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हंस में ‘घुसपैठिये’ के दो साल: पीयूष राज

‘घुसपैठिये’ स्तंभ की कहानियाँ न तो भाव-शिल्प की जटिलता में फंसती हैं और न ही इनके सरलीकरण में. उनके समाज में जितने तरह के अन्तर्विरोध हैं, उन्हें ये रचनाएँ सहजता से उनके स्वाभाविक रूप में पूरी डिटेलिंग के साथ रखती हैं. यही कारण है कि भाव और भाषा का दुहराव इनके यहाँ नहीं है. यहाँ भले ही इन कहानियों के कुछ उद्धरणों को उदाहरण के रूप में दिया गया है, लेकिन इन कहानियों की एक विशेषता यह भी है कि इनको पूरा पढ़कर ही इसके समग्र प्रभाव को समझा जा सकता है. # लेखक 

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प्यास और पानी, सौजन्य: अंकुर

‘घुसपैठिये’ के दो साल 

By पीयूष राज

हंस में ‘घुसपैठिये’ नामक स्तम्भ के दो साल पूरे हो गए हैं. इस स्तंभ में मजदूर बस्तियों में रहने वाले किशोर उम्र के बच्चों की कहानियाँ छप रही हैं. इन ‘अभी-अभी जवान हुए या हो रहे’ बच्चों की किसी खास तरह की साहित्यिक या वैचारिक ट्रेनिंग नहीं है. इनकी कहानियाँ देखे और भोगे गए जीवनानुभव की रचनात्मक अभिव्यक्ति हैं. लगभग 60 के दशक से ही ‘भोगे हुए यथार्थ’ के नाम पर लिखी गई रचनाओं को कभी किसी साहित्यिक आन्दोलन या किसी अस्मितावादी साहित्यिक आन्दोलन के नाम पर हिन्दी साहित्य में सराहना मिलती रही है. 80 के दशक के बाद तो ‘अनुभव या अनुभूति  की प्रामाणिकता’ अस्मितामूलक साहित्य का पर्याय बन गई. आलोचना की हर तरह की धारा ने इन अस्मितामूलक साहित्य को अब स्वीकार कर लिया है. इन विमर्शों की रचनाओं के साहित्यिक मूल्यांकन हेतु नए तरह के सौंदर्यशास्त्र और सौन्दर्यबोध को गढ़ने का आग्रह किया जाता है खासकर रचनात्मक उत्कृष्टता के सन्दर्भ में. अगर किसी को शिल्प या भाव के दृष्टिकोण से इन विमर्शों की रचनाएँ कमजोर लगती हैं तो यह तर्क दिया जाता है कि अभी-अभी तो इन्होंने लिखना शुरू किया है, अब तक ये हाशिये के लोग कहानियों में पात्र ही रहे हैं, अभी तक तो कोई और इनकी कहानी लिख रहा था, अब इन्होंने अपनी कहानी अपनी जुबानी लिखना शुरू किया है तो इनसे भाव और शिल्प की प्रगाढ़ता एवं विविधता की बहुत अधिक उम्मीद ठीक नहीं है आदि-आदि. मेरा सवाल यह है कि क्या ‘घुसपैठिये’ स्तम्भ के कहानीकारों के सन्दर्भ में इनमें से कई बातें लागू नहीं होती हैं? ‘घुसपैठिये’ की कहानियों के भाव और शिल्प पर मैं आगे अपने विचार रखूँगा. लेकिन क्या जो मानदण्ड विमर्शों को हिन्दी साहित्य या साहित्य में स्थान देने के लिए अपनाए गए हैं क्या वो ‘घुसपैठिये’ पर लागू नहीं होता? क्या कारण है कि विमर्श के नाम पर किसी भी तरह की रचना की वाहवाही करने वाले आलोचक इन कहानियों पर कुछ नहीं बोल रहे?

‘हंस’ जैसी प्रसिद्ध हिन्दी पत्रिका जिसे मेरी जानकारी के अनुसार हिन्दी साहित्य के साधारण पाठक से लेकर वरिष्ठ आलोचक तक पढ़ते हैं. ऐसी स्थिति में ‘घुसपैठिये’ पर हिन्दी समाज की चुप्पी आश्चर्य का विषय है. ऐसा इसीलिए भी है कि ‘हंस’ द्वारा इससे पहले इस तरह के किए गए प्रयासों को हिन्दी समाज और हिन्दी आलोचकों ने हाथों-हाथ लिया है. कामगार बस्तियों के इन किशोर रचनाकारों की रचनाओं पर चर्चा के लिए मैंने अन्य विमर्शों का जिक्र इसीलिए किया क्योंकि ‘घुसपैठिये’ की हिन्दी आलोचना द्वारा उपेक्षा उसके दोहरे मानदण्ड की परिचायक है. अन्य विमर्शों के तहत एक ही तरह की भाव और भाषा में लिखी जाने वाली रचनाओं की ‘स्वानुभूति’ के नाम पर जरूरत से अधिक प्रशंसा और ठीक उसी वक्त में भाव और भाषा की विविधता से परिपूर्ण अपनी स्वानुभूति को रचनात्मक अभिव्यक्ति देती रचनाओं पर दो शब्द तक नहीं कहना उपर्युक्त बात की पुष्टि के लिए पर्याप्त है. आखिर ‘साहित्य के आरक्षित डब्बों में घुस आए’ इन घुसपैठियों से किन्हें खतरा है? मेरा साफ-साफ़ मानना है कि विमर्श और समकालीनता के नाम पर एक ही तरह की भावबोध वाली रचनाओं को इनसे खतरा है. ऐसा नहीं है कि विमर्श के नामपर लिखी लिखी जा रही सभी रचनाओं में कोई विविधता नहीं है. लेकिन अधिकांश रचनाएँ एक ही तरह की हैं. इसका कारण यह दिया जाता है कि इन रचनाकारों की सामाजिक-सांस्कृतिक पृष्ठभूमि एक ही तरह की है इसीलिए इनकी रचनाओं में भाव और शिल्प की समानता देखने को मिलती है. अब अगर ‘घुसपैठिये’ के रचनाकारों की के सन्दर्भ में देखें तो इनकी भी सामाजिक-सांस्कृतिक-आर्थिक पृष्ठभूमि एक ही है. यहाँ तक कि ये रचनाकार कमोबेश एक ही उम्र के हैं. लेकिन इनकी रचनाओं में अनुभव को अभिव्यक्त करने का तरीका बिल्कुल भिन्न है. भाव और भाषा दोनों स्तरों पर. इसका कारण यह है कि वे एक साथ इन कामगार बस्तियों के जीवन के भोक्ता भी हैं और दर्शक भी. भोक्ता इस अर्थ में कि वे इन कामगार बस्तियों में रहते हैं और दर्शक इस अर्थ में कि वे स्वयं श्रमिक नहीं हैं. श्रमिक उनके माता-पिता या सम्बन्धी हैं. इस कारण वे इस जीवन में लिप्त रहने के बावजूद रचना करते समय एक तटस्थ दृष्टिकोण रखने में सफल हैं. उनकी रचनाओं में विविधता का मूल स्रोत यही तटस्थ दृष्टिकोण है.

इनकी रचनाओं के बारे में यह बिल्कुल सही मूल्यांकन है कि ‘साहित्य के उत्पादक और उपभोक्ता, अभिलेखन/रिकॉर्डिंग और सृजन, किस्सा और तथ्य के बीच के अंतर यहाँ धुंधले पड़ जाते हैं.’ इनका जीवनानुभव कृत्रिम, बनावटी या अतिशयोक्तिपूर्ण नहीं है. शोषित-पीड़ित होते हुए इनकी रचना का लक्ष्य आत्मपीड़ा का प्रकाशन नहीं है. ऐसा नहीं है कि जीवन की विसंगतियां और बिडम्बना इनकी रचनाओं में नहीं है लेकिन वे रचना करने से पहले ऐसा पूर्व निश्चय करके नहीं चलते कि उन्हें इस पहलू को हरहाल में उजागर करना है. उनका जीवन ही ऐसा है कि उनके इस जीवन की विसंगतियाँ और बिडम्बनाएं स्वतः ही उनकी रचनाओं का हिस्सा बन जाती हैं. ऐसा इसलिए भी है कि उनका जीवन घटनापूर्ण है. कामगार बस्तियों में रहने वाले लोगों के दैनिक जीवन में ही तेजी से घटनाएँ घटती हैं. सुबह उठकर दैनिक क्रियाकर्म से ही इन घटनाओं की शुरुआत हो जाती है-

‘सुबह के साढ़े पाँच बजे, जब अँधेरा भूरा होने लगता है और सपाट आसमान में हल्के नीले बादल दरारें बनाकर उभरने लगते हैं तब अंसारी जी के मोहल्ले में सब कुछ रोज़ाना वाली एक-सी धुन में शुरू हो जाता है। घुर्र-घुर्र करती पानी की मोटरों से घरों की दीवारें और ज़मीन झन्नाटें लेने लगती हैं। चबूतरों पर पानी की बाल्टियाँ उड़ेल दी जाती हैं, नहीं तो पाइप से छूटती ताजे पानी की दूधिया धार सारा आँगन भिगोती हुई गली में उतर आती हैं और सींक वाली झाडुओं का ज़बरदस्त संगीत एक साथ नहीं तो एक के बाद एक सुनाई देने लगता। इस बीच अंसारी जी उबासियाँ लेते हुए अपने पुराने, जर्जर मकान की बालकनी पर खड़े होकर मोहल्ले भर को निहारते हैं।’ (अंसारी जी )

मध्यवर्ग और उच्चवर्ग का जीवन इतना अधिक घटनापूर्ण नहीं होता. यह वर्ग  अपने जीवन में घटनाओं को अंजाम देने की कोशिश करता है जबकि कामगार बस्तियों में घटनाएँ ही श्रमिक-जीवन को संचालित करती हैं. इसी कारण ‘घुसपैठिये’ के रचनाकारों की एक बड़ी विशेषता है- छोटी-छोटी घटनाओं की भी सूक्ष्मता से विस्तृत वर्णन. घटनाएँ इतनी तेजी से घटित होती हैं कि साधारण किस्म के अभिलेखन से इसे रचनात्मक तौर पर सम्भालना नामुमकिन है. इसके संतुलन के लिए ये अपनी कहानियों के लिए फैंटसी, डायरी-लेखन या रिपोर्ताज की शैली अपनाते हैं. कामगार-बस्तियों की जीवन शैली अपने-आप में व्यवस्था की आलोचना है. जब इस जीवन शैली को फैंटसी, डायरी-लेखन या रिपोर्ताज शैली में ये रचनाकार अभिव्यक्त करते हैं तो उसमें व्यवस्था की आलोचना समाहित होती है. रचना की शैली कुछ भी हो पर व्यंग्य का सटीक प्रयोग इनके यहाँ व्यवस्था की विद्रूपता के लिए देखा जा सकता है. उदाहरण के लिए इन कहानियों के कुछ कथनों को देखिए– “ अरे तूने मुझे कहाँ पाला है? मुझे तो अमेरिकन कुत्ते ने पाला था और उस एहसान का कर्ज मैं अभी तक चुका रहा हूँ.’ तिहाई लाल ने पूछा ने पूछा ‘कैसे’? ‘अरे क्या तुझे याद नहीं जब तेरे अमेरिकन कुत्ते की नई-नई शादी हुई थी तो वह मेरी लूँगी चुराकर भाग गया था. बदले में मैंने उसकी बीबी की पाँच रुपये वाली साड़ी फाड़ दी थी, बाद में पता चला कि वह पाँच रुपये की नहीं पाँच हजार की थी. उस साड़ी का कर्ज मैं अभी तक चुका रहा हूँ.”  (‘नींबू-पानी पैसा’)

–“अरे छोड़, जो कभी रामभक्त नहीं बना वो देशभक्त कैसे बनेगा?” (‘नींबू-पानी पैसा’)

–“‘सरकारी नौकर हैं’ कहकर ख़ुद को देश की सेवा में लगा बताते हैं और अंसारी जी पाँच बजे तक की ड्यूटी पूरी लगन से निपटाकर दो बजे ही लौट आते हैं.” (सुबह वाकई बेनकाब थी उर्फ अंसारी जी)

उपर्युक्त उद्धरणों से स्पष्ट है कि व्यवस्था और समाज की विसंगतियों को इतनी सूक्ष्मता से ये रखते हैं कि पाठक को कहीं से ये ऊपर से लादा हुआ या किसी वैचारिक बोझ से लदा हुआ नहीं लगता है. ऐसा आजकल की रचनाओं में बहुत कम देखने को मिलता है.

फैंटसी या कल्पना की सहायता से अभी तक ‘अँधेरे’ का प्रयोग व्यवस्था की सच्चाई को बयान करने के लिए किया जाता रहा है. लेकिन ‘घुसपैठिये’ के रचनाकारों ने ‘अंधेरे’ को सकारात्मक रूप में दिखाया है. इसका कारण यह है कि वर्किंग क्लास की इच्छाएँ-आकांक्षाएँ दिनभर के काम के बाद अंधेरे में ही आकार लेती हैं-

‘रोजान की आदत से सभी जग तो रहे थे लेकिन अंधेरा होने की वजह से सभी आँख बंद करके दोबारा से सो जाते थे, अरे अभी अंधेरा है, एक नींद और मार लेते हैं। आज तो सभी की मम्मियाँ और घरवालियाँ अगड़ाइयाँ लेकर सो रही थीं। बच्चों के तो मजे आ गए थे। सावदा मे पढ़ाने वाले टीचर ने जब सावदा मे इंट्री लिया तो पता चला कि यहाँ तो अभी रात है, सभी ने अपनी-अपनी घड़ी पर नजर गड़ाया और देखा कि उनका टाइम तो सही है पर चौकीदार अभी तक सोया पड़ा है। सावदा से जाने वाली बसें लाईट जलाए खड़ी हैं। भटटू के पापा ने अपनी बीबी को जगाया, ‘अरे भगवान, अब तो जग जाइए, सुबह हो गई है।’ ‘अरे कैसी बात करते हैं, आप भी सो जाइए रात काफी बची है। आपको नींद क्यों नहीं आ रही है।’ ‘आप को रात लग रही है बाहर के लोग सावदा में आने लगे हैं।’

बाहर के लोग भी यहाँ आकर चक्कर मे फंस गए हैं, अरे सावदा को क्या हो गया है? सावदा के बच्चे अभी अपने घरो में सोये हुए पड़े हैं। रोज ड्यूटी जाने वाले लोग भी बेखबर सोये पड़े हैं।’ (अंधेरा)

यहाँ अंधेरा इसलिए खास है क्योंकि यही इनके जीवन का ऐसा पल है, जहाँ ये थोड़े बेफिक्र हो पाते हैं. भागदौड़ भरी जिंदगी जहाँ ठहर जाती है और इन्हें लगता है कि काश ‘इस रात की कोई सुबह न हो’।

दिन की शुरुआत उनके लिए युद्ध जैसी होती है. जहाँ पानी जैसी चीज के लिए ‘जलविद्रोह’ होता है और वैसी ‘दोस्ती’ जिसे धार्मिक-आस्था नहीं तोड़ पाती उसे पानी की धार तोड़ देती है.

“बन्नो बाजी को पाइप खोले पानी भरते देख उन दोनों को मानो चपेट पड़ गया। दोनों आंटियां बन्नो बाजी पर बरस पड़ी। अपनी बहन को दो जंगली कुत्तियों की भांति आंटियों के बीच अकेले जूझते देख बन्नो बाज़ी की दो बहनें पीछे रह सकती थीं क्या? वह भी तीनों के बीच घुस गईं। ये वही तीन हमशक्ल बहनें हैं जिनका ज़िक्र मैंने पहले किया था और जो कुछ मैंने कहा था काफ़ी हद तक इन बहनों ने उसे साकार कर दिखाया। इन तीनों बहनों ने मिलकर उन दोनों आंटियों को बैकफुट पर धकेल दिया। इसी के साथ बहुत सी औरतें इन पांचों की मौजूदगी के कारण अपने ख़ाली डिब्बे लिए लौट रही थीं।”

आस्था और जेंडर-सम्बन्धी प्रश्न किसी भी समाज के मूलभूत प्रश्न हैं. ‘घुसपैठिये’ की कहानियाँ बहुत ही बारीकी से आस्था और जेंडर के प्रश्नों को उठाती है. ‘रात और दिन’ और ‘नींबू-पानी पैसा’ जैसी कहानियाँ आस्था की जड़ों को हिलाने वाली हैं. दूसरी ओर ‘सुबह वाकई बेनकाब थी उर्फ अंसारी जी’, ‘लड़की की डायरी’, ‘पहचान’, ‘वंश’ जैसी कहानियाँ जेंडर-सम्बन्धों के अन्तर्विरोधों को बारीकी से रखती हैं.

‘सुबह वाकई बेनकाब थी उर्फ अंसारी जी’ के इन दो उद्धरणों में वर्किंग क्लास के भीतर जेंडर की समझ के पहलू को पकड़ा जा सकता है.

‘अम्मी, अब्बू अच्छा शौहर कहाँ से लायेंगे? ये अच्छा शौहर क्या होता है?’

‘नहीं मिलेगा अच्छा शौहर! क्योंकि तुम्हारे अब्बू उसे पहचानते ही नहीं है इसलिए तुम सिर्फ़ तरकारी काटो, तुम्हें ही अच्छी बेगम बनना पड़ेगा।’ कहकर शबनम फिर से चूल्हा जलाने लगी, पर अंदर से जैसे भभक उठी थी। (अंसारी जी)

अपनी हँसी को विराम और गले को आराम देकर उन्होंने कुछ दम भरते हुए कहा, ‘हाँ, हाँ, ज़रूर! क्यों नहीं! अच्छा शौहर भी ले आयेंगे हम!’ सुनकर मासूमा ने अगला सवाल किया, ‘पर अब्बू, पहले बताइये कि अच्छा शौहर होता क्या है?’ मासूमा की आँखों में जिज्ञासा साफ़ नज़र आ रही थी। अब्बू ने उसकी कलाई पकड़कर पास खिसकाते हुए उसे बोले, ‘अच्छा शौहर वह होता है जो हमारी मासूमा को बेइंतहा मोहब्बत करे। उसकी सारी ख्वाहिशें पूरी करे। उसका अपने से भी ज़्यादा ध्यान रखे और हमेशा उसे खुश रखे।’ जवाब सुनकर खामोश मासूमा जैसे अब्बू की आँखों में कुछ टटोलने लगी पर अंसारी जी तो इस बेहद सच्चे जवाब के साथ ख़ुद को ख़ाली कर चुके थे। ज्ञान और धर्म की कोई अनमोल बात किसी को बताते हुए जैसा आनंद कोई गुरू महसूस करता है कुछ वैसे ही फक्र का अहसास अंसारी जी के चेहरे पर नज़र आ रहा था। मासूमा एकटक अपने अब्बू की आँखों में झाँक रही थी कि तभी उसने फिर से अब्बू को पुकारा और कहा, ‘अब्बूजान क्या आप भी एक अच्छे शौहर हैं?’ सवाल सुनकर अंसारी जी के मुँह से निकलने वाली ‘हाँ’ अंदर ही कहीं घुट कर रह गई और स्तब्ध से मासूमा को देखते रहे। चाहकर भी अपना जवाब बुनने के लिए शब्द नहीं खोज पाए। (अंसारी जी)

एक तरफ मासूमा की माँ शबनम का खुद के अनुभव के आधार पर कहना है कि क्योंकि अंसारी जी खुद अच्छे शौहर नहीं है तो वह उसके लिए कैसे अच्छा शौहर ढूंढ पाएंगे. यह अनुभव अधिकतर औरतों का है. लेकिन जब यही सवाल मासूमा ने अंसारी जी से किया तब वे असहज हो गए. अंसारी जी अभी तक स्त्री-पुरुष संबंध को सिर्फ पति-पत्नी के संबंध के रूप में ही देखते आए थे, जहाँ उन्हें कुछ भी करने की स्वतन्त्रता थी. लेकिन जब संदर्भ उनकी बेटी का आया तब उन्हें इस संबंध में औरत की पीड़ा का अंदाजा हुआ. अंसारी जी के माध्यम से यह पाठकों को भी इस संबंध में सोचने को विवश करता है.

‘अच्छा शौहर कैसा होता है?’ या ‘क्या आप अच्छे शौहर हैं?’ या ‘वो बेटा है या बेटी?’ या ‘अगर बेटा है तो क्यों है और बेटी है तो क्यों है?’ या ‘दोनों में फर्क क्या है?’ या ‘कपड़े अलग क्यों हैं?’ या ‘खेल अलग क्यों हैं?’ जैसे कौतूहलपूर्ण प्रश्नों से ये कहानियाँ, किसी आम पाठक को भी जेंडर सम्बन्धित सम्बन्धों पर सोचने को विवश कर देती हैं. इसका मूल कारण है कि इन रचनाओं में ये प्रश्न बहुत ही सहज और स्वाभाविक रूप से आए हैं और पाठक के भीतर भी उसी सहजता से पैठ जाते हैं.

