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दंगा भेजियो मौला! उर्फ़ भारतीय मुसलमानों की नियति: संजीव कुमार

कोई तो वजह रही होगी कि अनिल यादव के संकलन ‘नगरवधुएं अख़बार नहीं पढ़तीं’ (2011, अंतिका प्रकाशन, ग़ाजि़याबाद) से पहली बार गुज़रते हुए ‘दंगा भेजियो मौला!’ कहानी पढ़ने से रह गयी! जहां तक याद आता है, कहानी का पहला पृष्ठ पढ़ने के बाद उसे छोड़ दिया था। संभव है, ‘लोककवि का बिरहा’ और ‘नगरवधुएं अख़बार नहीं पढ़तीं’ जैसी चर्चित कहानियों ने, जिनका नाम पहले से सुना हुआ था, पूरा ध्यान अपनी ओर खींच लिया हो और इपंले (इन पंक्तियों के लेखक) को आश्वस्त कर दिया हो कि जब हमें पढ़ ही लिया तो और क्या रक्खा है?

लेकिन यही कुल वजह नहीं रही होगी। पहला पृष्ठ पढ़ने के बाद कहानी छोड़ी गयी, इससे लगता है कि मुख्य कारण कहीं और है। पाठक-पंछी आया तो… पर फंसा नहीं! वह पास आता ही नहीं तो बात और थी। इससे क्या यह निष्कर्ष नहीं निकलता कि दाने बिखेरने और जाल बिछाने में कहानीकार की ओर से कहीं चूक रह गयी?… जी हां, बहुत घटिया रूपक है।[1] पर आप भी समझते हैं, यहां आशय बस इतना है कि कहानी अगर अपनी शुरुआत से ही पाठक को बांध नहीं लेती तो यह कहानीकार के सामर्थ्य की न्यूनता का प्रमाण है! वह कहानी ही क्या जो पढ़ते चले जाने को बाध्य न कर दे!..

यक़ीन मानिए, कुछ समय पहले तक इपंले ऐसा ही मानता था, पर ‘दंगा भेजियो मौला!’ जैसी कहानियों ने बताया कि ऐसा मानने में कितनी समस्याएं हैं। इपंले जब पाठक को पंछी और पाठ की शुरुआत को दाना बताता है तो वह इस हक़ीक़त पर पर्दा डाल देता है कि पाठकीय योग्यता भी अलग-अलग तरह की होती है। जब वह कहता है कि ‘अपनी शुरुआत से ही जो पाठक को बांध न ले…’ वगैरह, तो वह निहित रूप में स्वयं को एक आदर्श पाठक बता रहा होता है, जिसकी कसौटी पर कहानी की सम्मोहन-क्षमता को कस कर उसके बारे में वस्तुनिष्ठता का दावा करनेवाला एक फ़ैसला सुनाया जा सकता है। जबकि सचाई यह है कि वह ख़ास तरह की शक्तियों और सीमाओं से युक्त पाठक है और कहानी के साथ न बंध पाना, उसे छोड़ कर आगे बढ़ जाना, हो सकता है, कहानी की नहीं, बतौर पाठक खुद उसकी सीमाओं का निदर्शन हो। शब्द जिन भावों/अनुभवों/स्मृतियों को कुरेदना चाहते हैं, हो सकता है, वे इस ‘ख़ास’ पाठक के भीतर नगण्य वा नदारद हों। फिर कुरेदने की कला कितनी भी समर्थ हो, इस पाठक के पक्ष में उससे निकलेगा क्या? इस तरह जो अयोग्यता पाठक की है, उसे उलट कर कहानी और कहानीकार की अयोग्यता बता दिया जाता है। इसे कहते हैं, नाच न जाने, आंगन टेढ़ा! #लेखक

Snapshot from Goodnight Mommy (2015)

Snapshot from Goodnight Mommy (2015)

 

दंगे में आएंगे

By संजीव कुमार

‘दंगा भेजियो मौला!’ कहानी एक दृश्य से शुरू होती है। यह ऐसा दृश्य है जिसकी अपने मन के पटल पर पुनर्रचना कर पाना सीमित अनुभव वाले इपंले सरीखे एक मध्यवर्गीय के लिए थोड़ा मुश्किल है। सिनेमा तो है नहीं कि दृश्य बना-बनाया मिल जाए! कहानी के पाठक को शब्दों से निकाल कर दृश्य की पुनर्रचना करनी होती है और इस काम में उसके अपने अनुभव और स्मृतियों का योगदान होता है। इसीलिए बहुत चित्रात्मक और बिंबधर्मी वर्णन-विवरण भी अलग-अलग पाठक के मन में अलग-अलग बिंब निर्मित करते हैं। साहित्यिक कृतियों के फि़ल्मांतरण के खि़लाफ़ यह एक मज़बूत तर्क रहा है कि इससे अनंत संभावनाओं का निशेध होकर कृति एक निश्चित दृश्यावली में रूढ़/फि़क्स हो जाती है। इस तर्क से बहस हो सकती है, पर वह अभी छेड़नी नहीं है। कहना बस इतना है कि जब हम कहानी के दृश्य की बात करते हैं तो वहां पाठक भी सक्रिय भूमिका में होता है – उसके मन में दृश्य का उभरना जितना शब्दों को बरतने के कहानीकार के कौशल पर निर्भर करता है, उतना ही उसके अपने अनुभव-स्मृतियों की थाती तथा उसी से जुड़ी, शब्दों को दृश्यांतरित करने की योग्यता पर भी।

लगता है, पहली बार ‘दंगा भेजियो मौला!’ पढ़ते हुए इसी थाती और योग्यता पर मामला अटक गया था। इपंले दृश्य को अपने अंदर क़ायदे से रच नहीं पाया, इसीलिए तल्लीनता बनी नहीं और कहानी छूट गयी।

तो ऐसा क्या है इस दृश्य में?

असल में, वह जो भी है, सिर्फ़ इस दृश्य में नहीं, पूरी कहानी में है। ऐसी नारकीय स्थिति और देश तथा समाज के घूरे पर फेंक दिये जाने की नियति, जिसकी कल्पना भी सीमित मध्यवर्गीय अनुभव वाले व्यक्ति के लिए कठिन है। अभी, इस कहानी को पूरा पढ़ चुके होने के बाद भी, मैं उस मुहल्ले की एक आधी-अधूरी तस्वीर ही अपने मन में बना पाता हूं जो पूरे शहर के बरसाती पानी और सीवर लाइनों के उफन कर उल्टी दिशा में बहने से निकले मल-मूत्र की झील बना हुआ है और लंबे समय आधी-आधी मंजि़ल तक इस पानी में डूबे रहनेवाले मकान अक्सर ईंटों के बीच की मिट्टी के गल जाने से भहरा कर गिर पड़ते हैं और उनकी छतों पर खेलते बच्चों की लाशें थोड़ी देर बाद फूल कर उस बजबजाती झील की सतह पर उतरा जाती हैं। मेरे कोश में ऐसे स्मृति-चित्र ही बहुत कम हैं जिन्हें कहानीकार के शब्द कुरेद सकें और जिनकी मदद से मैं ‘अनायास’ अपने अन्दर इस दृश्य को रच सकूं। नहीं हैं, ऐसा तो नहीं कहा जा सकता, पर निस्संदेह कम और कमज़ोर हैं। इसीलिए शब्दों को अपने भीतर दृश्यांतरित करना नामुमकिन नहीं, पर मुश्किल है। मुश्किल से हर पाठक भागता है। सो इपंले भी पहली बार भाग खड़ा हुआ।

पर अच्छी रचना की यह विषेशता होती है कि अगर आप उसके साथ थोड़ी मुश्किल उठाने को तैयार हो जाएं तो वह आपको देश-दुनिया, समाज और राजनीति, मन और भावलोक के किसी ऐसे अज्ञात-अल्पज्ञात हिस्से में ले जाती है जहां से आप अधिक अनुभवी, अधिक परिपक्व होकर लौटते हैं। पाठानुभव जीवनानुभव की कमी को पूरा करने लगता है। ‘दंगा भेजियो मौला!’ ऐसी ही रचना है।

कहानी आपको मुसलमान बुनकरों के एक मुहल्ले में ले जाती है जो नदी के किनारे शहर के निचले हिस्से में बसा है – एक ‘लो लैंड’ जो हर साल महीने-डेढ़ महीने के लिए शहर भर के बरसाती पानी और सीवर से निकले गू-मूत की सड़ती झील में तब्दील हो जाता है और उसके हटने के बाद हैजा, डायरिया जैसी बीमारियां हमला कर देती हैं। हर साल कई महीने इन मुसीबतों से लड़ने के बाद ही वहां सामान्य जि़ंदगी बहाल हो पाती है। महान भारतीय राष्ट्र-राज्य के भीतर एक पराये राष्ट्र की तरह बरता जानेवाला यह मुहल्ला, मोमिनपुरा, अपनी बदहाली के लिए सिर्फ़ घृणा, उपेक्षा और उपहास का विषय है। राज्यतंत्र भी उसकी बदहाली को कम करने के लिए आगे नहीं आता, अलबत्ता बढ़ाने के लिए आता है। ‘हाथ में जल लेकर गंगा-जमुनी तहज़ीब का हवाला देने के दिन कब के लद चुके’ हैं। मोमिनपुरा के बाशिंदे दंगापीडि़त नहीं हैं, पर उनके साथ जो हो रहा है, वह किसी दंगे से कम नहीं:

दंगा तो हो ही रहा है।… सरकार ने अफ़सरों को इधर आने से मना कर दिया है। डॉक्टरों ने इलाज से मुंह फेर लिया है। जो पंप यहां लगने चाहिए, उन्हें नदी में लगाकर पानी इधर फेंका जा रहा है। करघे सड़ चुके हैं, घर ढह रहे हैं, बच्चे चूहों की तरह डूब कर मर रहे हैं। सबको इसी तरह बिना एक भी गोली-छुरा चलाए मार डाला जाएगा। जो बेघर-बेरोज़गार बचेंगे, वे बीमार होकर लाईलाज मरेंगे।’

यों तो मोमिनपुरा का हर साल यही हाल होता है, पर इस साल यह सड़ती झील हटने का नाम नहीं ले रही। पाकिस्तान और डल झील जैसे नामों से नवाज़े जानेवाले इस इलाक़े में ‘म्यूनिसिपैलिटी ने इस साल पानी निकासी के लिए एक भी पंप नहीं लगाया। अफ़सरों ने लिख कर दे दिया, सारे पंप ख़राब हैं, मरम्मत के लिए पैसा नहीं है, सरकार पैसा भेजेगी तो पानी निकाला जाएगा। लोक निर्माण विभाग ने घोषित कर दिया कि हाईवे की पुलिया से हर साल की तरह अगर पानी की निकासी की गई तो जर्जर सड़क टूट सकती है और शहर का संपर्क बाक़ी जगहों से कट सकता है। आपदा राहत विभाग ने ऐलान कर दिया कि यह बाढ़ नहीं, मामूली जलभराव है, इसलिए कुछ करने का प्रश्न ही नहीं पैदा होता।… अस्पतालों ने मोमिनपुरा के मरीजों की भर्ती करने से मना कर दिया कि जगह नहीं है और संक्रमण से पूरे शहर में महामारी का ख़तरा है। पावरलूम की मशीनें और मकानों का मलबा ख़रीदने के लिए कबाड़ी फेरे लगाने लगे। पानी में डूबे मकानों का तय-तोड़ होने लगा। रियल इस्टेट के दलाल समझा रहे थे कि हर साल तबाही लाने वाली ज़मीन से मुसलमान औने-पौने में जितनी जल्दी पिंड छुड़ा लें उतना अच्छा।…

यही है वह मुसलसल, बिना असलहे और बिना शोर-शराबे के चलता दंगा जो शासन-प्रशासन से लेकर शहर की जनता तक एक महामारी की शक्ल में फैले सांप्रदायिक मिज़ाज की अभिव्यक्ति है। अपने मुहल्ले की बदहाली को कम करने की जद्दोजहद में लगे मोमिनपुरा की क्रिकेट टीम के लड़के जब अपनी हर तरह की कोशिश से बेज़ार हो जाते हैं, तब यह ज़हरबुझा सच उनकी रगों में दौड़ जाता है कि न सिर्फ़ एक दंगा लगातार जारी है, बल्कि वह आमने-सामने वाले दंगे से ज़्यादा क्रूर और ख़तरनाक है, क्योंकि आमने-सामने की मारकाट वाले दंगे में कम-से-कम शासन-प्रशासन को इधर का रुख करना पड़ता है। दंगा इस बदहाली से बेहतर इस मायने में ठहरता है कि तब हाकिमों की ओर से, नेताओं और सामाजिक कार्यकर्ताओं की ओर से थोड़ी मदद मिल जाती है। थके-हारे, हताश और मायूस ये ग्यारह खिलाड़ी एक जुमे को फ़जर की नमाज़ के वक़्त सिज़दा कर एक ही दुआ मांगते हैं: ‘दंगा भेजियो मोरे मौला, वरना हम सब इस नर्क में सड़ कर मर जाएंगे। गू-मूत में लिथड़ कर मरने की जि़ल्लत से बेहतर है कि ख़ून में डूब कर मरें।’ और ‘दो दिन बाद मोमिनपुरा में भरते पानी के दबाव से हाई-वे की पुलिया टूट गई। काली झील कई जगहों से सड़क तोड़ कर उफनाती हुई पास के मोहल्लों और गांवों के खेतों में बह चली। घंटे-घडि़याल-शंखों का समवेत शोर बर्दाश्त के बाहर हो गया।… प्रभातफेरी करनेवालों की अगुवाई में शहर और गांवों से निकले जत्थे मोमिनपुरा पर चढ़ दौड़े। सीवर के बजबजाते पानी में हिंदू और मुसलमान गुत्थमगुत्था हो गये। अल्लाह ने हताश लड़कों की दुआ कबूल कर ली थी।’

इतना विचलित कर देनेवाली और इतने बड़े फलक पर अपनी रौशनी फेंकनेवाली कहानियां पिछले सालों में गिनती की लिखी गई होंगी। भारत के उदारीकरण के साथ-साथ राज्य की मशीनरी से लेकर जनता के एक बड़े हिस्से तक का जो सांप्रदायीकरण हुआ है, या कहें कि इन सभी ठिकानों पर दबे पड़े बहुसंख्यावादी सांप्रदायिक विष-बीज को जिस तरह पनपने, फूलने-फलने का मौक़ा मिला है- जिसके आलोक में ही नरेंद्र मोदी और भाजपा के उभार जैसी परिघटना की व्याख्या हो सकती है – उसकी यह प्रतिनिधि कहानी है। प्रभात पटनायक इसे आज़ादी की लड़ाई से विरासत में मिले साम्राज्यवादविरोधी समावेशी राष्ट्रवाद से बूर्जुआ राष्ट्रवाद की ओर संक्रमण का नतीजा मानते हैं जो कि नवउदारवादी दौर की लाक्षणिक विषेशता है (देखें, ‘विश्वीकरण का दौर और राष्ट्रवाद की दो अवधारणाएं’, लोकलहर, 15-21 जून 2015)। उनके अनुसार, राष्ट्रवाद के इन दो रूपों में अंतर करना इसलिए ज़रूरी है कि इसके बग़ैर हम एक युगांतकारी संक्रमण को समझ नहीं सकते। पहले वाले के लिए मुक्ति की धारणा अहम थी और वह तीसरी दुनिया के अन्य मुक्ति आंदोलनों के साथ एकजुटता पर बल देता था, जबकि दूसरा वाला देश की अंतरराष्ट्रीय ताक़त और औक़ात को बढ़ाने पर बल देता है। पहला वाला जनता को ग़रीबी, भूख, कंगाली से उबारने का लक्ष्य निर्धारित करता था, जबकि दूसरा वाला जीडीपी की देवमूर्ति बनाकर उसे पूजता है और उसके लिए किसानों को बेदख़ल करना, मज़दूरों के अधिकारों में कटौती करना, ग़रीबों के कल्याण की योजनाओं को ख़त्म करना – ऐसी किसी भी चीज़ को जायज़ ठहराता है। लेकिन नवउदारवादी प्रतिज्ञाओं पर खरा उतरनेवाला, राष्ट्रवाद के पहले से दूसरे रूप की ओर यह संक्रमण, जैसा कि प्रभात पटनायक लिखते हैं-

आसान नहीं था। इसलिए भारत जैसे देश में पूंजीवादी राष्ट्रवाद के अपने संपूर्ण रूप में उभरने की एक ज़रूरी शर्त यह है कि वह कोई अतिरिक्त सहारा पकड़ ले। सांप्रदायिक फ़ासीवाद उसका ऐसा ही सहारा है। एक ऐसे समाज में जिसने साम्राज्यवादविरोधी राष्ट्रवाद की मज़बूत उपस्थिति को देखा हो, यूरोपीय ढंग का उत्तर-वेस्टफेलियाई राष्ट्रवाद गढ़ा जाए, इसके लिए एक ख़ास ‘प्रतिक्रांति’ की ज़रूरत होती है, जिसे सबसे अच्छी तरह से ऐसी ताक़तें ही ला सकती हैं जो शुरू से ही साम्राज्यवादविरोधी राष्ट्रवाद के खि़लाफ़ रही हों यानी ‘सांप्रदायिकता’ की, ‘सांप्रदायिक फ़ासीवाद’ की ताक़तें। इसलिए साम्राज्यवादविरोधी राष्ट्रवाद की राख पर बूर्जआ राष्ट्रवाद के फलने-फूलने के लिए विडंबनापूर्ण तरीक़े से सांप्रदायिक फ़ासीवादी ताक़तों का हस्तक्षेप ज़रूरी है। यही भारत में हो रहा है।

यह लेख इसी साल के जून महीने का है और यह मूलतः केंद्र में एक सांप्रदायिक फ़ासीवादी सरकार के आने की व्याख्या करता है, पर यह स्पष्ट है कि यहां जिस प्रक्रिया की बात की गयी है, उसका आग़ाज़ इस मुल्क में उदारीकरण की शुरुआत के साथ हुआ था। 2003 में छपी ‘दंगा भेजियो मौला!’ इसी प्रक्रिया की एक विचलित कर देनेवाली सामाजिक अभिव्यक्ति का चित्र है। मोमिनपुरा स्वर्ग तो कभी न था, पर अब उसे मुकम्मल नर्क बनाने और बनाये रखने में जैसे सारी ताक़तें लगी हुई हैं। बहुसंख्यक सांप्रदायिकता बेहद मुखर और कारगर हो चली है। कहानी इसके कई-कई ब्यौरे देती है, जिनकी विषेशता है कि वे चीज़ों को एक स्थिति के रूप में नहीं, एक घटना-विकास के रूप में, बनते-बढ़ते रुझान के रूप में पेश करते हैं, और उनका निचोड़ इस मार्मिक वाक्य में सिमट जाता हैः

आचमन करने और हाथ में जल लेकर गंगा-जमुनी तहज़ीब का हवाला देने के दिन कब के लद चुके थे। यह शहर अब इस पानी और बस्ती दोनों से छुटकारा पाना चाहता था।

कहानी को पढ़ कर ख़त्म करते हुए आप महसूस करते हैं कि आपने किसी एक शहर के मुसलमानों की नहीं, समग्रता में भारतीय मुसलमान की गति और नियति का साक्षात्कार किया है। मोमिनपुरा या ऐसी किसी भी बस्ती को ‘पाकिस्तान’, ‘मिनी पाकिस्तान’ कहना तो एक क्रूर सांप्रदायिक मज़ाक है, पर मोमिनपुरा जिस शहर का हिस्सा है, वह ‘मिनी हिंदुस्तान’ ज़रूर है – पूरे मुल्क का एक स्याह रूपक – जहां ‘नियम और अनुशासन के साथ हर सुबह और गगनभेदी होती जा रही घंटे-घडि़याल और शंख की ध्वनियों’ के बीच एक मुसलमान बस्ती ‘पवित्र शहर का कमोड’ बने रहने को अभिशप्त है और पूरा शहर उससे छुटकारा पा लेने को आतुर, जिसके लिए ज़रूरी है कि उसके अभिशाप को और गाढ़ा किया जाए। धीमे ज़हर की मौत मरता यह भारतीय मुसलमान किसी भी कोने से मदद की उम्मीद नहीं कर सकता। राज्य और तमाम दूसरी एजेंसियों की थोड़ी भी नज़रे इनायत वह तभी हासिल कर सकता है जब इस धीमे ज़हर की जगह एक विस्फोटक तरीक़े से क़ानून और व्यवस्था की समस्या उठ खड़ी हो। इसीलिए विडंबनापूर्ण ढंग से वह दंगे की कामना करता है।

यहां ऐजाज़ अहमद का एक प्रकाशित व्याख्यान, ‘कम्यूनलिज़्म: चेंजिंग फॉर्मस् ऐंड फार्च्यूनस्’ (दि माक्र्सिस्ट, अप्रैल-जून 2013), याद आता है जहां वे यह बताते हुए, कि पूंजीवाद का हिंस्र लुटेरापन भारत में जाति संरचनाओं और सांप्रदायिक टकरावों के चलते हमेशा से पर्याप्त मुखर रहा है, कहते हैं: ‘ऐसी प्रवृत्तियां नवउदारवादी अतिवाद की शुरुआत से पहले थोड़े नियंत्रण में थीं; अब ऐसे अधिकतर नियंत्रणों को तिलांजलि दे दी गयी है और राज्य, कमोबेश अनिच्छापूर्वक, तभी हस्तक्षेप करता है जब कोई सांप्रदायिक दंगा हो जिसे कि सारतः एक क़ानून और व्यवस्था संबंधी समस्या के रूप में देखा जाता है।’ ‘दंगा भेजियो मौला!’ में मोमिनपुरा की क्रिकेट टीम के लड़के मदद की गुहार लगाने हर जगह जाते हैं, कोई सीधे मुंह बात नहीं करता और तब उन्हें भी समझ आ जाता है कि ये तभी आएंगे जब दंगा होगाः

देर रात गए जब वे अपनी साईकिलें नाव पर लाद कर घरों की ओर लौटते, अंधेरी छतों से आवाज़ें आतीं, ‘‘क्या यासीन मियां, वे लोग कब आएंगे?’’

अंधेरे में लड़के एक-दूसरे को लाचारी से ताकते रहते और नाव चुपचाप आगे बढ़ती रहती। टीम के लड़के दौड़ते रहे, लोग टरकाते रहे और बस्ती पूछती रही। एक रात बढि़याते पानी ने घर लौटते लड़कों से कहा, ‘‘बेटा, अब वे लोग नहीं आएंगे।’’

‘‘काहे?’’ यासीन ने पूछा।

‘‘तजुरबे की बात है, उस दुनिया के लोग यहां सिर्फ़ दो बखत आते हैं। या दंगे में या इलेक्शन में। ग़लतफ़हमी में न रहना कि वे यहां आकर तुम्हारे बदन से गू-मूत पोंछ कर तुम लोगों को दूल्हा बना देंगे।’’

अगले दिन यासीन ने दांत भींचकर हर रात सैकड़ों आवाज़ों में पूछे जानेवाले उस एक सवाल का जवाब नाव पर सफ़ेद पेंट से लिख दिया, ‘‘दंगे में आएंगे।’’ ताकि हर बार जवाब देना न पड़े।

ऐजाज़ अहमद की बात से यहां एक फर्क है। ऐजाज़ नवउदारवादी दौर में राज्य के चरित्र के बदलाव की ही बात करते हैं, पर ‘दंगा भेजियो मौला!’ कई दूसरी एजेंसियों को भी समेटती हुई एक अधिक जटिल तस्वीर सामने रखती है। मदद मांगने निकले लड़के ‘पहले उन नेताओं, समाज सेवियों और अख़बार वालों के पास गये जो दो बरस पहले हुए दंगे के दौरान बस्ती में आए थे और उन्होंने उनके बुजुर्गों को पुरसा दिया था। वे सभी गरदनें हिलाते रहे लेकिन झांकने नहीं आए। फिर वे सभी पार्टियों के नेताजियों, सरकारी अफ़सरों, स्वयंसेवी संगठनों के भाइजियों और मीडिया के भाईजानों के पास गए।’ सबने उन्हें टरका दिया। यहां मामला सिर्फ़ सामाजिक सरोकारों को बलाए-ताक़ रख चुके, जातिवाद और सांप्रदायिकता को नियंत्रित करने की ओर से उदासीन-अनिच्छुक नवउदारवादी राज्य का नहीं है; मामला एक ऐसे सर्वव्यापी नकारात्मक बदलाव का है जिसमें उम्मीद के सभी ठिकाने ध्वस्त हो गये हैं।

ऐसा पहले नहीं था। परिस्थितियां विपरीत थीं, पर इस क़दर नहीं। इसीलिए मोमिनपुरा के लोग शुरू में उम्मीद लगाए रहते हैं। वे समझ नहीं पाते कि आखि़र इस बार पानी का दायरा फैलता ही क्यों जा रहा है और क्यों उनकी मदद से हर किसी ने हाथ खींच लिये हैं। बढ़ता पानी अपनी ‘डभ्भक-डभ्भाक’ आवाज़ में उनसे कुछ कहता है, पर वे समझते नहीं। यह बदले हुए समय को पहचानने में हुई चूक है। उम्मीद के तिनके को कौन छोड़ना चाहता है? आखि़रकार क्रिकेट टीम के लड़के धीरे-धीरे पानी की बात समझने लगते हैं। क्रिकेट टीम के लड़के ही क्यों? क्योंकि वे ही हैं जिन्होंने मल्लाहों के नाव देने से मना कर देने के बाद कहीं से एक नाव का जुगाड़ किया है और मुहल्ले की हाड़ी-बीमारी-मौत जैसी हर मुसीबत में आपात सेवा देने से लेकर मदद की गुहार लगाने की दौड़-धूप तक का सारा काम करते हुए एक बड़े कैनवास पर चीज़ों को रखने-देखने-आंकने की स्थिति में हैं। पानी के साथ उनकी बातचीत को कहानीकार ने एक युक्ति के रूप में इस्तेमाल किया है। यह, दरअसल, गहरी हताशा के क्षणों में सच तक ले जानेवाला आत्मालाप और आत्ममंथन है। इसी मंथन से गुज़रते हुए बिखरे-बिखरे सारे तथ्य एक साथ इकट्ठा होते हैं और उनके बीच से सत्य सहसा फूट पड़ता है, जैसे जिग्सॉ पज़ल के सारे टुकड़े सही ठिकानों पर जुड़ गये हों। पानी की बात समझ कर, यानी तमाम टुकड़ों के जुड़ने से बनी मुकम्मल तस्वीर को देख कर, लड़के ‘दंगा भेजियो मोरे मौला’ की दुआ मांगते हैं और उनकी दुआ कबूल होती है।

‘अल्लाह ने लड़कों की दुआ कबूल कर ली थी’ – कहानी के इस आखि़री वाक्य से लगता है कि लड़के निष्क्रिय याचक भर हैं, पर इससे ठीक पहले के वाक्यों में कहानी सांकेतिक रूप से उनकी सक्रियता की ओर इशारा करती है। ‘दो दिन बाद मोमिनपुरा में भरते पानी के दबाव से हाई-वे की पुलिया टूट गयी।’ भरते पानी का दबाव मोमिनपुरा के वाशिंदों के बढ़ते असंतोष के दबाव का संकेत बन कर आया है। इसका मतलब, पुलिया टूटी नहीं, तोड़ी गयी। यह पुलिया ही थी जिससे होकर हर साल पानी को निकास मिलता था, पर इस साल प्रशासन ने किसी-न-किसी बहाने से इस काम को रोक रखा है। गू-मूत में लिथड़ कर मरते ये घिरे हुए लोग अंततः घिराव को तोड़ देते हैं। ‘घंटे-घडि़याल-शंखों का समवेत शोर बर्दाश्त के बाहर हो गया’ – यह वाक्य पुलिया टूटने की सूचना के बाद का है, पर यह कथाकाल में भी बाद का माना जाए, यह ज़रूरी नहीं। इसे पुलिया तोड़ दिये जाने की पृष्ठभूमि के रूप में भी पढ़ सकते हैं। बर्दाश्त के बाहर हो जाना इस शोर के एकाएक बहुत बढ़ जाने का अर्थ भी देता है – अपने अभिशाप से लड़ते मुसलमानों के खि़लाफ़ साम्प्रदायिक हिंदुओं की जंग का ऐलान – और मोमिनपुरा के बर्दाश्त की सीमा टूटने का अर्थ भी देता है, यानी दूसरी तरफ़ के बढ़ते हुए शक्ति-प्रदर्शन के खि़लाफ़ मुसलमानों की ओर से एक बड़ा इंकार।

