प्रेमचंद की भारतीयता और हिन्दी की साहित्यिक संस्कृति: चंदन श्रीवास्तव

हिन्दी की साहित्यिक संस्कृति और प्रेमचंद, लेखक- डा. राजकुमार, निबंधों ( कुल तेरह) का संकलन है और सारे लेख प्रेमचंद-विशेषी नहीं लेकिन पुस्तक का एक महत्वपूर्ण हिस्सा (कुल चार लंबे लेख) प्रेमचंद के मूल्यांकन की समस्या से जूझते हैं. चूंकि पुस्तक में भारतीय आधुनिकता को जमीन बनाकर ‘हिन्दी की साहित्यिक संस्कृति’ को समझने-बताने की कामयाब कोशिश की गई है सो पुस्तक की वैचारिकी का दायरा बड़ा हो जाता है. प्रेमचंद, हिन्द-स्वराज, सिविलाइजिंग मिशन, अंग्रेजी की जगह, हिन्दी की शक्ति, हिन्दी का जातीय संगीत, हिन्दी साहित्य का इतिहास और साहित्य, इतिहास तथा स्वाधीनता जैसे विषयों को एक सूत्र में पिरोने की भरपूर गुंजाइश बन जाती है पुस्तक में. और, ठीक इसी गुंजाइश को देखते हुए उम्मीद की जा सकती है समीक्ष्य पुस्तक की संभावनाओं का विस्तार लेखक किसी अन्य पुस्तक में बड़े फलक पर करेंगे. #लेखक

 

हिन्दी की संस्कृति और आधुनिकता का पुनर्पाठ बरास्ते प्रेमचंद

By चंदन श्रीवास्तव

प्रेमचंद पुराने हैं, इतने पुराने तो निश्चित ही कि हम उनकी रचनाओं की शत-वार्षिकी मना सकें. लेकिन, पुराना होना मात्र ‘साधुता’ की कसौटी नहीं, परीक्षा जरुरी है. पुराणमित्येव न साधु सर्वम्..’–  हिन्दी भाषा के भीतर चलने वाली साहित्य की ‘आधुनिकता’ की बहसें आपको अपने खास अंदाज में याद दिलाती हैं कि मालविकाग्निमित्रम् का सूत्रधार ऐसा आगाह कर गया है. सो, प्रेमचंद पुराने हैं तो उनकी कृतियों के परीक्षा के प्रयास भी कम पुराने नहीं.

प्रेमचंद के अध्येता जानते हैं कि शिवदान सिंह चौहान ने मार्च 1937 (प्रेमचंद की मृत्यु-1936) के अपने लेख में उनके रचना-कर्म की ‘प्रगतिशीलता’ की चर्चा की  थी. तब से लेकर अब तक प्रेमचंद को बुद्धि-विवेक की कसौटी पर ‘कलम का सिपाही’ के रुप में पढ़ा गया है और ‘कलम का मजदूर’ के रुप में भी. मूल्यांकन के लिए रचनाकार को नहीं उसकी रचनाओं के परिवेश को देखा जाना चाहिए और सबसे ज्यादा देखा जाना चाहिए रचनाकार के युग को आविष्ट करने वाली चेतना को—इस तर्क से हिन्दी साहित्य की समालोचना की आंख ने ‘प्रेमचंद और उनका युग’ तक पर नजर डाली है. ऐसे प्रयासों से प्रेमचंद के रचना-कर्म में ‘साधु-असाधु’ खोजने की सिद्ध कसौटियां बन गई हैं और अब यानि 21 वीं सदी के दूसरे दशक में यह अपेक्षित ही है कि 20 सदी के आरंभ से अपने लेखन की शुरुआत करने वाले प्रेमचंद की कृतियों की समालोचना की सिद्ध कसौटियों पर सवाल उठाये जायें. सो, सवाल खूब उठाये जा रहे हैं.