उदारीकरण, बाजारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण के समाज पर पड़े प्रभावों खासकर ‘वर्किंग क्लास’ पर पड़े प्रभावों के बारे में अभी तक जितना भी साहित्य में लिखा गया है वो ज्यादातर बाहर से साफ़-साफ़ दिखने वाले प्रभावों के बारे में है. इस परिप्रेक्ष्य में ‘घुसपैठिये’ की रचनाएँ व्यक्ति नहीं समाज की मानसिक अवस्था को रचनात्मक अभिव्यक्ति देती हैं. ‘निरुमा’ और ‘माल की महफिल’ जैसी कहानियों में  वर्किंग क्लास सामाजिक मनोदशा को जितने बेहतर ढंग से रखा गया है वो उदारीकरण को केन्द्र में रखकर लिखी जा रही समकालीन रचनाओं में दुर्लभ है. इस सामाजिक मनोदशा के साथ सबसे खास तथ्य यह है कि नई पीढ़ी की का मानसिक विकास किस दिशा में हो रहा है, इसके बारे में ये कहानियाँ संकेत देती हैं. ‘वंश’ , ‘पहचान’, ‘एक लड़की की डायरी’, ‘मुस्कान’ जैसी कहानियाँ जहाँ बच्चों और किशोरों के भीतर जेंडर संबंधी समझ के अंतरविरोधों को बड़ी बारीकी से पेश करती हैं. इन कहानियों में सिर्फ उन बच्चों या किशोरों के मन में चलने वाले अंतरविरोधों को एकांगी रूप से नहीं वर्णित किया गया है बल्कि इस मानसिक टकराहट को सामाजिक अंतरविरोधों के बरक्स रखने का प्रयास इन कहानियों में है, जो  जेंडर संबंधी एक भिन्न किस्म के संघर्ष की स्थिति को पैदा करता है.

इसके अलावा ‘घुसपैठिये’ की कहानियाँ इस उदारीकरण के दौर में दम तोड़ते सहज मानवीय संबंधों के बीच नए तरह के मानवीय संबंधों की भी खोज करते हैं. इसका मुख्य कारण यह है कि इसके रचनाकार अभी किशोर हैं जो अपने आसपास खत्म होते मानवीय संबंधों को देख रहे हैं. ‘जन्मदिन’, ‘ख्याली मूर्ति’, ‘लंहगा’, ‘मातारानी’ जैसी कहानियाँ तेजी से सिमटती जा रही दुनिया के भीतर भावनाओं के एक नए संसार की तलाश हैं. पीड़ा, दुःख, गरीबी और शोषण इस दुनिया में भी है लेकिन इससे जूझने और मानवीय संबंधों को हर-हाल में बचाने की जीवटता भी है.

‘घुसपैठिये’ स्तंभ की कहानियाँ न तो भाव-शिल्प की जटिलता में फंसती हैं और न ही इनके सरलीकरण में. उनके समाज में जितने तरह के अन्तर्विरोध हैं, उन्हें ये रचनाएँ सहजता से उनके स्वाभाविक रूप में पूरी डिटेलिंग के साथ रखती हैं. यही कारण है कि भाव और भाषा का दुहराव इनके यहाँ नहीं है. यहाँ भले ही इन कहानियों के कुछ उद्धरणों को उदाहरण के रूप में दिया गया है, लेकिन इन कहानियों की एक विशेषता यह भी है कि इनको पूरा पढ़कर ही इसके समग्र प्रभाव को समझा जा सकता है. इस प्रभाव की थोड़ी-बहुत तुलना ‘औदात्य’ की परिभाषा से भी की जा सकती है. यानी कब रचना आपको अपने प्रभाव में ले लेती है आपको इसका भान नहीं होता. इस स्तंभ के सभी रचनाकारों का अपना कलेवर है. यह भिन्नता कामगार बस्तियों के जीवन के विविध पहलुओं को ही हिन्दी समाज के सामने रखने का एक सफल माध्यम है. ये अपनी बात ऐसी भाषा में कह रहे हैं जो निःसंदेह इनके बारे में एक बार सोचने को मजबूर करता है.

पीयूष राज. भारतीय भाषा केंद्र, जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय से पीएचडी. फिलहाल फर्स्टपोस्ट हिंदी में पोस्टेड हैं. उनसे , मोबाइल नंबर -09868030533 , ईमेल आईडी – piyushraj2007@gmail.com पर संपर्क सम्भव है.

साभार: हंस, अप्रैल, 2017

 

‘रंगून’ वंडरलैंड से वंडरलैंड की यात्रा है: तत्याना षुर्लेई

विशाल भारद्वाज की बहुप्रतीक्षित फिल्म ‘रंगून’ दर्शकों के समक्ष आ चुकी है. बहुप्रतीक्षित इसलिए भी कि भारद्वाज हिंदी सिनेमा के सबसे प्रतिभाशाली निर्देशक हैं और एक कला-रूप के साथ-साथ लोकप्रियता के पैमाने पर भी उनका स्ट्राइक रेट अन्य निर्देशकों के बनिस्पत अधिक रहा है. यह समीक्षा उनके लिए है जो फिल्म देख चुके हैं, उनके लिए नहीं जो इसे पढ़कर फिल्म देखने जाएँ या न जाएँ का फैसला करें. विशाल की फिल्म लोगों द्वारा देखे जाने और उस पर गंभीर प्रतिक्रिया के लिए लोगों को उकसाती हैं. विशाल दर्शकों के साथ-साथ फिल्म आलोचकों के भी प्रिय फिल्मकार रहे हैं. फिल्म आलोचक तत्याना षुर्लेई की यह तात्कालिक-प्रतिक्रया इसी की एक कड़ी है. #तिरछीस्पेल्लिंग

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‘रंगून’: वंडरलैंड से वंडरलैंड की यात्रा 

By  तत्याना षुर्लेई

विशाल भारद्वाज की नयी फ़िल्म ‘रंगून’ युद्ध के बारे में है. शुरुआत में दर्शकों को लड़ाई के दो रास्तों के बारे में बताया जाता है, एक महात्मा गाँधी का अहिंसा वाला और दूसरा सुभाष चन्द्र का हिंसा वाला. ऐसा लगता है जैसे फ़िल्म की कहानी कुछ दार्शनिक होने वाली है और इसका आधार ‘युद्ध की वैधता’ होगी. लेकिन फ़िल्म के दुसरे भाग में पता चलता है कि यह देशभक्ति-श्रृंखला वाली फ़िल्म है, जिसमें इतनी सारी चीज़ें डाल दी गई हैं कि नायकों के चरित्र और उनके चारित्रिक बदलाव को दिखाने के लिए ज़्यादा स्थान बचा ही नहीं है. फलस्वरूप फ़िल्म न तो देशभक्ति और गद्दारी के बारे में कोई दिलचस्प कहानी कह पाती है और न ही एक कठिन और नामुमकिन प्यार के बारे में. फिर भी,‘रंगून’ की बुनियाद में एक खुबसूरत आईडिया दिखाई देता है.

फ़िल्म की नायिका, मिस जूलिया (कंगना रानौत) ऐलिस की तरह एक वंडरलैंड जानेवाली है, जहाँ आम दुनिया के नियम बिलकुल नहीं चलते हैं. जंगल के कैम्प में रहनेवाले सिपाहियों को दिलासा देने और उनका मनोरंजन करने के लिए वह सुरक्षित और आरामदेह (कम्फर्टेबल) बॉम्बे से बर्मा जा रही है. यद्यपि लेविस कैरोल की ऐलिस और मिस जूलिया में यही अंतर है कि विशाल भारद्वाज की नायिका वंडरलैंड (बर्मा) जाने से पहले भी एक दुसरे तरह की वंडरलैंड (बॉम्बे) की निवासी है. बम्बइया सपनों का कारखाना वास्तविकता से बहुत अलग है, लेकिन यह अलगाव ही वह कारण है जिसके चलते मिस जूलिया और वहाँ काम करने वाले अन्य लोगों के लिए यह वंडरलैंड सुरक्षित है. फ़िल्म वाले फ़िल्म के सब से अच्छे गाने, ‘जूलिया’ के सीक्वेंस में दिखाते हैं. उनका सिर्फ एक प्यार है, मिस जूलिया और चिंता भी सिर्फ एक है कि मिस जूलिया का नेक्स्ट शॉट और अच्छा हो सकता था. इस दुनिया में बुराइयाँ तो ज़रूर होती हैं लेकिन सब को पता है कि अंत में मास्क पहननेवाली फीयरलेस हीरोइन आ जाएगी और सब को बचा लेगी, पर नए वंडरलैंड में ऐसा नहीं होगा.

विशाल भारद्वाज उन दो अजीब दुनियाओं पर खुद को ज़्यादा केन्द्रित नहीं कर पाया है. यह बात अजीब इसलिए भी है कि ‘रंगून’ की कहानी में यह अच्छी तरह दिखाई देता है कि जूलिया के फ़िल्म या फिल्म-शूटिंग वाले सारे दृश्य क़ुरबानी और देशभक्ति वाले प्लॉट से ज़्यादा अच्छे हैं, ऐसा लगता है जैसे भारद्वाज खुद ही असमंजस में है कि उसको अपनी कहानी से क्या-क्या अपेक्षाएं हैं! फ़िल्म का दूसरा भाग पहले से कमज़ोर है. दुसरे भाग में ट्रेजेडी तो है लेकिन इसके बावजूद भी ये सारी मौतें और डिस्टर्बिंग सीन्स वास्तव में कुछ ख़ास डिस्टर्बिंग नहीं हैं, और ‘तलवार’ वाले प्लॉट में कोई थ्रिल ही नहीं है. सच्चाई यह है कि इस तलवार वाली कहानी में कोई बड़ा सरप्राइज आता ही नहीं है.

‘जूलिया’ गाने के अलावा फ़िल्म में और भी अच्छे गाने हैं जिनमें से खास तौर पर ‘टिप्पा’ और इसका ट्रेन सीक्वेंस बहुत सुन्दर है. इस गाने में लार्स वॉन ट्रायर की ‘डांसर इन द डार्क’ फ़िल्म का बड़ा प्रभाव है लेकिन कहा जाता है कि लार्स वॉन ट्रायर खुद ‘दिल से’ (1998) के ‘चल छैंया छैंया’ गाने के दृश्य से प्रेरित था. जब तक लोग कुछ नया और आर्टिस्टिक वैल्यू निकालते रहेंगे, तब तक प्रेरणा नक़ल नहीं कहलायेगा. और, ‘टिप्पा’ गाना इसी तरह का है. सुंदर दृश्यों के अलावा भी इसका एक अलग महत्व है, दर्शकों को अच्छी तरह से दो वंडरलैंड्स दिखाई देते हैं. बर्मा-यात्रा के पर्यटकीय अंदाज की सुंदरता और चाक-चौबंद सुरक्षा अचानक से खतरे में तब्दील हो जाते हैं. युद्ध की दुनिया में स्वागत आफत की दुनिया में फंसने जैसा है; बर्मा आए हुए लोगों पर लड़ाकू विमानों का हमला शुरू हो जाता है. इस दृश्य के बाद सभी को पता चलता है कि वे अब बिलकुल अलग दुनिया में आ गए हैं. एक ऐसी दुनिया, जहाँ कोई सुपर, फीयरलेस हीरोइन किसी को बचा नहीं सकती है. फिर भी, कुछ समय बाद अपने प्रेमी, नवाब मलिक (शाहिद कपूर) की जान बचाने वाली मिस जूलिया के फ़िल्मी स्टंट वाले सीन यहाँ फिर से बहुत अच्छा और ताजा लगने लगता है और यह फ़िल्म के दुसरे भाग का सब से अच्छा सीक्वेंस है, जिसमें दो वंडरलैंड्स मिल जाते हैं. सपनों की दुनिया में रहनेवाली जूलिया को इसके बावजूद भी हारना था जबकि वह मिशन में शुरू में ही सफल हो गयी थी. मिस जूलिया और क्रूर मेजर हार्डिंग (रिचर्ड मकेब) ने एक क्षण के लिए एक-दुसरे की दुनिया की अदलाबदली कर लेते हैं. मिस जूलिया सुपर-हीरोइन के कपड़े पहनकर नवाब को बचाने की कोशिश करती है, और मेजर हार्डिंग एक्टिंग का इस्तेमाल कर उसको धोखा देता है क्योंकि युद्ध युद्ध होता है, युद्ध के बारे में एक हैप्पी एंड वाली फ़िल्म नहीं. बहरहाल फ़िल्म इंडस्ट्री के बारे में एक फ़िल्म बनाकर भी विशाल भारद्वाज इस टॉपिक का पूरा इस्तेमाल नहीं कर पाया है, हालाँकि उसकी कहानी में यह स्पष्ट है कि फिल्मवाले फ़िल्मी तत्व उसको सब से अच्छे लगते हैं.

जूलिया, नवाब और जापानी सिपाही की जंगल-यात्रा भी फ़िल्म का एक अच्छा हिस्सा है, जिसमें न सिर्फ जूलिया और नवाब का प्यार होता है बल्कि दर्शकों को भी पता चलता है कि युद्ध कितना क्रूर और अमानवीय होता है, साथ ही साथ दोस्त और दुश्मन का विभाजन भी आसान नहीं होता है. लोग अपनी मर्ज़ी से सिपाही नहीं बनते हैं, वे देशभक्त होने के बावजूद भी अपने परिवारों के साथ रहना चाहते हैं. अफ़सोस की बात यह है कि कैम्प में आने के बाद ये सारी दिलचस्प बातें कहीं गायब हो जाती हैं और फ़िल्म में बिलकुल नयी कहानी आ जाती है जिससे भारद्वाज खुद थोड़ा-सा परेशान लगता है. देशभक्ति वाला भाग फ़िल्म का सब से कमज़ोर भाग है और इसमें कई ऐसे तत्व, टुकड़े हैं जो विशाल भारद्वाज के स्टैण्डर्ड से बहुत नीचे के हैं. उदहारण के लिए नवाब के राष्ट्रगीत गाने वाला दृश्य इसी तरह के एक बैड-टेस्ट का उदाहरण है, ऐसा लगता है जैसे यह विशाल भारद्वाज ने नहीं किसी और ने बनाया है. यहीं पुल वाला अंतिम सीक्वेंस भी अच्छा नहीं है. फ़िल्म के तीनों नायक-नायिका इस सीक्वेंस में कागज़ के कठपुतली लगते हैं, इसीलिए इन्हें देखते समय दया नहीं, बल्कि शर्मिंदगी का अहसास होता है.

जिनकी फ़िल्म में बिलकुल ही ज़रुरत नहीं थी, उन सारी चीजों को फिल्म में डालने के कारण कहानी में दिलचस्प और ताजे विचारों के लिए जगह ही नहीं बची थी और यह अफ़सोस की बात भी है क्योंकि ‘रंगून’ में बहुत अच्छे और दिलचस्प चरित्र हैं. मिस जूलिया दो आदमियों के रिश्ते में है जिनमें से एक, रुसी बिलीमोरिया (सैफ अली खान), बॉम्बे वाले, सुरक्षित वंडरलैंड का हिस्सा है, और दूसरा, नवाब मलिक नए और खतरनाक वंडरलैंड का. उनमें से एक का चुनाव करना एक खास ज़िन्दगी का चुनाव करना भी होता, इसलिए मिस जूलिया के लिए यह चयन इतना मुश्किल लगता है.

दुर्भाग्य से मिस जूलिया के चरित्र को विकसित करवा पाने की जगह फ़िल्म में बिलकुल ही नहीं थी, इसलिए वह फिल्म के अंत में वैसे ही भोली लगती है जैसे फिल्म के शुरू में लगती थी. अगर स्क्रिप्ट थोड़ा-सा बेहतर होता तो कंगना रानौत का प्रदर्शन और भी अच्छा होता. यहीं पर सवाल उठता है कि अभिनय-प्रतिभा को दिखाने के लिए अगर स्क्रिप्ट में कोई जगह नहीं है, तो फ़िल्म में अच्छे अभिनेता-अभिनेत्रियों की फिर क्या ही ज़रुरत है? शाहिद कपूर और सैफ अली खान को एक्टिंग के लिए कंगना रानौत से थोड़ा-सा ज़्यादा मौका मिला है, साथ ही यहीं पर एक समस्या भी दिखाई देती है. वे तीनों परदे पर बस आते हैं और बातचीत करते हैं, चरित्र के निर्माण और विकास में योगदान देने वाले स्क्रिप्ट और अभिनय के अभाव में दर्शकों को उन्हें अच्छी तरह पहचानने और समझने का मौका नहीं मिलता है. यही कारण है कि फ़िल्म देखनेवालों के लिए यह कोई बात नहीं है कि वे जीते हैं या मर जाते हैं, क्योंकि उनसे दर्शकों का कोई गहरा संबंध स्थापित ही नहीं हो पाता है.

तीनों मुख्य पात्रों के अतिरिक्त एक बहुत दिलचस्प पात्र मेजर हार्डिंग भी है. वह बिलकुल ताजातरीन और नया खलनायक है, जिसको भारतीय संस्कृति से प्यार है और जो साथ ही साथ भारतीय लोगों के प्रति नस्लवादी व्यवहार भी करता है. लेकिन यहाँ भी उसके चरित्र को दिखाने के लिए फिर से जगह नहीं है. बस अचानक से वह एक क्रूर इंग्लिशमैन बन जाता है, जो सिर्फ यह कहता है कि मैं गोरा हूँ इसलिए हमेशा सही हूँ, या फिर भारतीय लोगों को अपमानित करता है. युद्ध का विषय विशाल भारद्वाज के लिए सहज नहीं था इसलिए जो तत्व देश की आज़ादी की लड़ाई से सम्बंधित हैं, वे सब से कमज़ोर हैं. अगर युद्ध सिर्फ एक पृष्ठभूमि (बैकग्राउंड) होती या भारद्वाज इसे फ़िल्म इंडस्ट्री के परिप्रेक्ष्य में देखता (जो बार-बार कई एक दृश्यों में बहुत अच्छी तरह दिखाता भी है), तो ‘रंगून’ सचमुच बहुत अच्छी हो सकती थी, और उसके एक्टर्स भी यह साबित कर सकते थे कि वे सचमुच में कितने प्रतिभाशाली लोग हैं.

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तत्याना षुर्लेई पोलैंड की रहने वाली हैं, एक इंडोलॉजिस्ट (भारतीय उपमहाद्वीपीय भाषा और संस्कृति की जानकार)  और फिल्म आलोचक हैं. हिंदी की मशहूर पत्रिकाओं और ब्लॉग्स के लिए लिखती रही हैं. पोलैंड के शहर क्राकोव स्थित जेगिलोनियन विश्वविद्यालय से द कोर्टसन फिगर इन इंडियन पॉपुलर सिनेमा: ट्रेडिशन, स्टीरियोटाइप, मैनिपुलेशननामक विषय पर पीएचडी हैं. वर्तमान में मनिपाल विश्वविद्यालय, कर्नाटक के यूरोपीय अध्ययन संस्थान में पढ़ाती हैं.

‘रईस’ की तुलना में ‘काबिल’ अच्छी फिल्म है: तत्याना षुर्लेई

 

“रईस” की तुलना में मैं “काबिल” की ओर हूँ. यह फ़िल्म “रईस” से अच्छी इसलिए है कि “काबिल” यह दिखावा नहीं करता है कि वह कुछ नया और आर्टिस्टिक दिखानेवाला है. दोनों फिल्मों को देखकर फिर से यह दोहराना पड़ेगा कि अगर किसी को बारीक सिनेमा बनाना नहीं आता है तो उसे मुख्यधारा में ही रहना चाहिए. मुख्यधारा और मनोरंजन कोई कमतर जगह नहीं है और ऐसी फिल्मों की बड़ी ज़रुरत है. “काबिल” में कुछ न कुछ कमियां तो हैं लेकिन “रईस” से अच्छी इसलिए लगती है कि यह अपने दर्शकों के प्रति फेयर और फ्रैंक है. इसका ट्रेलर भी किसी को धोखा नहीं देता है. सब को पता है कि यह मनोरंजन के लिए बनी एक व्यावसायिक फ़िल्म है और जिसकी कहानी उम्मीद के मुताबिक ही है. #लेखक

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काबिल  पोस्टर

काबिल: मनोरंजन कोई बुरी बात नहीं है

By तत्याना षुर्लेई

फ़िल्म की कहानी रोमांटिक और मासूम प्यार से शुरू होती है, फिर इसमें दारुण दुःख पहुंचाने वाली क्रूरता, हिंसा और अन्याय आते हैं, और अंततः राहत देनेवाला बदला. फ़िल्म का नायक, रोहन भटनागर (ऋतिक रोशन) एक अँधा जवान आदमी है जो एक सुन्दर लड़की, सुप्रिया (यमी गौतम) से प्यार और शादी करता है. सिनेमा में दिखने वाले विकलांग लोगों में अक्सर किसी एक कमी की जगह उन्हें कई असाधारण क्षमताएं दी जाती हैं (न सिर्फ भारतीय फिल्मों में – ऐसा स्टीरियोटाइप दुनिया की बहुत सारी फिल्मों में प्रभुत्व रखता है). रोहन भी इसी तरह का आदमी है – उसको दिखाई नहीं देता है लेकिन इस विकलांगता के प्रतिउत्तर में वह दुसरे लोगों की आवाज़ों को अच्छी तरह नक़ल करता है. रोहन कार्टून का डबिंग करता है और इस काम में इतना प्रतिभावान है कि अकेले ही फ़िल्म के सारे नायकों की अलग-अलग आवाजें देता है. उसकी यह योग्यता बाद में बदला लेने वाले दृश्यों में उनकी बहुत मदद करेगा.