ऐसी सांकेतिकता और मितकथन इस कहानी की बड़ी ताक़त है। अनिल यादव के पास बहुत लंबी-लंबी कहानियां भी हैं, जिनके मुक़ाबले ‘दंगा भेजियो मौला!’ बिल्कुल शास्त्रीय अर्थों में ‘शॉर्ट स्टोरी’ है। डिमाई आकार के लगभग छह पृष्ठ। इस मझोले आकार में एक बड़ी बात को रखने की कला जैसी इस कहानी में है, वैसी खुद अनिल अपनी दूसरी कहानियों में अर्जित नहीं कर पाए हैं। पढ़ते हुए आप महसूस करते हैं कि वाचक ज़रूरी ब्यौरे देने में कोई कटौती नहीं कर रहा, लेकिन अपने वर्णनों-विवरणों में कहीं रमने को राज़ी नहीं है; जिस स्याह यथार्थ को वह उकेर रहा है, उसमें रमना एक अपराध है। वेदना में व्यक्ति या तो प्रलाप करता है, या बहुत कम बोल कर काम चलाता है। ‘दंगा भेजियो मौला!’ कम बोलनेवाली कहानी है। लगभग स्तब्ध अभिव्यक्ति जैसा ढब, भाषा की ख़पत में कोई शाहख़र्ची और इत्मीनान नहीं, एकदम ज़रूरत और भावनाओं के गहरे दबाव से निकले शब्द, और उतना ही कहकर आगे बढ़ जाना जितना कहकर लगा कि बात पूरी हो गयी। ऐसा अनुपात-बोध इधर की कहानियों में विरल है। कहानीकार कहीं भी विमर्श को वाचाल ढंग से पेश करने या आरोपित करने को समुत्सुक नहीं है। विरले ही कहीं ‘अभिमत’ के रूप में कोई बात कही गयी है; प्रस्तुति का अधिकांश ‘तथ्य-कथन’ की शक्ल में है। ‘तथ्य’ के पीछे ‘अभिमत’ का बल होता है, या कहें कि तथ्यों के चयन-संयोजन में अभिमत व्यंजित होता है, यह बात अलग है।

कहानी अपनी पूरी संरचना में सुसंगत है। यहां कुछ भी अलग नहीं छिटकता – न दृश्य, न ब्यौरे, न भाषा, न कथा-युक्तियां। इनमें से कोई अपने लिए नहीं है, सभी एक-दूसरे के लिए हैं। भारतीय मुसलमान की जिस अंधकारपूर्ण नियति को कहानीकार सामने रखना चाहता है, वह इस सुसंगत संरचना के कारण एक समग्र प्रभाव के रूप में उभरती है। कहानीकार की ख़ासियत है कि वह अपने सघन गद्य के बीच एकाएक कोई बहुत काव्यात्मक बिंब या उक्ति ला सकता है और बिना उसके आकर्षण में फंसे आगे निकल सकता है। ‘नाव दिन भर बस्ती के दुख ढोती रही’, ‘पानी में डूबे घरों में उन बच्चों की मांओं की सिसकियों की तरह कुप्पियां भभक रही थीं’, ‘…जीवन अचानक शहर की बुनकर बस्ती की खड़कताल से बिदक कर बाढ़ में डूबे, अंधियारे कछारी गांव की चाल चलने लगता’ – ऐसी काव्यात्मक उक्तियां उसके यहां कब आकर बिना कोई अतिरिक्त अवधान पाए निकल जाती हैं, पता भी नहीं चलता। वे गद्य की लय में एकरस हैं। इसीलिए वे अपना अलग वजूद जतलाने की बजाय पिघल कर एक पूरी मनःस्थिति की निर्मिति में शामिल हो जाती हैं। इसी मनःस्थिति के सघन रचाव का परिणाम है कि पानी से बातचीत जैसी ग़ैर-यथार्थवादी युक्ति भी बहुत चुपके से आकर कहानी में घुलमिल जाती है और आपको उसके अनोखेपन का अलग से अहसास नहीं होता। प्रकृति के साथ मनुष्य की बातचीत निविड़ अकेलेपन और गहरी वेदना का चिरपरिचित साक्ष्य रहा है। ‘मेघदूत’ के यक्ष और सूरदास की गोपियों को याद कीजिए। ‘दंगा भेजियो मौला!’ में यह एक समुदाय का अकेलापन है, जिसमें प्रकृति से कुछ कहना-सुनना एक सहज व्यापार की तरह लगता है। पर यह यक्ष और गोपियों के जैसा नहीं है, जिसमें अपने भीतर इकट्ठा भावनाओं का गुबार बाहर निकाल देने के लिए एक संबोध्य ढूंढ़ लिया गया है। कहानी पढ़ते हुए आप अनुभव कर सकते हैं कि यह कहा-सुनी उन पात्रों के भीतर की है और इसी मंथन से किसी विकट सत्य को प्रकट होना है। मोमिनपुरा क्रिकेट क्लब के कुछ लड़के हमेशा नाव पर ही रहने लगे हैं, ताकि रात में गिरनेवाले मकान में फंसे लोगों की जान बचाने के लिए हमेशा तैयार मिलें। ‘दिन बीतने के साथ बदबूदार हवा के झोंकों से नाव झील पर डोलती रही, तीन तरफ़ से बस्ती को घेरे कालोनियों की रोशनियां काले पानी पर नाचती रहीं, हर रात बढ़ते पानी के साथ बादलों से झांकते तारों समेत आसमान और क़रीब आता रहा। सावन बीता, भादों की फुहार में भींगते शहर से घिरे दंड-द्वीप पर अकेली नाव में रहते काफ़ी दिन बीत गए और तब लड़कों के आगे रहस्य खुलने लगे।… पानी, हवा, घंटे-घडि़याल, मर कर उतराते जानवर, गिरते मकान, रोशनियों का नाच, सितारे और चींडियों के झुंड – सभी कुछ न कुछ कह रहे थे। एक रात जब पूरी टीम बादलों भरे आसमान में आंखें गड़ाए प्रभात-फेरी का इंतज़ार कर रही थी, पानी बहुत धीमे से बुदबुदाया, ‘‘दंगा तो हो ही रहा है।’’

एक समूह/समुदाय का भयावह अकेलापन, उस अकेलेपन में चलनेवाला आत्ममंथन और उस आत्ममंथन से उपजा एक सच जो आसपास की हर शै के परस्पर संबंध से निकलनेवाला अर्थ है – इसे इतने संयम और सांकेतिक लाघव के साथ व्यक्त कर पाना हर कहानीकार के बस की बात नहीं हैं।

पीछे संरचना की सुसंगतता की बात की गयी। वह घटकों के अचूक संष्लेश में ही नहीं, कहानी की शुरुआत और अंत की सधी हुई योजना में भी है। कहानी एक दृश्य से शुरू होती है और एक दृश्य के साथ ख़त्म होती है; बीच का लगभग पूरा हिस्सा परिदृश्य का विस्तार है। जिस जगह जाकर वह ख़त्म होती है, वहां आप कहानी का बाक़ायदा अंत होना महसूस करते हैं। यह उन कहानियां की तरह नहीं है जो अपनी तमाम खूबियों के बावजूद अंत की ओर अधर में लटक जाती हैं। उनके उदाहरण फिर कभी। कोई कहानी अपनी पूरी बनावट से अंत संबंधी कैसी अपेक्षाएं जगाती है, और किस तरह की कहानियों में कोई ‘अंत’ ज़रूरी होता है, किनमें नहीं, इस पर भी फिर कभी। फिलहाल इतना ही कि ‘दंगा भेजियो मौला!’ को पढ़ते हुए आप एक बाक़ायदा अंत की अपेक्षा करते हैं और कहानी इस अपेक्षा को पूरा करती है। अनिल यादव की ही ‘लोककवि का बिरहा’ या ‘आर जे साहब का रेडियो’ जैसी कहानियों को पढ़ें तो स्पष्ट हो जाएगा कि कहानी की पूरी उठान से जगनेवाली अपेक्षा के मुक़ाबले कमज़ोर अंत का क्या मतलब होता है; जैसे अपनी दौड़ शानदार ढंग से पूरा करता कोई धावक फि़निश लाइन से ठीक पहले लड़खड़ा कर बैठ जाए!

पता नहीं, इपंले कह पाया या नहीं, पर वह कहना यही चाहता था कि अगर शुरुआत से ही कोई कहानी आपको गिरफ़्त में नहीं ले लेती, तो यह पाठक के रूप में आपकी अयोग्यता की निशानी भी हो सकती है और अगर आप थोड़ी मुश्किल उठाने को तैयार हो जाएं, तो अपनी इस अयोग्यता से उबरा भी जा सकता है।

[1] यों तो हर रूपक में बात को भटका कर अनजान दिशाओं की ओर ले जाने का दुर्गुण होता है, पर यह तो और भी दुष्ट है। दुष्ट माने दोषपूर्ण, जैसे शास्त्रों में वर्णित ‘दुष्ट काव्य’। पाठक अगर पंछी है और कहानीकार बहेलिया, तो पठन का सुख पाठ की गिरफ़्त में आने से पहले तक ही समझना चाहिए। गिरफ़्त में आने के बाद सुख का क्या मतलब? यानी इस रूपक की मानें तो पढ़ना एक सज़ा है (और वह असंगति अलंकार भी यहां कारगर नहीं कि ‘मज़ा इसमें इतना मगर किसलिए है’)! इसीलिए कहा, बहुत घटिया रूपक है। इसे थोड़ा ज़्यादा बोलने की इजाज़त दें तो कमबख़्त अनाप-शनाप बकने लगेगा।

संजीव कुमार

संजीव कुमार

संजीव कुमार। युवा आलोचक और कहानीकार। ‘जैनेन्द्र और अज्ञेयः सृजन का सैद्धांतिक नेपथ्य’ पुस्तक के लिए देवीशंकर अवस्थी सम्मान। दिल्ली विश्विद्यालय के देशबंधु कॉलेज में  प्राध्यापक। इनसे sanjusanjeev67@gmail.com पर संपर्क सम्भव है।

साभार- हंस, सितम्बर, 2015

भीष्म साहनी की कहानी-(अ)कला: संजीव कुमार

हिंदी कहानी के आन्दोलन ने जहाँ एक और पुरानी जड़ता को तोड़कर नयी ज़मीन तैयार की, वहीँ उसमें कभी मूर्खतापूर्ण और कभी षड्यंत्रपूर्ण चयनवाद भी उभरा. हिंदी के कई महत्वपूर्ण कहानी लेखक इस चयनवाद के शिकार हुए. ऐसे आन्दोलनों के शिकार भीष्म साहनी  भी हुए. यह चयनवादी आलोचना उनकी भी थी जो अपने को प्रगतिशील और जनवादी सिद्ध करने के लिए कुछ भी कर रहे थे.  इस चयनवाद के शिकार भीष्म साहनी जी अकेले नहीं हुए. कई दूसरे महत्वपूर्ण हिंदी कथा लेखक और कवि या तो पीढ़ियों के अंतराल के नाम पर आधुनिक न रहे या फिर उनके सामाजिक संघर्ष को क्रांतिकारी  तत्त्वों में शामिल न किया गया. यह अवश्य ही दुर्भाग्यपूर्ण परिस्थिति थी जिसके विरुद्ध आज भी संघर्ष करने की आवश्यकता बनी हुयी है. खासकर तब; जबकि क्रांतिकारिता की व्याख्या सामाजिक परिवर्तन के दूसरे छोर पर जा रही है…. फिट्गेराल्ड ने कभी कहा था, ‘मैं अपने समकालीनों के साथ नहीं होना चाहता, क्योंकि मेरी नियति भविष्य के कूड़ेदान में नहीं होगी.’ भीष्म साहनी अपने समय के साथ हो सकते हैं, अपने समकालीन लेखकों के साथ नहीं…. ऐसा नहीं है कि भीष्म साहनी जी अपनी कहानियों के कलात्मक रूपगठन के प्रति असचेष्ट हों. वे इस दिशा में यशपाल की उस शैली का थोड़ा अभ्यास किया मालूम पड़ते हैं जो प्रतिमुखता का एक नाटकीय चरम बिंदु पूरे घटनाक्रम के भीतर से खड़ा कर लेती है और हमें अभिभूत करती है… आधुनिकतावादी लेखकों ने कथानक को प्रायः व्यर्थ बना दिया है. हिंदी में प्रेमचंद-यशपाल से लेकर भीष्म साहनी और अमरकांत-रेणु ने उनकी पुनः प्रतिष्ठा के लिए संघर्ष किया है. भीष्म जी की तमाम कहानियों की रूप-रचना में एक कथानक होता है, एक भरी-पूरी कहानी होती है, जिसमें अकेला चरित्र अपनी भीतरी परिस्थितियों में कम होता है. एक पूरा व्यापाररत समुदाय उनके साथ दिखता है. ..कहानीपन की रक्षा का संघर्ष कहानी की रचनात्मक पहचान के लिए आवश्यक हो गया है. आज की अधिकांश कहानियों में हलचल तो बहुत होती है, पर अंतर्वस्तु में एक रिक्तता-सी लगती है.  # सुरेन्द्र चौधरी (‘हिंदी कहानी : रचना  और परिस्थिति ‘ में संकलित  ‘भीष्म  साहनी : नए  राष्ट्रीय बोध के अन्वेषक ‘ लेख से )  

फोटो- त्रिभुवन तिवारी, आउटलुक से साभार

फोटो- त्रिभुवन तिवारी, आउटलुक से साभार

   

By संजीव कुमार

यह थोड़ा अजीब तो है, पर क्या करें, कि कहानीकार भीष्म साहनी के बारे में सोचते हुए बरबस ‘मोहन जोशी हाजि़र हों’ और ‘तमस’ वाले अभिनेता भीष्म साहनी याद आ जाते हैं। दोनों जगह उनका किरदार ऐसा था जिसमें आविष्ट नाटकीयता वाले क्षणों की पर्याप्त गुंजाइश थी, पर भीष्म जी के अभिनय ने उन क्षणों को असाधारण तरीक़े से उभारने में कोई दिलचस्पी नहीं दिखायी। उसे किसी चिह्नित की जाने योग्य नाटकीयता के हवालेे नहीं किया। बस, जीवन के सहज प्रवाह का थोड़ा असहज हो जाना ही चिह्नित हो पाया। लगा, हम सामान्य दिनचर्या में आए हुए कुछ व्यतिक्रमों से रू-ब-रू हैं, उन व्यतिक्रमों के प्रति अतिरिक्त रूप से संवेदनशील बनानेवाली अभिनय-कला से नहीं। मानो हम बिना किसी नाटकीयता के प्रत्यक्ष जीवन की सादगी का साक्षात्कार कर रहे हों, उस जीवन की कलात्मक पुनर्रचना का नहीं।

कहानीकार भीष्म साहनी भी ऐसे ही हैं। उनकी कहानियां कथा-स्थितियों और पाठक के बीच किसी कहानीकार की मध्यस्थता का अहसास नहीं होने देतीं। बेहद सीधे-सादे तरीक़े से वे कहानी कहते चले जाते हैं। कहीं कोई चमकता हुआ वाक्य नहीं, कोई ऐसी साहित्यिक हिकमत नहीं जिसे देखकर आप ‘वाह’ कह उठें, कहीं किसी प्रसंग को थम-ठहर कर अलग से उभारने का जतन नहीं। आचार्य रामचंद्र शुक्ल होते तो शायद कहते कि इन्हें जीवन के मार्मिक स्थलों की पहचान नहीं है, इसलिए उन जगहों पर ठहर कर धैर्य से रमते नहीं हैं। पर मार्मिक स्थलों की पहचान का यह सूत्र तुलसीदास पर, या पुरानी/प्रचलित कथा को उपजीव्य बनानेवाले किसी भी रचनाकार पर तो लागू हो सकता है, भीष्म जी पर लागू नहीं हो सकता। तुलसी के पास कथा पहले से थी, विमर्श और वक्रता ही अपनी थी। उन्हेें एक पूर्वप्रचलित कथा में धैर्यपूर्ण ट्रीटमेंट की मांग करनेवाले मार्मिक स्थलों की पहचान करनी थी। भीष्म जी के पास कथा – यानी घटनाओं का कंकाल – और विमर्श, दोनों अपना है। उन्हें किसी पहले की कथा में ख़ास अपनी वक्रता पैदा नहीं करनी है। उनका कौशल उपजीव्य कथा की घटना-शृंखला में मार्मिक स्थलों की पहचान कर उसका सधे हाथों से ट्रीटमेंट करने में नहीं, स्वयं ऐसे स्थलों की कल्पना-उद्भावना करने में निहित है – ऐसी कथा-स्थितियों की उद्भावना जहां पात्र और परिस्थितियों के घात-प्रतिघात से जीवन का कोई मार्मिक पक्ष, कोई दबा हुआ आशय, कोई पहचाना किंतु अनपहचाना-सा सत्य बेसाख़्ता उभर आये।… और इस काम में भीष्म साहनी माहिर हैं। शायद इसी महारत केे चलते उनमें सीधेे-सादे ढंग से कहानी कह जानेे का दुर्लभ-सा आत्मविष्वास है।

भीष्म जी की इस विशेषता को नामवर सिंह ने अचूक ढंग सेे पहचाना था। ‘कहानी नयी कहानी’ में कहानी की संरचना को लेकर जगह-जगह अनेक सूत्र देते हुए जिस सूत्र के उदाहरण के रूप में उन्होंने भीष्म साहनी का उल्लेख किया है, उसे याद कीजिए। सजीव बिंब, सांकेतिकता, ‘आधारभूत विचार का द्रवीभूत होकर संपूर्ण कहानी के शरीर में भर उठना’, वातावरण-निर्माण, टेक्स्चर – इन सबकी चर्चा करते हुए भीष्म साहनी की कहानियां उदाहरण नहीं बनी हैं। वे उदाहरण बनी हैं इस सूत्र का: ‘‘कहानी जीवन के टुकड़े में निहित ‘अंतर्विरोध’, ‘द्वंद्व’, ‘संक्रांति’ अथवा ‘क्राइसिस’ को पकड़ने की कोशिश करती है और ठीक ढंग से पकड़ में आ जाने पर यह खंडगत अंतर्विरोध ही वृहद् अंतर्विरोध के किसी-न-किसी पहलू का आभास दे जाता है।… यह एक विरोधाभास है कि कहानी जैसा एकान्वित शिल्प अंतर्विरोध पर निर्भर होता है। नये कहानीकारों में भीष्म साहनी में एक ही साथ इन दोनों विशेषताओं का सर्वोत्तम सामंजस्य मिलता है। इस दृष्टि से भीष्म साहनी सबसे सफल कहानीकार हैं।’’ इसके बाद वे ‘चीफ़ की दावत’ का सधा हुआ विश्लेषण करते हैं और बताते हैं कि किस तरह कहानी की मां केवल एक चरित्र नहीं रह जाती, संपूर्ण प्राचीन का प्रतीक बन जाती है। और किस प्रकार ‘एक समर्थ कहानीकार जीवन की छोटी-से-छोटी घटना में अर्थ के स्तर-स्तर उद्घाटित करता हुआ उसकी व्याप्ति को मानवीय सत्य की सीमा तक पहुंचा देता है।’

यह अकारण नहीं है कि जीवन के टुकड़े में निहित अंतर्विरोध, द्वंद्व, क्राइसिस आदि को पकड़ने के उदाहरण के रूप में ही भीष्म जी याद आये, सजीव बिंब या वातावरण-निर्माण या ‘संगीत का-सा प्रभाव उत्पन्न करने’ का सामथ्र्य आदि के उदाहरण के रूप में नहीं। प्रतीक की बात ज़रूर की गई है (‘संपूर्ण प्राचीन का प्रतीक’), पर यह सायास नियोजित प्रतीक के अर्थ में नहीं है, जैसा राजेंद्र यादव या मोहन राकेश के यहां मिलता है। मोहन राकेश की ‘एक और जि़ंदगी’ में कोर्टरूम के भीतर पंखे से कटकर नीचे गिरे पक्षी का प्रतीक एक सजग सहित्यिक युक्ति है जो तलाक लेते पति-पत्नी के बच्चे की लहूलुहान आत्मा का प्रतीकार्थ व्यक्त करने के लिए प्रयुक्त हुई है। ‘चीफ़ की दावत’ की मां को ऐसी साहित्यिक युक्ति केे अर्थ में प्रतीक नहीं कहा गया है। इसीलिए मां प्रतीक ‘है’ नहीं, प्रतीक ‘बन जाती है’। प्रतीक ‘बन जाना’, दरअसल, पठन के स्तर पर उपलब्ध की गई व्यंजना या ध्वनि है, जो इसीलिए संभव हुई है कि कहानीकार ने एक अंतर्विरोध से जुड़ी विडंबना को सफ़ाई से पकड़नेवाली कथा-स्थिति निर्मित की है। कोई आष्चर्य नहीं कि मां के प्रतीक बन जाने की बात कहते हुए नामवर सिंह को काव्यशास्त्र में वर्णित व्यंजना की याद आई: ‘‘काव्यशास्त्र के आचार्यों ने मुख्यार्थ के भीतर से जो अर्थ की व्यंजना कराई है, वह भी इसी का रूप है। जीवन का सत्य इसी तरह खंड के भीतर से, किंतु उसे खंडित करता हुआ पूर्ण की ओर संकेेत करता है; खंड की सीमा को तोड़कर पूर्ण में मिलता है, मुख्यार्थ को बाधित करके रसमय अर्थ को व्यंजित करता है…।’’

मुख्यार्थ से आगे जाकर व्यंजित होनेवाला अर्थ (मुख्यार्थ कोे बाधित करके नहीं, मुख्यार्थ-बाध लक्षणा का लक्षण है; इस बात पर नामवर जी के नंबर कट सकते हैं), खंड की सीमा को तोड़कर पूर्ण में मिलता जीवन-सत्य – भीष्म जी की कहानियों की यह विशेषता उन्हें सीधा-सादा नहीं रहने देती, अंदाज़े-बयां में वे जितनी भी सीधी-सादी लगें। इसीलिए कहा है, दिल को देखो, चेहरा न देखो…। वस्तुतः अंदाज़े-बयां की सादगी और कहानी विधा की अपनी आकारिक सीमाओं के साथ भीष्म जी जितनी बड़ी वास्तविकताओं की ओर संकेत कर पाते हैं, वही उनके महत्व का आधार है। उनकी यादगार कहानियां – ‘चीफ़ की दावत’, ‘वाड्.चू’, ‘ओ हरामज़ादेे’, ‘अमृतसर आ गया है’, ‘अहम् ब्रह्मास्मि’ आदि – इसीलिए यादगार हैं। ‘वाड्.चू’ का उदाहरण लें। किसी भावुक कर देनेवाले संस्मरण की तरह प्रतीत होती यह कहानी आपको अचूक ढंग से यह अहसास कराती है कि व्यक्तिगत स्तर पर अपने दौर से विदाई ले लेना किसी के लिए संभव नहीं। आपका दौर आपका पीछा नहीं छोड़ता। वाड्.चू पुरानी पोथियों में ही घुसा रहता है, महाप्राण बुद्ध के प्रति एक भावुक लगाव में सिमटा। उसे न नेहरू से मतलब है, न चाउ एन लाई से। उसके अंदर मातृभूमि को लेकर कोई नाॅस्टैल्जिक भाव नहीं है, भले ही कहानी के प्रथम पुरुष वाचक को यह लगता रहा हो कि एक बार अपनी ज़मीन पर लौटने के बाद दुबारा भारत आना उसके लिए भावनात्मक कारणों से संभव नहीं होगा। वाड्.चू के साथ ऐसा कुछ नहीं होता। वह चीन जाता है और दुबारा अतीत की उन्हीं पोथियों में शरण पाने के लिए भारत लौट आता है। लेकिन दोनों जगह वह राज्यतंत्र की निगाह में संदिग्ध है। कोई यह मानने को तैयार नहीं कि वह किसी राज्यतंत्र के लिए हानिरहित एक अतीतजीवी प्राणी है। उसका दौर उसका पीछा करता रहता है और जब पीछा करना छोड़ता है, तब तक वाड्.चू का सर्वस्व लुट चुका होता है। अपने आसपास जितना अतीत उसने इकट्ठा कर रखा था, पांडुलिपियों और नोट्स की शक्ल में, जो उसकी दृष्टि में अत्यंत मूल्यवान था, छिन्न-भिन्न हो जाता है। वाड्.चू का जीवन सारहीन, बेमानी-सा हो जाता है और कुछ समय बाद उसकी मृत्यु हो जाती है। मानो एक ख़ास तरह के पर्यावरण में ही जी पानेवाले प्राणी से उसका पर्यावरण छीन लिया गया हो।

क्या वाड्.चू की त्रासदी को एक व्यक्ति की बदकि़स्मती के रूप में पढ़ा जा सकता है? निस्संदेह, पढ़ा तो जा ही सकता है, पर यह भी निष्चित है कि एक चरित्र और उसके साथ परिस्थितियों के इस घात-प्रतिघात की योजना भीष्म जी ने इतने संकरे पठन के लिए नहीं की है। अनैतिहासिक और समय-निरपेक्ष होकर जिया नहीं जा सकता, यह कठोर सचाई वाड्.चू की त्रासदी में व्यंजित होती है और यह व्यंजना व्यक्तियों से आगे वर्गों, समुदायों और राष्ट्रों पर भी लागू होती है। ‘खंड की सीमा को तोड़कर पूर्ण में मिलता जीवन-सत्य’ यही है जिसको साधने में यह सीधी-सादी कहानी कामयाब है। और इसे साधने के लिए भीष्म जी किसी ऐसी हिकमत का प्रयोग नहीं करते जिसे मैं थोड़े मज़ाकिया लहज़े में ‘सफऱ्ेस टेंशन’ कहना पसंद करता हूं। वे कोई ऐसा वाक्य नहीं लिखते जो आपको अर्थ की किसी विशेष दिशा की ओर ढुलकाने का ज़रिया बन जाए। बावजूद इसके अभिधा से आगे व्यंग्यार्थ की ओर आपकी यात्रा अनिवार्य हो जाती है, क्योंकि कहानी अपने वाक्यों से नहीं, वाक़यों से वह ध्वनि पैदा करने में समर्थ है।

इस रूप में गहरी अर्थ-व्यंजनाओं से भरी कथा-स्थितियों की कल्पना करना ही कहानीकार के तौर पर भीष्म साहनी का स्व-भाव है। शैली-शिल्प में नयापन या अतिरिक्त आकर्षण पैदा करना उनका स्व-भाव नहीं है, इसीलिए जहां वे इसकी कोशिश करते भी हैं, वहां उन्हें कोई सफलता नहीं मिलती। ‘वाड्.चू’ में ही देखें तो पहले वाक्य के साथ भीष्म जी ने एक चैंकाऊ कि़स्म की शुरुआत करने की कोशिश की है: ‘तभी वाड्.चू आता दिखाई पड़ा।’ लेकिन यह ‘तभी’ बिल्कुल जमता नहीं, क्योंकि वह अपना औचित्य सिद्ध नहीं कर पाता। शैली का चैंकाऊपन कतई प्रति-उत्पादक हो जाता है। इसी तरह ‘चीलें’ कहानी में वे चील का जो प्रतीक खड़ा करने की कोशिश करते हैं, वह ख़ासा निष्प्रभावी है। दरअसल, कहानियां उनके भीतर इस तरह के वातावरणधर्मी प्रयोगों के रूप में जन्म नहीं लेती हैं। नयी कहानी में स्त्री-पुरुष-संबंधों वाले कथ्य और प्रतीकात्मक-सांकेतिक शैली-शिल्प-विधान को जो महत्व मिला था, उसने शायद धक्का देकर भीष्म जी को ऐसी कहानी लिखने के लिए प्रेरित किया। वे अपनी प्रकृति से मूड/मनःस्थिति को आधार बनानेवाले कहानीकार हैं नहीं, जैसे कि वे ‘चीलें’ में दिखना चाहते हैं।

पर इसका यह भी मतलब नहीं कि मनोविज्ञान पर उनकी पकड़ मूड/मनःस्थिति को आधार बनानेवालों के मुक़ाबले कहीं भी कमतर है। यह कहते हुए मुझे ‘चीफ़ की दावत’ समेत भीष्म जी की कितनी ही कहानियां याद आ रही हैं, पर जि़क्र सिर्फ़ ‘अहम् ब्रह्मास्मि’ का करूंगा जिसका पाठ अभी मेरी मेज़ पर नहीं है और जिसे पढ़े हुए भी लगभग तीस साल गुज़र चुके हैं। उसका मुख्य पात्र अंग्रेज़ीयत से बहुत प्रभावित है। उसे अंग्रेज़ों की सभी चीज़ें बड़ी अच्छी लगती हैं। एक बार वह कहानी के ‘मैं’ से कहता है कि देखो, अहम् ब्रह्मास्मि का जो अंग्रेज़ी अनुवाद है, वह कितना सुंदर है, ‘आई ऐम द डिवाइन फ़्लेम’। और ऐसा कहते हुए उसके चेहरे पर एक अजीब तरह का दिव्य भाव उभर आता है। फिर कहानी में एक प्रसंग आता है जिसमें एक सिनेमा हाॅल के यूरिनर से अंग्रेज़ उसे धक्के मारकर हटा देते हैं, क्योंकि वह – एक काला देसी आदमी – उन्हें इंतज़ार करवा रहा है। इस घटना के बाद जब कहानी का प्रथम पुरुष वाचक उसके घर पहुंचता है तो कमरे में न पाकर उसे ढूंढ़ता हुआ छत पर जाता है। वहां देखता है कि वह आंखें मूंदे हुए ध्यानस्थ बैठा है और बुदबुदा रहा है, ‘आई ऐम द डिवाइन फ़्लेम… आई ऐम द डिवाइन फ़्लेम’। वाचक को लगता है कि वह मंत्र बुदबुदाता हुआ सतह से दो इंच ऊपर उठ गया है।

