नंगे-फ़क़ीर सरमद के क़त्ल की दास्तान: कृष्ण कल्पित

सरमद शहीद पर लिखी जा रही लंबी-कविता अथवा काव्याख्यान पूरा हुआ ।

दो महीने से इस मुश्किल काम में लगा हुआ था। इतनी सामग्री इकट्ठा करली कि उसमें फँस के रह गया था। किसी शख़्सियत पर कविता लिखना आसान काम नहीं। चाहे वह पौराणिक हो ऐतिहासिक हो या फिर समकालीन। यह निश्चय ही ज़ोखिम का काम है।

बहुत सी कविताएँ याद आईं । निराला की ‘राम की शक्तिपूजा’, मायकोव्स्की की ‘लेनिन’, धूमिल की राजकमल चौधरी और नागार्जुन की केदारनाथ अग्रवाल पर लिखी कविता । अर्नेस्टो कार्देनाल की मर्लिन मुनरो पर लिखी कविता और बर्तोल्त ब्रेख़्त की Lao Tzu : Legend of the Book Tao-Te-Ching on Lao Tzu’s Road into Exile । ( हालांकि ब्रेख़्त की कविता लाओ त्ज़े पर कम उसकी 81 सूक्तियों की क्लासिक-किताब पर अधिक है )

100 से ऊपर पंक्तियों की कविता  ‘सरमद : जामा मस्जिद की सीढ़ियों पर एक नँगे फ़क़ीर के क़त्ल की दास्तान’ आपके समक्ष है।  #कृष्ण कल्पित

Sarmad by Sadequain

सरमद शहीद से प्रेरित सादेकैन की एक  कृति 

जामा मस्जिद की सीढ़ियों पर एक नंगे-फ़क़ीर के क़त्ल की दास्तान

By कृष्ण कल्पित

उम्रेस्त कि आवाज़-ए-मंसूर कुहन शुद
मन अज़ सरे नो जलवा देहम दारो रसनरा !
( मंसूर की प्रसिद्धि पुरानी हो गई । मैं सूली पर चढ़ने का दृश्य नये सिरे से पैदा करता हूँ । )

(१)

-आप इतने बड़े विद्वान हैं, फिर भी नंगे क्यों रहते हैं ?

दिल्ली के शहर क़ाज़ी मुल्ला क़वी के सवाल के जवाब में सरमद ने कहा :
शैतान बलवान (क़वी) है !

शहर क़ाज़ी को लगा कि सरमद उसे शैतान कह रहा है । मुल्ला की भृकुटियाँ तन ही रही थी कि सरमद ने फिर कहा :
एक अजीब चोर ने मुझे नंगा कर दिया है !

(२)

शहर क़ाज़ी मुल्ला क़वी को आलमगीर औरंगज़ेब ने सरमद के पास भेजा था – उसकी नग्नता का रहस्य जानने के लिये । औरंगज़ेब शाहजहाँ के बाद दारा शिकोह को ठिकाने लगाकर बादशाह बना था । औरंगज़ेब जानता था कि दारा शिकोह सरमद की संगत में था और उसके बादशाह बनने की भविष्यवाणी सरमद ने की थी ।

औरंगज़ेब के दिल में सरमद को लेकर गश था – वह उसे भी दारा शिकोह की तरह ठिकाने लगाना चाहता था लेकिन कोई उचित बहाना नहीं मिल रहा था । औरंगज़ेब जानता था कि बिना किसी वाजिब वजह के सरमद का क़त्ल करने से उसे चाहने वाले भड़क सकते थे – जिनकी सँख्या अनगिनत थी ।

औरंगज़ेब क़ातिल होने के साथ धर्मपरायण भी था और बादशाह होने के बावजूद टोपियाँ सिलकर अपना जीवन-यापन करता था ।

(३)

क़ाज़ी मुल्ला क़वी ने दरबार में उपस्थित होकर सरमद का हाल सुनाया और सरमद की मौत का फ़तवा जारी करने के लिये क़लमदान का ढक्कन खोल ही रहा था कि औरंगज़ेब ने उसे इशारे से रोक दिया और कहा :
नग्नता किसी की मौत का कारण नहीं हो सकती ।

औरंगज़ेब जितना अन्यायप्रिय था उतना ही न्यायप्रिय भी था !

(४)

तब आलमगीर ने अन्याय को न्याय साबित करने के लिये धर्माचार्यों की सभा आहूत की । सरमद को भी बुलवाया गया ।

सर्वप्रथम औरंगज़ेब ने सरमद से पूछा :
सरमद, क्या यह सच है कि तुमने दारा शिकोह के बादशाह बनने की भविष्यवाणी की थी ?

