगा दिया और भारतीय स्वाधीनता संग्राम या फिर आधुनिक भारत के इतिहास-लेखन का उपक्रम एक हदतक इस विचार का साझीदार होने के कारण औपनिवेशिक ज्ञान-कांड(लेखक के शब्दों में पश्चिम की आधुनिकता) से मुक्त नहीं है. लेकिन विचार के इस बिन्दु तक पहुंचने के बाद यह सोचा जा सकता है कि क्या किन्हीं कमियों के बावजूद प्रेमचंद के लेखन को समझने में मार्क्सवादी मीमांसा किसी हद तक सहायक हो सकती है ?

यह अलग से कोई प्रश्न नहीं बल्कि पुस्तक के प्रधान कथ्य के तार्किक विस्तार से जुड़ा सवाल है. उदाहरण के लिए, समीक्ष्य पुस्तक में प्रेमचंद को गांधी से प्रभावित माना गया है और गांधी के चिन्तन में 19 वीं सदी के चिन्तक भूदेव मुखोपाध्याय के विचार की अनुगूंज सुनी गई है. पुस्तक ध्यान दिलाती है कि ‘गांधी जैसी दृढ़ता के साथ आधुनिकता की ज्ञानमीमांसात्मक परम्परा को चुनौती देने वाला कोई नहीं दिखता’ लेकिन बंगाल में अरविन्दो और विवेकानंद के पहले से पश्चिम अर्थात आधुनिकता की मूलभूत आलोचना शुरु हो गई थी. साक्ष्य के रुप में समीक्ष्य पुस्तक में भूदेव मुखोपाध्याय के ग्रन्थ सामाजिक प्रबन्ध का एक लंबा हिस्सा उद्धृत किया गया है जिसमें आता है कि “सभ्यताओं के उद्देश्य और उनकी प्राथमिकताएं एक जैसी नहीं होतीं, इसलिए उनकी तुलना नहीं की जा सकती. तुलना सभी की स्वीकार्य सार्वभौम निकष पर ही संभव है और यह निकष मनुष्य की प्रेम करने की क्षमता का क्रमिक विस्तार हो सकता है. पहले व्यक्ति और फिर व्यक्ति से आगे बढ़ते हुए इस दायरे में परिवार, समुदाय, राष्ट्र और अन्ततः समूचा ब्रह्मांड आना चाहिए. लेकिन पश्चिमी संस्कृति में यह राष्ट्र पर आकर रुक जाती है. हिन्दू धर्म के सार्वभौम प्रेम की तुलना में यह मनुष्यता के लिए हीनतर लक्ष्य है.”

चूंकि पुस्तक में प्रेमचंद के राष्ट्र विषयक चिन्तन को गांधी और उनसे भी पहले भूदेव मुखोपाध्याय द्वारा की गई सभ्यता समीक्षा से जोड़कर देखा गया है सो यहां ठहरकर सोचा जा सकता है कि क्या मार्क्सवादी समीक्षा की कोई युक्ति प्रेमचंद के लेखन में आये राष्ट्रवाद और भारतीय संस्कृति की धारणा की समझ को ज्यादा पैना बनाने में सहायक हो सकती है ? तनिक थमकर सोचें तो लगेगा कि इस प्रश्न का उत्तर ‘हां’ में भी हो सकता है. जैसे मार्क्सवादी तर्ज की समीक्षा यह बता सकती है कि ‘खेतिहर समुदाय त्यागी-संन्यासी जान पड़ने वाले नेताओं की तरफ विशेष आकर्षित होता है. इसका खास रिश्ता सिर्फ हिन्दू धर्म से ही नहीं है. गांधी में जो त्याग-भाव है, वह उनके निजी दर्शन की देन है और इस दर्शन में निश्चित ही हिन्दू धर्म का भी योग है तथा कुछ ऐसा ही हो ची मिन्ह, मुजफ्फर अहमद या पी सुन्दरैया में दिखायी देता है लेकिन त्याग-भाव से किसी नेता के भीतर जो साख पैदा होती है सिर्फ वही भर किसान को लामबंद करने के लिए काफी नहीं होती. यह अनिवार्य तो है लेकिन पर्याप्त नहीं और इसके पर्याप्त होने के लिए जमीनी हालात(मैटेरियल कंडीशन) अनुकूल होने चाहिए. एक खास सहायक कारण जिसकी वजह से किसान उठ खड़े हुए और उनके संघर्ष ने उपनिवेश-विरोधी संघर्ष का रुप लिया, ग्रेट डिप्रेशन कहलाने वाली महामंदी है. महामंदी का एक महत्वपूर्ण घटक खेतिहर संकट भी है. किसानों की लामबंदी को संभव बनाने के लिए कांग्रेस ने अवाम के आगे भारत के भविष्य के बारे में एक ब्लूप्रिन्ट रखा. यह काम कांग्रेस के कराची अधिवेशन(1931) में हुआ. इसमें सार्वभौम मताधिकार, हर भारतीय नागरिक को एक सुनिश्चित जीवन-स्तर फराहम करने, अनिवार्य और निशुल्क शिक्षा, जाति-धर्म और लिंग की अपेक्षाओं से परे कानून के समक्ष बराबरी का दर्जा देने और धर्म से राजसत्ता के अलगाव की बात कही गई.’ ( यह अंश पेरी एंडरसन की पुस्तक द इंडियन आयडियालॉजी की ईपीडब्ल्यू में प्रकाशित प्रभात पटनायक कृत समीक्षा में आता है).

प्रेमचंद कांग्रेस के सक्रिय कार्यकर्ता नहीं थे लेकिन कांग्रेस के साथ उनकी सहानुभूति हमेशा रही. वे गांधी-भाव से सदा सन्नद्ध रहे लेकिन आलोचना तो उन्होंने अपने इस महात्मा की भी की है. और, जैसा कि इतिहासकार सुधीरचंद्र ने प्रेमचंद विषयक अपने एक पुराने लेख( प्रेमचंद: ए हिस्ट्रोरियोग्राफिक व्यू, ईपीडब्ल्यू, 11 अप्रैल 1981) में कहा है, वे उन बाध्यताओं को देख सकते थे जिसके भीतर कांग्रेस को उसके नेताओं के वर्गीय हितों की वजहों से काम करना पड़ता था तो भी उन्होंने “कांग्रेस की अपनी आलोचना को ऐसा साज-संवार दिया कि वह कांग्रेस के कार्यक्रमों की संगति में जान पड़े.” अगर इतिहासकार सुधीरचंद्र की बात ठीक है तो फिर प्रभात पटनायक का उपर्युक्त उद्धरण प्रेमाश्रम(1922) में आये किसान-सभा के जिक्र से लेकर कर्मभूमि(1932) के सत्याग्रह तक की व्याख्या में सहायक साबित हो सकता है.

यही बात समीक्ष्य पुस्तक में अस्मितावादी आदोलन की वैचारिकी के दायरे में हुए प्रेमचंद के मूल्यांकन को लेकर उठाये गये प्रश्नों के बारे में भी सोची जा सकती है. अंग्रेजी-राज भारतीयों के लिए स्मृति-नाश और जीवन-नाश दोनों का कारण साबित हुआ और इस दोहरे नाश की शिकार भारत-भूमि का हर समाज हुआ और दलित कहीं और ज्यादा शिकार हुए—समीक्ष्य पुस्तक के लेखक के इस मंतव्य से इनकार नहीं किया जा सकता. अंग्रेजी राज में पौने दो सौ बरसों में जितने अकाल पड़े और भारत-भूमि के आम जन काल-कवलित हुए वैसा मुगलों या उसके पहले के भारत में ना हुआ था. कुछ पुस्तकों (जैसे माइक डेविस की पुस्तक ‘ लेट विक्टोरियन होलोकॉस्ट्सः एल निनो फेमाइन्स ऐंड मेकिंग ऑफ दि थर्ड वर्ल्ड) में दर्ज तथ्य बताते हैं कि 1770 से 1890 के बीच के एक सौ बीस साल के वक्फे में भारत में इकत्तीस बड़े अकाल पड़े थे और उसके पहले के पूरे दो हजार सालों में सत्रह. इन बड़े अकालों का संबंध जितना जलवायु-गत परिस्थितियों से है उससे बहुत-बहुत ज्यादा अंग्रेजी साम्राज्यवाद से. अकेले 1769-1770 में ही, कंपनी की लूट और मौसम के प्रकोप ने मिलकर , बंगाल की एक तिहाई आबादी को भुखमरी और मौत के मुँह में धकेल दिया था. यह सिलसिला दूसरे महायुद्ध के दौरान “प्रगतिशील” अंग्रेजी राज द्वारा पैदा किए गए, ‘बंगाल के अकाल’ तक जारी रहा. खुद अंग्रेजी राज की रिपोर्टों में लिखा मिलता है कि इन अकाल में काल-कवलित होने वालों में 80 प्रतिशत आबादी वंचित वर्ग के लोगों की थी. जाहिर है, आज की राजनीतिक शब्दावली में ‘दलित’ कहलाने वाली जातियों के लिए अपनी नस्ली श्रेष्ठता के पैमाने पर उन्हें ‘हीन से भी हीनतर’ करार देने वाला औपनिवेशिक ज्ञान-कांड मृत्यु के सामूहिक आयोजन से कमतर ना था. लिहाजा, अगर कोई कहे कि ‘अंग्रेज देर से आये और जल्दी चले गये’ तो उसके इस अफसोस पर रोष या अचरज जायज है.

लेकिन बात यहीं तक रुक नहीं जाती. अगर ‘अंग्रेजों के देर से आने और जल्दी जाने’ का अफसोस कंपनी-राज की लूट की पहचान के बाद भी मौजूद और मुखर है, उसे स्वीकृति हासिल है तो फिर इसके कारणों की खोज जरुरी है— खासकर यह खोजना कि इस अफसोस का स्रोत नैतिकता की किस वैचारिकी में है और क्या वह वैचारिकी ‘भारतीय आधुनिकता’ की प्रचलित समझ को किन्ही कोण से ज्यादा समग्र बनाने में मददगार हो सकती है ? यहां उदाहरण के तौर पर लाहौर(जात पांत तोड़क मंडल) वाले मशहूर भाषण पर महात्मा गांधी और आंबेडकर के बीच चली बहस की चर्चा की जा सकती है.