यह कथा-सार मैं तीस साल पहले, अपनी किशोेरावस्था मेें पढ़े हुए पाठ केे आधार पर बता रहा हूं। मुमकिन है, इसमें मेरा कुछ अपना भी जुड़ गया हो। पर कहानी की मुख्य विडंबना निभ्र्रांत है। और कहने की ज़रूरत नहीं कि वह हीनता-ग्रंथि की गहरी मनोवैज्ञानिक पकड़ पर टिकी है। मनोवैज्ञानिक पकड़ के इसी अर्थ में ‘अमृतसर आ गया है’ या ‘ओ हरामज़ादे’ भी मुख्यतः मनोविज्ञान की कहानियां हैं, भले ही कहानीकार घटनाओं की जगह मनःस्थितियों के रचाव में दिलचस्पी लेता न दिखाई दे।

कुल मिलाकर, भीष्म साहनी की अनेक कहानियां कहानी विधा की शक्ति का उदाहरण हैं। जिन लोगों को यह लगता था कि इस छोटे आकार की विधा में बड़ी बात को समेटने का माद्दा ही नहीं है, उन्हें खरा उत्तर देनेवाली कहानियों में भीष्म जी की कई कहानियां शामिल हैं। सबसे बड़ी बात कि यह माद्दा कथा-कथन की सादगी और भरपूर पठनीयता को बनाये रखते हुए हासिल किया गया है। कहानीकार बनने के इच्छुक किसी नये लेखक को अगर यह आत्मविश्वास अर्जित करना हो कि वह भी कहानियां लिख सकता/सकती है तो उसे भीष्म जी की कहानियां अवश्य पढ़नी चाहिए।

संजीव कुमार

संजीव कुमार

संजीव कुमार। युवा आलोचक और कहानीकार। ‘जैनेन्द्र और अज्ञेयः सृजन का सैद्धांतिक नेपथ्य’ पुस्तक के लिए देवीशंकर अवस्थी सम्मान। दिल्ली विश्विद्यालय के देशबंधु कॉलेज में  प्राध्यापक। इनसे sanjusanjeev67@gmail.com पर संपर्क सम्भव है।

सहमत (सफ़दर हाशमी मेमोरियल ट्रस्ट) द्वारा प्रकाशित भीष्म साहनी पर केंद्रित पुस्तिका से साभार

अमरकांत की कहानी ‘हत्यारे’ और आज का समय: मार्तण्ड प्रगल्भ

 बात तो करनी है ‘अमरकांत की कहानी ‘हत्यारे’ और आज का समय’ पर और इसी कहानी पर विचार करके मैं आया था। लेकिन कल की कुछ चर्चाएं जो खासतौर से यथार्थवाद के सम्बन्ध में या सत्य के सम्बन्ध में या यथार्थ और रचना के सम्बन्ध में हुई थीं उनके बारे में भी मैं इस कहानी के संदर्भ से कुछ सोच रहा था. जिसे मैं आगे स्पष्ट करूँगा. चर्चा का प्रस्तुत विषय गंभीर तो है ही मनोरंजक भी है। गंभीर क्यूं है इस पर थोड़ा बाद में चर्चा की जाएगी। पहले, मनोरंजक क्यूं है इसकी थोड़ी चर्चा कर ली जाए। आज का जो विषय है, इस विषय के साथ दिक्कत यह है कि आप जहां चाहे इस विषय को फिट कर सकते हैं। समाजशास्त्र का कोई सेमिनार हो, (तो) उसमें भी यह विषय आ जाएगा। दरअसल हुआ क्या है कि आलोचना की जो समाजशास्त्रीय पद्धति है उसने विषयों का टोटा खत्म कर दिया है और इस तरह के शीर्षक की आवाजाही बेरोकटोक चलती रहती है। जैसे, बहुत सारे शोधार्थी इसी तरह के शोध विषय चुन लेते हैं; कोई रचना ले ली और उसमें आज का समय या रचना का समय जोड़ दिया और पूरा एक शोध प्रबंध तैयार हो गया! इसके चलते, इस तरह के विषयों की पुनरावृत्ति बढ़ी है जिससे विषय की गंभीरता एक यांत्रिक पुनरुत्पादन में नष्ट हो जाती है और कई बार हम चीजों को ठेठ समाजशास्त्रीय व्याख्या तक सीमित कर लेते हैं। मानो किसी समय का जो अर्थशास्त्र है उसके बारे में जान लेना (ही विषय को समझने के लिए पर्याप्त) है , कि नेहरू युग के अवसान के समय क्या स्थितियां थीं उसकी थोड़ी चर्चा कर ली जाए और (रचना तथा उन स्थितियों) दोनों में ऐतिहासिक सम्बन्ध जोड़ लिया जाए और इस प्रकार आज के समय में हत्यारे कहानी की सार्थकता सिद्ध हो जाती है। इस पद्धति के चलते जो गंभीर और सारगर्भित सवाल हैं वो ढंक दिए जाते हैं।  # लेखक 

अमरकांत

अमरकांत

रचना और आलोचना के प्रश्न जीवन के प्रश्न होंगे कि नहीं!

By मार्तण्ड प्रगल्भ

हर सचेत और क्रियावान मनुष्य अपने समय की जटिलता को समझना चाहता है। उस समय को समझना चाहता है जिससे उसके अंग-प्रत्यंग-अनुषंग परिस्थिति विशेष में निर्मित हो रहे हैं। मनुष्य के वर्तमान की वर्तमानता (प्रजेन्स ऑफ प्रजेन्ट) क्या है? इस प्रश्न को लेकर वह कई जगह भटकता फिरता है. और ऐसे ही संकट के समय कोई कहानी या कविता या कोई अन्य कलारूप अपने भीतर के अदम्य आकर्षण से उसे अपनी ओर खींच लेते हैं। महान रचनाएं वक्त-बेवक्त ऐसा ही अदम्य आकर्षण पैदा करती हैं। तो सवाल यह है कि ‘हत्यारे’ कहानी का हम कथा आलोचकों-कथाकारों की सभा में क्या महत्त्व है। या हम सरीखों के लिए ‘हत्यारे’ की उपयोगिता क्या है? क्षमा करेंगे, यहां उपयोगिता किसी उपयोगवाद के अर्थ में नहीं है बल्कि मार्क्स जिसे उपयोग-मूल्य कहते हैं उसके अर्थ में है। दरअसल यह कहानी-कला और कथा आलोचना दोनों के लिए गंभीर सवाल है।

कल की चर्चा में समकालीनता और आज के समय के बारे में हमारे समय के महत्त्वपूर्ण आलोचक (रविभूषण) अपनी बात रखते हुए कल कह रहे थे कि 1944 से हमें अपना समय मानना चाहिए। उस साल एक किताब आयी थी- रोड टू सर्फडम; वहां से एक नए ऐतिहासिक युग ‘बाजारवाद की केंद्रीयता’ की शुरुआत होती है और उसको एक विभाजक रेखा माननी चाहिए। चूंकि वे अध्यक्ष हैं, इसलिए मैं क्षमा मांगते हुए कहना चाहता हूं कि यह काल निर्धारण की हेगेलियन पद्धति है, जहां विचार की प्रमुखता से इतिहास का मूल्यांकन किया जाता है। अब 1944 में किताब आयी और वहां से नए समय की शुरुआत हो तब तो उदारतावाद की शुरुआत लास्की आदि से ही हो जाएगी। अगर इतिहास विचारों की क्रमबद्धता, गत्यात्मकता और द्वन्द्वात्मकता में निहित है तो यह हेगेलियन पद्धति है। 44 में शेखर एक जीवनी का दूसरा खण्ड आता है। प्रयोगवाद, तारसप्तक ऐसी बहुत सारी चर्चाएं शुरु होती हैं। उनमें से किसको अपने समय का आधार बनाया जाए यह एक प्रश्न है। दूसरा प्रश्न, क्या अर्थशास्त्र के अनुशासन से चलकर साहित्य के लिए काल निर्धारण सम्भव है? अगर अर्थशास्त्र से इतिहास में परिवर्तन के चरणों को समझना है तो प्रभात पटनायक इसके लिए ज्यादा मुफीद होंगे। साहित्य के आलोचक के लिए ये प्रश्न महत्त्वपूर्ण क्यों हैं और फिर इतिहास निर्माण की जो वास्तविक शक्तियां हैं, जिनके प्रति हम अपनी प्रतिबद्धता भी व्यक्त करते हैं, वे इतिहास के निर्धारक बिंदु होंगे या कोई शिकागो स्कूल निर्धारक बिंदु होगा! कहने का तात्पर्य यह कि जैसे हमारा नया समय हमारी परिस्थितियों के अनुरूप भारतीय कम्युनिस्ट आंदोलन का भी एक नया समय था और वह नक्सलबाड़ी के आंदोलन से शुरु होता है तो इसे भी कोई कह सकता है कि यह हमारा अपना समय है। दृष्टि भेद का अंतर है। बहरहाल, सवाल है- आज का समय से मतलब क्या है? क्या आज की कहानी और कथा आलोचना का समय आज का समय है! और यदि यह सवाल है तो सवाल फिर रचना-प्रक्रिया का होगा अर्थात् प्रश्न आज के कलाकार की रचना-प्रक्रिया का है। यहां रचना-प्रक्रिया से तात्पर्य आज की कहानी की रचना-प्रक्रिया से है। सीधे शब्दों में कहें तो हत्यारे की रचना-प्रक्रिया हम सरीखों के लिए क्यों महत्त्वपूर्ण है। कहानीकार की तरफ से भी, पाठक की तरफ से भी और (ध्यातव्य है कि) आलोचक भी सबसे पहले एक पाठक ही होता है। इस रचना-प्रक्रिया को प्रारम्भिक रूप से आलोचक पाठक की ही हैसियत से समझेगा. कथाकार की तरफ से यह प्रक्रिया थोड़ी भिन्न होगी। इस भिन्नता की प्राथमिक पहचान कथाकार को होगी। लेकिन शीघ्र ही आलोचक पाठक की हैसियत से तटस्थ होगा और कथाकार लेखक की हैसियत से। यह तटस्थता कथाकार और आलोचक दोनों को कहानी के एक वस्तुनिष्ठ आकलन और मूल्यांकन की ओर प्रेरित करेगा। आकलन और मूल्यांकन के इसी क्रम में हत्यारे कहानी और आज के समय के जटिल अंतरसंबंधों की पहचान हम लोग शायद कर पाएं।

बहरहाल, कहानी पाठ की जो सबसे आम पद्धति है- वह समाजशास्त्रीय पद्धति है। जिसमें आप रचना से समाज, समाज से रचना में बराबर आवाजाही करते हैं और यह अच्छी बात भी है। कहानी के ‘आडियन्स’ की भिन्नता से इस तरह की समझ को विकसित करने का और इस समझ के चलते आडियन्स को, पाठक को विकसित करने की प्रक्रिया चलनी चाहिए। जैसे, सन् ’62 में अमरकांत की कहानी ‘हत्यारे’ आती है। यह नेहरू युग के अवसान और उसके मोह भंग का संधिकाल है और अगर हम ध्यान दें तो यह नई कहानी और अकहानी के संधिकाल की भी कहानी है और इस लिहाज खुद यह कहानी अमरकांत की कहानी यात्रा में एक ‘ब्रेक’ की तरह है। दो नायक हैं या खलनायक हैं। खलनायकत्व नायकत्व प्राप्त कर रहा है। दोनों नायकों को यदि गौर से देखें तो एक गोरा है, ऊंचा है। दूसरा सांवला है, ठिगना है। दोनों एक ही तरह की वेशभूषा में इलाहाबाद विश्वविद्यालय के आस-पास किसी बाजार में टहल रहे होते हैं और उनकी बातचीत जब शुरु होती है तो ठेठ लहज़े में, ‘हलो, सन!..इतना लेट क्यों, बेटे?’ इस तरह की एक बातचीत शुरू होती है। हमारे विमर्शों का जो दबाव है उसकी तरफ से अगर हम इस कहानी में एक संभावना की बात करें तो जो सांवला है वह भिन्न वर्ग का है, कहानी की संभावना है क्योंकि कहानी में कहीं-कहीं स्टेटमेंट्स (बयान) भी ऐसे आते हैं कि ‘तुमको सेक्रेटेरियट का भंगी बनाऊंगा!’ गोरा गुरु है। सांवला चेला है। गुरु उसको शिक्षित करता है। ठीक उसी प्रक्रिया में जैसे घीसू माधव को शिक्षित करता है. हत्यारे कहानी में जब गिलास में दोनों शराब बांटते हैं तो सांवला चुपके से अपनी शराब गोरे के गिलास में डाल देता है। (इस पर गोरा कहता है) ‘लेकिन जब तुम इतनी पी नहीं सकते तो अवसर आने पर घूस कैसे लोगे. जालसाजी कैसे करोगे, झूठ कैसे बोलोगे? फिर देश की सेवा क्या करोगे, खाक!’ सांवला अभी सीख रहा है। औरत के पास जाना अभी तक सीखा नहीं है. और फिर गोरा कहता है, ‘आज तो कुछ रचनात्मक कार्य होना चाहिए!’ तो रचनात्मक लीडरशिप क्या है? रिक्शा मजदूरों की बस्ती की तरफ चलता है। बस्ती के शुरु में ही पान की छोटी सी दुकान है। जिस पर पान-सिगरेट तो मिलती ही है रोजमर्रा की और सारी चीजें भी मिलती हैं, और वे दोनों मजदूरों की बस्ती आरम्भ होते ही जो पहली झोपड़ी है उसमें  घुस जाते हैं। एक महिला चूल्हे पर खाना बना रही होती है। उसके देखते ही गोरा मुस्कुराकर बोला, ‘ये विश्व लोफर संघ के अध्यक्ष हैं। इनको हर तरह से तुम्हें खुश करना है.’ दोनों औरत के साथ सम्बन्ध बनाते हैं। पैसा नहीं देते हैं और जब औरत कहती है, ‘लाइए मैं (पैसे का खुदरा करवा कर) ले आती हूं.’ तो गोरा बोलता है, ‘तुम तो पूंजीपति हो! तुमको किस बात की कमी है।…अरे, तुम देश की महान कार्यकत्री हो, तुम कहाँ कष्ट करोगी?’ और आगे बढ़ता है कहता है, ‘साले जूते निकालकर हाथ में लेलो! सांवला बोला ‘क्यों?’…(गोरा कहता है) ‘भाग साले! आर्थिक और सामाजिक क्रांति करने का समय आ गया है!’ दोनों भागना शुरु करते हैं। औरत बाहर निकल कर कहती है- ‘अरे, लूट लिया हरामी के बच्चों ने!’ मजदूरों की बस्ती से कुछ लोग उसके पीछे दौड़ पड़ते हैं। दोनों अरबी घोड़े की तरह सरपट भागे जा रहे हैं। कभी बाएं घूम जाते हैं। कभी दाएं घूम जाते हैं। इतने में मजदूरों का एक लड़का फुर्ती से सांवले की तरफ तीर की तरह बढ़ता चला जाता है और लगता है उसको पकड़ ही लेगा। ऐसे में गुरु गोरा रुक जाता है। जेब से चाकू निकालकर खोल लेता है और पीछा करते हुए आ रहे मजदूर के पेट में घोंप देता है और फिर भाग जाता है। कोलतारी सड़क पर आगे की स्ट्रीट लाइट में दोनों के सुंदर और पुष्ट शरीर पर पसीने की बूंदें छरछरा रही हैं; यह युद्ध का सिम्बल है ‘सिम्बलाइजेशन ऑफ पॉवर’ है, और वे फिर न जाने कहां अंधेरे में गुम हो जाते हैं. यह पूरी कहानी है। ध्यान दें कि जो नेहरूवियन आदर्शवाद है उसकी खोल के भीतर से जो फासिज्म पैदा हो रहा है यूथ के बीच में, वह उसी आदर्श की भाषा में ही पैदा हो रहा है. फासिज्म के साथ दिक्कत यही है, उसको आना तो हमारी ही भाषा में पड़ेगा। सामाजिक, आर्थिक क्रांति की भाषा में, लेकिन वो रूपवाद है। उसका यथार्थ फासिज्म है। आदर्श के उस रूपवाद का यथार्थ फासीवाद है और इसी फासीवादी टेन्डेन्सी की कहानी ‘हत्यारे’ है। और यह फासीवादी टेन्डेन्सी यूथ में व्याप्त हो रही है, जबकि हमारा देश सबसे नौजवान है, मोदी युवाओं को लेकर बड़े प्रसन्नचित हैं; एक युवा देश के भीतर, खुद युवा वर्ग के भीतर तरह-तरह के विभाजन हैं। इसको अगर ध्यान में न रखा जाएगा तो दिक्कत की बात होगी और अमरकांत की खासियत यही है। उनकी चिंता हमेशा ही परिवर्तनकारी शक्तियों के पहचान में आने वाले संकट को कहानी में रखने की है। बहरहाल, चूंकि मजदूरों की बस्ती में जा करके वह हत्या करता है। इसलिए वहां जा कर कहानी एलीगरी में बदलती है और यह मूल्य-निर्णय शामिल होता है कि फासीवादी चरित्र हमेशा ही वर्किंग क्लास (मजदूर वर्ग) के विरोध में होगा।

 बहरहाल, ये तो कहानी का एक सिंपल पाठ है। लेकिन क्या इसीलिए हत्यारे कहानी हमारे लिए महत्त्वपूर्ण है। फासीवाद के इस नए दौर के चरित्र के बारे में, उपभोक्ता समाज के बनने की प्रक्रिया के बारे में, बहुत सारी बातें इस कहानी को पढ़े बिना ही हम समझ भी रहे थे। क्या जरूरत थी कि इसको पढ़ा जाए! एक सचेत बुद्धिजीवी, एक एक्टीविस्ट जो सचमुच में परिवर्तन लाना चाहता है। जो परिवर्तन चाहता है। यथार्थ में परिवर्तन की गति को पहचानना चाहता है। उनके लिए केवल  कहानी का सामान्य पाठ ही होगा तो यह महत्त्वपूर्ण नहीं होगा।

यहाँ मैं संक्षेप में हिंदी के चार आलोचकों की चर्चा करना चाहूंगा, जिन्होंने ‘हत्यारे’ कहानी के बारे में लिखा है या अमरकांत के बारे में लिखा है। विश्वनाथ त्रिपाठी समाजशास्त्रीय, राजनीति के अपराधीकरण से लेकर अपराध के राजनीतीकरण और स्टूडेन्ट पॉलिटिक्स की वह पूरी प्रक्रिया जो जेपी मूवमेंट के भीतर से निकली है उसके ‘रिप्रजेन्टेशन’ के बतौर हत्यारे कहानी की अच्छी व्याख्या करते हैं। लेकिन वह एक सवाल उठाते हैं कि अमरकांत के पात्र कहीं भी संघर्ष क्यों नहीं करते हैं? अगर समाज में संघर्ष है तो अमरकांत के पात्र संघर्ष करते हुए क्यों नहीं दिखते। अजीब बात यह है कि ठीक यही आलोचना राजेन्द्र यादव भी अमरकांत के बारे में करते हैं कि अमरकांत की कहानी का कोई भी पात्र संघर्ष नहीं करता है। वहां आस्तित्व की समस्या महत्त्वपूर्ण है, आस्था का प्रश्न महत्त्वपूर्ण नहीं है। लेखकीय आस्था एक ओढ़ी हुई चीज है. मनुष्य के अस्तित्व की लड़ाई ज्यादा महत्त्वपूर्ण है और इसलिए अमरकांत अस्तित्ववादी कथाकार हैं। अब विश्वनाथ त्रिपाठी तो यह नहीं कहेंगे कि वे अस्तित्ववादी कथाकार हैं लेकिन हाँ, यह कहेंगे कि संघर्ष करता हुआ पात्र नहीं दिखता है। संघर्ष करते हुए पात्रों को दिखाना चाहिए। समाजवादी यथार्थवादी की जो अपेक्षा है वह अमरकांत के ऊपर विश्वनाथ त्रिपाठी की तरफ से (लागू की जाती है) और राजेन्द्र यादव हत्यारे को अस्तित्ववाद की कहानी मान लेते हैं। ‘हत्यारे’ नाम से सार्त्र की भी एक कहानी है और अगर समय हो तो संक्षेप में सार्त्र की ‘हत्यारे’ कहानी के अस्तित्ववाद का अमरकांत से क्या अंतर है इसे मैं देखना चाहूंगा और वह अंतर अपने अंतिम रूप में किसका अंतर होगा। बहरहाल, द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद का समय है। ब्रिटेन की एक कोर्ट में एक ऐसे केस की सुनवाई होनी है, जिसका जीतना तय है और वह बात यह है कि एक टी.बी. का डाक्टर है। एक दिन उसके पास बहुत अमीर आदमी आता है। लेकिन वह टी.बी. से बुरी तरह ग्रस्त है। बहुत बूढ़ा हो गया है। चल-फिर नहीं पा रहा है। दोनों फेफड़े उसके खराब हो चुके हैं और वह डाक्टर के पास बैठता है। डॉक्टर कहता है अब कोई उपाय नहीं है। तो मरीज बहुत विनती करता है। डॉक्टर कहता है, लगता है बड़े पैसे वाले हो। मरीज स्वीकार करता है तो डाक्टर उसे सलाह देता है कि तुम आज से कुछ खाओ-पीओ मत और अब सिर्फ पानी का सेवन करो और दूर कहीं चले जाओ। छः महीने गुजर जाते हैं। एक दिन अचानक वह आदमी हट्टा-कट्टा, सूटेड-बूटेड डॉक्टर के क्लीनिक में प्रवेश करता है। डॉक्टर पहचान नहीं पाता है। तब मरीज पूरी बात डॉक्टर को फिर से बताता है और डॉक्टर को बहुत सारा पैसा देने की बात कहता है। डॉक्टर चिंतित हो जाता है। वह मेज की दराज में रिवाल्वर निकाल कर अमीर आदमी को गोली मार देता है और उसका फेफड़ा निकाल कर टेबल रख कर पर निरीक्षण करने लगता है और कहता है कि इससे मनुष्य का विज्ञान पर से विश्वास ही उठ जाएगा। इसलिए मनुष्य समाज के कल्याण में उसकी हत्या कर देनी पड़ी और यह केस कोर्ट में गया है और लोग मान रहे हैं कि डॉक्टर जीत जाएगा। यह अस्तित्ववाद की कहानी है। अस्तित्व की समस्या का जो दर्शन फैलाया गया, इतिहास मुक्त व्यक्ति के स्वतंत्र अस्तित्व का प्रश्न, वह सार्त्र की कहानी में है। अमरकांत की कहानी में वह नहीं है।

यहां अमरकांत की कहानी के संदर्भ में संक्षेप में सुरेंद्र चौधरी और नामवर सिंह के पाठों के अंतर के बारे में एक बात करना चाहूंगा। सुरेंद्र चौधरी ने कहा कि हत्यारे कहानी में हत्या नहीं हुई होती तो यह बहुत महत्त्वपूर्ण कहानी होती। क्यों? क्योंकि हत्या वहां अतिनाटकीयता का प्रयोग मात्र है. जिससे कहानी में एक मादक भंगिका तो पैदा हुई है लेकिन वह कुछ कहानी में नया नहीं जोड़ती है और यह अच्छा हुआ कि अमरकांत ने आगे ऐसा प्रयोग नहीं किया। उन्होंने कहा जो परिवर्तनकारी प्रक्रिया है उसमें जो प्रच्छन्न खतरे छुपे हुए हैं वह अमरकांत की कहानी में ज्यादा बेहतर आता अगर वह हत्या नहीं हुई होती। यानि एक नपुंसक, बड़बोली, ऐय्याश युवा पीढ़ी का ज्यादा सही चित्रण हुआ होता अगर ये हत्या नहीं हुई होती। नामवर सिंह ने कहा अगर इस कहानी में हत्या नहीं हुई होती तो यह कहानी इतनी महत्त्वपूर्ण नहीं होती। उन्होंने कहा कि कहानी में हत्यारे के द्वारा की गई हत्या कहानीकार का या रचना का मूल्य-निर्णय है। एक वैल्यू जजमेंट है। अगर रचना की प्रक्रिया में यह वैल्यू जजमेंट (मूल्य-निर्णय) नहीं है, यह मैं अपनी भाषा में बोल रहा हूं एक इंटरव्यू में नामवर सिंह ने चलते हुए यह बात कही थी, तो रचना जो फासिस्ट टेन्डेन्सी दिखाना चाह रही है, जो आज एक अजीब तरह की प्रवृत्ति पैदा हो रही है ,उसे दिखाया नहीं जा सकता. युवाओं के आदर्श का अतीत में स्वतंत्रता आंदोलन का एक पूरा दौर है. पर वह आदर्श दूसरे थे। यह आदर्श दूसरे हैं। इन आदर्शों के रेहटारिक में जो कंटेंट है उसके प्रति मूल्य-निर्णय कीजिएगा कि नहीं यह एक रचना-प्रक्रिया का सवाल है। सुरेंद्र चौधरी के लिए कहानी में हत्या कहानी को अतिनाटकीय बना देती है, दूसरी ओर नामवर सिंह के लिए महत्त्वपूर्ण। दो मार्क्सवादी ओलोचकों की दृष्टि में यह भेद क्यों है? क्या यह यथार्थवाद की दो भिन्न दृष्टियां हैं? क्या यथार्थवाद बीसवीं सदी के साथ गुजरी हुई बात हो गई है! इसका हम सरीखों के लिए क्या कोई महत्त्व नहीं है? यह हमारे लिए भिन्न चर्चा का बिंदु है। यहां मैं अभी तफ्सील नहीं करना चाहूंगा, वक्त कम है। परंतु हमारे समय के एक प्रमुख चिंतक फ्रेडरिक जेम्सन के लिए यह बीती बात नहीं है। इसी साल उनकी एक पूरी किताब यथार्थवाद पर आयी है। यह किताब यथार्थवाद के साथ एक प्रयोग के लिए आमंत्रित करती है और खुद यथार्थवाद के भीतर विकसित होती आयी विरोधी प्रविधियों के द्वन्द्वात्मक चिंतन को विकसित करने का प्रयास करती है। मैं अंग्रेजी में जेम्सन को थोड़ा पढ़ना चाहूंगा अगर आप चाहें तो.

बीसवीं सदीं के इतिहास की आंतरिकता को कैसे समझा जाए इसी क्रम में जेम्सन लिखते हैं, ‘My experiment here claims to come at realism dialectically, not only by taking as its object of study the very antinomies themselves into which every constitution of this or that realism seems to resolve: but above all by grasping realism as a historical and even evolutionary process in which the negative and the positive are inextricably combined, and whose emergence and development at one and the same time constitute its own inevitable undoing, its own decay and dissolution. The stronger it gets, the weaker it gets; winner loses; its success is its failure. And this is meant, not in the spirit of the life cycle (“ripeness is all”), or of evolution or of entropy or historical rises and falls: it is to be grasped as a paradox and an anomaly, and the thinking of it as a contradiction or an aporia. Yet as Derrida observed, the aporia is not so much “an absence of path, a paralysis before roadblocks” so much as the promise of “the thinking of the path.” For me, however, aporetic thinking is precisely the dialectic itself; and the following exercise will therefore be for better or for worse a dialectical experiment.’

