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नंगे-फ़क़ीर सरमद के क़त्ल की दास्तान: कृष्ण कल्पित

सरमद शहीद पर लिखी जा रही लंबी-कविता अथवा काव्याख्यान पूरा हुआ ।

दो महीने से इस मुश्किल काम में लगा हुआ था। इतनी सामग्री इकट्ठा करली कि उसमें फँस के रह गया था। किसी शख़्सियत पर कविता लिखना आसान काम नहीं। चाहे वह पौराणिक हो ऐतिहासिक हो या फिर समकालीन। यह निश्चय ही ज़ोखिम का काम है।

बहुत सी कविताएँ याद आईं । निराला की ‘राम की शक्तिपूजा’, मायकोव्स्की की ‘लेनिन’, धूमिल की राजकमल चौधरी और नागार्जुन की केदारनाथ अग्रवाल पर लिखी कविता । अर्नेस्टो कार्देनाल की मर्लिन मुनरो पर लिखी कविता और बर्तोल्त ब्रेख़्त की Lao Tzu : Legend of the Book Tao-Te-Ching on Lao Tzu’s Road into Exile । ( हालांकि ब्रेख़्त की कविता लाओ त्ज़े पर कम उसकी 81 सूक्तियों की क्लासिक-किताब पर अधिक है )

100 से ऊपर पंक्तियों की कविता  ‘सरमद : जामा मस्जिद की सीढ़ियों पर एक नँगे फ़क़ीर के क़त्ल की दास्तान’ आपके समक्ष है।  #कृष्ण कल्पित

Sarmad by Sadequain

सरमद शहीद से प्रेरित सादेकैन की एक  कृति 

जामा मस्जिद की सीढ़ियों पर एक नंगे-फ़क़ीर के क़त्ल की दास्तान

By कृष्ण कल्पित

उम्रेस्त कि आवाज़-ए-मंसूर कुहन शुद
मन अज़ सरे नो जलवा देहम दारो रसनरा !
( मंसूर की प्रसिद्धि पुरानी हो गई । मैं सूली पर चढ़ने का दृश्य नये सिरे से पैदा करता हूँ । )

(१)

-आप इतने बड़े विद्वान हैं, फिर भी नंगे क्यों रहते हैं ?

दिल्ली के शहर क़ाज़ी मुल्ला क़वी के सवाल के जवाब में सरमद ने कहा :
शैतान बलवान (क़वी) है !

शहर क़ाज़ी को लगा कि सरमद उसे शैतान कह रहा है । मुल्ला की भृकुटियाँ तन ही रही थी कि सरमद ने फिर कहा :
एक अजीब चोर ने मुझे नंगा कर दिया है !

(२)

शहर क़ाज़ी मुल्ला क़वी को आलमगीर औरंगज़ेब ने सरमद के पास भेजा था – उसकी नग्नता का रहस्य जानने के लिये । औरंगज़ेब शाहजहाँ के बाद दारा शिकोह को ठिकाने लगाकर बादशाह बना था । औरंगज़ेब जानता था कि दारा शिकोह सरमद की संगत में था और उसके बादशाह बनने की भविष्यवाणी सरमद ने की थी ।

औरंगज़ेब के दिल में सरमद को लेकर गश था – वह उसे भी दारा शिकोह की तरह ठिकाने लगाना चाहता था लेकिन कोई उचित बहाना नहीं मिल रहा था । औरंगज़ेब जानता था कि बिना किसी वाजिब वजह के सरमद का क़त्ल करने से उसे चाहने वाले भड़क सकते थे – जिनकी सँख्या अनगिनत थी ।

औरंगज़ेब क़ातिल होने के साथ धर्मपरायण भी था और बादशाह होने के बावजूद टोपियाँ सिलकर अपना जीवन-यापन करता था ।

(३)

क़ाज़ी मुल्ला क़वी ने दरबार में उपस्थित होकर सरमद का हाल सुनाया और सरमद की मौत का फ़तवा जारी करने के लिये क़लमदान का ढक्कन खोल ही रहा था कि औरंगज़ेब ने उसे इशारे से रोक दिया और कहा :
नग्नता किसी की मौत का कारण नहीं हो सकती ।

औरंगज़ेब जितना अन्यायप्रिय था उतना ही न्यायप्रिय भी था !

(४)

तब आलमगीर ने अन्याय को न्याय साबित करने के लिये धर्माचार्यों की सभा आहूत की । सरमद को भी बुलवाया गया ।

सर्वप्रथम औरंगज़ेब ने सरमद से पूछा :
सरमद, क्या यह सच है कि तुमने दारा शिकोह के बादशाह बनने की भविष्यवाणी की थी ?

सरमद ने स्वीकृति में सर हिलाया और कहा :
मेरी भविष्यवाणी सच साबित हुई । दारा शिकोह अब समूचे ब्रह्मांड का बादशाह है ।

इसके बाद धर्मसभा के अध्यक्ष सिद्ध-सूफ़ी ख़लीफ़ा इब्राहिम बदख़्शानी ने सरमद से उसकी नग्नता का कारण पूछा । सरमद ख़ामोश रहा । फिर पूछा गया तो सरमद ने वही जवाब दिया जो उसने शहर क़ाज़ी को दिया था :
एक अजीब चोर है जिसने मुझे नंगा कर दिया !

तब ख़लीफ़ा ने सरमद को इस्लाम के मूल सूत्र कलमाये तैयब ( लाइलाहा इल्लल्लाह अर्थात कोई नहीं अल्लाह के सिवा ) पढ़ने के लिये कहा ।

सरमद के विरुद्ध यह भी शिकायत थी कि वह जब भी कलमा पढ़ता है, अधूरा पढ़ता है । अपनी आदत के अनुसार सरमद ने पढ़ा :
लाइलाहा ।

सरमद को जब आगे पढ़ने को कहा गया तो सरमद ने कहा कि मैं अभी यहीं तक पहुँचा हूँ कि कोई नहीं है । आगे पढूँगा तो वह झूठ होगा कयोंकि आगे के हर्फ़ अभी मेरे दिल में नहीं पहुँचे हैं । सरमद ने दृढ़ शब्दों में कहा कि मैं झूठ नहीं बोल सकता ।

बादशाह औरंगज़ेब, धर्मसभा के अध्यक्ष ख़लीफ़ा बदख़्शानी, शहर क़ाज़ी मुल्ला क़वी के साथ समूची धर्मसभा और पूरा दरबार सरमद का जवाब सुनकर सकते में था । ख़लीफ़ा ने कहा :
यह सरासर इस्लाम की अवमानना है, कुफ़्र है । अगर सरमद तौबा न करे, क्षमा न मांगे तो इसे मृत्युदंड दिया जाये

(५)

जब सरमद ने तौबा नहीं की क्षमा माँगने से इंकार कर दिया तो धर्माचार्यों की सभा और बादशाह की सहमति से शहर क़ाज़ी मुल्ला क़वी ने क़लमदान का ढक्कन खोला, उसमें क़लम की नोक डुबोई और काग़ज़ पर सरमद के मृत्युदंड का फ़रमान लिख दिया ।

अपनी मौत का फ़रमान सुनकर सरमद को लगा जैसे वह बारिश की फुहारों का संगीत सुन रहा है । वह भीतर से भीग रहा था जैसे उसकी फ़रियाद सुन ली गई है जैसे उसे अपनी मंज़िल प्राप्त हो गई है ।

सरमद अब कुफ़्र और ईमान के परे चला गया था । सरमद ने सोचा :
कितने फटे-पुराने वस्त्रों वाले साधु-फ़क़ीर गुज़र गये – अब मेरी बारी है ।

(६)

सरमद, तू पूरी दुनिया में अपने नेक कामों के नाते जाना जाता है । तूने कुफ़्र को छोड़कर इस्लाम धारण किया । तुझे ख़ुदा के काम में क्या कमी नज़र आई जो अब तुम राम नाम की माला जपने लगा !

सरमद को अपनी ही रुबाई याद आई और अपना पूरा जीवन आँखों के सामने चलचित्र की तरह घूमने लगा ।

पहले अरमानी-यहूदी, फिर मुस्लिम और अब हिन्दू !

सरमद जब अरब से हिंदुस्तान की तरफ़ चला था तो वह एक धनी सौदागर था । उसे वह लड़का याद आया, जिससे सिंध के ठट्टा नामक क़स्बे में उसकी आँख लड़ गई थी । इस अलौकिक मोहब्बत में उसने अपनी सारी दौलत उड़ा दी। सरमद दीवानगी में चलते हुये जब दिल्ली की देहरी में घुसा तो एक नंगा फ़क़ीर था ।

उसे वे धूल भरे रास्ते याद आये , जिस से चलकर वह यहाँ पहुँचा था ।

और सरमद को उस हिन्दू ज्योतिषी की याद आई जिसने उसकी हस्त-रेखाएँ देखकर यह पहेलीनुमा भविष्यवाणी की थी :

तुम्हारे मज़हब के तीसरे घर में मृत्यु बैठी हुई है!

(७)

अगले दिन सरमद को क़त्ल करने के लिये जामा मस्जिद की सीढ़ियों पर ले जाया गया, जहाँ इतनी भीड़ थी कि पाँव धरने की जगह नहीं थी । कुछ तमाशा देखने तो अधिकतर अपने प्रिय सरमद की मौत पर आँसू बहाने आये थे।जामा मस्जिद की सबसे ऊँची सीढ़ी पर खड़े होकर सरमद ने यह शे’र पढ़ा :

शोरे शुद व अज़ ख़्वाबे अदम चश्म कशुदेम

दी देम कि बाकीस्त शबे फ़ितना गुनूदेम !

( एक शोर उठा और हमने ख़्वाबे-अदम से आँखें खोलीं तो देखा – कुटिल-रात्रि अभी शेष है और हम चिर-निद्रा के प्रभाव में हैं । )

इसके बाद अपनी गर्दन को जल्लाद के सामने झुकाकर सरमद फुसफुसाया :

आओ, तुम जिस भी रास्ते से आओगे, मैं तुझे पहचान लूँगा !

(८)

सरमद का कटा हुआ सर जामा मस्जिद की सीढ़ियों से नृत्य करता हुआ लुढ़कता रहा ।सरमद के कटे हुये सर को उसके पीर हरे भरे शाह ने अपने आगोश में ले लिया । पवन पवन में मिल गई – जैसे कोई विप्लव थम गया हो !

(९)

मुस्लिम इतिहासकार वाला दागिस्तानी ने अपनी किताब में लिखा है कि वहाँ उपस्थित लोगों का कहना था कि जामा मस्जिद की सीढ़ियों से ज़मीन तक पहुँचते हुये सरमद के कटे हुये सर से यह आवाज़ निकलती रही :
ईल्लल्लाह   ईल्लल्लाह  ईल्लल्लाह
और यह भी प्रवाद है कि सरमद के कटे हुये सर से बहते हुये लहू ने जामा मस्जिद की सीढ़ियों पर जो इबारत लिखी गई उसे इस तरह पढा जा सकता था :
लाइलाहा  लाइलाहा लाइलाहा !

(१०)

इतिहास की किताबों में सरमद शहीद का ज़िक़्र मुश्किल से मिलता है लेकिन जामा मस्जिद के सामने बने सरमद के मज़ार पर आज भी उसके चाहने वालों की भीड़ लगी रहती है । यह जुड़वाँ मज़ार है । हरे भरे शाह और शहीद सरमद के मज़ार ।हरे भरे शाह और सरमद । जैसे निज़ामुद्दीन औलिया और अमीर ख़ुसरो । पीरो-मुरीद । एक हरा । एक लाल ।

इन के बीच नीम का एक घेर-घुमावदार, पुराना वृक्ष है जिससे सारे साल इन जुड़वाँ क़ब्रों पर नीम की निम्बोलियाँ टपकती रहती हैं ।

और जब दिल्ली की झुलसा देने वाली गर्मी से राष्ट्रपति-भवन के मुग़ल-गॉर्डन के फूल मुरझाने और घास पीली पड़ने लगती है तब भी सरमद के मज़ार के आसपास हरियाली कम नहीं होती । सरमद की क़ब्र के चारों तरफ़ फूल खिले रहते हैं और घास हरी-भरी रहती है !

(११)

ख़ूने कि इश्क़ रेज़द हरगिज़ न बाशद

( इश्क़ में जो ख़ून बहता है वह कदापि व्यर्थ नहीं जाता ! )

■     ■    ■

Krishna Kalpitअपने तरह का अकेला-बेबाक और विवादित कवि । कृष्ण कल्पित का जन्म 30 अक्टूबर, 1957 को रेगिस्तान के एक कस्बे फतेहपुर शेखावटी में हुआ। अब तक कविता की तीन किताबें और मीडिया पर समीक्षा की एक किताब छप चुकी है। एक शराबी की सूक्तियां  के लिए खासे चर्चित। ऋत्विक घटक के जीवन पर एक पेड की कहानी नाम से एक वृत्तचित्र भी बना चुके हैं।  अभी  हाल ही में बाग़-ए-बेदिल नाम से एक विलक्षण  और विशाल  काव्य-संकलन  के साथ-साथ ‘कविता-रहस्य ‘ नामक  पुस्तक प्रकाशित । 

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गीता प्रेस के कैलेंडर जैसा है केदारजी का ‘बनारस’: कृष्ण कल्पित

छवियों से मोहग्रस्त कवि कब ख़ुद एक छवि बन जाता है और ‘पाठकों’ से भरा-पूरा रहने वाला हिंदी समाज कैसे ख़ुद मोहग्रस्त हो जाता है, यह हिंदी की एक समकालीन घटना है.

छवि-निर्माण के इस सायास-अनायास प्रयास को तोड़ने का यह पहला प्रयास हिंदी में (सुविधानुसार, अगर आप इसे तात्कालिक भी कहना चाहें तब भी) कृष्ण कल्पित के कारण संभव हुआ.

रामविलास शर्मा को ‘फ़ासिस्ट’ क़रार देने का जैसा संगठित प्रयास नामवर-नेतृत्व में ‘आलोचना’ द्वारा हुआ था. साहित्य संसार की उस समय की चुप्पी याद आती है, लेकिन केदारनाथ सिंह प्रसंग में आलोचना के कुछ बिंदुओं को उभारना भर कृष्ण कल्पित को कोप-भाजन का शिकार बना देता है.

केदार-संदर्भ में उन्होंने कोई नयी बात की है, ऐसा भी नहीं है, बल्कि उन्होंने तो हिंदी-बौद्धिकों का कान पकड़ उन्हें हिंदी-आलोचना की परंपरा की ओर मुखातिब करने का काम ही किया है.

कृष्ण कल्पित के हस्तक्षप दूरगामी होते हैं. पहले वह एक कंकड़ फेंकते हैं, हलचल होती है और फिर जाल सहित नदी में कूदते हैं. कृष्ण कल्पित को कभी नदी किनारे जाल सुखाते नहीं देखा गया है. वैसे भी रेगिस्तान के एक कवि को नदी मिल जाए और वह किनारे बैठे जाल सुखाएगा, इसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती.

केदारनाथ सिंह कृत ‘बनारस’ कविता पर कृष्ण कल्पित का यह लेख एक शोध-प्रस्ताव (synopsis) है, या कह सकते हैं कि abstract है. नयी समीक्षा और एफ़.आर. लीविस के स्क्रूटिनी ग्रुप की आलोचना को भी देखें तो वे शोध-प्रबंध नहीं होकर abstract लगते हैं, नामवर सिंह की कहानी-कविता आलोचना का एक बड़ा हिस्सा इसे दायरे का ही है.

कृष्ण कल्पित केदारनाथ सिंह की कविता के संदर्भ में ‘काव्य-बिम्ब की प्रासंगिकता और सार्थकता’ का सवाल उठा रहे हैं, यह सवाल भी नया नहीं है. नामवर सिंह ने कहीं लिखते हुए केदारनाथ सिंह के ‘सप्तक रूप’ को ऐसे याद करते हैं, “ बिम्बों की लड़ी देखकर लगता है कि यह चरखे से निकले सूत की तरह चाहे जितनी लम्बी हो सकती थी. इसका आकस्मिक अंत अनिवार्य नहीं, बल्कि सुविधाजन्य है… कविता में अंतर्निहित कोई तर्क नहीं, बल्कि और अधिक चमत्कारपूर्ण बिम्बों को ढूंढ़ने के प्रयास से उपराम ही प्रतीत होता है. यदि बिम्ब-विधायक वस्तुओं की प्रकृति का विश्लेषण करें तो वास्तविक और काल्पनिक, भयावह और प्रीतिकर गुण-धर्मों का अद्भुत संयोग दिखाई पड़ता है. निस्संदेह इसके अनागत के भय-आशा—मिश्रित रूप की व्यंजना होती है. किंतु यह मिश्रण इतना अनिश्चित और अस्पष्ट है कि अभीष्ट से अधिक अनायासलभ्य प्रतीत होता है. कहना न होगा कि ये बिम्बधर्मी असंगतियां कविता के मूल कथ्य की असंगतियां हैं, जो अंततः कवि-कर्म की कमजोरी प्रकट करती हैं.”

नामवर तो शुरुआती केदार के बारे में ऐसी बातें कह रहे थे, लेकिन कृष्ण कल्पित इसे केदार के समूचे काव्य-व्यक्तित्व की सच्चाई मानते हैं.

दुःख है कि जो काम हिंदी-आलोचना और आलोचकों का है, वह भार भी एक कवि ढो रहा है. और यह मानने में शायद ही गुरेज होना चाहिए कि कृष्ण कल्पित का यह abstract ‘बनारस’ के संदर्भ में एक महत्वपूर्ण प्रस्थान साबित होगा. #तिरछी spelling 

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Photo By Marcin Ryczek

केदार जी का बनारस: अर्धक अस्ति अर्धक नास्ति

By कृष्ण कल्पित

केदारनाथ सिंह की कविता बनारस  रिपोर्ताज़ (Riportage) शैली में लिखी गई कविता है, जो मोहक बिम्बों (Romantic imagery) से लदी हुई है।

फ़ारसी के महाकवि हाफ़िज़ का कहना था कि जब भी रेगिस्तान पर लिखो तो इस बात का ध्यान रहे कि उसमें ऊँट न आये। अगर केदारजी की ‘बनारस’ कविता को रेगिस्तान समझा जाये तो यहाँ ऊँट ही ऊँट नज़र आते हैं।

बनारस के जितने भी प्रतीक हैं, वे यहाँ अपनी पूरी सज-धज के साथ मौज़ूद हैं – जल, नाव, घाट, शँख, गंगा, शव, खाली कटोरा, सूर्य, अर्घ्य, मडुआडीह इत्यादि। केदारजी इस कविता में आज के बनारस को नहीं बल्कि कालातीत बनारस की खोज करते हैं।

एक बार केदारजी अमेरिका में कविता-पाठ के लिए गये तो उन्होंने बनारस  कविता का पाठ किया। यह कविता सुनकर एक वृद्ध महिला रोने लगी। इस घटना का केदारजी के शिष्य किसी चमत्कार की तरह वर्णन करते हैं। जैसे कि मंगलेश डबराल अपने एक साक्षात्कार में इस बात की पुष्टि करते हैं कि उनकी कविता पढ़कर गुजरात के किसी व्यक्ति ने आत्महत्या का इरादा बदल लिया।

यह सही है कि भारतदेश में किसी चमत्कार के बिना किसी को बड़ा कवि नहीं समझा जाता। मध्यकाल के सभी बड़े कवियों के साथ किसी न किसी चमत्कार की कथा जुड़ी हुई है। लेकिन इस घटना के बारे में ख़ुद केदारजी ने लिखा है कि मैंने तो सिर्फ़ शीर्षक ही पढ़ा था – बनारस – कि वह बुज़ुर्ग महिला रोने लगी। ज़ाहिर है कि वह महिला कविता सुनकर नहीं बल्कि बनारस शहर की प्राचीनता, रहस्यमयता और आध्यात्मिकता को याद करके रोने लगी थी।

बनारस  कविता का उत्कर्ष (Climax) यह है कि यह आधा जल में है, आधा मंत्र में है और आधा है और आधा नहीं। क्या ये पंक्तियां आपको किसी संस्कृत श्लोक का भावानुवाद नहीं लगतीं? यह भी सम्भव है कि यह मंत्र ख़ुद केदारजी ने रचा हो क्योंकि बिना किसी श्लोक के बनारस पर विश्वसनीय कविता लिखना असम्भव है।

बनारस एक रहस्यमय नगर है। पुराने से भी पुराना। दो पुराने से भी पुराना। इसकी प्राचीनता और रहस्यमयता प्राचीनकाल से आज तक रचनाकारों के लिये आकर्षण का केंद्र रही है। मिर्ज़ा ग़ालिब भी इस आकर्षण से बच नहीं सके, जो इसे आदि से अंत तक मस्त-मलंगों की राजधानी कहते हैं।

आधुनिक हिंदी साहित्य में बनारस को लेकर जिन उल्लेखनीय रचनाओं का सृजन हुआ है उनमें शिवप्रसाद मिश्र ‘रुद्र’ की ‘बहती गंगा’, जयशंकर प्रसाद की कहानी ‘गुंडा’, शिवप्रसाद सिंह की उपन्यास त्रयी, जिसमें सिर्फ़ ‘गली आगे मुड़ती है’ ही पठनीय है। काशीनाथ सिंह का बहुचर्चित उपन्यास या रिपोर्ताज़ ‘काशी का अस्सी’, जहाँ भदेस ही कथ्य है। इन तमाम गद्य कृतियों में रुद्र काशिकेय की ‘बहती गंगा’ सर्वश्रेष्ठ है – एक मॉडर्न क्लासिक।

आधुनिक हिंदी कविता में धूमिल के यहाँ बनारस के चमकते हुये घाट दिखाई पड़ते हैं, जहाँ स्त्रियाँ योनि की सफलता के बाद गीत गा रही हैं। ज्ञानेन्द्रपति भी पिछले तीस बरसों से अपनी कविताओं में बनारस की अक्कासी कर रहे हैं। ज्ञानेन्द्रपति प्राचीन बनारस की तरफ़ देखते भी नहीं। वे पटना क़लम के कलाकार की तरह साधारण मनुष्यों और बनारस के जनजीवन के चित्र उकेर रहे हैं। केदारजी की संस्तुति पर जब ज्ञानरंजन ने ज्ञानेन्द्रपति को ‘पहल’ सम्मान देते हुये कहा था – अभी ज्ञानेन्द्रपति बनारस में और धँसेंगे। देखिये!