महात्मा गांधी ने जाति की संस्था के विरुद्ध आंबेडकर के भाषण की मूल बातों के प्रतिवाद में जो कुछ लिखा उसका सार संक्षेप कुछ यों हो सकता है कि ‘ 1.हिन्दू धर्म विकसनशील है, उसका कोई एक और स्थायी ग्रंथ नहीं. 2.जो तर्क की कसौटी पर खरी ना उतरे और जिसे आध्यात्मिक प्रयोग में ना लाया जा सके उसे ईश्वर की वाणी नहीं माना जा सकता. 3. धर्मग्रंथ का अनिवार्य व्याख्याता कोई विद्वान नहीं हो सकता. धर्म विद्वानों से नहीं साधु-संतों और उनके जीवन एवं कथन पर चलता है. 4.हिन्दू धर्म का सार है कि सत्य ही ईश्वर और अहिंसा मानव-परिवारों का कानून है. 5.धर्म को उसके सबसे बुरे उदाहरणों से नहीं बल्कि सबसे अच्छे उदाहरणों से परखा जाना चाहिए.’ इन बातों के पल्लवन के बाद महात्मा का आंबेडकर से सवाल था कि “क्या चैतन्य, ज्ञानदेव, तुकाराम, तिरुवल्लूर, रामकृष्ण परमहंस, राजा राममोहन राय, महर्षि देवेन्द्रनाथ टैगोर, विवेकानंद और अन्य विद्वानों द्वारा सिखाया धर्म पूरी तरह से गलत है, जैसा कि डा. आंबेडकर ने अपने भाषण में दिखाया है ?

आंबेडकर के भाषण के प्रतिवाद के रुप में दर्ज महात्मा गांधी के ये उपर्युक्त वाक्य महत्वपूर्ण है क्योंकि यही वह ब्लूप्रिन्ट है जिसके दायरे में हिन्दू धर्म-परंपराओं के किसी पक्ष(जैसे कि निर्गुण भक्ति और उससे जुड़ी वैष्णवी परंपरा) को आधुनिक भाव-बोध के अनुकूल बताकर कहा जाता है कि अंग्रेज ना आते तो भी अपनी इतिहास-धारा के अनुकूल भारतीय मनीषा व्यक्ति के सत्य और मुक्ति के इहलौकिक विचार तक पहुंच ही जाती. दरअसल आंबेडकर इस सोच का प्रतिवाद करते हुए उसमें कुछ जोड़ते हैं. गांधी के प्रतिवाद के जवाब में आंबेडकर लिखते हैं महात्मा ने प्रश्न उठाया है कि “चैतन्य, ज्ञानदेव, तुकाराम, तुरुवल्ललुर, रामकृष्ण परमहंस द्वारा ज्ञापित धर्म गुणरहित नहीं हो सकता जैसा कि मैंने बताया है और ये कि किसी भी धर्म को सबसे खराब नमूने से नहीं बल्कि सबसे अच्छे परिणाम से परखना होगा. मैं इस वक्तव्य के प्रत्येक शब्द से सहमत हूं लेकिन मैं इस वक्तव्य से बिल्कुल नहीं समझ पाया कि महात्मा इससे क्या सिद्ध करना चाहते हैं. यह सत्य है कि धर्म को सबसे खराब नमूने से नहीं बल्कि सबसे अच्छे से परखना चाहिए. लेकिन क्या मामला यहीं समाप्त हो जाता है? मै कहता हूं नहीं. प्रश्न अब भी उठता है कि सबसे खराब इतने अधिक क्यों हैं और सबसे अच्छे इतने थोड़े से क्यों.”

आगे महात्मा गांधी के प्रतिवाद के बुनियादी दोष पर अंगुली रखते हुए आंबेडकर लिखते (और इस लिखे से उत्तर मिल जाता हैं कि धर्म के सबसे अच्छे उदाहरण इतने कम क्यों) हैं, “महात्मा ने तर्क दिया है कि संतों के उदाहरण को अपनायें तो हिन्दू धर्म सहनीय हो जाएगा, महात्मा का ये तर्क भी अन्य कारण से गलत सिद्ध होता है. चैतन्य जैसे सुविख्यात संत का नाम लेकर मोटे और सबसे सरल तरीके से महात्मा सुझाव देना चाहते हैं कि ढांचे में मूलभूत परिवर्तन किए बिना हिन्दू समाज सहनीय और खुशहाल हो सकता है. …जो इस बात पर निर्भर हैं कि वह बड़ी जाति के हिन्दू को एक अच्छा इंसान बनायेंगे तथा व्यक्तिगत चरित्र सुधारेंगे, वे मेरे विचार से अपनी शक्ति बरबाद कर रहे हैं और एक भ्रम पाले हुए हैं. क्या व्यक्तिगत चरित्र शस्त्र बनाने वाले को एक अच्छा आदमी बना सकता है, अर्थात जो आदमी गोला बेचता है, वह ऐसा गोला बनाये जो न फटे और गैस जहर ना फैलाएं ? …सच बात तो यह है कि हिन्दू अपनी जाति के बाहर वाले व्यक्ति को पराया मानता है.. कहने का मतलब है कि बेहतर या बदतर हिन्दू मिल सकता है लेकिन एक अच्छा हिन्दू नहीं मिल सकता. ऐसा इसलिए नहीं कि उसके व्यक्तिगत चरित्र में कोई कमी है. असल में, अपने साथियों के साथ उसके संबंध का आधार ही गलत है.”

अगर एक पंक्ति में कहें तो आंबेडकर के उपर्युक्त कथन में यह ध्वनि सुनी जा सकती है कि व्यक्तिगत आचरण की सच्चाई और अहिंसा की कुछ उज्ज्वल परंपराओं के कारण भारत-भूमि में प्राक्क्-आधुनिक(प्रोटो-मॉडर्न) संवेदना तो थी लेकिन इस संवेदना को सबके लिए साकार करने वाला ढांचा नहीं था, यह ढांचा तो अंग्रेजों या कह लें पश्चिमी आधुनिकता की यांत्रिकी के एक रुप यानी ‘विधि आधारित सेक्युलर शासन व्यवस्था’ ही ले आयी. सुदीप्तो कविराज जब कहते हैं कि ‘पॉलिटिक्स’ शब्द का ठीक-ठीक समानार्थी शब्द भारतीय भाषाओं में नहीं है तो दरअसल उनके कहे में आंबेडकर द्वारा उठाये गये प्रश्न की ही एक अलग स्तर पर ध्वनि सुनायी देती है. राजनीति, खासकर लोकतांत्रिक राजनीति(चाहे वह जितनी अधूरी हो) प्राक्क-आधुनिक संवेदना वाले पुराने भारत के लिए एकदम ही नया अनुभव थी. सो, समीक्ष्य पुस्तक में आगे यह सोचने के लिए सवाल बनता है कि क्या ‘अंग्रेज देर से आये, जल्दी चले गये’ में जो अफसोस निहित है, वह कहीं परंपरित भारतीय आधुनिकता की प्रकट कमी (विधि आधारित राज-व्यवस्था) का संकेतक तो नहीं, कहीं इस अफसोस में इस बात की स्वीकृति तो नहीं कि आधुनिकता के पश्चिम प्रोजेक्ट में भारत ने अपनी तरफ से कुछ जोड़ा और घटाया तो पश्चिमी प्रोजेक्ट भी भारतीय आधुनिकता की संवेदना को सबके लिए साकार करने में मददगार हुआ. ऐसा सोचने का एक प्रस्थान बिन्दु आनंद कुमारस्वामी की पुस्तक ‘ऐसेज इन नेशनल आयडिलिज्म’ में आया ‘माता भारत’ लेख हो सकता है. नयी-पुरानी आधुनिकता के आंगन में राष्ट्रवाद की भावमूर्ति तैयार होने की कहानी इस लेख में जिस महीनी और मार्मिकता से कही गई है- वह विरल है.

समीक्ष्य पुस्तक निबंधों( कुल तेरह) का संकलन है और सारे लेख प्रेमचंद-विशेषी नहीं लेकिन पुस्तक का एक महत्वपूर्ण हिस्सा(कुल चार लंबे लेख) प्रेमचंद के मूल्यांकन की समस्या से जूझते हैं. चूंकि पुस्तक में भारतीय आधुनिकता को जमीन बनाकर ‘हिन्दी की साहित्यिक संस्कृति’ को समझने-बताने की कामयाब कोशिश की गई है सो पुस्तक की वैचारिकी का दायरा बड़ा हो जाता है. प्रेमचंद, हिन्द-स्वराज, सिविलाइजिंग मिशन, अंग्रेजी की जगह, हिन्दी की शक्ति, हिन्दी का जातीय संगीत, हिन्दी साहित्य का इतिहास और साहित्य, इतिहास तथा स्वाधीनता जैसे विषयों को एक सूत्र में पिरोने की भरपूर गुंजाइश बन जाती है पुस्तक में. और, ठीक इसी गुंजाइश को देखते हुए उम्मीद की जा सकती है समीक्ष्य पुस्तक की संभावनाओं का विस्तार लेखक किसी अन्य पुस्तक में बड़े फलक पर करेंगे.

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पुस्तक का नाम—हिन्दी की साहित्यिक संस्कृति और प्रेमचंद

लेखक- डा. राजकुमार

पृष्ठ संख्या- 171, मूल्य सजिल्द—400

प्रकाशन—राजकमल प्रकाशन प्रा. लि., नई दिल्ली.