मिसाल के लिए  हिन्दी साहित्य की अंदरुनी बहसों को अपने पन्ने पर खास जगह देने वाले अखबार ‘जनसत्ता’ के पन्ने पर 2013 में जुलाई से सितंबर महीने के बीच प्रेमचंद को लेकर चले वाद-विवाद को देखा जा सकता है. खुर्शीद अनवर ने 11 अगस्त 2013 के अपने ‘प्रेमचंद को साम्यवादी बनाने की कवायद’ शीर्षक लेख में कहा कि “ प्रेमचंद को साम्यवादी घोषित करना उसी तरह से है जैसे जवाहर लाल नेहरु को गांधी से अलग कर उनपर लाल बिल्ला लगा दिया जाय.”  प्रेमचंद को साम्यवादी ठहराने की कोशिशों की परीक्षा करते हुए खुर्शीद अनवर ने अपने लेख में ध्यान दिलाया कि बेशक यह पंक्ति प्रेमचंद की है कि ‘ धन्य है वह सभ्यता जो मालदारी और व्यक्तिगत संपत्ति का अंत कर रही है और जल्दी ही या देर से दुनिया उसका पदानुसरण करेगी.. ‘ लेकिन प्रेमचंद को साम्यवादी ठहराने के लिए इतना कहना काफी नहीं’. लेख में अनवर का सवाल था कि 1936 में हुए प्रगतिशील लेखक संघ के अधिवेशन में जहां एक ओर हसरत मोहानी जैसे व्यक्ति ने कम्युनिस्ट विचारों के प्रचार-प्रसार की बात की, वहीं प्रेमचंद ने अपने भाषण में एक बार भी ऐसा कोई वक्तव्य नहीं दिया. क्या कोई उसकी वजह बता सकता है ? अनवर का निष्कर्ष था कि “प्रेमचंद को महान कथाकार  रहने देने में हम सबका भला है. साहित्य समाज के आगे चलने वाली मशाल हमेशा ही रहेगा, इसके लिए प्रेमचंद का साम्यवादी होना जरुरी नहीं है.”

अनवर के इस लेख पर प्रेमचंद के साहित्य के मशहूर अध्येता कमल किशोर गोयनका ने लिखा कि लेख के शीर्षक (‘प्रेमचंद को साम्यवादी बनाने की कवायद’) में ‘कवायद’ की जगह ‘साजिश’ शब्द का इस्तेमाल ज्यादा अच्छा होता क्योंकि “ प्रेमचंद के ‘हंस’, जनवरी, 1936 में प्रकाशित एक लेख का शीर्षक है- ‘लंदन में भारतीय साहित्यकारों की एक नई संस्था’, जिसमें लिखा है कि मुल्कराज आनंद, केएस भट्ट, जेसी घोष, एस सिन्हा, एमडी तासीर और एसएस जहीर ने लंदन में ‘दि इंडियन प्रोग्रेसिव राइटर्स एसोसिएशन’ की बुनियाद डाली, लेकिन डॉक्टर रामविलास शर्मा (मार्क्सवादी आलोचक) ने लिखा है कि नींव प्रेमचंद ने डाली, और इस प्रकार इस झूठ को इतना विस्तार दिया गया कि प्रेमचंद ‘प्रगतिशील लेखक संघ’ के संस्थापक बना दिए गए.”  मार्क्सवाद से प्रेमचंद के अलगाव को दिखाने के लिए गोयनका ने तर्क दिया कि “प्रेमचंद ने ‘हंस’ के उसी अंक में लंदन से आया घोषणा-पत्र भी प्रकाशित किया है. इसमें एक भी शब्द, एक भी उद्देश्य का संबंध मार्क्सवाद से दूर तक नहीं है. इस घोषणा-पत्र में चार प्रमुख उद्देश्य हैं- सांस्कृतिक और सामाजिक उत्थान, भारतीय स्वाधीनता, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और इंडो-रोमन लिपि की स्वीकृति. प्रेमचंद ने अंतिम को अस्वीकार करते हुए लिखा कि शेष तीन तो उन्हें आदर्श ही रहे हैं, पर इनमें कहीं भी मार्क्सवाद नहीं है और स्पष्ट है कि प्रेमचंद ने समर्थन इसलिए किया कि वे तीस-पैंतीस वर्षों से इन्हीं उद्देश्यों को लेकर चल रहे थे और वे स्वराज और भारतीय आत्मा की रक्षा के ही उपकरण थे.”

