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धर्म-दर्शनवादी और उदारवादी राजनीतिक चेतना के कवि केदारनाथ सिंह: उस्मान खान

हिन्दी-साहित्य के इतिहास में केदारनाथ सिंह की स्थिति पर सोचता रहा हूँ। हिन्दी-साहित्य-जगत में उन्होने अपनी अलग पहचान बनाई। वे मुझे विचार-मुक्त कवि लगते रहे हैं। उनके साहित्य की अंतर्धारा – बिम्ब, कल्पना, कथा, स्मृति, परंपरा आदि- किस दिशा में बह रही है, इस पर दोबारा मनन किया तो एक विचारधारा निकल आई, कोई भी साहित्यिक अकेला नहीं होता। केदारनाथ सिंह की भी परंपरा है, घराना है। शायद लोग मेरे इस प्रयास को दूर की कौड़ी मारने का प्रयास समझें, पर कौड़ी खेलने वाले जानते हैं कि कभी-कभी दूर की कौड़ी भी लग जाती है। केदारनाथ सिंह की पहली पुस्तक जो मैंने पढ़ी, वह थी – ‘हिन्दी-कविता में बिम्ब-विधान’। फिर केदारनाथ सिंह की प्रतिनिधि कविताएं पढ़ीं, और उनके व्यक्तित्व और कृतित्व के बारे में सुनता-पढ़ता रहा। अब उनकी मृत्युपरांत पत्र-पत्रिकाओं, ब्लॉग, इंटरनेट पर टिप्पणियाँ और विचार पढ़ रहा हूँ। पर उन पर कभी लिखूंगा ऐसा सोचा नहीं था। संपादक-मित्र उदय शंकर ने सुझाया या बरगलाया; मैं सोचने लगा… #लेखक

kedarnath singh

साभार : साहित्य  अकादमी  आर्काइव्ज  वाया  यूट्यूब

केदारनाथ सिंह की मृत्यु पर….

By उस्मान खान

हिन्दी-साहित्य-जगत में केदारनाथ सिंह किसी परिचय के मोहताज नहीं। उन्हें १९८९ में साहित्य अकादमी सम्मान और २०१३ में भारतीय ज्ञानपीठ सम्मान मिला। केदारनाथ सिंह का मान है, सम्मान है, घराना है, परंपरा है, पर ऐसे व्यक्ति की मृत्यु पर भी छींटाकशी करने वाले कहाँ चूकते हैं। इंटरनेट के इस दौर में भावभीनी विदाई देने वाले बहुत दिखे – पता चला वे कईयों के प्रिय कवि थे। पाठक-समीक्षक अक्सर ही अपने प्रिय कवियों की सूची बनाते चलते हैं।

भावुक समर्थकों ने उनकी महानता और काव्य-वैभव पर वैसे ही लिखना शुरू कर दिया, जैसा कुँवर नारायण की मृत्यु पर लोगों ने लिखा था या जैसा मुक्तिबोध की जन्म-शताब्दी पर लोग लिख रहे हैं। पाठक-समीक्षक में कुछ लिखने-कहने का भावनात्मक-उन्माद पैदा होना अचरज नहीं, अपने प्रिय कवि की मृत्यु या जन्म-मृत्यु-शताब्दी वगैरह ऐसे अवसरों को बढ़ा देती हैं। पर वहीं केदारनाथ सिंह पर छींटाकशी भी होने लगी। उनके व्यक्तित्व और कृतित्व का विश्लेषण तेज़ हुआ, तर्क-वितर्क चलने लगा। युवा कवि-समीक्षक अविनाश मिश्र का लिखा पढ़ा, फिर कवि-समीक्षक कृष्ण कल्पित का लिखा पढ़ा। दोनों ने ही अपने मन की गुत्थी ही सामने रखी है। केदारनाथ सिंह के व्यक्तित्व के बारे में अलग जानकारी इस लिखे में मिल सकती है, लेकिन उनके कृतित्व की उपेक्षा की गई है।

कृष्ण कल्पित ने बनारस कविता को केंद्र में रखकर अपनी बात कही है, उन्हें कविता शायद इसलिए पसंद नहीं कि वे बनारस पर और भी अच्छी रचनाएँ पढ़ चुके हैं, उन्होंने बनारस पर अपना पसंदीदा साहित्य भी बताया है। उनके लिखे का मूल यह है कि केदारनाथ सिंह की कविता में वर्णित बनारस गीता प्रेस के कैलेंडर की तरह है। बात ताने की तरह लगती है, लेकिन फ़िलहाल इसे ही उनकी कविताओं में घुसने का प्रारम्भ-बिन्दु बनाते हैं।

साहित्य में बिम्ब एक भाव-विचार या चरित्र या दृश्य होता है, साथ ही यह भाव-विचार या चरित्र या दृश्य गतिशील होता है। प्रत्येक बिम्ब भाव-विचार-श्रंखला या दृश्यावली होता है। बिम्ब से अर्थ उस कला-उत्पाद से है, जो विशेष दृश्य-बोध को प्रस्तुत करता है। केदारनाथ सिंह की कविताओं में ‘बिम्ब की अवधारणा’ का केंद्रीय महत्त्व है, बिम्ब-विधान पर उन्होंने लिखा भी है, लेकिन उनकी अधिकांश कविताओं में कोई बिम्ब-विधान दिखाई ही नहीं देता, शायद एक समय के बाद वे भाषा-शैली और कथाओं पर अधिक ध्यान देने लगे थे, बिम्ब-विधान के निर्माण का प्रयास वे करते रहे, उन्होने लंबी कविताएं भी साधीं, लेकिन तब भी बहुत कम कविताओं में वे कोई नया बिम्ब-विधान प्रस्तुत कर पाए हैं। कविता में कथा कह देना एक बात है और बिंबों के माध्यम से कथा कहना दूसरी बात। केदारनाथ सिंह ने ‘मंच और मचान’ में एक कथा प्रस्तुत की है, यह कथा स्वयं में एक बिम्ब हो सकती है, लेकिन यह बिंबों से रची कविता नहीं है। उनकी कविताओं में बिम्ब अलबत्ता हैं, पर छिन्न-भिन्न या ढीले-ढाले ढंग से जुड़े हुए। उन्हें अगर मजबूती से जोड़ा जाए, तो एक धारा प्रवाहित होती दिखती है। अगर आप उन्हें जोड़ने में असमर्थ रहे तो आप उनकी धर्म-दर्शनवादी उदारवादी राजनीतिक चेतना को नहीं जान पाएँगे न ही यह देख पाएँगे कि वे बिम्ब-निर्माण में कुशल नहीं थे।