आसपास में रहनेवाले दो अपराधी, अमित (रोहित रॉय) और उसका दोस्त माधव (रोनित रॉय) बार-बार रोहन और सुप्रिया की ख़ुशी के आड़े आते हैं. इनके लिए इस जोड़ी की विकलांगता मजाक उड़ानेवाली बात है. एक दिन वे छेड़-छाड़ से आगे चले जाते हैं और सुप्रिया का बलात्कार करते हैं. अमित का भाई शहर का बड़ा आदमी है इसलिए वह आसानी से भ्रष्ट पुलिस को अपने पक्ष में कर लेता है. भ्रष्ट पुलिस हिंदी सिनेमा का सब से पसंदीदा टॉपिक है जिससे फिल्मवाले अभी तक थके नहीं हैं. लेकिन विषयों का दुहराव और दर्शकों के उम्मीदों पर खरा उतरने वाला प्लॉट मुख्यधारा की सिनेमा के सबसे जरुरी हिस्से हैं.

अपनी पत्नी की मौत के बाद, यह देखकर कि पुलिस कुछ नहीं करेगा, रोहन खुद बदला लेता है और भ्रष्ट पुलिस इंस्पेक्टर से जीतता है. यह प्लॉट बहुत टिपिकल और आसान है – ऐसी फिल्में तो बार-बार बनती हैं, फिर भी हमेशा की तरह वे अपने दर्शकों को अंत में बड़ी राहत देती हैं. “काबिल” में नयी बात यह है कि फ़िल्म की कहानी एक ही तरह के दो दृश्यों से अच्छी तरह खेलती है. उदहारण के लिए रोहन की पत्नी के बलात्कार के केस में इंस्पेक्टर बार-बार बोलता है कि सबूत के बिना वह कुछ नहीं कर सकता है, लेकिन बाद में, बदले वाले दृश्य में, फ़िल्म का नायक भी पुलिस से अपने क्राइम के सारे सबूत छुपाता है. सुप्रिया ने फँसी लगा ली तो रोहन ने माधव को भी फांसी पर लटकाया. सुप्रिया का बलात्कार करने से पहले उसको बिस्तर से बांधा और उसके मुँह में कपड़ा लगाया गया था ताकि वह कुछ बोल न सके, तो ऐसी ही स्थिति लेटाकर अमित की भी हत्या होती है. इस तरह के अलग-अलग आइने में प्रतिबिंबित होने वाले दृश्यों की तरह सारी उल्टी परछाईयाँ फ़िल्म में दिखाई गईं हैं.

रुसी लेखक, अन्तोन चेखव ने एक बार लिखा की नाटक के शुरू में दर्शकों को अगर दीवार में लटकी बन्दुक दिखाई देती है तो इसका मतलब यह है कि कहानी में इसका इस्तेमाल जरुरी है. “काबिल” में इस नियम का प्रयोग बहुत हुआ है. लगभग हर छोटे दृश्य, जैसे साईकिल वाला, या रोहन का पत्नी को घड़ी गिफ्ट करना इत्यादि. पहले तो इन सब का कोई बड़ा मतलब नहीं दिखता है, लेकिन बाद में ये सारे दृश्य वापस आते हैं और नायक अपने बदले वाले दृश्य में इन सब का कोई न कोई प्रयोग करता है.

सबसे अच्छी बात यह है कि मुख्यधारा की दूसरी फिल्मों के विपरीत “काबिल” में जब भी  किसी ऑब्जेक्ट का दुबारा इस्तेमाल है तो दर्शकों को याद दिलानेवाला बोरिंग फ्लैशबैक या ऑफ-स्क्रीन से झुंझला देने वाली आवाजें नहीं आती हैं (बस फ़िल्म के अंत में अंधे लोगों के बारे में रोहन के शब्द दोबारा आए हैं). साथ ही साथ “काबिल” अपने दर्शकों की बुद्धिमत्ता का सम्मान करता है जो कि पॉपुलर फिल्मों में अक्सर नहीं होता है.

ऋतिक रोशन ने “काबिल” से पहले भी विकलांग आदमी का अभिनय किया है. मगर इस बार उसने अच्छी तरह से अपने सबसे बड़े हुनर को अपने नायक की विकलांगता से जोड़ दिया है. ऋतिक का सब से बड़ा कौशल उसका नाच है जो इस बार ड्रीम सीक्वेंस का हिस्सा नहीं है. डांस स्कूल के सीन में ऋतिक फिर से दर्शकों को यह दिखाता है कि वह बॉलीवुड का सब अच्छा डांसर है. पुराने थिएटर में लड़ाई के सीन में नायक के अंधापन के साथ अँधेरा का भी दिलचस्प इस्तेमाल है. यह जरुर है कि नायक का कौशल कभी-कभी कुछ ज़्यादा ही दिखाया गया है जो कि विकलांग आदमी में नहीं होते हैं.

अंधे लोगों की ज़िन्दगी में जो कुछ भी अजीब चीजें, हरकतें सामान्यतः दिखती हैं, फिल्मवालों ने भरसक कोशिश की है कि उनकी व्याख्या प्रस्तुत की जाएँ. शादी की रात, नायक और नायिका के कमरे में जली हुई सारी मोमबत्तियाँ, जो ट्रेलर में भी दिखाई गईं हैं, किसी को अजीब लग सकती हैं. इसीलिए फ़िल्म में उसकी व्याख्या है कि वे क्यों आईं! यहाँ मोमबत्ती फ़िल्म में चेखव वाली चीज़ बन गयी. दिलचस्प बात यह भी है कि इस फ़िल्म में ऋतिक रोशन की दूसरी फिल्मों से अलग दर्शकों को उसके दोनों अंगूठे पुरे समय दिखाई देते हैं. यह निशान कोई विकलांगता नहीं है, बल्कि नायक के भाग्यशाली होने की निशानी है, फिर भी अपनी पुरानी फिल्मों में ऋतिक इसे छुपाता था. चूँकि “काबिल” सामन्य लोगों से अलग दिखने वाले लोगों के शांति से जीने के अधिकार और उनके प्रति होने वाले भेद-भाव के बारे में फ़िल्म है, इसीलिए दूसरों से अपनी भिन्नता दिखाना विकलांगता के पक्ष में एक मज़बूत आवाज़ है. विकलांग नायक का अभिनय करना और खुद दूसरों से कुछ अलग होना अलग-अलग बातें हैं और यहाँ ऋतिक ने फिर से अपनी एक और खासियत का अच्छा इस्तेमाल किया.

फ़िल्म में कमियां ज़रूर हैं और उनमें सब से बड़ी शायद फ़िल्म का आइटम नंबर है. इसकी ज़रुरत बिलकुल नहीं थी, क्योंकि यह गाना और परफॉरमेंस अच्छा नहीं हैं. शायद फिल्मवाले आगे आने वाली अपने नायक की अलग-अलग लड़ाइयों से पहले दर्शकों को थोडा-सा आराम देना चाहते थे, फिर भी अगर ज़रुरत थी तो इसे ज़्यादा अच्छी तरह से करना चाहिए था. सुप्रिया का भूत वाला आईडिया भी ज़्यादा अच्छा नहीं था, इससे फ़िल्म बस ज़्यादा दयनीय बन जाती. नायिका की मौत और उससे पहले उसके प्रति घटित अपराध ही इतने कष्टप्रद हैं कि इससे ज़्यादा कुछ डालने की जरुरत नहीं थी.

फ़िल्म में एक चिंताजनक बात माधव की बहन के प्रति रोहन का व्यवहार है. माधव और उसका दोस्त अमित जब सुप्रिया को छेड़ते थे तो रोहन को मालूम था कि यह महसूस करना कितना कष्टप्रद है. फिर भी अपने बदले वाले क्षण में रोहन माधव की बहन को छेड़ता है. यह ज़रूर है कि रोहन का व्यवहार उतना ख़राब नहीं है जितना अमित और माधव का था. वह बस अमित की आवाज़ का नक़ल करता है और यह दिखाने की कोशिश करता है कि यह सब बुराइयाँ अमित ही करता है. लेकिन, बाद में वह माधव को स्पष्ट करता है कि यह आईडिया उसे यह महसूस करवाने के लिए था कि जब कोई तुम्हारी प्यारी बहन को छेड़ता है तो तुम्हें कैसा लगता है. इस तरह की सोच पूरी दुनिया में बहुत पॉपुलर है– जब एक आदमी दुसरे आदमी की औरत से बदतमीजी करता है तो बदले में उसकी औरत से भी यही बदतमीजी करनी चाहिए. जबकि दोनों मामलों में औरतें एक तरह से बेकसूर होती हैं. इसीलिए आदमियों के झगड़े में उनको घसीटने और दंडित करने का यह आईडिया बहुत खतरनाक है.

अगर फ़िल्म में एक छोटा-सा स्पष्टीकरण यह होता कि अपराधी क्यों यह सब अपराध करते हैं तो यह भी कहानी के लिए और भी अच्छा होता, और आखिर में इतनी लड़ाइयों के बाद नायक के चेहरे पर ज़्यादा निशान दिखने चाहिए थे. मेनस्ट्रीम सिनेमा का हीरो सुपर हीरो की तरह होता है लेकिन फिर भी इतनी पिटाई के बाद हीरो के चेहरे में भी कोई न कोई चोट तो आता ही है. इन कमियों के बावजूद “काबिल” वीकेंड के शाम के लिए बहुत अच्छी फ़िल्म है जिसे देखते समय दर्शक रो सकते हैं, हंस सकते हैं और अंत में राहत महसूस कर सकते हैं.

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तत्याना षुर्लेई पोलैंड की रहने वाली हैं, एक इंडोलॉजिस्ट (भारतीय उपमहाद्वीपीय भाषा और संस्कृति की जानकार)  और फिल्म आलोचक हैं. हिंदी की मशहूर पत्रिकाओं और ब्लॉग्स के लिए लिखती रही हैं. पोलैंड के शहर क्राकोव स्थित जेगिलोनियन विश्वविद्यालय से “द कोर्टसन फिगर इन इंडियन पॉपुलर सिनेमा: ‘ट्रेडिशन, स्टीरियोटाइप, मैनिपुलेशन” नामक विषय पर पीएचडी हैं. वर्तमान में मनिपाल विश्वविद्यालय, कर्नाटक के यूरोपीय अध्ययन संस्थान में पढ़ाती हैं.

सीरिया को यहाँ से देखो: माने मकर्तच्यान

सीरिया के बारे में एक भारतीय के रूप में हमें कुछ नहीं पता है. हम भारतीय सचमुच के भारतीय रह नहीं गए हैं. जिनके कारण हमें भारतीय तमगे से नवाजा जाता है वह एलिट भारतीयता है. जिसकी जडें इंग्लैंड,अमेरिका और यूरोप से जुड़ी हैं. यही जडें भारतीय मानस का विश्वबोध विकसित करने में सबसे ज्यादा रोल अदा करती हैं. यह अकारण नहीं हैं कि दक्षिणपंथी ताकतों से लेकर वामपंथी  तक सीरिया के बारे में एकमय राय रखती हैं. सीरिया को यहाँ से देखो मतलब पूरब के नजरिये से देखने का मतलब क्या होता है, इस आर्टिकल से समझा जा सकता है.

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Bulent Kilic/Agence France-Presse — Getty Images

सीरिया में शतरंज

By माने मकर्तच्यान

सीरिया

यह नाम आज दुनिया के कोने-कोने में चर्चा में है. वर्षों से राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय  मीडिया की मुख्य ख़बरों में सीरिया का नाम उछलता रहा है. मध्य एशिया के इस मुल्क की ज़मीन किन शक्तियों के बीच संघर्ष का केंद्र बनी है और सीरिया में हो रही घटनाएँ क्यों विश्व की राजनीति का भविष्य तय करने वाली हैं – इस पेचीदगी को समझने का प्रयास करते हैं.

नक्शे पर सीरिया को देखें तो पाते हैं कि यह देश पूर्वी गोलार्द्ध पर और विभिन्न संस्कृतियों के केंद्र में स्थित है. उत्तर में आर्मीनियाई तोरोस पर्वतमाला ने मध्य पूर्वी के इस देश को माइनर एशिया से पृथक कर दिया है. पश्चिम में भूमध्य सागर तटीय क्षेत्र, पूर्व में मेसोपोटामिया और दक्षिण में अरब रेगिस्तान से यह मुल्क घिरा हुआ है. राजनीतिक मानचित्र के अनुसार पश्चिम में लेबनान, उत्तर में तुर्की, पूर्व में इराक, दक्षिण में जॉर्डन और पश्चिम दक्षिण में इजरायल से उसकी सीमाएं बांधते हैं. आज का सीरियाई अरब गणतंत्र मात्र 70 साल पुराना है लेकिन सीरियाई सभ्यता का आरंभ लगभग 6000 ई.पू. माना जाता है. इसके प्रमाण वहां विश्व प्राचीनतम शहरों जैसे एब्ला, मारी, उगारित आदि में देखने को मिलते हैं. इसकी राजधानी दमिश्क पृथ्वी पर निरंतरता में बसे हुए सबसे पुराने नगरों में से एक है. इस शहर का प्रारंभिक उल्लेख 15वीं शताब्दी ई.पू. मिस्र के फ़िरौन तुतमोस तृतीय के भौगोलिक नक्शे में पाया जाता है. पहाड़ों से घिरे तथा जीवन के लिए आवश्यक जल स्रोत बराडा नदी के नज़दीक होने के कारण इसकी अवस्थिति सामरिक और नागरिक दोनों ही दृष्टियों से महत्वपूर्ण है. देश का व्यापारिक महत्व रखनेवाला दूसरा शहर अल्लेपो है जो कि उतना ही प्राचीन है.

हज़ारों सालों से व्यापारिक, आर्थिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक और सामरिक चौराहे पर स्थित यह भूखंड शुरु से ही विश्व की विभिन्न शक्तियों से प्रभावित और नियंत्रित होता रहा है. यहीं से विश्व के सभी छोटे-बड़े विजेता गुज़रे हैं. अकाडिनी-सुमेरों से लेकर हित्तियों, मिस्र के फ़िरौन, अश्शूर और आक्मेनिड फ़ारसियों तक यहां आए. सिकंदर के बाद 87 ई.पू. में आर्मीनियाई राजा तिग्रान के साम्राज्य में सीरिया का मिल जाना और आगे 64 ई.पू में रोमन साम्राज्य का इस पर कब्ज़ा हो जाना उल्लेखनीय घटनाएं हैं. इसके उपरांत समय समय पर सेल्जुक तुर्क, क्रूसेडर्स, मंगोल, मिस्र के मामलुक अन्य जातियां यहां तबाही मचाकर गुज़र चुकी हैं.

सीरिया 16वीं सदी से अगली 4 सदियों तक उस्मान तुर्कों के अधीन रहा. 1918 में प्रथम विश्व युद्ध में उस्मानी साम्राज्य की हार के बाद सीरिया एक स्वतंत्र राज्य बनने की उम्मीद में था कि फ्रांस व् ब्रिटेन ने मध्यपूर्व का आपस में बंटवारा कर लिया. सीरिया फ्रांस के नियंत्रण में आ गया. सन् 1920 में हाशमी परिवार के फ़ैज़ल प्रथम के अंतर्गत सीरिया कुछ महीनों के लिए स्वतंत्र राज्य बनकर उभरा. 1936 के सितंबर में सीरिया और फ्रांस के बीच सीरिया की स्वतंत्रता को लेकर एक मसविदे पर दस्तख़त हुए और हाशिम अल-अतास्सी को सीरियाई आधुनिक गणराज्य के प्रथम राष्ट्रपति के रूप में चयनित करने की योजना बनी. हालांकि यह संधि अस्तित्व में कभी नहीं आई क्योंकि फ्रेंच विधानमंडल इस करार की पुष्टि से मुकर गया. सीरियाई राष्ट्रवादियों और अंग्रेज़ों के सतत दबाव में अप्रैल,1946 में फ्रांस को अपनी सेना सीरिया से हटा लेने पर मजबूर होना पड़ा और अंततः उन्होंने सीरियन रिपब्लिकन सरकार के हाथ में देश की सत्ता सौंप दी.

वर्तमान राष्ट्रपति बशर अल-असद के पिता हाफ़िज अल-असद का जन्म निर्धन परिवार में हुआ था. विद्यार्थी रहते हुए ही वे बाथ पार्टी से जुड़ गए थे. आगे चलकर वे सीरियन एयर फोर्स में लेफ़्टिनेंट बन गए. 1963 के सीरिया में तख़्तापलट के उपरांत बाथिस्ट सेना का पुरे सीरिया पर नियंत्रण हो गया और उससे जुड़े हाफ़िज अल-असद सीरियन एयर फोर्स के कमांडर नियुक्त कर दिए गए. 1966 में एक और तख़्तापलट के उपरांत वे रक्षा मंत्री बना दिए गए और अपने देश की राजनीति में बहुत लोकोप्रिय होते चले गए. यही वजह थी कि जब उन्होंने समस्त सीरियन सेना के अध्यक्ष सालाह जदीद को निकाल बाहर किया तो कोई हाय-तौबा नहीं मची. 1970 में वे सीरिया के प्रधानमंत्री बन गए और 71 में राष्ट्रपति पद के लिए चुन लिए गए. उसी अप्रैल में मिस्र के अनवर सादात, लीबिया के मुअम्मर गद्दाफ़ी के साथ हाफ़िज असद ने ‘फेडरेशन ऑफ अरब रिपब्लिक्स’ नाम का संघ बनाने की चेष्टा की. यह समझौता विश्व राजनीति में एक बहुत ही मजबूत गठबंधन का रूप ले सकता था. इस विचार का इन तीनों मुल्कों की जनता में जबरदस्त स्वागत भी हुआ किन्तु यह संघ मात्र पांच वर्षों तक ही चल पाया. और इन तीनों मुल्कों में अनेक मुद्दों पर कभी भी पूरी तरह सहमती नहीं बन पाई. 1982 में हम्मा शहर की घेरेबंदी और विरोधी मुस्लिम ब्रडरहुड के उदय के बीच हम्मा के चालीस हज़ार नागरिकों की हत्या का आरोप भी हाफ़िज असद पर लगा. 1983 के नवंबर में हाफ़िज को हृदयघात हुआ. उसी समय उसके भाई रिफ़ात अल-असद जो तब सीरियन सेना के प्रमुख हुआ करते थे, ने हाफ़िज का तख़्तापलट करने की नाकाम कोशिश की. 1994 में हाफ़िज के सबसे बड़े बेटे की कार दुर्घटना में हुई मौत के उपरांत हाफ़िज अधिक बीमार रहने लगे. इन्हीं परिस्थितियों में 1994 में हाफ़िज के छोटे बेटे बशर अल-असद को सीरिया की राजनीति में लाया गया. जून 2000 में हाफ़िज असद की मृत्यु हो गई किन्तु उसके पहले ही उन्होंने सेना एवं उच्च पदाधिकारियों का समर्थन बशर के पक्ष में सुरक्षित कर लिया था. सत्तांतरण निर्विघ्न रूप से हो गया. असद ने पहले बाथ पार्टी का नेतृत्व संभाला और फिर सीरिया के राष्ट्रपति निर्वाचित कर लिए गए. लेबनान के 2005 के ‘सीडर रिवोल्यूशन’ के बाद वहां की सीरियाई समर्थन वाली सरकार का पतन हो गया और सीरियन सेना को वहां से हटना पड़ा. इससे बशर की साख़ को काफ़ी बट्टा लगा किन्तु फिर भी वह 2007 में दुबारा राष्ट्रपति चुन लिए गए.