चंदन श्रीवास्तव

चंदन श्रीवास्तव

मूलतया छपरा (बिहार) के निवासी, पिछले पंद्रह सालों से दिल्ली में। आईआईएमसी और जेएनयू में पढ़ाई। “उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध में हिन्दी लोकवृत्त का निर्माण” शीर्षक से पीएचडी, दिल्ली के कॉलेजों में छिटपुट अध्यापन, फिर टीवी चैनल की नौकरी और अब विकासशील समाज अध्ययन पीठ (सीएसडीएस) की एक परियोजना इंक्लूसिव मीडिया फॉर चेंज से जुड़े हैं। इनसे  chandan@csds.in पर संपर्क संभव है। 

 

 

साभार: प्रतिमान

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‘संपूर्ण क्रांति’ और ‘रेलगाड़ी’ के बीच जरुरी अन्तर को ‘बाग़-ए-बेदिल’ में खोजता हमारे जमाने का एक ‘मीर’: चंदन श्रीवास्तव

शराबी की अद्भुत सूक्तियां लिखने वाले कृष्ण कल्पित जी , सद्य प्रकाशित काव्य-संकलन ‘बाग़-ए-बेदिल’ कारण इधर घनघोर चर्चा के केंद्र बने हुए हैं. बहुतेरे लोगों ने उनकी पूर्व-पंक्तियाँ के आधार पर ही मान लिया था कि वे अब प्रकाश में नहीं आयेंगें। शराबी की सूक्तियां नामक कितबिया में वे पहले ही लिख गए थे- कभी प्रकाश में नहीं आता शराबी/ अंधेरे में धीरे धीरे/ विलीन हो जाता है. कविता के प्रति जैसा समर्पण/लगाव इस शराबी के पास है वैसा रेअर ही देखने को मिलता है. और यह रेअरनेस ही वह जिजीविषा है जो उन्हें बार-बार प्रकाश में लाता है. बाग़-ए-बेदिल वाला प्रकाश तो इतना तेज है कि बहुतेरों की आँखें चौंधिया गयी हैं और बहुतेरे ऐसे हैं जो इस तेज में भी बारीकियां पढ़ रहे हैं.

‘बाग़-ए-बेदिल’ पर जे.एन.यू में आयोजित संगोष्ठी में चन्दन श्रीवास्तव एक वक्ता के बतौर आमंत्रित थे. इस संगोष्ठी में उनके कविता-कर्म को गम्भीरता से लेने की जरुरत महसूस की गयी. चन्दन श्रीवास्तव का यह यह लेख इसी प्रक्रिया की शुरूआती कड़ी है. बाग़-ए-बेदिल और कृष्ण कल्पित के कवि-व्यक्तित्व के ऊपर आगे भी लेख दिए जायेंगे।  

बाग़-ए-बेदिल

बाग़-ए-बेदिल

By  चंदन श्रीवास्तव

विश्वविद्यालयी दिनों की ट्रेनिंग की वजह से तबीयत कुछ ऐसी हो चली है कि लफ्ज किताब सुनते ही मन में एक रटी-रटायी पंक्ति गूंजने लगती है- आखिर! इस किताब की पॉलिटिक्स क्या है ? हैरत नहीं कि किताब बाग़-ए-बेदिल हाथ आई तो ऐसा ही हुआ। किताब भारी-भरकम है, आकार से भी और आवाज से भी। अदबी मुआमले की समझ के मामले में अपनी औकात देखी तो भार उठाने की हिम्मत नहीं हुई। सोचा, चलो किसी और के लिखे से काम चलाते हैं। और इसी फिराक में नजर अटकी बाग़ ए बेदिल पर कवि अरुणकमल की टिप्पणी के एक टुकड़े पर कि – “ कल्पित ने अतीत को वर्तमान में ढाल दिया है और वर्तमान को अतीत में ढालकर उसे व्यतीत होने से रोका है, इसलिए हर कविता कई कालों में प्रवाहित होती है। ” कहते हैं बदलाव सृष्टि का नियम है। अपनी इतिहास-प्रदत्त स्थिति के कारण आप उससे सहमत-असहमत हो सकते हैं। सो, अरुणकमल की पंक्ति को पढ़कर लगा कृष्ण कल्पित की कोशिश समय के अनवरत घूमते पहिए को थाम लेने की है। लगा, कृष्ण कल्पित अपने खास समय के भीतर बदलाव के किसी रंग-ढंग से असहमत हैं और ‘कविता के कुरुक्षेत्र’ में उस बदलाव पर जीत हासिल करने के लिए उतरे हैं।

लेकिन, कृष्ण कल्पित का अपने कवि और कविता के बारे में ख्याल ऐसा निष्कर्ष निकालने से रोकता है। अपने कवि-कर्म को लेकर कल्पित साहब का कहना है कि -“ ये कवितायें एक उपेक्षित और दीवार से लगा दिए गए कवि की प्रति-कवितायें हैं।”  और “ इन कविताओं में शब्दों का आयुधों और अस्त्र-शस्त्रों की तरह उपयोग आत्म-रक्षार्थ ही हुआ है..किसी दुश्मन, किसी भूखंड, या कीर्ति को विजित करने के लिए नहीं। हर कवि को अपने लिए एक कवच का निर्माण करना पड़ता है और कविता-साधना तो निश्चय ही किसी निरंतर युद्ध से कम नहीं..। ” आगे परंपरा का निजी-पाठ करते हुए उन्होंने यह भी जोड़ा है कि-“प्रागैतिहासिक काल से ही कविता से तीर-तमंचों का काम लिया जाता रहा है- आत्मरक्षार्थ या मानवता की रक्षा के लिए। ” इस शुरुआती (इस वजह से कच्चे और अधबने) पाठ में अगले अनुच्छेदों तक कोशिश करुंगा कि बाग़-ए-बेदिल को कृष्ण कल्पित के आत्म-वक्तव्य के प्रति ईमानदार रहते हुए पढ़ने की कोशिश करुं और इस निष्कर्ष निकालने की हिम्मत जुटा सकूं कि अतीत को वर्तमान में ढालना या फिर वर्तमान को अतीत में ढालकर उसे व्यतीत होने से रोकना कल्पित की कविता की पॉलिटिक्स के भीतर एक प्रक्रिया है, परिणति कत्तई नहीं।

बाग़ ए बेदिल के अपने पाठ की शुरुआत इस प्रश्न से करें – कृष्ण कल्पित को क्यों लगता है कि उनकी कवितायें एक उपेक्षित और दीवार से लगा दिए गए कवि की प्रति-कवितायें हैं? अपनी भारी-भरकम काया में सैकड़ों कविताओं को समेटने वाली इस किताब का उत्तर होगा एक शिकायत या कह लें फरियाद की शक्ल में सामने आयेगा-

उस देश में जेबकतरों की तरह कवियों ने भी अपने इलाके बांट रखे थेमी लार्ड।

वहां गिरहकटोंपिंडारियों मवालियों कबाड़ियों और हलकटों को कवि कहने का रिवाज थाहुजूर।

औरकवियों से उस देश में अपराधियों का सा सलूक किया जाता थामहोदय!…

कबाड़ीपन और कवि-कर्म के बीच का भेद क्योंकर मिट रहा है ? बाग़-ए-बेदिल का उत्तर है-

‘ यह विचार विपथता इसलिए थी,

कि वह उस जनपद का नहींदस जनपथ का कवि थासार्त्र !

बाग़-ए-बेदिल की कविता विपथता का कारण विपर्यय में खोजती है। ‘ जनपद ’( याद करें पुराने वक्तों के महाजनपदों को, देश से राष्ट्र बनने की हिंसक प्रक्रिया को, मेट्रोपॉलिटनी सार्वभौमिकता से स्थानीयता को बचाये रखने की जुगत को) और ‘दस जनपथ ’( 10 डाऊनिंग स्ट्रीट से निकले लोकतंत्र/आधुनिकता की भारतीय अनुकृति का नया संस्करण) के बीच का विपर्यय। जिससे अपेक्षा थी कि ‘उस जनपद का कवि’होकर रहेगा वह ‘दस जनपथ का कवि’ जिस समय के भीतर बनने को बाध्य हुआ उस समय के लक्षण क्या हैं ? वह समय कौन-सा है जिसमें कवि हलकट बनने को बाध्य और आतुर एक साथ है? बाग़-ए-बेदिल का उत्तर है-

जेपी, लोकतंत्र की आँख से ढलका हुआ आंसू था,

जो अब सूख चला हैपार्थ।

कि जनता आती है’ वाले विशाल मैदान में,

अब बाजीगर और रंडियां घूमते हैं।

दरअस्ल संपूर्ण क्रांति अब एक रेलगाड़ी का नाम हैसार्त्र!

और, ऐसे समय में क्या अघट घट रहा है ?

