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कबीर का करघा और मुक्तिबोध का वामपंथी इन्टेलेक्ट: विष्णु खरे

यह बात-चीत इसी साल जनवरी की है. मौका था जयपुर समानांतर साहित्य उत्सव का. विष्णु खरे भी वहां आये हुए थे. बात-चीत में अनिल यादव, रवि प्रकाश, सुधांशु, अविनाश और उदय शंकर भी शामिल थे. # मार्तंड प्रगल्भ

Vishnu-Khare-Hindi-Kavita

साहित्यकार विष्णु खरे. (जन्म: 9 फरवरी 1940 – अवसान: 19 सितंबर 2018) (फोटो साभार: हिंदी कविता/यूट्यूब

 

 

विष्णु खरे के साथ एक अधूरी बातचीत: मार्तंड प्रगल्भ

प्रश्न मुक्तिबोध को लेकर अभी जो उत्सव चल रहा है, और जैसा कि मनमोहन कह रहे थे कि यह उत्सव और विस्मृति दोनों का साथ-साथ चलना है, यह दोनों दरअसल एक ही सिक्के के दो पहलू हैं, तो इसी सिलसिले में इन सब के बीच मुक्तिबोध को लेकर आपकी अपनी जीवन-प्रक्रिया और रचना-प्रक्रिया में ही जो अनुभव रहे हैं उसे थोड़ा साझा करते हुए, उनसे जो पहली मुठभेड़ है, उसे बताएं!

वि.ख. मुक्तिबोध का जो पहला संग्रह आया था तो मैं शायद उसे पहले पढने वालों में से एक था. बाद में मैंने अपने कॉलेज, रतलाम कॉलेज में एक छात्र से उसपर एम्.फिल. भी करवाया था, हिंदी में. वह मुक्तिबोध पर पहला एम्.फिल. है, पैंसठ में. कहने का मतलब है कि मुक्तिबोध का बहुत गंभीर प्रभाव मुझ पर तभी था. मुक्तिबोध का असर कोई नयी चीज़ नहीं है. मेरे यहाँ तो अभी तक चालू है. अभी कम नहीं हुआ है. उसकी वजह शायद यह है कि मैं खुद लिखने वाला हूँ और मैं एक कमिटेड राइटर भी हूँ, मुक्तिबोध हमारे लेखक हैं. हमलोग वामपंथी लोगों के वे कवि हैं. तब से लेकर अब तक मुक्तिबोध मेरे जीवन में और मेरे लेखन में केन्द्रीय रहे हैं. लेखन माने उनका जो आईडियोलॉजिकल असर है, उनका कमिटमेंट है, वह हमारे लिए एक लाइट हाउस की तरह है. हांलांकि यह भी सच है कि मुक्तिबोध की आमद के पहले ही मैं वामपंथी था. मुक्तिबोध से मेरे वामपंथ को ताकत मिली है. मैं उनको पढ़ कर वामपंथी नहीं हुआ. मैं पहले से था. मुझ पर मैक्सिम गोर्की का असर था. मुक्तिबोध बाद में आते हैं. लेकिन आजतक मुक्तिबोध के बिना मैं कुछ भी साहित्यिक सोच नहीं पाता. यह एक तरह से ऐसी उपस्थिति है जो कभी कम नहीं होती है.

प्र. मुक्तिबोध की राजनीतिक प्रतिबद्धता निश्चित रूप से एक लम्बे ट्रेडीशन में है. वामपंथ एक वैश्विक परम्परा थी जिससे मुक्तिबोध अपने तईं नया रचने की कोशिश कर रहे थे. हिंदी या भारतीय या इस पूरे उपमहाद्विपीय संदर्भ में राजनीतिक प्रतिबद्धता के कवि के रूप में मुक्तिबोध प्रगतिशील आंदोलन में नया पक्ष क्या रख रहे थे?

वि.ख. मुक्तिबोध ऐज़ सच प्रगतिशील आंदोलन में नहीं थे. मुक्तिबोध की सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि वे किसी भी इस तरह के मूवमेंट से अलग रहते हुए अपनी केन्द्रीय जगह बनाए हैं. यह बहुत आश्चर्य की बात है. यह हिंदी की ताकत की बात भी है कि मुक्तिबोध को समझने में हिंदी को किसी वामपंथी धारे की ज़रुरत नहीं पड़ी और वह मुक्तिबोध को मुक्तिबोध बनाने में कोई बैसाखी नहीं बनी. यह बहुत बड़ी बात है. मुक्तिबोध अभी भी इंडिपेंडेंट हैं. मुक्तिबोध को आप किसी भी इस तरह के स्कूल में बाँध नहीं सकते. मुक्तिबोध का जो पूरा होना है वह मृत्यु के बाद का है. एक बड़ी विचित्र बात है कि हिंदी में कोई लेखक मृत्यु के इतने दिनों बाद तक बना रहा. मुक्तिबोध मरता नहीं है. मुक्तिबोध की प्रतिष्ठा में, मुक्तिबोध के फेम में, मुक्तिबोध के एक्सेप्टेंस में कोई फ़र्क नहीं आया है बल्कि मुक्तिबोध निर्बाध बढ़ रहा है. आप देखिये न मुक्तिबोध के ज़माने का, और उनके पहले का भी, पूरा प्रगतिशील स्कूल नष्ट हो गया. इनके पहले के बड़े-बड़े कथित प्रगतिशील कवि खत्म हो गए. मुक्तिबोध का मुक्तिबोध होना और इतने बड़े कवि-समुदाय द्वारा स्वीकृत होना अजीब है. हमलोग कह सकते हैं कि हमने मुक्तिबोध को सबसे पहले समझा. मुक्तिबोध अगर हमारे बगैर भी इतना बड़ा हो गया और होता जा रहा है तो मुक्तिबोध की ताकत का वह रेशा ढूंढना चाहिए कि वह क्यों एक्सेप्टेड है. क्योंकि मुक्तिबोध की ईमानदारी टोटली ट्रांसपैरेंट है. टोटली. वहां पर कोई ओपेक्नेस है ही नहीं…ट्रांसपैरेंट है.

प्र. यह जो इंडिपेंडेंट लेफ्ट की बात आप कह रहे हैं कि जितनी भी प्रगतिशील परम्पराएं थीं मुक्तिबोध उनसे अलग रह कर, बिना स्कूल का अनुकरण किये, और बिना किसी स्कूल का पालन किये या बिना किसी मठ में गए और बिना कोई मठ बनाने की प्रक्रिया में शामिल हुए, जिस इंडिपेंडेंट लेफ्ट की धारा को प्रेरणा देते हैं, उनकी प्रतिबद्धता का यह अंश आपको प्रेरणा कैसे देता है?

वि.ख. टोटली.

प्र. अभी के समय में अगर कहें कि इस तरह के किसी इंडिपेंडेंट लेफ्ट की जगह अगर बन रही है तो उसका स्वरुप या उसकी पॉलिटिक्स को हमलोग कैसे समझ पायेंगे?

वि.ख. देखिये जिस तरह आप मुक्तिबोध की पॉलिटिक्स को समझते हैं वैसे ही आपको हमलोगों की भी पॉलिटिक्स समझनी पड़ेगी. अगर आप मुक्तिबोध को समझते हैं और हमलोग उनके आस-पास भी कहीं हैं, तभी आप हमें समझेंगे. अगर हमलोग बेईमान हैं तो आप समझ जायेंगे कि यह बेईमानी है. उसका कोई फ़ॉर्मूला नहीं हो सकता है. यह अजीब बात है कि मुक्तिबोध आपको खुद अपना जज होने के लिए प्रेरित करता है. वह फ़ॉर्मूला नहीं देता. वह कह रहा है कि तुम जज करो…मुझे भी जज करो. तो यह जो अपने प्रशंसकों को भी खुला छोड़ना, चुनाव के लिए, जजमेंट के लिए, यह बहुत बड़ी बात है. अच्छा पर यह ज़रूर कहूँगा कि जो आपने बात की न इंडिपेंडेंट लेफ्ट… तो ऐसा कोई मूवमेंट मुक्तिबोध ने नहीं चलाया, न हमलोग चला रहे हैं. हमलोग टोटली लेफ्ट हैं, ऐसा सोचते हैं. लेकिन बाकी जो अपने आप को लेफ्टिस्ट क्लेम करने वाले लोग हैं उनसे हम अलग हैं.

प्र. यहाँ हम इसी अंतर को थोड़ा और मूर्त तरीके से समझना चाह रहे हैं!

वि.ख. मुक्तिबोध एक तरीके से टोटल आर्टिस्ट था. टोटल आर्टिस्ट. वह यह नहीं देखता कि कौन सुनता है, क्या करता है. वह लिखता था और अपना पूरा लिखता था. इसी तरह आपको यह देखना पड़ेगा कि आज का कौन सा कवि है जो इंडिपेंडेंट लिख रहा है और मुक्तिबोध के वैल्यू से डिग के नहीं. हो सकता है कि हममें से कोई मुक्तिबोध से भी आगे जाय, सोच में. यह पॉसिबल है क्योंकि दुनिया बदल रही है और बदल रही है तो मुक्तिबोध को भी बदलना पड़ेगा. आज जहाँ मुक्तिबोध है, आज से बीस साल बाद मुक्तिबोध रह नहीं सकते. लेकिन कोई आदमी आएगा या कुछ लोग आयेंगे, कई आदमी आयेंगे जिनमें मुक्तिबोध दिखेगा आपको. पूजन के सेन्समें नहीं  , विचारधारा के सेन्स में, कमिटमेंट के सेन्स में, आप ऑलरेडी देखते हैं, और साफ़ है कि हमारे लोग मुक्तिबोध के हैं और कई लोग नहीं हैं. जो हमारे साथ नहीं है, मुक्तिबोध के साथ नहीं है, वे भी बुरे नहीं हैं. यह हम मानते हैं कि मुक्तिबोध के साथ रह कर आप कहीं ज्यादा सीखते हैं, कहीं ज्यादा बड़े होते हैं. हम मुक्तिबोध को छोड़ नहीं सकते अकेले क्योंकि वह हमें नहीं छोड़ता. वह हमारे पीछे पड़ा हुआ है. लगातार. क्योंकि मुक्तिबोध को समझना बाक़ी है. मुक्तिबोध को पूरा पढ़ा जाना बाक़ी है.

प्र. मुक्तिबोध की दो प्रचलित छवियों की बात करें तो एक ओर उनका शहीदी चित्र खींचा जाता है- असद ज़ैदी और कई अन्यों की स्मृति में मुक्तिबोध की शहादत की मुहर है, और दूसरी ओर उन्हें ब्रह्मराक्षस की सीमाओं में बाँधने की कोशिश की जाती है, ब्रह्मराक्षस की छवि गढ़ी जाती है. इन छवियों की आलोचना आप कैसे करते हैं?

वि.ख. देखिये इन दोनों छवियों को मैं सही नहीं मानता. कारण ये है कि मुक्तिबोध शहीद नहीं थे इस तरह से. मुक्तिबोध को शहीद मानकर केवल रफा-दफा किया जा सकता है. मुक्तिबोध की व्याख्या उनके टोटल वर्क पर होनी चाहिए. उनकी शहादत हमें भूलनी पड़ेगी. वरना हम उनके पूजक बन के रह जायेंगे. मुक्तिबोध हमारे पास एक बहुत बड़ी सम्पदा हैं. आज भगत सिंह को कौन मानता है? कोई नहीं मानता. भगत सिंह भगत सिंह बना दिए गए बस. शहीद-ए-आज़म बन गए. मुझे मुक्तिबोध को हिंदी कविता का या हिंदी साहित्य का शहीदे-आज़म नहीं बनाना है. वह जिंदा हैं. अपने वर्क में जिंदा हैं, हमारे जीवन में जिंदा हैं. क्योंकि वह हमारे जीवन के लिए यूजफुल है. आज भगत सिंह यूजफुल नहीं रहे. लेकिन मुक्तिबोध हमारे लिए क़दम-क़दम पर यूजफुल हैं. इसलिए मैं न शहीद और न ही उन्हें ब्रह्मराक्षस मानता हूँ. यह एक तरह से मुक्तिबोध को मिस्टीफाई करने की बात है, बिला वजह. मुक्तिबोध को ब्रह्मराक्षस मानना, उनको भाजपा की गोद में डाल देना है. मुक्तिबोध के साथ कुछ भी मिस्टिक नहीं किया जा सकता. वह मिस्टेरियस आदमी नहीं था. मिस्टिक नहीं था वह. वह तांत्रिक नहीं था. उसके पास सभी अलामतें थीं कि वह दुनिया देख रहा था. अब आप कहेंगे मुक्तिबोध खुद तांत्रिक हो गए थे, यह बेवकूफी है. मैं इन दोनों खेमों को मुक्तिबोध के लिए बहुत हानिकारक मानता हूँ, और मुक्तिबोध के लिए क्या, जो मुक्तिबोध को पढ़ते हैं उनके लिए. मुक्तिबोध पर हमले की कोशिश जो लोग कर रहे हैं, वह मैं समझता हूँ ब्रह्मराक्षस वाला खेमा है. अब दिक्कत क्या है कि बहुत सारे लोग हैं हिंदी कविता के वे मुक्तिबोध को बड़ा मानना नहीं चाहते अपने से. इन्हें लगता है कि अगर मुक्तिबोध ही मुक्तिबोध रहेगा तो हम कहाँ जायेंगे. मुझे लगता है कि असद ज़ैदी वगैरह लोगों में यही ग्रंथि है कि भाई हम भी कुछ हैं. कुछ हमारी बात भी बने. मुक्तिबोध क्या होता है! और कब तक रहोगे मुक्तिबोध के! मेरी बात तो यह है कि मैं मुक्तिबोध से आगे जाते हुए भी उनका गुलाम हूँ. यह सब कुछ उसी से सीखा है. उससे प्रेरित हुए हैं, तो कैसे कह दें कि भाई वह शहीद हो गया. शहीद हो गए? अरे वह जिंदा है. शहीद हुआ होगा तुम्हारे लिए. वह तो हिंदी के लिए भी शहीद नहीं हुआ. क्योंकि वह जिंदा रहना चाहता है भाई, काम करते हुए, तो उसको आप शहादत मत दीजिये. मेरा कहना यह है कि उन्हें कोई शहीद न माने और जो मानता है वह अपराधी है. मुक्तिबोध को शहीद मानना अपराध है. उसको मानो कि वह जिंदा है और हमारे बीच है. हम ज़िंदा हैं. मैं कहता हूँ कि मैं मुक्तिबोध हूँ, चलिए बहस कीजिये. हममें से जो भी फील करता है कि वह मुक्तिबोध का है- उसके अन्दर मुक्तिबोध बैठा है. यह बात है.

प्र. मुक्तिबोध की रचना-प्रक्रिया की विशिष्टता आखिर क्या थी या किस तरीके से वह प्रैक्टिस, वह विश्वदृष्टि हम तक अबाधित चली आ रही है?

वि.ख. मुक्तिबोध एक्चुअली एक विश्वचेता कवि थे. उनको सिर्फ भारतीय कवि मानना बड़ा गलत है. ‘बाचीज़ा-ए-अतफ़ाल है दुनिया मिरे आगे’. वह तमाशे की बात नहीं करता था. वह अकेला कवि है कबीर के बाद. कबीर ब्रह्मांडीय कवि हैं. मैंने कहा भी है कि कबीर का जो करघा है, माने जुलाहे का जो करघा है एक पूरी कायनात है. तो एक ओर कबीर का जुलाहापन और उसका करघा और फिर उसके बाद मुक्तिबोध का इन्टलेक्ट, वामपंथी इन्टलेक्ट. वामपंथी आदमी पूरी कायनात को इकठ्ठा देखेगा ही. वह अभिशप्त है. वह बिना दुनिया का जायज़ा लिए बल्कि कहिये कि बिना कॉसमॉस का जायज़ा लिए हो ही नहीं सकता.

प्र. कबीर के बाद मुक्तिबोध- अर्थात जिसे आरंभिक आधुनिक काल कहा जाता है वहाँ एक जुलाहे की, दस्तकार की, आर्टीजन कवि की विश्वदृष्टि और उनकी साधना के बाद मुक्तिबोध!

वि.ख. मैं आपसे कह रहा हूँ कि उस ज़माने की सबसे बड़ी टेक्नोलोजी करघा थी, करघे से बड़ी कोई टेक्नोलोजी थी नहीं पूरे विश्व में. कबीर उसका एक्सपर्ट है. वह समझता है सब चीज़.

प्र. लेकिन कबीर की आर्टीजनशिप की दुनिया और मुक्तिबोध की औद्योगिक सभ्यता की दुनिया में जो लीप है, ब्रह्मांडीय दृष्टि में जो यह लीप है, उसी संदर्भ में कि एक श्रमिक-कवि या कवि-कामगार जो अपने चारों ओर की दुनिया में सक्रिय है और इस वक़्त की ‘टेक्नोलोजी’ के सहारे जेनेरिक मनुष्यता की आत्मा को बनाने में लगा है- कॉसमॉस के भीतर, वैसी स्थिति में एक कवि-कामगार की राजनीति को रचनाप्रक्रिया में कैसे स्पष्ट करेंगे?

(यहाँ हमारी बात-चीत रुक जाती है. विष्णु-खरे का कोई पुराना मित्र उनसे मिलने आ चुके थे. आज जब कि खरे हमारे बीच नहीं है इसलिए इस बात-चीत को इसी रूप में आगे जारी रखना संभव नहीं है.)

मार्तण्ड प्रगल्भ

 

छात्र राजनीति और संस्कृति-कर्म में व्यस्त रहने वाले मार्तण्ड प्रगल्भ जे.एन.यू. के भारतीय भाषा केंद्र से पी.एच.डी. हैं. फ़िलहाल  रेडिकल नोट्स कलेक्टिव  के साथ कार्यरत हैं. उनसे mpragalbha1@gmail.com पर संपर्क संभव है            

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राजकमल चौधरी, और ज्याँ जेने की आतंरिक समीपता: सुरेंद्र चौधरी

सुरेंद्र चौधरी और राजकमल चौधरी गया कॉलेज, गया के दिनों से दोस्त थे. राजकमल की मृत्यु के तत्क्षण बाद मुक्ति-प्रसंग की समीक्षा लिखने के अतिरिक्त बहुत दिनों तक सुरेंद्र चौधरी ने उनपर लगभग नहीं लिखा. अपनी दुविधा को अपनी एक अप्रकाशित पुस्तक में वे कुछ ऐसे स्पष्ट करते हैं, ” मैंने राजकमल की कहानियों पर अब तक कुछ नहीं लिखा. मेरे मन में उस दोस्त लेखक के लिए एक संशय सदा बना रहा . क्या मैं इस आदमी के द्वारा उसके लेखन को जान सकता हूँ? क्या वह किसी भी अर्थ में पूर्ण होगा? उसके लेखन और समय से काफी दूर आकर मैं अपनी जिज्ञासा दुहरा भर सकता हूँ! मेरा ख्याल है कि वह अपने कथा-साहित्य के लिए याद किया जाय या न किया जाय  मगर मुक्ति-प्रसंग के लिए याद किया जाएगा.”

जहाँ तक मेरी जानकारी है, सुरेंद्र चौधरी ने राजकमल चौधरी की कृति-केन्द्रित एक ही लेख/समीक्षा लिखी है- मुक्ति-प्रसंग: एक और देह गाथा. इसके अतिरिक्त सुरेंद्र चौधरी के आलोचकीय-वृत्त में राजकमल चौधरी अक्सरहां नजर आते हैं. मुक्ति-प्रसंग की समीक्षा के अतिरिक्त अन्य प्रसंगों से दो उद्धरण यहाँ द्रष्टव्य हैं. #उदय शंकर

भावना से परिचालित होने वाले व्यक्ति का वेग तो समझा जा सकता है मगर उसकी को समझना बड़ा कठिन काम है, क्योंकि यह गति दिशा-निरपेक्ष होती है. समकालीन कवियों के एक अच्छे बड़े समूह की दिशाहीनता इसी वेग का परिणाम है. इस भावनात्मक वेग के काव्यात्मक उपकरणों को पहचानना बहुत मुश्किल काम नहीं है. आत्मोद्रेक की काव्य-शैली इसी भावनात्मक वेग से बनती है. उसकी नाटकीयता में आत्मसाक्षात्कार के घनीभूत क्षण बिरले ही होते हैं. राजकमल की आत्मोद्रेकपूर्ण काव्य-शैली के नकलची शायद ही उन घनीभूत क्षणों को पा सकेंगे जिसमें राजकमल का कवि अपने अनुभवों के सम्मुख अकेला था. फिर आत्मोद्रेक की यह काव्य-शैली वेग में जिस स्वाभाविक ढंग से अपने को तोड़ लेती है, आत्मक्षय करती है उसे दूसरे कहाँ से पाएँगे. वे बंदिशों को तोड़कर भी यह स्वाभाविक आत्म-विभाजन पैदा नहीं कर सकेंगे. राजकमल के लिए आत्मोद्रेक काव्य की शैली नहीं है, अनुभव का बंध (Mode of experience) है.

‘मुक्ति-प्रसंग’ में दो स्तरों पर काव्य-भाषा के अलग-अलग रूप मिलते हैं. उसका तंत्र अलग है. उनका व्यावहारिक रूप एक दूसरे से भिन्न है. यह द्विरूपता राजकमल की कविता में विशेष मानसिक तनाव के भीतर की अनिवार्यता अनिवार्यता है जो कि कविता में नहीं थी. ‘मुक्ति-प्रसंग’ में जहाँ एक ओर उपचार्हीं सीधी साहित्यिक संस्कार वाली बोलचाल की भाषा है, दूसरी ओर वही तंत्र के सिद्धपीठ की भाषा भी है, उसी क्षेत्र के रूपक हैं, काव्य-प्रकरण (allusions) हैं. मैं इस विशेष मनःस्थिति के भीतर के उपचारों की चर्चा एक विशेष कारण से कर रहा हूँ. इसी भीतरी-सन्दर्भ की कृच्छता चाहे जितनी संदेहजनक लगे, मगर आज की मानसिक परिस्थिति में यह असम्भाव्य नहीं है. आत्मीयता राजकमल की काव्य भाषा में, सीधी-सादी तेवर वाली भाषा भी है, मुहावरे समकालीन जीवन के पूरे विस्तार से चुने गए हैं.

 

mukti-prasang

मुक्ति-प्रसंग: एक और देह गाथा

By सुरेंद्र चौधरी

ज्याँ जेने पर सार्त्र ने अपनी पुस्तक के मार्फ़त लोगों को चौंकाया था, यों पुस्तक चौंकाने के लिए नहीं लिखी गयी थी जितनी एक विशिष्ट उद्देश्य से, अस्तित्वादी मनोविश्लेषण को उदाहृत-व्यवस्थित करने के लिए लिखी गयी थी. मुक्ति-प्रसंग में अज्ञेय का एक पत्रांश उद्धृत किया गया है और इसका कोई सम्बन्ध इस पुस्तक से नहीं है-कवि से उसके सम्बन्ध की बाबत मैं यहाँ नहीं कह रहा- इसलिए उसे हम चौंकाने, परिभाषित करने या बहलाने वाला वक्तव्य नहीं मान सकते. क्या अज्ञेय जी का यह कथन कि ‘मृत्यु का स्वीकार, मैं मानता हूँ, आत्मा की या यह न पसंद हो तो कहूँ कि चेतना की एक गहरी आवश्यकता है; और उस स्वीकार में एक तरह की स्वस्थता भी मिलती है,’ ‘मुक्ति-प्रसंग’ की रचना का वैचारिक आधार बन सका है? क्या राजकमल चौधरी की प्रस्तुत रचना के सन्दर्भ में उसकी कोई अनिवार्यता है? क्या हम ‘मुक्ति-प्रसंग’ की वस्तु से उसका कोई आत्मिक सम्बन्ध जोड़ सकते हैं?

‘मुक्ति-प्रसंग’ नाम से जैसा कि कुछ दिनों पूर्व तक प्रपद्यवादी मानते रहे हैं, इसकी सार्थकता प्रमाणित हो पाती है कि किन्तु नामों का भ्रम अक्सर व्यवहार में हुआ करता है. तत्काल हम नाम-माहात्म्य पर न जाएँ. चूँकि मृत्यु पूरी कविता की मनःस्थिति को परिभाषित करती है और उसके मानसिक सन्दर्भ में व्याप्त है, इसलिए मृत्यु की वास्तविकता पर बहस नहीं की जा सकती. किन्तु मृत्यु की प्रत्यक्षता से इनकार नहीं कर सकते. यह कहना भी झटके से संभव नहीं है कि ‘मुक्ति-प्रसंग’ में न तो मृत्यु को स्वीकार करने की क्षमता स्पष्ट हो पाती है और न उसे स्वीकार के साथ अलग कर देने की. हाँ, तत्काल ऐसा जरुर लगता है कि मृत्यु के केन्द्रीय मूड में एक ‘ओनानिस्टिक’ ऐन्द्रजालिक श्रृंखला है जो हमें अतिक्रांत करती है- कभी इस आत्मविगलन से हम खीजते हैं, कभी उसकी गहराईयों में झाँकने को विवश होते हैं. कभी-कभी ऐसा भी लगता है कि मृत्यु को स्वीकारने की अपेक्षा जीवन को नकारने में कवि अधिक सक्षम है. क्या राजकमल का देवता ‘मुक्ति’ नहीं है, नकारत्मक स्वतंत्रता, ‘पॉइंटलेस फ्रीडम’ है?  क्या राजकमल मृत्यु के वास्तविक सन्दर्भ में भी अपने पाताल लोक की संवेदना से मुक्त नहीं हो सका?

मृत्यु को स्वीकार कर उसे अलग कर देने की बात अज्ञेय जी ने जिस ‘हाइडेगेरियन’ स्तर से कही थी, लगता है राजकमल उसे ‘मिस’ कर गया. आत्मविषाक्त और आत्मविगलित अल्पनाएँ पूरी कविता के रूप पर इस तरह हावी हो गईं हैं कि मालूम पड़ता है जैसे उनके बीच अच्छी पंक्तियाँ, अच्छे टुकड़े अथवा कोई सशक्त मानस-प्रवाह दब कर रह गया. बहुत हद तक डॉ. माचवे के इस मंतव्य से सहमत हुआ जा सकता है कि कविता का निष्कर्ष न तो अज्ञेय जी की धारणाओं से संभव हो पाया और न कवि के अपने नकारात्मक वेग से ही. कुछ अनिश्चयात्मक स्थिति बनी रह जाती है. यह अनिश्चय मुक्ति और वरण दोनों के लिए नकारात्मक सिद्ध हो सकता है. फलतः राजकमल मुक्ति के रूप में अपने लिए जो मांग रखता है वह निरर्थक है, एक लम्बे और भावनात्मक काव्य-कर्म की यह निरर्थकता क्या बहुतों के लिए दुःखद नहीं होती?

अपने लिए व्यक्तिगत विश्वासों की एक दुनिया गढ़ लेना और उसमें रहते हुए वास्तविकता को पूरे आत्मवेग के साथ नकारते चलना जितना आसान है, मृत्यु के सन्दर्भ में उसका दबाव झेलना उतना ही मुश्किल. इतना ही नहीं, ज्यां जेने की तरह ही राजकमल भी जब विश्वासों की एक दुनिया गढ़ने के साथ अपने लिए कुछ ‘रिचुअल्स’ भी गढ़ने लगता है, तब समीक्षक के लिए यह आवश्यक हो जाता है कि वह इन क्रियाओं की आत्मिकता को केवल खारिज करने की उतावली न करे. जैन-धर्म-मन्त्रों के साथ गिन्सबर्ग तो आए हैं किंतु जेने नहीं आया, मगर क्या आंतरिक रूप से राजकमल जेने के समीप नहीं है? इसे कुछ लोग दूर की कौड़ी समझ सकते हैं.

राजकमल अपने लिए जिस दुनिया की मांग करता है उसकी कोई व्यवस्थित तस्वीर या नैतिक अनिवार्यता भी उसके दिमाग में है या वह केवल नकारना जानता है? पुस्तक की अंतिम कुछ पंक्तियों का स्वर ‘ऐम्वीवैलेन्ट’ है. वैसे विद्रोह इतना नकारत्मक नहीं होता, और फिर मुक्ति-प्रसंग विद्रोह की कविता कहाँ है? वह तो अनुभव के एक नितांत आतंरिक स्तर पर मृत्यु को स्वीकार कर जाने का दर्शन है! स्पष्ट है कि अज्ञेय का मंतव्य राजकमल की चेतना में प्रवेश करने से रह गया है, शायद उसकी दुनिया में यह मंतव्य है ही नहीं! जब वह कहता है कि ‘ मैं इस शव के गर्भ में हूँ और यह शव मेरे कन्धों पर है’, तब ऐसा लगता है कि अज्ञेय जी के शब्द उसकी चेतना पर ‘फलैट’ पड़ रहे हैं!

नकार के इस अबाध वेग के बावजूद इस प्रसंग में एक आर्द्र करने वाली आन्तरिकता है. यह आन्तरिकता कैसे परिभाषित होती है? क्या राजकमल के विश्वासों में? उसके पास विशवास नहीं है! वरण में? वरण की आत्मक्षमता भी उसमें वैसी उत्कट नहीं है! फिर? इस आन्तरिकता को न तो उसके नकार के दर्शन से परिभाषित किया जा सकता है और न ही उसकी स्वीकारात्मक शाब्दिक भूमिकाओं से ही. यह अनिवार्यता बनती है वस्तुतः जीने की उसकी लालसा से, इसी से वह परिभाषित भी होती है. जिजीविषा और मुमुक्षा तो राजकम के लिए केवल पारिभाषिक शब्द हैं!

मृत्यु की भयावहता का गहराता हुआ रंग पूरी कविता पर तो नहीं, मगर उसके कुछ अंशों पर तो इतना है कि केवल उन अंशों से जीवन के प्रति उसकी निर्लसता का वक्तव्य खंडित हो जाता है. ‘एनेस्थेशिया’ के प्रभाव की तरह यह रंग नीला है, मृत्यु का रंग, कूलक्षय करती हुयी नदी का रंग, असीम आकाश का रंग, अपूर्ण, अपनी कामनाओं से विवश स्त्री का रंग! आत्म-स्वीकृतियों में जरुर इमानदारी और सच्चाई है जो कवि को उनके प्रति मुक्त करती हुई मालूम पड़ती है. मसलन,

नदी के किनारे वापस चले आना, तुम्हारी नियति है,

हर बार प्रत्यागमन

वह आदि वर्ण वह नीलापन

तुम कभी नहीं पाओगे अपराजित कभी.

या…

 

सबके लिये सबके हित में

अस्पताल चला गया राजकमल चौधरी

लिखने-पढ़ने, गाँजा-अफ़ीम-सिगरेट पीने

मरने का अपना एकमात्र कमरा अंदर से बन्द करके

दोपहर दिन के पसीने, पेशाब, वीर्यपात

मटमैले अँधेरे में लेटे हुये

धुँआ, क्रोध, दुर्गंधियाँ पीते रहने के सिवा

जिसने कोई बड़ा काम नहीं किया

अपनी देह

अथवा अपनी चेतना में

इस उम्र तक.

यह आत्म-विवृति कभी आंतरिक अनुभव के स्तर पर गहरे अवसादक प्रभाव उत्पन्न करती है. जैसे इन पंक्तियों में:

जटिल हुए, किन्तु

कोई भी प्रतिमा बनाने योग्य नहीं हुए

उसके अनुभव!

अपने आन्तरिक और निकटतम देश में घूमता हुआ यह व्यक्ति कभी-कभी गहरी आत्मलीनता में गहरे मानवीय अर्थों के प्रति अवाचक सचेत हो गया-सा मालूम पड़ने लगता है. यों उसे अपनी व्यर्थता का पूरा-पूरा बोध है और उस व्यवस्था का भी, जिसने उसे इतना व्यर्थ बना दिया है! इस गहरे आत्मबोध से कवि से स्वर में निजता के साथ वास्तविक गहराई आ जाती है.

नहीं करूँगा औरों के अपराध

मेरे वकील और मेरे न्यायाधीश यहाँ नहीं

उस सफ़ेद ठण्ड कमरे में प्रतीक्षारत हैं मेरे लिए

यहाँ नहीं बोलूँगा

सफाई के वकील, अभी मैं चुप हूँ.

और अभी मैं चिंताग्रस्त हूँ.

इस चिंताग्रस्त मानस के कई मानसिक आयाम हो सकते हैं, वस्तुतः हैं. राजकमल खुद भी एक खुली पुस्तक है, इतिहास-पुरुष चाहे वह न भी हो. इस अर्थ में मुक्ति-प्रसंग का कवि पारदर्शी है, इसे उसकी कविताओं से भी जाना जा सकता है. गहरी होती मृत्यु-छायाओं के बीच भी राजकमल पारदर्शी है, रहस्य के रंग भरना उसे नहीं आता.

राजकमल की आन्तरिक्ता को इन थोड़े-से उदाहरणों से मैंने परिभाषित नहीं किया, वस्तुतः वह परिभाषा की चीज भी नहीं है. मगर हिंदी कविता के समकालीन स्वरुप से वह इस अर्थ में भिन्न है कि उसका त्रास, अकेलापन, मृत्यु से साक्षात्कार और इन सब मनःस्थितियों में जूझता हुआ कवि-मानस ‘फ़ेक’ नहीं है. इसी वास्तविकता ने मुक्ति-प्रसंग को दर्शन की रिक्तता की सीमाओं के बावजूद पठनीय बना दिया है.

***

सर्व-प्रथम, आलोचना, १९६७ के किसी अंक में प्रकाशित. फिर, उदयशंकर द्वारा संपादित सुरेंद्र चौधरी के प्रकाशित लेखों के संकलन के तीसरे भाग, ‘साधारण की प्रतिज्ञा: अँधेरे से साक्षात्कार’ में पुनर्प्रकाशित.

 

‘चांद’, ‘माधुरी’ और हिंदी नवजागरण : अविनाश मिश्र

अपने लेखकीय कर्म की प्रतिबद्धता, मूल्यनिष्ठता और व्यापकता के लिए प्रसिद्ध प्रियंवद का नया काम एक ऐसे वक्त में हमारे सामने आया है जब समता के संघर्ष कमजोर पड़ रहे हैं, न्याय की राह और मुक्ति की इच्छा नए सिरे से दमन के बीच है, राजनीति और पत्रकारिता पतनशीलता के शीर्ष पर हैं और हिंदी की साहित्यिक मेधा की ऊंचाई नापने के लिए ‘दैनिक जागरण’ की मदद ली जा रही है। इस स्थिति में प्रियंवद के संपादन में हिंदी नवजागरण काल (1929 ई. से 1933 ई. तक) की दो प्रमुख पत्रिकाओं — ‘चांद’ और ‘माधुरी’ — से रचना-चयन के सात खंडों का प्रकाशन एक महत्वशाली और प्रासंगिक घटना है। एक बेहद अश्लील सांस्कृतिक शोर और प्राचीनता-प्रेम के दरमियान, बहुत पीछे जाए बगैर यह प्रकाशन यह जानने का अवसर है कि कभी हमारी संस्कृति कैसी थी, हमारी बनावट कैसी थी, हमारे घर कैसे थे, हमारी प्राथमिकताएं और आवश्कताएं कैसी थीं, हमारा रहन-सहन और अन्न कैसा था, हमारी शिक्षा-दीक्षा, हमारी किताबें और पोशाक कैसी थी, हमारे नाटक, हमारी नाटक-मंडलियां और फिल्में कैसी थीं, हमारी पत्रकारिता कैसी थी, अभिव्यक्ति और विचारों की स्वतंत्रता और मूल मानवीय अधिकारों के लिए हमारा कभी न खत्म होने वाला संघर्ष कैसा था। # लेखक 

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तस्वीर सौजन्य: उदय शंकर

सारे सवालों की रोशनी में अंधेरा नजर आया

(‘चांद’ और ‘माधुरी’ चयन के सात खंडों के प्रकाश में एक प्रतिक्रिया और एक प्रसंग)   

 BY अविनाश मिश्र  

मैथिलीशरण गुप्त की ‘आर्य’ शीर्षक कविता की प्रारंभिक पंक्तियां — हम कौन थे, क्या हो गए हैं और क्या होंगे अभी / आओ विचारें आज मिल कर ये समस्याएं सभी — अपनी बहुउद्देशीयता की वजह से कभी पुरानी पड़ती नजर नहीं आती हैं। हमारी समस्याएं बढ़ती-बदलती रहती हैं और यह विचार करने की सामर्थ्य भी कि हम कौन थे, क्या हो गए हैं और क्या होंगे अभी…

‘चांद’ चयन के संपादकीय खंड में राष्ट्रीय शिक्षा पर रामरखसिंह सहगल के किस्तवार संपादकीय शिक्षा में स्त्रियों और दलितों की स्थिति, उसमें व्याप्त वर्ण-व्यवस्था का पक्ष, और उसके जरिए सत्ता के प्रतिकार की तत्कालीन परंपरा बयान करते हैं। मौजूदा राजसत्ता इस वक्त जो हमारे विश्वविद्यालयों और विद्यार्थियों के साथ कर रही है, इसकी जांच के लिए ये संपादकीय एक आधार सरीखे हैं। आधुनिक शिक्षा-प्रणाली के संदर्भ में रामरखसिंह सहगल मेकॉले को उद्धृत करते हैं, ‘‘हमें भारत में ऐसे मनुष्यों की एक श्रेणी पैदा कर देने का शक्ति-भर प्रयत्न करना चाहिए, जो हमारे और उन करोड़ों भारतवासियों के बीच, जिन पर हम शासन करते हैं, दुभाषिए का काम करे। इन लोगों को ऐसा होना चाहिए कि ये केवल रंग और रक्त की दृष्टि से भारतवासी हों, किंतु रुचि, विचार, भाषा और भावों की दृष्टि से अंग्रेज हों।’’ [खंड : 1, पृष्ठ : 93]

‘चांद’ चयन के संपादकीय खंड को पढ़कर बहुत सहज ही इस बात की प्रतीति होती है कि अपने उन बहुत सारे राष्ट्र-निर्माताओं को जो भारतीय मानस को सहेजने-गढ़ने के लिए सचेष्ट रहे, हम कब का भुला चुके हैं। कुछ नाम इस चयन के पन्नों पर जब खुलते हैं, तब यह नजर आता है कि स्वतंत्रता से पूर्व सामाजिक-सुधार के सुदीर्घ संघर्ष में लगे रहे इन नामों का अब कोई नामलेवा नहीं है। हरविलास जी शारदा एक ऐसा ही नाम हैं और सरलादेवी चौधरानी भी। शारदा सामाजिक और राजनीतिक सुधारों में एक गंभीर पारस्परिक संबंध देखते थे। उनके अनुसार एक की ओर ध्यान न देने से दूसरे को गहरा आघात पहुंचता है। सामाजिक और राजनीतिक सुधार साथ-साथ हों, वह इस बात के हामी थे। बाल-विवाह संबंधी लड़ाई, अछूतोद्धार और स्त्री-समानता के लिए हरविलास जी शारदा के यत्न कितने अविस्मरणीय हैं, इसकी सूचना ‘चांद’ के संपादकीय पढ़कर मिलती है।

‘स्त्रियों के जन्मसिद्ध अधिकार’ शीर्षक संपादकीय में धनीराम प्रेम लिखते हैं, ‘‘श्रीमती सरलादेवी चौधरानी भारत की उन थोड़ी-सी महिलाओं में से हैं, जिन्होंने राजनीतिक तथा सामाजिक क्षेत्र में बहुत-कुछ कार्य किया है। उनकी सेवाएं पुरानी हैं और उनका अनुभव बहुत प्रौढ़। वह जो कुछ कहती हैं, वह सारगर्भित तथा गवेषणापूर्ण होता है और उसमें मनन करने योग्य पर्याप्त सामग्री रहती है। अभी हाल ही में उन्होंने ‘बंगाल महिला कांग्रेस’ की सभानेत्री की हैसियत से जो भाषण दिया है, वह बड़ा महत्वपूर्ण है। उस भाषण में भारतवर्ष के सामने तथा भारतवर्ष के द्वारा संसार के सामने उन्होंने बड़े स्पष्ट तथा जोरदार शब्दों में स्त्रियों के जन्मसिद्ध अधिकारों की मांग पेश की है।’’ [खंड : 1, पृष्ठ : 185-186]

सरलादेवी की मांगों में हर आयु और वर्ग की स्त्री के लिए जिन अधिकारों की चर्चा की गई, वे स्त्री को एक नागरिक की तरह देखने की बुनियादी कार्य-योजना को प्रस्तावित करते हैं। सरलादेवी की आवाज तत्युगीन स्त्री-स्थिति को पूर्णतः परिवर्तित करने के पक्ष में थी। इसमें स्त्री-मुक्ति की आकांक्षा का वजन था।

इसके अतिरिक्त ‘मिथिला’ (बहुविवाह की जातिवादी कुप्रथा के संदर्भ में), ‘हिंदू-समाज और तलाक’, ‘ऑर्डिनेंस-युग’, ‘हमारी धार्मिक समस्याएं’, ‘दर्द की तस्वीरें’, ‘वर्तमान राजपूताना’, ‘वे और हम’, ‘हिंदू-समाज और जातिभेद’, ‘हिंदुओं में संयुक्त-कुटुंब-प्रथा’, ‘सामाजिक-क्रांति’, ‘भारतीय स्त्री-समाज’, ‘संसार-संकट’, ‘विश्वव्यापी अर्थ-संकट’, ‘स्वदेशी’, ‘भारत में बेकारी’ ये शीर्षक ही ‘चांद’ के संपादकीयों के — जो रामरखसिंह सहगल, शुकदेव राय, त्रिवेणी प्रसाद, भुवनेश्वर प्रसाद मिश्र ‘माधव’, लक्ष्मीदेवी, धनीराम प्रेम, मथुरा लाल शर्मा, नवजादिकलाल श्रीवास्तव द्वारा लिखे गए — सरोकार और दृष्टि की व्यापकता को बताने के लिए पर्याप्त हैं।

इस पर्याप्तता का प्रभाव समझने के लिए ‘चांद’ और ‘माधुरी’ के चयन-खंडों के संयुक्त प्राक्कथन में व्यक्त प्रियंवद के शब्द उल्लेखनीय हैं, ‘‘1929 में बाल-विवाह के विरोध में ‘शारदा एक्ट’ पारित हुआ और 1929 में ही स्त्रियों की कुछ श्रेणियों को पैतृक संपत्ति में अधिकार मिला। स्त्रियां अब जहाज उड़ा रही थीं, विश्वविद्यालयों में डिग्रियां ले रही थीं, खिलाड़ी बन रही थीं, तैरने की पोशाक पहनकर पानी में छलांगें लगा रही थीं। वे जेल जा रही थीं, शराब की दुकानों पर पिकेटिंग कर रही थीं, सिनेमा के परदे पर निस्संकोच काम कर रही थीं।’’ [खंड : 1, पृष्ठ : 12]

‘चांद’ और ‘माधुरी’ के अंकों से चयनित कहानियों के खंड क्रमशः दो और छह की कहानियां पढ़कर आधुनिक हिंदी कहानी के बनने की प्रक्रिया समझी जा सकती है। नवजागरणकालीनता की वजह से जागरण, गर्व और सुधार इन कहानियों का केंद्रीय पहलू है। ‘चांद’ कहानी खंड में चतुरसेन शास्त्री, विश्वम्भरनाथ शर्मा ‘कौशिक’, जनार्दनप्रसाद झा ‘द्विज’, ‘मुक्त’, धनीराम ‘प्रेम’, ‘रतन’, अनूपलाल मंडल, विष्णुदत्त शर्मा, पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी, ब्रह्मस्वरूप गुप्त, अंतर्वेदी, टॉल्स्टॉय, गौतमचंद्र त्रिवेदी ‘नीरस’, नर्मदाप्रसाद खरे, पृथ्वीनाथ शर्मा, प्रेमचंद, जीवानंद वात्सायन, जहूरबख्श, रणवीरसिंह ‘वीर’, ललितकिशोरसिंह की कहानियां हैं और ‘माधुरी’ कहानी खंड में केशवदेव शर्मा, के.पी., सुदर्शन, प्रेमचंद, खड्गजीत मिश्र, प्रयाग दास भार्गव, भगवती प्रसाद वाजपेयी, रामेश्वरप्रसाद श्रीवास्तव, चंद्रगुप्त विद्यालंकार, इलाचंद्र जोशी, कालिका प्रसाद चतुर्वेदी, प्रफुल्लचंद्र ओझा, शंभुदयाल सकसेना, मुंशी अलीअब्बास हुसैनी, अवध उपाध्याय, सोमदत्त विद्यालंकार, केदारनाथ अग्रवाल, कन्हैयालाल की कहानियां हैं।

‘चांद’ के लेख, आलोचना एवं पुस्तक परिचय खंड (3) और ‘माधुरी’ के संपादकीय, आलोचना एवं पुस्तक परिचय खंड (4) में भी एक सशक्त स्त्री-पक्ष व्यक्त हुआ है। संसारप्रसिद्ध स्त्रियों की तुलना में भारतीय स्त्री और उसकी सामाजिक स्थिति, गर्भ-निरोध और स्त्रियों के जेल-जीवन पर ‘चांद’ के अंकों में प्रकाशित लेख सटीक अर्थों में एक बड़े सामाजिक सुधार का प्रस्ताव करते प्रतीत होते हैं। ‘चांद’ और ‘माधुरी’ में आलोचना एवं पुस्तक परिचय खंड के अंतर्गत हिंदी किताबों की एक ऐसी दुनिया नुमायां होती है जो अब धूसरित हो चुकी है। अब न इन किताबों का कहीं पता है, न इनके लेखकों, आलोचकों, अनुवादकों और प्रकाशकों का… ये भारत के लगभग सब कोनों में थे और यह होना इस बात की तस्दीक है कि पुस्तक-प्रकाशन तब किसी महानगरीय केंद्रीयता से ग्रस्त नहीं था। इन किताबों के विषय इनके लिए आवश्यक श्रम और दृष्टि की विविधता का आप प्रमाण हैं। ‘काउंट टालस्टाय के उपन्यासों का अनुवाद’ शीर्षक माधुरी में प्रकाशित संपादकीय टिप्पणी बताती है, ‘‘संसार की कोई ऐसी प्रसिद्ध भाषा नहीं, जिसमें टालस्टाय की रचनाओं के सुंदर अनुवाद न हों। हिंदी में भी उनकी कुछ कहानियों और दो-एक नाटकों का अनुवाद हो चुका है, पर उनके बड़े-बड़े उपन्यासों का, जिन्होंने संसार-साहित्य में एक नए युग की सृष्टि कर दी है, अभी तक अनुवाद नहीं हुआ। उनके तीन बड़े उपन्यास उच्चकोटि के हैं— ‘एनी करेनिना’, ‘रिजरेक्रेशन’ और ‘वार एंड पीस’। जिन लोगों ने इन साहित्य-रत्नों को पढ़ा है, वे जानते हैं कि इस जोड़ के उपन्यास संसार में अधिक नहीं हैं— उनके नाम उंगलियों पर गिने जा सकते हैं। इन उपन्यासों से वंचित होकर कोई भी भाषा गर्व से सिर ऊंचा नहीं कर सकती। …इसलिए यह लिखते हुए हम एक गौरव-युक्त हर्ष का अनुभव कर रहे हैं कि इन तीनों पुस्तकों के अनुवाद हिंदी में हो गए हैं, और इसका श्रेय हमारे मित्र श्री रुद्रनारायणजी अग्रवाल को प्राप्त है। लगभग तीन हजार पृष्ठों का अनुवाद करना कोई आसान काम न था, पर आप टालस्टाय के परम भक्त हैं, और भक्ति ही वह वस्तु है, जो पहाड़ों पर कुएं खोदती है, कंदराओं में चित्र बनाती है और शैलश्रृंगों पर मंदिरों का निर्माण करती है।’’ [खंड : 4, पृष्ठ : 29]

सोवियत संघ-विघटन से पूर्व मास्‍को के प्रमुख प्रकाशन गृह प्रगति एवं रादुगा प्रकाशन और भारतीय पीपुल पब्लिशिंग हाउस से आए मदन लाल मधु (‘आन्ना कारेनिना’ और ‘वार एंड पीस’ के अनुवादक) और भीष्म साहनी (‘रिस्रेक्शन’ के अनुवादक) के रूस में क्रमशः रोजगार और प्रवास के दौरान किए गए अनुवादों के लगभग चार दशक पूर्व किए गए रुद्रनारायणजी अग्रवाल कृत तोल्स्तोय के उपन्यासों के अनुवाद क्या हुए, यह प्रश्न यहां विचारणीय है।

‘चांद’ और ‘माधुरी’ से चयन के इन खंडों में कविताओं का चयन नहीं किया गया है। विविध व परिशिष्ट खंड (7) में ‘माधुरी’ के जनवरी-1931 अंक से ‘मारवाड़ के कुछ दोहे’ (रामनरेश त्रिपाठी) जरूर शामिल हैं। इस चयन में कविताओं से दूरी बरतने के प्रियंवद ने दो कारण बताए हैं, ‘‘पहला यह, कि कविताओं में या तो अत्यंत भावुकता भरी, छायावादी, रूमानी भाषायी बाजीगरी थी या फिर स्थूल राष्ट्रवादी उच्छवास या फिर प्राचीन परंपरा में लिखे सवैये, मुक्तक आदि। यद्यपि कवियों में कुछ नाम महत्वपूर्ण थे, जैसे कि महादेवी वर्मा, रामकुमार वर्मा (इनकी कविताएं सबसे अधिक थीं) सोहनलाल द्विवेदी, जगन्नाथ दास रत्नाकर, अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’ व कुछ अन्य भी। पर ये कविताएं किसी भी मानक से हमारे चयन के उद्देश्य के पास नहीं पहुंचती थीं। संभव है ये उस समय लोकप्रिय हों, पर ये अपने समय का मुख्य स्वर नहीं थीं। ‘केसर की क्यारी’ ‘चांद’ का एक ऐसा ही स्तंभ था जिसमें उर्दू शाइरी का प्रतिनिधित्व था। पर वह भी बहुत कमजोर था। उर्दू शाइरी इसके पहले ही बहुत ऊंचे मेयार तय कर चुकी थी। इसके अलावा इसमें कुछ भी तत्कालीन मनुष्य से नहीं जुड़ता था।’’ [खंड : 1, पृष्ठ : 15]

प्रो. राजकुमार अपने एक लेख में भारतेंदु युगीन हिंदी नवजागरण में कथित उर्दू परंपरा में लिखे गए साहित्य की चर्चा के सिरे से गायब होने की समस्या को प्रश्नांकित करते हैं। लेकिन ‘चांद’ और ‘माधुरी’ से ये चयन-खंड इस बात का प्रमाण हैं कि यह समस्या द्विवेदी युग में भी कायम रही आई। यहां राजकुमार का यह कथ्य ध्यान देने योग्य है, ‘‘उर्दू को आप हिंदी की शैली मानें या उसकी परिकल्पना को ही अस्वीकार करें, लेकिन सच्चाई है कि हिंदी के नए चाल में ढलने से पहले उर्दू में साहित्य लिखने का सिलसिला शुरू हो चुका था। इसलिए फारसी लिपि या उर्दू में  फारसी-अरबी के शब्दों को जबरदस्ती ठूंसने की आलोचना करने के बावजूद हिंदी जाति के नवजागरण की चर्चा से उर्दू में लिखे गए साहित्य को आप बाहर नहीं कर सकते। ऐसा करने से उसकी सांप्रदायिक परिणिति की संभावनाएं बढ़ जाती हैं और अंततः वही हुआ भी। मुख्य बात यह है हिंदी क्षेत्र की व्यापकता और भाषायी जटिलता के कारण यहां ऐसी स्थितियां उत्पन्न हुईं कि तेलुगू, बांग्ला या मराठी की तरह हिंदी का कोई एक रूप सुनिश्चित करना और बाकी रूपों को बाहर कर देना सभी को स्वीकार्य निर्णय नहीं बन पाया। फारसी और फिर उर्दू की परंपरा के विकास के कारण हिंदी के ही कई रजिस्टर बन गए। कई बार तो एक ही समय में अलग-अलग परंपरा से जुड़े लोग इन रजिस्टरों का अलग-अलग ढंग से उपयोग करते दिखाई पड़ते हैं। समस्या तब उत्पन्न होती है जब हम इनमें से किसी एक रूप के आधार पर हिंदी का स्वरूप स्थिर करने की कोशिश करते हैं। हिंदी, हिंदुस्तानी और उर्दू के बीच खींचतान के समूचे इतिहास को इसी परिप्रेक्ष्य में समझना चाहिए। भारतेंदु युगीन हिंदी नवजागरण की समस्या यह है कि उसने हिंदी का एक सही रूप तय कर बाकी रूपों को प्रकारांतर से अवैध घोषित कर दिया और उनके बारे में किसी भी प्रकार के चिंतन-अध्ययन का ही निषेध कर दिया। उर्दू परंपरा में लिखे गए साहित्य को हिंदी नवजागरण के दायरे से बाहर कर देने के बावजूद भारतेंदु को इस बात का एहसास था कि उर्दू शाइरी की परंपरा से भिन्न खड़ी बोली हिंदी में कविता लिख पाना आसान नहीं होगा।’’

खंड-5 में ‘माधुरी’ में प्रकाशित कुछ लेखों का चयन है। ‘‘यह देखना रोचक है कि समकालीन होते हुए भी, ‘चांद’ और ‘माधुरी’ के लेखों में दृष्टि, चेतना, सरोकार व लेखकों की उपस्थिति, एक दीखने वाला फर्क है। ‘माधुरी’ लगभग मुख्य रूप से साहित्य की पत्रिका थी, जिसमें हिंदी के लगभग सभी बड़े नाम लिखते रहे थे। इसके लेखों में राजनीति से थोड़ी दूरी दिखती है, पर ‘चांद’ के लेखों में स्थिति इससे उलट थी।’’ [खंड : 5, ब्लर्ब से]