(मेरा प्रयोग यथार्थवाद तक द्वंद्वात्मक तरीके से पहुँचने का है. यह प्रयोग यथार्थवाद के इस या उस विरोधाभासी युग्मों के अध्ययन तक ही अपने को सीमित नहीं करता है, वरन् यथार्थवाद को एक ऐतिहासिक और विकासमान प्रक्रिया के रूप में देखने का हिमायती है. इस प्रक्रिया में यथार्थवाद के नकारात्मक और सकारात्मक पक्ष साथ-साथ अंतर्गुम्फित रहते आये हैं। अपने उदय और विकास की इस प्रक्रिया में ही वह अपना क्षय और अपनी मृत्यु भी रचता चलता है। ज्यों-ज्यों वह मजबूत होता है त्यों-त्यों वह कमज़ोर होता चलता है। विजेता पराजित हो जाता है। इसकी जीत में ही इसकी हार शामिल है। जीवन-चक्र के अर्थ में नहीं, उद्विकास के अर्थ में नहीं, किसी एन्ट्रापी के अर्थ में नहीं न ही किसी ऐतिहासिक उत्थान पतन की दास्तान के अर्थ में. बल्कि एक विरोधाभास की तरह अंतर्विरोध के अर्थ में इसे सोचने का प्रयोग. एक द्वंद्वात्मक प्रयोग।)

इस विचारोत्तेजक प्रयोग में हम सब यदि शामिल हों तो हमारी कहानी आलोचना के लिए और शायद उनके लिए भी अच्छा होगा जो आज यथार्थवाद के पीछे डण्डा लिए दौड़ रहे हैं। जी, मेरा इशारा हिंदी कहानी के पिछले 25 सालों के विकास पर बात करने वाले आलोचना के कुछ नए राजकुमारों की तरफ भी है। बहरहाल, यह कहानी फिर कभी।

हत्यारे कहानी में जो मूल्य-निर्णय है वह हत्या की घटना में है। जरूरी नहीं कि हर कहानी में यह मूल्य-निर्णय आये ही। लेखकीय मूल्य-निर्णय कोई अनिवार्यता नहीं है। परंतु अपराध की इस मनोवृत्ति के बारे में, इस फासीवादी प्रवृत्ति के बारे में अगर कहानी के भीतर उसके मजदूर वर्ग का विरोधी होने का निर्णय नहीं होता तो यह कहानी इतनी मूल्यवान नहीं होती। वह पेटी बुर्जुआ की जो एक खास प्रवृत्ति है- नपुंसक, बड़बोली, ऐय्याश युवा पीढ़ी का चरित्र-चित्रण मात्र बन कर रह जाती। ऐसे चरित्रों के भावी विकास का, गहरे खलनायकत्व का उद्घाटन वहां नहीं हो पाता। यह पीड़ा भरी प्रतीक्षा के प्रतिक्रियावादी रूपांतरण की कहानी है। विद्रूप विडंबनाओं के नायक घीसू और माधव लुम्पेन सर्वहारा हैं और हत्यारे कहानी के नायक या खलनायक, यदि कहने की अनुमति दें, तो लुम्पेन पेटी बुर्जुआ हैं। कहानी के भीतर का यह मूल्य-निर्णय दरअसल रचना-प्रक्रिया का एक अहम हिस्सा है।

 हमारे आज के कथालोचक यह दावा कर रहे हैं कि जन-जीवन में जब कोई यूनिंगफाइंग फैक्टर नहीं है तो कहानी के भीतर वह कहां से होगा। किसी यूनिंगफाइंग फैक्टर के बिना कहानी की रचना-प्रक्रिया में कोई मूल्य-निर्णय तो आ ही नहीं सकता। फिर क्या किया जाए! यूनीफाइंग फैक्टर मतलब -विश्वदृष्टि या जीवन दृष्टि। लेकिन यथार्थ के असम्बद्ध होने की चर्चा पहली बार तो नहीं हो रही है। और हम अपने अनुभव से जानते हैं कि समाज के संक्रमण काल में हमेशा ही ऐसी बातें होती रही हैं। ऐसी बातों में हमारे समय के एक प्रमुख चरित्र की ईमानदार स्वीकारोक्ति भी होती है। याद करें कि आधुनिकतावाद की धारा के एक आदि नायक टी.एस. इलियट ‘डीसोसिएशन ऑफ सेंसबिलटी’ की चर्चा किया करते थे। पिछले 20-25 सालों के तीव्र परिवर्तन ने हमारी संवेदनाओं में एक असम्बद्धता तो पैदा की ही है। जैसे इलियट के समय में भी हुई थी। आज हम तेजी से उपभोक्तावादी समाज में बदलते जा रहे हैं। हमारी पिछली पीढ़ी के महान सिनेमाकार और राजनीतिक कार्यकर्ता पियरे पाउलो पासोलिनी ने फासीवाद के नए स्वरूप को उपभोक्तावाद में बदलते देखा था। देख लिया था, इसलिए उनकी हत्या कर दी गई. और फासीवाद के इस आसन्न संकट के काल में पुराने और नए के संधिकाल में हमारी भी चेतना आक्रांत है. इसलिए मानव विरोधी विचारधाराओं के द्वारा चेतना पर छायी इस धुंध को और अधिक मिस्टीफाई (रहस्यात्मक) करने का षडयंत्र रचा जा रहा है। खण्ड-खण्ड पाखण्ड की दृष्टि एक ऐसी ही मानव विरोधी विचारधारा है। ताज्जुब नहीं, इस विचारधारा का पहला हमला यथार्थवाद पर है। ऐसा क्यूं है कि मानव विरोधी विचारधाराओं का पहला हमला समय-समय पर यथार्थवाद के खिलाफ होता है! क्योंकि यथार्थवाद और चाहे जो हो उसके मूल में है मानव-विरोधी मिस्टीफिकेशन को, उसके धुंध को साफ कर देना। डी-मिस्टीफिकेशन यथार्थवाद की एक प्राथमिक शर्त है। जहां से बुर्जुआ सोसायटी के लिए अपने-आप यह शैली खतरनाक सिद्ध हुई है। बहरहाल, उसके अलग-अलग ट्रेडीशन हैं, अंग्रेजी ट्रेडीशन, फ्रेंच ट्रेडीशन खैर! लेकिन सीधे डी-मिस्टीफिकेशन एक महत्त्वपूर्ण काम है। मूल्य-निर्णय का सम्बन्ध क्या इस डी-मिस्टीफिकेशन से है? डी-मिस्टीफिकेशन की यह प्रक्रिया बदलाव की नई ताकतों के प्रति रचना-प्रक्रिया में मूल्यबोध की तरह आती है। लेखक की प्राथमिक संवेदना से लेकर पाठ की प्रक्रिया तक इसका निरंतर विकास होता है। ब्रेख्त के लिए रचना-प्रक्रिया के साथ चलने वाला यह डी-मिस्टीफिकेशन एक क्रियावान, उत्कंठापूर्ण और प्रयोगात्मक भी है. या दुसरे शब्दों में कहें तो सामाजिक संस्थाओं और भौतिक दुनिया के प्रति वैज्ञानिक दृष्टि का उन्मेष है। यथार्थवाद इसी वैज्ञानिक दृष्टि को प्रोत्साहित करता है, प्रयोग के स्तर पर भी। और यह प्रक्रिया त्रिस्तरीय है। पहली, रचना में पात्रों और उसकी काल्पनिक दुनिया के बीच। दूसरी, रचना और पाठक के बीच। तीसरी, रचना-रचनाकार का अपने कच्चे माल और टेक्निक के बीच। यथार्थवाद का यह त्रिआयामी व्यवहार (प्रैक्सिस) परंपरागत अनुकरणों और उनके शुद्ध प्रतिनिधिमूलक केटेगरी को ध्वस्त कर देता है. जिसके प्रभाव में आजकल का अधिकांश दलित लेखन है। फिर बकौल जेम्सन ‘रीडिंग इज ए सिम्बोलिक एक्ट’। इस ‘सिम्बोलिक एक्ट’ के प्रति सजग होना, आत्म सजग होना जरूरी है। यह सजगता एक सचेतन क्रिया है। इस क्रिया में अपने राजनीतिक अवचेतन की संरचना के प्रति सजगता भी शामिल है। दिक्कत यह है कि क्या हमारा लेखन और हमारी आलोचना खुद आत्म सजग है! ‘हत्यारे’ कहानी का पाठ आज के समय में यही चुनौती हमारे समक्ष रखता है। बात सिर्फ रचना के क्लास मोटिफ को उद्घाटित करने या अलग-अलग विमर्शों के  लिहाज से उसकी व्याख्या का नहीं है . अर्थात् रचना के बाहर की दुनिया का प्रतिबिम्ब और उसकी व्याख्या का नहीं है। बल्कि रचना की विकासमान सम्पूर्णता का है। इसीलिए उसकी हिस्टोरीसिटी का है। विषय से विचार तक की यात्रा का खतरा दरअसल हिस्टोरीसिटी के अन्वेषण का खतरा है। अमरकांत की कहानी में यह हिस्टोरीसिटी उसके मूल्य-निर्णय की प्रक्रिया में आयी है। यह हिस्टोरीसिटी न केवल समकालीनता का यूनीफाइंग फैक्टर है वरन् हमारे और रचना के कालांतर का भी एक यूनीफाइंग फैक्टर है। यह रचना से पाठक तक लगातार जारी है. इस अर्थ में यह हिस्टोरीसिटी विद्आउट हिस्ट्री है .और इसी अर्थ में यह वर्तमान की वर्तमानता है। इसी अर्थ में हत्यारे कहानी खुद अमरकांत की कहानी-कला की आलोचना है। उसमें एक ब्रेक है. अमरकांत के कहानी संसार में एक घटना की तरह। हत्यारे कहानी का अंत कुछ इस तरह होता है, ‘झोपड़ियों से कुछ व्यक्ति निकलकर युवकों के पीछे दौड़े। तारकोल की सड़कें जन-शून्य थी। दोनों युवक अरबी घोड़ों की तरह दौड़ रहे थे। वे कभी बाएं घूम जाते, कभी दाएं। पीछा करने वालों में एक फुर्तीबाज व्यक्ति तीर की तरह उनकी ओर बढ़ रहा था।…जो व्यक्ति ‘हाय मार डाला’ कहके लड़खड़ा कर गिर पड़ा। इसके बाद दोनों पुनः तेजी से भाग चले। तब बिजली का खम्भा आया तो रोशनी में उनके पसीने से लथपथ ताकतवर शरीर बहुत सुंदर दिखाई देने लगे। फिर वे न मालूम किधर अंधेरे में खो गए!’ जिस अंधेरे में दोनों न जाने कहां गुम हो गए यह वही अंधेरा है जो मुक्तिबोध के ‘अंधेरे में’ है। जहां वे डोमा जी उस्ताद को देख लेते हैं। हम अपने अंधेरे में क्या देख रहे हैं! यह क्या हमारे मूल्य-निर्णय से तय नहीं होता!

दो अवांतर प्रसंग छोटे-छोटे- एक, हमारा एक कलाकार मित्र अनुपम मूवमेंट में पेंटिंग्स करता है। उसकी एक समस्या है। हालांकि यह कहानी के बाहर का प्रसंग है लेकिन कला का महत्त्वपूर्ण प्रश्न है और यथार्थवाद का भी एक महत्त्वपूर्ण प्रश्न है। वह कहता है कि हम जिस शैली में अब तक पेंटिंग्स बनाते आए हैं अब यथार्थ उसी शैली में बद्ध होकर हमारे सामने आ रहा है। याद कीजिए मुक्तिबोध की भी यही समस्या थी। वह कहता है कि मैं अपने ही शिल्प में बंधने के चलते यथार्थ को नहीं देख पा रहा हूं- यह जो परिवर्तनशील यथार्थ है। वह अपना एक अनुभव बताता है कि वह एक बार एक स्त्री के जीवन की किसी परिस्थिति पर बड़े भावावेग से एक चित्र बना रहा होता है। पेंटिंग्स पूर्ण नहीं हो पा रही है। वह परेशान है। अचानक इस परेशानी में वह अपना शरीर काटकर खून से पेंटिंग का एक हिस्सा बना देता है और अपने बाल नोचकर पेंटिंग्स में जहां-तहां चिपका देता है और कहता है कि मुझे बहुत शांति मिली है। कलाकार रचना में अपने बॉडीली प्रजेन्स (शरीरी उपस्थिति) को खोजना चाह रहा है। पेंटर पेंटिंग्स में अपनी उपस्थिति खोजने की कोशिश में है। यह बॉडली प्रजेन्स का क्राइसिस कला का एक वास्तविक अनुभव तो है, लेकिन यह मिसप्लेस्ड क्वेश्चन है। यह प्राब्लम मिसप्लेस्ड है क्योंकि पॉलिटिक्स में जैसे वह अपनी प्रजेन्स को आंदोलन के भीतर देख रहा है; रचना, जो प्रोटेस्ट के भीतर से निकलने वाली रचना है इसलिए महत्त्वपूर्ण भी है, के भीतर भी अपना बॉडली प्रजेन्स ढूंढ़ रहा है। राजनीति की दुनिया का कला की दुनिया से जो सम्बन्ध होगा, वह क्या होगा? क्या रचना-प्रक्रिया में जिसको मुक्तिबोध कहते हैं, जब तक तटस्थता नहीं होगी तब तक तदाकारिता सम्भव नहीं है। प्रश्न वहां अटैच होकर के बॉडली प्रजेन्स का, स्वानुभूति का नहीं है प्रश्न डिटैचमेंट का है। यह डिटैचमेंट लग सकता है कि कोई आधुनिकवादी तर्क हो, उपभोक्तावादी सर्जक मन का। खैर, इस पर चर्चा कहीं और।

दूसरा प्रसंग, नामवर सिंह ने हाल-फिलहाल पप्पू यादव की किताब का लोकार्पण किया। पप्पू यादव हत्यारे कहानी के नायक भी हैं। प्रश्न है, उन्होंने हत्यारे कहानी के बारे में कहा कि वहां मूल्य-निर्णय महत्त्वपूर्ण है. यह बात तो सही है कि दुनिया भर में अपराधियों की डायरियां आदि काफी लोकप्रिय हुई है;  उस पर विचार करना एक अलग बात है. लेकिन उसकी किताब का लोकार्पण करना एक राजनीतिक काम है। इसमें आपका मूल्य-निर्णय होगा कि नहीं! यानि रचना और आलोचना के प्रश्न जीवन के प्रश्न होंगे कि नहीं! यह एक महत्त्वपूर्ण सवाल है। शायद इसी अर्थ में प्रेमचंद कहते थे कि हर कोई चाहता है कि मेरा जीवन एक कहानी बन जाए।

मार्तण्ड प्रगल्भ

मार्तण्ड प्रगल्भ

छात्र राजनीति और संस्कृति-कर्म में व्यस्त रहने वाले मार्तण्ड प्रगल्भ जे.एन.यू. के भारतीय भाषा केंद्र में पी.एच.डी. के लिए शोधरत  हैं। उनसे mpragalbha1@gmail.com पर संपर्क संभव है

(जन संस्कृति मंच के कथा समूह के प्रथम आयोजन ‘कथा मंच’ के तृतीय सत्र में कथाकार मार्तण्ड द्वारा ‘अमरकांत की कहानी हत्यारे और आज का समय’ पर इलाहाबाद में दिनांक 22 दिसंबर, 2013 को प्रस्तुत व्याख्यान। लिप्यावतरण- श्रीकांत पाण्डेय।)

सुरेन्द्र चौधरी- विराट ऐतिहासिक संदर्भों से समृद्ध आलोचक: मार्तंड प्रगल्भ

सच्ची आलोचना किस कदर गंभीर वैचारिक संघर्ष का परिणाम होती है इसे सुरेन्द्र चौधरी के लेखन में स्पष्ट ही देखा जा सकता है। रचना के प्रति  जिस संवेदनशीलता की जरूरत होती है और असहमति के क्षणों में भी आलोचना की भाषा में  जो विनम्रता होनी चाहिए इसे भी इनके यहाँ देखा जा सकता है। सुरेन्द्र चौधरी पर बहस एक ऐतिहासिक ज़रुरत है। ज़रुरत है हिंदी की प्रगतिशील आलोचना की एक दूसरी परम्परा से संवाद की। बौद्धिक समाज क्या इसके लिए तैयार है? विचारहीनता और तात्कालिकता के दबाव के बीच हिंदी आलोचना की समृद्ध प्रगतिशील परंपरा क्या सुरेन्द्र चौधरी से संवाद नहीं करेगी? ऐतिह्यता का प्रश्न सुरेन्द्र चौधरी के लेखन का मूल प्रश्न है। इसलिए समकालीनता और तात्कालिकता से उनकी मुठभेड़ ही उनकी आलोचना बनाती चलती है। यह अकारण नहीं कि इतिहास के प्रश्नों से उलझने वाला यह आलोचक साहित्य के आख्यान रूपों पर अपनी विशेष दृष्टि रखता है। पर कविता के संबंद्ध में उनका छिटपुट लेखन किसी भी बड़े काव्य आलोचक के लिए इर्ष्या का कारण बन सकते है।  बहरहाल। 

BY मार्तंड प्रगल्भ 

सबसे पहले डॉ॰ चौधरी की पुस्तक ‘इतिहास: संयोग और सार्थकता’ से उनके कुछ निष्कर्षों-स्थापनाओं को उद्धृत करना चाहता हूँ-

  •  ‘‘स्पष्ट है कि हिंदी साहित्य में आधुनिकता दो महायुद्धों के बीच उत्पन्न अवस्था नहीं है और न वह मात्र ‘मूल्यबोध और विराट विघटन’ के तनाव के बीच की उपलब्धि है। हिंदी में आधुनिकता की प्रतिष्ठा इस ‘विराट विघटन’ के नारे से लगभग 80-90 वर्ष पूर्व हो चुकी थी। हिंदी में आधुनिकता बोध का संस्कार आत्मचेता से अधिक वस्तुसत्य चेता है।’’ (पृ.219 खंड1) (ध्यान दें कि आधुनिकतावाद शब्द का इस्तेमाल न करते हुए भी, आधुनिकता, आधुनिकताबोध के अपने आशयों को यहां मिलाकर प्रयोग किया गया है। परंतु महायुद्धों की चर्चा से स्पष्ट है कि आधुनिकतावाद शब्द के अपने अर्थों में ही इसे पढ़ना चाहिए। इन शब्दों के अपने अर्थ पश्चिमी हैं परंतु डॉ॰ चौधरी भारतीय परिस्थितियों में इसे समझने की कोशिश कर रहे हैं।)
  •  ‘‘भारतीय परिस्थितियों में ‘उदारतावादी चेतना’ चूंकि रोमैंटिक दृष्टिविस्तार का परिणाम थी और बौद्धिक उद्बोध की परिणति थी इसलिए आधुनिक इतिहास में वह अपने ढंग की अकेली है। …भारत में आधुनिकता पश्चिमी राज्यसत्ता की क्रांतिकारी भूमिका से नहीं आई और न वह भारत में उनकी शैक्षणिक नीति से आई। वह भारतीय बुद्धिजीवी के उद्बोध से उत्पन्न हुई। …वस्तुतः भारत में आधुनिकता का उत्थापन अंग्रेजों की प्रत्यवस्थान शक्ति से भारतीय पूंजी के प्रतिरोध से होता है। इस अर्थ में भारतीय पूंजीपति की राष्टीय भूमिका अपने उत्थापन युग में क्रांतिकारी जनहितपरक, और राष्टीय स्वार्थ से अनिवार्यतः प्रेरित रही है। भारतेंदु युग का संपूर्ण साहित्य अपने जन चारित्र्य के व्याख्यान के द्वारा यह स्पष्ट करता है कि इस युग में भारतीय बुद्धिजीवी का स्वार्थ अविकल रूप से भारतीय जनता से जुड़ा हुआ था। इस काल का वर्गसंघर्ष चरित्रतः उपनिवेशविरोधी और आभिजात्यविरोधी है। यही कारण है कि संपूर्ण युग की विचार पद्धति में उपनिवेशविरोध और आभिजात्यविरोध की चिंतासरणि प्रधान है।’’ (पृ.219-20-21,खंड1)
  • ‘‘ऐसा लगता है कि ‘भाग्यवती’ के लेखक ने अकेले भाग्यवती से सारी भूमिकाएं संपन्न करवाने का व्रत ले लिया है, फिर भी इतना तो निश्चित है कि हिंदी उपन्यास साहित्य में भाग्यवती आधुनिक युग की यूलिसिस है।’’ (पृ.222, खंड1) (यूलिसिस और जेम्स ज्वाएस की अपनी पश्चिमी उपस्थिति और आयरलैंड की औपनिवेशित दासता जिस ढंग से अंतर्विरोधी साम्राज्यवादी चरित्र का क्रिटिक है, उसे भारतीय संदर्भों में भाग्यवती से तुलना करना एक प्रमुख वैचारिक प्रस्थान है। ‘माडर्निस्ट’ पेपर में संकलित फ्रेडरिक जेमसन के लेखों में इस आधुनिकतावाद के सहारे साम्राज्यवाद के चरित्र को समझने का प्रयास किया गया है।)
  • ‘‘उदारता की चेतना, मेरी छोटी धारणा के अनुसार, एक विशेष वर्ग की जीवन परिस्थितियों की द्वंद्वात्मकता की मांग है। यह वर्ग अपने प्रारंभिक उत्थापन के युग में निश्चित रूप से क्रियाशील, अथवा प्रगतिशील रहता है। भारतेंदु युग अपनी उदारचेता जीवन-विधा के कारण और विचार सरणि के कारण क्रियाशीलता और प्रगति का युग है। इस युग की सबसे बड़ी विशेषता इसका ‘आधुनिकता बोध’ नहीं है, बल्कि आधुनिकता की मांग को क्रियात्मक पूर्णता देने की तत्परता है। यह युग, जहां एक अभावात्मक परिस्थिति का निषेध करता है (निगेशन ऑफ निगेशन) वहीं इसका अंतर्विरोध सार्थक हो जाता है।’’ (पृ.223,खंड1)
  • ‘‘भारतेंदु युग की सारी परिस्थितियां रोमांटिक धारणा के अनुकूल होकर भी रोमैंटिक उद्बोध में असफल रहीं। इसका एकमात्र कारण राजनीतिक सत्ता का अंतर्विरोध था। भारत उस उत्थान विशेष में औपनिवेशिक व्यवस्था के रूप में परिणति ग्रहण कर रहा था, फलतः भारतीय बुद्धिजीवी उस अदम्य असीमित इच्छाशक्ति के बोध को व्यावहारिक परिणति देने में असमर्थ था। राजनीतिक  परतंत्रता ने भारत के प्रथम आत्मोद्बोध को व्यंग्यात्मक परिणति दे दी। किंतु यह राजनीतिक परतंत्रता देश की प्रथम जागृति को बहुत दिनों तक व्यंग्यात्मक दृष्टिकोण के घेरे में बंधे रहने तक विवश नहीं कर सकी। निर्विशेष राष्टीयता बनकर यह जागृति श्रीधर पाठक, राम नरेश त्रिपाठी और मैथिलीशरण गुप्त के साहित्य में उत्थापित हुई। हिंदी में छायावाद इसी निर्विशेष जागृति का परिणाम है। उसकी अवाचकता का यही रहस्य है। (पृ.226, खंड1)
  •  ‘‘कविता के आश्रय पक्ष की जितनी समृद्ध भक्ति काल के पश्चात छायावाद के उत्थान में देखी जा सकती है वह न इन दो कालों के अंतराल में संभव है और न उसके पश्चात ही। व्यक्ति की इच्छाशक्ति जितने विविध धरातलों पर छायावाद युग में बोध (रियलाइजेशन) ढूंढती है, उतनी किसी परवर्ती उत्थान में नहीं।’’ (पृ. 227, खंड1)
  •  ‘‘प्रसाद ने न केवल गुप्त युग की गाथाएं गाईं, बल्कि उस युग की कला, संस्कृति का दैवीकरण किया। उन्होंने भारतीय इतिहास की गति का अतीत की ओर मोड़ना चाहा…। प्रसाद शात्योब्रां की तरह स्वच्छंदतावाद की प्रतिक्रियात्मक सरणि के अनुगामी है। राजनीतिक धारणा के क्षेत्र में साम्राज्य वैभववादी, धर्म के क्षेत्र में सनातनी और दर्शन के क्षेत्र में सांस्कृतिक स्पर्श के साथ प्रसाद स्वच्छंदतावादी हैं।’’ (पृ.228, खंड1)
  •  ‘‘महादेवी इस धारा की सबसे कमजोर कवयित्री हैं क्योंकि उनका उद्बोध न अतीत की भूमि पर संतुलित हो पाता है और न इतिहास की वर्तमान गति का अनुसरण कर पाता है। अतीत से विच्छुरित और वर्तमान में अप्रतिष्ठित कवयित्री की आत्मा संतुलन के लिए मात्र अवाचक का सहारा लेती रह जाती है। उनका दुखवाद इसलिए (मेरी दृष्टि में) उनके व्यक्तिगत कारणों से अधिक दृष्टिकोण की अस्पष्टता का परिणाम है। महादेवी निरर्थक आत्मचेतना का दैवीकरण करती हैं।’’ (पृ.228, खंड1)
  •  ‘‘पंत जी का रोमैंटिक दृष्टिकोण अपनी ही द्विरूपता के कारण उलझ जाता है। ‘गुंजन’ के उपरांत निरंतर वे पश्चिम और पूर्व के बीच अपनी चेतना का समझौता करने को आकुल हैं। भौतिकता और आध्यात्मिकता उनके लिए समस्याएं (इनिग्मा) उलझनें बन जाती हैं। भावसत्ता और वस्तुसत्ता के बीच कृत्रिम विभाजन करने को वे आकुल हैं। ऐसा कृत्रिम विभाजन निराला ने नहीं किया; महादेवी ने भौतिक धरातल का बलात् निषेध-आग्रह रखा, प्रसाद ने ‘कामायनी’ में इस विरोध का संतुलन कल्पित रूप से कर लिया। पंत जी किसी भी कल्पित भूमि पर ऐसा समझौता कर नहीं पाते, अरविंद के सर्वचेतनवाद की शरण में जाकर भी नहीं। (उदाहरणार्थ ‘कला और बूढ़ा चांद’)। वे चेतना के धरातल पर दो बिंदुओं को सरल रेखा से मिलाना चाहते हैं, यथार्थ अंतर्विरोध बन जाता है। फलतः वे प्रसाद की तरह नव्य श्रेण्यता (निओ क्लासिसिज्म) को स्वीकार करने में भी अक्षम रहते हैं और शुद्ध रोमैंटिक उद्बोधों को भी सहेज नहीं पाते। निराला और प्रसाद से वे इसी अर्थ में न्यून सिद्ध होते हैं।’’ (पृ.231, खंड1)
  • ‘‘मेरी दृष्टि में छायावाद के प्रारंभिक उत्थान में नाटकीय संवादी स्वर नहीं है। यह शुरू होती है बच्चन, भगवती चरण वर्मा, दिनकर और नवीन के साथ। इन कवियों में अधिकांश के पास कोई दृष्टि ही नहीं है, उनके पास केवल प्रतिरोधजन्य नाटकीयता है जो कभी दृष्टि बन ही नहीं सकती। उस अर्थ में इनमें जो सहजता है, उसे विशिष्ट मनोभूमि की सहजता मानने का खतरा केवल साही साहब ले सकते हैं। जितना शक्ति प्रवाह बच्चन और वर्माजी की रचनाओं में नहीं है, उतना साही साहब में है जिसके बहाव में वे साहित्य के सहज विकास के सूत्रों को छोड़कर कैलिडोस्कोपिक विविध्ता में खो जाते हैं।’’ (पृ.233, खंड1) (‘लघु मानव के बहाने हिंदी कविता पर एक बहस’ में उल्लिखित छायावादी विजन के टूटने के संदर्भ में पढ़ा जाए।)
  •  ‘‘चाहे प्रगतिवादी आंदोलन ने साहित्य में कोई महान भूमिका न भी पूरी की हो मगर इतना तो मानना पड़ेगा कि उसने क्षयी रोमांस का रचनात्मक धरातल पर विरोध किया और हिंदी नवलेखन को मध्य वर्ग की पतनशीलता की तस्वीर बन जाने से बहुत हद तक बचा लिया। हिंदी नवलेखन अगर ‘गुनाहों के देवता’ की पूजा और ‘अंधा युग’ के विक्षिप्त बोध से बच सका तो इसका कारण मैं यशपाल, अश्क, नागार्जुन, त्रिलोचन और केदारनाथ अग्रवाल के सशक्त रचनात्मक लेखन को मानता हूँ।’’ (पृ.235, खंड1)
  •  ‘‘तृतीय दशक में रोमैंटिक दृष्टि जिस प्रकार अपनी विशिष्ट असंगतियों के कारण पतनशील हो गई थी। उसकी प्रतिक्रिया की जमीन अलग-अलग है, एक ओर अज्ञेय के साथ व्यक्तित्व का उत्थापन और दूसरी ओर मानववाद की परंपरा के विकास की तत्परता। संपूर्ण चतुर्थ दशक और पंचम दशक में व्यक्तिवाद से मानववाद की टकराहट होती रही और उसकी अनुगूंज साहित्य के क्षेत्र में सुनाई पड़ती रही। इस दरम्यान व्यक्तिवाद न बर्गशां से लेकर सार्त्र तक के नकाब बदले, मगर उसका संकट समाप्त नहीं हुआ।’’ (पृ. 236)
  •  ‘‘1950-60 तक नवलेखन ने एक व्यापक आंदोलन का स्वरूप धारण कर लिया लेकिन इससे यह नहीं मान लेना चाहिए कि नवलेखन पर व्यक्तिवाद का प्रभाव शेष ही नहीं रहा था। कवियों का एक समुदाय ऐसा था जो अब भी बदले हुए स्वर में पुराना राग अलाप रहा था। कहानियों में व्यक्तियों की आत्मकेंद्रता के साथ एक समानान्तर स्वर भी उभरता है जिसे प्रकाश में लाने की आवश्यकता है। यह स्वर हमारे स्वातंत्रयोत्तर नवजागरण से जुड़ा हुआ है। (डॉ॰ नामवर सिंह की शब्दावली में)” (पृ.237, खंड1)