बाग़-ए-बेदिल की मानें तो-

ब्राह्नणों की फौज से जब घिर गई मायावती,

देख लेना एक दिन उसको बना देंगे सती।

बीवियां फिरती हैं दुनिया भर में कत्थक नाचतीं,

और, भारत मां तुम्हारे घर में बर्तन मांजती,

बुझ गये दीपक तो क्या आओ उतारें आरती,

वाजपेयी को मिला सम्मान भारत-भारती।

एक ऐसे समय में जब मर्यादाओं का भयंकर उलटफेर आंखों के आगे हो, कविता और कबाड़ का, कवि और गिरहकट का अंतर समाप्त हो रहा हो, तो कृष्ण कल्पित के अपने ही शब्दों में मानवता के रक्षार्थ कविता और कवि को क्या करना चाहिए? दूसरे शब्दों में, जब व्यवस्था अपने बाशिन्दों को विज्ञापनी भाषा में समझा रही हो कि दरअसल क्रांति एक रेलगाड़ी का ही नाम है और वह इस तरह कि तुम अपने जनपद से चलकर दस जनपथ और दस जनपथ(और उसके पसारे) से निकलकर अपने जनपद के भीतर अबाध आवाजाही कर सकते हो, और इस तरह, मानवीय मुक्ति के एक नये आख्यान में प्रवेश कर सकते हो, तो कविता, व्यवस्था की इस भाषा के काट में क्या करे ? किन शब्दों से बने कौन-से आयुध लाये ? इस प्रश्न का उत्तर खोजने चलें तो एक रास्ता खुलता है जिसपर चलकर आप कह सकें कि अतीत को वर्तमान में ढालना और वर्तमान को अतीत में ढालकर उसे व्यतीत होने से रोकना दरअसल कृष्ण कल्पित की कविता के लिए एक प्रक्रिया है और परिणति है उस भाषा को हासिल करने की कोशिश करना जो मुक्ति की प्रचलित भाषा की काट में खड़ी हो।

कल्पित इस भाषा को खोजने के लिए बार-बार अतीत की कविता के उस्तादों के पास लौटते हैं। चाहें तो कह लें, शेखावटी, जयपुर, पटना जैसे ‘उस जनपद’ का अपना घर “लुटियन दिल्ली” के जोर से लुट जाने का गम गलत करने के लिए किसी पीर-फकीर-शायर की मजार पर बैठना चाहते हैं। वहां झरने वाली निबौलियों को उठाकर पूरे हिन्दुस्तान की कविता की रिवायत के भीतर बे दर-ओ-दीवार का एक घर बसाना चाहते हैं। उन्हें उम्मीद, वहां से प्रचलित भाषा की काट करने वाली एक भाषा मिल सकेगी।यही वजह रही होगी जो पुस्तक के शीर्षक में आया शब्द बेदिल किताब के हर्फों में एक कहानी लेकर जिन्दा होता है। कहानी कविता के भेष में कुछ यों है कि-

औरंगजेब के बड़े बेटे आजमशाह ने,

बेदिल आजीमाबादी/देहलवी को मिलने के लिए बुलाया

तो बेदिल ने यह मिसरा लिख भेजापार्थ!

दुनिया अगर देहेन्द न जुम्बम ज जाए खीश- मन बस्ता अम हिनाए-किनायत ब जाये खीश

( दुनिया भी अगर दे दो तब भी मैं अपनी जगह से नहीं हिलूंगा क्योंकि मैंने अपने पांवों में सब्र की मेहंदी लगा ली है)

कविता के भीतर इस कथा की पुनर्वासी करके कल्पित एक साथ कई काम करते हैं। एक तो वे आपके मन के भीतर पैठी ऐसी ही अनेक कथाओं के लिए राह खोलते हैं। इस कथा को पढ़कर बिरला ही होगा जिसके मुंह पर यह पंक्ति ना आ जाये- आवत जात पनहिया टूटी बिसर गयोहरिनाम- संतन को कहा सिकरी सो काम। किसी को मिर्जा गालिब का यह शेर भी याद आ सकता है- हजार कस्द करता हूं इस जा से कहीं और जाने का- दिल कहता है तू जा मैं नहीं जाने का। और, बेतरतरीबी के तर्क से मन के किसी कोने में बैठा ‘अंगद का पाँव’ भी याद आ सकता है। तेजरफ्तारी अगर आज के जीवन और जगत को परिभाषित करने वाली वर्चस्वकारी भाषा है तो फिर कृष्ण कल्पित कविता के उस्तादों के पास जाकर वहां से उनके ठहराव ढूंढ़ लाते हैं।जो कोई बेदिल की तरह सब्र की मेहँदी लगाकर ठहरा है, कोई किसी भक्तकवि की तरह रामकथा में रमने की वजह से ठहरा है तो कोई गालिब की तरह नये-पुराने पस-ओ-पेश में पड़कर ठहरा हुआ है। ठहराव का अपना निजी ठौर खोज सकें- इसके लिए कृष्ण कल्पित की कविता कथाओं या कह लें काव्य-पंक्तियों की एक झनकार(शुक्लजी के शब्दों में कहें तो अर्थ और प्रसंग का गर्भत्व) रचती है। कल्पित की कविताओं(बाग़-ए-बेदिल में) के शब्द और पंक्तियां ‘अर्थ’ और ‘प्रसंग’खोजने के क्रम जब ‘आखर’ तलाशती हैं तो एक पूरा सिलसिला कायम हो जाता है, पूरब की कविता के रुप-शिल्प, कथ्य और वस्तु को सुनने-सुनाने का। कवि अपनी तरफ आखर और अरथ की पूरी परंपरा सौंपने को उत्सुक है ताकि पाठक नये सिरे से रचने और लड़ने के लिए तैयार हो सकें।

आखिर को एक बात दो शब्द “पार्थ” और “सार्त्र” पर। बाग ए बेदिल की कविता का स्थापत्य इन दो शब्दों के बिना संभव नहीं। जैसे कबीर की कविता में संबोध्य का चयन(साधो, संत, पांड़े/बांभन) के अनुकूल कविता की वस्तु बदलती है, साथी ही इन शब्दों के आने के साथ मानो विषय की घोषणा हो जाती है, ठीक उसी तरह कृष्ण कल्पित के बाग़-ए-बेदिल में ‘पार्थ’ और ‘सार्त्र’ कविता की बनावट के दो पाट हैं, और अपने नाम के अनुकूल वस्तु को धारण करते हैं। पार्थ, कुरुक्षेत्र यानि भावी महाविनाश की आशंका के बीच किंकर्तव्यविमूढ़ खड़ा पात्र है, कृष्ण उसे कर्तव्य का उपदेश देते हैं- युद्धस्व..। आशंका सार्त्र के साथ भी है। दो विश्वयुद्धों के बीच खड़ा एक चिन्तक जिसकी आंखों के आगे आधुनिकता या कह लें तर्कबुद्धि पर आधारित राज्यसत्ता/विज्ञान/उद्योग का चरित्र उजागर हुआ और आधुनिकता प्रदत्त मानव-मुक्ति का आख्यान हिरोशिमा पर परमाणु बम के धमाके के साथ दम तोड़ गया। पार्थ के सामने अपने समय की मर्यादाओं के भंग होने का संकट खड़ा हुआ था तो सार्त्र के सामने नई मर्यादाओं के भंग होने का संकट, वे मर्यादाएं जिनका वादा था- हमारे चौखटे में रहो, मुक्ति हो जाओगे । आधुनिक और प्राचीन, दोनों ने मुक्ति शब्द के साथ छल किया- इस बात के दो गवाह कृष्ण कल्पित की कविता में‘पार्थ’ और ‘सार्त्र’ हैं। दोनों को हाजिर-नाजिर जान, बाग़-ए-बेदिल कभी पीड़ा, कभी व्यंग्य, कभी पुकार तो कभी ललकार और कई बार हिकारत के स्वर में बोलती है।

जाहिर है, ग्लोबल गांव होने की जिद में पड़ी दुनिया के विस्थापितों/ शापितों की जगतपीड़ा और आत्मपीड़ा में नाभिनाल रिश्ता बैठाने को बेचैन यह यायावर कवि कृष्ण कल्पित अपने ठौर के तौर पर पार्थ और सार्थ को ही चुन सकता था।

चन्दन श्रीवास्तव

चन्दन श्रीवास्तव

चन्दन श्रीवास्तव,  मूलतया छपरा(बिहार) के निवासी, पिछले पंद्रह सालों से दिल्ली में। पहले आईआईएमसी और फिर जेएनयू में पढ़ाई। “उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध में हिन्दी लोकवृत्त का निर्माण” शीर्षक से पीएचडी के बाद दिल्ली के कॉलेजों में छिटपुट अध्यापन, फिर टीवी चैनल की नौकरी और अब विकासशील समाज अध्ययन पीठ(सीएसडीएस) की एक परियोजना इंक्लूसिव मीडिया फॉर चेंज से जुड़े हैं। इनसे  chandan@csds.in पर संपर्क संभव है। 

( यह कृष्ण कल्पित को समझने की शुरुआती कोशिश है. लिखने वाले ने ना तो उनकी सारी रचनाओं का पाठ किया है और ना ही पढ़ी हुई कविताओं पर पर्याप्त समय देकर सोचा है। अगर बेतरतीबी के भीतर से कोई तरतीब बन सकती हो तो इस कोशिश को भी इसी रुप में देखा जाय)

बाग़-ए-बेदिल, अंतिका प्रकाशन , प्रकाशन वर्ष : 2013, पृ. सं: 512, मूल्‍य : HB 850/-, PB 450/- 

बलराज साहनी- जो बात तुझमें है तेरी तस्वीर में नहीं: चंदन श्रीवास्तव

By चंदन श्रीवास्तव

अभिनय महान कहलाएगा बशर्ते अभिनेता किरदार को ऐसे निभाये कि उसका अपना व्यक्तित्व तिरोहित हो जाय, वह ना रहे, निभाया गया किरदार ही रहे। इस पंक्ति को पढ़कर किसी को कबीर याद आ जायें तो क्या अचरज- ‘जब मैं था तब हरि नहीं- अब हरि हैं हम नाहीं ’! अचरज कीजिए कि बलराज साहनी के अभिनय की ऊंचाई को ठीक-ठीक इसी कसौटी पर महान ठहराया जाता है, यह भूलते हुए कि कबीर का समय बलराज साहनी के समय से अलग है, और ठीक इसीलिए 15 वीं सदी के भक्त का अपनी भाव-वस्तु से जो तादात्म्य संभव रहा होगा वह शायद बीसवीं सदी के किसी अभिनेता का अपने किरदार के साथ संभव ना भी हो । आख़िर चेतना का वस्तूकरण, व्यक्तित्व का विघटन, संवेदना का विच्छेद जैसे पद बीसवीं सदी के मनुष्य को समझने-समझाने की गरज से आये थे। अचरज कीजिए कि खुद बलराज साहनी ने भी अपनी तरफ़ से अभिनय की महानता की कसौटी प्रस्तुत करने की कोशिश की तो किरदार के साथ अभिनेता के एकात्म को ज़रुरी शर्त माना, भले ही अभिनय के दौरान उन्हें इससे तनिक अलग भी अनुभव हुआ हो। इस आलेख का विषय बलराज साहनी के इस ‘अलग अनुभव ’ की तरफ़ संकेत मात्र करना है, ताकि इस आम सहमति को तनिक प्रश्नाकुल होकर कुरेदा जा सके कि किरदार से अभिनेता का एकात्म ही अभिनय की महानता की एकमात्र कसौटी है।