अपनी विशेष भाषा-शैली के निर्माण में भी वे असमर्थ रहे। आधुनिक बिम्ब-विधान भाव-विचार के तनाव पर स्थिर रहता है। एक दृश्य, जिसमें विचार और प्रति-विचार का खिंचाव स्थिर हो जाता है। केदारनाथ सिंह के बिंबों में चित्रित भाव-विचार लचर हैं, लाचार हैं – व्यवस्था और शक्ति वहाँ नहीं। आधुनिक अंग्रेजी कविता को एजरा पाउंड और टी. एस. इलियट ने जैसे शक्तिशाली बिम्ब दिए या जिस तरह मुक्तिबोध, शमशेर और राजकमल चौधरी ने हिन्दी-कविता को पूंजीवादी भारत की शहरी सभ्यता के ठोस बिंबों से समृद्ध किया, वहीँ केदारनाथ सिंह जीवन भर बिम्ब-साधना करते हुए भी नए बनते भारत को कविता में प्रस्तुत करने में असमर्थ रहे। उनकी कविता प्राक-पूंजीवादी युग में ही शरण ढूंढती रही, मामला तुलसीदास का हो या कबीरदास का। वे आधुनिक युग की जीवन-स्थितियों से कतराते रहे। साहित्य में बिम्ब-निर्माण नया नहीं है, साहित्य भाव-विचार या चरित्र या दृश्य निरूपण का कार्य ही तो करता आ रहा है। सवाल है इन बिंबों की गति का, संकरी ही सही, पर इनकी धारा का, इन बिंबों में व्याप्त विविधरंगी फूलों की माला तैयार करने का।

बनारस कविता भी अस्त-व्यस्त बिंब ही प्रस्तुत करती है। मैंने गीता प्रेस का कैलेंडर नहीं देखा, उसमें भी बनारस होगा, पर केदारनाथ सिंह की कविता का बनारस, बनारस के टूटे-फूटे दृश्य दिखाता है। किसी दृश्य में कोई आंतरिक संघर्ष नहीं, हर दृश्य जैसे जड़ है, लेकिन प्रत्येक दृश्य अगले दृश्य से जुड़ जाता है, इन दृश्यों या दृश्यावली का कोई आंतरिक संघर्ष नहीं दिखता, संबंध ज़रूर दिखता है। बनारस कविता इस लिहाज से अच्छी है कि इन टूटे-फूटे दृश्यों को तार्किकता से जोड़ने पर एक विचार-श्रंखला, एक दृश्यावली प्रस्तुत होती है, जो केदारनाथ सिंह के समूचे साहित्य को अपने में समेट लेती है। वह बात जो अनकही रह गई। इस कविता में केदारनाथ सिंह के साहित्य की अंतर्धारा, उनकी साहित्य-परंपरा आसानी से दिखाई देती है। इस कविता का बनारस पूंजीवादी शहरीकरण की चपेट से बाहर खड़ा है, वह यथार्थ है, लेकिन ऐसा यथार्थ जिसे ‘तुलसीदास’, ‘धीरे-धीरे’, ‘आधा’, ‘स्तम्भ’, ‘अर्घ्य’ के बिंबों, स्मृतियों से रचा गया है। प्रेमचंद भी बनारस से अनजान नहीं थे, लेकिन उनके उपन्यासों में शहर का नक़्शा कुछ और है। रंगभूमि में वे लिखते हैं–

शहर अमीरों के रहने और क्रय-विक्रय का स्थान है। उसके बाहर की भूमि उनके मनोरंजन और विनोद की जगह है। उसके मध्य भाग में उनके लड़कों की पाठशालाएँ और उनके मुक़दमेबाज़ी के अखाड़े होते हैं, जहाँ न्याय के बहाने गरीबों का गला घोंटा जाता है। शहर के आस-पास गरीबों की बस्तियाँ होती हैं।[i]

हो सकता है प्रेमचंद एक आदर्श पूंजीवादी नगर की बात कर रहे हों, लेकिन बनारस भी शहर है, जो आधुनिक-काल में निरंतर विस्तार पाता गया है, प्रेस और विश्वविद्यालय हों या नए कटते प्लॉट और कॉलोनियाँ; और उसका एक हिस्सा पुराना होने के नाते कई स्मृतियाँ अपने में सँजोए है। हिन्दी-क्षेत्र का एक प्रमुख साहित्यिक केंद्र बनारस रहा है। मामला स्मृतियों का नहीं, स्मृतियों को छांटने का है, चुनने का है। स्मृतियों के आपसी संघर्ष का है। केदारनाथ सिंह स्मृति के बिम्ब तैयार करते जाते हैं, लेकिन यह स्मृति विशेष है। इसमें उनका चुनाव है। केदारनाथ सिंह के लिए बनारस का धार्मिक महत्त्व अधिक है। बनारस एक नहीं कई सभ्यताओं का केंद्र रहा है, ढोंग और पाखंड की सभ्यता के भव्य-बिम्ब वे तैयार करते हैं, लेकिन बाह्याडंबर और अन्याय के विरोध की सभ्यता का कोई बिम्ब इस कविता में नहीं। तुलसीदास के साहित्य का महत्त्व अपनी जगह, पर क्या बनारस में तुलसीदास से बहुत पहले कबीर नाम का जुलाहा नहीं था और उसी समय का एक रैदास नाम का ‘खालिस चमार’ नहीं था। इन्हें उनकी कविता छूती भी नहीं। क्या इस शहर में विशेष धर्म-दर्शन का संगम ही इन बिंबों का विधान है, अगर है, तो क्या केदारनाथ सिंह रूमानी-यथार्थवादी धारा में नहीं हैं?

रूमानी-यथार्थवाद रूमानवाद और आधुनिकतावाद के साथ यथार्थवाद के वाद-विवाद-संवाद में जन्मा था, और अंततः हिटलर के प्रचार-प्रमुख गोएबेल ने उसका आदर्श रूप प्रस्तुत किया था। उसने रेडियो और सिनेमा को फासीवादी राजनीति के प्रचार का माध्यम बनाया। यह बात भी ध्यान देने योग्य है कि उसने वर्ष १९२१ में अपनी पीएच.डी. रूमानवादी नाटककार क्रिश्चियन विल्हेल्म फॉन शुत्स पर की थी। तब तक रूमानवाद का साहित्यिक धारा के रूप में अंत हो चुका था और आधुनिकतावाद के नाम पर धर्मशास्त्रों का आधुनिक-साहित्यिक पुनर्पाठ चालू हो चुका था। रूमानवाद और आधुनिकतावाद की धार्मिक-दर्शनवादी धारा का संयोजन फासीवादी रूमानी-यथार्थवाद के रूप में सामने आया था।

रूमानवादी साहित्य-धारा १८००-१८५० तक प्रभावी रही, इसके बाद १८५० से यथार्थवादी साहित्य-धारा का पदार्पण हुआ, इसने रूमानवादी साहित्य-धारा के विरोध में अपने कई सिद्धान्त तैयार किए थे, १९०० से आधुनिकतावादी साहित्य-धारा का प्रवेश होता है। इन तीनों ही धाराओं को यूरोप के पूंजीवादी शहरों के प्रति-साहित्य के रूप में देखा जा सकता है। पूंजीवादी-व्यवस्था का विरोध तीनों धाराओं में है। लेकिन इस व्यवस्था के अंत और नए समाज के निर्माण का संकल्प प्रायः मार्क्सवादी साहित्यिकों में ही देखा जा सकता है। केवल मार्क्सवादी साहित्यिक ही ऐसे कहे जा सकते हैं, जिनहोने इन शहरों में नई आशा और भविष्य-स्वप्न देखा।