इस खंड में प्रकाशित— ‘गुमान मिश्र और उनका आश्रयदाता’ (लाला सीताराम), ‘हिंदी में उच्चकोटि की पुस्तकों का अभाव’ (अवध उपाध्याय), ‘महाकवि भूषण की इतिहास अनुकूलता’ (रामचंद्र-गोविंद काटे), ‘शिवाजी महाराज की वास्तविक जन्म-तिथि’ (गोपाल-दामोदर तामस्कर), ‘प्रयाग की हिंदी नाट्य-समिति’ (शिवपूजन सहाय), ‘प्राचीन भारत में राष्ट्रतंत्र’ (अरविंद घोष), ‘चुंबन’ (छन्नूलाल द्विवेदी), ‘रूस के आदर्श जेलखाने’ (देवव्रत शास्त्री), ‘बरवै-रामायण’ (सद्गुरुशरण अवस्थी), ‘उपाध्यायजी और अद्वैतवाद’ (वासुदेवशरण अग्रवाल), ‘अश्वमेध-यज्ञ’ (इंद्र विद्यालंकार), ‘प्रेमी मोपासां’ (केशवदेव शर्मा), ‘ब्रिटिश-साम्राज्य के पूर्व भारत’ (मंडन मिश्र), ‘कौटिल्य का वस्तु-विज्ञान’ (गोपाल-दामोदर तामस्कर), ‘हिंदी की आधुनिक कविता’ (विनयमोहन शर्मा), ‘भारतीय लिपि और भाषाएं’ (पांडेय रामावतार शर्मा), ‘उर्दू कविता में इस्लाह’ (ब्रजमोहन वर्मा), ‘हिंदी ‘य-श्रुति’ की परीक्षा’ (पं. हजारीप्रसाद द्विवेदी शास्त्राचार्य) जैसे लेख ‘माधुरी’ की सुघड़, वैश्विक और विषय-वैविध्यपूर्ण संपादकीय दृष्टि का पता देते हैं। लेकिन इस सूची में स्त्री, दलित और मुस्लिम नामों का न होना, इस प्रश्न/विमर्श को जमीन दे सकता है कि क्या उनके नाम किन्हीं अप्रकाशित काली सूचियों में दर्ज थे? इस खंड में ही प्रकाशित सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ का लेख ‘वर्णाश्रम-धर्म की वर्तमान स्थिति’ पढ़ते हुए, यह प्रश्न भी बार-बार परेशान करता है कि इक़बाल को सांप्रदायिक मानने वाली नजर निराला को भी सांप्रदायिक क्यों नहीं मानती है। इस खंड में ही कृष्णबिहारी मिश्र का लेख ‘हिंदी-साहित्य का विकास’ इस तथ्य की ओर संकेत करता है कि आचार्य रामचंद्र शुक्ल की संदिग्ध तुलनात्मक दृष्टि और काव्य-विवेक, उनकी तथ्यात्मक चूकों और अमौलिकता पर विचार बहुत पहले ही किया जा चुका है। हिंदी में ऐसे विचार और विमर्श प्राय: दबी जुबान में होते रहे/रहते हैं, लेकिन इस प्रकार की मुखरताएं यहां घेर कर खत्म कर दी जाती रही हैं। असद ज़ैदी ने 1857 के प्रथम स्वाधीनता-संग्राम के 150 साल पूरे होने पर जो विवादित कविता लिखी थी उसमें प्रतापनारायणों, मैथिलीशरणों और रामचंद्रों के विषय में यों ही नहीं कहा था कि वे खुद एक बेहतर गुलामी से ज्यादा कुछ नहीं चाहते थे। इस प्रकार देखें तो ‘चांद’ और ‘माधुरी’ से रचना-चयन के इन सात खंडों का प्रकाशन इस बात के लिए मजबूर करता है कि हम अपने कथित महान हिंदी-निर्माताओं के ‘हिंदू विवेक’ यानी उनकी उस सांप्रदायिक-दृष्टि को रेखांकित करें जिसकी वजह से वे एक तरफ अंग्रेज शासकों की प्रशंसा में रत थे और दूसरी तरफ हिंदू महासभा के एजेंडे पर भी काम कर रहे थे। यहां ‘वर्णाश्रम-धर्म की वर्तमान स्थिति’ शीर्षक लेख से उद्धृत निराला रचित इस लंबे अनुच्छेद पर गौर करें :

‘‘सृष्टि की साम्यावस्था कभी नहीं रहती, तब अंत्यजों या शूद्रों की ही क्यों रहने लगी। ज्यों-ज्यों परिवर्तन का चक्र घूमता गया, त्यों-त्यों असीरियन सभ्यता के साथ एक नवीन शक्ति एक नवीन वैदांतिक साम्य-स्फूर्ति लेकर पैदा हुई, जिसके आश्रय में देखते-देखते आधा संसार आ गया। भारतवर्ष पर गत हजार वर्षों से उसी सभ्यता का प्रवाह बह रहा है। यहां की दिव्य शक्ति के भार से झुके हुए निम्न-श्रेणियों के लोगों को उसकी सहायता से सिर उठाने का मौका मिला— वे लोग मुसलमान हो गए। यहां की दिव्य सभ्यता आसुर सभ्यता से लड़ते-लड़ते क्रमशः दुर्बल हो गई थी, अंत तक उसने विकारग्रस्त रोगी की तरह विकलांग, विकृत-मस्तिष्क होकर अपने ही घर वालों से तर्क-वितर्क और लड़ाई-झगड़ों पर कमर कस ली। क्रोध अपनी ही दुर्बलता का परिचायक है, और अंत तक आत्मनाश का कारण बन बैठता है, उधर दुर्बल का जीवन भी क्रोध करना ही है, उसकी और कोई व्याख्या भी नहीं। फलतः ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य-शक्ति पराभूत होकर मृत्यु की प्रतीक्षा करने लगी। जब ग्रीक सभ्यता का दानवी प्रवाह गत दो शताब्दियों से आने लगा, दानवी माया अपने पूर्ण यौवन पर आ गई, हिंदुस्तान पर अंग्रेजों का शासन सुदृढ़ हो गया, विज्ञान ने भौतिक करामात दिखाने आरंभ कर दिए, उस समय ब्राह्मण-शक्ति तो पराभूत हो ही चुकी थी, किंतु क्षत्रिय और वैश्य-शक्ति भी पूर्णतः विजित हो गई। शिक्षा जो थी अंग्रेजों के हाथ में गई, अस्त्र-विद्या अंग्रेजों के अधिकार में रही (अस्त्र ही छीन लिए गए, तब वह विद्या कहां रह गई? और वह क्षत्रियत्व भी विलीन हो गया), व्यवसाय-कौशल भी अंग्रेजों के हाथ में। भारतवासियों के भाग्य में पड़ा शूद्रत्व। यहां की ब्राह्मण-वृत्ति में शूद्रत्व, क्षत्रिय-कर्म में शूद्रत्व, और व्यवसायी जो विदेशों का माल बेचने वाले हैं कुछ और बढ़कर शूद्रत्व इख्तियार कर रहे हैं। अदालत में ब्राह्मण और चांडाल की एक ही हैसियत, एक ही स्थान, एक ही निर्णय। ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य अपने घर में ऐंठने के लिए ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य रह गए। बाहरी प्रतिघातों ने भारतवर्ष के उस समाज-शरीर को, उसके उस व्यक्तित्व को, समूल नष्ट कर दिया; बाह्य दृष्टि से उसका अस्तित्व ही न रह गया। अंग्रेज-सरकार ने मुसलमान और नान-मुसलमान के दो हिस्से करके हिंदू-समाज की कद्र में एक कदम और बढ़कर अपनी गुणग्राहिता प्रकट की। यहां साफ जाहिर हो रहा है कि ‘न निवसेत् म्लेच्छराज्ये’ का फल क्या होता है, संस्पर्श दोष का परिणाम कितना भयंकर हुआ करता है।’’ [खंड : 5, पृष्ठ : 80-81]

हिंदी-निर्माताओं का हिंदू प्रशिक्षण किस तरह मुल्क के आजाद होने बाद भी परवान चढ़ता रहा है, इसके उदाहरण प्रत्येक दशक में नजर आ जाएंगे। यहां नाम गिनाने में नाम छूटने की आशंकाएं ज्यादा हैं, इसलिए अवकाश और औचित्य दोनों होने बावजूद इससे बचा जा रहा है, लेकिन मौजूदा भारतीय सरकार में हिंदी की नई पीढ़ी से एक हालिया उदाहरण दे ही देना चाहिए। 12 मार्च 2018 के ‘हिंदुस्तान’ के वाराणसी संस्करण की एक खबर का शीर्षक — ‘संकुल में पीएम : मोदी और मैक्रों ने देखा राम-हनुमान का मिलन’ — पढ़कर उसे पूरा पढ़ने की इच्छा हुई :

‘‘प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रो ने सोमवार को बड़ा लालपुर के दीनदयाल संकुल में रामचरित मानस के प्रमुख प्रसंगों पर आधारित नाटक ‘चित्रकूट’ का मंचन देखा। रूपवाणी संस्था की इस प्रस्तुति में दोनों शासनाध्यक्षों की मौजूदगी के दौरान बाली-सुग्रीव युद्ध और श्रीराम-हनुमान मिलन के प्रसंगों का मंचन हुआ।

संकुल के ओपेन थिएटर में दोनों शासनाध्यक्षों के साथ ब्रिगेटी मैक्रो (फ्रांस की प्रथम महिला) और प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ भी मौजूद थे। ओपेन थिएटर में दो गद्दे लगाए गए थे। लेकिन मोदी-इमैनुअल मैक्रो एक ही स्थान पर बैठे। वहां जगह कम पड़ने के कारण ब्रिगेटी मैक्रो ने बड़े ही सहज भाव से नीचे सीढ़ियों पर बैठकर रामलीला का मंचन देखा। उन्हें सीढ़ियों पर बैठता देख मोदी ने अफसरों को व्यवस्था करने का इशारा किया, लेकिन ब्रिगेटी मैक्रो ने मना कर दिया। दूसरी तरफ मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ अकेले बैठे थे।

व्योमेश शुक्ल निर्देशित इस नाटक में छऊ, कथक और भरतनाट्यम नृत्य-शैलियों को आधार बनाया गया। इस प्रस्तुति में राम, सीता, लक्ष्मण और हिरण की भूमिका क्रमशः स्वाति, नंदिनी, काजोल और साखी ने निभाई। अन्य भूमिकाओं में तापस, हेमंत, आकाश, देवांशी, दीपक गुप्त और विशाल थे।’’

यह कहने की इच्छा नहीं है, लेकिन कहना पड़ रहा है कि व्योमेश शुक्ल हिंदी के चर्चित कवि और कभी जन संस्कृति मंच से संबद्ध रहे हैं। एक उम्र तक उन्हें एक साथ हिंदी के महत्वपूर्ण, प्रतिबद्ध, प्रगतिशील व्यक्तित्वों और कथित कलावादियों का स्नेह, सहयोग और समर्थन मिला है। ‘पहल’ और ‘उद्भावना’ सरीखी पत्रिकाओं ने उनके काम की पुस्तिकाएं प्रकाशित की हैं। उन्हें अशोक वाजपेयी ने भारतभूषण अग्रवाल पुरस्कार दिया है। उन्हें श्रीकांत वर्मा पर अब तक नहीं आई किताब लिखने के लिए रज़ा फाउंडेशन की फैलोशिप मिली है। वह रज़ा फाउंडेशन की पत्रिका ‘समास’ के अब तक नहीं आए एक अंक के संपादक रहे हैं… यह व्योमेश का विकास-क्रम है और ये सारी घटनाएं 16 मई 2014 से पूर्व की हैं। इस तारीख से ठीक पूर्व 16वें लोकसभा चुनाव में वह बनारस में नरेंद्र मोदी के विरुद्ध — अरविंद केजरीवाल का नहीं — कांग्रेसी अजय राय का प्रचार कर, उनके पक्ष में हिंदी लेखकों-पत्रकारों और बुद्धिजीवियों को एकजुट कर चुके हैं। लेकिन इस तारीख के बाद से वह आंदोलनात्मक और साहित्यिक व्यर्थताएं तज कर ‘राममय रंगकर्म’ के प्रति पूर्णतः समर्पित और सक्रिय हो गए हैं। वह निराला की लंबी कविता ‘राम की शक्तिपूजा’ पर तैयार की गई नृत्य-नाटिका की देश भर में सौ से ज्यादा प्रस्तुतियां दे चुके हैं। मोदी और योगी को राम-हनुमान का मिलन दिखाना उनकी नाटकीय साधना का महज एक पड़ाव है। 2019 में यानी 17वें लोकसभा चुनाव में किसी फाशिस्ट की ताजपोशी अगर पुन: होती है, तब यकीकन एक हिंदू-राष्ट्र में हम व्योमेश शुक्ल के रंगकर्म का चरमोत्कर्ष देखेंगे और यह न हुआ तब भी अफसरों-अवसरों की कोई कमी थोड़े ही है।

इन घटनाओं की पृष्ठभूमि में वह हिंदू-मानस है जो मूलतः सांप्रदायिक है और जिसे कथित प्रात: स्मरणीय हिंदी-निर्माताओं ने तैयार किया है। इसलिए ही संभवतः रामविलास शर्मा का गढ़ा पद ‘हिंदी नवजागरण’ इतना संदेहास्पद है। संसार का कोई भी नवजागरण इतना अशक्त और अपूर्ण नहीं है जितना कि यह ‘हिंदी नवजागरण’ है। इसका ही नतीजा है कि इस हाहाकारी वक्त में हम सब जगह अपने बहुत नजदीक भयानक हिंदू मानस से घिरे हुए हैं। कोई भी स्थान और माध्यम अब निरापद नहीं है। हमारी शीर्षस्थानीयताएं ईश्वर को याद कर रही हैं (देखें : नामवर सिंह पर केंद्रित एनडीटीवी इंडिया का 4 मई 2018 का प्राइम टाइम)। इस दृश्य में ‘चांद’ और ‘माधुरी’ के चयन-खंडों का प्रकाशन बहुत सारी अवधारणाओं पर पुनर्विचार का प्रस्थान-बिंदु बन सकता है। यह पुनर्विचार ही संभवतः हमारे उन वास्तविक निर्माताओं के अधूरे कार्य और उनकी वेदना के स्रोत को संगतपूर्ण निष्कर्षों तलक पहुंचा सकेगा जो समाज, संस्कृति और साहित्य की सेवा के लिए अथक श्रम करते हुए, अशेष कष्ट सहते हुए, सफलता-असफलता से बेखबर आत्मत्याग की राह पर अपरिमित धन व्यय करते हुए अपने शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य को नष्ट करते रहे।

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संदर्भ :

प्रस्तुत आलेख में साल 2018 में वाग्देवी प्रकाशन, बीकानेर से प्रियंवद के चयन और संपादन में प्रकाशित ‘चांद’ और ‘माधुरी’ की रचनाओं के सात खंडों को आधार बनाया गया है। इस खंड से दिए गए उद्धरणों में लेखकों और पुस्तकों के नाम की वही वर्तनी और उच्चारण प्रयोग में लिए गए हैं, जैसे कभी ‘चांद’ और ‘माधुरी’ में प्रयुक्त हुए और इस वजह से इन खंडों में भी। प्रो. राजकुमार का उद्धरण पहले ‘नया ज्ञानोदय’ और बाद में tirchhispelling.wordpress.com पर प्रकाशित उनके लेख ‘हिंदी नवजागरण की परिकल्पना पर पुनर्विचार की जरूरत’ से है। असद ज़ैदी की कविता ‘1857 : सामान की तलाश’ आधार प्रकाशन, पंचकूला से प्रकाशित उनके तीन कविता-संग्रहों के चयन ‘सरे-शाम’ में पढ़ी जा सकती है। इस आलेख की अंतिम पंक्तियों में मुक्तिबोध की कविता ‘ब्रह्मराक्षस’ की अंतिम पंक्तियों की ध्वनि है।

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साभार: पहल 112 

16107461_1328427407221041_632303947667798252_oआभासी पटल (सोशल साइट्स) के बाहर ‘कुंठित मन’ की ‘निर्लज्ज अभिव्यक्तियाँ’ कितनी अमानवीय होती हैं, वह जानी-पहचानी है. अविनाश के पास ‘कूटनीति’ की भाषा नहीं है, जिसका सबसे सजग इस्तेमाल आभासी लोक-वृत्त के दायरे में किया जाता है. जिस दिन उसके पास यह आ जायेगी, वह ख़त्म हो जाएगा.  यह आभासी-व्यवहार और कुछ नहीं, बल्कि हाल-चाल, दुआ-सलाम की भाषा को पाने का ही करतब है. यह भाषा आदमी को दलाल, अवसरवादी, व्यवसायी बना सकती है लेकिन रचनाकार नहीं. यह ‘सर्वधर्म-समभाव’ की सबसे उपजाऊ जमीन है. जहाँ भाषा गूगल-ट्रांसलेट हो जाती है. अविनाश से संपर्क -स्थापित हेतु  darasaldelhi@gmail.com का इस्तेमाल कर सकते हैं.

दलित साहित्य का सौंदर्यशास्त्र उर्फ़ अंध-श्रद्धा के राज में समीक्षा का निर्वासन: उस्मान खान

डॉ. अंबेडकर ने सौंदर्यशास्त्र पर सीधे कलम चलाई है, ऐसा हमें ज्ञात नहीं, लेकिन जॉन ड्यूई ने सौंदर्यशास्त्र पर लिखा है। वाल्मीकि जी का सौंदर्यशास्त्र चाहे अनुभव की द्वंद्वात्मकता की उपेक्षा करे, ड्यूई ऐसा नहीं करते। उनकी पुस्तक ‘आर्ट एज़ एक्सपीरिएन्स’[4] १९३४ में प्रकाशित हुई थी। उनके अनुसार, अनुभव स्थानीय-माहौल में कार्य करते हुए अर्जित किए जाते हैं, ये अनुभव स्थानीय-संस्कृति में निर्मित सामुदायिक अनुभव होते हैं। उनके अनुसार ये समुदाय निरंतर टकराव में रहते हैं। वे खंडित और यांत्रिक अनुभव से जन्य कला को असौंदर्य कहते हैं, सुव्यवस्थित पूर्ण अनुभव को ही वे अनुभव मानते हैं। वे कला को उत्पादक/कलाकार का पक्ष मानते हैं और सौंदर्य को उपभोक्ता/सामाजिक का। निश्चित ही कलाकृति का उपभोक्ता केवल उदासीन ग्राहक नहीं होता, वह अपने रिस्पांस से कलाकृति को विभिन्न अर्थ देता है। उनके अनुसार कलाकार एक व्यक्ति की तरह अपने स्थानीय माहौल में कार्य करते हुए अनुभव अर्जित करता है, कला इन अनुभवों का विशेष रूप है। कलाकार के अनुभव विशिष्ट होते जाते हैं, लेकिन सामान्य अनुभवों से एकदम अलग वे नहीं होते। ड्यूई के अनुसार सोचना भी सुंदर होता है। वाल्मीकि जी ने अपने सौंदर्यशास्त्र में, यदि वह डॉ. अंबेडकर के दर्शन से निर्मित हुआ है, अनुभव के सौंदर्य पर सोचने का कष्ट नहीं उठाया।   #लेखक 

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Courtesy:  kractivist.wordpress.com/

                    

‘दलित साहित्य का सौंदर्यशास्त्र’ : वाद-विवाद-संवाद[1]

By उस्मान खान

                              फ़रियाद की कोई लै नहीं है,

                              नाला पाबंद-ए-नै नहीं है।[2]

दलित-साहित्य आंदोलनधर्मी-बहसधर्मी है। सन २००१ में प्रकाशित ओमप्रकाश वाल्मीकि की पुस्तक ‘दलित साहित्य का सौंदर्यशास्त्र’ दलित-साहित्य की बहसों को समेटने और अंबेडकरवाद को दलित साहित्य के सौंदर्यशास्त्र का केंद्र बनाने का प्रयास है। दलित-साहित्य के सौंदर्यशास्त्र या समीक्षाशास्त्र के निर्माण का यह प्रयास दलित-साहित्य की परिपक्वता और दलित-बहस की अपरिपक्वता दोनों को सामने लाता है।

वाल्मीकि जी अपने सौंदर्यशास्त्र का आधार डॉ. अंबेडकर के जीवन-संघर्षों और विचारों को बताते हैं। डॉ. अंबेडकर का सम्पूर्ण जीवन अगर किसी एक सामान्य कार्य में पूर्ण होता है, तो वह है छुआछूत और जाति-व्यवस्था का विरोध। उन्होंने उच्च-शिक्षा प्राप्त की, बहिष्कृत हितकारिणी सभा का निर्माण किया, मुकनायक, बहिष्कृत भारत और इक्वालिटी जनता जैसे पत्र निकाले, गाँधीवादी राजनीति पर प्रश्न-चिह्न लगाए, महाड़ सत्याग्रह किया, मनुस्मृति जलाई, जाति-प्रश्न को राजनीति का प्रश्न बनाया, कालाराम मंदिर में प्रवेश का प्रयास किया, इंडिपेंडेंट लेबर पार्टी बनाई, कांग्रेस मंत्रिमंडल में शामिल हुए, बौद्ध हुए, शेड्यूल्ड कास्ट्स फेडरेशन का निर्माण किया। यथा, उनका जीवन-संघर्ष किसी सीधी लकीर की तरह नहीं है, उसमें पर्याप्त पेंच हैं। उनके विचार जाति-व्यवस्था से मुक्ति की राजनीति के सापेक्ष तैयार होते जाते हैं। बने-बनाए ढाँचे में नहीं अनुभव, प्रयोग और व्यवहार के आधार पर बदलते हुए। एक तीखा भाव जो नहीं बदलता, वह है – जाति-भेद का बीजनाश। इस अर्थ में डॉ. अंबेडकर किसी वाद के अनुसरणकर्ता या निर्माता नहीं हैं, अपने गुरु जॉन ड्यूई की तरह अनुभवों से शिक्षा पाते हुए, किसी भी प्रकार की हिंसा से बचते हुए, वे जाति-व्यवस्था के उद्भव, विकास और नाश का अपना सिद्धान्त विकसित करते जाते हैं। अपनी राजनीति के लिए तात्कालिक लाभ प्राप्त करने के प्रक्रम में वे किन्हीं निश्चित आचार-विचार पर टीके नहीं रहते, वे मुख्यतः भौतिक-विकास का पूंजीवादी और आध्यात्मिक विकास का धार्मिक मार्ग सुझाते हैं। वे व्यवहारवाद के आधार पर संघर्ष करते जाते हैं, इन संघर्षों का अंतिम प्रयोग बौद्ध-धर्म अपनाना था और इस संभावना से इन्कार नहीं किया जा सकता कि वे आगे भी नए प्रयोग करने से हिचकते नहीं।

उनके जीवन-संघर्ष और चिंतन-मनन से जो दर्शन प्राप्त होता है उसे परिणामवाद, व्यवहारवाद या अनुभववाद कहा जा सकता है। जॉन ड्यूई से अलग उन्होंने अपनी विशेष समस्या के संबंध में इस दर्शन का प्रयोग और विकास किया। जहाँ ड्यूई अमेरिका की उभरती पूंजीवादी-साम्राज्यवादी-संसदीय-व्यवस्था में कार्यरत थे, वहीं डॉ. अंबेडकर सामंती-पूंजीवादी उपनिवेशी भारत में। उत्तर-उपनिवेशी भारत में डॉ. अंबेडकर की राजनीति का दूसरा रूप दिखाई देता है – तेलंगाना के जन-संहार का विरोध न करना, बौद्ध-धर्म को अपनाना और शेड्यूल्ड कास्ट्स फेडरेशन का निर्माण करना आदि। वे कभी भारत में लोकतन्त्र के विकास और नागरिक-समाज के निर्माण के प्रति आशावान दिखते हैं, तो कभी उनका मोहभंग प्रकट होता है। सिद्धांतों की व्यवस्था उनके चिंतन में नहीं है। वे अपने जीवन-संघर्ष में भी स्थिति-सापेक्ष कोई भी कार्य करते दिखते हैं। हिंसा का पक्ष लेते भी उन्हें देखा जा सकता है। वे मार्क्स के विचारों को जाने बिना ही उनके प्रति घृणा और तिरस्कार प्रदर्शित करते हैं, बौद्ध-धर्म को जाति-व्यवस्था ही नहीं, सम्पूर्ण मानवता की सभी समस्याओं का हल बताते हुए वे मार्क्सवाद को (बिना ठीक से जाने-समझे ही) खारिज कर देते हैं।[3] अवसरानुकूल स्वीकार और त्याग की यह प्रक्रिया चलती रहती है। बौद्ध-धर्म के स्वीकार से जाति-व्यवस्था या उत्पीड़न का अंत संभव नहीं, इतिहास और वर्तमान दोनों इसका सबूत देते खड़े हैं। क्या म्याम्मार और श्रीलंका में बौद्ध-धर्म प्रभावी नहीं, क्या वहाँ सभी प्रकार का उत्पीड़न समाप्त हो चुका है, सभी लोग सुखी हैं, करुणा और मैत्री आधारित जीवन जी रहे हैं?

अंबेडकरवादी राजनीति डॉ. अंबेडकर को फरिश्ता, मसीहा, देवता की तरह प्रस्तुत करती है, इससे डॉ. अंबेडकर एक ऐसे व्यक्तित्त्व के रूप में उभरते हैं, जिनकी जय की जा सकती है या मूर्ति तोड़ी जा सकती है, लेकिन जिनसे संवाद नहीं स्थापित किया जा सकता। उत्तर-उपनिवेशी भारत में अंबेडकरवादी राजनीति कई धाराओं और उप-धाराओं में बंटती चली गई। मुख्यधारा एकालापी या असंवादी है। इस धारा के बौद्धिक डॉ. अंबेडकर को भगवान नहीं, तो उससे कम भी नहीं मानते। वे किसी भी तरह डॉ. अंबेडकर को विश्व का महानतम बौद्धिक सिद्ध करना और मनवाना चाहते हैं। बौद्धिक को बौद्धिक कहने में या क्रांतिकारी को क्रांतिकारी कहने में कोई हर्ज नहीं, लेकिन किसी के जीवन और विचारों का सुव्यवस्थित अध्ययन किए बिना क्या यह उचित है कि हम उसे कुछ कहें? वाल्मीकि जी डॉ. अंबेडकर के जीवन और विचारों को पूर्णता में नहीं देखते। उन्हें सर्वदर्शी सर्वज्ञाता की तरह से प्रस्तुत करने के अतिरिक्त उनके सौंदर्यशास्त्र में डॉ. अंबेडकर के व्यक्तित्त्व और दर्शन के बारे में कोई सही जानकारी नहीं मिलती। अंध-श्रद्धा के राज में समीक्षा निर्वासित रहती है।

निश्चित ही, डॉ. अंबेडकर बौद्ध-धर्म का विशेष उपयोग करते हैं, बौद्ध-दर्शन से अधिक वे बौद्ध-संगठन पर ध्यान देते हैं, उनके बुद्ध आधुनिक राजनैतिक बुद्ध हैं। भारत में जाति-व्यवस्था की समाप्ति के संघर्ष में विकसित हुआ उनका व्यवहारवादी-दर्शन विशिष्ट होकर भी व्यवहारवाद के सामान्य सिद्धांतों से विचलित नहीं होता। इस अर्थ में वे ड्यूई के सच्चे शिष्य हैं। बुद्ध के अनित्यवाद पर वे विशेष ध्यान नहीं देते। वाल्मीकि जी ने भी यही रास्ता पकड़ा है।

डॉ. अंबेडकर ने सौंदर्यशास्त्र पर सीधे कलम चलाई है, ऐसा हमें ज्ञात नहीं, लेकिन जॉन ड्यूई ने सौंदर्यशास्त्र पर लिखा है। वाल्मीकि जी का सौंदर्यशास्त्र चाहे अनुभव की द्वंद्वात्मकता की उपेक्षा करे, ड्यूई ऐसा नहीं करते। उनकी पुस्तक ‘आर्ट एज़ एक्सपीरिएन्स’[4] १९३४ में प्रकाशित हुई थी। उनके अनुसार, अनुभव स्थानीय-माहौल में कार्य करते हुए अर्जित किए जाते हैं, ये अनुभव स्थानीय-संस्कृति में निर्मित सामुदायिक अनुभव होते हैं। उनके अनुसार ये समुदाय निरंतर टकराव में रहते हैं। वे खंडित और यांत्रिक अनुभव से जन्य कला को असौंदर्य कहते हैं, सुव्यवस्थित पूर्ण अनुभव को ही वे अनुभव मानते हैं। वे कला को उत्पादक/कलाकार का पक्ष मानते हैं और सौंदर्य को उपभोक्ता/सामाजिक का। निश्चित ही कलाकृति का उपभोक्ता केवल उदासीन ग्राहक नहीं होता, वह अपने रिस्पांस से कलाकृति को विभिन्न अर्थ देता है। उनके अनुसार कलाकार एक व्यक्ति की तरह अपने स्थानीय माहौल में कार्य करते हुए अनुभव अर्जित करता है, कला इन अनुभवों का विशेष रूप है। कलाकार के अनुभव विशिष्ट होते जाते हैं, लेकिन सामान्य अनुभवों से एकदम अलग वे नहीं होते। ड्यूई के अनुसार सोचना भी सुंदर होता है। वाल्मीकि जी ने अपने सौंदर्यशास्त्र में, यदि वह डॉ. अंबेडकर के दर्शन से निर्मित हुआ है, अनुभव के सौंदर्य पर सोचने का कष्ट नहीं उठाया। उनको यही कह देना काफी लगा – ‘एक दलित जिस उत्पीड़न को भोगकर दुख, वेदना से साक्षात्कार करता है, वह आनंददायक कैसे हो सकता है?’[5] (५०)

पीड़ा से आनंद नहीं उपजता, इस मान्यता के साथ वाल्मीकि जी अपने सौंदर्य-चिंतन में आनंद के पक्ष को नकारते हैं। निश्चित ही, आनंद के पक्ष को सीमित अर्थों में ग्रहण करने से ऐसी मान्यता निर्मित हुई है। आनंद का पक्ष केवल मनोरंजन से नहीं जुड़ा है, अरस्तू द्वारा प्रस्तावित विरेचन से भी सम्बद्ध है। कलाकृति के उपभोग से सम्बद्ध है। सौंदर्यशास्त्र के निर्माण में पहला प्रश्न साधारणीकरण का ही रहा आया है। वाल्मीकि जी इस प्रश्न से पल्ला झाड़ लेते हैं या उपरोक्त प्रश्न उठाकर उस पहले प्रश्न को खारिज मान लेते हैं। पाठक/दर्शक/श्रोता कलाकृति में वर्णित भाव-विचार-अनुभव को अपने भाव-विचार-अनुभव से अनुकूलित करता है, इस प्रक्रिया में अपनी पीड़ा के लिए दवाई पाता है। जिस तरह घाव पर मरहम लगाने से घायल को लाभ मिलता है, उसी तरह पीड़ा के अनुभव पढ़ना पाठक के मन-मस्तिष्क के घावों को, जो उसकी अपनी पीड़ा के अनुभव हैं, भरता है। इसका अर्थ फिर यह नहीं कि पाठक को दूसरे की पीड़ा के अनुभव पढ़कर राहत मिलती है, नहीं, बल्कि उसको अपनी पीड़ा के अनुभव पर सोचने-समझने में सहयोग मिलता है, साथ ही पीड़ा के सामूहिक अनुभव पर सोचने-समझने में भी वह अधिक सक्षम हो पाता है। इससे वह अपनी व समाज की पीड़ा को समाप्त करने की प्रेरणा भी पाता है। यह समझ और प्रेरणा अनुभवों की पूर्णता और संतुष्टि को जन्म देती है, जो पाठक के लिए कलाकृति का भिन्न अर्थ निर्मित करती है। जहाँ ऐसा नहीं होता, वहाँ पाठक के लिए कृति अपूर्ण और असंतुष्टिकर होती है, उसकी सौंदर्य-पीपासा शांत नहीं होती।

कला को एक माध्यम की तरह देखने से यह दृष्टि पैदा होती है कि कला का उद्देश्य केवल शिक्षा देना है, कला को स्वयंपूर्ण मान लेने पर यह दृष्टि पैदा होती है कि कला का उद्देश्य केवल आनंद या मनोरंजन है। ये दोनों ही दृष्टियाँ अधूरी हैं और कला में फाँक पैदा करती हैं। शिक्षा और आनंद का जितना बेहतर संतुलन कोई कलाकृति स्थापित कर पाती है, उतनी ही सुंदर वह कही जाती है – एक स्वयंपूर्ण-माध्यम । लेकिन कला का उद्देश्य यहीं तक सीमित नहीं है, कला का अंतिम उद्देश्य सत्य को पुनर्प्रस्तुत करना है, वास्तविकता का कलात्मक प्रकाशन करना है। वाल्मीकि जी अपने सौंदर्यशास्त्र में कला को एक माध्यम, वह भी सीमित, मानते दिखते हैं। निश्चित ही, वे बाज़ार-केन्द्रित कला-उत्पादन के विरोध में और विचारधारा-केन्द्रित कला-उत्पादन के पक्ष में हैं, लेकिन सत्य और सुंदर की पूर्णता की उपेक्षा करते हैं।

अपनी पुस्तक में उन्होंने ड्यूई द्वारा किए गए विषय और अंतर्वस्तु के भेद की चर्चा की है, लेकिन वे यह नहीं बताते कि अंतर्वस्तु से ड्यूई का अर्थ साहित्यिकता से ही है, शायद इससे वे अपनी इस मान्यता को तुष्ट करना चाहते हैं कि अंतर्वस्तु ही प्रमुख है, रूप नहीं। जबकि ड्यूई के लिए रूप का महत्त्व कम नहीं। फिर वाल्मीकि जी कला की सामान्य अंतर्वस्तु संबंधी ड्यूई के विचार पर भी नहीं सोचते, इसीके परिणामस्वरूप वे दलित-साहित्य और अनुभव की अंबेडकरवादी अनन्यता पर ज़ोर देकर उसकी महत्ता स्थापित करते दिखते हैं। वैज्ञानिक जागरण के अभाव में सौंदर्यशास्त्र का निर्माण किस तरह होता है, इसे समझने के लिए वाल्मीकि जी का सौंदर्यशास्त्र एक उत्तम उदाहरण है। डॉ. अंबेडकर के विचारों और साहित्य दोनों के संबंध में उनका विवेचन धार्मिक-आस्थामय है, दर्शन और विज्ञान से वे दूर हैं। कहीं इसलिए तो नहीं कि दर्शन और विज्ञान धर्म पर संदेह और धर्म के नकार का प्रस्ताव भी रखते हैं!

अंबेडकरवाद विचार, आंदोलन और प्रकार्य की दृष्टि से एक जटिल विचारधारा है। हिन्दी-क्षेत्र में भी दलित-आंदोलन के निर्माण में और प्रकारांतर से दलित-साहित्य के निर्माण में अंबेडकरवाद के प्रचार-प्रसार की मुख्य भूमिका रही है। ८० के दशक में विशेषकर पश्चिमी उत्तरप्रदेश में, अनुसूचित-जाति के सामाजिक राजनैतिक संगठनों के निर्माण, प्रचार-प्रसार और चुनावी विजयों के साथ ही साथ, हिन्दी-दलित-साहित्यिकों के आंदोलन का भी प्रारम्भ होता है। अनुसूचित-जाति के शिक्षित-जन अंबेडकरवाद और वाया अंबेडकरवाद, बौद्ध-धर्म की ओर मुड़ते हैं। ९० के दशक में दलितों की आत्मकथाएँ सामने आने लगती हैं, जो हिन्दी-साहित्य के इतिहास की अभूतपूर्व घटना है। ओमप्रकाश वाल्मीकि, मलखान सिंह, मोहनदास नैमिशराय, कौशल्या बैसन्त्री, सुशीला टाकभौरे दलित-साहित्यिकों की सूची बढ़ती जाती है। वाल्मीकि जी का कहना ठीक है कि सिद्धों, संतों और दलित-साहित्य के विचारों में मूलभूत अंतर है, तब भी हिन्दी-साहित्य के इतिहास में और किसी धारा से इसकी सादृश्यता नहीं खोजी जा सकती। स्वयं वे भी घुम-घूमकर वहीं पहुँचते हैं।

उत्तर-उपनिवेशी भारत में समाज के लोकतांत्रिकरण और पूंजीवादी प्रसार ने भारत की सदियों पुरानी ग्रामीण-व्यवस्था का अधिकाधिक विखंडन किया, साथ ही अनुसूचित-जाति के एक हिस्से की राजनैतिक-आर्थिक उन्नति ने उनके अपने बौद्धिकों के निर्माण में आधारभूत भूमिका निभाई। यह बौद्धिक-वर्ग अंबेडकरवाद का निर्माता बना। अनुसूचित-जाति का यह वर्ग हिन्दी-दलित-साहित्य को जन्म देने वाला भी बना। महाराष्ट्र में दलित-साहित्यिकों के उभार और हिन्दी-क्षेत्र में – विशेषकर पश्चिमी उत्तर-प्रदेश में – कांशीराम और मायावती के बहुजन-आंदोलन और फुले-अंबेडकर-विचार के प्रचार-प्रसार ने हिन्दी-दलित-साहित्य के निर्माण की तात्कालिक भूमिका तैयार की। आज भी, दलित-आंदोलनों के निरंतर प्रचार-प्रसार के बाद भी, दलित-साहित्यिक हिन्दी-क्षेत्र में पूरी तरह सामने नहीं आ पाए हैं। अब भी दलितों के लिए कलम पकड़ना मुश्किल है। दलित शायद निर्बाध घोड़ी चढ़ने भी लग जाएँ, लेकिन ज्ञान-शक्ति अर्जित किए बिना किसी उत्पीड़ित-वर्ग की मुक्ति संभव नहीं, दलितों को भी इस शक्ति को अधिकाधिक सँजोना होगा, अन्यथा विडम्बना बनी रहेगी –

                              बेटा है बजरंगी दल में

                              बाप बना है भगवाधारी

                              भैया हिन्दू परिषद में है

                              बीजेपी में महतारी

                              मंदिर-मस्जिद में गोली

                              इनके कंधे चलती है।

                              यह दलितों की बस्ती है।[6]

ओमप्रकाश वाल्मीकि दलित-साहित्य को अंबेडकरवाद से किसी तरह बाहर नहीं मानते, यही कारण है कि वे दलित-साहित्य की अंबेडकर-पूर्व की रचनाओं को विशेष महत्त्व नहीं देते। उनकी दृष्टि में जो अंबेडकरवाद की चेतना से पूर्ण नहीं, वह दलित-साहित्य नहीं। अपने सौंदर्यशास्त्र में वे दो बातों पर ज़ोर देते हैं – पहली कि अनुसूचित-जाति द्वारा लिखा गया साहित्य ही दलित-साहित्य है, दूसरी कि अंबेडकरवाद की चेतना के बिना दलित-साहित्य नहीं रचा जा सकता। कुल मिलाकर यह कि अनुसूचित-जाति के अंबेडकरवादी व्यक्ति का साहित्य ही दलित-साहित्य है। उनके लिए दलित-साहित्य की प्रामाणिकता अंबेडकरवादी होने पर टिकी है, ना कि सिर्फ़ दलित होने पर। आश्चर्य नहीं, उनके लिए बुद्ध, सिद्ध, संत, फुले (पेरियार) आदि डॉ. अंबेडकर के निर्माण में समाहित हो जाते हैं।

वाल्मीकि जी के अनुसार बाबा साहब डॉ. भीमराव अंबेडकर दलित-साहित्य के केंद्रीय प्रेरणा-स्रोत हैं और दलित-साहित्य की धार्मिक, दार्शनिक, सांस्कृतिक, राजनैतिक और आर्थिक मान्यताएँ वही हैं, जो अंबेडकरवाद की हैं। लेकिन इन मान्यताओं को केवल प्रकट किया गया है और इन पर आत्म-सत्यापन की मोहर लगा दी गई है। यानी इन मान्यताओं और दलित-साहित्य के अंतर्संबंधों पर विचार नहीं किया गया है। डॉ. अंबेडकर की आर्थिक मान्यताओं पर लिखते हुए उन्होंने ‘अछूत  कौन और कैसे?’ पर आधारित सभ्यता की व्याख्या प्रस्तुत करना ही काफ़ी समझा है। क्या यह व्याख्या भौतिक-इतिहास पर आधारित है? क्या इससे दलित-साहित्य की आर्थिक मान्यताएँ स्पष्ट हो जाती हैं? इस व्याख्या को क्यों सही माना जाए, इसके पीछे कोई तर्क उन्होंने नहीं दिया। ऐसा क्यों? कहीं इसलिए तो नहीं कि इस संबंध में डॉ. अंबेडकर स्वयं सशंकित थे, इसलिए वे भी बिना प्रमाण ही इसे मान लेने की बात कहते हैं – ‘हमारे पास इस बात का कोई प्रमाण नहीं है कि ये छितरे हुए आदमी बौद्ध थे। किन्तु किसी प्रमाण की आवश्यकता भी नहीं है, जबकि उस समय अधिकांश हिन्दू बौद्ध ही थे। हम मान लेते हैं कि वे बौद्ध ही थे।‘[7] हमारे पास प्रमाण नहीं है, लेकिन हम मान लेते हैं, क्या यह वैज्ञानिक-दृष्टि है? डॉ. अंबेडकर ने स्वयं अर्थशास्त्र पर कलम चलाई है, वाल्मीकि जी को आर्थिक मान्यताओं पर बात करते हुए डॉ. अंबेडकर के अपने अर्थशास्त्र को सामने रखना था। अगर वाल्मीकि जी श्रम के शोषण का विचार सामने रखते, तो दलितों के शोषण का (आर्थिक ही सही!) पक्ष अधिक उजागर हो पाता और इस संबंध में डॉ. अंबेडकर के विचार भी अधिक स्पष्ट हो पाते। दलित-साहित्य में वर्णित श्रम के शोषण को समझने में भी पाठक को मदद मिलती। इसी तरह दलित-साहित्य की धार्मिक, सांस्कृतिक मान्यताओं पर लिखते हुए वे कहते हैं कि दलित-साहित्य अंधश्रद्धा, आस्था की जगह विश्लेषण तथा ऐतिहासिक और सामाजिक परिप्रेक्ष्य पर ध्यान देता है, और अंत में बौद्ध-धर्म की दीक्षा लेते समय डॉ. अंबेडकर द्वारा की गई २२ प्रतिज्ञाओं को इसका आधार बताते हैं। एक तरफ़ वे कबीर की अध्यात्मिकता की आलोचना करते हैं और दूसरी तरफ़ डॉ. अंबेडकर की अध्यात्मिकता का पक्ष लेते हैं। क्या इसे संगत माना जा सकता है? कभी वे धर्म को हानिकारक बताते हैं, तो कभी स्वयं दलित-साहित्य की धार्मिक मान्यताएँ बताने लगते हैं। क्या धार्मिक हुए बिना दलित-साहित्य नहीं लिखा जा सकता? वाल्मीकि जी दलित-साहित्य के हर पहलू को डॉ. अंबेडकर से जोड़ते हैं, इससे उनके सौंदर्यशास्त्र में कई असंगतियाँ और भ्रांत धारणाएँ उत्पन्न हुई हैं। वे दलित-चेतना के १३ बिन्दुओं में वैज्ञानिक-दृष्टि को भी शामिल करते हैं, लेकिन दलित-साहित्य के सौंदर्यशास्त्र के निर्माण में वैज्ञानिक-दृष्टि का प्रयोग करते नहीं दिखते। वे लिखते हैं –

‘दलित-साहित्य ‘आशय’ को महत्त्व देता है। अभिव्यक्ति और शिल्प दूसरे स्थान पर आता है। जीवन-अनुभवों की प्रामाणिकता ‘आशय’ को अर्थ-गंभीर बनाती है। यह अर्थ-गाम्भीर्य डॉ. अंबेडकर-दर्शन के विचार तत्त्व पर आधारित होना चाहिए। इसीलिए दलित साहित्य के सौंदर्यशास्त्र का स्वरूप पारंपरिक सौंदर्यशास्त्र से भिन्न है।‘[8]

यहाँ अभिव्यक्ति को सीमित अर्थों में समझा गया है। ड्यूई के अनुसार कलाकार के संपीड़ित या दबाए गए अनुभवों का किसी माध्यम से प्रकट होना अभिव्यक्ति है। उनके अनुसार कला अभिव्यक्त वस्तु है। यह शिल्प या रूप का मामला नहीं, बल्कि सामाजिक यथार्थ में अस्तित्त्व की दखल को, पीड़ा के अनुभव को पुनर्प्रस्तुत करने का कार्य है, एक ऐसा कार्य जो स्वयं सामाजिक यथार्थ में एक दखल बन जाता है। साथ ही वाल्मीकि जी ने अपनी पुस्तक में ‘अंबेडकर-दर्शन के विचार तत्त्व’ के बारे में जो लिखा है, वह भी सम्यक-दृष्टिपूर्ण नहीं कहा जा सकता, वह डॉ. अंबेडकर के विचारों के विश्लेषण-संश्लेषण से अधिक अंबेडकरवादी (बहुजनवादी) आंदोलन द्वारा निर्मित-प्रसारित भावुक-श्रद्धापूर्ण विवेचना है। वे लिखते हैं – ‘दलित साहित्य का वैचारिक आधार डॉ. अंबेडकर का जीवन-संघर्ष एवं ज्योतिबा फुले और बुद्ध का दर्शन उसकी दार्शनिकता का आधार है।‘[9]

लेकिन पूरी पुस्तक में फुले और बुद्ध के विचारों को डॉ. अंबेडकर के विचारों से अलग नहीं किया गया, साथ ही फुले और बुद्ध के अपने दर्शन को डॉ. अंबेडकर के जीवन-संघर्ष से भी नहीं जोड़ा गया। बुद्ध, सिद्ध, कबीर, रैदास, फुले और अंबेडकर सभी को नई दलित-राजनीति – अंबेडकरवाद – की दृष्टि से देखा गया है। बुद्ध के अनीश्वरवाद और अनात्मवाद को – अनित्यवाद की बुद्धवादी व्याख्या को – अनुभववाद में सीमित नहीं किया जा सकता। डॉ. अंबेडकर के बुद्ध विशिष्ट हैं – सर्वज्ञ-सर्वदर्शी भी और आधुनिक राजनैतिक भी – दलितों की भौतिक और आध्यात्मिक समस्याओं का एकमात्र समाधान। बौद्ध-दर्शन अनित्यवाद को अपनी विचारधारा या दर्शन का मूल-तत्त्व मानता है, अंबेडकरवादी-दर्शन अनुभववाद को। वाल्मीकि जी ने बुद्ध, बौद्ध-धर्म, फुले, डॉ. अंबेडकर और अंबेडकरवादी आंदोलन की एक खास छवि निर्मित की है, जिसके आधार पर उनका अंबेडकरवाद तैयार हुआ है, जो कि उनके सौंदर्यशास्त्र का आधार है। यह छवि भौतिक इतिहास के नकार और वास्तविकता के एक अंश के स्वीकार से निर्मित हुई है। भारत का और प्रकारांतर से वर्ण-जाति-धर्म-व्यवस्था का भौतिक इतिहास और यथार्थ की पूर्णता उनके सौंदर्यशास्त्र में उपेक्षित रह गई है। डॉ. अंबेडकर के विचारों को भी पूर्णता में देखने से बचा गया है। वाल्मीकि जी द्वारा दलित-साहित्य में अंबेडकरवादी होने पर ही अधिक ज़ोर दिया गया है। इससे दलित-साहित्य के विस्तार की समीक्षा तो बाधित हुई ही है, साथ ही डॉ. अंबेडकर के विचारों तथा छायावाद और प्रगतिवाद (प्रकारांतर से दक्षिणपंथ और वामपंथ) की सम्यक-आलोचना भी नहीं हो पाई है। अंबेडकरवाद को भी जिस तरह प्रस्तुत किया गया है, वह दलित-साहित्य-समीक्षा के लिए उपयुक्त नहीं, उसमें मुक्ति कम बंधन अधिक है। निश्चित ही, अंबेडकरवाद को समझे बिना दलित-साहित्य की समीक्षा नहीं की जा सकती, तब भी यह याद रखना चाहिए कि अंबेडकरवाद के कई प्रकार हैं, वाल्मीकि जी ने अपने सौंदर्यशास्त्र में मुख्यधारा के अंबेडकरवाद को प्रस्तुत किया है, जो सोचने से अधिक मानने पर ज़ोर देता है, जो सम्पूर्ण दलित-साहित्य को स्वीकार करने में भी समर्थ नहीं, फिर सम्पूर्ण-निम्न-वर्ग तो उनके विवेचन से बाहर ही रह जाता है।

संत-प्रेरणा दलित-साहित्य में महत्त्वपूर्ण स्थान रखती है। वाल्मीकि जी के लिए भी बुद्ध, कबीर आदि नायक हैं, लेकिन डॉ. अंबेडकर के अधिनायकत्त्व में ही। उनके सौंदर्यशास्त्र में डॉ. अंबेडकर को उपास्य बनाने की प्रेरणा सर्वत्र व्याप्त है। डॉ. अंबेडकर के विचारों की सर्वोच्चता सिद्ध करने में ही पुस्तक का अधिक भाग चला गया है। बुद्ध आदि के विचारों के स्वतंत्र अस्तित्त्व की उपेक्षा वाल्मीकि जी के सौंदर्यशास्त्र में प्रकट है। इसी कारण दलित-साहित्य की विरासत को उनका सौंदर्यशास्त्र उचित महत्त्व नहीं देता, जैसे इससे दलित-साहित्य की शुद्धता (अंबेडकरवाद) नष्ट हो जाएगी। वे दलित-साहित्य के विस्तार को भी उचित महत्त्व नहीं देते, जैसे इससे अंबेडकरवाद दूषित हो जाएगा। लेकिन दलित-साहित्य की विरासत और विस्तार को समुचित महत्त्व दिए बिना उसका प्रासंगिक सौंदर्यशास्त्र नहीं निर्मित किया जा सकता। वाल्मीकि जी के डॉ. अंबेडकर अपने में बंद हैं – वे आत्मालाप करते दिखते हैं, संलाप नहीं। ना वे बुद्ध से संवाद कर पाते हैं, ना फुले से और ना ही मार्क्स से।

डॉ. अंबेडकर ने मार्क्स के विचारों के अध्ययन-मनन के अभाव में उनके बारे में कई असंगत स्थापनाएँ प्रस्तुत की हैं। वाल्मीकि जी ने इस संबंध में अलग दृष्टि अपनाई है। वे बुद्ध, मार्क्स और अंबेडकर तीनों को शोषण के विरुद्ध मुक्ति का मार्ग तैयार करने वाला कहते हैं। उनके अनुसार भारत के साम्यवादी नेतृत्त्व और मार्क्सवादी विचारकों ने वर्ग और वर्ण को एक ही मान लिया, इसमें उनके ‘संस्कारों’ या उत्पीड़क-अनुभवों का प्रमुख योगदान रहा, जिससे दलित-मुक्ति के संबंध में उनकी दोहरी मानसिकता का निर्माण हुआ। यहाँ यह ध्यान रखना चाहिए कि वर्ग और वर्ण में भेद होते हुए भी दोनों अंतर्ग्रथित हैं और वाल्मीकि जी दोनों को पूर्णतः अलग मानते दिखते हैं। वे वर्ण-आधारित विश्लेषण को ही सही मानते लगते हैं, और जो कोई वर्ग की बात करता है, उसे वे वर्ण को समझने में असमर्थ बताने लगते हैं। उनका कहना गलत नहीं कि साम्यवादी नेतृत्त्व और मार्क्सवादी विचारकों का उच्च-वर्ग दलित-उत्पीड़न की तीव्रता को समझ नहीं पाया। ऐसे मार्क्सवादियों को वे मार्क्सवाद का मुखौटा लगाए ब्राह्मणवादी कहते हैं। निश्चित ही, ऐसे नेताओं और बौद्धिकों ने मार्क्स के विचारों को भोंथरा ही अधिक किया। मार्क्स के विचारों से प्रेरित लेकिन गंभीर स्व-परिवर्तन में असमर्थ व्यक्तियों के कारण यह विडंबनात्मक स्थिति पैदा हुई। मार्क्सवादियों में कथनी-करनी का अंतर पैदा होने लगा। इससे उत्पन्न अंतर्विरोधों ने साम्यवादी आंदोलन में विखंडन की प्रक्रिया प्रारम्भ की, जो अब तक चल रही है। पर विखंडन की इस प्रक्रिया में भारत के साम्यवादी नेतृत्त्व और मार्क्सवादी विचारकों में ऐसे व्यक्तित्त्व आसानी से खोजे जा सकते हैं, जिन्होंने निम्न-वर्ग और उत्पीड़ित वर्ग के लिए सैद्धान्तिक हथियारों का ही निर्माण नहीं किया बल्कि हथियारों से सिद्धान्त भी रचे। मार्क्सवाद अकादमियों और विश्व-विद्यालयों में पलने वाला वाद नहीं है, वह सम्पूर्ण विश्व के निम्न-वर्ग की मुक्ति की इच्छा की तीव्रता और विद्रोह का सिद्धान्त है। वाल्मीकि जी मार्क्स के विचारों पर चर्चा नहीं करते, लेकिन उन्हें भी अपने देवताओं में जगह दे देते हैं। मार्क्स के विचारों को जाने-समझे बिना ही उनका त्याग या स्वीकार दोनों ही का कोई अर्थ नहीं। वे भी प्रकारांतर से वही काम करते दिखते हैं, जो डॉ. अंबेडकर ने किया था, हालाँकि उनका प्रश्न जायज़ है – ‘शोषणविहीन समाज की परिकल्पना को साकार करने के लिए मार्क्सवादी विचारक ‘वर्ग’ के साथ ‘वर्ण’ को अपनी लड़ाई का लक्ष्य बनाने में ढुलमुल क्यों हैं?’[10]

लेकिन इस प्रश्न को उलटकर भी पूछा जा सकता है कि शोषणविहीन समाज की परिकल्पना को साकार करने के लिए अंबेडकरवादी विचारक ‘वर्ण’ के साथ ‘वर्ग’ को अपनी लड़ाई का लक्ष्य बनाने में ढुलमुल क्यों हैं? या वे वर्ग-विहीन समाज के लिए छिड़ी हुई लड़ाई में सचेत-सक्रिय सहयोग कर रहे हैं? कहीं वे भी दोहरी मानसिकता का शिकार तो नहीं!