खुद कमल किशोर गोयनका ने क्या ‘आप इस प्रेमचंद को जानते हैं’(जनसत्ता, 28 जुलाई, 2013) शीर्षक अपने लेख में प्रेमचंद की नैतिकता और आधुनिकता की भूरि-भूरि प्रशंसा करते हुए उनकी कहानी ‘बालक’ की ओर ध्यान दिलाते हुए लिखा था कि इसका “ अशिक्षित नायक विवाह के छह महीने बाद उत्पन्न बच्चे को इस तर्क से स्वीकार करता है कि मैंने एक खेत खरीदा था, उसपर किसी ने फसल बोई ही थी तो क्या वह फसल मेरी नहीं होगी .”  प्रेमचंद की कहानियों के नैतिक-भाव की श्रेष्ठता और आधुनिकता-बोध की इस प्रशंसा पर दलित-चिन्तक धर्मवीर ने अपने लेख ‘हम प्रेमचंद को जानते हैं’( 4 अगस्त, 2013) में सवाल उठाया. धर्मवीर ने लिखा कि “ गोयनका और उनके प्रेमचंद ने यह बात एक बार भी नहीं सोची कि बालक कहानी में पैदा संतान किस राष्ट्र की रक्षा के लिए अपने प्राण न्यौछावर करेगी. क्या राष्ट्रवादी होने में यह जानना जरुरी नहीं कि बच्चा अपने वास्तविक पिता को जाने ? जैविक पिता से भिन्न वैवाहिक पिता की फर्जीगीरी राष्ट्रवाद नहीं है. ऐसे समाज में शूरवीर पैदा नहीं हुआ करते ”

अस्मितापरक आंदोलन की वैचारिकी के भीतर प्रेमचंद की छवि किन रंग-रेखाओं से उकेरी जा रही है उसका एक बेहतर उदाहरण रत्नकुमार सांभरिया का आलेख ‘दलित, प्रेमचंद, तुलसीदास और शहीद भगतसिंह’ हो सकता है. लेख में प्रेमचंद के शब्द-संसार की चुनिन्दा पंक्तियों के आधार पर साबित किया गया है कि वे “ग्राम्य जीवन और लोक परंपराओं से नितांत अनभिज्ञ थे. वे घोर ईश्वरवादी, भाग्यवादी और वर्णवादी थे तथा छुआछूत और जातपांत में उनका अटूट विश्वास था… प्रेमचंद- साहित्य में श्लीलता का प्रायः अभाव है और उनकी भाषा में लियाकत नहीं होने के कारण पाठक के मन को कचोटती है. विशेषतः दलितों के बारे में वे जिस भाषा-शैली का प्रयोग करते हैं, वह हृदय ही चीर डालती है.बावजूद इसके मार्क्सवादी सोच का यह मानना है कि प्रेमचंद ने उस समय दलितों के बारे में लिखा, जब लोग उनकी छाया से भी दूर भागते थे.. क्या यह तर्क इस दायरे में नहीं आता कि कोई किसी अछूत को थप्पड़ मार दे और यह तर्क दे कर उसकी प्रशंसा की जाये देखो, ‘उसने ‘अछूत’ को छुआ तो सही, दूसरे लोग तो उसकी छाया से भी दूर भागते हैं.’

सांभरिया का निष्कर्ष है कि “ प्रेमचंद-साहित्य में न दलित नेतृत्व है, न दलित चरित्र. उनकी रचनाओं के कथानक धर्मशास्त्रों के सूक्तों से ऊपर नहीं उठ पाये हैं. शास्त्र, जो अपने अंतस में पूर्वाग्रह समाये होने के कारण शूद्रों के लिये ‘‘शस्त्रों’’ से भी ज्यादा मारक साबित हुये हैं, प्रेमचंद की कलम ‘‘शास्त्र बनाम शस्त्र’’ के गिर्द घूमती है.”