बनारस पर केदारजी की सिर्फ़ यही एक कविता है, जो श्लोकों, प्रतीकों, बिंबों और मिथकों से जड़ित है। इस कविता में कोई आंतरिक प्रवाह नहीं है, कोई दीर्घ-आलाप नहीं। यहाँ सब कुछ जड़ित है। ‘बनारस’ कविता में केदारजी कवि कम और एक कुशल शिल्पी दिखाई पड़ते हैं।

बनारस  की तरह केदारजी की कविता में केवल एक मुसलमान है – नूर मियाँ। नूर मियाँ केदारजी का सिकन्दर बख़्त है।

बनारस जैसे प्राचीन नगर से टकराकर आधुनिक हिंदी कविता में कोई बड़ी रचना सम्भव हुई है तो वह श्रीकांत वर्मा की ‘मगध’ है। सुनते हैं कि ‘मगध’ की रचना से पूर्व श्रीकांत वर्मा तीन महीनों तक अपनी पहचान छुपाकर बनारस की गलियों में भटकते रहे थे। ‘मगध’ निसन्देह एक क्लासिक रचना है जहाँ प्राचीन जनपदों, नगरों, प्रतीकों के जरिये आधुनिक सभ्यता के हाहाकार को बहुत मार्मिक ढंग से व्यक्त किया गया है।

इसके बरक्स केदारजी का बनारस  कालातीत बनारस है, जो शताब्दियों से अपनी एक टांग पर खड़े होकर सूर्य को अर्घ्य दे रहा है। केदारजी लगता है बनारस पर कविता नहीं लिख रहे बल्कि कोई पेंटिंग बना रहे हैं और इस चक्कर में वे इतनी सारी चीज़ें कैनवास पर अंकित कर देते हैं कि उसका प्रभाव बिखर जाता है।

कोई करुणा, कोई वेदना, कोई विडम्बना, कोई केंद्रीय कथ्य ‘बनारस’ कविता में नज़र नहीं आता।

न यह सत्यजित रे का बनारस है, न मक़बूल फ़िदा हुसेन का, न रामकुमार का, न एलन गिन्सबर्ग का। यह केदारजी का बनारस है – गीता प्रेस गोरखपुर के यथार्थवादी कैलेंडर जैसा।

इस कविता की शुरुआत में जब मडुआडीह की तरफ़ से बनारस की तरफ़ जो धूल का जो बवंडर आता है और बनारस कंठ किरकिराने लगता है तो पाठक की आशा जगती है लेकिन अंत तक आते-आते शताब्दियों से एक टांग पर खड़े होकर सूर्य को अर्घ्य देता बनारस कविता को मटियामेट कर देता है ।

केदारजी कहते हैं कि बनारस में सब कुछ धीरे-धीरे होता है। मुझे लगता है कि धीरे-धीरे केदारजी के इस अति प्रशंसित (Over rated) आधुनिक शाहकार को भुला दिया जायेगा!

यह ऐसा ही है कि पेरिस पर लिखी कविता का अंत एफिल टॉवर से किया जाये । किसी शहर पर कैसे कविता लिखी जाती है वह हम फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ की पेरिस पर लिखी कविता पढ़कर जान सकते हैं ।

बनारस  कविता केदारजी की बाघ सीरीज़ की तरह महत्वाकांक्षी पर असफल कविता है ।

 

कृष्ण कल्पित

अपने तरह का अकेला-बेबाक और विवादित कवि । कृष्ण कल्पित का जन्म 30 अक्टूबर, 1957 को रेगिस्तान के एक कस्बे फतेहपुर शेखावटी में हुआ। अब तक कविता की तीन किताबें और मीडिया पर समीक्षा की एक किताब छप चुकी है। एक शराबी की सूक्तियां  के लिए खासे चर्चित। ऋत्विक घटक के जीवन पर एक पेड की कहानी नाम से एक वृत्तचित्र भी बना चुके हैं।  अभी  हाल ही में बाग़-ए-बेदिल नाम से  एक विलक्षण  और विशाल  काव्य-संकलन  के साथ-साथ ‘कविता-रहस्य ‘ नामक पुस्तक प्रकाशित । 

जाने दो वह कवि कल्पित था : अविनाश मिश्र

कभी निराला के लिए नागार्जुन ने लिखा था : ‘‘उसे मरने दिया हमने रह गया छुट कर पवन/ अब भले ही याद में करते रहें सौ-सौ हवन।’’ यह लिखाई बताती है कि हिंदी साहित्य में मरण का बहुत माहात्म्य है, यह ज्ञानरंजन भी बहुत पूर्व में कह चुके हैं। मुझे यह कहना भला तो नहीं लग रहा है, लेकिन मुझे लगता है कि कृष्ण कल्पित के जीते-जी शायद उन्हें वह प्रतिष्ठा नहीं मिलेगी जिसके वह हकदार हैं। आज हिंदी साहित्य में कृष्ण कल्पित का मौखिक और कुटिल विरोध उनके लिखित विरोध से कई गुना बढ़ चुका है। उन पर हो रहे आक्रमण कभी निराला पर हुए आक्रमणों की याद दिलाते हैं। इस तरह देखें तो हिंदी कविता और आवारगी की ही नहीं कृष्ण कल्पित अपमान की परंपरा को भी आगे बढ़ा रहे हैं। इस अपमान में भी आनंद की तलाश उनकी सहज-वृत्ति है। इसके लिए वह जिस सिद्ध ‘विट’ तक जाते हैं, वह एक साथ उनके कुछ मित्रों और कई शत्रुओं का निर्माण करती है। इन शत्रुओं में औसत कवि-कवयित्री, फूहड़ लेखक-लेखिकाएं, मतिमंद और माफिया आलोचक, अर्थपिशाच प्रकाशक, काहिल प्राध्यापक और उनके निकम्मे शोधार्थी, मानसिक रूप से दिवालिए पत्रकार, चालू और हद दर्जे के बेवकूफ टिप्पणीकार, भ्रमरवृत्तिदक्ष दलाल और प्रतिभा-प्रभावशून्य युवक-युवतियां शामिल हैं। इस पर सोचा जाना चाहिए कि आखिर एक कवि इतने सारे मूर्त शत्रुओं के बीच रहकर कैसे काम करता है. #लेखक 

परंपरा का आवारापन

कृष्ण कल्पित की कविता-सृष्टि पर एकाग्र

 

By  अविनाश मिश्र  

‘‘आलोचक कवि हो यह जरूरी नहीं, लेकिन कवि का आलोचक होना अपरिहार्य है!’’

यह कहने वाले समकालीन हिंदी कविता के सबसे आवारा कवि कृष्ण कल्पित कवियों में सबसे बड़े शराबी और शराबियों में सबसे बड़े कवि हैं। एक आलोचनात्मक आलेख के लिहाज से यह शुरुआत कुछ अजीब और भारहीन लग सकती है, लेकिन मैं चाहता हूं कि जैसे कृष्ण कल्पित (कृ.क.) को कविता नसीब हुई है, वैसे ही मुझे उनकी कविता की आलोचना नसीब हो।

इस आलोचना के केंद्र में वे असर हैं जो मेरे उत्साह में मुझ तक विष्णु खरे के जरिए, विष्णु खरे तक मुक्तिबोध के जरिए, मुक्तिबोध तक निराला के जरिए, निराला तक कबीर के जरिए, कबीर तक बाणभट्ट के जरिए और बाणभट्ट तक वाल्मीकि के जरिए आए। लेकिन कहां ये तेजस्वी और पराक्रमी कवि-आलोचक और कहां अत्यंत अल्प बौद्धिकता वाला मैं! मुझे यह बहुत अच्छी तरह मालूम है कि जिस परंपरा में कृ.क. आवारगी करते रहे हैं, उसमें मेरी गति बहुत क्षीण है। इस गति के बावजूद मैं कृ.क. की कविता-सृष्टि पर एकाग्र होकर कुछ कहने का प्रयत्न कर रहा हूं और इस सिलसिले में विष्णु खरे की एक कविता ‘कूकर’ मेरे साथ चलने लगी है।

हिंदी कविता संसार में एक लंबे समय तक कृ.क. के नाम के आगे गलत या प्रश्न का निशान लगाया जाता रहा है, लेकिन अब यह एक तथ्य और सच्चाई मालूम पड़ती है कि कृ.क. पूरब की कविता की पूरी परंपरा को देखने वाले अपनी और अपने से ठीक पूर्व की पीढ़ी में एकमात्र आवारा कवि हैं। अपने नियमों से ही अपना खेल खेलते हुए वह कविता की दुनिया में किसी और के खेल में शामिल होने वाले बेवकूफों, कायरों और शोहदों में नहीं हैं और उनसे दूर भी रहे हैं।

दिशाओं में गर्क हो जाने की ख्वाहिश रखने वाले वह उन कवियों में से हैं जिन्होंने अपने शुरुआती रियाज को भी शाया करवाया है। इस रियाज को अगर रियाज ही माना जाए, तब हिंदी कविता की मुख्यधारा में सही मायनों में कृ.क. का काव्य-प्रवेश साल 1990 में आए ‘बढ़ई का बेटा’ से होता है। इस संग्रह की आखिरी कविता कवियों के मुख्यधारा तक आने, उसमें भटकने, खटने और खो-खप जाने को बयां करती है :

बहुत दूर से चलकर दिल्ली आते हैं कवि

भोजपुर से मारवाड़ से संथाल परगना से मालवा से

छत्तीसगढ़ से पहाड़ से और पंजाब से चलकर

दिल्ली आते हैं कवि

जैसे कामगार आते हैं छैनी-हथौड़ा लेकर

रोजी-रोटी की तलाश में

[ कवियों की कहानी ]

 

इस काव्य-प्रवेश से एक दशक पूर्व ‘भीड़ से गुजरते हुए’ के गीतों से पहले एक भूमिका में कवि ने दर्ज किया :

अभी मैं हांफ रहा हूं

मुझे सुनने को आतुर लोगों

अभी मैं हांफ रहा हूं

जब मैं हांफने की

पूरी यात्रा तय कर लूंगा

तब मैं पूरी कथा कहूंगा

कृ.क. के कवि के इस शाया रियाज में रेतीली स्थानीयता की विसंगतियां थीं, प्रेमानुभव थे और ‘दर्द जितना भी मिला, प्यास बनकर पी गए’ वाली रूमानियत और शहादत थी। इसमें लोक-संवेदना और विस्थापन की मार थी। लय से लगाव और छंद का ज्ञान साथ लिए इस रियाज में एक अनूठा कथा-तत्व था, इसलिए इसे कथा-गीत कहकर भी पुकारा गया :

राजा रानी प्रजा मंत्री बेटा इकलौता

एक कहानी सुनी थी जिसका अंत नहीं होता

इस रियाज ने एक आवारागर्द अक्ल रखने वाले कृ.क. की कवि-छवि का बहुत दूर तक नुकसान किया। इसने हिंदी कविता की व्यावहारिक राजनीति को यह छूट दी कि वह कृ.क. के कवि के इर्द-गिर्द प्रश्नवाचकता का वृत्त निर्मित करे और इसे बहुत दूर तक विस्फारित कर सके। इस वृत्त में ‘कैद’ कवि का काव्य-संघर्ष इसलिए बहुत उल्लेख्य है क्योंकि उसकी कविता पहले गीत की रूढ़ संवेदना से बाहर आई, फिर आठवें दशक के फॉरमूलों से और फिर नवें दशक के नक्शे से भी। इस प्रकार एक सीधी गति में सफर करते हुए कृ.क. की कविता आज सारे दायरों को ध्वस्त कर अपना एक अलग देश बना चुकी है और यह कहना सुखद है कि छूट चुके मरहलों से उसके रिश्ते अब भी अच्छे हैं।

प्रस्तुत सामयिकता में कृ.क. की कविताएं अभ्यस्त मुहावरों और काव्य-समझ की कविताएं नहीं हैं। इस वक्त हिंदी में कविता के जितने भी सांचे हैं — प्रतिबद्ध कविता, वैचारिक कविता, सैद्धांतिक कविता, राजनीतिक कविता, क्रांतिकारी कविता, ऐतिहासिक कविता, वैश्विक कविता, आंचलिक कविता, प्राकृतिक कविता, सांस्कृतिक कविता, लोक कविता, ग्रामीण कविता, कस्बाई कविता, नागर कविता, पर्वतीय कविता, स्त्रीवादी कविता, दलित कविता, आदिवासी कविता, अल्पसंख्यक कविता, सर्वहारा कविता, तात्कालिक कविता, समयातीत कविता, आवश्यकतावादी कविता, आशावादी कविता, निराशावादी कविता, इच्छावादी कविता, चालू कविता, जड़ कविता, स्मृत्यात्मक कविता, गत्यात्मक कविता, रत्यात्मक कविता, काव्यात्मक कविता, गद्य कविता, ठोस कविता, तरल कविता, मुश्किल कविता, सरल कविता, अगड़ी कविता, पिछड़ी कविता, आधुनिक कविता, उत्तर आधुनिक कविता, गंभीर कविता, लोकप्रिय कविता, जन कविता, बौद्धिक कविता — उनमें से किसी एक में कृ.क. की कविता को नहीं रखा जा सकता। इस कविता-समय में इन काव्य-प्रकारों और प्रवृत्तियों के बीच इस प्रकार कृ.क. की कविता एक ‘आवारा कविता’ नजर आती है। आवारगी सदा से समय में तिरस्कृत रही आई है। यह अलग बात है :

पुरस्कृत कवियों से कविता दूर चली जाती है

कविता तिरस्कृत कवियों पर रीझती है

[ कविता-रहस्य, 25:1 ]

 

आवारा कविता अपने आस-पास को बहुत सजगता और ईमानदारी से देखती है, लेकिन वह अपने समय में बहुत अकेली भी पड़ जाती है और इसलिए ही वह परंपरा से संबद्ध होती है। इस प्रकार की कविता में एक खास किस्म का देहातीपन और बेबाकी होती है, और उसका कहना-बोलना अक्सर किसी सच्चे-निहंग पागलपन की याद दिलाता है। यहां यह भी बताते हुए आगे बढ़ना चाहिए कि किसी गैर-मार्क्सवादी कवि की कविता को सीधे मनुष्य से प्रतिबद्ध बता देने वाले समीक्षात्मक-आलोचनात्मक प्रयत्न मार्क्सवादी आलोचना के कूपाकाश में प्राय: बहुत नवीन और अलग समझे जाते रहे हैं। लेकिन किसी विचार या राजनीति से प्रतिबद्ध होने बावजूद कविता — अगर वह कविता है — तो अनिवार्यतः — प्रथमतः और अंततः — मनुष्य से ही प्रतिबद्ध होगी, इसलिए किसी कवि की कविता का मनुष्य से प्रतिबद्ध होना या बने रहना कोई नई और अनूठी बात नहीं है। नयापन और वैशिष्ट्य तो इसमें है कि कवि अपनी प्रतिबद्धता को बयां कैसे कर रहा है, और यह भी मैं कोई नई बात नहीं कह रहा हूं, बस इस प्रसंग में इस जरूरी बात को दुहरा भर रहा हूं। इस अर्थ में देखें तो कृ.क. का कवि एक शास्त्रकार भी है। वह माफिया आलोचकों को पहचानता है और उसकी कविता कातिलों का कातिल होने की बराबर कोशिश करती है। आस-पास को कभी ओझल न करने वाली मानवीय दृष्टि के साथ दृढ़ यह कविता बंकिमता को बचाती है और परंपरा में आवारगी करते हुए कथित आधुनिकता और उत्तर-आधुनिकता दोनों से ही परहेज बरतती है। यह इस यकीन के साथ व्यक्त होती है कि एक नए कवि में सारे पुराने कवि शामिल होते हैं। यह जरी-गोटेदार भाषा से दूरी बनाकर करुणा और क्रोध से संभव हुई वाग्मिता को प्रश्रय देती है। तत्कालप्रिय प्रवचनात्मकता से प्राप्त वैचारिक प्रतिबद्धता-पक्षधरता से बचती हुई यह लोगों के बीच, लोगों का होने की कोशिश करती है और इस कोशिश में जनप्रिय और बदनाम साथ-साथ होती है।

कविता में क्या हो, क्या न हो, क्या कहा जाए, क्या न कहा जाए, कैसे कहा जाए, कैसे न कहा जाए… यह सब हिंदी कविता में गई सदी के सातवें दशक में ही पूर्णरूपेण तय और स्पष्ट हो गया था। कुछेक अपवादों को छोड़ दें तो आज करीब-करीब सारे नए-पुराने कवि इस स्पष्टता के साथ ही लिख रहे हैं। कृ.क. इन अपवादों में से ही एक या कहें इन अपवादों में भी एक अपवाद हैं। कविता और कवि-व्यक्तित्व दोनों ही कृ.क. के पास है। निराला और राजकमल चौधरी के बाद यह संयोग कृ.क. के रूप में हिंदी में कई दशकों के बाद घट रहा है। यह यों ही नहीं है कि आज हिंदी साहित्य (हिं.सा.) के सारे संगठित तत्व और शक्तियां कृ.क. पर क्रुद्ध और इसलिए उनके विरुद्ध हैं। अद्भुत आकर्षक आवारगी से भरा हुआ कृ.क. का व्यक्तित्व और उसका कवित्व हिं.सा. के जड़, संकीर्ण और अदूरदर्शी आलोचकों के बीच उभरा है। यह भी कह सकते हैं कि कृ.क. जैसे कवि के लिए यह समय पूरी तरह मुफीद नहीं रहा आया। कृ.क. कविता में और कविता से अलग भी प्राय: बहुत मूल्यवान बातें कहते हैं, लेकिन कभी-कभी उनमें व्यावहारिक संचार का बहुत अभाव होता है। इस अभाव को अपना अपमान समझ हिं.सा. की व्यावहारिक राजनीति उनसे एक शत्रु की तरह बर्ताव करती है। यह बर्ताव तत्काल भले ही कुछ बर्बाद करता दिखे, लेकिन बहुत दूर तक इसकी कोई गति नजर नहीं आती, क्योंकि कृ.क. के पास भविष्य कविता के रूप में सुरक्षित है और इस दृश्य में भी यह कृ.क के सौभाग्य का तेवर नहीं तो और क्या है कि उनके और उनके कवित्व के प्रति अनुराग रखने वाले बढ़ते ही जा रहे हैं। उनके पक्ष में नजर आने वाले ऐसे उदीयमान व्यक्तित्वों की कोई कमी नहीं है जिनसे कल हिंदी धन्य होगी। यहां वरिष्ठ कवियों के बहाने युवा कवियों को संबोधित कृ.क. की ये कविता-पंक्तियां दृष्टव्य हैं :

जिसकी एक भी पंक्ति नहीं बची

उसके पास सर्वाधिक तमगे बचे हुए हैं

 

[ वरिष्ठ कवियो ]

एक योग्य कवि की लंबी उपेक्षा उसको पराक्रमी बनाती चली जाती है। इस पराक्रम से उसके प्रशंसकों का एक अलग समुदाय निर्मित होता है और उसके समर्थकों की एक अलग श्रेणी… ‘निराला की साहित्य साधना’ को यहां याद करते चलिए। दुरभिसंधियां युक्तियां बन जाती हैं, लेकिन एक वैविध्यपूर्ण कवि-व्यक्तित्व खुद को कभी संघर्ष से वंचित नहीं करता। कुंठाएं उसे दबोचने की कोशिश करती हैं, लेकिन वह आत्म-विश्वास को संभाले रखता है। कृ.क. के यहां ये विशेषताएं नजर आती हैं। उन्होंने शिल्प से आक्रांत और शब्द से आडंबर किए बगैर हिंदी कविता में एक असंतुलन उत्पन्न किया है। इस असंतुलन ने तमाम ‘विशिष्ट कवियों’ को असुरक्षा में डाल दिया है। अब स्थिति यह है कि सांस्कृतिक रूप से सत्तावान तंत्र और संरचनाएं कृ.क. की प्रत्येक पंक्ति से भयभीत रहती हैं। इस तंत्र और इन संरचनाओं ने वर्षों तक उनके कवि को खत्म करने के यत्न किए, लेकिन ‘अपने होने को प्रकाशित करने’ के नए माध्यमों के उदय के बाद आज कृ.क. हिंदी के सबसे चर्चित कवियों में से एक होकर उभरे हैं। उन्होंने एक काव्यात्मक न्याय के लिए प्रचलनों के बीतने की प्रतीक्षा की है। उनकी प्रतीक्षा समाप्त नहीं हुई है, लेकिन उन्हें कुछ राहत है क्योंकि मौजूदा हिं.सा. में उनके प्रकट-अप्रकट ‘प्रॉपर प्रशंसक’ अभी हिंदी के किसी भी दूसरे कवि से ज्यादा भासते हैं। उनकी कविता के प्रेमियों की दर्ज-बेदर्ज और लिखित-वाचिक प्रतिक्रियाएं हिंदी कविता संसार में उनके कवि के ‘अन्यत्व’ को पुख्ता करती हैं। उनके इस उदय और उभार ने तमाम चिढ़े हुए, अयोग्य, औसत और जलनशील तत्वों को उनके खिलाफ भी सक्रिय कर दिया है। इसके साथ ही उनके उन शत्रुओं का यहां क्या ही उल्लेख किया जाए जिनका प्रज्ञा-क्षेत्र ही बाधित है और जिनका पूरा व्यक्तित्व और लेखन कृ.क. के शाश्वत किए-धरे के आगे बहुत संक्षिप्त और सस्ता लगता है। कृ.क. जिस शैली और शाला से खुद को जोड़ते हैं, वहां यश के साथ अपयश मुफ्त मिलता है और इसलिए उनके अपयश से ‘यश’ कमाने वालों की भीड़ भी इधर बहुत भारी हो गई है। इस भीड़ में अधिकांश ऐसे हैं जो ‘भीड़’ को ‘भीर’ और ‘भारी’ को ‘भाड़ी’ लिखते हैं।