सामाजिक-यथार्थ और समूहगत अनुभव का संतुलन दलित-साहित्य के समीक्षाशास्त्र का प्रमुख प्रतिमान है, पर वाल्मीकि जी ने इस पर ठीक से ध्यान नहीं दिया। उनका अनुभव पर इतना ज़ोर है कि सामाजिक-यथार्थ फिसलता जाता है। समूहगत या जाति/समुदायगत अनुभव सामाजिक-यथार्थ का एक खंड है, निश्चित ही, पूर्ण यथार्थ उसके बिना संभव नहीं, लेकिन वह पूर्ण यथार्थ भी नहीं। हमे कहना होगा कि सामाजिक यथार्थ पूरे समाज का यथार्थ है और दलित-साहित्य में वर्णित यथार्थ प्रायः समूह-विशेष का यथार्थ है। दलित-साहित्य में प्रायः समाज के अनुभव नहीं, व्यक्ति के अनुभव प्रस्तुत किए गए हैं। पूर्ण नहीं आंशिक सत्य पर ज़ोर दिया गया है। आश्चर्य नहीं, नव-उदारवादी नीतियों, उपभोक्तावादी-सभ्यता, फासीवादी राजनीति और प्रकृति के विनाश के प्रति अंबेडकरवादी आंदोलन की तरह ही दलित-साहित्य प्रायः उदासीन है। जबकि नई स्थितियाँ अंबेडकरवाद को चुनौती देती खड़ी हैं, इन चुनौतियों के प्रति भय या उपेक्षा का भाव रखना दलित-साहित्य और समीक्षा के लिए भी घातक सिद्ध होगा।

जो समीक्षक डॉ. अंबेडकर के संघर्ष और समीक्षा से प्रेरणा लेते हैं, उन्हें नया भगवान बनाकर दलितों की मुक्ति का स्वप्न देख रहे हैं, तो वे उसी जाल में फँस रहे हैं, जिसमें बुद्ध, सरह, कबीर आदि के अनुसरणकर्ता फँसे थे। भारत का इतिहास साक्षी है कि नया ईश्वर, नया धर्म, नया पुराण, नए भजन रचकर जाति-भेद को समाप्त नहीं किया जा सकता। अनुसूचित-जाति में विश्लेषण-संश्लेषण और योजना-निर्माण की क्षमता का विकास किए बिना अनुसूचित-जाति की मुक्ति संभव नहीं और साथ ही भारत की समाज-व्यवस्था में बदलाव संभव नहीं। दलितों के वैज्ञानिक जागरण के बिना दलित-साहित्य का सौंदर्यशास्त्र भी अधूरा ही रहेगा।

लोकायत से लेकर अंबेडकरवाद तक निम्न-वर्ग और उत्पीड़ित-वर्ग की मुक्ति के कई भारतीय-मार्ग रहे हैं, पर सभी ईश्वरवाद, धर्मवाद, पुराणवाद द्वारा ढँक दिए गए। अगर आज भी उत्पीड़ित-वर्ग इन चोंचलों को नहीं समझ पा रहा है, तो इसमें मुख्य रूप से उनके नाम पर राजनीति करने वाले संगठनों और नेतृत्त्व का दोष है। क्रांतिकारी शिक्षा के अभाव में निम्न-वर्ग और उत्पीड़ित-वर्ग के व्यक्ति सामाजिक-यथार्थ की आंशिक व्याख्या में ही सफल हो पाते हैं। यह व्याख्या प्रायः निज-अनुभव और मुख्य-धारा के प्रभाव में विकसित होती है। सामाजिक-यथार्थ की पूर्णता उनके समक्ष प्रकट नहीं हो पाती, और मुक्ति की उनकी खोज प्रायः नए ईश्वर के निर्माण में समाप्त होती है। नेता देवता की तरह हो जाते हैं, भक्त उनका यशोगान करते हैं – निम्न और उत्पीड़ित वर्ग आधुनिक स्थितियों की चमत्कारी दुनिया बना लेता है – मुक्ति का आधुनिक धार्मिक मार्ग, लेकिन न उत्पीड़न रुकता है न अपमान। विचार भोंथरे निकलते हैं, नेता बुज़दिल। उत्पीड़ित-वर्ग का न भौतिक विकास हो पाता है न आत्मिक। आने वाली पीढ़ी देखती है – नया ईश्वर, नए देवता, नया धर्म – लेकिन आत्मविश्वास और साहस का अभाव, समुचित शिक्षा और आनंद का अभाव। विडम्बना और निराशा का एकछत्र राज। कवि रोष प्रकट करता है –

मगर / अब तक तो / यही दिखाई दिया है / कि हमारे संगठनों के / लगभग सारे रहनुमा / वैचारिकता से / नपुंसक हैं / साहस से खाली हैं / इच्छा शक्ति से / बंजर और बाँझ हैं / और / अपने ही / कीचड़ में लथपथ रहकर / अचंभों में / मरने वाले / आत्मघाती जानवर हैं।[11]

मार्क्सवादी हों या अंबेडकरवादी, इस बात को समझा जाना चाहिए कि जिस तरह कर्मरहित चिंतन व्यर्थ है, उसी तरह चिंतनरहित कर्म भी व्यर्थ है। मीडिया और प्रबंधन उत्पीड़ितों को सोचने-समझने से रोकने का ही काम करते आए हैं। शोषक और शोषितों के, उत्पीड़क और उत्पीड़ितों के सदियों के संघर्ष से यह अनिवार्य सीख मिलती है कि शोषितों-उत्पीड़ितों के स्वयंबुद्ध हुए बिना किसी भी सामाजिक-व्यवस्था में कोई भी वास्तविक बदलाव असंभव है। संपूर्ण-निम्न-वर्ग की मुक्ति के बिना किसी क्षेत्र या सामाजिक-वर्ग की मुक्ति भी संभव नहीं। भावुक-श्रद्धा नहीं, क्रांतिकारी शिक्षा ही यह काम कर सकती है।

आत्मकथा दलित-साहित्य की विशेष विधा है। ओमप्रकाश वाल्मीकि ने स्वयं भी आत्मकथा लिखी है और अपने सौंदर्यशास्त्र में भी दलित-साहित्य में आत्मकथा के विशेष महत्त्व को स्वीकार किया है। दलित-आत्मकथा दलित-अनुभव का प्रामाणिक दस्तावेज़ सामाजिक यथार्थ की सापेक्षिकता में ही है, उससे अलग वह अस्तित्त्व में भी नहीं आ सकती थी, और उसकी समीक्षा भी सामाजिक यथार्थ के पक्ष के संतुलन में ही हो सकती है। सामाजिक यथार्थ अनुभव को जन्म देता है, न कि इसका उलट। ओमप्रकाश वाल्मीकि सामाजिक यथार्थ की उपेक्षा पर एक पक्षीय (अंबेडकरवादी) अनुभव के साहित्य के रूप में दलित-साहित्य को स्थापित करते हैं, लेकिन उनकी आत्मकथा, कविताएं और कहानियाँ इस स्थापना का विरोध आप हैं।

समाज और व्यक्ति की पारस्परिकता में अनुभव निर्मित होते हैं, वाल्मीकि जी का सौंदर्यशास्त्र इस मूलभूत बात की उपेक्षा कर अनुभव के स्वामित्व को ही महत्त्वपूर्ण मानता है। फिर अनुभव के स्वामित्व की विविधता भी वे स्वीकार नहीं कर पाते, अंबेडकरवादी अनुभव ही उनके लिए दलित-अनुभव है। निश्चित ही, दलित-अनुभव सामाजिक यथार्थ में एक दलित-व्यक्ति के हस्तक्षेप को प्रस्तुत करता है और दलित-साहित्य दलित-अनुभव के सत्य का प्रकाशन करता है, लेकिन वाल्मीकि जी के अनुभव क्या कौशल्या बैसंत्री के अनुभवों से सादृश्यता दिखलाते हुए भी अलग नहीं हैं? वाल्मीकि जी दलित-आत्मकथाओं के अंतर्संबंधों की भी उपेक्षा करते हैं। आज दलित-साहित्य के विस्तार के साथ हिन्दी में दलित-आत्मकथाओं में भी शुभवृद्धि हुई है, तब भी अभी वह बहुत कम है। आत्मकथा आमतौर पर बुढ़ापे में लिखी जाती है और दलित-साहित्य अभी मुख्यतः युवाओं के हाथ में है। अभी हज़ारों दलित-आत्मकथाओं की भूमिका बन रही है। इन भविष्य की आत्मकथाओं की संगति में इन प्रारम्भिक आत्मकथाओं को और बेहतर समझा जा सकेगा। दलित-आत्मकथाओं और स्व-कथनों ने भारत के निम्न-वर्ग के दलित-अनुभवों को दर्ज कर अभूतपूर्व कार्य किया है। स्व-कथा नहीं, तो स्व-कथन के माध्यम से ही, लेकिन अन्य उत्पीड़ित वर्गों को भी इस कार्य में सहयोग के लिए आगे आना चाहिए। भारत के अन्य उत्पीड़ित-वर्गों के लिए दलित-साहित्य प्रेरणा और बहस का स्रोत है।

कुछ समीक्षक डॉ. अंबेडकर को पूंजीवाद और ब्राह्मणवाद के विरोधी के रूप में प्रस्तुत करने पर ज़ोर देते हैं, जबकि डॉ. अंबेडकर की चिंता और चिंतन का मुख्य विषय पूंजीवाद-विरोध नहीं रहा। अंबेडकरवादी आंदोलन भी पूंजीवाद का सचेत-सक्रिय विरोधी नहीं है। अगर हम डॉ. अंबेडकर के जीवन और विचारों का भावुक-श्रद्धापूर्ण अनुशीलन भर न करें और अंबेडकरवादी आंदोलनों के ज़मीनी कार्यों को देखें, तो हमें ज्ञात होगा कि भारत में ब्राह्मणवाद-विरोधी चेतना के निर्माण में जितना सहयोग डॉ. अंबेडकर और अंबेडकरवाद का है, उतना किसी वामपंथी-संगठन का नहीं, साथ ही यह भी कि पूंजीवाद-विरोधी चेतना के निर्माण में डॉ. अंबेडकर के विचारों और अंबेडकरवादी-संगठनों का सहयोग न के बराबर है। पूंजीवाद और ब्राह्मणवाद  के संयोजित रूप का विरोध अंबेडकरवादी और मार्क्सवादी आंदोलन की नई दिशा है। ऐसे प्रयास अभी अपने प्रारम्भिक दौर में हैं।

भारत का पूंजीवाद विशिष्ट है, वह विभिन्न जातियों-जनजातियों-समुदायों से निर्मित, एक बहुराष्ट्रीय सामाजिक-संरचना में कार्यरत है। भारत में पूंजीवाद उपनिवेशी-शक्तियों, स्थानीय भू-स्वामियों और व्यापारियों के संयोग से निर्मित हुआ है। उच्च-वर्ग की सहभागिता के बिना उपनिवेश का निर्माण असंभव था। यहाँ यह नहीं भूलना चाहिए कि वर्तमान भारत का एक बड़ा भाग कभी सीधे उपनिवेश के अंतर्गत नहीं रहा। भारत का समाज उत्तर-उपनिवेशी-काल में भी पारंपरिक उच्च-वर्ग के नियंत्रण में ही विकसित होता रहा है। पारंपरिक बौद्धिक ही उत्तर-उपनिवेशी भारत में शासक-वर्ग के रूप में उभरे। यह वर्ग ही पूंजीवाद का लाभ लेने में सक्षम था और है, वह अपने रहते उत्पीड़ित-वर्गों को स्वतन्त्रता या लोकतन्त्र का लाभ नहीं लेने देगा, इसी कारण उत्पीड़ित-वर्गों की मुक्ति पूंजीवाद के नाश से सीधे सम्बद्ध  है। भारत के पारंपरिक उच्च-वर्ग के आचार-विचार ही मुख्य-धारा के आचार-विचार हैं। वर्तमान भारत की समाज-व्यवस्था भी इन्हीं पारंपरिक उत्पीड़क-वर्ग के पूँजीपतियों के अधीन है। भारत में पूंजीवाद, फूले से लेकर अंबेडकर के समय तक, वह भी सीमित अर्थों में, दलितों के लिए उपहार था। लेकिन पूंजीवाद के अपने हित थे, जो दलितों के हित के विपरीत थे और हैं, इसी कारण भारत में विकसित पूंजीवादी-साम्राज्यवादी-संसदीय-प्रणाली अनुसूचित-जाति के लिए सुविधा नहीं दुविधा बनती गई। संविधान भारत के निम्न-वर्ग और उच्च-वर्ग के बीच एक ऐसे समझौते के रूप में उभरा, जिसे बोटी देकर बकरा लेना कहा जा सकता है। डॉ. अंबेडकर ने इस स्थिति के संबंध में अपने विचारों को १९५५ में बी.बी.सी. को दिए एक साक्षात्कार में रखा है। वे कहते हैं कि हमारे देश में एक ऐसी सामाजिक संरचना है, जो संसदीय प्रणाली के साथ पूरी तरह असंगत है।[12] उनके अनुसार भारत की आज़ादी के बाद विकसित हो रहा लोकतन्त्र ‘अछूतों’ की मुक्ति में विशेष सहयोगी नहीं हो पाएगा। वे संसदीय-चुनावों में जीत-हार, भाषण और लोकतन्त्र के भरोसे बैठे रहने की बजाय, दलित-मुक्ति के लिए ठोस कार्यक्रम/योजना और संस्थाओं/संगठनों के निर्माण की वकालत करते हैं।

भारत भर के शोषण-उत्पीड़न-विरोधी आंदोलनों का संयोजन और निम्न-वर्ग की एकजुटता इतनी आसान नहीं। भारत के निम्न-वर्ग के खाते में निरंतर विजय दर्ज करते जाने वाली विचारधारा, आंदोलन और नेतृत्त्व अभी तक विकसित नहीं हो सका है। मिज़ोरम और राजस्थान की, कश्मीर और केरल की सामाजिक-व्यवस्था और निम्न-वर्ग की चेतना और संगठन का स्तर एक-से नहीं है, यद्यपि पूरे भारत में शोषण-उत्पीड़न का कारोबार जारी है, पूंजीवाद हावी है। निम्न-वर्ग के पास विचारधारा के नाम पर देसी कट्टे हैं, और शत्रु एके-47 लिए खड़ा है।

हिन्दी-दलित-साहित्य और अंबेडकरवाद नाभिनालबद्ध हैं, लेकिन अंबेडकरवादी आंदोलन की सीमा को दलित-साहित्य की सीमा नहीं माना जा सकता। डॉ. अंबेडकर के विचारों को सभी दलित-साहित्यिकों पर भी नहीं थोपा जा सकता। आज डॉ. अंबेडकर के विचारों और अंबेडकरवादी आंदोलनों को पूर्णता में परखने की ज़रूरत है, साथ ही बुद्ध या कबीर या फुले या पेरियार या अयंकाली के कार्यों-विचारों को डॉ. अंबेडकर के मातहत करने से बचने की भी। दलित-साहित्य का सौंदर्यशास्त्र भौतिक इतिहास के नकार और सामाजिक यथार्थ की उपेक्षा पर नहीं तैयार हो सकता।

बुद्धवाद हो, मार्क्सवाद हो या अंबेडकरवाद, जो निम्न-वर्ग और उत्पीड़ित-वर्ग को बौद्धिक और आत्मिक रूप से नेताओं और विचारकों पर आश्रित रखना चाहता है, वह उनका हितैषी नहीं हो सकता। दलित-आत्मकथाएँ भारत में क्रांतिकारी शिक्षा की आधार पाठ्य-वस्तु है। दलित-साहित्य – विशेषकर आत्मकथा – और समीक्षा ने मेरे सामने जिस दुनिया को खोल दिया है, वह भूख, पीड़ा, रोष, आशा और बहस की दुनिया है। यह दुनिया चीख-चीख कर कह रही है – हमें न नए पवित्र (ब्राह्मण) चाहिए, न नए ‘अछूत’ (दलित), हमें न नए पूंजीपति चाहिए, न नए मज़दूर, हमें ख़ुशी और सम्मान का जीवन चाहिए, हम शोषण, उत्पीड़न और अपमान की समाज-व्यवस्था का विनाश करके ही दम लेंगे – ‘हमारी दासता का सफर / तुम्हारे जन्म से शुरू होता है / और इसका अंत भी / तुम्हारे अंत के साथ होगा।‘[13]

usman khanउस्मान ख़ान समकालीन हिंदी साहित्य के अलहदा युवा कवि-कथाकार-आलोचक हैंचर्चाओं और पुरस्कारों की भीड़ से अलहदा… छपाऊ मानसिकता से भी अलहदा... जे.एन.यूके हिंदी विभाग से मालवा के लोकसाहित्य पर पीएचडीइनसे usmanjnu@gmail.com पर संपर्क कर सकते हैं.

 

सन्दर्भ: 

[1]  संदर्भ-सूची में आवश्यक संदर्भ ही दिए गए हैं, जबकि विचार कई संदर्भों से लिए गए हैं।

[2]  पूरी ग़ज़ल इस लिंक पर पढ़ें – https://www.rekhta.org/ghazals/fariyaad-kii-koii-lai-nahiin-hai-mirza-ghalib-ghazals?lang=hi

[3]  अधिक जानकारी के लिए देखें – रंगनायकम्मा, ‘जाति’ प्रश्न के समाधान के लिए बुद्ध काफ़ी नहीं, अंबेडकर भी काफ़ी नहीं, मार्क्स ज़रूरी है, राहुल फाउंडेशन, २००८

[4]  जॉन ड्यूई, आर्ट एज़ एक्सपेरियंस, द बर्कले पब्लिशिंग ग्रुप, पेंग्विन ग्रुप, २००५

[5]  ओमप्रकाश वाल्मीकि, दलित साहित्य का सौंदर्यशास्त्र, राधाकृष्ण प्रकाशन, २०१४, पृ.-५०

[6]   पूरी कविता इस लिंक पर पढ़ें – https://aavazdo.wordpress.com/2017/10/01/ये-दलितो-की-बस्ती-है/

[7]  डॉ. भीमराव अंबेडकर, अछूत कौन और कैसे, अनुवादक – भदंत आनंद कौसल्यायन, गौतम बूक डिपो, प्रथम प्रकाशन, १९४९, पृ.-८८। ‘सौंदर्यशास्त्र’ में पुस्तक का नाम ‘शूद्र कौन और कैसे?’ छपा है।

[8]   ओमप्रकाश वाल्मीकि, उपरोक्त, पृ.-५०

[9]   ओमप्रकाश वाल्मीकि, उपरोक्त, पृ.-५३

[10]  ओमप्रकाश वाल्मीकि, उपरोक्त, पृ.-९७

[11]  बजरंग बिहारी तिवारी, दलित साहित्य : एक अंतर्यात्रा, नवारुण प्रकाशन, २०१५, पृ.-५८ से उद्धृत। निश्चित ही, ‘नपुंसक’ और ‘बांझ’ जैसे शब्द खलते हैं, लेकिन आशय स्पष्ट है।

[12]   पूरा साक्षात्कार इस लिंक पर देख-सुन सकते हैं – https://www.youtube.com/watch?v=4RcGJtl2nhE

[13]  बजरंग बिहारी तिवारी, उपरोक्त, पृ.-७३ से उद्धृत

रोहित वेमुला की घटना और वेलीवाड़ा: मार्तंड प्रगल्भ

मुक्तिकामी शिक्षा की एक नितांत भिन्न छवि को संजोये किसी आदर्शवादी नौजवान को वर्तमान विश्वविद्यालयों के भीतर भी उसी सर्वग्रासी अवमूल्यन को जन्म देने वाली अलगाव और जड़ता की पारिस्थितकी के पीड़ादायी अनुभवों से गुजरने को बाध्य होना पड़ता है. दलित समाज के लिए ये अनुभव उनकी चेतना की व्यवस्था में ऐतिहासिक रूप से पुरुत्पादित होते आये हैं. यह अकारण नहीं कि ‘रोहित वेमुला’ की घटना के बाद उभरा आन्दोलन विश्वविद्यालय में वेलीवाड़ा को पुनर्न्वेषित करता है. विद्रोह के लिए ज़रूरी स्पेस के रूप में वेलीवाड़ा न केवल विश्वविद्यालय की सीमाओं को स्पष्ट करता है वरन् समाज में हर जगह व्याप्त वेलीवाड़ा के व्यापक संघर्ष का हिस्सा बन जाता है. #लेखक 

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A sculpture at University of Hyderabad . Credit: Javed Iqbal, via The Wire

रोहित वेमुला की घटना और वेलीवाड़ा

By मार्तंड प्रगल्भ

रोहित वेमुला के पहले और आखिरी पत्र[1] को पढ़ते वक़्त एक आदर्शवादी नौजवान की छवि उभर आती है. वह अपने जीवन-अनुभवों से जानता है कि हमारी ह्रासग्रस्त मानवीय सम्बन्धों से बनने वाली पूरी पारिस्थितिकी बनावटी, झूठी, कृत्रिम और भयोत्पादक हो गयी है. “ हमारा प्रेम बनावटी है, हमारी मान्यताएं झूठी हैं, हमारी मौलिकता वैध है बस कृत्रिम कला के ज़रिये, यह बेहद कठिन हो गया है कि हम प्रेम करें और दुखी न हों.” मनुष्य होने की हर संभव कोशिश और उत्साह रोज़मर्रा की ज़िन्दगी में शामिल गहरे अवमूल्यन से मुठभेड़ करती है. मनुष्यों के मूल्यांकन की उनकी परिभाषाओं की एक दूसरी दुनिया का स्वप्न अपने आसपास के अवमूल्यित मूल्यों से विद्रोह करने को बाध्य है. एक ऐसी दुनिया के लिए जहाँ प्रेम दुःख न पैदा करे. आज की दुनिया में मनुष्यों का मूल्य,“ इंसान की उपयोगिता उसकी तत्कालीन पहचान तक सिमट कर रह गयी है और उसकी नजदीकी संभावना तक ही सीमित कर दिया गया है … एक आंकड़ा है मनुष्य- महज एक वस्तु … आदमी को कभी भी उसके दिमाग के हिसाब से नहीं आंका गया. एक ऐसी चीज़ जो स्टारडस्ट से बनी थी, हर क्षेत्र में, अध्ययन में, गलियों में, राजनीति में, मरने में और जीने में.” दिमाग जो स्वप्न देख सकता है. विज्ञान का स्वप्न. केवल तात्कालिक संभावना के विरुद्ध भविष्य के दिक्-काल की असीम संभावनाओं का स्वप्न. वास्तविक मनुष्य को वस्तुवत करने की मूल्यव्यवस्था के खिलाफ मनुष्य होने की अनंत संभावना को जीवन मूल्य के रूप में जीने वाले लोगों के लिए अनिवार है कि वे आपस में मिलकर जीवन की पारिस्थतिकी के आमूलचूल परिवर्तन में जुड़ जाएँ. स्वयं को उस परिवर्तन के हथियार के रूप में रूपांतरित करें. अलगाव और जड़ता की सर्वग्रासी सभ्यता जीवन के बीजों को नष्ट करने का कारखाना बन चुकी है. मनुष्यता का विद्रोह और नए के निर्माण का संकल्प प्रत्येक क्षण इस झूठ को महसूस करने में इसके अंत को जीता है. “मैं मृत्यु के बाद की कहानियों पर विश्वास नहीं करता, भूत और आत्मा. अगर कुछ है जिस पर मैं भरोसा करता हूँ, वह है कि मैं सितारों की सैर करूँगा और दूसरी दुनिया के बारे में जानूंगा”.

मुक्तिकामी शिक्षा की एक नितांत भिन्न छवि को संजोये किसी आदर्शवादी नौजवान को वर्तमान विश्वविद्यालयों के भीतर भी उसी सर्वग्रासी अवमूल्यन को जन्म देने वाली अलगाव और जड़ता की पारिस्थितकी के पीड़ादायी अनुभवों से गुजरने को बाध्य होना पड़ता है. दलित समाज के लिए ये अनुभव उनकी चेतना की व्यवस्था में ऐतिहासिक रूप से पुरुत्पादित होते आये हैं. यह अकारण नहीं कि ‘रोहित वेमुला’ की घटना के बाद उभरा आन्दोलन विश्वविद्यालय में वेलीवाड़ा को पुनर्न्वेषित करता है. विद्रोह के लिए ज़रूरी स्पेस के रूप में वेलीवाड़ा न केवल विश्वविद्यालय की सीमायों को स्पष्ट करता है वरन् समाज में हर जगह व्याप्त वेलीवाड़ा के व्यापक संघर्ष का हिस्सा बन जाता है. समाज के अदृश्य और अस्पृश्य का विश्वविद्यालय के भीतर दृश्य और भौतिक होना न केवल समाज के पुनर्संयोजन की दृष्टि देता है वरन् शिक्षा के नए सैद्धांतिक व्यवहारों की प्रेरणा भी प्रदान करता है. ऐतिहासिक रूप से संतों के सामाजिक-सांस्कृतिक प्रयासों और अम्बेडकर के राजनीतिक व्यवहारों में दलितवाड़ा या वेलीवाड़ा के सामाजिक स्पेस को सामाजिक क्रान्ति के आधार क्षेत्र के रूप में रूपांतरित होता हुआ हम देखते हैं. इस अर्थ में ‘वेलीवाड़ा’ दलित मुक्ति के ऐतिहासिक प्रयोगों की परम्परा में है. यह कोई फिक्स मॉडल नहीं वरन् एक आन्दोलन है जिसका उद्देश्य है जातियों का नाश और श्रम-विभाजन को श्रमिकों के विभाजन से मुक्त करना. दूसरे शब्दों में वेलीवाड़ा समानता और न्याय के वास्तव को समाज में स्थापित करते जाने वाला आन्दोलन है. यह नए गणराज्य की इकाई नहीं वरन् गणराज्य को चुनौती है.

पिछले कुछ सालों से देश भर की उच्च शिक्षण संस्थाएं हमारी संसदीय सरकारों के निशाने पर हैं. निशाने पर हैं और बहुत संस्थागत रूप से उच्च शिक्षा के लोकतांत्रिक आदर्श को नष्ट करने की शक्तियों के खिलाफ संघर्ष कर रहे हैं. किसी न किसी तरीके से विश्वविद्यालय की सम्पूर्ण पारिस्थितिकी को बचाने की जद्दो-जहद भी तेज हो रही है. कुछ गिने-चुने विश्वविद्यालय या शोध की उच्च शिक्षण संस्थाएं बची हैं जो आज भी नए भारत के स्वप्न को बचाने की कोशिश कर रही हैं. नए भारत के निर्माण और शिक्षा के व्यवहार के विमर्श में नए समाज के निर्माण का आदर्श भी जिंदा है. नवउदारवाद के हिंसक और हमलावर दौर में इन विश्वविद्यालयों का लोकतांत्रिक व्यवहारों और शिक्षा के वैश्विक प्रयोगों के सहिष्णु विमर्श की जगह के रूप में खुद को बचाए रखने की राजनीति अपवाद चिह्नित हो रही है. पिछले तीस-चालीस सालों में सम्पूर्ण शिक्षा-व्यवस्था का पुनर्संयोजन होता गया है. गाँव, कस्बों और छोटे-बड़े शहरों में यह पुनर्संयोजन स्वीकार्य बना दिया गया. इसलिए आज जब जवाहरलाल नेहरु या हैदराबाद विश्वविद्यालय पर प्रायोजित हमले हो रहे हैं ऐसे में उनकी पारिस्थितिकी असुरक्षित महसूस कर रही है. यह असुरक्षा देशभर की शैक्षणिक पारिस्थितिकी में संपन्न मूलगामी दरार के खिलाफ शिक्षा की नयी व्यवस्था की लड़ाई में सहभागिता-निर्माण के संकट के चलते है. संघर्ष के अपने अपवाद चरित्र के कारण ‘save या बचाओ’ का नारा निर्माण की कार्य-नीति के लिए जरूरी हो उठा है.

उच्च शिक्षा की स्थानीय पारिस्थितिकी का एक ऐसा मॉडल जो स्वतः और संतुलित संचालन का भी मॉडल हो अब संभव नहीं रह गया है. मार्क्स पूँजीवाद के विकासक्रम में पैदा होने वाले सम्पूर्ण मानवीय सामाजिक-चयापचय(सोशल मेटाबोलिज्म) के रिफ्ट की चर्चा करते हैं. मनुष्य जीवन की सम्पूर्ण पारिस्थितिकी में उत्पन्न यह भ्रंश (रिफ्ट) अलगाव और जड़ता को ऐसी अपूरणीय क्षति में बदल देता है जहाँ से पुनर्वापसी संभव नहीं रह जाती. यह भ्रंश अनिवार्यतः और सतत वैश्विक संकट है. इसलिए विश्विद्यालय की पारिस्थितिकी-भ्रंश के खिलाफ संघर्ष अपनी चौहद्दी में असंभव नए प्रयोगों से मुकर नहीं सकता. रोहित वेमुला की घटना के बाद यह संघर्ष विश्वविद्यालयों की पारिस्थितिकी में दलित जीवन के संकट को समझने और व्यापक संकट के खिलाफ क्रांतिकारी नव-निर्माण के व्यवहारों में सहभागी आन्दोलनों का रूप ग्रहण करने की चेष्टा कर रहा है. सहभागी स्थानीय आन्दोलनों के भीतर व्यवहारों के लोकतांत्रिक स्वरूप को लेकर बहस पहले से कहीं तेज हो उठी है. वास्तविक समानता या जिसे अंग्रेजी में sabstantive eqality कहा जाता है उसके स्थानीय प्रयोग लोकतंत्र के आंदोलनात्मक चरित्र को व्यावहारिक बनाने का प्रयास कर रही है. इन प्रयासों को भी अम्बेडकर के राजनीतिक व्यवहारों से प्रेरणा मिलती है. लोकतंत्र उनके लिए सरकार की एक व्यवस्था मात्र नहीं थी. लोकतांत्रिक समाज एक गतिशील समाज है. स्वतंत्रता, समानता और भाईचारे के मूल्यों को आचरण में उतारने के लिए ज़रूरी समाज. यहाँ साहचर्य या संगठन के अन्य रूपों से संवाद संभव है. भाईचारा हर व्यक्ति या विचार को मूल्यवान मानने में है, अगर वह व्यक्ति और विचार वास्तविक जीवन में समानता का आचरण करता है या उसकी प्रेरणा देता है. “ दूसरे शब्दों में, समाज के भीतर संपर्क का सर्वत्र प्रसार होना चाहिए. इसी को भाईचारा कहा जाता है और यह प्रजातंत्र का दूसरा नाम है. प्रजातंत्र सरकार का एक स्वरुप मात्र नहीं है. यह वस्तुतः साहचर्य की स्थिति में रहने का एक तरीका है, जिसमें सार्वजनिक अनुभव का समवेत रूप से सम्प्रेषण होता है.”[2] आरक्षण-केन्द्रित सुधारवादी प्रयोगों ने साहचर्य और भागीदारी के लोकतंत्र को कुछ एक व्यक्तियों के इर्द-गिर्द सीमित कर दिया . ‘सार्वजनिक अनुभव का समवेत रूप से सम्प्रेषण’ जीवन के अन्य क्षेत्रों की तरह विश्वविद्यालयों के भीतर भी असंभव होता गया है. छात्र राजनीति से निकले प्रगतिशील मूल्यों वाला लोकतांत्रिक मॉडल भी साहचर्य में वास्तविक समानता के सामाजिक परिवर्तन को सत्ता प्राप्ति की होड़ के हवाले कर देता है. दलित राजनीति अपने समय के सभी सामाजिक सुधारवादी माडलों के अन्दर समानता और भाईचारे के आचरण का अभाव महसूस करती है. इसका अर्थ है कि छात्र राजनीति के परम्परागत संगठनात्मक अनुभवों में जाति के नाश की किसी ईमानदार कोशिश का अभाव है. इसलिए जब कैम्पस-लोकतंत्र को बचाने की बात की जाती है तो यह दलित राजनीति के सामने ‘किस लोकतंत्र’ को बचाने का सवाल बन जाता है. विश्वविद्यालय की पारिस्थितिकी को बनाने वाले छात्रों, शिक्षकों, कर्मचारियों, कामगारों के रोज़मर्रा के जीवन में समानता और भाईचारे के नाम पर केवल उंच-नीच का व्यवहार है. दलित राजनीति उंच-नीच की इस उत्पीड़क व्यवस्था का वास्तव में नाश चाहती है. यही कारण है कि लोकतांत्रिक मॉडलों के नाम पर चलने वाली उत्पीड़क व्यवस्था से संघर्ष साहचर्य और सामाजिक संगठन के ज्यादा समतामूलक रूपों की तलाश भी है.

जातिगत शोषण दलित जीवन का यथार्थ है. ऐतिहासिक रूप से जाति की व्यवस्था ने समाज को न केवल विद्रूपित किया है बल्कि इसने सभ्यतामूलक बर्बरता को समाज व्यवस्था की केन्द्रीय शक्ति बना दिया है. इस सभ्यतामूलक बर्बरता के खिलाफ समतापरक समाज के आदर्श वाली दलित राजनीति के भीतर वाम छात्र-आंदोलनों के लोकतांत्रिक-सांस्थानिक व्यवहारों के प्रति एक स्वाभाविक अस्वीकार है. अस्वीकार की यह स्वीकृति केवल विचारधारा के लिए ही ज़रूरी नहीं है बल्कि इस अस्वीकार की रौशनी में नए विश्वविद्यालय तक अपना सफ़र तय करना हमारी आवश्यकता भी है. दलित राजनीति यह वाजिब सवाल उठाती है कि प्रगतिशील छात्र आंदोलनों ने विश्वविद्यालय के पारितंत्र में दलित जीवन को सम्यक ढंग से संबोधित क्यों नहीं किया? या ऐसा वो क्यों नहीं कर पाए? बचाने से परिरक्षण और पुनर्निर्माण क्योंकर होगा? और यह सवाल एक बारगी मुक्तिकामी राजनीति की सम्पूर्ण परम्परा को चुनौती है. चुनौती के इसी व्यवहार में दलित और प्रगतिशील सहभागिता विकसित हो सकती है. रोहित वेमुला का अस्वीकार दलित और प्रगतिशील ताकतों की सहभागी परम्परा को चुनौती देने वाला अस्वीकार है. उच्च शिक्षण-संस्थाएं संघर्ष, ज्ञान और संगठन के जिन स्वप्न-आदर्शों को संबोधित करती हैं उनके टूटने का अस्वीकार और नवनिर्माण की चेतना है रोहित वेमुला. अम्बेडकर की उन्मूलनपरक दृष्टि और शिक्षा के मुक्तिदायक रूपों पर जोर आज ‘रोहित वेमुला’ के स्वप्न-आदर्शों में नए अर्थग्रहण कर रहा है. यह अर्थ-ग्रहण क्रमिक मोह-भंगों के खिलाफ होने वाले वास्तविक आन्दोलनों से पृथक पहचाना नहीं जा सकता.

वेलीवाड़ा और साहचर्य

कबीरा यह घर प्रेम का खाला का घर नाहीं / शीश उतारे भूईं धरे तब पैसे घर माहीं”

वेलीवाड़ा के संदर्भ में कबीर का घर याद आना अनायास नहीं है. इस घर में प्रेम के नियम को छोड़ कर कोई अन्य सामाजिक नियम लागू नहीं है. प्रेम भी कोई नैतिक विधि-शास्त्र से संचालित अलंकरण नहीं बल्कि साहचर्य की रचना-प्रक्रिया. इस घर में प्रवेश के लिए ज़रूरी है तत्कालिक पहचान से मुक्त होना. एक ऐसा सामाजिक स्पेस जो निश्चित हदों के बदले अनहद हो. लोकतंत्र का ऐसा अनहद चरित्र ही वेलीवाड़ा है. यह अनहद ‘सार्वजनिक अनुभवों का समवेत सम्प्रेषण’ है. यह सम्प्रेषण सामाजिक सुधार के सतही प्रयासों के लिए अस्वीकार्य है. इस अस्वीकार्यता के चलते यह मूलगामी राजनीति का संयोजक हो उठता है. वेलीवाड़ा सामूहिक स्वामित्व और सामूहिक अभिव्यक्ति ( ओनरशिप और ऑथरशिप) दोनों है. अम्बेडकर के राजनीतिक प्रयासों से दो उदाहरण इसकी ऐतिहासिक परम्परा को स्पष्ट करते हैं. देवदासियां मंदिरों से निकल कर मुंबई के कामतीपूर में सेक्स-मजदूरी करने लगीं. शहर उन्हें आत्म-मर्यादा नहीं दे पाया. वह अपनी अस्पृश्यता और अपने अपमान से मुक्त नहीं हुई. उनका प्रेम, मातृत्व, कामना और अपने सम्पूर्ण जीवन पर अधिकार न पहले था और न सेक्स-मजदूर बनने के बाद. अम्बेडकर इनसे बात-चीत करने गए एक नए घर का स्वप्न ले कर. शहर की मलिन बस्तियों के भीतर एक सर्वथा भिन्न पारिस्थितिकी का स्वप्न लेकर. गोपाल गुरु ने ध्यान दिलाया है कि अम्बेडकर के लिए श्रम-शक्ति ही देहों में मूर्त होती है. यह श्रम-शक्ति बलात् मजे की वस्तु होने से इनकार करती है. “ अम्बेडकर इसलिए सलाह देते हैं कि आत्म-मर्यादा मूलतः उस प्रक्रिया से निकलती है जिसमें ये अस्पृश्य महिलायें अपने श्रम को भौतिक गुणों जैसे प्रकृति, भूमि या उद्योग से घुला मिला सकें.”[3]  आत्म-मर्यादा केवल एक विचारधारा नहीं बल्कि एक भौतिक प्रक्रिया है. शादी अम्बेडकर के लिए मुक्त साहचर्य की ऐसी प्रक्रिया थी जहां सामूहिक श्रम-शक्ति अपनी भौतिक दुनिया के साथ घुल-मिल कर सामूहिक भलाई की स्वतंत्र इकाई हो जाए. श्रम-शक्ति की स्वतंत्र और ठोस अभिव्यक्ति के लिए ज़रूरी है कि भौतिक गुण सार्वजनीन हों. निजी संपत्ति को बचाए रखने की व्यवस्था श्रम-शक्ति का बलात् दोहन करती है. अस्पृश्यों के आत्मसम्मान और आत्म-मुक्ति के लिए ज़रूरी प्रक्रिया है प्रकृति और समाज के ऊपर किसी भी तरीके के निजी संपत्ति का क्षरण. स्त्रियाँ तो श्रम-शक्ति का उत्पादन भी करती हैं. ऐसी स्थिति में दलित और मलिन बस्तियों की अस्पृश्य महिलायें सामाजिक पुनुरुत्पादन की दूसरी रीति के लिए संघर्ष में ही आत्म-मर्यादा भी हासिल कर सकती हैं. साहचर्य यहाँ व्यक्तिगत उत्पादकों के स्वतंत्र साहचर्य के लिए ज़रूरी संघर्ष की एकता में है. अम्बेडकर ने इस संघर्ष को जारी रखने वाले आत्मबल के लिए दलित गृहस्थ की एक नयी कल्पना सामने रखी. बहुत कुछ कबीर के घर की तरह.

कबीर की तरह अम्बेडकर भी जानते थे कि जो अपना पुराना घर नहीं जला सकता वह इस नए साहचर्य में शामिल नहीं हो सकता. ‘जात-पात तोड़क मंडल’ का हिन्दू सुधारवादी प्रयास अम्बेडकर को अपने घर में अध्यक्ष बना कर पंजाब के दलितों का अभिभावक बनना चाहता था. यह प्रतिनिधित्व को प्रतीकात्मक बनाना था. पंजाब का दलित जन-गण अम्बेडकर के जाति-विनाश या उन्मूलन की दृष्टि को पहचानना चाहती थी. आत्म-परिचय की यह सामूहिक चेतना स्वाभाविक रूप से मंडल को बाध्य कर रही थी कि वह लाहौर में अपने सभा की वार्षिक कांफ्रेंस का अध्यक्ष बम्बई के एक उन्मूलनवादी डॉक्टर साहेब को बनाये. सवर्ण सुधारकों का वैष्णव घर ऐसे अस्पृश्य को बिना किसी शुद्धि के प्रवेश नहीं दे सकता था. अम्बेडकर ने मंडल के साथ अपने पत्राचार में लगातार शुद्धि के वैष्णव आग्रहों को अस्वीकार किया. अपने पर्चे के किसी अभी अंश या विचार से उन्होंने समझौता नहीं किया. अम्बेडकर जानते थे कि ऐसे सुधारवादी बिना अपने वैष्णव घर को जलाए उनके सहचर नहीं बन सकते. मंडल की सामाजिक संरचना की आलोचना करते हुए अम्बेडकर गुरु और अंत्यज के अंतर्विरोध को बहुत तीव्र कर देते हैं. गुरु के रूप में एक अस्पृश्य को स्वीकार करने का अर्थ था समानता के आदर्श को आचरण में उतारना. यह आचरण नए सामाजिक सम्बन्धों की स्वीकृति है. साहचर्य के लिए जातिप्रथा का ज़रूरी ध्वंस स्वीकार करने में मंडल असमर्थ था. हिन्दू-धर्म और जातिव्यवस्था की प्रभुत्वशाली दुनिया में अम्बेडकर हमेशा बहिष्कृत थे. अपने बलात् बहिष्कार के हिंसात्मक-अहिंसात्मक अनुभवों के सहारे ही वह जाति-उन्मूलन की अपनी नयी सैद्धांतिकी भी रचते हैं. यह सैद्धांतिक व्यवहार स्वयं राजनैतिक हो उठता है. कबीर आदि संतों को भी ज्ञानी और गुरु के रूप में स्वीकार करना वैष्णव मन के खिलाफ था. इनकी आलोचना इतनी प्रखर थी कि वे किसी भी तरीके से वैष्णव विश्वदृष्टि में समंजित नहीं हो सकते थे. वह एक नयी विश्वदृष्टि का उन्मेष था. कबीर कभी किसी शिष्य को संबोधित नहीं करते. या तो अपने धुर विरोधी पांडे-मौलवियों का मजा लेते या फिर साधना पथ के सहयात्रियों साधू-असाधु, अवधू आदि को संबोधित करते है. साहचर्य के बाहर सद्गुरु का कोई अर्थ नहीं. यह सद्गुरु साथी कामगार है. वह प्रेम और सबद की साधना का सहचर-मित्र है.

मंडल के अस्वीकार के लिए अम्बेडकर पहले से ही तैयार थे. वह देख रहे थे कि संत रामदास की वाणी असत्य नहीं हो सकती. संत कवियों के सत्य को वह अपने राजनीतिक जीवन में पुनर्न्वेषित करते हैं. गुरु और अंत्यज के सम्बन्धों की सभी हिन्दू या वैष्णव कल्पनाओं और परिकल्पनाओं की आलोचना करते हुए वह समाज में शिक्षक की भूमिका पर भी विचार कर रहे थे. बौद्ध-मठों और विश्वविद्यालयों के इतिहास में उनकी अंतर्दृष्टि आवयविक या सहज बुद्धिजीवियों के संगठनात्मक व्यवहार की परम्परा का अन्वेषण करती है. सहज या आवयविक बुद्धिजीवी उनके लिए बौद्ध-भिक्षुओं का तात्कालिक या आधुनिकतम रूपांतरण थे[4]. बौद्ध संघों और विश्वविद्यालयों से विद्रोह करने वाले सरहपा आदि सिद्धों की परम्परा कबीर आदि संतों के यहाँ नवीन जीवन-दृष्टि का उन्मेष बन जाती है. महाराष्ट्र की संत-परम्परा अम्बेडकर की अंतर्दृष्टि में स्वाभाविक थी. उन्होंने अपने पर्चे में लिखा था कि अगर उन्हें अपने वर्तमान सामजिक संरचना वाले मंडल के सम्मलेन में  अध्यक्षीय वक्तव्य का मौक़ा मिल जाता तो संत रामदास की वाणी असत्य हो जाती. अम्बेडकर ‘सार्वजनिक अनुभवों के समवेत सम्प्रेषण’ को राजनीति का आधार बना रहे थे. मंडल के अस्वीकार ने अम्बेडकर को सहज या आवयविक बुद्धिजीवी के रूप में पुनः रेखांकित किया. दलितवाड़ा या वेलीवाड़ा की पारिस्थितिकी से आवयविक या सहज जुड़ाव उत्पादकों की तरह ही संभव है. ब्राह्मणवाद और पूंजीवाद की संश्लिष्ट उत्पादन-प्रक्रिया से बनने वाले सामाजिक सम्बन्धों के भीतर वेलीवाड़ा एक रिक्त स्थान है. यह उत्पादकों के नितांत भिन्न सामाजिक संगठन होने की प्रक्रिया है. वह प्रभुत्वशाली सामाजिक सम्बन्धों द्वारा अप्रोप्रिएशन की हर संभव चेष्टा की कांट-छांट में सक्षम है. इसी अर्थ में वह एक गतिशील लोकतांत्रिक समाज है. यह बहिष्कृतों और अस्पृश्यों का लोकतंत्र है.

वेलीवाड़ा और व्यवहार का दर्शन

सहज बुद्धिजीवी के संगठन पर विचार करने वाले ग्राम्शी से अम्बेडकर के प्रयासों की फौरी एकता भी शिक्षाप्रद है. अम्बेडकर और ग्राम्शी दोनों ही अपने सामाजिक-धार्मिक आन्दोलनों के इतिहास की जांच करते हुए आवयविक बुद्धिजीवी की संकल्पना तक पहुँच रहे थे. अपने राष्ट्रीय इतिहासों में दलित और सबाल्टर्न की तार्किक इयत्ता बहुत भिन्न नहीं है. संत कवियों का अनुभव-सम्मत विवेकवाद एक नयी विश्वदृष्टि की प्रस्तावना करती है जिसे ग्राम्शी के शब्दों में व्यवहार का दर्शन कह सकते हैं. यह दर्शन सम्पूर्ण प्रभुत्वशाली धार्मिक विश्वदृष्टि का विकल्प देती है. उत्पादकों के अनुभव की एकता जब अपनी अभिव्यक्ति के संकट से गुज़र रही होती है तब यह निश्चित है कि सम्पूर्ण सामाजिक सम्बन्ध एक बड़े परिवर्तन की पीड़ा से गुज़र रहा है. ऐसे समय में प्रभुत्वशाली विश्वदृष्टि अपने सामाजिक आधार को विचारधारा के सीमेंट और गारे से जोड़े रखने में अक्षम हो जाती है. संकट के इस काल में उत्पादकों के अनुभवों की एकता दो नितांत विरोधी विश्वदृष्टि में बंट जाती है. इन विरुद्धों का सामंजस्य धार्मिक विचारधारा को पुनर्जीवित करने जुड़ जाता है. जबकि विरुद्धों के संघर्ष की तार्किक परिणति धर्म मात्र का विनाश हो जाती है. संतों का सच धर्म का सच नहीं है जिसका प्रचार सामंजस्य की वैष्णव विचारधारा करती है. वैष्णव विचारधारा उत्पादन को गुणों के अधीन करती है जबकि कबीर आदि संत उत्पादन को गुणातीत बताते हैं.

सरहपाद जैसे सिद्धों का नालंदा विश्वविद्यालय के प्रति विद्रोह और फिर से सिद्धांत और व्यवहार की एकता का प्रयास यह बताता है कि उस समय के संस्थानिक बौद्धिकों की दूरी जन साधारण से कितनी बढ़ गयी थी. संस्थानों को भी आतंरिक विच्छेद के भय से गुजरना पड़ रहा था. सिद्धों या संतों को अपने समय के सामान्य-बोध की आलोचना करनी पड़ी थी. यह आलोचना उन्होंने सामान्य-बोध की जगह पर ही खड़े होकर की थी. जनसमूह के सामान्य-बोध में जो साधु-बोध का ‘स्वस्थ-केन्द्रक’ था, ये संत उसे संबोधित करते थे. कबीर आदि संतों ने सामान्य-बोध की जगह से सामान्य-बोध की आलोचना करते हुए लोगों को विश्वास दिलाने की कोशिश की कि कोई भी ‘ज्ञानी’ हो सकता है. या ग्राम्शी के शब्दों में कहें तो “हर कोई दार्शनिक” है. इसे स्पष्ट करने के लिए ही आरम्भ में सामान्य-बोध की जगह से ही ऐसी आलोचना आवश्यक है. आरम्भ में यह प्रक्रिया व्यक्ति केन्द्रित ही होती है. अलग-अलग व्यक्ति ही इसे अपने स्तर पर आरम्भ करते हैं. कह सकते हैं कि यह आरम्भ में वैयक्तिक साधना के रूप में विकसित होती है. ऐसी स्थिति में प्रभुत्वशाली संस्था या धर्म मत या शास्त्रों के सामने ‘सहज’ या ग्राम्शी जिसे ‘सिम्पल’ कहते हैं उसका संकट पैदा हो जाता है. प्रभुत्वशाली परंपरा कोशिश करती है कि बौद्धिकों पर कठोर नियंत्रण बनाये रखा जाए, ताकि वे अपनी सीमा का अतिक्रमण न करने पायें. इस अतिक्रमण से अखंडता में पड़ी दरार विस्फोटक और विनाशकारी हो सकती है. दूसरी ओर यह भी संभव नहीं कि ‘सहज’ को ही बौद्धिक घोषित कर इस दरार को पाट दें.

कबीर आदि संत ‘सहज’ को उनके आरंभिक दार्शनिक ‘सामान्य-बोध’ के स्तर पर ही नहीं छोड़ते. वह ‘सहज’ को एक उच्च जीवन-विवेक बनाने की साधना करते हैं. ये सहज और बौद्धिक के बीच एकता इसलिए नहीं बना रहे थे कि विवेकवान क्रियाओं की साधना का एक घेरा बना कर अलग पंथ निकाल लें और जनता के बीच ‘सहज’ के नाम पर एक क्षीण एकता बनी रहे. वह चाहते थे कि एक ‘नैतिक और बौद्धिक ब्लाक’ बनाया जाये, ताकि जनता का बौद्धिक विकास संभव हो न कि केवल बौद्धिकों के छोटे से हिस्से का आतंक कायम हो. कबीर के शब्दों में कहें तो ‘सहज’ की पहचान इसी अर्थ में कठिन साधना की पहचान थी. ज्ञान के हाथी पर कबीर इसी सहज का दुलीचा डाल कर चढ़ने कहते थे. निम्नवर्गीय सामाजिक समूहों के ठोस ब्लाक के निर्माण के प्रयास के कारण संतों की साधना वैष्णव प्रभुत्व की विरोधी प्रक्रिया थी. इस अर्थ में ये न केवल व्यवहार का नया दर्शन बनाने की कोशिश कर रहे थे वरन् दर्शन का नया व्यवहार भी सामने रख रहे थे. दोनों ही अर्थों में यह दर्शन और व्यवहार की पुरानी सारी परंपराओं के साथ-साथ वैष्णव भक्ति के रूप में सिद्धांत और व्यवहार की नई प्रभुत्वशाली धारा की आलोचना भी कर रहे थे. सामान्य-बोध की यथार्थ दृष्टि की आलोचना के क्रम में संतों ने एक नई यथार्थ दृष्टि का उन्मेष किया था. यह यथार्थ की आलोचकीय दृष्टि थी.

ग्राम्शी लिखते हैं कि आलोचकीय आत्मचेतस् प्रयासों द्वारा राजनीतिक और ऐतिहासिक रूप से बौद्धिकों का एक अभिजात्य (elite)[5]भी निर्मित होता जाता है. यहाँ ‘अभिजात्य’ शब्द को उसके प्रतिक्रियावादी अर्थ में नहीं प्रयोग किया गया है. यह ग्राम्शी के यहाँ हिरावल के अर्थ में प्रयुक्त हुआ है. ग्राम्शी लिखते हैं : “कोई मानव जनसमूह व्यापक अर्थों में खुद को संगठित किये बिना खुद को ‘पृथक्’ नहीं कर सकता, अपनी जगह पर स्वतंत्र नहीं हो सकता; और कोई संगठन बिना संगठनकर्ता या नेतृत्व के यानी बिना बौद्धिकों के संभव नहीं; दूसरे शब्दों में कहें तो सिद्धांत या व्यवहार के सम्बन्ध (नेक्सस) के सैद्धांतिक पक्ष का पृथक् जनसमूह जो विचारों की अवधारणात्मक या दार्शनिक व्याख्या में ‘प्रवीण’ हो उसके वास्तविक अस्तित्व के बिना.”[6]

इस प्रकार सहज साधना कवि-बौद्धिकों के रूप में संतों के लिए एक द्वंद्वात्मक रचना प्रक्रिया थी. बौद्धिकों और जनता के बीच बनते रहने वाली सहज साधना. यह वेलीवाड़ा की आतंरिक गतिशीलता है. कबीर आदि संत इस प्रक्रिया को बनाने वाले और खुद उससे बनने वाले थे. इस प्रक्रिया में लगातार उन क्षणों की पुनरावृत्ति होती रहती है जहाँ जनता और बौद्धिकों के बीच की दूरी बढ़ने लगती है. इस संबंध के पतन से यह धारणा घर करने लगती है कि सिद्धांत अनावश्यक, गैर ज़रूरी और महज व्यवहार का पूरक है. वह व्यवहार के अधीन है. सिद्धांत और व्यवहार को न केवल भिन्न माना जाने लगता है वरन् उन्हें अलगाकर दो भिन्न अवयवों में तोड़ दिया जाता है. व्यवहार रूढ़ियों के पालन में बंद कर दिया जाता है. इस यांत्रिकता की बार-बार पुनरावृत्ति का मतलब है “कि कोई अपेक्षाकृत आदिम ऐतिहासिक अवस्था से गुजर रहा है.”[7] सिद्धांत और व्यवहार की इस विलगता के बीच ही कबीर आदि के प्रयासों पर प्रभुत्व की वैष्णव दृष्टि का प्रवेश होता जाता है. दूसरी ओर उनके व्यवहार के सिद्धांत में अन्तर्निहित समानता के आदर्श के साथ नए उभरते वणिक समुदाय की संवेदना और पैसे के व्यावहारिक सिद्धांत और दर्शन का घालमेल करने की कोशिशें होने लगती है. कबीर निर्गुण राम के सगुण वैष्णव अवतार बन जाते हैं और मठों को बनियों और मध्यवर्ती जातियों का संरक्षण मिलने लगता है. यहाँ ध्यान रखना चाहिए कि यांत्रिक, निर्धारणवादी या भाग्यवादी अवयवों का सबल होना व्यवहार के दर्शनों की आन्तरिकता रही है. ग्राम्शी लिखते हैं कि किसी सामाजिक श्रेणी के “सबाल्टर्न” चरित्र की यह आवश्यक और इतिहास सम्मत विशेषता बनी रही है.[8]

कबीर आदि संतों का अनुभवसम्मत विवेकवाद ‘सिद्धांत और व्यवहार’ की एकता के प्रयास में है. ग्राम्शी कहते हैं कि यांत्रिक विश्वदृष्टि ही निम्नवर्गों का धर्म हो जाता है. कबीर आदि संत इन अर्थों में ही धर्म बनने के पहले के सिद्धांतकार हैं और इसी अर्थ में ठेठ राजनीतिक भी हैं. यांत्रिक दुहराव की प्रक्रिया दरअस्ल इतिहास की आदिमता की ओर लौटना है. व्यवहार के दर्शन के आरंभिक बौद्धिकों के रूप में कबीर आदि संत राजनीतिक अर्थों में ही प्राक्-धार्मिक हैं . कबीर के यहाँ काम की एकता की कौंध वह आधारभूमि है जिसे वह ‘निर्गुण राम’ कहते हैं. काम का विभाजन उनके गुणों के आधार पर नहीं हो सकता. वह निर्गुण हो कर भी विश्व को लगातार नए-नए रूपों में सृजित करता रहता है. विश्व को बदलता रहता है. निर्गुण सर्जना की वैश्विकता प्रभुत्व की विचारधारा द्वारा थोपे गए सारे भेद परक प्रवर्गों को चुनौती देती है. कबीर की ‘आँखिन देखि’ का ‘अनभै सच’ काम की यही सार्वजनीनता है.

