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हंस में ‘घुसपैठिये’ के दो साल: पीयूष राज

‘घुसपैठिये’ स्तंभ की कहानियाँ न तो भाव-शिल्प की जटिलता में फंसती हैं और न ही इनके सरलीकरण में. उनके समाज में जितने तरह के अन्तर्विरोध हैं, उन्हें ये रचनाएँ सहजता से उनके स्वाभाविक रूप में पूरी डिटेलिंग के साथ रखती हैं. यही कारण है कि भाव और भाषा का दुहराव इनके यहाँ नहीं है. यहाँ भले ही इन कहानियों के कुछ उद्धरणों को उदाहरण के रूप में दिया गया है, लेकिन इन कहानियों की एक विशेषता यह भी है कि इनको पूरा पढ़कर ही इसके समग्र प्रभाव को समझा जा सकता है. # लेखक 

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प्यास और पानी, सौजन्य: अंकुर

‘घुसपैठिये’ के दो साल 

By पीयूष राज

हंस में ‘घुसपैठिये’ नामक स्तम्भ के दो साल पूरे हो गए हैं. इस स्तंभ में मजदूर बस्तियों में रहने वाले किशोर उम्र के बच्चों की कहानियाँ छप रही हैं. इन ‘अभी-अभी जवान हुए या हो रहे’ बच्चों की किसी खास तरह की साहित्यिक या वैचारिक ट्रेनिंग नहीं है. इनकी कहानियाँ देखे और भोगे गए जीवनानुभव की रचनात्मक अभिव्यक्ति हैं. लगभग 60 के दशक से ही ‘भोगे हुए यथार्थ’ के नाम पर लिखी गई रचनाओं को कभी किसी साहित्यिक आन्दोलन या किसी अस्मितावादी साहित्यिक आन्दोलन के नाम पर हिन्दी साहित्य में सराहना मिलती रही है. 80 के दशक के बाद तो ‘अनुभव या अनुभूति  की प्रामाणिकता’ अस्मितामूलक साहित्य का पर्याय बन गई. आलोचना की हर तरह की धारा ने इन अस्मितामूलक साहित्य को अब स्वीकार कर लिया है. इन विमर्शों की रचनाओं के साहित्यिक मूल्यांकन हेतु नए तरह के सौंदर्यशास्त्र और सौन्दर्यबोध को गढ़ने का आग्रह किया जाता है खासकर रचनात्मक उत्कृष्टता के सन्दर्भ में. अगर किसी को शिल्प या भाव के दृष्टिकोण से इन विमर्शों की रचनाएँ कमजोर लगती हैं तो यह तर्क दिया जाता है कि अभी-अभी तो इन्होंने लिखना शुरू किया है, अब तक ये हाशिये के लोग कहानियों में पात्र ही रहे हैं, अभी तक तो कोई और इनकी कहानी लिख रहा था, अब इन्होंने अपनी कहानी अपनी जुबानी लिखना शुरू किया है तो इनसे भाव और शिल्प की प्रगाढ़ता एवं विविधता की बहुत अधिक उम्मीद ठीक नहीं है आदि-आदि. मेरा सवाल यह है कि क्या ‘घुसपैठिये’ स्तम्भ के कहानीकारों के सन्दर्भ में इनमें से कई बातें लागू नहीं होती हैं? ‘घुसपैठिये’ की कहानियों के भाव और शिल्प पर मैं आगे अपने विचार रखूँगा. लेकिन क्या जो मानदण्ड विमर्शों को हिन्दी साहित्य या साहित्य में स्थान देने के लिए अपनाए गए हैं क्या वो ‘घुसपैठिये’ पर लागू नहीं होता? क्या कारण है कि विमर्श के नाम पर किसी भी तरह की रचना की वाहवाही करने वाले आलोचक इन कहानियों पर कुछ नहीं बोल रहे?

‘हंस’ जैसी प्रसिद्ध हिन्दी पत्रिका जिसे मेरी जानकारी के अनुसार हिन्दी साहित्य के साधारण पाठक से लेकर वरिष्ठ आलोचक तक पढ़ते हैं. ऐसी स्थिति में ‘घुसपैठिये’ पर हिन्दी समाज की चुप्पी आश्चर्य का विषय है. ऐसा इसीलिए भी है कि ‘हंस’ द्वारा इससे पहले इस तरह के किए गए प्रयासों को हिन्दी समाज और हिन्दी आलोचकों ने हाथों-हाथ लिया है. कामगार बस्तियों के इन किशोर रचनाकारों की रचनाओं पर चर्चा के लिए मैंने अन्य विमर्शों का जिक्र इसीलिए किया क्योंकि ‘घुसपैठिये’ की हिन्दी आलोचना द्वारा उपेक्षा उसके दोहरे मानदण्ड की परिचायक है. अन्य विमर्शों के तहत एक ही तरह की भाव और भाषा में लिखी जाने वाली रचनाओं की ‘स्वानुभूति’ के नाम पर जरूरत से अधिक प्रशंसा और ठीक उसी वक्त में भाव और भाषा की विविधता से परिपूर्ण अपनी स्वानुभूति को रचनात्मक अभिव्यक्ति देती रचनाओं पर दो शब्द तक नहीं कहना उपर्युक्त बात की पुष्टि के लिए पर्याप्त है. आखिर ‘साहित्य के आरक्षित डब्बों में घुस आए’ इन घुसपैठियों से किन्हें खतरा है? मेरा साफ-साफ़ मानना है कि विमर्श और समकालीनता के नाम पर एक ही तरह की भावबोध वाली रचनाओं को इनसे खतरा है. ऐसा नहीं है कि विमर्श के नामपर लिखी लिखी जा रही सभी रचनाओं में कोई विविधता नहीं है. लेकिन अधिकांश रचनाएँ एक ही तरह की हैं. इसका कारण यह दिया जाता है कि इन रचनाकारों की सामाजिक-सांस्कृतिक पृष्ठभूमि एक ही तरह की है इसीलिए इनकी रचनाओं में भाव और शिल्प की समानता देखने को मिलती है. अब अगर ‘घुसपैठिये’ के रचनाकारों की के सन्दर्भ में देखें तो इनकी भी सामाजिक-सांस्कृतिक-आर्थिक पृष्ठभूमि एक ही है. यहाँ तक कि ये रचनाकार कमोबेश एक ही उम्र के हैं. लेकिन इनकी रचनाओं में अनुभव को अभिव्यक्त करने का तरीका बिल्कुल भिन्न है. भाव और भाषा दोनों स्तरों पर. इसका कारण यह है कि वे एक साथ इन कामगार बस्तियों के जीवन के भोक्ता भी हैं और दर्शक भी. भोक्ता इस अर्थ में कि वे इन कामगार बस्तियों में रहते हैं और दर्शक इस अर्थ में कि वे स्वयं श्रमिक नहीं हैं. श्रमिक उनके माता-पिता या सम्बन्धी हैं. इस कारण वे इस जीवन में लिप्त रहने के बावजूद रचना करते समय एक तटस्थ दृष्टिकोण रखने में सफल हैं. उनकी रचनाओं में विविधता का मूल स्रोत यही तटस्थ दृष्टिकोण है.

इनकी रचनाओं के बारे में यह बिल्कुल सही मूल्यांकन है कि ‘साहित्य के उत्पादक और उपभोक्ता, अभिलेखन/रिकॉर्डिंग और सृजन, किस्सा और तथ्य के बीच के अंतर यहाँ धुंधले पड़ जाते हैं.’ इनका जीवनानुभव कृत्रिम, बनावटी या अतिशयोक्तिपूर्ण नहीं है. शोषित-पीड़ित होते हुए इनकी रचना का लक्ष्य आत्मपीड़ा का प्रकाशन नहीं है. ऐसा नहीं है कि जीवन की विसंगतियां और बिडम्बना इनकी रचनाओं में नहीं है लेकिन वे रचना करने से पहले ऐसा पूर्व निश्चय करके नहीं चलते कि उन्हें इस पहलू को हरहाल में उजागर करना है. उनका जीवन ही ऐसा है कि उनके इस जीवन की विसंगतियाँ और बिडम्बनाएं स्वतः ही उनकी रचनाओं का हिस्सा बन जाती हैं. ऐसा इसलिए भी है कि उनका जीवन घटनापूर्ण है. कामगार बस्तियों में रहने वाले लोगों के दैनिक जीवन में ही तेजी से घटनाएँ घटती हैं. सुबह उठकर दैनिक क्रियाकर्म से ही इन घटनाओं की शुरुआत हो जाती है-

‘सुबह के साढ़े पाँच बजे, जब अँधेरा भूरा होने लगता है और सपाट आसमान में हल्के नीले बादल दरारें बनाकर उभरने लगते हैं तब अंसारी जी के मोहल्ले में सब कुछ रोज़ाना वाली एक-सी धुन में शुरू हो जाता है। घुर्र-घुर्र करती पानी की मोटरों से घरों की दीवारें और ज़मीन झन्नाटें लेने लगती हैं। चबूतरों पर पानी की बाल्टियाँ उड़ेल दी जाती हैं, नहीं तो पाइप से छूटती ताजे पानी की दूधिया धार सारा आँगन भिगोती हुई गली में उतर आती हैं और सींक वाली झाडुओं का ज़बरदस्त संगीत एक साथ नहीं तो एक के बाद एक सुनाई देने लगता। इस बीच अंसारी जी उबासियाँ लेते हुए अपने पुराने, जर्जर मकान की बालकनी पर खड़े होकर मोहल्ले भर को निहारते हैं।’ (अंसारी जी )

मध्यवर्ग और उच्चवर्ग का जीवन इतना अधिक घटनापूर्ण नहीं होता. यह वर्ग  अपने जीवन में घटनाओं को अंजाम देने की कोशिश करता है जबकि कामगार बस्तियों में घटनाएँ ही श्रमिक-जीवन को संचालित करती हैं. इसी कारण ‘घुसपैठिये’ के रचनाकारों की एक बड़ी विशेषता है- छोटी-छोटी घटनाओं की भी सूक्ष्मता से विस्तृत वर्णन. घटनाएँ इतनी तेजी से घटित होती हैं कि साधारण किस्म के अभिलेखन से इसे रचनात्मक तौर पर सम्भालना नामुमकिन है. इसके संतुलन के लिए ये अपनी कहानियों के लिए फैंटसी, डायरी-लेखन या रिपोर्ताज की शैली अपनाते हैं. कामगार-बस्तियों की जीवन शैली अपने-आप में व्यवस्था की आलोचना है. जब इस जीवन शैली को फैंटसी, डायरी-लेखन या रिपोर्ताज शैली में ये रचनाकार अभिव्यक्त करते हैं तो उसमें व्यवस्था की आलोचना समाहित होती है. रचना की शैली कुछ भी हो पर व्यंग्य का सटीक प्रयोग इनके यहाँ व्यवस्था की विद्रूपता के लिए देखा जा सकता है. उदाहरण के लिए इन कहानियों के कुछ कथनों को देखिए– “ अरे तूने मुझे कहाँ पाला है? मुझे तो अमेरिकन कुत्ते ने पाला था और उस एहसान का कर्ज मैं अभी तक चुका रहा हूँ.’ तिहाई लाल ने पूछा ने पूछा ‘कैसे’? ‘अरे क्या तुझे याद नहीं जब तेरे अमेरिकन कुत्ते की नई-नई शादी हुई थी तो वह मेरी लूँगी चुराकर भाग गया था. बदले में मैंने उसकी बीबी की पाँच रुपये वाली साड़ी फाड़ दी थी, बाद में पता चला कि वह पाँच रुपये की नहीं पाँच हजार की थी. उस साड़ी का कर्ज मैं अभी तक चुका रहा हूँ.”  (‘नींबू-पानी पैसा’)

–“अरे छोड़, जो कभी रामभक्त नहीं बना वो देशभक्त कैसे बनेगा?” (‘नींबू-पानी पैसा’)

–“‘सरकारी नौकर हैं’ कहकर ख़ुद को देश की सेवा में लगा बताते हैं और अंसारी जी पाँच बजे तक की ड्यूटी पूरी लगन से निपटाकर दो बजे ही लौट आते हैं.” (सुबह वाकई बेनकाब थी उर्फ अंसारी जी)

उपर्युक्त उद्धरणों से स्पष्ट है कि व्यवस्था और समाज की विसंगतियों को इतनी सूक्ष्मता से ये रखते हैं कि पाठक को कहीं से ये ऊपर से लादा हुआ या किसी वैचारिक बोझ से लदा हुआ नहीं लगता है. ऐसा आजकल की रचनाओं में बहुत कम देखने को मिलता है.

फैंटसी या कल्पना की सहायता से अभी तक ‘अँधेरे’ का प्रयोग व्यवस्था की सच्चाई को बयान करने के लिए किया जाता रहा है. लेकिन ‘घुसपैठिये’ के रचनाकारों ने ‘अंधेरे’ को सकारात्मक रूप में दिखाया है. इसका कारण यह है कि वर्किंग क्लास की इच्छाएँ-आकांक्षाएँ दिनभर के काम के बाद अंधेरे में ही आकार लेती हैं-

‘रोजान की आदत से सभी जग तो रहे थे लेकिन अंधेरा होने की वजह से सभी आँख बंद करके दोबारा से सो जाते थे, अरे अभी अंधेरा है, एक नींद और मार लेते हैं। आज तो सभी की मम्मियाँ और घरवालियाँ अगड़ाइयाँ लेकर सो रही थीं। बच्चों के तो मजे आ गए थे। सावदा मे पढ़ाने वाले टीचर ने जब सावदा मे इंट्री लिया तो पता चला कि यहाँ तो अभी रात है, सभी ने अपनी-अपनी घड़ी पर नजर गड़ाया और देखा कि उनका टाइम तो सही है पर चौकीदार अभी तक सोया पड़ा है। सावदा से जाने वाली बसें लाईट जलाए खड़ी हैं। भटटू के पापा ने अपनी बीबी को जगाया, ‘अरे भगवान, अब तो जग जाइए, सुबह हो गई है।’ ‘अरे कैसी बात करते हैं, आप भी सो जाइए रात काफी बची है। आपको नींद क्यों नहीं आ रही है।’ ‘आप को रात लग रही है बाहर के लोग सावदा में आने लगे हैं।’

बाहर के लोग भी यहाँ आकर चक्कर मे फंस गए हैं, अरे सावदा को क्या हो गया है? सावदा के बच्चे अभी अपने घरो में सोये हुए पड़े हैं। रोज ड्यूटी जाने वाले लोग भी बेखबर सोये पड़े हैं।’ (अंधेरा)

यहाँ अंधेरा इसलिए खास है क्योंकि यही इनके जीवन का ऐसा पल है, जहाँ ये थोड़े बेफिक्र हो पाते हैं. भागदौड़ भरी जिंदगी जहाँ ठहर जाती है और इन्हें लगता है कि काश ‘इस रात की कोई सुबह न हो’।

दिन की शुरुआत उनके लिए युद्ध जैसी होती है. जहाँ पानी जैसी चीज के लिए ‘जलविद्रोह’ होता है और वैसी ‘दोस्ती’ जिसे धार्मिक-आस्था नहीं तोड़ पाती उसे पानी की धार तोड़ देती है.

“बन्नो बाजी को पाइप खोले पानी भरते देख उन दोनों को मानो चपेट पड़ गया। दोनों आंटियां बन्नो बाजी पर बरस पड़ी। अपनी बहन को दो जंगली कुत्तियों की भांति आंटियों के बीच अकेले जूझते देख बन्नो बाज़ी की दो बहनें पीछे रह सकती थीं क्या? वह भी तीनों के बीच घुस गईं। ये वही तीन हमशक्ल बहनें हैं जिनका ज़िक्र मैंने पहले किया था और जो कुछ मैंने कहा था काफ़ी हद तक इन बहनों ने उसे साकार कर दिखाया। इन तीनों बहनों ने मिलकर उन दोनों आंटियों को बैकफुट पर धकेल दिया। इसी के साथ बहुत सी औरतें इन पांचों की मौजूदगी के कारण अपने ख़ाली डिब्बे लिए लौट रही थीं।”

आस्था और जेंडर-सम्बन्धी प्रश्न किसी भी समाज के मूलभूत प्रश्न हैं. ‘घुसपैठिये’ की कहानियाँ बहुत ही बारीकी से आस्था और जेंडर के प्रश्नों को उठाती है. ‘रात और दिन’ और ‘नींबू-पानी पैसा’ जैसी कहानियाँ आस्था की जड़ों को हिलाने वाली हैं. दूसरी ओर ‘सुबह वाकई बेनकाब थी उर्फ अंसारी जी’, ‘लड़की की डायरी’, ‘पहचान’, ‘वंश’ जैसी कहानियाँ जेंडर-सम्बन्धों के अन्तर्विरोधों को बारीकी से रखती हैं.

‘सुबह वाकई बेनकाब थी उर्फ अंसारी जी’ के इन दो उद्धरणों में वर्किंग क्लास के भीतर जेंडर की समझ के पहलू को पकड़ा जा सकता है.

‘अम्मी, अब्बू अच्छा शौहर कहाँ से लायेंगे? ये अच्छा शौहर क्या होता है?’

‘नहीं मिलेगा अच्छा शौहर! क्योंकि तुम्हारे अब्बू उसे पहचानते ही नहीं है इसलिए तुम सिर्फ़ तरकारी काटो, तुम्हें ही अच्छी बेगम बनना पड़ेगा।’ कहकर शबनम फिर से चूल्हा जलाने लगी, पर अंदर से जैसे भभक उठी थी। (अंसारी जी)

अपनी हँसी को विराम और गले को आराम देकर उन्होंने कुछ दम भरते हुए कहा, ‘हाँ, हाँ, ज़रूर! क्यों नहीं! अच्छा शौहर भी ले आयेंगे हम!’ सुनकर मासूमा ने अगला सवाल किया, ‘पर अब्बू, पहले बताइये कि अच्छा शौहर होता क्या है?’ मासूमा की आँखों में जिज्ञासा साफ़ नज़र आ रही थी। अब्बू ने उसकी कलाई पकड़कर पास खिसकाते हुए उसे बोले, ‘अच्छा शौहर वह होता है जो हमारी मासूमा को बेइंतहा मोहब्बत करे। उसकी सारी ख्वाहिशें पूरी करे। उसका अपने से भी ज़्यादा ध्यान रखे और हमेशा उसे खुश रखे।’ जवाब सुनकर खामोश मासूमा जैसे अब्बू की आँखों में कुछ टटोलने लगी पर अंसारी जी तो इस बेहद सच्चे जवाब के साथ ख़ुद को ख़ाली कर चुके थे। ज्ञान और धर्म की कोई अनमोल बात किसी को बताते हुए जैसा आनंद कोई गुरू महसूस करता है कुछ वैसे ही फक्र का अहसास अंसारी जी के चेहरे पर नज़र आ रहा था। मासूमा एकटक अपने अब्बू की आँखों में झाँक रही थी कि तभी उसने फिर से अब्बू को पुकारा और कहा, ‘अब्बूजान क्या आप भी एक अच्छे शौहर हैं?’ सवाल सुनकर अंसारी जी के मुँह से निकलने वाली ‘हाँ’ अंदर ही कहीं घुट कर रह गई और स्तब्ध से मासूमा को देखते रहे। चाहकर भी अपना जवाब बुनने के लिए शब्द नहीं खोज पाए। (अंसारी जी)

एक तरफ मासूमा की माँ शबनम का खुद के अनुभव के आधार पर कहना है कि क्योंकि अंसारी जी खुद अच्छे शौहर नहीं है तो वह उसके लिए कैसे अच्छा शौहर ढूंढ पाएंगे. यह अनुभव अधिकतर औरतों का है. लेकिन जब यही सवाल मासूमा ने अंसारी जी से किया तब वे असहज हो गए. अंसारी जी अभी तक स्त्री-पुरुष संबंध को सिर्फ पति-पत्नी के संबंध के रूप में ही देखते आए थे, जहाँ उन्हें कुछ भी करने की स्वतन्त्रता थी. लेकिन जब संदर्भ उनकी बेटी का आया तब उन्हें इस संबंध में औरत की पीड़ा का अंदाजा हुआ. अंसारी जी के माध्यम से यह पाठकों को भी इस संबंध में सोचने को विवश करता है.

‘अच्छा शौहर कैसा होता है?’ या ‘क्या आप अच्छे शौहर हैं?’ या ‘वो बेटा है या बेटी?’ या ‘अगर बेटा है तो क्यों है और बेटी है तो क्यों है?’ या ‘दोनों में फर्क क्या है?’ या ‘कपड़े अलग क्यों हैं?’ या ‘खेल अलग क्यों हैं?’ जैसे कौतूहलपूर्ण प्रश्नों से ये कहानियाँ, किसी आम पाठक को भी जेंडर सम्बन्धित सम्बन्धों पर सोचने को विवश कर देती हैं. इसका मूल कारण है कि इन रचनाओं में ये प्रश्न बहुत ही सहज और स्वाभाविक रूप से आए हैं और पाठक के भीतर भी उसी सहजता से पैठ जाते हैं.

उदारीकरण, बाजारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण के समाज पर पड़े प्रभावों खासकर ‘वर्किंग क्लास’ पर पड़े प्रभावों के बारे में अभी तक जितना भी साहित्य में लिखा गया है वो ज्यादातर बाहर से साफ़-साफ़ दिखने वाले प्रभावों के बारे में है. इस परिप्रेक्ष्य में ‘घुसपैठिये’ की रचनाएँ व्यक्ति नहीं समाज की मानसिक अवस्था को रचनात्मक अभिव्यक्ति देती हैं. ‘निरुमा’ और ‘माल की महफिल’ जैसी कहानियों में  वर्किंग क्लास सामाजिक मनोदशा को जितने बेहतर ढंग से रखा गया है वो उदारीकरण को केन्द्र में रखकर लिखी जा रही समकालीन रचनाओं में दुर्लभ है. इस सामाजिक मनोदशा के साथ सबसे खास तथ्य यह है कि नई पीढ़ी की का मानसिक विकास किस दिशा में हो रहा है, इसके बारे में ये कहानियाँ संकेत देती हैं. ‘वंश’ , ‘पहचान’, ‘एक लड़की की डायरी’, ‘मुस्कान’ जैसी कहानियाँ जहाँ बच्चों और किशोरों के भीतर जेंडर संबंधी समझ के अंतरविरोधों को बड़ी बारीकी से पेश करती हैं. इन कहानियों में सिर्फ उन बच्चों या किशोरों के मन में चलने वाले अंतरविरोधों को एकांगी रूप से नहीं वर्णित किया गया है बल्कि इस मानसिक टकराहट को सामाजिक अंतरविरोधों के बरक्स रखने का प्रयास इन कहानियों में है, जो  जेंडर संबंधी एक भिन्न किस्म के संघर्ष की स्थिति को पैदा करता है.