कभी निराला के लिए नागार्जुन ने लिखा था : ‘‘उसे मरने दिया हमने रह गया छुट कर पवन/ अब भले ही याद में करते रहें सौ-सौ हवन।’’ यह लिखाई बताती है कि हिं.सा. में मरण का बहुत माहात्म्य है, यह ज्ञानरंजन भी बहुत पूर्व में कह चुके हैं। मुझे यह कहना भला तो नहीं लग रहा है, लेकिन मुझे लगता है कि कृ.क. के जीते-जी शायद उन्हें वह प्रतिष्ठा नहीं मिलेगी जिसके वह हकदार हैं। आज हिं.सा. में कृ.क. का मौखिक और कुटिल विरोध उनके लिखित विरोध से कई गुना बढ़ चुका है। उन पर हो रहे आक्रमण कभी निराला पर हुए आक्रमणों की याद दिलाते हैं। इस तरह देखें तो हिंदी कविता और आवारगी की ही नहीं कृ.क. अपमान की परंपरा को भी आगे बढ़ा रहे हैं। इस अपमान में भी आनंद की तलाश उनकी सहज-वृत्ति है। इसके लिए वह जिस सिद्ध ‘विट’ तक जाते हैं, वह एक साथ उनके कुछ मित्रों और कई शत्रुओं का निर्माण करती है। इन शत्रुओं में औसत कवि-कवयित्री, फूहड़ लेखक-लेखिकाएं, मतिमंद और माफिया आलोचक, अर्थपिशाच प्रकाशक, काहिल प्राध्यापक और उनके निकम्मे शोधार्थी, मानसिक रूप से दिवालिए पत्रकार, चालू और हद दर्जे के बेवकूफ टिप्पणीकार, भ्रमरवृत्तिदक्ष दलाल और प्रतिभा-प्रभावशून्य युवक-युवतियां शामिल हैं। इस पर सोचा जाना चाहिए कि आखिर एक कवि इतने सारे मूर्त शत्रुओं के बीच रहकर कैसे काम करता है :

जनवरी बलात्कार के लिये मुफीद महीना है

फरवरी में किसी का भी कत्ल किया जा सकता है

मार्च लड़कियों के घर से भागने का मौसम है

अप्रैल में किया गया अपहरण फलदायक होता है

मई में सामूहिक हत्याकांड अच्छे से किया जा सकता है

जून के महीने में दलितों के घर लहककर जलते हैं

जुलाई में मुसलमानों को मारा जा सकता है

अगस्त में तो बच्चे मरते ही हैं

सितंबर में किसान चाहें तो पेड़ों से लटक सकते हैं

अक्टूबर में डिफाल्टर देश छोड़कर भाग सकते हैं

नवंबर गोरक्षकों के लिए आरक्षित है

वे किसी भी निरपराध नागरिक को सरे-आम मार सकते हैं

दिसंबर में आप आंसू बहा सकते हैं

प्रायश्चित कर सकते हैं

और अगर चाहें तो कृष्ण कल्पित के विरुद्ध विज्ञप्ति जारी कर सकते हैं!

 

[ नया बारामासा ]

 

बुरी खबर और भयावह यथार्थ को कविता में लाने के लिए कृ.क. कविता को किसी अपराध की तरह संभव करते हैं। अन्याय, शोषण और गैर-बराबरी के विरुद्ध लड़ने का उनका तरीका एक ‘नैतिक कवि’ का तरीका नहीं भी लग सकता है। इस लड़ाई में वह ‘राजनीतिक रूप से गलत’ भी नजर आ सकते हैं, लेकिन उनका पक्ष और स्थिति बहुत स्पष्ट है। दरअसल, वह बहुत तत्कालप्रिय ढंग से उम्मीद और नाउम्मीदी में होना नहीं जानते हैं और न ही वह अपने कवि और कविता और कथ्य की शर्त पर सबको खुश रखना चाहते हैं। वह उस प्रतिबद्धता से खुद को अलग करते चलते हैं, जिसका दांव पर कुछ भी नहीं लगा होता :

वह दिन जरूर आएगा जब मुझे मार गिराया जाएगा

 

मेरा जीवन हत्यारों का चूका हुआ निशाना है!

[ चूका हुआ निशाना ]

 

कृ.क. की अब तक प्रकाशित कविता-सृष्टि में यह बात बहुत स्पष्ट नजर आती है कि वह एक साथ साहित्यिक और सामाजिक कवि हैं। इस दर्जा साहित्यिक कवि कि समाज उन्हें पढ़-सुनकर बहुत सहजता से साहित्यिक हो सकता है। यह एक जनकवि के होने की अलामत है। एक जनकवि खुद को और जन के दुख को सुनाना जानता है। इस जिक्र में यह कहने में कोई हर्ज नहीं है कि मौजूदा दौर में सही मायनों में हिंदी में जनकवि होने की विशेषता सिर्फ कृ.क. में ही दृश्य होती है। यह हमारी भाषा और उसमें कविता का दुर्भाग्य है कि कृ.क. की काव्य-प्रतिभा के साथ-साथ उनकी इस विशेषता के साथ भी न्याय नहीं हुआ। उनकी इस क्षमता को पहचानकर भी नजरअंदाज किया गया। बौद्धिकों और जनता दोनों को ही आकर्षित करने वाली कृ.क. की कविताओं में वे सारे अवयव हैं जो एक जनकवि का निर्माण करते हैं। हिंदी की औसतताओं के कौआरोर में उनकी कविता महज किताबी नहीं है। वह यात्राएं करना जानती है, खुद को गाना और कंठ में बसना भी। यह कविता जन को संस्कारित करने की काबिलियत रखती है, लेकिन इसे प्रशंसक मिलते हैं, जन नहीं मिलते, पाठक मिलते हैं, वे आलोचक नहीं मिलते जो इस कविता को जन के बीच प्रतिष्ठित कर सकें। यहां सार्त्र को याद कीजिए जिन्होंने कहा था कि मेरे पास पाठक हैं, लेकिन मुझे जनता चाहिए।

लड़कपन से ही कवि-कर्म में संलग्न कृ.क. के कवि के निर्माण में तुलसी, सूर, मीरा, कबीर की तरह ही मीर, ग़ालिब, ज़ौक़, नज़ीर और हाफ़िज़, बेदिल, शेखसादी और कालिदास, भवभूति, भर्तृहरि और खुसरो का योगदान है। यह स्वयं कवि ने स्वीकारा है और यह भी कि उसकी हिंदी में उर्दू सहज रूप से विद्यमान रहती है। कृ.क. हिंदी नहीं हिंदवी का कवि कहलाना पसंद करते हैं। हिंदवी वह है जिसमें मीर लिखते थे।

आलोचना और प्रशंसा दोनों से ही अब तक आहत नहीं हुए कृ.क. वरिष्ठों में सबसे युवा हैं और युवाओं में सबसे वरिष्ठ, स्वीकृतों में वह सबसे बहिष्कृत हैं और बहिष्कृतों में सबसे स्वीकृत। वह मुक्त वैभव में छंद हैं और छंद वैभव में मुक्त। जहां सब मुखर हैं, वहां वह चुप हैं और जहां सब चुप हैं, वहां वह मुखर। वह कवियों की जमीन जानते हैं और जमीन की कविता भी। भुला दिए गए शब्दों को वे जमा करते हैं और घिसे हुए शब्दों को हटाते रहते हैं। उनके शब्दों में दृश्य हैं, लेकिन फिल्म बनाने की एक धुंधली-सी इच्छा बहुत बार मन में जगने के बावजूद वह आज तक एक भी फिल्म नहीं बना पाए हैं। बचपन से लेकर अब तक के बहुत सारे ऐसे दृश्य उनकी आंखों के सामने से गुजरे हैं, जब उन्हें लगा है कि एक फिल्म बनानी चाहिए। कस्बे के घर के आंगन में गोबर से लिपे हुए चूल्हे को फूंक मारकर सुलगाती हुई दादी की आंखों से निकलते हुए आंसू, अपने लंबे कानों को जोर-जोर से हिलाकर तितर-बितर करती हुई काले छबकों वाली बकरी और चटख-चटख करती हुई लकड़ियां— यह सब देखकर पहली बार उन्हें लगा था कि केवल दृश्यों के माध्यम से भी कुछ रचा जा सकता है। यह बहुत पुरानी बात है, जब उनके पिता होर्डिंग्स बनाया करते थे और उनसे रंगों की पुताई करवाते थे। चाक्षुष सौंदर्य और मानवीय क्रियाओं से भरे-पूरे ऐसे न जाने कितने दृश्यों का एक अंतहीन और अटूट सिलसिला यहां तक चला आया है। कुछ रचने की इस आरंभिक अकुलाहट ने ही उन्हें कवि-कर्म में प्रवृत्त किया। यहां पूर्व में दर्ज उनके रियाज, काव्य-प्रवेश और काव्य-विकास को याद करें तो उनकी कविताएं सिनेमा से जुड़े उनके स्वप्न और उनकी आकांक्षा का प्रतिफलन लगती हैं :

कभी-कभी यह सोचकर घबरा जाता हूं कि अचानक फिल्म बनाने की सुविधाएं पा गया तो क्या करूंगा? फिल्म बनाने से पहले पांच-दस हजार फुट कच्ची फिल्म बिगाड़नी चाहिए। अब तक बिगाड़ देनी चाहिए थी। पहली बार में पांच-सौ फुट में से साढ़े चार सौ फुट फिल्म सही निकाल पाना कितना मुश्किल होगा। लेकिन अगर ऐसा हुआ भी तो क्या इस बात का डर, तनाव और एक किस्म का निजी आतंक भी मेरी रचनात्मकता का हिस्सा नहीं रहेगा? इस ‘अभाव’ को भी तो रचनात्मकता में बदला जा सकता है।

[ पसरी हुए रेत पर ]

अभाव को रचनात्मकता में बदलती हुई कृ.क. की कवि-छवि में कुछ पुराने शब्द, कुछ भावनाएं और कुछ अनगढ़पन सदा नजर आता रहा है। कमजोर जिंदगी के बयान छुपाने की कोशिश उनकी कविता ने अब तक नहीं की है :

नई दिल्ली के कवियो!

चाहे जितनी कमजोर दिखे मैं अपनी कविता नहीं बदलूंगा

 

[ दिल्ली के कवि ]

 

ऊपर उद्धृत पंक्तियां साल 1987 में हुई कृ.क. की एक कविता से हैं। वह बार-बार दिल्ली में आते और बार-बार दिल्ली से जाते रहे हैं। साल 1988 में हुई उनकी एक और कविता में इस बीच के ब्यौरे कुछ यों सामने आते हैं :

कुछ कवि हो गए मशहूर कुछ काल-कवलित

कुछ ने ढूंढ़ लिए दूसरे धंधे मसलन शेयर बाजार

 

कुछ डूबे हुए हैं प्रेम में कुछ घृणा में

 

कुछ ने ले लिया संन्यास कुछ ने गाड़ी

 

कुछ लिखने लगे कहानी कुछ फलादेश

 

इनके बीच एक कवि है जिसे अभी याद हैं

पिछली लड़ाई में मारे गए साथियों के नाम

उसके पास अभी है एक नक्शा!

[ नक्शा ]

‘नक्शा’ आलोकधन्वा को समर्पित है, लेकिन इसमें कृ.क. का सफर भी साफ नजर आता है। इस नजर आने में बहुत दूर-दूर से चलकर दिल्ली आती हुई रेलगाड़ियां हैं जिनमें कवि हैं — दुनिया की सबसे पुरानी कला के मजदूर — अपने अभावों, पुकारों और तकलीफों के साथ। वे ऋतु कोई भी हो शोक में डूबे हुए हैं — आंसुओं को रोकने की कला सीखते हुए — देश की अलग-अलग दिशाओं से आए हुए वे दिल्ली की अलग-अलग दिशाओं में भटक रहे हैं, उन्हें कोई काम नहीं मिल रहा है :

वे जिंदा रहने को आते हैं दिल्ली और मारे जाते हैं

भूख से बेकारी से उपेक्षा से मरते हैं वे

[ कवियों की कहानी ]

एक कवि गोरख पांडे की याद में लिखी गई यह ‘कवियों की कहानी’ एक दूसरे कवि कृ.क. ने लिखी है यह सोचकर :

होती है हर एक कवि की अपनी एक कहानी

जिसे लिखता है एक दूसरा कवि

 

इस साहित्यिक और बौद्धिक वातावरण को बहुत करीब से देखते हुए कृ.क. की और हिंदी की उम्र में धीमे-धीमे चलते हुए वह वक्त नजदीक आ गया, जब उन्होंने इस वातावरण के विरोधी कवि के रूप अपनी काव्य-भाषा और शैली के लिए नए आयाम पाने का संघर्ष प्रारंभ किया। पूरब की पूरी कविता और काव्य-शास्त्र की पूरी परंपरा में आवाजाही और उससे मुठभेड़ करते हुए कृ.क. की उम्र में वे वर्ष भी आए, जब वह समकालीन हिंदी कविता के लिए बिल्कुल बेगाने हो गए :

इस जरीगोटेदार भाषा के बांदी समय में

कौन समझेगा कि मुझ पगलैट को तो

अपने ही खोजे शब्दों के बदरंग चिथड़े प्यारे हैं

 

[ शब्दों के चिथड़े ]

कृ.क. ने मध्यकाल की मीरा की कविता और जीवन को केंद्र में रखते हुए ‘कोई अछूता सबद’ में हिंदी में लोकप्रिय हुए तत्कालीन स्त्री-विमर्श को समझने की कोशिश की :

तुम जो पहनाओगे पहनूंगी

जो खिलाओगे खाऊंगी

तुम जहां कहोगे वहां बैठ जाऊंगी

कहोगे तो बिक जाऊंगी बाजार में

[ ढलती रात में ]

संसार एक नई शताब्दी से परिचित हो चुका था, लेकिन हिंदी कविता संसार कृ.क. से अब तलक एक अपरिचित की तरह बर्ताव कर रहा था। उनकी आवारगी बढ़ती जा रही थी और आवारा पंक्तियां और सूक्तियां उन पर आयद हो रही थीं और वह उन्हें इस उम्मीद में प्रकाशित करवाते जा रहे थे कि शायद वे एक रोज मानवता के काम आएंगी :

कभी प्रकाश में नहीं आता शराबी

 

अंधेरे में धीरे-धीरे विलीन हो जाता है

[ एक शराबी की सूक्तियां, 35 ]

 

कृ.क. की एक कहानी ‘शराबघर’ के नायक की मरने की इच्छा शराब पीने के बाद अधिक प्रबल हो उठती है। वह एक रोज अपनी मृत्यु संबंधी सारी कविताओं को एक डायरी में उतारता है और डायरी के पहले पृष्ठ पर लिखता है :

‘मैं मरना चाहता हूं।’

 

लेकिन वह मरा नहीं, वह आज तक शराबघरों में भटक रहा है। उसकी सूक्तियों को जानने वालों की संख्या बढ़ती चली जा रही है, लेकिन अभी भी उसे जानने वाले बहुत कम हैं।

‘एक शराबी की सूक्तियां’ को कृ.क. ने अपना ‘मुक्तिप्रसंग’ कहा है और राजकमल चौधरी ने ‘मुक्तिप्रसंग’ को अपना वर्तमान :

‘‘…मैं अपने अतीत में राजकमल चौधरी नहीं था। भविष्य में यह प्रश्नवाचक व्यक्ति और इस व्यक्ति की उत्तर-क्रियाएं बने रहना मेरे लिए संभव नहीं है। क्योंकि, मैं केवल अपने वर्तमान में जीवित रहता हूं। …अतएव, ‘मुक्तिप्रसंग’ मेरा वर्तमान है। …मृत्यु की सहज स्वीकृति से देह की सीमाओं, संगतियों और अनिवार्यताओं से मुक्त हुआ जा सकता है। …ऑपरेशन थिएटर की सफेद टेबल पर संज्ञाहीन होते हुए, मैंने ऐसा अनुभव किया है। मैंने अनुभव किया है कि स्वयं को और अपने अहं को मुक्त किया जा सकता है। …इस अनुभव के साथ ही, दो समानधर्मा शब्द जिजीविषा और मुमुक्षा इस कविता के मूलगत कारण हैं। …सती-वर्तमान के अग्निजर्जर शव को अपने कंधों पर, मैं शिव की तरह धारण करता हूं। मैं इस शव के गर्भ में हूं, और यह शव मेरे कंधों पर है। इसकी विकृति, वीभत्सता और दुर्गंधियों में मुझे जीवित रहना ही पड़ेगा। जीवित ही नहीं, मुक्त और स्वाधीन भी रहना होगा।’’

 

राजकमल चौधरी को यहां उद्धृत करने की जरूरत इसलिए महसूस हुई ताकि यह कहा जा सके कि कृ.क. की प्रत्येक प्रकाशित कृति कृ.क. का ‘मुक्तिप्रसंग’ ही प्रतीत होती है। उनकी प्रत्येक कृति उनकी पूर्व और आगामी कृतियों से मुक्त और स्वाधीन है। बहरहाल, लोक के अवलोकन और अर्थ के आरोह-अवरोह और मिजाजे-सुखन की अच्छी तरह शिनाख्त करने में व्यस्त उनकी आवारगी के नए-नए रंग एक के बाद एक हिंदी कविता संसार के मुंह पर खुलने लगे। उनकी कविता का वह बंद दरवाजा जिसे हिंदी साहित्य के समकालीन बौद्धिक वातावरण में कोई खटखटा नहीं रहा था, उन्होंने उसे खुद ही खोल दिया और बाद इसके इस वातावरण में बेचैनियां, सरगोशियां, गलतफहमियां फलने-फूलने-फैलने लगीं। बेइंसाफी के यथार्थ में कृ.क. बहुत बेपरवाह नजर आए और उनकी कविता पूर्व-अपूर्व कवियों के नक्षत्र-मंडल को तहस-नहस करने के इरादे से परंपरा में कुछ इस प्रकार धंसी कि सूक्ति, संदेश, अफवाह, अधूरा वाक्य, चेतावनी, धमकी, शास्त्र, इतिहास, कथा और नामालूम क्या-क्या हो गई :

 

विलग होते ही

बिखर जाएगी कलाकृति!

 

[ एक शराबी की सूक्तियां, 78 ]

नगर ढिंढोरा पीटता फिरता हूं हर राह

रोज रात को नौ बजे करता हूं आगाह

 

[ बाग़-ए-बेदिल, पृष्ठ-41 ]

 

कल्पितजी को हो गया काव्य-शास्त्र से प्यार

देखो क्या अंजाम हो भवसागर या पार!   