बलराज साहनी

बलराज साहनी

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आम सहमति यही है कि ‘ बलराज साहनी कई चेहरों वाला अभिनेता ’ थे। ‘ कई चेहरों वाला अभिनेता ’ कहने के पीछे मंशा यह बताने की होती है कि “अधिकतर अभिनेता विभिन्न पात्रों के रोल करने पर भी अपने ख़ुद के चेहरे को छिपा नहीं पाते हैं और सही अर्थों में उन पात्रों को साकार करने में असमर्थ रहते हैं..” जबकि बलराज साहनी ने विभिन्न पात्रों की भूमिका इस तरह निभायी कि “ ख़ुद की शख़्सियत को उन पात्रों में उजागर नहीं होने दिया, इसीलिए वे पात्र इतने सजीव होकर होकर साकार हुए। ”(1) । बलराज साहनी के अभिनय के संदर्भ में ‘ कई चेहरों वाला अभिनेता ’ का रुपक इतना प्रभावशाली है कि थोड़े हेर-फेर के साथ हर समीक्षक इस बात को दोहराना जरुरी समझता है। मिसाल के लिए जन्मशती के इस साल में बलराज साहनी के अभिनय की विशेषता को याद करते हुए एक सुधी समीक्षक ने उनकी तुलना यूनान के पौराणिक पात्र प्रोतेउस से की क्योंकि एक तो वह किसी के पकड़ में नहीं आता और आ भी जाय तो “ऐसी रफ़्तार से इतने वास्तविक-से चोले बदलने लगता है कि पकड़नेवाला घबरा कर उसे छोड़ देता है और वह फिर फ़रार हो जाता है। ”(2)कमोबेश ऐसी ही बात अपने इस सहोदर भाई के बारे में भीष्म साहनी भी कहते हैं- “ बलराज की सफलता का राज था कि वे किसी किरदार को निभाते वक्त उसमें अपना दिल ही नहीं, आत्मा भी झोंक देते थे। काबुलीवाला फ़िल्म करते वक्त उन्होंने पठान काबुलीवाला के जीवन को नजदीक से जानने के लिए उसका गहन अध्ययन किया। यही कारण है कि जब आप बलराज की किसी फ़िल्म को याद करते हैं, तो बलराज याद नहीं आते वह किरदार याद आता है। हर किरदार अपने आप में अलग नजर आता है। अभिनेता बलराज गायब हो जाता  है। वह अपनी पहचान को किरदार में घुला देते थे। यह इस कारण होता था क्योंकि वे किरदार से गहरे स्तर पर जुड़ जाते थे. बलराज कहते थे कि एक्टिंग सिर्फ कला नहीं है, यह एक विज्ञान भी है.”(3)

भीष्म साहनी ने जिस बात को संक्षेप में लिखा है, उसका विस्तार बलराज साहनी पर केंद्रित ख्वाजा अहमद अब्बास के एक संस्मरण में मिलता है। इस संस्मरण में अभिनेता बलराज साहनी से जुड़ी कई कहानियां हैं, ऐसी कहानियां जो अभिनय के प्रति बलराज साहनी की निष्ठा का साक्ष्य तो हैं ही, पाठक के मन में अभिनेता बलराज के प्रति श्रद्धा-भाव जगाती हैं। अब्बास साहब लिखते हैं- “ 1945 में इप्टा ने जब फ़िल्म धरती के लाल बनायी, जिसमें सारे के सारे गैर-पेशेवर अभिनेता-अभिनेत्री थे, उसके लिए लंबे-तड़ंगे तथा नफीस बलराज साहनी ने, जो बीबीसी में दो बरस काम करने के बाद कुछ ही अर्सा हुए लंदन से वापस लौटे थे,खुद को ऐसे आधे-पेट खाकर गुजर करते बंगाली किसान में बदला,जैसे वह अकाल के मारे लाखों किसानों में से ही एक हों। वह महीनों तक सिर्फ एक वक्त खाकर गुजारा करते रहे थे ताकि कैमरे के सामने उनकी अधनंगी देह,अपने भूख के मारे होने की गवाही दे। और हर रोज कैमरे के सामने जाने से पहले वह अपनी धोती,समूचे शरीर और चेहरे पर भी,कीचड़ मिले पानी का छिडक़ाव कराते थे ताकि हर तरह से अकिंचनता प्रकट हो। ”(4)

‘दो बीघा ज़मीन’ के बारे में तो ख़ैर, यह बात प्रसिद्ध है ही कि इस फ़िल्म के किरदार को निभाने के लिए बलराज साहनी कई हफ्ते तक कलकत्ता में रिक्शा खींचने वालों की बस्ती में रहे थे। यहां उन्होंने रिक्शा खींचने के लिए खुद को प्रशिक्षित ही नहीं किया था बल्कि रिक्शा खींचने वालों के तौर-तरीके भी सीखे थे। ‘दो बीघा ज़मीन ’ के किरदार को निभाने के लिए बलराज साहनी ने क्या-क्या किया इसका एक ब्यौरा खुद बलराज साहनी की जबानी सुनिए- “बम्बई शहर से बाहर जोगेश्वरी के इलाके में उत्तर प्रदेश और बिहार के भैंसे पालने वाले भैया लोगों की बहुत बड़ी बस्ती है। मैं अगले दिन से वहां के चक्कर लगाने लगा। मैं भैया लोगों के साथ बैठता, उनकी बातें सुनता, उन्हें काम करते हुए देखता। वे कैसे चलते हैं, क्या पहनते हैं, क्या खाते हैं, कैसे उठते-बैठते हैं- यह सब मैं बड़े गौर से देखता और अपने मन में बैठाता। भैया लोगों को सिर पर गमछा लपेटने का बहुत शौक होता है और हर कोई उसे अपने ही ढंग से लपेटता है। मैंने भी एक गमछा खरीद लिया और घर में उसे सिर पर लपेटने का अभ्यास करने लगा। लेकिन वह खूबसूरती पैदा न होती। मेरे सामने यह एक बहुत बड़ी समस्या थी, जिसे हल करने की मैंने पूरी कोशिश की। ‘दो बीघा जमीन’ में मेरी सफलता ज्यादातर इसी अध्ययन का नतीजा है।”(5)

एक बार फिर से प्रसंग पर लौटते हुए बात ख्वाजा अहमद अब्बास के संस्मरण की करें। अब्बास साहब ने तफ्सील से बताया है कि बलराज साहनी द्वारा अभिनीत किरदार अगर प्रसिद्ध हुए तो इसलिए कि उनका अभिनय कौशल “मानव व्यवहार के सहानुभूतिपूर्ण प्रेक्षण और यथार्थवाद के लिए गहरे लगाव,ब्यौरों के प्रति तथा चरित्र व व्यक्तित्व एक एक-एक रग-रेशे के प्रति आश्यचर्यजनक ईमानदारी ” से भरा था। अब्बास साहब लिखते हैं- “काबुलीवाला में,रवींद्रनाथ टैगोर के रचे बहुत ही भोले पठान के प्यारे से पात्र को साकार करने के लिए,उन्होंने रावलपिंडी में गुजरे अपने बचपन की स्मृतियों को फिर से जगाया था,जहां सीमांत क्षेत्र से आने वाले पठान सहज ही और रोजमर्रा के जीवन का हिस्सा होते थे। इसके अलावा उन्होंने स्थानीय पठानों से संपर्क कर उनसे उनकी बोल-चाल सीखी थी,उनका प्रिय साज़ रबाब बजाना सीखा था और पश्तो के गीत गाना सीखा था। उन्होंने पठानों की हिंदुस्तानी की बोल-चाल की ध्वनि और उसके लालित्य को सीखा था। ..वर्षों तक वह जहां भी जाते थे, उनके चाहने वाले उनका स्वागत काबुलीबाला के बोलने के तरीके की उनकी प्रस्तुति की नकल कर के किया करते थे। ” (6) । इसी तरह इप्टा के नाटक आखिरी शमा में बलराज साहनी द्वारा अभिनीत मिर्जा गालिब के चरित्र के की तैयारी के बारे में अब्बास साहब ने लिखा है कि “इस पात्र की प्रस्तुति को पूर्णतम बनाने में.. उन्होंने अपने दोस्तों से देहली की उर्दू इस तरह सीखी थी, वह इस जुबान में वैसे ही बोल सकते थे, जैसे गालिब बोलते रहे होंगे। उन्होंने मुशाइरा शैली में शाइरी पढ़ने की नफीस कला भी घोंटकर पी ली थी। गालिब के पात्र की उनकी प्रस्तुति इतनी विश्वसनीय तथा जीवंत थी कि गालिब के एक महान पारखी तथा गालिब साहित्य के विद्वान ने कहा था: ‘‘जाहिर है कि महान शायर को मैंने कभी देखा तो नहीं था, पर मैं इतना जरूर जानता हूं कि गालिब ऐसे ही नजर आते,ऐसे ही शायरी पढ़ते और नाटक में चित्रित विभिन्न हालात में उनकी ऐसी ही प्रतिक्रिया रही होती।’’(7)