अल्पसंख्यक अलावित (शिया मुसलमानों की एक धारा) के प्रभुत्व वाली इस सरकार के अंतर्गत सीरिया आदर्श मुल्क नहीं है, ख़ासकर नागरिक-मानवाधिकारों और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के मामलों में. बावजूद इसके यह अरब दुनिया में एक मात्र बचा हुआ स्वतंत्र धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र है. तुर्की और सऊदी अरब के मानवाधिकार-हनन के सामने सीरिया अभी भी शरीफ़ दिखता है. इसके लोकप्रिय, साम्राज्यवाद विरोधी और धर्मनिरपेक्ष सोच का आधार वहां की बाथ पार्टी (सीरियाई सरकार) की नीतियों से प्रेरित है, जिसमें मुस्लिम, ईसाई और द्रूज तीनों ही धर्मों के लोग शामिल हैं. मिस्र और ट्यूनीशिया के विपरीत, सीरिया में राष्ट्रपति बशर अल-असद को बड़ा जनसमर्थन प्राप्त है.

हालांकि हाल के वर्षों में बढ़ती बेरोज़गारी, सामाजिक स्तर और स्थितियों में गिरावट आई है और यह अकारण नहीं है कि वहां बड़े पैमाने पर विरोध प्रकट होते रहे हैं. विशेष रूप से 2006 में अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष के निर्देश पर मितव्ययिता, वेतन वृद्धि पर रोक, वित्तीय प्रणाली की नियंत्रण मुक्ति, व्यापारिक कानूनों में ‘सुधार’ और निजीकरण जैसी औषधियां पिला देने के उपरांत.

2010 में ह्यूमन राइट्स वॉच के अनुसार मानवाधिकारों के मामलों में सीरिया ‘दुनिया के सबसे ख़राब देशों में था’. सीरियाई अधिकारियों पर लोकतंत्र का ध्वंस करने, मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को गिरफ़्तार करने, वेबसाइटों पर रोक लगाने, ब्लॉगर्स को हिरासत में लेने और यात्रा पर प्रतिबंध लगाने जैसे अनेक आरोप लगाये गए. सीरिया के संविधान में लैंगिक समानता का अधिकार है किन्तु आलोचकों का कहना है कि व्यक्तिगत कानून और दंडसंहिता स्त्रियों के अधिकारों को सुरक्षित नहीं रख पाते. यही नहीं, वह पुरुषवादी ’प्रतिष्ठाजन्य हत्याओं’ के प्रति भी नर्म है।

2010 में ही मध्य-पश्चिमी एशिया एवं उत्तरी अफ्रीका में श्रृखंलाबद्ध विरोध-प्रदर्शन का दौर आरंभ हुआ जिसे अरब स्प्रिंग या अरब जागृति नाम से जाना जाता है. ‘अरब स्प्रिंग’ क्रान्ति ने अरब जगत के साथ-साथ समूचे विश्व को हिलाकर रख दिया था. इसकी शुरुआत ट्यूनीशिया में 17 दिसंबर,2010 को मोहम्मद बउजिजी- एक फेरीवाले के आत्मदाह से हुई थी. इस क्रांति की लपटें अल्जीरिया, मिस्र, जॉर्डन, यमन तथा अरब लीग व् इसके आसपास के क्षेत्रों में फैल गई. सीरिया भी उससे अछुता न रहा.

सीरियाई गृह युद्ध

सीरियाई गृहयुद्ध जॉर्डन की सीमा पर सटे एक छोटे से शहर दारा से शुरू हुआ. 17 मार्च,2011 को बशर अल-असद के त्यागपत्र की मांग को लेकर लोग सड़कों पर उतर आए. सीरिया का यह तथाकथित ‘शांतिपूर्ण’ विरोध-प्रदर्शन सीरियन सेना द्वारा बलपूर्वक दबा दिया गया. उसी जुलाई में सेना से टूटे हुए समूहों ने ‘मुक्त सीरियन सना’ के गठन की घोषणा की.

9 नवंबर,2011 तक संयुक्त राष्ट्र के मुताबिक राष्ट्रपति बशर अल-असद के ख़िलाफ़ विद्रोह के दौरान 3500 से अधिक मौतें हुई, जिसमें से 250 से अधिक सिर्फ़ 2 साल तक के बच्चे थे. कहा जाता है कि अनेक अल्पव्यस्क लड़कों के साथ सुरक्षाबल के अधिकारियों ने सामूहिक बलात्कार भी किया. विरोध की लपटें तेजी से चारों ओर फैल गईं.

अगस्त 2013 में असद सरकार पर अपने नागरिकों के ख़िलाफ़ रासायनिक हथियार इस्तेमाल करने का आरोप लगा. जून में ही व्हाइट होउस ने घोषित किया था कि अमेरिका को इस बात का विश्वास है कि असद ने राष्ट्रपति पद की सीमाओं का उल्लंघन करते हुए अप्रैल में अपनी निरीह जनता पर रासायनिक हथियारों का प्रयोग किया है. हालांकि इस बात का कोई पुख़्ता सबूत वे अब तक नहीं दे पाए हैं. अमेरिकी विदेश सचिव जॉन केरी ने दावा किया कि उनकी यह जानकारी अखंडनीय है. यह भी कहा “दुनिया किसी मुगालते में न रहे, और उन तमाम लोगों पर हर हाल में जिम्मेदारी तय की जाएगी जिन लोगों ने विश्व की सबसे निरीह जनता पर जघन्यतम हथियारों का इस्तेमाल किया है कि इस दुनिया में कुछ भी और नहीं है जो इससे अधिक गंभीर हो!”

बशर अल-असद के इस संभावित अमानवीय कृत्य पर किसी भी तरह की नरमी न बरतते हुए भी यह कहना आवश्यक है कि सीरिया पर 12,192, इराक पर 12,095, अफ़गानिस्तान पर 1,337 बम गिराने वाले और इराक में यूनाइटेड नेशनस असिस्टेंस मिशन फॉर इराक की रिपोर्ट के मुताबिक 2016 में अकेले इराक में 19,266 नागरिकों को बमबारी से मार देने वाले ‘शांति दूत’ और नोबल पुरस्कार विजेता बराक ओबामा और उनके प्रशासन के मुंह से यह उक्ति अशोभनीय लगती है.

बहरहाल, अमेरिका में इज़रायल के तत्कालीन राजदूत माइकल ओरेन ने वॉल स्ट्रीट जर्नल में तब साहित्यिक अंदाज़ में लिखा था कि “असद ने अपनी स्वतंत्रता मांगती जनता पर जो हिंसक हमला किया है वह इज़रायल के इस भय की पुष्टि करता है कि सीरिया के जिस शैतान को हम जान गए हैं वह उस शैतान से भी बदतर है जिसे हम अब तक नहीं जानते”. मई,2011 तक इज़रायल के शीर्ष अधिकारियों- प्रधानमंत्री, रक्षा मंत्री, विदेश मंत्री और राष्ट्रपति सबने सार्वजनिक रूप से घोषित कर दिया था कि वे असद का पतन देखने को आतुर थे. यह उन्होंने ओबामा की ऐसी ही घोषणा के तीन माह पूर्व कर लिया था. तब से सीरिया फिर एक बड़ी त्रासदी झेल रहा है.

किसकी किससे है लड़ाई ?

मुख्य रूप से सीरिया में चार भिन्न संगठनों के बीच युद्ध चला है. सीरियाई सरकार जिसमें अलावितों का बहुमत है. विरोधी दलों जिसमें सुन्नी मुसलमानों का बहुमत है, आइ.एस.आइ.एल या दाएश जो भी कह लें जो सलाफ़ी और वहाबी पंथ को मानने वाले सुन्नी हैं और कुरदीश रोजावा जो आम तौर पर शिया हैं. राष्ट्रपति असद के नियंत्रण में मुख्य रूप से सीरिया का पश्चिमी भाग और तटीय क्षेत्र है. इनका युद्ध सीधे तौर पर आइ.एस.आइ.एल और उन विपक्षी दलों के साथ है, जिसके अनेक घटकों ने मिलकर खुद को मुक्त सीरियन सेना की संज्ञा दे रखी थी. इस सेना का 2012 में एक दूसरे से मतभेद रखते अनेक खण्डों में विभाजन हो गया जिसका एक हिस्सा अतिवादी इस्लामिक संगठनों जैसे कि अल नुसरा/अल कायदा के साथ हो लिया और अन्य हिस्से बिना कट्टर जेहादी बनें असद के ख़िलाफ़ लड़ते रहे.

इस्लामिक स्टेट ऑफ इराक (आइ.एस.आइ.) के नेता अबू बक्र अल-बग़दादी ने अप्रैल 2013 में सीरिया में अल कायदा समर्थित आतंकवादी समूह में जो कि खुद को जबत अल नुसरा या नुसरा फ्रंट कहते हैं, का विलय किया और खुद को आइ.एस.आइ. के बजाय आइ.एस.आइ.एल (इस्लामिक स्टेट इन इराक एंड द लेवांत) या आइसिस कहने की घोषणा कर दी. हालांकि अल नुसरा फ्रंट के नेता अबू मुहम्मद अल-जव्लानी ने विलय के दावे का खंडन किया था. वैसे एक ही अतिवादी धारा के इन गुटों में विलय होना या न होना बाकियों के लिए कोई ख़ास मायने नहीं रखता है.

इस्लामी राज्य आज विश्व शांति के लिए ख़तरा माना जाता है.आइसिस तीन साल में इराक के बाद अपने आतंकी शिंकजे को सीरिया में फैला लिए और 29 जून,2014 को इस्लामी ख़लीफ़ाई साम्राज्य के निर्माण की घोषणा कर दी तथा विश्व के अनुमानित 1.5 अरब मुसलमानों को भी इस साम्राज्य का सदस्य बता दिया. आइसिस के ख़िलाफ़ कोई एक संयुक्त मोर्चा नहीं लड़ रहा है. रूसी वायु सेना समर्थित सीरियन सरकारी सेना, अमेरिका के नेतृत्व में पाश्चात्य गठबंधन, साथ ही कुर्द, लेबनान, इराक आर इरान के शियाई ताकतें आइसिस नामक भयानक बीमारी के ख़िलाफ़ लड़ रहे हैं. हालांकि पश्चिमी गठबंधन की यह नूरा कुश्ती है या सचमुच की लड़ाई यह भविष्य ही बतायेगा.

गौरतलब है कि जहां आइसिस का प्रभुत्व फैला वहां आतंक मचाना और सैकड़ों हज़ारों आम नागरिकों का कत्ल करना तो सामान्य बात थी. असंख्य युद्ध अपराध तथा विशेष रूप से अल्पसंख्यक येज़ीदियों और कुर्दों का नरसंहार भी किया गया. जनवरी, 2014 से लेकर 25 अप्रैल 2015 तक सिर्फ़ इराक में 28,34,676 लोग विस्थापित कर दिए गए जिसमें बच्चों की संख्या 13 लाख थी. इस्लामिक स्टेट के धर्म-पिता और उनकी ही तरह सलाफ़ी धर्म को मानने वाले सऊदी अरब का मानवाधिकारों का ट्रैक रिकॉर्ड भी घिनौना रहा है किन्तु अमेरिका जैसे उनके मित्र राष्ट्रों को उसपर किसी भी प्रकार की आपत्ति नहीं होती.

बहरहाल सीरिया का उत्तरी भाग रोजावा के नियंत्रण में है, जिसकी कमान कुर्दों की जनतांत्रिक संघ ईकाई वाई.पी.जी.के हाथ में है. गृहयुद्ध के दौरान असद सरकार ने अपनी सेना को रोजावा से हटा लिया था तबसे वहां आइसिस व विद्रोहियों के ख़िलाफ़ स्थानीय कुर्द लड़ाकुओं का युद्ध ज़ारी है. आज के दिन रोजावा और असद सरकार के बीच संबंध एक दूसरे के अस्तित्व के लिए ख़तरनाक नहीं रह गए हैं.

सीरिया और उसके विशाल पड़ोसी राज्य तुर्की के बीच संबंध तनावपूर्ण रहे हैं. इसका मुख्य कारण सीरिया की ओर से कुर्दिश स्वायत्त राज्य की स्थापना का समर्थन और तुर्की बांधों की समस्या है, जो सीरिया के लिए पानी की आपूर्ति में बाधा पहुंचाते हैं. इस गृहयुद्ध के दौरान तुर्की ने सीरियाई सरकार के विद्रोही दलों तथा आइसिस का भी बड़े पैमाने पर समर्थन किया और रोजावा की स्वायत्तता के खि़लाफ़ रहा.

पर इन सबसे बढ़कर बाहरी ताकतों का भिन्न स्तरों पर हस्तक्षेप बेहद महत्वपूर्ण है. सीरिया को लेकर संयुक्त राष्ट्र के वीटो शक्तियों के बीच दो समूहों में बंटवारा हो गया, एक पश्चिमी-अमेरिका के नेतृत्व में ब्रिटेन, फ्रांस, यमन, संयुक्त अरब अमीरात, कतर और 2016 के दिसंबर तक तुर्की सहित का गठबंधन और दूसरा पूर्वी -रूस, सीरिया, चीन, इरान का गठबंधन.

अमेरिका के नेतृत्व में पश्चिमी गठबंधन असद की सरकार को गिराने हेतु आइसिस व विद्रोहियों या विपक्षी दलों का समर्थन और प्रशिक्षण प्रत्यक्ष-परोक्ष रूप से करता रहा जबकि रूस और चीन युद्ध में असद सरकार के समर्थन में खड़े रहे.

15-16 नवम्बर,2015 को जी20 समिट में पुतिन के बयान ने सीरिया के इस गृह युद्ध की शक्ल ही बदल डाली. रूस के राष्ट्रपति ने तुर्की और अमेरिका के गठबंधन पर प्रहार करते हुए कहा कि आइसिस की आमदनी तेल और पट्रोलियम उत्पादों के अवैध व्यापार से होती है. प्रतिदिन तुर्की से इराक तक अंतहीन ट्रकों की शृंखला का खुलासा करने वाले उपग्रह चित्रों के माध्यम से अपनी बात की पुख़्ता करते हुए पुतिन ने कहा कि आइसिस की भिन्न-भिन्न इकाइयों का वित्तपोषण करने वाली ताकतों में 40 देश और उसी जी20 के कुछ सदस्य भी शामिल हैं. साथ ही यह भी कहा कि आइसिस को जड़ से तब तक ख़त्म करने में सफ़ल नहीं होंगे जब तक उनके आर्थिक स्रोतों को काट न दिया जाएं.

30 सितम्बर,2015 को सीरिया की सरकार के अनुरोध पर रूसी वायु सेना सीरिया में घुस गई. सीरियाइ सेना रूस की मदद से न सिर्फ आइसिस के विस्तार को रोकने में सफ़ल हुई, बल्कि उन्हें भारी नुक्सान भी पहुँचाया. तब से अब तक आइसिस ने 4600 वर्गमील भू-भाग और अपने 35,000 लड़ाकुओं को खो दिया है. सीरियाई सेना स्थानीय नागरिक सेनाओं के साथ मिलकर 586 शहरों व् गांवों को आइसिस से मुक्त करा चुकी है.

अगस्त, 2014 में ओबामा की आइसिस के ख़िलाफ़ बमबारी की घोषणा से उनकी विश्व भर में प्रशंसा हुई किन्तु सवाल यह उठता है आइसिस से चल रही इस लड़ाई में अमेरिका तीन सालों से कर क्या रहा था? अमेरिका का खुफिया तंत्र और सैन्य तंत्र अपने जानते दोहरी चाल खेल रहे है. एक तरफ तो आइसिस को हथियारों, प्रशिक्षण और सामरिक साधनों से लैस कर रहे हैं और दूसरी तरफ़ विद्रोही दलों को सीरियन आर्मी तथा आइसिस से लड़ने का प्रशिक्षण भी दे रहे हैं. अमेरिका असद को हटाना चाहता है और आइसिस भी यही चाहता है. चाणक्य की उक्ति ‘शत्रु का शत्रु मित्र’ के अनुसार असद को गिराने में अमेरिका और आइसिस मित्र हो जाते हैं. आइसिस से कोई प्यार न रखते हुए भी चूँकि असद को गिराना अमेरिका की पहली प्राथमिकता है तो आइसिस के साथ वन-नाईट स्टैंड की तर्ज पर हमबिस्तर होने में उन्हें कोई गुरेज नहीं होता. ख़ैर, दो नावों पर सवार होने का नतीजा क्या हो सकता है यह बार-बार भुगतने के बावजूद अमेरिका सीखने को तैयार नहीं दिखता. यह मानना भी संभव नहीं है कि अमेरिकी कांग्रेस और पेंटागन में समन्वय टूट चूका है और दोनों मुक्त रूप से अलग अलग नीतियों पर चल रहे हैं.

सीरियाई युद्ध कैसे उभरा?

सीरियाई युद्ध को समझने के लिए उसकी शुरुआत कहां से हुई और कैसे हुई समझना आवश्यक है. विश्वभर में लोगों को प्राप्त जानकारियां मुख्यधारा के माध्यमों द्वारा प्रचारित ख़बरों के ऊपर टिकी हुई है, जबकि अनेक सूत्रों से यह पता चलता है कि दारा से शुरू हुआ सीरियाई गृहयुद्ध मोसाद (इज़रायल खुफ़िया एजेंसी) और पश्चिमी शक्तियों द्वारा इस्लामी आतंकवादियों को स्थापित करने की एक सोची समझी योजना थी.

पहला महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि पश्चिमी मीडिया द्वारा सामने लाई गई यह ख़बर कि दारा आन्दोलनकारियों पर सीरियाई पुलिस और सशस्त्र बलों ने अंधाधुंध फायरिंग की और निहत्थे ’लोकतंत्र समर्थक’ प्रदर्शनकारियों की हत्याएं की और यह सही भी था किन्तु जिस बात का उल्लेख करना पश्चिमी मीडिया सुविधानुसार भूल गया, वह यह था कि प्रदर्शनकारियों में आतंकवादी निशानेबाज़ और हथियारबंद योद्धा भी थे, जो सोची-समझी रणनीति के तहत सुरक्षा बलों और प्रदर्शनकारियों दोनों पर गोलियां बरसा रहे थे. यह इस बात से भी साबित होता है कि दारा में मरने वालों में पुलिसकर्मियों की संख्या प्रदर्शनकारियों की तुलना में अधिक थी. और यह ख़बर कोई और नहीं, इज़रायल नेशनल न्यूज़ रिपोर्ट ने प्रसारित की थी, जो कि किसी भी हालत में दमिश्क के पक्ष में प्रचार नहीं करते. इससे यह स्पष्ट होता है कि दारा के आन्दोलन में पुलिसबल शुरुआत में बुरी तरह सशत्र जिहादियों द्वारा घिर गया था, न कि शांत आंदोलनकारियों पर गोलियां बरसा रहा था.

दूसरा महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि दारा के आन्दोलन में बाहरी शक्तियों की संलिप्तता का अंदाजा इस बात से भी लगता है कि यह सारा आन्दोलन दमिश्क या अलेप्पो में, जो कि प्रतिपक्ष के गढ़ हुआ करते थे, से न होकर जॉर्डन की सीमा पर स्थित दारा में हुआ. इन्टरनेट पर उपलब्ध अनेक औपचारिक सूत्रों के अनुसार (अल जजीरा और सी.एन.एन समेत) सीरियाई रेबेल्स को सीआईए द्वारा बड़े पैमाने हथियार उपलब्ध कराए गए थे और यह वर्षों तक जॉर्डन व् तुर्की की सीमा से होता रहा.

 ‘प्रोजेक्ट फॉर दी इन्वेस्टीगेशन ऑफ करप्शन एंड आर्गनाइज़्ड क्राइम’ (ओ.सी.सी.आर.पी) के जुलाई,2016 की रिपोर्ट के अनुसार युक्रेन, बोस्निया, बल्गेरिया, क्रोएशिया, चेक गणराज्य, मोंटेनेग्रो, स्लोवाकिया, सर्बिया और रोमानिया जैसे यूरोपीय देशों ने सैकड़ों टन की संख्या में राइफलों, मोर्टारों, रॉकेट लंचेर्स, टैंक रोधी हथियारों तथा भारी मशीनगनों को जिसकी कुल कीमत 12 लाख यूरो भी (वास्तविक आंकडें भविष्य बताएगा), सऊदी अरब और जॉर्डन व् तुर्की के जरिए सीरियाई लड़ाकुओं और आतंकवादियों के हाथ में थमा दिया. यद्यपि यू.एस. का बराबर कहना यह रहा है कि वे सिर्फ़ सीरियन लड़ाकुओं को चुन चुनकर प्रशिक्षित करते थे, आइसिस को नहीं. पर तथ्यों का कुछ और ही कहना है.