वेलीवाड़ा और अनुभववाद की सैद्धांतिक सीमाएं

मूलगामी अनुभववाद आज एक विचारधारात्मक शक्ति बन गया है. इस विचारधारा के अनुसार पूँजी का धार्मिक और जातिवादी चरित्र जिस इतिहास से बनता है दलित एकता उस प्रभुत्वशाली इतिहास से सर्वथा भिन्न इतिहास दृष्टि रखती है. वह पूँजी के इतिहास की शुरुआत से ठीक पहले है और इसलिए अपने अनुभव की संरचना में प्राक्-धार्मिक भी है. यह अनुभववाद आधुनिकतावाद की मूलगामी आलोचना करती है. वह आधुनिकतावाद को ब्राह्मणवादी- हिंदूवादी और ज्ञानमीमांसात्मक साम्राज्यवाद की विचारधारा के रूप में आलोचित करती है. भारत में समाज-विज्ञानों का चरित्र आज एक आतंरिक प्राच्यवाद से ग्रसित है और समानता के व्यवहार को यहाँ वास्तव करने के लिए दलित अनुभवों के सैद्धांतिक अप्रोप्रियेसन से लड़ना ज़रूरी है. इस उद्देश्य का एक नैतिक आग्रह भी है. यह नैतिक आग्रह दलित अनुभवों की अपनी सैद्धांतिकी विकसित होने के लिए ज़रूरी है. मिलिंद वाकाणकर[9] डा. धर्मवीर के प्रबल अनुभववाद को रेखांकित करते हैं. डा. धर्मवीर अपने प्रबल अनुभववाद के कारण ही कबीर के सम्बन्ध में हजारीप्रसाद द्विवेदी की मूलगामी आलोचना में समर्थ हुए. परन्तु उनका मूलगामी अनुभवाद धार्मिक विचारधारा का विकल्प नहीं दे पाया. कबीर स्वयं एक नए धर्म के प्रवर्तक बन उठे. यह उनकी सैद्धांतिक सीमा है. वाकणकर कबीर और दलित जनमन के रिश्तों के ऐतिहासिक पुनुरुत्पादन का एक प्रतिइतिहास लिखने की कोशिश करते हैं.

वाकणकर कहते हैं कि कबीर से आज के दलित आन्दोलन को दो चीजें उपहार में मिली हैं. एक चमत्कार और दूसरी हिंसा. वाकणकर कबीर के नाम के सहारे लगातार बनते रहने वाली कविताओं का सामाजिक इतिहास लिखने का प्रयास करते हैं. ‘कहत कबीर’ किस प्रकार कबीर से अपना रिश्ता प्रकट करने वाली एक टेकनीक बन गयी थी और मठों के भीतर या बाहर भी लगातार दलित सामूहिकता को संगठित करती रही थी, उसे समझने की कोशिश. दूसरे शब्दों में कहें तो मठों के भीतर कबीरपंथियों में और दलित आन्दोलन में काम करने वाली धार्मिक भावनाओं की राजनीतिक परीक्षा उनका उद्देश्य है. वाकणकर ऐतिहासिक धर्मों की प्रभुत्वशाली इतिहासदृष्टि या कहें कि वैष्णव कबीर के रूप में कबीर को देखने की इतिहासदृष्टि की उल्टी धारा में जाकर यह देखने का प्रयास करते हैं कि ऐतिहासिक धर्मों में कबीर का एप्रोप्रिएशन या पुनर्प्रस्तुति के ठीक पहले वह क्या था जिसने किसी दलित को इतना सशक्त बनाया कि वह ‘कहत कबीर’ के नाम से अपनी कविता करता है. वाकणकर वर्तमान सभी धर्मों को ऐतिहासिक धर्म ही मानते हैं. कबीर के सहारे वह इन ऐतिहासिक धर्मों का एक प्राक् इतिहास लिखने की कोशिश कर रहे हैं जहाँ ईश्वर के जन्म से पहले अर्थात् ऐतिहासिक धर्म बनने के ठीक पहले ‘ईश्वर के आने की ख़बर’ में छुपी चमत्कार की तात्कालिकता एक निम्नवर्गीय सामूहिकता को संगठित कर लेती है. वाकणकर दलित आन्दोलन में सक्रिय अम्बेडकरवादी विचारधारा की दो प्रवृत्तियों की आलोचना करते हैं. एक प्रवृत्ति दलित धर्म की तलाश करती है जो कभी बौद्ध धर्म में तो कभी कबीर धर्म में प्रकट होती है. दूसरी ओर कैसे दलित आन्दोलनों के अन्दर से उभरी प्रतिनिधित्व या रिप्रेजेंटेशन की राजनीति वस्तुतः चुनावी जोड़ तोड़ की राजनीति में बदल जाती है. वाकणकर के अनुसार ऐतिहासिक धर्मों का इतिहास जिन घटनाओं के इर्द गिर्द शुरू होता है, उस घटना को संभव करने वाली निम्नवर्गीय चेतना के भीतर शामिल स्वतः स्फूर्त क्षमता को दमित करके आगे बढ़ता है. वह धर्मों का एक संपूर्ण इतिहास है जबकि विधर्मी या अपधर्मी परंपरा के इतिहास को कभी भी ऐतिहासिक धर्म की पूर्णता के मॉडल में देखना संभव नहीं है. भक्ति को धार्मिक विचारधारा कहने से हम केवल प्रभुत्वशाली वैष्णव धारा का ही इतिहास समझ सकते हैं. परन्तु जिस ‘घटना’ के आलोक में वैष्णव धर्म लोकप्रिय धार्मिक विचारधारा में रूपांतरित होता है अर्थात् निम्नवर्गीय दलित सामूहिकता की जिस विधर्मी परंपरा में नया क्षण कबीर लेकर आते हैं, उस धुंधले क्षण का इतिहास वाकणकर लिखने की कोशिश करते हैं. मूल कवि और उसके अनुयायी दलित कवि अर्थात् ‘हस्ताक्षर’ और ‘प्रतिहस्ताक्षर’ के द्वारा कबीर कैसे नया सन्दर्भ ग्रहण करते चलते हैं, उसका इतिहास. दूसरे शब्दों में, मूल कवि के प्रति सच्ची श्रद्धा और कृतज्ञतावश जब कोई दलित कवि अपनी कविता पर कबीर की मुहर लगाता है तो लगभग वही कर रहा होता है जिसे हम ‘भक्ति’ कहते हैं. पर वाकणकर इसे ऐतिहासिक धर्मों की तरह नहीं मानते जहाँ कबीर भगवान् हो जाते हैं. डा. धर्मवीर के ‘कबीर भगवान्’ और ‘दलित धर्म’ की चर्चा के सन्दर्भ में वाकणकर उसी प्रक्रिया का दुहराव देखते हैं. दलित अपधर्मी परंपरा वस्तुतः जब ‘दलित सशक्तिकरण’ के रूप में पुनर्प्रस्तुत होती है तो वह प्रभुत्वशाली परंपरा ही हो जाती है. डा. धर्मवीर के भीतर जो अपधर्मी, निम्नवर्गीय स्वाभाविकता है, उसे तो वाकणकर स्वीकार करते हैं परंतु ऐतिहासिक धर्म के मॉडल से बाहर न निकल पाने की आलोचना भी करते हैं. इसलिए वाकणकर के अनुसार डा. धर्मवीर द्विवेदी जी के ‘ब्राह्मणवादी’ मॉडल की आलोचना करते हुए भी ऐतिहासिक धर्मों की प्रभुत्वशाली परंपरा में ही अंतर्भुक्त हो गए. ठीक उसी तरह, जब दलित आन्दोलन अम्बेडकरवादी इतिहासदृष्टि में अंतर्भुक्त हो जाता है तो आन्दोलन में अन्तर्निहित दलित सामूहिकता या ‘दलित, मुस्लिम, आदिवासी’ सामूहिकता प्रतिनिधिमूलक राजनीति में विकृत होकर स्वयं प्रभुत्वशाली परंपरा बन जाती है. वाकणकर कहते है कि ‘दलित, आदिवासी, मुस्लिम’ जीवन में रोजमर्रा की हिंसा और मृत्यु की अनवरत उपस्थिति ने उनकी स्मृतियों में सामाजिकता की एक पूर्णतः भिन्न छवि संजोये रखी है. यह किसी आन्दोलन की आकस्मिकता के बीच अचानक से पुनर्संयोजित होकर आन्दोलन के सामाजिक चरित्र का निर्माण करती है. दिक्कत उसको प्रतिनिधित्व देने वाली प्रक्रिया में आती है जहाँ पहले से ही प्रभुत्वशाली धार्मिक या राष्ट्रीय या कोई अन्य विचारधारा एप्रोप्रिएशन के लिए तैयार है. इस प्रक्रिया को वाकणकर ‘राजनीतिक समाज’ (पोलिटिकल सोसाइटी) के निर्माण की प्रक्रिया कहते हैं. ‘नागरिक समाज’ की मध्यस्थता के चलते दलित समुदायों और राज्य के बीच सीधा राजनीतिक संवाद नहीं बन पाता है. उनका कहना है कि पार्था चटर्जी आदि के द्वारा प्रस्तावित इस ‘राजनीतिक समाज’ के लिए जरूरी है कि दलित आन्दोलन को इस प्राक् इतिहास में अन्तर्निहित सम्भावना की ओर लगातार ध्यान दिलाते रहा जाये.

गोपाल गुरु के लिए यह प्रबल अनुभववाद जिस बाह्य और प्राक् का सिद्धांत देता है उस सिद्धांत की वस्तु दलित जनमन को प्रतीकात्मक बना देती है. यह यथार्थ के संश्लिष्ट अनुभवों के द्वंद्वात्मक विश्लेषण में असमर्थ है. साहित्यिक उत्पादनों को आधार बना कर जब सिद्धांत निर्माण होता है तो वह दलित अनुभवों को महज सौंदर्यशास्त्र की वस्तु बना देता है. गुरु कहते हैं- “लेकिन कविता सिद्धांत का स्थानापन्न नहीं हो सकती…[लेकिन] कविता के पास विशिष्ट को सामान्य और सामान्य को विशिष्ट करने वाली संकल्पनात्मक क्षमता नहीं है. इसमें द्वंद्वात्मक शक्ति नहीं है.” अनुभववाद की आलोचना में गुरु की यह प्लेटोनिक भंगिमा ध्यान देने लायक है. सत्य के धारण की द्वंद्वात्मक क्षमता को कविता के बाहर का क्षेत्र घोषित किया गया. यह दलित सैद्धांतिकी को तात्कालिक प्रदर्शन की प्रवृत्ति से मुक्त करने वाली भंगिमा है. साहित्यक आलोचना से समाज विज्ञान के अनुशासन को स्वायत्त करने के लिए यह कतई आवश्यक नहीं था कि कविता मात्र को द्वंद्वात्मक शक्ति से रहित मान लिया जाय. अनुभव प्रसूत रचना-प्रक्रिया के दो रूपों के बीच मूल्यगत अंतर को स्थापित करके स्वायत्ता और समानता का आग्रह अनुभव की अवधारणा में उलझने को बाध्य है. इस उलझन को सुलझाने के क्रम में ही अनुभव सिद्धांत-निर्माण का एथिक्स बन जाता है. गुरु अनुभव की मौलिकता को स्वीकार करते हैं पर सिद्धांत को आवश्यक मानते हैं. दलित सिद्धान्तकारों की स्वायत्ता एक नैतिक अर्थशास्त्र की प्रस्तावना करती है. यह नैतिक अर्थशास्त्र एक मनुष्य एक मूल्य वाली व्यवस्था है जहाँ कोई नैतिक अधिशेष मूल्य का शोषण संभव नहीं[10]. पर वास्तव में गुरु अनुभव की आरम्भिक और स्वाभाविक ऊर्जा को ज्ञानमीमांसक व्यवस्था के अंतर्भुक्त करते हैं. सत्य के दावे का यह ज्ञानात्मक एकाधिकार अनुभवों का अभिग्रहण एक ख़ास विश्वदृष्टि से करने लगता है. साहित्यिक और सैद्धांतिक उत्पादकों की भिन्नता का यह नैतिक आग्रह सत्य के प्रति साहित्य के दावे को निर्मूल करता है. यह एक किस्म के यांत्रिक यथार्थवाद को जन्म देती है. यह यांत्रिक यथार्थवाद साहित्य और कला की राजनीति को अद्वान्द्वात्मक और तात्कालिक मानता है. सिद्धांत निर्माण के लिए हद से हद इसकी उपयोगिता महज संवेदनात्मक होने में है. गुरु दलित साहित्य या साहित्य मात्र को विशिष्ट अनुभवों पर आधारित सौन्दर्यबोध की दृष्टि मानते हैं जिसका उपयोग सिद्धांत निर्माण के लिए ज़रूरी सार्वभौमिक का निर्देशात्मक स्तर होने की संभावना तक सीमित है.[11] इस प्रकार कलाकार सहज और आवयविक बुद्धिजीवी के सैद्धांतिक उत्पादन से बाहर हो जाता है.

वेलीवाड़ा रचना-प्रक्रिया की इस श्रेणीबद्धता के खिलाफ है. रोहित वेमुला की घटना के आलोक में स्पष्ट है कि न तो वाकणकर के अर्थों में मृत्युशोकगीत की सामूहिकता वेलीवाड़ा है और न गुरु के अर्थों में समाज-वैज्ञानिक मात्र सत्य के गणराज्य का आवयविक बुद्धिजीवी है. वेलीवाड़ा नैतिक को राजनैतिक का विकल्प नहीं देखता. वहां राजनीति की नैतिकता से बनने वाला उत्पादकों का संगठन है. सांस्कृतिक श्रेणी-क्रम को चुनौती देने के लिए ज़रूरी है कि सम्पूर्ण सांकृतिक उद्योग के तर्क का निषेध संभव हो. वेलीवाड़ा सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक क्रान्ति का त्रिविमीय चरित्र है. अनुभवप्रसूत यह वेलीवाड़ा जितना तार्किक है उतना ही वास्तविक भी.

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मार्तण्ड  प्रगल्भ

मार्तण्ड प्रगल्भ

छात्र राजनीति और संस्कृति-कर्म में व्यस्त रहने वाले मार्तण्ड प्रगल्भ जे.एन.यू. के भारतीय भाषा केंद्र से पी.एच.डी. हैं. फ़िलहाल  रेडिकल नोट्स कलेक्टिव  के साथ कार्यरत हैं. उनसे mpragalbha1@gmail.com पर संपर्क संभव है

 

 

 

सन्दर्भ:

[1]  रोहित वेमुला का पत्र (१८-१०-२०१७ को ब्राउज़)

[2] डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वांङ्मय, खंड-१, पृष्ठ: ७८. डॉ. अम्बेडकर प्रतिष्ठान, नई दिल्ली- २०१३.

[3] गोपाल गुरु, गोपाल गुरु-सुन्दर सरुकई; क्रैक्ड मिरर: अन इंडियन डिबेट ऑन एक्सपीरियंस एंड थ्योरी ; पृष्ठ ९९; ओयूपी, दिल्ली- २०१२.

[4] देखें, मई १९५० वैशाख अंक, महाबोधि सोसाइटी जर्नल. अम्बेडकर ‘बुद्धा एंड द फ्यूचर ऑफ़ हिज रिलिजन’. बौद्ध धर्म विषयक उनके अन्य लेखन में भी उक्त विचारों को देखा जा सकता है.

[5] ‘elite’ शब्द पर टिप्पणी करते हुए ‘जेल नोटबुक’ के संपादक ने नोट किया है:- “élite.” As is made clear later in the text, Gramsci uses this word (in French in the original) in a sense very different from that of the reactionary post-Pareto theorists of “political élites”. The élite in Gramsci is the revolutionary vanguard of a social class in constant contact with its political and intellectual base. पृष्ठ- ३३४, पाद टिप्पणी-१८, अंतोनियो ग्राम्शी, सेलेक्सन्स फ्रॉम द प्रिज़न नोटबुक्स. (सं. और अनु.) क़ुइन्तिन होअरे और ज्योफ्रे नोवेल स्मिथ. ओरिएंट ब्लैकस्वान, दिल्ली- १९९६.

[6] वही

[7] वही. पृष्ठ-३३५

[8] “It should be noted how the deterministic, fatalistic and mechanistic element has been a direct ideological “aroma” emanating from the philosophy of praxis, rather like religion or drugs (in their stupefying effect). It has been made necessary and justified historically by the “subaltern”character of certain social strata.” पृष्ठ-३३६.

[9] देखें: मिलिंद वाकणकर, सबॉलटर्निटी एंड रिलिजन : प्रीहिस्ट्री ऑफ़ दलित एम्पावरमेंट इन साउथ एशिया. रूटलेज: लन्दन, २०१०. मिलिंद वाकाणकर के विचारों की विस्तृत समीक्षा के लिए देखें:  (मार्तंड प्रगल्भ, दलित आधुनिकता और कबीर की सहज साधना पर कुछ विचार , रैडिकल नोट्स. ) २०-१०-२०१७ को ब्राउज़.

[10] गोपाल गुरु, गोपाल गुरु-सुन्दर सरुकई; क्रैक्ड मिरर: अन इंडियन डिबेट ऑन एक्सपीरियंस एंड थ्योरी ; पृष्ठ- २०६; ओयूपी, दिल्ली- २०१२

[11] वही, पृष्ठ २३.

तुलसी के हनुमान् अका फ़ादर कामिल बुल्के: मार्तंड प्रगल्भ

बुल्के के लिए नैतिकता पूरी तरह धार्मिक थी। वह राज्य के विकास के साथ इसी धार्मिकता को स्वर्ग के राज्य में रूपांतरित देखना चाहते थे। अंबेडकर की तरह यहाँ भी नैतिकता और धार्मिकता में कोई फर्क नहीं था। धर्म स्वयं में पवित्र और सार्वजनीन नैतिकता है। विश्वबंधुत्व स्वयं नैतिकता है। विश्वबंधुत्व की इस पवित्र नैतिकता के दर्शन बुल्के को तुलसी के मानस में होता है। वह बुद्ध के बदले उत्तरभारत की जनता के बीच इस पवित्र सामान आचार-संहिता की पूर्व-उपस्थिति और उसके सर्वोत्तम विकास का पूर्व-स्वप्न तुलसीदास के यहाँ देखते हैं। उनके लिए तुलसी स्वयं एक आश्चर्य थे। वैसे ही जैसे इवोर ब्राउन के लिए शेक्सपियर. #लेखक 

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Camille Bulcke

बुल्के की रामकथा : आकर्षण और इतिहास

By मार्तंड प्रगल्भ

फ़ादर कामिल बुल्के को केदारनाथ सिंह तुलसी के हनुमान् की संज्ञा देते हैं। यह एक अद्भुत बिम्ब है। आखिर क्या सोचकर कवि केदारनाथ ऐसा कहते हैं? भक्ति के आदर्श हनुमान्! तुलसीदास से पहले भक्त के रूप में हनुमान् की कोई विशेष छवि नहीं थी। महाकवि तुलसी का ही प्रताप था कि उन्होंने प्रतापी हनुमान् को भक्त शिरोमणि में बदल दिया! खुद राम के चरित में “अग्या सम न सुसाहिब सेवा” के भक्ति आदर्श को चरितार्थ करने वाले हनुमान्! आजीवन ब्रह्मचर्य का पालन करने वाले हनुमान्! माता सीता के भी परम सेवक और हृदय में युगल भगवान् की छवि हमेशा धारण करने वाले हनुमान् खुद भी उस चित्र में शामिल हो गए थे। भक्त से स्वयं लोकमानस के भगवान् में बदल जाने वाले हनुमान्। चिर सानिध्य के आदर्श। यह स्वयं तुलसी की आत्म छवि थी। तुलसीदास को स्वयं के आदर्श पर कितना विश्वास था इसका पता हमें ‘विनयपत्रिका’ या ‘हनुमन‍्‍बाहुक’ जैसी रचनाओं से चलता है। भक्त की यह आत्म छवि तुलसीदास के द्वारा उत्तर भारत की हिंदी पट्टी को दिया गया अनुपम और अद्वितीय उपहार था। शुक्लजी ने भक्ति के इसी आदर्श को सैद्धांतिक रूप दिया था। जिस सेना की सहायता से अन्धकार पर विजय पानी थी उस सेना के सबसे मधुर चरित्र हनुमान् थे। भरत भले ही राजा के आदर्श थे पर साधारण मनुष्यों के तो हनुमान् ही थे। जो सेना भक्ति के धागे से बंधी होगी वही चिरविजयी होगी! सच्चाई का धर्मचक्र हमेशा गतिशील रहेगा अगर शासक भरत जैसा भक्त हो और जनता के हृदय में हमेशा भरत मिलाप का दृश्य। भक्ति के लिए आत्मदैन्य का चरमबोध और एक मिशनरी व्यक्तित्व दोनों जरूरी हैं। शुक्ल जिसे भक्ति का सैद्धांतिक आधार प्रदान कर रहे थे उसे बुल्के ने जीवन में उतार लिया था। परन्तु दोनों भिन्न दिशाओं से चलकर इस आदर्श तक पहुंचे थे। शुक्ल भारतीय आत्म की खोज करते हुए और बुल्के ईसाई आत्म की तलाश में चलते हुए। दोनों ही नैतिकता और सार्वभौमिकता का स्वयं में एक अनिवार्य संबंध मानते थे। व्यावहार की नैतिकता स्वभावतः सार्वभौमिक मूल्यों की तरफ ले जाने वाली होनी चाहिए। ऐसा नहीं कि दोनों में फर्क नहीं है। शुक्ल होते तो बुल्के की आलोचना करुणा और दुःख के अतिवाद के सन्दर्भ में करते। जबकि बुल्के शुक्ल के रसवाद की हरसंभव आलोचना में रत थे। दोनों के अवतारवाद के आदर्श में अंतर था। बुल्के के लिए ईश्वर मनुष्य के रूप में था, केवल लीला या अभिनय का पात्र नहीं। शुक्ल के लिए बाहरी विश्व का प्रपंच रसों की व्यवस्था ही है, जहाँ स्वयं रस स्वरूप ईश्वर है। बुल्के ईश्वर की इस रसवादी व्याख्या से संतुष्ट नहीं थे। उनका विश्वास था कि सांसारिक व्यावहार में एक ऐसी समाज व्यवस्था संभव है जहाँ करुणा और प्रेम के सहारे ईश्वर का राज्य वास्तविक हो। बुल्के की आस्था में एक ‘सांप्रदायिक गंध’ थी, जिसे शुक्लजी हमेशा की तरह अपनी आलोचना का निशाना बनाते। परन्तु बुल्के ने जितनी सेवा चर्च के लिए की थी, उतनी ही भक्ति रामकथा, तुलसी और हिंदी की भी की थी। बुल्के के लिए इन दोनों में कोई अंतर्विरोध नहीं था। शुक्ल इस चरित्र की आलोचना कैसे करते यह सोचना ज्यादा कठिन नहीं है। शुक्लजी का विश्वास आधुनिक- पूर्व के सामाजिक सम्बंधों की सामूहिकता और उसकी बनी बनाई व्यवस्था की क्रियाशीलता में था। सर्वथा नई व्यवस्था शुक्ल को वास्तविक और व्यावहारिक नहीं लगती थी। हमने देखा था कि विल्सन, मोनिर विलियम्स या ग्रियर्सन के यहाँ भी करुणा, नैतिकता और संघबद्ध धर्म की समरूपता के चलते बौद्ध और ईसाई धर्मों का एक नैकट्य निरुपित किया गया था। सामान्यतः भक्ति बौद्ध ज्ञानवाद में करुणामय ईश्वर का संयोग था जिसका वास्तविक मनुष्य रूप ईसामसीह में उन्हें दिखाई देता था। ग्रियर्सन, शुक्ल जी और बुल्के तीनों वैष्णव भक्ति और तुलसीदास की सर्वोच्चता के प्रति एकमत से सहमत हैं। सबसे श्रेष्ठ भाव के रूप में करुणा को नकारना किसी के लिए संभव नहीं था। ईश्वर के अनंत करुणानिधान तुलसी और भवभूति दोनों का आदर्श था। शुक्ल व्यवहार में अद्वैत को स्वीकार्य नहीं मानते थे। शुक्लजी के लिए अद्वैत प्रक्रिया का निष्कर्ष है स्वयं प्रक्रिया में अद्वैत नहीं हो सकता। शुक्ल रस निष्पत्ति में आलाम्बनत्व धर्म की सार्वभौमिकता को स्वीकार करते थे और इसलिए साधारणीकरण के किसी सम्प्रदायवाद के खिलाफ थे। क्योंकि वहां आश्रय के तादात्म से साधारणीकरण संभव माना जाता है। प्रक्रिया पर जोर देने से शुक्ल जी के यहाँ आश्रय और पाठक या सहृदय के ध्रुवीकरण से तो रस सिद्धांत को मुक्ति तो मिली लेकिन वहां से वास्तविक मनुष्य गायब हो गया। वास्तविक, क्रियाशील, व्यावहारिक मनुष्य केवल भावों की रस निष्पत्ति से संतुष्ट नहीं हो सकता था, उसे वास्तविक मुक्ति भी चाहिए थी। यह मुक्ति शुक्लजी के लिए नैतिकता और धर्म नियमों के क्षेत्र में ही संभव थी। राजनीतिक जीवन और साहित्य का क्षेत्र इन दोनों के बीच संबंध शुक्लजी के लिए केवल पैशन का था, यह हमने पीछे देखा है। बुल्के के लिए जीवन, धर्म और कर्म तीनों की एकता उन्हें वास्तविक जीवन में अनंत करुणानिधान का सन्देश लगती थी। उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में संत कवि की भूमिका में गीदो गैज़ेल की कविताएँ और उनका संत जीवन चरित फ्लेमिश-डच सांस्कृतिक और राष्ट्रवादी आंदोलन में बहुत प्रभावशाली भूमिका निभाता था। कामिल बुल्के का युवा जीवन इस सांस्कृतिक नेतृत्व से अभिभूत था।

गीदो गैज़ेल प्रगीत और प्रकृति के कवि थे। नवरोमानवाद और आध्यात्मिकता के साथ-साथ बीसवीं शताब्दी के अंवागार्द कवियों पर भी उनका काफी प्रभाव था। सूक्ष्म से सूक्ष्म भावों में अर्थ की तलाश, एक ‘पूज्य बुद्धि’ और मननशील मन की मांग करती है। गीदो की कविताएँ इन दोनों का समन्वय करती थीं। मध्यवर्गीय परिवार में पले-बढ़े गीदो के पिता एक कुशल माली थे। ईसाई परिवेश और कृषक जीवन का मधुर सौन्दर्य इन दोनों के बीच गीदो की आरंभिक अनुभूतियों का निर्माण हुआ था। परिवार को लेकर और खासकर अपनी माता को लेकर गीदो अनन्य प्रेम और श्रद्धा रखते थे। फ्लेमिश आन्दोलन से जुड़ने के क्रम में ही गीदो के छात्र जीवन में उच्च आदर्शों के क्रियान्वयन के लिए जीवन के कठोर निर्णय का वक़्त भी उनके सामने आया। पिता के निर्देश में उन्हें ईश्वर का निर्देश मिला और उन्होंने पुरोहित का जीवन अपने लिए चुन लिया। कविता, साहित्य और मातृभाषा के सम्मान की लड़ाई तथा पुरोहित कर्म की एकता उन्हें ईश्वर का संकेत मालूम पड़ती थी। गीदो हमेशा पुरोहित-कवि-फ्लेमिश के रूप में नौजवान कवियों, देशप्रेमियों और पुरोहितों के बीच लोकप्रिय रहे थे। उनके लिए कला, ‘कला नहीं बल्कि ईश्वर की भेंट’ थी। यंत्रणाओं और दुखों के बीच कला गीदो के लिए एक फलदायी क्रिया थी। करुण, शांत और आस्थावान फ्लेमिश-डच कृषक जीवन के प्रगीत लोगों में प्रेरणा और सुख का संचार करती थी। कविता के अलावा गैज़ेल ने पत्रकारिता, अनुवाद और लोकगीतों के संग्रह का काम भी किया था। उनकी तुलना कई बार अंगेज कवि हॉपकिंस के साथ भी होती है। हॉपकिंस के साथ गैज़ेल के व्यक्तित्व का मेल केवल प्रगीतकार और पुरोहिती का ही नहीं बल्कि यौन भावनाओं के संकट का भी है। दोनों ही एक सारसंग्रही प्रयोगकर्ता भी थे। गैज़ेल की विश्वदृष्टि में एक सर्ववादी चेतना और प्रयोग का साहस देख चर्च के उच्च पुरोहित वर्ग में एक विरोध भी था। प्रथम विश्वयुद्ध के अनंतर फ्लेमिश राष्ट्रवादी आन्दोलन और अवांगर्द कविता आन्दोलन के प्रेरणास्रोत के रूप में गैज़ेल जितना स्थानीयता से जुड़े थे उतने वैश्विक भी थे। गीदो की दो कविताएँ उनके काव्य संसार का कुछ कुछ परिचय दे सकती हैं :

“मैं था/ नहीं तब/ और, “तुम हो,/ मेरे बच्चे”/ ईश्वर ने कहा,/ और वह देखो!/ मैं हूँ!” दूसरा उदाहरण –

सरल है बहुत, वादा करना/ और बोना देश के बाहर खूबसूरत शब्द/ जैसे, खूब सवेरे बोलना/ मुर्गों का, ओह ! कितना अच्छा लगता/ महज शब्द के उच्चारित करने से नहीं/ फ़ायदा होगा अपने फ्लैंडर्स का ;/ जो चाहता है मदद करना हमारे लोगों की/ उसे प्रजनन का दुःख उठाना होगा।[1]

गीदों के इस व्यक्तित्व का बुल्के के अपने जीवन पर तुलसी से कम प्रभाव नहीं था। ऐसा भी कहा जा सकता है कि बुल्के के लिए गीदों प्रेम और तुलसी प्रेम अलग- अलग नहीं थे। कृषक जीवन और ईसाई आस्था के बीच पले-बढ़े बुल्के को गीदो की कविताओं में स्वयं की भावनाएं ही प्रतिबिंबित दिखती थीं। बुल्के अपने आरम्भिक जीवन को याद करते हुए हमेशा कहते थे कि “पिता से मुझे मिला जीवन की गुरुता का विशिष्ट बोध, वत्सल माता से मिली प्रफुल्लित व्यावहारगत स्वप्निलता”। गरीब और असहायों के प्रति असीम करुणा का बोध उनको मध्यवर्गीय कृषक जीवन के यथार्थ के करीब ले जाता था। उनके लिए पूरा गाँव एक संयुक्त परिवार की तरह ही था, बाद में एक वृहत्तर फ्लेमिश संस्कृति भी उन्हें एक बड़े संयुक्त परिवार की संस्कृति की तरह  दिखती थी। अपने गाँव के संस्मरण में बुल्के अपने ‘मसीहाई लोगों’ को लक्ष्य करते हुए लिखते हैं : “वे दुःख को चुपचाप सहते हैं क्योंकि मसीह का क्रॉस उनके लिए जीवंत वास्तविकता है। उनके जीवन के सब दिन ईश्वर के सान्निध्य में व्यतीत होते हैं और उनकी कठिनाइयाँ ईश्वर में लीन हो जाती हैं… वे कतई रहस्यवादी नहीं हैं… उनमें जीवन  के प्रति उदासीनता नहीं है। … सृष्टि से प्यार करने के चलते उनका जीवन सहज हो जाता है और वे सृष्टि के रहस्य समझ जाते हैं।”[2] इन ‘मसीही लोगों’ में बुल्के मध्यकाल की झलक देखते हैं। बालोचित भोलेपन की यह जीवनदृष्टि ऐसी है जिसमें ‘ईश्वर और जगत, प्रकृति और भगवत् कृपा में कोई द्वंद्व नहीं’ है। विद्यार्थी जीवन के आरम्भ से ही संत पौलुस के पत्रों में उनकी असीम रूचि थी। भारत आने के पहले उन्होंने आइन्स्टीन के सापेक्षतावाद और उच्च गणित का भी विशेष अध्ययन किया था। जर्मन भाषा के किसी ग्रन्थ में मानस के कुछ उद्धृत अंशों को पढ़कर उन्हें एक अद्वितीय अनुभव हुआ और भारत के विषय में सबकुछ जान लेने की इच्छा जाग गयी। “जब से मैंने जर्मन भाषा में अनूदित हिन्दुओं के धर्मग्रन्थ रामचरितमानस से उद्धृत अंश पढ़े हैं, तब से मैं भारत के विषय में सबकुछ जान लेना चाहता हूँ। अरे हाँ, उन अंशों का सारांश था- पृथ्वी पर उसी व्यक्ति का जीवन धन्य है जिसको देखकर उनका पिता हर्षित हो। पिता पुत्र के सबंध की इतनी मर्मिक गहन अनुभूति अन्य किसी साहित्य में नहीं देखी है।”[3]

सन् १९३५ में जब बुल्के भारत आये उस समय भारत में भी भारतीय स्वतंत्रता आन्दोलन का ज़ोर था। बुल्के ने राष्ट्रीय सम्मान के संघर्ष को और भारतीयों की घोर दुर्दशा, दोनों का साक्षात्कार किया। अपने देश की राजनीतिक स्थिति से तुलना करते हुए बुल्के लिखते हैं, “मुझे विश्वास हो चला है कि भारतीयों ने अंग्रेज आकाओं को प्रसन्न रखने के प्रयोजन से अंग्रेजी पहनावा, भाषा और तौर तरीके भी अपना लिए हैं। बिलकुल मेरे देश के बुर्जुआ वर्ग की तरह।”[4] बुल्के शुरू से ही प्रखर सामाजिक चेतना, विद्या और आस्था के भीतर कोई अंतर्विरोध नहीं देखते थे। उनके अनुसार धार्मिक विश्वास केवल तर्क- वितर्क की चीज नहीं है। “मैं समझता हूँ कि भौतिकवाद मानव जीवन की समस्या हल करने में असमर्थ है। मैं यह भी मानता हूँ कि धार्मिक विश्वास तर्क-वितर्क का विषय नहीं है इतना ही निवेदन है कि मुझे ईसा की शिक्षा से प्रेरणा और सुख शांति मिलती है।”[5] यह बात बुल्के उनसे बार-बार पूछे जाने वाले इस सवाल के जवाब में कहते थे कि धर्म और ईश्वर तथा आधुनिक विवेकवाद का अविरोध वह कैसे देखते हैं। बुल्के के लिए परम दयालु ईश्वर में आस्था से बढ़कर जीवन में ‘आशावाद’ का कोई स्रोत नहीं था। बुल्के अपनी जीवन साधना के तीन घटक ईसा, हिंदी और तुलसीदास को मानते थे। वह इनके बीच कोई विरोध नहीं बल्कि एक गहरा अंतर्संबंध देखते थे। यह अंतर्संबंध उन्हें स्वयं ईश्वर का संकेत मालूम पड़ता था। भारत में आने की इच्छा को तुलसीदास की कविता में छिपे ईश्वरीय संकेत की तरह ही बुल्के ने ग्रहण किया था। रामकथा पर शोध के लिए प्रेरित करने वाले जिन तीन तत्वों का उल्लेख बुल्के करते हैं वे हैं, हिंदी प्रेम, तुलसी के प्रति श्रद्धा और डा. धीरेन्द्र वर्मा की उदारता। रामचरित मानस और तुलसी के बारे में जानकारी के लिए बुल्के रामचंद्र शुक्ल से भी विचार विमर्श कर आये थे। परन्तु ऐसा लगता है कि उन्हें बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय के बदले इलाहाबाद का वातावरण ज्यादा पसंद आया था। हिंदी के साहित्यकारों के बीच बुल्के जल्द ही घुल- मिल गए थे। मैथिलीशरण गुप्त से जाकर उनके गाँव में ही मिल आये थे। महादेवी वर्मा से उनका इतना गहरा संबंध बन गया था कि वे उन्हें दीदी कहकर पुकारने लगे थे। इलाहबाद शहर के वातावरण में एक आधुनिक सार्वजनीनता बुल्के को पसंद थी। धीरेन्द्र वर्मा और माताप्रसाद जैसे शिक्षकों का उन्हें सान्निध्य मिला था। परिमल की बैठकों में भी बुल्के की शिरकत रहती थी। दूसरे शब्दों में कहें तो हिंदी की साहित्यिक दुनिया और हिंदी के विभागों के बीच बुल्के  की एक सक्रिय उपस्थिति थी। रांची के सेंट जेवियर कॉलेज में हिंदी के विभागाध्यक्ष रहते हुए कॉलेज को और अपने ‘मनरेसा हाउस’ के निजी पुस्तकालय को बुल्के ने देश विदेश के लिए आकर्षण का केंद्र बना दिया। बुल्के की स्नेहिल, आशीषमयी और प्रखर विद्वता की छवि के इर्द गिर्द हिंदी शोधार्थियों और अध्यापकों की एक मंडली ही बन गयी थी।

 हिंदी और तुलसीसेवा के काम का ही एक विस्तार बुल्के की लम्बी साइकिल यात्राएँ भी थी। रांची के आसपास के आदिवासी इलाकों में बुल्के अपने साइकिल के साथ निकल जाते, जहाँ वे ईसा और तुलसी के सन्देश सुनाते और उनकी रोजमर्रा की समस्याओं और कष्टों के समाधान का प्रयास करते। तथाकथित भोले-भाले, निरीह, सौम्य, सहज प्राकृतिक जीवन में रचे-बसे इन आदिवासियों में बुल्के को अपने गाँव के लोगों की छवि दिखती थी और वह स्वयं उनसे प्रेरणा ग्रहण करते थे। धीरे-धीरे झारखण्ड की कई बोलियों और भाषाओं के अध्ययन के साथ- साथ आदिवासी संस्कृति के अध्ययन के लिए बुल्के स्वयं एक शोध संस्था में बदलते गए। ये सारे काम उन्हें अपने पुरोहिती, धार्मिक कामों से अलग नहीं लगते थे। संघ भी बुल्के की इच्छाओं का कभी अनादर नहीं करता था। मूल ग्रीक से बाइबिल के ओल्ड और न्यू टेस्टामेंट का अनुवाद बुल्के ने अपनी आत्मा का पूरा जोर लगाकर किया था। अपने अनुवादों को संघ के बाकी पुरोहितों या भाइयों को वह सुनाते और उनकी प्रतिक्रिया के बिना आगे नहीं बढ़ते थे। बाइबिल के हिंदी अनुवादों का इतिहास कम से कम डेढ़ सौ साल पुराना तो था ही। परन्तु उन अनुवादों में बाइबिल के उच्च साहित्यिक गुणों का पूरा निदर्शन नहीं होता था। उनमें ज्यादातर कामचलाऊ प्रयास थे। बुल्के के लिए बाइबिल की आस्था उसके उच्च कलात्मक मूल्यों की आस्था भी थी। उन्हें विश्वास था कि मसीह का सन्देश व्यावहारिक रूप से भी प्रेम और करुणा से इतना भरा है कि एक बार उन भावों का सम्प्रेषण हो जाये तो कोई भी उसे अपने हृदय से नहीं निकाल सकता। बुल्के को अलग-अलग शहरों के संघ बंधुओं से बाइबिल के अनुवाद की श्रेष्ठता और उसकी सहज संप्रेषणीयता का सन्देश लगातार मिलता रहता था। आगे चलकर बुल्के की मृत्यु के बाद उनके स्मृति ग्रन्थ के लिए शमशेर बहादुर सिंह ने दिनेश्वर प्रसाद को संबोधित करते हुए ‘एक पत्र’ लिखा था। दिनेश्वर प्रसाद इसे ‘संस्मरणात्मक- आशंसात्मक’ पत्र की तरह याद करते हैं। शमशेर और बुल्के का परिचय इलाहबाद में ही शायद डा. रघुवंश के कारण हुआ था। शमशेर के अनुसार बुल्के, रघुवंश के बहुत ‘घनिष्ठ और हार्दिक विद्वान् मित्र’ थे। शमशेर लिखते हैं कि हिंदी के विद्वान मित्रों का संपर्क और स्वयं की “उनकी अपनी (एडवांस्ड) साहित्यिक सुरुचि, लगन और अनथक श्रम ने उन्हें (बुल्के) हिंदी साहित्य में दीक्षित किया था, विशेषकर भक्ति साहित्य और रामचरितमानस के अनेक गूढ़ तत्वों में। अगर मैं यह कहूँ कि भारतीय परिवेश में रामचरितमानस उनके लिए बाइबिल के न्यू टेस्टामेंट का दर्पण बन गया था, तो मैं शायद बहुत गलत न हूँगा।”[6] शमशेर बुल्के के ‘एडवांस्ड साहित्यिक सुरुचि’ से बखूबी परिचित थे। स्वयं शमशेर बाइबिल कई हिस्सों का साहित्यिक अनुवाद करना चाहते थे। “एक बार यूनानी भाषा सीखने का बाल प्रयास करते हुए एक पाठ में बाइबिल के उद्धृत अंश पढ़कर तीव्र इच्छा हुई थी कि इस आध्यात्मिक ग्रन्थ का आस्वादन तो मूल में ही किया जाये, तभी संतोष हो सकता है।”[7] शमशेर की यह आकांक्षा तो पूरी नहीं हो पाई पर बुल्के के अनुवाद से उन्हें लगभग मूल को पढ़ने जैसा ‘सुख और संतोष’ मिलता था।

निश्चित रूप से शमशेर को यह ‘सुख और संतोष’ स्वयं बाइबिल के पवित्र और महान् होने के बदले उसकी ‘प्रवाहमयता, सरसता और हृदय को छूने वाली’ साहित्यिक विशेषताओं के कारण मिलता था, शमशेर का ‘मन तृप्त हो जाता’ था। वह इसी पत्र में लिखते हैं कि उन्होंने कई बार बुल्के के अनुवाद पढ़े हैं और बार-बार पढ़ने की इच्छा होती है। इन अनुवादों से, “ईसामसीह का पूरा शहीदी चरित्र आँखों के सामने साकार हो उठता है। कैसी घोर विरोधी परिस्थितियों में कठमुल्ला, ढोंगी, पाखंडी तथाकथित धर्माचारियों के समक्ष मसीह की खरी शुद्ध आत्मा सूर्य के प्रकाश की तरह चमकती है। हिंदी में यह सब एक सफल अनुवाद के कारण ही संभव हुआ है।”[8] यह बाइबिल की साहित्यिक श्रेष्ठता के प्रति एक साहित्यिक आस्था थी। साहित्य के रूप में धर्मग्रन्थ के संपूर्ण इहलौकीकरण का यह प्रयास स्वयं आधुनिकतावाद की एक प्रमुख विशेषता थी। शमशेर और मुक्तिबोध दोनों ही मानस के उच्च साहित्यिक गुणों से परिचित थे। मुक्तिबोध के लिए मानस का सर्वश्रेष्ठ हिस्सा वह है जहाँ वह सामंती समाज की सीमाओं के भीतर मनुष्यता का विकास दिखाते हैं। मुक्तिबोध लिखते हैं, “तत्कालीन मानव संबंध, विश्वदृष्टि तथा जीवन मूल्यों के सर्वोच्च प्रतीक राम की मानवता हमें प्रभावित करती है। तुलसीदासजी तथा रामचंद्रजी की वह सचेष्ट आन्तरिकता (जो तत्कालीन आदर्शों से बनी हुई थी) हम पर छा जाती है। वे नियम-विधान, वे आचार-विचार, अब आज त्याज्य हो चुके हैं; किन्तु उनके भीतर जो तत्कालीन मानव-संबंध हैं उनको कहीं भी भंग न करते हुए, राम ने निषाद और गुह से भी आलिंगन किया, शबरी के बेर खाये, केवट से दोस्ती की, वनवासी असभ्यों को गले लगाया- तत्कालीन मानव- संबंधों का वास्तविक निर्वाह उन्होंने अपने इन्हीं आदर्श- क्षणों में किया। उनसे वे मानव संबंध अधिक घनीभूत ही हुए। निषाद निषाद ही रहा, गुह गुह ही, और राम का रामत्व अपने संपूर्ण सामंती मानवादर्शों में जगमगा उठा। तत्कालीन मानव-संबंधों के घेरे के भीतर मानवता की जितनी भी सर्वोच्चता संभव थी, उतनी तुलसीदास के राम में समा गयी। इसलिए तत्कालीन समाज के आदर्श चरित्र राम हैं। राम की इस आदर्शमयी आन्तरिकता के चित्र = उनकी भीतरी मानवता के शिखर- हमें आज भी द्रवीभूत करते हैं।”[9]

शुक्लजी के यहाँ साहित्यिकता और धार्मिकता की पृथकता और समानांतरता एक ही आचार- संहिता के दो पक्ष थे। जब धार्मिक ग्रन्थ के रूप में मानस पर गलत नैतिकता के समर्थन का आरोप लगता तो वह साहित्यिकता की बात करते थे और जब साहित्यिकता के आधार पर किसी को ख़ारिज करना होता तो नैतिक आचार-संहिता की बात करते थे। इन दोनों आचार संहिताओं की एकता कबीर की आलोचना में सबसे स्पष्ट थी। बुल्के के यहाँ दो भिन्न आचार संहिताओं का प्रशन नहीं था। वहां ‘कला नहीं ईश्वर की देन’ ही महत्वपूर्ण थी। कला और साहित्य की एडवांस्ड रुचियों में मानवतावादी विचारों की यह समकालीनता हिंदी में आधुनिकतावाद और पश्चिमी मार्क्सवाद की मानवतावादी धारा के साथ जुड़ी भी थी। यह न केवल स्व-भाव था और न केवल प्र-भाव। यह स्वाभाव और प्रभाव की वैश्विकता भी थी। बुल्के के परिमल प्रेम को इसी सन्दर्भ में देखा जा सकता है। बुल्के शुद्ध आत्मा के प्रकाश की वास्तविकता मसीह के सांसारिक राज्य में देखते थे। तुलसी की युगीन सीमा और श्रेष्ठता दोनों ही बुल्के के लिए इसी बात में थी कि तुलसी के साहित्य के भीतर वह सबकुछ मौजूद था जो स्वाभाविक रूप से मसीह को प्राप्त करने वाला है। तुलसी के यहाँ मसीह के यथार्थ का स्वप्न था। बुल्के के लिए यह यथार्थ स्वप्न से भी ज्यादा वैभवशाली और कारुणिक है। बुल्के के उच्च मूल्य वाले साहित्यिक अनुवादों में यही आस्था थी।

फ़िलहाल हम उनके शोध प्रबंध की ओर वापस लौटते हैं। हमने देखा था कि रामकथा को लेकर बुल्के की प्रेरणा तीन तत्वों से बनी थी- हिंदी प्रेम, तुलसी के प्रति श्रद्धा और डा. धीरेन्द्र वर्मा की उदारता। संघ से शोध की अनुमति मिलते ही बुल्के इलाहाबाद विश्वविद्यालय पहुंचे। शोध के विषय के रूप में डा. धीरेन्द्र वर्मा ने उन्हें मध्यकालीन ब्रजभाषा साहित्य पर काम करने का सुझाव दिया। बुल्के इस सुझाव को सुनकर चुप रह गए। धीरेन्द्र वर्म समझ गए थे कि यह विषय बुल्के की आत्मा के अनुरूप न था। उन्हें पता था कि बुल्के तुलसी से प्रेम करते हैं। इसलिए उन्होंने तुरंत ही दूसरा विषय सुझाया और कहा कि आप मानस की रामकथा पर काम कीजिये। माताप्रसाद गुप्त के निर्देशन में काम आरम्भ करने के बाद बुल्के ने रामकथा सम्बन्धी इतनी सामग्री जुटा ली कि ‘भूमिका’ को ही पूर्ण शोध बनाना पड़ा। इस प्रकार ‘रामकथा : उत्पत्ति और विकास’ के रूप में हिंदी में लिखा पहला शोध प्रबंध सामने आया।

‘रामकथा : उत्पति और विकास’ लगातार संशोधित और परिवर्धित होता रहा। सन् १९४९ में शोध प्रबंध जमा करने के बाद भी बुल्के रामकथा और रामभक्ति संबंधी सामने आने वाली हर नई जानकारी या उसके इतिहास को लेकर किसी नई प्रस्तावना का वैज्ञानिक विश्लेषण भी नए संस्करणों में जोड़ते चले गए। रामकथा के विकास को इतिहास और भूगोल के इतने बड़े फलक पर शोध की वैज्ञानिक वस्तुनिष्ठता और साहित्यिकता की पहचान के साथ विश्लेषण बुल्के से पहले किसी ने नहीं किया था। कृष्ण चरित और कृष्णभक्ति को लेकर प्राच्यविद्याविदों के बीच जितनी बहस हुई थी और उसके इतिहास निरूपण का जितना प्रयास हुआ था, उस हिसाब से रामकथा और रामभक्ति के विकास का निरूपण नहीं हुआ था। अकारण नहीं कि धीरेन्द्र वर्मा इसे ‘रामकथा का विश्वकोश’ कहते थे। शोध में बुल्के ने रामकथा के ऐतिहासिक विकासक्रम के निरूपण और मूल रामकथा संबंधी कई पुराने पूर्वग्रहपूर्ण निष्कर्षों से अपनी असहमति व्यक्त की है। बुल्के लिखते हैं कि रामकथा के मूलस्रोत संबंधी मतों में मूल का पता लगाने के लिए प्रायः विद्वानों द्वारा ‘दो या तीन स्वतंत्र वृत्तांतों’ की कल्पना कर ली जाती है। बुल्के के अनुसार इस प्रवृत्ति के मूल में दशरथ जातक संबंधी डा. वेबर का मत था। पुराने मतों का उल्लेख करते हुए बुल्के लिखते हैं : “रामकथा का मूल रूप बौद्ध दशरथ- जातक के गद्य में सुरक्षित है; इस जातक में सीता हरण और युद्ध वर्णन का अभाव है। अतः इन दोनों का आधार संभवतः होमर के काव्य में ढूंढना चाहिए, यह डा. वेबर का विचार है। श्री दिनेशचन्द्र सेन की धारणा है कि वाल्मीकि ने पहले पहल (दशरथ, रावण तथा हनुमान् संबंधी) तीन नितांत स्वतंत्र वृत्तांत मिलाकर रामकथा की सृष्टि की है। डा. यकोबी के अनुसार रामायण की कथावस्तु के स्पष्टतया दो स्वतंत्र भाग हैं- प्रथम भाग अयोध्या से संबंध रखता है और ऐतिहासिक घटनाओं पर निर्भर है; द्वितीय भाग की आधिकारिक कथावस्तु (सीताहरण तथा रावणवध) का मूल रूप वैदिक साहित्य में विद्यमान है। सीता, राम तथा रावण का व्यक्तित्व क्रमशः वैदिक सीता (कृषि की अधिष्ठात्री देवी), इंद्र तथा वृत्रासुर से विकसित हुआ है। सीताहरण का मूल स्रोत प्राणियों द्वारा गायों का अपहरण है तथा रावणवध वृत्तासुर- वध का विकसित रूप मात्र है।”[10]

बुल्के इन दो या तीन स्वतंत्र वृत्तांतों के सिद्धांत के बदले रामकथा की समस्त आधिकारिक कथावस्तु, न केवल राम का निष्कासन वरन् सीताहरण और रावणवध का भी एक ‘मूल ऐतिहासिक आधार’ मानना स्वाभाविक बताते हैं। इस प्रकार बुल्के के लिए एक मूल ऐतिहासिक घटना के आख्यान चरित काव्यों के आधार पर वाल्मीकि ने अपनी रचना की थी। बौद्ध त्रिपिटकों की ‘एकाध गाथाएं’ और महाभारत में द्रोण तथा शांतिपर्व की अत्यंत संक्षिप्त रामकथाएं उनके अनुसार वाल्मीकि-पूर्व प्रचलित रामकथा संबंधी आख्यान काव्य पर आधारित हैं। इनमें से स्वयं कोई भी मूल कथावस्तु नहीं है। ‘मूल ऐतिहासिक घटना’ से विकसित होते राम के चरित्र पर बाद में बौद्ध और भागवत धर्मों का प्रभाव पड़ा था। बौद्ध रामकथाओं में ‘दशरथ जातक की समस्या’ पर बुल्के ने विशेष ध्यान दिया है। उनके अनुसार ‘दशरथ जातक की रामकथा न केवल ब्राह्मण रामकथा का विकृत रूप है, वरन् उसका रचनाकाल वाल्मीकि के बहुत सी शताब्दियों बाद माना जाना चाहिए।”[11] बुल्के वाल्मीकि पूर्व रामकथा आख्यान को मूलतः ब्राह्मणीय रामकथा मानते हैं। इस मूल की विकृति दशरथ जातक की रामकथा है। संक्षिप्त और गद्यात्मक होने के चलते बुल्के इसपर वाल्मीकिकृत रामायण की कोई छाप नहीं देख पाते। इस आधार पर उन्होंने ये अनुमान लगाया कि यह वाल्मीकि रामायण पर नहीं बल्कि उसके पूर्व के रामाख्यान काव्य पर आधारित हो सकता है। इस प्रकार मूल प्राचीन ऐतिहासिक घटना से निकला मूल ब्राह्मण आख्यान काव्य और उसे महाकाव्यात्मक संगठन देने वाले हुए आदिकवि वाल्मीकि : बुल्के ने रामकथा की उत्पत्ति का निरूपण इसी क्रम में किया है। मूल ऐतिहासिक घटना संबंधी उनकी मान्यता इतनी प्रबल थी और उसमें उन्हें इतना विश्वास था कि वह अयोध्या की खुदाई से इसके निश्चित प्रमाण मिलने की आशा रखते थे। ‘मानस कौमुदी’ में बुल्के लिखते हैं “राम संबंधी प्राचीन गाथा साहित्य का आरम्भ ऐतिहासिक घटनाओं के आधार पर हुआ होगा…। यदि प्राचीन अयोध्या की खुदाई की जाए, तो यह सिद्ध हो जाएगा कि नवीं शताब्दी ईस्वी पूर्व में वहां एक नगर था। हाल में अपने देश के विख्यात पुरातत्त्वज्ञ डा. हंसमुख धीरज सांकलिया ने ‘रामायण : मिथ ऑर रियलिटी’ नामक पुस्तक में यह विचार प्रकट किया है कि कम से कम आठ सौ ई.पू. तक अयोध्या बसायी जा चुकी थी।”[12]