रूमानवादी साहित्यिक आधुनिकता-विरोधी थे, उद्योगिकरण और आधुनिक शहर उसके लिए अभिशाप थे, प्रकृति और लोक-जीवन उसके पूज्य थे और कल्पना (बिम्ब, फेंटेसी, आख्यान आदि इसमें सम्मिलित होते चले गए) वरदान। वे नई जीवन-स्थितियों से भागते थे। यथार्थवादी साहित्य रूमानवाद के विरोध में खड़ा था। यथार्थवादी साहित्यिक समाज का ‘वास्तविक’ चित्रण करने पर ज़ोर देते थे। वर्ग-स्थिति और वर्ग-व्यवहार का निरूपण उसका प्रमुख कार्य था। नई जीवन-स्थितियों ने उसके पुराने बंधन खोल दिए थे। एक तरफ़ भाव-विचार-अनुभव की कल्पना थी, तो दूसरी तरफ़ भाव-विचार-अनुभव की मांसलता। रूमानवाद के प्रचारक प्रायः धर्म-दर्शन शास्त्री थे, यथार्थवाद के प्रायः मार्क्सवादी। यथार्थवाद के प्रभावी होने के साथ ही, रुमानवादी धारा का एक तरह से अंत हुआ और आधुनिकतावादी-साहित्य के भी बीज पड़े।

२०वीं सदी के प्रारम्भ में एज़रा पाउंड और टी.एस. इलियट आधुनिकतावादी-साहित्य के प्रमुख प्रचारक के रूप में उभरते हैं। बिम्ब की अवधारणा साहित्य-चर्चा के केंद्र में उपस्थित होती है, साथ ही धर्मशास्त्र और पुराणों का आधुनिक स्थितियों के अनुकूल पाठ करने का प्रयास शुरू होता है, फोकलोर में विशेष दार्शनिक संकल्पनाएँ खोजी जाने लगती हैं। कल्पना और फंतासी, परंपरा और प्रतिभा, प्रकृति और लोक-जीवन पर चर्चा को नई दिशा मिलती है। आधुनिकतावाद का यथार्थवाद से संघर्ष शुरू होता है, इस संघर्ष ने दुनिया भर के साहित्यिकों को दो खेमों में बाँट दिया था– ‘काफ्का या थॉमस मान’। लेकिन यह नहीं भूलना चाहिए कि २०वीं सदी में आधुनिकतावाद भी दो प्रबल धाराओं में विभक्त होता चला गया– धर्म-दर्शनवादी और मार्क्सवादी। आधुनिकतावादी धर्म-दर्शनवादी कवि प्राक-पूंजीवादी युग में अपना आदर्श खोजता है, आधुनिकतावादी मार्क्सवादी कवि वैज्ञानिक समाजवाद में। विचार दोनों के यथार्थवादी हैं। जहाँ आधुनिकतावादी-साहित्य अपने यथार्थवादी-मूल से उखड़ जाता है, वह रुमानवादी साहित्य बन जाता है, या कभी प्राक-पूंजीवादी साहित्य में तब्दील हो जाता है। आधुनिकतावादी-साहित्यिक यथार्थ को नकारता नहीं, वरन उसकी विशेष कल्पना करता है। व्यक्ति और समाज का उपचेतन स्तर उसकी फैन्टेसी का मुख्य विषय है। वास्तव में, यथार्थ की कल्पना कैसी हो? इस प्रश्न पर ही आधुनिकतावादी साहित्य में भेद पैदा होता है। धर्म-दर्शनवादी कल्पना और मार्क्सवादी कल्पना पूंजीवादी शहरों के यथार्थ का एक-सा रूप प्रस्तुत नहीं करती।

इस संबंध में लुकाच-ब्रेख्त-चर्चा उल्लेखनीय है। लुकाच आधुनिकतावादियों के धर्मदर्शनवादी उपचेतन पर ज़ोर देते हैं, तो ब्रेख्त उनकी तकनीकों के मार्क्सवादी प्रयोग की संभावना पर। जहाँ यथार्थवादी-साहित्य में बाह्य-स्थितियों या वस्तु-जगत के वर्णन पर अधिक ध्यान होता था, वहीं आधुनिकतावादी-साहित्य ने मन:स्थितियों को साहित्य-उत्पादन के केंद्र में ला खड़ा किया। औद्योगिक शहरों के निर्माण और पूंजीवादी विकास से उभरे भय और संताप ने, धर्म-हानि के प्रचार ने आधुनिकतावादी-साहित्य के निर्माण की भूमिका बनाई। मानव-अस्तित्त्व का नई सभ्यता से सामना ‘ईश्वर की मृत्यु’, ‘सभ्यता का पतन’ जैसे फ़िकरों को पैदा करने लगा। लेकिन कुछ ही समय में इन नई स्थितियों से जन्मी आशा और उत्साह ने भी साहित्य में स्थान पाया। ‘नई सभ्यता’ और ‘नए मनुष्य’ की चर्चा होने लगी। यांत्रिक पुनरुत्पादन की व्यवस्था और उपभोक्तावादी सभ्यता के उदय ने प्राचीन-साहित्य की दुर्लभता को नष्ट किया और इस प्रक्रिया में उसकी पवित्रता को भी। प्राचीन का पतन और नए का उदय साहित्यिकों को सभ्यता-समीक्षा की ओर ले गया, अभिव्यक्ति के नए तरीकों और आधुनिक ‘सौंदर्य-मूल्यों’ की खोज की ओर। यह स्थिति १९वीं सदी के अंतिम दशकों और २०वीं सदी के प्रारम्भिक दशकों के यूरोप की थी। हिन्दी-कविता में आधुनिकतावादी-धर्म-दर्शनवादी-साहित्य-धारा और आधुनिकतावादी-मार्क्सवादी-साहित्य-धारा का संघर्ष ४० के दशक में शुरू होता है। ‘तार-सप्तक’ इसका प्रारम्भ-बिन्दु है।

साहित्य में यथार्थ का वर्णन एक विशेष स्थिति में क्रांतिकारी था, जब यूरोप १९वीं सदी के उत्तरार्द्ध में था। २०वीं सदी के प्रारम्भ में आधुनिक शहरों में बदलते सामाजिक-संबंध साहित्यिक को भी नए भाव-विचारों, बिंबों के संपर्क में ले आए। दुनिया भर में नई इमारतों, मशीनों और लोकतान्त्रिक तथा वैज्ञानिक सोच के विकास ने एक ऐसे समाज को जन्म दिया, जो पहले कभी नहीं था। यह पूंजीवादी सभ्यता के संपर्क में आने पर पूरी पृथ्वी पर हुआ। निश्चित ही २१वीं सदी में भी यह परिवर्तन जारी है, भारत के करीबी नेपाल में राजशाही का अंत २१वीं सदी में जाकर ही हो पाया है, कुर्दिस्तान के लोग अब भी एक नए वि-राज्य की संकल्पना के लिए लड़ रहे हैं। १९वीं और २०वीं सदी में भी इन नए भाव-विचारों और बिंबों ने नई कल्पना और भाषा की खोज की थी। आज भी नए भाव-विचार साहित्यिकों को नई कल्पना और भाषा की खोज में लगाए हुए हैं। सवाल तब भी यथार्थ का था, आज भी यथार्थ का है – साहित्य में यथार्थ के पुनर्प्रस्तुतिकरण का है।