वाद-विवाद के उपर्युक्त प्रसंगों को नजर में रखें तो संक्षप में कहा जा सकता है कि प्रेमचंद के साहित्य को परखने की सिद्ध कसौटियां प्रश्नांकित की जा रही हैं, अगर साहित्य की समालोचना की किन्हीं कसौटियों के तहत यह बताया गया था कि प्रेमचंद के साहित्य में आधुनिक भाव-बोध के अनुकूल राष्ट्र और व्यक्ति दोनों ही के मुक्ति के प्रसंग हैं तो अब गंगा एकदम ही उल्टी बहती दिख रही है. प्रेमचंद को ‘कलम का सिपाही’ और ‘कलम का मजदूर’ से लेकर ‘सामंत का मुंशी’ बनाने तक की यह कहानी पहली नजर में विचारोत्तेजक जान पड़ सकती है लेकिन वाद-विवाद में समाये आवेग को एक तरफ करके देखें तो स्पष्ट होगा कि प्रेमचंद के साहित्य को लेकर बना पक्ष और प्रतिपक्ष एक ही विचार-सरणी(आधुनिकता की परियोजना) का साझीदार है और इसकी पद्धित( प्रेमचंद के साहित्य से उद्धरणों का सुविधाजनक चयन) भी एक ही है. पक्ष और प्रतिपक्ष के पास व्यक्ति, समुदाय और राष्ट्र की मुक्ति को लेकर एक तयशुदा निष्कर्ष है और प्रेमचंद के साहित्य का पाठ इस तयशुदा निष्कर्ष के अनुकूल पड़ते उद्धरणों के चयन के आधार पर किया गया है. समीक्ष्य पुस्तक ‘हिन्दी की साहित्यिक संस्कृति और भारतीय आधुनिकता’  अपने-अपने मुक्ति-प्रसंग के अनुकूल प्रेमचंद की मूर्ति गढ़ने और तोड़ने की कोशिशों का संज्ञान लेने, इस कोशिश की मूल प्रस्थापनाओं को प्रश्नांकित करने और अपनी तरफ से प्रेमचंद के ज्यादा तथ्यसंगत और इतिहास-बद्ध अध्ययन का प्रस्ताव करने के कारण महत्वपूर्ण है.

समीक्ष्य पुस्तक में प्रेमचंद से आपकी भेंट साहित्यकार, पत्रकार या स्वाधीनता-सेनानी के रुप में नहीं बल्कि एक ‘चिन्तक’ के रुप में होती है. इसकी वजह भी लेखक की नजर में बहुत स्पष्ट है और इसे पुस्तक के प्राक्कथन में यों बताया गया है कि आधुनिकता के साथ पूंजीवाद, उपनिवेशवाद, राष्ट्रवाद, विज्ञान, तर्कबुद्धि और लोकतंत्र का विकास जुड़ा हुआ है और आधुनिकता की कोई बहस मार्क्स को दरकिनार कर आगे नहीं बढ़ायी जा सकती तथा भारतीय आधुनिकता की कोई भी परिकल्पना गांधी के बगैर अधूरी है. चूंकि हिन्दी की साहित्यिक संस्कृति को इन विभूतियों के चिन्तन का लाभ मिलता रहा है सो हिन्दी की साहित्यिक मेधा ने आधुनिकता के पश्चिमी महाआख्यान को आंख मूंदकर नहीं अपनाया, उसने आधुनिकता की कुछ बातें मानी तो कुछ से इनकार किया और प्रेमचंद के लेखन में इस बात के पर्याप्त साक्ष्य मिलते हैं सो “प्रेमचंद सरीखे चिन्तक को आधुनिकता के प्रोजेक्ट के समर्थन में निशेष कर देने के बजाय उन बिन्दुओं पर पर पुनर्विचार करने की आवश्यकता है जहां ये आधुनिकता की सख्त आलोचना करते हैं. वस्तुतः हिन्दी की साहित्यिक संस्कृति(या संस्कृतियां) को समझना प्रकारांतर से इस प्रक्रिया की समग्रता, विशिष्टता और अपनी सभ्यता की आंतरिक गतिकी को भी समझना है.”