सरमद ने स्वीकृति में सर हिलाया और कहा :
मेरी भविष्यवाणी सच साबित हुई । दारा शिकोह अब समूचे ब्रह्मांड का बादशाह है ।

इसके बाद धर्मसभा के अध्यक्ष सिद्ध-सूफ़ी ख़लीफ़ा इब्राहिम बदख़्शानी ने सरमद से उसकी नग्नता का कारण पूछा । सरमद ख़ामोश रहा । फिर पूछा गया तो सरमद ने वही जवाब दिया जो उसने शहर क़ाज़ी को दिया था :
एक अजीब चोर है जिसने मुझे नंगा कर दिया !

तब ख़लीफ़ा ने सरमद को इस्लाम के मूल सूत्र कलमाये तैयब ( लाइलाहा इल्लल्लाह अर्थात कोई नहीं अल्लाह के सिवा ) पढ़ने के लिये कहा ।

सरमद के विरुद्ध यह भी शिकायत थी कि वह जब भी कलमा पढ़ता है, अधूरा पढ़ता है । अपनी आदत के अनुसार सरमद ने पढ़ा :
लाइलाहा ।

सरमद को जब आगे पढ़ने को कहा गया तो सरमद ने कहा कि मैं अभी यहीं तक पहुँचा हूँ कि कोई नहीं है । आगे पढूँगा तो वह झूठ होगा कयोंकि आगे के हर्फ़ अभी मेरे दिल में नहीं पहुँचे हैं । सरमद ने दृढ़ शब्दों में कहा कि मैं झूठ नहीं बोल सकता ।

बादशाह औरंगज़ेब, धर्मसभा के अध्यक्ष ख़लीफ़ा बदख़्शानी, शहर क़ाज़ी मुल्ला क़वी के साथ समूची धर्मसभा और पूरा दरबार सरमद का जवाब सुनकर सकते में था । ख़लीफ़ा ने कहा :
यह सरासर इस्लाम की अवमानना है, कुफ़्र है । अगर सरमद तौबा न करे, क्षमा न मांगे तो इसे मृत्युदंड दिया जाये

(५)

जब सरमद ने तौबा नहीं की क्षमा माँगने से इंकार कर दिया तो धर्माचार्यों की सभा और बादशाह की सहमति से शहर क़ाज़ी मुल्ला क़वी ने क़लमदान का ढक्कन खोला, उसमें क़लम की नोक डुबोई और काग़ज़ पर सरमद के मृत्युदंड का फ़रमान लिख दिया ।

अपनी मौत का फ़रमान सुनकर सरमद को लगा जैसे वह बारिश की फुहारों का संगीत सुन रहा है । वह भीतर से भीग रहा था जैसे उसकी फ़रियाद सुन ली गई है जैसे उसे अपनी मंज़िल प्राप्त हो गई है ।

सरमद अब कुफ़्र और ईमान के परे चला गया था । सरमद ने सोचा :
कितने फटे-पुराने वस्त्रों वाले साधु-फ़क़ीर गुज़र गये – अब मेरी बारी है ।

(६)

सरमद, तू पूरी दुनिया में अपने नेक कामों के नाते जाना जाता है । तूने कुफ़्र को छोड़कर इस्लाम धारण किया । तुझे ख़ुदा के काम में क्या कमी नज़र आई जो अब तुम राम नाम की माला जपने लगा !

सरमद को अपनी ही रुबाई याद आई और अपना पूरा जीवन आँखों के सामने चलचित्र की तरह घूमने लगा ।

पहले अरमानी-यहूदी, फिर मुस्लिम और अब हिन्दू !

सरमद जब अरब से हिंदुस्तान की तरफ़ चला था तो वह एक धनी सौदागर था । उसे वह लड़का याद आया, जिससे सिंध के ठट्टा नामक क़स्बे में उसकी आँख लड़ गई थी । इस अलौकिक मोहब्बत में उसने अपनी सारी दौलत उड़ा दी। सरमद दीवानगी में चलते हुये जब दिल्ली की देहरी में घुसा तो एक नंगा फ़क़ीर था ।

उसे वे धूल भरे रास्ते याद आये , जिस से चलकर वह यहाँ पहुँचा था ।

और सरमद को उस हिन्दू ज्योतिषी की याद आई जिसने उसकी हस्त-रेखाएँ देखकर यह पहेलीनुमा भविष्यवाणी की थी :

तुम्हारे मज़हब के तीसरे घर में मृत्यु बैठी हुई है!

(७)

अगले दिन सरमद को क़त्ल करने के लिये जामा मस्जिद की सीढ़ियों पर ले जाया गया, जहाँ इतनी भीड़ थी कि पाँव धरने की जगह नहीं थी । कुछ तमाशा देखने तो अधिकतर अपने प्रिय सरमद की मौत पर आँसू बहाने आये थे।जामा मस्जिद की सबसे ऊँची सीढ़ी पर खड़े होकर सरमद ने यह शे’र पढ़ा :

शोरे शुद व अज़ ख़्वाबे अदम चश्म कशुदेम

दी देम कि बाकीस्त शबे फ़ितना गुनूदेम !