यथार्थ को स्वीकारते हुए भी, अद्भुत, अकल्पनीय और शक्तिशाली रचना आधुनिकतावादियों की विशेष पहचान बनी। इसने साहित्य-रचना की नई समझ तैयार की। आधुनिकतावादी-धर्म-दर्शनवादी-साहित्य मानव-मूल्यों के पतन के दृश्य निरूपित कर, सर्वशक्तिशाली-पुरुष में आस्था की ओर ले जाता है। वह पूंजीवादी-सभ्यता के सामने असहाय खड़े व्यक्ति की सर्व-शक्तिमान-पुरुष के सामने की गई प्रार्थनाएँ हैं। इससे अलग आधुनिकतावादी मार्क्सवादियों का ध्यान इस पर रहता था कि कल्पना, पुराण, स्मृति आदि के प्रयोग से वर्णन में रुचि पैदा हो, साहित्य सरस बना रहे साथ ही वर्गीय-वास्तविकता और साहित्य की परिवर्तनकारी शक्ति का ह्रास न हो। उनको आशा थी कि नई जीवन-स्थितियों से उभरा, नई और प्रभावशाली तकनीकों से निर्मित साहित्य वर्ग-संघर्ष को तेज़ करने में अधिक सहयोगी होगा। उनका मत था कि साहित्य राजनीति के रण-क्षेत्र में प्रवेश करे, लेकिन अपनी सेना के साथ। साहित्य में राजनीति का सहयोग करने की शक्ति होनी चाहिए। साहित्य में प्रभावित करने की क्षमता होनी चाहिए, लेकिन प्रभाव के लिए यथार्थ का रहस्यीकरण करना साहित्यिक को धर्म-दर्शनवादी धारा में ला खड़ा करता है। समीक्षक की भी यही स्थिति होती है, यदि वह जड़-सौंदर्यबोध से ग्रसित है। समस्या रूमानियत या यथार्थ से नहीं, बल्कि विशेष राजनैतिक दृष्टि से होती है, जो मानव-मूल्यों के ह्रास से जन्म लेती है, हिंसा और उपभोग की संस्कृति के प्रभावी होने से सामने आती है। समस्या आधुनिकता से नहीं, पूंजीवादी आधुनिकता से है, शहरों से नहीं पूंजीवादी शहरों से है, धर्म-दर्शन से नहीं, धर्म-दर्शन के अफ़ीम से है।

यहाँ यह नहीं भूलना चाहिए की उपरोक्त साहित्यिक वाद और आंदोलन शहरों में साहित्यिकों के संगठित होने के कारण पैदा हुए थे, कई साहित्यिक अपने को वाद और आंदोलन से मुक्त कहते रहे, पर आधुनिक शहरों में जीवन-यापन करना और उनमें पैदा हो रही नई स्थितियों और सौंदर्य-मूल्यों से मुक्त रहकर साहित्य-उत्पादन करना असंभव था। केदारनाथ सिंह भी विचार-मुक्त कवि लगते हैं, लेकिन यह असंभव था कि उनका साहित्य नई उत्पादन-स्थितियों से भी बचकर निकल जाता। उस पर भी विभिन्न वादों और आंदोलनों का प्रभाव है। उपरोक्त तीनों प्रमुख वाद साहित्य के अतिरिक्त अन्य कला-माध्यमों में भी प्रारम्भ और प्रभावी हुए। १९वीं और २०वीं सदी में विश्व-भर में रूमानवाद, यथार्थवाद और आधुनिकतावाद के वाद-विवाद-संवाद में प्रचुर साहित्य-उत्पादन हुआ। हिन्दी का आधुनिक-साहित्य भी इसका अपवाद नहीं। यह वाद-विवाद-संवाद  सर्रियलिज़्म, फ्यूचरिज़्म और एंटी-पोएट्री से लेकर सिचूएशनिस्ट, जादुई यथार्थवाद और उत्तर-आधुनिकतवाद तक विभिन्न नई साहित्य-धाराओं के निर्माण में सहयोगी बनी, हिन्दी में भी नई कविता, अकविता, जादुई प्रभाववादी, अस्मितावादी आदि साहित्य-धाराओं के निर्माण में इस संघर्ष ने सहयोग किया।

आधुनिक-साहित्य के अंतर्गत यथार्थ का रहस्यीकरण और यथार्थ का पुनर्प्रस्तुतिकरण दोनों कार्य हुए। जबकि ये दोनों एकदम भिन्न प्रक्रियाएँ हैं। यथार्थ के वर्णन में, कल्पना और भाषा-शैली का महत्त्व नकार देने पर साहित्य अपनी साहित्यिकता खो देता है, लेकिन यह याद रखना चाहिए कि आधुनिक-साहित्य का मूल विषय पूंजीवादी-सामाजिक-संबंध हैं, उससे अलग होते ही वह प्राचीन साहित्य की नकल भर रह जाता है। पुराण का साहित्यिक-प्रयोग पुराण रचने से अलग है। लू शुन ने इस प्रक्रिया पर लिखा है। उन्होने चीन की पौराणिक कहानियों का आधुनिक पुनर्प्रस्तुतिकरण भी किया है।

केदारनाथ सिंह २०वीं सदी के उत्तरार्द्ध के प्रारम्भ से प्रायः अब तक साहित्य-उत्पादन करते रहे थे। उन पर इन विभिन्न वादों और आंदोलनों का असर पड़ना आश्चर्य की बात नहीं। उनकी पुस्तक ‘हिन्दी-कविता में बिम्ब-विधान’ जब प्रकाशित हुई, तब तक हिन्दी-साहित्य में बिम्ब, फेंटेसी, कल्पना, परंपरा, पुराण, स्मृति, भविष्य-कल्पना आदि यूरोपीय आधुनिकतावादी-साहित्यिक-अवधारणाएँ चर्चा का विषय बन चुकी थी। केदारनाथ सिंह ने ‘तीसरा सप्तक’ के अपने वक्तव्य में ज़ोर देकर कहा कि कविता में मैं सबसे अधिक ध्यान देता हूँ बिम्ब-विधान पर, लेकिन न तो ‘तीसरा सप्तक’ में न ही बाद में वे अपनी बात पर खरे उतरते हैं। बिंबों की शिथिलता उनके साहित्य में जीवन भर बनी रही। वे कोई बिम्ब-विधान नहीं रच पाए। ‘बाघ’ कविता में भी बिंबों और वक्तव्यों का बिखराव ही लक्षित होता है। कोई विधान है क्या वहाँ? और अगर है, तो क्या वह रूमानी-यथार्थवादी विधान ही नहीं है? बुद्ध-कथा पढ़कर कोई भी समझ सकता है कि विद्वान-प्राध्यापक-कवि किस युग में जी रहा है। बुद्ध-संबंधी उसकी कल्पना क्या है? वह आज से भय खाकर कल के वीर को देखते हैं। बुद्ध उन्हें ठीक ही दिखाई देते हैं, लेकिन वे गर्दन झुकाकर निकल जाते हैं, आश्चर्य! ये कौन-से बुद्ध हैं? बुद्ध हैं या कोई आधुनिक आरामतलब साहित्यिक, जो ख़तरा देखते ही दुम दबाने लगता है? माना कि बुद्ध-संबंधी साहित्य का अध्ययन-मनन २०वीं सदी में जाकर ही ठीक से शुरू हुआ, लेकिन जब तक केदारनाथ सिंह ‘बाघ’ लिखते, बुद्ध-साहित्य का पर्याप्त अध्ययन-मनन हिन्दी में भी उपलब्ध हो चुका था, दिल्ली में तो और आसानी से उपलब्ध हो जाता होगा। देखने वालों को तो ‘मुँह नज़र आते हैं दीवारों के बीच’।