हम स्पष्टतः देखते हैं कि ऐतिहासिक चरितकाव्यों की ऐतिहासिकता के निरूपण का प्रयास देशी भाषा साहित्यों के इतिहास से होते हुए एक ठेठ ऐतिहासिक घटना के अनुमान तक पहुँच चुका था। मध्यकाल के ऐतिहासिक चरितकाव्यों के आधार पर इतिहास की वास्तविक घटनाओं तक पहुँचने के इस मार्ग की आलोचना उसी समय ‘हिंदी साहित्य का आदिकाल’ में द्विवेदीजी कर रहे थे। जहाँ द्विवेदी कथा की संरचना और मोटिव के सहारे आख्यान काव्यों से इतिहास की पुनर्रचना के बदले आख्यान काव्यों की ऐतिहासिक पुनर्रचना का प्रश्न सामने रखते हैं। बुल्के के सामने समस्या यह थी कि रामकथा के इतिहास में वाल्मीकि के रामायण की कथा का मूलस्रोत न तो वेदों में दिख रहा था, न जातक कथाओं में और न ही किसी ज्ञात ऐतिहासिक घटना में। प्राचीन इतिहास के इस धुंधलके के भीतर उन्होंने यही अनुमान स्थिर किया कि वाल्मीकि के रामायण का जो ढांचा प्राचीन और अर्वाचीन, देशी विदेशी रामायणों की मूलभूत एकता बनाने वाला है, वह किसी वास्तविक मूल ऐतिहासिक घटना पर आधारित है और जिसे वाल्मीकि ने अपने पूर्व प्रचलित लोक आख्यान काव्य से ग्रहण किया है। बुल्के के लिए यह सर्वाधिक विज्ञानसम्मत अनुमान था। एक वास्तविक ऐतिहासिक घटना का अनुमान जहाँ राम को अयोध्या से निकाला जाना, सीताहरण और रावण विजय मूलतः ऐतिहासिक घटनाएँ थीं। ठीक उसी तरह जैसे पृथ्वीराजरासो की मूल ऐतिहासिक घटनाओं की तलाश वैज्ञानिक पाठ निर्धारणों के ज़रिये किया जा रहा था। ‘मूल ऐतिहासिकता’ की रक्षा के लिए हनुमान् के आदिवासी या मूल निवासी उद्गम की कल्पना बुल्के के लिए असंगत नहीं थी। ‘आर्य-अनार्य’ युद्ध के रूपक के रूप में राम कथा की व्याख्या पहले से ही हो रही थी, वैसे ही जैसे पृथ्वीराजरासो का संबंध ‘हिन्दू-मुसलमान’ संघर्ष का अनिवार्य रूपक मान लिया गया था। हनुमान् ‘वानर गोत्रीय’ आदिवासी थे जिन्हें आगे चलकर रामकथा के अन्य आदिवासियों के साथ सचमुच का वानर मान लिया गया था। प्रचलित रामायणों में हनुमान् के ‘वानरत्व- विषयक विशेषणों’ का बाहुल्य देखकर वह इस अनुमान पर पहुंचे थे कि हनुमान् संबंधी यह धारणा वाल्मीकि के समय के पूर्व ही मान्यता पा चुकी थी।[13] उनके अनुसार प्रारंभ में हनुमान् को जो वायुपुत्र कहा गया वही उसकी कथा का आधार है। बुल्के वायुपुत्र शब्द के अनार्य मूल की ओर ध्यान दिलाते हैं जहाँ इसका अर्थ ऐन्द्रजालिक अथवा विद्याधर है। सुमग्ग जातक में वायुस्स पुत्त नामक विद्याधर का उल्लेख है जो वास्तव में जादूगर है। अन्यत्र भी इसका अर्थ जादूगर है जो हनुमान् के तीव्र बुद्धि संपन्न होने का एक प्रतीक भी है।[14] बुल्के के अनुसार हनुमान् के जन्म की कोई ऐसी कथा नहीं मिलती जो वाल्मीकि रामायण की कथा से बहुत स्वतंत्र और अलग रूप से निर्मित हुई हो। ‘वानर गोत्रीय’ का अर्थ यह है कि जिस मध्य भारतीय आदिवासी समाज के हनुमान् थे, उनका टोटेम ‘वानर’ था। झारखण्ड के उरांव, मुंडा आदि आदिवासी समाजों में ‘हेलेमान’ या ‘गाड़ी’ जैसे टोटेम से उन्हें अपनी धारणा को बल मिलता था। वाल्मीकि कृत रामायण से विकसित हनुमान् के चरित्र का विकासक्रम कुछ यूँ है-  वाल्मीकि कृत आदिरामायण में सुग्रीव के पराक्रमी तथा बुद्धिमान मंत्री (बुद्धिमत्ता और पराक्रम के मूल रूप में ) उसके बाद ‘चिरंजीवत्व’ (वरदानों में सबसे प्राचीन हनुमान् की कीर्ति से सम्बंधित), ब्रह्मचर्य (प्राचीनतम उल्लेख स्कन्द पुराण में ), शैव अवतार से होते हुए मध्यकालीन भक्ति में रामभक्त के रूप में पूर्ण विकसित चरित्र। इन विशेषणों का मूल स्रोत भी बुल्के के अनुसार आदिरामायण ही है परन्तु परवर्ती साहित्य में बढ़ते क्रम में है। हनुमान् की अंतिम विशेषता उनका देवत्व है। बुल्के दिखाते है कि ईसा की आठवीं शताब्दी के अनंतर हनुमान् को रुद्रावतार माना जाने लगा था। इसी के साथ ‘हनुमन् भक्ति’ की भावना का भी विकास शुरू हुआ जिसके प्रारंभिक साक्ष्य शैव ग्रंथों में ही उपलब्ध हैं। दसवीं से पंद्रहवीं शताब्दी के बीच हनुमन् भक्ति का पूर्ण विकास हुआ। पंद्रहवीं शताब्दी के बाद हनुमान् का ‘संकटमोचन’ रूप सबसे लोकप्रिय हुआ। अर्वाचीन साहित्य में उनकी महिमा क्रमशः बढ़ती गयी और उन्हें ‘पापमोचक, मुक्तिदाता भगवान्’ की उपाधि मिलती गयी। बुल्के इसमें तुलसी के महत्वपूर्ण योगदान को रेखांकित करते हैं (संकट सोच विमोचनी मूरती)। संकटमोचक, मुक्तिदाता, मंत्रदाता रूप का संबंध बुल्के प्राचीन ‘यक्षपूजा’ से जोड़ते हैं। बुल्के के लिए अत्यंत प्राचीन और गाँव- गाँव प्रचलित ‘यक्षपूजा’ की लोकप्रियता के साथ हनुमान् की लोकप्रियता का बनना स्वाभाविक था। बुल्के लिखते हैं “इस अत्यंत  प्राचीन पूजा पद्धति  से संबंध हो जाने पर हनुमान् की लोकप्रियता बहुत ही बढ़ गयी। और उस समय तक जिस उद्देश्य से और जिस रूप में यक्षों की पूजा होती रही अब उसी उद्देश्य और उसी रूप में महावीर हनुमान् की भी पूजा होने लगी। हनुमान् के संकटमोचन और द्वारपाल वाला रूप वीरपूजा से संबंध रखता है। प्राचीन वीरपूजा और हनुमत्पूजा के उद्देश्यों में जो सादृश्य है वह उपर्युक्त विकास की वास्तविकता को प्रमाणित करता है।”[15]

बुल्के के अनुसार हनुमान् के चरित्र के विकास में भक्ति और लोकपूजा रूपों का यह अद्भुत मेल जो पंद्रहवीं शताब्दी के बाद हुआ इन सब के मूल में वाल्मीकिकृत रामायण के कुछ मूल तत्त्व हैं। इसी प्रकार रामायण के अन्य चरित्रों और घटनाओं का भी विकास, विस्तार और विकृति के मूल तत्वों की एकता उन्होंने वाल्मीकि रामायण से ही निर्धारित की है। हनुमान् के मामले में रामकथा से पृथक किसी और कथा परंपरा का वाल्मीकि-पूर्व रूप के निर्धारण को बुल्के आवश्यक मानते हैं। और इस प्रकार हनुमान् भी एक ऐतिहासिक चरित्र ठहरते हैं।

बुल्के के पास एक आधुनिक और वैज्ञानिक शोध पद्धति थी। इस पद्धति के सहारे वह धर्म-मतों और कथाओं की विविधता को स्वीकार करते हुए उस विविधता के भीतर एकत्व स्थापित करने वाले एक मूल ढांचे की खोज करते हैं। मूल ढांचे की यह खोज इसके इहलौकिक कारण की तलाश थी। रामकथा की व्यापकता और भारतीय उपमहाद्वीप के साथ-साथ दक्षिण पूर्व के एशियाई देशों में मिलने वाली इसकी प्रचुर विविधता को नकारना किसी के लिए भी संभव न था। रामकथा के आधार पर विकसित रामकथा का ठोस वस्तुगत आधार इतिहास में जरूर होना चाहिए। बुल्के इतिहास के इसी प्रश्न के साथ शोध में प्रवृत्त हुए थे। शोध की ओर प्रवृत्त करने वाले तीन तत्त्वों में तुलसी के प्रति अगाध श्रद्धा शायद सबसे महत्वपूर्ण थी और उन्होंने शोध भी शुरू किया था मानस की रामकथा पर ही। पर भूमिका के लिए इकट्ठी की गयी सामग्री ने उनके शोध प्रश्न को नए प्रकाश से आलोकित कर दिया। रामकथा की उत्पत्ति और विकास का यह दीर्घ इतिहास उसकी दीर्घकालीन लोकप्रियता और व्यापकता का स्वयं प्रमाण थी। बौद्ध जातकों आदि में जो स्वीकार्य ऐतिहासिक आख्यान के मूल तत्त्वों से विकृति थी उसी कारण उनकी लोकप्रियता धीरे धीरे कम होती गयी, बुल्के को अपने इस अनुमान की निरर्थकता का बोध शायद था। इसलिए अपने अनुमान की पुष्टि के लिए उन्होंने अलोकप्रियता के दो और कारण गिनाये। एक उनकी भाषा (पाली, चीनी आदि) दूसरी इनकी विधा (पद्य)! सारतः यह प्रमाणित हुआ कि मूलकथा ब्राह्मणीय कथा थी, जैसे जैसे ब्राह्मणीय धर्म स्वयं लोकप्रिय वैष्णव धर्म में बदलता गया वैसे वैसे रामकथा से रामभक्ति कथा के रूप में वह विकसित होता गया। बुल्के का हिंदी प्रेम उनके संस्कृत प्रेम से अलग नहीं था। उन्हें भारतीय संस्कृति और संस्कृत भाषा के आपसी ‘एकत्व’ का अहसास था। हिंदी को वह संस्कृत की पुत्री ही मानते थे। संस्कृत केन्द्रित भारतीयता बुल्के को कल्पित प्रतीत नहीं हुई। विविधताएँ उनके लिए एक संस्कृत केंद्र से संकेंद्रित वृत्तों के रूप में विकसित होती गयी थी। शोधकार्य की सामग्री जो अधिकांशतः संस्कृत में ही उपलब्ध थी, उनके सामने बुल्के को पाली या चीनी की अलोकप्रियता भी एकदम स्वाभाविक लगती थी। वाल्मीकि रामायण के राम के चरित्र में बुद्ध के प्रभाव को बुल्के अस्वीकार नहीं करते परन्तु वह प्रभाव वाल्मीकि की साहित्यिक प्रतिभा में निहित था जिसने बुद्ध के लोकप्रिय करुण रूप को राम के चरित्र में समाहित कर लिया था। महाभारत के ‘बुद्ध राम संवाद’ की तरह वाल्मीकि रामायण में कहीं भी बुद्ध का कोई चरित्र नहीं है। केवल एक बार बुद्ध का उल्लेख हुआ है ‘जाबालि’ वृत्तान्त के अंतर्गत जहाँ राम बुद्ध को चोर और नास्तिक कहते हैं।[16] इसके अलावा बुद्ध संबंधी श्लोक न तो गौड़ीय पाठ में मिलता है और न ही पश्चिमोत्तरीय पाठ में। “अतः आदि रामायण में न तो बुद्ध का कोई उल्लेख हुआ था और न बौद्ध धर्म के प्रत्यक्ष प्रभाव का कहीं भी असंदिग्ध निर्देश मिलता है।”[17] परोक्ष प्रभाव के प्रश्न का निराकरण उन्होंने दो अनुमानों के आधार पर किया। महाभारत में रामायण की अपेक्षा जो कहीं अधिक ‘कटुभाव, उग्र रणोत्सुकता, घोर युद्ध, अदमनीय विद्वेष’ आदि दिखाई देते हैं उसका कारण बौद्ध धर्म का प्रभाव नहीं वरन् उसकी भौगौलिक विशिष्ट अवस्थिति है। महाभारत की घटना पश्चिम में हुई थी जबकि रामायण की कौशल प्रदेश में, ‘जहाँ सभ्यता और संस्कृति का विकास आगे बढ़ चुका था’। इस तरह करुणा और अहिंसा जो कि सभ्यता और संस्कृति के आगे बढ़े हुए भाव हैं, वे आदिकवि को बौद्धों के प्रभाव के चलते नहीं वरन् स्वाभाविक रूप से प्राप्त था! दूसरा अनुमान और भी महत्त्वपूर्ण है। बुल्के कहते हैं कि रामायण के रचनाकाल में कौशल में बौद्ध धर्म का पर्याप्त प्रचार हो गया था। वह लिखते हैं: “अतः यह असंभव नहीं कि वाल्मीकि ब्राह्मण धर्म के प्रभाव में रहते हुए भी परोक्ष रूप से बौद्ध आदर्श से प्रभावित हुए थे। सीता का हिंसा के विरुद्ध भाषण (रौद्रं पर प्राणाभि हिंसनम् आदि ), जो बौद्ध अहिंसा का स्मरण दिलाता है, प्रक्षिप्त माना जा सकता है। लेकिन राम का अत्यंत शांत और कोमल स्वाभाव, उनकी सौम्यता आदि ध्यान में रखकर स्वीकार करना पड़ता है कि वे मुनि पहले हैं, क्षत्रिय बाद में। अतः इनके चरित्र चित्रण में किंचित बौद्ध प्रभाव देखना निर्मूल कल्पना नहीं प्रतीत होती है।”[18]इस प्रकार बुल्के राम के चरित्र पर ‘किंचित् बौद्ध प्रभाव’ स्वीकार करते हुए दशरथ जातक की समस्या का जो समाधान प्रस्तुत करते हैं, वह बुल्के के आतंरिक अंतर्विरोधों को भी स्पष्ट करता है। भारत के लोकप्रिय धार्मिक रूपों के बीच बौद्ध धर्म को ‘मूल भारतीयता’ के प्रश्न से जोड़ने वाली एकदम विपरीत प्रवृत्ति का पता हमें अम्बेडकर के यहाँ मिलता है। इस विषय पर थोड़ी और चर्चा हम आगे करेंगे।

वाल्मीकि कृत आदि रामायण से विकसित होती रामकथा का सर्वोच्च रूप रामभक्ति और तुलसीदास में बुल्के दिखाते हैं। अनेक रामायण उस एक रामायण का विकास है जो स्वयं लोक आख्यान के रूप में एक ऐतिहासिक घटना के सुदृढ़ आधार पर विकसित हुआ था। एक प्रकार से यह महाकाव्यात्मक एकता थी। इस एकता के वाहक बुल्के के अनुसार ‘काव्योपजीवी कुशीलव’ होते थे। इन कुशीलवों का काम होता था कि वे आदि रामायण की कथा समस्त देश में घूम घूमकर प्रचारित करें और इसी के सहारे जीविकोपार्जन करें। आधुनिक विद्वान् इसे संस्कृत शास्त्रीय काव्य की सार्वदेशिक संस्कृति से जोड़कर देखते हैं।[19] शेल्डन पोलॉक संस्कृत की सार्वदेशिक संस्कृति को राज्य और काव्य के संबंधों के माध्यम से देखने की कोशिश करते हैं। संस्कृत काव्य और राज्य की सार्वदेशिक संस्कृति के साथ साथ प्राकृत और अपभ्रंश की अर्द्ध सार्वदेशिक संस्कृतियों का प्रभाव हज़ार ईस्वी के आसपास देशी भाषाओं की ‘स्थानीयता और सार्वदेशिकता’ की आत्माभिव्यक्ति के दबाव के चलते समाप्त हो गया। पोलॉक इसे महाकाव्यों की स्थानीयता के साथ बनने वाली देशी भाषाओं की सहस्त्राब्दी के रूप में व्याख्यायित करते हैं। बुल्के ने भी ध्यान दिलाया था कि आधुनिक भारतीय भाषाओं के पहले पहल लिखे गए काव्यों में रामकथा या रामायण ही थी। बुल्के की अपेक्षा पोलॉक अपने तथ्यों को ज्यादा ठोस और वस्तुनिष्ठ बताते हैं, जहाँ वे काव्य के साथ साथ दक्षिण पूर्व एशिया में विस्तृत शिलालेखों और अभिलेखों का साक्ष्य भी प्रस्तुत करते हैं। इस प्रकार काव्य और राज्य के सम्मिलित इतिहास के लिए पोलॉक के पास ज्यादा ठोस आधार है, जिसके सहारे वह धर्म के इतिहास से मुक्त इतिहास दृष्टि का विकास करना चाहते हैं। बुल्के ने आधुनिक भारतीय भाषाओं में रामकथा की व्यापकता का कारण भक्ति के विकास को बताया था। बुल्के की रामकथा के विकास का द्वितीय सोपान वह था जहाँ रामकथा का आदर्श, क्षत्रिय चरित्र मात्र न रहकर विष्णु की अवतारलीला के रूप में परिणत हो गया था। बौद्धों और जैनियों के साहित्य को छोड़कर बुल्के राम के इस रूप को सर्वस्वीकृत मानते थे। परन्तु इस द्वितीय सोपान में जनता की धार्मिक चेतना के भीतर राम के लिए कोई विशेष आग्रह न था। न ही इस समय तक रामभक्ति का अविर्भाव हुआ था। धार्मिक साहित्य की अपेक्षा इस दूसरे सोपान में तत्कालीन ललित साहित्य के भीतर ही रामकथा की व्यापकता और लोकप्रियता मिलती है। ललित साहित्य अधिकाशतः ‘शास्त्रीय संस्कृत काव्य’ की परंपरा थी। यहाँ राम का चरित्र साहित्यिक था, धार्मिक नहीं। बुल्के ध्यान दिलाते हैं कि “रामभक्ति के आविर्भाव के पूर्व रामकथा का यह साहित्यिक रूप विदेश में फैल गया और उसपर बाद में रामभक्ति का प्रभाव नहीं पड़ा, इसलिए समस्त विदेशी रामकथा साहित्य में रामभक्ति का प्रायः अभाव है।”[20] इस तरह विदेशों में रामकथा का प्रसार धार्मिक कम साहित्यिक ज्यादा था।

रामकथा के विस्तार को कुछ विद्वान एक ही कथा का अलग-अलग संस्कृतियों में इम्प्रोवाईजेशन होना बताते हैं, जिसमे राजनीतिक सत्ता और लोक संस्कृति दोनों की भूमिका थी। कुशीलवों के कव्योपजीवी वर्ग के साथ पांडुलिपियों की नक़ल की तकनीक, राज्य निर्मित शिलालेखों- अभोलेखों का परम्परित आदर्श मॉडल आदि मिलकर कथाओं का एक सुनिश्चित तंत्र बनाती थी। लोकमानस के बीच अगर कथा के धार्मिक रूपों का अभाव था भी तब भी यह नहीं कहा जा सकता कि साहित्य नितांत अधार्मिक था। कथाओं का सुनिश्चित तंत्र लोकमानस, सत्ता और काव्य के रिश्तों को बनाने वाले एक सक्रिय काव्योपजीवी वर्ग पर निर्भर करता था। इस वर्ग का जीविकोपार्जन मुख्यतः राज्यसत्ता या धर्म संस्था पर निर्भर करता था और कहना न होगा कि बदले में इन सत्ता संस्थाओं को अपनी जनस्वीकृति और लोकप्रियता के लिए इन वर्गों पर निर्भर होना पड़ता था। इसलिए राज्य और धर्म संस्था के अपने हितों से भी ये कथाएं अछूती नहीं थीं, उनमें प्रक्षेप और परिवर्तन होता रहता था और कहीं-कहीं एकदम नए रूपों का निर्माण हो गया था।

रामकथा की लोकप्रियता आरम्भ से ही इतनी थी कि उसे विष्णु का अवतार, बौद्ध धर्म में बोधिसत्व तथा जैन धर्म में आठवें बलदेव की तरह स्वीकार किया गया था। संस्कृत शास्त्रीय ललित-साहित्य के भीतर वाल्मीकि की कथा का साहित्यिक रूपांतरण और उसका विदेशों में विस्तार और अंत में भक्ति के साथ जुड़कर लोकप्रिय धार्मिकता के सर्वोच्च रूप में विकसित होना। संक्षेप में रामकथा की उत्पत्ति और विस्तार की कहानी यही थी। इस विकास की मौलिक एकता के दोनों ध्रुवों पर, रामकथा के विकास, प्रसार और विविधता को आतंरिक एकता और संगति प्रदान करने वाले दो महाकवि थे। यह नेहरू युगीन अनेकता में एकता के मॉडल से अभिन्न है। अकारण नहीं कि बुल्के हिंदी भाषा का एक ठोस संस्कृत आधारित मानक बनाने के प्रबल पक्षधर थे।

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हुसैन की रचना

हिन्दू धर्म और अवतारवाद

बुल्के बराबर कहा करते थे कि वर्षों तक संस्कृत और हिंदी साहित्य पढ़ते-पढ़ते उनका मन पूरी तरह भारतीय हो गया है। लोगों की नजरों में बुल्के आधुनिक संत की तरह थे। आधुनिक भारत के निर्माण का उद्देश्य बुल्के के अनुसार प्राचीन और नवीन का समन्वय होना चाहिए। यह बात उन्होंने ‘हिंदी के प्रति हिंदी भाषियों का कर्तव्य’ बतलाते हुए कही थी। भाषा आन्दोलनों की उग्रता को लक्ष्य करते हुए उन्होंने कहा कि यह उग्रता निरे अंग्रेजी विरोध के कारण है। भाषा का सम्मान और मानसिक सांस्कृतिक जागरण एक दूसरे से अलग नहीं हो सकते। उन्होंने कहा कि अहिंसक सत्याग्रह हमारा कर्तव्य है। हिंदी भाषा उनके लिए एक ‘संगठित शक्ति’ थी। उत्तर भारत के विभिन्न बोलियों के सम्मान की लड़ाई को बुल्के वहीं तक स्वीकार करते थे जहाँ तक यह लड़ाई हिंदी भाषा की ‘संगठित शक्ति’ को बढ़ाने में मददगार हो। उन्होंने कहा कि हिंदी की ‘संगठित शक्ति’ अगर बोलियों में बिखर जाये तो उसका परिणाम उत्तर भारत के लिए बहुत घातक होगा। हिंदी भाषा और साहित्य के पिछले चार सौ सालों के इतिहास में इस ‘संगठित शक्ति’ का इतिहास भी वह देखते थे। फ्लेमिश जातीयता की तरह विकसित होती एक हिंदी जातीयता ! नए पुराने के समन्वय का निर्णय उनके लिए कभी उग्र नहीं हो सकता था। उन्होंने कहा कि भारत में इतिहास कभी भी जड़ नहीं था और न ही कभी किसी रूढ़िगत जड़ता की जगह ही भारतीय इतिहास में रही है। बुल्के के लिए नये पुराने के निर्णय का आधार कालिदास के इन शब्दों में था- ‘पुराणमित्येव न साधु सर्वं न चापि काव्यं नवमित्यवद्यम्। संत परीक्ष्य अंतरद् भंजते मूढ़ पर प्रत्ययनेवबुद्धः’, अर्थात् पुराना हो जाने से ही न तो कोई काव्य अच्छा हो जाता है और न ही नया होने से ही बुरा हो जाता है। समझदार लोग दोनों को परखकर किसी एक को अपनाते हैं। जो मूर्ख है वही दूसरों के कहने पर चलता है। इस तरह प्राचीन की परीक्षा और आधुनिकता के बीच वह कोई विरोध नहीं मानते थे। अतीत के भंडार से “किसी काल विशेष के कुछ ही सिद्धांत निकालकर उन्हें भारतीयता की एकमात्र प्रतिनिधि उपलब्धि ठहराना, भारत की शताब्दियों तक निरंतर आगे बढ़ती हुई उदार संस्कृति के प्रति घोर अन्याय ही है।”[21] संस्कृति के प्रति इसी उदार दृष्टि से ही उन्होंने रामकथा की उत्पत्ति और विकास का निरूपण किया था। जातीयता की संगठक शक्ति के रूप में रामकथा का इतिहास भारतीय संस्कृति की एक उदार विश्व दृष्टि का भी विकास था। भारतीय संस्कृति की इस उदार विश्वदृष्टि में स्वयं को नवीन करते चलने की अपार क्षमता है। प्रेमचंद के बारे में बुल्के ने कहा कि उनकी कहानी कला का मूल स्रोत तो विदेशी है किन्तु उन्होंने उसे अपनी मौलिक प्रतिभा के सांचे में ढालकर एक स्वाभाविक भारतीय रूप प्रदान किया है। प्रेमचन्द की इस कहानी कला के मूल स्रोत अर्थात् यथार्थवादी कहानी कला को सम्बोधत करते हुए उन्होंने लिखा कि बहुत से यथार्थवादी उपन्यासों में जीवन की क्रूरता, देश की कुंठा और मनुष्य की पाशविक वृत्तियों का चित्रण मात्र किया जाता है। इसे वह उद्देश्यहीन यथार्थवाद कहते हैं और “इस प्रकार का उद्देश्यहीन यथार्थवाद भारत की साहित्यिक परंपरा से मेल नहीं खाता। यथार्थ को दिशा देना, कुंठा के अंधकार से निकलने का मार्ग दिखाना, मनुष्य को पशुतुल्य धरातल से ऊपर उठाना, यह भारतीय दृष्टिकोण के अनुसार साहित्य का उद्देश्य है।”[22]  बुल्के के लिए सोद्देश्य यथार्थवाद की भारतीय परंपरा थी ‘कीरति भनिति भूति भली सोई..’। भारतीय साहित्य के इस स्वाभाविक विकास की गति अर्थात् सोद्देश्य यथार्थवाद की उदार विश्वदृष्टि को ही वह  प्रेमचंद में नवीन होता देख रहे थे।

साहित्य की तरह संस्कृति और धर्म के प्रति बुल्के की उदार विश्वदृष्टि को भी हम उन्हीं के शब्दों में ‘सोद्देश्य यथार्थवाद’ की दृष्टि कह सकते हैं। अपनी इसी दृष्टि से बुल्के अवतारवाद की भारतीय विचारधारा को समझने का प्रयास करते थे। अवतार का भी एक निश्चित उद्देश्य था। वह उद्देश्य था धर्म की स्थापना। धर्म की स्थापना के उद्देश्य से अवतारों की इच्छा को बुल्के ने भारतीय जनता की वास्तविक इच्छाओं का स्वप्न कहा था। इस तरह बुल्के के लिए राम की भक्ति ‘निर्बलों की आह’ को संगठित करने वाली धार्मिक विचारधारा का प्रतिनिधित्व करती है, क्योंकि इस भक्ति में एक सोद्देश्य यथार्थवाद है। निस्संदेह बुल्के के लिए यह सोद्देश्य यथार्थवाद प्रेमचंद के ठीक विपरीत एक धार्मिक व्यावहारिक विचारधारा थी। बुल्के ने हिंदी विभागों से भगवतीचरण वर्मा के उपन्यास ‘चित्रलेखा’ को इसीलिए हटाने का अनुरोध किया था, क्योंकि वहां कुमारगिरी जैसे योगी का चित्रलेखा के सामने झुक जाना उन्हें अच्छा नहीं लगता था। बुल्के के लिए ब्रह्मचर्य का आदर्श एक उच्च आदर्श था और स्त्री सौन्दर्य के सामने उसकी पराजय उनके अनुसार बीए के छात्रों को गलत सन्देश देती थी, इसलिए पाठ्यक्रम से उसे हटाना जरूरी था! अवतारवाद की विचारधारा के विकास में कृष्णभक्ति के योगदान को बुल्के-सीधे सीधे नकार नहीं सकते थे। राधा कृष्ण की रासलीलाओं और अवतारवाद की नैतिकता के बीच का अंतर्विरोध बुल्के के लिए ठीक वैसी ही उलझन पैदा करने वाला था जैसी ग्रियर्सन या शुक्ल जी के यहाँ। सामान्यतः हिन्दू धर्म के बारे में बुल्के का विचार डा. राधाकृष्ण के विचारों से अभिन्न है। वह ईसाई धर्म की तरह ही हिन्दू धर्म को भी एक विशेष जीवन व्यवहार की दृष्टि मानते थे। अंतर केवल उसकी परिणति का है। बुल्के हिन्दूओं के जीवन व्यवहार को स्वभावतः ईसाई धर्म में पर्यवसित होता हुआ देखते थे।

पिछले तीन हज़ार सालों से निरंतर विकसित होते हिन्दू धर्म को, वह यहाँ के लाखों हिन्दुओं की निरंतर विकसित होती धार्मिकता की तलाश की तरह देखते हैं। इस दीर्घ इतिहास में उन्हें किसी ऐसी केंद्रीय सत्ता (अथॉरिटी) का अभाव मिलता है जो नई प्रवृत्तियों और व्यवहारों की जाँच कर सके। जबतक कोई नया धर्मगुरु खुलकर वेदों को नहीं नकारता तब तक वह मोक्ष के नए मार्ग और उस नए मार्ग के अपने अनुयायियों के साथ हिन्दू धर्म के भीतर जगह पा जाता था। बुल्के कहते हैं कि समन्वय की इसी क्षमता के सहारे वेदों का खुलकर विरोध करने वाले बौद्ध और जैन धर्म भी आजकल हिन्दूवाद की शाखा मात्र में बदल गए हैं। इस प्रकार यह हिन्दू धर्म असंख्य मतों और पंथों और धार्मिक व्यवहारों से युक्त एक जटिल व्यवस्था के रूप में प्रकट होती है। बुल्के देखते थे कि पढ़े लिखे हिन्दुओं के बीच भी हिन्दू धर्म की पहचान को लेकर कोई मतैक्य नहीं था। एक लोकप्रिय राष्ट्रीय पत्रिका के पत्राचार कॉलम की एक बहस का हवाला बुल्के देते हैं, जहाँ हिन्दू धर्म के बारे में व्यक्तिगत विचारों पर एक लम्बी बहस हुई थी। उस लम्बी बहस का अंतिम निर्णय था : हिन्दू एक ऐसा व्यक्ति है जिसका जन्म हिन्दू परिवार में हुआ है और जिसने कभी खुलकर अपने धर्म का परित्याग नहीं किया है।[23] उनके यहाँ हिन्दू धर्म की इस अपरिभाषेय संश्लिष्टता का इतिहास पहले के प्राच्यविद्याविदों के वर्णन से बहुत भिन्न नहीं थी। ई.पू. की तीसरी और दूसरी सस्त्राब्दियों में आर्यों का भारत आगमन हुआ। इन आर्यों ने अपने साथ ‘प्रकृति-पूजक’ धर्म भी साथ लाया। आर्यों की जो शाखा यूरोप पहुंची थी उनका धर्म भी मुख्यतः ‘प्रकृति पूजा’ ही था। आरंभिक ऋग्वेद की सुन्दर ऋचाओं से होते हुए बाद के तीनों वेद मिल कर हिन्दुओं के दूसरे पवित्र ग्रंथों का आधार बनते हैं। बुल्के का सुझाव है कि बाद के तीनों वेदों की प्रकृति को बेहतर ढंग से समझने के लिए हमें उत्तर भारत में आर्य और अनार्य आबादियों की आपसदारी के परिणाम के रूप में उन्हें देखना चाहिए।

बुल्के लिखते हैं कि आरंभिक आर्यों में मुख्यतः तीन श्रेणियां थीं: पुजारियों की, आधिकारिक योद्धाओं की और सामान्य कबीलीयाई मनुष्यों की। उत्तर भारत में पहले से रह रही जनता के संपर्क और उनपर विजय के दौरान धीरे-धीरे ये श्रेणियां कठोर होती गयीं और उन्हें धार्मिक मान्यता भी मिलती गयी। ब्राह्मणीय कर्मकांडों के आसपास पुरोहित वर्ग ने एक विशेषाधिकार संपन्न स्थिति हासिल कर लिया। इन कर्मकांडों के विधि-निर्देशों और धार्मिक अर्थों के निर्देश के लिए ब्राह्मण ग्रन्थ लिखे गए। यहाँ पहली बार हिन्दू धर्म की आरंभिक गाथाओं का संकलन मिलता है। पुरोहितों के अलावा क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र जातियों के कठोर बन्धन निर्धारित हुए। शूद्र अधिकांशतः अनार्य जनता थी जो सेवा कार्यों के निमित्त सामाजिक संरचना में शामिल कर लिए गए थे। इनमें में अनेक ऐसे थे जिन्हें जाति बाह्य भी समझा जाता था।[24] जाति का नियम शादी के नियमों से बंधा था। इसके अलावा खान-पान और व्यवसाय के कठोर नियम थे। अपनी जाति के बाहर शादी और व्यवसाय का स्वप्न देखना, हिन्दू व्यवस्था के भीतर संभव नहीं था और जाति बाह्य होने के डर से धर्मान्तरण हमेशा से मुश्किल रहा है। बुल्के लिखते हैं कि सामाजिक व्यवस्था में जातिवाद इतनी गहराई तक व्याप्त है कि इसे बदलने में अभी बहुत वक़्त लगेगा।

जन्म-जन्मान्तर तक व्याप्त कर्म-बंधन का सिद्धांत ब्राह्मण ग्रंथों के पुनर्जन्म की मान्यता से विकसित होता गया था। उनके अनुसार कर्म-बंधन का यह सिद्धांत व्यावहारिक रूप से लगभग हर हिन्दू मानता है। कर्म-बंधन का यह सिद्धांत कहता है कि किसी का वर्तमान अस्तित्व अपने सभी सुखों और दुखों के साथ पूर्वजन्म के कर्मों का फल है और भविष्य के जन्म का आधार। असंख्य आत्माएं पुनर्जन्म के इस बंधन में भटक रही हैं और इसकी न तो कोई शुरुआत है और न ही कोई अंत। परन्तु कुछ लोग हमेशा ही इस भवचक्र से मुक्ति पाते रहेंगे। बुल्के लिखते हैं कि इस प्रकार यह सिद्धांत संपूर्ण ब्रह्मांड को एक नैतिक सिद्धांत के अधीन करता है जहाँ हर अच्छे काम को पुरस्कृत और बुरे काम को दण्डित होना पड़ता है। इस ब्रह्मांडीय नियम के अन्दर देवता भी शामिल हैं। दर्शनों में इस कर्म बंधन पर अंतहीन बहसें हुई हैं। पर लगभग सभी इस बात पर सहमत हैं कि आत्मानुशासन या ईश्वर के आशीर्वाद से प्राप्त आत्मज्ञान से मुक्ति संभव है। बुल्के ने महसूस किया था कि पुनर्जन्म के इस बंधन का सिद्धांत बहुत हताशाजनक है। उन्होंने हिन्दू विश्वविद्यालय के अपने एक विद्यार्थी का एक संस्मरण सुनाया जिसने बुल्के के सामने द्रवित हृदय से अपने पापों का ज़िक्र किया और अंत में कहा कि उसने अपना यह जन्म गँवा दिया है, और अब इसकी भरपाई इस जन्म में संभव नहीं। हताशाजनक इस सिद्धांत के कारण वर्तमान जन्म ही अंतिम जन्म है, इसकी कल्पना से ही लोग डरते हैं। अपने पापों के प्रति इतने सचेत लेकिन पश्चाताप की कोई आशा नहीं। इस प्रकार हिन्दुओं की जीवन दृष्टि में एक चरम निराशावाद की झलक दिखती है।

बुल्के ने लिखा कि असंख्य देवी-देवताओं के बीच एक ही परमात्मा पर विश्वास केवल शिक्षित हिन्दुओं के बीच मान्य है। पर इन शिक्षितों के बीच बहुत कम ऐसे हैं जो शंकर को समझने का दावा कर सकते हैं, परन्तु शंकर की तरह ही वे एक निर्वैयक्तिक परमात्मा पर विश्वास करते हैं। अलग-अलग ईश्वर उस एक ही ब्रह्म के निरूपण हैं। भक्त कवियों के आधिभौतिक सार को वह इन शब्दों में रखते हैं : “जब वे अटकल लगते हैं तो उनका झुकाव अद्वैतवाद की तरफ होता है, लेकिन उनकी तीव्र धार्मिक अन्तःप्रज्ञा हमेशा एक वैयक्तिक ईश्वर की ओर उन्हें खींच लेती है।”[25] ईसा पूर्व छठी शताब्दी में उठे आस्तिक आन्दोलन के परिणामस्वरूप भगवद्गीता का जन्म होता है जिसे वे हिन्दुओं की सबसे पवित्र और लोकप्रिय पुस्तक मानते हैं। उनके अनुसार भगवद्गीता की अद्वैतवादी व्याख्याओं से हटकर जब हम उसका पूर्वग्रहहीन पाठ करते हैं, तो पाते हैं कि वहां कृष्ण के प्रति वैयक्तिक भक्ति और आत्मसमर्पण है, जो पूर्वजन्म के चक्र से मुक्ति का मार्ग दिखाता है। पुराणों की अपेक्षा भगवद्गीता में उच्च नैतिक मूल्यों की केन्द्रीयता है। बुल्के लिखते हैं कि एक गंभीर हिन्दू ने उन्हें कभी कहा था कि भारत में कृष्ण को इतना सम्मान और इतनी भक्ति कभी नहीं मिलती अगर वह पहली बार अपनी गोपाल लीलाओं के द्वारा जाना जाता। दक्षिण भारत के शैव संतों की शिव आराधनाओं में भी भगवद्गीता की तरह गंभीर और सच्ची आध्यात्मिकता के दर्शन होते हैं। बाद में यह सच्ची धार्मिकता रामभक्ति में ही सबसे सुन्दर और हृदयग्राही रूप ग्रहण करती है। इन सबके अलावा हिन्दू धर्म का मतलब हजारों की संख्या में घूमने वाले साधु-संन्यासियों, हजारों मंदिरों, सैकड़ों तीर्थों और लाखों भक्त हिन्दू स्त्रियों के दैनिक व्रतों और उपवासों के ज़िक्र के बिना अधूरा है। हजारों की संख्या में घूमने वाले और आम लोगों के दान पर निर्भर रहने वाले साधु आधुनिक हिन्दू धर्म की एक दुखद प्रवृत्ति को व्यक्त करते हैं। बुल्के के अनुसार भारत में एक ‘शिक्षित हिन्दू पुरोहित वर्ग’ का अभाव बहुत खटकने वाली बात है।

निष्कर्षतः बुल्के मानते हैं कि ईश्वर की खोज का जैसा भावावेगपूर्ण इतिहास हिंदुस्तान में मिलता है। उतना शायद विश्व के किसी देश में नहीं। परन्तु दूसरी ओर भारत के ऋषियों और ज्ञानियों ने हमेशा इस बात पर जोर दिया कि परमात्मा की प्रकृति को पूरी तरह जानने में मनुष्य की बुद्धि अक्षम है। महाभारत में कहा गया है कि शास्त्र और परंपरा हमें कई परस्पर विरुद्ध कथनों के सामने ला खड़ा करते हैं, हर ऋषि के पास अपना कोई भिन्न सिद्धांत है और धर्म का रहस्य गुहा में छिपा है। हिन्दू धर्म के इस संशयवाद को बुल्के आधुनिक हिन्दुओं में भी पैठा हुआ देखते हैं। भारत में व्याप्त धार्मिक तटस्थतावाद के लिए बुल्के आंशिक रूप से इस संशयवाद को जिम्मेदार ठहराते हैं। सभी धर्म समान रूप से अच्छे हैं, सारी नदियाँ समुद्र में मिल जाती हैं आदि निष्कर्ष इसी धार्मिक संशयवाद का परिणाम है।[26]

अवतारवाद और रामभक्ति दो ऐसी चीजें हैं जो उनके अनुसार आधुनिक हिन्दू धर्म को एक करती है। अवतारवाद की भावना बुल्के के लिए एक वैयक्तिक ईश्वर की चाह की भावना थी। दूसरे शब्दों में एक सच्चे एकेश्वरवादी धर्म की आन्तरिकता का इतिहास अवतारवाद का इतिहास है। हमने पीछे देखा कि शुक्ल जी के व्यावहारिक उभयस्वरूप ब्रह्म के सिद्धांत से उन्हें तोष नहीं था। भक्ति कविता में उन्होंने भक्तों की इस प्रबल आकांक्षा की ओर ध्यान दिलाया था। अवतार की इसी प्रबल आकांक्षा के कारण तुलसीदास पिछले कवियों से अलग थे। अनुमान और दर्शन में भले ही तुलसी ‘सगुनहि अगुनहि नहिं कछु भेदा’ कहते हों लेकिन वहां वैयक्तिक राम का आग्रह इतना प्रबल है कि कभी-कभी राम अपना परब्रह्म रूप छोड़कर मनुष्यों की तरह वास्तविक सुख-दुःख का अनुभव करने लगते हैं। यह महज लीला का आनंद नहीं है। वरन् वास्तविक मनुष्य में वास्तव होने की वेदना है। रामकथा सच्चे अवतार का पूर्वस्वप्न है। यह भारतीय ईसाइयत का आतंरिक इतिहास था जो वास्तव में तुलसीदास का हाथ पकड़कर ईसाइयत की वैश्विकता पा लेगा। बुल्के अवतारवाद के विकास में कृष्णभक्ति की प्रकृति पर विस्तार से चर्चा करते हैं। कृष्णभक्ति की अनैतिकता अन्य प्राच्यविद्याविदों और शुक्ल जी के साथ-साथ बुल्के की आलोचना का केंद्र बनी रही। इन नैतिक मूल्यों का संबंध समाज में यौनिकता के गहरे स्तरों से था, जिसे  हमने द्विवेदी जी की चर्चा के दौरान पीछे देखा है। बुल्के एकदम शुक्ल जी की तरह ही रामभक्ति पर कृष्णभक्ति के प्रभावों की आलोचना करते हैं। राम-सीता की माधुर्य भक्ति में राम और सीता के चरित्र की विकृति बुल्के के अनुसार खुद हिन्दू अवतारवाद की अवधारणा में अन्तर्निहित है। दूसरी ओर दार्शनिक व्याख्याओं के लिए जितने शास्त्र उपलब्ध हैं, वे सभी कृष्णभक्ति पर केन्द्रित हैं। कृष्णभक्ति से जुड़े इन दार्शनिक ग्रंथों में अवतारवाद को लीलावाद में बदल दिया है। शुक्ल इसी को ‘लोकमंगल की सिद्धावस्था’ कहते थे। बुल्के के अनुसार कृष्णभक्ति की दार्शनिक व्याख्याओं में नैतिकता की रक्षा का ऐसा प्रयास पहले भी हुआ था, लेकिन वह कभी भी प्रभावी नहीं हो सका। इसका कारण है कि भारतीय अवतारवाद की धारणा में नैतिकता और धार्मिकता के बीच हमेशा ही एक जरूरी पार्थक्य बनाये रखा गया है। ईश्वर का सत्-चित्-आनंद रूप जब धार्मिक व्यावहार के लिए प्रयुक्त होता है तब उसमें विकृति आती है। यहाँ नैतिक-अनैतिक के निर्णय का कोई प्रश्न ही नहीं रह जाता, क्योंकि सच्चिदानंद स्वरूप ईश्वर नैतिक-अनैतिक निर्णय से बाहर है। कहा जा सकता है कि व्यावहारिक सत्य के रूप में बुल्के के लिए मसीह का चरित्र सत्-चित्-आनंद स्वरूप नहीं बल्कि ‘सत्-चित्-वेदना’ के स्वरूप में वास्तविक होता है।

अवतार के जिम्मे कई अनैतिक कार्यों का ज़िक्र स्वयं महाभारत में था। कृष्ण का चरित्र वहां पूरी तरह नैतिक नहीं बना रहता। गीता में अवतार के दो उद्देश्य बताये गए हैं। पहला ईश्वर के प्रति पूर्ण समर्पण, दूसरा भक्त की मुक्ति। बाद की कृष्णाश्रयी धाराओं में पहली को छोड़ केवल दूसरी पर ध्यान दिया गया। जबकि बुल्के कहते हैं कि ईश्वर के प्रति पूर्ण समर्पण ही मुक्ति का रास्ता है। इसे छोड़ कर मोक्ष पर ध्यान लगाना नैतिकता और धार्मिकता के अलगाव को जन्म देना। दूसरे शब्दों में कहें तो पूर्ण समर्पण की नैतिकता मूल और आरंभिक है, उसे छोड़ कर सीधे मोक्ष पर ध्यान लगाने से विकृति आती है। मोक्ष एक प्रक्रिया है जिसकी पहली शर्त है पूर्ण समर्पण। यह पूर्ण समर्पण एक उच्च नैतिक मूल्यों वाले शहीदी चरित्र में मसीह ने वास्तव किया था।

वेदना और करुणा की कथाओं में मसीह के चरित्र का सार है। बुल्के पुनर्जागरण या पुनरुथान के मसीही शहादत को गोस्पेल की कथाओं में अभिव्यक्त मानते थे। इसलिए वहां दैनिक व्यावहारिक नैतिकता पर जोर था। हमने देखा था कि कृषक जीवन और औद्योगिक जीवन की विकृतियों के बीच वह मसीही करुणा का प्रचार ज़रूरी मानते थे। कारीगरी (आर्टीजनशिप) वाले सामाजिक सम्बन्धों से बनने वाली सामूहिकता में वह जीवन का आदर्श देखते हैं। गोस्पेल की कथाओं की कारुणिकता में अवतारवाद का सार देखना, जेसुइटपंथियों की अपनी मान्यता थी। वे जेसुइट सम्प्रदाय से थे और बाइबिल या न्यूटेस्टामेंट की साहित्यिकता के महत्त्व को जानते थे। कहने का अर्थ यह है कि बुल्के मसीही अवतारवाद की एक भिन्न परम्परा से आते थे। सामूहिक परिवार सामुदायिक जीवन की पहली पाठशाला मानी जाती है और इस जीवन के रोज़मर्रा के दृश्यों में करुणा की असंख्य अभिव्यक्तियाँ होती हैं। इस जीवन में मसीही करुणा सीमेंट की तरह काम करती है। बुल्के साहित्यिकता का उद्देश्य इस जीवन में मसीही करुणा के प्रचार प्रसार में देखते थे। मसीही अवतारवाद की इसी वैश्विकता के प्रचार के लिए बुल्के स्वयं मिशनरी कार्यों का एक आदर्श स्थापित कर रहे थे।[27] बुल्के का मानस उनके शब्दों में पूर्ण भारतीय हो गया था। इसी भारतीय मानस से वह भारतीय अवतारवाद की आलोचना करते हैं। परहित और विश्वमानवतावाद की विचारधारा चालीस और पचास के दशक में जोर-शोर से प्रचारित हुई थी। १९५६ के बाद रूसी कम्युनिस्ट पार्टी की आत्मालोचनाओं से भी इस विचारधारा को काफी बल मिला था। जीवन-जगत में हिंसा के विकृत और बर्बर रूपों को सामने कर सामाजिक व्यवस्था के रूप में औद्योगिक सभ्यता या पूंजीवादी सभ्यता से मुक्ति के सारे प्रयासों को निरर्थक घोषित किया जाने लगा था। पूँजी के भीतर एक बेहतर दुनिया की संभावना के लिए जेसुइट मिशनरी भी अपनी मसीहाई करुणा को लेकर बहुत सक्रिय थी। मसीही अवतारवाद के करुण पक्ष को लेकर संघों में समर्पित पुजारियों का एक नया दल उत्साहित होकर लग गया था। यह ईसाई धर्म की व्यावहारिकता और ईश्वर के राज्य के विकल्प का प्रचार करने में सबसे आगे था। ये मिशनरी उच्च नैतिक मूल्यों को सामने रख समाज में शान्ति और सुख की वास्तविकता के स्वप्न को यथार्थ करने की कोशिश कर रहे थे। इस मानवतावादी धार्मिक विचारधारा का प्रचार मार्क्सवाद को भी प्रभावित कर रहा था। ऐसे ही वक़्त में आरंभिक मार्क्स की रचनाओं को आधार बना कर पश्चिमी मार्क्सवाद की एक प्रवृत्ति के रूप में, मानवतावादी मार्क्सवाद का भी जन्म हुआ था। करुणा की सार्वभौमिकता का आधार श्रम के अपने अलगाव में निहित था। ‘आर्थिक और दार्शनिक पांडुलिपियों’ में मार्क्स ने पहली बार अमूर्त मनुष्य के बदले जीते-जागते श्रमशील मनुष्य की पूर्णता को दर्शन के केंद्र में लाया था। मनुष्य का अपने प्रजातीय सत्ता से अलगाव की व्याख्याओं में मनुष्य के आदिम अलगाव की व्याख्या देख, ईसाई धार्मिक विचारधारा ने मार्क्स की व्याख्याओं में अन्तर्निहित नैतिकता को ईसाई नैतिकता से एक कर दिया। इस वैचारिक परिदृश्य में ही एक करुण और अहिंसक मार्क्सवाद की कल्पना के लिए भी अवकाश मिल गया था। बुल्के व्यक्तिवाद या मसीह की वैक्तिकता की धारणा में हिंसा का पूर्ण निषेध देखते थे। पूंजीवादी व्यक्तिवादी विचारधारों की आलोचना के साथ-साथ वह दैवीय हिंसा की धारणा के भी आलोचक थे। बुल्के संघ के उद्देश्यों को यथार्थवादी मानते थे। संघ के भीतर व्यक्तिवाद की रक्षा को वह सत्य से जोड़ कर ही देखते थे। मसीह के करुण सन्देश की वास्तविकता का प्रचार-प्रसार कभी भी उन्हें व्यक्तिस्वातंत्र्य के आड़े आने वाला प्रतीत नहीं हुआ। बल्कि उन्हें लगता था कि संघ के भीतर ही व्यक्तिस्वातंत्र्य का सर्वोत्तम रूप सामने आता है। यहाँ स्वतंत्र सत्य के बल से संगठित होती है और अन्दर-बाहर का द्वैत पूर्णतः मिट जाता है। धार्मिकता और नैतिकता का यह संयोग उन्हें ईसाई नैतिकता की स्वाभाविक वैश्विकता प्रतीत होती थी। फ्लेमिश और भारतीय बुर्जुआजी के चरित्र की एकता में बुल्के को जनता के कष्टों के बीज दिखाई देते थे। जनता के कष्टों से निजात के लिए साधन और साध्य दोनों की पवित्रता आवशयक थी। हिंसा को नैतिक रूप से स्वीकार करना बुल्के के लिए असंभव था। साधन और साध्य दोनों की पवित्रता में वह धार्मिकता और नैतिकता की एकता देखते थे।

हिन्दू अवतारवाद में साध्य की पवित्रता से साधन की नैतिकता तय होती है। बुल्के ‘अंत भला तो सब भला’ के विचार को नहीं स्वीकार करते। साधन की अपवित्रता से साध्य भी अपवित्र हो जाता है। साध्य तभी न्यायसंगत हो सकता है जब साधन भी न्यायसंगत हो। साधन और साध्य की इस प्राकृत-कानूनवादी व्याख्या को बुल्के मसीही अवतारवाद की मौलिकता मानते थे। तुलसी के यहाँ हिंसा और युद्ध के बदले आत्मसमर्पण की केन्द्रीयता थी। बुल्के ने कई ऐसे प्रसंगों का ज़िक्र किया है जहाँ तुलसी हिंसा को आत्मसमर्पण की नैतिक सीमा में मोक्ष का कारण बना देते हैं। हिंसा को मुक्ति का कारण बताकर उसे नैतिक बनाने के इस प्रयास में बुल्के भारतीय अवतारवाद की सीमा देखते थे। बुल्के ने भारतीय अवतारवाद और ईसाई मसीही अवतारवाद (इनकार्नेशन) के बीच पांच समानताएं गिनाई हैं:-[28]