पुस्तक के प्राक्क्थन के इस अंश से स्पष्ट हो जाता है कि उसमें चर्चा भारतीय आधुनिकता की ही प्रधान है और प्रेमचंद की चर्चा ‘हिन्दी की साहित्यिक संस्कृति’ के पुनर्पाठ के मकसद की गई है. इस पुनर्पाठ के क्रम में ही पुस्तक में प्रेमचंद का एक चिन्तक के रुप में विशिष्ट योगदान रेखांकित किया गया है और हिन्दी की साहित्यिक संस्कृति की वर्चस्वशील धाराओं को प्रश्नांकित किया गया है. सवाल उठता है कि साहित्यिक संस्कृति से क्या समझें और इसके पुनर्पाठ की प्रविधि क्या हो. समीक्ष्य पुस्तक में फ्रेडरिक जेम्सन के हवाले से लिखा मिलता है कि “साहित्यिक संस्कृतियां ऐसे कोड के रुप में सामने आती हैं जिनके बारे में हम प्रायः भूल चुके होते हैं. वे एक ऐसी बीमारी के लक्षण की तरह हैं जिसे हम बीमारी के रुप में पहचानते ही नहीं., वे समग्रता के एक टुकड़े की तरह हैं जिसे देख सकने वाला अंग हम पहले ही खो चुके हैं. ये साहित्यिक रचनाएँ, सामाजिक यथार्थ को निर्मित करने वाली दूसरी वस्तुओं की तरह पुकार रही हैं कि हम उनकी टीका व्याख्या करें, उनका अर्थ करें, उनकी पहचान करें साहित्यिक आलोचना का यह दायित्व है कि वह अंतर्बाह्य अस्तित्व और इतिहास की तुलना जारी रखे. ”

लिहाजा समीक्ष्य पुस्तक के लेखक ने अपने लिए कठिन दायित्व चुना है क्योंकि साहित्यिक संस्कृति अगर समग्रता का वह टुकड़ा हो जिसे देख सकने वाला अंग पहले ही खो चुका है या फिर वह ऐसी बीमारी का लक्षण हो जिसकी बीमारी के रुप में पहचान ही ना हो तो फिर सवाल उठेगा कि सामाजिक यथार्थ का निर्माण करने वाली इस जरुरी चीज को जानने के लिए साहित्यिक आलोचना कौन-से औजार अपनाये ? लेखक ने ध्यान दिलाया है कि “औपनिवेशिक वर्चस्व के दौरान उपनिवेशित सभ्यता ऐसी विस्मृति का शिकार होती है कि अपनी सभ्यता के कोडो की उपनिवेशवाद द्वारा की गई व्याख्या को ही थोड़े बहुत हेर-फेर के साथ स्वीकार कर लेती है.” इस स्वीकार के लक्षण समीक्ष्य पुस्तक के लेखक को प्रेमचंद के मूल्यांकन को लेकर बनी कसौटियों और उन कसौटियों को प्रश्नांकित करने वाले हाल के अस्मितापरक प्रयासों में दिखते हैं.

पुस्तक के लेखक के मुताबिक अकारण नहीं है कि प्रेमचंद का अध्ययन प्रायः आधुनिकता द्वारा स्वीकृत और राजनीतिक दृष्टि से सही मुद्दों के आधार पर किया गया है. इसी कड़ी में प्रेमचंद को काल-क्रमानुसार देखने और किसी एक कालखंड की रचनाओं को समझ के करीब पड़ने के कारण विशेष तरजीह दी गई. जैसे प्रेमचंद के अंतिम दौर की रचनाओं को मार्क्सवादी विद्वानों ने ज्यादा महत्व दिया क्योंकि उनके अनुसार प्रेमचंद इस दौर में लगभग मार्क्सवादी हो गये थे. इस तरह के अध्ययन की “विडंबना यह है कि वह यह मानकर चलता है कि सच क्या यह उसे पहले से मालूम है. इस सच के समर्थन में एक गवाह के रुप में पेश करने के लिए वह प्रेमचंद को ठोक पीटकर अपने सच के अनुरुप ढालने की कोशिश करता है. यानी प्रेमचंद स्वयं में महत्वपूर्ण नहीं हैं. महत्वपूर्ण है वह सच जो उसे पहले से मालूम है. यह प्रेमचंद का रिडक्शन है. पहले से ज्ञात सच में प्रेमचंद के रचनात्मक अवदान को हजम कर लेने की कोशिश है.”