थे या नहीं, मैं नहीं जानता, लेकिन उनके साहित्य का बहुलांश उसी धारा को समृद्ध करता है। वे यथार्थवादी स्थितियों में रूमानी भाव-विचार तैयार करते हैं। कल्पना-भावना, स्मृति-परंपरा के नाम पर यथार्थ का रहस्यीकरण करते हैं। केदारनाथ सिंह ऐसा क्यों करते हैं? क्या नाम, सम्मान, परंपरा, घराने के लिए? अपनी परंपरा की खोज में उनकी कविताएं बनारस और दिल्ली के आभिजात्य-वर्ग की स्मृति से अधिक कुछ और नहीं निर्मित करती। उन्हें जो चुनना था, उन्होने चुना और उनकी कविताओं पर इसका असर पड़ा, उनकी कवितायें रूमानी यथार्थवाद की शिकार होती चली गईं। मैं यह नहीं कहता कि वे सड़क पर भूखों मरते या मार्क्सवादी होते तो उनकी कविताएं महान हो जातीं, या वे मेरे प्रिय कवि हो जाते। पर क्या कारण है कि ८३ वर्ष के जीवन में लिखा गया उनका अधिकांश साहित्य एक-सा है? केदारनाथ सिंह की प्रतिबद्धता बिम्ब के प्रति है, लेकिन एक साहित्य-उत्पादक के रूप में वे रूमान और यथार्थ के तनाव के बिम्ब ही निर्मित कर पाते हैं और दया और भीरुता के भाव-विचार। वे कभी-कभी ही अपनी बात स्पष्ट करते हैं, वह भी कथा या स्मृति के बिम्ब खींचते वक़्त। यह कहने का एक ढंग हो सकता है, लेकिन वह जो कहते हैं, उसमें एक दिशा निर्मित होती जाती है। और वह दिशा मानव-मूल्यों के ह्रास की उपेक्षा की है, मानव-मूल्यों की उच्चता से सहम जाने की है। साहस और सृजनशीलता के बिना साहित्यिक भय और जड़ता से ग्रस्त हो जाता है। भय और जड़ता उसके समक्ष अतीत-गौरव-गान और प्रकृति-वर्णन के अतिरिक्त कोई रास्ता नहीं छोडते। उनकी प्रतिबद्धता वर्तमान समाज या राजनीति के प्रति क्यों नहीं है? क्या साहित्य और समाज के सम्बन्धों को वे नहीं जानते? या जान-बुझकर उपेक्षित करते हैं? उनकी रचनाओं में समाज और साहित्य का संबंध अगर है तो अवैध है, अपवित्र है। ऐसे अवैध सम्बन्धों से जन्मे बिम्ब देखकर उनकी कविताओं का डी.एन.ए. टेस्ट न करें, वे उन्हीं की संतान हैं लेकिन अवांछित। यथार्थ रूमान के आवरण में क्या बाघ कविता जैसा नहीं लगता?

साहित्यिक जब तक जीवित होता है, वह विश्व में अपनी भूमिका और साहित्य-रचना के विषय और रूप में बदलाव कर सकता है। बदलाव की यह संभावना या आशंका मृत साहित्यिक खो देता है। साहित्यिक की मृत्यु उसके किए और कहे-लिखे पर पुनर्विचार के लिए प्रेरित करती है। साहित्यिक अपने जीवन में भी बदलता है। उसके भाव-विचार, कल्पना-क्षमता, भाषा-शैली आदि बदलते हैं। मृत्यु साहित्यिक के व्यक्तित्व और कृतित्व में बदलाव को रोक देता है। लेकिन कुछ साहित्यिक जीवन में ही अपने साहित्यिक विकास को रोक देते हैं, उनके लिखने-सोचने का एक ढर्रा बन जाता है। इसे उनकी मृत्यु भी कहा जा सकता है। इससे लिखने का काम आसान हो जाता है, साथ ही विशेष लेखन में कुशलता हासिल हो जाती है, लेकिन इससे विषय और रूप की एकतानता निर्मित होती जाती है, साहित्यिक प्रयोग सीमित होता जाता है। लेखन की यह खास प्रक्रिया रूढ़िवाद कही जा सकती है, इसे साहित्यिक-हठ भी कहा जा सकता है। केदारनाथ सिंह भी साहित्यिक-हठी हैं। साहित्य का यह संकीर्ण घेरा साहित्यिक के लिए एक सुरक्षा-कवच की तरह होता है। वह इसे जीत की गारंटी समझने लगता है। वह जहाँ प्रसिद्धि पाता है, एक-सा, वैसा ही जैसा प्रसिद्ध हुआ, लिखता जाता है। विषय-संकीर्णता और प्रयोग से भय साहित्यिक में जड़ सौंदर्यबोध का निर्माण करते हैं। जीते-जी मरना और क्या है कि अब आप अपनी सृजन-क्षमता का विस्तार नहीं कर सकते, यांत्रिक पुनरुत्पादन के अतिरिक्त और कुछ नहीं कर सकते। नए को रचने की शक्ति आप में नहीं। नए को समझने का सामर्थ्य आपमें नहीं है। ज़रूरी तो नहीं कि कवि हो गए, तो अब ज़िंदगी भर कवि ही बने रहना है, ‘राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा’। पर साहित्यिक ऐसी स्थितियों में भी फँस जाता है। अपने काव्य को माँजने में वह ऐसा रूप प्राप्त करता है, जो दूसरों के लिए असाध्य है, वह अनन्य साहित्य की रचना करता है, इस अनन्य रूप को पुनरुत्पादित करने में ही वह काव्य-कौशल समझने लगता है। यहीं उसकी मौत है, अपनी ही साहित्य की फैक्टरी में।