प्रसिद्ध मानवाधिकार समूह एमनेस्टी इंटरनेशनल द्वारा प्रकाशित 44 पृष्ठ के रिपोर्ट के मुताबिक आइसिस के पास अमेरिका-निर्मित भारी शस्त्रागार पाया गया था (जिसकी घोषणा रूस के रक्षा अधिकारियों ने भी बारंबार की है), जो कि इराकी सेना व उन्हीं सीरियन लड़ाकुओं से आइसिस को प्राप्त हुआ था. आइसिस के कब्ज़े में पाए गए हथियारों व गोला-बारूद का ज़खीरा ‘अंततः इस बात को दर्शाता है कि इराक में दशकों तक ग़ैर ज़िम्मेदारी से हथियार सप्लाई किए गए और अमेरिका के नेतृत्व में अधिकृत प्रशासन हथियारों के वितरण तथा स्टॉक को सुरक्षित रूप से प्रबंधन करने में नाकाम रहा.” अमेरिका और उसके गठबंधन में अन्य आपूर्तिकर्ता देशों की सोची-समझी साज़िश के तहत लापरवाही से, गै़र ज़िम्मेदारी या ‘जान बूझकर’ आइसिस के आतंकवादियों को हथियार पकड़ा दिए, यह बहस का मुद्दा है.

इज़रायली खुफिया सूत्रों (देखें देबका, 14अगस्त, 2011) तक ने इसको छिपाया नहीं हैः “शुरुआत से ही नाटो और तुर्की के हाई कमान द्वारा इस्लामी ‘स्वतंत्रता सेनानियों’ को  प्रशिक्षित और हथियारबंद किया गया. अफगान-सोवियत युद्ध से बचे हज़ारों मुजाहिदीनों को सी.आई.ए के इस धर्मयुद्ध में नियुक्त किया गया. इस पूरी योजना को सऊदी अरब और कतर का सक्रिय समर्थन प्राप्त था. आगे चलकर यह तथाकथित इस्लामी स्वतंत्रता सेनानी अल-नुसरा और आइसिस में समन्वित हो गए.” अपनी नाक बचाने के लिए अमेरिका अब चाहे स्वतंत्रता सेनानी जैसी पावन-सी संज्ञाएँ गढ़ता रहे, पर तथ्य यह है कि अमेरिका अपनी समस्त मूर्खताओं समेत अल-नुसरा और आइसिस का पोषण कर रहा था.

पुरस्कृत लेखक मिख़ाइल चोसुदोव्स्की, जो कि ओटावा विश्वविद्यालय में अर्थशास्त्र के प्रोफे़सर रह चुके हैं, और वर्तमान में वैश्वीकरण संबंधी अनुसंधान केंद्र के निदेशक हैं, के अनुसार सीरिया में विरोध प्रदर्शन का ढांचा लीबिया में ही बनाया गया था. “पूर्वी लीबिया में ‘लीबिया इस्लामिक लड़ाकू समूहों’ को ब्रिटिश एमआइ6 और सी.आई.ए का समर्थन पहले से ही प्राप्त था. सीरिया में मीडिया के झूठ और जालसाजी से निर्मित विरोध प्रदर्शन का उद्देश्य धर्मनिरपेक्ष मुल्क को कमज़ोर करना था और मानवोचित उद्देश्य के नाम पर अपनी ग़ैर कानूनी दखलंदाज़ी को ‘संयुक्त राष्ट्र’ से हरी झंडी दिलवाना था”.

तीसरा उल्लेखनीय तथ्य यह है कि जब ओबामा से पूछा गया था कि आइसिस सशक्त बनता जा रहा है तो ओबामा ने उत्तर इस विश्वास के साथ दिया था कि मानो आइसिस पूरी तरह उनके ही नियंत्रण में हो. “मुझे नहीं लगता कि वे कुछ अधिक ताकतवर हो रहे हैं. शुरू से ही हमारा उद्देश्य उन पर नियंत्रण रखना रहा है और हम इसमें सफ़ल रहे हैं….इराक में उनकी बढ़त नहीं हुई है. सीरिया में भी वे बस आयेंगे (असद का अंत कर?) और चले जाएंगे.”

एक तरफ़ अमेरिका का राष्ट्रपति कहता है कि उन्हें नहीं लगता कि आइसिस की बढ़त हुई है और दूसरी तरफ़ उसी अमेरिका का विदेश सचिव स्वीकार करता है कि आइसिस की वृद्धि हुई थी पर उसे रोकने की योजना भी न थी. विकिलीक्स ने हाल ही में संयुक्त राष्ट्र महासभा में सितम्बर,2016 को हुई गुप्त बैठक की रिकॉर्डिंग ज़ारी कर दी है. इसमें अचंभित कर देने वाले तथ्य उभरकर सामने आए हैं. बैठक में अमेरिका के विदेश सचिव जॉन केरी ने सीरियाई सरकार के विद्रोही प्रतिनिधियों को कहा कि उन्हें इस बात का ज़रा भी अंदाज़ा नहीं था कि असद अमेरिका के सामने घुटने टेकने के बजाय रूस के पास चला जाएगा- ‘हम जानते थे कि आइसिस की बढ़त हो रही है…हम देख रहे थे…हमने देखा कि यह बड़ी शक्ति के रूप में उभर रहा है और हमें लगा कि असद पर इससे बेतरह दबाव बनेगा और वह हमसे हमारी शर्तों पर समझौता करने पर मज़बूर हो जाएगा लेकिन ऐसा करने के बजाय उसने पुतिन से समर्थन मांग लिया…हमने सीरिया में बल प्रयोग का तर्क खो दिया’.

यदि अमेरिका को सच में आइसिस के पांव कांटने होते तो जून, 2014 में सीरिया से इराक तक ख़ाली रेगिस्तान के बीच से गुजरने वाले आइसिस के सिलसिलेवार टोयोटा ट्रकों के काफ़िलों को बमबारी से उड़ा न डालते? सीरिया के रेगिस्तान जैसा खुला क्षेत्र तो अमेरिका के प्रतिष्ठित जेट लड़ाकू विमानों (एफ़15, एफ22 रेप्टर, एफ6) के लिए सैन्य दृष्टि से गुड़ियों का खेल होता. यही नहीं, 2015 के अक्टूबर में रूसी और अमेरिकी वायु सेनाओं के बीच सीरिया में आपातकालीन स्थिति के दौरान उड़ान पथों को लेकर मार्गदर्शित करने, बमबारी और अन्य गतिविधियों पर हुए समझौते के तहत रूसी वायु सेना को सटीक जानकारी देने के बजाय पश्चिमी गठबंधन की ओर से भ्रमित तथा दुर्व्यवहार करने के अनेक आरोप लगे हैं. इनमें एक आरोप यह था कि अमेरिकी विमान अपनी उड़ान के स्तर से लगभग एक किलोमीटर (0.62 मील) नीचे जाकर रुसी एस.यू 35 लड़ाकू जेट के मार्ग में बाधा पहुंचाते थे. अमेरिकी सैन्य अधिकारियों ने इस पर रुसी अधिकारियों से माफ़ी भी मांगी थी. इससे भी भयानक घटना 17सितंबर को घटी जब देर एज़-ज़ोर में पश्चिमी गठबंधन द्वारा रूसी विमानों को लक्ष्य से गुमराह कर दिए जाने के बाद किए गए उनके हमले में 62 सीरियन सैनिक मारे गए और 100 घायल हुए. हमले से 2 महीने बाद पेंटागन ने लिखित रूप में स्वीकारा कि घटना “खेदजनक त्रुटि” थी. अमेरिका की अत्याधुनिक व् श्रेष्ठतम सैन्य मशीनरी की ऐसी बेहूदा हरकतों पर वहां के रक्षा सचिव को शर्म से डूब मरना चाहिए था.

सीरियाई गृह युद्ध के कारणों में से सबसे मज़बूत और महत्वपूर्ण कयास यह है कि यह सारा खेल तब शुरू हुआ था जब सन् 2000 में अमेरिका समर्थक कतर ने सऊदी अरब, जॉर्डन, सीरिया और तुर्की के जरिए यूरोप तक प्राकृतिक गैस पहुँचाने वाले दस बिलियन डॉलर, 1500 कि.मी. पाइपलाइन के निर्माण करने की घोषणा की. वहां ईरान की भी पाइपलाइन के निर्माण की योजनाएं थीं जो कि इराक और सीरिया के बीच से निकलने वाली थी और रूस को इस पर कोई आपत्ति नहीं थी. रूस ने कतर और तुर्की पाइपलाइन की योजना को अपने अस्तित्व को ख़तरे में डालने वाली नाटो की साजिश बताया. यूक्रेन में 2014 के विद्रोह के पीछे भी यही साजिश थी जहां से रूस के 80% गैस का रास्ता गुजरता था और जिस पर नाटो की निगाहें टिकी हुई थी. युक्रेनियन युद्ध के ठीक पहले अमेरिकी उपराष्ट्रपति बायडेन के पुत्र, केरी परिवार यूक्रेन के सबसे बड़े नेचरल गैस के प्रोडूसर बोर्ड में शामिल कर लिए गए, क्रांति हुई और आख़िर नाटो अपने मिशन में कामयाब हुआ. विकिलीक्स द्वारा हिलरी क्लिंटन के गुप्त कागजों के खुलासे से यह भी स्पष्ट होता है कि लीबिया और सीरिया में यह सारा षड्यंत्र इसलिए भी रचा गया है क्योंकि वे अमेरिकी डॉलर से नाता तोड़ने और पश्चिमी केंद्रीय बैंकिंग के एकाधिकार से मुक्त होना चाहते थे.

बहरहाल, सीरिया के इस युद्ध में रूसी और अमेरिकी सैन्य बलों के बीच कोई सीधा संघर्ष नहीं है. यह तो एक परोक्ष युद्ध है जिसमें पश्चिमी शक्तियों समर्थित विद्रोही दल और उन्हीं शक्तियों द्वारा पोषित आइसिस रूस समर्थित सीरियाई सरकार के ख़िलाफ़ लड़ रहे हैं. इसका जीता जागता उदाहरण अलेप्पो है.

मीडिया का षड्यंत्र

सीरिया के अति प्राचीन और व्यापारिक दृष्टि से महत्वपूर्ण अलेप्पो शहर को आइसिस से मुक्त कराने की लड़ाई यहाँ उल्लेखनीय है. यह आइसिस की रीढ़ तोड़ देने वाली लड़ाई थी, साथ ही साथ ज़ियोनिस्ट ताकतों के इशारों पर नाचती पश्चिमी मीडिया के विद्रूप चेहरा का पर्दाफ़ाश भी कर दिया. एक-एक करके सी.एन.एन., बी.बी.सी., अल जज़ीरा और तमाम मुख्यधारा के मीडिया के नकाब उतर गए. इसमें ट्विटर और फे़सबूक पर सक्रिय एजेंटों की भी पोल खुल गई.

युद्ध की विषम परिस्थितियों में, जहां बिजली आपूर्ति जैसी समस्याएँ आम बात हैं, वहां चंद ‘मासूम नागरिक’ इंटरनेट सुविधा से परिपूर्ण, दुनिया को सीरियाई सेना और रूस की क्रूरता का ‘आंखों देखा हाल’ दुनिया को दिखाने का कर्तव्य निभा रहे थे. ‘यह मेरा अंतिम विडियो है’…‘अलेप्पो में लोग भाग रहे हैं’…‘कोई अब बचा नहीं, सब मर गए हैं’ आदि आदि हैश-टैग करते पोस्टों को लाखों फे़सबूक व् ट्विटर के योद्धाओं ने मीडिया के हाथों की कठपुतली बनकर उनके झूठ और अफ़वाहों को अंतिम सत्य मान लिया और आगे प्रसारित भी किया. इस पूरी प्रक्रिया में आइसिस नाम का उल्लेख ऐसे नदारद था जैसे इस नाम का कोई संगठन कभी रहा ही न हो. नतीजा यह निकला कि सीरियन व रूसी सेना विश्व भर में निंदनीय बन गई. इतना बड़ा मिथ्या-प्रचार अभियान इस युद्ध में पहली बार देखा गया.

यह बात बिल्कुल सही है कि हर युद्ध में कोलैटरल डैमेज भी होता है और आम नागरिक भी मारे जाते हैं. ऐसा हम प्रथम और द्वितीय महायुद्धों जिसमें हिरोशिमा व नागासाकी भी शामिल हैं, से लेकर इराक और अफगानिस्तान के युद्धों में देख चुके हैं जहाँ विपक्षी लड़ाकुओं के अलावा लाखों की संख्या में निरीह नागरिक मारे गए. और ऐसा कुछ अलेप्पो में भी हुआ होगा किन्तु यह विश्वास कर लेना कि रूस की बमबारी में तो निरीह जनता मारी जाती हैं जबकि अमेरिकी बमबारी में एक ही घर में बैठे सिर्फ़ सक्रिय आतंकवादी मारे जाते हैं और आम जन का बाल भी बांका नहीं होता यह नितांत हास्यास्पद विचार है. किसी भी प्रकार की मानवीय क्षति हमारे वक्त की बड़ी त्रासदी है किन्तु युद्ध में किसी के लिए भी इससे पूरी तरह बचना असंभव है.

तथ्य यह भी बताते हैं कि 16 दिसंबर,2016 को फ्रेंच स्वतंत्र मीडिया एजेंसी ( वोल्टेयरनेट.ओर्ग) की ख़बर के मुताबिक सीरियन विशेष बलों द्वारा अलेप्पो शहर के एक बंकर में 14 नाटो अधिकारी जिंदा पकड़े गए थे. सीरिया के नामी सांसद व् अलेप्पो चैम्बर ऑफ कॉमर्स के निदेशक फ़ारेज शहाबी ने अपने फ़ेसबूक पेज पर पकड़े गए अधिकारियों के नाम व् राष्ट्रीयता को भी साझा किया था, जिसमें 8 सऊदी अरब के अधिकारी थे, एक अमेरिका, एक तुर्क, एक इज़रायली, एक कतर, एक जॉर्डन और एक मोरोको का था. 19 दिसंबर को संयुक्त राष्ट्र में सीरियाई राजदूत बशर जा़फ़री ने इस ख़बर की अधिकारिक रूप से घोषणा भी की थी. यद्यपि कई सूत्रों के अनुसार पश्चिमी गठबंधन के अधिकारियों की संख्या उससे भी अधिक थी- 22 अमेरिकन, 16 एमआई, 6 ब्रिटिश एजेंट्स, 21 फ्रेंच, 7 इज़राइली, 62 तुर्की यानि लगभग 150 ऑफ़िसर और सेना प्रशिक्षक आइसिस के संग अलेप्पो की बमबारी में फंस गए थे. इससे पूर्व रूस क्रूज मिसाइल ’कैलिबर’ के हमले से 30 इजराइली व् पश्चिमी देशों के सैन्य सलाहकारों की मौत की ख़बर भी प्रसारित की गई थी और यदि यह सच है तो अपने एजेंट्स को वहां से बचाने के उद्देश से अमेरिका के विदेश सचिव केरी की चिंता वाजिब थी और मास्को से सैन्य अभियान को स्थगित करने का आग्रह भी स्पष्ट हो जाता है. सवाल यह उठता है कि आख़िर पश्चिमी गठबंधन के यह अधिकारी आइसिस के नियंत्रण वाले अलेप्पो में कर क्या रहे थे ? जबकि सीरियाई सरकार ने उन्हें कोई आमंत्रण दिया भी नहीं था.

इन परिस्थितियों में यह संदेह भी पैदा होता है कि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षापरिषद् द्वारा अलेप्पो में सात दिन के लिए मानवीय सहायता हेतु युद्धविराम का प्रस्ताव कहीं ‘अपने’ लोगों को बचाने का प्रयास तो नहीं था? बहरहाल रूस और चीन ने इसका विरोध किया था और इसे पारित नहीं होने दिया था. रूस का मानना था कि इस तरह के अल्पकालिक विराम से आतंकवादी हथियारों का पुनर्संग्रहण कर ताकत इकठ्ठा कर सकते हैं और यह किसी भी हालत में वे नहीं होने देंगे.

अलेप्पो में हुए इस भीषण युद्ध के दौरान रूस ने जिस प्रकार आम जन के बीच सहायता पहुंचाई वह उल्लेखनीय है. अलेप्पो के नागरिकों को शहर से बाहर सुरक्षित जगहों पर पहुँचाने और उन्हें यथासंभव चिकित्सकीय व् अन्य सुविधाएं देने के अलावा सीरियन सेना के विरुद्ध लड़ रही मुक्त सीरियन सेना के 6000 से अधिक लड़ाकुओं को भी जो हथियार डालने को राज़ी हो गए थे, उन्हें अपने परिवार सहित अलेप्पो और इड्लिब शहरों के बीच बने विशेष ‘कॉरिडोर’ से सुरक्षित जगह पर पहुंचाया दिया गया. यह पूरी घटना न सिर्फ़ रूसी वायु सेना व् असंख्य ड्रोनों की निगरानी में हुई बल्कि रूसी रक्षा मंत्रालय के वेबसाइट से लेकर रशियन टुडे के फ़ेसबूक पृष्ठ पर लाइव प्रसारित की जा रही थी. निस्संदेह रूसी प्रचारतंत्र भी सिर्फ़ अपने अच्छे कृत्यों का प्रचार प्रदर्शन अपने पक्ष को मज़बूत करने के लिए कर रहा होगा.

इस तथ्य का यहां उल्लेख अनुचित नहीं होगा कि रूस और सीरिया के साथ साथ अलेप्पो में आइसिस पर जीत का श्रेय ईरान को भी जाता है. सीरियाई कुर्दों का आइसिस के ख़िलाफ़ जंग में ईरानी सैन्य सलाहकारों ने मदद ही नहीं प्रशिक्षण भी दिया था.

बहरहाल युद्ध अभी पूरी तरह से ख़त्म नहीं हुआ है और न ही निकट भविष्य में शांति बहाल होने की संभावनाएं दिख रही हैं. किंतु अब तक के इस युद्ध का यह नतीजा अवश्य निकला है कि अलेप्पो में आइसिस के पतन के उपरांत चमत्कारिक रूप से एरडोगन का हृदय परिवर्तन हो गया है और वे रूस और ईरान के साथ तालमेल बिठाने में लग गए हैं.

इसी क्रम में रूस-ईरान-तुर्की की 27 दिसंबर की बैठक से पूर्व 19 दिसंबर को तुर्की की राजधानी अंकारा के एक संग्रहालय में चित्र-प्रदर्शनी के दौरान रूस के राजदूत आंद्रेई कार्लोव की हत्या कर दी गई. हत्या को लेकर अनेक कयास लगाए जा रहे हैं जिसमें यह भी है कि पश्चिमी गठबंधन की यह कोशिश थी कि तुर्की के साथ रूस का समझौता टूट जाए.

फिलहाल रूस-ईरान-तुर्की के बीच समझौते के तहत सीरिया में अधिकारिक रूप से संघर्ष विराम ज़ारी है. अमेरिका सहित अन्य पश्चिमी शक्तियां भी आश्चर्यचकित रूप से चुप हैं. हालांकि हाल ही में अमेरिका के रक्षा सचिव एश कार्टर ने अपने ब्यान में यह घोषित कर दिया है कि “अमेरिका आइसिस से अकेले लड़ रहा है और रूस ने सीरिया में कुछ भी नहीं किया है. सवाल यह उठता है कि जब रूस ने सीरिया में कुछ भी नहीं किया है (अच्छा या बुरा) तो फिर विश्व भर में उसकी निंदा क्यों करवाई जा रही थी? इन सब बातों से साफ़ पता चलता है कि अब तक विश्व में स्वयंभू रहा अमेरिका युद्ध में असद की सफलता और विश्व राजनीति में रूस की बढ़ती प्रभुता से कितना बौखलाया हुआ है.

हंस के दिसंबर,2015 के संपादकीय में उठाया गया सवाल आज भी उतना ही प्रासंगिक है -“..अफ्रीका, मध्य-पूर्व एशिया, पश्चिमी जगत और इज़रायल के बनते-बिगड़ते समीकरणों, कूटनीतिक पेचीदगियों और जटिल अंतर्राष्ट्रीय संबंधों के बीच एक बड़ा प्रश्न अनुत्तरित रह जाता है. विश्व भर में एक सार्वभौमिक नियम है कि हत्या के लिए हथियार उपलब्ध कराने वाला, प्रशिक्षण और साधन प्रदान करने वाला भी बराबर का दोषी होता है. आइसिस को तो उसके किए की सजा मिलने जा रही है किंतु पश्चिम के इन प्रभुओं को, सऊदी राजशाही को, कतर, तुर्की और इज़रायल को उनके किए की सज़ा कब मिलेगी? यह बड़ा सवाल है.”

ख़ैर, अमेरिकी राष्ट्रपति पद पर एक अल्पशिक्षित बड़बोले और नितांत अभद्र इस नारंगी से जीव के आगमन के साथ ही शांति नोबल पुरुस्कार विजेता ओबामा को अपने किए लाखों वधों की जवाबदेही से छुटकारा मिल जाएगा. आज अचानक ‘ग्लैडिएटर’ फिल्म का एक संवाद याद आ गया – जब रोम का एक सीनेटर अपने क्रूर सम्राट कमोडस के लिए कहता है कि “सम्राट अच्छी तरह जानता है कि रोम क्या है. रोम महज एक भीड़ है. उनको जादू दिखाओ- वे चमत्कृत हो जाते हैं. सम्राट उनके लिए बड़े पैमाने पर मौत लाएगा जिसके लिए वे उसे बेपनाह प्यार करेंगे”.