  • मसीही और भारतीय दोनों अवतारों का मतलब है- धरती पर ईश्वर का मुक्त प्रवेश।
  • दोनों तंत्र यह बताते हैं कि इस मुक्त प्रवेश से ईश्वर अपना पारब्रह्म चरित्र नहीं खोता। अर्थात् उसकी पारलौकिकता या सर्वभूतात्मकता का लोप नहीं हो जाता। उसका ईश्वरत्व अविकृत रहता है।
  • दोनों तंत्र अवतार के उद्देश्यों में अभिन्न हैं- ‘धर्मसंस्थाप्नाय’। दोनों तंत्रों में ईश्वर के परमप्रेमनिधान और अनंतकरुणानिधान रूप को बहुत महत्त्व दिया गया है। वह मनुष्य की मुक्ति के लिए अवतरित होते हैं और मुक्ति को सरल बना देते हैं। भगवान् मनुष्य का सुखदाता, सखा और सहचर हो जाता है।
  • परमदयालु करुणानिधान के प्रति पूर्ण समर्पण और अवतार के प्रति प्रेममयी श्रद्धा या भक्ति दोनों तंत्रों में है।
  • मोक्ष का अर्थ दोनों जगह अनंतकाल तक भगवान् के साथ आनन्दमय सान्निध्य में है। (बुल्के के अनुसार यह शंकर की वही बात है जहां ‘आत्मचेतना’ लुप्त हो जाती है।)

दोनों तंत्रों के बीच मौलिक अंतर इस प्रकार है:-

नर प्रकृति के यथार्थ को लेकर:

भारतीय अवतार की परम्परा को वह ईसाई धर्म में ‘ईशदर्शन’ (थेईफैनी) की परम्परा की तरह देखते हैं। मसीह पूर्ण ईश्वर और पूर्ण मनुष्य दोनों है; पवित्र त्रित्व का दूसरा व्यक्ति जो ईश्वर और नर प्रकृति को अवधारणा में एक करता है। नर प्रकृति बनती है वास्तविक आत्मा और शरीर से, उसे दुःख या पीड़ा की वास्तविक अनुभूति होती है। वह सीमित और ससीम है। भारतीय अवतार नर प्रकृति के क्षेत्र में कभी वास्तविक नहीं होता। उसका शरीर, जब वह नर रूप में आता है, तब भी वास्तविक हाड़-मांस से बना शरीर नहीं होता बल्कि शुद्ध आध्यात्मिक पदार्थ का बना होता है। इसलिए वह प्रकृति के नियमों से बाहर होता है। वह वास्तविक मनुष्य नहीं होता। इसलिए उसकी सारी पीड़ा, सारे सुख और उसके सारे नैतिक-अनैतिक कर्म सब अभिनय में बदल जाते हैं। अवतार वहां लीला मात्र है। तुलसीदास के यहाँ भी अक्सर इस बात पर जोर दिया गया है कि राम स्वयं कष्ट नहीं भोग रहे बल्कि मंच के अभिनेता की तरह अनुभूतियों का प्रदर्शन मात्र कर रहे हैं और शब्द कह रहे हैं। बुल्के तुलसी को उद्धृत करते हैं:-

भगत हेतु भगवान् प्रभु, राम धरेउ तनु-भूप।

किये चरित पावन परम प्राकृत नर अनुरूप।।

जथा अनेक वेश धरि नृत्य करइ कर करेई ।

सोई सोई भाव देखावाइ, आपुन होइ न सोइ।।

पर बुल्के के अनुसार लोकप्रिय विश्वास में यही चला आया है कि राम का वास्तव में जन्म हुआ था। वह मनुष्यों के बीच जिंदा थे और उन्हीं के बीच उनकी मृत्यु हुई। एक मौके पर तो तुलसी भी अपना दर्शन भूल गए और कहा कि भगतों के हित राम ने अनेक कष्ट झेले हैं:-

राम भगत हित नर तनु धारी।

सहि संकट किए साधु सुखारी।।

हिन्दू दर्शन में यह सर्वस्वीकृत है कि ईश्वर कभी वास्तविक मनुष्य नहीं हो सकता। उसकी प्रकृति कभी नर प्रकृति नहीं हो सकती। अपने इस निष्कर्ष के समर्थन में उन्होंने हिन्दू दर्शन के विख्यात विद्वान् राधाकृष्णन को उद्धृत किया: “एक कष्ट भोगता ईश्वर, काँटों के ताज का देवता कभी धार्मिक आत्मा को संतोष प्रदान नहीं कर सकता।” बुल्के इस मत से पूरी तरह असहमत हैं और कहते हैं कि पिछली बीस सदियों का इतिहास गवाह है कि एक कष्ट भोगता ईश्वर धार्मिक आत्मा को शांति दे सकता है।

बुल्के आगे लिखते हैं कि “क्रिसमस की कहानियां मनुष्यों के हृदय को ज्यादा आसानी से पकड़ लेती हैं बनिस्पत पुनरुथान के आख्यान के; गुड़ फ्राइडे का भावेग मनुष्य हृदय पर अपनी छाप कहीं गहरे छोड़ता है, बनिस्पत ईस्टर सन्डे की महिमा के; ईसाई श्रद्धा सलीब से ज्यादा प्रेरित होती है बनिस्पत मसीह के चमत्कारों से; महान् परीक्षाओं के वक़्त हमें शान्ति स्वर्ग के विचारों से नहीं बल्कि कलवारी के सलीब से मिलती है; सलीब हमें आंसू बहाने पर मजबूर करता है न केवल प्रेम के बल्कि सहानुभूति और करुणा के भी।”[29] जेसुइट मत के साथ-साथ यह बुल्के का अपना अनुभूतिगम्य ईसाई धर्म है। यहाँ चमत्कार या पुनरुत्थान के बदले सहानुभूति और करुणा का जीवन मसीही अवतार के केंद्र में है। ईश्वरीय प्रेम पूरी तरह मसीही अवतार में ही प्रकट होता है। वहां मनुष्य के लिए मनुष्य की तरह मसीह खुद पीड़ा सहता हुआ मनुष्य के जीवन के साथ है। उस मनुष्य के लिए जिसे उसने ‘कुछ नहीं’ से पैदा किया। कृष्ण के चरित्र में ऐसा कुछ नहीं है। आत्मविसर्जन वाला भारतीय प्रेम का आदर्श भी ईसा में ही है।

मोक्ष या उद्धार की प्रकृति:

  •  ईसा ने नरप्रकृति धारण किया और सलीब पर अपने बलिदान द्वारा पाप और मृत्यु से इसे मुक्ति प्रदान किया। इससे मनुष्यों की आत्मा और उसका शरीर दोनों उच्चतर भूमि तक उठ गए और वह दैवीय जीवन में भागीदारी के योग्य हो गए। दैवीय जीवन में भागीदारी को बुल्के ईश्वर के चिर सान्निध्य की तरह देखते हैं। भारतीय अवतार तंत्र में नर प्रकृति के उद्धार की जगह नहीं है और न ही वहां शरीर के पुनरुत्थान की महिमा है। “जैसे ईश्वर मनुष्य नहीं हो सकते वैसे ही मनुष्य (यानी कि मानव प्रकृति) भी कभी ईश्वरत्व नहीं पा सकती।
  •  ईसा ने एक बार विश्व का उद्धार कर हमेशा के लिए उसका उद्धार कर दिया और अंत में सब कुछ ईसा में वापस स्थित हो जाएगा। वह मनुष्य इतिहास का संहार है। दूसरी ओर हिन्दू अवतार तंत्र में विश्व अनादि और अनंत है। वहां अवतारों की ज़रूरत हमेशा बनी रहेगी। अनंत काल तक उसका हर कल्प में आविर्भाव होता रहेगा और हर बार कुछ आत्माएं पुनर्जन्म के बंधन से मुक्ति पाते रहेंगे। भवबंधन में पड़े असंख्य जीवों के साथ यह प्रक्रिया चलती रहेगी।

नैतिक और धार्मिक चरित्र:

  •  नीतिशास्त्र: स्वयं नर प्रकृति में ईसा का जीवन नैतिक जीवन का आदर्श है। इस अर्थ में कर्तव्य के नियमों के पालन का वह जीता जागता उदाहरण है। क्योंकि वह ईश्वर का अवतार था इसलिए पापी नहीं हो सकता था। इस प्रकार वह प्रकृति और चुनाव दोनों ही स्थितियों में पाप-मुक्त था। “आखिर कौन मुझ पर पाप का आरोप लगाएगा?” भारतीय अवतार तंत्र में ईश्वर स्वयं धर्म के अनुपालन से स्वतंत्र है। वह पाप-पुण्य से परे है। वह स्वयं नैतिक मानदंडो से ऊपर और स्वतंत्र है। बुल्के उदाहरण देते हैं- परशुराम ने क्षत्रियों से बदला लेने के लिए २१ बार उनकी हत्या की, वाल्मीकि की कविता में राम का चरित्र उदात्त है पर बाद के प्रक्षेपों और अन्तःक्षेपों में कई बातें उसके चरित्र से जुड़ गयी जो न्यायसांगत नहीं है, जैसे बालि-वध, सीता की अग्नि-परीक्षा आदि। बाद के भक्ति सम्प्रदायों में उन्हें कृष्ण का अनुकरणकर्ता दिखाया गया। कृष्ण का गोपियों के साथ रास कहीं से भी नैतिक नहीं। बुद्ध अवतार तो गलत शिक्षाओं के प्रचार के लिए ही माना गया है। बुल्के लिखते हैं कि धर्म और नीतिशास्त्र का अलगाव भारतीय अवतारवाद का ‘खतरनाक सिद्धांत’ है। भक्ति संप्रदाय के सिद्धान्त में भी इस अलगाव की व्याख्या मिलती है। इस पृथकता के कारण ही कई सारे भक्ति संप्रदाय भ्रष्टाचार के गढ़ बनते गए। इसकी स्वीकृति स्वयं रामानुज के यहाँ है। रामानुज ने कहा था कि यह सही है विष्णु को बारिश से बचने के लिए अपने सहयोगियों के साथ शिव-मंदिर में शरण लेनी पड़ी थी, पर इसका यह मतलब नहीं कि भक्त भी शैवों की मदद ले। रामानुज ने कहा अगर राजा अपनी किसी गणिका के साथ सम्भोग करता है, तो इसका यह मतलब नहीं कि राजा की पतिव्रता स्त्री भी अपने किसी सभासद से सम्भोग कर सकती है। गोविन्दाचार्य ने इसका मतलब बताते हुए कहा कि राजा या भगवान् कोई काम करते हैं तो इसका मतलब यह नहीं कि भक्त भी वैसा ही काम करने को स्वतंत्र है। भक्त हर काम में भगवान् का अनुकरण नहीं कर सकता। बुल्के रामानुज सम्प्रदाय की उस अद्भुत मान्यता का उल्लेख करते है, जहाँ भक्त भगवान् या उनके भक्त को प्रसन्न करने के लिए पाप करता है। रामानुज के अनुरंजन के लिए एक महिला अपना शरीर भी बेचने को तैयार हो जाती है। उसका तर्क था कि “रामानुज जैसे अतिथि के सम्मान के लिए मैं व्याभिचार को भी प्रस्स्तुत हूँ… मैं अपना शरीर बीच कर उस शरीर से उनकी भक्ति करुँगी। क्योंकि स्वयं भगवान् ने कहा है कि- मेरे लिए किये जाने वाले तुम्हारे पाप भी पुण्य हो जाते हैं, जबकि मेरे सन्दर्भ से हीन तुम्हारे सरे गुण भी व्याभिचार मात्र हो जाते हैं।” पतिव्रत और स्त्रीधर्म के इस दुहरे चरित्र को भारतीय भक्ति में और इस प्रकार हिन्दू अवतार तंत्र में जगह प्राप्त है। भारतीय अवतार तंत्र में हर जगह इस धार्मिक और नैतिक द्वैत का पता मिलता है।
  •  धार्मिकता: वास्तविक मनुष्य की तरह ईसा के पास स्वयं की एक अपनी धार्मिकता है। वह पापमुक्त है फिर भी ईश्वर की प्रार्थना करता है। वह सभी वस्तुओं में स्वयं को ईश्वर के प्रति समर्पित करता है। “मैं पिता से आया हूँ”, “मैं पिता में हूँ”, “मैं पिता के पास जाता हूँ”। भारतीय अवतार तंत्र में अवतार के लिए स्वयं साधना की जगह नहीं है। इसलिए वह मनुष्यों की साधना या उसके आध्यात्मिक जीवन की वास्तविक प्रेरणा नहीं हो सकता। न ही धार्मिक और न ही नैतिक आचरण में।

ऐतिहासिकता:

ईसा एक ठेठ ऐतिहासिक चरित्र है और गोस्पेल की कहानियों में उसके जीवन के ऐतिहासिक तथ्यों का पता मिलता है। बुल्के कहते हैं कि ईसा के चरित्र को मिथ बनाने का प्रयास धर्म के दुश्मनों का है ताकि ईसायत को धर्म के नाम पर बुरा-भला कहा जा सके। दूसरी ओर भारतीय अवतार तंत्र में अवतार की सारी कहानियाँ मिथ हैं। बुल्के राम, परशुराम या कृष्ण की ऐतिहासिकता को अस्वीकार न करते हुए भी इनकी कथाओं को बाद की कल्पना और विकास बताया है। इन चरित्रों ने खुद को कभी दैवीय नहीं कहा। रामकथा के ऐतिहासिक विकास का निरूपण कर उन्होंने स्वयं इन कहानियों के विकास समझने की कोशिश की थी। इन कहानियों के बदलाव या फेर-फार के पीछे बुल्के किसी ठोस ऐतिहासिक चेतना का अभाव पाते हैं। अर्थात् इन कहानियों में ऐतिहासिकता की रक्षा के लिए किसी ठोस केन्द्रीय सत्ता का आभाव है।

बुल्के भारतीय अवतारों की कल्पना में एक सच्ची धार्मिक अन्तःप्रेरणा देखते हैं। एक शुद्ध और सहज मानवीय आकांक्षा, जहाँ ईश्वर मनुष्यों के पापमय, दुखमय, कष्टमय जीवन के उद्धार के निमित्त ही धरा-धाम पर अवतरित होता है। यद्यपि यह सही है कि अवतार की कहानियाँ मिथकीय हैं और उनमें ऐतिहासिकता का अभाव है परन्तु “यह वासना, यह अन्तःप्रेरणा, ईश्वर के प्रति यह विश्वास, यह आस्था गलत नहीं है, ईश्वर के अवतार की आकांक्षा में वे सही थे। यहाँ तक कि उनके मिथ भी पूरी तरह गलत नहीं हैं; वे सभी ईसा मसीह में वास्तव हुई हैं। उनके (भारतीयों के) सबसे सुन्दर स्वप्न की अपेक्षा यह यथार्थ कहीं ज्यादा उदात्त है- ईश्वर पूर्ण रूप से मनुष्य बन कर सारी पीड़ा को वास्तव में भोगता हुआ अपनी मृत्यु के बाद सभी मनुष्यों का उद्धार संभव करता है। यह हम पर निर्भर है कि हम अगाध श्रद्धा और सच्ची सहानुभूति के सहारे दिखा पायें कि उनके स्वप्नों का यथार्थ ही हमारा ईसा मसीह है।”[30]

अवतारवाद और अवतार की भक्ति के बारे में ये सारी बातें बुल्के अपने जेसुइट संघ बंधुओं के लिए कर रहे थे। निश्चित रूप से धर्म के प्रचार के लिए सच्ची प्रेरणा ज़रूरी थी, और बुल्के ईसाई धर्म और अपनी जेसुइट व्याख्या का निचोड़ भारतीय और ईसाई अवतार के सिद्धांतों में अंतर करते वक़्त सामने रख रहे थे। दो चीजें जिस पर बुल्के का सबसे ज्यादा जोर है, वह है हिन्दू धर्म में नैतिकता और धर्म का अलगाव तथा अवतार का अवास्तविक या अनैतिहासिक स्वरूप, जिससे प्रेम या भक्ति का वास्तविक इहलौकिक आधार संभव नहीं हो पाता। दूसरे शब्दों में कहें तो रोज़मर्रा के जीवन में शामिल आचार-संहिता का अभाव जो एक ही साथ व्यक्तिगत और सार्वभौमिक दोनों हो। पूर्ण पवित्र आचार-संहिता के इस अभाव के कारण हिन्दू समाज में जाति और वर्णव्यवस्था की जगह बची हुई है, इसे बुल्के और जेसुइट संघ के दूसरे सदस्य बखूबी जानते थे। मिशनरी का काम मुख्यतः समाज के निचले तबकों और जनजाति-आदिवासी जनसंख्या के बीच था। उनके अनुभव में भारतीय वर्णव्यवस्था का चरित्र स्पष्ट था। धर्म और नीतिशास्त्र के पृथकता की चर्चा, हिन्दू धर्म की आलोचना करते समय पीछे भी यूरोपीय प्राच्याविद्याविद और ईसाई मिशनरियां करती आई थीं। यहाँ तक कि शुक्ल जी भी धर्म की चर्चा मुख्यतः नीतिशास्त्र के संबंध में ही करते हैं। उच्च नैतिक मूल्यों के मामले में बौद्ध धर्म का महत्त्व भी यूरोपीय विद्वानों ने स्वीकार किया था। पर बौद्ध धर्म के प्रति शुरूआती आकर्षण धीरे-धीरे मध्यकालीन वैष्णव भक्ति के आकर्षण में बदल गया था। बुल्के जिस समय जेसुइट संघ के आदर्श प्रचारक के रूप में धर्म का उच्च आदर्श सामने रख रहे थे, उसी वक़्त अंबेडकर बौद्ध संघ के पुनरुत्थान और संघ के मिशनरी स्वरूप का आदर्श बताते समय जेसुइट कार्यकर्ताओं का उदाहरण दे रहे थे।[31] बुल्के ने हिन्दू धर्म में सुयोग्य पुरोहित-तंत्र का अभाव देखा था। अंबेडकर भी भिक्षु संघ के पुनरुत्थान के लिए जेसुइट मिशनरी की तरह एक सुयोग्य पुरोहित तंत्र की ज़रूरत महसूस करते थे। विद्वता, सामजिक सेवा, और उच्च नैतिक जीवन के संयोग के बिना भिक्षु संघ की पुरानी महिमा का नवोत्थान अंबेडकर असंभव मानते थे। बौद्ध धर्म के प्रति आस्था के प्रचार के लिए संघ के सदस्यों को जिस निःस्वार्थ सेवा और वैज्ञानिक चेतना को साधना ज़रूरी था, अंबेडकर उसका प्रत्यक्ष उदाहरण एशिया में ईसाई धर्म के प्रचार और उनमें जेसुइट पादरियों या संघ के सदस्यों के योगदान में देखते हैं। ऐसी ही तुलना वह पुराने नालंदा और तक्षशिला के उदाहरणों को सामने रख कर भी करते हैं।

अंबेडकर के लिए धर्म और धम्म के बीच सबसे बड़ा फर्क नैतिकता को लेकर ही था। हिन्दुवाद में धर्म और नैतिकता का अलगाव था जबकि धम्म और कुछ नहीं नैतिकता थी। बौद्ध धर्म नैतिकता की सार्वभौमिकता और भिक्षु-संघ के रूप में नए समाज का निर्माण, इन दोनों को साथ-साथ लेकर चलता है। अंबेडकर धम्म या बुद्धवाद को ‘प्रज्ञा और करुणा’ पर आधारित समानता की वैश्विक संस्कृति का वास्तविक इहलौकीकरण मानते हैं। वहां कोई ईश्वर या अवतार नहीं है। वह शुद्ध विश्वबंधुत्व है जो कि नैतिकता है और वही धम्म है। अंबेडकर भक्ति को राजनीतिक जीवन में ‘व्यक्ति-पूजा’ की प्रवृत्ति की तरह देखते हैं जिसका अंतिम रूप तानाशाही है। उनके अनुसार किसी के प्रति हमारी अगाध श्रद्धा एक चीज़ है लेकिन उसकी आज्ञा का पालन बिलकुल दूसरी चीज़। श्रद्धा किसी उच्च आदर्श के शरीर रूप के प्रति होती है और यह महत्वपूर्ण चीज़ है, जबकि उसका आज्ञापालक होना दासत्व है।[32] हमने पीछे देखा था कि बौद्ध धर्म में हृदय के आभाव और उसके शुष्क बुद्धिवाद को कारण बता कर उसकी लोकप्रियता के ह्रास को समझा गया था। अंबेडकर को बौद्ध पुनरुत्थान के लिए लोकप्रियता एक बड़ी चुनौती लगती थी। बौद्ध भिक्खु संघ के आदर्श विकास के लिए क्या ज़रूरी था और क्यों ज़रूरी था, इसे अंबेडकर स्पष्ट करते हुए सबसे पहली और सबसे महत्वपूर्ण चीज़ बताते हैं- एक बौद्ध बाइबिल का लिखा जाना। दूसरी चीज़ है भिक्खु संघ के उद्देश्य, संगठन और उद्देश्यों को बदलना और तीसरी एक विश्व बौद्ध मिशन की स्थापना। ये सब बातें वह भिक्खु संघ के सदस्यों को संबोधित करते हुए कह रहे थे। अंबेडकर कहते हैं कि हर महान् धर्म आस्था या विश्वास पर टिका है। लेकिन आस्था केवल शुद्ध विमर्श या अमूर्त्त डॉग्मा पर नहीं टिक सकती। शुष्क सिद्धांत कथनों से आस्था पैदा नहीं होती और बिना आस्था के धर्म का प्रचार संभव नहीं होता। कल्पना को टिकने के लिए कुछ न कुछ चाहिए- मसलन कोई मिथक, कोई महाकाव्य या गोस्पेल (जीवनचरित या लीलाचारित)। ‘जिसे पत्रकारिता की भाषा में कहानी कहते हैं’। अमूर्त्त विश्वासों को मूर्त्त किये बिना या किसी रसमय साहित्यिक अभिव्यक्ति के बिना आस्था का टिकना मुश्किल है। इसलिए अंबेडकर को पुराने धम्मपद के बदले एक सरस, प्रवाहमयी, हृदयग्राही और एक ‘सम्मोहिनी शक्ति’ से युक्त, हर जगह अपने साथ रखने सकने योग्य, सुवह्य ‘बुद्ध चरित’ की सख्त ज़रूरत महसूस हो रही थी। वह एक ऐसे ‘बुद्ध-चरित’ में चार चीजें आवश्यक मानते थे। :- १.बुद्ध का संक्षिप्त जीवन परिचय, २. चीनी धम्मपद,३. बुद्ध के कुछ प्रमुख संवाद, ४. बौद्ध उत्सव, जन्म-मृत्यु, विवाह आदि के संस्कार। बाइबिल के गोस्पेल के उच्च साहित्यिक गुणों के बारे में हमने पीछे चर्चा की थी और आस्था के महत्त्व को भी रेखांकित किया था। साहित्यिक आस्था एक चीज़ है और धार्मिक एकदम दूसरी। अंबेडकर धर्म के प्रचार के लिए आस्था और आस्था के लिए साहित्यिकता की भूमिका दोनों महत्वपूर्ण मानते थे। साहित्यिकता धार्मिक आस्था के सन्दर्भ में यहाँ वैसे ही है जैसे बुल्के के लिए। दूसरे शब्दों में, अंबेडकर को भी ‘धर्म की रसात्मक अभिव्यक्ति’ की ज़रूरत महसूस हो रही थी। इस अर्थ में यह भक्ति साहित्य था, और धर्म का प्रचार भक्ति के बिना असम्भव था। भक्ति एक ‘सम्मोहिनी शक्ति’ थी, जो खुद धर्म के वशीभूत थी। बाइबिल का यह रूप बुद्ध को लगभग अवतार बनाता है। ऐतिहासिक तो बुद्ध थे ही।

भिक्खु संन्यासी या साधु की तरह संसार से विरक्त रहने वाला व्यक्ति नहीं होता बल्कि इसी जीवन के भीतर संघर्षरत होता है। इस जीवन के अतिरिक्त उसे किसी पारलौकिकता की कामना नहीं होती। बुल्के जिस अर्थ में कर्मबन्धन और पुनर्जन्म के विश्वास के कारण कर्म की निष्कामता को हिंन्दु धर्म और अवतारवाद का दोष मानते थे, अंबेडकर भी उन्हीं अर्थों में ‘मुक्ति की इहलौकिकता’ के लिए एक ही जीवन और उसी जीवन में मुक्ति के बौद्ध-मत को संघ के भिक्खु का आदर्श बताते हैं। मुक्ति के लिए केवल पैशन नहीं बल्कि धर्म के संगठित प्रचार की सक्रियता ज़रूरी थी। वास्तव में एक नए समाज का निर्माण उनका उद्देश्य था। बुद्ध को इन्हीं अर्थों में संघ की ज़रूरत महसूस हुई थी। अंबेडकर कहते हैं कि साधारण मनुष्य केवल आस्था के सहारे मुक्ति नहीं पा सकता। उसे वास्तविक सामाजिकता में बदलने के लिए ही संघ की स्थापना की गयी है। एक ऐसा मॉडल समाज जससे सामान्य जन प्रेरणा पा सके, शिक्षा पा सकें और धम्म की वास्तविकता में उनकी आस्था दृढ़ होती जाये। दूसरे शब्दों में कहें, तो बौद्ध धर्म का इहलौकिक समाजीकरण संभव हो पाए। यह संपूर्ण धर्मान्तरित सक्रिय समाज का आदर्श बन सके। इसी आवश्यकता के चलते बुद्ध ने संघ की स्थापना की और उसे विनय के नियमों से बाँध दिया। विनय के नियम संघ के सामाजिक जीवन की नैतिक आचार-संहिता थी।

अंबेडकर कहते हैं कि इसके अलावा भी संघ का एक महत्वपूर्ण उद्देश्य था। वह संघ को बौद्धिकों का एक ऐसा संगठन बनाना चाहते थे जो साधारण जनों का सच्चा और निष्पक्ष निर्देशन कर सके। संघ सक्रिय बौद्धिकों का संगठन था। इन बौद्धिकों का काम शुद्ध मनन-चिंतन करना नहीं बल्कि समाज सेवा और धम्म की सच्ची शिक्षा का प्रचार करना है। ये दोनों काम अलग-अलग संभव नहीं हैं। उसी प्रकार वैज्ञानिक चेतना के प्रसार के बिना धम्म की रक्षा और उसका प्रसार असम्भव है। भिक्खु अपने समय के ज्ञान-विज्ञान के अधुनातन निष्कर्षों का और उसकी प्रामाणिकता और सत्यता का प्रचार कर, मिथ्या विचारधाराओं के धुंध को जनता के चित्त से दूर करता है। उनका कहना था कि इस महती उद्देश्य के लिए बुद्ध भिक्खुओं के लिए संपत्ति का निषेध करते हैं। बुद्ध जानते थे कि स्वतंत्र चिंतन और निष्पक्ष विचारों के लिए सबसे बड़ी बाधा संपत्ति थी। जनता की स्वतंत्र सेवा के लिए संपत्ति का त्याग बहुत ज़रूरी था। बुद्ध भिक्खुओं को शादी न करने और आजीवन ब्रह्मचर्य के पालन का निर्देश भी इसी सेवा के लिए देते थे। हालाँकि संघ में स्त्री और पुरुष की समानता का सिद्धांत था। अंबेडकर ब्रह्मचर्य के उच्च आदर्श और स्त्री-पुरुष समानता के सिद्धांत के बीच कोई अंतर्विरोध नहीं देखते थे। वैसे भी बुद्ध के समय तक स्त्रियों को भी संपत्ति माना जाने लगा था!

 बौद्धिकों के सक्रिय संगठन के मॉडल के लिए ही वह जेसुइट संघ से सीखने की सलाह दे रहे थे। अंबेडकर लिखते हैं कि पीड़ित मानवता की सेवा के लिए अगर आज कोई कुछ करना चाहता है तो उसके सामने ‘राम कृष्ण मिशन’ को छोड़ कर और कोई रास्ता नहीं मिलता। ऐसे में संघ की आवश्यकता समाज के अंदर महसूस भी हो रही है लेकिन कोई और उदाहरण समाज के सामने नहीं है। ईसाई मिशनरियों के वह खिलाफ थे क्योंकि वहां भी ईश्वर मौजूद था। धम्म के सिवा विश्वमानवता के सामने कोई और रास्ता संभव नहीं दिख रहा था। इसलिए अंबेडकर हजारों श्रद्धालुओं के बदले थोड़े लेकिन आस्थावान-विद्वान्-सक्रिय भिक्खुओं की परम आवश्यकता को सामने रह रहे थे। उच्च शिक्षित ऐसे भिक्खुओं की एक छवि हम बुल्के में भी देखते हैं जिसकी तरफ अंबेडकर इशारा कर रहे थे। क्या यह केवल संयोग है कि केदारनाथ सिंह के भक्त हनुमान् और अंबेडकर के उच्च शिक्षित भिक्षु दोनों रूपों में बुल्के की छवि हमारे सामने प्रकट होती है !

 बुल्के के लिए नैतिकता पूरी तरह धार्मिक थी। वह राज्य के विकास के साथ इसी धार्मिकता को स्वर्ग के राज्य में रूपांतरित देखना चाहते थे। अंबेडकर की तरह यहाँ भी नैतिकता और धार्मिकता में कोई फर्क नहीं था। धर्म स्वयं में पवित्र और सार्वजनीन नैतिकता है। विश्वबंधुत्व स्वयं नैतिकता है। विश्वबंधुत्व की इस पवित्र नैतिकता के दर्शन बुल्के को तुलसी के मानस में होता है। वह बुद्ध के बदले उत्तरभारत की जनता के बीच इस पवित्र सामान आचार-संहिता की पूर्व-उपस्थिति और उसके सर्वोत्तम विकास का पूर्व-स्वप्न तुलसीदास के यहाँ देखते हैं। उनके लिए तुलसी स्वयं एक आश्चर्य थे। वैसे ही जैसे इवोर ब्राउन के लिए शेक्सपियर।[33]

सन्दर्भ :

[1] फ़ादर क्विराइन, गीदो गैज़ेल, डा. बुल्के स्मृति ग्रन्थ (सं. दिनेश्वर प्रसाद और श्रवण कुमार गोस्वामी), पृष्ट २१२-२१३, डा. बुल्के स्मृति ग्रन्थ समिति, रांची, १९८७

[2] फ़ादर कामिल बुल्के : भारतीय संस्कृति के अन्वेषक, शैल सक्सेना, पृष्ठ १७, प्रिय साहित्य सदन, दिल्ली, २०१४

[3] वही, पृष्ठ ३४

[4] वही, पृष्ठ ३७

[5] बुल्के, ‘एक ईसाई की आस्था, हिंदी प्रेम और तुलसी’, हिंदी चेतना, अंक- जुलाई-अगस्त २००९, पृष्ठ- ३३

[6] बुल्के स्मृति ग्रन्थ, पृष्ट ४३८

[7] वही.

[8] वही, पृष्ठ ४४०

[9] समाज और साहित्य, मुक्तिबोध रचनावली, खंड पांच, पृष्ठ ५४-५५

[10] रामकथा, कामिल बुल्के, पृष्ठ ५७९; हिंदी परिषद् प्रकाशन, इलाहबाद विश्वविद्यालय, इलाहबाद– २०१२

[11] वही, पृष्ठ ५८१

[12] मानस कौमुदी, डा. कामिल बुल्के, डा. दिनेश्वर प्रसाद; पृष्ठ ४-५, अनुपम प्रकाशन, पटना – १९८४

[13] रामकथा, पृष्ठ ५३४

[14] हनुमान् की जन्मकथा, बुल्के, हिंदी अनुशीलन, वर्ष ३, अंक ३, २००७ विक्रमी

[15] रामकथा, पृष्ठ ५४९

[16] वही, पृष्ठ ७८

[17] वही

[18] वही

[19] देखें शेल्डन पोलॉक, द लैंग्वेज ऑफ़ द गॉड्स इन द वर्ल्ड ऑफ़ मेन, विशेष रूप से अध्याय पांच, यूनिवर्सिटी ऑफ़ कैलिफोर्निया प्रेस, लन्दन २००६

[20] रामकथा, पृष्ठ ५९१

[21] बुल्के, हिंदी के प्रति हिंदी भाषियों का कर्तव्य, पृष्ठ ४०

[22] वही

[23] रामकथा एंड अदर एसेज, कामिल बुल्के, (सं.) डा. दिनेश्वर प्रसाद, पृष्ठ १५८, वाणी प्रकाशन, दिल्ली २०१०

[24] बुल्के लिखते हैं कि इन जाति बाह्य वर्गों के आधुनिक उत्तराधिकारी करीब पचास मिलियन की आबादी वाले हैं. बीस मिलियन से अधिक आबादी उन जनजातियों की है जिन्हें आर्य जीत नहीं पाए और जो आने वाली अनेक सदियों तक खुद क आर्यों के संपर्क से दूर जंगलों में अपने आप को बचाती और रहती आ रही हैं. जनजातियों या आदिवासियों की इतिहास विहीन छवि बुल्के के लिए भी मान्य थी. इसके हिसाब से ही वह आदिवासियों की समस्याओं पर विचार करते हैं. देखें, वही, पृष्ठ-१५७

[25] वही, पृष्ठ- १६०

[26] “I have often tried to make them realise their resposibility towards the truth by saying; “You believe in rebirth, I believe that there is no rebirth, one of us is wrong.” When they hear this they are shocked, shake their head and answer: “It is not as simple as all that.”” pp 162

[27] यह बात ध्यान देने लायक है कि ग्राम्शी जेसुइट ईसायत को लोकप्रिय जनता के लिए शुद्ध नार्कोटिक कहते हैं. देखें: प्रिज़न नोटबुक्स. पृष्ठ-३३८.

[28] अवतार एंड इनकार्नेशन, रामकथा एंड अदर एसेज, कामिल बुल्के, (सं.) डा. दिनेश्वर प्रसाद, पृष्ठ -१६८-१९४. वाणी प्रकाशन, दिल्ली २०१०

[29] वही- १७८.

[30] वही.

[31] “We want fewer Bhikkhus and we want Bhikkhus highly educated, Bhikkhu Sangha must borrow some of the features of the Christian priest-hood particularly the Jesuists. Christianity has spread in Asia through service-educational and medical. This is possible because the Christian priest is not merely versed in religious lore but because he is also versed in Arts and Science.”  B.R. Ambedkar in Buddha and Future of His Religion.Published inMay 1950 Vaishaka issue of the Maha Bodhi Society journal. (http://www.clearviewproject.org/engagedbuddhistwriting/buddhaandthefutureof.html)

[33] रामकथा एंड अदर एसेस. पृष्ठ-१४४.

मार्तण्ड  प्रगल्भ

मार्तण्ड प्रगल्भ

छात्र राजनीति और संस्कृति-कर्म में व्यस्त रहने वाले मार्तण्ड प्रगल्भ जे.एन.यू. के भारतीय भाषा केंद्र से पी.एच.डी. हैं. फ़िलहाल  रेडिकल नोट्स कलेक्टिव  के साथ कार्यरत हैं. उनसे mpragalbha1@gmail.com पर संपर्क संभव है.

नंगे-फ़क़ीर सरमद के क़त्ल की दास्तान: कृष्ण कल्पित

सरमद शहीद पर लिखी जा रही लंबी-कविता अथवा काव्याख्यान पूरा हुआ ।

दो महीने से इस मुश्किल काम में लगा हुआ था। इतनी सामग्री इकट्ठा करली कि उसमें फँस के रह गया था। किसी शख़्सियत पर कविता लिखना आसान काम नहीं। चाहे वह पौराणिक हो ऐतिहासिक हो या फिर समकालीन। यह निश्चय ही ज़ोखिम का काम है।

बहुत सी कविताएँ याद आईं । निराला की ‘राम की शक्तिपूजा’, मायकोव्स्की की ‘लेनिन’, धूमिल की राजकमल चौधरी और नागार्जुन की केदारनाथ अग्रवाल पर लिखी कविता । अर्नेस्टो कार्देनाल की मर्लिन मुनरो पर लिखी कविता और बर्तोल्त ब्रेख़्त की Lao Tzu : Legend of the Book Tao-Te-Ching on Lao Tzu’s Road into Exile । ( हालांकि ब्रेख़्त की कविता लाओ त्ज़े पर कम उसकी 81 सूक्तियों की क्लासिक-किताब पर अधिक है )

100 से ऊपर पंक्तियों की कविता  ‘सरमद : जामा मस्जिद की सीढ़ियों पर एक नँगे फ़क़ीर के क़त्ल की दास्तान’ आपके समक्ष है।  #कृष्ण कल्पित

Sarmad by Sadequain

सरमद शहीद से प्रेरित सादेकैन की एक  कृति 

जामा मस्जिद की सीढ़ियों पर एक नंगे-फ़क़ीर के क़त्ल की दास्तान

By कृष्ण कल्पित

उम्रेस्त कि आवाज़-ए-मंसूर कुहन शुद
मन अज़ सरे नो जलवा देहम दारो रसनरा !
( मंसूर की प्रसिद्धि पुरानी हो गई । मैं सूली पर चढ़ने का दृश्य नये सिरे से पैदा करता हूँ । )

(१)

-आप इतने बड़े विद्वान हैं, फिर भी नंगे क्यों रहते हैं ?

दिल्ली के शहर क़ाज़ी मुल्ला क़वी के सवाल के जवाब में सरमद ने कहा :
शैतान बलवान (क़वी) है !

शहर क़ाज़ी को लगा कि सरमद उसे शैतान कह रहा है । मुल्ला की भृकुटियाँ तन ही रही थी कि सरमद ने फिर कहा :
एक अजीब चोर ने मुझे नंगा कर दिया है !

(२)

शहर क़ाज़ी मुल्ला क़वी को आलमगीर औरंगज़ेब ने सरमद के पास भेजा था – उसकी नग्नता का रहस्य जानने के लिये । औरंगज़ेब शाहजहाँ के बाद दारा शिकोह को ठिकाने लगाकर बादशाह बना था । औरंगज़ेब जानता था कि दारा शिकोह सरमद की संगत में था और उसके बादशाह बनने की भविष्यवाणी सरमद ने की थी ।

औरंगज़ेब के दिल में सरमद को लेकर गश था – वह उसे भी दारा शिकोह की तरह ठिकाने लगाना चाहता था लेकिन कोई उचित बहाना नहीं मिल रहा था । औरंगज़ेब जानता था कि बिना किसी वाजिब वजह के सरमद का क़त्ल करने से उसे चाहने वाले भड़क सकते थे – जिनकी सँख्या अनगिनत थी ।

औरंगज़ेब क़ातिल होने के साथ धर्मपरायण भी था और बादशाह होने के बावजूद टोपियाँ सिलकर अपना जीवन-यापन करता था ।

(३)

क़ाज़ी मुल्ला क़वी ने दरबार में उपस्थित होकर सरमद का हाल सुनाया और सरमद की मौत का फ़तवा जारी करने के लिये क़लमदान का ढक्कन खोल ही रहा था कि औरंगज़ेब ने उसे इशारे से रोक दिया और कहा :
नग्नता किसी की मौत का कारण नहीं हो सकती ।

औरंगज़ेब जितना अन्यायप्रिय था उतना ही न्यायप्रिय भी था !

(४)

तब आलमगीर ने अन्याय को न्याय साबित करने के लिये धर्माचार्यों की सभा आहूत की । सरमद को भी बुलवाया गया ।

सर्वप्रथम औरंगज़ेब ने सरमद से पूछा :
सरमद, क्या यह सच है कि तुमने दारा शिकोह के बादशाह बनने की भविष्यवाणी की थी ?

सरमद ने स्वीकृति में सर हिलाया और कहा :
मेरी भविष्यवाणी सच साबित हुई । दारा शिकोह अब समूचे ब्रह्मांड का बादशाह है ।

इसके बाद धर्मसभा के अध्यक्ष सिद्ध-सूफ़ी ख़लीफ़ा इब्राहिम बदख़्शानी ने सरमद से उसकी नग्नता का कारण पूछा । सरमद ख़ामोश रहा । फिर पूछा गया तो सरमद ने वही जवाब दिया जो उसने शहर क़ाज़ी को दिया था :
एक अजीब चोर है जिसने मुझे नंगा कर दिया !

तब ख़लीफ़ा ने सरमद को इस्लाम के मूल सूत्र कलमाये तैयब ( लाइलाहा इल्लल्लाह अर्थात कोई नहीं अल्लाह के सिवा ) पढ़ने के लिये कहा ।

सरमद के विरुद्ध यह भी शिकायत थी कि वह जब भी कलमा पढ़ता है, अधूरा पढ़ता है । अपनी आदत के अनुसार सरमद ने पढ़ा :
लाइलाहा ।

सरमद को जब आगे पढ़ने को कहा गया तो सरमद ने कहा कि मैं अभी यहीं तक पहुँचा हूँ कि कोई नहीं है । आगे पढूँगा तो वह झूठ होगा कयोंकि आगे के हर्फ़ अभी मेरे दिल में नहीं पहुँचे हैं । सरमद ने दृढ़ शब्दों में कहा कि मैं झूठ नहीं बोल सकता ।

बादशाह औरंगज़ेब, धर्मसभा के अध्यक्ष ख़लीफ़ा बदख़्शानी, शहर क़ाज़ी मुल्ला क़वी के साथ समूची धर्मसभा और पूरा दरबार सरमद का जवाब सुनकर सकते में था । ख़लीफ़ा ने कहा :
यह सरासर इस्लाम की अवमानना है, कुफ़्र है । अगर सरमद तौबा न करे, क्षमा न मांगे तो इसे मृत्युदंड दिया जाये

(५)

जब सरमद ने तौबा नहीं की क्षमा माँगने से इंकार कर दिया तो धर्माचार्यों की सभा और बादशाह की सहमति से शहर क़ाज़ी मुल्ला क़वी ने क़लमदान का ढक्कन खोला, उसमें क़लम की नोक डुबोई और काग़ज़ पर सरमद के मृत्युदंड का फ़रमान लिख दिया ।

अपनी मौत का फ़रमान सुनकर सरमद को लगा जैसे वह बारिश की फुहारों का संगीत सुन रहा है । वह भीतर से भीग रहा था जैसे उसकी फ़रियाद सुन ली गई है जैसे उसे अपनी मंज़िल प्राप्त हो गई है ।

सरमद अब कुफ़्र और ईमान के परे चला गया था । सरमद ने सोचा :
कितने फटे-पुराने वस्त्रों वाले साधु-फ़क़ीर गुज़र गये – अब मेरी बारी है ।

(६)

सरमद, तू पूरी दुनिया में अपने नेक कामों के नाते जाना जाता है । तूने कुफ़्र को छोड़कर इस्लाम धारण किया । तुझे ख़ुदा के काम में क्या कमी नज़र आई जो अब तुम राम नाम की माला जपने लगा !

सरमद को अपनी ही रुबाई याद आई और अपना पूरा जीवन आँखों के सामने चलचित्र की तरह घूमने लगा ।

पहले अरमानी-यहूदी, फिर मुस्लिम और अब हिन्दू !

सरमद जब अरब से हिंदुस्तान की तरफ़ चला था तो वह एक धनी सौदागर था । उसे वह लड़का याद आया, जिससे सिंध के ठट्टा नामक क़स्बे में उसकी आँख लड़ गई थी । इस अलौकिक मोहब्बत में उसने अपनी सारी दौलत उड़ा दी। सरमद दीवानगी में चलते हुये जब दिल्ली की देहरी में घुसा तो एक नंगा फ़क़ीर था ।

उसे वे धूल भरे रास्ते याद आये , जिस से चलकर वह यहाँ पहुँचा था ।

और सरमद को उस हिन्दू ज्योतिषी की याद आई जिसने उसकी हस्त-रेखाएँ देखकर यह पहेलीनुमा भविष्यवाणी की थी :

तुम्हारे मज़हब के तीसरे घर में मृत्यु बैठी हुई है!

(७)

अगले दिन सरमद को क़त्ल करने के लिये जामा मस्जिद की सीढ़ियों पर ले जाया गया, जहाँ इतनी भीड़ थी कि पाँव धरने की जगह नहीं थी । कुछ तमाशा देखने तो अधिकतर अपने प्रिय सरमद की मौत पर आँसू बहाने आये थे।जामा मस्जिद की सबसे ऊँची सीढ़ी पर खड़े होकर सरमद ने यह शे’र पढ़ा :

शोरे शुद व अज़ ख़्वाबे अदम चश्म कशुदेम

दी देम कि बाकीस्त शबे फ़ितना गुनूदेम !

( एक शोर उठा और हमने ख़्वाबे-अदम से आँखें खोलीं तो देखा – कुटिल-रात्रि अभी शेष है और हम चिर-निद्रा के प्रभाव में हैं । )

इसके बाद अपनी गर्दन को जल्लाद के सामने झुकाकर सरमद फुसफुसाया :

आओ, तुम जिस भी रास्ते से आओगे, मैं तुझे पहचान लूँगा !

(८)

सरमद का कटा हुआ सर जामा मस्जिद की सीढ़ियों से नृत्य करता हुआ लुढ़कता रहा ।सरमद के कटे हुये सर को उसके पीर हरे भरे शाह ने अपने आगोश में ले लिया । पवन पवन में मिल गई – जैसे कोई विप्लव थम गया हो !

(९)

मुस्लिम इतिहासकार वाला दागिस्तानी ने अपनी किताब में लिखा है कि वहाँ उपस्थित लोगों का कहना था कि जामा मस्जिद की सीढ़ियों से ज़मीन तक पहुँचते हुये सरमद के कटे हुये सर से यह आवाज़ निकलती रही :
ईल्लल्लाह   ईल्लल्लाह  ईल्लल्लाह
और यह भी प्रवाद है कि सरमद के कटे हुये सर से बहते हुये लहू ने जामा मस्जिद की सीढ़ियों पर जो इबारत लिखी गई उसे इस तरह पढा जा सकता था :
लाइलाहा  लाइलाहा लाइलाहा !

(१०)

इतिहास की किताबों में सरमद शहीद का ज़िक़्र मुश्किल से मिलता है लेकिन जामा मस्जिद के सामने बने सरमद के मज़ार पर आज भी उसके चाहने वालों की भीड़ लगी रहती है । यह जुड़वाँ मज़ार है । हरे भरे शाह और शहीद सरमद के मज़ार ।हरे भरे शाह और सरमद । जैसे निज़ामुद्दीन औलिया और अमीर ख़ुसरो । पीरो-मुरीद । एक हरा । एक लाल ।

इन के बीच नीम का एक घेर-घुमावदार, पुराना वृक्ष है जिससे सारे साल इन जुड़वाँ क़ब्रों पर नीम की निम्बोलियाँ टपकती रहती हैं ।

और जब दिल्ली की झुलसा देने वाली गर्मी से राष्ट्रपति-भवन के मुग़ल-गॉर्डन के फूल मुरझाने और घास पीली पड़ने लगती है तब भी सरमद के मज़ार के आसपास हरियाली कम नहीं होती । सरमद की क़ब्र के चारों तरफ़ फूल खिले रहते हैं और घास हरी-भरी रहती है !

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ख़ूने कि इश्क़ रेज़द हरगिज़ न बाशद

( इश्क़ में जो ख़ून बहता है वह कदापि व्यर्थ नहीं जाता ! )

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Krishna Kalpitअपने तरह का अकेला-बेबाक और विवादित कवि । कृष्ण कल्पित का जन्म 30 अक्टूबर, 1957 को रेगिस्तान के एक कस्बे फतेहपुर शेखावटी में हुआ। अब तक कविता की तीन किताबें और मीडिया पर समीक्षा की एक किताब छप चुकी है। एक शराबी की सूक्तियां  के लिए खासे चर्चित। ऋत्विक घटक के जीवन पर एक पेड की कहानी नाम से एक वृत्तचित्र भी बना चुके हैं।  अभी  हाल ही में बाग़-ए-बेदिल नाम से एक विलक्षण  और विशाल  काव्य-संकलन  के साथ-साथ ‘कविता-रहस्य ‘ नामक  पुस्तक प्रकाशित । 

धर्म-दर्शनवादी और उदारवादी राजनीतिक चेतना के कवि केदारनाथ सिंह: उस्मान खान

हिन्दी-साहित्य के इतिहास में केदारनाथ सिंह की स्थिति पर सोचता रहा हूँ। हिन्दी-साहित्य-जगत में उन्होने अपनी अलग पहचान बनाई। वे मुझे विचार-मुक्त कवि लगते रहे हैं। उनके साहित्य की अंतर्धारा – बिम्ब, कल्पना, कथा, स्मृति, परंपरा आदि- किस दिशा में बह रही है, इस पर दोबारा मनन किया तो एक विचारधारा निकल आई, कोई भी साहित्यिक अकेला नहीं होता। केदारनाथ सिंह की भी परंपरा है, घराना है। शायद लोग मेरे इस प्रयास को दूर की कौड़ी मारने का प्रयास समझें, पर कौड़ी खेलने वाले जानते हैं कि कभी-कभी दूर की कौड़ी भी लग जाती है। केदारनाथ सिंह की पहली पुस्तक जो मैंने पढ़ी, वह थी – ‘हिन्दी-कविता में बिम्ब-विधान’। फिर केदारनाथ सिंह की प्रतिनिधि कविताएं पढ़ीं, और उनके व्यक्तित्व और कृतित्व के बारे में सुनता-पढ़ता रहा। अब उनकी मृत्युपरांत पत्र-पत्रिकाओं, ब्लॉग, इंटरनेट पर टिप्पणियाँ और विचार पढ़ रहा हूँ। पर उन पर कभी लिखूंगा ऐसा सोचा नहीं था। संपादक-मित्र उदय शंकर ने सुझाया या बरगलाया; मैं सोचने लगा… #लेखक

kedarnath singh

साभार : साहित्य  अकादमी  आर्काइव्ज  वाया  यूट्यूब

केदारनाथ सिंह की मृत्यु पर….