 

[ कविता-रहस्य, 24:6 ]

 

मैं अपने दोनों हाथ ऊपर उठाकर एक बार फिर कहता हूं :

यह महादेश चल नहीं सकता

 

[ हिंदनामा : एक महादेश का महाकाव्य, 52 ]

…यह कोई शिगूफा नहीं मेरा शिकस्ता दिल ही है जो इतिहास की अब तक की कारगुजारियों पर शर्मसार है जिसका हिंदी अर्थ लज्जित बताया गया है जिसके लिए मैं शर्मिंदा हूं और इसके लिए फिर लज्जित होता हूं कि मुझे अब तक क्यों नहीं पता था कि मांस के शोरबे को संस्कृत में यूष कहा जाता है शोरिश विप्लव होता है 1857 जैसा धूल उड़ाता हुआ एक कोलाहल और इस समय मैं जो उर्दू-हिंदी शब्दकोश पढ़ रहा हूं जिसके सारे शब्द कुचले और सताए हुए लोगों की तरह जीवित हैं…

 

[ रेख़ते के बीज : उर्दू-हिंदी शब्दकोश पर एक लंबा पर अधूरा वाक्य ]

कविता लिखना अपराध है

किसी खास मकसद के लिए किया गया जुर्म


कविता पुरस्कृत होने की कला नहीं सजायाफ्ता होने की छटपटाहट है

जो सभागारों में सिसक रहे हैं वे कवि नहीं हैं

कवि वे हैं जो रूमाल से अपना चेहरा छिपाए संसार से छुपते फिरते हैं


[ कविता के विरुद्ध ]

कृ.क. की कविता-सृष्टि से प्रस्तुत इन उद्धरणों के उजाले में यहां यह भी ध्यान देने योग्य है कि काव्य-स्फीतियों और विस्फोटों के आगे नतमस्तक हिं.सा. की मुख्यधारा की कविता में जिस वस्तु को कविता-संग्रह कहकर पुकारा जाता है, ऐसी एक भी वस्तु साल 1990 के बाद से कृ.क. की अब तक सामने नहीं आई है। लगभग तीन-साढ़े तीन दशक प्राचीन कृ.क. की कविता-सृष्टि में कविता-संग्रह इन पंक्तियों के लिखे जाने तक सिर्फ एक ही है— ‘बढ़ई का बेटा’। इस दरमियान उन्होंने अपनी विवादास्पदता के अंतरालों में ‘रेख़ते के बीज’, ‘साइकिल की कहानी’, ‘अकेला नहीं सोया’, ‘कविता के विरुद्ध’, ‘खाली पोस्टकार्ड’, ‘मीठा प्याज’, ‘वापस जाने वाली रेलगाड़ी’, ‘राख उड़ाने वाली दिशा में’, ‘वरिष्ठ कवियो’, ‘अपना नाप’, ‘पानी’, ‘एक कवि की आत्मकथा’, ‘नया बारामासा’, ‘एक अधूरा उपन्यास’, ‘अफीम का पानी’, ‘प्रसिद्ध’, ‘खून के धब्बे’, ‘नया प्रेम’, ‘चूका हुआ निशाना’ जैसी चर्चित पर असंकलित कविताएं लिखने के अलावा जो कुछ भी लिखा है — वह संग्रह के लिहाज से नहीं — किताब की तरह लिखा है। यह गौरतलब है कि कृ.क. की किताबें एक जिल्द में प्रकाशित होने से पूर्व ही प्रकाशित हो रहती हैं। उनकी कविताएं उनकी तरह ही बिखरी हुई हैं। वे उन सारी जगहों पर बिखर गई हैं, जहां वे प्रकाशित हो सकती हैं। एक विकास-क्रम में बिखरना और निखरना… कृ.क. की कविता-सृष्टि के दो संयुक्त-तत्व हैं। समय से और समकालीनता से सताए हुए कृ.क. इस लोक के तमाम स्मृत-विस्मृत कवियों के कुल के हैं। आवारापन में वह बुद्ध के कुल के हैं। फक्कड़पन में वह कबीर और मीरा के कुल हैं। संस्कृत में वह भर्तृहरि, बाणभट्ट और राजशेखर के कुल के हैं। उर्दू में वह मजाज़ और मंटो के कुल के हैं। हिंदी में वह निराला, उग्र, भुवनेश्वर और राजकमल चौधरी के कुल के हैं।

कृ.क. की कविता-सृष्टि का काव्य-पुरुष प्रचलन के विपर्यय में और प्रयोग के पक्ष में सतत सक्रिय, रचनात्मक, सांसारिक और विवादात्मक रहा है। उनके काव्य-पुरुष के इस संघर्ष को समझने के लिए ‘बाग़-ए-बेदिल’ की स्थापना बहुत काम आ सकती है। यह स्थापना उनके लेखे उनकी एक लिखी जा रही पुस्तक ‘आवारगी का काव्यशास्त्र’ का प्रथम अध्याय है। यह अध्याय एक रचयिता की आवारगी का अनूठा विश्लेषण है। राजशेखर की ‘काव्य-मीमांसा’ के एक श्लोक के आश्रय से यहां स्पष्ट होता है कि आवारगी से जांघें दृढ़ हो जाती हैं। आत्मा भी मजबूत और फलग्राही हो जाती है और उसके सारे पाप पथ पर ही थक कर नष्ट हो जाते हैं। दो हजार पन्नों की सामग्री को संपादित करने के बाद पांच सौ बारह पन्नों में समाए ‘बाग़-ए-बेदिल’ के जिल्दबंद होने से पहले इस किताब के कुछ और नाम भी थे — ‘समकालीन संदेश रासक’, ‘शैतान के श्लोक’ और ‘पार्थ और सार्त्र’ — लेकिन पक्की स्याही से छपने के बाद अब इसका सिर्फ एक नाम है— ‘बाग़-ए-बेदिल’। समकालीन हिं.सा. की व्यावहारिक राजनीति में एक अज्ञात-अनाम-अजनबी कवि की तरह व्यवहृत कृ.क. ने इस किताब को यह सोचकर शाया करवाया कि यूरोपीय, मुगल, गॉथिक और आधुनिक शिल्प की समकालीन हिंदी कविता की इमारतों के बीच, ‘बाग़-ए-बेदिल’ के ये खंडहर शायद बुरे नहीं लगेंगे :

‘कद्र जैसी मेरे शे’रों की अमीरों में हुई,

वैसी ही उनकी भी होगी मेरे दीवान के बीच!’

 

इसी तरह ‘बाग़-ए-बेदिल’ में भी आपको

नकली कवियों

मंदबुद्धि संपादकों

डॉनों

मठाधीशों

गॉडफादरों इत्यादि

कुलीन कातिलों का चेहरा दिखाई पड़ेगा पार्थ!

 

पढ़ते

सुनते

देखते रहिएगा—

 

कल्ब-ए-कबीर और कला कातिलों की जंग का

यह हैरतअंगेज जासूसी काव्य!

 

[ कला कातिल-2 ]

‘बाग़-ए-बेदिल’ हिंदी साहित्य के एक विशेष कालखंड का व्यंजनात्मक इतिहास है। विलुप्त काव्य-पंक्तियों, धुनों, लयों, छंदों का पुनर्वास करती हुई यह कृति एक वाचिक वैभव का लिखित पाठ है। आक्रामकता और आत्ममुग्धता से लबालब ‘बाग़-ए-बेदिल’ के बारे में समादृत कवि अरुण कमल का यह कथन उद्धृत करने योग्य है : ‘‘कौन-सा ऐसा समकालीन है जिसके तरकश में इतने छंद हैं, इतने पुष्प-बाण? आवाज और स्वर के इतने घुमाव, इतने घूर्ण, इतने भंवर, इतनी रंगभरी अनुकृतियां हैं। कई बार तो इनमें से कुछ पदों को पढ़कर मैं ढूंढ़ता हुआ क्षेमेंद्र या राजशेखर या मीर या शाद तक पहुंचा। ये कविताएं हमारे अपने ही पते हैं खोए हुए, उन घरों के पते, जहां हम पिछली सांसें छोड़ आए हैं। इन्हें पढ़कर लगता है कि हिंदी कवि के पास खुद अपनी कितनी बड़ी और चौड़े पाट वाली परंपरा है।’’

इस सबके बावजूद यह हाल है कि क्या कहा जाए… हिंदी संसार में यों लगता है जैसे शत्रुओं की तो छोड़िए कोई शुभचिंतक मित्र भी पूरा का पूरा कृ.क. का अपना नहीं। कृ.क. का जिक्र आने पर वे या तो चुप रहते हैं या आधे दिल से विहंस कर पैरवी करते हैं या बात बदलने का यत्न। एक अक्षय परंपरा में आवारा भटकने के लिए कृ.क. अकेले कर दिए गए हैं, लेकिन वह इस तरह के पहले और अकेले कवि नहीं हैं। उन जैसे कवियों को इसलिए एक और मन मिलता है— कभी न थकने वाला। मन जो हवाओं-सा तेज नहीं, लेकिन जानता है कि उसे उड़ना ही है— एक जारी कवि-समय में अपने काव्य-पथ और समानधर्माओं की तलाश में। मैं इस आलोचना को यहां खत्म नहीं कर रहा हूं, बस कुछ वक्त के लिए रोक रहा हूं, यह सोचकर :

समझदार था मूरख भी था

दीवाना भी वह किंचित था

 

अश्रु आंख में और हृदय में

युगों-युगों का दुख संचित था

उसकी कही हुई बातों में

आखर कम अरथ अमित था

 

जाने दो वह कवि कल्पित था!    

***

 

संदर्भ :

प्रस्तुत आलेख में कृष्ण कल्पित की अब तक प्रकाशित कविता और कविता से संबंधित छह किताबों — राजस्थान साहित्य अकादेमी से प्रकाशित ‘भीड़ से गुजरते हुए’ (1980), रचना प्रकाशन, जयपुर से प्रकाशित ‘बढ़ई का बेटा’ (1990), कलमकार प्रकाशन, जयपुर से प्रकाशित ‘कोई अछूता सबद’ (2003), अंतिका प्रकाशन, गाजियाबाद से प्रकाशित ‘बाग़-ए-बेदिल’ (2013), दखल प्रकाशन, दिल्ली से प्रकाशित ‘एक शराबी की सूक्तियां’ (2015) और बोधि प्रकाशन, जयपुर से प्रकाशित ‘कविता-रहस्य’ (2015) — को आधार बनाया गया है। इसके अतिरिक्त जिल्दबंद होने से पूर्व ही सोशल नेटवर्किंग साइट ‘फेसबुक’ पर स्वयं कवि के द्वारा ही प्रकाशित ‘हिंदनामा : एक महादेश का महाकाव्य’ को भी पाठ में लिया गया है। कवि की फेसबुक टाइमलाइन के साथ इंटरनेट की दुनिया में यत्र-तत्र बिखरी कविताओं को भी प्रयोग में लिया गया है। ‘जनसत्ता’, ‘संबोधन’, ‘जलसा’, ‘पाखी’ और ‘इंडिया टुडे साहित्य वार्षिकी’ जैसे पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित कवि के काम और कविताओं पर भी नजर मारी गई है और टेलीविजन और सिनेमा को केंद्र में रखकर लिखे गए लेखों-टिप्पणियों की कलमकार प्रकाशन, जयपुर से प्रकाशित किताब ‘छोटा परदा बड़ा परदा’ पर भी। निराला के लिए नागार्जुन द्वारा लिखी गई पंक्तियां यात्री प्रकाशन से प्रकाशित निराला पर केंद्रित नागार्जुन की किताब ‘एक व्यक्ति : एक युग’ (1992) के समर्पण-पृष्ठ से हैं। राजकमल चौधरी का कथ्य देवशंकर नवीन के संपादन में वाणी प्रकाशन से आए उनकी कविताओं के एक चयन ‘ऑडिट रिपोर्ट’ (2006) में शामिल लंबी कविता ‘मुक्तिप्रसंग’ से पहले दी गई टिप्पणी से लिया गया है। अरुण कमल को उद्धृत करने के लिए ‘बाग़-ए-बेदिल’ के आखिरी पन्ने को धैर्य से पढ़ा गया है। प्रस्तुत आलेख की शुरुआत और आखिरी अनुच्छेद पर विष्णु खरे की कविता ‘कूकर’ की छायाएं हैं, कहीं-कहीं इस कविता की कुछ पंक्तियां जस की तस, कहीं कुछ बदलकर ले ली गई हैं। इसके लिए विष्णु खरे के प्रति आलेखकार कृतज्ञ है।

***

साभार: पहल 110

 

आभासी पटल (सोशल साइट्स) के बाहर ‘कुंठित मन’ की ‘निर्लज्ज अभिव्यक्तियाँ’ कितनी अमानवीय होती हैं, वह जानी-पहचानी है. अविनाश के पास ‘कूटनीति’ की भाषा नहीं है, जिसका सबसे सजग इस्तेमाल आभासी लोक-वृत्त के दायरे में किया जाता है. जिस दिन उसके पास यह आ जायेगी, वह ख़त्म हो जाएगा.  यह आभासी-व्यवहार और कुछ नहीं, बल्कि हाल-चाल, दुआ-सलाम की भाषा को पाने का ही करतब है. यह भाषा आदमी को दलाल, अवसरवादी, व्यवसायी बना सकती है लेकिन रचनाकार नहीं. यह ‘सर्वधर्म-समभाव’ की सबसे उपजाऊ जमीन है. जहाँ भाषा गूगल-ट्रांसलेट हो जाती है. अविनाश से संपर्क -स्थापित हेतु  darasaldelhi@gmail.com का इस्तेमाल कर सकते हैं.

मोहनदास अब महात्मा था: कृष्ण कल्पित

मोहनदास अब महात्मा था

By कृष्ण कल्पित

1.

रेलगाड़ी के तीसरे-दर्ज़े से भारत-दर्शन के दौरान मोहनदास ने वस्त्र त्याग दिये थे.

अब मोहनदास सिर्फ़ लँगोटी वाला नँगा-फ़क़ीर था और मोहनदास को महात्मा पहली बार कवीन्द्र-रवींद्र ने कहा.

मोहनदास की हैसियत अब किसी सितारे-हिन्द जैसी थी और उसे सत्याग्रह, नमक बनाने, सविनय अवज्ञा, जेल जाने के अलावा पोस्टकार्ड लिखने, यंग-इंडिया अख़बार के लिये लेख-सम्पादकीय लिखने के साथ बकरी को चारा खिलाने, जूते गांठने जैसे अन्य काम भी करने होते थे.

राजनीति और धर्म के अलावा महात्मा को अब साहित्य-संगीत-संस्कृति के मामलों में भी हस्तक्षेप करना पड़ता था और इसी क्रम में वे बच्चन की ‘मधुशाला’, उग्र के उपन्यास ‘चॉकलेट’ को क्लीन-चिट दे चुके थे और निराला जैसे महारथी उन्हें ‘बापू, तुम यदि मुर्गी खाते’ जैसी कविताओं के जरिये उकसाने की असफल कोशिश कर चुके थे.

युवा सितार-वादक विलायत खान भी गाँधी को अपना सितार सुनाना चाहते थे उन्होंने पत्र लिखा तो गाँधी ने उन्हें सेवाग्राम बुलाया.

विलायत खान लम्बी यात्रा के बाद सेवाग्राम आश्रम पहुंचे तो देखा गांधी बकरियों को चारा खिला रहे थे यह सुबह की बात थी थोड़ी देर के बाद गाँधी आश्रम के दालान में रखे चरखे पर बैठ गये और विलायत खान से कहा – सुनाओ!

गाँधी चरखा चलाने लगे घरर घरर की ध्वनि वातावरण में गूंजने लगी.

युवा विलायत खान असमंजस में थे और सोच रहे थे कि इस महात्मा को संगीत सुनने की तमीज़ तक नहीं है.

फिर अनमने ढंग से सितार बजाने लगे महात्मा का चरखा भी चालू था घरर घरर घरर घरर…

विलायत खान अपनी आत्मकथा में लिखते हैं कि थोड़ी देर बाद लगा जैसे महात्मा का चरखा मेरे सितार की संगत कर रहा है या मेरा सितार महात्मा के चरखे की संगत कर रहा है!

चरखा और सितार दोनों एकाकार थे और यह जुगलबंदी कोई एक घण्टा तक चली वातावरण स्तब्ध था और गांधीजी की बकरियाँ अपने कान हिला-हिला कर इस जुगलबन्दी का आनन्द ले रहीं थीं.

विलायत खान आगे लिखते हैं कि सितार और चरखे की वह जुगलबंदी एक दिव्य-अनुभूति थी और ऐसा लग रहा था जैसे सितार सूत कात रहा हो और चरखे से संगीत निसृत हो रहा हो !

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2.

दिल्ली में वह मावठ का दिन था

३० जनवरी, १९४८ को दोपहर ३ बजे के आसपास महात्मा गाँधी हरिजन-बस्ती से लौटकर जब बिड़ला-हॉउस आये तब भी हल्की बूंदा-बांदी हो रही थी.

लँगोटी वाला नँगा फ़क़ीर थोड़ा थक गया था, इसलिये चरखा कातने बैठ गया. थोड़ी देर बाद जब संध्या-प्रार्थना का समय हुआ तो गाँधी प्रार्थना-स्थल की तरफ़ बढ़े,

कि अचानक उनके सामने हॉलीवुड सिनेमा के अभिनेता जैसा सुंदर एक युवक सामने आया जिसने पतलून और क़मीज़ पहन रखी थी.

नाथूराम गोडसे नामक उस युवक ने गाँधी को नमस्कार किया, प्रत्युत्तर में महात्मा गाँधी अपने हाथ जोड़ ही रहे थे कि उस सुदर्शन युवक ने विद्युत-गति से अपनी पतलून से Bereta M 1934 semi-autometic Pistol निकाली और

धाँय धाँय धाँय…

शाम के ५ बजकर १७ मिनट हुये थे नँगा-फ़क़ीर अब भू-लुंठित था हर तरफ़ हाहाकार कोलाहल कोहराम मच गया और हत्यारा दबोच लिया गया.

महात्मा की उस दिन की प्रार्थना अधूरी रही.

आज़ादी के बाद मची मारकाट साम्प्रदायिक दंगों और नेहरू-मण्डली की हरक़तों से महात्मा गाँधी निराश हो चले थे.

क्या उस दिन वे ईश्वर से अपनी मृत्यु की प्रार्थना करने जा रहे थे जो प्रार्थना के पूर्व ही स्वीकार हो गयी थी !

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कृष्ण कल्पित

अपने तरह का अकेला-बेबाक और विवादित कवि । कृष्ण कल्पित का जन्म 30 अक्टूबर, 1957 को रेगिस्तान के एक कस्बे फतेहपुर शेखावटी में हुआ। अब तक कविता की तीन किताबें और मीडिया पर समीक्षा की एक किताब छप चुकी है। एक शराबी की सूक्तियां  के लिए खासे चर्चित। ऋत्विक घटक के जीवन पर एक पेड की कहानी नाम से एक वृत्तचित्र भी बना चुके हैं।  अभी  हाल ही में बाग़-ए-बेदिल नाम से  एक विलक्षण  और विशाल  काव्य-संकलन  के साथ-साथ ‘कविता-रहस्य ‘ नामक पुस्तक प्रकाशित । 

शराबघर: कृष्‍ण कल्पित

तिरछिस्पेल्लिंग कविता-कहानियां या रचनात्मक गद्य प्रकाशित नहीं करता है और न ही कभी कुछ आमंत्रित करता है. लेकिन यहाँ कुछ कवितायें और एकाध कहानियाँ प्रकशित जरुर हुयी हैं. उनका प्रकाशन इस विशवास के साथ ही हुआ है कि वे एक एक्सक्लूसिव मिज़ाज का प्रतिनिधित्व करती हैं. कृष्ण कल्पित की यह कहानी ‘शराबघर’ इसी एक्सक्लूसिवनेस के कारण यहाँ दी जा रही है. कृष्ण कल्पित हिंदी पब्लिक स्फीयर के एक अनोखे रचनाकार हैं, जिनसे हम प्यार करते हैं, जिन्हें संजोना चाहते हैं. उनके अक्खड़पन का राज कहीं और है. वे हिंदी के एक रेयर आधुनिकतावादी (Modernist)लेखक हैं जिन्हें परंपरा के पगों का स्पर्श प्राप्त है. बाग़-ए-बेदिल, कविता रहस्य और उनकी कवितायें बाकी जो भी होंगी बाद में होंगी, सबसे पहले वे यह बताती हैं कि उनका कवि काव्य-परंपरा के भिन्न-भिन्न पड़ावों को चखने का आदि रहा है. कृष्ण कल्पित आचार्य कवि हैं. लेकिन यह कहना उनके कवि-व्यक्तित्व को कहीं से कम करना नहीं है. ‘शराबी की सूक्तियां’ इसीलिए उपर्युक्त सूचि से बचा ली गई थी. ‘शराबी की सूक्तियां’ का मूल्यांकन या आकलन अभी तक हिंदी समाज नहीं कर पाया है, जबकि यही समाज ‘मधुशाला’ की तुकबंदियों को हर बेतुके अवसरों पर दुहरा दिया करता है. ‘शराबी की सूक्तियां’ का महत्व अगर समझना हो तो थोड़ा-सा भारतीयेत्तर साहित्य की कुछ बानगियों को देखना पड़ेगा. यहाँ सिर्फ दो नाम लेकर आगे बढ़ जाउंगा, एक हैं पोलिश रचनाकार येजी पिल्ह, जिनकी पुस्तक ‘द माइटी एंजेल’ लोकप्रिय पोलिश पुस्तकों में शुमार है और जिस पर प्रसिद्द पोलिश फिल्मकार  वोइचेह स्मजोव्स्कि ने इसी नाम से फिल्म बनायी है; दूसरे हैं अतिलोकप्रिय अमेरिकन कवि/गद्यकार चार्ल्स बुकोव्स्की, जो आवारगी, शराब, अकथ की कथनी करने वाले के रूप में प्रसिद्ध हैं और इनके और इनकी रचनायों के ऊपर कम से कम चार-पांच फिल्में जरुर बन चुकी हैं. यह सब सिर्फ इसलिए कहा गया है कि शराबी की रचनात्मकता को शराब के बोतल का जिन्न मात्र न समझ लिया जाय और दुनिया में हिंदी के अलावा ऐसा बहुत कम जगह समझा गया है.