14859701_1474274785922952_6659694896302909380_oमाने मकर्तच्यान, जेएनयू में शोधरत इंडोलॉजी की छात्रा हैं. आर्मेनिया से आती हैं और वैश्विक गतिविधिओं पर पैनी नज़र रखती हैं. आप उनसे  mane.nare@gmail.com पर संपर्क कर सकते हैं.

साभार- हंस, फ़रवरी, 2016

आत्महंता की डायरी और बेकशिंस्कि का घर: मग्दालेना जेबाउकोव्स्का

बीसवीं-इक्कीसवीं सदी के विश्वस्तरीय, चर्चित, पोलिश चित्रकार ज़्जिसुअव बेकशिंस्कि का जीवन उनकी कृतियों की तरह ही सर्रियलिस्ट-स्पर्श लिए हुए अविश्वसनीय जान पड़ता है. उन्नीस सौ अंठानवे में उनकी पत्नी की मृत्यु की होती है. उन्नीस सौ निन्यानवे के क्रिसमस की पूर्वसंध्या के अवसर पर उनका इकलौता पुत्र तोमष, जो कि बहुत ही लोकप्रिय रेडियो उद्घोषक, संगीत-पत्रकार और अनुवादक था, आत्महत्या कर लेता है. सत्रह बार चाक़ू से गोदा गया बेक्शिन्स्कि का मृत शरीर इक्कीस फ़रवरी, दो हजार पाँच को उनके ही फ्लैट में पाया जाता है. यह धत् कर्म उनके ही केयरटेकर के नाबालिग पुत्र द्वारा किया गया था. मग्दालेना जेबाउकोव्स्का ने अपनी पुस्तक बेक्शिन्स्कि: एक दोहरी तस्वीर‘ (The Beksinskis: Double Portrait[i]) में बखूबी इन दृश्यों को जगह दी है. पोलिश इंडोलॉजिस्ट तत्याना षुर्लेई ने इसी किताब के शुरूआती हिस्से को यहाँ अनुदित की है.

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बेकशिंस्कि के परिवार के चित्र

By मग्दालेना जेबाउकोव्स्का 

आत्महंता की डायरी और बेकशिंस्कि का घर

एक चिट्ठी 

प्रिय एवा! एक बुरी खबर है। तोमेक[ii] मर गया। क्रिसमस की पूर्व संध्या पर उसने आत्महत्या कर ली और क्रिसमस के दोपहर, करीब तीन बजे मुझे उसकी लाश मिली। मैं पहले ही तुमको इस संबंध में लिख चुका हूँ कि अगस्त या इससे पहले से ही रेड अलर्ट था, और अब इस तरह इसकी समाप्ति हुयी।

अभियोजन पक्ष के कार्यालय के समक्ष जाने से पहले ही मैंने सारे भौतिक सबूतों को छुपा दिया है। क्योंकि, कागज़ के एक टुकड़े पर तोमेक ने लिखा कि मेरे लिए कंप्यूटर में एक चिट्ठी और डिक्टाफोन में एक मैसेज है।  डॉक्टर के आने से पहले ही मैंने कॉपी को सुरक्षित रख कंप्यूटर से चिट्ठी को हटाया, फिर कागज़ के टुकड़े और डिक्टाफोन को जेब में छुपाया। क्योंकि, मुझे डर था कि पुलिस सब कुछ अपने कब्जे में ले लेगा और बाद में अलग-अलग अंजान लोग इसे सुनेंगे, पढ़ेंगे और इसके बारे में पीएचडी लिखेंगे। मुझे लगता है कि मैंने जो किया अच्छा किया। हालांकि, पुलिस और अभियोजन पक्ष वाली औरत यह समझ नहीं सकती थी कि उसने क्यों कोई चिट्ठी नहीं छोड़ा। उन लोगों के बीच सब से बड़ा शक इसी एक बात से पैदा हुआ।

वास्तव में, इस चिट्ठी से मुझे अधिक वस्तुगत जानकारी मिली। जैसे कि, किसको क्या देना चाहिए और कौन-से काम पुरे करने हैं। मैं यह चिट्ठी उनको दिखा सकता था, लेकिन इसे पढ़ने के लिए मेरे पास समय नहीं था। और, टेप इतना व्यक्तिगत था कि इसे सिर्फ मैंने सुना, शायद एक और बार सुनकर इसको नष्ट करूंगा, जैसी उसकी इच्छा थी। उसकी यह भी प्रार्थना थी कि उसकी टेप वाली डायरी को (सुनने या न सुनने के बाद), जिसमें बहुत सारे टेप हैं, भी नष्ट करूँ।

जोशा की मौत के बाद, पहली बार मुझे एक अजीब-सी खुशी का अहसास हुआ कि यह सब होने के पहले ही वह मर गई, क्योंकि यह उसके लिए असहनीय होता। मैं ज़्यादा सहनशील हूँ, वैसे भी अंत में यहाँ किसी का रहना जरुरी है।

सिर्फ़ मुझे मालूम था कि तोमेक के लिए जीवन मुश्किल था। अहंवादी और अहंकारी होने के बावजूद, कोई अपनी नियति खुद नहीं चुनता। लेकिन, मुझे लगता है कि यह जो कुछ भी हुआ, अच्छा हुआ।

टेप पर दर्ज उसका अंतिम संदेश यही था कि जिस दुनिया में उसको जीना पड़ता है इससे वह कितना निराश है। उसे हमेशा एक अलग दुनिया चाहिए थी, जहां के नियम सीधे होते हैं, दोस्ती हमेशा सही होती है या ऐसा कुछ…।

इस मैसेज का अंत लगभग इस तरह था, “मैं जानता हूँ कि मेरी दुनिया कल्पना की दुनिया है, लेकिन उन इकतालीस सालों में मैं भी शायद एक कल्पना था। मैं कल्पना की दुनिया में जा रहा हूँ, क्योंकि मैं सिर्फ़ वहाँ ही खुश रह सकता हूँ। हाथ जोड़कर तुमसे विनती करता हूँ कि मुझे जगाना मत।”

उसने याकूब की सीढ़ी वाला टीशर्ट पहना था, और मुझे नहीं मालूम कि इसका कोई प्रतीकात्मक अर्थ था या नहीं!

उसे डर था कि नींद की गोलियां जब तक उसे मारेगी, उससे पहले मैं आ जाऊंगा! इसलिए, उसने टेप के संदेश में कहा कि तेईस दिसम्बर से उसने कुछ नहीं खाया है ताकि गोलियां जल्दी से अपना काम करें, और गोलियों के डिब्बे को बाहर के कूड़ेदान में फेंका ताकि डॉक्टर को पता न चल सके  कि उसने क्या खाया है!

वह तेईस तारीख की शाम को ही यह करना चाहता था। लेकिन, उसे याद आया कि वह हर शुक्रवार को घर आकर अखबार में छपे टीवी-कार्यक्रम के विवरणों में से पसंदीदा फिल्मों को चिन्हित करता है। ताकि, बाद में उसे देख सके और इसके लिए प्रसारण के समय उन्हें रिकॉर्ड करना चाहिए। वह जानता था कि इस दिन अगर वह नहीं आएगा तो मैं परेशान होकर चेक करूंगा कि क्या हुआ। इसलिए चौबीस दिसम्बर को दोपहर दो बजे मेरे पास आ गया और ऐसी फिल्मों को मार्क किया जो सिर्फ उसके लिए दिलचस्प हो सकती थीं, क्योंकि मुझे वेस्टर्न पसंद नहीं हैं। यह सब कुछ मुझे दिलासा देने के लिए था ताकि मैं कुछ अनुमान न करने लगूँ, और सच में उसका यह प्रयास सफल हुआ।

गोलियाँ खाने के बाद रिकॉर्ड हुए टेप से पता चला कि उसने गोलियों को चौबीस तारीख को दोपहर के तीन बजकर पाँच मिनट पर खाया। मैं चौबीस घंटे बाद वहाँ पहुँचा। वहाँ पहुँचने से पहले मैं कुछ परेशान था क्योंकि उसकी अच्छी दोस्त, अनया ओर्तोदोक्स[iii] ने फोन की और बतायी कि जब वह मेरे घर से अपने घर वापस गया था तभी अनया ने तोमेक से बात की थी और उसे लगा कि तोमेक की तबियत ठीक नहीं है। इसलिए वह बोली कि मैं उसके पास जाऊँ या उसको अपने यहाँ बुलाऊँ।

चूँकि, तोमेक ने मुझसे कहा था कि बीमार होने की वजह से वह दो दिनों के लिए फोन को स्विच ऑफ करेगा, ताकि उसकी तबीयत में सुधार हो। शुरू में मुझे लगा कि सच में उसने यह किया। अनया से बातचीत करने के बाद मैंने तोमेक को फोन किया लेकिन सिर्फ ऑटोमेटिक और रिकॉर्ड स्वर ही सुनाई देते थे, उसका मोबाइल फोन बंद था। मैं वहाँ गया और बार-बार दरवाजे की घंटी बजाता रहा। अब मुझे याद नहीं है, लेकिन यह शायद दोपहर चार बजकर पचास मिनट या पाँच बजकर दस मिनट था। उसने दरवाजा नहीं खोला और मेरे पास चाभी नहीं थी (अगले दिन मुझे पता चला कि उसने मेरे घर में अपनी चाभियों को दिनुव[iv] से खरीदी गयी एक चीनी मिट्टी के गमले में रखा है, अन्य दूसरी चीजों के नीचे) तो मैंने सोचा कि उसने नींद की गोली खाकर और कानों में इअरफ़ोन लगा सो रहा है। दरवाजे तोड़ना मैंने ज़रूरी नहीं समझा। दूसरे दिन मुझे उसकी चाभियाँ मिली और जब मैं तोमेक के पास पहुंचा तो वह बहुत समय से मरा हुआ था। हाँ, ऐसा ही था। ठीक है, अगर तुमको कुछ और जानना चाहिए तो लिखो! सभी को नमस्कार।

ज़्जिसुअव।

वारसा: रविवार, 26 दिसम्बर, 1999, दोपहर 4:07।

***

घर

हर किसी को यह घर धोखा देता था, जो उसे पूरी तरह जानने और समझने की कोशिश करता था। उसने किसी को भी घर की पूरी तस्वीर उतारने की अनुमति नहीं दी। सिर्फ अहाते की ओर से अंदर प्रवेश पाने वाली टूटी हुई सीढ़ियों की, या बगीचे की ओर से झाड़ियों के बीच से ऊँचे उठे हुए सड़े बरामदे की, या एक दीवार पर लकड़ी के हिले हुए रेलिंग की और उपेक्षित अहाते की ही, जहाँ ऊँची छत वाला एक छोटा कुआँ था, तस्वीर खींचना संभव था। एसेनबह की दवाई की दुकान के पीछे छुपा यह घर सड़क से दिखाई नहीं देता था और पेड़ों के पीछे होने के कारण पुओव्येत्स्कि नदी की ओर से भी दिखाई नहीं देता था। शुरू-शुरू में यह घर बॉयलर के वर्कशॉप होने के रहस्य की रक्षा करता था।

हेनरिक वनिएक, ज़्जिसुअव बेकशिंस्कि का दोस्त, को यकीन है कि यह घर, बीच में एक छोटे अहाते के साथ, एक वर्ग की संकल्पना पर आधृत है; जिसमें बाहर से कोई सीधा प्रवेश-द्वार नहीं था। इसे देखकर उसे एन्फ़िलैड की याद आती है जिसमें एक कमरे से दूसरे कमरे तक जाने का रास्ता घुमावदार होता है।

लेकिन यह असम्भव है क्योंकि लकड़ी का यह घर, जिसके छत धातु के प्लेटों से बने थे, अन्य इमारतों के बगल में U आकार में खड़ा था। जो, सामने या अन्दर से एक मंजिली हवेली जैसा था और ऊपर-ऊपर से देखने पर किसी ग्रामीण घर जैसा आभासित होता था।

अतिथियों को यह घर अव्यवस्थित लगता था। मेहमान अंधेरे गलियारे में पहुँचते ही जगह और समय के बारे में भूल जाते थे। लोग स्टूडियो से बाथरूम जाना चाहते थे तो बरामदे में पहुँचते थे। बच्चे के कमरे में जाना चाहते थे और ज़ोफ़िया के कमरे में पहुँच जाते थे। रसोईघर से कोठार जाने या तोमष के कमरे से स्तनिसुआवा दादी के कमरे जाने की प्रक्रिया अक्सर घर के सभी सदस्यों को परेशान करती थी। स्टूडियो के दरवाजे को ढूँढने की प्रक्रिया में अचानक एक आलमारी सामने आ जाती थी, जिसमें प्लास्टर की ढेर सारी खोपड़ियाँ होती थीं।

बाथरूम जाने के रास्ते को ज़्जिसुअव ने छोटी-छोटी बल्बों से सजाया था, रात के समय यह सजावट मदद करने की बजाय परेशानी का सबब बन जाती थी। एक बार बेकशिंस्कि ने वनिएक को बताया कि गलियारे में लगे बल्ब उसके सपनों के जटिल मामले का एक हिस्सा है।

घर के लिए नवीनीकरण कोई मतलब नहीं रखता था, जैसे, दीवारों को अंदर और बाहर से रंगना, बरामदे के टूटे हुए रेलिंग को ठीक करना। घर को इसकी परवाह नहीं थी कि लिविंग रूम को स्टूडियो, और बेडरूम को तोड़कर दो नए कमरे बना दिए गए थे, दूर के कमरों में किरायेदार रहते थे। धीरे-धीरे झड़ते प्लास्टर के कारण दीवारें अपनी नंगी होती लकड़ियों को गोचर करती हुयीं घर की अगोचरता को लगभग नष्ट कर रही थीं।

सनोक शहर के इसी घर में बेकशिंस्कि परिवार की पाँच पीढ़ियाँ रहती थीं। सिर्फ सड़क के नाम अलग-अलग थे। गलिसिया (ऑस्ट्रियन-हंगरियन कब्जे के समय) के ज़माने में  सड़क का नाम ‘ल्वोव्सका’ था, दूसरे गणतन्त्र में ‘यागिएलोनियन’ हो गया, इसी तरह जर्मनी के कब्जे के समय इसका नाम ‘एडोल्फ हिटलर मार्ग’ और साम्यवादी ज़माने में ‘श्वियेरचेव्स्कि[v] मार्ग’।

बेकशिंस्कि परिवार का घर अब नहीं है। बीसवीं शताब्दी के सत्तर के दशक के अंत में उसे नष्ट कर दिया गया।

बेकशिंस्कि परिवार भी अब नहीं है। परिवार के अंतिम सदस्य ज़्जिसुअव की 2005 में हत्या कर दी गयी।

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Tatiana Szurlej

अनुवादक तत्याना षुर्लेई ,  एक  Indologist और फिल्म-आलोचक हैं। हंस, पाखी, पहल, अकार आदि हिंदी-पत्रिकाओं के लिए लिखती रही हैं। पोलैंड के शहर क्राकोव स्थित Jagiellonian University से  ‘The Courtesan Figure in Indian Popular Cinema : Tradition, Stereotype, Manipulation’ विषय पर पीएचडी की हैं। इनसे  tatiana.szurlej@gmail.com पर संपर्क संभव है.

 

[i] Magdalena Grzebałkowska, Beksińscy. Portret podwójny, Wydawnictwo Znak, Kraków 2014

[ii] पोलिश भाषा में लोगों के मूल नाम के अलग-अलग प्रकार हो सकते हैं जिनका इस्तेमाल परिवार या दोस्तों से किया जाता है। इसलिए मूल नाम तोमष (Tomasz) से तोमेक (Tomek) या तोमेचेक (Tomeczek) के प्रकार होते हैं, ज़ोफ़िया (Zofia) से ज़ोशा (Zosia), ज़्जिसउअव (Zdzisław) से ज़्जिसेक (Zdzisek), आदि।

[iii] अनया ओर्तोदोक्स (Anja Orthodox) क्लोस्तेर्केलर (Closterkeller) नाम के पोलिश बैंड की गायिका है।

[iv] दिनुव (Dynów) दक्षिण-पूर्व पोलैंड का छोटा शहर है।

[v] जनरल करोल श्वियेरचेव्स्कि (Karol Świerczewski) रेड आर्मी और पोलिश आर्मी का सैनिक, कम्युनिस्ट कार्यकर्ता।

Satyajit Ray Interviews Andrzej Wajda: A Tribute to Wajda

During the Film Festival in Delhi (1965), we (Film Fare) invited Satyajit Ray to interview Polish Director Andrej Wajda. Although Ray was the interviewer, Wazda occasionally came up with the question as the conversation veered round to technique. The interview was, therefore, an exchange of ideas between two great directors. Well-known Polish critic B. Michalech acted as interpreter.

Satyajit Ray With Wajda

Satyajit Ray Interviews Andrzej Wajda

 

Ray- what are you working on now, Mr. Wajda?

Wajda- Going slow actually. I’m engaged at the moment in making a historical film. Not quite my cup of tea, though.

Ray- Why, then are you making it?

Wajda- Well, it’s based on a very popular book, well known in Poland, very dear to poles. After three years of waiting, doing nothing, I feel the need to be in touch with my audience again.

Ray- Oh yes, I understand that. Was “Generation” your first film?

Wajda- My first independent film. I mean, made entirely by me: my very first feature film.

Ray- I saw it in Venice, out of competition. Wonderful, I thought.

Wajda- Now, Mr. Ray, I have a question for you.

Ray- Out with it.

Wajda- You being the… well, the best known and the most brilliant director of Indian films, do you think it is possible, I mean in the future, taking a long perspective, to make films independently, films like the ones you made without the support, the strong support of some national organisation like State.

Ray- Well, I make my films without the support of any national organisation. There is no question of such support the way I make films. They are financed by private producers and distributors. As for my first film “Pather Panchali,” of course, I started with my own money, and then because funds run out, we had shelved it and actually thought of giving it up. And then somebody who had some influence with Government, persuaded them to take it up and they took it up. I mean the West Bengal Government.

Wajda- My question, I’m afraid, is more delicate. You see, for us you are the only man who is practising a sort of an excellent national cinema, truly national, and therefore I put it to you: Do you think that the way you are doing it this sort of cinema can develop in India- not only a cinema which Indian in name but which is practically a sort of national cinema?

Ray- Well, theoretically it is possible. I mean just the way I make films it is possible for another person to make films. You need first of all a man with the same sort of urge and with a certain degree of talent, also a certain degree of tenacity.

Wajda- Obstinacy…

Ray- Obstinacy, yes. Let’s put it this way. There is no bar, of course, if his films succeed. But supposing he makes one film, and if that is a failure at the box office- it may be an artistic success- and if he keeps on making failure financially, then it is difficult for him to make any headway, because after all, he depends on the producers, his backers, his distributors.

Wajda- But do you think there are a group of men in India, in any centre, who try to make the sort of films you have been making?

Ray- Well, I can speak about my own home state, Bengal. There are a number of young directors who engaged after “Pather Panchali”. Because I was new director and my films was a success, some distributors who had not backed young people, new people, before, now began backing them, and some of them have been reasonably successful. Oh, yes, there is such a young group in Bengal. Some haven’t succeeded as well as others, so they have to wait long for another contract. But there is backing for at least some people. There isn’t a big a big movement yet, not really, but there are people who are wanting to back them. It’s a healthy sign.

Wajda- Yes, but is the state itself interested in encouraging this sort of good and important- I mean socially and artistically important-productions? Does the state have an interest in encouraging such productions?

Ray- The state itself is not in a position to directly encourage them. Now we have this President’s Award in India which is an all India thing. Awards are supposed to be given to significant films. But of course they are chosen by committee all of whose members may not be experts, you see. Well, Government also gives a cash prize and a medal, and if the film gets a prize, it can get better distribution if it can be revived. On the strength of the prize, it can have a fresh start, you know.

Also there was some talk of forming a financial corporation which would be backing certain scripts which were thought suitable, but it hasn’t so far worked…but it’s in the air. It’s being considered. May I put a question to you? How many films have you made so far-five, six?

Wajda- Ten.

Ray- Let’s see… “Generation,” “Kanal,” “Ashes and Dimonds,” “Lotna,” “Samson”…

Wajda- “Sorcerers”… another made in Siberia- “Lady Macbeth of Minsk.” Then, of course, a sketch for a French film…

Ray- Oh yes, yes….

Wajda- “Lost on the Frontiers” which was a very nice sketch but I am sorry now that this subject has been put into a new film, because it is the subject of an old film. And then the film I am making now is in two parts… I mean from the production point of view it is even more than two films.