इसके अलावा ‘घुसपैठिये’ की कहानियाँ इस उदारीकरण के दौर में दम तोड़ते सहज मानवीय संबंधों के बीच नए तरह के मानवीय संबंधों की भी खोज करते हैं. इसका मुख्य कारण यह है कि इसके रचनाकार अभी किशोर हैं जो अपने आसपास खत्म होते मानवीय संबंधों को देख रहे हैं. ‘जन्मदिन’, ‘ख्याली मूर्ति’, ‘लंहगा’, ‘मातारानी’ जैसी कहानियाँ तेजी से सिमटती जा रही दुनिया के भीतर भावनाओं के एक नए संसार की तलाश हैं. पीड़ा, दुःख, गरीबी और शोषण इस दुनिया में भी है लेकिन इससे जूझने और मानवीय संबंधों को हर-हाल में बचाने की जीवटता भी है.

‘घुसपैठिये’ स्तंभ की कहानियाँ न तो भाव-शिल्प की जटिलता में फंसती हैं और न ही इनके सरलीकरण में. उनके समाज में जितने तरह के अन्तर्विरोध हैं, उन्हें ये रचनाएँ सहजता से उनके स्वाभाविक रूप में पूरी डिटेलिंग के साथ रखती हैं. यही कारण है कि भाव और भाषा का दुहराव इनके यहाँ नहीं है. यहाँ भले ही इन कहानियों के कुछ उद्धरणों को उदाहरण के रूप में दिया गया है, लेकिन इन कहानियों की एक विशेषता यह भी है कि इनको पूरा पढ़कर ही इसके समग्र प्रभाव को समझा जा सकता है. इस प्रभाव की थोड़ी-बहुत तुलना ‘औदात्य’ की परिभाषा से भी की जा सकती है. यानी कब रचना आपको अपने प्रभाव में ले लेती है आपको इसका भान नहीं होता. इस स्तंभ के सभी रचनाकारों का अपना कलेवर है. यह भिन्नता कामगार बस्तियों के जीवन के विविध पहलुओं को ही हिन्दी समाज के सामने रखने का एक सफल माध्यम है. ये अपनी बात ऐसी भाषा में कह रहे हैं जो निःसंदेह इनके बारे में एक बार सोचने को मजबूर करता है.

पीयूष राज. भारतीय भाषा केंद्र, जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय से पीएचडी. फिलहाल फर्स्टपोस्ट हिंदी में पोस्टेड हैं. उनसे , मोबाइल नंबर -09868030533 , ईमेल आईडी – piyushraj2007@gmail.com पर संपर्क सम्भव है.

साभार: हंस, अप्रैल, 2017

 

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नींबू पानी पैसा : शंकर हल्दर

यह स्तम्भ  (घुसपैठिये)दिल्ली और आसपास की कामगार बस्तियों के तरुण-युवा लेखकों की प्रतिनिधि रचनाएं आप तक पहुंचाएगा. ये लेखक और इनका लेखन बने-बनाए खांचों में नहीं समाते. ‘घुसपैठिये’ स्तम्भ के लेखक अभी-अभी जवान हुए हैं या हो रहे हैं. एकाध को छोड़कर इसके सभी संभावित लेखकों की उम्र २0 वर्ष के अंदर ही है। लेकिन इन सब में कुछ सामान्य विशेषताएँ भी हैं. सभी की आर्थिक-सामाजिक पृष्ठभूमि लगभग समान हैं। इससे भी बड़ी विशेषता यह है कि इनके लिए बचपन की किताबें कागजों से उतनी नहीं बनती हैं जितनी उनके संघर्ष, मोहल्लों, माहौल और जगह से बनती हैं. उनकी लिखाई में वे जगहें आपको सुरक्षित मिलेंगी। आप शायद महसूस करें कि साहित्य के उत्पादक और उपभोक्ता, अभिलेखन/रिकाॅर्डिंग और सृजन, कि़स्सा और तथ्य के बीच के अंतर यहाँ धुंधले पड़ जाते हैं साहित्य के सुरक्षित-आरक्षित डिब्बे में घुस आये इन घुसपैठियों को आप कैसे बरतेंगे, यह आप ही को तय करना है.

बाल दिवस के अवसर पर प्रस्तुत  हैं, शंकर हल्दर की कहानी ‘नींबू पानी पैसा’.

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नींबू पानी पैसा

 BY शंकर हल्दर  

पाँच साल हो गए पर कर्ज अभी तक दूर नहीं हुआ, राम चाचा की यह चिंता हर रोज़ उनकी लुंगी उतार देती है। इसी चिंता के साथ एक दिन वे मंदिर जाते हैं और भगवान से बोलते हैं, ‘हे भगवान तू मेरा कर्जा दूर कर दे मैं तेरे को एक नहीं एक हजार नारियल चढ़ाऊँगा; पर तेरे मंदिर में तो इतनी जगह ही नहीं! इसलिए मैं आपको नींबू-पानी चढ़ाऊंगा। गंगाजल या नारियल तो सभी चढ़ाते ही हैं।’

भगवान चिल्ला कर बोले, ‘चुप हो जा मानव! सब हमारी पूजा करते हैं, हमे प्यार करते हैं, गंगाजल चढ़ाते हैं और तू नींबू-पानी चढ़ाएगा? हम तुझे श्राप दे देंगे!’ ‘अरे नहीं भगवान नहीं, मेरे पास पहले से ही बहुत साँप है कल ही मुझे एक अनाकोंडा ने काट लिया था।’ ‘अरे बुद्धू, मैं श्राप बोल रहा हूँ श्राप, कभी लंबा न हो पाओ वैसा वाला श्राप दे देंगे।’ भगवान फिर से चिल्लाये।

राम चाचा बोले, ‘भगवान ये कौन-सा साँप हैं? कोई नयी कंपनी का साँप है क्या?’ ‘अरे मूर्ख, श्राप, श्राप.. जो एक ऋषि ने हनुमान को दिया था।’ ‘अरे नहीं, भगवान मुझे वह वाला श्राप नहीं देना, आप जो कहोगे मैं वही करूंगा।’ ‘पहले वादा कर! तू कभी भी हम पर नींबू-पानी नहीं चढ़ाएगा।’ भगवान बोले।

राम चाचा भगवान को टोक कर फिर से बोले, ‘नींबू-पानी की जगह क्या चढाऊं?’ ‘अब तू हमें गंगाजल चढ़ाएगा और नारियल की जगह कहीं नारियल का छिलका मत चढ़ा दियो, वरना हम तुझे श्राप दे देंगे। अब बोल, तेरी इच्छा क्या है?’ ‘भगवान मुझ पर बहुत कर्ज़ है।’ भगवान बीच में ही टोक कर बोले, ‘अरे तू खुद ही दुनिया पर कर्ज़ है, तेरे पे क्या कर्ज़ होगा? चल बोल।’ राम चाचा ने वही बात फिर से दोहरायी, ‘भगवान मुझ पर बहुत कर्ज़ है, इसलिए मुझे पैसे चाहिए। आप हमारी कॉलोनी में एक दिन के लिए पैसों की बारिश करवा दो।’

भगवान ने राम चाचा की यह इच्छा पूरी कर दी। घर के बाहर से अचानक आवाज़ आई, ‘राम चाचा बाहर आ कर देखो, पैसो की बारिश हो रही है।’  बाहर सच में पैसो की बारिश हो रही है। उनकी खुशी का ठिकाना नहीं रहा। वे सबके साथ गरबा डांस करने लगते हैं पर डांस करते-करते उनकी लुंगी फट जाती है। छत पर एक झण्डा लगा था। वे उसी झंडे को लुंगी बना लेते हैं।

राम चाचा नीचे आकर पैसे लपेटने लगे तभी एक अम्मा बोली, ‘अरे राम, लुंगी की जगह यह झण्डा क्यों पहन लिया? देश भक्त बन रहे हो क्या?’ तभी एक बुढ़िया बोली, ‘अरे छोड़, जो कभी राम भक्त नहीं बना वह देश भक्त कैसे बनेगा? बॉर्डर पर जाते ही इसके पैर कांपने लगेंगे। आज से इसे हम राम की जगह इंडियन लुंगी मैन बुलाएँगे।’ ‘अरे बुढ़िया चुप, ज्यादा बचर-बचर नहीं करो, वर्ना हम सब कुछ भुला कर कोई क्राइम कर देंगे। और अम्मा, तुम एक दिन की मेहमान हो इसीलिए अपना एक दिन तो सही से गुजारो; वरना हम अभी ही तेरा स्वर्गवास करा देते हैं। पैसों की इतनी अच्छी बारिश करवायी है, लूटना है तो पैसा लूटो ना, हमारी इज्जत काहे लूटती हो? अगर फिर से बचर-बचर की तो सड़े हुए टमाटर की चटनी में तुम दोनों को फ़ेक देंगे।’

कॉलोनी के सभी लोग पैसे लूट रहे थे। बाल्टी में, बर्तन में, चादर में। अपनी कागज की बोरी लिए राम चाचा भी आ गए और उसमें पैसे इकट्ठे करने लगे। वे पैसे इकट्ठे करते-करते थक गए। उन्होंने देखा कि हरीलाल की पोटली पैसों से भर गयी है। राम चाचा हरीलाल से बोले कि ‘अरे हरीलाल, जल्दी जा कर देख! तेरी बीबी चने का आटा खा कर मर गयी है।’  ‘मेरी बीबी चने का आटा खाकर कैसे मर सकती है?’ हरी लाल ने पूछा। ‘अरे धरती पर बोझ बनी तेरी बीवी ने उस चने का आटा खा लिया था जिसमें चूहे ने मूत रखा था और उस चूहे को डायबिटिज थी।’ हरीलाल पैसों की अपनी पोटली छोड़ सांढ़ की तरह घर की ओर भागा। घर जाकर देखता है तो उसकी बीवी छुपम-छुपाई की खेल रही है। हरीलाल को राम चाचा पर बहुत गुस्सा आया।

हरीलाल राम चाचा के पास भागता है पर हरी लाल का रास्ता काटने के बजाय एक काली बिल्ली हरीलाल को ही काट लेती है। तब तक राम चाचा पैसों की पोटली ले कर नौ-दो-ग्यारह हो चुके होते हैं।

राम चाचा चौक पर जाते हैं। वहां उन्हे गज़ब का नज़ारा दिखता है। चौक पर बस भीड़ ही भीड़ है। लोग पैसों के लिए लोग लड़-झगड़ रहे हैं। लोग जानवरों की तरह पैसे लूट रहे थे, सारी गाड़ियां जाम हो गयी थीं। बस वाला ड्राईवर तो पागल ही हो गया था, उसने अपनी कमीज खोल कर उसमें पैसे इकट्ठे करने लगा।

एक पेड़ पर हजार-हजार के दो नोट लटके हुए हैं और रुपयो को लेने के लिए एक आदमी पेड़ चढ़ता है लेकिन दूसरा आदमी उसकी पैंट खींच कर नीचे गिरा देता है। एक टीन वाले घर के ऊपर हजार का एक नोट है। एक हाथी जैसा आदमी उस छत चढ़ता है। उसका पैर फिसल जाता है और उसके गले की हड्डी टूट जाती है।

मीडिया भी आ जाती है। मीडिया की लड़की कैमरे में बोलने लगी, ‘आप देख सकते हैं इधर का नज़ारा, बस इसी कॉलोनी में पैसों की बारिश हो रही है और इन पैसों को लूटने के लिए लोग पागल हुए जा रहे हैं। क्या यह सच  है या एक चमत्कार? वह लड़की एक आदमी से पूछती है, ‘ये पैसे लुटते हुए आपको कैसा महसूस हो रहा है? पैसों की यह बारिश कैसे हो रही है?’

राम चाचा अपने दोस्त तिहाई लाल के साथ खड़े यह सब देख रहे थे, ‘टीवी पर मुझे जाना चाहिए था लेकिन यह मुच्छड़ बोल रहा है। मेहनत करें हम और अंडा खाए फकीर।… अरे तिहाई लाल, तू पैसे नहीं लूट रहा है।’ तिहाई लाल बोला, ‘ओये तू पैसे लूटने की बात कर रहा है? वहाँ मेरे बीबी बिजली के खंबे की तार से फेवीकोल की तरह चिपकी पड़ी है और स्पाइडर मैन की तरह जाल बुन कर पैसे लूट रही है और किसी को भी खंभे पर चढ़ने नहीं दे रही है।’

‘कैसे? बिजली के खंभे पर कैसे किसी को चढ़ने नहीं दे रही है? राम चाचा पूछे। ‘अरे जिस मोजे को मैंने चार साल से नहीं धोया, उसी मोजे को मेरी बीबी ने कमर में बाँध रखा है।’ ‘लगता है तेरी बीबी आज स्पाइडर मैन का रिकार्ड तोड़ देगी!’ ‘अरे, स्पाइडर मैन का रिकार्ड बना ही कब था? जो मेरी बीबी उसे तोड़ देगी? तिहाई लाल बोला। ‘अरे तूने ‘स्पायडर मैन टू’ नहीं देखी क्या? आखिरी सीन में जब वह ट्रेन रोकता है तो उसकी चड्डी खुल जाती है।’ ‘तो इसमें रिकार्ड क्या है?’ तिहाई लाल ने आश्चर्य व्यक्त किया। ‘रिकार्ड है, स्पाइडर मैन ने चड्डी खोलने का रिकार्ड बनाया है।’ ‘चल ये सब छोड़, क्या तू जानता है कि मेरी छत इतनी बड़ी है कि उस पर पैसों का हिमालय पर्वत बन चुका है। मुझे तो नेशनल बैंक का एवार्ड मिलना चाहिए। लेकिन तुम तो लोगों के पैसों की पोटलियाँ चुरा रहा है? क्या मैंने तुझे इसी दिन के लिए पाला था? तिहाई लाल बोला ने ताना मारा।

‘अरे तूने मुझे कहाँ पाला है? मुझे तो अमेरिकन कुत्ते ने पाला था और उस एहसान का कर्ज मैं अभी तलक चुका रहा हूँ।’ तिहाई लाल ने पूछा, ‘कैसे?’ ‘अरे क्या तुझे याद नहीं जब तेरे अमेरिकन कुत्ते की नई-नई शादी हुई थी तो वह मेरी लूँगी चुरा कर भाग गया था। बदले में मैंने उसकी बीबी की पाँच रूपये वाली साड़ी फाड़ दी थी, बाद मे पता चला कि वह पाँच रुपये की नहीं पाँच हजार की थी। उस साड़ी का कर्ज मैं अभी तक चुका रहा हूँ।’

तिहाई लाल बोला, ‘माफ करना मैंने तेरे लाल जख्म को फिर से हरा कर दिया। चल यह सब छोड़, पैसे की बारिश की खुशी में आज मैंने एक शानदार पार्टी रखी है। तू जरूर अईयो। डिनर में बम के पकौड़े, सीमेंट की दाल और मिर्च के रसगुल्ले हैं।’ राम चाचा बोले, ‘ठीक है। मैं जरूर आऊँगा।

राम चाचा के पास पैसों की तीन पोटलियाँ जमा हो गई थी। जमीन पर सिर्फ सिक्के पड़े थे। नोट का नामोनिशान नहीं था। मंदिर के छत के ऊपर हजार-हजार के बहुत सारे नोट गिरे थे। राम चाचा मंदिर की छत पर चढ़ गए और जैसे ही नोट उठाया, भगवान की आवाज आई, ‘अबे मानव रुक जा, भगवान का पैसा चुराता है? तूझे श्राप दे दूँगा!’ राम चाचा बोले, ‘आप भी न भगवान… कितनी बार बोलूं कि मेरे पास पहले से ही बहुत साँप हैं, कल ही मुझे एक अजगर ने काट लिया था।’ भगवान बोले, ‘पर मानव, तूने तो मुझे बोला था कि एनाकोंडा ने काटा है।’ ‘हाँ एनाकोंडा ही था, बस उसका सर नेम अजगर था। मेरी चेककप रिपोर्ट में लिखा था।’ ‘ठीक है ठीक है। पर मंदिर से पैसा मत चुरा वरना तूझे श्राप दे देंगे।’ राम चाचा अब चिल्ला कर बोले, ‘भगवान, समझते नहीं हो और जज्बाती हो जाते हो। सुबह-शाम उतारता हूँ आरती, फिर बोलते हो, अच्छी नहीं है अगरबत्ती।’

भगवान बोले, ‘अरे दुनिया के आठवें अजूबे, तूझसे तो बोलना ही बेकार है। पर अगर तूने मंदिर से पैसा उठाया तो हम तुझे दण्ड देंगे।’ ‘तो फिर मैं पैसे कहाँ से लूँ? जमीन पर सिर्फ सिक्के पड़े हैं। अपनी शादी में क्या मैं सिक्के इस्तेमाल करूंगा? पंडित दक्षिणा माँगेगा तो क्या मै पंडित को दक्षिण अमेरिका भेज दूँगा?’ राम चाचा एक सांस में भी बोल गए। भगवान बोले, ‘पर तेरी तो शादी हो चुकी थी न? और तेरी बीबी मर भी गई है!’ ‘वह मेरे बीबी ही थी, एक दिन ढोकला खा ली और मर गई।’ ‘कैसे?’ ‘अरे उस ढोकले को बिल्ली ने आँख मारी थी।’ ‘और वह दूसरी कौन है? जो नर्क में सजा काट रही है।’

राम चाचा बोले, ‘वह मेरी दूसरी बीबी है, उसे मच्छरों से नफरत होने लगी थी। एक दिन एक मच्छर उसके मुंह में सुसु करके भाग गया, उसे मलेरिया हो गया और वह भी गुजर गई।’ भगवान बोले, ‘पापी, तू उसका श्राद्ध करने के बजाय यहाँ पैसों की बारिश में नाच रहा है। मैं अभी बारिश बंद कर देता हूँ।’

 ‘भगवान, नहीं-नहीं, पैसो की बारिश बंद मत करो। मैं उन दोनों का श्राद्ध कर दूँगा।’ यह कह वे घर की ओर चल पड़े, रास्ते में जहाँ पर भी पैसे दिखते जेबों में भर लेते। तभी उन्हें बहुत ज़ोर की बाथरूम लग जाती है। भागते हुए घर जाते हैं। पर घर के सामने हरीलाल खड़ा रहता है। ‘तुम्हारी इतनी हिम्मत कि मुझसे झूठ बोलो? अब तो मैं तुम्हें छोडूंगा नहीं।’ राम चाचा बोले, ‘पहले पकड़ तो सही!’ ‘क्या कहा?’ ‘अरे हरी लाल, भड़क मत, अपनी पोटली ले और मुझे जाने दे!’ लेकिन हरीलाल ने राम चाचा की हड्डी-पसली तोड़ डाली और राम चाचा की पोटली भी छीन लिया।

राम चाचा को काफी चोट आई। इंडियन लूँगी फट कर सिर्फ लंगोटी रह गई। बिना कपड़ों के उन्हें कुछ भी अच्छा नही लग रहा था। इसलिए अपनी दादी का घाघरा-चोली पहन लिए। बाथरूम गए तो देखा कि वहाँ पर 500 का नोट पड़ा है। लैट्रिन में हाथ डालकर कर पैसा उठा लिया। जैसे ही घर से बाहर निकले तो सभी लोग हंसने लगे। ‘यह क्या? घाघरा-चोली क्यों पहन रखा है? चाची की याद आ गई क्या?’ लोगों की बातें राम चाचा को मिर्ची की तरह लगी। बीबी के बक्से में रखी साड़ी पहन कर फिर से बाहर आ गए। अब वे साड़ी के आँचल में पैसे बटोरने लगे।

राम चाचा की गली मे ही चिंटूलाल, पिंटूलाल मिले। चिंटूलाल बोला, ‘अरे राम चाची झाड़ू लगा रही हो क्या?’ ‘मैं चाची नहीं, चाचा हूँ।’ ‘तो चाची की साड़ी क्यों पहन रखी है?’ ‘यह तो 3015 का फैशन है, तुम क्या जानो इस फैशन को।’

तभी गली के सारे लोग भागते हुए दिखे तो राम चाचा ने पूछा, ‘चिंटूलाल, ये सब भाग क्यों रहे हैं?’ ‘उधर रंगीला पागल होकर टीवी टावर पर चढ़ गया है।’ सभी लोग रंगीला को देखने चले गए। इतने में रानी मौसी गली से आती हुई दिखाई दी, जिसके कंधे में पैसे से भरी थैली लटक रही थी। यह देख राम चाचा का मन ललच गया। वे उसकी थैली छीनने लगे। रानी मौसी चिलल्लाने लगी, ‘बचाओ-बचाओ….।’ पर लोग तो रंगीला को देखने गए थे। रानी मौसी कहने लगी, ‘अरे राम हमें मत छेड़ो वरना हम अपनी बड़ी बहन से शिकायत कर देंगे। वह पीट-पीट कर करेली की चटनी बना देगी।’ ‘हाँ हाँ, वह तो जापान से जूडो कराटे सीख कर आई है ना, मैं तो सिर्फ आपका हालचाल पूछ रहा हूँ। आपके बच्चे ठीक ठाक हैं न? आप तो यूंही भड़क गयी। अरे, आप तो बहुत अच्छा गाना गाती हैं।’ ‘तुम्हें गाने की पड़ी है, वहाँ रंगीला टावर पर चढ़ कर मरने वाला है।’ ‘अरे वह तो हर दूसरे दिन मरने का बहाना करता रहता है। आज ज्यादा पी लिया होगा।’ अपनी थैली से पैसे निकालते हुए रानी मौसी बोली, ‘पैसा लोगे क्या?’ राम चाचा अपनी साड़ी के पल्लू को फैलाते हुए बोले, ‘देख, मैंने भी पैसे लूटे हैं।’