परम्परागत काव्य, काव्यशात्र और काव्य-परंपरा का धनी होना ही क्या कृष्ण कल्पित की प्रासंगिकता है? अगर इतना भर होता तो वे एक भाष्यकार मात्र बन कर रह जाते. कल्पित की प्रासंगिकता वहाँ है जब वे परंपरा प्रदत्त सूत्रों का प्रासंगिक भाष्य कर डालते हैं लेकिन उनकी इस प्रासंगिकता का सूत्र/सन्दर्भ क्या है? कभी एक बंगाली मित्र, जो कि दर्शन का शोधार्थी था, को शराबी की सूक्तियां सुनाई थी, उसने सुनकर जो पहली पंक्ति उचारी थी वह यह कि कवि मॉडर्निस्ट है. मैं भी यही सोचा करता था लेकिन कभी बोलने की हिम्मत नहीं हुयी थी. इस धारणा के प्रति अभी तक पूरी तरह से सहमत भी नहीं हुआ था. लेकिन जैसे ही उनकी कहानी ‘शराबघर’ पढ़ी, लोहा मान लिया. ‘शराबघर’ कहानी की चर्चा पहले क्यों नहीं हुयी या  क्यों नहीं सुनी इसका अंदाजा लगाना मुश्किल है. कल्पित बहुत ही सहज और प्रवाहपूर्ण गद्य के भी धनी हैं, यह अब तक अनछुआ था. कल्पित सार्त्र के इतने नजदीक सिर्फ ध्वनित नहीं होते हैं बल्कि रचनात्मक रूप से वहीं कहीं स्थित हैं, ‘शराबघर’ कहानी से इसकी तस्दीक की जा सकती है. ‘शराबघर’ की आत्मा हिंदी में किसी और के यहाँ अगर मिलती है तो वे हैं ज्ञानरंजन और उनकी कहानी ‘घंटा’.

कृष्ण कल्पित के ‘शराबघर’ को ‘विमर्श’ के दायरे की कहानी मानता हूँ, जिस पर चर्चा होनी चाहिए. इसी लिए हमने हिंदी के अप्रतिम गद्यकार अनिल यादव से आग्रह किया कि वे इसकी एक भूमिका लिखें. तिरछीस्पेल्लिंग कृष्ण कल्पित और अनिल यादव दोनों का आभारी है. @तिरछिस्पेल्लिंग

कंपनीराज की देन बार, क्लब और पब सदा की नकली जगहें हैं जहां ऐसे लोग बहुतायत में आते हैं जो जीने नहीं जीते दिखने को जिंदगी मानते हैं. इस नकल का नतीजा है कि वहां शराब पीकर की जाने वाली बातों से लेकर टॉयलेट में पेशाब की झार तक एक जैसी होती है. उनके मुकाबिल देसी के ठेके, हौलियां और कलारियां लगभग मायालोक हैं. अव्वल तो वहां देस दिखता है. मैने बहुत थोड़े वक्त के लिए ही सही ऐसे ठेके जिये हैं जहां कारोबार शुरू करने के पहले कालीमाई को माला और दारू चढ़ाई जाती है, बोतलों के बीच तार पर गंवई दुकानदार का लंगोट सूख रहा होता है, कोई बच्चा पढ़ रहा होता है और वह जस्ते की थाली में बेंट की जगह सुतली बंधे चाकू से हमाहमीं के साथ शराबियों से दुआ सलाम करता हुआ तरकारी काट रहा होता है. देस भी कुछ चीज नहीं, वहां न जाने कितनी सभ्यताओं के नुमाइंदों के रूप में साले-बहनोई, घीसू-माधव, मौलवी-शागिर्द, मौसिया, फूफू, भांजे, दूल्हा भाई, आशिक और माशूका के बाप एक साथ बैठे मिलते हैं. हरेक का अपना मौलिक लबोलहजा यहां तक कि सिसकारी और भींगी मूंछे निथारने की अदा होती है, उनके भीतर कोई पुरातन जगह होती है जहां से वे बोलते हैं, उस जगह को पहचानने की तमीज हो तभी पता चलता है कि वे किस इतिहास से हंकाले जाने के बाद यहां आन पहुंचे हैं. वहां शोर के रोएंदार सीने में एक इत्मीनान का बड़ा सा दायरा होता है जिसमें नई जिंदगी के खाके बनते हैं, जहां बरसों से कोई हर शाम दो कुल्हड़ रख के पीता है, कोई अपने आंसुओं और रातरानी की महक में नहाकर पवित्र लौटता है, कोई दोस्त को दो निवाले खिलाने के लिए कसमें देते हुए मां हुआ जाता है, कोई एक ही मुड़े तुड़े कागज को बरसों पढ़ता है, कोई ध्यानस्थ होकर दुनिया की सतह से बहुत ऊपर चला जाता है और नहीं लौटता. मुझे अपने दौर सबसे जहीन, प्रतिभाशाली लोग वहीं मिले हैं, हमेशा की तरह उनमें से ज्यादातर की अदा बरबाद होना थी और उन्हें इसकी खास फिक्र भी नहीं थी.

इसे शराब का कसीदा न समझा जाए लेकिन उसमें कुछ ऐसा होता जरूर है जो जिंदगी की आग को कुरेद देता है बशर्ते आपमें कभी जरा सी आग रही हो. इसे घटिया पियक्कड़ों की सताई औरतें नहीं समझेंगी, वे शरीफ लोग तो कतई नहीं जिन्होंने चखी नहीं लेकिन नैतिकता और पाखंड के नशे में धुत्त रहते हैं. कृष्ण कल्पित की इस कहानी में एक ऐसे ही शराबघर के सहन में डोलती उसकी आत्मा के पैरों की आवाज सुनाई पड़ती है. कोई दो राय नहीं कि शराबी की सुक्तियां उनकी कमाई चीज है. @अनिल यादव

Snap shot from O-Bi, O-Ba: The End of Civilization

Snap shot from O-Bi, O-Ba: The End of Civilization

By कृष्‍ण कल्पित

शराबघर

वह एक सस्‍ता शराबघर था. शहर के बीचों बीच – थोड़ा अंदर धंसकर. वहां देशी से लेकर विदेशी तक हर किस्‍म की शराब मिलती थी और कहा जाता था कि यह शराबघर चौबीसों घंटे खुला रहता है. य‍ह ठीक भी था, क्‍योंकि एक दिन सवेरे चार बजे तक पीते रहने के बाद हम वहीं ‘लुढ़क’ गए थे और आंख खुलने पर देखा कि शहर की नालियां साफ करने वाले सफाई मजदूर देसी शराब की गुटकियां ले रहे थे. सुबह के पांच साढे पांच बजे होंगे, जब बांसों पर लटकाई हुई झाड़ूओं से छनकर आती रोशनी हमारे चेहरों पर पड़ी.

शर्माजी अभी ‘जागे’ नहीं थे. मैंने उन्‍हें झिंझोड़कर उठाने की कोशिश की. वे हड़बड़ाकर उठे और जेब में पड़े चश्‍मे को टटोलने लगे. शराबघर की दीवार के परली तरफ वाले रास्‍ते पर सामाजिक कार्यकर्ताओं का एक जत्‍था ‘उठ जाग मुसाफिर भोर भई, अब रैन कहां जो सोबत है’ गाते हुए गुजर रहा था. इस गाने को सुनकर या जाने किसी और बात पर एक सफाई मजदूर बेतरह हंसने लगा. मैंने, चौंक कर उसकी तरफ देखा, उसने हमारी तरफ भरपूर नजरों से देखा और कहने लगा, ‘जागो, मालिक, अब तो जागो .’

मैं खिसिया दिया. शर्माजी ने सिगरेट सुलगाते हुए ‘मालिक’ शब्‍द का व्‍यंग्य मिश्रित उच्‍चारण किया और हंसने लगे. हम धीरे-धीरे ‘जाग’ रहे थे हालांकि रात को पी गई शराब का खुमार अब भी हमारी आंखों की जड़ों तक पहुंच रहा था.

हम शराबघर से बाहर निकल रहे थे और चुप थे. चलते हुए हमारी चुप्‍पी इतनी शांति प्रदायिनी थी कि बोलते हुए तकलीफ हो रही थी. वैसे भी पिछली रात हम इतना बोल चुके थे कि बड़ी आसानी से दो-तीन दिन चुप रह सकते थे. हम बहुत धीमे-धीमे चल रहे थे. थोड़ा दूर आकर, गली के नुक्‍कड़ के पास शर्माजी ने पूछा, ‘वह तो रात को ही चला गया होगा.’

‘’हां उसे घर पहुंचना जरूरी था. वैसे मेरे इस उत्‍तर की कोई खास जरूरत नहीं थी, क्‍योंकि शर्माजी को पता था कि वह रात को ही चला गया है. फिर भी यह निरर्थक बातचीत हमारे बीच संवाद का रास्‍ता खोल रही थी, जिसे मैं अभी जानबूझकर टाले रखना चाह रहा था.

हम साल भर से इस शराबघर में आ रहे थे. लेकिन सवेरे की रोशनी में यह परिचित रास्‍ता कुछ बदला हुआ सा लग रहा था. मैं धुंधली पड़ चुकी लंबी गुलाबी दीवार पर बने बुर्ज को देर तक देखता रहा. लाल भक्‍क सूरज को बुर्ज में उलझा हुआ देखकर मैं अभिभूत हो गया. कुछ-कुछ ऐसा लग रहा था जैसे इस धरती पर पहली बार सवेरा हुआ हो. ऐसा शायद इसलिए कि एक तो पिछले कई बरसों से सबेरे जल्‍दी उठने की आदत नहीं रही थी और दूसरे नशा अभी पूरी तरह उतरा नहीं था.’ ‘अद्भुत’ मैं मन ही मन बुदबुदाया और बाहर से साइकिल पर गुजर रहे हॉकर से पूछा, ‘क्‍या खबर हैॽ’ हॉकर ने एक बार मेरी तरफ देखा और बिना जवाब दिए पैंडल मारता आगे बढ़ गया.

शर्माजी मुझसे आगे चल रहे थे. मैं पीछे चल रहा था और प्रसन्‍न था. असल में प्रसन्‍नता हमारे शरीरों के अंदरूनी और निचले हिस्‍से में थोड़ी बहुत बची रह गई थी जो कभी-कभार अल्‍कोहल के धक्‍के से ऊपर आ जाती थी. हम नवाब तो थे नहीं, गरीब और मध्‍यवर्ग के लड़के थे, जो गांवों-कस्‍बों में अपने ढहते हुए घरों और दुखी माताओं को छोड़कर इस बड़े शहर में आये थे. एक दिन हमने सिर्फ जीते रहने की धुन पर थिरकने से इनकार कर दिया तो हमें खदेड़ा जाने लगा. इस तरह हमें समाज की ‘मुख्‍यधारा’ से बाहर कर दिया गया. तब हमारी आंखों में कुछ स्‍वप्‍न बचे हुए थे. हम सोचते थे कि हम एक दिन इस दुनिया को बदल देंगे. यह तो अब आकर पता चला कि हम समाज का कुछ भी नहीं हिला पाए. बल्कि हमारे ही हुलिए बदल गए. हम चाहते तो लौट भी सकते थे और अपनी मां की गोद में बैठकर सुबक सकते थे. लेकिन उससे क्‍या होता? न हममें लौटने की इच्‍छा बची थी न शक्ति. हमारे कुछ मित्र बीच से लौट भी गए थे, पर हम इस जोखिम भरे रास्‍ते पर बहुत आगे बढ़ आये थे, जहां रोमांच तो था ही कुछ ‘खोजने’ का आनंद भी था. लगता था जैसे हम कहीं पहुंच रहे थे. यह शायद हमारा भ्रम था. हम कहीं नहीं पहुंचते थे, सिर्फ हर शाम बिना नागा इस सस्‍ते शराब घर में पहुंच जाते थे.

यह शराबघर किसी बंदरगाह की तरह था, जहां हमें हार-थककर अपने अपने ‘बेड़े’ डालने थे. शराबघर क्‍या था, एक बहुत पुराना मकान था. दरवाजे के बाहर एक नीम का पेड़ था. अंदर आने पर एक चौक, दो-तीन कोठरियां, जो शराब रखने का गोदाम बन चुकी थीं और आंगन के बीचों बीच एक गहरा कुआं था, जिसमें बहुत नीचे जाकर पानी चमकता था. इस शराबघर का मालिक एक रिटायर्ड फौजी था, जो बिना लाइसेंस अपने बूते पर शराबघर को चलाता था. शराबबंदी के मुश्किल समय में भी इस बूढ़े फौजी ने शहर की इस ‘आखिरी रोशनी’ को बूझने नहीं दिया था. ऐसा लगता था जैसे इस बूढ़े फौजी के लिए यह शराबघर चलाना व्‍यापार कम और ‘मिशन’ अधिक हो. पूरे शहर में यह शराबघर फौजी के अड्डे के नाम से मशहूर था.

हम काफी भटक-भटका कर इस अड्डे तक पहुंचे थे. पहले-पहल शायद शर्माजी ही मुझे इस अड्डे तक लेकर आए थे. कोई सालेक भर पहले की बात होगी. मैं कॉफी हाउस के आखिरी कोने में बैठा बची हुई आखिरी अठन्‍नी उछाल रहा था और बीच-बीच में केबिन में बैठी उस लड़की की तरफ देख रहा था, जो अपने बगल में बैठे लड़के से अपने थके हुए शरीर को सटाए दे रही थी. इस चक्‍कर में अठन्‍नी बार-बार हथेली की बजाए टेबल पर गिर रही थी. तभी कॉफी हाउस का दरवाजा खोलकर सोम अंदर घुसा– उसने घुसते ही कोने में बैठ मुझे देख लिया था. वह सीधा मेरे पास आया. बीच में, और बाहर कई लोगों ने उसे ‘सोम सोम’ कहकर पुकारा, लेकिन उसने किसी की आवाज पर कान नहीं दिया. वह जब से शहर के एक प्रमुख अखबार का सिटी रिपोर्टर बना है, उसकी पूछ बढ़ गई है. इस बात को सोम जानता था, इसी से वह अभी तक बचा हुआ था. वह जानता था कि उसे कोई नहीं पूछता, सब साले उस अखबार के आगे पूंछ हिला रहे हैं जो सवेरे-सवेरे इस शहर पर कनात की तरह तन जाता है. सोम तो छह महीने पहले भी था, इसी शहर में, इसी कॉफी हाउस में, इसी नरक में. तब किसी चिड़िया के पूत ने नहीं पुकारा– ‘सोम –सोम’. आगे सोफे पर बैठा वह तुंदियल खादी का कुरता, सोम के सामने ही-ही करते जिसके दांत नहीं थकते, आज वही दार्शनिक भाव से चलकर आया था. यहीं कोने में. पिछली सर्दियों में. सोम सिगरेट खाली करके गांजे को हथेली पर रगड़ रहा था. खादी के कुरते ने टेलीविजन के उद्घोषक की तरह आते ही सोम से कहा था, ‘सोम, तुम धीरे-धीरे अपनी मृत्‍यु की तरफ बढ़ रहे हो… .

‘तुम कौन से तक्षशिला की ओर बढ़ रहे हो, कुत्‍ते. चले जाओं यहां से.’ ‘कुत्‍ता’ संबोधन सुनकर वह हक्‍का-बक्‍का रह गया था. चुपचाप वापस लौट गया था. कुत्‍ते, मच्‍छर, कीड़े आदि सोम के प्रिय सम्‍बोधन थे, जिन्‍हें वह किसी भी लाट-साहब के लिए कहीं भी काम में ले सकता था. इधर अखबार में काम करने के बाद वह ‘बास्‍टर्ड’ शब्‍द का इस्‍तेमाल ज्‍यादा करने लगा है.

वह आते ही मुझ से लगभग लिपट गया. मैंने महसूस किया उसके लिपटने में वही पुराने वाला ताप अभी है. बाहर से भले ही आदमी बदल जाए, भीतर से बदलने में समय लगता है.

‘आओे, प्‍यारे.’ सोम ने कहा. मैं उसके पीछे पीछे कॉफी हाउस के बाहर चला आया था.

बाहर सूरज ढल रहा था. ढलते सूरज की किरणें शहर की पुरानी इमारतों से टकराकर सोने की तरह चमक रही थी. वह मेरा प्रिय दृश्‍य था. मैं आंखों के ऊपर हथेली टिकाकर उस सोनिया धूप को आंखों में भरता रहा. सूरज ! अपनी सोनिया किरणों पर इतराओ मत, हमारे यहां की तो रेत भी सोना है. सूरज ने मेरी बात नहीं सुनी. मैंने सामने देखा, सोम निराश होकर लौट रहा था. उसने कहा, ‘आज पगार का दिन है, शहर की तमाम दुकानें बंद हैं और आजकल पुलिस कुछ ज्‍यादा ही ध्‍यान दे रही है… फिर भी रूको, मैं सोचता हूं– क्‍या किया जा सकता है.’

तभी सामने रेलिंग के पास से शर्माजी आते दिखे. शर्माजी हमारे बीच उस पुरोधा की तरह थे, जिन्हें सब संकटों का हल पता हो. शर्माजी हमसे उम्र में काफी बड़े थे और हमारे लिए घने छायादार पेड़ की तरह थे, जिसकी छांव में हम सुस्‍ताया करते थे. वे इस शहर से थोड़ा दूर एक कस्‍बे के कॉलेज में अंग्रेजी पढ़ाते थे. पिछले डेढ़ साल से इसी शहर में थे और विश्‍वविद्यालय में अंग्रेजी के ब्‍लैक लिटरेचर पर कोई शोध कर रहे थे. मेरी जानकारी में पिछले डेढ़ वर्ष से शर्माजी ने अपने शोध का एक पन्‍ना भी नहीं लिखा था. वे लिखने से परे थे. साहित्‍य से उनका गहरा लगाव था. पीने के बाद वे जब कोई ब्‍लैक कहानी या कविता सुनाते तो उनकी आंखे भीग जाती थी. थोड़ा ज्‍यादा पीने के बाद वे ब्‍लैक लिटरेचर भूल जाते और कबीर, तुलसी और मीरा की कविताएं सुनाते. कबीर का ‘कौन ठगवा नजरिया लूटल हो’ पद सुनाते हुए उनकी आंखों से जार-जार आंसू बहते थे. फिर किन्‍हीं अज्ञात लोगों को संबोधित करके वे कहते थे, ‘वे स्साले हंसते हैं कि मैं रोता हूं. रोना पाप है क्‍या, हां मैं रोता हूं … क्‍योंकि मेरी आंखों में आंसू है….’ ऐसे ही एक लंबे एकालाप के बाद उनका एक तकिया कलाम था, ‘जिनकी आंखों का पानी मर गया, वे क्‍या खाक लिक्‍खेंगेॽ’ इसके बाद एक सांस खींचकर एक लंबा मौन और फिर शर्माजी का हंसना. सीधे हृदय से निकली हुई हंसी.

उस दिन पहली बार शर्माजी मुझे और सोम को फौजी के अड्डे पर लाए थे. वह दिन और आज का दिन, शायद ही कोई दिन बीता हो जब हम इस अड्डे पर न आये हों. सोम जरूर बीच-बीच में गच्‍चा दे जाता था, लेकिन अब तक कॉफी हाउस के कई और लोगों को हमारे अड्डे का पता चल चुका था और वे सूंघते-सूंघते यहां तक आने लगे थे, जिनका उद्देश्‍य सिर्फ शराब पीना था, उनसे हम बचना चाहते थे और उनसे बचना मुश्किल था. वे दिन भर गिद्ध की तरह शहर पर मंडराते हैं और शाम होते ही किसी ठौर उतर लेते हैं. वे बुरे नहीं थे, लेकिन इतने भले थे कि हर समय उनके भीतर मनुष्‍यता फुफकारती रहती थी.

वहां इतने सारे लोगों को एक साथ बैठकर पीते हुए देखने से एक घटना प्रधान संसार के चलते रहने की अनुभूति होती थी. मजदूर, रिक्‍शा चलाने वाले, ठेले वाले, छोटे-मोटे व्‍यापारी, रंगरेज, अध्‍यापक, सिनेमा के पोस्‍टर बनाने वाले चित्रकार, मोची, बढ़ई और बहुत संभव है कि उठाइगीर, चोर, मवाली और हत्‍यारे भी इनमें हों. उस पुराने मकान के आंगन में जिसे जहां जगह मिली वहीं पर बैठकर पी रहे हैं. कोठरी के बाहर एक मरियल लट्टू जल रहा था और चांदनी रात का भूरा मैला आलोक उस शराब घर पर बरस रहा था. आधे-अधूरे अस्‍पष्‍ट शब्‍द, फुसफुसाती आवाजें, और बीच-बीच में फुसफुसाहट को बेधती हुई तीखी और कर्कश आवाजें. इससे पहले जीवन के इतने बीचों बीच बैठकर मैंने शराब नहीं पी थी. इतना सारा जीवन. मेरी आंखें आश्‍चर्य से फटी जा रही थी. उस दिन ही मैंने असलियत में जाना कि इस शहर में करने के लिए इतने सारे धंधे हैं और जीने के लिए इतनी सारी जगहें.

उस दिन जब हम उस शराबघर से बाहर निकले तो मेरी चाल में किसी सम्राट की सी लचक थी, आंखों में किसी संत की सी तरलता और हृदय में अथाह प्‍यार. बाहर आकर लगा यह शहर हमारे लिए ही जगमगा रहा है. दूर पहाड़ी पर बने किले की रोशनियां खास हमारे लिए हैं. उस दिन बरसों बाद मैंने एक पुरानी फिल्‍म का गाना पूरा गाया.

असल में पिछले एक अरसे से हम थोड़े से लोगों की संगत में सड़ रहे थे. विश्‍वविद्यालय और कॉफी हाउस. हमारे पास सिर्फ ये दो जगहें बची थीं. थोड़े से अध्‍यापक, शोध-छात्र, पत्रकार और कॉफी हाउस के वही चिर-परिचित पुराने चेहरे. कोई ऐसा कोण नहीं बचा था, जिधर से हमने इन चेहरों को नहीं पहचाना हो. वे सब इतने जाने-पहचाने चेहरे थे कि पूरी तरह बेजान थे. निराशा हमारे शरीर में धंसने लगी थी और अब हमारा स्थाई भाव बन चुका था. एक चिड़चिड़ापन चेहरे पर हर समय चिपका रहता था. सफलता हमें डराने लगी थी और विफलता भीतर ही भीतर कुतर रही थी. हम न रोजों में रोने लायक बचे थे न गीतों में गाने लायक.