Ray- Only one film was in colour….or were there others?

Wajda- Only one… “Lotna.”

Ray- Do you like working in colour?

Wajda- It is certainly very interesting but one is handicapped by poor quality of laboratories in Poland and then not only the labs, but also the quality of the colours themselves. One can never foresee if it will work or not. So I am a little afraid of colour at this stage. Maybe because I am an artist, I am more sensitive to colour. For normal colour production, we may be all right. But my requirements are not so easily satisfied.

Ray- Well, it is more or less the same with me. I have made one colour film. Of course this was special because it was all outdoors, all location. But I was worried because processing facilities were not adequate in India and it had all to be processed not in Calcutta but in Bombay. But I was quite surprised with the results which wouldn’t have been as good had we shot in studio. We don’t have the lights, etc. But outdoors was a different matter. And I had this special kind of a story- I wrote the story specially for the films.

Wajda- Reverting to colour. We have another difficulty. In our climate the differences in colour during the day are enormous, unlike India where you have approximately the same intensity of light the whole day.

Ray- Now in Delhi? (Laughter)

Wajda- Yes. We have in Poland, during the day, ten or even twenty colour changes.

Meeting Contingencies

Ray- Well! I will tell you how we shot the film in Darjeeling, way up in the hills. I knew there would be differences in colour because there would be clouds, there would be mist, there would be sun, there would be morning and evening. The shooting had to meet all contingencies. It was a two-hour-long story, two hours continuous, unbroken time you see…I had scenes, mist scenes and cloudy scenes and sunny and shadowy scenes. We’d be shooting a sunny scene-and then the mist would come and we would all run with the camera and take another part of another scene. That’s how it was shot.

In a way it was easy because there was no chance of costume involved. Everything happened within the radius of, say, one square  mile. As soon as we felt there were clouds coming up, we changed, folded up there, and went over the next spot for that part of the scene. And so on.

Wajda- Weather back home is so capricious. A solution would be to use several cameras simultaneously as some time, Kurosawa does in black and white. Yes, because the difference between one take and another can be sometimes quite terrible. It’ is necessary to eliminate then afterwards. Eight or ten cameras very well placed, in a carefully thought out way, could well be the solution for a good colour film.

Ray- Tell me, Mr. Wajda, do you always make films of your own choice? I mean your own subject, your own cast and everything. You have complete freedom, I suppose?

Wajda- The initiative is mine. But after the script has been chosen and accepted by me, the last word is a committee’s which has to approve of it. In a way, I have complete freedom, although someone else has the last word. This is understandable because the state being the producer has at one stage to interfere and to say yes or no. But once production starts, I am complete master. There is no interference. I may even change a lot of things, departing from the original script. Ray- Can you really?

Wajda- Yes. From the script, from the approved script, I can change a sequence here, an entire scene there…

Ray- And they see the finished film?

Wajda- The committee does, yes. But of course when the film is finished the situation is much better because the money has been expended (laughter). This is more serious, so practically nobody interferes then.

 Ray- Have you ever had to completely abandon an idea because it wasn’t approved?

Wajda- Yes, some of them. For the ten films I have made in my career. I had 35 scripts. In a way I suppose I have more experience in making scripts (laughter) than of actually making films. But not all of them, of course, have been abandoned because the committee didn’t approve of them. Some I abandoned myself. Unfortunately in Poland we do not have professional script-writers and sometimes one comes across a very good idea which cannot be well expressed in a script.

Ray- Yes.

Wajda- …And therefore I do the scripting myself, though I am not always satisfied with my own work. Sometimes is happens that the script is not bad, the idea is good, but still there is a lack of good actors for some particular characters. Here again we are handicapped because we do not have good professional film actors, only theatre actors playing in films. And always the choice is limited and then everything depends on the goodwill of an actor or of a theatre. In Warsaw, for instance, there are 20 dramatic theatres. And Warsaw is not a very big town, about a million of population.

Ray- How many takes do you shoot normally? I often have to do with just one. It’s a question of raw stock-which is rationed here.

Wajda- We try to adopt the same method. Of course, one has to have a certain idea of the shape the film is going to take. But there is a certain pleasure in shooting much more than the final requirements. The pleasure of making a film is repeated thrice-firstly, when you are writing the script; secondly, when you are editing it.

Ray- Yes. Even if you shooting with a clear cut idea in your mind, at the cutting stage there are always small things you can do.

Wajda- Right.

Ray- It is not rigid, never rigid, particularly in dialogue scenes.

Wajda- I agree.

Ray- When you are cutting back and forth you can do a lot and you can control and modify the acting.

Wajda- Yes.

Ray- So there is still a lot left, but again here in Bengal we have to be very disciplined because we can’t be spending too much. That would be disastrous. Ours is a small market.

Wajda- But you have never used some popular stars of India?

Ray- I have not used the biggest stars, but one of them whom I introduced for the first times is now a very big star, but he is still making films for me. Another I introduced has now gone to Bombay; she too is now a big star. It’s like you see. As soon as they begin acquiring mannerism, I am a little afraid of using them.

Wajda- Now may I ask you about rehearsals? I have a double technique. For young inexperienced actors, I usually do not rehearse very much because here the only thing which matters is a certain —

Ray- A certain freshness, exactly…

Wajda- But for experienced actors, rehearsals are good. For the young actor who lacks the technique it is very difficult to get a good performance during rehearsal and to continue it when shooting.

Rehearsing Without Props

Ray- Do you find, as I do sometimes, that it is a difficult to rehearse a film scene as a stage scene in a drawing room…you know, I find that unless I am surrounded with the right props on the set I can’t rehears, I get no inspiration.

Wajda- This sort of rehearsal, if you call it rehearsal, with the actors is very useful in the beginning. More in the nature of a free discussion with the actors.

Ray- Yes.

Wajda- Just to reconstruct some characters, indicate the general line they are following. But then, of course I feel it is not useful, it is not effective, except maybe for a film which is entirely based on dialogue, which is quite a different thing.

Ray- Yes, particularly if you are planning fairly long takes where the actors have sustain the scene, it can be quite a problem.

Wajda- Yes, but so long as the actors are not in costume and in the place where the shooting is going to be done, they are for the director a little dead, a little…(Laughter).

Ray- Exactly… It’s the same with me. That’s why I put the question.

Wajda- You see, there is a very natural interaction of all the elements on the set.

Ray- Exactly. Do you agree with, for instance, Antonioni, when he says that an actor is nothing but a puppet in the director’s hands? That the actor will have to do exactly as he says, he shouldn’t be given any initiative of his own?

Wajda- I am sharply against it.

Ray- Ah, yes. You know of course that Antonioni said this…

Wajda- Yes, yes, of course…

Ray- I think Antonioni lies when he says that.

Wajda (laughing)Maybe Antonioni thinks he can influence actors because his principal actress is his wife and therefore he has a very strong influence on her. If one were to make a film in this way one would be tapping only half the possibilities of a good performance. The actor’s own interpretation of the character gives fullness to his performance. I suppose to call actors puppets is a reaction against the star system. Films are made to suit stars. Of course, sometimes it works as in the cases of Paul Newman and Marlon Brando. All the films they have made are made round them, and still it works.

Ray- Yes it’s like a concerto.

Wajda- But I myself am interested in making this sort of film.

Ray- Because the artists get an excessive prominence, it is not part of general pattern. They stick out, you see….

Published in Film Fare, 1965

 

The Postmodern mores and Cinematic Expression: Dhiraj Kumar Nite

Tanu Weds Manu Returns (TWMR) is a commercial movie, and all signs are to make it a big money-grossing of this year. That said, let’s proceed. All commercial movies are necessarily an expression of socio-cultural and political proclivity of the movie maker. The logic of Investment shapes technological inputs; but the narrative strategy, cinematography and the conceptualisation of characters are, equally, the product of cultural and political locus of film makers. Let’s call this non-economic aspect of film making as the ethico-political logic and craft logic. The sexist form of cinematic characters are as much guided by the image of target audience shared by film makers as by the sexist discourse i.e., ethico-political logic, which the former often entertains. The movie of our discussion presents an enchanting ethico-political logic; the craft logic and the economic logic accompany the former to make it commercially viable. A superb combination of three distinguishes it from the so-called art movie.@Author

TWMR (2015)

TWMR (2015)

By Dhiraj Kumar Nite

Ethico-Political Logic of Cinematic Expression

TWMR brings two enamouring female characters who do share as much similarity as contrasting attributes. Both are women-in-rebellion in their own rights. They defy the tradition of cultural restraints set on the women by patriarchy. Tanu [Trivedi] embodies as much self-seeking modern conceit as, I suggest, a post-modern autonomist self. She seeks to freely flow in pursuit of a boyishly unrestrained, hedonistically rich and thrilling newness. However, she is bereft of any wishes for financial self-sufficiency. The financial foundation of her sparking adventurous life is the wealth of her parents, the boyfriend and the husband. She recognises dignity in labour, but she keeps herself away from such demanding fact of human life. As a whole her character is altogether novel imagination. She is not Anita (Praveen Boby) of Deewar, who was an equally infectious, iconoclastic discovery of the 1970s. She neither satisfies the definition of modern [bourgeois] womanhood, who is a companion of her male member to support his productive life and perform the role of an emotional anchor. Nor does she fit with the image of a modern female antithesis, who relishes financial self-sufficiency and transformative womanhood. I tempt to look at her as a post-modern womanhood in her status as a female thesis. The refusal to productivist paradigm of modernity is her distinguishing attribute. Abundance of necessaries of humankind to life is conducive to her refusal. At the same time, she does not regardthe female’s virtue in her reproductive function for the manly world. For any association with such considerationwould be a hindrance to realisation of her exploratory self. Marriage is a means than an end in-itself.

Datto, alias Kusum is one of the strongest female characters ever imagined in the Bollywood. She is distant from the retrogressive feudal tradition and the self-seeking moderns [bourgeois] conceit. She is at the cusp of refreshing transcendence. She seeks to win the world that is competitive. She takes pride in her ability of financially supporting the family or socially dependent kith & kin; relishes her agenda [rather than any burden of responsibility] of fostering a web of social relations/network; and commits to resist the latter when it attempts to overwhelm her autonomist, exploratory self. She nurtures the ethic of care, cooperation, and progressive transformation. For instance, in the course of seventh round of the Brhamanical ritual of marriage she enquires on her groom, her beloved if he is well-disposed to the final step. She decides to walk out, for she was not simply reluctant to marry to someone who is still emotionally attached to his first wife. She is careful of and cooperative towards a possibility of consolidation of love between self-deprecating Tanu and unsure Manu. She represents an image of, I tempt to suggest, a post-modern female antithesis. The latter transcends the self of feminist or socialist female antithesis, which was born in modern world and contributed to its progress. She is anyone but Indrani Sinha (Raakhee of Tapasya).

TWMR is decidedly neither a naturalist feature film nor realist. Damn, what to celebrate! It is in the league of some movies made in the recent times, which explore the grey areas of their characters. Dabang’s inspector, Piku’s daughter, Haider’s mother and son, Queen’s Rani: all of them perform their social functions with certain peculiarities. The villains are also grey characters; the hero and heroine also pleasingly indulge in the necessary ‘social vice’. Different classes intersect – at times collide with – eachother here and there. Tanu as a distraught person stumbles across a quiet beggar; the latter kisses her outreached palm and intends to offer a price for such weird thrill that visited him. Disconcerted Tanu moves on. It reminds the penultimate episode of Manto’s story A Woman’s life. In the latter Saugandhi was flustered at her rejection by the customer. Tanu is taken aback by her own realisation of the extent of dissolute condition, of acceptance by a destitute man. All this orchestrates something as much palpably earthly, which one would believe that a natural course of life witnesses; as fantasy for the world to entertain, even if not in the sight to descend soon.Needless to say, the realm of imagining of social characters is perilously fraught with the logic of investment. What is saleable sets the circumference, the limit. Therefore, Tanu and Manu return to each other to produce not just a happy ending, so notoriously characteristics of the Bollywood, but to satisfy the moral compass of the target audience. No explanation is sought for the change of hearts and minds between Tanu and Manu, who were so reasonably disposed to undertake separate strayed journeys till the previous moment. Here, TWMR loses an opportunity to lend us a cult movie. This is a recurrent feature of the story authored by Himanshu Sharma. There was no explanation on offer for the appearance of an uncommon lady, TanuTrivedi, known as batman, in Kanpur city in the prequel movie (TWM). Hobsbawm writes (On History: chapter, Postmodernity and History) that there is an increased tendency of exploring the meaning at the cost of explanation, which we find as a defining trait of the postmodernist literature.

The anti-foundationalist and anti-essentialist approach presents the aesthetics of meaning; of the politics;of the form; of the hierarchy. Let me digress to support my observation with what I borrow from a recent article of a cultural theorist,Fredrick Jameson, ‘The Aesthetics of Singularity’, New Left Review, vol. 92, March-April 2015.1. In our postmodern age we not only use technology, we consume it, and we consume its exchanges, value; its price along with its purely symbolic overtones. Similarly, the form of the work has become the content; and that we consume in such works is the form itself. In the modernist texts the effort is to identify form and content so completely that we cannot really distinguish the two; whereas in the postmodern ones an absolute separation must be achieved before form is folded back into content. Further, there is centrality of the postmodern economy, which is characterised as the displacement of old-fashioned industrial production by finance capital. 2.Only thing capital cannot subsume is the human entity itself, for which the attractive theoretical terms excess and remainder are reserved. The post-human is the final effort to absorb even this indivisible remainder.3.We have not yet entered a whole new era rather a new age of third, globalised stage of capitalism as such. Here, postmodern philosophy is associated with anti-foundationalism and anti-essentialism. This is characterised as the repudiation of any ultimate system of meaning in nature or the universe; and as the struggle against any normative idea of human nature. 4. What further distinguishes it from the old critiques of modernity is the disappearance of all anguish and pathos. Nobody seems to miss god any longer, and alienation in a consumer society does not seem to be a particularly painful or stressful prospect. No one is surprised by the operations of a globalised capitalism. This is called as cynical reason. Even increasing immiseration, and the return of poverty and unemployment on a massive world-wide scale, are scarcely matters of amazement for anyone. So clearly are they the result of our own political and economic system and not of the sins of the human race or the fatality of life on earth. We are so completely submerged in the human world, heideggerian ontic, that we have little time any longer for what he liked to call the question of being. 5. In our time all politics is about real estate. Postmodern politics is essentially a matter of land grabs. … Not to surprise,one protagonist of TWMR is a builder, another is a squatter, and the third is the issue of the location of housing in London between Tanu and Manu than the condition of house.

The craft logic of TWMR is scintillating. Every character is well chiselled. Every cast moulds herself/himself into the concerned social character. The use of close-up camera, not so popular in the Bollywood, demandingly tests calibre of actors. The narrative maintains suspense and well-proportioned subplots till the end. Editing carries pace of the narrative at an enjoyable and captivating scale. Cinematography weaves locales, which the audience would identify with and also chew it. The content, dialogue and body language successfully present a refreshing social drama rather than an electrifying comedy, for which it had immense spice to grow into at the hand of a director like Priyadarshan. Music and the songs are as much to bring out glittering, tormented or repenting inner self as to advance the story line. Finally, Kangana’s dancing effort is the rare occasion,where she bursts out as one actor involved in double roles.

Dhiraj k NiteDhiraj Kumar Nite, A Social Scientist, University of Johannesburg, Ambedkar Univeristy Delhi. You can contact him through dhirajnite@gmail.com

बूढ़ों का वसंत और लोलितागिरी: डॉ. विनय कुमार

सत्तर पार का एक बूढ़ा ‘सुपरस्टार’ है, उसे विश्वास है कि उसे सप्तर्षियों में से एक मान लिया गया है,सो मृत्यु उसे नहीं व्यापेगी।यह बूढ़ा हालांकि मुंह के भीतर नकली दाँत और माथे के ऊपर नकली केश लगाता है, जब तब बीमार पड़ते रहता है, तो भी सोलह साल की लड़की से प्रेम का नाटक करने के लिए हमेशा तैयार रहता है। बूढ़ा प्रयोगों का शौकीन है। उसे लगता है, प्रयोग करते रहने से आदमी हमेशा जवान बना रहता है। अपनी उम्र को जीत लेने का नाटक करते-करते इस बूढ़े ने साबित किया है कि सचमुच उम्र को जीता जा सकता है। वैसे अपनी उम्र को जीतने के लिए यह बूढ़ा एक खास किस्म का शहद भी खाता है। यह शहद पुणे के एक बाग़ में तैयार होता है। यह शहद या तो सिर्फ यह बूढ़ा खाता है या फिर मधुमक्खियों पर राज करने वाली रानी मधुमक्खी, बाकी जो कोई इस शहद को खाना चाहता हो उसे उस क्लब में शामिल होना पड़ेगा जो कि रानी मधुमक्खी का क्लब होता है। यह क्लब अकसर आईपीएल की टीमों के खरीदारों और उनके दोस्तों से बनता है। साठ पार कर चुका एक और बूढ़ा है। यह बूढ़ा ‘सर्वशक्तिमान’ है। इस बूढ़े के पास एक नुस्खा है। बूढ़ा रानी मधुमक्खी के क्लब में शामिल होने का नुस्खा बताता है। इस बूढ़े ने भी उम्र को जीत लिया है।यह बूढ़ा अपने शरीर को सोने से मढ़वा देना चाहता है। सोना मढ़वाये सूट को धारण करने वाला बूढ़ा अपने को रॉकस्टार कहलवाने का शौकीन है, उसे रॉकस्टार कहा भी जा रहा है। साठ साल के इस लोकतंत्र पर इक्कीसवीं सदी में बरस इक्कीसवे बरस की जवानी छा रही है। सारे बूढ़े जवान हो गये हैं, सारे बच्चे भी जवान हो गये हैं, और जो जवान हैं, उनसे कहा जा रहा है कि अब आप चिरयौवन की अनंत आकाशगंगा में टहल लगाने को तैयार हैं। यंगिस्तान कहलाने वाले इस देश में अब कोई नहीं मरता। यहां रोग-शोक-दुःख-मृत्यु कुछ भी नहीं है। यह सब उस दौर की बातें हैं जब ग्रोथ-रेट के साथ किसी पुछल्ले की तरह हिन्दू शब्द जुड़ा होता था। यह ‘हिन्दू’ शब्द उस युग की इकॉनॉमी में इस देश के आदमी को आदिमानव बताने के लिए प्रयोग किया जाता था। आदिमानव ने छलांग लगायी है, अब वह महामानव है या फिर महामानव बनने को तैयार खड़ा है। महामानवत्व के सुखसागर में डूबते उतराते इस माहौल में यह लेख कह रहा है कि भाई साहेब, ये तो एक रोग है…! यह तो सिर्फ एक भूमिका है, पृष्ठभूमि है..आख्यान आगे है। डॉ. विनय कुमार की लेखनी में नयापन क्या है? नयापन वही है जो हिंदी के समकालीन रचनात्मक परिदृश्य से गायब है। नई सूचनाएं, नए ज्ञान ताकि हम बाकी संसार के साथ कदमताल कर सकें! अंग्रेजी या विदेशी साहित्य-लेखन से सहज लोगों के लिए विनय कुमार का लेखन नया नहीं बल्कि एक तरह का दुहराव भी लग सकता है, लेकिन इसे एक तरह की शुरुआत माननी चाहिए। समकालीन हिंदी कथेत्तर गद्य हिंदी का सबसे गरीब संस्करण हो गया है। डॉ. विनय की पुस्तक ‘एक मनोचिकित्सक के नोट्स’ इस गरीबी को कुछ कम ही करता है। प्रस्तुत है इसी पुस्तक से छोटे-छोटे दो गद्यांश। @चंदन श्रीवास्तव 

Sugar Daddy (1976)-Poster

Sugar Daddy (1968)-Poster


By डॉ. विनय कुमार

 चीनी कम होने की निःशब्दता

 
चीनी कम

मादरे-वतन में अगर मनमोहनॉमिक्स की इन्द्रधनुषी छटा का नूर न होता तो हमें ‘प्रिविलेज्ड बूढ़ों के वसंत’ और ‘लोलितागिरी’ पर चर्चा की जरुरत महसूस न होती… ‘निःशब्द’ और ‘चीनी कम’ पर चर्चाएँ कहाँ हो रही हैं? क्या उस भारत में जो अनुसरण करता है या उस छोटे भारत में जो नेतृत्व करता है. जो भारत ‘भूख-भय-भ्रष्टाचार’ की मार से खुद ‘निःशब्द’ है और जिसकी किस्मत में यूँही ‘चीनी कम’ है उसे यह विलासितापूर्ण सहूलियत कहाँ कि प्रेम और विवाह की तरह-तरह की रेसिपि को चटखारे लेकर पढ़े. वृद्ध और युवती के प्रेम, साहचर्य और विवाह का मुद्दा गर्म हो रहा है या गरमाया जा रहा है? सोचने की बात है. सोचने का फैशन न रहने के बावजूद इस पर सोचने की जरुरत है.