रानी मौसी चली जाती है, राम चाचा सोचते हैं कि चलो, बहुत पैसे जमा हो गए, अब घर चलते हैं। राम चाचा रात भर खूब सोचते हैं। अब तो मेरे पास पैसों की बहुत सारे पोटलियाँ हो गई हैं, आधे पैसों से अपनी पत्नियों का श्राद्ध करूंगा और आधे से अपना कर्जा दूँगा। बाकी पैसे से मैं एक अच्छी लूँगी सिलवाऊंगा। यही सब सोचते हुए राम चाचा सो गए।

अगली सुबह राम चाचा उठते ही पहले मंदिर जाते हैं। राम चाचा मंदिर पहुँचते ही भगवान प्रकट होकर बोले, ‘अरे मूर्ख मानव, पुरुष होकर नारियों का वस्त्र पहनता है। घर जा, पहले ढंग के वस्त्र पहन कर आ।’ राम चाचा भागते हुए घर आए और इंडियन लूँगी खोजने लगे। राम चाचा ने अपनी फटी हुई इंडियन लूँगी को ही पहन लिया और सोचने लगे कि भगवान पर कुछ चढ़ाना भी तो होगा। चलो नींबू-पानी ले लेता हूँ। अपनी फटी हुई इंडियन लूँगी पहन और हाथ में नींबू-पानी का ग्लास ले मंदिर की ओर चल पड़े। राम चाचा ने जैसे ही शिवलिंग पर नींबू-पानी चढ़ाया तभी भगवान प्रकट होकर बोले, ‘मानव तेरा यह दु:साहस? कल ही तुझे चेतावनी दी थी कि मुझे नींबू-पानी पसंद नहीं है, उसके बावजूद तू नींबू-पानी लाया है।’

राम चाचा बोले, ‘अरे भगवान, मेरी पड़ोसन गंगा का मोटर खराब हो गया है इसलिए उसने जल नहीं दिया और इस नींबू-पानी मे मैंने घी और शक्कर डाला है, बहुत अच्छा है, पीकर तो देखो।’ भगवान बोले, ‘अरे मानव हम नदी वाले गंगाजल की बात कर रहे हैं। तेरी गंगा की नहीं, अपनी गंगा की। जा मानव, हम तूझे श्राप देते हैं कि कल पैसों की जो बारिश हुयी है, वे सारे पैसे गायब हो जाएंगे।’

सुनते ही राम चाचा की लूँगी ऊतर गई और हाथ से नींबू-पानी का ग्लास छूट गया। वे घर की तरफ भागे। घर जाकर देखे तो पोटलियाँ पड़ी थीं लेकिन पैसे गायब थे। फिर अपनी पड़ोस वाली गंगा से पूछा, ‘अरे गंगा, कल तूने जो पैसे लूटे थे वे पैसे कहा हैं? गंगा ने कहा, ‘अंदर पोटली में। ‘तो जाओ अंदर, देखो पैसे हैं या मेरी तरह ही गायब तो नहीं हो गये हैं?’ गंगा ने अंदर जाकर देखा कि पोटली खुली पड़ी थी और सारे पैसे गायब थे। गंगा शोर मचाते हुए बाहर आकर बोली, ‘मेरे भी सारे पैसे गायब हैं।’

राम चाचा ने देखा कि तिहाई लाल भागते हुए आ रहा है, पास आकर हाँफते हुए बोला, ‘पता है, मेरे पैसों का हिमालय पर्वत गायब हो गया है। अब मुझे नेशनल बैंक का एवार्ड नहीं मिलेगा।’ इतने में अम्मा फूट-फूट कर रोते हुए आई। राम चाचा ने पूछा, ‘अब क्यों रो रही हो?’ अम्मा बोली, ‘कल हमरा बेटवा नाले मे छलांग मार-मार कर जो पैसे लूटे थे वे सब गायब हो गये हैं।

सभी के पैसे गायब हो गए थे। राम चाचा यही सोच रहे थे कि अब तो मेरा कर्ज भी दूर नही हो पाएगा। मेरी बीबी उधर श्राद्ध के लिए तड़पती रहेगी और इधर मै तड़पता रहूँगा।

शंकर हल्दर

शंकर हल्दर

जन्म- 09/03/2003. पिछले तीन सालों से अंकुर किताबघर के नियमित रियाजकर्ता. किसी भी पत्र-पत्रिका में प्रकाशित होने वाली पहली रचना. पता: बी-458, सावदा-घेवरा जे.जे. कॉलोनी, दिल्ली- 110081. मोबाइल न. 9654653124.

साभार: हंस, जनवरी, 2016

 

पंचांग और समोसा: आरती अग्रवाल

यह स्तम्भ  (घुसपैठिये)दिल्ली और आसपास की कामगार बस्तियों के तरुण-युवा लेखकों की प्रतिनिधि रचनाएं आप तक पहुंचाएगा. ये लेखक और इनका लेखन बने-बनाए खांचों में नहीं समाते. ‘घुसपैठिये’ स्तम्भ के लेखक अभी-अभी जवान हुए हैं या हो रहे हैं. एकाध को छोड़कर इसके सभी संभावित लेखकों की उम्र २0 वर्ष के अंदर ही है। लेकिन इन सब में कुछ सामान्य विशेषताएँ भी हैं. सभी की आर्थिक-सामाजिक पृष्ठभूमि लगभग समान हैं। इससे भी बड़ी विशेषता यह है कि इनके लिए बचपन की किताबें कागजों से उतनी नहीं बनती हैं जितनी उनके संघर्ष, मोहल्लों, माहौल और जगह से बनती हैं. उनकी लिखाई में वे जगहें आपको सुरक्षित मिलेंगी। आप शायद महसूस करें कि साहित्य के उत्पादक और उपभोक्ता, अभिलेखन/रिकाॅर्डिंग और सृजन, कि़स्सा और तथ्य के बीच के अंतर यहाँ धुंधले पड़ जाते हैं साहित्य के सुरक्षित-आरक्षित डिब्बे में घुस आये इन घुसपैठियों को आप कैसे बरतेंगे, यह आप ही को तय करना है.

इस बार की घुसपैठिया हैं आरती अग्रवाल.

फोटो - शिवा नगरी

फोटो – शिवा नगरी

पंचांग और समोसा

By आरती अग्रवाल

 पंचांग

मोटी-मोटी चमकती आंखें स्थिर-सी हो पंचांग पर थम सी गई थीं। एक-एक पेज पलटते हुए वे गौर से काफी देर तक बारिकी से देखते जा रहे थे। पंचांग का हर पन्ना दूर से ही अपनी चिकनाहट का अहसास करवा रहा था। आलथी-पालथी मार  बारीक अक्षरो में लिखे उस पंचाग को अपनी गोद में करीने से रखकर वे बड़ी बेचैनी से पन्नों को पलटते हुए कुछ खोज रहे थे। बल्ब की झिलमिलाती-सी रौशनी में उनकी आंखे और छोटी हो गई थीं बल्कि बंद होने का अहसास करा रही थीं। तभी, पेजों को पलटती उनकी उंगली एक पेज पर थम सी गई। नज़रें उठाकर सामने सोफे पर बैठे शक्स की ओर देखते हुए बोले- “हाँ तो अनिल बाबू, पांच  जनवरी सोमवार का दिन आपके लिए बेहद शुभ रहेगा।”

“क्या?”

“पांच जनवरी, सोमवार आपके लिए शुभकारी रहेगा क्योंकि उस दिन पूर्णमासी भी है।” कहते हुए उनकी आंखें और बड़ी हो गईं। “जी-जी, तो पांच जनवरी को गेट लगवा दूं न!” काले जैकेट में लिपटे अनिल बाबू गर्दन को उठा,  हां में सिर हिलाते हुए बोले। पंडित जी ने सर हिलाया ही था कि उनकी नज़रें फिर से उसी पीले पन्ने पर अटक गईं, काफी गौर से देखते हुए बोले- “रुकिए, पांच जनवरी तो फस्कलास है अनिल बाबू, पर एक बात का ध्यान रखना होगा, काम थोड़ा संभल कर करना होगा।” अनिल बाबू कुछ खामोश हो गए। वे हैरत के साथ पंडित जी के चेहरे को ताकने लगे जिसमें असंतोष की छाया जरा भी न थी। “देखिए, बात बड़ी नहीं है बस काम बारह बजे से चार बजे के बीच करवाना होगा वरना उसके बाद संकट भारी है।” सुनते ही अनिल बाबू के कान चैकन्ने हो गए। वह अपने हाथ को हाथ में बांधते हुए बगल में बैठी पत्नी को हिलाते हुए बोले, “यार ठीक तो है, चार घण्टे में तो हो जाएगा।” “हां-हां क्यों नहीं।” दोनों ने पंडित जी की ओर देखते हुए कहा। पर पंडित जी खामोश हो मन ही मन कुछ बुदबुदाते हुए फिर उस पौथी में झांकने लगे। पेज़ पर ऊँगली लहराते हुए फिर बोले- “देखिए अपन के लिए दिन बढि़या निकला है, टेंशन की कोई बात नहीं है, बाकी सब कुछ भगवान के भरोसे छोड़ दीजिए, सब कुछ शुभ है।” “जी बिल्कुल, आपके रहते हमें किस बात की चिंता है मालिक, बस आपका सहारा बना रहे।” हां में हां मिलाते हुए अनिल बाबू बोले। “अरे अनिल बाबू, हमारा कहां?” उन्होंने हंसते हुए कहा और फिर अपने आसन के बगल में बने छोटे कमरे की ओर झांकने लगे, जो घण्टों से खामोश था लेकिन कानों में पड़ती चूडि़यों की खनखनाहट किसी महिला के अंदर होने का पैगाम दे रही थी, पंडित जी अपनी बढ़ी काली दाढ़ी पर हाथ फेरते हुए बोले- “हां सुनिए, जरा तीन कप चाय बना दीजिए, अनिल बाबू भी थक गए होंगे, क्यों अनिल बाबू?”

सुशील बाबू की मोटी आंखें पूरे मैदान में गश्त लगाती हुई फिर से पंडित जी के उस चेहरे पर आ टिकी जिन्होंने अपनी पोथी को साईड में रख आंखों को मसला ही था। शॉल में लिपटी धीमे-धीमे कदमों से आगे बढ़ती एक अधेड़ उम्र की महिला की आवाज़ ने उन्हें अपनी ओर खींच लिया- “राम राम महाराज जी, सुबह से कहां गए थे, अब तक चार चक्कर लगा चूकी हूँ,  सोचा आखिरी बार देख ही आती हूँ, बड़े दिनों से आपके दर्शन नहीं हुए था न!” एक ही सांस में कंपकपी-सी आवाज़ में कहते हुए वह आगे बढ़ी ही थी कि पंडित जी ने सोफे की ओर उन्हें बैठने का इशारा करते हुए कहा- “राम राम जी, आईए, अच्छा हुआ आप आ गईं, हम सुबह से पूजा में गए हुए थे, तो वहां देर हो गई।”

सिकुड़कर बैठ चूकी वह अधेड़ महिला तपाक से बोल पड़ी- “महाराज एक  मुश्किल है, मैं समझ नहीं पा रही हूँ कि समाधान कैसे निकालूं, तो सोचा आपसे राय ले लूँ।” “जी-जी, बिल्कुल कहिए क्या बात है? अगर हल निकला तो जरुर निकालेंगे।” कहते हुए पंडित जी अपने उस आसन पर जंच कर बैठ गए जिस पर करीने से बिछी पीली चादर पंडित जी के दुपट्टे से मैच खा रही थी जो गर्दन में झुलता हुआ कुर्ते पर लहरा रहा था। उन्होंने आंखें मिंची मानो किसी का स्मरण कर रहे हों। आंख मींचने के बाद उन पर अपनी बड़ी-बड़ी हथेलियों को फेरते हुए एक लंबा-सा सांस खींचकर बोले- “हाँ जी, बोलिए क्या बात है? “महाराज मैं देख रही हूँ कि घर में बहुत सारे भगवान् क्या बिठाएं हैं कि मेरे घर का सर्वनाश होने लगा है, मैं तो कुछ समझ नहीं पा रही हूँ।”

वह इतना ही कह पायी थी कि अंदर से निकलती एक पतली-लम्बी महिला पर सभी की नज़रें जम गईं। गोरा रंग, लंबा-चौड़ा शरीर जिस पर जंचती हरी साड़ी लाईट में चमक रही थी, बड़ी-बड़ी आंखें, लंबा-सा चेहरा और मुस्कुराहट के साथ दो हिस्सों में बटते गाल, जिन पर सभी को देख एक मुस्कुराहट खिल आई थी। पंडिताइन सभी को चाय पकड़ाती हुई धीरे से बोली- “अभी आती हूँ, अंदर सब्जी बन रही है।” कहकर वह अंदर कमरे में चली गई और सभी गरमा-गरम चाय की चुस्की लेते हुए पंडित जी के चेहरे को ताकने लगे जो पल-पल न जाने किस दुनिया में डूब जाता था और फिर वापस अपनी अवस्था में आने के बाद माहौल में एक गर्माहट पैदा कर देता था।

“हां, तो रही बात भगवान जी की! देखिए, जो भगवान् होते हैं वे सब एक हैं कोई अच्छा या बुरा नहीं है, वो तो हम मनुष्य की सोच ऐसी बन गई है कि हमने भगवानों को भी बांट दिया है। आप मानती हो सांई बाबा को, अनिल बाबू मानते हैं लक्ष्मी माता को और बच्चे मानें शिवजी को। सबकी अपनी-अपनी मंशा है। लेकिन हम किसी को गलत नही कह सकते क्यों अनिल बाबू!” इन्हीं शब्दों को वे अब तक दस बार कह चुके थे और यह उनकी एक खास आदत बन चुकी थी कि सामने बैठे किसी भी इंसान को अपनी बातों में शामिल कर लेते। कभी लफ्जों से जी-जी कहकर तो कभी गर्दन को हिला बात को आगे बढ़ाने का इशारा देना अनिल बाबू की आदत का हिस्सा बन गया था। गर्दन झुकी पर नजरें उठीं और पंडित जी बोले- “देखिए होता क्या है कि घर में कम ही भगवान् रखें तो ज्यादा अच्छा है, भगवान् भी शैतान का रुप ले लेते हैं। अगर हमारी मानें तो यही सलाह है कि आप सारे भगवान् को हटा दीजिए बस एक-दो रखिये, जो आपकी मंशा के अनुसार हों।” “मतलब कैसे हटाउं महाराज?” बात पूरी होने से पहले ही वह झट से बोल पड़ी। “कैसे क्या, आप उन्हें आराम से उठाइए, नहलाइए और किसी पीपल के पेड़ के नीचे ठण्डा कर दीजिए।”

बात से बात का सिरा निकालते जाना पंडित जी की कला है। चाय की चुस्की भरते हुए पंडित जी बोले- “एक बात सोचिए, इंसान कहता है कि भगवान् कहां है? मैं एक छोटी-सी बात पूछता हूँ आप बताइए, अगर कोई मुझसे पूछता है कि मनोज कौन है? तो मैं अपने सीने पर हाथ धर कर कहता हूँ कि मैं मनोज हूँ। पर सोचिए, अगर वह कहे यह मनोज तो नहीं है बल्कि मनोज का सीना है; फिर मैं सिर पर हाथ धर कर कहता हूँ कि ये रहा मनोज़! पर वह भी मनोज कहाँ से हुआ वह तो मनोज़ का सिर है। अब मैं अपने जितने भी अंगों से मनोज़ को बता रहा हूँ वह मनोज़ नहीं बल्कि मनोज के अंग हैं, तो फिर पूरा इंसान कहां हैं? बस उसके अंग ही तो हैं लेकिन वह खुद कहां हैं?”

खामोशी छा गई, सभी आश्चर्य भरी नज़रों से पंडित जी के चेहरे को देखने लगे। वे वास्तव में इंसान की खोज करते मालूम पड़ रहे थे। एक अजीब-सा जुनून उनके भीतर उतर आया था। अनिल बाबू, उनकी पत्नी और वह महिला भौचक-से इस सवाल का जवाब जानने को बेचैन हो उठे थे। बदन को सहलाती सर्द हवा का भी किसी पर कोई असर नहीं था। ठण्डी होती अपनी चाय का भी ख्याल नहीं रहा किसी को और वह महिला अपने सिर उतरते शॉल से भी वेपरवाह चूकी हो थी। आज अभी इसी वक्त सब अपने-अपने रुप को खोज़ लेंगे, ऐसा लग रहा था।

“देखिए, मनुष्य कहता है भगवान् कहां हैं? भूमि, जल, पवन, अग्नि, मिट्टी इनमें से किस में? ये चीजें तो भगवान के शरीर के अंग हैं, भगवान् नहीं। अब आप देखिए, वो देख रहे हैं न!” उबड़-खाबड़ बने फर्श की ओर इशारा करते हुए पंडित जी ने कहा और सभी की नज़रे फर्श पर झूलती उस छवि पर जा टिकी जो दरअसल पंडित जी के हाथ में लहराती मखमली शॉल की परछाई थी, जिसे दिखाते हुए बोले- “ये हैं भगवान जो हर पल, हर घड़ी सिर्फ अपन मनुष्य के ही साथ नहीं, दुनिया की हर छोटी-बड़ी चीज़ यानी एक सूई के साथ भी रहते हैं। बस फर्क इतना है कि अपन अपने भगवान् को नहीं समझ पाते जबकि वे पल-पल हमारे साथ रहते हैं। दरअसल बात यही थी कि मनुष्य को किसी भी वहम में पढ़ना ही नहीं चाहिए। भगवान् को बंधनों में भी मत बांधो। बहनजी, हुआ यह है कि आपको वहम लग गया है। क्यों बहन जी? मैं गलत कह रहा हूँ तो बोलिए कि हां, पंडित जी आप गलत कह रहें हैं!” “नहीं-नहीं महाराज, यह तो सच है।” महिला अब जाकर अपने जवाबों को खोज पाई थी। “समझ गई महाराज़, अब अगर सण्डे को सारे भगवान् हटा दूं तो ठीक रहेगा न?” फिर से अपनी उलझन को बयान करते हुए उसने पूछा। “जी बिल्कुल, जरा सण्डे को छोड़कर बुधवार को कीजिए तो बढ़िया है।” “ठीक है महाराज, ओम नमः शिवाय।” पंडित जी के पैर छूती हुई वह महिला आगे बढ़ गई। “अरे-अरे ये क्या कर रही हैं, ओम नमः शिवाय” कहते हुए पंडित जी ने पैर नीचे लटका लिए और फिर कुछ पल खामोश हो गए।

जेब से हाथों को निकालते हुए अनिल बाबू ने कहा- “चलते हैं महाराज, नौ बज गए; बच्चे घर पर भूखे होगें, हम तो सुबह से ही निकले हैं।” इतने में पंडिताइन नीली साड़ी को संभालती हुई बाहर निकली और अनिल बाबू की पत्नी की ओर देखते हुए बोली- “और जी बढ़िया, सब ठीक है न?” “हां बस दुआ है आपकी।” वह पंडतानी जी के बगल में खड़ी हो, धीमे से मुस्कुराते हुए बोली- “और खाना-पीना बन गया?” “हां….” लंबी-सी हां भरते हुए पंडिताइन ने कहा- “आइए आप भी खा लीजिए।” “अरे नहीं..” बात को टालते हुए अनिल बाबू बोले- “घर पर बच्चे भूखे हैं, उन्हें भी देखना है ,चलो चलतें हैं। पंडित जी, फिर परसो दोबारा आयेंगे।” पंडित जी भी उनके साथ-साथ गेट तक छोड़ने चल पड़े।

समोसा

पंडिताइन अपने काम में व्यस्त हो चुकी थी। सारे बर्तनों को समेटती हुई साइड में रख ही रही थी कि धीमी-धीमी चाल आते हुए पंडित जी ने कहा- “यार, खाना डाल दो भूख लग रही है।” फटाफट हाथ धोकर वे अंदर कमरे में बिछी चादर पर पालथी मार टिक गए। पंडिताइन भी किचन में दाखिल हो फ्रिज़ से आटा निकाल गरमा-गरम रोटियां पकाने लगी। हर एक पकती रोटी के साथ उसमें घी लगाती और मोड़कर पंडित जी की थाली में रख देती। पंडित जी भी गरमा-गरम रोटी का मजा लेते हुए साइड में रखे आलू की ओर देखते हुए बोले- “अरे आज अभी तक आलू नहीं रखे क्या?” “कहां यार तुम देख नहीं रहे, सुबह से तो काम में ही लगी हूं, खिसियानी-सी आवाज में पंडिताइन ने कहा। जिनकी आंखें पंडित जी को घूर-घूर कर देखने लगी थी पर इनका गुस्सा तो कुछ पल में ही ठण्डा पड़ जाया करता है इसलिए आज भी ठण्डा हो गया।

पंडित जी को फटाफट रोटी खिला पंडिताइन ने टोकरे से आलू को निकाल रगड़-रगड़ कर धो डाली। फिर उसे बड़े से पतीले में डालकर गैस पर चढ़ा दिए और हीटर के पास बैठ पालक, धनिया, हरी मिर्च तथा टमाटर ले काटने-चुनने बैठ गई। आलू के उबलते ही पंडित जी उसे छिलने बैठ गए। सारे सामान के कटते ही पंडिताइन ने चटनी भी तैयार कर डाली। पंडित जी मस्ती-मस्ती में आलू छिल चुके थे। उन्होंने सारे कटे सामान, मसाले और छिले आलू को एक बर्तन में मसल कर चोखा भी तैयार कर लिया। पंडिताइन द्वारा गुंथे हुए मैदे के साथ काम का सिलसिला शुरु हो गया। पंडिताइन जहां एक तरफ समोसे भरने में मस्त थी वहीं दूसरी ओर पंडित जी अपनी धून में खोए करारे समोसे तलते जा रहे थे। यूँही मस्ती ही मस्ती में समोसे बनकर तैयार हो गए कि अहसास भी नहीं हुआ।

बड़े से थैले में समोसे, चटनी और सब्जी अपनी स्कूटी पर टांग वे सुबह-सुबह सफदरजंग अस्पताल,  ट्रॉमा सेंटर व एम्स अस्पताल की ओर चल पड़े थे, जहां के लोगों को हमेशा ही उनके पांच रुपये के एक समोसे की तलब रहती है।