          2

 बलराज साहनी के अभिनय के बारे में प्रचलित ये सत्यकथाएं क्या एक अभिनेता के कौशल का साक्ष्य मात्र हैं, या इन कथाओं की एक अंदरुनी राजनीति है? क्या इन कथाओं के भीतर एक प्रेरणा यह सिद्ध करने की है कि अभिनय तभी श्रेष्ठ हो सकता है जब अभिनेता निभाये जा रहे किरदार की वास्तविक ज़िंदगी में उतरकर उसके सुख-दुःख को भोगे? दूसरे शब्दों में, क्या बलराज साहनी के अभिनय-कौशल को सिद्ध करने के लिए बहुधा उद्धृत की जाने वाली इन कथाओं के भीतर एक मंशा यह साबित करने की होती है कि यह कलाकार समाजवादी समाज-रचना के सिद्धांतों के प्रति निष्ठावान था और उसकी अभिनय कौशल एक तो इस निष्ठा का ही सबूत है और दूसरे उसका अभिनय-कौशल समाजवादी समाज-रचना की दिशा में किया गया कृत्य होने के नाते महान है ? लग सकता है कि यहां महानता की बड़ी और जटिल कथा का एक छोटे-से वाक्य में लाघवीकरण हो रहा है, मगर ऊपर की कथाओं में इस प्रश्न का उत्तर हां में देने के पर्याप्त साक्ष्य मौजूद हैं। मिसाल के लिए, जिस सुधी समीक्षक ने बलराज साहनी के अभिनय कौशल को सराहते हुए उसकी तुलना रुप बदलने वाले पौराणिक पक्षी प्रोतेऊस से की है, उसने लिखा है कि नैचुरल एक्टिंग की यह सिफअत वैसे तो अशोक कुमार और मोतीलाल में भी मौजूद थी, लेकिन “अशोक कुमार और मोतीलाल की सीमा यह थी वे ऊँचे या दरमियानी समाजी दरजे से अलग दिख नहीं पाते थे – उनमें आप उन्हें जो चाहे बना डालिए. उनके चेहरे सिर्फ़ ख़वास के रहे, अवाम के न बन पाए. हिंदी सिनेमा की इस ख़ला को भरा बलराज साहनी ने.” (8)

भीष्म साहनी अपने सहोदर भाई के अभिनय-कौशल को जब याद करते हैं तो यह जोड़ना जरुरी समझते हैं कि “ इससे ( किरदार के साथ एकात्म) बढ़कर भी शायद एक चीज थी, वह था बलराज का सामाजिक सरोकार। वे किसी किरदार को उसके सामाजिक संदर्भो से जोड़ कर देखते थे. उन्होंने मार्क्सवाद के महत्व को स्वीकार किया ”। और अपनी बात की पुष्टि में एक वाक़ये का ज़िक्र करते हैं कि कैसे ‘दो बीघा ज़मीन” की शूटिंग के दौरान बलराज साहनी मुलाकात कलकत्ते में बिहार से आये एक रिक्शेवाले से हुई और उन्होंने उसे फ़िल्म की कहानी सुनाई तो वह यह कहकर रोने लगा कि- “यह तो बिल्कुल मेरी कहानी है. उसके पास भी दो बीघा ज़मीन थी, जो उसने एक जमींदार के पास गिरवी रखी थी और वह उसे छुड़ाने के लिए पिछले पंद्रह साल से कलकत्ता में रिक्शा चला रहा था. हालांकि उसे उम्मीद नहीं थी कि वह उस ज़मीन को कभी हासिल कर पायेगा. इस अनुभव ने उन्हें बदल कर रख दिया। उन्होंने ख़ुद से कहा कि ‘मुझ पर दुनिया को एक गरीब, बेबस आदमी की कहानी बताने की जिम्मेदारी डाली गयी है, और मैं इस जिम्मेदारी को उठाने के योग्य होऊं या न होऊं, मुझे अपनी ऊर्जा का एक-एक कतरा इस जिम्मेदारी को निभाने में खर्च करना चाहिए ’।(9)

और ख्वाजा अहमद अब्बास के जिस संस्मरण का जिक्र आलेख में ऊपर आया है वह तो लिखा ही गया है इस पैरोकारी के साथ कि- “अगर भारत में कोई ऐसा कलाकार हुआ है जो ‘‘जन कलाकार’’ के ख़िताब का हकदार है, तो वह बलराज साहनी ही हैं। उन्होंने अपनी ज़िंदगी के बेहतरीन साल, भारतीय रंगमंच तथा सिनेमा को घनघोर व्यापारिकता के दमघोंटू शिकंजे से बचाने के लिए और आम जन के जीवन के साथ उनके मूल, जीवनदायी रिश्ते फिर से कायम करने के लिए समर्पित किए थे। ” फ़िल्म के पर्दे पर बलराज साहनी का चेहरा ‘ख्वास का नहीं अवाम का चेहरा ’ बन सका तो इसलिए कि ‘उन्होंने मार्क्सवाद के महत्व को स्वीकार किया था ’-  ख्वाजा अहमद अब्बास का उपरोक्त संस्मरण शायद इस बात को सबसे दमदार ढंग से प्रस्तुत करता है। उनका तर्क है- “ बलराज साहनी कोई यथार्थ से कटे हुए बुद्धिजीवी तथा कलाकार नहीं थे। आम आदमी से उनका गहरा परिचय (जिसका पता उनके द्वारा अभिनीत पात्रों से चलता है), स्वतंत्रता के लिए तथा सामाजिक न्याय के लिए जनता के संघर्षों में उनकी हिस्सेदारी से निकला था। उन्होंने जुलूसों में, जनसभाओं में तथा ट्रेड यूनियन गतिविधियों में शामिल होकर और पुलिस की नृशंस लाठियों और गोलियां उगलती बंदूकों को सामना करते हुए यह भागीदारी की थी। गोर्की की तरह अगर जिंदगी उनके लिए एक विशाल विश्वविद्यालय थी, तो जेलों ने जीवन व जनता के इस चिरंतन अध्येता, बलराज साहनी के लिए स्नातकोत्तर प्रशिक्षण का काम किया था। ”(10)

समाजवादी सिद्धांतों के प्रति निष्ठा ने बलराज साहनी को श्रेष्ठ अभिनेता बनने की ज़मीन मुहैया करायी, ऐसा सिर्फ उनके अभिनय को सराहने वाले सुधी समीक्षक ही नहीं बल्कि ख़ुद बलराज साहनी भी मानते हैं, लेकिन किसी घोषणा के अंदाज में नहीं बल्कि उस संयम के साथ जो उनके अभिनय की एक खास पहचान है। वे लिखते हैं- “यह कहना कि कलाकार को हर समय अपनी कला का ही ध्यान रहता है, और देश या समाज की समस्याओं से वे बिल्कुल अलग रहते हैं, बड़ी भारी भूल है। अभिनेता जनता के सामने जीवन नहीं पेश करता,दूसरों के जीवन की तस्वीर पेश करता है। हमलोग फ़िल्म में मैंने एक पढ़े-लिखे बेरोजगार नौजवान का पार्ट अदा किया, दो बीघा जमीन में एक दुःखी किसान का, औलाद में एक घरेलू नौकर का, सीमा में एक विद्वान समाज सेवक का, टकसाल में करोड़पति का और काबुली वाला में एक मुफलिस पठान का। सब रोल एक दूसरे से जुदा थे। अगर मैं किसानों, मजदूरों, पठानों वग़ैरह का जीवन क़रीब से जाकर नहीं देखता तो कभी यह संभव नहीं हो सकता था कि मैं यह पार्ट अदा कर सकता। अगर उन्हें क़रीब से देखना उचित था तो उनके जीवन की आर्थिक सामाजिक और राजनीतिक समस्याओं को जानना और समझना भी मेरा फ़र्ज़ था, तभी मैं उनके दिलों की धड़कनों को अपनी आंखों और अपने शब्दों में अभिव्यक्त कर सकता था, वरना बात अधूरी रह जाती। ” (11)

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“जीवन की आर्थिक सामाजिक और राजनीतिक समस्याओं को” जाने-समझे बगैर किसी अभिनेता के लिए किरदार को निभा पाना संभव नहीं- इस निष्कर्ष पर बलराज साहनी कैसे पहुंचे ? क्या इस वजह से कि अभिनेता बनने के बावजूद उनका खुद के बारे में ख्याल यही रहा कि वे प्राथमिक रुप से एक साहित्यकार हैं ? शायद हां, क्य़ोंकि वे अपने साहित्यकार होने और अभिनेता होने को अनिवार्य-संबंध की एक कड़ी के रुप में देखते थे। इस बात को अलग-अलग रुपों में उन्होंने स्वीकार किया है कि “अगर मैं साहित्यकार ना होता तो इतना अच्छा अभिनेता नहीं बन पाता..”। (12) । फ़िल्म-अभिनेता बनने के पीछे जो कारण उन्होंने गिनाये हैं उसमें एक है पैसों की तंगी तो दूसरा है, साहित्य की दुनिया से बेवजह ठुकरा दिए जाने का मलाल। अपने बारे में वे किंचित गर्व से बताते हैं कि विलायत(बीबीसी लंदन में एनाऊंसर की नौकरी के लिए) जाने से “पहले मेरी कहानियां ‘हंस’ में बाकायदा प्रकाशित होती रहती थी. मैं उन भाग्यशाली लेखकों में से था, जिनकी भेजी हुई कोई भी रचना अस्वीकृत नहीं हुई थी। ” बीबीसी में नौकरी के दौरान उन्होंने एक भी कहानी नहीं लिखी और जब भारत लौटने पर इस “टूटे अभ्यास” को जारी रखने के लिए  उन्होंने एक कहानी हंस पत्रिका में भेजी तो वह लौटा दी गई। ख़ुद उन्हीं के शब्दों में- “मेरे स्वाभिमान को गहरी चोट लगी. इस चोट का घाव कितना गहरा था, इसका अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि उसके बाद मैंने कोई कहानी नहीं लिखी .चेतन के फ़िल्मों में काम करने के निमन्त्रण ने जैसे इस चोट पर मरहम का काम किया. फ़िल्मों का मार्ग अपनाने का कारण यह अस्वीकृत कहानी भी रही। (13)