सवाल उठता है, प्रेमचंद के मार्क्सवादी अध्येताओं को कौन सा सच पहले से पता है जिसमें प्रेमचंद को रिड्यूस किया जा रहा है ? यहां बात आती है प्रेमचंद की भारत-विषयक परिकल्पना की. समीक्ष्य पुस्तक के मुताबिक प्रेमचंद एक ऐसे भारत की कल्पना करते हैं जो पश्चिम से तात्विक और बुनियादी रुप से भिन्न है. वामपंथी ऐसी भिन्नता की कल्पना नहीं कर सकते थे क्योंकि “वामपंथ के सार्वभौमिक महाआख्यान में भिन्नता के लिए खास जगह नहीं थी. भिन्नता का मतलब उनके लिए विशिष्टता नहीं, कमी थी,  जो उन्हें भारत के इतिहास में दिखायी पड़ती थी. पश्चिम के तर्ज पर भारत के इतिहास में पुनर्जागरण, ज्ञानोदय, राष्ट्रवाद, औद्योगिक क्रांति, व्यक्तिवाद वगैरह की आपेक्षिक अनुपस्थिति देख उनके ‘करुणाकलित हृदय’ में आह सी उठती थी और फिर वे इस शोध में जुट जाते थे कि क्या कारण(अर्थात् कमी थी) थे जिनकी वजह से हमारे यहां…..। कुल मिलाकर भारत के अतीत-इतिहास में गर्व करने लायक उन्हें कुछ खास नजर नहीं आता था. मार्क्स की तरह उन्हें भी लगता था कि शैतान को भी उसका जायज हक मिलना ही चाहिए. सदियों से चली आ रही अर्थव्यवस्था को नष्ट कर उपनिवेशवाद ने भारतीय इतिहास को पटरी पर ला दिया. भारत को इतिहास के राजपथ पर घसीट लाने का सेहरा उपनिवेशवाद के माथे बांध देने के बाद उपनिवेशवाद का एक प्रगतिशील पक्ष तो निकल आया लेकिन इसी के साथ भारत की इतिहास की विशिष्टता का महत्व समझने वाली दृष्टि भी गायब हो गयी. लब्बोलुआब यह कि उपनिवेशवाद आया तो भारत की जड़ता टूटी और पूंजीवाद का विकास शुरु हुआ. पूंजीवाद आ गया तो देर-सबेर समाजवाद आना ही है. यह सोचने की जहमत नहीं उठायी गई कि सभ्यताओं के विकासक्रम और जीवन-मूल्य एक जैसे नहीं होते.”

अस्मितावादी आंदोलन की वैचारिकी के भीतर प्रेमचंद के मूल्यांकन के प्रयासों को लेकर भी समीक्ष्य पुस्तक यही कमी देखती है. पुस्तक अस्मितावादी वैचारिकी की इस विडंबना की ओर ध्यान दिलाती है कि जमींदारी व्यवस्था खत्म कर किसानों में जमीन बांटने और बिना किसी भेदभाव के सभी को समान नागरिकता देने का काम उपनिवेशवाद ने नहीं राष्ट्रवाद ने किया. लेकिन दलित चिन्तकों को औपनिवेशिक शासन के सिवा बाकी सभी वर्णवादी लगते हैं– “ एकतरफा प्रेम में बौराये इन बेचारों को यह भी नहीं पता कि औपनिवेशिक शासक इनके बारे में क्या सोचते हैं. उल्लेखनीय है कि औपनिवेशिक शासक सफेद नस्ल को सर्वश्रेष्ठ मानते थे. सभी भारतीय उनकी दृष्टि में हीन प्रजाति के थे. इन हीनों में सवर्ण बेहतर थे क्योंकि वे पतित आर्य थे, दलित तो पतित आर्य भी नहीं थे. वे निकृष्टतम प्रजाति के थे. हिन्दी में इन दिनों प्रगतिशीलता का एक नया ढब निकला है. इस ढब के मुताबिक उपनिवेशवाद भारत के लिए और विशेष रुप से दलितों के लिए वरदान था. दलितों का उद्धार करने के लिए ही अंग्रेजों ने भारत को उपनिवेश बनाया था. बुरा हो राष्ट्रवादियों का जिन्होंने उन्हें ज्यादा दिन टिकने नहीं दिया. वे देर से आये और जल्दी चले गये !..”