    Surendra Choudhary 13 जून 1933- 09 मई 2001

    Surendra Choudhary
    13 जून 1933- 09 मई 2001

क्या आधुनिक हिंदी साहित्य के इतिहास को देखने की एक नयी दृष्टि का उन्मेष इन उद्धरणों से होकर नहीं जाता? बौद्धिक समाज क्या इसके लिए तैयार है? विचारहीनता और तात्कालिकता के दबाव के बीच हिंदी आलोचना की समृद्ध प्रगतिशील परंपरा क्या सुरेन्द्र चौधरी से संवाद नहीं करेगी? ऐतिह्यता का प्रश्न सुरेन्द्र चौधरी के लेखन का मूल प्रश्न है। इसलिए समकालीनता और तात्कालिकता से उनकी मुठभेड़ ही उनकी आलोचना बनाती चलती है। यह अकारण नहीं कि इतिहास के प्रश्नों से उलझने वाला यह आलोचक साहित्य के आख्यान रूपों पर अपनी विशेष दृष्टि रखता है। पर कविता के संबंद्ध में उनका छिटपुट लेखन किसी भी बड़े काव्य आलोचक के लिए इर्ष्या का कारण बन सकते है।  बहरहाल।

 सुरेंद्र चौधरी के लिए भारतीय इतिहास की धारा जातीयता के निर्माण के प्रश्न से तय होती मालूम होती है। जातीय निर्माण की प्रक्रिया संबंधी यह चिंतन हिंदी में राम विलास शर्मा की देन है। जातीय निर्माण की अवधारणा को भाषा से जोड़ते हुए डॉ॰ शर्मा ने एक किताब लिखी थी-‘भाषा और समाज’। इसमें उन्होंने कुछ महत्वपूर्ण मुद्दे उठाए थे। लघु जातियों के निर्माण संबंधी अवधारणा को प्रस्तुत करते हुए शर्मा ने बताया था कि किस प्रकार जनपदों के विकास से भिन्न वस्तुगत आधार लेकर मध्यकाल में जातियों का निर्माण हुआ। यह निर्माण हिंदी की भिन्न बोलियों के विकास के साथ हुआ था और दोनों में कापफी सारे संबंध सूत्र उन्होंने खोजे थे। स्तालिन के महाजाति की निर्माण संबंधी धारणा और उसके भाषा विषयक चिंतन का प्रभाव यहां स्पष्ट रूप से लक्षित किया जा सकता है। इसे आधुनिक काल में तथा उससे पहले व्यापारिक पूंजीवाद के साथ जोड़ते हुए महाजाति और राष्ट्रभाषा की अवधारणा डॉ॰ शर्मा ने रखी थी। इतिहास की यह अवधारणा दोषयुक्त है परंतु उसके अपने ऐतिहासिक आधार भी हैं। और इसका एक सिरा राष्ट्रवादी इतिहास लेखन और मार्क्सवादी इतिहास लेखन के घालमेल में खोजा जा सकता है। बहरहाल, नवजागरण और जातीय निर्माण संबंधी प्रक्रिया के चिंतन का एक स्वरूप और उसका प्रभाव ग्रहण चौधरी के लेखन में स्पष्टतया देखा जा सकता है। इसी संदर्भ में औपनिवेशिक चिंतन को एक चुनौती भी मिलती रही है। डॉ॰ चौधरी ने 1857 के महाविद्रोह के बाद चलनेवाली जातीयताओं के नवगठन को औपनिवेशिक प्रशासकीय नीति के लिए एक खतरा माना था। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में लिखा कि उर्दू को इलाकाई जबान बताकर अलगाने की कोशिशें हुईं, बंगाल विभाजन हुआ, मराठा क्षेत्र को तोड़ा गया और उड़ीसा के साथ विभाजक नीति अपनाई गई। ‘‘ऐसी स्थिति में भारत की एकता, कौमियतों की नकार से सिद्ध करने के बजाय उसके सहकार में सिद्ध करने का स्तर जनवादी है।’’ (पृ.122, खंड1) इतिहास में जनवादी मूल्यों की पहचान हमेशा एक चुनौती रही है। रेडिकल इतिहास लेखन कई बार अतिवाद का शिकार होता रहा है। इस अतिवाद के मूल में एक ऐसी इतिहास दृष्टि काम करती है जो नितांत समकालीन विमर्शों का प्रक्षेप अतीत के किसी कालखंड में करता है। ठेठ समकालीन विमर्शों को आधार बनाकर इतिहास की व्याख्याएं  गलत निष्कर्षों तक पहुंच जाती हैं। हिंदी नवजागरण संबंधी चिंतन के साथ यही होता रहा है। सांप्रदायिकता के प्रश्नों से जूझते हुए कुछ विचारक हिंदी नवजागरण को नितांत हिंदू नवजागरण सिद्ध करते हैं। ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य की सीमाओं को ध्यान में न रखने के कारण ही ऐसा होता है। भारतेंदुयुगीन नववैष्णवता को पुनरुत्थानवादी बताना भी ऐसी ही दृष्टि का फल है। वास्तविकता यह है कि जिस वैष्णवता को भारतेंदु भारतीयता का आधार बता रहे थे, वह कोई मध्ययुगीन अवधारणा न थी। धर्मांधता और सांप्रदायिकता के बरक्स यह धर्म और लोक में प्रेम की महत्ता को स्वीकार करते हुए अलगाववादी ताकतों के खिलाफ एक मॉडल था। राज्य और जाति संबंधी पश्चिमी अवधारणा के समानांतर यह राष्ट्र-राज्य के अपने निर्धारक तत्वों को पहचानने की कोशिश थी। डॉ॰ चौधरी ने ‘स्वाधीनता संग्राम और हिंदी साहित्य’ नामक लेख में डॉ॰ राम विलास शर्मा की मान्यताओं से सहमति जताई है। बाद में इस नववैष्णवता के जनवादी स्वरूप की पहचान डॉ॰ नामवर सिंह ने ‘हिंदी नवजागरण की समस्याएं’ नामक अपने लेख में की है। अमेरिकी स्वाधीनता आंदोलन के वक्त जिस प्रकार नव ईसाई विचारधारा की नैतिकता कोई बाधक तत्व नहीं थी और मैक्स बेबर से लेकर व्हिटनी ग्रिसगोल्ड तक इसका समर्थन कर रहे थे, उसी प्रकार भारतेंदु मंडल की वैष्णव नैतिकता ‘क्रिस्तान, मुसलमान और ब्राहम धर्मों के प्रेम मार्ग’ को इस विचारधारा से जोड़ने का जनवादी प्रयास था। और यह अकारण न था कि नववैष्णवता की यह धारा गांधी के ‘हिंद स्वराज’ के लोकचिंतन का आधार भी बना था। पश्चिमी आधुनिकता के मूल्यों में छिपे प्राच्यवादी षड्यंत्र के सामने भारतीयता की पहचान एक समस्या है। ‘हिंद स्वराज’ के सौ वर्ष पूरे होने पर जो चिंतन दोबारा भारतीय आधुनिकता की खोज कर रही है, वह इस नववैष्णवता के महत्व को खारिज नहीं कर सकती। डॉ॰ चौधरी ने लिखा था-‘‘बचकाने किंतु उत्साही मार्क्सवादी को इसे संदर्भ से जोड़ने की जरूरत है। स्वाधीनता आंदोलन और साहित्य की प्रेरक परिस्थितियों का यह ताना-बाना बहुत महत्वपूर्ण है और किसी निर्णायक दिशा के लिए आधार का काम करता है। नववैष्णवता न पुनरुत्थानवादी है, न पुराणपंथी और न वह शुद्ध मध्ययुगीन ही है। उसमें वर्तमान के अनुरूप धार्मिक सहिष्णुता, उदारता और प्रेम मार्ग पर चलकर उस एकता की आकांक्षा है जो उसकी मुक्ति का उपनिवेश और पिछड़ेपन का बायस बन सकती है। धर्म बुद्धि साहस की स्वीकृति और आलस्य त्याग के साथ इस नववैष्णवता का वही संबंध हो सकता है जो कॉलविनवादियों का न्यू इंग्लैंड से बना था।’’ (पृ.125, खंड1)

आगे डॉ॰ चौधरी नववैष्णवता के अंतर्विरोधों को पहचानने के लिए ‘इंदु’ और ‘सरस्वती’ के लेखों का हवाला भी देते हैं। हरिऔध, मैथिलीशरण गुप्त और प्रसाद के विचारों की समीक्षा का आग्रह करते हैं। ‘जनमेजय का नागयज्ञ’ में कृष्ण का मानवता की घोषणा और ‘कंकाल’ में गोस्वामीजी के भाषणों में इस नववैष्णवता के अनुगूंज है। ‘‘आज हम धर्म के जिस ढांचे के शव को घेरकर रो रहे हैं, वह उनका (कृष्ण) धर्म नहीं है।’’ पंडित माध्व प्रसाद मिश्र के लेखों में नववैष्णवता के प्रश्नों पर चिंतन है। ग्रियर्सन की क्रिस्टोमायथी से पहले श्री ब्रहमानंद जी 1897 में निबंधावली में क्रिश्चियन विश्वासों का नववैष्णव संदर्भ दिखाया था। स्वदेश भक्ति का भावना के रसात्मक रूप का नववैष्णवता से क्या संबंध हो सकता है, यह भी डॉ॰ चौधरी की चिंता का विषय है। क्या नववैष्णवता का प्रेमचंद पर भी प्रभाव था या फिर निराला का नववेदांत पुनरुत्थानवादी था? ऐसे प्रश्नों पर फिर से विचार की आवश्यकता है।

विचारधारात्मक अंतर्विरोधों के कौन से सूत्र हिंदी नवजागरण के प्रारंभिक चरण को भाषा के सांप्रदायीकरण की ओर ले जाते हैं, इसे डॉ॰ चौधरी नहीं बताते। भारतेंदुयुगीन राजभक्ति बनाम देशभक्ति के द्वैत को व्याख्यायित न कर डॉ॰ चौधरी इतिहास की मौखिक परंपरा के क्रांतिकारी होने के मिथक को तोड़ने के लिए तत्कालीन पत्रिकाओं में छपे लेखों की ओर जाते हैं और शोध कार्य का आहवान करते हैं।

इस संदर्भ में कुछ बिंदुओं की ओर ध्यान दिलाना आवश्यक है। पहला यह कि डॉ॰ चौधरी का लेख ‘स्वाधीनता संग्राम और हिंदी साहित्य’ अक्टूबर-दिसंबर 1986 की आलोचना में प्रकाशित नामवर सिंह के लेख ‘हिंदी नवजागरण की समस्याएं’ में निकाले गए निष्कर्षों की असहमति में लिखा गया है। नामवर सिंह का मानना है कि हिंदी साहित्य का प्रत्यक्षततः संबंध बांग्ला नवजागरण से है जबकि डॉ॰ चौधरी इसे अनिवार्यतः 1857 के साम्राज्यवाद विरोधी-उपनिवेशवाद विरोधी चरित्र से जोड़ते हैं। नवजागरण और भाषा के संबंध पर नामवर सिंह ने ठोस प्रतिक्रिया दी और उसके सांप्रदायिक आधार की ओर इशारा किया है। इसलिए वहां नववैष्णवता की प्रगतिशीलता के अंतर्विरोधों को भाषा की समस्या से समझने पर बल है। यह बात सुरेंद्र चौधरी नहीं करते हैं। हिंदी नवजागरण में राजनीतिक चिंतन या सत्ता परिवर्तन की अनुगूंज मद्धिम हो जाती है और वह मूलतः सांस्कृतिक नवजागरण हो जाता है। इसलिए ‘स्वत्व निज भारत गहै’ (नामवर इसे आधुनिक शब्दावली में आइडेंटिटी से जोड़ते हैं) के स्वत्व प्राप्ति के राजनीतिक स्वाधीनता वाला पक्ष जरूरी होते हुए भी यहां तथ्यात्मक रूप से परोक्ष ही था। नामवर सिंह ने लिखा है-‘‘राजनीतिक स्वाधीनता इस स्वत्व प्राप्ति की पहली शर्त है। नवजागरण के उन्नायक इस आवश्यकता का अनुभव न करते रहे होंगे, यह सोचना कठिन है, फिर भी तथ्य यही है कि नवजागरणकालीन प्रकाशित साहित्य में राजनीतिक स्वाधीनता का स्पष्ट स्वर कम ही सुनाई पड़ता है। पहले ईस्ट इंडिया कंपनी और फिर महारानी विक्टोरिया के शासन काल में राज के विरुद्ध निश्चय ही किसानों के छिटपुट विद्रोह बराबर होते रहे जिनमें सबसे संगठित और सशक्त सन सत्तावन की राज्यक्रांति है फिर भी समकालीन शिष्ट साहित्य में उसकी गूंज सुनाई नहीं पड़ती-लोक साहित्य भले ही प्रचुर मात्र में मौखिक रूप में रचा गया। यह स्थिति सन सत्तावन के पहले तो थी ही, उसके बाद कम से कम तीन दशकों तक बनी रही। आर्थिक शोषण के खिलाफ जरूर लिखा गया, पुलिस तथा अफसरों के अत्याचार और अन्याय की भी शिकायत की गई, पर राजसत्ता पलटने के विचार को जैसे अंतर्गुहावास दे दिया गया।’’ (हिंदी का गद्यपर्व, नामवर सिंह, पृ.87, राजकमल प्रकाशन, 2010) मानो इसी का जवाब देते हुए सुरेंद्र चौधरी ने लिखा-‘‘जनता के चित्त में स्वदेशी-स्वराज का भाव 1857 की देन है, इसे स्वीकार करने में कठिनाई नहीं होनी चाहिए। संभवतः इसी शक्ति संबल को पहचानकर स्वदेशी की भावना के लिए भारतेंदु युग के कवियों को देश निकाला तो न दिया गया, पर वर्नाकुलर प्रेस पर अनेक बंदिशें डाली गईं। स्वदेशी के प्रति इस राज के रुख ने स्वतंत्रता के राग को बल दिया, इस पर बहस नहीं की जा सकती। …सत्ता परिवर्तन की आकांक्षा नारों में अवश्य प्रकट नहीं हुई। ‘अंग्रेजों भारत छोड़ो’ जैसा नारा भारतेंदु युग में न लगा था, मगर सत्ता परिवर्तन को भी गुहावास न दिया गया था।’’ और इसके प्रमाण में डॉ॰ चौधरी ने ‘नागरनैया जाला काले पनिया रे ना!’ जैसे गीतों का उदाहरण दिया है। उन्होंने बताया है कि राज-रजवार और विष्णु सिंह के गीत मगध में गाए जाते थे, बाबू कुंअर सिंह की मुसलमान प्रेमिका के गीत सारे भोजपुर में गाए जाते थे। हरेंद्र देव के काव्य में उसकी आवृत्तियां हैं। फिर अवध बुंदेलखंड से निकलकर सुदूर गया जिले तक इसकी अंतरध्वनियों की पहचान वह करते हैं।

तो क्या हिंदी जाति के साहित्य में 1857 के महाविद्रोह का मूल स्वर भारतेंदु युग में सुनाई पड़ता है? और क्या यह नवजागरण उसी चेतना का विस्तार है? क्या सचमुच हिंदी नवजागरण 1857 में व्यक्त जनजागरण की ही अगली ऐतिहासिक अवस्था है और हिंदी नवजागरण के शिष्ट साहित्य में व्यक्त विचार से नामवर सिंह का क्या अभिप्राय है? क्या भारतेंदु मंडल की विचारधारा 1857 की चेतना से भिन्न स्वर अख्तियार करती है तथा जनसमुदाय की संवेदना 1857 के साथ है? क्या मौखिक परंपरा साम्राज्यवाद उपनिवेशवाद विरोध की राजनीतिक आकांक्षा को कायम रखती है और हिंदी (या बांग्ला या मराठी) नवजागरण के नेताओं या उनके लक्ष्यीभूत श्रोता या पाठक जिस नवनिर्मित मध्यवर्ग से थे, उस मध्यवर्ग का मानस 1857 की मूलभूत चेतना से दूर पड़ता है?

डॉ॰ चौधरी और डॉ॰ नामवर सिंह दो भिन्न दृष्टियों से उस काल को देख रहे हैं। मध्यवर्गीय/भद्रलोक के शिष्ट साहित्य के अंतर्विरोधी या नवजागरण के नेताओं की अंतर्विरोधी यह साफ इशारा करती है कि वहां 1857 के दो प्रमुख गुण सांप्रदायिक एकता और औपनिवेशिक सत्ता के प्रति सचेत वैरभाव (कांसस हास्टेलिटी) का अभाव है। रंजीत गुहा मानते हैं कि ‘यह सचेत वैरभाव संघर्ष में हिस्सा लेनेवालों तक ही सीमित नहीं था’ बल्कि एक कन्पेफडरेट नेशनेलिज्म के जरिए हिंदू मुसलिम संघर्ष के सिद्धंत का समाधान भी था। इसके बदले नवजागरण कालीन नेताओं में और इसलिए साहित्य में भी वैरभाव की जगह ‘कांसस लायलिटी ऑफ द टेक्स्ट’ (देखें, रंजीत गुहा, द इंडियन हिस्टोग्रापफी ऑफ इडियाः ए नाइन्टीन्थ सेंचुरी एजेंडा एण्ड इट्स इम्प्लीकेशंस; सीएसएसएस, कलकत्ता, 1987, पृ.54) मिलता है। देशभक्ति और राजभक्ति की यह विभाजित चेतना जितना भद्रवर्गीय हितों से चालित थी, उतनी ही राष्टीय स्वरूप की निर्मिति में अदरनेस को परिभाषित करने में भी थी। डॉ॰ चौधरी लोकचेतना को 1857 का विकास मानते वक्त इस तथ्य को नजरअंदाज करते हैं। लोक की असंबद्ध यद्यपि प्रतिरोधी विचारधारा को हिंदी नवजागरण का प्रमुख स्वर मान लेना ठीक नहीं मालूम पड़ता। लोक साहित्य में 1857 की वीरता के स्मृति चिन्ह शेष थे। गीत गाए जाते थे परंतु वहां राज के प्रति कोई सचेत वैरभाव नहीं रह गया था। इसके बदले अतीत की मोहक स्मृति ही प्रधान थी। इस गौण धारा को प्रमुखता देने से नवजागरण के संष्लिष्ट चरित्र की व्याख्या उसी अतिरेकवादी उत्साही जनवाद से ग्रसित हो जाती है जिसकी खिलाफत डॉ॰ चौधरी लगातार करते रहे थे।

डॉ॰ चौधरी अगर भाषा और नवजागरण के संबंधों की पड़ताल करते तो शायद इस ओर उनका ध्यान जरूर जाता। 19वीं सदी के उतररार्द्ध का पूरा काल भारतीय राष्टीयता के निर्माण का गर्भकाल था। भारतीय राष्टीयता के तमाम अंतर्विरोधों का उत्स भी यही है। 1920 के दशक में रूप लेनेवाली सांप्रदायिकता और 20वीं सदी में लगातार बदलते राष्ट्रवादी चिंतन की रूपरेखा में अपने प्रारंभिक रूप में यहीं दिखाई पड़ती है। हिंदी और उर्दू राष्टीयताओं को उसके धार्मिक प्रतीकों के साथ पढ़ने की कोशिश हमें नवजागरण के पूरे संदर्भ को समझने पर मजबूर करता है। भारतेंदुयुगीन जातीयता हिंदू-मुसलमान भद्रवर्गीय हितों से चालित था, जहां भाषा को लगातार एक हथियार की तरह इस्तेमाल करते हुए पूरे समुदाय की पीडि़त ग्रंथि (विक्टिम कॉम्प्लेक्स) को निर्मित किया गया और इसी के सहारे जातीय गोलबंदी की गई। उस वक्त राष्टीयता का सवाल अंग्रेजों के विरुद्ध अपने आपको किस प्रकार परिभाषित किया जाए-इस प्रश्न से जुड़ी थी। इसलिए भारतेंदु और अन्य हिंदी आंदोलन के नेताओं के साथ कई उदारपंथी नेता जैसे बिशन नारायण डर (लखनऊ के सम्मानित वकील, भारतीय  राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष भी रहे तथा उर्दू के शाय तथा  मुसलमानों के मित्र के रूप में प्रसिद्ध और बंगाल के आर्थिक इतिहासकार विक्टोरियन उदारपंथी तथा प्रगतिशील राष्ट्रवादी रोमेश चंद्र दत्त ने लगातार हिंदू-मुस्लिम एकता की बात भी की और राष्ट्र की एकता के हिंदुओं की एकता की भी चर्चा की (देखें, ज्ञानेंद्र पांडेय; दी कन्स्ट्रकशन ऑफ कम्युनलिज्म इन कॉलोनियल नॉर्थ इंडिया, आक्सफोर्ड, 2006, पृ.218)। इस दौर की जातीयता में हिंदू जाति के संगठन और उत्थान का महत्व दिया गया तथा अंडरटोन के रूप में यह पहचान की राजनीति मुसलमानों को सामने रखकर निर्मित की गई। परंतु तब राष्ट्र के उत्थान का मतलब था, अलग-अलग समुदायों का उत्थान। हिंदू-मुसलमान-ईसाई-सिख आदि मिलकर राष्ट्र का निर्माण करते हैं, ऐसा माना जा रहा था। (देखें, वही, पृ. 223) भारतेंदु और सर सैयद अहमद खां के वक्तव्यों में भी इसकी अनुगूंज स्पष्ट ही देखी जा सकती है।

साठ के दशक की पूरी पीढ़ी जिस यातना, संत्रस, संशय, सिनिक, नकार विद्रोह आदि से गुजर रही थी, उसका और उसके कारणों की पड़ताल डॉ॰ चौधरी निरंतर अपने लेखन में करते हैं। डॉ॰ चौधरी ने लगातार नई पीढ़ी और बीच की पीढ़ी के अंतर्विरोधों को रेखांकित किया है। बिचली पीढ़ी के अवसरवाद तथा तटस्थता को नकारकर नवलेखन ने ‘प्रतीक्षा’ के मोहभंग के कारण एक निषेध और नकार की मुद्रा अख्तियार की थी। यह मुद्रा केवल एक भंगिमा मात्र न थी। इस नकार के वस्तुगत कारण थे और रचनात्मक मानस को ये उद्वेलित भी कर रहे थे। एक संवादी आलोचक की भांति इस नई पीढ़ी की रचनाशीलता को संभावनाओं के रूप में समझने की जरूरत थी। डॉ॰ चौधरी इसे पूरा करने की कोशिश करते हैं। स्वातंत्रयोत्तर दो दशकों में लगातार वर्ग संघर्ष की शिथिलता के कारण मध्यवर्गीय लेखक सामान्य जनजीवन से दूर होते गए। इस शिथिलता के साथ भारतीय सत्ता तंत्र की नीतियों और जनतंत्र के पीड़ादायी अनुभव ने एक ऐसी पीढ़ी को जिसने अपनी आंखें नए और स्वतंत्र भारत में खोली थीं, उमस से भर दिया। आजादी के बाद जन आंदोलनों का दौर एक तरह से रुक गया था। इसने कहीं न कहीं मध्यवर्गीय अलगाव का जन्म दिया। प्रतीक्षा और अलगाव के अंतर्विरोध में कुछ लोगों ने आत्म समर्पण कर दिया और अपनी राजनीतिक चेतना गिरवी रख दी। नवलेखन जब अलगाव और अस्तित्व के संकट की घोषणा कर रहा था तो इसे हमारे कुछ पुराने आलोचकों ने अंतर्राष्टीय नारों का प्रभाव कहकर खारिज कर दिया था। लेखन के बीज शब्द के रूप में स्वतंत्रता नई पीढ़ी के लिए महज नारा न था। लेकिन इसे मानवीय अस्तित्व की स्वतंत्रता के व्यापक फलक पर देखने के बजाय तत्कालीन प्रगतिशीलों ने भी अमेरिकी कल्चरल प्रफीडम के शीतयुद्धकालीन विचारधारा का प्रभाव माना और इसे भाववाद की इकहरी संकल्पना में ढालने की कोशिश की। दूसरी ओर, लेखक की स्वतंत्रता के नाम पर रूपवादियों खासकर परिमलवादियों और अज्ञेयवादियों ने इसे बल प्रदान किया। सुरेंद्र चौधरी ने ऐसी स्थिति को अधूरा और भ्रामक मानते हुए नवलेखन को एक बंद पद्धति मानने से इनकार किया था। आलोचना को नई पीढ़ी से बातचीत का दरवाजा खोलना चाहिए। इस मान्यता से वह कभी पीछे नहीं रहे। उन्होंने जोर देकर कहा कि नई पीढ़ी का संकट उतना निजी नहीं था जितना वह उपरी दृष्टि से मालूम पड़ता था। ‘नकार’ की दृष्टि किस ऐतिहासिक संकट में पैदा हो रही थी, उसे समझना जरूरी था। स्थिति को केवल नकारते हुए लड़ा नहीं जा सकता। यह सही था लेकिन नकार की भी एक सच्चाई तो होती ही है। इसी सच्चाई और यंत्रणा के दोहरे दबाव के बीच उस वक्त की रचनादृष्टि सार्थकता पाती है। और ‘‘जो लोग इस दुहरे दबाव को नहीं महसूस करते हैं वे या तो मुहावरे चुराते हैं, या फिर पूरी पीढ़ी के साथ एक व्यावसायिक खेल खेल रहे हैं। हमारी पीढ़ी की रचनात्मक लड़ाई का यह एक आंतरिक आयाम है।’’ (खंड तीन, पृ.146)

स्वतंत्रता के बाद की बिचली पीढ़ी ने देह को लेकर नई पीढ़ी की रचनादृष्टि को ‘ऐय्यास प्रेतों’ की तरह ट्रीट किया था। चौधरी ने देह की इस राजनीति को इसकी ऐतिहासिक भूमिका में समझने का प्रयास किया। उन्होंने स्पष्ट किया, ‘‘हम अदेह राजनीति के धर्मवीर नहीं हैं। चूंकि देह हमें देह हमें दुनिया में गोचर करती है, इंद्रियग्राहय अनुभवों से संपन्न करती है और दुनिया के मूर्त रिश्तों के बीच प्रतिष्ठित करती है, इसलिए हमारी राजनीति देह को नकारती नहीं है…। प्रश्न केवल देह की अमूर्त परिभाषा का नहीं, देह और देह के बीच मूर्त रिश्तों का है। हमारे लिए देह की अनेक यातनाएं हैं, वह हमें मूर्त-अमूर्त सभी देशों में आज गति दे रही है, इसलिए देह को हम अस्पृश्य नहीं मानेंगे। देह का दुरुपयोग करने में जैनेंद्र और अज्ञेय से कमलेश्वर और भारती भिन्न नहीं हैं। … बिचली पीढ़ी के आर्यसमाजी आलोचक देह की राजनीति को तो देखते हैं मगर उसके विस्तार को नहीं देख पाते। यह विस्तार हमें जीवन की वास्तविकताओं से जोड़ता है। देह में ही पेट भी है, इसे हम भूले नहीं हैं! आवेश के शुद्ध भावनात्मक रिश्ते आज की दुनिया में बन पाते हैं, इसमें अगर हमें विश्वास नहीं है तो जिम्मेदारी हमारी है…। चेतना अथवा संस्कारजन्य नैतिकता के सारे नियम देह पर ज्यों के त्यों लागू नहीं किए जा सकते…। देह की अपनी समस्याएं हैं, अपने स्वतंत्र नियम हैं। देह की इन ठोस मूर्त समस्याओं को नजरअंदाज कर उस पर टिप्पणी करना मुझे उचित नहीं मालूम पड़ता।’’ (वही, पृ. 147) देह की इस राजनीति को उस वक्त इतने बड़े परिपे्रक्ष्य में और किसी ने देखा हो, ऐसा मुझे मालूम नहीं। नामवर सिंह ने ‘मुक्ति प्रसंग’ के संदर्भ में लिखा था कि उस कविता में ‘‘बीच-बीच में सेक्स के खुले शब्दों से भद्र रुचि को ध्क्का देने की शोखी या शरारत है।’’ लेकिन इस देह की राजनीति का व्यापक आधार क्या है, इसकी बात उन्होंने भी न की। कापफी समय बाद फ्रेडरिक जेमेसन ने देह की इस राजनीति के ठोस द्वंद्वात्मक समझ को एक भिन्न संदर्भ में पेश किया। उत्तर आधुनिक दौर में ‘देह का आना एक वर्चुअल दुनिया में यथार्थ की विजय है। अपनी संकीर्णता और वस्तुपूजा के बावजूद देह की प्रधानता मोहक वर्चुअल रियलिटी के बीच मानवीय संवेदनाओं के हस्तक्षेप की तरह है। क्या मोहभंग से उपजे आक्रोश के दौर में नई पीढ़ी का स्वप्न को नकारकर देह की सत्ता और उसकी चुनौतियों को खुलकर व्यक्त करना इसी प्रकार का एक प्रयास न था!