फ़िल्मों में अभिनय करते हुए पच्चीस से ज़्यादा बरसों के गुजर जाने के बावजूद अपने बारे में उनकी मान्यता यही रही कि वे प्राथमिक रुप से एक लेखक हैं। अपने “फिल्मी जीवन की पचासवीं वर्षगांठ” पर उन्होंने लिखा कि देश के बंटवारे के काऱण मुझे पिता के धन-दौलत के आश्रय से वंचित रहना पडा और पांवों पर खड़ा होने की मजबूरी ने मुझसे जो कई काम करवाये( मिसाल के लिए फ़िल्म डिवीजन की डाक्यूमेंटरी फ़िल्मों में कमेंटरी बोलना, विदेशी फ़िल्मों की हिन्दी डबिंग में भाग लेना, गुरुदत्त द्वारा निर्देशित फ़िल्म बाजी की पटकथा और संवाद लिखना) और फ़िल्मों में काम करना भी इसी मजबूरी का हिस्सा था। फ़िल्म बाज़ी के सफल होने के बाद इस फ़िल्म के निर्माता चेतन आनंद ने उन्हें एक फ़िल्म की कथा लिखने और उसे निर्देशित करने का न्योता दिया था और उन्होंने लिखा है कि-“आज मुझे अफसोस होता है कि चेतन आनंद की इतनी अच्छी पेशकश मैंने क्यों ना शुक्रगुज़ारी के साथ क़बूल की ” क्योंकि बलराज साहनी के ही शब्दों में- “लेखक और निर्देशक बनना मेरे जैसे आलसी स्वभाव के व्यक्ति को ज़्यादा रास आता। ”(14)

खुद को प्राथमिक तौर पर लेखक मानने वाले बलराज साहनी के लिए साहित्य का उद्देश्य है- “असलियत के सामने आईना रख देना ” यानी जीवन की हू-ब-हू तस्वीर पेश करना। इस सोच के अनुकूल वे नाटको-फ़िल्मों और उनमें किए जाने वाले अभिनय के बारे में भी यही मानते थे कि उसमें कुछ भी ऐसा नहीं किया जाना चाहिए जो “कहीं भी वास्तविकता और असलियत पर अत्याचार ” सरीखा हो। कविताई में जिसे अतिशयोक्ति कहा जाता है, वही फ़िल्मों में मेलोड्रामा कहलाता है- अगर इस पंक्ति को ठीक मानें तो कहा जा सकता है कि बलराज साहनी ने अपने लिए अभिनय की जो निजी कसौटी तय की थी वह हिन्दी फ़िल्मों की इतिहास-प्रदत्त या कह लें स्वभावगत विशेषता यानी मेलोड्रामेटिक बनावट के प्रतिपक्ष में तैयार की हुई कसौटी है। यह अकारण नहीं है कि एक तरफ वे कंपनियों के पेश किए हुए नाटकों को कलात्मकता से शून्य रचना मानते हैं क्योंकि सामूहिक जीवन के मामले में “अंदर से खोखली” और बाहर के सामाजिक जीवन से बहुत गहरे ना जुड़े होने के कारण ऐसी रचना पेश नहीं कर पायीं जिनका “ असलियत से संबंध” हो और अपने दौर की फ़िल्मों को अलिफ़-लैला नुमा “उन्हीं पुराने दकियानूसी नाटकों के रुपांतरण ” मानकर उनके  “दीर्घजीवी होने पर” वह शुबहा करते हैं। अलिफ़-लैला यानी फैंटेसी की दुनिया अगर अपने को अतिशयोक्ति(मेलोड्रामा) में साकार करती हो, तो इसके लिए बलराज साहनी के व्याकरण में कोई जगह नहीं जान पड़ती। कम से कम अपनी तरफ से उन्होंने अभिनय की जो कसौटी प्रस्तुत की है, उसको पढ़कर तो यही लगता है।

गवर्नमेंट कॉलेज लाहौर से अंग्रेज़ी साहित्य में एम.ए. और फिर शांतिनिकेतन में थोड़े दिन तक अंग्रेज़ी-साहित्य का अध्यापन करने वाले बलराज साहनी अभिनय का प्रतिमान प्रस्तुत करना हो तो शेक्सपीयर के नाटक हैमलेट के तीसरे अंक को याद करते हैं जिसमें नायक हैमलेट बादशाह के दरबार में नाटक पेश करने वाले अभिनेताओं को उपदेश देते हुए कहता है- “देखो स्टेज पर खड़े होकर इस तरह बोलो कि सुनने वालों को रस आये, यह नहीं कि उनके कान फट जायें। तुम अभिनेता हो, ढिंढोरची नहीं। और देखो, हाथ को कुल्हाड़े की तरह मार-मारकर हवा को मत चीरना। अभिनेता को चाहिए कि वह अपने मन को हमेशा काबू में रखे,चाहे उसके अन्दर भावनाओं के तूफान क्यों ना उठ खड़े हों। जो अभिनेता अपनी भावनाओं को क़ाबू में रखकर उन्हें संयम से व्यक्त नहीं कर सकता, उसे चौराहे पर खड़ा करके चाबुक मारना चाहिए।..”

“..और देखो फीके भी मत पड़ जाना। अंडर ऐक्टिंग करना भी अच्छा नहीं होता। ख़ुद अपनी समझ-बूझ को अपना उस्ताद बनाओ और उसी के अनुकूल चलो। अपने चाल-ढाल को, अपने संकतो के शब्दों के अनुकूल बनाओ और शब्दों को संकेतों के अनुकूल और बराबर ख्याल रखो कि कहीं भी वास्तविकता और असलियत पर अत्याचार ना हो। अगर कहीं भी अतिशयोक्ति से काम लिया तो नाटक का सारा मनोरथ ही खत्म हो जाएगा।। याद रखो, सैकड़ों वर्षों से नाटक का मनोरथ एक ही रहा है और भविष्य में भी वही रहेगा- असलियत के सामने आईना रख देना ताकि अच्छाई अपना रुप देख सके, उतार-चढ़ाव भी उस आईने में साफ दिखाई दें..”

उनकी पेशकश में चुनौती है कि – “जरा इन पंक्तियों की कसौटी पर आप अपने देखे हुए नाटकों और फ़िल्मों को परखिए और देखिए कि वे किस हद तक पूरी उतरती हैं..” (15)

                                            4

आलेख के इस आख़िरी भाग में आइए, देखने की कोशिश करें कि क्या बलराज साहनी के सिनेमाई अनुभव के भीतर कोई फांक है, दूसरे शब्दों में क्या उनके सिनेमाई अनुभव का कोई हिस्सा अभिनय के बारे में तय किए गए अपने ही प्रतिमान को नकारता हुआ-सा प्रतीत होता है ? इस सिलसिले में पहली बात “स्वाभाविक अभिनय” से जुड़ती है। भले ही बलराज साहनी की मान्यता यह रही हो कि ‘अभिनय अगर स्वाभाविक हो तो उसे हर कोई पसंद करता है ’(और यह मान्यता बहसतलब है) लेकिन ऐसा कहने के साथ-साथ यह जोड़ना भी ज़रूरी समझते हैं कि “स्वाभाविक अभिनय एक तरह से भ्रांति पैदा करने वाली चीज है, क्योंकि दर्शकों को स्वाभाविक लगने वाला अभिनय करते समय हो सकता है, अभिनेता को कई अस्वाभाविक बातें करनी पड़ें। उसका दृष्टिकोण दर्शक के दृष्टिकोण से भिन्न होता है…”।(16) प्रश्न पूछा जा सकता है कि क्या दृष्टिकोण का यह अलगाव निभाये गए किरदार से दर्शक का एकात्म स्थापित करने में कहीं से बाधक नहीं होता ? और दूसरी बात, कलाकार अगर अपने अभिनय को स्वाभाविक बनाने के लिए कुछ अस्वाभाविक चीजें करता है तो फिर इस अस्वाभाविकता का उस भोगे हुए यथार्थ से क्या रिश्ता है जिसे खुद बलराज साहनी ने अभिनय की प्रामाणिकता के लिए जरुरी माना है ?

इस प्रश्न का सही उत्तर तो खैर हमेशा अनिर्णय की स्थिति में रहेगा कि लोकप्रियता किसी कला की महानता की एकमात्र कसौटी है या नहीं , परंतु यह बात मान ली जानी चाहिए कि कला अगर स्वान्तः सुखाय नहीं है तो फिर उसे लोक-स्वीकृति की तलब हमेशा लगी रहेगी। यह बात कम से कम फ़िल्म सरीखे जन-माध्यम के लिए तो कही ही जा सकती है क्योंकि इसका विराट दर्शक-वर्ग ‘अज्ञातकुलशील’ होता है और फ़िल्म बनाने वाले के सामने हमेशा इस बात की चुनौती होती है कि वह इस ‘ अज्ञातकुलशील ’ दर्शक की रुचि का कोई औसत मान निकालकर उस पर खड़ा उतरने की कोशिश करे। अभिनेता के दृष्टिकोण और दर्शक के दृष्टिकोण में अंतर स्वीकार करने वाले बलराज साहनी जब फ़िल्म की लोकप्रियता के बारे सोचते हैं, तो आश्चर्यजनक तौर पर अभिनय के बारे में तय किए गए अपने ही प्रतिमान से बिल्कुल अलग बात कहते हैं, कुछ ऐसी बात जो असलियत के सामने आईने रखने वाले उनके यथार्थवाद की जगह अतिरंजना और अतिशयोक्ति को प्रतिष्ठित करता प्रतीत होता है। मिसाल के लिए, अभिनय-कला शीर्षक निबंध में एक जगह उनका कहना है-“हम पढ़े-लिखे अभिनेता पुराने अभिनेताओं पर नाक-मुंह चढ़ाते हैं। हम कहते हैं कि उनका अभिनय स्वाभाविक नहीं था, उनमें बनावट होती थी, और वे बात को बहुत ज्यादा बढ़ा-चढ़ाकर पेश करते थे। लेकिन उनके अभिनय का सही मूल्यांकन करने के लिए हमें यह देखना चाहिए कि उनका दर्शकों पर कैसा प्रभाव पडता था। वे जो भाव अभिव्यक्त करते थे, वे प्रायः सच्चे होते थे, और उनकी अभिनय शैली बहुत प्रभावशाली होती थी। बाल-गंधर्व जैसे अभिनेता अपनी शैली के बहुत बड़े उस्ताद थे। आगा हश्र के नाटक दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर देते थे। ” (17)