प्रेमचंद के मूल्यांकन की कसौटियों में पेवस्त औपनिवेशिक ज्ञानकांड के रग-रेशे दिखाते हुए उसके बरक्स पुस्तक में भरपूर साक्ष्यों के साथ प्रेमचंद की पश्चिम के प्रति अवधारणा का रेखांकन किया गया है. इसी क्रम में पश्चिमी राष्ट्रवाद के बारे में प्रेमचंद की सोच और भारतीय राष्ट्रवाद से उसकी भिन्नता के बारे में विचार किया गया है फिर भारतीय राष्ट्रवाद की इकाइयों— शहर, नागरिक-समाज, गांव(पारंपरिक सामुदायिकता) और गांव में भी दलित और स्त्री के बारे में प्रेमचंद के विचारों की चर्चा है. इस चर्चा से बड़े हद तक पुस्तक की मूल स्थापना सिद्ध हो जाती है कि “प्रेमचंद सरीखे चिन्तक को आधुनिकता के प्रोजेक्ट में समर्थन में निःशेष कर देने के बजाय उन बिन्दुओं पर पर पुनर्विचार करने की आवश्यकता है जहां ये आधुनिकता की सख्त आलोचना करते हैं. वस्तुतः हिन्दी की साहित्यिक संस्कृति(या संस्कृतियां) को समझना प्रकारांतर से इस प्रक्रिया की समग्रता, विशिष्टता और अपनी सभ्यता की आंतरिक गतिकी को भी समझना है.”

इतिहास को विवेचना का विषय बनाने वाली कुछ पुस्तकें करुणा के भाव से लिखी होती हैं, कुछ सात्विक क्रोध से. न्याय की भावना दोनों ही पुस्तकों की प्रेरक होती है लेकिन इस भाव का निर्वाह दोनों में अलग-अलग होता है. करुणा के भाव से लिखी पुस्तकों में प्रिय के खो जाने का मलाल नहीं होता, बल्कि स्वीकृति होती है. ऐसी पुस्तकों में जोर अपने खोये या अधूरे पाये हुए को भरपूर ब्यौरे के साथ बताने पर होता है. कोई चीज खो गयी या अधूरी हासिल है तो इसकी वजहें क्या रहीं— ऐसी खोज करुणा भाव से लिखी किताबों में प्रधान नहीं होती. इतिहासकार सुधीरचंद्र की पुस्तक ‘गांधी-एक असम्भव सम्भावना’ करुणा के भाव से लिखी पुस्तक का एक अच्छा उदाहरण हो सकती है. सात्विक क्रोध से लिखी पुस्तकों में किसी चीज के खोने या अधूरा हासिल होने का मलाल बहुत मुखर होता है और उसके कारणों की खोज बड़ी प्रखर. जोर अपने खोये या हासिल को महीन ब्यौरे में बताने पर कम हो जाता है और कारणों की खोज पर ज्यादा. किसी प्रिय चीज के खो जाने या उसके अधूरे रुप में हासिल होने की जाहिर वजह के साथ सात्विक क्रोध से लिखी पुस्तकें बहुत ज्यादा जिरह करती हैं. सो, खोज ली गई वजहों के साथ लेखक की हमदर्दी नहीं बन पाती और इसका एक घाटा होता है— जिन बातों को किसी चीज के खो जाने या अधूरा हासिल होने की वजह के रुप देखा जा रहा है उनके दोष बड़े प्रखर होकर उभरते हैं, अगर कोई गुण है तो वह दब जाता है. समीक्ष्य पुस्तक भी सात्विक क्रोध से लिखी गई है और उसमें दोष-विवेचन जितना प्रखर है, गुणों की चर्चा या कह लें एक लें उनके साथ मुठभेड़ की कोशिश कम है.

मिसाल के लिए, समीक्ष्य पुस्तक के लेखक के इस विचार से इनकार नहीं किया जा सकता कि मार्क्स ने भारत के पुराने समाज को इतिहास-धारा से वंचित माना है और अंग्रेजी शासन को वह शक्ति जिसने अपनी तमाम बर्बरता के बावजूद भारत को इतिहास(या कह लें आधुनिकता) के प्रगति-पथ पर लगा दिया और भारतीय स्वाधीनता संग्राम या फिर आधुनिक भारत के इतिहास-लेखन का उपक्रम एक हदतक इस विचार का साझीदार होने के कारण औपनिवेशिक ज्ञान-कांड(लेखक के शब्दों में पश्चिम की आधुनिकता) से मुक्त नहीं है. लेकिन विचार के इस बिन्दु तक पहुंचने के बाद यह सोचा जा सकता है कि क्या किन्हीं कमियों के बावजूद प्रेमचंद के लेखन को समझने में मार्क्सवादी मीमांसा किसी हद तक सहायक हो सकती है ?