पंडित जी की रेहड़ी के लगने में आज भी देर हो गयी थी। पानी की रेहड़ी से भागे आ रहे गुप्ता जी समोसे की ओर इशारा करते हुए बोले- ‘‘आज तो लेट हो गए महाराज़!’’  “हां, रास्ते में जाम लगा था।” दोने में चार गरमा-गरम समोसे पर सब्जी, चटनी डाल गुप्ता जी की ओर बढ़ा दिए। दोने को हाथ में लेते हुए गुप्ता जी बोले- ‘‘मै तो बहुत परेशान हो गया हूँ, पता नहीं मेरे रोजगार को क्या हो गया है, बिल्कुल मंदा पड़ गया है।’’ अब तक आस-पास के और दुकानदार भी आ खड़े हुए थे। उन्हें दो-दो समोसे देते हुए गुप्ता जी की ओर देखकर पंडित जी बोले, ‘‘देखिए गुप्ता जी रोजगार नहीं चल रहा इसका मतलब यह कतई नहीं है कि किसी ने आपको बांध दिया है, ऐसा मत सोचिए, यह वहम है और कुछ नहीं, हमारी बात को समझ रहे हैं न! आप चिंता मत कीजिए बस अपने काम को मेहनत से कीजिए अवश्य चलेगा।’’ पंडित जी की निगाहें अब दूसरे ग्राहक की ओर चली गई।

पंडित जी को इस बात का पूरा एहसास था कि अपने भविष्य को जानने वालों की भीड़ उन्हें घर पर भी काफी घंटों तक घेरती है। रोजाना ही अपने संकटों से घिरे और उनका हल निकलवाने के लिए लोग दौड़े चले आते हैं। उनका आना तो जैसे हर दिन का रूटीन बन गया है। वे आराम से आते, बंद पंचांग को खुलवाकर कुछ नया ही पूछने के लिए बैठ जाते हैं और बिना कुछ दिये ही सलाम करके चले जाते हैं। पंडित जी पंचांग को अपने बगल में रख अपनी उसी दुनिया में उतर जाते जो उनका रोजगार बन गया है।

बदलते शहर ने उनका काम भी बदल दिया था। वे इस बात को अच्छी तरह समझ चुके थे कि शहर से अब पंडिताई गायब होती जा रही है। पूछने वालों की तादात तो अब भी है, लेकिन सिर्फ जान-पहचान वालों की, जिनके दुखों का हल निकालना उनका काम नहीं बल्कि फर्ज बनकर रह गया है। जिन लोगों को शुभ दिनों की फ़ेहरिस्त बांटते है वे तो  अपने दिनो को बदलते जा रहे हैं। लेकिन पंडित जी का दिन कब शुभ होगा, यह शायद उनको भी मालूम नहीं था।

पंडिताई उनके घर चलाने का जरिया नहीं बल्कि लोगों की कहानियाँ सुनने का जरिया बनकर रह गया था। वे अपने बदले हुये काम के दरमियान रह कर भी खुद को खोना नहीं चाहते थे तो कहानियाँ सुनने का दौर वहाँ भी चल पड़ा।

कुछ देर के लिए वे अपने में ही कहीं खो गए थे। इतने में एक पतली-सी आवाज ने उन्हें वापस समोसो के बीच ला पटक दिया। एक छोटी-सी, करीब सात-आठ साल की बच्ची को रेहड़ी के करीब देखते हुए वह उठ खड़े हुए और बोले, ‘‘हां मोड़ी क्या चाहिए?’’ इतना कहा ही था कि उस लड़की ने कुछ न बोलते हुए तीन रुपये बढ़ा दिए और  समोसे की ओर इशारा किया। यह लड़की यहीं रहती है। यहाँ अकेली कैसे आई इसका किसी को कुछ नहीं मालूम। कई लोग यहाँ इलाज कराने आए और कुछ न कुछ अपना छोड़ कर चले गए। पैसे देख पंडित जी कुछ नहीं बोल पाए, बस दो समोसे उसकी ओर बढ़ा दिए, ‘‘ले मोड़ी, साइड में बैठकर खा ले।’’

वे धम्म से स्टूल पर बैठ गए। नजरें अब भी उसी बच्ची पर थीं जो समोसे खाने में मस्त थी। गोल-मटोल सा चेहरा, कसकर बंधी दो चोटियाँ और छोटी-छोटी आंखें, जिनमें जरा भी डर नहीं था। काफी देर तक लड़की को देख लेने के बाद वह बोल ही पड़े, ‘‘गुप्ता जी, कुछ मां-बाप भी पता नहीं कैसे होते हैं जो बच्चों को अकेला छोड़ देते हैं। मालूम नहीं किसकी मोड़ी है?”  तभी पीछे से आती आवाज़ ने अचानक पंडित जी का ध्यान अपनी ओर खींच लिया। गुप्ता जी और साथ में खड़े लोगों की नज़रें भी उसी आदमी पर जा टिकी जो पंडित जी की ओर आता हुआ बोला- ‘‘सही कहता हूं इस दुनिया में भलाई का तो जमाना ही नहीं रहा। यहां तक कि लोग तो लोग साला भगवान् भी मतलबी हो गया है।’’  “क्या भाई साहब, होश में तो हैं, जानते हो क्या कह रहे हो।” वह आदमी आगे कुछ कहता कि गुप्ता जी तपाक से बोल पड़े। आदमी का गुस्सा रुका नहीं था, “हां भगवान के लिए।” उसकी आंखें अचानक लाल हो गई थीं, बाल छोटे होने के बावजूद भी माथे पर बिखरे हुए थे और अंधेरे के बावजूद भी पसीना बूंद-बूंद बनकर माथे से चमक रहा था। पंडित जी धैर्य से बोले, ‘‘अरे बैठिए तो भाई साहब, इतना गुस्सा किसलिए?’’ पंडित जी ने इतना ही कहा था कि वह फिर बोल पड़ा, ‘‘अरे क्या दिया है इस भगवान् ने मुझे? मैंने तो इसके लिए सब कुछ किया पर इसने मेरे लिए क्या किया?’’ कहकर ही कहीं वह शांत हुआ था पर अब पंडित जी चालू हो गए थे। ऐसा लगा जैसे किसी ने उनके अंतरंग का तार छेड़ दिया हो। वह बोले, ‘‘एक बात समझ में नहीं आती कि लोग हर बात का कसूर घूमा-फिरा कर किसी और को ही क्यूं देते हैं, हम जो करते हैं, वह असल में अपने लिए करते हैं, लेकिन जब हम अपने किए को खुद नहीं समझ पाते हैं तो किसी ऐसे दोषी को तलाशते हैं जो कुछ बोलता ही न हो। अरे माना तुमने भगवान के लिए सब कुछ किया पर क्या भगवान से पूछकर किया था।”

पंडित जी ने इतना कहा ही था कि निगाहें समोसे का इंतजार कर रहे उन ग्राहको पर टिक गईं  जो हर दिन के ग्राहाक हैं। पडित जी ने बिना पूछे उन ग्राहकों को समोसे पैक कर अलग-अलग थमा दिए थे। पर हैरानी कि वे आज गए नहीं वहीं जमे थे और जमते भी क्यूं नहीं, आखिर हर दिन माहौल को बनाने वाले पंडित जी की राय आज उफान पर थी। जेब में पैसो को डालते हुए वे फिर अपने उसी रुप में उतर आए। ‘‘ एक बात सोचिए कि हम हमेशा मांगते ही क्यों रहते हैं? क्या हमने कभी सोचा है कि हम जिससे मांग रहे है वह हमारा कौन है? भई, जिससे हम मांग रहे हैं वह हमारा लगता क्या है और हम उसके क्या लगते हैं?”

सभी को इतना तो मालूम था कि अक्सर सवाल पैदा करने वाले पंडित जी आज़ फिर कुछ नया ही उगल देगें और जिसे सुनने की आशा में हर रोज़ की तरह सबके कान चौकन्ने हो गए थे। यहां-वहां फिरती पंडित जी की निगाहें भी वापस उन चेहरों पर आ टिकी थीं जिन्हें बस उनके ही बोलने का इंतजार था। एक लम्बी-सी सांस छोड़ते हुए बोले- “अगर यही सवाल आपसे पूछें तो सिर्फ आप लोग ही नहीं पूरा संसार यही कहेगा कि वे हमारे मां-बाप है और हम उनके बच्चे हैं। फिर तो सभी उसके बच्चे हुए, वह कितनों की मनोकामना पूरी करेगा? इसलिए बढि़या यही है कि भगवान से कहो- ‘हे भगवान, जो है बस तू ही तू है,  मैं कुछ भी नही हूं।’ तब वह तुम्हारी सुनेगा वरना तो सारा संसार एक ही बात कहता है कि वह किस-किस की सुनेगा?” कहते हुए पंडित जी के चेहरे पर चुप्पी छा गई। यहां तक की माहौल में शरीक आस-पास के दुकानदार ही नहीं बल्कि अस्पतालों के बाहर रुकने वाले लोग भी खामोश हो गए थे। शायद इसलिए कि इससे पहले किसी ने भी ऐसे सोचा ही नहीं था जैसा उनकी कानों ने अब सुन लिया था।

कानों ने इन अल्फाजों को अभी हज़म भी नहीं किया था कि उससे पहले कानों में पड़ती एक नई गूंज ने सारा ध्यान ही भटका दिया था- ‘‘राम-राम महाराज जी, आज हमारा एक छोटा-सा काम कर दो।’’ इस आवाज़ ने सभी की नजरों में खुद को केंद्र बना डाला। पंडित जी भी पलटकर उस ओर देखने लगे- वह नौजवान लड़का, जिसे महीने पहले सभी आइस्क्रीम वाले के नाम से जाना करते थे। अचानक गायब होने के बाद उसका आज एकदम से आना सभी को चौंका गया था। करीब आते ही उसकी जुबान से फिर वही अल्फाज़ निकले- ‘‘पंडित जी एक छोटा-सा काम कर दो।’’ सब हाल-चाल पूछते कि इससे पहले ही उसने फटाक से हाथ को आगे बढ़ाते हुए कहा-‘‘पंडित जी मेरा रिश्ता तय हुआ है जरा देखकर बताओ कि शादी का बंधन कैसा रहेगा?”  यह सुनकर पल भर के लिए तो सभी हंस पड़े पर पंडित जी के दारा अचानक उसका हाथ पकड़ते ही सबकी बेचैनी बढ़ गई। वे मुस्कुराते हुए बोले– ‘‘मोड़ा देख, तेरे लिए शादी तो बढि़या है क्योंकि तुम्हारी किस्मत की रेखा तेरी बीवी के हाथों में ही है।” पल भर के लिए चुप हो गए और झुककर काफी गौर से हाथ को देखते हुए बोले- ‘‘ भाई जिस दिन तेरी शादी होगी उस दिन जबरदस्त मौसम होगा, काली आंधी, जानता है न!’’ वे फिर से खामोश हो गए, लड़का तो लड़का भीड़ में मौजूद लोग भी पलभर के लिए घबरा गए पर तभी पीछे से आती आवाज़ ने सभी का ध्यान भटका दिया-‘‘काली आंधी!” बगल से आती यह आवाज उस बुढ़िया की थी, जिसे यहाँ पर सभी काकी कहकर बुलाते हैं। वह हर रोज गहराते अंधेरे में चली आती है और जल्दबाजी मचाती हुई समोसे ले निकल पड़ती है। पर आज, काकी रेहड़ी के आस-पास लगी भीड़ को चीरती हुई अपनी लाठी के सहारे आगे बढ़ पंडित जी के स्टूल पर आ बैठी। अब सबकी नज़रें फिर से पंडित जी पर थम गई थी। वे फिर स्टार्ट हो गए- “बता भई, तेरी बीबी का नाम क्या है?”  लड़का फटाक से बोला- “रानी।” “क्या?” सुनते ही मानो पंडित जी के होश उड़ गए- “मोड़ा देख तुम्हारी तो बिल्कुल नहीं बनने वाली, क्योंकि मोड़ी का नाम है रानी और तुम्हारा राजा। तुम्हारी राशि हुई म और उसकी य यानी बिल्ली और चूहा, जिनकी कभी नहीं बनती। पर चिंता मत कर, सब भगवान के भरोसे है।” इतना कहते ही माहौल में बिल्कुल सन्नाटा छा गया। माहौल इतना गंभीर हो गया था कि काकी भी हैरान हो गई थी। वह भी चुप हो अपनी राह चलने को हुयी ही थी कि पंडित जी जोर से हँसे, सभी उनको देखकर चौंक गए। फिर पंडित जी बोले, “अरे यार, पंडित मजाक नहीं कर सकते क्या?”

वक्त काफी हो चुका था। अंधेरा गहराने लगा था। रात के 10 बज चुके थे। सभी दुआ-सलाम कर अपनी-अपनी दुकानों की ओर बढ़ रहे थे। पंडित जी के सभी समोसे रोजाना की तरह बिक चुके थे।

 

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आरती अग्रवाल। जन्म: 1999, दिल्ली। ग्यारवी कक्षा में पढ़ती हैं और दक्षिणपुरी दिल्ली में रहती हैं। अंकुरके साथ 2005 से जुड़ी हैं। ‘फर्स्टसिटी’ और ‘अकार’ के साथ-साथ वेब पोर्टल ‘यूथ की आवाज़’ में रचनाएँ प्रकाशित. पता: जे- 455, दक्षिणपुरी, डॉ. अम्बेडकर नगर सेक्टर- 5, नई दिल्ली- 110062.

साभार: हंस, मई, 2015

ख्याली मूर्ति: नन्दनी हल्दर

यह स्तम्भ  (घुसपैठिये)दिल्ली और आसपास की कामगार बस्तियों के तरुण-युवा लेखकों की प्रतिनिधि रचनाएं आप तक पहुंचाएगा. ये लेखक और इनका लेखन बने-बनाए खांचों में नहीं समाते. ‘घुसपैठिये’ स्तम्भ के लेखक अभी-अभी जवान हुए हैं या हो रहे हैं. एकाध को छोड़कर इसके सभी संभावित लेखकों की उम्र २0 वर्ष के अंदर ही है। लेकिन इन सब में कुछ सामान्य विशेषताएँ भी हैं. सभी की आर्थिक-सामाजिक पृष्ठभूमि लगभग समान हैं। इससे भी बड़ी विशेषता यह है कि इनके लिए बचपन की किताबें कागजों से उतनी नहीं बनती हैं जितनी उनके संघर्ष, मोहल्लों, माहौल और जगह से बनती हैं. उनकी लिखाई में वे जगहें आपको सुरक्षित मिलेंगी। आप शायद महसूस करें कि साहित्य के उत्पादक और उपभोक्ता, अभिलेखन/रिकाॅर्डिंग और सृजन, कि़स्सा और तथ्य के बीच के अंतर यहाँ धुंधले पड़ जाते हैं साहित्य के सुरक्षित-आरक्षित डिब्बे में घुस आये इन घुसपैठियों को आप कैसे बरतेंगे, यह आप ही को तय करना है.

इस बार की घुसपैठिया हैं ग्यारह वर्षीय युवा लेखिका नंदिनी हल्दर .

सौजन्य: पीटीआई

सौजन्य: पीटीआई

ख्याली मूर्ति

By नन्दनी हल्दर

धूप की किरणें छांव में समा रही थीं। थोड़ी छांव तो उन खेले हुए कदमों पर भी थी जो कुछ देर पहले खेल रहे थे। मैं भी उसी धूप में बैठकर मूर्ति को बनते हुए देख रही थी। उसे बनने में एक हफ्ता लग सकता है, ऐसा रामू के मुँह से कहते सुना था। यह मूर्ति पूजा में शामिल होने वाली थी।

ठंडी हवा इधर यूंही टहलने के लिए आ गयी थी। आँखें उस हवा को तसल्ली देकर इशारा करतीं। वह घास का पुतला लगभग तैयार हो चुका था। रामू की सफेद रंग की शर्ट भीगी हुयी हथेलियों से गीली हो चुकी थी। उसने उसको मोड़कर बाजू तक चढ़ा लिया था। मिट्टी से सने हाथ अब इधर-उधर बिखरी पड़ी घास को समेटने में लगे थे। वह पीली-सुनहरी, नुकीली घास मानो उनके हाथों में चुभती ही नहीं हो, ऐसा मैं सोच रही थी।

“अरे रामू अंकल, देखो यह पानी कितना गंदा है?”

“अरे बेटा, गंदा पानी हुआ तो क्या हुआ? यह गंदा पानी ही ज़्यादा काम आयेगा!” वह बोला।

मेरे दिलोदिमाग में तो बस उस मूर्ति का नकाब था। मैं एक ख्याली दुनिया में खो चुकी थी और अपने आप में बुदबुदाने लगी, “आय-हाय! क्या सुंदर होगी मेरी मूर्ति! उसके काले-काले बाल! गोरा-गोरा चेहरा! सुंदर-सुंदर हीरे-मोती वाले गहने! लाल गुलाबी रंग की साड़ी!”

मैंने अब सोच लिया था कि मेरे पूरे मोहल्ले में उस ख्याली मूर्ति से सुंदर कोई भी नहीं। ज़ेहन के एक कोने में मूर्ति अपना घर बना चुकी थी। मूर्ति का नकाब तो एक हफ्ते बाद खुलेगा। जब पुतले को देखने पर ही इतनी खुश थी तो मूर्ति के बनने पर कितना खुश होऊँगी, यही सब सोच रही थी।

बच्चों की टोलियाँ तो वहाँ बैठ ही गई थीं। बच्चे अपनी बातों की ऊँची-ऊँची उड़ान भर रहे थे।

“अरे पता है, मेरे पापा दूसरी शादी करेंगे, वे मेरी सौतेली माँ लायेंगें और मेरी माँ की सौतन।”

“अरे चिंटू, तुझे इन सब के बारे में कैसे पता चला, तू तो स्कूल भी नहीं जाता है!”

“अरे दीदी, मेरे मम्मी-पापा दिन-रात यही सब बातें करते रहते हैं?”

“कितना छोटू है रे तू, लेकिन तेरी बातें इतनी बड़ी-बड़ी हैं, शैतान कहीं का!”

“दीदी मैं शैतान नहीं हूँ।”

“अच्छा चल तू शैतान नहीं, महाशैतान है। अच्छा, वैसे तेरे पापा दूसरी शादी क्यों कर रहे हैं?”

“दीदी, वह सौतेली मम्मी बहुत सुंदर है न इसीलिए।”

तभी चिंटू कुछ सोचने-सा लगा और बोला।

“वाह! मेरी मूर्ति कितनी सुंदर लग रही है, मेरी सौतेली मम्मी की तरह। इसके भूरे-भूरे बाल और सांवली, बिलकुल मेरी तरह। होठों पर उनकी मतवाली लाली, मॉडर्न डिजाइन वाली उनकी साड़ी, जो मैंने मार्केट में देखी थी। अरे दीदी, पता है मेरी सौतेली मम्मी के बाल कैसे हैं? उनके होठ कैसे हैं? उनकी साड़ी पता है, कैसी है? पिंक और आसमानी कलर की है। उसके बॉर्डर में मेहँदी का डिजाइन है। उनके भूरे बाल अधकटे हैं और होठों पर पिंक लिपिस्टिक है।”

उंगली को दिमाग के दायीं तरफ पीटते हुये फिर बोला- “स्क्रू टाईट हो जा, स्क्रू टाईट हो जा। और हाँ, उसके पास चमकने वाली घड़ी भी है। और न… और न… नगों वाली माला भी है। सांवली है पर सुंदर बहुत है। पता है दीदी, मैंने तो यह भी डिसाइड कर लिया है कि रामू अंकल मेरी वाली ही मूर्ति ही बनाएंगें और वह सांवली होगी। वह पिंक और हल्का आसमानी कलर की साड़ी पहनेगी। देखना बिलकुल मेरी सौतेली मम्मी जैसी लगेगी।”

“अरे चिंटू, इतना छोड़ता क्यों है? न ही तेरी सौतेली मम्मी आई है और न ही मूर्ति बनी है और तू अभी से ही आसमान में उड़ने लगा!”

“मेरी मम्मी से पापा पक गए हैं। यह मैं सच कह रहा हूँ।”

“पर चिंटू एक बात ध्यान में रखियो, अगर तेरे पापा तेरे से पक गए तो क्या वे तुझे भी चेंज कर देंगे!”

“मेरे पर विश्वास क्यों नहीं करती हो, सौ बार बोल चुका हूँ कि मैं सच कह रहा हूँ, पर तुम मानती ही नहीं। आज से पहले मेरे पापा तीन शादियाँ कर चुके हैं। पर किसी ने भी मुझे भाई नहीं दिया। पहली मम्मी थोड़ी अटपटी थी। दूसरी मम्मी बहुत हरामन थी। तीसरी जिसने मुझे जन्म दिया और चौथी, सुंदर तो है पर होगी कैसी, यह आगे देखेंगे! मैं चलता हूँ! बाय टाटा सी यू!”

वह घासों से बना पुतला! बच्चे उसे देख खुश हो जाते। पुतले के चारो ओर लोगों की इकट्ठी भीड़ और उनमें चलती बातें। ‘भाई यह क्या है?’ ‘यह रामू क्या बना रहा है?’ ‘पता नहीं, लेकिन सुना है कि कोई मूर्ति बना रहा है।’ ‘कुछ कर तो रहा है। रामू के पास कोई काम भी तो नहीं है।’ ‘राम-राम जी!’ ‘अरे सुरेश भाई क्या हाल हैं?’ ‘हम तो भाई ठीक हैं! तुम कइसन हो?’ ‘राम –राम जी!’ इस तरह की आवाजें जब भी कानों की कुंडी खटखटाती, मेरे ख्यालों और ख्याली मूर्ति को चूर-चूर कर देतीं।

मैं सोच रही थी कि यह पुतला बड़ा सुंदर लग रहा है! अगर उसे दूर से देखा जाये तो असली मानुष लगेगा!

”अरे बेटा, देखना पुतला कैसा लग रहा है?“

“हाँ अंकल, ठीक है!”