साहित्य प्रांसगिक होना चाहता है। प्रासंगिक होकर ही साहित्य जीवित रह सकता है। लेकिन प्रासंगिकता युग-सापेक्ष होती है। कल का प्रासंगिक आज अप्रासंगिक लग सकता है और आज का प्रासंगिक कल अप्रासंगिक हो सकता है। केदारनाथ सिंह का साहित्य भी अपनी गति को प्राप्त होगा। मेरी दृष्टि में केदारनाथ सिंह की कविताओं में शिथिल बिंबों की भरमार है, धर्म, प्रकृति और लोक-जीवन के बिम्ब अधिक है, अन्याय-अत्याचार, अंधविश्वास की मुखालफत के बिम्ब कम। उनकी कविताओं में उदारवादी राजनीतिक-दिशा है, प्रयोगशीलता की निरंतर उपेक्षा है। हिन्दी-साहित्य के गुणात्मक विकास में उनकी कविताओं का कोई महत्त्व नहीं। वे नई बनती जीवन-स्थितियों के प्रति अचेत हैं, परिणामस्वरूप नई कल्पना और भाषा-शैली के निर्माण के प्रति भी जागरूक नहीं हैं। केदारनाथ सिंह की कविताओं में प्रस्तुत बिंबों का प्रमुख विचार और प्रतिविचार रूमान और यथार्थ है। रूमानी यथार्थवाद उनकी कविता का अंधेरा पक्ष है। उनके साहित्यिक का राजनैतिक उपचेतन है। ज्ञान-विज्ञान की उपेक्षा, अध्ययन-मनन का आलस्य और नए को स्वीकारने की असमर्थता केदारनाथ सिंह की कविताओं की विशेषता है। वे १९४७ यानी भारत-पाकिस्तान-विभाजन को एक रूमानी स्मृति में तब्दील कर देते हैं, उनका प्रश्न कि ‘क्यों चले गए थे नूर मियाँ’ ऐसे उभर कर आता है जैसे उनका नौकर शहर छोडकर चला गया हो और अब खाना कौन बनाएगा, घर कौन साफ करेगा! नूर मियाँ का इससे अधिक क्या महत्त्व है कि वे सुरमा बेचते थे? पाकिस्तान में पत्ते कैसे गिरते हैं! यह विस्मय नासिर काजमी के लिए उचित था, केदारनाथ सिंह जब आधी सदी गुज़र जाने के बाद वैसे ही विस्मित होते हैं, वही सवाल दोहराते हैं, तो वह रूमानी स्मृति से अधिक कुछ नहीं लगता। केदारनाथ सिंह का गणित तो कमज़ोर नहीं, लेकिन इतिहास में वे उत्तीर्ण नहीं हो पाते। ८० के दशक का उत्तरार्द्ध दक्षिणपंथी राजनीति के भारत और विश्व-भर में प्रभावी होने का समय है। ऐसे समय में भारत-पाकिस्तान विभाजन को एक भावुक स्मृति बनाकर पेश करना केदारनाथ सिंह द्वारा यथार्थ का रुमानीकरण, वस्तु-जगत का रहस्यीकरण नहीं तो और क्या है! यह एक खास राजनैतिक दृष्टि नहीं तो और क्या है? यह नहीं भुलना चाहिए कि जब केदारनाथ सिंह ४७ के बारे में लिख रहे थे, हिन्दी-साहित्यिकों का बहुलांश जाति-धर्म आधारित दंगों, हिंसा-उन्माद का तीखा विरोध कर रहा था। यह भारत में फासीवादी शक्तियों के प्रभावी होने का समय है, साथ ही अस्मितावादी-समुदायवादी बहुरंगी-प्रतिवादी शक्तियों के तैयार होने का भी, आश्चर्य नहीं केदारनाथ सिंह के साहित्यिक का अंतर्संघर्ष भी तेज़ हो जाता है। मण्डल-कमंडल और बाबरी-मस्जिद के ठोस-बिम्ब केदारनाथ सिंह देख नहीं पाए, या देखते ही पीछे भागे, तो उन्हें नूर मियाँ दिखाई दे गए, थोड़ा और पीछे जाते तो कोई ‘डोम’ या कोई ‘मुंडा’ भी दिख सकता था। क्या उनकी स्मृति एक जगह जाकर रुक नहीं जाती? क्या वे यथार्थ का एक खास नक्शा नहीं बनाते? बाहर की कोमलता अंदर की कठोरता पर बहुत मोटी चढ़ी हुई है। केदारनाथ सिंह ईश्वर को बार-बार धन्यवाद देते रहे हैं। शायद हिन्दी-भाषा को भी ईश्वर का वरदान मानते रहे थे। क्या ‘देव-भाषा’ का आधुनिक रूप ही हिन्दी है, और इसीलिए हिन्दी भाषा ईश्वरीय कृपा है? तो फिर बुद्ध की करुणा का क्या होगा? अल्लाह की रहमत का क्या होगा? और जीसस की दया का? और फिर कबीर और नानक का क्या होगा? हिन्दी-कवि के लिए कई परम्पराएँ खुली हैं, केदारनाथ सिंह ने अपनी मति से चुनाव किया। उन्होने कुछ अपनी सुमति और कुछ भगवान भरोसे ही जीवन काटा और साहित्य-उत्पादन किया। जानने वाले जानते हैं कि सर्रियलिस्ट फ़िल्मकार लुई बुनुएल ने भी ईश्वर को धन्यवाद दिया है, वे अपने अंदाज़ में, जैसे पूछने वाले पर ही व्यंग्य करते हुए, कहते हैं – “ईश्वर का धन्यवाद कि मैं नास्तिक हूँ!” धन्यवाद के पात्र केदारनाथ सिंह भी हैं कि उन्होने अपनी कुछ कविताओं में अपनी परंपरा और उपचेतन को स्पष्ट रूप से सामने रख दिया है। उनके साहित्य की अंतर्धारा की दिशा यहाँ साफ है। ‘मुक्ति’, ‘मेरी भाषा के लोग’, ‘नए कवि का दुख’ ऐसी कई कविताएं हैं। पर मैं केवल उनकी एक कविता की ओर ध्यान दिलाना चाहूँगा, ‘बनारस’ में जिस बात के लिए बिंबों को जोड़ना पड़ता है, वह मशक़्क़त यहाँ नहीं, अपनी बात को बच्चों सी सरल ज़बान में तैयार बिंबों के माध्यम से उन्होंने रखा है –

जब ट्रेन चढ़ता हूँ

तो विज्ञान को धन्यवाद देता हूँ

वैज्ञानिक को भी

 

जब उतरता हूँ वायुयान से

तो ढेरों धन्यवाद देता हूँ विज्ञान को

और थोड़ा सा ईश्वर को भी

 

पर जब बिस्तर पर जाता हूँ

और रोशनी में नहीं आती नींद

तो बत्ती बुझाता हूँ

और सो जाता हूँ

 

विज्ञान के अंधेरे में

अच्छी नींद आती है। (विज्ञान और नींद)

यहाँ विरोध स्पष्ट है, कुछ अनकहा नहीं। विचार और प्रति-विचार आमने-सामने हैं। पर अब भी सोच में सवाल नाच रहे हैं। केदारनाथ सिंह की यथार्थ की कल्पना कैसी है? क्या वे रूमानी यथार्थवादी धारा के कवि हैं? आज उनकी क्या प्रासंगिकता है, जबकि इसी साल उन्होने अपनी आखरी साँसे लीं? इन प्रश्नों को पाठक-समीक्षक के ध्यानार्थ रखता हूँ। केदारनाथ सिंह के साहित्य का मूल्यांकन होना अभी शुरू ही हुआ है, आशा है उनकी रचनावली प्रकाशित होगी, और बेहतर मूल्यांकन किया जाएगा। उनके साहित्य की अंतर्धारा और हिन्दी-साहित्य में उनकी परंपरा भी अधिक स्पष्ट होगी। तब शायद अधिक स्पष्ट होगा कि केदारनाथ सिंह की राजनीति क्या रही? मुझे विश्वास है हिन्दी-साहित्य-समीक्षक अधिक गंभीरता से केदारनाथ सिंह के व्यक्तित्व और कृतित्व पर सोचेंगे। ‘विज्ञान के अंधेरे में’ सोए उनके उपचेतन को टटोलेंगे। वे भी मशक़्क़त से भागेंगे तो हिन्दी-साहित्य का क्या होगा! यूँ आराम-तलब बौद्धिक-साहित्यिक हिन्दी-साहित्य-चर्चा का नया विषय तो नहीं है। इस पर बात होती आई है। चलती चर्चा चलती चले…

***

[i] प्रेमचंद, ‘रंगभूमि’, हंस प्रकाशन, इलाहाबाद, १९९९, पृ.-९

usman khan

उस्मान ख़ान समकालीन हिंदी साहित्य के अलहदा युवा कवि-कथाकार हैंचर्चाओं और पुरस्कारों की भीड़ से अलहदा… छपाऊ मानसिकता से भी अलहदा... जे.एन.यूके हिंदी विभाग से मालवा के लोकसाहित्य पर पीएचडीइनसे usmanjnu@gmail.com पर संपर्क कर सकते हैं.