मुझे एमए किए तीन बरस बीत चुके थे. पिछले तीन बरसों से मैं अवैध रूप से विश्‍वविद्यालय के होस्‍टल में रह रहा था. अभी कुछ दिन हुए एक दिन जब मैं देर रात को हॉस्‍टल पहुंचा तो देखा मेरा सामान, किताबें और बिस्‍तर कमरे के बाहर फेंक दिये गए हैं और कमरे पर हॉस्‍टल का एक मोटा ताला लटक रहा है. रात मैं वहीं बरामदे में पड़ी एक टूटी खाट पर सोया था सवेरे एक रिक्‍शे पर अपना सामान लादकर सीधा शर्माजी के कमरे पर पहुंच गया. शर्माजी ने मेरा बिस्‍तर अपने कमरे के एक कोने में बिछा दिया. तब से मैं शर्माजी के कमरे में ही रह रहा था. इन दिनों मैं घोर निराशा में डूबा हुआ था. कोई भी रास्‍ता नहीं दिखलाई पड़ रहा था. मैं जीवन से पूरी तरह खाली हो चुका था.

शर्माजी ने मुझे आश्रय दिया, सहारा दिया, दिलासा भी दी. लेकिन मेरे मन पर पड़ा हुआ निराशा का भारी पत्‍थर हट नहीं रहा था.

उन दिनों मृत्‍यु को लेकर बहुत सारी कविताएं भी मैंने लिखीं. यह साल सवा साल पहले की बात है. शर्माजी सवेरे निकल जाते थे और मैं सारा दिन कमरे में अकेला पड़ा हुआ मृत्‍यु चिंतन में लीन रहता. शराब पीने के बाद मरने की इच्‍छा अधिक प्रबल हो उठती थी. एक दिन मैंने अपनी मृत्‍यु संबंधी सारी कविताओं को एक डायरी में उतारा और डायरी के पहले पृ्ष्‍ठ पर लिखा– ‘मैं मरना चाहता हूं.’ इसके बाद मैंने लिखा– ‘अब मुझसे जीने के लिए कहना किसी सम्राट से मूंगफली बेचने के लिए कहना है.’ यह एक जापानी उपन्‍यासकार के पत्र का अंश था, जो उसने आत्‍महत्‍या करने से पहले अपनी बहन को लिखा था. मैंने इसके नीचे अपने हस्‍ताक्षर किए और डायरी सिरहाने रखकर सो गया .

दूसरे दिन आंख खुलने पर जब मैंने इस डायरी को पढ़ा तो बड़ा अटपटा सा लगा. फिर मुझे हंसी आ गई. बाहर दरवाजे पर दूध वाला घंटी बजा रहा था. हॉकर ने नीचे से अखबार फेंका जो मेरे सर से आकर टकराया. मैंने अपनी उस डायरी को कमरे के ऊपरी कोने में बनी ताख पर फेंक दिया और खिड़की के पास आया. बाहर रास्‍ते में एक दस बारह साल का चरवाहा हाथ में एक बेंत लेकर बकरियों के रेवड़ को हांकता हुआ पहाडि़यों की तरफ ले जा रहा था. शर्माजी अभी सोए हुए थे. मैं जल्‍दी-जल्‍दी तैयार हुआ और बाहर निकल आया. यह उसी दिन की बात है, जब मैं कॉफी हाउस से उठन्‍नी उछाल रहा था और जिस दिन पहली बार उस सस्‍ते शराबघर में गया था. उसी दिन वहां से बाहर निकलकर मैंने कहा था, ‘मैं अभी जीना चाहता हूं.’

मैं तेज तेज कदमों से चलकर शर्माजी के पास तक आ गया. हम एक चाय की थड़ी पर बाहर पड़े मूढ़ों पर बैठ गए. शर्माजी ने पूछा, ‘रात को बाबू खां पेंटर तुमसे क्‍या कह रहा था?

‘बाबू खां ने मुझे काम के लिए बुलाया है. उसने कहा है कि मैं उसके होर्डिंग रंग दिया करूं.’ मैंने कहा .

शर्माजी यह तो जानते ही थे कि मैं पिछले छह महीने से जिस प्रेस में जाकर प्रुफ पढ़ता हूं, वह काम मुझे रामदयाल फोरमेन ने दिलवाया था. रामदयाल से भी मेरी मुलाकात यहीं हुई थी. शर्माजी यह भी जानते थे कि आजकल सफेद बालों वाला बूढ़ा शराबी घर से हर रोज टिफिन लाता है और मुझे कॉफी हाउस में प्रेस में ढूंढता रहता है और धमकाकर पूछता है, ‘खाना खाया या नहीं?’

और तुम उस बढ़ई से क्‍या पूछ रहे थे ॽ’ शर्माजी रात को सचमुच ज्‍यादा पी गए थे और उन्‍हें रात की कोई बात याद नहीं.

मैं उससे पूछ रहा था कि एक डबल बेड का क्‍या खर्चा बैठता है?’ मैंने उत्‍तर दिया.

शर्माजी एक रहस्‍यभरी दृष्टि से मेरी तरफ देखकर चाय की चुस्कियां लेने लगे. मैंने सामने देखा, सफाई मजदूर अपने कंधों पर बांसझाड़ू लटकाए शहर की तरफ बढ़ रहे थे. वे अब शहर की गंदगी साफ करेंगे. देशी दारू का एक तेज भभका हवा में तैर गया.

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कृष्ण कल्पित. यह तब के आस-पास की ही तस्वीर है जब उन्होंने यह कहानी लिखी होगी. उनसे मोबाइल-9968312514 और ईमेल- krishnakalpit@gmail.com पर संपर्क संभव है.

‘संपूर्ण क्रांति’ और ‘रेलगाड़ी’ के बीच जरुरी अन्तर को ‘बाग़-ए-बेदिल’ में खोजता हमारे जमाने का एक ‘मीर’: चंदन श्रीवास्तव

शराबी की अद्भुत सूक्तियां लिखने वाले कृष्ण कल्पित जी , सद्य प्रकाशित काव्य-संकलन ‘बाग़-ए-बेदिल’ कारण इधर घनघोर चर्चा के केंद्र बने हुए हैं. बहुतेरे लोगों ने उनकी पूर्व-पंक्तियाँ के आधार पर ही मान लिया था कि वे अब प्रकाश में नहीं आयेंगें। शराबी की सूक्तियां नामक कितबिया में वे पहले ही लिख गए थे- कभी प्रकाश में नहीं आता शराबी/ अंधेरे में धीरे धीरे/ विलीन हो जाता है. कविता के प्रति जैसा समर्पण/लगाव इस शराबी के पास है वैसा रेअर ही देखने को मिलता है. और यह रेअरनेस ही वह जिजीविषा है जो उन्हें बार-बार प्रकाश में लाता है. बाग़-ए-बेदिल वाला प्रकाश तो इतना तेज है कि बहुतेरों की आँखें चौंधिया गयी हैं और बहुतेरे ऐसे हैं जो इस तेज में भी बारीकियां पढ़ रहे हैं.

‘बाग़-ए-बेदिल’ पर जे.एन.यू में आयोजित संगोष्ठी में चन्दन श्रीवास्तव एक वक्ता के बतौर आमंत्रित थे. इस संगोष्ठी में उनके कविता-कर्म को गम्भीरता से लेने की जरुरत महसूस की गयी. चन्दन श्रीवास्तव का यह यह लेख इसी प्रक्रिया की शुरूआती कड़ी है. बाग़-ए-बेदिल और कृष्ण कल्पित के कवि-व्यक्तित्व के ऊपर आगे भी लेख दिए जायेंगे।  

बाग़-ए-बेदिल

बाग़-ए-बेदिल

By  चंदन श्रीवास्तव

विश्वविद्यालयी दिनों की ट्रेनिंग की वजह से तबीयत कुछ ऐसी हो चली है कि लफ्ज किताब सुनते ही मन में एक रटी-रटायी पंक्ति गूंजने लगती है- आखिर! इस किताब की पॉलिटिक्स क्या है ? हैरत नहीं कि किताब बाग़-ए-बेदिल हाथ आई तो ऐसा ही हुआ। किताब भारी-भरकम है, आकार से भी और आवाज से भी। अदबी मुआमले की समझ के मामले में अपनी औकात देखी तो भार उठाने की हिम्मत नहीं हुई। सोचा, चलो किसी और के लिखे से काम चलाते हैं। और इसी फिराक में नजर अटकी बाग़ ए बेदिल पर कवि अरुणकमल की टिप्पणी के एक टुकड़े पर कि – “ कल्पित ने अतीत को वर्तमान में ढाल दिया है और वर्तमान को अतीत में ढालकर उसे व्यतीत होने से रोका है, इसलिए हर कविता कई कालों में प्रवाहित होती है। ” कहते हैं बदलाव सृष्टि का नियम है। अपनी इतिहास-प्रदत्त स्थिति के कारण आप उससे सहमत-असहमत हो सकते हैं। सो, अरुणकमल की पंक्ति को पढ़कर लगा कृष्ण कल्पित की कोशिश समय के अनवरत घूमते पहिए को थाम लेने की है। लगा, कृष्ण कल्पित अपने खास समय के भीतर बदलाव के किसी रंग-ढंग से असहमत हैं और ‘कविता के कुरुक्षेत्र’ में उस बदलाव पर जीत हासिल करने के लिए उतरे हैं।

लेकिन, कृष्ण कल्पित का अपने कवि और कविता के बारे में ख्याल ऐसा निष्कर्ष निकालने से रोकता है। अपने कवि-कर्म को लेकर कल्पित साहब का कहना है कि -“ ये कवितायें एक उपेक्षित और दीवार से लगा दिए गए कवि की प्रति-कवितायें हैं।”  और “ इन कविताओं में शब्दों का आयुधों और अस्त्र-शस्त्रों की तरह उपयोग आत्म-रक्षार्थ ही हुआ है..किसी दुश्मन, किसी भूखंड, या कीर्ति को विजित करने के लिए नहीं। हर कवि को अपने लिए एक कवच का निर्माण करना पड़ता है और कविता-साधना तो निश्चय ही किसी निरंतर युद्ध से कम नहीं..। ” आगे परंपरा का निजी-पाठ करते हुए उन्होंने यह भी जोड़ा है कि-“प्रागैतिहासिक काल से ही कविता से तीर-तमंचों का काम लिया जाता रहा है- आत्मरक्षार्थ या मानवता की रक्षा के लिए। ” इस शुरुआती (इस वजह से कच्चे और अधबने) पाठ में अगले अनुच्छेदों तक कोशिश करुंगा कि बाग़-ए-बेदिल को कृष्ण कल्पित के आत्म-वक्तव्य के प्रति ईमानदार रहते हुए पढ़ने की कोशिश करुं और इस निष्कर्ष निकालने की हिम्मत जुटा सकूं कि अतीत को वर्तमान में ढालना या फिर वर्तमान को अतीत में ढालकर उसे व्यतीत होने से रोकना कल्पित की कविता की पॉलिटिक्स के भीतर एक प्रक्रिया है, परिणति कत्तई नहीं।

बाग़ ए बेदिल के अपने पाठ की शुरुआत इस प्रश्न से करें – कृष्ण कल्पित को क्यों लगता है कि उनकी कवितायें एक उपेक्षित और दीवार से लगा दिए गए कवि की प्रति-कवितायें हैं? अपनी भारी-भरकम काया में सैकड़ों कविताओं को समेटने वाली इस किताब का उत्तर होगा एक शिकायत या कह लें फरियाद की शक्ल में सामने आयेगा-

उस देश में जेबकतरों की तरह कवियों ने भी अपने इलाके बांट रखे थेमी लार्ड।

वहां गिरहकटोंपिंडारियों मवालियों कबाड़ियों और हलकटों को कवि कहने का रिवाज थाहुजूर।

औरकवियों से उस देश में अपराधियों का सा सलूक किया जाता थामहोदय!…

कबाड़ीपन और कवि-कर्म के बीच का भेद क्योंकर मिट रहा है ? बाग़-ए-बेदिल का उत्तर है-

‘ यह विचार विपथता इसलिए थी,

कि वह उस जनपद का नहींदस जनपथ का कवि थासार्त्र !

बाग़-ए-बेदिल की कविता विपथता का कारण विपर्यय में खोजती है। ‘ जनपद ’( याद करें पुराने वक्तों के महाजनपदों को, देश से राष्ट्र बनने की हिंसक प्रक्रिया को, मेट्रोपॉलिटनी सार्वभौमिकता से स्थानीयता को बचाये रखने की जुगत को) और ‘दस जनपथ ’( 10 डाऊनिंग स्ट्रीट से निकले लोकतंत्र/आधुनिकता की भारतीय अनुकृति का नया संस्करण) के बीच का विपर्यय। जिससे अपेक्षा थी कि ‘उस जनपद का कवि’होकर रहेगा वह ‘दस जनपथ का कवि’ जिस समय के भीतर बनने को बाध्य हुआ उस समय के लक्षण क्या हैं ? वह समय कौन-सा है जिसमें कवि हलकट बनने को बाध्य और आतुर एक साथ है? बाग़-ए-बेदिल का उत्तर है-

जेपी, लोकतंत्र की आँख से ढलका हुआ आंसू था,

जो अब सूख चला हैपार्थ।

कि जनता आती है’ वाले विशाल मैदान में,

अब बाजीगर और रंडियां घूमते हैं।

दरअस्ल संपूर्ण क्रांति अब एक रेलगाड़ी का नाम हैसार्त्र!

और, ऐसे समय में क्या अघट घट रहा है ?

बाग़-ए-बेदिल की मानें तो-

ब्राह्नणों की फौज से जब घिर गई मायावती,

देख लेना एक दिन उसको बना देंगे सती।

बीवियां फिरती हैं दुनिया भर में कत्थक नाचतीं,

और, भारत मां तुम्हारे घर में बर्तन मांजती,

बुझ गये दीपक तो क्या आओ उतारें आरती,

वाजपेयी को मिला सम्मान भारत-भारती।

एक ऐसे समय में जब मर्यादाओं का भयंकर उलटफेर आंखों के आगे हो, कविता और कबाड़ का, कवि और गिरहकट का अंतर समाप्त हो रहा हो, तो कृष्ण कल्पित के अपने ही शब्दों में मानवता के रक्षार्थ कविता और कवि को क्या करना चाहिए? दूसरे शब्दों में, जब व्यवस्था अपने बाशिन्दों को विज्ञापनी भाषा में समझा रही हो कि दरअसल क्रांति एक रेलगाड़ी का ही नाम है और वह इस तरह कि तुम अपने जनपद से चलकर दस जनपथ और दस जनपथ(और उसके पसारे) से निकलकर अपने जनपद के भीतर अबाध आवाजाही कर सकते हो, और इस तरह, मानवीय मुक्ति के एक नये आख्यान में प्रवेश कर सकते हो, तो कविता, व्यवस्था की इस भाषा के काट में क्या करे ? किन शब्दों से बने कौन-से आयुध लाये ? इस प्रश्न का उत्तर खोजने चलें तो एक रास्ता खुलता है जिसपर चलकर आप कह सकें कि अतीत को वर्तमान में ढालना और वर्तमान को अतीत में ढालकर उसे व्यतीत होने से रोकना दरअसल कृष्ण कल्पित की कविता के लिए एक प्रक्रिया है और परिणति है उस भाषा को हासिल करने की कोशिश करना जो मुक्ति की प्रचलित भाषा की काट में खड़ी हो।

कल्पित इस भाषा को खोजने के लिए बार-बार अतीत की कविता के उस्तादों के पास लौटते हैं। चाहें तो कह लें, शेखावटी, जयपुर, पटना जैसे ‘उस जनपद’ का अपना घर “लुटियन दिल्ली” के जोर से लुट जाने का गम गलत करने के लिए किसी पीर-फकीर-शायर की मजार पर बैठना चाहते हैं। वहां झरने वाली निबौलियों को उठाकर पूरे हिन्दुस्तान की कविता की रिवायत के भीतर बे दर-ओ-दीवार का एक घर बसाना चाहते हैं। उन्हें उम्मीद, वहां से प्रचलित भाषा की काट करने वाली एक भाषा मिल सकेगी।यही वजह रही होगी जो पुस्तक के शीर्षक में आया शब्द बेदिल किताब के हर्फों में एक कहानी लेकर जिन्दा होता है। कहानी कविता के भेष में कुछ यों है कि-

औरंगजेब के बड़े बेटे आजमशाह ने,

बेदिल आजीमाबादी/देहलवी को मिलने के लिए बुलाया

तो बेदिल ने यह मिसरा लिख भेजापार्थ!

दुनिया अगर देहेन्द न जुम्बम ज जाए खीश- मन बस्ता अम हिनाए-किनायत ब जाये खीश

( दुनिया भी अगर दे दो तब भी मैं अपनी जगह से नहीं हिलूंगा क्योंकि मैंने अपने पांवों में सब्र की मेहंदी लगा ली है)

कविता के भीतर इस कथा की पुनर्वासी करके कल्पित एक साथ कई काम करते हैं। एक तो वे आपके मन के भीतर पैठी ऐसी ही अनेक कथाओं के लिए राह खोलते हैं। इस कथा को पढ़कर बिरला ही होगा जिसके मुंह पर यह पंक्ति ना आ जाये- आवत जात पनहिया टूटी बिसर गयोहरिनाम- संतन को कहा सिकरी सो काम। किसी को मिर्जा गालिब का यह शेर भी याद आ सकता है- हजार कस्द करता हूं इस जा से कहीं और जाने का- दिल कहता है तू जा मैं नहीं जाने का। और, बेतरतरीबी के तर्क से मन के किसी कोने में बैठा ‘अंगद का पाँव’ भी याद आ सकता है। तेजरफ्तारी अगर आज के जीवन और जगत को परिभाषित करने वाली वर्चस्वकारी भाषा है तो फिर कृष्ण कल्पित कविता के उस्तादों के पास जाकर वहां से उनके ठहराव ढूंढ़ लाते हैं।जो कोई बेदिल की तरह सब्र की मेहँदी लगाकर ठहरा है, कोई किसी भक्तकवि की तरह रामकथा में रमने की वजह से ठहरा है तो कोई गालिब की तरह नये-पुराने पस-ओ-पेश में पड़कर ठहरा हुआ है। ठहराव का अपना निजी ठौर खोज सकें- इसके लिए कृष्ण कल्पित की कविता कथाओं या कह लें काव्य-पंक्तियों की एक झनकार(शुक्लजी के शब्दों में कहें तो अर्थ और प्रसंग का गर्भत्व) रचती है। कल्पित की कविताओं(बाग़-ए-बेदिल में) के शब्द और पंक्तियां ‘अर्थ’ और ‘प्रसंग’खोजने के क्रम जब ‘आखर’ तलाशती हैं तो एक पूरा सिलसिला कायम हो जाता है, पूरब की कविता के रुप-शिल्प, कथ्य और वस्तु को सुनने-सुनाने का। कवि अपनी तरफ आखर और अरथ की पूरी परंपरा सौंपने को उत्सुक है ताकि पाठक नये सिरे से रचने और लड़ने के लिए तैयार हो सकें।

आखिर को एक बात दो शब्द “पार्थ” और “सार्त्र” पर। बाग ए बेदिल की कविता का स्थापत्य इन दो शब्दों के बिना संभव नहीं। जैसे कबीर की कविता में संबोध्य का चयन(साधो, संत, पांड़े/बांभन) के अनुकूल कविता की वस्तु बदलती है, साथी ही इन शब्दों के आने के साथ मानो विषय की घोषणा हो जाती है, ठीक उसी तरह कृष्ण कल्पित के बाग़-ए-बेदिल में ‘पार्थ’ और ‘सार्त्र’ कविता की बनावट के दो पाट हैं, और अपने नाम के अनुकूल वस्तु को धारण करते हैं। पार्थ, कुरुक्षेत्र यानि भावी महाविनाश की आशंका के बीच किंकर्तव्यविमूढ़ खड़ा पात्र है, कृष्ण उसे कर्तव्य का उपदेश देते हैं- युद्धस्व..। आशंका सार्त्र के साथ भी है। दो विश्वयुद्धों के बीच खड़ा एक चिन्तक जिसकी आंखों के आगे आधुनिकता या कह लें तर्कबुद्धि पर आधारित राज्यसत्ता/विज्ञान/उद्योग का चरित्र उजागर हुआ और आधुनिकता प्रदत्त मानव-मुक्ति का आख्यान हिरोशिमा पर परमाणु बम के धमाके के साथ दम तोड़ गया। पार्थ के सामने अपने समय की मर्यादाओं के भंग होने का संकट खड़ा हुआ था तो सार्त्र के सामने नई मर्यादाओं के भंग होने का संकट, वे मर्यादाएं जिनका वादा था- हमारे चौखटे में रहो, मुक्ति हो जाओगे । आधुनिक और प्राचीन, दोनों ने मुक्ति शब्द के साथ छल किया- इस बात के दो गवाह कृष्ण कल्पित की कविता में‘पार्थ’ और ‘सार्त्र’ हैं। दोनों को हाजिर-नाजिर जान, बाग़-ए-बेदिल कभी पीड़ा, कभी व्यंग्य, कभी पुकार तो कभी ललकार और कई बार हिकारत के स्वर में बोलती है।