रामू ने यह सवाल तभी पूछा जब मैं ख्यालो में खोई थी। मानो वह मेरे जहन में घुसकर मेरे ख्यालों को जान जाता है। डूबते सूरज को शाम की लालिमा घेर चुकी थी। बच्चों के हाथों में अब एक ही चीज़ नज़र आने लगी थी- इधर-उधर करती डोलची, जिसमें वे मदर डेयरी से दूध भरकर लौट रहे थे।

लाल रंग की उबड़-खाबड़ ईंट से रामू मिट्टी के ढेलों को तोड़ रह़ा था। कुछ पल बाद ही मिट्टी के ढेले मुलायम मिट्टी में तब्दील हो चुके थे। रामू उन्हें सान रहा था। अब उस मिट्टी को हाथों में लपेट कर चुभते घासों पर लगा रहा था। शरारती फौज भी अपने कदमों की हाजि़री लगाने चल दिये थे। उनकी निगाहें अब आसपास के माहौल में जम चुकी थीं। वह पिसी हुई, मुलायम सी मिट्टी अब उस मेहमान के कमर तक चढ़ चुकी थी।

आसपास के शोर-गुल से रामू बहुत परेशान था। उसकी परेशान निगाहें मूर्ति से हट नहीं रही थीं लेकिन आवाज़ उसके कानों में समा रही थी जो आसपास से गुजर कर हवा में दूर-दूर तक फैल रही थी। वह मिट्टी सूरज की किरणों से सूख रही थी लेकिन अब भी कहीं न कहीं गीली थी।

घास का पुतला एक मूर्ति में तब्दील हो चुका था। उसने मेहमान का मुखौटा ही बदल दिया था। अब भी मूर्ति के कुछ अवशेष बाकी थे और जिनको निखारने में अभी और वक्त लगना बाकी था। यही वजह थी कि लोगों के कदम अब यहाँ कुछ पल ही टिकने वाले थे। रामू भी बेफ्रिक होकर आसपास बिखरे सामानों को समेटने में लगा था। पड़ोसियों के गले से उतरते लफ्ज भी बंद हो चुके थे, केवल सवारी-गाड़ियों के शोर के अलावा और कुछ भी कानों तक नहीं पहुँच पा रहा था। रात होने ही वाली थी।

रामू के घर की दहलीज़ पर लगी एक छोटी सी तस्वीर मुझे रोक कर अपनी ओर खींच चुकी थी। हाथों के सहारे तस्वीर को उठाया और इस तस्वीर में बनी मूर्ति भी मेरे ख्यालों में अपना घर बनाने लगी।

कदम उस संकरी गली में पहुँचे जहाँ सन्नाटा था। लोग मूर्ति की तरह चुपचाप बैठे थे। कदम अपनी चुप्पी के साथ अब घर के आँगन में पहुँचे। मूर्ति का नकाब पहनकर दिमाग भी तकिये की तरफ़ सरक चुका था। खेलते कदम भी एक-दूसरे के पास सटे लेटे थे। मूर्ति का सुंदर चेहरा बार-बार आँखों के सामने आ रहा था, ऊपर से घर का शोरगुल भी था और आँखों में नींद नहीं थी। इसीलिए ख्याली मूर्ति के बारे में इधर-उधर की बातों को मैं बटोरने में लगी थी। आँखें उन बातों के साथ कब सो गईं, इसकी याद मुझे भी नहीं थी।

सुबह उठकर दादी को अलग ही तरह से सजे हुए देखा। दादी के घुंघरू जैसी लट को देखते ही ज़ेहन में मूर्ति का नकाब आ पहुँचा। हाथों से उस नकाब को हटाया।

“आय-हाय क्या सुंदर लग रही है?”

“शुक्रिया…शुक्रिया!” मेरे बगल में खड़ी दादी बोल पड़ी।

“दादी, आप कहाँ की सोच रही हो? मैं तो अपनी ख्याली मूर्ति की बात कर रही हूँ। उसके काले-काले बाल, गोरा-गोरा चेहरा, हीरे-मोती वाले गहने!”

“देख, मैं भी तो वैसी ही दिख रही हूँ न!” दादी बोली

दादी के साथ बहसबाजी के बाद कदम उस संकरी गली में जा पहुँचे जहाँ गली मूर्ति के कारण जीते-जागते माहौल में तब्दील हो चुकी थी। उस खिड़की के सींकचों पर नज़र बिल्कुल टिकी हुई थी क्योंकि मूर्ति के कुछ अंश उससे दिखाई पड़ रहे थे।

मूर्ति की उंगलियाँ रंगों से भीगी हुई थीं। एक नहीं, दो नहीं, तीन नहीं, चार नहीं, पाँच-पाँच उँगलियाँ! कदम उस दहलीज़ के पास जा पहुँचे। मैंने उन उँगलियों को रामू की खिलखिलाती निगाहों के पास रख दिया जो अभी भी मूर्ति को तराशने में लगा था।

“अरे बेटा, तुम आ गई?”

“जी अंकल!”

“बैठो-बैठो! एक खुशखबरी है।”

“क्या अंकल?”

“कल मूर्ति की रंगाई होगी!”

“क्या? फिर बड़ा मज़ा आयेगा!”

सूरज की किरणें मूर्ति के शरीर को और भी उभार रही थीं। कोई खुरदरी चमकदार-सी चीज़ लेकर रामू मूर्ति के शरीर पर घिसने लगा। मूर्ति के होंठों की खिलखिलाती मुस्कुराहट के साथ-साथ उसकी प्यारी-प्यारी आँखें भी मूर्ति की शोभा को बढ़ा रही थीं।

रामू बड़े उत्साह से अपना काम कर रहा था। शर्ट के बाजू उसी तरह मुड़े हुए थे जिस तरह पहले थे। मूर्ति की घिसाई का वह काम भी निपट चुका था। रामू का थकावटी शरीर उससे बार-बार कह रहा था कि ‘मुझे आराम करना है, मुझे आराम करना है!’ यह बात मेरे ज़ेहन में महफूज़ थी। पर रामू को तो इस बात का एहसास ही नहीं था।

“अंकल, आप सुबह से काम कर रहे हैं! अपने शरीर को आराम तो करने दो!”

“अरे बेटा, इसे परसो देना है!”

“पर अंकल, कल तो रंगाई है!”

मेरे आगे रामू की एक न चली।

“उफ्फ, तू तो मेरा दिमाग़ खा जाती है!” कहकर रामू अपने थकावटी शरीर को बैठा चुके थे।

सामने निगाहों में बसी मूर्ति मुझे और रामू से कुछ न कुछ कह रही थीं, पर मैं और रामू उसे समझने में असमर्थ थे। रामू के गले से निकलते लफ्ज़ होंठों पर मुस्कुराहट ला रहे थे। कुछ पल बाद शैतानी टोली अपनी बातों के साथ वहाँ पहुँच गई।

“अंकल बड़ा ही सुंदर लग रहा है!”

“हाँ-हाँ चिंटू, तुने सही कहा!”

“अंकल इसमें जंग नहीं करोगे?”

चिंटू की बातों से सब ठहाका मारकर हँस पड़े। तभी मैंने जवाब दिया,

“अरे चिंटू जंग नहीं, रंग!”

अक्सर इन्हीं बातों से उदासी भरे चेहरे पर भी मुस्कुराहट खिलखिला उठती है। वक़्त की रफ़्तार अब मौसमों में तब्दील हो चली थी। ‘कल तो रंगाई है, बड़ा मज़ा आयेगा!’

काश! मेरी ख्याली मूर्ति इस मूर्ति से मैच कर जाये! इन्हीं बातों को सोचते हुए घर के दरवाज़े पर दस्तक दी। घर में कोई नहीं था। घर में घुसते ही कदम चौकी पर जा पहुँचे। घर अब वैसा नहीं था जैसा पहले था। मूर्ति के अनुभव के साथ पलकें झुकने को थीं। नींद आँखों में कब आई पता ही नहीं चला।

मूर्ति अभी तक ज़ेहन में थी और जिसका जिक्र बार-बार दिमाग़ में हो रहा था। कुछ पल बाद मेरे कदम रामू के घर पहुँच चुके थे। मूर्ति की रंगाई मेरे आने पर ही शुरू हुई। शैतानी फौज कोने में अपना झुंड बनाए बैठी थी। उन्हीं के पास जाकर मैं भी बैठ गई।

“दीदी, मैंने कहा था न कि रामू अंकल यह मूर्ति बिलकुल मेरी सौतेली माँ जैसी बनायेंगें!”

“अरे चिंटू, अभी तक अंकल ने तो रंग भी नहीं किया। तू तो पहले ही डींगें मारने लग गया।”

रंगों में भींगे पेंट-ब्रुश। उन रंगों से उभरती मूर्ति की छवि जो कि दिल में एक घर-सा बना चुकी थी। इकट्ठी भीड़ में हर निहारती निगाहें जो सिर्फ और सिर्फ उस छवि पर ही टिकी हुयी थीं। मैं भी अपनी ही धून में थी।

मूर्ति की रंगाई शुरू हुई। सबसे पहले मूर्ति के शरीर को सफेद रंग से रंगा, उसके बाद मानुष कलर, हथेलियों के गड्ढों पर थोड़ा-थोड़ा लाल रंग और गालों पर भी वही रंग। कुछ देर बाद रंगाई की यह दुनिया भी खत्म हुयी। मूर्ति को रंग में देखकर आँखें उसे निहारती रहीं। रंगने के बाद उसका शरीर उभर आया था। सफ़ेद मूर्ति अब इंसानी कलर वाले शरीर में तब्दील होने चली थी। अब रामू उसे सजाने में लगा था और मेरा मन मचल-सा रहा था कि काश मैं भी मूर्ति को सजा पाती। मेरे दिल की बात जुबां पर आ ही गई।

“अंकल-अंकल मैं भी सजाऊँ!”

“नहीं बेटा, यह बच्चों का खेल नहीं है।” अपने काम में व्यस्त रामू बोला।

मूर्ति के घुँघराले बाल जो दादी के लटों की तरह लग रहे थे जिसे मैंने आज सुबह-सुबह ही देखा था। मोतियों की एक छोटी-सी माला जिसे मूर्ति को पहनाया जाना था बिलकुल वैसी ही लग रही थी जिसे मैं कमला मार्केट से लायी थी। बहुत-से गहने थे जैसे चूड़ियाँ, लटकन वाले झुमके, बड़ी-बड़ी मालाएँ, गुलाबी ब्यूटीफुल-सी साड़ी जो मन को जिज्ञासु बना रही थी क्योंकि ऐसी साड़ी मैंने कभी देखी ही नहीं थी। बार्डर के रंग आसमानी और लाल थे। रामू इन गहनों और साड़ी को बारी-बारी पहनाते गए। वह सजावट का माहौल भी लगभग खत्म ही हो चुका था।

गहनों के साथ वह प्यारी-सी साड़ी मूर्ति की शोभा में चार चाँद लगा रही थी। उस वक्त चिंटू का मुंह देखने लायक था। बड़ा ही डींगें मार रहा था। ‘मेरी सौतेली मम्मी जैसी मूर्ति बनेगी! आप देख लेना दीदी!’ शायद वह भी मन ही मन सोच रहा होगा कि ‘क्या सोचा था और क्या हो गया!’ उसकी शक्ल के बारह बज चुके थे।

सौतेली माँ किसी मूर्ति में नहीं थी। उनकी खुद की खूबसूरती भला कोई मूर्ति कैसे ले सकती थी!

—समाप्त—-

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नंदिनी हल्दर. जन्म- 26 नवंबर 2004, लक्ष्मीनगर, दिल्ली. अंकुर किताबघर की नियमित रियाजकर्ता. पता- सी-68, सावदा-घेवरा जे.जे. कॉलोनी, दिल्ली- 110081 

साभार: हंस, अप्रैल, 2015

रात और दिन : जानू नागर

यह स्तम्भ  (घुसपैठिये)दिल्ली और आसपास की कामगार बस्तियों के तरुण-युवा लेखकों की प्रतिनिधि रचनाएं आप तक पहुंचाएगा. ये लेखक और इनका लेखन बने-बनाए खांचों में नहीं समाते. ‘घुसपैठिये’ स्तम्भ के लेखक अभी-अभी जवान हुए हैं या हो रहे हैं. एकाध को छोड़कर इसके सभी संभावित लेखकों की उम्र २0 वर्ष के अंदर ही है। लेकिन इन सब में कुछ सामान्य विशेषताएँ भी हैं. सभी की आर्थिक-सामाजिक पृष्ठभूमि लगभग समान हैं। इससे भी बड़ी विशेषता यह है कि इनके लिए बचपन की किताबें कागजों से उतनी नहीं बनती हैं जितनी उनके संघर्ष, मोहल्लों, माहौल और जगह से बनती हैं. उनकी लिखाई में वे जगहें आपको सुरक्षित मिलेंगी। आप शायद महसूस करें कि साहित्य के उत्पादक और उपभोक्ता, अभिलेखन/रिकाॅर्डिंग और सृजन, कि़स्सा और तथ्य के बीच के अंतर यहाँ धुंधले पड़ जाते हैं साहित्य के सुरक्षित-आरक्षित डिब्बे में घुस आये इन घुसपैठियों को आप कैसे बरतेंगे, यह आप ही को तय करना है.

ब्रूनो द्यूमों निर्देशित एक धारावाहिक का दृश्य

ब्रूनो द्यूमों निर्देशित एक धारावाहिक का दृश्य

रात और दिन

By जानू नागर

दिन

12 दिसंबर को सुबह छह बजे से शाम छह बजे तक

सुबह की लीला निराली होती है। इस दौर में भागदौड़ का अपना मजा है। पेपर वाला, दूध वाला मंदिरों की तरफ ही भागता दिखता है। इस भागदौड़ भरी जिंदगी में सामने से गुजर जाने के बाद भी कहते हैं- भाई आपके तो दर्शन दुर्लभ हैं। लोगों की तो पूछो मत, पूजा-आरती करने में इतने मग्न रहते हैं कि जिस प्रतिमा के सामने होते हैं, उसका रूप रंग क्या है? उससे तो बेखबर ही रहते हैं। सुबह के अंधेरे में आए और सुबह के अंधेरे में गुम हो गए। इस लाइन से एक बात याद आती है।

“तुनी-तुनी चंदन पुनि-पुनि पानी, सड़ गए देवता, तब हम जानी।”

इसलिए यह कोई आश्चर्य कि बात नहीं कि सुबह के छः बजे जब एक महिला ने देखा कि मन्दिर में बजरंग बली की मूर्ति चोट खाई और बिखरी होने के साथ ही उसकी एक आँख भी गायब थी। उस महिला ने शोर मचाया, “मन्दिर मे अनर्थ हो गया है।”

महिला की आवाज़ काफी ऊँची और दमदार थी। बार-बार एक ही बात कह रही थी “जिसने बजरंग बली के साथ ऐसा बेहूदा काम किया उसका नाश हो!”

अब यह शोर किसी से छुपा नहीं रहा। कानों में भनक पहुँच ही गई।

“अरे यहाँ ये हो रहा!”

“वहाँ ये हो रहा हैं!”

इन आवाज़ों का अपना एक मजा होता है। बातों को सुनने के लिए कान तो पहले ही खड़े कर लिए जाते हैं। फिर कान कहाँ मानने वाले, वह तो आंखों को भी देखने के लिए कहते “बहन चल देख कर आते हैं। वहाँ किस बात का शोर है?”

महिला की आवाज़ ने कम समय में ही घर से, गली से, लोगों को मन्दिर के सामने सड़क पर जमा कर दिया। भीड़ उमड़ती गई। बात हवा और आग की तरह फैलती गई। सभी अपने-अपने मन मुताबिक बातें बनाते। जिसके दिल में जो गुबार था वही भक से कह देते।

धर्म को विवाद का मुद्दा बनता देख, मुस्लिम समुदाय वाले लोगों के चेहरे पर डर प्रतीत हो रहा था। आक्रोश वाले चेहरे सिर्फ हिन्दुओं के थे। सकुचाए चेहरे मुस्लिमों के थे। कुछ लोग तो उस भीड़ से कट लेना चाहते थे। लेकिन जहाँ दोनों धर्म की मौजूदगी हो वहाँ पर मामला एक तरफा नहीं हो सकता। दोनों धर्मों के बीच में उतार-चढ़ाव का माहौल बनकर बिखर रहा था। एक बात जो सच थी कि बिखरे माहौल को समटने वालों में भी दोनों धर्म के थे।

भीड़ बढ़ती ही जा रही थी, बस बढ़ती ही जा रही थी। अफ़वाहें अपना पैर फैला रही थीं। ऐसा लग रहा था कि अफवाहों में फैलते शब्दों को इस भीड़ ने बांध दिया है। सवालों के जवाब ढूढ़ने की हिम्मत किसी में न थी। हर कोई अपने-अपने परिवेश में छुप जाना चाहता है। किसी के सवाल का जवाब किसी को कहीं गलत रुख में न मोड़ दे!

तभी भीड़ से 100 नम्बर में कॉल हुआ। पुलिस भी हाँफती-भागती, सायरन बजाती भीड़ को चीर कर सावदा के सी ब्लॉक मन्दिर के सामने खड़ी हो गई। पुलिस वालों के तो अपने पुराने रटे-रटाए सवाल होते हैं।

कब टूटी?

तोड़ते हुए किसी को देखा?

कौन हो सकता है?

आप को किसी पर शक है?

पुलिस के इन बेहूदा सवालों को तोड़ते हुए किसी ने कहा की सर सवाल छोड़ो पता करो ये किसका काम है?

हाँ, कान को एक बात समझ में आई। किसी ने पुलिस वाले से कहा की भाई सब कुछ छोड़ो हिन्दू ने तोड़ा या मुस्लिम ने तोड़ा जिसने भी तोड़ा है ग़लत किया है। उसको सजा ऊपर वाला देगा। सभी लोग चंदा मिलाकर नई प्रतिमा ले आते है। भीड़ में शामिल हिन्दू व मुस्लिम दोनों ने हामी भरी। पुलिस को भी हाँ मे हाँ मिलाना पड़ा। मामला शांत हुआ। शोर गुफ्तगू में कहीं थमता चला जा रहा था। भीड़ बादलों की तरह बरसने के बाद छंट रही थी।

अब मन्दिर मस्जिद के लिए कमिटी बननी चाहिए ताकि दोबारा से इस तरह की कोई घटना न घटे। बातचीत से साफ हो चला था कि शाम को पंचायत बैठाई जाए। चंदा अभी के अभी वसूला जाए, दस-बीस लोग पुलिस के साथ मिलकर घर-घर जाकर चंदा इकट्ठा किया। दोपहर तक मूर्ति भर के लिए चंदा जमा हो गया।

शाम को पंचायत ने फैसला लिया कि जब मूर्ति चंदे से आ रही हैं, तो फालतू मुद्दा बढ़ाने से कोई फायदा नहीं है। गलती तो कमिटी की है। मन्दिर में कोई न कोई पुरोहित होना चाहिए। सारी बातों को यहीं दफन किया जाये।

ठंडे कुहासे ने आज कालोनी को पूरी तरह से घेर रखा था। ठंड हवाएँ लोगों को आग के पास भेजने का काम कर रही थी। शाम का बुढ़ा सूरज कोहरे को चीरने की कोशिश कर रहा था।

’’’’’’

11 दिसंबर शाम 6 बजे से 12 दिसंबर सुबह 4 बजे तक

रात

काम के वक्त मालिक से थोड़ी अनबन हो गई थी और यह सोच कर कि ईटों के टेढ़ेपन को कब तक सीधा करता रहूँगा, करनी-बसूली के साथ-साथ साहूल व सफ़ेद लम्बे धागे को पटक दिया। उसने मुझे झटके में 200 रुपए दिये थे। वह काफी गरम था। उसकी गर्मी से मुझे क्या लेना देना?