वृद्ध का युवती से विवाह भारत के लिए कोई नई बात नहीं है. दक्षिणभोगी नीतिकार कह गए ‘वीरभोग्या वसुंधरा’ और सेनाओं के सहारे वीरता सिद्ध करने वाले सत्तावान हत्यारों को भोग का सिद्धांत मिल गया. महलों के भीतर रानियों के मोहल्ले से लेकर नगर तक बसने लगे. जरा सोचकर देखिये कि कृष्ण की साथ हजार रानियों का खर्चा कैसे चलता होगा. सिर्फ इच्छा की पूर्ति के लिए कृष्ण को प्रजा से कितना वसूलना पड़ता होगा. सत्ता और धन की गोटियों से खेला जाने वाले यह खेल नन्द और यशोदा की विरासत के बूते तो कतई संभव न था.

अब इस मुद्दे को स्त्रियों की दृष्टि से देखें. तरह-तरह के स्वाभाविक और आरोपित सीमाओं के बावजूद स्त्रियाँ सभ्यता-यात्रा में बराबर की भागीदार रही हैं. कल से आज तक जीवन और वर्चस्व की लड़ाइयों में वे अपनी तरह से शरीक रही हैं. हल और हथियार भले ही कम उठाती रही हैं, मगर श्रम के स्वेद और युद्धों के आँसूं और रक्त से कम नहीं भींगती रही हैं. नर और मादा की तरह जंगलों में भटकती मानवजाति ने जब ‘घर’ बनाया तो उनकी भूमिका इस कदर बदली कि उनका मनोविज्ञान पुरुषों से काफी अलग हो गया. घर और तन से चिपके बच्चों ने उन्हें सुरक्षा की आवश्यकता का पाठ पढ़ाया. अन्न और मांस कमाकर लौटे पुरुष को जब भूख और थकान से राहत मिलने लगी तो वह स्त्री को पहले ‘जरुरत’ फिर ‘जायदाद’ की तरह प्यार करने लगा. परिणाम यह हुआ कि स्त्रियाँ ‘कृपाकांक्षिणी’ और ‘सुरक्षाकामिनी’ हो गईं. शायद यही कारण है कि स्त्रियाँ पुरुषों की उम्र से अधिक उनकी सामर्थ्य को अहमियत देने लगीं.

स्त्री के मनोविज्ञान की इस विशिष्ट पहचान के पक्ष में सबसे बड़ा जैविक प्रमाण (बायोलॉजिकल एविडेंस) यह है कि स्त्रियों की यौनिक उत्तेजना का सबलतम कारक है—पुरुष प्रदत्त देखभाल और सुरक्षा. याद करें प्रकाश झा की फिल्म ‘दिल क्या करे’. इस फिल्म की नायिका चलती ट्रेन में बलात्कार की कोशिश करने वाले गुंडों से बचाने वाले अजनबी को थोड़ी ही देर के बाद बेहद ‘निःशब्द’ तरीके से अपनी देह सौंप देती है और यात्रा के अंत में अजनबी के प्रति आँखों से आभार प्रकट करते हुए विदा हो जाती है. इतना कुछ हो जाने के बावजूद अजनबियत बरकरार रहती है. ऐसा क्यों? क्योंकि सिलसिले खतरनाक भी हो सकते हैं. अजनबियत अपने आप में एक सुरक्षा कवच है. इस प्रसंग को सुरक्षा के प्रति स्त्री के मनोवैज्ञानिक (सायकोबायोलॉजिकल) प्रतिक्रिया के रूप में देखें.

अगर स्वतंत्रता पूर्व के भारत की बात करें तो मुग्धाओं के प्रेम की सुविधा सामंतों, सेठों और वाग्वीर ज्ञानिओं के ही भाग्य में थी. लोकतांत्रिक भारत में इसमें ‘प्रिविलेज्ड क्लास’ के नेता और आला अफसर भी शामिल हो गए. अब जबकि उदारीकरण की मीठी छुरी से अच्छी-बुरी पुरानी मान्यताएं हँस-रोकर हलाल हो रही हैं, एक नए सोशल आर्डर को मान्यता दिलाने की कोशिश सर उठा रही हैं. एक फिल्म में सुबह की दौड़ लगाते हुए अमिताभ आते हैं ‘जब तक जाँ में है जाँ तब तक रहे जवां, रोज सुबह से माँगें नई-नई खुशियाँ.’ इस फिल्म में बुढ़ाते जाने के बावजूद वे विवाह नहीं करते. मगर उदार भारत में शताब्दी के महानायक कामनाओं के नदी में ‘निःशब्द’ बहते नज़र आए. ‘निःशब्द’ में थोडा अपराधबोध हुआ और ख्याल-ए-ख़ुदकुशी से उबरे तो तय किया कि तीस पार की कुड़ी से कुड़माई की जाये. इस ढीठ बदलाव के मनोविज्ञान की व्याख्या वैश्वीकरण और उदारीकरण की रोशनी में ही संभव है.

जब पश्चिम में औद्योगिक क्रान्ति हुई तो सत्ता और अर्थ के समीकरण बदले. पुराने सामन्तों और सेठों की जगह उद्यम से उभरे नवधनाढ्यों ने ली. उद्योगों ने पूंजी के नए पहाड़ बनाए, ऐश्वर्य और सुख की नई परिभाषाएँ विकसित कीं और एकदम नए किस्म की कुलीनों की जमात खाड़ी की. उद्यम और उत्पादन बहादुरों की जमात पूंजी के नशे में ‘जब तक है जाँ तब तक लुटें मजा’ की राह पर चल पड़ी. तबसे आज तक यूरोप और उसके सारे उपनिवेश में ‘एन्जॉय योर सेल्फ’ का नारा गूंज रहा है. भोग के प्रयोग ने स्त्रियों के सामने भी यह विकल्प प्रस्तुत किया कि वे चाहें तो अमीर बूढ़ों की सहचरी बन सकती हैं. धन और सत्ता का सुख किसे नहीं चाहिए. स्त्रियाँ अपवाद नहीं हैं. उनमें से कुछ को लगा कि अमीर बूढ़ों के प्रति आकर्षित होना एक सुरक्षित, आरामदेह और शक्ति एवं ऐश्वर्य प्रदान करने वाला बेहतर विकल्प है. यहीं से खड़ी हुई प्रिविलेज्ड प्रेमियों की एक नई जमात. अमेरिका में इस जमात को ‘शुगर डैडीज’ कहा जाता है. अब तो आप मानेगें कि बूढ़ों का यह वसंत ‘ग्लोबलाइजेशन का बाई प्रोडक्ट’ है और उसे फैशन शो की तरह प्रायोजित किया जा रहा है, भारत के नए उद्यम-वीरों के लिए. कुल मिलाकर वृद्ध-युवती साहचर्य का यह फैशन पूंजी के पहाड़ों से उठने वाली पुरानी पछुआ हवा का यह पुरवैया झोंका है.

जो पश्चिम में हो चूका वह भारत में हो रहा है. मगर जो जो भारत में हो रहा है वह पश्चिम में नहीं हो रहा है. पश्चिम में स्त्री-पुरुष संबंधों के समीकरण बदल गये हैं. वहाँ स्त्री सशक्तिकरण का दौर सफल हो चुका है. काफी तादात में स्त्रियाँ ज्ञान, धन, शासन-सत्ता की स्वामिनी हो चुकी हैं. नई रायशुमारियाँ बताती हैं कि अब समृद्ध और सत्तावान प्रौढ़ाएँ भींगती मसों के युवक से प्रेम और विवाह करने लगी हैं. आज नहीं तो कल भारत में यह हो सकता है. ‘चीनी कम’ की सफलता की कामना करने वाले शुगर डैडीज सोच लें.

निःशब्द

हमारे समय में शहरी और कस्बाई भारत में प्रेम पर चर्चा कोई अजूबा नहीं है. महामायावी मीडिया की कृपा से हम तरह-तरह के प्रेम पर होने वाली तरह-तरह की चर्चाओं के अनिवार्य घेरे में हैं. मोनिका-क्लिंटन और जूली-मटुकनाथ जैसी कथाएँ चाट मसाले की तरह हमरे खाने की प्लेटों में अनिवार्य रूप से छिड़की जा रही है और चूँकि हम भूखे नहीं रह सकते इसीलिए उसे चखने को विवश हैं. प्रेम का हो या न हो यह ‘प्रेम’ के अहर्निश उच्चारण से उठने वाले शोर का समय अवश्य है और ऐसे समय में आई है एक फिल्म ‘निःशब्द’. एक ‘टीन’ (युवती) और एक वक्त की मार से छीजे हुए ‘टिन’ (वृद्ध) की प्रेमकथा को लेकर.

इस फिल्म के पहले इस पर चर्चाएँ आईं और खूब आईं, जिनका लब्बोलुआब यह था कि भारत बदल रहा है- इंडिया प्वायज्ड टु बिकम बोल्ड एंड ब्यूटीफुल, देखो तो सही क्या मणिकांचन संयोग है- ओल्ड बिग बी और कमसिन ब्यूटीफुल जिया. सुपरस्टार की लोलितागिरी. जिया देखोगे तो जिया धड़क-धड़क जाएगा. तो ‘निःशब्द’ से पहले आई शब्दों की भीड़ इश्तेहार की तख्तियां उठाये. और जब फिल्म आई तो आई और आकर चली गयी. पटना में मटुक-जूली का तड़का भी भीड़ न बटोर पाया.

दरअसल ‘निःशब्द’ आकर्षण और प्रेम से अधिक त्रासदियों की कथा है. नायिका खंडित परिवार से आती है. पिताओं से भरे समाज में वह पिता के प्रेम से वंचित है. यह अभाव उसके मनोयौनिक (सायकोसेक्सुअल) विकास में अपनी भूमिका निभाता है. चूँकि किसी चीज की इच्छा उसकी कमी से ही पैदा होती है इसलिए उसके अचेतन में पितृपुरुष के लिए चाह का मौजूद होना कोई अजूबा नहीं. यहाँ प्रश्न उठता है कि उसने सहेली के पिता को पिता की तरह क्यों नहीं चाहा. ऐसा इसलिए कि वह पिता-पुत्री के संबंधों के व्याकरण से अनभिज्ञ थी. हर शिशु नर या मादा पैदा होता है. संबंधों की समझ तो परिवार और परिवेश के साथ ‘इंटरएक्शन’ से विकसित होती है. नायिका की समस्या यह है कि जब संयोग उसे अबाधित एकांत में नायक को समझने का अवसर प्रदान करता है और उसके अचेतन में पितृपुरुष को पाने की इच्छा सिर उठाती है तो वह स्वयं को एक पुत्री की तरह अभिव्यक्त नहीं कर पाती क्योंकि उसे वह मनोवैज्ञानिक भाषा ही नहीं पता जिसमें एक पुत्री अपने पिता से बात करती है. उसकी इच्छा उसके बचपन के अभाव से उठती है, मगर व्यक्त होती है युवा भाषा में. यह त्रासदी नहीं तो और क्या है! नायक अपनी तरह की त्रासदी का शिकार है, विवाहित होकर दाम्पत्य प्रेम से वंचित. दाम्पत्य की विडंबना यह है कि वह प्रेमहीन होकर भी संतानवान हो सकता है. नायक तृप्त पिता है मगर एक अतृप्त पुरुष. फिल्म में संयोग उसके अतृप्त पुरुष का कद इतना बढ़ा देता है कि पिता बौना हो जाता है. अतृप्त पुरुष की भाषा के शोर में पिता की भाषा खो जाती है. अगर सही-गलत के पारंपरिक और समाजसम्मत नजरिये से सोचें तो यह दायित्व नायक का ही था कि वह नायिका के हित में सही भाषा में बात करता. क्योंकि नायिका भले ही पुत्री की भाषा नहीं जानती थी, नायक तो पिता की भाषा जानता था. वह निःशब्द की ‘जिया’ के मोह को गुड्डी की ‘जया’ के मोह की तरह भंग कर सकता था. मगर इच्छाओं को बहकाते-दहकाते ग्लोबलाइज्ड समाज में यही, शायद यही हो सकता था. यह त्रासदी नहीं तो और क्या है?

अगर मिथकों पर रत्ती भर भी यकीन करें तो मानना होगा कि भारत शांतनु और ययाति का देश है. स्मरण है कि कमसिन कायालोलुप राजाओं की वासना की वासना को सैद्धांतिक आधार प्रदान करने के लिए लोभी शास्त्रकारों ने सोलह की उम्र को अक्षत सौन्दर्य के भोग का प्रवेशद्वार घोषित कर दिया था. ‘स्वीट सिक्सटीन’ का जूमला तो बहुत बाद की चीज है. आज चिकित्सा विज्ञान सोलह की उम्र को मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण से अपरिपक्व मानता है. सोलह और अठारह में फासला ही कितना है. ‘निःशब्द’ के बहाने से ही सही, यहाँ यह कहना होगा कि अठारह वर्षीय युवती के लिए साठ वर्ष के पुरुष के मन में उमड़ा प्रेम उस कंगन की तरह होता है, जिसके सहारे वह पंचतंत्र के बूढ़े शेर की तरह अपने शिकार को फंसाने की कोशिश करता है. मीडिया और जूली को मटुक जी भी ‘निःशब्द’ के नायक की तरह अपने दाम्पत्य-जीवन को असफल बताते हैं. यहाँ उनसे यह पूछना दिलचस्प होगा कि जूलिगिरी उनकी आदत तो नहीं.

‘सठियाना’ एक फब्ती भर नहीं है. बढ़ती उम्र के लोगों की रक्त-नलिकाएं संकरी हो जाती हैं, इस कारन मस्तिष्क में रक्त-संचार कम हो जाता है. कभी-कभी मस्तिष्क में फैली रक्त-नलिकाओं में थक्का बन जाता है और मस्तिष्क के किसी ख़ास हिस्से को रक्त मिलना बंद हो जाता है. अगर यह दुर्घटना मस्तिष्क के ‘फ्रंटल लोब’ नामका हिस्से में घटित होती है, तो ग्रसित व्यक्ति वर्जनाहीन/अनैतिक व्यवहार कर सकता है. ‘जूलियों’ को ‘मटुकों’ से प्यार करने के पहले उनके मस्तिष्क का सीटी स्कैन कराकर देख लेना चाहिए कि ‘फ्रंटल लोब’ सिकुड़ तो नहीं रहा. सनद रहे की छाती में धडकने वाला दिल एक पम्पिंग सेट-भर है, वह दिल जो भावनाओं का केंद्र है, उसका निवास मस्तिष्क में ही होता है.

…साठ और अठारह का अंतराल सिर्फ उम्र का अंतराल नहीं होता, यह उर्जा, क्षमता और भविष्य का अंतराल भी होता है. टेस्टोस्टेरोन नामक पुरुष हार्मोन पच्चीस वर्ष में अपने शिखर पर होता है जबकि साठ वर्ष की उम्र में घाटी में घसीटता दीखता है. प्लैटोनिक प्रेम तो हार्मोन के मदद के बगैर भी शिखर पर पहुँच सकता है, मगर प्लैटोनिक फेज ख़त्म होने के बाद क्या- क्या होगा- यह भी सोचना चाहिए. अब आयें भविष्य पर.

अठारह की उम्र के भविष्य का अर्थ है सुबह के आठ आठ बजे और साठ का समय है शाम के पांच बजे. साठ वाला डूब जाएगा अठारह वाली के दिन कैसे कटेंगें! इसे भी सोचा जाना चाहिए!

vinay kumar

डॉ. विनय कुमार मनोवेद माइंड हॉस्पिटल, पटना में मनोचिकित्सक हैं.  हिंदी साहित्य से लेकर साहित्येत्तर सांस्कृतिक रुचियों तक को बहुत नजदीक से परखते हैं. नॉन फिक्शनल हिंदी की अकाल वेला में अद्भुत चमक के अधिकारी हैं. हाल ही आई पुस्तक ‘एक मनोचिकित्सक के नोट्स’ से खासे चर्चित. उनसे dr.vinaykr@gmail.com पर संपर्क संभव है. 

‘Mard Ke Seene Mein Baal Hota Hai’: Abhiruchi Ranjan

By Abhiruchi Ranjan

I made these posters as part of conducting the GSCASH (JNU) workshop in 2013-14. GSCASH workshops are conducted to sensitize the students regarding gender issues. Popular film dialogues and songs are an important means of capturing people’ s imagination. Using these dialogues and songs to create awareness about gender issues is a way Of speaking to the people, instead of speaking at them. Also conveyed in these images and lyrics are  biased attitudes which slowly become normalised and even admirable gender traits.


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Abhiruchi Ranjan is  a student of the Ph.D programme at the Centre for Political Studies, Jawaharlal Nehru University, New Delhi. She can be contacted at abhiruchi.b.ranjan@gmail.com.

भारतवन अधिनायक: संतोष झा

संतोष झा बिहार के युवा रंगकर्मी, संगीतकार, नाटककार और संस्कृतिकर्मी हैं. फिलहाल एक राजनितिक नाटक ‘भारतवन अधिनायक’ के रिहर्सल में व्यस्त हैं. हिंदी की कुछ कविताओं को स्वर और संगीत देने के कारण खासे चर्चित रहे हैं. उनके द्वारा लिखित नाटक ‘भारतवन अधिनायक’ से कुछ गीत हम यहाँ साझा कर रहे हैं. नाटक के पीडीऍफ़ संस्करण के लिए यहाँ चटका लगा सकते हैं.भारतवन अधिनायक -संतोष झा और उनसे संपर्क की इच्छा हो तो  hirawal@gmail.com पर  लिख भी  सकते  हैं. 325265_355927197757029_1801603844_o

By संतोष झा 

1.

वन-वन-वन अधिनायक जय हे

भारतवन अधिनायक

गेंडे विशाल, लोमड़-सियार

औ’ स्वान तुम्हारे सेवक

प्रति वृक्ष-वृक्ष वानर-समूह

तुम ही उन सबके नायक

भेड़-बकरियां-गायें

श्रद्धानत हो आएं

सम्मुख नवाएं माथा

2.

डेवलपमेंट का नया आइडिया !

क’मॉन गाइज़ लेट्स मेक इट सक्सेसफुल

वन टू थ्री फोर हैव ग्लास फुल-फुल

दुनिया जाए भाड़ में, यू बी जस्ट कूल!

वन टू थ्री फोर हैव ग्लास फुल-फुल

हैव ग्लास फुल-फुल, हैव ग्लास फुल-फुल

हैव ग्लास फुल-फुल, हैव ग्लास फुल-फुल

चलो पीछे-पीछे-पीछे-पीछे-पीछे-पीछे देखें

चलो आगे-आगे-आगे-आगे-आगे-आगे बढ़ें

चलो शेयर करें व्हाट्स अप पे

चलो शेयर करें फेसबुक पे

दुनिया जाए भाड़ में, यू बी जस्ट कूल!

क’मॉन गाइज़ लेट्स मेक इट सक्सेसफुल

वन टू थ्री पफोर हैव ग्लास फुल-फुल

हैव ग्लास फुल-फुल, हैव ग्लास फुल-फुल

हैव ग्लास फुल-फुल, हैव ग्लास फुल-फुल

3.

घर तो निकला हवा-हवाई, रोज़ी का क्या होगा राजा?

घर तो निकला हवा-हवाई, रोटी का क्या होगा राजा?

घर तो निकला हवा-हवाई, ऊपर से बढ़ती महंगाई

ऊपर से बढ़ती महंगाई, बच्चों का क्या होगा राजा

घर तो निकला हवा-हवाई, रोज़ी का क्या होगा राजा?

घर तो निकला हवा-हवाई, रोटी का क्या होगा राजा?

4.

भारतवन का नया राज है, नया काज है, नया साज है

कौन बताए किसके सर पे, इस शासन का रखा ताज है

कल तक दिल्ली में दिखता था, नागपूर में दिखे आज है

ऐ भारतवन के बाशिंदो! बैल, गधे, आज़ाद परिंदो

आंख मूंदकर जीनेवालो, आसमान में उड़नेवालो

लक्कड़बग्घे घूम रहे हैं, गिद्ध डाल पर झूम रहे हैं

खों-खों, भौं-भौं, हुआं-हुआं में, दाना-पानी कहीं नहीं है

क्या होगा बछड़ों-चूज़ों का, इसकी चिंता कहीं नहीं है

कोई कहता एक रंग का बैल रहेगा भारतवन में

कोइ कहता एक रंग की चिडि़या होगी इस उपवन में

आखें खोलो, उठो एक संग, भारतवन के ऐ बाशिंदो !

नागपूर-दिल्ली से कह दो – हमें हमारा वतन चाहिए

नए राज के लंगूरों से कह दो – हमको अमन चाहिए

अमन चाहिए!

अमन चाहिए!!

अमन चाहिए!!!

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