( एक शोर उठा और हमने ख़्वाबे-अदम से आँखें खोलीं तो देखा – कुटिल-रात्रि अभी शेष है और हम चिर-निद्रा के प्रभाव में हैं । )

इसके बाद अपनी गर्दन को जल्लाद के सामने झुकाकर सरमद फुसफुसाया :

आओ, तुम जिस भी रास्ते से आओगे, मैं तुझे पहचान लूँगा !

(८)

सरमद का कटा हुआ सर जामा मस्जिद की सीढ़ियों से नृत्य करता हुआ लुढ़कता रहा ।सरमद के कटे हुये सर को उसके पीर हरे भरे शाह ने अपने आगोश में ले लिया । पवन पवन में मिल गई – जैसे कोई विप्लव थम गया हो !

(९)

मुस्लिम इतिहासकार वाला दागिस्तानी ने अपनी किताब में लिखा है कि वहाँ उपस्थित लोगों का कहना था कि जामा मस्जिद की सीढ़ियों से ज़मीन तक पहुँचते हुये सरमद के कटे हुये सर से यह आवाज़ निकलती रही :
ईल्लल्लाह   ईल्लल्लाह  ईल्लल्लाह
और यह भी प्रवाद है कि सरमद के कटे हुये सर से बहते हुये लहू ने जामा मस्जिद की सीढ़ियों पर जो इबारत लिखी गई उसे इस तरह पढा जा सकता था :
लाइलाहा  लाइलाहा लाइलाहा !

(१०)

इतिहास की किताबों में सरमद शहीद का ज़िक़्र मुश्किल से मिलता है लेकिन जामा मस्जिद के सामने बने सरमद के मज़ार पर आज भी उसके चाहने वालों की भीड़ लगी रहती है । यह जुड़वाँ मज़ार है । हरे भरे शाह और शहीद सरमद के मज़ार ।हरे भरे शाह और सरमद । जैसे निज़ामुद्दीन औलिया और अमीर ख़ुसरो । पीरो-मुरीद । एक हरा । एक लाल ।

इन के बीच नीम का एक घेर-घुमावदार, पुराना वृक्ष है जिससे सारे साल इन जुड़वाँ क़ब्रों पर नीम की निम्बोलियाँ टपकती रहती हैं ।

और जब दिल्ली की झुलसा देने वाली गर्मी से राष्ट्रपति-भवन के मुग़ल-गॉर्डन के फूल मुरझाने और घास पीली पड़ने लगती है तब भी सरमद के मज़ार के आसपास हरियाली कम नहीं होती । सरमद की क़ब्र के चारों तरफ़ फूल खिले रहते हैं और घास हरी-भरी रहती है !

(११)

ख़ूने कि इश्क़ रेज़द हरगिज़ न बाशद

( इश्क़ में जो ख़ून बहता है वह कदापि व्यर्थ नहीं जाता ! )

■     ■    ■

Krishna Kalpitअपने तरह का अकेला-बेबाक और विवादित कवि । कृष्ण कल्पित का जन्म 30 अक्टूबर, 1957 को रेगिस्तान के एक कस्बे फतेहपुर शेखावटी में हुआ। अब तक कविता की तीन किताबें और मीडिया पर समीक्षा की एक किताब छप चुकी है। एक शराबी की सूक्तियां  के लिए खासे चर्चित। ऋत्विक घटक के जीवन पर एक पेड की कहानी नाम से एक वृत्तचित्र भी बना चुके हैं।  अभी  हाल ही में बाग़-ए-बेदिल नाम से एक विलक्षण  और विशाल  काव्य-संकलन  के साथ-साथ ‘कविता-रहस्य ‘ नामक  पुस्तक प्रकाशित । 

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6 thoughts on “नंगे-फ़क़ीर सरमद के क़त्ल की दास्तान: कृष्ण कल्पित

  1. शिव किशोर तिवारी on said:

    बिना भावुकता के, बिना एडिटोरियल कमेंट, बिना किसी प्रसंग को अनावश्यक विस्तार दिए आपने एक दारुण कथा लिखी है। बधाई।

  2. मीनाक्षी माथुर on said:

    “इश्क में जो खून बहता है वह कदापि व्यर्थ नही जाता”
    सत्य और सुंदर

  3. शंभू दयाल वाजपेयी on said:

    बहुत सुंदर । प्रणाम ।

  4. Ravi Ranjan on said:

    बहुत ही सुन्दर और मार्मिक प्रसंग की कलात्मक प्रस्तुति के लिए साधुवाद.

  5. Ravi Ranjan on said:

    ‘काफिर-ए-इश्कम मुसलमानी मरा दरकार नीस्त’ -खुसरो

  6. राकेश श्रीवास्तव on said:

    बहुत बहुत धन्यवाद कल्पित जी।

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