‘‘मालिक-मालिक…’’, मालिक शब्द सुनकर दिल-दिमाग दोनों ही पाक गए थे। साथ काम करने वाले लेबरों की छुट्टी कर दी थी। अपने हाथ-पैरों के साथ मुँह मे लगी सीमेंट-बालू के पाउडर को पानी से धो लिया। अपना काम वाला कुर्ता उतार गुलाबी फुल बाजू वाली कमीज को धारण किया, जूते वही पहने रहा जो मुलायम रबड़ के बने थे।

एक लेबर ने सारे औजारों को साफ करके एक बोरी मे भरकर कल के काम के लिए तैयार कर दिया था। लेबर अपनी घर की ओर निकल लिए थे, कुछ अपनी साईकिल से तो कुछ पैदल। मैंने भी अपनी साईकिल उठाई और पैडल घूमाने लगा। दिमाग में एक ही बात का सुरूर था कि आज जी भर कर पिऊँगा। साईकिल सड़क पर दौड़ रही थी और दिमाग कहीं और चल रहा था। ख्यालों में खोया ही था कि एक कार वाले ने सामने से टक्कर मार गिरा दिया। जब तक मैं संभलता वह पहले ही कहने लगा कि “साले मरने चले आते हैं। घर में कोई इंतजार करने वाला है भी कि नहीं।” उसकी इस बात ने मेरे कलेजे को और भी जला दिया। उसका जाना और मेरा खड़ा होना एक साथ हुआ।

साईकिल का हैंडल काफी मुड़ गया था। अगले पहिये को पैरों के बीच में फंसा कर हाथों की ताकत से सीधा किया और पहले की तरह फिर से उसपर चढ़ लिया। ठंडी हवाएँ कानों में कुछ कह रही थीं। मैंने भी कह दिया कि “आज मेरे दिमाग को मत उलझाओ, बस आधे घण्टे की बात है। तुझको भी सबक सीखा दूँगा।” साईकिल भाग रही थी और मै गहरी-गहरी सांसें ले रहा था या कह लो कि हाँफ रहा था।

टेंशन से माथे पर पसीना फूट आया था। कॉलोनी नजदीक आ गई थी। मुझे आज किसी से कुछ नहीं कहना था। घर के सामने साईकिल को उसी तरह से गिराया जिस तरह साले कार वाले ने गिराया था। इस बार मैं नहीं गिरा, गिरी साईकिल को उठाया भी नहीं, बस उसमें ताला मार चाभी को कमरे के लटकते पर्दे के पीछे फेंक कर आगे बढ़ गया था। पीछे से बप्पा ने आवाज दी, “कहाँ को जा रहा है?” “कहू नहीं आउत हैं”, बिना पीछे मुड़े उत्तर दिया। “जल्दी ने आ जइयो। खाना बन गौ हैं।” लेकिन मैं बिना आवाज दिये बढ़ता गया।

जो भी जान-पहचान का मिलता उन सब को राम-राम करता हुआ आगे बढ़ता गया। पक्की सड़क को पार करते वक्त एक बाईक वाले ने टक्कर मारते-मारते छोड़ा। वह भी उल्टा ही कहने लगा कि “मरने को जी चाहता है क्या?” वह मेरे पड़ोस का ही लड़का था इसीलिए कुछ नहीं कहा।

एक गली नहीं दो गली नहीं तीसरी गली के सामने रुक गया। वहाँ पर ग्राहको का इंतजार करती औरत ने पूछा, “क्या चाहिए?” मैंने मज़ाक में कहा, “क्या दोगी?” वह थोड़े रूखे स्वर में बोली, “काम बता वरना आगे निकल, धन्धे का टाईम है। मज़ाक करना है तो सुबह आना।” “अरे! सुबह किसने देखी है? जरा अंगूर वाली बोतल दे दो।” वह हल्की मुस्कान साधते हुई चबूतरे के ऊपर से पैसे मांगी। कमीज के ऊपर वाले खिसा से पैसे निकाल कर थमा दिया।

वह शाशी थी, जो शराब का धन्धा करती है। बहुत कड़े स्वभाव वाली है। अगर कुछ भी उल्टा सीधा बोला तो सारा राशन-पानी लेकर ऊपर चढ़ जाती है। बस एक ही बात बोलती है, “भडुये जाता है या अभी सिखाऊँ तमीज, बोतल ले और आगे निकल ले।” अपनी दोनों बोतलों को कमर में खोस कर पंसारी की दुकान की तरफ बढ़ चला।

मेरी आदत नून चाट कर शराब पीने की नहीं है। नमकीन व सलाद के साथ ही पीता हूँ। परचून की दुकान की तरफ गया और वहाँ से एक गिलास, साथ में हल्दीराम की कड़क आलू भुजिया वाली नमकीन पैंट के खीसा मे भरकर पार्क की तरफ बढ़ गया। पार्क में कुछ समझ नहीं आया, वहाँ गंदगी भी बहुत थी तो यह सोचकर कि पीने में मजा नहीं आएगा नाई की दुकान की तरफ गया। दुकान तो बंद थी लेकिन उसके सामने लकड़ी का एक टूटा हुआ तख्त पड़ा था। उसी के ऊपर दोनों बोतल निकाल कर रख दिया।

ठंड में पानी की क्या जरूरत? शराब को नीट ही गिलास में पलटना शुरू किया। थोड़ी-थोड़ी नमकीन के साथ पैक पर पैक मारने लगा। खड़े-खड़े पैर भर आए थे सो वहीं बैठ गया। कई एक पैक पी गया पर साला नशा चढ़ ही नहीं रहा था। पर हाँ, सड़क के किनारे बैठकर पीने का अपना ही एक मजा है। एक बोतल खत्म हो चुकी थी, हल्का-हल्का सुरूर ठंडी हवा की वजह से होने लगा था। नमकीन मुँह का स्वाद बदल रही थी। पहली खाली बोतल को वहीं पटक दिया। वह उछल गई लेकिन फूटी नहीं। ओ हो ये काँच वाली नहीं प्लास्टिक वाली थी। दूसरी पर नंबर लगा दिया। एक दो हल्के हल्के पैक लेने के बाद सर चकराया, माथा घुमने लगा।

अब तो सब कुछ याद आने लगा था, जो कुछ भी हुआ था सब नज़रों के सामने घूमने लगा। माँ और भाई के मर जाने का गम, उनका चेहरा सामने आते ही एक पैक और लिया। सोचा तो आँखों में आँसू आ गए। काफी वक्त तक अपने बारे में सोचता रहा, नजर उठा कर आसमान की तरफ देखा तो चाँद-तारे मुँह चिढ़ा रहे थे। चल छोड़ यार, दारु पी, उनकी क्या मिसाल? अपने मन को समझाते हुए बोला कि “मेरी भी कोई जिंदगी है!” अब जो भी पैक बनता बहुत भारी लगता। “यह तख़्त अब मेरा, सिर्फ मेरा है। किसी के बाप में भी दम नहीं कि कोई आ कर यह कहे कि तख़्त मेरा है।” नमकीन पता नहीं किधर गिर गई। गिलास भी साला टेढ़ा दिखने लगा, लबों की तरफ ले जाता तो साला नाक की तरफ चला आता। अब बाकी की शराब को बोतल से ही गट-गट पीने लगा।

ठंड का असर अब मुझमें नहीं रहा, हवा को बार-बार अपनी मुट्ठी मे पकड़ता, बंधी मुट्ठी को सीने में ठोकता हुआ हवा से कहता, “आ… आ दम है तो घुस मेरे सीने में”, वह भी डर गई साली। अब तक कमीज की दो चार बटनें खुल गई थीं। कुहासा भी साला हीरो बन रहा था। उसके भी गालों पर दो चार थप्पड़ हवा में जमा दिया। सामने खड़ा कुत्ता भी शेर लग रहा था। उससे कहा, “आ मेरे बेटे, मेरे पास आ”, वह भी कमीना था हाथ चाट कर भाग गया। मैं भी चाटने के लिए खड़ा हुआ और तख़्त पर गिर गया, फिर संभला तो पैर स्प्रिंग की तरह हिल रहे थे।

कार वाले को जी भर कर गालियाँ दी। “अब अगर वह मुझे टक्कर मारे तो साले को कार से बाहर निकाल कर उसके सीने पर अपनी साईकिल चढ़ा दूँ। साला भाग गया नहीं तो बताता कि कौन मरने आया है!” जिसका घर बना रहा था उसकी तो “माँ की…..” जो न कहना था वह बकता रहा। अब तो न जाने कहाँ से ताकत आन पड़ी थी शरीर में। तखत को खड़ा कर दो चार लात उसको भी मारा। “साला पीते वक्त हिल रहा था।” किसी ने कहा, “अब घर चला जा बहुत पी लिया है।” “घर-घर, घर-वर मुझे नहीं जाना और अबे तू कौन होता है? साले तूझे भेजूं क्या? भाग जा नहीं तो बहुत मारूँगा।”

लम्बा भारी शरीर झुकने लगा था फिर भी सड़क पर चढ़ आया था। अब तो मैं कालोनी का डॉन था। “साला कोई भी बोला तो उसका मर्डर कर दूँगा। अगर भगवान भी आ जाए तो दो चार हाथ कर लूँ। उसने मुझे दिया भी क्या है, गम के सिवा? माँ व भाई को छीन लिया। मुझे भी कई बार मारने की कोशिश किया। मुझको मारेगा, अगर मिल गया तो आज उसकी खैर नहीं।” बोतल भी हाथ से छूट चुकी थी।

लड़खड़ाते कदम ऊँची सड़क की तरफ बढ़ चले थे। डगमगा तो इस तरह से रहा था, जैसे स्टेज मे नाचने वाली नाचती है। कैसे कमर हिला-हिला कर ठूमका मारती है। मै भी सकीरा से कम नहीं था। यह सोच काफी तेज हंसा और हंसता ही गया…….। फिर किसी ने कहा कि “पीकर पागल हो रहा है।” “जा-जा पागल खुद होगा। मुझे पागल बता रहा है! पागल तू होगा मै नहीं, अपनी पी रहा हूँ। तेरे बाप की नहीं। अपनी कमाई की पी रहा हूँ। भाग जा साले नहीं तो बहुत मारूँगा, मार-मार कर भूत बना दूँगा।” अभी कदम उसी जगह हिल रहे थे।

सड़क पर खड़े खम्भे की मर्करी जल रही थी। उसको जलता देख मैं भी जल गया। एक पत्थर उठा कर मारा वह भी वहाँ न जाकर मेरे ही पैरों के पास गिरा। “साला पत्थर में भी दम नहीं, यहीं पर गिर गया।” रात में कोई और रंग दिखाई नहीं दे रहा था सिर्फ काले के सिवा। लेकिन उसे छोड़ दिया क्योंकि काले तो मेरे दोस्त को भी कहते हैं।

सामने एक छोटा सा मन्दिर था। मन्दिर को देख लगा कि भगवान यहीं होगा। बजरंग बली की मूर्ति के सामने पहुँच गया। काफी तेज हंसा, “ये भगवान, नहीं ये भगवान नहीं, भगवान का भक्त है। और मैं भी भक्त हूँ देवी माँ का। आज दोनों भक्तों की लड़ाई होगी। देखता हूँ कौन जीतता है?” वह बहुत मुस्करा रहा था। वहीं बगल मे पड़े बाँस के डंडे को उठा कर झगड़ा शुरू कर दिया। भक्त को बहुत मारा।

मारता भी कहाँ उसके फुले गालों व गदे पर। मारते वक्त सिर्फ इतना कह पा रहा था। “उठा अपना गदा और दिखा अपनी ताकत…” कहता रहा और पीटता रहा। गदा टूट गया और क्या टूटा। मुझे याद नहीं। बगल मे खड़ी माँ मुस्करा रही थी।

उसी बाँस के डंडे को पटकता हुआ आगे बढ़ता गया। मुझसे जो टक्कर लेगा उसकी खैर नहीं, सड़क पर चीखता-चिल्लाता अपनी घर वाली गली में आगे बढ़ता गया।

समाप्त

???????????????????????????????जानू नागर- जन्म 1985 , बड़ागाँव, मछरिहा, फतेहपुर उत्तर प्रदेश. शिक्षा- इंटरमीडिएट. नांगला माँची, दिल्ली लैब में 2005 से जुड़े. उसी दौरान नांगला माँची का एक ऑडियो आर्काइव बनाया. नांगला विस्थापन के बाद भी लैब से जुड़े रहे. अंकुर के नियमित संवादक हैं.

साभार: हंस, मार्च, 2015

चिड़ियों की उड़ान में एक चिट्ठी: लख्मी चंद कोहली

यह स्तम्भ  (घुसपैठिये)दिल्ली और आसपास की कामगार बस्तियों के तरुण-युवा लेखकों की प्रतिनिधि रचनाएं आप तक पहुंचाएगा. ये लेखक और इनका लेखन बने-बनाए खांचों में नहीं समाते. ‘घुसपैठिये’ स्तम्भ के लेखक अभी-अभी जवान हुए हैं या हो रहे हैं. एकाध को छोड़कर इसके सभी संभावित लेखकों की उम्र २0 वर्ष के अंदर ही है। लेकिन इन सब में कुछ सामान्य विशेषताएँ भी हैं. सभी की आर्थिक-सामाजिक पृष्ठभूमि लगभग समान हैं। इससे भी बड़ी विशेषता यह है कि इनके लिए बचपन की किताबें कागजों से उतनी नहीं बनती हैं जितनी उनके संघर्ष, मोहल्लों, माहौल और जगह से बनती हैं. उनकी लिखाई में वे जगहें आपको सुरक्षित मिलेंगी। आप शायद महसूस करें कि साहित्य के उत्पादक और उपभोक्ता, अभिलेखन/रिकाॅर्डिंग और सृजन, कि़स्सा और तथ्य के बीच के अंतर यहाँ धुंधले पड़ जाते हैं साहित्य के सुरक्षित-आरक्षित डिब्बे में घुस आये इन घुसपैठियों को आप कैसे बरतेंगे, यह आप ही को तय करना है.

प्यास और पानी, सौजन्य: अंकुर

प्यास और पानी, सौजन्य: अंकुर

लिखने वाली चिट्ठी

पढ़ने वाली चिट्ठी

By  लख्मी चंद कोहली

पिछले साल जो बस्ती तोड़ी गई तो कई ज़िंदगियां और रोजगार जैसे धराशायी हो गये। सुल्तान भाई का भी किताबों पर जिल्द चढ़ाने का काम बंद हो गया। उर्दू मे लिखी कहानियाँ और आयतों को मजबूत जिल्द देना और उन्हें पढ़ना सुल्तान भाई के जीवन का एक खूबसूरत मकसद बन गया था। अब सड़क के किनारे, जहां पर कभी वो अपना खाली वक्त बिताया करते थे, वहीं पर रेहड़ी लगा ली। कचोरियों को गरम आलू की सब्जी के साथ बेचने की।

जगह ऐसी थी कि रेहड़ी लगाने से पहले सड़क को झाड़ू मारते वक्त अक्सर उन्हे रेहड़ी के नीचे और आसपास कुछ पड़ा मिल ही जाता। उसे वो रख लिया करते थे। ऐसी ही चीज़ों से उनका घर भरा पड़ा था। कभी पर्स तो कभी कोई फॉर्म या कोई किताब। एक बार तो उन्हें किसी की डायरी ही मिल गई थी। उसपर अनेकों टेलीफोन नंबर लिखे हुये थे। उन्हीं नम्बरों पर फ़ोन कर करके उन्होनें उस आदमी को घर बुला लिया था जिसकी वो डायरी थी।

अभी रेहड़ी जमाने के लिए सड़क को साफ कर ही रहे थे कि उन्हें कुछ पन्ने मिल गए जिनको पूरा का पूरा टेप लपेटे हुए था। खोल कर देखने के लिये सुल्तान भाई का मन उनकी तरफ मे खींच गया। चार पन्नों का पूरा चिट्ठा था जिसे स्टेपलर से एक कोने में जोड़ा गया था और ऊपर से टेप लगा दी गयी थी। कागज के पन्नो पर सुल्तान भाई अपनी निगाह मार चुके थे। तारीख उसपर दो साल पुरानी थी। बीच–बीच में छेदों से भरा हुआ था। स्याही फैल चुकी थी। कुछ – कुछ जगह से तो मिटा-सा भी महसूस हो रहा था लेकिन पढ़ने वाले को कोई परेशानी होगी नहीं, ऐसा वे अन्दाज़ लगा रहे थे। तीसरा पन्ना तो एक दम सफेद था, शायद अलग से जोड़ा गया होगा, मगर सबसे आगे और सबसे पीछे के पन्ने की हालत बहुत ही ज्यादा खस्ता हो चुकी थी।

लगता ही नहीं कि कभी किसी ने इसे पढ़ा भी होगा, यह तो छोड़ो, आज से पहले शायद इसे खोला तक भी नहीं गया होगा। यह भी हो सकता है कि पढ़ने वाले ने पढ़ने के बाद टेप लगाई हो। जो भी हो, लेकिन किसी के दिल की बात होगी इसमें। वे यही सब सोचने में लग गये थे।

ख़त देवनागरी में लिखे गए थे जिनको पढ़ना उनके बस के बाहर था। अगर उर्दू लिपि में लिखाई होती तो उनके लिए कोई मुश्किल नहीं थी। वो अभी के अभी पढ़ने के लिए बैठ जाते। लेकिन अब तो बस, उसमें लिखे शब्दों को पहचानने की कोशिश कर रहे थे। और बड़े नाज़ुक अहसास से उसे अपने हाथों में थामे खड़े थे।

रेहड़ी पर कचौड़ी खाने वालों की भीड़ लग रही थी। आज अपने ग्राहकों को देखने का नज़रिया सुल्तान भाई का कुछ और ही बनता दिख रहा था, वे यही सोच रहे थे कि किससे ये चार पन्ने पढ़वायें। जब भी कोई अकेला आता दिखता तो वो सोचते कि इनसे ही पढ़वा लेता हूँ, मगर ऐसा हो नहीं पाता। हिम्मत करते और खुद को रोक लेते। बस वो यही सोचते रहे और सबकी प्लेट बनाते रहे।

आज आधा घन्टा पहले ही सब कुछ निबट गया। घर के पास में रमेश भाई मिलेगें, उन्हीं से ये पन्ने पढ़वाऊंगा। उन्हें भी तो बहुत सारी चीज़ें पढ़ने का चस्का है। जब देखो कुछ न कुछ पढ़ते ही रहते हैं। वे ही पढ़ सकते हैं। जल्दी – जल्दी रेहड़ी को धकेलते हुये वे घर की तरफ आ गये। पूरी गली में सिर्फ कोने पर ही लाइट खुली थी, बाकी जगह पर अंधेरा था।

रमेश भाई अपनी ख़ाट के नीचे लेटे कुत्ते को पानी पिला रहे थे। इस वक़्त में अगर उनके पास कोई आता है तो वो कुछ नहीं कहते। बस, उनका कुत्ता ही आने वाले को जवाब देता है। सुल्तान भाई भी यह बात भली-भांति जानते थे। वे रमेश भाई के पास आये और बोले, “रमेश भाई आपसे एक इल्तज़ा है। ज़रा ये पन्ने पढ़ देगें? रेहड़ी के पास ये पड़े मिले। इसे पढ़ने का बड़ा मन हो रहा है।”

रमेश भाई तो पहले से ही पढ़ने के चस्के के शिकार हैं। रात में नींद लाने के लिए और सुबह जागने के लिये, बस कुछ मिल जाये पढ़ने के लिये। उन पन्नों को हल्के हाथ से संभालते हुये वे बोले, “अबे कितने साल पुराने हैं, इनका तो दम ही निकला हुआ है?”

सुल्तान भाई इस बात का जवाब देते हुये फ़ौरन बोले, “भाई जान, दो साल पुराने हैं। तभी तो इसे सुनने की इच्छा हो रही है।”

रमेश भाई ने उनकी तरफ देखते हुये कहा, “सब कुछ बदल गया सुल्तान मगर तू नहीं बदला।”

उन्होंने पन्ने पूरे खोल लिये। एक निगाह मारते हुए थोड़ा मुस्कुराने लगे। बिना कुछ बोले ही लिखे शब्दों को पढ़ने लगे –

अंकित, मुझे पता है तुम मुझसे बहुत परेशान हो गए हो। लेकिन मैं क्या करूँ, मुझे तुमसे इतना प्यार है कि मैं तुम्हारी एक पल की भी रूस्वाई सहन नहीं कर सकती। मेरे कारण तुम्हें अपने कई काम छोड़ने पड़े हैं, ये भी जानती हूँ। तुमसे हर बात पर सवाल करती हूँ और अपने पास तुम्हें नहीं पाकर परेशान और जिद्दी हो जाती हूँ। मैं जब तक तुमसे बात नहीं कर लेती, चैन से रह नहीं पाती। मैं चाहूँ तो पूरे दिन कईयों से बातें कर सकती हूँ, और करती भी हूँ। मगर क्या, मैं जब भी तुमसे बातें करूँ तो बस तुम्हारे परिवार के बारे मे ही पूछूं? क्या मैं कुछ और नहीं पूछ सकती? जो बीत गया वो तो गया, अब हम आगे की बात कर सकते हैं। मैं पिछले कई दिनों से तुमसे बहुत सारी बातें करना चाहती थी लेकिन हमारा मिलना ही नहीं हो पाया। मैं जब तुमसे बात करती हूँ तो कई तरह की बातें जो कहना चाहती हूँ मगर मिस कर जाती हूँ. जब बातें करती हूँ तो बोलते – बोलते रूक जाती हूँ, मुझे बात कहने नहीं आती और वही जब मैं तुम्हें लिखकर कहती हूँ तो बहुत सारी बातें लिखने का मन होता है। अबकी बार हम जब मिलेगें तो यूँही लिखकर–लिखकर बातें करेगें। मजा आयेगा। मेरी सारी सहेलियाँ यूहीं स्कूल में लिख लिखकर बातें करती हैं।

इतना पढ़ना ही था कि बिजली ने साथ छोड़ दिया, वे एक दूसरे को यूँही देखते रह गये। इस वक़्त दोनों के मन में उस ख़त को पूरा पढ़ने की इच्छा उमड़ रही थी। रमेश भाई ने अपनी जेब से एक माचिस निकाली और सुल्तान भाई को बीच–बीच मे जलाते रहने को कहा। एक तिली जली और पढ़ना फिर से शुरू हुआ।

तुम मेरी बातों को गलत मत लेना – और मुझे भी गलत मत समझना। बहुत प्यार करती हूँ तुमसे। चाहो तो मेरा इम्तिहान भी ले सकते हो। मैं बस, कुछ कहना चाहती हूँ।

पहली तिली खत्म हो चुकी थी , एक और जली

बहुत हिम्मत करके ये बता रही हूँ मैं तुम्हें, सोचो कि ये बातें मैंने पहले क्यों नहीं बताई? या समझो कि ऐसी बातें मैं सबको कहती फिरती हूँ।

दूसरी तिली भी खत्म हो चुकी थी। चारों तरफ सन्नाटा और गहरा हो गया। एक – दूसरे के पास अल्फाज़ नहीं थे कुछ कहने लिये भी। दोनों एक – दूसरे का मुँह देखते रहे। कुछ देर के लिये दोनों के बीच में खामोशी रही – इस इंतजार में कि शायद बिजली अभी आ जायेगी। लेकिन शायद अब यह होने वाला नहीं था। रोड की बिजली भी तो गई थी। लगभग आधा घंटा बैठने के बाद मे दोनों ने फैसला किया कि बाकी का कल पढेंगे। बिना कुछ बात किये वे अपने – अपने घरों में चले आये।

सुल्तान भाई रेहड़ी पर गीला कपड़ा मारकर लेट गये। न जाने कितनी बार उन्होंने उन लाइनों को दोहराया था जिन्हें माचिस की रोशनी में सुना था, शायद आखिरी बार वही सुना था – इसलिये वही घूम रहा था। इंतजार, आने वाले कल का था।

***

सुबह का आलम बिलकुल वैसा ही था जैसा रोज़ होता था। आज सुलतान भाई की आँख काफी पहले ही खुल चुकी थी। बेगम साहिबा रेहड़ी लगाने का समान बनाने की तैयारी में लगी हुई थीं। पर सुल्तान भाई ख़तों को अपनी जेब में रखे बाकी का हिस्सा सुनने के लिए बेकरार थे। वो अंदाज़ा लगा रहे थे कि पन्ने की लाइनों में वो लड़की कौन होगी, कैसी होगी? शायद 20 या 21 साल की होगी। लिखते वक्त उसकी आँखों में पानी उतरा हुआ होगा। इस सब के बाद भी उनको लड़के का चेहरा साफ – साफ नज़र नहीं आ रहा था। फिर भी वो अंकित का चेहरा बनाने लगे। उसकी उम्र सोचने लगे।

सुल्तान भाई ने अपनी बेगम को समान रखने को कहा और वे वहाँ से रमेश भाई की घर की तरफ चल दिये। रमेश भाई के घर का दरवाजा बंद था। वे वहीं बैठ गए। अब उन्हे इंतजार था रमेश भाई के आने का। अबकी बार वो पूरा ही सुनकर जायेंगे। ये वो ठान चुके थे।

कुछ ही देर के बाद रमेश भाई आये और बोले, “अरे सुल्तान, तू यहाँ कैसे बैठा है? तुझे देखकर लगता है, तू सोया ही नहीं रात भर।“

सुल्तान भाई ने पन्ना हाथ में देते हुए कहा, “सुना दीजिये रमेश भाई।”

रमेश भाई मुस्कुराए, पन्ना खोला और पढ़ना शुरु कर दिया।

मैं थोड़ी सी पागल हूँ। चीजों को समझने मे जितना वक़्त लगाती हूँ उतना ही उन्हें भुलाने में भी। मैं अपने यहाँ के रिश्तों को समझ नहीं पा रही हूँ। कब कौन सा रिश्ता मुझ पर अपना रौब जमाने लग जाता है, पता ही नहीं चलता। पहले कहते हैं ये कर, वो कर और जब करने की ठान लो तो कहते है छोड़ दो। ये कहाँ की बात है? बता सकते हो? सच बताऊँ, मैं जैसे जीना चाहती हूँ वैसे जी नहीं पाती। मैं तो तोते की तरह जीना चाहती हूँ, उसे लोग बेबफा कहते हैं – लेकिन उसकी असली बात मैं तुम्हें बताऊँ, वह किसी भी रिश्ते मे फँसकर रहना नहीं चाहता – सबके बीच में रहेगा, बोलना सीखेगा, खाना खायेगा, और तो और गाना भी गायेगा, लेकिन मौका पाते ही उड़ जाता है। फिर किसी और के यहाँ भी यही सब करता है। कितना अच्छा हो कि हर कोई ऐसा हो?