नई पीढ़ी के बारे में डॉ॰ चौधरी आशान्वित थे और कृत्रिम भावनात्मक सत्य के बरक्स अपने को ही बार-बार तोड़ते, नकारते और लांघते चलने के क्रम में प्राप्त मानवीय वास्तविकता को महत्वपूर्ण मानते थे। ‘हम कुछ न बनाते हुए भी चीखने को विवश हैं’। घटित का यही मर्म कहीं न कहीं स्पर्श भी करता है और धूमिल ने ता लिखा ही था-‘‘मगर यह वक्त घबराए हुए लोगों की शर्म आंकने का नहीं है।’’ अपने को बार-बार तोड़कर अर्जित सत्य के बारे में बात करते हुए डॉ॰ चौधरी के दिमाग में रघुवीर सहाय की ये पंक्तियां जरूर रही होंगी-

‘‘कुछ होगा, कुछ होगा अगर मैं बोलूंगा

न टूटे न टूटे तिलिस्म सत्ता का

मेरे अंदर का एक कायर टूटेगा टूट

मेरे मन टूट एक बार सही तरह

अच्छी तरह टूट मत झूठ-मूठ उफब मत रूठ

मत डूब सिर्पफ टूट’’ (आत्महत्या के विरुद्ध्द्ध

परंतु बड़े आश्चर्य की बात है कि रघुवीर सहाय की इन कविताओं में उन्हें ‘आत्मीयता’ का स्पर्श नहीं मिला। और ये महज ‘रक्तचापहीन पीली पत्रकारिता’ की कविता जान पड़ी। टूटने से ज्ञात मानवीय सत्य दूसरी जगह उन्हें सपाटबयानी लगी। ऐसी सपाटबयानी ‘‘कल्पित दर्द के रिहटोरिक को तोड़ने का सबसे नाटकीय और तात्कालिक माध्यम बन जाती है। समस्या एक दूसरे स्तर पर फिर भी बनी रह जाती है। सपाटबयानी आवेश के निरंतर अंदाज को तोड़कर अगर कहीं स्थिर हो जाती है तो यह उसकी अशक्यता ही होती है। यह अशक्यता पहले रिहटोरिक को तोड़ती है फिर अपने को तोड़ते चलना उसकी नियति हो जाती है। कोई कवि मुहावरे के लंगड़े दरवाजे से आसानी से फैशन में आ जाता है और कविता को अनुभव की प्रामाणिकता से छलने लगता है…। अपने को ही बार-बार तोड़ते रहने की रघुवीर सहाय की नियति है क्योंकि उन्हें किसी शर्त पर उस जंगल से निकलना स्वीकार्य नहीं है…। मुझे लगता है कि ‘आत्महत्या के विरुद्ध’ की अधिकांश कविताएं एक अजीब रौ में लिखी गई हैं। उनमें न तो विजयदेव नारायण साही की कविताओं की आत्मीयता है और न राजकमल का वेग।’’ (वही, पृ. 63-69) मतलब इन कविताओं में आत्मीयता नहीं है और परिवेश से संपृक्ति भी नहीं है और टूटना एक मुहावरा भर है-एक रेहटोरिक को तोड़कर दूसरा रेहटोरिक गढ़ना-वास्तविक कर्मक्षेत्र की संवेदना से व्यवस्था को तोड़कर विद्रोही बनना और मुहावरों से युग को तोड़कर आततायी कहलाने का जो अंतर है, उसे आत्महत्या के विरुद्ध की कविताएं साथ-साथ व्यक्त करती हैं। आखिर क्या कारण है कि एक जगह सैद्धंतिक रूप से स्वयं को तोड़ने की महत्ता को स्वीकार करने के बावजूद डॉ॰ चौधरी को दूसरी जगह व्यवस्था को तोड़ने की इच्छा उसमें दिखाई नहीं पड़ी। उसमें आत्मीयता नहीं मिली-वह मिली भी तो विजयदेव नारायण साही की कविता में। कहीं ऐसा तो नहीं था कि पत्रकारिता की भाषा के विरोध ने उन्हें सपाटबयानी के विरोध तक पहुंचा दिया था। अनात्मीयता तथा परिवेश असंपृक्ति के अनुभव के पीछे सपाटबयानी संबंधी धारणा काम कर रही थी। काव्य भाषा संबंधी चिंतन मे ही कहीं कोइ दोष तो नही था!

रघुवीर सहाय की कविताओं में आत्मीयता नहीं मिलने पर डॉ॰ चौधरी ने जो आक्षेप लगाए थे, उसका उत्तर ‘कविता के नए प्रतिमान’ में नामवर सिंह ने दिया भी था। परिवेश को रचनात्मक रूप देने के लिए नाटकीयता कैसे काम करती है और वहां कविता के भीतर का नाटकीय नायक, जो प्राइवेट से ज्यादा सामान्य यथार्थ के किसी निजी साक्षात्कार का एक राजनीतिक व्यक्तित्व के साथ अपनी उपस्थिति दर्ज कराता है। नामवर सिंह ने लिखा था कि आत्महत्या के विरूद्ध की कविताएं ऐसे ही आत्मीय राजनीतिक व्यक्तित्व की कविताएं हैं।

निर्वैयक्तिकता की अपनी घोषणाओं के बावजूद ‘प्रगीतात्मक’ आत्मीयता का बोध और तदनुरूप काव्य भाषा का मोह डॉ॰ चौधरी को ‘आत्महत्या के विरुद्ध’ की कविताओं में ‘रक्तचापहीन पीली पत्रकारिता के मुहावरों के खतरनाक प्रयास को देख लेती है। 1970 में जब ‘कविता के नए प्रतिमान: विसंगति और विडंबना का सौन्दर्यशास्त्र’ शीर्षक आलेख में डॉ॰ चौधरी ने ‘कविता के नए प्रतिमान’ की समीक्षा की तो फिर से अपनी पुरानी धारणा का ही समर्थन करते हुए लिखा-‘‘पत्रकार की नाटकीय आत्मीयता में सबकुछ एक ‘मैं’ के अधीन होता है। इसमें की कीमियागिरी में घुलनशील तत्व: मैं बने की घोल में सारा तथ्य घुल जाता है-उसकी स्वतंत्रता और वास्तविकता समाप्त हो जाती है। ‘आत्महत्या के विरुद्ध’ में एक नाटकीय ‘मैं’ का ऐसा ही स्फार है जिसमें तथ्यों की वस्तुनिष्ठता घुलती रहती है। सबकुछ ‘मैं’ के गुंजलक में कैद हो जाता है और सारे करतब के साथ यही ‘मैं’ स्थितियों, घटनाओं और संबंधें पर गुंजलक मारकर बैठा शेष रह जाता है। इतिहास को नचाता हुआ, इतिहास के बीच गतिशील इकाई के रूप में नहीं, सर्वतंत्र स्वतंत्र सत्ता के विस्पफोट के रूप में। इस अनात्म ‘मैं’ का यही रहस्य है जिसकी ओर मैंने इशारा किया था। ‘मैं’ के स्पफार की यह मुद्रा आत्मीय नहीं हो सकती।’’ (खंड1, पृ. 211)

‘कविता के नए प्रतिमान’ की आलोचना उन्होंने दो लेखों में की है। ‘समकालीन कविता: अंधेरे से साक्षात्कार’ शीर्षक लेख में यद्यपि उन्होंने ‘कविता के नए प्रतिमान’ का नाम नहीं लिया है लेकिन विसंगति, विडंबना, नाटकीयता, सपाटबयानी और काव्यभाषा संबंधी नामवर सिंह की स्थापनाओं की आलोचना इसमें है जबकि ‘कविता के नए प्रतिमान: विसंगति और विडंबना का सौन्दर्यशास्त्र’ नामवर सिंह की किताब की समीक्षा है। ‘कविता के नए प्रतिमान’ की इससे अच्छी समीक्षा मेरे देखे में नहीं आई। डॉ॰ चौधरी ने शुरू में ही बताया है कि किस प्रकार छायावाद के ऐतिहासिक पतन पर अपनी दृष्टि केंद्रित न करके नामवर सिंह ने विजयदेव नारायण साही की इस स्थापना का समर्थन किया कि छायावाद का अंतर्विरोध उसके नैतिक विजन के टूट जाने तक सीमित था। उन्होंने आरोप लगाया कि नामवर सिंह ने इसे ज्यों का त्यों स्वीकार करते हुए भावना बुद्धि का एक हीगेलियन डाइलेक्टिक्स गढ़ लिया है। इसी का परिणाम है-काव्य संवेदना का विभाजन। डॉ॰ चौधरी ने लिखा कि नामवर सिंह की इस पुस्तक में ‘‘विवाद शैली के आतंक में इतिहास का परिप्रेक्ष्य डूबता नजर आता है… ‘कविता के नए प्रतिमान’ में जो सबसे बड़ा दोष है, वह परिप्रेक्ष्य के खो जाने का नहीं है, इतिहास के अदृश्य रह जाने का है।’’ (खंड 1, पृ. 206)

‘कविता के नए प्रतिमान’ में इतिहास के अदृश्य रह जाने के कारण नागार्जुन, त्रिलोचन, केदार और सुमन जैसे दूसरे कवि प्रतिमानों के निर्माण से गायब हैं। ‘कविता के नए प्रतिमान’ का परिप्रेक्ष्य निश्चित रूप से मुक्तिबोध हैं लेकिन ‘परिवेश और मूल्य’ में जिस इतिहास को दिखाने की कोशिश नामवर सिंह कर रहे थे, वह उन्हीं के शब्दों में अपूर्ण है और जिसकी क्षतिपूर्ति ‘अंधेरे में पुनश्च’ नामक अध्याय भी नहीं कर पाया। डॉ॰ चौधरी ने यह भी बताया है कि नई कविता के अनुभव संसार की वर्गीय संरचना को लक्ष्य करते हुए मुक्तिबोध ने जो कुछ भी लिखा, उसके बावजूद उनकी भावधारा अपनी विचारधारा से संगत न हो पाई। कला के तीसरे क्षण वाला उनका सिद्धांत उनकी अपनी काव्य प्रक्रिया का अंतर्विरोध भी है। ‘‘कला के जिस तीसरे क्षण को वे संपूर्ण रचनात्मक क्षण सिद्ध करते हैं, क्या वह ‘आत्मपूर्ण तात्कालिकता’ का पर्याय नहीं है। क्या यह ‘आत्मपूर्ण तात्कालिकता सारे कला सत्य को अपने भीतर की परिस्थितियों में या परम स्थिति में फ्रीज नहीं कर देती? सारे विकास को अपने भीतर ही नहीं समेट लेती? यह इतिहास का निषेध है और बर्गशैनियन गुणात्मक काल संरचना से मुक्तिबोध की भावधारा पीडि़त रही। इससे इनकार नहीं किया जाना चाहिए।’’ (खंड 1, पृ. 209)

डॉ॰ चौधरी ने यह भी आरोप लगाया कि विसंगति और विडंबना को जब नामवर सिंह समकालीन इतिहास की मूल लाक्षणिकता के रूप में प्रस्तुत करने लगते हैं तो वह विसंगति और विडंबना को गहरे अर्थ से काटकर फ्राइवालस बना देते हैं। बुर्जुआ सौंदर्यशास्त्र से लड़ने के क्रम में जिन रूपवादी औजारों की सहायता नामवर सिंह लेते हैं, कहीं न कहीं उन औजारों के खुद ही शिकार हो जाते हैं। डॉ॰ चौधरी ने खुद ही लिखा-‘‘कविता के मूल्यांकन में संरचनावादी दृष्टि कहां मार्क्सवादी सौंदर्यशास्त्र से टकराती है, इसे जानना हो तो नामवर की यह पुस्तक महत्वपूर्ण उदाहरण बन सकती है। जिस तरह हीगेलियन द्वंद्ववाद विचारों की गत्यात्मकता पर आश्रित है और कालचाप से आपकी प्रत्यवस्थाएं निर्मित कर उन्हें एक उच्च संश्लेष में बदल लेता है, उसी तरह नामवर का संरचनावादी दृष्टिकोण भी एक कल्पित पूर्णता का संश्लेष बनकर रह जाता है जिसका इतिहास, अनुभव और मानवीय कार्य व्यापारों तथा भावनाओं के मूर्त विश्व से कोई सीधा संबंध नहीं है। … ‘कविता के नए प्रतिमान’ वस्तुतः प्रतिमानों की भीड़ है जिसमें सही प्रतिमान दबा पड़ा रह जाता है।’’ (खंड 1, पृ. 213)

नामवर सिंह पर भाववादी चिंतन के प्रभाव के रूप में कहानी आलोचना संबंधी कुछ निष्कर्ष लगातार डॉ॰ चौधरी की आलोचना के केंद्र में रहे हैं। निर्मल वर्मा के कहानी संग्रह ‘परिंदे’ को नई कहानी की पहली कृति कहना और उसे ‘कालातीत कलादृष्टि’ से विभूषित करना ऐसा ही एक प्रयास था। डॉ॰ चौधरी लिखते हैं कि ‘परिंदे’ संग्रह की कहानियों में ताजगी थी मगर यह ताजगी कतई इस कारण नहीं थी कि निर्मल वर्मा ने इन कहानियों में अपने समय के इतिहास की उस विराट नियति को पहचान लिया था जो मनुष्य को अकेला करती है। ‘‘तमाम कुशलता के बावजूद ‘परिंदे’ जैनेंद्र का अतिक्रमण नहीं करती थी। इतना अवश्य था कि लतिका का पिंजरा बड़ा हो गया था, मगर कैच 22 वह तब भी न बन पाया था। फिर भी नई स्थितियों में स्त्री की यह नियति एक पैराडॉक्स खड़ा करती थी। लतिका को पिंजड़े से ज्यादा उसका अपना नैतिक आवेश बांधता है- इसी बिंदु पर उसकी अपनी पहली और आखिरी पहचान संभव है। … यूरोप की पतनशील परंपरा के आघात को नई कहानी का उद्घोष मानना वैचारिक दिवालियेपन के अतिरिक्त कुछ नहीं कहा जा सकता। बिंब, ध्वनियां, रंग ऐंद्रियबोध को गहरा करते हैं, मगर इससे यथार्थ का ऐतिहय ढांचा कालचाप भी प्राप्त कर लेता है-इसे नहीं माना जा सकता। शायद इस महत्वपूर्ण तथ्य की परीक्षा नहीं की जा सकी। ये विचारधाराएं आंतरिकता को तथ्यबद्ध दायरे से निकालकर जिस अगोचर भावभूमि पर ले जाती हैं, उनका सत्य क्या है। उनका सत्य लौकिक भावभूमि के विरोध में प्रकट हुआ है। यह सत्य जो एक लौकिक भावभूमि को तोड़कर प्रकट हुआ था, किसी कालजयी दृष्टि का परिणाम न था। बल्कि कालचाप से निर्वासित मध्यवर्ग की आत्मचेतना का परिणाम था! उस पर बुर्जुआ विचारधारा का ताजा रंग चढ़ आया।’’ (खंड 2, पृ. 26 व 127-28)

डॉ॰ चौधरी समकालीनता के प्रस्थान बिंदु के रूप में आजादी को रखते हैं। उनके लिए यह आजादी कालगत परिवर्तन के बजाय देश में होने वाला एक परिवर्तन था। यह देशगत परिवर्तन न केवल विभाजन की पीड़ा से ग्रसित था वरन भारतीय जीवन को जो वृहत्तर यथार्थ गांव और शहर की सीमा को तोड़कर राष्ट्रीय धारा में एक होना चाहते थे, वहां गांधीजी की परिकल्पना खंडित हुई थी और निश्चित रूप से गांव और शहर दो भिन्न यथार्थ से रूबरू थे। सुरेंद्र चौधरी ने नेहरू युग के अंतर्विरोधें को अलग-अलग तरीकों से लगातार व्याख्यायित करने की कोशिश की और इसके साथ रचनाशीलता की संलग्नता को चिन्हित भी किया। इन अंतर्विरोधें को पाटने की समस्या ही तात्कालिकता के समक्ष सबसे बड़ी चुनौती थी। स्वातंत्रयोत्तर हिंदी कहानी में जो तथ्य नई कहानी को कहानी से अलग करता था, वह निश्चित रूप से मध्यवर्ग का आत्मकेंद्रण था। ’62 के राष्ट्रीय हादसे से पहले दशक में निश्चित रूप से एक नवरोमैंटिक उत्थान था (नामवर सिंह के शब्दों में)। मगर जिसे पीड़ाभरी प्रतीक्षा कहा जाता है, उसके इतर इस प्रतीक्षा की सीमाओं को तोड़कर मुक्तिबोध वृहत्तर ऐतिहासिक अंतर्विरोधें से जूझ रहे थे। उनका सिनिकल और संशयवादी होना केवल आवेशजन्य नहीं था। ‘विपात्र’ और ‘क्लाड ईथरली’ की पीड़ा  प्रतिरोध, विद्रोह और स्वतंत्रता की एक पूरी दुनिया को रूपकों में ढालने का प्रयास था। अपने प्रयास में मुक्तिबोध जरूर अकेले थे लेकिन वहां निर्मल वर्मा का अकेलापन नहीं था। डॉ॰ चौधरी जोर देकर कहना चाहते हैं कि नई कहानी की संष्लिष्टता और उसका नयापन जिस रास्ते होकर आजादी के बाद की रचनात्मक परिस्थितियों और उसके अंतर्विरोधें को कैच करने की कोशिश कर रहा था, उसकी दुनिया मुक्तिबोध के रूपकों में ही साकार होती है। जिस प्रकार कविता मुक्तिबोध के यहां सारे रोमैंटिक आवेश उतार देती है, उसी प्रकार कहानीकार मुक्तिबोध के यहां भी भावुकता से उठनेवाली टीस और पीड़ाभरी प्रतीक्षा के बदले आहत नैरंतर्य का संकट केंद्रियता पाता है। नई कहानी की रचनाशीलता के केंद्र में व्यतीत होती व्यवस्था और चरित्रों के प्रति एक व्यथा भरा मोह है जो परिवार-समाज के अंतर्विभाजन के कारण पैदा हुई थी। ‘‘मुझे याद है कि पश्चिम में कथा साहित्य की बहस में जहां जॉर्ज स्पाइनर महाकाव्यात्मक और नाटकीय के बहाने दो सदियों की कथा यात्र के रचनात्मक सार पर बहस कर रहे थे, वहीं मार्क स्पिनका ने डिकेंस और काफ्का की आधुनिकता के केंद्र में परिवार-समाज को रखकर देखा था। ऐसे प्रयत्न अपने यहां न दिखाई पड़े। नामवर जी नई कहानी की बहस में परिवार, समाज को विशेष महत्व देते दिखाई न पड़े। (खंड 2, पृ. 28)

परिवार-समाज की इस केंद्रीयता का कोई कहानीकार था तो वो अमरकांत था। छोटे-छोटे क्रियाकलापों में कितने गहरे भावात्मक अर्थ छिपे रहते हैं, अपनी इसी पहचान के कारण अमरकांत की कहानियां अलग पड़ती हैं। परिवार के भीतर के जीवित रेशों से बनी कहानियां और परिवार के भीतर की भयावहता-दोनों कैसे राष्ट्रीय संदर्भ से जुड़कर भय और त्रास के बावजूद अपने संघर्ष को जीवित रखने की जातीय जिजीविषा से लैस हो सकती है- इसका विश्वास केवल अमरकांत की कहानियां देती हैं। ‘अमरकांत: जीवन की संभावनाओं के लिए संघर्ष’ शीर्षक आलेख नई कहानी के सबसे सशक्त कहानीकार को दुबारा देखने की एक कोशिश है। बड़े ताज्जुब की बात है कि अमरकांत पर कोई स्वतंत्र लेख न तो नामवर सिंह ने उस दौर में लिखा, न ही किसी और ने। डॉ॰ चौधरी का यह लेख उस महती आवश्यकता की पूर्ति करता है।

दूसरे खंड में संकलित डॉ॰ चौधरी के लेख एक बार फिर यह साबित करते हैं कि वह हिंदी के शीर्षस्थ कथा आलोचक हैं। ‘हिंदी कहानीः प्रक्रिया और पाठ’ के साथ कहानी के स्थापत्य को समझने का जो प्रयास उन्होंने शुरू किया था, वह उनके बाद के लेखन में भी लक्षित किया जा सकता है। प्रस्तुत संकलन के लेखों से गुजरते हुए हम लगातार उत्तरशती की कथायात्र करते हैं। इस कथायात्र में समकालीन से जूझते हुए कहानियों का भिन्न भिन्न रचना संदर्भ और उन रचना संदर्भों से झांकते हुए कहानी के स्थापत्य की भिन्न भिन्न भंगिमाएं मिलती हैं। प्रेमचंद के संदर्भ में उन्होंने जिस प्रकार कथावाचन को महत्व दिया था, उसी प्रकार बाद के कहानीकारों के यहां कथावाचक का हासिया किस प्रकार कहानी की रचना परिस्थिति को समृद्ध करता है, उसे भी समझने का प्रयास है। कला और जनवाद के रिश्ते भी डॉ॰ चौधरी के लेखन में निरंतर केंद्रीयता पाते रहे हैं। कथ्य की मार्मिक पहचान केवल नारों से तय नहीं होती। कहानी के भीतर जनवादी आंदोलन की अधिकांश कहानियां गढ़े गए यथार्थ की कहानियां हैं जो निश्चित रूप से यथार्थ के आतंक से पलायन है। अभिधत्मक पहचान और सर्वव्यापी चेतना कलारूपों के लिए मिथकों का आश्रय नहीं लेती। व्यापक और जटिल अनुभवों तक पहुंचने का एक रास्ता मिथकों को तोड़कर भी तय किया जा सकता है। इसके अमरकांत लगातार सिद्ध करते रहे।

सुरेंद्र चौधरी की कथा आलोचना पर विस्तृत बहस की जरूरत है। ये बहस हिंदी कथा आलोचना को नई दिशा दे सकती है। प्रस्तुत आलेख में उन सारे बिंदुओं को समाहित करना संभव नहीं है। खंड दो में मुक्तिबोध, भीष्म साहनी, प्रेमचंद और रेणु की कहानियों की विस्तृत समीक्षा के अलावा मार्क्सवादी सौन्दर्यशास्त्र पर भी एक बहस है। ‘हिंदी व्यंग्य की जातीय परंपरा और परसाई’ शीर्षक आलेख में एक विधा के रूप में व्यंग्य की आवश्यकता और शक्ति-दोनों को पहचानने का भी एक प्रयास है। समाज की विडंबना और उसके अंतर्विरोध जब तर्क की संगति से आगे निकलकर सादृश्यमूलक कल्पना का आधार लेती है तो वह व्यंग्य की बनावट में अपनी पहचान बनाती है। यह व्यंग्य दृष्टि परसाई के यहां अपने आलोचनात्मक यथार्थवाद के कारण ही केवल हास्य का माध्यम नहीं रह जाती। परसाई का व्यक्तित्व अपने युग के आत्मसंशय से ऊपर है। इसलिए वह ओजपूर्ण ढंग से अंतर्विरोधी स्थितियों पर प्रतिक्रिया करता है। एक नैतिक ऊर्जा की मद्धिम आंच में परसाई अपने चरित्रों और परिस्थितियों को पकाते हैं जिससे उनकी शैली तो अलग होती ही है, उसमें नया तासीर भी पैदा होता है। परसाई का व्यंग्य और उनकी गद्यशैली ठेठ अर्थों में हिंदी की जातीय परंपरा का निर्वाह करती है।

’90 के बाद की हिंदी कहानियों में घटना संकुलता के बीच से नई परिस्थितियों का कहानी में सार्थक उपयोग किस प्रकार हो- इस पर डॉ॰ चौधरी विस्तृत विवेचन करते हैं। सांप्रदायिकता जैसी थीम को ले करके फैशनपरक कहानियों का दौर भी चला था। डॉ॰ चौधरी कहते हैं कि तात्कालिकता के मोह में बाजार का गुलाम बनना एक बात है और विराट ऐतिहासिक संदर्भ को कहानियों में ढालना दूसरी बात। मानवीय गरिमा को केंद्र में रखकर लिखी गई दो कहानियों को डॉ॰ चौधरी अपनी समीक्षा का आधार बनाते हैं। प्रियंवद की कहानी ‘वे वहां कैद हैं’ एक पूरी पीढ़ी की दुश्चिंताओं और उलझनों को अपने केंद्र में रखती है। यहां उलझन, दुश्चिंताओं का कारण है या परिणाम-ये तो तय नहीं होता, परंतु तर्क और आवेशजन्य अपराध किस प्रकार मानवीय परिस्थितियों को एक मिथक में बदल देता है-वह पफर्क सामने आया है। छोटे-छोटे प्रसंगों से कैसे बड़ी पृष्ठभूमि का निर्माण होता है-प्रियंवद ने इसे अपनी कहानी कला में साधा है। डॉ॰ चौधरी लिखते हैं-‘‘कहानी के गद्य में प्रियंवद की अपनी अलग पहचान है। संवाद और दृश्य-दोनों इस गद्य से सजीव हो उठते हैं। मनुष्य की जटिल भावनाओं को नैतिक आवर्तों में डालकर देखने की एक विशेष कुशलता उनमें दिखाई पड़ेगी। न्याय और करुणा की सरहदों से एक साथ टकराता हुआ उनका गद्य संसार अथक और अक्षय शक्ति की सूचना देता है। अपनी पीढ़ी के वे अकेले गद्य लेखक हैं जिनमें मुझे ये विशेषताएं लक्षित होती हैं। कविता के मुहावरे में वे नहीं उछालते, जैसा उनके कुछ समकालीन उछालते हैं पर गद्य की पूरी काठी में लिरिक का स्पर्श होता है। (खंड 2, पृ. 265)

दूसरी कहानी है उदय प्रकाश की ‘और अंत में प्रार्थना’। व्यक्तिगत और अवांतर प्रसंगों से सार्वजनिक विडंबना को कैसे सामने लाया जाता है-इसे इस कहानी के संदर्भ में समझा जा सकता है। विषय साधारण ही हो, सारे क्रियाकलाप दैनिक जीवन के ही हों परंतु फिर भी उसमें कलात्मक उन्मेष कैसे हो सकता है-इसे प्रस्तुत कहानी से समझा जा सकता है। विभाजन के प्रेतों से लड़ता हुआ वाकणकर का व्यक्तित्व जिस आत्मसाक्ष्य की पीड़ा से गुजरता है, वह आधुनिक इतिहास में राष्ट्रीयता, वर्ण और ध्र्म तथा पूंजीवादी दुष्चक्र के जटिल संबंधें को कथा के भीतर मूर्त करता है। डॉ॰ चौधरी लिखते हैं-‘‘राज्यसत्ता के चरित्र को परोक्ष रूप से कहानी के गठन के साथ इस ऊंचे स्तर पर उजागर करने वाली कुछ ही कहानियां मैंने पढ़ी हैं। हिंदी कहानियों में किया गया ढेर सारा राजनीतिक लेखन इस स्तर तक नहीं उठता, इसके आसपास तक भी नहीं पहुंचता। उनमें क्रांति की उतावली में पूरी प्रक्रिया का सहज विसर्जन देखा जा सकता है।’’ (खंड 2, पृ. 272)

यह आधी अधूरी रूपरेखा मात्र है एक भुला दिए गए आलोचक के विशाल और सजग आलोचना कर्म का।  सच्ची आलोचना किस कदर गंभीर वैचारिक संघर्ष का परिणाम होती है इसे सुरेन्द्र चौधरी के लेखन में स्पष्ट ही देखा जा सकता है। सुरेन्द्र चौधरी पर बहस एक ऐतिहासिक ज़रुरत है। ज़रुरत है हिंदी की प्रगतिशील आलोचना की एक दूसरी परम्परा से संवाद की। बाकी फिर कभी।

(सुरेन्द्र चौधरी से संबंद्धित सारे उद्धरण अंतिका प्रकाशन से तीन खंडों में प्रकाशित उनके रचना संचयन से लिए गए हैं। विवरण नीचे उपलब्ध है। इस लेख का संशोधित-संपादित अंश अकार में प्रकाशित हो चुका है। मैं इसके लिए अकार का आभारी हूँ।)

मार्तंड प्रगल्भ

मार्तंड प्रगल्भ

मार्तंड प्रगल्भ जे.एन.यू. के भारतीय भाषा केंद्र में पी.एच.डी. के लिए शोधरत  हैं। फिलहाल लिडेन (नीदरलैण्ड) में अध्ययन-प्रवास कर रहे हैं। उनसे mpragalbha1@gmail.com पर संपर्क संभव है।

Published Books Of Surendra Chaudhary: 

  •  Hindi Kahani : Prakriya Aur Path (Hindi), Radhakrishna Prakashan, 1963, 1995
  • Phanishwar Nath Renu, Sahitya Academy, 1987
  • Itihas : Sanyaog Aur Sarthakata(I), Antika Prakashan, 2009
  • Hindi Kahani : Rachana Aur Paristhiti(II), Antika Prakashan, 2009
  • Sadharan Ki Pratigya : Andhere Se Sakshatkar(III), Antika Prakashan, 2009

घोंघा: संजीव कुमार (कहानी बहस के लिए)

इस कहानी के इर्द-गिर्द एक बहस कहानीकारों, आलोचकों और सुधि पाठकों के बीच चल पड़ी है युवा आलोचक आशुतोष कुमार ने अपने फेसबुक वाल पर अभी हाल में ही लिखा है- “संजीव कुमार की कहानी ‘घोंघा’ पर मित्रों में बहस जारी है हिंदी आलोचना के एक नए विमर्श के मुताबिक़ इसके ‘पोर्नोग्राफिक’घोषित हो जाने का खतरा भी है। इस कहानी को जल्दबाजी में न पढ़ियेगा। हमारे सामाजिक मन की बहुत भीतरी तहों में उतर कर उसे विचलित करने का माद्दा इस कहानी में है। लैंगिक, वर्गीय, समाज-आर्थिक प्रतिसंधों (faultiness)  के टकराव का यौन दमित समाज में युवा हो रही पीढ़ी के भावबोध पर कितना विनाशकारी असर हो सकता है,इसे समझना हो तो कहानी पढ़ लीजिये।” सवाल उठाये जा रहें हैं कि इस कहानी में कहन का जो खिलंदड़ा अंदाज़ लिया गया है ,वह  त्रासदी की भीषणता को घटा कर एक मनोरंजक गप्प में बदल देने की समसामयिक  हिकमत का नमूना तो नहीं हो  गया है? कथावाचन की क्लासिकी परम्परा को एक अमानवीय वृत्तांत की रचना के उपकरण के रूप में चित्रित करना क्या कहानी कहने- सुनने के कौतूहल मात्र को संदिग्ध नहीं बना देता ? स्त्री के प्रति सहानुभूति का दावा करती हुयी कहानी स्त्री की असहाय दशा का ग्राफिक चित्रण  कर ती कहीं पाठकों की दमित यौन भावनाओं को उत्प्रेरित करने का बहाना तो नहीं बन रही?