गीता प्रेस के कैलेंडर जैसा है केदारजी का ‘बनारस’: कृष्ण कल्पित

छवियों से मोहग्रस्त कवि कब ख़ुद एक छवि बन जाता है और ‘पाठकों’ से भरा-पूरा रहने वाला हिंदी समाज कैसे ख़ुद मोहग्रस्त हो जाता है, यह हिंदी की एक समकालीन घटना है.

छवि-निर्माण के इस सायास-अनायास प्रयास को तोड़ने का यह पहला प्रयास हिंदी में (सुविधानुसार, अगर आप इसे तात्कालिक भी कहना चाहें तब भी) कृष्ण कल्पित के कारण संभव हुआ.

रामविलास शर्मा को ‘फ़ासिस्ट’ क़रार देने का जैसा संगठित प्रयास नामवर-नेतृत्व में ‘आलोचना’ द्वारा हुआ था. साहित्य संसार की उस समय की चुप्पी याद आती है, लेकिन केदारनाथ सिंह प्रसंग में आलोचना के कुछ बिंदुओं को उभारना भर कृष्ण कल्पित को कोप-भाजन का शिकार बना देता है.

केदार-संदर्भ में उन्होंने कोई नयी बात की है, ऐसा भी नहीं है, बल्कि उन्होंने तो हिंदी-बौद्धिकों का कान पकड़ उन्हें हिंदी-आलोचना की परंपरा की ओर मुखातिब करने का काम ही किया है.

कृष्ण कल्पित के हस्तक्षप दूरगामी होते हैं. पहले वह एक कंकड़ फेंकते हैं, हलचल होती है और फिर जाल सहित नदी में कूदते हैं. कृष्ण कल्पित को कभी नदी किनारे जाल सुखाते नहीं देखा गया है. वैसे भी रेगिस्तान के एक कवि को नदी मिल जाए और वह किनारे बैठे जाल सुखाएगा, इसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती.

केदारनाथ सिंह कृत ‘बनारस’ कविता पर कृष्ण कल्पित का यह लेख एक शोध-प्रस्ताव (synopsis) है, या कह सकते हैं कि abstract है. नयी समीक्षा और एफ़.आर. लीविस के स्क्रूटिनी ग्रुप की आलोचना को भी देखें तो वे शोध-प्रबंध नहीं होकर abstract लगते हैं, नामवर सिंह की कहानी-कविता आलोचना का एक बड़ा हिस्सा इसे दायरे का ही है.

कृष्ण कल्पित केदारनाथ सिंह की कविता के संदर्भ में ‘काव्य-बिम्ब की प्रासंगिकता और सार्थकता’ का सवाल उठा रहे हैं, यह सवाल भी नया नहीं है. नामवर सिंह ने कहीं लिखते हुए केदारनाथ सिंह के ‘सप्तक रूप’ को ऐसे याद करते हैं, “ बिम्बों की लड़ी देखकर लगता है कि यह चरखे से निकले सूत की तरह चाहे जितनी लम्बी हो सकती थी. इसका आकस्मिक अंत अनिवार्य नहीं, बल्कि सुविधाजन्य है… कविता में अंतर्निहित कोई तर्क नहीं, बल्कि और अधिक चमत्कारपूर्ण बिम्बों को ढूंढ़ने के प्रयास से उपराम ही प्रतीत होता है. यदि बिम्ब-विधायक वस्तुओं की प्रकृति का विश्लेषण करें तो वास्तविक और काल्पनिक, भयावह और प्रीतिकर गुण-धर्मों का अद्भुत संयोग दिखाई पड़ता है. निस्संदेह इसके अनागत के भय-आशा—मिश्रित रूप की व्यंजना होती है. किंतु यह मिश्रण इतना अनिश्चित और अस्पष्ट है कि अभीष्ट से अधिक अनायासलभ्य प्रतीत होता है. कहना न होगा कि ये बिम्बधर्मी असंगतियां कविता के मूल कथ्य की असंगतियां हैं, जो अंततः कवि-कर्म की कमजोरी प्रकट करती हैं.”

नामवर तो शुरुआती केदार के बारे में ऐसी बातें कह रहे थे, लेकिन कृष्ण कल्पित इसे केदार के समूचे काव्य-व्यक्तित्व की सच्चाई मानते हैं.

दुःख है कि जो काम हिंदी-आलोचना और आलोचकों का है, वह भार भी एक कवि ढो रहा है. और यह मानने में शायद ही गुरेज होना चाहिए कि कृष्ण कल्पित का यह abstract ‘बनारस’ के संदर्भ में एक महत्वपूर्ण प्रस्थान साबित होगा. #तिरछी spelling 

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Photo By Marcin Ryczek

केदार जी का बनारस: अर्धक अस्ति अर्धक नास्ति

By कृष्ण कल्पित

केदारनाथ सिंह की कविता बनारस  रिपोर्ताज़ (Riportage) शैली में लिखी गई कविता है, जो मोहक बिम्बों (Romantic imagery) से लदी हुई है।

फ़ारसी के महाकवि हाफ़िज़ का कहना था कि जब भी रेगिस्तान पर लिखो तो इस बात का ध्यान रहे कि उसमें ऊँट न आये। अगर केदारजी की ‘बनारस’ कविता को रेगिस्तान समझा जाये तो यहाँ ऊँट ही ऊँट नज़र आते हैं।

बनारस के जितने भी प्रतीक हैं, वे यहाँ अपनी पूरी सज-धज के साथ मौज़ूद हैं – जल, नाव, घाट, शँख, गंगा, शव, खाली कटोरा, सूर्य, अर्घ्य, मडुआडीह इत्यादि। केदारजी इस कविता में आज के बनारस को नहीं बल्कि कालातीत बनारस की खोज करते हैं।

एक बार केदारजी अमेरिका में कविता-पाठ के लिए गये तो उन्होंने बनारस  कविता का पाठ किया। यह कविता सुनकर एक वृद्ध महिला रोने लगी। इस घटना का केदारजी के शिष्य किसी चमत्कार की तरह वर्णन करते हैं। जैसे कि मंगलेश डबराल अपने एक साक्षात्कार में इस बात की पुष्टि करते हैं कि उनकी कविता पढ़कर गुजरात के किसी व्यक्ति ने आत्महत्या का इरादा बदल लिया।