रमेश भाई सुल्तान की तरफ देखते जा रहे थे। लेकिन सुल्तान भाई को इससे कोई वास्ता नहीं था। उनको तो बस, ये पूरा सुनना था कि आख़िर में होना क्या है? यह पूरा ही उनके जीवन से बिलकुल परे था। उनकी जिज्ञासा देखकर रमेश भाई मुस्कुरा दिये। वो बिना रुके पढ़ते गए।

कल मेरी एक बहुत पुरानी सहेली मुझसे मिलने आई, उसकी शादी हो चुकी है। वह जब मुझसे बात कर रही थी तो पता है, मैंने उसे यही कह दिया कि पागल तोते की तरह जी। सही किया न मैनें? वह हर वक़्त किसी न किसी दिन को याद करती रहती है, कभी अच्छे बीते दिन तो कभी बुरे दिन। अच्छे दिनों को बुरे दिनो का जवाब बना देगी और बुरे दिनों को अच्छे दिनों का। मेरी तो कुछ समझ मे नहीं आता। लेकिन तुमको तो मेरी बातें समझ में आती है न! कोई है ही नहीं जिसे मैं अपनी बातों को बता कर उसे मानने के लिए कहूँ? तुम बता सकते हो कि तुम कितनों को अपनी बातों को मानने के लिए कहते हो? मैं बताऊँ – तुम तो कह ही नहीं पाते होगे, तुम तो बस, काम-काम और काम के कीड़े की तरह से जीते हो, कभी उससे कुछ देर के लिए बाहर निकलकर देखो, तुम्हें कितने लोग देखते हैं? मालूम है तुम जब मेरी गली से निकलते हो तो कितने लोग तुम्हे देखते हैं? बता सकते हो!

पढ़ने वाले रमेश भाई तो रुकने का नाम ही नहीं ले रहे थे। उनके मन मे तो उन शब्दों की जैसे माला-सी पिरोती जा रही थी। दोनों एक सुर लगाए बस उस खत में छुपे एहसास में डूबे हुये थे।

तुम कभी समझ पाओगे या नहीं मेरी इन सारी बातों को, लेकिन मैं हमेशा से बस हर बात तुमको बता देना चाहती हूँ। मैंने बहुत कुछ सुना और देखा है, लेकिन शायद वे सब अब भी मुझे कम लगते हैं। सच कहूँ तो मैं किसी भी तरह के रिश्तेदारियों को समझना नहीं चाहती। हाँ, मैं उनके बीच में रहकर जीना चाहती हूँ, लेकिन रिश्तेदारी से थोड़ा दूर। तुम सोचोगे कि ये लड़की अगर मेरे घर मे आ गई तो क्या होगा? रिश्तेदारों के बीच मे रहने के लिये उनको समझना क्या जरूरी होता है? इसे ज़रा समझाना। यह सब मैं लिखकर ही तुम्हें बता सकती हूँ। इसीलिए सब कुछ लिखने की कोशिश कर रही हूँ । पर एक बात बताऊँ, मुझे डर भी है बहुत – न जाने तुम क्या सोचोगे मेरे बारे में! डर मुझे इस बात का नहीं है कि तुम मुझे छोड़ दोगे। मुझे डर बस इसका है कि तुम भी मेरी बात नहीं समझ पाओगे।

रमेश भाई पढ़ना बंद करते हुये बोले, “आगे की लाइनें तो बहुत ही धुंधली हैं कैसे पढूँ?” सुल्तान भाई के मन में बिलकुल चैन नहीं था। वो तो उनसे पढ़वा कर ही छोड़ेंगे। वो कहने लगे, “क्या फायदा फिर पढ़ाई का रमेश भाई? साफ साफ तो सभी पढ़ लेते हैं। धुंधले अक्षरों को पढ़ना ही तो पढ़ाई है। कोशिश तो करो।”

रमेश भाई रुक-रुक और अटक-अटक कर पढ़ने लगे।

इसलिये मैं तुम्हें ये लिख तो रही हूँ लेकिन भेजूँगी नहीं, यह सदा मेरे पास ही रहेगा, जब मैं यह दुनिया छोड़कर जाऊँगी तब तुम्हे देकर जाऊँगी, क्योंकि ये बातें मैं खुद में रखकर इसको ज़िन्दा दबोचना चाहती नहीं। एक दिन तो तुम्हें जरूर बताऊँगी।

मैं सदा तुमसे इतना ही प्यार करूँगी

जैसे एक ही पल में सब कुछ बीत गया। पन्नों के अन्दर की बातों का सारा अहसास उस एक पल में बस गया। दोनों के पास कुछ शब्द ही नहीं बचे थे। सुल्तान भाई और रमेश भाई उस ख़त के राज़ों के चोर बन गये थे। दोनों एक दूसरे को देखते रहे। फिर बिना कुछ बोले सुल्तान भाई ने पन्ने लिए और अपने घर की ओर चल दिये।

घर पहुंचे तो घर में बिलकुल शांति थी। रेहड़ी का समान बन चुका था। बेगम रेहड़ी के समान से फ़ारिग होकर सुबह का नाश्ता बना रही थी। सुल्तान भाई ने उनसे कुछ पूछना चाहा लेकिन वह सवाल ऐसे तुरंत ही पूछ नहीं सकते थे तो पहले चाय मांगी, फिर उन्होंने बात करने की कोशिश मे पूछा, “एक बात मैं पूछूँ तुमसे?

उनकी बेगम बोली, “हाँ जी, पूछिये?”

“ज़रा बताना, तुम अपने मन की बात किससे करती हो?”

बेगम साहिबा चुप सुल्तान भाई को देखने लगी।

सुल्तान भाई ने फिर पूछा, “जब तुम अपनी सहेलियों से मिलती हो तो क्या बातें करती हो?” उन्होंने चाय की चुसकियाँ भरना शुरू किया।

बेगम उनकी तरफ कुछ देर देखती रही कि आज से पहले तो इन्होंने कभी इस तरह के सवाल नहीं किए, ये इन्हे आज क्या हुआ? पर वो बोली, “जी, ज़्यादा बात करने का मन ही नहीं होता। बस, इधर -उधर की ही बातें होती हैं। कभी पुरानी सहेलियों की बातें तो कभी घर–परिवार की, अगर कोई सहेली कहीं घूमने – वूमने चली जाती है तो वहाँ के बारे में बताती है।”

सुल्तान भाई बोले, “अच्छा, पहले जब तुम सहेलियों से बातें करती थी, जब शादी नहीं हुई थी और अब जब करती हो तो तुमको कुछ फ़र्क लगता है?”

“फ़र्क तो है, लेकिन पहले भी बढ़िया था, आज भी बढ़िया है।” उनकी बेगम बात को टालते हुये बोली।

सुल्तान भाई कहने लगे, “जब हम अकेले होते हैं तो ज्यादा अच्छा होता है, जब रिश्तेदारियों में फँस जाते हैं तो सब कुछ बुरा होने लगता है- है ना! तुम जब अपनी सहेलियों को अपने आज के दिनों के बारे में बताती होगीं तो वो क्या कहती हैं?”

“सब अपने-अपने तरीके से समझाती हैं। सब कहती हैं, ऐसे जियो, वैसे जियो – हर कोई चाहती है कि उसकी तरह जियें, हमें मालूम है कि हमें कैसे जीना है?”

“तुम किस तरह जीना चाहती हो बता सकती हो?”

सुल्तान भाई की बेगम बोली, “हमें चिड़िया की तरह जीना चाहिए, जो अपने बच्चो को उड़ना सिखाती है, खाना सिखाती है फिर एक दिन उन्हे छोड़ देती है ताकि वो खुद से जीना सीख लें। सही है न जी!” आज से पहले शायद उन्होनें कभी ऐसी कोई बात नहीं की होगी लेकिन आज बातों ही बातों वो बोल गई।

सुल्तान भाई ख़त में क़ैद तोते के बारे में सोचने लगे। ख़त को पढ़कर जैसे बातचीत कि नई गाँठे खुल गई थी। गाठें जो सुल्तान भाई और उनकी बेगम के रिश्ते के बीच बंधी हुई थी। ख़त के अंदर छुपी दास्तां सुल्तान भाई से भी उतना ही वास्ता रखती थी।

अपनी रेहड़ी को संभाल कर सुल्तान भाई अपने ठीये पर पहुँच गए। आसपास खड़े लोगों में उस चेहरे को तलाशना बेकार था। ख़त के किरदार पहचान में नहीं थे और शायद न ही वो भीड़ में मौजूद थे। पर शाम को बेगम साहिबा से होने वाली बातचीत में शायद नए सवाल जुड़ जाये।

समाप्त

लख्मी चंद कोहली

लख्मी चंद कोहली

 

स्कूल पास करने के बाद लख्मी ने शहर में तरह तरह के काम किए हैं। 2001 से अंकुर के नियमित संवादक। इनके लेख बहुरूपिया शहर (राजकमल प्रकाशन 2007) में प्रकाशित हुये। ‘एक शहर है’ नामक ब्लॉग में नियमित लिखते हैं। संपर्क : Email : lakhmikohli@gmail.com Phone : 9811535505

 

 

साभार: हंस, फरवरी, 2015

सुबह वाकई बेनकाब थी उर्फ अंसारी जी: टीना नेगी 

बच्चों द्वारा अपने सपने खुद बुनने को प्रोत्साहन देने में देश-दुनिया के गिने-चुने लोग ही सक्रिय हैं. इन्हीं में एक संस्था है ‘अंकुर सोसायटी फाॅर आॅल्टरनेटिव्ज़ इन एजुकेशन.’ दिल्ली के इर्द-गिर्द मजदूर बस्तियों में शैक्षणिक केंद्र चलाने वाली इस संस्था से जुड़े लोगों को जब लगा कि इन समाजों के अनुभव और अनुभूतियां शब्दों की दुनिया में सीधे पहुंचनी चाहिए और अब तक कहानी में पात्र भर रहे चरित्र यदि स्वयं अपनी बात कहें तो बेहतर होगा. बस! एक नई सकारात्मक शुरुआत हो गई. इन लोगों ने अपने शैक्षणिक केंद्रों के बाल-किशोर भागीदारों को लिखने के लिए उत्साहित और प्रेरित किया समय-समय पर लेखकीय कार्यशालाएं आयोजित कीं. धीरे-धीरे नतीजे सामने आने लगे. ‘अंकुर’ की शर्मिला भगत और प्रभात कुमार झा के प्रयासों से ‘बहुरूपिया शहर’(राजकमल प्रकाशन 2007), यशोदा सिंह की किताब दस्तक’(वाणी प्रकाशन 2012) और ‘अकार’ का 2014 का विशेषांक पाठकों के सामने है. हंस को उदय शंकर के माध्यम से उनकी कुछ रचनाएं देखने को मिलीं. हम इन किशोरों के लेखन-कौशल पर चमत्कृत रह गए. रचनाजी, बलवंत कौर और विभासजी के साथ मिलकर यह तय हुआ कि ‘घुसपैठिये’ शीर्षक से देश भर में हाशिए पर पड़े समाजों में हो रहे युवा लेखन को हम पाठकों के सामने लाएं-बगैर किसी मुरौवत के. इसी क्रम में इस अंक में प्रस्तुत है टीना नेगी की कहानी ‘‘सुबह वाकई बेनकाब थी उर्फ अंसारी जी’’. # संजय सहाय, (संपादक, हंस )

यह स्तम्भ दिल्ली और आसपास की कामगार बस्तियों के तरुण-युवा लेखकों की प्रतिनिधि रचनाएं आप तक पहुंचाएगा. ये लेखक और इनका लेखन बने-बनाए खांचों में नहीं समाते. ‘घुसपैठिये’ स्तम्भ के लेखक अभी-अभी जवान हुए हैं या हो रहे हैं. एकाध को छोड़कर इसके सभी संभावित लेखकों की उम्र २0 वर्ष के अंदर ही है। लेकिन इन सब में कुछ सामान्य विशेषताएँ भी हैं. सभी की आर्थिक-सामाजिक पृष्ठभूमि लगभग समान हैं। इससे भी बड़ी विशेषता यह है कि इनके लिए बचपन की किताबें कागजों से उतनी नहीं बनती हैं जितनी उनके संघर्ष, मोहल्लों, माहौल और जगह से बनती हैं. उनकी लिखाई में वे जगहें आपको सुरक्षित मिलेंगी। आप शायद महसूस करें कि साहित्य के उत्पादक और उपभोक्ता, अभिलेखन/रिकाॅर्डिंग और सृजन, कि़स्सा और तथ्य के बीच के अंतर यहाँ धुंधले पड़ जाते हैं साहित्य के सुरक्षित-आरक्षित डिब्बे में घुस आये इन घुसपैठियों को आप कैसे बरतेंगे, यह आप ही को तय करना है. # घुसपैठिये स्तम्भ -परिचय 

दक्षिणपुरी की एक रसोई सौजन्य: अंकुर

दक्षिणपुरी की एक रसोई, सौजन्य: अंकुर

अंसारी जी

By टीना नेगी 

सुबह के साढ़े पाँच बजे, जब अँधेरा भूरा होने लगता है और सपाट आसमान में हल्के नीले बादल दरारें बनाकर उभरने लगते हैं तब अंसारी जी के मोहल्ले में सब कुछ रोज़ाना वाली एक-सी धुन में शुरू हो जाता है। घुर्र-घुर्र करती पानी की मोटरों से घरों की दीवारें और ज़मीन झन्नाटें लेने लगती हैं। चबूतरों पर पानी की बाल्टियाँ उड़ेल दी जाती हैं, नहीं तो पाइप से छूटती ताजे पानी की दूधिया धार सारा आँगन भिगोती हुई गली में उतर आती हैं और सींक वाली झाडुओं का ज़बरदस्त संगीत एक साथ नहीं तो एक के बाद एक सुनाई देने लगता। इस बीच अंसारी जी उबासियाँ लेते हुए अपने पुराने, जर्जर मकान की बालकनी पर खड़े होकर मोहल्ले भर को निहारते हैं।

‘या अल्लाह’ कहते हुए जब उनकी मोटी-मोटी अकड़ी हुई साँवली बाँहों से अंगड़ाई फूटती है तब पड़ोस की औरतों की नज़रें भी उस बालकनी की तरफ़ उठ जाती हैं। चेहरे पर घूँघट और दरवाज़े के पल्ले खींच लिए जाते हैं, शर्म और लिहाज़ की ये झलकियाँ दो जगह और दो माहौल को जैसे एक फ़ासला दे देती हैं। अंसारी जी अपनी मूंछों पर ताव देते हुए एक अजीब अभिमान के साथ हँसते हैं, जैसे उनका कोई छोड़ा हुआ तीर बिल्कुल सटीक निशाने पर लग गया हो। कमर पर चेकदार सूती धोती, कुछ-कुछ लंगोट की तरह बाँध लेते हैं और अर्द्धनग्न सी अवस्था में अपने बेडौल शरीर के साथ वहीं बालकनी पर झुक जाते हैं। कमरे में रखे रेडियो के बजने की आवाज़ आती है। सत्तर के दशक के गाने तेज़ आवाज़ में बजने लगते हैं। आसपास को जबरन जागने पर मजबूर करता हुआ यह शोर अक्सर पड़ोसियों से झगड़े की वजह बनता है पर हफ्ते दस दिन बाद रेडियो फिर से बजने लगता है और अंसारी जी का गला भी, जो सातो सुर लगाकर गाने की कोशिश करता है। औरतें घूँघट की आड़ से बड़बड़ाती हैं, कनखियों से देखकर ताने देती हैं, मर्द जात से कौन बोले, सोचकर मुँह नहीं लगाती।

अंसारी जी की साइकिल के स्टैण्ड से उतरने की आवाज़ आती है और बेटी मासूमा चिल्लाती है, ‘अब्बूजान हमारे लिए अख़बार लेते आना!’ तब अंसारी जी के दफ़्तर जाने का पैग़ाम मिल जाता है। घंटे भर में पड़ोसन  शबनम बेगम को घेरते हुए कहती हैं, ‘समझाती क्यों नहीं अपने मियां को! सुबह-सुबह सबकी नींद हराम करता है।’ इस बात पर उनकी आपस में झड़प हो जाती है। शबनम बेगम सौ बराबर एक का काम करती हैं। अंसारी जी की हर मुमकिन हिमायत लेती हैं फिर चाहे हफ्ते भर सहेलियाँ पास न बुलाएँ पर शौहर से बढ़कर कुछ नहीं समझती हैं।

सत्रह गज ज़मीन पर खड़ी एक खोकेनुमा दुकान के उपर बने उनके दुमंजिला मकान की कुछ यही तस्वीर और कहानी रही है। अंसारी जी के घर की खिड़कियों और दरवाज़ों से धूप और हवा के अलावा शायद ही कोई बेरोक-टोक सफ़र करता है।

‘सरकारी नौकर हैं’ कहकर ख़ुद को देश की सेवा में लगा बताते हैं और अंसारी जी पाँच बजे तक की ड्यूटी पूरी लगन से निपटाकर दो बजे ही लौट आते हैं। उसके बाद दोपहर घर में और शाम गली में गुज़रती है। वही सत्तर के दशक के गाने रेडियो में गूँज पड़ते हैं। घर के आगे चारपाई डालते हैं और हाथ में चाय का कप लिए वहीं बैठ जाते हैं। आदमियों से कम ही बोलचाल रखते हैं पर हर गुज़रती महिला से दुआ-सलाम जरूर करते हैं। उम्र में जिनसे छोटे हैं और रिश्ते में जिनके भाईजान, उनसे तो हँसी-ठिठोली भी खूब होती है, जैसे सामने वाले घर में रहने वाली मधु बहन, इनसे मज़ाक करने को अंसारी जी की आदत कहें, या शौक, या उनके मिज़ाज़ का ही हिस्सा। जब तक मधु को मधुबाला कहते हुए उससे एक गिलास ठंडा पानी नहीं माँगते तब तक अंसारी जी का दिन नहीं बनता। शबनम बेगम ऊपर से अंसारी जी की हर आवाज़ पर कान जमाए रखती है। कभी चाय तो कभी पकौड़े के बहाने अपने मियाँ को घर की चैखट की तरफ़ खींचती रहती हैं। मन में खटका-सा लगा रहता है क्योंकि अपने शौहर के मिजाज वह जानती है।

नहाने के बाद गीले बदन ही अंसारी जी शाम को दोबारा घर के बाहर चारपाई पर जम जाते हैं। चारपाई का सिरहाना मधु के घर की चैखट के ठीक सामने लगाते हैं। फिर शरीर की मांसपेशियाँ तानकर कुछ इतने ज़ोर से अंगड़ाई लेते हैं कि गुद्दी पर टिकी पानी की बूंदें कमर पर फिसलने लगती हैं। चारपाई की रस्सियाँ चटख कर कर्र-सा शोर करती हैं। आसपास खेलते बच्चे अपना ठिकाना कुछ दूर जमा लेते हैं। शाम के उस माहौल में अजीब-सी गर्माहट भर आती है। अंसारी जी चारपाई पर लेट कर मस्ताने अंदाज़ में गीत गुनगुनाने लगते हैं, ‘जिंदगी एक सफर है सुहाना, यहाँ कल क्या हो किसने है जाना…’ या फिर ‘ये दिल तुम बिन कहीं लगता नहीं, अब क्या करें…’। अंसारी जी की आँखें चारों तरफ़ कुछ ऐसे घूमती हैं जैसे माहौल से कुछ छाँट या बीन रही हांे। कुछ ऐसा ढूंढ़ रहीं हों जिसे टिक कर निहारा जा सके, जिससे बतियाया जा सके।

बेटी मासूमा जब अब्बूजान को गली में गाता हुआ सुनती है तो घर में बजता रेडियो बंद कर देती है और फरमाती है ‘अब्बूजान आप ख़ुद ही गा लीजिए! अच्छा गाते हैं’ कहकर वो अपनी पोथी-पुस्तकों में उलझ जाती है। अब्बू जो हर दिन उसे अख़बार लाकर देते हैं, उन अख़बारों से उसकी अलमारी का नीचे वाला ख़ाना भर चुका है। वह अख़बार को ज़्यादा नहीं पढ़ती, बस उसके तीसरे पन्ने पर आने वाले कैरियर विकल्प पढ़ती है और डायरी में एक फेहरिश्त बनाती जाती है कि बड़ी होकर क्या बनेगी! इससे भी उब जाती है तो सारे अख़बार निकालकर हीरो-हीरोइन की फ़ोटो की कटिंग शुरू कर देती है पर ऐसा वह सिर्फ़ तब करती है जब अब्बूजान घर पर नहीं होते। इसलिए अब्बूजान सिर्फ़ उसकी उस फेहरिश्त के बारे में ही जानते हैं जिसे रात को उनके कंधों पर लटक कर वो दिखाती है और बताती है- ‘‘देखिए, अब्बूजान! हमने डायटीशियन के कोर्स के बारे में पढ़ा है। हमें तो यही कराइयेगा!’’ अब्बूजान भी मासूमा की नर्म हथेलियाँ थाम कर बड़े प्यार से ‘हाँ’ में सिर हिला देते। उनकी चुप्पी और मुस्कुराहट उन हज़ार सपनों की गवाही देती है जो वह मासूमा के लिए देखते हैं। उनके लाए अख़बारों का सही इस्तेमाल मासूमा ही जानती है, ऐसा वह सोचते तो फ़क्र से फूल जाते हैं।