जाहिर है, ग्लोबल गांव होने की जिद में पड़ी दुनिया के विस्थापितों/ शापितों की जगतपीड़ा और आत्मपीड़ा में नाभिनाल रिश्ता बैठाने को बेचैन यह यायावर कवि कृष्ण कल्पित अपने ठौर के तौर पर पार्थ और सार्थ को ही चुन सकता था।

चन्दन श्रीवास्तव

चन्दन श्रीवास्तव

चन्दन श्रीवास्तव,  मूलतया छपरा(बिहार) के निवासी, पिछले पंद्रह सालों से दिल्ली में। पहले आईआईएमसी और फिर जेएनयू में पढ़ाई। “उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध में हिन्दी लोकवृत्त का निर्माण” शीर्षक से पीएचडी के बाद दिल्ली के कॉलेजों में छिटपुट अध्यापन, फिर टीवी चैनल की नौकरी और अब विकासशील समाज अध्ययन पीठ(सीएसडीएस) की एक परियोजना इंक्लूसिव मीडिया फॉर चेंज से जुड़े हैं। इनसे  chandan@csds.in पर संपर्क संभव है। 

( यह कृष्ण कल्पित को समझने की शुरुआती कोशिश है. लिखने वाले ने ना तो उनकी सारी रचनाओं का पाठ किया है और ना ही पढ़ी हुई कविताओं पर पर्याप्त समय देकर सोचा है। अगर बेतरतीबी के भीतर से कोई तरतीब बन सकती हो तो इस कोशिश को भी इसी रुप में देखा जाय)

बाग़-ए-बेदिल, अंतिका प्रकाशन , प्रकाशन वर्ष : 2013, पृ. सं: 512, मूल्‍य : HB 850/-, PB 450/- 

विश्व हिन्दी सम्मेलन और साइकिल की कहानी: कृष्ण कल्पित

By कृष्ण कल्पित

 विश्व हिन्दी सम्मेलन

जिस भाषा में हम बिलखते हैं
और बहाते हैं आंसू
वे उस पर करते हैं सवारी
भरते हैं उड़ान उत्तुंग आसमानों में

एक कहता है मैं नहीं गया
मुझे गिना जाए त्यागियों में
एक कहता है मैं चला गया
मुझे गिना जाए भागियों में

एक आसमान से गिरा रहा था सूचियां
हिन्दी पट्टी के सूखे मैदानों पर

हिन्दी के एक नए शेख ने
बना रखा था सरकारी कमेटियों का हरम
एक से निकलकर
दूसरे में जाता हुआ

एक मूल में नष्ट हो रहा था
दूसरा ब्याज में और तीसरा लिहाज़ में

एक चिल्लाता था
मैं जीवन भर होता रहा अपमानित
अब मुझे भी किया जाए सम्मानित

एक कहता था
मुझे दे दिया जाए सारा पैसा
मैं उसका डॉलर में अनुवाद करूंगा
एक कहता था नहीं
सिर्फ मैं ही बजा सकता हूं
यह असाध्य वीणा

एक साम्राज्यवादी
एक सम्प्रदायवादी के गले में
फूल-मालाएं डाल रहा था
एक स्त्री किसी निर्दोष के रक्त से
करती थी विज्ञप्तियों पर हस्ताक्षर

यह एक अजीब शामिल बाजा था
जिसमें एक बाजारू गायक
अश्लील भजन गा रहा था

एक सम्पादक
विदेश राज्य मन्त्री के जूते में
निर्जनता ढूंढ रहा था
एक पत्रकार का
शास्त्री भवन की एक दराज़ में
स्थाई निवास था

एक कहता था मैं इतालवी में मरूंगा
एक स्पेनिश में अप्रासंगिक होना चाहता था
एक किसी लुप्त प्राय भाषा के पीछे
छिपता फिरता था

एक रूठ गया था
एक को मनाया जा रहा था
एक आचार्य जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय
में कराह रहा था
एक मसखरा
मुक्तिबोध पर व्याख्यान दे रहा था

 एक मृतक

ब्रिटिश एअरवेज़ के पंखों से लिपटा हुआ था

दूसरा मृतक
भविष्य में होने वाली
सभी गोष्ठियों की अध्यक्षता कर चुका था
एक आत्मा
आगामी बरसों के
सभी प्रतिनिधि मण्डलों में घुसी हुई थी

यह भूमण्डलीकरण का अजब नज़ारा था कि
सोहो के एक भड़कीले वेश्यालय में
हिन्दी का लंगोट लटक रहा था

और दूर पूरब में
और धुर रेगिस्तान के किसी गांव में
जन्म लेता हुआ बच्चा
जिस भाषा में तुतलाता था
उसे हिन्दी कहा जाता था

कहां खो गया प्रतिरोध !
क्या भविष्य में सिर्फ़
भिखारियों के काम आएगी
यह महान भाषा !

इसी भाषा में एक कवि
दो टूक कलेजे के करता पछताता
लिखता जाता था कविता
और फाड़ता जाता था।

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Bicycle-thieves's Poster

Bicycle-thieves’s Poster

साइकिल की कहानी

यह मनुष्य से भी अधिक मानवीय है
चलती हुई कोई उम्मीद
ठहरी हुई एक संभावना
उड़ती हुई पतंग की अंगुलियों की ठुमक
और पांवों में चपलता का अलिखित आख्यान
इसे इसकी छाया से भी पहचाना जा सकता है

मूषक पर गणेश
बैल पर शिवजी
सिंह पर दुर्गा
मयूर पर कार्तिक
हाथी पर इन्द्र
हंस पर सरस्वती
उल्लू पर लक्ष्मी
भैंसे पर यमराज
बी. एम. डब्ल्यू पर महाजन
विमान पर राष्ट्राध्यक्ष
गधे पर मुल्ला नसरूद्दीन
रेलगाड़ी पर भीड़
लेकिन साइकिल पर हर बार कोई मनुष्य

कोई हारा-थका मजदूर
स्कूल जाता बच्चा
या फिर पटना की सड़कों पर
जनकवि लालधुआं की पत्नी
कैरियर पर सिलाई मशीन बांधे हुए
साइकिल अकेली सवारी है दुनिया में
जो किसी देवता की नहीं है

साइकिल का कोई शोकगीत नहीं हो सकता
वह जीवन की तरफ दौड़ती हुई अकेली
मशीन है मनुष्य और मशीन की यह सबसे प्राचीन
दोस्ती है जिसे कविता में लिखा पंजाबी कवि
अमरजीत चंदन ने और सिनेमा में दिखाया
वित्तोरिया देसीका ने ’बाइसिकल थीफ’ में

गरीबी यातना और अपमान की जिन
अंधेरी और तंग गलियों में
मनुष्यता रहती है
वहां तक सिर्फ साइकिल जा सकती है
घटना-स्थल पर पायी गयी सिर्फ इस बात से
हम इस निष्कर्ष पर नहीं पहुँच सकते कि
साइकिल का इस्तेमाल मनुष्यता के विरोध में
किया गया जब लाशें उठा ली गयी थीं
और बारूद का धुआं छट गया था तब

साइकिल के दो चमकते हुए चक्के सड़क के
बीचों-बीच पड़े हुए थे घंटी बहुत दूर
जा गिरी थी और वह टिफिन कैरियर जिसमें
रोटी की जगह बम रखा हुआ था कहीं
खलाओं में खो गया था।

एक साइकिल की कहानी
अंततः एक मनुष्य की कहानी है !

कृष्ण कल्पित

कृष्ण कल्पित

अपने तरह का अकेला-बेबाक और विवादित कवि । कृष्ण कल्पित का जन्म 30 अक्टूबर, 1957 को रेगिस्तान के एक कस्बे फतेहपुर शेखावटी में हुआ। अब तक कविता की तीन किताबें और मीडिया पर समीक्षा की एक किताब छप चुकी है। एक शराबी की सूक्तियां  के लिए खासे चर्चित। ऋत्विक घटक के जीवन पर एक पेड की कहानी नाम से एक वृत्तचित्र भी बना चुके हैं।  अभी  हाल ही में बाग़-ए-बेदिल नाम से  एक विलक्षण  और विशाल  काव्य-संकलन  प्रकाशित । आवारगी का काव्यशास्त्र  इसी संकलन  की भूमिका है। 

आवारगी का काव्यशास्त्र: कृष्ण कल्पित

 By कृष्ण कल्पित 

 आवारगी का काव्यशास्त्र

(प्रथम अध्याय)

कर्णाटीदशनास्ति: शित: महाराष्ट्री कटाक्ष क्षत:

प्रौढान्ध्री-स्तन-पीडि़त:, प्रणयिनि भ्रू-भंग वित्रासित:।

लाटी बाहु-विचेष्टीतश्च मलय स्त्री तर्जनी तर्जित

सोऽयं सम्प्रति राजशेखरकविर्वाराणसीं वाञ्छति॥7॥

—राजशेखर

कर्णाट देश की महिलाओं के दाँतों से अंकित, महाराष्ट्रनियों के तीव्र कटाक्षों से आहत, आंध्र की प्रौढ़ रमणियों के स्तनों से पीडि़त, प्रणयिनियों के कटाक्ष से भयभीत, लाटदेशीय रमणियों के भुजपाशों से आलिंगित और मलय निवासी नारियों की तर्जनी से तर्जित यह कवि राजशेखर अब वृद्धावस्था में वाराणसी में बसना चाहता है।

वाराणसी जाकर बस जाने की इच्छा तो मेरे मन में भी बरसों से है, पर एक हज़ार से अधिक वर्ष पूर्व संस्कृत के एक यायावर कवि राजशेखर ने वाराणसी में बसने के जो कारण गिनाए हैं, वैसे कारण और अर्हता प्राप्त करने में मुझे अभी समय लगेगा।

वैसे तो हज़ारों लाखों लोग बिना किसी कारण वाराणसी में बसे हुए हैं, लेकिन हम अपने समय के एक अनूठे कवि ज्ञानेन्द्रपति से तो यह उम्मीद रख ही सकते हैं कि वे राजशेखर की तरह हमें बताएँ कि कोई पच्चीस वर्ष पूर्व एक दिन अचानक गंगातट पर आकर क्यों बस गए; क्योंकि बिना कसी कारण बनारस में बसना अपराध है, जहाँ जिस पथ से आता है शव उसी पथ से जाता है शव! लोकोपवाद से बचने के लिए भी यह ज़रूरी है।

अगर आपके पास पापों की गठरी नहीं है तो फिर बनारस जाकर क्या कीजिएगा? अभी तो पूरी दुनिया घूमिए—पाप की गठरी को भारी कीजिए—अभी तो यायावर राजशेखर की तरह आवारगी कीजिए—अभी तो यहाँ-वहाँ दूर-दूर तक लावण्य के ढेर बिखरे हुए हैं।

प्रायोजित, सुरक्षित और समयबद्ध आवारगी के इस क्षुद्र समकालीन समय में सच्ची आवारणी अलभ्य है और सच्चे आवारा दुर्लभ। आवारगी एक मुश्किल कला है। यह दुनिया का आठवाँ आश्चर्य है, पैंसठवीं कला है और पिच्यासिवाँ आसन है। इसका कोई शास्त्र नहीं है। यह किसी विश्वविद्यालय में नहीं पढ़ाई जाती। यह पाँवों को लहुलूहान करने का हुनर है। यह जलते अंगारों पर नृत्य करने का दुस्साहस है।

आवारगी एक कोई वनलता सेन है, जो किसी दुर्लभ क्षण में जीवनानन्द दास को मिलती है—इस पथ के दावेदार चरित्रहीन शरत थे—रवीन्द्र नहीं। उर्दू-हिन्दी शब्दकोश में इसका एक अर्थ भीषण जाड़े में लखनऊ के एक सस्ते शराबघर में ठंड से अकड़ी हुई मजाज़ लखनवी की लाश भी है। ये ताँबे के कीड़े हैं, जिन्हें शाहजहाँपुर की धूल में भुवनेश्वर ने खोजा था। यह सत्यजित राय की ‘चारुलता’ नहीं, बल्कि ऋत्विक घटक की ‘बाड़ी थेके पालिए’ है। यह ‘असाध्य वीणा’ तो कतई नहीं है, बल्कि शमशेर की ‘टूटी हुई बिखरी हुई’ है। यह मुक्तिबोध की ‘घेर घुमावदार’ बावड़ी है या फिर राजकमल की अँतडिय़ों में उलझा हुआ ‘मुक्ति प्रसंग’ है।

उर्दू शायरों के अनुसार आवारगी में भी एक सलीका चाहिए। यह एक चालाकी है। वही प्रसिद्ध चालाकी, जिसने हमारे कथित पुरोधाओं को निस्तेज और निर्वीर्य कर दिया है। सत्ता के सतत् संघर्षण से जिनकी तशरीफें फूल गई हैं—जो शाम को इन्डिया इन्टरनैशनल सेन्टर में स्कॉच की चुस्कियों के साथ मुक्तिबोध की सुमिरनी फेरते रहते हैं।

मुक्तिबोध इनके लिए शराब के साथ खाए जाने वाले सलाद से अधिक कुछ नहीं हैं। यह लोग हर तीसरे महीने आवारगी के लिए पेरिस, फ्रैंकफुर्त, शिकागो और लंदन जाते रहते हैं और हमें विदेशी किताबों के कैटलोग दिखाकर डराते रहते हैं। ये सब नकली यायावर हैं, जिन्हें पहचान कर ही हम सच्ची आवारगी की तरफ बढ़ सकते हैं।

वे आधी रात को निकलते हैं घरों से

अक्सर घरवालों को बिना बताए

अंधेरे में ठिठकते हैं एक बार

फिर पैदल ही चल देते हैं स्टेशन की ओर

बुद्ध भी बिना बताए ही घर से निकले थे। नवजात शिशु, सुन्दर स्त्री यशोधरा और अपार वैभव को छोड़कर। वैसे तो बहुत सारे आवारा मशहूर हैं, लेकिन अब तक की मनुष्यता के इतिहास में बुद्ध से बड़ा आवारा कोई और हुआ हो—मुझे पता नहीं। एक दिन मैं नीरांजरा, अचिरावती और नैरांजना नदियों के तट पर एक साथ घूम रहा था। कपिलवस्तु से पाटलिपुत्र से श्रावस्ती से चेतवन से उज्जयिनी से काशी से कोसाम्बी से कुशीनगर से नालंदा से मथुरा से वेलुवन से वैशाली से जंबुनाद तक। यह मेरी आवारगी थी—देशकाल, समय-सीमा और भाषाओं के पार। मैं कन्थक नामक घोड़े पर सवार था, छन्दक मेरा सहायक। ब्राह्मïणों के पाखंड और वैदिक कर्मकाण्ड को ध्वस्त करता हुआ मैं सोच रहा था कि युद्ध का सामना अयुद्ध से और घृणा का मुकाबला अघृणा से ही हो सकता है। यह एक रोमांचक यात्रा थी और मैं अपनी आवारगी में सोच रहा था कि यदि सुरापान और स्त्री-समागम को जोड़ दिया जाए तो बौद्ध-दर्शन दुनिया का सर्वश्रेष्ठ दर्शन हो सकता है।

लगभग नवीं शताब्दी में श्री महेन्द्र विक्रम वर्मा रचित ‘मत्तविलास प्रहसनम्ï’ के उस शाक्य भिक्षु की तरह मुझे भी लगता है कि यह वृद्ध बौद्धों का युवा बौद्धों के विरुद्ध रचा हुआ षड्यन्त्र है। इसे पूरा विश्वास है कि बुद्ध के पिटक ग्रन्थोंं की मूल प्रति में सुरापान और स्त्री-समागम का समावेश ज़रूर होगा। वह उस मूल पिटक के अनुसंधान में रत है, वह उसे खोजना चाहता है। या उनमें यह प्रावधान जोडऩा चाहता है। इसी कर्म में वह शाक्य भिक्षु निमग्न रहता है। एक दिन बौद्ध-मठ जाते हुए वह सोचता है—’अत्यंत दयालु भगवान बुद्ध ने महलों में निवास, सुन्दर सेज लगे पलंगों पर शयन, पहले प्रहर में भोजन, अपराह्म में मीठे रसों का पान, पाँचों सुगन्धों से युक्त ताम्बूल और रेशमी वस्त्रों का पहनना इत्यादि उपदेशों से भिक्षु-संघ पर कृपा करते हुए क्या स्त्री-सहवास और मदिरापान का विधान भी नहीं किया होगा? ज़रूर किया होगा। अवश्य ही इन निरुत्साही तथा दुष्ट वृद्ध बौद्धोंं ने हम नवयुवकों से डाह कर पिटक-ग्रन्थों में स्त्री-सहवास और सुरापान के विधान को अलग कर दिया है—ऐसा मैं समझता हूँ। मैं इस भूल को सुधारूँगा। ऐसा करके मैं बुद्ध-विचार और संघ का बहुत बड़ा उपकार करूँगा।’

‘एक शराबी की सूक्तियाँ’ लिखकर मैं अपने आप को आवारगी का छोटा-मोटा विशेषज्ञ समझने की हिमाकत कर बैठा था। मैं आसमान से तब गिरा, जब मेरी भेंट हज़ार वर्ष पहले लिखे गए इसी संस्कृत नाटक ‘मत्तविलास प्रहसनम्ï’ के मुख्य पात्र मद्यप कापालिक से हुई। यह कापालिक अपनी सहचरी देवसोमा के साथ हर घड़ी मदिरा-मत्त रहता है। आवारगी उसके चरणों की धूल नज़र आती है। यह कापालिक काँचीपुर के एक शराबघर में अपनी प्रिया देवसोमा से कहता है—’प्रिय, देखो देखो। यह मद्यशाला ही यज्ञशाला है, यहाँ ध्वजा को बाँधने का खम्भा ही यूप है, सुरा सोमरस है, मतवाले ही पुरोहित (ऋत्विक) हैं। चषक ही चमस है, शूल्यमांस चिखना ही हविष्य है, पियक्कड़ों का प्रलाप ही यजुर्वेद है और उनके गान समवेद, पीने की इच्छा ही अग्नि है, मद्यशाला का मालिक ही यजमान है। देखो—मत्तविलासों के नृत्य दर्शनीय हैं, जो बजते हुए मृदंग के इशारों पर हो रहे हैं; जिनमें अनेक प्रकार के अंगों का विक्षेप, शब्द तथा कटाक्ष हो रहे हैं—दुपट्टे को एक हाथ में लेकर ऊपर फहराया जा रहा है और गिरते हुए वस्त्र को सम्भालते हुए हाथों की विषम लय है तथा कंठस्वर लडख़ड़ाया हुआ है।’

शराबियों का ऐसा अभूतपूर्व नृत्य ‘मत्तविलास’ के बाद भारतीय वांङमय की समरभूमि में प्रेमचंद के यहाँ कफन में ही दिखाई पड़ता है—जब घीसू और माधो कफन के लिए इक_ा किए गए पैसों से शराब पीकर वह अविस्मरणीय नृत्य करते हैंं—ठगिनी क्यों नैना झमकावै! यह शायद साहित्य में दर्ज पहली दलित आवारगी थी जिसे प्रेमचंद ने लिखकर अमर कर दिया।

राहुल सांकृत्यायन के ‘घुमक्कड़ शास्त्र’ के बावजूद अभी तक आवारगी का कोई शास्त्र नहीं बना। वह शायद बन भी नहीं सकता। आवारगी से शास्त्र बनते हैं, लेकिन आवारगी को किसी शास्त्र में नहीं समेटा जा सकता। आवारगी जन्मना होती है। सोच समझकर आवारगी नहीं हो सकती और आवारगी निरुद्देश्य भी नहीं होती। जेबों में नोट ठूँसकर या क्रेडिट कार्ड के भरोसे की गई आवारगी अपने नाम पर कलंक है। जिसने आजतक बिना टिकट ट्रेन की यात्रा नहीं की उसका जीवन व्यर्थ है। आवारगी में एक गहरी निस्संगता चाहिए होती है। ‘एन ऑटोबायोग्राफी ऑव ए सुपरट्रैम्प’ के नायक की तरह, जो टिकट चेकर से बचने के लिए रेल के डिब्बों में छिपने-छिपाने के उपक्रम में ट्रेन से गिरकर अपनी एक टाँग गवाँ बैठता है। उसे इसका भी कोई अफसोस नहीं, अब वह बैसाखी के सहारे आवारागर्दी करता है अपनी एक टाँग कटने की घटना उसके लिए एक छिपकली की पूँछ कटने से अधिक नहीं।

नई दिल्ली के लोधी गार्डन में सुबह-शाम रिबॉक के जूते पहनकर जॉगिंग करने वाले संतुष्ट सुअरों के विचरण को आवारगी नहीं कहा जा सकता। पटना में फ्रेजर रोड के किसी रेस्त्रां के नीम अंधेरे में किसी सुन्दर कन्या से सटकर बैठना भी आवारगी नहीं है। आवारगी वीकएंड का उद्यम नहीं है, बल्कि वह एक सतत प्रक्रिया है। वामन की तरह समूची पृथ्वी को तीन डग में नाप लेने वाले कूपमंडूक तो बहुत नज़र आएँगे पर अपने स्थान और अपने करघे पर बैठा हुआ कबीर कहीं नहीं जाकर भी (सिर्फ मगहर को छोड़कर) समूची दुनिया में आवारगी करता रहता है और सोलहवीं शताब्दी की वह आवारा औरत मीरा, जो दुर्ग-दीवारों को तोड़कर हाथ में इकतारा लेकर निकल पड़ी थी—साधुओं की संगत में। कविता भी प्रतिरोध हो सकती है—कबीर से सीखो। नृत्य भी विद्रोह हो सकता है—मीरा से सीखो।

यह सही है कि किसी आवारा के पत्रोत्कंठित जीवन का विष बुझा हुआ होता है, फिर भी निराला की तरह उसके हृदयकुंज में आशा का एक प्रदीप हर-पल जलता रहता है। तो क्या निराला ने बगैर आवारगी के ‘तोड़ती पत्थर’ कविता लिखी होगी—

वह तोड़ती पत्थर

देखा उसे मैंने

इलाहाबाद के पथ पर

क्या बिना किसी धुआँधार आवारगी के निराला ने आनन्द भवन की अय्याश अट्टालिकाओं पर गुरु हथौड़ा प्रहार किया था?