By उस्मान खान

हिन्दी-साहित्य-जगत में केदारनाथ सिंह किसी परिचय के मोहताज नहीं। उन्हें १९८९ में साहित्य अकादमी सम्मान और २०१३ में भारतीय ज्ञानपीठ सम्मान मिला। केदारनाथ सिंह का मान है, सम्मान है, घराना है, परंपरा है, पर ऐसे व्यक्ति की मृत्यु पर भी छींटाकशी करने वाले कहाँ चूकते हैं। इंटरनेट के इस दौर में भावभीनी विदाई देने वाले बहुत दिखे – पता चला वे कईयों के प्रिय कवि थे। पाठक-समीक्षक अक्सर ही अपने प्रिय कवियों की सूची बनाते चलते हैं।

भावुक समर्थकों ने उनकी महानता और काव्य-वैभव पर वैसे ही लिखना शुरू कर दिया, जैसा कुँवर नारायण की मृत्यु पर लोगों ने लिखा था या जैसा मुक्तिबोध की जन्म-शताब्दी पर लोग लिख रहे हैं। पाठक-समीक्षक में कुछ लिखने-कहने का भावनात्मक-उन्माद पैदा होना अचरज नहीं, अपने प्रिय कवि की मृत्यु या जन्म-मृत्यु-शताब्दी वगैरह ऐसे अवसरों को बढ़ा देती हैं। पर वहीं केदारनाथ सिंह पर छींटाकशी भी होने लगी। उनके व्यक्तित्व और कृतित्व का विश्लेषण तेज़ हुआ, तर्क-वितर्क चलने लगा। युवा कवि-समीक्षक अविनाश मिश्र का लिखा पढ़ा, फिर कवि-समीक्षक कृष्ण कल्पित का लिखा पढ़ा। दोनों ने ही अपने मन की गुत्थी ही सामने रखी है। केदारनाथ सिंह के व्यक्तित्व के बारे में अलग जानकारी इस लिखे में मिल सकती है, लेकिन उनके कृतित्व की उपेक्षा की गई है।

कृष्ण कल्पित ने बनारस कविता को केंद्र में रखकर अपनी बात कही है, उन्हें कविता शायद इसलिए पसंद नहीं कि वे बनारस पर और भी अच्छी रचनाएँ पढ़ चुके हैं, उन्होंने बनारस पर अपना पसंदीदा साहित्य भी बताया है। उनके लिखे का मूल यह है कि केदारनाथ सिंह की कविता में वर्णित बनारस गीता प्रेस के कैलेंडर की तरह है। बात ताने की तरह लगती है, लेकिन फ़िलहाल इसे ही उनकी कविताओं में घुसने का प्रारम्भ-बिन्दु बनाते हैं।

साहित्य में बिम्ब एक भाव-विचार या चरित्र या दृश्य होता है, साथ ही यह भाव-विचार या चरित्र या दृश्य गतिशील होता है। प्रत्येक बिम्ब भाव-विचार-श्रंखला या दृश्यावली होता है। बिम्ब से अर्थ उस कला-उत्पाद से है, जो विशेष दृश्य-बोध को प्रस्तुत करता है। केदारनाथ सिंह की कविताओं में ‘बिम्ब की अवधारणा’ का केंद्रीय महत्त्व है, बिम्ब-विधान पर उन्होंने लिखा भी है, लेकिन उनकी अधिकांश कविताओं में कोई बिम्ब-विधान दिखाई ही नहीं देता, शायद एक समय के बाद वे भाषा-शैली और कथाओं पर अधिक ध्यान देने लगे थे, बिम्ब-विधान के निर्माण का प्रयास वे करते रहे, उन्होने लंबी कविताएं भी साधीं, लेकिन तब भी बहुत कम कविताओं में वे कोई नया बिम्ब-विधान प्रस्तुत कर पाए हैं। कविता में कथा कह देना एक बात है और बिंबों के माध्यम से कथा कहना दूसरी बात। केदारनाथ सिंह ने ‘मंच और मचान’ में एक कथा प्रस्तुत की है, यह कथा स्वयं में एक बिम्ब हो सकती है, लेकिन यह बिंबों से रची कविता नहीं है। उनकी कविताओं में बिम्ब अलबत्ता हैं, पर छिन्न-भिन्न या ढीले-ढाले ढंग से जुड़े हुए। उन्हें अगर मजबूती से जोड़ा जाए, तो एक धारा प्रवाहित होती दिखती है। अगर आप उन्हें जोड़ने में असमर्थ रहे तो आप उनकी धर्म-दर्शनवादी उदारवादी राजनीतिक चेतना को नहीं जान पाएँगे न ही यह देख पाएँगे कि वे बिम्ब-निर्माण में कुशल नहीं थे।

अपनी विशेष भाषा-शैली के निर्माण में भी वे असमर्थ रहे। आधुनिक बिम्ब-विधान भाव-विचार के तनाव पर स्थिर रहता है। एक दृश्य, जिसमें विचार और प्रति-विचार का खिंचाव स्थिर हो जाता है। केदारनाथ सिंह के बिंबों में चित्रित भाव-विचार लचर हैं, लाचार हैं – व्यवस्था और शक्ति वहाँ नहीं। आधुनिक अंग्रेजी कविता को एजरा पाउंड और टी. एस. इलियट ने जैसे शक्तिशाली बिम्ब दिए या जिस तरह मुक्तिबोध, शमशेर और राजकमल चौधरी ने हिन्दी-कविता को पूंजीवादी भारत की शहरी सभ्यता के ठोस बिंबों से समृद्ध किया, वहीँ केदारनाथ सिंह जीवन भर बिम्ब-साधना करते हुए भी नए बनते भारत को कविता में प्रस्तुत करने में असमर्थ रहे। उनकी कविता प्राक-पूंजीवादी युग में ही शरण ढूंढती रही, मामला तुलसीदास का हो या कबीरदास का। वे आधुनिक युग की जीवन-स्थितियों से कतराते रहे। साहित्य में बिम्ब-निर्माण नया नहीं है, साहित्य भाव-विचार या चरित्र या दृश्य निरूपण का कार्य ही तो करता आ रहा है। सवाल है इन बिंबों की गति का, संकरी ही सही, पर इनकी धारा का, इन बिंबों में व्याप्त विविधरंगी फूलों की माला तैयार करने का।

बनारस कविता भी अस्त-व्यस्त बिंब ही प्रस्तुत करती है। मैंने गीता प्रेस का कैलेंडर नहीं देखा, उसमें भी बनारस होगा, पर केदारनाथ सिंह की कविता का बनारस, बनारस के टूटे-फूटे दृश्य दिखाता है। किसी दृश्य में कोई आंतरिक संघर्ष नहीं, हर दृश्य जैसे जड़ है, लेकिन प्रत्येक दृश्य अगले दृश्य से जुड़ जाता है, इन दृश्यों या दृश्यावली का कोई आंतरिक संघर्ष नहीं दिखता, संबंध ज़रूर दिखता है। बनारस कविता इस लिहाज से अच्छी है कि इन टूटे-फूटे दृश्यों को तार्किकता से जोड़ने पर एक विचार-श्रंखला, एक दृश्यावली प्रस्तुत होती है, जो केदारनाथ सिंह के समूचे साहित्य को अपने में समेट लेती है। वह बात जो अनकही रह गई। इस कविता में केदारनाथ सिंह के साहित्य की अंतर्धारा, उनकी साहित्य-परंपरा आसानी से दिखाई देती है। इस कविता का बनारस पूंजीवादी शहरीकरण की चपेट से बाहर खड़ा है, वह यथार्थ है, लेकिन ऐसा यथार्थ जिसे ‘तुलसीदास’, ‘धीरे-धीरे’, ‘आधा’, ‘स्तम्भ’, ‘अर्घ्य’ के बिंबों, स्मृतियों से रचा गया है। प्रेमचंद भी बनारस से अनजान नहीं थे, लेकिन उनके उपन्यासों में शहर का नक़्शा कुछ और है। रंगभूमि में वे लिखते हैं–

शहर अमीरों के रहने और क्रय-विक्रय का स्थान है। उसके बाहर की भूमि उनके मनोरंजन और विनोद की जगह है। उसके मध्य भाग में उनके लड़कों की पाठशालाएँ और उनके मुक़दमेबाज़ी के अखाड़े होते हैं, जहाँ न्याय के बहाने गरीबों का गला घोंटा जाता है। शहर के आस-पास गरीबों की बस्तियाँ होती हैं।[i]

हो सकता है प्रेमचंद एक आदर्श पूंजीवादी नगर की बात कर रहे हों, लेकिन बनारस भी शहर है, जो आधुनिक-काल में निरंतर विस्तार पाता गया है, प्रेस और विश्वविद्यालय हों या नए कटते प्लॉट और कॉलोनियाँ; और उसका एक हिस्सा पुराना होने के नाते कई स्मृतियाँ अपने में सँजोए है। हिन्दी-क्षेत्र का एक प्रमुख साहित्यिक केंद्र बनारस रहा है। मामला स्मृतियों का नहीं, स्मृतियों को छांटने का है, चुनने का है। स्मृतियों के आपसी संघर्ष का है। केदारनाथ सिंह स्मृति के बिम्ब तैयार करते जाते हैं, लेकिन यह स्मृति विशेष है। इसमें उनका चुनाव है। केदारनाथ सिंह के लिए बनारस का धार्मिक महत्त्व अधिक है। बनारस एक नहीं कई सभ्यताओं का केंद्र रहा है, ढोंग और पाखंड की सभ्यता के भव्य-बिम्ब वे तैयार करते हैं, लेकिन बाह्याडंबर और अन्याय के विरोध की सभ्यता का कोई बिम्ब इस कविता में नहीं। तुलसीदास के साहित्य का महत्त्व अपनी जगह, पर क्या बनारस में तुलसीदास से बहुत पहले कबीर नाम का जुलाहा नहीं था और उसी समय का एक रैदास नाम का ‘खालिस चमार’ नहीं था। इन्हें उनकी कविता छूती भी नहीं। क्या इस शहर में विशेष धर्म-दर्शन का संगम ही इन बिंबों का विधान है, अगर है, तो क्या केदारनाथ सिंह रूमानी-यथार्थवादी धारा में नहीं हैं?

रूमानी-यथार्थवाद रूमानवाद और आधुनिकतावाद के साथ यथार्थवाद के वाद-विवाद-संवाद में जन्मा था, और अंततः हिटलर के प्रचार-प्रमुख गोएबेल ने उसका आदर्श रूप प्रस्तुत किया था। उसने रेडियो और सिनेमा को फासीवादी राजनीति के प्रचार का माध्यम बनाया। यह बात भी ध्यान देने योग्य है कि उसने वर्ष १९२१ में अपनी पीएच.डी. रूमानवादी नाटककार क्रिश्चियन विल्हेल्म फॉन शुत्स पर की थी। तब तक रूमानवाद का साहित्यिक धारा के रूप में अंत हो चुका था और आधुनिकतावाद के नाम पर धर्मशास्त्रों का आधुनिक-साहित्यिक पुनर्पाठ चालू हो चुका था। रूमानवाद और आधुनिकतावाद की धार्मिक-दर्शनवादी धारा का संयोजन फासीवादी रूमानी-यथार्थवाद के रूप में सामने आया था।

रूमानवादी साहित्य-धारा १८००-१८५० तक प्रभावी रही, इसके बाद १८५० से यथार्थवादी साहित्य-धारा का पदार्पण हुआ, इसने रूमानवादी साहित्य-धारा के विरोध में अपने कई सिद्धान्त तैयार किए थे, १९०० से आधुनिकतावादी साहित्य-धारा का प्रवेश होता है। इन तीनों ही धाराओं को यूरोप के पूंजीवादी शहरों के प्रति-साहित्य के रूप में देखा जा सकता है। पूंजीवादी-व्यवस्था का विरोध तीनों धाराओं में है। लेकिन इस व्यवस्था के अंत और नए समाज के निर्माण का संकल्प प्रायः मार्क्सवादी साहित्यिकों में ही देखा जा सकता है। केवल मार्क्सवादी साहित्यिक ही ऐसे कहे जा सकते हैं, जिनहोने इन शहरों में नई आशा और भविष्य-स्वप्न देखा।

रूमानवादी साहित्यिक आधुनिकता-विरोधी थे, उद्योगिकरण और आधुनिक शहर उसके लिए अभिशाप थे, प्रकृति और लोक-जीवन उसके पूज्य थे और कल्पना (बिम्ब, फेंटेसी, आख्यान आदि इसमें सम्मिलित होते चले गए) वरदान। वे नई जीवन-स्थितियों से भागते थे। यथार्थवादी साहित्य रूमानवाद के विरोध में खड़ा था। यथार्थवादी साहित्यिक समाज का ‘वास्तविक’ चित्रण करने पर ज़ोर देते थे। वर्ग-स्थिति और वर्ग-व्यवहार का निरूपण उसका प्रमुख कार्य था। नई जीवन-स्थितियों ने उसके पुराने बंधन खोल दिए थे। एक तरफ़ भाव-विचार-अनुभव की कल्पना थी, तो दूसरी तरफ़ भाव-विचार-अनुभव की मांसलता। रूमानवाद के प्रचारक प्रायः धर्म-दर्शन शास्त्री थे, यथार्थवाद के प्रायः मार्क्सवादी। यथार्थवाद के प्रभावी होने के साथ ही, रुमानवादी धारा का एक तरह से अंत हुआ और आधुनिकतावादी-साहित्य के भी बीज पड़े।

२०वीं सदी के प्रारम्भ में एज़रा पाउंड और टी.एस. इलियट आधुनिकतावादी-साहित्य के प्रमुख प्रचारक के रूप में उभरते हैं। बिम्ब की अवधारणा साहित्य-चर्चा के केंद्र में उपस्थित होती है, साथ ही धर्मशास्त्र और पुराणों का आधुनिक स्थितियों के अनुकूल पाठ करने का प्रयास शुरू होता है, फोकलोर में विशेष दार्शनिक संकल्पनाएँ खोजी जाने लगती हैं। कल्पना और फंतासी, परंपरा और प्रतिभा, प्रकृति और लोक-जीवन पर चर्चा को नई दिशा मिलती है। आधुनिकतावाद का यथार्थवाद से संघर्ष शुरू होता है, इस संघर्ष ने दुनिया भर के साहित्यिकों को दो खेमों में बाँट दिया था– ‘काफ्का या थॉमस मान’। लेकिन यह नहीं भूलना चाहिए कि २०वीं सदी में आधुनिकतावाद भी दो प्रबल धाराओं में विभक्त होता चला गया– धर्म-दर्शनवादी और मार्क्सवादी। आधुनिकतावादी धर्म-दर्शनवादी कवि प्राक-पूंजीवादी युग में अपना आदर्श खोजता है, आधुनिकतावादी मार्क्सवादी कवि वैज्ञानिक समाजवाद में। विचार दोनों के यथार्थवादी हैं। जहाँ आधुनिकतावादी-साहित्य अपने यथार्थवादी-मूल से उखड़ जाता है, वह रुमानवादी साहित्य बन जाता है, या कभी प्राक-पूंजीवादी साहित्य में तब्दील हो जाता है। आधुनिकतावादी-साहित्यिक यथार्थ को नकारता नहीं, वरन उसकी विशेष कल्पना करता है। व्यक्ति और समाज का उपचेतन स्तर उसकी फैन्टेसी का मुख्य विषय है। वास्तव में, यथार्थ की कल्पना कैसी हो? इस प्रश्न पर ही आधुनिकतावादी साहित्य में भेद पैदा होता है। धर्म-दर्शनवादी कल्पना और मार्क्सवादी कल्पना पूंजीवादी शहरों के यथार्थ का एक-सा रूप प्रस्तुत नहीं करती।

इस संबंध में लुकाच-ब्रेख्त-चर्चा उल्लेखनीय है। लुकाच आधुनिकतावादियों के धर्मदर्शनवादी उपचेतन पर ज़ोर देते हैं, तो ब्रेख्त उनकी तकनीकों के मार्क्सवादी प्रयोग की संभावना पर। जहाँ यथार्थवादी-साहित्य में बाह्य-स्थितियों या वस्तु-जगत के वर्णन पर अधिक ध्यान होता था, वहीं आधुनिकतावादी-साहित्य ने मन:स्थितियों को साहित्य-उत्पादन के केंद्र में ला खड़ा किया। औद्योगिक शहरों के निर्माण और पूंजीवादी विकास से उभरे भय और संताप ने, धर्म-हानि के प्रचार ने आधुनिकतावादी-साहित्य के निर्माण की भूमिका बनाई। मानव-अस्तित्त्व का नई सभ्यता से सामना ‘ईश्वर की मृत्यु’, ‘सभ्यता का पतन’ जैसे फ़िकरों को पैदा करने लगा। लेकिन कुछ ही समय में इन नई स्थितियों से जन्मी आशा और उत्साह ने भी साहित्य में स्थान पाया। ‘नई सभ्यता’ और ‘नए मनुष्य’ की चर्चा होने लगी। यांत्रिक पुनरुत्पादन की व्यवस्था और उपभोक्तावादी सभ्यता के उदय ने प्राचीन-साहित्य की दुर्लभता को नष्ट किया और इस प्रक्रिया में उसकी पवित्रता को भी। प्राचीन का पतन और नए का उदय साहित्यिकों को सभ्यता-समीक्षा की ओर ले गया, अभिव्यक्ति के नए तरीकों और आधुनिक ‘सौंदर्य-मूल्यों’ की खोज की ओर। यह स्थिति १९वीं सदी के अंतिम दशकों और २०वीं सदी के प्रारम्भिक दशकों के यूरोप की थी। हिन्दी-कविता में आधुनिकतावादी-धर्म-दर्शनवादी-साहित्य-धारा और आधुनिकतावादी-मार्क्सवादी-साहित्य-धारा का संघर्ष ४० के दशक में शुरू होता है। ‘तार-सप्तक’ इसका प्रारम्भ-बिन्दु है।

साहित्य में यथार्थ का वर्णन एक विशेष स्थिति में क्रांतिकारी था, जब यूरोप १९वीं सदी के उत्तरार्द्ध में था। २०वीं सदी के प्रारम्भ में आधुनिक शहरों में बदलते सामाजिक-संबंध साहित्यिक को भी नए भाव-विचारों, बिंबों के संपर्क में ले आए। दुनिया भर में नई इमारतों, मशीनों और लोकतान्त्रिक तथा वैज्ञानिक सोच के विकास ने एक ऐसे समाज को जन्म दिया, जो पहले कभी नहीं था। यह पूंजीवादी सभ्यता के संपर्क में आने पर पूरी पृथ्वी पर हुआ। निश्चित ही २१वीं सदी में भी यह परिवर्तन जारी है, भारत के करीबी नेपाल में राजशाही का अंत २१वीं सदी में जाकर ही हो पाया है, कुर्दिस्तान के लोग अब भी एक नए वि-राज्य की संकल्पना के लिए लड़ रहे हैं। १९वीं और २०वीं सदी में भी इन नए भाव-विचारों और बिंबों ने नई कल्पना और भाषा की खोज की थी। आज भी नए भाव-विचार साहित्यिकों को नई कल्पना और भाषा की खोज में लगाए हुए हैं। सवाल तब भी यथार्थ का था, आज भी यथार्थ का है – साहित्य में यथार्थ के पुनर्प्रस्तुतिकरण का है।

यथार्थ को स्वीकारते हुए भी, अद्भुत, अकल्पनीय और शक्तिशाली रचना आधुनिकतावादियों की विशेष पहचान बनी। इसने साहित्य-रचना की नई समझ तैयार की। आधुनिकतावादी-धर्म-दर्शनवादी-साहित्य मानव-मूल्यों के पतन के दृश्य निरूपित कर, सर्वशक्तिशाली-पुरुष में आस्था की ओर ले जाता है। वह पूंजीवादी-सभ्यता के सामने असहाय खड़े व्यक्ति की सर्व-शक्तिमान-पुरुष के सामने की गई प्रार्थनाएँ हैं। इससे अलग आधुनिकतावादी मार्क्सवादियों का ध्यान इस पर रहता था कि कल्पना, पुराण, स्मृति आदि के प्रयोग से वर्णन में रुचि पैदा हो, साहित्य सरस बना रहे साथ ही वर्गीय-वास्तविकता और साहित्य की परिवर्तनकारी शक्ति का ह्रास न हो। उनको आशा थी कि नई जीवन-स्थितियों से उभरा, नई और प्रभावशाली तकनीकों से निर्मित साहित्य वर्ग-संघर्ष को तेज़ करने में अधिक सहयोगी होगा। उनका मत था कि साहित्य राजनीति के रण-क्षेत्र में प्रवेश करे, लेकिन अपनी सेना के साथ। साहित्य में राजनीति का सहयोग करने की शक्ति होनी चाहिए। साहित्य में प्रभावित करने की क्षमता होनी चाहिए, लेकिन प्रभाव के लिए यथार्थ का रहस्यीकरण करना साहित्यिक को धर्म-दर्शनवादी धारा में ला खड़ा करता है। समीक्षक की भी यही स्थिति होती है, यदि वह जड़-सौंदर्यबोध से ग्रसित है। समस्या रूमानियत या यथार्थ से नहीं, बल्कि विशेष राजनैतिक दृष्टि से होती है, जो मानव-मूल्यों के ह्रास से जन्म लेती है, हिंसा और उपभोग की संस्कृति के प्रभावी होने से सामने आती है। समस्या आधुनिकता से नहीं, पूंजीवादी आधुनिकता से है, शहरों से नहीं पूंजीवादी शहरों से है, धर्म-दर्शन से नहीं, धर्म-दर्शन के अफ़ीम से है।

यहाँ यह नहीं भूलना चाहिए की उपरोक्त साहित्यिक वाद और आंदोलन शहरों में साहित्यिकों के संगठित होने के कारण पैदा हुए थे, कई साहित्यिक अपने को वाद और आंदोलन से मुक्त कहते रहे, पर आधुनिक शहरों में जीवन-यापन करना और उनमें पैदा हो रही नई स्थितियों और सौंदर्य-मूल्यों से मुक्त रहकर साहित्य-उत्पादन करना असंभव था। केदारनाथ सिंह भी विचार-मुक्त कवि लगते हैं, लेकिन यह असंभव था कि उनका साहित्य नई उत्पादन-स्थितियों से भी बचकर निकल जाता। उस पर भी विभिन्न वादों और आंदोलनों का प्रभाव है। उपरोक्त तीनों प्रमुख वाद साहित्य के अतिरिक्त अन्य कला-माध्यमों में भी प्रारम्भ और प्रभावी हुए। १९वीं और २०वीं सदी में विश्व-भर में रूमानवाद, यथार्थवाद और आधुनिकतावाद के वाद-विवाद-संवाद में प्रचुर साहित्य-उत्पादन हुआ। हिन्दी का आधुनिक-साहित्य भी इसका अपवाद नहीं। यह वाद-विवाद-संवाद  सर्रियलिज़्म, फ्यूचरिज़्म और एंटी-पोएट्री से लेकर सिचूएशनिस्ट, जादुई यथार्थवाद और उत्तर-आधुनिकतवाद तक विभिन्न नई साहित्य-धाराओं के निर्माण में सहयोगी बनी, हिन्दी में भी नई कविता, अकविता, जादुई प्रभाववादी, अस्मितावादी आदि साहित्य-धाराओं के निर्माण में इस संघर्ष ने सहयोग किया।

आधुनिक-साहित्य के अंतर्गत यथार्थ का रहस्यीकरण और यथार्थ का पुनर्प्रस्तुतिकरण दोनों कार्य हुए। जबकि ये दोनों एकदम भिन्न प्रक्रियाएँ हैं। यथार्थ के वर्णन में, कल्पना और भाषा-शैली का महत्त्व नकार देने पर साहित्य अपनी साहित्यिकता खो देता है, लेकिन यह याद रखना चाहिए कि आधुनिक-साहित्य का मूल विषय पूंजीवादी-सामाजिक-संबंध हैं, उससे अलग होते ही वह प्राचीन साहित्य की नकल भर रह जाता है। पुराण का साहित्यिक-प्रयोग पुराण रचने से अलग है। लू शुन ने इस प्रक्रिया पर लिखा है। उन्होने चीन की पौराणिक कहानियों का आधुनिक पुनर्प्रस्तुतिकरण भी किया है।

केदारनाथ सिंह २०वीं सदी के उत्तरार्द्ध के प्रारम्भ से प्रायः अब तक साहित्य-उत्पादन करते रहे थे। उन पर इन विभिन्न वादों और आंदोलनों का असर पड़ना आश्चर्य की बात नहीं। उनकी पुस्तक ‘हिन्दी-कविता में बिम्ब-विधान’ जब प्रकाशित हुई, तब तक हिन्दी-साहित्य में बिम्ब, फेंटेसी, कल्पना, परंपरा, पुराण, स्मृति, भविष्य-कल्पना आदि यूरोपीय आधुनिकतावादी-साहित्यिक-अवधारणाएँ चर्चा का विषय बन चुकी थी। केदारनाथ सिंह ने ‘तीसरा सप्तक’ के अपने वक्तव्य में ज़ोर देकर कहा कि कविता में मैं सबसे अधिक ध्यान देता हूँ बिम्ब-विधान पर, लेकिन न तो ‘तीसरा सप्तक’ में न ही बाद में वे अपनी बात पर खरे उतरते हैं। बिंबों की शिथिलता उनके साहित्य में जीवन भर बनी रही। वे कोई बिम्ब-विधान नहीं रच पाए। ‘बाघ’ कविता में भी बिंबों और वक्तव्यों का बिखराव ही लक्षित होता है। कोई विधान है क्या वहाँ? और अगर है, तो क्या वह रूमानी-यथार्थवादी विधान ही नहीं है? बुद्ध-कथा पढ़कर कोई भी समझ सकता है कि विद्वान-प्राध्यापक-कवि किस युग में जी रहा है। बुद्ध-संबंधी उसकी कल्पना क्या है? वह आज से भय खाकर कल के वीर को देखते हैं। बुद्ध उन्हें ठीक ही दिखाई देते हैं, लेकिन वे गर्दन झुकाकर निकल जाते हैं, आश्चर्य! ये कौन-से बुद्ध हैं? बुद्ध हैं या कोई आधुनिक आरामतलब साहित्यिक, जो ख़तरा देखते ही दुम दबाने लगता है? माना कि बुद्ध-संबंधी साहित्य का अध्ययन-मनन २०वीं सदी में जाकर ही ठीक से शुरू हुआ, लेकिन जब तक केदारनाथ सिंह ‘बाघ’ लिखते, बुद्ध-साहित्य का पर्याप्त अध्ययन-मनन हिन्दी में भी उपलब्ध हो चुका था, दिल्ली में तो और आसानी से उपलब्ध हो जाता होगा। देखने वालों को तो ‘मुँह नज़र आते हैं दीवारों के बीच’।

थे या नहीं, मैं नहीं जानता, लेकिन उनके साहित्य का बहुलांश उसी धारा को समृद्ध करता है। वे यथार्थवादी स्थितियों में रूमानी भाव-विचार तैयार करते हैं। कल्पना-भावना, स्मृति-परंपरा के नाम पर यथार्थ का रहस्यीकरण करते हैं। केदारनाथ सिंह ऐसा क्यों करते हैं? क्या नाम, सम्मान, परंपरा, घराने के लिए? अपनी परंपरा की खोज में उनकी कविताएं बनारस और दिल्ली के आभिजात्य-वर्ग की स्मृति से अधिक कुछ और नहीं निर्मित करती। उन्हें जो चुनना था, उन्होने चुना और उनकी कविताओं पर इसका असर पड़ा, उनकी कवितायें रूमानी यथार्थवाद की शिकार होती चली गईं। मैं यह नहीं कहता कि वे सड़क पर भूखों मरते या मार्क्सवादी होते तो उनकी कविताएं महान हो जातीं, या वे मेरे प्रिय कवि हो जाते। पर क्या कारण है कि ८३ वर्ष के जीवन में लिखा गया उनका अधिकांश साहित्य एक-सा है? केदारनाथ सिंह की प्रतिबद्धता बिम्ब के प्रति है, लेकिन एक साहित्य-उत्पादक के रूप में वे रूमान और यथार्थ के तनाव के बिम्ब ही निर्मित कर पाते हैं और दया और भीरुता के भाव-विचार। वे कभी-कभी ही अपनी बात स्पष्ट करते हैं, वह भी कथा या स्मृति के बिम्ब खींचते वक़्त। यह कहने का एक ढंग हो सकता है, लेकिन वह जो कहते हैं, उसमें एक दिशा निर्मित होती जाती है। और वह दिशा मानव-मूल्यों के ह्रास की उपेक्षा की है, मानव-मूल्यों की उच्चता से सहम जाने की है। साहस और सृजनशीलता के बिना साहित्यिक भय और जड़ता से ग्रस्त हो जाता है। भय और जड़ता उसके समक्ष अतीत-गौरव-गान और प्रकृति-वर्णन के अतिरिक्त कोई रास्ता नहीं छोडते। उनकी प्रतिबद्धता वर्तमान समाज या राजनीति के प्रति क्यों नहीं है? क्या साहित्य और समाज के सम्बन्धों को वे नहीं जानते? या जान-बुझकर उपेक्षित करते हैं? उनकी रचनाओं में समाज और साहित्य का संबंध अगर है तो अवैध है, अपवित्र है। ऐसे अवैध सम्बन्धों से जन्मे बिम्ब देखकर उनकी कविताओं का डी.एन.ए. टेस्ट न करें, वे उन्हीं की संतान हैं लेकिन अवांछित। यथार्थ रूमान के आवरण में क्या बाघ कविता जैसा नहीं लगता?

साहित्यिक जब तक जीवित होता है, वह विश्व में अपनी भूमिका और साहित्य-रचना के विषय और रूप में बदलाव कर सकता है। बदलाव की यह संभावना या आशंका मृत साहित्यिक खो देता है। साहित्यिक की मृत्यु उसके किए और कहे-लिखे पर पुनर्विचार के लिए प्रेरित करती है। साहित्यिक अपने जीवन में भी बदलता है। उसके भाव-विचार, कल्पना-क्षमता, भाषा-शैली आदि बदलते हैं। मृत्यु साहित्यिक के व्यक्तित्व और कृतित्व में बदलाव को रोक देता है। लेकिन कुछ साहित्यिक जीवन में ही अपने साहित्यिक विकास को रोक देते हैं, उनके लिखने-सोचने का एक ढर्रा बन जाता है। इसे उनकी मृत्यु भी कहा जा सकता है। इससे लिखने का काम आसान हो जाता है, साथ ही विशेष लेखन में कुशलता हासिल हो जाती है, लेकिन इससे विषय और रूप की एकतानता निर्मित होती जाती है, साहित्यिक प्रयोग सीमित होता जाता है। लेखन की यह खास प्रक्रिया रूढ़िवाद कही जा सकती है, इसे साहित्यिक-हठ भी कहा जा सकता है। केदारनाथ सिंह भी साहित्यिक-हठी हैं। साहित्य का यह संकीर्ण घेरा साहित्यिक के लिए एक सुरक्षा-कवच की तरह होता है। वह इसे जीत की गारंटी समझने लगता है। वह जहाँ प्रसिद्धि पाता है, एक-सा, वैसा ही जैसा प्रसिद्ध हुआ, लिखता जाता है। विषय-संकीर्णता और प्रयोग से भय साहित्यिक में जड़ सौंदर्यबोध का निर्माण करते हैं। जीते-जी मरना और क्या है कि अब आप अपनी सृजन-क्षमता का विस्तार नहीं कर सकते, यांत्रिक पुनरुत्पादन के अतिरिक्त और कुछ नहीं कर सकते। नए को रचने की शक्ति आप में नहीं। नए को समझने का सामर्थ्य आपमें नहीं है। ज़रूरी तो नहीं कि कवि हो गए, तो अब ज़िंदगी भर कवि ही बने रहना है, ‘राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा’। पर साहित्यिक ऐसी स्थितियों में भी फँस जाता है। अपने काव्य को माँजने में वह ऐसा रूप प्राप्त करता है, जो दूसरों के लिए असाध्य है, वह अनन्य साहित्य की रचना करता है, इस अनन्य रूप को पुनरुत्पादित करने में ही वह काव्य-कौशल समझने लगता है। यहीं उसकी मौत है, अपनी ही साहित्य की फैक्टरी में।

साहित्य प्रांसगिक होना चाहता है। प्रासंगिक होकर ही साहित्य जीवित रह सकता है। लेकिन प्रासंगिकता युग-सापेक्ष होती है। कल का प्रासंगिक आज अप्रासंगिक लग सकता है और आज का प्रासंगिक कल अप्रासंगिक हो सकता है। केदारनाथ सिंह का साहित्य भी अपनी गति को प्राप्त होगा। मेरी दृष्टि में केदारनाथ सिंह की कविताओं में शिथिल बिंबों की भरमार है, धर्म, प्रकृति और लोक-जीवन के बिम्ब अधिक है, अन्याय-अत्याचार, अंधविश्वास की मुखालफत के बिम्ब कम। उनकी कविताओं में उदारवादी राजनीतिक-दिशा है, प्रयोगशीलता की निरंतर उपेक्षा है। हिन्दी-साहित्य के गुणात्मक विकास में उनकी कविताओं का कोई महत्त्व नहीं। वे नई बनती जीवन-स्थितियों के प्रति अचेत हैं, परिणामस्वरूप नई कल्पना और भाषा-शैली के निर्माण के प्रति भी जागरूक नहीं हैं। केदारनाथ सिंह की कविताओं में प्रस्तुत बिंबों का प्रमुख विचार और प्रतिविचार रूमान और यथार्थ है। रूमानी यथार्थवाद उनकी कविता का अंधेरा पक्ष है। उनके साहित्यिक का राजनैतिक उपचेतन है। ज्ञान-विज्ञान की उपेक्षा, अध्ययन-मनन का आलस्य और नए को स्वीकारने की असमर्थता केदारनाथ सिंह की कविताओं की विशेषता है। वे १९४७ यानी भारत-पाकिस्तान-विभाजन को एक रूमानी स्मृति में तब्दील कर देते हैं, उनका प्रश्न कि ‘क्यों चले गए थे नूर मियाँ’ ऐसे उभर कर आता है जैसे उनका नौकर शहर छोडकर चला गया हो और अब खाना कौन बनाएगा, घर कौन साफ करेगा! नूर मियाँ का इससे अधिक क्या महत्त्व है कि वे सुरमा बेचते थे? पाकिस्तान में पत्ते कैसे गिरते हैं! यह विस्मय नासिर काजमी के लिए उचित था, केदारनाथ सिंह जब आधी सदी गुज़र जाने के बाद वैसे ही विस्मित होते हैं, वही सवाल दोहराते हैं, तो वह रूमानी स्मृति से अधिक कुछ नहीं लगता। केदारनाथ सिंह का गणित तो कमज़ोर नहीं, लेकिन इतिहास में वे उत्तीर्ण नहीं हो पाते। ८० के दशक का उत्तरार्द्ध दक्षिणपंथी राजनीति के भारत और विश्व-भर में प्रभावी होने का समय है। ऐसे समय में भारत-पाकिस्तान विभाजन को एक भावुक स्मृति बनाकर पेश करना केदारनाथ सिंह द्वारा यथार्थ का रुमानीकरण, वस्तु-जगत का रहस्यीकरण नहीं तो और क्या है! यह एक खास राजनैतिक दृष्टि नहीं तो और क्या है? यह नहीं भुलना चाहिए कि जब केदारनाथ सिंह ४७ के बारे में लिख रहे थे, हिन्दी-साहित्यिकों का बहुलांश जाति-धर्म आधारित दंगों, हिंसा-उन्माद का तीखा विरोध कर रहा था। यह भारत में फासीवादी शक्तियों के प्रभावी होने का समय है, साथ ही अस्मितावादी-समुदायवादी बहुरंगी-प्रतिवादी शक्तियों के तैयार होने का भी, आश्चर्य नहीं केदारनाथ सिंह के साहित्यिक का अंतर्संघर्ष भी तेज़ हो जाता है। मण्डल-कमंडल और बाबरी-मस्जिद के ठोस-बिम्ब केदारनाथ सिंह देख नहीं पाए, या देखते ही पीछे भागे, तो उन्हें नूर मियाँ दिखाई दे गए, थोड़ा और पीछे जाते तो कोई ‘डोम’ या कोई ‘मुंडा’ भी दिख सकता था। क्या उनकी स्मृति एक जगह जाकर रुक नहीं जाती? क्या वे यथार्थ का एक खास नक्शा नहीं बनाते? बाहर की कोमलता अंदर की कठोरता पर बहुत मोटी चढ़ी हुई है। केदारनाथ सिंह ईश्वर को बार-बार धन्यवाद देते रहे हैं। शायद हिन्दी-भाषा को भी ईश्वर का वरदान मानते रहे थे। क्या ‘देव-भाषा’ का आधुनिक रूप ही हिन्दी है, और इसीलिए हिन्दी भाषा ईश्वरीय कृपा है? तो फिर बुद्ध की करुणा का क्या होगा? अल्लाह की रहमत का क्या होगा? और जीसस की दया का? और फिर कबीर और नानक का क्या होगा? हिन्दी-कवि के लिए कई परम्पराएँ खुली हैं, केदारनाथ सिंह ने अपनी मति से चुनाव किया। उन्होने कुछ अपनी सुमति और कुछ भगवान भरोसे ही जीवन काटा और साहित्य-उत्पादन किया। जानने वाले जानते हैं कि सर्रियलिस्ट फ़िल्मकार लुई बुनुएल ने भी ईश्वर को धन्यवाद दिया है, वे अपने अंदाज़ में, जैसे पूछने वाले पर ही व्यंग्य करते हुए, कहते हैं – “ईश्वर का धन्यवाद कि मैं नास्तिक हूँ!” धन्यवाद के पात्र केदारनाथ सिंह भी हैं कि उन्होने अपनी कुछ कविताओं में अपनी परंपरा और उपचेतन को स्पष्ट रूप से सामने रख दिया है। उनके साहित्य की अंतर्धारा की दिशा यहाँ साफ है। ‘मुक्ति’, ‘मेरी भाषा के लोग’, ‘नए कवि का दुख’ ऐसी कई कविताएं हैं। पर मैं केवल उनकी एक कविता की ओर ध्यान दिलाना चाहूँगा, ‘बनारस’ में जिस बात के लिए बिंबों को जोड़ना पड़ता है, वह मशक़्क़त यहाँ नहीं, अपनी बात को बच्चों सी सरल ज़बान में तैयार बिंबों के माध्यम से उन्होंने रखा है –

जब ट्रेन चढ़ता हूँ

तो विज्ञान को धन्यवाद देता हूँ

वैज्ञानिक को भी

 

जब उतरता हूँ वायुयान से

तो ढेरों धन्यवाद देता हूँ विज्ञान को

और थोड़ा सा ईश्वर को भी

 

पर जब बिस्तर पर जाता हूँ

और रोशनी में नहीं आती नींद

तो बत्ती बुझाता हूँ

और सो जाता हूँ

 

विज्ञान के अंधेरे में

अच्छी नींद आती है। (विज्ञान और नींद)

यहाँ विरोध स्पष्ट है, कुछ अनकहा नहीं। विचार और प्रति-विचार आमने-सामने हैं। पर अब भी सोच में सवाल नाच रहे हैं। केदारनाथ सिंह की यथार्थ की कल्पना कैसी है? क्या वे रूमानी यथार्थवादी धारा के कवि हैं? आज उनकी क्या प्रासंगिकता है, जबकि इसी साल उन्होने अपनी आखरी साँसे लीं? इन प्रश्नों को पाठक-समीक्षक के ध्यानार्थ रखता हूँ। केदारनाथ सिंह के साहित्य का मूल्यांकन होना अभी शुरू ही हुआ है, आशा है उनकी रचनावली प्रकाशित होगी, और बेहतर मूल्यांकन किया जाएगा। उनके साहित्य की अंतर्धारा और हिन्दी-साहित्य में उनकी परंपरा भी अधिक स्पष्ट होगी। तब शायद अधिक स्पष्ट होगा कि केदारनाथ सिंह की राजनीति क्या रही? मुझे विश्वास है हिन्दी-साहित्य-समीक्षक अधिक गंभीरता से केदारनाथ सिंह के व्यक्तित्व और कृतित्व पर सोचेंगे। ‘विज्ञान के अंधेरे में’ सोए उनके उपचेतन को टटोलेंगे। वे भी मशक़्क़त से भागेंगे तो हिन्दी-साहित्य का क्या होगा! यूँ आराम-तलब बौद्धिक-साहित्यिक हिन्दी-साहित्य-चर्चा का नया विषय तो नहीं है। इस पर बात होती आई है। चलती चर्चा चलती चले…

***

[i] प्रेमचंद, ‘रंगभूमि’, हंस प्रकाशन, इलाहाबाद, १९९९, पृ.-९

usman khan

उस्मान ख़ान समकालीन हिंदी साहित्य के अलहदा युवा कवि-कथाकार हैंचर्चाओं और पुरस्कारों की भीड़ से अलहदा… छपाऊ मानसिकता से भी अलहदा... जे.एन.यूके हिंदी विभाग से मालवा के लोकसाहित्य पर पीएचडीइनसे usmanjnu@gmail.com पर संपर्क कर सकते हैं.

प्रेमचंद की भारतीयता और हिन्दी की साहित्यिक संस्कृति: चंदन श्रीवास्तव

हिन्दी की साहित्यिक संस्कृति और प्रेमचंद, लेखक- डा. राजकुमार, निबंधों ( कुल तेरह) का संकलन है और सारे लेख प्रेमचंद-विशेषी नहीं लेकिन पुस्तक का एक महत्वपूर्ण हिस्सा (कुल चार लंबे लेख) प्रेमचंद के मूल्यांकन की समस्या से जूझते हैं. चूंकि पुस्तक में भारतीय आधुनिकता को जमीन बनाकर ‘हिन्दी की साहित्यिक संस्कृति’ को समझने-बताने की कामयाब कोशिश की गई है सो पुस्तक की वैचारिकी का दायरा बड़ा हो जाता है. प्रेमचंद, हिन्द-स्वराज, सिविलाइजिंग मिशन, अंग्रेजी की जगह, हिन्दी की शक्ति, हिन्दी का जातीय संगीत, हिन्दी साहित्य का इतिहास और साहित्य, इतिहास तथा स्वाधीनता जैसे विषयों को एक सूत्र में पिरोने की भरपूर गुंजाइश बन जाती है पुस्तक में. और, ठीक इसी गुंजाइश को देखते हुए उम्मीद की जा सकती है समीक्ष्य पुस्तक की संभावनाओं का विस्तार लेखक किसी अन्य पुस्तक में बड़े फलक पर करेंगे. #लेखक

 

हिन्दी की संस्कृति और आधुनिकता का पुनर्पाठ बरास्ते प्रेमचंद

By चंदन श्रीवास्तव

प्रेमचंद पुराने हैं, इतने पुराने तो निश्चित ही कि हम उनकी रचनाओं की शत-वार्षिकी मना सकें. लेकिन, पुराना होना मात्र ‘साधुता’ की कसौटी नहीं, परीक्षा जरुरी है. पुराणमित्येव न साधु सर्वम्..’–  हिन्दी भाषा के भीतर चलने वाली साहित्य की ‘आधुनिकता’ की बहसें आपको अपने खास अंदाज में याद दिलाती हैं कि मालविकाग्निमित्रम् का सूत्रधार ऐसा आगाह कर गया है. सो, प्रेमचंद पुराने हैं तो उनकी कृतियों के परीक्षा के प्रयास भी कम पुराने नहीं.

प्रेमचंद के अध्येता जानते हैं कि शिवदान सिंह चौहान ने मार्च 1937 (प्रेमचंद की मृत्यु-1936) के अपने लेख में उनके रचना-कर्म की ‘प्रगतिशीलता’ की चर्चा की  थी. तब से लेकर अब तक प्रेमचंद को बुद्धि-विवेक की कसौटी पर ‘कलम का सिपाही’ के रुप में पढ़ा गया है और ‘कलम का मजदूर’ के रुप में भी. मूल्यांकन के लिए रचनाकार को नहीं उसकी रचनाओं के परिवेश को देखा जाना चाहिए और सबसे ज्यादा देखा जाना चाहिए रचनाकार के युग को आविष्ट करने वाली चेतना को—इस तर्क से हिन्दी साहित्य की समालोचना की आंख ने ‘प्रेमचंद और उनका युग’ तक पर नजर डाली है. ऐसे प्रयासों से प्रेमचंद के रचना-कर्म में ‘साधु-असाधु’ खोजने की सिद्ध कसौटियां बन गई हैं और अब यानि 21 वीं सदी के दूसरे दशक में यह अपेक्षित ही है कि 20 सदी के आरंभ से अपने लेखन की शुरुआत करने वाले प्रेमचंद की कृतियों की समालोचना की सिद्ध कसौटियों पर सवाल उठाये जायें. सो, सवाल खूब उठाये जा रहे हैं.

मिसाल के लिए  हिन्दी साहित्य की अंदरुनी बहसों को अपने पन्ने पर खास जगह देने वाले अखबार ‘जनसत्ता’ के पन्ने पर 2013 में जुलाई से सितंबर महीने के बीच प्रेमचंद को लेकर चले वाद-विवाद को देखा जा सकता है. खुर्शीद अनवर ने 11 अगस्त 2013 के अपने ‘प्रेमचंद को साम्यवादी बनाने की कवायद’ शीर्षक लेख में कहा कि “ प्रेमचंद को साम्यवादी घोषित करना उसी तरह से है जैसे जवाहर लाल नेहरु को गांधी से अलग कर उनपर लाल बिल्ला लगा दिया जाय.”  प्रेमचंद को साम्यवादी ठहराने की कोशिशों की परीक्षा करते हुए खुर्शीद अनवर ने अपने लेख में ध्यान दिलाया कि बेशक यह पंक्ति प्रेमचंद की है कि ‘ धन्य है वह सभ्यता जो मालदारी और व्यक्तिगत संपत्ति का अंत कर रही है और जल्दी ही या देर से दुनिया उसका पदानुसरण करेगी.. ‘ लेकिन प्रेमचंद को साम्यवादी ठहराने के लिए इतना कहना काफी नहीं’. लेख में अनवर का सवाल था कि 1936 में हुए प्रगतिशील लेखक संघ के अधिवेशन में जहां एक ओर हसरत मोहानी जैसे व्यक्ति ने कम्युनिस्ट विचारों के प्रचार-प्रसार की बात की, वहीं प्रेमचंद ने अपने भाषण में एक बार भी ऐसा कोई वक्तव्य नहीं दिया. क्या कोई उसकी वजह बता सकता है ? अनवर का निष्कर्ष था कि “प्रेमचंद को महान कथाकार  रहने देने में हम सबका भला है. साहित्य समाज के आगे चलने वाली मशाल हमेशा ही रहेगा, इसके लिए प्रेमचंद का साम्यवादी होना जरुरी नहीं है.”

अनवर के इस लेख पर प्रेमचंद के साहित्य के मशहूर अध्येता कमल किशोर गोयनका ने लिखा कि लेख के शीर्षक (‘प्रेमचंद को साम्यवादी बनाने की कवायद’) में ‘कवायद’ की जगह ‘साजिश’ शब्द का इस्तेमाल ज्यादा अच्छा होता क्योंकि “ प्रेमचंद के ‘हंस’, जनवरी, 1936 में प्रकाशित एक लेख का शीर्षक है- ‘लंदन में भारतीय साहित्यकारों की एक नई संस्था’, जिसमें लिखा है कि मुल्कराज आनंद, केएस भट्ट, जेसी घोष, एस सिन्हा, एमडी तासीर और एसएस जहीर ने लंदन में ‘दि इंडियन प्रोग्रेसिव राइटर्स एसोसिएशन’ की बुनियाद डाली, लेकिन डॉक्टर रामविलास शर्मा (मार्क्सवादी आलोचक) ने लिखा है कि नींव प्रेमचंद ने डाली, और इस प्रकार इस झूठ को इतना विस्तार दिया गया कि प्रेमचंद ‘प्रगतिशील लेखक संघ’ के संस्थापक बना दिए गए.”  मार्क्सवाद से प्रेमचंद के अलगाव को दिखाने के लिए गोयनका ने तर्क दिया कि “प्रेमचंद ने ‘हंस’ के उसी अंक में लंदन से आया घोषणा-पत्र भी प्रकाशित किया है. इसमें एक भी शब्द, एक भी उद्देश्य का संबंध मार्क्सवाद से दूर तक नहीं है. इस घोषणा-पत्र में चार प्रमुख उद्देश्य हैं- सांस्कृतिक और सामाजिक उत्थान, भारतीय स्वाधीनता, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और इंडो-रोमन लिपि की स्वीकृति. प्रेमचंद ने अंतिम को अस्वीकार करते हुए लिखा कि शेष तीन तो उन्हें आदर्श ही रहे हैं, पर इनमें कहीं भी मार्क्सवाद नहीं है और स्पष्ट है कि प्रेमचंद ने समर्थन इसलिए किया कि वे तीस-पैंतीस वर्षों से इन्हीं उद्देश्यों को लेकर चल रहे थे और वे स्वराज और भारतीय आत्मा की रक्षा के ही उपकरण थे.”

खुद कमल किशोर गोयनका ने क्या ‘आप इस प्रेमचंद को जानते हैं’(जनसत्ता, 28 जुलाई, 2013) शीर्षक अपने लेख में प्रेमचंद की नैतिकता और आधुनिकता की भूरि-भूरि प्रशंसा करते हुए उनकी कहानी ‘बालक’ की ओर ध्यान दिलाते हुए लिखा था कि इसका “ अशिक्षित नायक विवाह के छह महीने बाद उत्पन्न बच्चे को इस तर्क से स्वीकार करता है कि मैंने एक खेत खरीदा था, उसपर किसी ने फसल बोई ही थी तो क्या वह फसल मेरी नहीं होगी .”  प्रेमचंद की कहानियों के नैतिक-भाव की श्रेष्ठता और आधुनिकता-बोध की इस प्रशंसा पर दलित-चिन्तक धर्मवीर ने अपने लेख ‘हम प्रेमचंद को जानते हैं’( 4 अगस्त, 2013) में सवाल उठाया. धर्मवीर ने लिखा कि “ गोयनका और उनके प्रेमचंद ने यह बात एक बार भी नहीं सोची कि बालक कहानी में पैदा संतान किस राष्ट्र की रक्षा के लिए अपने प्राण न्यौछावर करेगी. क्या राष्ट्रवादी होने में यह जानना जरुरी नहीं कि बच्चा अपने वास्तविक पिता को जाने ? जैविक पिता से भिन्न वैवाहिक पिता की फर्जीगीरी राष्ट्रवाद नहीं है. ऐसे समाज में शूरवीर पैदा नहीं हुआ करते ”

अस्मितापरक आंदोलन की वैचारिकी के भीतर प्रेमचंद की छवि किन रंग-रेखाओं से उकेरी जा रही है उसका एक बेहतर उदाहरण रत्नकुमार सांभरिया का आलेख ‘दलित, प्रेमचंद, तुलसीदास और शहीद भगतसिंह’ हो सकता है. लेख में प्रेमचंद के शब्द-संसार की चुनिन्दा पंक्तियों के आधार पर साबित किया गया है कि वे “ग्राम्य जीवन और लोक परंपराओं से नितांत अनभिज्ञ थे. वे घोर ईश्वरवादी, भाग्यवादी और वर्णवादी थे तथा छुआछूत और जातपांत में उनका अटूट विश्वास था… प्रेमचंद- साहित्य में श्लीलता का प्रायः अभाव है और उनकी भाषा में लियाकत नहीं होने के कारण पाठक के मन को कचोटती है. विशेषतः दलितों के बारे में वे जिस भाषा-शैली का प्रयोग करते हैं, वह हृदय ही चीर डालती है.बावजूद इसके मार्क्सवादी सोच का यह मानना है कि प्रेमचंद ने उस समय दलितों के बारे में लिखा, जब लोग उनकी छाया से भी दूर भागते थे.. क्या यह तर्क इस दायरे में नहीं आता कि कोई किसी अछूत को थप्पड़ मार दे और यह तर्क दे कर उसकी प्रशंसा की जाये देखो, ‘उसने ‘अछूत’ को छुआ तो सही, दूसरे लोग तो उसकी छाया से भी दूर भागते हैं.’

सांभरिया का निष्कर्ष है कि “ प्रेमचंद-साहित्य में न दलित नेतृत्व है, न दलित चरित्र. उनकी रचनाओं के कथानक धर्मशास्त्रों के सूक्तों से ऊपर नहीं उठ पाये हैं. शास्त्र, जो अपने अंतस में पूर्वाग्रह समाये होने के कारण शूद्रों के लिये ‘‘शस्त्रों’’ से भी ज्यादा मारक साबित हुये हैं, प्रेमचंद की कलम ‘‘शास्त्र बनाम शस्त्र’’ के गिर्द घूमती है.”

वाद-विवाद के उपर्युक्त प्रसंगों को नजर में रखें तो संक्षप में कहा जा सकता है कि प्रेमचंद के साहित्य को परखने की सिद्ध कसौटियां प्रश्नांकित की जा रही हैं, अगर साहित्य की समालोचना की किन्हीं कसौटियों के तहत यह बताया गया था कि प्रेमचंद के साहित्य में आधुनिक भाव-बोध के अनुकूल राष्ट्र और व्यक्ति दोनों ही के मुक्ति के प्रसंग हैं तो अब गंगा एकदम ही उल्टी बहती दिख रही है. प्रेमचंद को ‘कलम का सिपाही’ और ‘कलम का मजदूर’ से लेकर ‘सामंत का मुंशी’ बनाने तक की यह कहानी पहली नजर में विचारोत्तेजक जान पड़ सकती है लेकिन वाद-विवाद में समाये आवेग को एक तरफ करके देखें तो स्पष्ट होगा कि प्रेमचंद के साहित्य को लेकर बना पक्ष और प्रतिपक्ष एक ही विचार-सरणी(आधुनिकता की परियोजना) का साझीदार है और इसकी पद्धित( प्रेमचंद के साहित्य से उद्धरणों का सुविधाजनक चयन) भी एक ही है. पक्ष और प्रतिपक्ष के पास व्यक्ति, समुदाय और राष्ट्र की मुक्ति को लेकर एक तयशुदा निष्कर्ष है और प्रेमचंद के साहित्य का पाठ इस तयशुदा निष्कर्ष के अनुकूल पड़ते उद्धरणों के चयन के आधार पर किया गया है. समीक्ष्य पुस्तक ‘हिन्दी की साहित्यिक संस्कृति और भारतीय आधुनिकता’  अपने-अपने मुक्ति-प्रसंग के अनुकूल प्रेमचंद की मूर्ति गढ़ने और तोड़ने की कोशिशों का संज्ञान लेने, इस कोशिश की मूल प्रस्थापनाओं को प्रश्नांकित करने और अपनी तरफ से प्रेमचंद के ज्यादा तथ्यसंगत और इतिहास-बद्ध अध्ययन का प्रस्ताव करने के कारण महत्वपूर्ण है.

समीक्ष्य पुस्तक में प्रेमचंद से आपकी भेंट साहित्यकार, पत्रकार या स्वाधीनता-सेनानी के रुप में नहीं बल्कि एक ‘चिन्तक’ के रुप में होती है. इसकी वजह भी लेखक की नजर में बहुत स्पष्ट है और इसे पुस्तक के प्राक्कथन में यों बताया गया है कि आधुनिकता के साथ पूंजीवाद, उपनिवेशवाद, राष्ट्रवाद, विज्ञान, तर्कबुद्धि और लोकतंत्र का विकास जुड़ा हुआ है और आधुनिकता की कोई बहस मार्क्स को दरकिनार कर आगे नहीं बढ़ायी जा सकती तथा भारतीय आधुनिकता की कोई भी परिकल्पना गांधी के बगैर अधूरी है. चूंकि हिन्दी की साहित्यिक संस्कृति को इन विभूतियों के चिन्तन का लाभ मिलता रहा है सो हिन्दी की साहित्यिक मेधा ने आधुनिकता के पश्चिमी महाआख्यान को आंख मूंदकर नहीं अपनाया, उसने आधुनिकता की कुछ बातें मानी तो कुछ से इनकार किया और प्रेमचंद के लेखन में इस बात के पर्याप्त साक्ष्य मिलते हैं सो “प्रेमचंद सरीखे चिन्तक को आधुनिकता के प्रोजेक्ट के समर्थन में निशेष कर देने के बजाय उन बिन्दुओं पर पर पुनर्विचार करने की आवश्यकता है जहां ये आधुनिकता की सख्त आलोचना करते हैं. वस्तुतः हिन्दी की साहित्यिक संस्कृति(या संस्कृतियां) को समझना प्रकारांतर से इस प्रक्रिया की समग्रता, विशिष्टता और अपनी सभ्यता की आंतरिक गतिकी को भी समझना है.”

पुस्तक के प्राक्क्थन के इस अंश से स्पष्ट हो जाता है कि उसमें चर्चा भारतीय आधुनिकता की ही प्रधान है और प्रेमचंद की चर्चा ‘हिन्दी की साहित्यिक संस्कृति’ के पुनर्पाठ के मकसद की गई है. इस पुनर्पाठ के क्रम में ही पुस्तक में प्रेमचंद का एक चिन्तक के रुप में विशिष्ट योगदान रेखांकित किया गया है और हिन्दी की साहित्यिक संस्कृति की वर्चस्वशील धाराओं को प्रश्नांकित किया गया है. सवाल उठता है कि साहित्यिक संस्कृति से क्या समझें और इसके पुनर्पाठ की प्रविधि क्या हो. समीक्ष्य पुस्तक में फ्रेडरिक जेम्सन के हवाले से लिखा मिलता है कि “साहित्यिक संस्कृतियां ऐसे कोड के रुप में सामने आती हैं जिनके बारे में हम प्रायः भूल चुके होते हैं. वे एक ऐसी बीमारी के लक्षण की तरह हैं जिसे हम बीमारी के रुप में पहचानते ही नहीं., वे समग्रता के एक टुकड़े की तरह हैं जिसे देख सकने वाला अंग हम पहले ही खो चुके हैं. ये साहित्यिक रचनाएँ, सामाजिक यथार्थ को निर्मित करने वाली दूसरी वस्तुओं की तरह पुकार रही हैं कि हम उनकी टीका व्याख्या करें, उनका अर्थ करें, उनकी पहचान करें साहित्यिक आलोचना का यह दायित्व है कि वह अंतर्बाह्य अस्तित्व और इतिहास की तुलना जारी रखे. ”

लिहाजा समीक्ष्य पुस्तक के लेखक ने अपने लिए कठिन दायित्व चुना है क्योंकि साहित्यिक संस्कृति अगर समग्रता का वह टुकड़ा हो जिसे देख सकने वाला अंग पहले ही खो चुका है या फिर वह ऐसी बीमारी का लक्षण हो जिसकी बीमारी के रुप में पहचान ही ना हो तो फिर सवाल उठेगा कि सामाजिक यथार्थ का निर्माण करने वाली इस जरुरी चीज को जानने के लिए साहित्यिक आलोचना कौन-से औजार अपनाये ? लेखक ने ध्यान दिलाया है कि “औपनिवेशिक वर्चस्व के दौरान उपनिवेशित सभ्यता ऐसी विस्मृति का शिकार होती है कि अपनी सभ्यता के कोडो की उपनिवेशवाद द्वारा की गई व्याख्या को ही थोड़े बहुत हेर-फेर के साथ स्वीकार कर लेती है.” इस स्वीकार के लक्षण समीक्ष्य पुस्तक के लेखक को प्रेमचंद के मूल्यांकन को लेकर बनी कसौटियों और उन कसौटियों को प्रश्नांकित करने वाले हाल के अस्मितापरक प्रयासों में दिखते हैं.