एक रोज़ सर्द शाम को जब गली हल्की धुंध में ढकी हुई थी। सभी मकानों के बंद दरवाज़ें, खिड़कियों पर डाले परदे अपना उजाला अपने में ही समेट कर बैठे थे। गली का शोर भी जैसे शांत होकर उस शाम सिकुड़ गया था। कई चबूतरों पर शाम की दावत की तैयारी चल रही थी। इन चूल्हों और तसलों से उठता धुंआ कोहरे में घुल-मिलकर शाम को और धुंधला बना रहा था। अंसारी जी भी अपने कमरे की हीटर वाली गर्माहट को अलविदा कहकर बाहर निकले। हाथ में चाय का कप था पर होठों पर कोई गीत नहीं। इस ठंडी शाम भी उनके बदन पर सिर्फ़ एक धोती थी और गीले बालों में पानी की बूँदें मोती की तरह चमक रही थीं। सीढ़ी से उतरते ही उन्होंने चारपाई को हाथ से गिराकर घर के सामने बिछा दिया और हमेशा की तरह उस पर तनकर बैठ गए। आँखों ने मधु के घर के दरवाज़े की तरफ़ देखा जो कि बंद था। दरवाज़े के पीछे वाला परदा भी चैखट पर सरका हुआ था। अंसारी जी दरवाज़े की झिर्री से भी अंधेरे के सिवा कुछ और नहीं टटोल पा रहे थे। ऊपर शबनम बेगम भी चूल्हे-चैके में जुटी हुई थी। मासूमा अम्मी का हाथ बँटाते हुए तरकारी काट रही थी। अब्बूजान ने कहा था कि अगर मासूमा तरकारी काटना सीख जाएगी तब इस ईद पर उसे शरारा दिलायेंगे। नीचे खामोश बैठे अंसारी जी की नज़रें मधु को ढूंढ़ रही थीं। कान उस सन्नाटे से जैसे चिढ़ बैठे थे और कहीं से आती चूडि़यों की खनक पर गर्दन तुरंत घूम जाती थी। यहाँ शबनम बेगम का सारा ध्यान अंसारी जी पर सिमटा हुआ था। उनकी आवाज़ उसे नीचे के माहौल का अंदाज़ा देती थी पर आज वह भी नहीं सुन पायी थी। मधु के घर का बंद दरवाज़ा देखकर अंसारी जी की बेताबी बढ़ती जा रही थी। जाड़े की ठंड में भी माथा पसीने से गीला था कि अचानक चारपाई से उठकर सीढि़याँ चढ़ते हुए उन्होंने करारी आवाज़ में पुकारा, ‘शब्बो ज़रा टांड से तसला उतार, मैं आता हूँ! इस जाड़े का कुछ तो इंतज़ाम करना ही पड़ेगा!’ शबनम बेगम ने आवाज़ सुनते ही चूल्हा बुझा दिया और स्टूल को टांड की तरफ़ खिसका दिया और फट से चढ़कर तसला उतार लाई। जब तक अंसारी जी ऊपर आए वह उनके लिए तसला लेकर तैयार खड़ी थी। अंसारी जी ने बिना किसी भाव के अपनी शब्बो की तरफ़ देखा, तसला और चैखट के पास रखा कोयले का कट्टा लेकर नीचे उतरने लगे। जाते-जाते आले में से माचिस भी उठा ली। पीछे से मासूमा ने पुकारा, ‘अब्बू देखिए हम तरकारी काटना सीख गए’। मासूमा की खनखनाती आवाज से ही मानो अंसारी जी के चेहरे पर बसंत खिल आता हो, वे मुस्कुराते हुए पलटे और बोले, ‘हाँ तो ठीक है, अब हम अपनी मासूमा के लिए शरारा भी ला सकते हैं और अच्छा शौहर भी!’ कहते हुए वे अपने सामान के साथ नीचे उतर गए। मासूमा शरारा सुनकर बेहद खुश हो गई, इसलिए चाकू-तरकारी छोड़ अम्मी की तरफ़ घूमी और बोली, ‘अम्मी, अब्बू अच्छा शौहर कहाँ से लायेंगे? ये अच्छा शौहर क्या होता है?’

शबनम बेगम की निग़ाहें अब तक सीढ़ी पर टिकी हुई थी और अंसारी जी की उन आंखों को याद कर रही थी जो उससे कुछ नहीं कहती थीं, कुछ नहीं सुनाती थीं, बस कायदे पढ़ाना जानती थीं। जब मासूमा की ‘अच्छे शौहर’ वाली बात पर शबनम का ध्यान गया तो लगा, क्या बेहुदा सवाल पूछ रही है ! ऐसी कोई चीज़ तो आज तक शब्बो को मिली ही नहीं। वह मासूमा पर झल्ला पड़ी और बोली, ‘नहीं मिलेगा अच्छा शौहर! क्योंकि तुम्हारे अब्बू उसे पहचानते ही नहीं है इसलिए तुम सिर्फ़ तरकारी काटो, तुम्हें ही अच्छी बेगम बनना पड़ेगा।’ कहकर शबनम फिर से चूल्हा जलाने लगी, पर अंदर से जैसे भभक उठी थी।

नीचे अंसारी जी तसले में आग जलाने में जुटे हुए थे। तसले में मुट्ठी भर-भर के कोयले झोंकते जा रहे थे, फिर मिट्टी का तेल छिड़ककर माचिस की तीली से आग सुलगा दी। पहले काला धुंआ उनके घर के आगे मंडराता रहा फिर आग की लपटें ऊँची और ऊँची होने लगीं। आग की उस रोशनी में अंसारी जी के चेहरे का तमतमाता हुआ तेज़ गुस्सा साफ़ नज़र आ रहा था। वे शांत, एकदम खामोश उस जलती हुई आग को देख रहे थे। कोहनियाँ घुटनों पर टिकाए हुए दोनों हाथों की उंगलियाँ एक-दूसरे में फँसाए बैठे थे। दाहिने कान में डली सोने की बाली भी चमक रही थी। तसला चारपाई से नीचे लटकते पैरों के पास रखा था, जिसे बार-बार पैर मार कर घुमा देते। दूर पनवाड़ी की दुकान के पास खेलते बच्चे ऐसा करते हुए अंसारी जी को ग़ौर से देख रहे थे।

गली के लगभग सभी चूल्हे बुझ चुके थे, औरतों ने रोटी पकाकर चूल्हों को अंदर कर लिए थे और किवाड़ लगा सभी अपने घरों में घुस गए थे। पर यहाँ अंसारी जी का मकान गली के एक चैथाई हिस्से में रोशनी बिखेर रहा था। ऊपरी मंजिल से बल्ब की पीली रोशनी बाहर फैल रही थी जो शबनम बेगम ने अंसारी जी के इंतज़ार में जलाई थी और नीचे जलती हुई आग का उजाला था जो सीधे मधु के घर को रोशन कर रहा था।

अचानक सामने वाले घर की चैखट का परदा हटा, कुंड़ी खोलने की आवाज़ आई और किसी ने एक झटके से दरवाज़ा खोल दिया। अंसारी जी की आँखें कुछ ऐसी बेसब्री से उठी जैसे कोई कबूतर फड़फड़ाकर अचानक किसी दूसरी जगह आ बैठा हो। उस रोशनी में अंसारी जी ने मधु के चबूतरे पर आकार लेती एक बड़ी सी नवयौवना काली परछाई देखी। परछाई, जो पास आते-आते और बड़ी, और बड़ी होने लगी। उन्होंने नज़र उठाकर सामने देखा तो मधु नई नवेली दुल्हन की तरह सजी-सँवरी सामने खड़ी थी। भारी कढ़ाई वाली साड़ी मानो कहर बरपा रही हो, और मेकअप से चमचमाते सफेद चेहरे पर जैसे धूप खिली हो। चमेली के सफेद फूलों वाला गजरा जूड़े में सजा हुआ और गुलाबी होंठ आज और सूर्ख होकर मुस्कुरा रहे थे। अंसारी जी जैसे सच में किसी खूबसूरत ख़्वाब को जी रहे थे। उनके आसपास का उजाला और ज़्यादा रोशन हो गया था। ठंड से ठिठुरते बदन में एक गुनगुना-सा अहसास भर गया था कि तभी घुँघट माथे पर सरका कर मधु ने अंसारी जी की तरफ़ देखा; इस देखने में एक ऐसी जल्दबाजी थी कि उसमें अंसारी जी का हाल-चाल लेने का या कुछ पूछने का कोई भाव नहीं था। मधु ने घूमकर अपने घर का दरवाज़ा बंद कर दिया, ताले में खटाखट चाबी घुमा दी और पलटकर अंसारी जी की तरफ़ चाबी का गुच्छा उछालते हुए बोली, ‘ज़रा ये शब्बो भाभी को दे दीजिएगा। हम घूमने जा रहे हैं। बाहर वे मेरा इंतज़ार करते होंगे!’ उसके लफ़्ज जिस तेज़ी से गूँजकर गुम हुए, उतनी ही तेजी से पायल की झनकार छोड़ते उसके कदम गली से बाहर हो लिए।

अंसारी जी की आँखें गली की आखिरी छोर तक मधु को निहारती रहीं। पायल की छन-छन में कान अब भी खोए हुए थे, लगता था कि वह मूरत अब भी सामने चबूतरे पर खड़ी है। ऊँची उठती आग की लपटों में यह आसानी से पढ़ा जा सकता था। उनकी आँखें की चैंधियाहट ऐसी थी कि कल्पना और काश के आसमान से उतरना आसान नहीं था। इस उजाले में वास्तविक जीवन का सादा चेहरा कहीं कोसो दूर खड़ा नज़र आता है, फिर उस चेहरे से मासूमा और शबनम दिखाई भी पड़ जाए तो भी कान उनकी पुकार को नकार देते।

उस रात ऊपरी मंजिल पर बल्व की पीली रोशनी यूं ही कायम रही। शब्बो न तो अपने मियाँ को ऊपर बुलाने के लिए पुकार पाई न मासूमा के उस सवाल का, कि ‘अच्छा शौहर क्या होता है’, कोई वाजि़ब जवाब दे पाई। रात भर ज़हन में तरह-तरह के सवाल कुलमुलाते रहे। करवटों के खेल में आसमान फिर से नीला हो गया।

गली में फूल-माला बेचने वालों, अख़बार वालों का आना शुरू हो गया था। चबूतरों पर फिर से चूल्हे जल उठे थे। अंसारी जी की बेढब काया सुबह चारपाई पर पड़ी खर्राटे ले रही थी। मिट्टी के लाल तवे पर रोटी थपक कर डालते हुए औरतें कनखियों से चारपाई पर पसरे हुए अंसारी जी पर भी एक नज़र डाल देतीं, और आपस में इशारे करते हुए फुसफुसाने लगतीं। कई बार हँसी के सुरीले ठहाके भी उस ओर से सुनाई दे जाते – ‘आज क्या हुआ शब्बो के मियां को! लगता है शब्बो ने रात घर में घुसने नहीं दिया।’ कहकर सारी की सारी गर्दन उठाकर ऊपर शब्बों की बालकनी की तरफ़ देखने लगीं। उस सुबह मासूमा को किसी ने अख़बार लाने का वादा नहीं किया।

खैर, सूरज चढ़ा और मक्खियों ने अंसारी जी के कानों पर भिन्न-भिन्न का शोर किया और तब एक झटके से ‘या अल्लाह’ की पुकार के साथ अंसारी जी ने ख़ुद को चारपाई से परे धकेल दिया। उनके इस तरह अचानक उठने से चारपाई जैसे हैरान थी। उसकी रस्सियाँ काफ़ी देर तक चरमराते हुए झूलती रही। कंचे खेलने के लिए जमीन में पिल ढूंढ़ते बच्चे भी इस आवाज़ से दंग रह गए। हैरान-परेशान सा वह लम्हा अंसारी जी के नींद भरे चेहरे पर केन्द्रित हो गया- सूजी हुई आँखें… मूंछों पर ताव नहीं… चिपचिपाहट से भरा चेहरा, बाल बिखरे हुए और धोती पर हज़ार सिलवटें। उबासियाँ मानो पूरे चेहरे की त्वचा को हिला रही थीं। इस सज्जन पुरुष को कभी किसी ने ऐसे नहीं देखा था। आज की सुबह वाकई बेनकाब थी।

उस सुबह की चर्चा महीनों गली में चलती रही। अंसारी जी इस अजीब हादसे से, जो जाने कैसे उनके साथ हो गया था, परेशान होकर शब्बो से झगडते रहे। शब्बो को भी कई दिन अपनी सहेलियों का मज़ाक झेलना पड़ा। कई शाम घर के आगे चारपाई नहीं बिछी। रेडियों में गाने नहीं बजे। सुबह पांच बजे ‘या अल्लाह’ की अज़ान सुनाई दी पर उस बालकनी पर कोई भी खड़ा नज़र नहीं आया ताकि उसकी निगाहों से झिझक कर मुँह फेरना पड़े। इस दौरान अंसारी जी मासूमा को ज़्यादा वक़्त देने लगे। रात को वह अब्बू की गोद में लेटकर शेखचिल्ली के किस्से सुनती। अब सुबह में अब्बू उसे कुरान पढ़कर सुनाते और कई खेलों में मासूमा के जोड़ीदार बनते। अंसारी जी मासूमा के लिए अब किसी फि़ल्म के नायक से कम नहीं थे। उसके अब्बू जैसा कोई नहीं, ये बात उसने अपनी हर सखी-सहेली को रटवा दी थी। शब्बो बेगम बाप-बेटी के इस रिश्ते को हर पहलू से देख रही थी। मासूमा कब तक खुश रह पायेगी इस बात से वे परेशान रहती, पर उसके मियाँ इसी बहाने घर के भीतर को जीने लगे हैं, यह अहसास उसे सुकून पहुँचाने के लिए काफी था।

उस दिन घर मासूमा की किलकारियों से गूँज रहा था। अंसारी जी ने शेखचिल्ली का कोई मज़ेदार किस्सा खत्म किया था। उनके घुटनों पर बैठकर झूलती मासूमा उस किस्से पर अब तक हँस रही थी। जब अंसारी जी मासूमा को झुलाते हुए ऊपर की तरफ़ ऊँचा उठा देते तब वह और तेज़ी से चिल्ला कर हँसती। अंसारी जी भी मासूमा की इस अदा पर ठहाका लगाने लगते। बाहर बरामदे में शब्बो, मासूमा को नहाने के लिए पुकार रही थी पर अब्बू के आगे अम्मी को कौन सुने! सुबह की चाय के बाद दोनों अपनी मस्ती में खो गए थे। शुरूआत मासूमा ने अपनी डायरी खोल कर की थी फिर अख़बारों का पुलिंदा अब्बू के आगे बिखेर दिया था। उसके बाद मासूमा की फरमाइश पर अब्बू कहानी सुनाने लगे थे। शब्बो ने बीच में अपनी मौजूदगी छेड़ते हुए कहा भी था कि दोपहर में कहानी नहीं सुनाते, कोई रास्ता भटक जाएगा, पर बाप-बेटी के उस रिश्ते में शब्बो के दाखिल होने की कोई जगह नहीं थी। अब दोनों झूलने और झुलाने में मगन हो गए थे कि अचानक मासूमा अब्बू के पैरों से उतरकर उनकी पीठ से चिपक गई। अब्बू की गर्दन को उसने अपनी दोनों बाँहों के घेरे में लेकर मुँह को उनके कान के करीब ले जाकर धीरे से बोली, ‘अब्बूजान आज सात समंदर पार वाला गीत हो जाए, बहुत दिन हो गए!’ अंसारी जी ने खरखरा कर गला साफ़ किया और फिर राम जी के तोते की तरह शुरू हो गए- ‘सात समंदर पार से गुडि़यों के बाज़ार से…’ तभी मासूमा बोली, ‘पापा जल्दी आ जाना, एक सुंदर सी गुडि़या लाना..’ फिर दोनों साथ में गाते रहे।

मासूमा के चेहरे पर खुशी बिना अपना रूख बदले उसी तरह कायम थी। अंसारी जी की आँखें बंद, चेहरा स्थिर सा और होंठ अपनी धुन में गाए जा रहा था। शब्बो उनकी आवाज़ में असीम सुख की कल्पनाएँ संजो रही थी। वह बाप-बेटी के इस रिश्ते के दरम्यान नहीं बल्कि दरकिनार हो दूर खड़ी थी, फिर भी इसे दूर से दर्शक की तरह ही देखने और महसूस करने का जो लुत्फ़ था वह उसके लिए किसी जन्नत से कम नहीं था; अंसारी जी की शखि़्सयत में अपने शौहर को तलाशती हुई मानो मासूमा के अब्बूजान से टकरा गई हो और इस टकराने वाले लम्हें को अब वह ताउम्र जीना चाह रही हो।

तभी मासूमा अब्बू की पीठ से उतर गई। अंसारी जी थोड़ी रौबदार आवाज़ में बोले, ‘जाओ मासूमा अब ज़रा एक गिलास पानी लेकर आओ!’ मासूमा दौड़कर पानी ले आई। अंसारी जी गटागट पानी गले से उतार गए। पानी पीने के बाद अब्बू की भीगी मूंछों को देखकर मासूमा हँस पड़ी। अंसारी जी बोले, ‘हमारी मासूमा तो हमारी हर बात मानती है, अब तो शरारा दिलाना ही पड़ेगा, है ना!’ मासूमा ने झट से हाँ में गर्दन हिला दी। अगले ही पल सवाल दागा, ‘शरारा आप कहाँ से लायेंगे अब्बू?’ अब्बू हँसकर बोले, ‘अरे कहाँ से लायेंगे कि क्या बात है पगली, चांदनी चैक ले चलेंगे तुम्हें, जो पसंद आए वह ले लेना!’ सुनकर मासूमा शांत हो गई। कुछ पल अंसारी जी के चेहरे को देखती रही। अंसारी जी का ध्यान अब उस पर से हट गया था। वे अख़बार पर निगाहें जमा कर बैठ गए थे। उनकी आँखें अखबार की लिखावट पर तैर रही थी। उनके धीरे-धीरे हिलते होंठो को देखकर मासूमा समझ गई कि वे अख़बार पढ़ रहे हैं पर फिर भी उसके बेचैन दिल ने उसे उकसाया और वह बोल पड़ी, ‘अब्बू शरारा तो ठीक है पर आप हमारे लिए अच्छा शौहर भी लाने वाले थे!’ ये सुनते ही अंसारी जी ने हैरतभरी आँखों से मासूमा को देखा। मासूमा के गंभीर चेहरे पर हँसी का नामोनिशान नहीं था। वह अपने जवाब के इंतज़ार में अब्बू की ओर ताक रही थी। मायूस सी मासूमा के मुँह से इतना बड़ा सवाल सुनकर वह खुद को हँसने से रोक न सके। अख़बार को छोड़कर ज़ोर से हंस पड़े। उनका मोटा पेट हँसी के ठहाकों से काफी देर हिलता रहा। आँखें चमक उठीं। चेहरा तरोताज़ा हो गया। अपनी हँसी को विराम और गले को आराम देकर उन्होंने कुछ दम भरते हुए कहा, ‘हाँ, हाँ, ज़रूर! क्यों नहीं! अच्छा शौहर भी ले आयेंगे हम!’ सुनकर मासूमा ने अगला सवाल किया, ‘पर अब्बू, पहले बताइये कि अच्छा शौहर होता क्या है?’ मासूमा की आँखों में जिज्ञासा साफ़ नज़र आ रही थी। अब्बू ने उसकी कलाई पकड़कर पास खिसकाते हुए उसे बोले, ‘अच्छा शौहर वह होता है जो हमारी मासूमा को बेइंतहा मोहब्बत करे। उसकी सारी ख्वाहिशें पूरी करे। उसका अपने से भी ज़्यादा ध्यान रखे और हमेशा उसे खुश रखे।’ जवाब सुनकर खामोश मासूमा जैसे अब्बू की आँखों में कुछ टटोलने लगी पर अंसारी जी तो इस बेहद सच्चे जवाब के साथ ख़ुद को ख़ाली कर चुके थे। ज्ञान और धर्म की कोई अनमोल बात किसी को बताते हुए जैसा आनंद कोई गुरू महसूस करता है कुछ वैसे ही फक्र का अहसास अंसारी जी के चेहरे पर नज़र आ रहा था। मासूमा एकटक अपने अब्बू की आँखों में झाँक रही थी कि तभी उसने फिर से अब्बू को पुकारा और कहा, ‘अब्बूजान क्या आप भी एक अच्छे शौहर हैं?’ सवाल सुनकर अंसारी जी के मुँह से निकलने वाली ‘हाँ’ अंदर ही कहीं घुट कर रह गई और स्तब्ध से मासूमा को देखते रहे। चाहकर भी अपना जवाब बुनने के लिए शब्द नहीं खोज पाए। मासूमा ने बेसब्री दिखाते हुए उनकी बाँह झिंझोड़ कर पुकारा, ‘बताइए न अब्बू, आपके जैसा ही होता है न अच्छा शौहर?’ अंसारी जी के हाथों से मासूमा की कलाई छूट गई। शब्बो ने बाहर से पुकारा, ‘मासूमा, आज नहाना नहीं है क्या या अंदर बातें ही बनाती रहोगी?’ मासूमा अब्बू को खामोश पाकर सब्र खो बैठी और उठकर तौलिया ढूँढ़ने लगी। अंसारी जी भी हाथ में अख़बार उठाकर बैठ गए पर इस बार उनकी नज़रें अख़बार की लिखावट पर ही टिकी रहीं, तैर नहीं पाईं!

टीना नेगी

टीना नेगी

 ‘अंकुर-कलेक्टिव’ की नियमित रियाजकर्ता। 2011 में लाहौर में आयोजित बाल-साहित्य-सम्मेलन में अंकुर की तरफ से बाल-लेखकों के साथ किस्सागोई की प्रस्तुती। उनके लेखन के कुछ टुकड़े ‘फर्स्ट सिटी’ और ‘अकार’ में प्रकाशित। संपर्कः एल-259, सेक्टर- 5, दक्षिणपुरी, डाॅ. अम्बेदकर नगर, नई दिल्ली-110062

साभार: हंस, जनवरी, 2015 

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