‘घोंघा’ कहानी जिस चुहलबाजी या ‘मनोरंजक’ उठान के साथ शुरू होती है, कहानी उसका निर्वाह नहीं कर पाती क्योंकि कहानी एक ट्रैजिक ‘अंत’ के साथ पाठकों के बीच खुलती है। कहानी अपनी शुरुआत के साथ ही जैसे पाठकों को अपने बीच साधारणीकृत कर लेती है. लेकिन यही शुरुआत कहानी के संपूर्ण प्रभाव में एक विस्मृत पार्श्व बन जाती है. क्लासिकल कहानियों की जो भी स्मृति हमारे कथा-संसार में विद्यमान हैं, उसका बहुलांश कहानी के ऐसे फॉर्म को सहजता प्रदान नहीं करता है. लेकिन एक बात तो स्पष्ट है कि यह कहानी अपने कथात्मक-स्वाद में भले दो स्तरों पर चलती हो लेकिन इन दोनों स्तरों का उत्स कहीं न कहीं एक ही सामाजिक-सच्चाई है. एक सवाल यहाँ वाजिब हो सकता है कि जिस सामाजिक सच्चाई को व्यक्त करने के लिए कहानीकार ने एक लोक-स्वीकृत फॉर्म, जो पाठकों को सहज ही कथा का आनंद देता है, को त्याज्य समझा, वह क्या इतना अनिवार्य था?

सवाल यह भी हो सकता है कि कथावाचकों का संसार क्या सचमुच इतना निष्करुण भी है? यह बात सिर्फ इसलिए नहीं कही जा रही  है कि कथाकार ने कथावाचन के लोकप्रिय अंदाज को विस्मृति के हवाले कर दिया बल्कि इसलिए भी कि चौपालों का कथानायक-कथावाचक ‘जितुआ’ कैसे निष्करुण और स्त्रीविरोधी समाज का प्रतिनिधि कारक के बतौर सामने आता है. 

इस कहानी का महत्व इसलिए भी सुरक्षित होना चाहिए कि यह कहानी एक ऐसे दौर में लिखी गयी है जब कहानीकारों के एक अतिप्रचारित तबके ने भाषा की ‘चुहलता’ के सामने मानों आत्मसमर्पण कर दिया हो. ऐसा नहीं है कि संजीव कुमार में उस ‘चुहलता’ की प्रतिभा नहीं है बल्कि उनके इस प्रतिभा की व्युत्पति एक सामाजिक-वैचारिक अभ्यास की कमानी पर कस कर होती है।
कोई सत्ता-प्रतिष्ठान रचनात्मक-संसार को कैसे गैर रचनात्मक बहसों में उलझाकर व्यक्तिगत लानत-मलानत में खींसे निपोरता है इसका सबसे बड़ा उदाहरण अभी हिन्दी के बौद्धिक समाज में देखने को मिल रहा है। ऊपर से तुर्रा यह कि बहस इस बहाने शुरू हुई कि रचना को देखना चाहिए न कि रचनाकार में पुष्ट उसके वैचारिक व्यक्तित्व को। 
तो इस प्रस्ताव के साथ हम इस कहानी को बहस के लिए प्रस्तावित करते हैं। हमें उम्मीद है कि कहानी विचारोत्तेजक लगेगी और आप भी कुछ टिप्पणीनुमा जोड़ना चाहेंगे। 

आप अपनी टिप्पणी-लेख-समीक्षा को इन पतों पर मेल कर सकते हैं- ashuvandana@gmail.com और  udayshankar151@gmail.com। धन्यवाद। 

Massacre in Korea By Picasso

Massacre in Korea By Picasso

घोंघा

BY संजीव कुमार

उम्र की दूसरी-तीसरी दहाई में अनगिनत बार मैंने वह सपना देखा होगा…

पर मुश्किल यह है कि अभी जब उस सपने से कहानी शुरू करना चाहता हूं, कुछ भी क़ायदे से याद नहीं आ रहा।

ये भी हो सकता है कि हर बार मैं उसे वही सपना समझता होऊं, पर वह वही न होता हो। कुछ अजीबो-ग़रीब चीज़ें हर सपने में एक-सी होती हों, जिनके चलते लगता हो कि सपना वही है। जैसे यह, कि शहर के अपने छात्रावास से निकलते ही मैं गांव की बूढ़ी गंडक नदी के घाट पर पहुंच जाता हूं! जैसे यह, कि गंडक-तट की रेतीली मिट्टी पर पड़े असंख्य घोंघों के बीच मैं बचता-बचाता चलता हूं और साथ में सोचता हूं कि मैं किसे बचा रहा हूं, ख़ुद को या घोंघों को? जैसे यह, कि नदी की सतह समतल न होकर उन्नतोदर है, बीच से उठी हुई! जैसे यह, कि बांध की ढलान पर सलवार-कुर्ते की एक जोड़ी पड़ी है, अपने होने में किसी के न होने को अनायास दर्ज करती। जैसे यह, कि अचानक मुझे पता चलता है, यह बूढ़ी गंडक नदी नहीं, बूढ़ा गंडक समुद्र है!! जैसे यह, कि मैं धरती से आसमान तक फैले डरावने जबड़े जैसी एक लहर से बचने के लिए भागता हूं और घोंघों के कठोर खोल के टूटने-चुभने से मेरे तलवे लहूलुहान होते जाते हैं और रफ़्तार ऐसी कि घोंघों से बस थोड़ी ही तेज़!

तो मुझे यह नहीं कहना चाहिए कि अनगिनत बार मैंने यह सपना देखा होगा। कहना चाहिए कि अनगिनत बार ये चीज़ें मेरे सपनों में आयी होंगी, जोड़-घटाव के अलग-अलग समीकरणों में उलझी।

इनके पीछे भी एक कहानी है। यों तो एक नहीं, अनेकों कहानियां होंगी, पर एक को मैं अपने पूरे होशोहवास में जानता हूं। उस एक कहानी के पीछे भी अनेकों कहानियां होंगी जिन्हें मैं बिल्कुल नहीं जानता।

हमारा कॉलेज गंगा के किनारे था। अंग्रेज़ों का बनवाया हुआ वह परिसर इतना विराट और जटिल था कि मैं विष्वास के साथ नहीं कह सकता कि स्कूल से निकलने के बाद के जो पांच साल मैंने वहां गुज़ारे, उनमें कॉलेज की इमारत के हर कोने को देख पाया होऊंगा। शहर की मुख्य सड़क पर–उसे ‘मेन रोड’ कहा भी जाता था–कॉलेज का प्रवेश-द्वार था, जिससे घुसने के बाद पेड़ों की क़तारों के बीच एक लंबा फ़ासला तय करके ही हम इमारत के भीतर के किसी ठिकाने तक पहुंच पाते थे। हमारा छात्रावास, कई और छात्रावासों के साथ, इसी परिसर में एक तरफ़ था, गंगा के ज़्यादा क़रीब। लेकिन एक ही परिसर के भीतर हमारे गौरवशाली कॉलेज और दयनीय छात्रावास की इमारत के बीच कोई तुलना न थी। दरअसल, उसे इमारत कहना ही अजीब लगता है। वह अंग्रेज़ों के ज़माने की एक फ़ौजी बैरक थी, करकट यानी ऐस्बेस्टाॅस की छत वाली, जिसे छात्रावास में तब्दील करने के बाद बेहतर तो क्या, ज्यों-का-त्यों बनाये रखने की भी कोई कोशिश नहीं की गयी थी। लिखित इतिहास पर भरोसा न करने वाले मेरे ज़्यादातर सहपाठियों का तो मानना था, और इसके लिए मौखिक स्रोतों के अनगिनत साक्ष्य उनके पास थे, कि वह फ़ौजियों की बैरक नहीं, उनका अस्तबल था जिसे छात्रावास में तब्दील करते वक़्त सिर्फ़ इतना किया गया कि हर कमरे के सामने की लोहे वाली बैरियर हटा कर वहां दीवार चुनवा दी गयी और एक दरवाज़ा निकाल दिया गया। इसके अलावा सब कुछ घोड़ों के हिसाब से ही बना रहने दिया गया। करकट की छत के नीचे लगी प्लाई की फॉल्स सीलिंग के बारे में उनका कहना था कि वह तो अंग्रेज़ों के घोड़ों के लिए भी ‘आवश्यक आवश्यकता’ की श्रेणी में आता होगा। वह न होती तो मई-जून के महीनों में, जब करकट की वजह से इन कमरों में अदृश्य आग जल रही होती, घोड़े शर्तिया बग़ावत कर बैठते और अंग्रेज़ों को यह साबित करने में अपने कई इतिहासकारों को झोंकना पड़ता कि चूंकि घोड़ों का सामंतवाद के साथ क़रीबी रिश्ता रहा है, इसलिए इस बग़ावत का मूल चरित्र प्रतिगामी है।

बहरहाल, निहायत घोड़ोपयोगी होते हुए भी हमारा छात्रावास बाहर कहीं किराये का कमरा लेकर रहने की बनिस्पत बहुत आरामदेह था। उसके आसपास खुला-खुला वातावरण था, उत्तर की तरफ़ कुछ क़दम के फ़ासले पर गंगा थी, चारों ओर काफ़ी बड़ी संख्या में पेड़-पौधे थे, और सबसे बड़ी बात कि एक ‘बबजिया’ की देख-रेख में चलने वाला किफ़ायती मेस था जहां 110 रुपये में महीने भर सुबह-शाम का खाना मिल जाता था। जिस मैथिल युवक को ‘बाबा’ के साथ सम्मानसूचक ‘जी’ और अपमानसूचक ‘आ/वा’ लगा कर ‘बबजिया’ कहा जाता था, वही मेस का कर्ताधर्ता और सर्वेसर्वा था। मेस में खाने के हक़दार तो हॉस्टलर्स ही थे, लेकिन आठ-दस बाहर के ग्राहक भी वह बनाये रखता था जिनसे वह उसी खाने के 140 रुपये वसूलता था।

बाहर के ग्राहकों में सिर्फ़ जीतेंद्र था जिससे बबजिया 110 रुपये ही लेता था, या कहिए कि ले पाता था। जीतेंद्र हमारे ही कॉलेज का विद्यार्थी था और हमारे छात्रावास के साथ उसका ऐसा रिश्ता था कि बहुत-से लोग उसे यहीं का अंतेवासी समझते थे। रहता भी पास ही था, उपप्राचार्य की कोठी के आउटहाउस में। प्राचार्य और उपप्राचार्य को कॉलेज के परिसर में ही अंग्रेज़ों के ज़माने की बनी कोठियां मिली हुई थीं। दोनों कोठियां गंगा के ठीक किनारे पर बनी थीं जिनमें पेड़ों और झाड़-झंखाड़ से भरा बड़ा-सा अहाता था। अहाते और गंगा की तरफ़ जाती ढलान के बीच कम्पाउंड वॉल थी जिसे अहाते की तरफ़ से देखो तो खेत की मेड़ से बस थोड़ी ही ऊंची नज़र आती, पर गंगा की तरफ़ से देखने पर उसकी ऊंचाई आठ फीट से कम न थी। प्राचार्य ने तो नहीं, पर उपप्राचार्य ने अपना आउटहाउस किराये पर एक मामा-भांजे को दे रखा था। जीतेंद्र वही भांजा था। उससे उम्र में तीन-चार साल बड़ा उसका मामा शायद ठेकेदारी के धंधे में हाथ-पैर मार रहा था। वह अक्सर सुबह जल्दी निकल कर देर रात लौटता था। इसीलिए हमारे मेस में खाना सिर्फ़ जीतेंद्र खाता था।

लंच और डिनर के समय के अलावा भी जित्तू का काफ़ी वक़्त हमारे छात्रावास में बीतता। बी.ए. अंतिम वर्श के सारे लड़के उसके मित्र थे और वह प्रायः किसी-न-किसी के कमरे में बैठा पाया जाता। ग़रज़ कि हमारा छात्रावास उसकी अड्डेबाज़ी का पसंदीदा ठिकाना था।

इस ठिकाने पर दो चीज़ों को उसकी विशिष्ट पहचान का दर्जा हासिल था। पहली चीज़ थी उसकी हंसी, जो किसी भी तरह की मासूमियत से कोसों दूर थी। हंसते हुए अक्सर उसकी आंखों में एक शैतानी चमक होती जो ऐसे सभी लोगों की आंखों में होती है जिनके भीतर दूसरों को नुकसान पहुंचा कर, या किसी भी तरीक़े से उन्हें मायूसी, हताशा या कुंठा में धकेल कर लुत्फ़ लेने की प्रवृत्ति होती है। लेकिन उसकी पहचान के रूप में स्थापित विशेषता यह नहीं थी। पहचान वाली विशेषता यह थी कि उस हंसी में घोड़ों की हिनहिनाहट और परिंदों के परों की फड़फड़ाहट का विचित्र संयोग था। हिनहिनाहट का संबंध गले से रहा होगा और फड़फड़ाहट का जीभ और होठों से। बल्कि यह कहना ज़्यादा सही होगा कि हिनहिनाहट उसकी हंसी का मूल स्वर था और फड़फड़ाहट उस लार की वल्गा को खींचे रखने का शोर जो हर हंसी के साथ जीतेंद्र के मुंह से बरबस बाहर की ओर चल पड़ती थी। ऐसी हंसी पूरे हॉस्टल  में किसी की नहीं थी। वह कॉरीडोर के कोने वाले कमरे में भी हंस रहा हो तो दूसरे कोने में बैठा बंदा समझ जाता कि जितुआ हंस रहा है। और जितुआ हंस रहा है, मतलब पूरी संभावना है कि उसके आसपास कोई-न-कोई परेशान या चिड़चिड़ा या बग़लें झांकता या मायूस या आहत है।

कॉरीडोर के एक कोने वाले कमरे से दूसरे कोने वाले कमरे तक आवाज़ों के पहुंच जाने का रहस्य यह था कि कमरों में लगी फ़ाॅल्स सीलिंग जगह-जगह से उजड़ चुकी थी और उसके तथा करकट की छत के बीच सभी कमरों को जोड़ता हुआ एक सुरंगनुमा ख़ालीपन था, क्योंकि कमरों के बीच की पार्टीशन वाली दीवार फॉल्स सीलिंग की ऊंचाई तक ही थी। लिहाज़ा किसी एक कमरे से उठती आवाज़ उस सुरंग में घुसने के बाद सभी कमरों में यथायोग्य बंट जाती। बिल्कुल पास के कमरों में उसकी गुणवत्ता उत्तम, थोड़े बाद वाले कमरों में मध्यम और ख़ासे दूर के कमरों में अधम होती।

और इस सुरंग से होकर आती आवाज़ों में से जीतेंद्र की हंसी ही नहीं, उसके गपास्टक की आवाज़ भी एकदम अलग से पहचानी जाती थी। जी हां, यह गपास्टक या कि़स्साग़ोई उसकी दूसरी पहचान थी। वह जहां भी बैठता, वहां धीरे-धीरे पांच-सात लड़के इकट्ठा हो ही जाते, क्योंकि वह एक-के-बाद-एक दिलचस्प कि़स्से इंतहाई सहज और ग़ैरबनावटी अंदाज़ में सुनाता जाता। महमूद और दानिश भी, जो इन दिनों दास्तानगोई की कला को दुबारा ज़िंदा कर रहे हैं, उससे कुछ-न-कुछ सीख सकते थे। वह जो कुछ सुनाता, उसमें आपबीती कितनी होती थी और कितना मनगढ़ंत, कहना मुष्किल है, लेकिन उसका दावा सच का होता और बातें सच्ची लगती भी थीं। यानी वह पत्रकारीय अर्थों में ‘स्टोरी’ सुनाता था जहां झूठ को भी सच के दावे और ढब के साथ पेश किया जाता है, साहित्यिक अर्थों में नहीं जहां हम सच को भी झूठ कह कर परोसते हैं। उसके पास दुनिया का विशाल अनुभव था जो कभी भी निःशेष न होने वाले खज़ाने की तरह उसके साथ चलता था और उसकी बातें सुन कर हम ख़ुद को कुंए का मेढ़क समझने पर मजबूर होते थे। हमारे पास दरी वाले सिनेमाघरों से लेकर पलंग और मसनद वाले सिनेमाघरों तक का तज़ुर्बा नहीं था। हमने कोठों और चकलाघरों का स्वाद नहीं चखा था। हमने ट्रकों में सफ़र करके लाइन-होटलों में रातें नहीं गुज़ारी थीं। हम कभी डब्ल्यू.टी. यात्रा करने के ज़ुर्म में जेल नहीं गये थे। हमने टिकटें ब्लैक में बेच कर उम्दा रेस्तरांओं में मुगऱ्मुसल्लम नहीं उड़ाया था। रहरी यानी अरहर के खेत देखने में कैसे होते हैं, यह हममें से ज़्यादातर को पता नहीं था, फिर भला हम कैसे जानते कि वह कामातुर जोड़ों के लिए अभयारण्य क्यों साबित होता है! निचोड़ यह कि जीतेंद्र के कि़स्से हमारे लिए अवैध और निषिद्ध ज्ञान का भंडार थे।

इस भंडार में यों तो लगभग हर चीज़ हमारे काम की थी, पर सबसे ज़्यादा काम की चीज़ थी उसका कामशास्त्र। उसे हम श्लेष में ‘काम’ की चीज़ कहते, क्योंकि वही हमारी अभावग्रस्तता (या शायद अकालग्रस्तता) और ग़र्ज़मंदी का सबसे अहम संदर्भ था। कहने को हम एक सहशिक्षा महाविद्यालय में पढ़ रहे थे, पर लड़कियां हमारे लिए उतनी ही दुर्लभ थीं जितनी पास वाले ब्वायज़ कॉलेज यानी ‘बंडाश्रम’ के लड़कों के लिए। हिक़ारत में दिये गये इस ‘बंडाश्रम’ नाम के बदले ब्वायज़ कॉलेज के लड़के हमारे बारे में कहने लगे थे कि साले, बात तो ऐसे करते हैं जैसे सहशिक्षा महाविद्यालय में नहीं, सहवास महाविद्यालय में पढ़ते हों। ये करमघट्टू, ताखे पर रखी हुई मिठाई देख-देख के रोज़ इतनी लार टपकाते हैं कि एक दिन जब मिठाई मिलेगी तब पूरी लार ख़त्म हो चुकी होगी, मिठाई घोंटी नहीं जाएगी।

बंडाश्रम वालों की इस बात का उत्तरार्द्ध भले ही शु द्ध खिसियाहट का नमूना हो, ताखे पर रखी हुई मिठाई वाला उपमान ग़लत नहीं था। लड़कियों के साथ हमारा संबंध वैसा ही था जैसा दिन और रात, सूरज और चांद के बीच होता है। कभी क़ायदे से मिल न पाना हमारी कि़स्मत में बदा था। बस, कक्षाएं थीं जो सुबह और शाम की भांति आधे-अधूरे ढंग से हमें पास आने का मौक़ा देती थीं। पता नहीं, कॉलेज के स्थपति ने कितना विराट गल्र्स कॉमन-रूम बनावाया था कि कक्षाओं में बैठी लड़कियों के अलावा बची हुई सारी लड़कियां उस कॉमन-रूम के पेट में समा जाती थीं। क्लास शु रू होने से दो मिनट पहले वे कॉमन-रूम से निकल कर क्लास-रूम के बाहर झंुड में खड़ी हो जातीं। उनके झुंड का रंग-ढंग देख कर मुझे रोयाल चिकेन सेंटर की वे मुर्गियां याद आतीं जो आसिफ़ मियां का हाथ पिंजरे के अंदर जाते ही मुंह दूसरी ओर घुमाये परले कोने में अंड़सने लगती थीं (ज़ाहिर है, उसमें मुर्गे भी होते होंगे, लेकिन मेरी याद में सब मुर्गियां बन कर ही आते)।… टीचर के आने पर उसके पीछे-पीछे वे क्लासरूम में प्रवेश करतीं और आगे की दो ख़ाली क़तारों में जाकर बैठ जातीं। इन क़तारों को उन्हीं के लिए ख़ाली छोड़ा जाता था। फिर क्लास ख़त्म होने पर वे टीचर के पीछे-पीछे क्लास-रूम से निकलती हुई सीधा गल्र्स कॉमन-रूम या किसी और क्लास-रूम की तरफ़ झुंड में बढ़ जातीं। ज़्यादातर लड़कियों को हम उनके राॅल नंबर से जानते थे, क्योंकि हाजि़री लगाने के लिए नाम नहीं, राॅल नंबर पुकारा जाता था। थक-हार कर उसे ही हमने उनके नाम का दर्जा दे दिया था। मिसाल के लिए, हमारे क्लास की तीन निहायत खूबसूरत लड़कियों के नाम थे, 84, 310 और 320। कॉलेज के 99 फ़ीसदी लड़कों को सालों-साल किसी लड़की से दो शब्द बात करने का मौक़ा न मिलता था और यही हाल 99 फ़ीसदी लड़कियों का था। बचे 1 फ़ीसदी लड़के और लड़कियां। तो उनकी बात ही अलग थी! वे हमें अपने शहर तो क्या, इस मत्र्यलोक के ही प्राणी नहीं लगते। उन्हें हम देवलोक का प्रतिनिधि मानते थे। हां, कभी-कभी जब कोई देवता हमारी दुनिया के किसी असुर से इस बात पर पिट जाता कि उसने उस लड़की से बात क्यों की जिसके पिता को असुर विशेष ने अपना ससुर मान लिया है, तब उसका देवत्व हमारे लिए संदेह के घेरे में आ जाता था।

ख़ैर, अकाल की इस चर्चा को यहीं विराम दें, क्योंकि वह हरिकथा की तरह अनंता है और आपके सामने मैं अपने अभावों का रोना रोने नहीं बैठा हूं। मैं तो…

या पता नहीं…

अच्छा, छोडि़ए! मैं क्या करने बैठा हूं, यह ख़ासा बहसतलब हो सकता है, पर फि़लहाल मैं जो कर रहा था, वह चर्चा थी जीतेंद्र की हंसी और कि़स्साग़ोई की। तो उसके कि़स्सों का जादू ही था जो हमें उसके आसपास मंडराने के लिए मजबूर करता था, वर्ना उसकी शैतानी हंसी का निशाना हम सब कभी-न-कभी बन चुके थे। और जब भी कोई उसका निशाना बनता, अविलंब यह क़सम खाता कि इस साले से अब कोई दोस्ती-यारी नहीं रखनी है… लेकिन बमुष्किल चैबीस घंटे बाद वह जितुआ के आसपास मंडराता पाया जाता।

ऐसे ही एक दिन, जब शैतानी हंसी का शिकार बनने के बाद खायी गयी क़सम का स्वाद मेरे मन की जिह्वा से उतरा भी न था, जित्तू ने रात के खाने के बाद और दोस्तों से अलग मुझे पकड़ा।

‘का रे चिकेन! गुस्सा हो?’ कहते हुए उसने मेरे कंधे के पास की गोलाई को बड़े मानीख़ेज़ अंदाज़ में दबाया। यह उसका प्यार जताने का ख़ास तरीक़ा था। उसके ‘चिकेन’ में चिकना होने और सुस्वादु खाद्य पदार्थ होने का अर्थ मिला हुआ था और यह संबोधन उसने ख़ास मेरे लिए सुरक्षित कर रखा था। यह शब्द मुझे सचेत रूप से कभी आपत्तिजनक नहीं लगा, पर शायद मेरे मन में इसने अनजाने ही कोई गांठ डाल दी थी जिसका कहीं-न-कहीं मेरी मोटी मूंछों के साथ संबंध है जिन्हें मैंने उन्हीं दिनों तराशना बंद कर फलने-फूलने के लिए छोड़ दिया था।

बहरहाल, कंधे की गोलाई को उसकी हथेली की पकड़ से आज़ाद कराते हुए मैंने उसे ‘बड़गाहीभाई’ की पदवी से नवाज़ा और कहा कि बताये, बात क्या है। वह पहले तो हिनहिनाती हंसी हंसता रहा, फिर मेरे और पास आकर धीमे से, लगभग बुदबुदाते हुए बोला, ‘आज केतनो गरिया लो भइवा, सब माफ है। हम त अंदर तक सिलाबोर (सराबोर) हैं… पूरा, जबर्दस्त!’

कह कर वह मुस्कुराती आंखें से इस बयान के असर को टटोलने लगा। उसे पता था कि वह गपास्टक का पहला टुकड़ा मेरी ओर उछाल चुका है और अब मेरा उपेक्षापूर्वक वहां से चलते बनना असंभव हो गया है।

असर तो सचमुच हुआ था, पर मैंने कोशिश की कि वह दिखे नहीं। बात को हल्के में लेने वाले अंदाज़ में कहा, ‘बेसी पेल मत। बताओ, का बात है?’