बात बढ़ा-चढ़ाकर पेश की जाय, सच्चाई तो भी रह सकती है, ऐसी प्रभावशील सच्चाई जो मंत्रमुग्ध कर दे- ऐसा अनुभव बलराज साहनी को कई बार हुआ। इसका एक साक्ष्य उनकी आत्मकथा के शुरुआती कुछ पन्नों पर ही मौजूद हैं। अपने स्कूली दिनों को याद करते हुए वे लिखते हैं उन दिनों मैंने ‘हीर-रांझा’ और ‘अनारकली’ नाम की फिल्में देखी थीं और अनारकली के रुप में अभिनेत्री सुलोचना के सौन्दर्य से अभिभूत हो उठा था। अनारकली को जिन्दा दफ्न करने के दृश्य को याद करके मैं रो उठा था। अनारकली की दर्दनाक मौत की पीड़ा में छटपटाते बलराज की हालत यह थी -“  यदि मुझसे कोई कहता कि यह सब तो सिनेमा के ट्रिक का मामला है और कोई भी ईंट सुलोचना के चेहरे को ढंकने के लिए नहीं रखी गई तो मैं उसे थप्पड़ मार देता, जहां तक मेरा सवाल है, सुलोचना मर चुकी थी और मेरे लिए जीवन में कोई आनंद शेष नहीं रह गया था..लेकिन सुलोचना तो जिन्दा थी और कई फिल्मों में उसने मेरे साथ काम भी किया। जब भी मैं उसके प्रति अपने इस किशोरवय के प्रेम का जिक्र करता तो वह इसे हंसी में उड़ा देती। आज जबकि मैं खुद एक फ़िल्म स्टार हूं तो उसकी इस हंसी का मतलब समझ सकता हूं लेकिन तो भी यह ख्याल मैं अपने दिल से नहीं निकाल पाता कि किसी दिन उससे कहूंगा कि वह सिर्फ मूर्खतापूर्ण आसक्ति भर नहीं था बल्कि प्रेम का मेरा पहला सच्चा अनुभव था..। ” (18)

और दूसरा साक्ष्य है फ़िल्म ‘दो बीघा जमीन” की लोकप्रियता के संबंध में की गई उनकी टिप्पणी। इस फ़िल्म से जुड़ी यादों को बलराज साहनी अपनी “आखिरी सांसों तक सहेजकर” रखना चाहते थे। बावजूद इसके इस फ़िल्म का यथार्थवाद उन्हें खटकता था। उन्हें मलाल रहा कि दो बीघा जमीन को जैसी सराहना बुद्धिजीवियों में मिली वैसी आम जनता के बीच नहीं। और इसकी व्याख्या करते हुए उन्होंने इस फ़िल्म में दो दोष गिनाये हैं। एक तो यह कि इस फ़िल्म का नायक कभी भी “उस अन्याय और अत्याचार के खिलाफ आवाज बुलंद नहीं करता, जिसका उसे सामना करना होता है , ” और दूसरे यह कि “ वह अपने दोस्तों और सहकर्मियों को खुद से दूर कर देता है ” जबकि एक औसत दर्शक जो खुद को हीरो के जूते में रख कर देखना चाहता है। वह कभी भी “ खुद को इस तरह के आत्मपीड़क और अंतर्मुखी हीरो के साथ जोड़ कर देखना ” नहीं चाहेगा। इस दोष का जिम्मेदार वे सारी प्रगतिशील कला और साहित्य की उस आदत को मानते हैं जो “विदेशी मूल्य और वाद पर खड़ा उतरना चाहते हैं ना कि उन मूल्यों पर, जो हमारी अपनी धरती की उपज हैं। दो बीघा जमीन की तकनीक भी विश्व प्रसिद्ध इतालवी निर्देशक की फ़िल्म बाइसिकिल थीफ और उसमें प्रदर्शित किये गये यथार्थवाद से प्रभावित थी। यही वह कारण था कि रूसियों ने भले ही दो बीघा जमीन के बारे में अच्छी बातें कहीं, लेकिन उन्होंने अपनी सारी प्रशंसा और सम्मान राजकपूर की फ़िल्म आवारा के लिए सुरक्षित रख लिया, बल्कि वे आवारा के प्रति दीवाने से हो गये।.. हालांकि हमने उम्मीद की थी समाजवाद के इस मक्का में लोग कहीं ज्यादा सुसंस्कृत और उन्नत कला  को सम्मान देंगे , लेकिन रूसियों को आवारा के प्रति उनकी दीवानगी के लिए कसूरवार नहीं माना जा सकता। खास तौर से यह देखते हुए कि आवारा में कितने बेजोड़ तरीके से भारतीय जीवन की धड़कन को पकड़ा गया है।” (19)

इस विन्दु पर संस्कृति-मनोविज्ञानी सुधीर कक्कड़ की याद आना लाजिमी है जो लिखते हैं कि सिनेमा भारतीय उपमहाद्वीप में रहने वाले लोगों के साझा स्वप्नों(फैंटेसी) का वाहक है और एक ऐसा वैकल्पिक जगत मुहैया कराता है, जहां हम यथार्थ से अपने पुराने संघर्ष को जारी रख सकते हैं। हमारे फ़िल्म-जगत में फ़िल्म दर फ़िल्म स्वप्नों की ऐसी भारी मात्रा में नियमितता आश्चर्य में डालती है। एक तरह से जिंदगी की वास्तविक समस्याओं के ऐसे जादुई हल, भारतीय जनमानस में गहरी जमी ऐसे समाधानों की इच्छा की ओर इशारा करते हैं।.. कोई भी समझदार भारतीय यह नहीं मानता कि सिनेमा में वास्तविक जिंदगी का अंकन होता है। ” (20)

चन्दन श्रीवास्तव

चन्दन श्रीवास्तव

चन्दन श्रीवास्तव,  मूलतया छपरा(बिहार) के निवासी, पिछले पंद्रह सालों से दिल्ली में। पहले आईआईएमसी और फिर जेएनयू में पढ़ाई। “उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध में हिन्दी लोकवृत्त का निर्माण” शीर्षक से पीएचडी के बाद दिल्ली के कॉलेजों में छिटपुट अध्यापन, फिर टीवी चैनल की नौकरी और अब विकासशील समाज अध्ययन पीठ(सीएसडीएस) की एक परियोजना इंक्लूसिव मीडिया फॉर चेंज से जुड़े हैं। इनसे  chandan@csds.in पर संपर्क संभव है। 

संदर्भ

(1) बलराज-संतोष साहनी समग्र, संपादक डा. बलदेवराज गुप्त, प्रचारक ग्रंथावली परियोजना, हिन्दी प्रचारक संस्थान, वाराणसी में संकलित सुखवीर का बलराज साहनी एक चेहरा, कई चेहरे शीर्षक आलेख।

2. नवभारत टाईम्स में प्रकाशित विष्णु खरे का लेख जो चवन्नी चैप नामक ब्लॉग पर ‘बलराज साहनी पर विष्णु खरे ’ शीर्षक से उपलब्ध है

3 अखरावट ब्लॉगस्पॉट पर भीष्म साहनी की नजर से बलराज साहनी- शीर्षक पोस्ट

4 देखें पुंजप्रकाश ब्लॉग स्पॉट पर जनकलाकार बलराज साहनी- ख्वाजा अहमद अब्बास शीर्षक पोस्ट

5. लाईवहिन्दुस्तान डॉट कॉम पर 5 मई 2012 को प्रकाशित दो ‘ बीघा जमीन की एक तलाश ’ शीर्षक पोस्ट

6. देखें पुंजप्रकाश ब्लॉग स्पॉट पर जन-कलाकार बलराज साहनी- ख्वाजा अहमद अब्बास शीर्षक पोस्ट

7 उपरोक्त, वही

8  चवन्नी चैप नामक ब्लॉग पर विष्णु खरे का आलेख, उपरोक्त

9. अखरावट ब्लॉग सपॉट पर- भीष्म साहनी की नजर से बलराज साहनी शीर्षक पोस्ट

10.( देखें- लाईवहिन्दुस्तान डॉट कॉम पर, उपरोक्त)

11. देखें- बलराज-संतोष साहनी समग्र, संपादक डा. बलदेवराज गुप्त, प्रचारक ग्रंथावली परियोजना, हिन्दी प्रचारक संस्थान, वाराणसी में संकलित ‘फिल्मी-दुनिया ’ नामक निबंध

12  देखें- बलराज-संतोष साहनी समग्र में- सुखबीर का आलेख, उपरोक्त)

13. देखें चवन्नीचैप ब्लागस्पाट पर क्यों अभिनेता बने बलराज साहनी शीर्षक पोस्ट

14. देखें- बलराज-संतोष साहनी समग्र में “अपने फिल्मी जीवन की पचासवीं वर्षगांठ पर ” शीर्षक आलेख

15. देखें बलराज-संतोष साहनी समग्र में सिनेमा और स्टेज नामक निबंध

16.  देखें बलराज-संतोष साहनी समग्र में अभिनय कला नामक निबंध

17. बलराज-संतोष साहनी समग्र में अभिनय-कला नामक निबंध

18. देखें बलराज साहनी- ऐन ऑटोबॉयग्राफी, हिन्द पॉकेट बुक्स, 1979, दिल्ली

19. अखरावट ब्लागस्पॉट पर मेरी निगाह में सिनेमा : बलराज साहनी, सत्यजीत रे, अडूर गोपालकृष्णन नामक पोस्ट

20. अखरावट बलॉगस्पॉट पर सिनेमा पर सुधीर कक्कड़: भारतीय सिनेमा दिवास्वप्नों पर पलता है.. शीर्षक पोस्ट

साभार- नया पथ

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