यह सही है कि भारतदेश में किसी चमत्कार के बिना किसी को बड़ा कवि नहीं समझा जाता। मध्यकाल के सभी बड़े कवियों के साथ किसी न किसी चमत्कार की कथा जुड़ी हुई है। लेकिन इस घटना के बारे में ख़ुद केदारजी ने लिखा है कि मैंने तो सिर्फ़ शीर्षक ही पढ़ा था – बनारस – कि वह बुज़ुर्ग महिला रोने लगी। ज़ाहिर है कि वह महिला कविता सुनकर नहीं बल्कि बनारस शहर की प्राचीनता, रहस्यमयता और आध्यात्मिकता को याद करके रोने लगी थी।

बनारस  कविता का उत्कर्ष (Climax) यह है कि यह आधा जल में है, आधा मंत्र में है और आधा है और आधा नहीं। क्या ये पंक्तियां आपको किसी संस्कृत श्लोक का भावानुवाद नहीं लगतीं? यह भी सम्भव है कि यह मंत्र ख़ुद केदारजी ने रचा हो क्योंकि बिना किसी श्लोक के बनारस पर विश्वसनीय कविता लिखना असम्भव है।

बनारस एक रहस्यमय नगर है। पुराने से भी पुराना। दो पुराने से भी पुराना। इसकी प्राचीनता और रहस्यमयता प्राचीनकाल से आज तक रचनाकारों के लिये आकर्षण का केंद्र रही है। मिर्ज़ा ग़ालिब भी इस आकर्षण से बच नहीं सके, जो इसे आदि से अंत तक मस्त-मलंगों की राजधानी कहते हैं।

आधुनिक हिंदी साहित्य में बनारस को लेकर जिन उल्लेखनीय रचनाओं का सृजन हुआ है उनमें शिवप्रसाद मिश्र ‘रुद्र’ की ‘बहती गंगा’, जयशंकर प्रसाद की कहानी ‘गुंडा’, शिवप्रसाद सिंह की उपन्यास त्रयी, जिसमें सिर्फ़ ‘गली आगे मुड़ती है’ ही पठनीय है। काशीनाथ सिंह का बहुचर्चित उपन्यास या रिपोर्ताज़ ‘काशी का अस्सी’, जहाँ भदेस ही कथ्य है। इन तमाम गद्य कृतियों में रुद्र काशिकेय की ‘बहती गंगा’ सर्वश्रेष्ठ है – एक मॉडर्न क्लासिक।

आधुनिक हिंदी कविता में धूमिल के यहाँ बनारस के चमकते हुये घाट दिखाई पड़ते हैं, जहाँ स्त्रियाँ योनि की सफलता के बाद गीत गा रही हैं। ज्ञानेन्द्रपति भी पिछले तीस बरसों से अपनी कविताओं में बनारस की अक्कासी कर रहे हैं। ज्ञानेन्द्रपति प्राचीन बनारस की तरफ़ देखते भी नहीं। वे पटना क़लम के कलाकार की तरह साधारण मनुष्यों और बनारस के जनजीवन के चित्र उकेर रहे हैं। केदारजी की संस्तुति पर जब ज्ञानरंजन ने ज्ञानेन्द्रपति को ‘पहल’ सम्मान देते हुये कहा था – अभी ज्ञानेन्द्रपति बनारस में और धँसेंगे। देखिये!

बनारस पर केदारजी की सिर्फ़ यही एक कविता है, जो श्लोकों, प्रतीकों, बिंबों और मिथकों से जड़ित है। इस कविता में कोई आंतरिक प्रवाह नहीं है, कोई दीर्घ-आलाप नहीं। यहाँ सब कुछ जड़ित है। ‘बनारस’ कविता में केदारजी कवि कम और एक कुशल शिल्पी दिखाई पड़ते हैं।

बनारस  की तरह केदारजी की कविता में केवल एक मुसलमान है – नूर मियाँ। नूर मियाँ केदारजी का सिकन्दर बख़्त है।

बनारस जैसे प्राचीन नगर से टकराकर आधुनिक हिंदी कविता में कोई बड़ी रचना सम्भव हुई है तो वह श्रीकांत वर्मा की ‘मगध’ है। सुनते हैं कि ‘मगध’ की रचना से पूर्व श्रीकांत वर्मा तीन महीनों तक अपनी पहचान छुपाकर बनारस की गलियों में भटकते रहे थे। ‘मगध’ निसन्देह एक क्लासिक रचना है जहाँ प्राचीन जनपदों, नगरों, प्रतीकों के जरिये आधुनिक सभ्यता के हाहाकार को बहुत मार्मिक ढंग से व्यक्त किया गया है।

इसके बरक्स केदारजी का बनारस  कालातीत बनारस है, जो शताब्दियों से अपनी एक टांग पर खड़े होकर सूर्य को अर्घ्य दे रहा है। केदारजी लगता है बनारस पर कविता नहीं लिख रहे बल्कि कोई पेंटिंग बना रहे हैं और इस चक्कर में वे इतनी सारी चीज़ें कैनवास पर अंकित कर देते हैं कि उसका प्रभाव बिखर जाता है।

कोई करुणा, कोई वेदना, कोई विडम्बना, कोई केंद्रीय कथ्य ‘बनारस’ कविता में नज़र नहीं आता।

न यह सत्यजित रे का बनारस है, न मक़बूल फ़िदा हुसेन का, न रामकुमार का, न एलन गिन्सबर्ग का। यह केदारजी का बनारस है – गीता प्रेस गोरखपुर के यथार्थवादी कैलेंडर जैसा।

इस कविता की शुरुआत में जब मडुआडीह की तरफ़ से बनारस की तरफ़ जो धूल का जो बवंडर आता है और बनारस कंठ किरकिराने लगता है तो पाठक की आशा जगती है लेकिन अंत तक आते-आते शताब्दियों से एक टांग पर खड़े होकर सूर्य को अर्घ्य देता बनारस कविता को मटियामेट कर देता है ।

केदारजी कहते हैं कि बनारस में सब कुछ धीरे-धीरे होता है। मुझे लगता है कि धीरे-धीरे केदारजी के इस अति प्रशंसित (Over rated) आधुनिक शाहकार को भुला दिया जायेगा!

यह ऐसा ही है कि पेरिस पर लिखी कविता का अंत एफिल टॉवर से किया जाये । किसी शहर पर कैसे कविता लिखी जाती है वह हम फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ की पेरिस पर लिखी कविता पढ़कर जान सकते हैं ।

बनारस  कविता केदारजी की बाघ सीरीज़ की तरह महत्वाकांक्षी पर असफल कविता है ।

 

कृष्ण कल्पित

अपने तरह का अकेला-बेबाक और विवादित कवि । कृष्ण कल्पित का जन्म 30 अक्टूबर, 1957 को रेगिस्तान के एक कस्बे फतेहपुर शेखावटी में हुआ। अब तक कविता की तीन किताबें और मीडिया पर समीक्षा की एक किताब छप चुकी है। एक शराबी की सूक्तियां  के लिए खासे चर्चित। ऋत्विक घटक के जीवन पर एक पेड की कहानी नाम से एक वृत्तचित्र भी बना चुके हैं।  अभी  हाल ही में बाग़-ए-बेदिल नाम से  एक विलक्षण  और विशाल  काव्य-संकलन  के साथ-साथ ‘कविता-रहस्य ‘ नामक पुस्तक प्रकाशित । 

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