वह फिर हिनहिनाया, जैसे कहना चाहता हो कि लाख छुपाओ, छुप न सकेगा… वग़ैरा। फिर बोला, ‘आजकल धकाधक चल रहलउ हे, भइवा। रात दिन।’ कह कर उसने एक गंदा इशारा किया जिसका मतलब था कि रात-दिन चलने वाली चीज़, और कुछ नहीं, संभोग है।

सुन कर मैं चैंधिया गया होउंगा, क्योंकि वह मेरे चेहरे को देखते हुए, उस चेहरे की ओर तर्जनी से निशाना साधे हुए, इतनी ज़ोर से हिनहिनाया कि दूर खड़े सारे लड़के हमारी ओर देखने लगे। कुछ पलों बाद जब उसका हिनहिनाना रुका, तो हंसी के दबाव में उसकी आंखों से पानी बहने लगा था। ‘ओह, मजा आ गेलउ, भइवा,’ कहते हुए उसने मुझे कंधे से पकड़ा और जो लड़के इस हंसी के चलते समुत्सुक होकर हमारी ओर क़दम बढ़ा चुके थे, उनसे अलग ले चला।

अलग जाते हुए जो बात उसने लगभग फुसफुसाते हुए बतायी, वह इस प्रकार थी।

पिछली रात जब वह अपने मामू के साथ नाइट शो देख कर स्टेशन के पास के सिनेमा हाॅल से कैम्पस की ओर लौट रहा था, एक लड़की सड़क पर अकेली दिखी। मामा-भांजे ने सोचा, शायद पैसे पर चलने वाली है। थोड़ी ठिठोली करने की इच्छा हुई। टोका। लड़की बहुत घबरायी हुई थी। बात करने पर पता चला कि रात के दस बजे स्टेशन पर उतरी थी। सदर अस्पताल जाना है, जहां उसकी मां भर्ती है। पास में पैसे नहीं हैं और पैदल किस रास्ते जाये, उसे समझ नहीं आ रहा।… मामा-भांजे ने एक-दूसरे को देखा, आंखों ही आंखों में बातें हुईं। उपप्राचार्य, जिनकी कोठी के आउटहाउस में वे रहते थे, हफ़्ते भर के लिए सपरिवार बाहर गये हुए थे। इससे अच्छा समय और क्या हो सकता था! तुरंत एक रिक्षा रुकवाया। लड़की से कहा कि वे जहां रहते हैं, वह जगह अस्पताल के पास ही है, साथ आ जाये। लड़की उनके साथ रिक्षे पर बैठ गयी। मामा-भांजा उसे लिये हुए अपने कमरे पर आ गये। कॉलेज के विशाल परिसर में घुसने के बाद से लड़की यही समझती रही कि अस्पताल आ गया है। कमरे में लाने के बाद लड़की को धमका कर दोनों ने अपनी प्यास बुझायी। साथ में एक काम और किया। प्यास बुझाते समय उसके जो कपड़े उतारे थे, उन्हें एक बक्से में बंद कर ताला लगा दिया। लड़की अब बिल्कुल नंगी थी, इसलिए उसके भाग खड़े होने का सवाल ही नहीं था। तब से लगभग चैबीस घंटे गुज़र चुके थे। लड़की इस बीच सोई नहीं थी। उनके बिस्तर के एक कोने में घुटने मोड़े, अपनी देह से ही देह को ढंके बैठी थी, गठरी की तरह। मामू ने सुबह काम पर जाने से पहले इस गठरी को खोला था और उसके बाद से भांजा तीन बार खोल चुका था। हर बार वह लाचार-सी खुल जाती और गिड़गिड़ाती कि उसे एक बार अस्पताल पहुंचा दिया जाए, वह रात को फिर आ जाएगी। हर बार जितुआ उसे आष्वस्त करता कि एक दिन अच्छे-से भोग लेने दे, अगले दिन पहंुचा दिया जाएगा।

सच कहूं तो अब बिल्कुल याद नहीं कि इस बात को सुन कर मुझे कैसा लगा था। अंदर कहीं गुस्से का ज्वार उठा हो और मैंने जितुआ के मुंह पर थूक दिया हो, या दूर-दूर से हमें बातें करते देख रहे दोस्तों को बुला कर जितुआ की हैवानियत के लिए उसे सार्वजनिक रूप से ज़लील किया हो, या चुप रह कर मन-ही-मन संकल्प किया हो कि कल पुलिस को सूचना देकर उसके कमरे पर छापा डलवा दूंगा, या चेहरे पर याचक भाव लाकर उससे कहा हो कि हमरो दिलबा दे न, यार–ऐसा कुछ नहीं हुआ था। शायद जितुआ की हैवानियत के प्रति एक गहरी वितृश्णा और निर्वस्त्र स्त्री-देह की दुर्निवार रूप से सम्मोहक कल्पना के बीच मैं ठिठक गया था। शायद ये सी-साॅ के दो बाज़ुओं की तरह थीं, जिनकी बीच वाली टेक के दोनों ओर अपने पैर जमाये मैं सीधा खड़े रहने की कोशिश कर रहा था। इतना याद है कि छूटते ही कोई प्रतिक्रिया देने के बजाय कुछ क्षण ठहर कर मैंने कहा था, ‘साला, एकदम्मे जंगली है का रे? भाक्!’ और अपने कमरे की ओर चल पड़ा था। पीछे से हंसी के फ़व्वारे के साथ झरते उसके ये शब्द सुनाई पड़े थे, ‘जंगलवा में ई सब कहां मिलता है, भइवा!’

कमरे में लौट कर मैं अपनी मेज़-कुर्सी ठीक से जमा ही रहा था कि वह पीछे से फिर आ पहुंचा। ‘जंगली बनना है, शिशिर?’ इस बार उसका अंदाज़ गंभीर था, ‘सोच ले, भइवा! एक नंबर समान है। बाद में मत बोलना कि साला दोस्त काम नहीं आया। हम त अपना भर कोसिस करते ही हैं कि तू लोग को दुनिया का सब स्वाद चखवा दें।’

बेशक! अभी दो दिन पहले ही उसने हमें सामूहिक रूप से एक स्वाद चखवाया था। ब्लू-फि़ल्म का। उपप्राचार्य उसी दिन सपरिवार बाहर गये थे। उनके निकलते ही जितुआ ने ‘चंदा’ करके रात को अपने कमरे पर ब्लू-फि़ल्म का प्रोग्राम रखा (इससे पहले तक ‘चंदा’ हमारे लिए सरस्वती पूजा से जुड़ी शब्दावली का हिस्सा था)। डेढ़ सौ रुपये में टी.वी. सेट, वी.सी.पी. और कैसेट्स–रात भर के लिए। हम लपक कर और ललक कर इस आयोजन में शरीक हुए थे, एक अभूतपूर्व स्वाद की उम्मीद में खुदबुदाते। जित्तू के कमरे की ओर जाते हुए रास्ते में एक तज़ुर्बेकार साथी ने बताया था कि बेट्टा, जब सीन देखोगे न, त अइसा सांस फुलने लगेगा जइसे आॅक्सीजन कम पड़ गया हो। फस्ट टाइम वाला सब लोग का यही हाल होता है।

और सचमुच, हमारा यही हाल हुआ था।

लेकिन यह मेरे लिए थोड़ा परेशान करने वाली बात थी कि जित्तू ने जब जंगली बनने का न्यौता दिया, तब भी एकाएक मैंने उसी तरह सांसों का फूलना महसूस किया। फेफड़ों में एकाएक जैसे कुछ ज़्यादा जगह बन आयी थी और हवा जाने का रास्ता नाकाफ़ी लगने लगा था। एक मिनट तक मैं उसकी ओर पीठ किये अपनी मेज़ पर किताबें जमाता रहा, फिर एक शब्द में मैंने जवाब दिया, ‘कल।’ मेरी इस असहमत-सी सहमति पर वह फिर हिनहिनाया और कुछ ‘घाघ’ या ‘घुन्ना’ या ‘घोंघा’ जैसा कमेंट मारते हुए रुख़्सत हो गया।

‘हां रे साला, घाघ तो हम हैं,’ मैंने सोचा, ‘कल पता लगेगा। ई जान रहा है कि हम स्वाद के चक्कर में आ रहे हैं? जब लड़की को आजाद करा देंगे, तब समझ में आएगा, केतना घाघ हैं।’ मैंने ख़ुद को विष्वास दिलाया कि कमरे पर चलने का न्यौता पाकर मेरी सांसों का फूल आना, दरअसल, एक मज़लूम को आज़ाद कराने के दुस्साहसिक विचार से उपजे भय और रोमांच का नतीजा था।

वह एक बेचैन रात थी। जितुआ की हैवानियत के बारे में सोच-सोच कर मैं सो नहीं पा रहा था। साले ने पिछले चैबीस घंटे से किसी को क़ैद कर रखा है और वह भी इस हालत में! कल रात से वह अपने लाचार जिस्म पर सात-आठ दफ़े इन दरिंदों की ठोकरें झेल चुकी है।…और यह सिलसिला ऐन उस घड़ी शुरू हुआ है जब वह ऊपर वाले का शुक्र मना रही थी कि उसने आखि़रकार अपने दूत भेज कर उसे मां के पास पहुंचवा ही दिया। कॉलेज के विशाल परिसर में पेड़ों की क़तारों के बीच से गुज़रते हुए और दूर-दूर गलियारों और छात्रावासों के कमरों में जलती लाइटों को देखते हुए उसे तसल्ली हुई होगी कि इतने शांत और शानदार अस्पताल में मौत उसकी मां के आस-पास भी फटकने का साहस नहीं करेगी। शहर का सारा इंतज़ाम कितना ‘निम्मन’ है और लोग कितने ‘सुपातर’, उसने सोचा होगा। और इसके तुरंत बाद वह जैसे पहाड़ की चोटी से अंधेरे खड्ड में गिरी होगी। फिर मन और देह की भयावह पीड़ा से कराहती एक गठरी बन कर बिस्तर के कोने में धंस गयी होगी।

यह सब कुछ मैं शायद इन्हीं शब्दों में नहीं सोच रहा था, पर इतना तो याद है कि शब्दों में ही सोच रहा था। ध्यान जब भी भटक कर किसी और दिशा में जाता, मैं शब्दों और सुचिंतित वाक्यों से हांक कर उसे ग़ुस्से और हमदर्दी की उसी राह पर ले आता। अंततः मैंने तय किया कि कल कंचन’दी के घर से–वह उसी शहर में रहने वाली मेरी मौसेरी बहन थीं–एक जोड़ी कपड़े लेकर आना है, ताकि जितुआ के कमरे पर जाते ही उस लड़की को कपड़े दूं और उसके सदर अस्पताल जाने का इंतज़ाम करूं।

अगले दिन क्लास ख़त्म होते ही मैं कंचन’दी के यहां गया। उन्हें बताया कि नाटक खेलने के लिए सलवार-कुर्ते की एक जोड़ी चाहिए। वे इस शर्त पर कपड़े देने को राज़ी हुईं कि मैं रात का खाना वहीं खाऊं। रात का खाना खाकर अपने झोले में एक सलवार सूट रखे मैं नौ बजे छात्रावास पहुंचा।

जितुआ गेट पर ही मिल गया। वह डिनर के बाद अपने कमरे की ओर जा रहा था। मुझे देखते ही बोला, ‘का भइवा, कहां गायब हो जाते हो? साला दिन भर खोज खोज के तबाह हो गये।’ फिर पास आकर फुसफुसाया, ‘अबहीं चलबे?’

‘चल।’ मैंने कहा और उसके साथ हो लिया।

पिछली बार फूलती हुई सांसों के बीच मैं सिर्फ़ ‘कल’ कह पाया था, इस बार सिर्फ़ ‘चल’। चलते हुए मैंने एक बार अच्छी तरह कंधे से लटके झोले को टटोला। यह अपनी सांसों के फूलने को झुठलाने की कोशिश रही होगी।

कोठी पर पहुंच कर मेरी चाल ख़ुद-ब-ख़ुद धीमी पड़ गयी। जितुआ को मैंने दो क़दम आगे निकल जाने दिया। वह पैंट की जेब में चाभी टटोलता कमरे के दरवाज़े की ओर बढ़ा… पर यह क्या! वहां तो कोई ताला था ही नहीं। हाथ लगाते ही दरवाज़ा खुल गया। ‘अरे! खुलल कैसे है यार? मामू आ गये का?’ कह कर उसने हड़बड़ी में लाइट जलायी।

लाइट ने बताया कि मामू तो नहीं ही आये हैं, लड़की भी नदारद है।

जितुआ सन्न! ‘अरे, कहां गेलउ भइवा?’ वह ऐसे तड़फड़ाने लगा जैसे बिर्हनी के छत्ते में हाथ पड़ गया हो। झटाझट उसने कमरे के सारे कोने-अंतरे तलाश लिये।

मैंने ग़ौर किया, तीन दिन पहले के मुक़ाबले कमरे की रंगत थोड़ी बदली हुई थी। सामान तो अपनी पुरानी जगह पर ही थे–दरवाज़े के ठीक सामने की दीवार के साथ एक स्टोव और दो-चार बर्तन, बांयीं तरफ़ एक चैड़ी-सी चैकी और उस पर बिछा तोशक, फ़ोल्डिंग मेज़ पर कूड़े के ढेर की तरह रखी किताबें, पास ही जस्ते का एक बड़ा-सा बक्सा–पर तोशक को छोड़ कपास का कोई नामोनिशान नहीं था। बिस्तर पर चादर तक न थी और कमरे में आर-पार बंधी रस्सी, जिस पर ढेरों कपड़े टंगे होते थे, ख़ाली पड़ी थी। शायद मामा-भांजे ने सारा कुछ, एहतियातन, बक्से में बंद कर दिया था। उस बक्से पर अभी ताला लटक रहा था।

इन सारे सामानों के बीच वह ‘समान’ कहीं नहीं था। दरवाज़े की आड़ में एक देह भर का जो छोटा-सा गुप्त ठिकाना था, वहां भी नहीं। जितुआ दौड़ कर ग़ुसलख़ाने में झांक आया। वह भी ख़ाली था।

‘ले लोट्टा। लगता है, कमरवा बंद करके जाना भूल गये थे।… लेकिन कपड़ा त सब ताला में बंद है। साली लंगटे भाग गई का?’ कहता हुआ वह बाहर की ओर दौड़ा और फाटक से निकल कर हड़बड़ाया हुआ दोनों तरफ़ देखने लगा, इस दुविधा में कि किधर जाए।

                मैं कमरे के बारामदे पर खड़ा रहा। मुझे संदेह होने लगा था कि कहीं सब कुछ इस साले की कि़स्साग़ोई तो नहीं है! सोचता होगा, ऐसा कोई कि़स्सा बनाने से इसकी मर्दानगी का रुआब जमेगा।… वाह, क्या मर्दानगी है!… अब ये हरामी फाटक के पास से अपने कंधे झुलाये हुए लौटेगा और कहेगा, ‘भाग गेलउ रंडिया। साइद चद्दर-उद्दर कुछ बाहर छूट गेलई होत। ओही लपेट-उपेट के भाग गेलउ।’

उसकी ऐक्टिंग की ओर से मुंह फेर लेने की ग़रज़ से, या शायद किसी अंतःप्रज्ञा के चलते, या शायद यों ही, मैं फाटक से ठीक उल्टी दिशा में देखने लगा जहां पेड़ों और झाड़-झंखाड़ से भरा कोठी का विशाल अहाता था। अहाते के छोर पर खेत की मेड़ से बस थोड़ी ही ऊंची दीवार और आगे गंगा की ढलान। चांदनी रात में यह पूरा विस्तार बहुत रहस्यमय लग रहा था, क्योंकि कोठी की सारी बत्तियां बुझी हुई थीं। सिर्फ़ एक बल्ब था, जितुआ के कमरे का, जो मेरी पीठ के ठीक पीछे था। पर चांदनी में सब कुछ साफ़-साफ़ नज़र आ रहा था, गाछ-वृक्षों की हरीतिमा को छोड़ कर। सांवलापन ओढ़े ये गाछ-वृक्ष ऐसे लग रहे थे जैसे त्रिआयामी परछाईंयों में बदल गये हों। हवा थमी हुई थी। बाउंडरी वाल के आगे तेज़ी से धुंधली पड़ती चांदनी गंगा के विस्तार पर जाकर लगभग लुप्त हो गयी थी। वहां अंधेरा पसरा था और पानी की सरसराहट में सुनायी पड़ता सन्नाटा भी।

आधे मिनट मैं इस रहस्यलोक के किनारे पर खड़ा उसकी चैहद्दियां टटोलने की कोशिश करता रहा। वे जितनी पास थीं, उतनी ही दूर भी।… या शायद वे कहीं थीं ही नहीं। उनके एक साथ पास और दूर होने की अतार्किकता का यही निदान था।

पर उस रहस्यलोक के भीतर कुछ और था जिसने एकाएक मेरा ध्यान खींच कर मुझे हतप्रभ कर दिया और अगले एक-डेढ़ मिनट में वह सब हो गया जिसे बताने के लिए मैं इतने ब्यौरे पार करता यहां तक पहुंचा हूं।

मैंने देखा, दूर किसी मोटे तने की आड़ से झांकती एक गोरी बांह और कमर के कटाव से नीचे का सफ़ेद झक्क अर्द्धचंद्र! वह अपने नंगे जिस्म को एक उम्रदराज़ पेड़ की आड़ में छिपाने की नाकाम कोशिश कर रही थी। जिस्म का जो क़तरा तने से बाहर निकला था, उससे टकरा कर चांदनी जैसे बिखर-बिखर जाती थी। पेड़ कुछ बेतरतीब और विरल झाडि़यों के पीछे था। इसलिए कमर से नीचे की अधगोलाई किसी ढीले-ढाले जाल में उलझी-सी दिख रही थी।

मैं सांसों को संभालता कुछ क्षण रहस्यलोक में छिपे इस सबसे गहरे, किंतु अंशतः अनावृत, रहस्य को देखता रहा। इस बीच उसने तने के पीछे से अपना आधा चेहरा बाहर निकाला और एक आंख से इसी दिशा में देखने लगी जिधर आउटहाउस था, फाटक था और मैं भी। मेरे पीछे बल्ब से रौशन कमरे का दरवाज़ा था, शायद इसीलिए वह समझ न पाई हो कि मैं उसे ही देख रहा हूं। समझ पाती तो तुरंत अपने को छुपा लेने का कोई और जतन करती।

उतनी देर में मैंने अपनी सांसों पर थोड़ा काबू पा लिया था और मुझे याद आ गया था कि मैं इसे देखने नहीं, कपड़े देने आया हूं। मैं बारामदे से उतर कर उस ओर बढ़ गया।

और यही सारी गड़बड़ी की शुरुआत थी। मुझे आगे आता देख वह एकाएक सचेत हुई और वहां से भाग कर पीछे एक केले के पेड़ की आड़ में खड़ी हो गयी। एक कौंध की तरह उसका पूरा नंगा जिस्म दृश्य से होकर गुज़रा। किसी ग्लानि या घबराहट या महज़ एक अपरिचित-सी झेंप के चलते मेरे पैर बारामदे से चार क़दम आगे ही ठिठक गये और मैं कठपुलती की तरह पीछे मुड़ गया, जैसे यह साबित करना हो कि मैंने कुछ नहीं देखा। जितुआ उस समय फाटक के बाहर दाहिनी तरफ़ से लौट कर बाईं तरफ़ जा रहा था। उस पर नज़र पड़ते ही मैं वापस झुरमुट की ओर मुड़ गया।

भाग कर केले की आड़ में उसका जाना, बेशक, ख़ुद को बचाने की कोशिश में एक बेमतलब-सा क़दम था, पर कोई उपाय न देख कर वह लुका-छिपी के खेल में ही बचाव और प्रतिरोध का छद्म संतोश ढूंढ़ रही होगी। यह भी हो सकता है कि केले के नाटे क़द और नीचे को लटके हुए दुकूल-नुमा पत्तों से उसे कुछ ज़्यादा ही उम्मीद रही हो। वहां जाकर शायद उसे महसूस हुआ कि उसकी उम्मीद कितनी ग़लत थी; वह जितना छुप रही थी, उससे ज़्यादा दिख रही थी। मुझे अपनी ओर देखता देख वह स्तनों पर अपने हाथ बांधे पीछे खिसकने लगी। अब वह आड़ से बिल्कुल बाहर थी, पीछे को जाती हुई। उसके बाल बंधे थे। चेहरे से लेकर गर्दन तक का रंग गेहुंआं रहा होगा, तभी वह बहुत साफ़ नज़र नहीं रहा था, पर पूरी देह चांदनी में चमक रही थी।… दो-चार क़दम पीछे जाने के बाद ज़मीन पर गिरी हुई एक सूखी डाल से उसके पैर उलझे। जैसे आत्मरक्षा की कोई युक्ति अचानक सूझ गयी हो, उसने वह मोटी-सी डाल हाथों में उठा ली और उसे ध्यान नहीं रहा… या रहा भी हो… कि ऐसा करने से उसके स्तन पूरी तरह बेबाक हो गये हैं–डुबकी मार कर ऊपर को उठते गोताखोरों की तरह दो भारावनत स्तन…

बचपन के भूगर्भ की किन्हीं परतों में दबा परितृप्त स्पर्ष का एक अहसास मेरी हथेलियों, गालों और होंठों पर बिछलता चला गया।

क्या इसे ही जादुई यथार्थ कहते हैं?

मैं मंत्रविद्ध-सा जड़ हो गया। फिर से यह बात सांसों की धौंकनी में कहीं खो गयी कि मेरे कंधे पर लटकते झोेले में एक जोड़ी कपड़े इसी जादू और रहस्य को ढंकने के लिए हैं। शायद चांदनी का नीम अंधेरा न होता और उसकी देह की चमक ही नहीं, आंखों के डर को भी मैं देख पाता तो यह भूल न होती।… या कौन जाने, यह सिर्फ़ एक लाचारी भरी सफ़ाई हो! कैसे कह सकता हूं कि दिन के उजाले में भी उन आंखों को मैं देख ही पाता! क्या इस वक़्त मैं उसकी देह के अलावा और कुछ भी देख पा रहा था? उमस भरी रात में निस्तब्ध खड़े पेड़, अहाते की ठिगनी चारदीवारी, उसके पार धुंधली पड़ती हुई अंधेरे में गुम जाने वाली ढलान, गंगा के प्रवाह पर कहीं-कहीं रोशनी के कांपते प्रतिबिंब–ये सब मेरी निगाह के दायरे में रह कर भी अदृश्य थे। दृश्य सिर्फ़ एक जिस्म था।

पर यह सब, कुछ गिने-चुने लम्हों की ही बात थी। जब पीछे की ओर चलते हुए अहाते की छोटी-सी दीवार से उसके पैर अटके तो मुझे जैसे होश आया। मैं अपने ठिठके हुए क़दमों को झटक कर आगे लपका और चिल्लाया, ‘अरे, रुको! हम ई कपड़ा…।’ वाक्य बीच में ही छूट गया, क्योंकि मेरे लपकने और चिल्लाने को एक निर्णायक हमला मान कर उसने हाथ में पकड़ी हुई डाल मुझ पर फेंक कर मारी। वह सीधा मेरे चेहरे पर लगी होती अगर हाथों पर रोकते और नीचे झुकते हुए मैं ज़मीन पर न आ गिरा होता। उधर लड़की, शायद जवाबी हमला कर चुकने के बाद की घबराहट में, या मेरी आवाज़ सुन कर पीछे से दौड़े आते हुए जितुआ को देख कर, तेज़ी से पीछे मुड़ी और दो-ढाई फिट ऊंची उस दीवार पर खड़ी हो गयी जिसके बाद गंगा की ढलान शुरू होती थी।

तुरंत उस पार कूद जाने के बजाय वह अगले कुछ सेकेंड वहीं खड़ी रही। शायद पसोपेश में थी कि दूसरी तरफ़ का संसार न जाने कैसा हो। पर यह पसोपेश, निस्संदेह, उसे बेमानी लगा होगा, क्योंकि दुःस्वप्न जैसे इन दो दिनों से ज़्यादा बुरे दिनों की कल्पना भी नामुमकिन थी।

या शायद उन क्षणों में उसकी निगाह दाहिनी ओर के घाट पर, छात्रावास का डिनर निपटाने के बाद तफ़री करते दो-तीन युवकों की ओर चली गयी हो और एक बार को उसने सोचा हो कि उनसे कोई मदद मिल सकती है या नहीं। पर वे उसे, निस्संदेह, एक नग्न स्त्री-देह की मौजूदगी से अनजान, इसीलिए फि़लहाल निश्क्रिय, दरिंदों की तरह नज़र आये होंगे।

या शायद उन क्षणों में उसने सामने, सीधी ढलान के छोर पर, क्रमशः विरल होते दूधिया घोल-जैसी चांदनी में ऊंघती गंगा मैया को एक बार आंख भर कर देखा हो और यह जानते हुए भी, कि इस बात का कोई मतलब नहीं है, ‘रच्छा’ की ‘बिनती’ की हो।

जो भी हो, उठ कर खड़े होते-होते उन क्षणों में मैंने जो देखा, वह मेरी सांसों और शब्दों पर बहुत भारी पड़ रहा था। उसकी पीठ मेरी तरफ़ थी और दीवार के ऊपर जहां वह खड़ी थी, नीम उजाला उसकी देह के आकार में धवल प्रकाश बन गया था।… उघड़ी हुई पीठ से लेकर कमर के कटाव से नीचे के उन्नतोदर विस्तार तक, लगभग स्तब्ध-अवाक् कर देने वाले सौंदर्य का यह भीषण सामना था।… मैंने उखड़ती हुई सांसों के बीच झोले में रखे कपड़े बाहर निकाल लिये और उन्हें हाथों में थामे एक पूरा वाक्य कह डालने की कोशिश की, लेकिन हकलाहट में कुछ बेमेल शब्द ही निकल पाये।…

या शायद वह भी नहीं… बस, कुछ निरर्थक ध्वनियां।

ऐन जिस वक़्त पीछे से भाग कर आता जितुआ मेरे पास तक पहुंचा, लड़की दूसरी तरफ़ कूद गयी और तीर की तरह दौड़ती हुई, मेरी दुःकल्पना की हदों से भी आगे, ढलान पार कर गंगा में समा गयी। शांत लहरों में एक तेज़ हड़कंप हुआ, जैसे दो-तीन बड़े पत्थर एक के बाद एक फेंके गये हों। पर इतना ही। लहरें फिर शांत हो गयीं। दाहिनी ओर के घाट पर बैठे युवक चैंक कर खड़े हो गये और कौतुक से उधर देखने लगे। उन्हें अपनी बांयीं आंख के कोने से जो कुछ दिखा होगा, वह एक पहेली की तरह लग रहा होगा, जिसे वे समझने की कोशिश कर रहे थे।

मैं अब तक दौड़ कर अहाते की दीवार के पास आ गया था। तभी पीछे से जितुआ ने कॉलर पकड़ कर मुझे पेड़ों की आड़ में खींच लिया।

‘भोंसड़ीवाले, सबके नजर में आने का सौख है का?’ वह ग़ुस्से में था।

‘अउ ई का है?’ मेरे हाथ से कंचन’दी का सलवार-सूट खींचते हुए उसने पूछा।

बात समझते उसे देर नहीं लगी।

‘भोंसड़ी के, हम विलेन बनके माल को लें और तू हीरो बनके? एही सोचे थे?… साला, घोंघा!’

शायद मुझे दुबारा कहना चाहिए–बात समझते उसे देर नहीं लगी।

कपड़े मेरे मुंह पर मारते हुए वह अपने कमरे की ओर बढ़ गया। जाते-जाते कहता गया कि तुरंत दफ़ा हो जाऊं, क्योंकि नीचे जिन लड़कों को कुछ गड़बड़ का अंदेशा हुआ है, वे आते ही होंगे।

घाट की ओर से पहेली को हल करने की हलचल लगातार कानों तक आ रही थी। अलबत्ता पानी की हलचल शांत हो गयी थी। गंगा की छाती पर कोई शोर नहीं था।…

क्या उसने इस डर से हाथ-पैर भी नहीं मारे कि कहीं कोई बचाने न आ जाये और कहीं उसकी निर्वस्त्र देह उसके चैतन्य रहते बाहर न निकाल ली जाये?…या क्या पानी की चादर ओढ़ कर उसे इतना सुकून मिला कि पिछले अड़तालीस घंटों से जगी हुई आंखें गहरी नींद में मुंद गयीं?…

भगवान जाने, उसे तैरना आता भी था या नहीं?…

मैं काठ बना कुछ देर पेड़ों के झुरमुट से गंगा को देखता रहा…

पर मेरे पास ज़्यादा समय नहीं था। मुझे दूसरे रास्ते से भाग कर घाट पर खड़े लड़कों में शामिल होना था ताकि इस घटना का कोई सूत्र मुझ तक पहुंचता न लगे।

तेज-तेज़ चलते हुए मैंने सलवार-कुर्ते की जोड़ी को अंदर डाला… और शायद ख़ुद को भी… साला, घोंघा!

संजीव कुमार

संजीव कुमार

संजीव कुमार। युवा आलोचक और कहानीकार। ‘जैनेन्द्र और अज्ञेयः सृजन का सैद्धांतिक नेपथ्य’ पुस्तक के लिए देवीशंकर अवस्थी सम्मान। दिल्ली विश्विद्यालय के देशबंधु कॉलेज में  प्राध्यापक। इनसे sanjusanjeev67@gmail.com पर संपर्क सम्भव है।

कहानी ‘बनास’ से साभार प्रस्तुत है। 

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