हर नया विचार किसी न किसी आवारगी में आकार लेता है। हर सृजनात्मकता के पीछे कोई आवारगी ज़रूर होती है और फिर कविता जैसी कला के लिए तो आवारगी खाद-पानी की तरह मुफीद होती है। उसके बगैर शायद कविता संभव ही नहीं है। फिर भी घनघोर आश्चर्य की बात है कि भारतीय और पाश्चात्य काव्यालोचना में आवारगी का कहीं कोई जि़क्र नहीं पाया जाता। न वह वृत्ति है न प्रवृत्ति न तत्त्व। काव्यालोचन से आवारगी पूरी तरह बहिष्कृत है। जैसे यह कोई काल्पनिक चीज़ है, तो फिर कविता क्या है? कविता की दुनिया में आलोचना अब भी एक कुलीन इलाका है—जहाँ ऐसी पथभ्रष्ट प्रवृत्तियों की थियरी नहीं बनाई जा सकती।

Hektor, the Trojan hero. Aristotle questions his courage.

Hektor, the Trojan hero. Aristotle questions his courage.

आवारगी अब भी आलोचकों द्वारा निंदित क्षेत्र है। कवि अवश्य आवारा प्रसिद्ध हुए हैं, उनकी आवारगी की भी किंवदन्तियाँ बनी हैं। लेकिन संस्कृत के अलंकार शास्त्रियों, रीति-आचार्यों से लेकर अब तक उत्तर-आधुनिक विखंडनवादियों तक किसी भी कविता-क्रिटिक ने आवारगी की गर्द-भरे आईने से कविता कला का क्रिटिक नहीं लिखा है। जबकि बहुधा बगैर भाषा के कविता संभव हो सकती है, लेकिन बगैर आवारगी के नहीं।

अब तक की काव्यालोचना में आवारगी, यायावरी, भले ही काव्य तत्त्व के रूप में नहीं पर परोक्ष रूप से कहीं मिलती है तो राजशेखर की ‘काव्यमीमांसा’ में। काव्यालोचना के इस अपूर्व ग्रन्थ के रचयिता ने कृति में स्वयं को यायावरीय कहा है। और यह तो पहले ही आ चुका प्रसंग है कि समूचे भारतवर्ष में आवारगी करने के बाद कवि राजशेखर अब काशी में बसना चाहते हैं। ध्यान से देखने पर पता चलता है कि काव्यशास्त्र की हस अपूर्व पुस्तक की शैली भी किसी यात्रा-वृतान्त की तरह है। यह तब तक का संस्कृत साहित्य का इतिहास भी है और इसका ‘काव्य-पुरुष’ अध्याय पढ़कर लगता है कि यह एक रोचक आख्यान है। यहाँ खंडन भी है और नई स्थापनाएँ भी। इस पुस्तक में अपने समय के बौद्धिक वातावरण का बहुत ही प्रामाणिक व सरस वर्णन हुआ है।

एक बार मैं अपने समय से और समकालीनता से इतना सताया हुआ था कि मिशेल, फुको, रोलाँ बार्थ, देरीदा, वॉल्टर बेंजामिन, एडोर्नो, एडवर्ड सईद, अमर्त्य सेन अैर ब्रोदोलो को चकमा देकर राजशेखर की ‘काव्यमीमांसा’ में घुस गया। हज़ार साल का गच्चा मार गया। आवारगी के सामने काल हाथ जोड़े खड़ा रहता है। सच्चा आवारा एक आनन्द-यात्रा में रहता है।

मेरी यह आवारगी राजशेखर के साथ थी। राजशेखर को इस तरह भी देखा जाना चाहिए कि वह पहला कवि आलोचक था, जिसने कहा था कि स्त्री भी कवि हो सकती है। न केवल हो सकती हैं, बल्कि थीं। ‘काव्यमीमांसा’ में राजशेखर ने जिन समकालीन स्त्री कवियों का जि़क्र किया है, उनमें कर्णाटदेश की विजयांका, लाटदेश की प्रभुदेवी, विकट नितंबा, शांकरी, पांचाली, शीला भट्टारिका और सुभद्रा हैं। इतनी कवयित्रियाँ तो अभी समकालीन हिन्दी कविता के परिदृश्य में भी दिखाई नहीं पड़तीं।

क्या यह आश्चर्य की बात नहीं है कि राजशेखर बनारस में बसने वाले अपने श्लोक में जिन भू-भाग की स्त्रियों का जि़क्र करते हैं, वहाँ-वहाँ की कवयित्रियों का जि़क्र उनकी ‘काव्यमीमांसा’ में भी है। इसे क्या समझा जाए? आप चाहें तो ‘काव्यमीमांसा’ को एक रसिक के आख्यान की तरह भी पढ़ सकते हैं या फिर आलोचनात्मक आख्यान; या फिर यह एक प्रसिद्ध कवि की मुग्ध कर देने वाली कारीगरी है, जहाँ साहित्य के सारे रस एक ही सरोवर में एकाकार हैं। स्त्री कवियों का जि़क्रभर ही नहीं, बल्कि उनकी कला के बारे में भी हमें पता चलता है। विजयांका को उन्होंने वैदर्भी रीति की रचना में कालिदास के बाद अन्यतम बताया है। तारीफ का यह तरीका आपको नामवर सिंह की याद दिला सकता है—सटीक और निशाने पर। लाटदेश की प्रभुदेवी के बारे में राजशेखर लिखते हैं कि उन्होंने सूक्तियों, कामकेलि तथा कलाओं का काव्य में सन्निवेश कर अपने को अमर कर दिया। भारतवर्ष के सभी भू-भागों की स्त्री कवियों का वर्णन ‘काव्यमीमांसा’ में उपलब्ध है। जिसे पढ़कर बीच-बीच में आपको भ्रम हो सकता है कि आप वात्स्यायन का कामसूत्र पढ़ रहे हैं। कवियों की जीवन शैली, आचार इत्यादि का अध्याय तो राजशेखर ने ‘कामसूत्र’ से लिया ही है।

राजशेखर ने विकट नितंबा की रंजित वाणी की प्रशंसा की है। शीला भट्टारिका के लिए कहा है कि वे पांचाली रीति से कविता करने वाली उत्तम कवि भी थीं। और सुभद्रा की रचना विवेकपूर्ण होती थी। इतना रसभीगा होने के बावजूद राजशेखर का ‘काव्यमीमांसा’ आलोचना ग्रन्थ है और हज़ार बरसों से है।

आलोचना ग्रन्थ होने के बावजूद यह एक कवि की आलोचना है, इस बात का पता हमें तब चलता है, जब राजशेखर अपने समकालीनों और पूर्ववत्र्ती कवियों की आलोचना ईष्र्या से भरकर काव्योक्त ढंग से करते हैं। उनका कहना है कि बाण की स्वच्छन्द वाणी किसी कुलटा स्त्री जैसी है, हालांकि उनकी पदरचना अच्छी है। माघ पर आक्रमण करते हुए वे लिखते हैं—माघ की रचना माघ की तरह कँपाने वाली है और कवियों का उत्साह भंग करने वाली है इत्यादि। यह एक ऐसे बौद्धिक-आवेग-ताप से रची हुई कृति है, जिसकी आँच एक हज़ार वर्ष बाद भी मद्धम नहीं पड़ी है। मेरी आवारगी मुझसे पूछती है कि आखिर बचेगा क्या?

राजशेखर ने अपने को यायावर कुल का कहा है। यानी जिस कुल का काम आवारगी है। एक बंजारा जाति होती है घूमने-फिरने वाली। राजशेखर भी आवारा कवियों के कुल के थे। अकालजलद उनके पूर्वज थे। काव्य पुरुष जैसी कल्पना राजशेखर ही कर सकते थे। इस अध्याय को आप किसी उपन्यास की तरह पढ़ सकते हैं—आत्मकथा की तरह भी। जब काव्यपुरुष माँ सरस्वती को परेशान करने लगा तो उसके लिए साहित्य विद्यावधू का निर्माण किया गया। यह काव्य पुरुष भी आवारगी में माहिर है। पहले वह पूर्व दिशा की ओर जाता है। साहित्यवधू उसे रिझाने का असफल प्रयास करती है। काव्यपुरुष फिर पांचाल देश जाता है, अवन्ती जाता है, दक्षिण जाता है, उत्तर जाता है। और विदर्भ जाकर काव्यपुरुष साहित्यवधू से गन्धर्व विवाह करता है। ऐसी घुमक्कड़ी—ऐसी आवारगी। क्या आपको नहीं लगता कि यहाँ राजशेखर फिर अपनी आत्मकथा लिखने लगे हैं? काव्यपुरुष राजशेखर ही थे। ‘काव्यमीमांसा’ का यह अध्याय लगभग जादुई है, यथार्थ है या नहीं, पता नहीं।

इस जादू के बावजूद ‘काव्यमीमांसा’ काव्यशास्त्र का विलक्षण ग्रन्थ है। राजशेखर कहते हैं सतत् अभ्यास से वाक्य में पाक आता है। राजशेखर कहते हैं कि कविता करना ठीक है पर कुकवि होना ठीक नहीं। यह सजीव मरण है।

राजशेखर कितनी सरलता से यह कहते हैं कि एक कवि के तो घर में ही काव्य रह जाता है। दूसरे का काव्य मित्रों के घरों तक पहुँचता है। किन्तु दूसरी तरह के कवियों का काव्य विदग्धों के मुख पर बैठकर पैर रखकर हर तरफ फैल जाता है। क्या आपको यह समकालीन हिन्दी कविता पर लिखी टिप्पणी नहीं लगती है?

आवारा लोगों और आवारगी के बारे में भी ‘काव्यमीमांसा’ में एक श्लोक है—

                पुष्पिण्यौ चरतौ जंघे भूष्णुरात्मा फलेग्रहि:।

                शेरेस्य सर्वे पाप्यान: श्रमेण प्रपर्थ हता:।।

अर्थात् आवारगी से जाँघें दृढ़ हो जाती हैं। आत्मा भी मज़बूत और फलग्राही हो जाती है और उसके सारे पाप पथ पर ही थक कर नष्ट हो जाते हैं। राजशेखर की ‘काव्यमीमांसा’ दरअसल आवारगी का काव्यशास्त्र है। पाणिनी ने कहा होगा, दण्डी ने, भारवि ने, कालिदास ने, भरत ने—उग्रट ने कहा होगा, लेकिन अब यायावरीय राजशेखर कहता है। जैसे यायावरी दिए गए दृष्टान्त के सिद्ध होने का प्रमाण हो। यह पुराणों में वर्णित भारत-वर्ष का भ्रमण करके लिखा हुआ काव्यशास्त्र ग्रन्थ है। एक ऐसे समय और समाज में यह लिखा गया, जहाँ बौद्धिक उत्तेेजना का माहौल था। जब टीकाएँ मूल ग्रन्थों से अधिक प्रसिद्ध हो चली थीं। राजशेखर ने अपने समय तक के संस्कृत वाङमय का गम्भीर अध्ययन किया था, जिसकी तेजस्वी झलकें हमें ‘काव्यमीमांसा’ में जहाँ-तहाँ मिलती रहती हैं। खंडन और स्थापना। आवारगी ने एक यायावर को काव्यालोचना का काव्यपुरुष बना दिया।

वैसे संस्कृत में यायावरों की कमी नहीं रही। संस्कृत में गद्य काव्य लिखनेवाले महाकवि सुबन्धु के ग्रन्थ ‘वासवदत्ता’ में यायावरी के कई मनोरम दृश्य हैं। उनकी आवारगी ने ही उनसे ऐसा कामोद्दीपक वर्णन करवाया होगा—’पर्वत के चारों ओर शिप्रा बह रही थी। शाम को सुन्दरियाँ उसमें स्नान करने आया करती थीं—उनकी गहरी नाभि में भर जाने के कारण नदी-जल कुंठित हो जाया करता था। वह ललना अपने उन्नत पयोधरों से अलकृंत हो रही थी—उस समय उसके स्तन ऐसे लग रहे थे, जैसे उन्हें गिरने के भय से लौह-कील से जड़ दिया गया हो। वे मानो कामदेव के एकान्त निवास-स्थल हों और वे ऐसे लग रहे थे, जैसे समस्त अंगों के निर्माण के बाद बचे हुए लावण्य के ढेर हों।

आवारगी भले ही घोर निराशा में की जाए, लेकिन उसमें कामभाव छिपा रहता है। एक कामांक्षा। आज तो यह विपुला पृथ्वी सबको एक गाँव दिखाई पड़ रही है तो इसमें आवारा लोगों का कोई कम योगदान नहीं है।

                रात हँस-हँस के ये कहती है कि मैखाने में चल

                फिर किसी शहनाज़े-लाला-रुख के काशाने में चल

                ये नहीं मुमकिन तो फिर ऐ दोस्त वीराने में चल

क्या आवारगी का राष्ट्र-गीत ‘आवारा’ लिखने वाले मजाज़ लखनवी ने कभी भर्तृहरि का शृंगार-शतक पढ़ा होगा—

                मान्सर्ममुत्सार्य विचार्य कार्य-

                भार्या: समर्यादमिद वदन्तु।

                सेत्या नितम्बा: कियु भूधराणा-

                स्मरस्मेर-विलासिनीनाम्ï॥

अर्थात्

शहनाज़े-लाला-रुख के काशाने में चल या फिर किसी वीराने में।

                इक महल की आड़ से निकला वो पीला माहताब

                जैसे मुल्ला का अमामा, जैसे बनिए की किताब

                जैसे मुफलिस की जवानी, जैसे बेवा का शबाब

                ऐ गमे-दिल क्या करूँ, ऐ वहशते-दिल क्या करूँ?

मजाज़ की कविता का केन्द्रीय तत्त्व आवारगी है। जीवन भी। मजाज़ के साथ मेरी आवारगी के भी कई किस्से हैं। आवारगी ज़रूरी नहीं कि समकालीनों के साथ ही हो—वह कभी-कभी तो किसी एक टिमटिमाते हुए सितारे के साथ भी हो सकती है।

किताबों के साथ तो मैंने बहुत आवारगी की है। दोस्तायवस्की की ‘जुर्म और सज़ा’, तालस्ताय की अन्ना, पुनरुत्थान, युद्ध और शांति, काम्यू का आउट साइडर, काफ्का की ट्रायल और चीन की दीवार, रेणु की परती-परिकथा। बाणभट्ट की आत्मकथा का बाण तो खुद बहुत बड़ा आवारा था, नाम गिनवाने का कोई अर्थ नहीं और इधर मैं समकालीनता पर धूल फेंकता हुआ संस्कृत क्लासिकों के साथ आवारगी कर रहा हूँ।

जो सर्वाधिक निन्दित हो, उसके साथ आवारगी का अलग अपना मज़ा है—जैसे राजशेखर की ‘काव्यमीमांसा’।

मैं इतनी सारी कथा-कृतियों का आशिक और राजशेखर साथ चलते हुए कहते हैं कि जिस कवि की प्रतिभा का क्षय निम्नकोटि की कथा-रचना में नहीं होता, वहीं कवियों में श्रेष्ठ है।

मैं अभी बनारस नहीं बसना चाहता, क्योंकि मेरे रास्ते में अभी बहुत सारे लावण्य के ढेर बिखरे हुए हैं!

(कृष्ण कल्पित रचित ‘आवारगी का काव्य-शास्त्र’ नामक ग्रन्थ का प्रथम अध्याय समाप्त। इति यायावरीय:।)

कृष्ण कल्पित

कृष्ण कल्पित

अपने तरह का अकेला-बेबाक और विवादित कवि । कृष्ण कल्पित का जन्म 30 अक्टूबर, 1957 को रेगिस्तान के एक कस्बे फतेहपुर शेखावटी में हुआ। अब तक कविता की तीन किताबें और मीडिया पर समीक्षा की एक किताब छप चुकी है। एक शराबी की सूक्तियां  के लिए खासे चर्चित। ऋत्विक घटक के जीवन पर एक पेड की कहानी नाम से एक वृत्तचित्र भी बना चुके हैं।  अभी  हाल ही में बाग़-ए-बेदिल नाम से  एक विलक्षण  और विशाल  काव्य-संकलन  प्रकाशित । आवारगी का काव्यशास्त्र  इसी संकलन  की भूमिका है। 

पटना कलम- विलुप्त शैली की कुछ कवितायें: कृष्ण कल्पित

By कृष्ण कल्पित 

1

जेपी लोकतन्त्र की आँख से ;

ढुलका हुआ आँसू था,

जो अब सुख चला है, पार्थ!

‘कि जनता आती है’ वाले;

विशाल गांधी मैदान में,

अब बाजीगर और रंडियाँ घूमते हैं!

दरअसल;

सम्पूर्ण क्रांति

अब एक रेलगाड़ी का नाम है, सार्त्र!

Image by Uday Shankar

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2.

(आज नालंदा-राजगीर से लौटा हूँ, पार्थ!)

उड़ रही  ख़ाक बची है, भंते!

बुद्ध की राख़ बची है, भंते!

गिड़गिड़ाने से कुछ नहीं हासिल,

बात-बेबाक बची है, भंते!

बाँट दी सबको चिट्ठियाँ दुःख की,

अब कहाँ डाक बची है, भंते!

परखचे उड़ चुके हैं कल्पित के,

इक फकत साख बची है, भंते!

मेरे हिस्से की पी गए शमशेर,

अब महज़ ताख बची है, भंते!

3.

(विश्वनाथ त्रिपाठी के लिए)

काहे नाराज़  हो निउनिया तुम।

दिल में जूँ राज़ हो निउनिया तुम।

बज रहा साज़ हो निउनिया तुम।

मेरी आवाज़ हो निउनिया तुम।

मुझको अंज़ाम-ए-मुहब्बत समझो,

और आगाज़ हो निउनिया तुम।

कल कहाँ थी मुझे नहीं मालूम,

अब-अभी-आज हो निउनिया तुम।

बंड था बाण भूल जा उसको,

अब तो हल्लाज हो निउनिया तुम।

एक पनवाँ खिलाय दो हमको,

काहे नाराज़ हो निउनिया तुम।

Image by Uday Shankar

Image by Uday Shankar

4.

आज क्या लिखके भेज दूँ तुमको।

तुम तो जानो हो क्या कहूँ तुमको।

रंग फबता है नीलगूँ तुमको।

तुम जो बोलो तो कल मिलूँ तुमको।

हममें कुछ फ़र्क़ ही नहीं जानम,

मैं भी पागल हूँ और जुनूँ तुमको।

आज कुछ इस तरह से हो जाए,

बोलता मैं रहूँ सुनूँ तुमको।

इक उचटती निगाह ले जाओ,

कुछ तो तोहफ़ा नज़र करूँ तुमको।

बेख़याली में काश हो जाए,

डगमगा कर के थाम लूँ तुमको!

5.

मैं भी कब तक यहाँ रह लूँगा,

मैं भी एक दिन मर जाऊँगा।

मेरा घर है चाँद के पीछे,

मैं भी अपने घर जाऊँगा।

सरहप्पा से गोरख आई,

ऐसी थी मजबूत बुनाई,

ओढ़ रहा हूँ बड़े जतन से,

मैं भी चादर धर जाऊँगा।

आज मेरे कल दिवस दूसरा,

आएगा फिर नया सिरफिरा,

थोड़े दिन की बात है जानम,

मैं भी तुम्हें बिसर जाऊँगा!

6.

कौन मक्कार कहता है कि

ठुमरी का अवसान हो जाएगा, पार्थ!

ख़माज ख़त्म हो जाएगा,

दादरा नष्ट हो जाएगा और चैती बिसरा दी जाएगी!

तब उस स्त्री का क्या होगा

जिसने अपना जीवन

करुण-किरवानी को अर्पित कर दिया है, सार्त्र!…

‘चैत मास बोले रे कोयलिया, हे रामा! मोरे अंगनवा!’

और वह अंधा हारमोनियम वादक!

कृष्ण कल्पित

कृष्ण कल्पित

अपने तरह का अकेला-बेबाक और विवादित कवि । कृष्ण कल्पित का जन्म 30 अक्टूबर, 1957 को रेगिस्तान के एक कस्बे फतेहपुर शेखावटी में हुआ। अब तक कविता की तीन किताबें और मीडिया पर समीक्षा की एक किताब छप चुकी है। एक शराबी की सूक्तियां  के लिए खासे चर्चित। ऋत्विक घटक के जीवन पर एक पेड की कहानी नाम से एक वृत्तचित्र भी बना चुके हैं। 

आलोचना -सहस्त्राब्दी अंक सैंतालीस से साभार 

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