पुस्तक के लेखक के मुताबिक अकारण नहीं है कि प्रेमचंद का अध्ययन प्रायः आधुनिकता द्वारा स्वीकृत और राजनीतिक दृष्टि से सही मुद्दों के आधार पर किया गया है. इसी कड़ी में प्रेमचंद को काल-क्रमानुसार देखने और किसी एक कालखंड की रचनाओं को समझ के करीब पड़ने के कारण विशेष तरजीह दी गई. जैसे प्रेमचंद के अंतिम दौर की रचनाओं को मार्क्सवादी विद्वानों ने ज्यादा महत्व दिया क्योंकि उनके अनुसार प्रेमचंद इस दौर में लगभग मार्क्सवादी हो गये थे. इस तरह के अध्ययन की “विडंबना यह है कि वह यह मानकर चलता है कि सच क्या यह उसे पहले से मालूम है. इस सच के समर्थन में एक गवाह के रुप में पेश करने के लिए वह प्रेमचंद को ठोक पीटकर अपने सच के अनुरुप ढालने की कोशिश करता है. यानी प्रेमचंद स्वयं में महत्वपूर्ण नहीं हैं. महत्वपूर्ण है वह सच जो उसे पहले से मालूम है. यह प्रेमचंद का रिडक्शन है. पहले से ज्ञात सच में प्रेमचंद के रचनात्मक अवदान को हजम कर लेने की कोशिश है.”

सवाल उठता है, प्रेमचंद के मार्क्सवादी अध्येताओं को कौन सा सच पहले से पता है जिसमें प्रेमचंद को रिड्यूस किया जा रहा है ? यहां बात आती है प्रेमचंद की भारत-विषयक परिकल्पना की. समीक्ष्य पुस्तक के मुताबिक प्रेमचंद एक ऐसे भारत की कल्पना करते हैं जो पश्चिम से तात्विक और बुनियादी रुप से भिन्न है. वामपंथी ऐसी भिन्नता की कल्पना नहीं कर सकते थे क्योंकि “वामपंथ के सार्वभौमिक महाआख्यान में भिन्नता के लिए खास जगह नहीं थी. भिन्नता का मतलब उनके लिए विशिष्टता नहीं, कमी थी,  जो उन्हें भारत के इतिहास में दिखायी पड़ती थी. पश्चिम के तर्ज पर भारत के इतिहास में पुनर्जागरण, ज्ञानोदय, राष्ट्रवाद, औद्योगिक क्रांति, व्यक्तिवाद वगैरह की आपेक्षिक अनुपस्थिति देख उनके ‘करुणाकलित हृदय’ में आह सी उठती थी और फिर वे इस शोध में जुट जाते थे कि क्या कारण(अर्थात् कमी थी) थे जिनकी वजह से हमारे यहां…..। कुल मिलाकर भारत के अतीत-इतिहास में गर्व करने लायक उन्हें कुछ खास नजर नहीं आता था. मार्क्स की तरह उन्हें भी लगता था कि शैतान को भी उसका जायज हक मिलना ही चाहिए. सदियों से चली आ रही अर्थव्यवस्था को नष्ट कर उपनिवेशवाद ने भारतीय इतिहास को पटरी पर ला दिया. भारत को इतिहास के राजपथ पर घसीट लाने का सेहरा उपनिवेशवाद के माथे बांध देने के बाद उपनिवेशवाद का एक प्रगतिशील पक्ष तो निकल आया लेकिन इसी के साथ भारत की इतिहास की विशिष्टता का महत्व समझने वाली दृष्टि भी गायब हो गयी. लब्बोलुआब यह कि उपनिवेशवाद आया तो भारत की जड़ता टूटी और पूंजीवाद का विकास शुरु हुआ. पूंजीवाद आ गया तो देर-सबेर समाजवाद आना ही है. यह सोचने की जहमत नहीं उठायी गई कि सभ्यताओं के विकासक्रम और जीवन-मूल्य एक जैसे नहीं होते.”

अस्मितावादी आंदोलन की वैचारिकी के भीतर प्रेमचंद के मूल्यांकन के प्रयासों को लेकर भी समीक्ष्य पुस्तक यही कमी देखती है. पुस्तक अस्मितावादी वैचारिकी की इस विडंबना की ओर ध्यान दिलाती है कि जमींदारी व्यवस्था खत्म कर किसानों में जमीन बांटने और बिना किसी भेदभाव के सभी को समान नागरिकता देने का काम उपनिवेशवाद ने नहीं राष्ट्रवाद ने किया. लेकिन दलित चिन्तकों को औपनिवेशिक शासन के सिवा बाकी सभी वर्णवादी लगते हैं– “ एकतरफा प्रेम में बौराये इन बेचारों को यह भी नहीं पता कि औपनिवेशिक शासक इनके बारे में क्या सोचते हैं. उल्लेखनीय है कि औपनिवेशिक शासक सफेद नस्ल को सर्वश्रेष्ठ मानते थे. सभी भारतीय उनकी दृष्टि में हीन प्रजाति के थे. इन हीनों में सवर्ण बेहतर थे क्योंकि वे पतित आर्य थे, दलित तो पतित आर्य भी नहीं थे. वे निकृष्टतम प्रजाति के थे. हिन्दी में इन दिनों प्रगतिशीलता का एक नया ढब निकला है. इस ढब के मुताबिक उपनिवेशवाद भारत के लिए और विशेष रुप से दलितों के लिए वरदान था. दलितों का उद्धार करने के लिए ही अंग्रेजों ने भारत को उपनिवेश बनाया था. बुरा हो राष्ट्रवादियों का जिन्होंने उन्हें ज्यादा दिन टिकने नहीं दिया. वे देर से आये और जल्दी चले गये !..”

प्रेमचंद के मूल्यांकन की कसौटियों में पेवस्त औपनिवेशिक ज्ञानकांड के रग-रेशे दिखाते हुए उसके बरक्स पुस्तक में भरपूर साक्ष्यों के साथ प्रेमचंद की पश्चिम के प्रति अवधारणा का रेखांकन किया गया है. इसी क्रम में पश्चिमी राष्ट्रवाद के बारे में प्रेमचंद की सोच और भारतीय राष्ट्रवाद से उसकी भिन्नता के बारे में विचार किया गया है फिर भारतीय राष्ट्रवाद की इकाइयों— शहर, नागरिक-समाज, गांव(पारंपरिक सामुदायिकता) और गांव में भी दलित और स्त्री के बारे में प्रेमचंद के विचारों की चर्चा है. इस चर्चा से बड़े हद तक पुस्तक की मूल स्थापना सिद्ध हो जाती है कि “प्रेमचंद सरीखे चिन्तक को आधुनिकता के प्रोजेक्ट में समर्थन में निःशेष कर देने के बजाय उन बिन्दुओं पर पर पुनर्विचार करने की आवश्यकता है जहां ये आधुनिकता की सख्त आलोचना करते हैं. वस्तुतः हिन्दी की साहित्यिक संस्कृति(या संस्कृतियां) को समझना प्रकारांतर से इस प्रक्रिया की समग्रता, विशिष्टता और अपनी सभ्यता की आंतरिक गतिकी को भी समझना है.”

इतिहास को विवेचना का विषय बनाने वाली कुछ पुस्तकें करुणा के भाव से लिखी होती हैं, कुछ सात्विक क्रोध से. न्याय की भावना दोनों ही पुस्तकों की प्रेरक होती है लेकिन इस भाव का निर्वाह दोनों में अलग-अलग होता है. करुणा के भाव से लिखी पुस्तकों में प्रिय के खो जाने का मलाल नहीं होता, बल्कि स्वीकृति होती है. ऐसी पुस्तकों में जोर अपने खोये या अधूरे पाये हुए को भरपूर ब्यौरे के साथ बताने पर होता है. कोई चीज खो गयी या अधूरी हासिल है तो इसकी वजहें क्या रहीं— ऐसी खोज करुणा भाव से लिखी किताबों में प्रधान नहीं होती. इतिहासकार सुधीरचंद्र की पुस्तक ‘गांधी-एक असम्भव सम्भावना’ करुणा के भाव से लिखी पुस्तक का एक अच्छा उदाहरण हो सकती है. सात्विक क्रोध से लिखी पुस्तकों में किसी चीज के खोने या अधूरा हासिल होने का मलाल बहुत मुखर होता है और उसके कारणों की खोज बड़ी प्रखर. जोर अपने खोये या हासिल को महीन ब्यौरे में बताने पर कम हो जाता है और कारणों की खोज पर ज्यादा. किसी प्रिय चीज के खो जाने या उसके अधूरे रुप में हासिल होने की जाहिर वजह के साथ सात्विक क्रोध से लिखी पुस्तकें बहुत ज्यादा जिरह करती हैं. सो, खोज ली गई वजहों के साथ लेखक की हमदर्दी नहीं बन पाती और इसका एक घाटा होता है— जिन बातों को किसी चीज के खो जाने या अधूरा हासिल होने की वजह के रुप देखा जा रहा है उनके दोष बड़े प्रखर होकर उभरते हैं, अगर कोई गुण है तो वह दब जाता है. समीक्ष्य पुस्तक भी सात्विक क्रोध से लिखी गई है और उसमें दोष-विवेचन जितना प्रखर है, गुणों की चर्चा या कह लें एक लें उनके साथ मुठभेड़ की कोशिश कम है.

मिसाल के लिए, समीक्ष्य पुस्तक के लेखक के इस विचार से इनकार नहीं किया जा सकता कि मार्क्स ने भारत के पुराने समाज को इतिहास-धारा से वंचित माना है और अंग्रेजी शासन को वह शक्ति जिसने अपनी तमाम बर्बरता के बावजूद भारत को इतिहास(या कह लें आधुनिकता) के प्रगति-पथ पर लगा दिया और भारतीय स्वाधीनता संग्राम या फिर आधुनिक भारत के इतिहास-लेखन का उपक्रम एक हदतक इस विचार का साझीदार होने के कारण औपनिवेशिक ज्ञान-कांड(लेखक के शब्दों में पश्चिम की आधुनिकता) से मुक्त नहीं है. लेकिन विचार के इस बिन्दु तक पहुंचने के बाद यह सोचा जा सकता है कि क्या किन्हीं कमियों के बावजूद प्रेमचंद के लेखन को समझने में मार्क्सवादी मीमांसा किसी हद तक सहायक हो सकती है ?

यह अलग से कोई प्रश्न नहीं बल्कि पुस्तक के प्रधान कथ्य के तार्किक विस्तार से जुड़ा सवाल है. उदाहरण के लिए, समीक्ष्य पुस्तक में प्रेमचंद को गांधी से प्रभावित माना गया है और गांधी के चिन्तन में 19 वीं सदी के चिन्तक भूदेव मुखोपाध्याय के विचार की अनुगूंज सुनी गई है. पुस्तक ध्यान दिलाती है कि ‘गांधी जैसी दृढ़ता के साथ आधुनिकता की ज्ञानमीमांसात्मक परम्परा को चुनौती देने वाला कोई नहीं दिखता’ लेकिन बंगाल में अरविन्दो और विवेकानंद के पहले से पश्चिम अर्थात आधुनिकता की मूलभूत आलोचना शुरु हो गई थी. साक्ष्य के रुप में समीक्ष्य पुस्तक में भूदेव मुखोपाध्याय के ग्रन्थ सामाजिक प्रबन्ध का एक लंबा हिस्सा उद्धृत किया गया है जिसमें आता है कि “सभ्यताओं के उद्देश्य और उनकी प्राथमिकताएं एक जैसी नहीं होतीं, इसलिए उनकी तुलना नहीं की जा सकती. तुलना सभी की स्वीकार्य सार्वभौम निकष पर ही संभव है और यह निकष मनुष्य की प्रेम करने की क्षमता का क्रमिक विस्तार हो सकता है. पहले व्यक्ति और फिर व्यक्ति से आगे बढ़ते हुए इस दायरे में परिवार, समुदाय, राष्ट्र और अन्ततः समूचा ब्रह्मांड आना चाहिए. लेकिन पश्चिमी संस्कृति में यह राष्ट्र पर आकर रुक जाती है. हिन्दू धर्म के सार्वभौम प्रेम की तुलना में यह मनुष्यता के लिए हीनतर लक्ष्य है.”

चूंकि पुस्तक में प्रेमचंद के राष्ट्र विषयक चिन्तन को गांधी और उनसे भी पहले भूदेव मुखोपाध्याय द्वारा की गई सभ्यता समीक्षा से जोड़कर देखा गया है सो यहां ठहरकर सोचा जा सकता है कि क्या मार्क्सवादी समीक्षा की कोई युक्ति प्रेमचंद के लेखन में आये राष्ट्रवाद और भारतीय संस्कृति की धारणा की समझ को ज्यादा पैना बनाने में सहायक हो सकती है ? तनिक थमकर सोचें तो लगेगा कि इस प्रश्न का उत्तर ‘हां’ में भी हो सकता है. जैसे मार्क्सवादी तर्ज की समीक्षा यह बता सकती है कि ‘खेतिहर समुदाय त्यागी-संन्यासी जान पड़ने वाले नेताओं की तरफ विशेष आकर्षित होता है. इसका खास रिश्ता सिर्फ हिन्दू धर्म से ही नहीं है. गांधी में जो त्याग-भाव है, वह उनके निजी दर्शन की देन है और इस दर्शन में निश्चित ही हिन्दू धर्म का भी योग है तथा कुछ ऐसा ही हो ची मिन्ह, मुजफ्फर अहमद या पी सुन्दरैया में दिखायी देता है लेकिन त्याग-भाव से किसी नेता के भीतर जो साख पैदा होती है सिर्फ वही भर किसान को लामबंद करने के लिए काफी नहीं होती. यह अनिवार्य तो है लेकिन पर्याप्त नहीं और इसके पर्याप्त होने के लिए जमीनी हालात(मैटेरियल कंडीशन) अनुकूल होने चाहिए. एक खास सहायक कारण जिसकी वजह से किसान उठ खड़े हुए और उनके संघर्ष ने उपनिवेश-विरोधी संघर्ष का रुप लिया, ग्रेट डिप्रेशन कहलाने वाली महामंदी है. महामंदी का एक महत्वपूर्ण घटक खेतिहर संकट भी है. किसानों की लामबंदी को संभव बनाने के लिए कांग्रेस ने अवाम के आगे भारत के भविष्य के बारे में एक ब्लूप्रिन्ट रखा. यह काम कांग्रेस के कराची अधिवेशन(1931) में हुआ. इसमें सार्वभौम मताधिकार, हर भारतीय नागरिक को एक सुनिश्चित जीवन-स्तर फराहम करने, अनिवार्य और निशुल्क शिक्षा, जाति-धर्म और लिंग की अपेक्षाओं से परे कानून के समक्ष बराबरी का दर्जा देने और धर्म से राजसत्ता के अलगाव की बात कही गई.’ ( यह अंश पेरी एंडरसन की पुस्तक द इंडियन आयडियालॉजी की ईपीडब्ल्यू में प्रकाशित प्रभात पटनायक कृत समीक्षा में आता है).

प्रेमचंद कांग्रेस के सक्रिय कार्यकर्ता नहीं थे लेकिन कांग्रेस के साथ उनकी सहानुभूति हमेशा रही. वे गांधी-भाव से सदा सन्नद्ध रहे लेकिन आलोचना तो उन्होंने अपने इस महात्मा की भी की है. और, जैसा कि इतिहासकार सुधीरचंद्र ने प्रेमचंद विषयक अपने एक पुराने लेख( प्रेमचंद: ए हिस्ट्रोरियोग्राफिक व्यू, ईपीडब्ल्यू, 11 अप्रैल 1981) में कहा है, वे उन बाध्यताओं को देख सकते थे जिसके भीतर कांग्रेस को उसके नेताओं के वर्गीय हितों की वजहों से काम करना पड़ता था तो भी उन्होंने “कांग्रेस की अपनी आलोचना को ऐसा साज-संवार दिया कि वह कांग्रेस के कार्यक्रमों की संगति में जान पड़े.” अगर इतिहासकार सुधीरचंद्र की बात ठीक है तो फिर प्रभात पटनायक का उपर्युक्त उद्धरण प्रेमाश्रम(1922) में आये किसान-सभा के जिक्र से लेकर कर्मभूमि(1932) के सत्याग्रह तक की व्याख्या में सहायक साबित हो सकता है.

यही बात समीक्ष्य पुस्तक में अस्मितावादी आदोलन की वैचारिकी के दायरे में हुए प्रेमचंद के मूल्यांकन को लेकर उठाये गये प्रश्नों के बारे में भी सोची जा सकती है. अंग्रेजी-राज भारतीयों के लिए स्मृति-नाश और जीवन-नाश दोनों का कारण साबित हुआ और इस दोहरे नाश की शिकार भारत-भूमि का हर समाज हुआ और दलित कहीं और ज्यादा शिकार हुए—समीक्ष्य पुस्तक के लेखक के इस मंतव्य से इनकार नहीं किया जा सकता. अंग्रेजी राज में पौने दो सौ बरसों में जितने अकाल पड़े और भारत-भूमि के आम जन काल-कवलित हुए वैसा मुगलों या उसके पहले के भारत में ना हुआ था. कुछ पुस्तकों (जैसे माइक डेविस की पुस्तक ‘ लेट विक्टोरियन होलोकॉस्ट्सः एल निनो फेमाइन्स ऐंड मेकिंग ऑफ दि थर्ड वर्ल्ड) में दर्ज तथ्य बताते हैं कि 1770 से 1890 के बीच के एक सौ बीस साल के वक्फे में भारत में इकत्तीस बड़े अकाल पड़े थे और उसके पहले के पूरे दो हजार सालों में सत्रह. इन बड़े अकालों का संबंध जितना जलवायु-गत परिस्थितियों से है उससे बहुत-बहुत ज्यादा अंग्रेजी साम्राज्यवाद से. अकेले 1769-1770 में ही, कंपनी की लूट और मौसम के प्रकोप ने मिलकर , बंगाल की एक तिहाई आबादी को भुखमरी और मौत के मुँह में धकेल दिया था. यह सिलसिला दूसरे महायुद्ध के दौरान “प्रगतिशील” अंग्रेजी राज द्वारा पैदा किए गए, ‘बंगाल के अकाल’ तक जारी रहा. खुद अंग्रेजी राज की रिपोर्टों में लिखा मिलता है कि इन अकाल में काल-कवलित होने वालों में 80 प्रतिशत आबादी वंचित वर्ग के लोगों की थी. जाहिर है, आज की राजनीतिक शब्दावली में ‘दलित’ कहलाने वाली जातियों के लिए अपनी नस्ली श्रेष्ठता के पैमाने पर उन्हें ‘हीन से भी हीनतर’ करार देने वाला औपनिवेशिक ज्ञान-कांड मृत्यु के सामूहिक आयोजन से कमतर ना था. लिहाजा, अगर कोई कहे कि ‘अंग्रेज देर से आये और जल्दी चले गये’ तो उसके इस अफसोस पर रोष या अचरज जायज है.

लेकिन बात यहीं तक रुक नहीं जाती. अगर ‘अंग्रेजों के देर से आने और जल्दी जाने’ का अफसोस कंपनी-राज की लूट की पहचान के बाद भी मौजूद और मुखर है, उसे स्वीकृति हासिल है तो फिर इसके कारणों की खोज जरुरी है— खासकर यह खोजना कि इस अफसोस का स्रोत नैतिकता की किस वैचारिकी में है और क्या वह वैचारिकी ‘भारतीय आधुनिकता’ की प्रचलित समझ को किन्ही कोण से ज्यादा समग्र बनाने में मददगार हो सकती है ? यहां उदाहरण के तौर पर लाहौर(जात पांत तोड़क मंडल) वाले मशहूर भाषण पर महात्मा गांधी और आंबेडकर के बीच चली बहस की चर्चा की जा सकती है.

महात्मा गांधी ने जाति की संस्था के विरुद्ध आंबेडकर के भाषण की मूल बातों के प्रतिवाद में जो कुछ लिखा उसका सार संक्षेप कुछ यों हो सकता है कि ‘ 1.हिन्दू धर्म विकसनशील है, उसका कोई एक और स्थायी ग्रंथ नहीं. 2.जो तर्क की कसौटी पर खरी ना उतरे और जिसे आध्यात्मिक प्रयोग में ना लाया जा सके उसे ईश्वर की वाणी नहीं माना जा सकता. 3. धर्मग्रंथ का अनिवार्य व्याख्याता कोई विद्वान नहीं हो सकता. धर्म विद्वानों से नहीं साधु-संतों और उनके जीवन एवं कथन पर चलता है. 4.हिन्दू धर्म का सार है कि सत्य ही ईश्वर और अहिंसा मानव-परिवारों का कानून है. 5.धर्म को उसके सबसे बुरे उदाहरणों से नहीं बल्कि सबसे अच्छे उदाहरणों से परखा जाना चाहिए.’ इन बातों के पल्लवन के बाद महात्मा का आंबेडकर से सवाल था कि “क्या चैतन्य, ज्ञानदेव, तुकाराम, तिरुवल्लूर, रामकृष्ण परमहंस, राजा राममोहन राय, महर्षि देवेन्द्रनाथ टैगोर, विवेकानंद और अन्य विद्वानों द्वारा सिखाया धर्म पूरी तरह से गलत है, जैसा कि डा. आंबेडकर ने अपने भाषण में दिखाया है ?

आंबेडकर के भाषण के प्रतिवाद के रुप में दर्ज महात्मा गांधी के ये उपर्युक्त वाक्य महत्वपूर्ण है क्योंकि यही वह ब्लूप्रिन्ट है जिसके दायरे में हिन्दू धर्म-परंपराओं के किसी पक्ष(जैसे कि निर्गुण भक्ति और उससे जुड़ी वैष्णवी परंपरा) को आधुनिक भाव-बोध के अनुकूल बताकर कहा जाता है कि अंग्रेज ना आते तो भी अपनी इतिहास-धारा के अनुकूल भारतीय मनीषा व्यक्ति के सत्य और मुक्ति के इहलौकिक विचार तक पहुंच ही जाती. दरअसल आंबेडकर इस सोच का प्रतिवाद करते हुए उसमें कुछ जोड़ते हैं. गांधी के प्रतिवाद के जवाब में आंबेडकर लिखते हैं महात्मा ने प्रश्न उठाया है कि “चैतन्य, ज्ञानदेव, तुकाराम, तुरुवल्ललुर, रामकृष्ण परमहंस द्वारा ज्ञापित धर्म गुणरहित नहीं हो सकता जैसा कि मैंने बताया है और ये कि किसी भी धर्म को सबसे खराब नमूने से नहीं बल्कि सबसे अच्छे परिणाम से परखना होगा. मैं इस वक्तव्य के प्रत्येक शब्द से सहमत हूं लेकिन मैं इस वक्तव्य से बिल्कुल नहीं समझ पाया कि महात्मा इससे क्या सिद्ध करना चाहते हैं. यह सत्य है कि धर्म को सबसे खराब नमूने से नहीं बल्कि सबसे अच्छे से परखना चाहिए. लेकिन क्या मामला यहीं समाप्त हो जाता है? मै कहता हूं नहीं. प्रश्न अब भी उठता है कि सबसे खराब इतने अधिक क्यों हैं और सबसे अच्छे इतने थोड़े से क्यों.”

आगे महात्मा गांधी के प्रतिवाद के बुनियादी दोष पर अंगुली रखते हुए आंबेडकर लिखते (और इस लिखे से उत्तर मिल जाता हैं कि धर्म के सबसे अच्छे उदाहरण इतने कम क्यों) हैं, “महात्मा ने तर्क दिया है कि संतों के उदाहरण को अपनायें तो हिन्दू धर्म सहनीय हो जाएगा, महात्मा का ये तर्क भी अन्य कारण से गलत सिद्ध होता है. चैतन्य जैसे सुविख्यात संत का नाम लेकर मोटे और सबसे सरल तरीके से महात्मा सुझाव देना चाहते हैं कि ढांचे में मूलभूत परिवर्तन किए बिना हिन्दू समाज सहनीय और खुशहाल हो सकता है. …जो इस बात पर निर्भर हैं कि वह बड़ी जाति के हिन्दू को एक अच्छा इंसान बनायेंगे तथा व्यक्तिगत चरित्र सुधारेंगे, वे मेरे विचार से अपनी शक्ति बरबाद कर रहे हैं और एक भ्रम पाले हुए हैं. क्या व्यक्तिगत चरित्र शस्त्र बनाने वाले को एक अच्छा आदमी बना सकता है, अर्थात जो आदमी गोला बेचता है, वह ऐसा गोला बनाये जो न फटे और गैस जहर ना फैलाएं ? …सच बात तो यह है कि हिन्दू अपनी जाति के बाहर वाले व्यक्ति को पराया मानता है.. कहने का मतलब है कि बेहतर या बदतर हिन्दू मिल सकता है लेकिन एक अच्छा हिन्दू नहीं मिल सकता. ऐसा इसलिए नहीं कि उसके व्यक्तिगत चरित्र में कोई कमी है. असल में, अपने साथियों के साथ उसके संबंध का आधार ही गलत है.”

अगर एक पंक्ति में कहें तो आंबेडकर के उपर्युक्त कथन में यह ध्वनि सुनी जा सकती है कि व्यक्तिगत आचरण की सच्चाई और अहिंसा की कुछ उज्ज्वल परंपराओं के कारण भारत-भूमि में प्राक्क्-आधुनिक(प्रोटो-मॉडर्न) संवेदना तो थी लेकिन इस संवेदना को सबके लिए साकार करने वाला ढांचा नहीं था, यह ढांचा तो अंग्रेजों या कह लें पश्चिमी आधुनिकता की यांत्रिकी के एक रुप यानी ‘विधि आधारित सेक्युलर शासन व्यवस्था’ ही ले आयी. सुदीप्तो कविराज जब कहते हैं कि ‘पॉलिटिक्स’ शब्द का ठीक-ठीक समानार्थी शब्द भारतीय भाषाओं में नहीं है तो दरअसल उनके कहे में आंबेडकर द्वारा उठाये गये प्रश्न की ही एक अलग स्तर पर ध्वनि सुनायी देती है. राजनीति, खासकर लोकतांत्रिक राजनीति(चाहे वह जितनी अधूरी हो) प्राक्क-आधुनिक संवेदना वाले पुराने भारत के लिए एकदम ही नया अनुभव थी. सो, समीक्ष्य पुस्तक में आगे यह सोचने के लिए सवाल बनता है कि क्या ‘अंग्रेज देर से आये, जल्दी चले गये’ में जो अफसोस निहित है, वह कहीं परंपरित भारतीय आधुनिकता की प्रकट कमी (विधि आधारित राज-व्यवस्था) का संकेतक तो नहीं, कहीं इस अफसोस में इस बात की स्वीकृति तो नहीं कि आधुनिकता के पश्चिम प्रोजेक्ट में भारत ने अपनी तरफ से कुछ जोड़ा और घटाया तो पश्चिमी प्रोजेक्ट भी भारतीय आधुनिकता की संवेदना को सबके लिए साकार करने में मददगार हुआ. ऐसा सोचने का एक प्रस्थान बिन्दु आनंद कुमारस्वामी की पुस्तक ‘ऐसेज इन नेशनल आयडिलिज्म’ में आया ‘माता भारत’ लेख हो सकता है. नयी-पुरानी आधुनिकता के आंगन में राष्ट्रवाद की भावमूर्ति तैयार होने की कहानी इस लेख में जिस महीनी और मार्मिकता से कही गई है- वह विरल है.

समीक्ष्य पुस्तक निबंधों( कुल तेरह) का संकलन है और सारे लेख प्रेमचंद-विशेषी नहीं लेकिन पुस्तक का एक महत्वपूर्ण हिस्सा(कुल चार लंबे लेख) प्रेमचंद के मूल्यांकन की समस्या से जूझते हैं. चूंकि पुस्तक में भारतीय आधुनिकता को जमीन बनाकर ‘हिन्दी की साहित्यिक संस्कृति’ को समझने-बताने की कामयाब कोशिश की गई है सो पुस्तक की वैचारिकी का दायरा बड़ा हो जाता है. प्रेमचंद, हिन्द-स्वराज, सिविलाइजिंग मिशन, अंग्रेजी की जगह, हिन्दी की शक्ति, हिन्दी का जातीय संगीत, हिन्दी साहित्य का इतिहास और साहित्य, इतिहास तथा स्वाधीनता जैसे विषयों को एक सूत्र में पिरोने की भरपूर गुंजाइश बन जाती है पुस्तक में. और, ठीक इसी गुंजाइश को देखते हुए उम्मीद की जा सकती है समीक्ष्य पुस्तक की संभावनाओं का विस्तार लेखक किसी अन्य पुस्तक में बड़े फलक पर करेंगे.

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पुस्तक का नाम—हिन्दी की साहित्यिक संस्कृति और प्रेमचंद

लेखक- डा. राजकुमार

पृष्ठ संख्या- 171, मूल्य सजिल्द—400

प्रकाशन—राजकमल प्रकाशन प्रा. लि., नई दिल्ली.

चंदन श्रीवास्तव

चंदन श्रीवास्तव

मूलतया छपरा (बिहार) के निवासी, पिछले पंद्रह सालों से दिल्ली में। आईआईएमसी और जेएनयू में पढ़ाई। “उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध में हिन्दी लोकवृत्त का निर्माण” शीर्षक से पीएचडी, दिल्ली के कॉलेजों में छिटपुट अध्यापन, फिर टीवी चैनल की नौकरी और अब विकासशील समाज अध्ययन पीठ (सीएसडीएस) की एक परियोजना इंक्लूसिव मीडिया फॉर चेंज से जुड़े हैं। इनसे  chandan@csds.in पर संपर्क संभव है। 

 

 

साभार: प्रतिमान

हिंदी साहित्यिक की विकट जीवटता: उस्मान ख़ान

विश्व-साहित्य की अवधारणा अभी हिन्दी में चर्चित नहीं है। इंग्लिश के विश्व-भाषा बनते जाने, पुस्तकों, पत्रिकाओं के ‘सॉफ्ट’ रूप आ जाने, इंटरनेट के विकास आदि ने विश्व-स्तर पर साहित्य-उत्पादन में वृद्धि की है। विश्व-साहित्य ने समीक्षकों का ध्यान फिर से आकर्षित किया है। हिन्दी-क्षेत्र में भी साहित्य-महोत्सव, रंग-महोत्सव, संगीत-महोत्सव, सिनेमा-महोत्सव आदि का चलन हो गया है। सुस्त और निराश हिन्दी साहित्यिकों के लिए इवेंट क्रिएट किए जाते हैं। ऐसे लोग हैं, जो शहरों में इश्तेहार लिए फिरते हैं – ‘निराश साहित्यिक मिलें’। थोड़ा खर्चा करना पड़ता है, पर उत्साह पैदा हो सकता है। हिन्दी का साहित्य-उत्पादक ठेके पर काम करता है, दिहाड़ी भी कर लेता है, अनियमित और मुक्त साहित्यिकों की भी कमी नहीं। कुछ ही को आराम है। हिन्दी कवि त्रिलोचन ने यूँ ही नहीं कहा – ‘हिन्दी की कविता उनकी कविता है जिनकी साँसों को आराम नहीं था’। #लेखक 

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विश्व-साहित्य और हिंदीयत

By उस्मान ख़ान

विश्व-साहित्य की अवधारणा १९वीं सदी के जर्मन साहित्यिक, राजनेता और विज्ञान-अनुसंधानी जोहान वोल्फ़्गेन फोन गेटे के लेखन में पहली बार प्रकट होती है। विश्व-साहित्य तब एक संभावना की बात थी। जर्मनी के ही क्रांतिकारी, समीक्षक, मज़दूर-नेता कार्ल मार्क्स और फ्रेडेरिक एंगेल्स ने साम्यवादी घोषणापत्र में आने वाले समय में असंख्य देशज और स्थानीय साहित्य से विश्व-साहित्य के उदय की संभावना जताई थी। २०वीं सदी में प्रिंटिंग-प्रेस और अनुवाद-कला के उत्तरोत्तर विकास ने विश्व-साहित्य के निर्माण को तेज़ किया। २१वीं सदी में मुक्त-बाज़ार और इंटरनेट के विश्व-व्यापी प्रभाव में विश्व-साहित्य के निर्माण और वैश्विक-सौंदर्य-मूल्यों के निर्माण की ओर साहित्यिकों और समीक्षकों का ध्यान तेज़ी से जा रहा है।

आज विश्व के कई देशों में तुलनात्मक साहित्य और विश्व-साहित्य विश्व-विद्यालयों, अध्ययन-केन्द्रों आदि के पाठ्यक्रमों में शामिल किया जा रहा है। अभी इस प्रश्न को हल नहीं किया जा सकता है कि विश्व-साहित्य में किन किताबों को शामिल किया जाना चाहिए! साहित्य के विभिन्न माध्यमों में विस्तार को देखते हुए यह काम और भी कठिन होता जा रहा है। लेकिन भविष्य में रास्ता अधिक साफ़ होगा। स्थानीयता का रूप भी अधिक स्पष्ट होगा। हिंदीयत क्या है? यह भी अधिक स्पष्ट होगा।

विश्व-साहित्य-समीक्षा अपने प्रारम्भ में यानी साम्राज्यवाद के विस्तार के समय यूरोप-केन्द्रित थी, आज साम्राज्यवाद की स्थिति भी बदल गई है और ग़ैर-यूरोपीय देशों और भाषाओं में भी विश्व-साहित्य-समीक्षा का प्रयास हो रहा है। डॉलर की सत्ता को वेनेजुएला और चीन जैसे देशों ने चुनौती दी है। पूंजीवाद-साम्राज्यवाद एक-रंगी विश्व-संस्कृति को प्रसारित करता है, एक-सा जीने, सोचने और खाने-पीने-पहनने पर ज़ोर देता है। विकासाधीन देशों में एक समय की प्रगतिशील कही जाने वाली पहलकदमी ने अपनी भूमिका खो दी है।

आज का समय लोकतन्त्र और विज्ञान की ओर बढ़ने का रास्ता छोड़ ३०-४० के दशक में पश्चिम-यूरोप के देशों द्वारा सुझाए फासीवाद की ओर बढ़ गया है। उत्पादन-पुनरुत्पादन की नीरस ज़िंदगी से अधिक वह अब और कुछ नहीं दे सकता। इसी कारण हिंसा-उन्माद-विकृति को ही ख़ुशी और अच्छाई मानने का प्रचार किया जाता है। बहू-रंगी संस्कृति से निर्मित विश्व-संस्कृति को वह स्वीकार नहीं कर पाता। रोज़गार और युद्ध के कारण बढ़ता पलायन विभिन्न संस्कृतियों के संयोजन का प्रमुख कारण है।

यह बहु-रंगी सांस्कृतिक स्थिति जीवन को रसपूर्ण बनाने में अभी असमर्थ है। यह कोलाहल किसी सरस गीत को जन्म देगा। विभिन्न संस्कृतियों का यह संयोजन पूंजीवाद-साम्राज्यवाद के सांस्कृतिक प्रभाव को कैसे कम या खत्म करेगा, यह इस पर निर्भर करता है कि निम्न-वर्गीय संस्कृतिकर्मी की क्या स्थिति है, क्या योजनाएँ हैं, वह कितना साहसी और सृजनशील है। विश्व की बदलती राजनैतिक-आर्थिक स्थितियों से विश्व-साहित्य के निर्माण में तेज़ी आई है। आज संस्कृतिकर्मी मुक्त-बाज़ार में फासीवाद और समाजवाद के संघर्ष की नई मंज़िल पर खड़ी है। मार्क्स और एंगेल्स ने आभिजात्य-वर्ग के साहित्यिक-उत्पादन के कॉस्मोपोलिटन या सर्वदेशीय चरित्र की बात कही है, आज निम्न-वर्गीय साहित्यिकों की भी ऐसी लंबी सूची बन चुकी है, जिनके साहित्य को कॉस्मोपोलिटन साहित्य कहा जा सकता है। सर्वदेशीय साहित्य या विश्व-साहित्य की अवधारणा ग़ैर-यूरोपीय देशों में प्रायः मार्क्सवादी विचारों के प्रचार-प्रसार के साथ ही पहुँचीं। विश्व की एकता पूंजीवादी-साम्राज्यवाद के पक्ष-विपक्ष में देखी जाने लगी। साम्यवादी घोषणापत्र को विश्व-साहित्य की पहली कृति कहा जाना अतिशयोक्ति नहीं है।

कम्युनिस्ट घोषणा पत्र का हिन्दी में अनुवाद क्रांतिकारी अयोध्या प्रसाद ने जेल में रहते हुए १९३३ में किया। उर्दू में इसके पहले घोषणापत्र के दो अध्याय मौलाना अबुल कलाम आज़ाद के साप्ताहिक अल-हिलाल में १९२७ में प्रकाशित हुए थे, लेकिन उर्दू में इसका पूर्ण अनुवाद १९४६ में ही संभव हो सका। बोलियों में अब तक इसका अनुवाद उपलब्ध नहीं है। सर्वदेशीय साहित्य बाज़ार और अनुवाद-कला के विशेष विकास की माँग करता है। सामंतकाल में भी ऐसे बाज़ार थे, अनुवाद भी होते थे, तब भी विश्व-स्तर पर एक से बाज़ार नहीं थे, बग़दाद हो या बनारस, अमेरिका के अस्तित्त्व से भी विद्वान तब अपरिचित थे।

पूंजीवादी-साम्राज्यवाद के प्रसार के साथ ही ऐसे शहरों, बाज़ारों और साहित्य का आविर्भाव संभव हो सका, जिन्हें सर्वदेशीय कहा जा सके। तब भी आज स्थिति और बदल गई है। भारतेन्दु, महावीर प्रसाद द्विवेदी और प्रेमचंद के नाम पर आधुनिक साहित्य के युगों का नाम कर देने के बाद भी ये साहित्यिक सर्वदेशीय प्रवृत्ति के उचित परिचायक नहीं हैं। अकबर इलाहाबादी, इक़बाल, प्रेमचंद आदि का लेखन हिन्दी-उर्दू में सर्वदेशीय साहित्य का आधार बनाता है। सर्वदेशीय साहित्य के उत्पादन में १९४० का दशक विशेष महत्त्व रखता है। ब्रिटिश-शासन का विरोध, व्यंग्य और उपन्यास का लिखा जाना आधुनिकता के लक्षण हैं, तब भी आधुनिक जीवन-स्थितियों के विकास के बिना आधुनिक साहित्य अपने उत्कृष्ट रूप में प्रकट नहीं हो सकता था। हिन्दी क्षेत्र में यह स्थिति १९४० के दशक में ही बन पाई। प्रगतिशील-लेखक-संघ का उदय (१९३६, लखनऊ अधिवेशन) सर्वदेशीय-साहित्य के निर्माण की वास्तविक भूमिका बना। ‘तार-सप्तक’ (१९४२) का प्रकाशन हिन्दी-कविता में आधुनिकता का वास्तविक प्रवेश है। हिन्दी-क्षेत्र में प्रेमचंद पहले हैं जो निम्न-वर्गीय सर्वदेशीय-साहित्य के निर्माण की ओर बढ़ते हैं। उन्हें प्रगतिशील-लेखक-संघ के पहले अधिवेशन का अध्यक्ष बनाया जाना अचरज की बात नहीं है। उनका साहित्य उस समय के लेखकों के लिए भी प्रेरणा-स्रोत था। ‘महाजनी सभ्यता’ को, धर्म और जाति के नाम पर चल रहे अन्याय-अत्याचार को सामने रखने का साहस और किसमे था? तब भी यशपाल, भुवनेश्वर, मंटो और मुक्तिबोध जैसे साहित्यिक ही हिन्दी-उर्दू भाषा में कॉस्मोपोलिटन साहित्य के उत्कृष्ट उत्पादक कहे जा सकते हैं। इन सभी का साहित्य लगभग एक ही समय में सामने आने लगता है, तब भी रूप-संयोजन और भाव-विचार की विविधता बनी रहती है। राहुल सांकृत्यायन का साहित्य भी इसी समय तेज़ी से सामने आता है। भारत में मुंबई और कोलकाता प्रारम्भिक कॉस्मोपोलिटन हैं। हिन्दी-क्षेत्र में ऐसे शहर १९वीं सदी के अंतिम दशकों में उभरने लगे थे। इनके समुचित विकास के बाद ही हिन्दी क्षेत्र में सर्वदेशीय साहित्यिक तेज़ी से उभरते हैं। हिंदीयत का विश्व-साहित्य से पहला सही मुक़ाबला १९४० के दशक से शुरू होता है। हजारीप्रसाद द्विवेदी, रांगेय राघव, अज्ञेय, मज़ाज, फैज, फ़िराक़, शमशेर, इस्मत चुगताई, कृशनचंदर समवेत हिंदीयत की एक पहचान बनती जाती है। विश्व-साहित्य और हिंदीयत का निर्माण एक-दूसरे के पूरक हैं। विश्व-साहित्य और हिंदीयत की अवधारणा को आज के साहित्यिक के ध्यानार्थ सामने रखना ही इस पर्चे का उद्देश्य है। दुनिया भर में पूंजीवाद-साम्राज्यवाद के विस्तार के क्रम में विश्व-साहित्य का निर्माण हुआ है, हिन्दी में भी अभिजात्य-वर्गीय और निम्न-वर्गीय साहित्य-धाराएँ इसी विस्तार में स्पष्ट होती चली गई हैं। मंटो ने चचा सेम को तब ही ख़त लिख डाले थे। अफ़सोस, आज हिन्दी-उर्दू के साहित्यिक उन खतों को भूल गए।

हिन्दी का साहित्यिक विकट जीव है – उसे एक साथ हिन्दी-उर्दू-इंग्लिश और हिन्दी-क्षेत्र की बोलियों को साधना पड़ता है। यही अच्छा है कि अब संस्कृत और फ़ारसी का दबाव जाता रहा है। फिर भी हिन्दी के निम्न-वर्गीय साहित्यिक को बाज़ार में भी ठीक भाव नहीं मिल पाता। इतनी साधना, और फायदा कोड़ी का भी नहीं। तब भी निम्न-वर्गीय साहित्यिक का उत्पादन किसी को भी हैरान कर सकता है। अनगढ़ ही सही, उसकी मेहनत और आशा-उत्साह से इनकार नहीं किया जा सकता। आज ऐसे निम्न-वर्गीय साहित्यिकों की संख्या हज़ारों-लाखों में हैं, जो विश्व-साहित्य का हिस्सा बनते जा रहे हैं। पारंपरिक महत्व प्राप्त साहित्य को भी फिर से जाँचा जा रहा है। विभिन्न देशों और भाषाओं के साहित्य का ‘सामान्य सौन्दर्यशास्त्र’ निर्मित करने का प्रयास किया जा रहा है। विश्व-स्तर पर साहित्यिक रूपों – यथा उपन्यास, सिनेमा आदि – के उद्भव, विकास और प्रकार्य का अध्ययन किया जा रहा है। विश्व साहित्य समीक्षा मानवीय और साहित्यिक मूल्यों को विश्व-स्तर पर जाँचकर देखने की कोशिश करती है। आज ऐसे समीक्षकों की कमी नहीं है, जो कई देशों और भाषाओं के साहित्य के गंभीर अध्ययन का अपने लेखन में उपयोग करते हैं। हिन्दी-साहित्य-समीक्षा भी इस स्थिति से लाभान्वित हो रही है। साहित्य के आंतरिक-पठन के साथ ही बाह्य-पठन का संश्लेषण इन समीक्षकों की विशेषता है।

विनोद कुमार शुक्ल ने लिखा है कि ‘मैं छत्तीसगढ़ी में वैश्विक हूँ’। ठीक बात, लेकिन यह छत्तीसगढ़ के समाज और लोगों के आंतरिक विरोध को छुपाकर नहीं, उजागर कर ही हो सकता है कि कोई छत्तीसगढ़ी में ही वैश्विक हो जाए। निम्न-वर्ग का प्रश्न हर कवि से सीधा है – साहित्यिक ने निम्न-वर्ग के लिए क्या किया? एक उत्पादक के रूप में निम्न-वर्ग की मुक्ति के लिए वह सचेत सक्रिय प्रतिबद्धता कैसे प्रदर्शित करता है? करता भी है या नहीं? मुक्तिबोध कविता में पुछते हैं – ‘बताओ तो किस-किस के लिए तुम दौड़ गए?’ स्थानीयता देशज शब्दों या प्राचीन और सामंतकालीन कथा-रूपों के प्रयोग से नहीं, बल्कि स्थानीय राजनीति में सक्रिय सहयोग से उत्पन्न होती है। इसमें साहित्यिकों के अपने समूह हो सकते हैं, सहमतियाँ-असहमतियाँ हो सकती हैं, लेकिन राजनीति को समझे बिना स्थानीयता को समझना नामुमकिन है। क्या अचरज अगर आज हबीब जालिब और विद्रोही जैसे कवि हिन्दी-क्षेत्र में प्रसिद्धि पा रहे हैं। स्थानीयता का निर्माण विशेष सामाजिक-पारस्परिकता में होता है। आभिजात्य-वर्ग और निम्न-वर्ग के संघर्ष और संवाद में स्थानीयता जन्म लेती है। ब्रिटिश-साम्राज्यवाद के अंतर्गत हमारी ज़ंजीरें साफ़ दिखाई देती थी, सुनाई देती थी, छुई जा सकती थी – आज स्थिति पूरी तरह बदल चुकी है। आज साहित्यिक के जीवन-मूल्य भी उपभोक्तावाद, एकरंगी संस्कृति के प्रभाव में है। हिन्दी साहित्यिक प्रायः निम्न-वर्गीय पक्षधरता से दूर है। जन-अलगाव से ग्रसित है। उसके सामने साम्राज्यवाद का बदला रूप स्पष्ट नहीं है। आभिजात्य-वर्ग और निम्न-वर्ग का संघर्ष और संवाद नए स्तर पर पहुँच गया है। निम्न-वर्ग की साधना वैश्विक होने की है, आभिजात्य-वर्ग की स्थानीय होने की।

विश्व में दो ही साहित्यिक-वर्ग रहे हैं – पूँजीपति और सर्वहारा, मालिक और नौकर, आभिजात्य और निम्न-वर्ग। हिन्दी का साहित्यिक भी इसका अपवाद नहीं। हिंदीयत छत्तीसगढ़ी या देहलवी होने से अलग चीज़ है। हिंदीयत हैदराबाद और मुंबई का भी अंश है। लाहौर और इस्लामाबाद का भी। जयपुर और पटना का भी। जबकि इनमें से हर जगह की अपनी स्थानीयता है। बनारसी भोजपुरी होकर भी बनारसी है। साहित्य की विविधता और विस्तार से भयभीत, मुक्त-बाज़ार से बढ़ी रोज़गार की अनिश्चितता से शंकित हिन्दी-समीक्षक विश्व-साहित्य और हिंदीयत के संबंध को समझने में प्रायः असमर्थ है। वह स्थानीयता के नाम पर देशज शब्द या शहरी चालू फिकरे या जगहों के नाम ही समझ पाते हैं। स्थान की अपनी वैश्विक बनावट को समझने की ओर वे झुक ही नहीं पाते हैं।

हिंदीयत भारतीयता से भी अलग है, विशेष है। हिंदीयत हिन्दी, उर्दू, इंग्लिश और बोलियों के लोगों से मिलकर तैयार होती है तथा हिन्दी-क्षेत्र में सर्वदेशीय नगरों के निर्माण से पहले इसका आस्तित्त्व नहीं था। पूंजीवाद-साम्राज्यवाद के विरोध में हिंदीयत का भी निर्माण हुआ और सर्वदेशीय साहित्य का भी। विभिन्न विचारधाराओं और व्यक्तित्वों के संघर्ष में हिंदीयत की अवधारणा का निर्माण होता आ रहा है। उसके उद्भव, विकास और प्रकार्य को समझने का काम अभी अधूरा है। प्रारम्भ में हिंदीयत की अवधारणा भी बड़े शहरों से संबद्ध थी, आज वह छोटे शहरों, कस्बों और गाँव तक प्रसारित हो चुकी है। विभिन्न धर्मों, जातियों-जनजातियों, समुदायों के लोग, विभिन्न राजनैतिक और सामाजिक संगठन, आभिजात्य-वर्ग और निम्न-वर्ग मिलकर हिंदीयत का निर्माण करते हैं। विभिन्न विचारधाराओं के समीक्षकों ने हिंदीयत की अलग-अलग व्याख्या की है। कभी इसे भारतीय कहा गया, कभी देशज तो कभी स्थानीय। हिंदीयत एक बहु-संस्कृतिपूर्ण क्षेत्र-भावना है। आज का साहित्यिक और समीक्षक भी बदली हुई स्थितियों में भारतीय, देशज या स्थानीय होने का अर्थ खोज रहा है। हिंदीयत का नया रूप विश्व-साहित्य की पूर्णता में प्रकट होगा। हिंदीयत की पहचान बनने के लिए आभिजात्य-वर्ग और निम्न-वर्ग निरंतर संघर्षरत हैं। दोनों अपनी-अपनी तरह की हिंदीयत के हामी हैं।

२१वीं सदी का हिन्दी साहित्यिक विश्व-साहित्य के संपर्क में है, हिंदीयत की पहचान भी उसे है। लेकिन आज हिन्दी के दोनों संघर्षरत वर्गों के साहित्यिक अपने वर्गीय उपचेतन को प्रकट करने में, उसका निस्संकोच, साहसिकता से चित्रण करने में प्रायः असमर्थ हैं। उनके मन में शंका है, डर है। दोनों ही अपने उपचेतन में नहीं उतरना चाहते – जहाँ हिंसा-उन्माद-विकृति का कोहराम मचा है। निम्न-वर्ग की आर्थिक-स्थिति से उसके साहित्यिकों का विश्व-साहित्य के संपर्क में न आ पाना समझा जा सकता है, वह अभी भी इंटरनेट पर उपलब्ध साहित्य के संपर्क में नहीं है, उसकी जेब प्रायः खाली है, विश्व-साहित्य की उसकी समझ का अभी निर्माण होना है, पर आभिजात्य-वर्ग की समस्या कुछ और है – सुस्ती और निराशा, शंका और भय, बाह्याडंबर और वाक्जाल से लगाव आदि। इस संबंध में दलित-साहित्य ही उल्लेखनीय है, जहाँ भारतीय उप-महाद्वीप के निम्न-वर्ग के उपचेतन का सुंदर चित्रण हुआ है। हिन्दी-साहित्यिक भी इस कार्य में पीछे नहीं रहे हैं। आज भारत का दलित-साहित्य अपने निजी अनुभवों का प्रायः उपभोग कर चुका है। अब उसे निम्न-वर्ग के अन्य-अनुभवों से खुद का संबंध बनाना होगा, अन्यथा वह भी नीरस जीवन का अंश बनकर रह जाएगा। दलित-साहित्य में भी आभिजात्य-वर्गीय-प्रेरणाएँ प्रकट होती रही हैं, जो दलित-साहित्य-विरोधी है। निम्न-वर्गीय स्त्री-साहित्य की संख्या पर अभी मुझे शोध करने की आवश्यकता है।

नई सदी की स्त्री साहित्यिकों में साहस और विचारधारात्मक प्रतिबद्धता का विकास आशापूर्ण है। वास्तव में वर्ग-संघर्ष और वर्गीय चेतन और उपचेतन स्तरों के अंतर्संबंधों की पूर्णता को देख पाने में आज का हिन्दी साहित्यिक प्रायः असमर्थ है। हिंदीयत की खोज का प्रारम्भ आधुनिक धार्मिक आंदोलनकारियों की छत्र-छाया में हुआ था, उसकी हिंसक-धर्मवादी व्याख्याएँ नई नहीं हैं। फ़ासीवाद की प्रेरणा हिन्दी-साहित्यिकों में गहरी पैठ बना चुकी है। हिन्दी का अभिजात्य-वर्ग संस्कृति और सभ्यता का जानकार और रक्षक होने का दावा करता है, यह वर्ग हिंसक-धर्मवादी व्याख्याओं को निर्मित और प्रचारित करता आया है। मुक्तिबोध ‘दिमाग़ी गुहान्धकार का औरांग-ऊटांग’ कविता में इस वर्ग के उपचेतन में उतरते हैं, वे पुछते हैं – ‘किसके लिए हैं बाघ-नख ये?’। उत्तर साफ़ है – निम्न-वर्ग के लिए। आज हिन्दी के लोकप्रिय साहित्य और कला पर उपभोक्तावाद और उससे जन्मे हिंसक-धर्मवाद का प्रभाव और भी स्पष्ट है। इन व्याख्याओं और हिंसा-उन्माद की कार्यवाहियों के बीच हिंदीयत की निम्न-वर्गीय प्रेरणाएँ निरंतर कुचली जा रही हैं। निम्न-वर्ग के साहित्यिकों पर भी इन व्याख्याओं का दबाव और दमन तथा बहिष्कार का भय व्याप्त है। हिन्दी के निम्न-वर्गीय साहित्यिक की वर्ग-चेतस-सक्रियता से ही इस स्थिति में बदलाव आ सकता है। हिन्दी के निम्न-वर्गीय साहित्यिकों के लिए आज जरूरी है कि वे विश्व-साहित्य को, हिंदीयत को समझें, पूंजीवाद-साम्राज्यवाद के विरुद्ध एकजुट हों, अपने उपचेतन को समझें, निम्न-वर्गीय-एकजुटता बनाएँ, नए सौंदर्यशास्त्र का निर्माण करें और विश्व-साहित्य के निर्माण में सक्रिय सहयोग दें!
usman khan

उस्मान ख़ान समकालीन हिंदी साहित्य के अलहदा युवा कवि-कथाकार हैंचर्चाओं और पुरस्कारों की भीड़ से अलहदा… छपाऊ मानसिकता से भी अलहदा... जे.एन.यूके हिंदी विभाग से मालवा के लोकसाहित्य पर पीएचडीइनसे usmanjnu@gmail.com पर संपर्क कर सकते हैं.

 

 

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