यह अलग से कोई प्रश्न नहीं बल्कि पुस्तक के प्रधान कथ्य के तार्किक विस्तार से जुड़ा सवाल है. उदाहरण के लिए, समीक्ष्य पुस्तक में प्रेमचंद को गांधी से प्रभावित माना गया है और गांधी के चिन्तन में 19 वीं सदी के चिन्तक भूदेव मुखोपाध्याय के विचार की अनुगूंज सुनी गई है. पुस्तक ध्यान दिलाती है कि ‘गांधी जैसी दृढ़ता के साथ आधुनिकता की ज्ञानमीमांसात्मक परम्परा को चुनौती देने वाला कोई नहीं दिखता’ लेकिन बंगाल में अरविन्दो और विवेकानंद के पहले से पश्चिम अर्थात आधुनिकता की मूलभूत आलोचना शुरु हो गई थी. साक्ष्य के रुप में समीक्ष्य पुस्तक में भूदेव मुखोपाध्याय के ग्रन्थ सामाजिक प्रबन्ध का एक लंबा हिस्सा उद्धृत किया गया है जिसमें आता है कि “सभ्यताओं के उद्देश्य और उनकी प्राथमिकताएं एक जैसी नहीं होतीं, इसलिए उनकी तुलना नहीं की जा सकती. तुलना सभी की स्वीकार्य सार्वभौम निकष पर ही संभव है और यह निकष मनुष्य की प्रेम करने की क्षमता का क्रमिक विस्तार हो सकता है. पहले व्यक्ति और फिर व्यक्ति से आगे बढ़ते हुए इस दायरे में परिवार, समुदाय, राष्ट्र और अन्ततः समूचा ब्रह्मांड आना चाहिए. लेकिन पश्चिमी संस्कृति में यह राष्ट्र पर आकर रुक जाती है. हिन्दू धर्म के सार्वभौम प्रेम की तुलना में यह मनुष्यता के लिए हीनतर लक्ष्य है.”

चूंकि पुस्तक में प्रेमचंद के राष्ट्र विषयक चिन्तन को गांधी और उनसे भी पहले भूदेव मुखोपाध्याय द्वारा की गई सभ्यता समीक्षा से जोड़कर देखा गया है सो यहां ठहरकर सोचा जा सकता है कि क्या मार्क्सवादी समीक्षा की कोई युक्ति प्रेमचंद के लेखन में आये राष्ट्रवाद और भारतीय संस्कृति की धारणा की समझ को ज्यादा पैना बनाने में सहायक हो सकती है ? तनिक थमकर सोचें तो लगेगा कि इस प्रश्न का उत्तर ‘हां’ में भी हो सकता है. जैसे मार्क्सवादी तर्ज की समीक्षा यह बता सकती है कि ‘खेतिहर समुदाय त्यागी-संन्यासी जान पड़ने वाले नेताओं की तरफ विशेष आकर्षित होता है. इसका खास रिश्ता सिर्फ हिन्दू धर्म से ही नहीं है. गांधी में जो त्याग-भाव है, वह उनके निजी दर्शन की देन है और इस दर्शन में निश्चित ही हिन्दू धर्म का भी योग है तथा कुछ ऐसा ही हो ची मिन्ह, मुजफ्फर अहमद या पी सुन्दरैया में दिखायी देता है लेकिन त्याग-भाव से किसी नेता के भीतर जो साख पैदा होती है सिर्फ वही भर किसान को लामबंद करने के लिए काफी नहीं होती. यह अनिवार्य तो है लेकिन पर्याप्त नहीं और इसके पर्याप्त होने के लिए जमीनी हालात(मैटेरियल कंडीशन) अनुकूल होने चाहिए. एक खास सहायक कारण जिसकी वजह से किसान उठ खड़े हुए और उनके संघर्ष ने उपनिवेश-विरोधी संघर्ष का रुप लिया, ग्रेट डिप्रेशन कहलाने वाली महामंदी है. महामंदी का एक महत्वपूर्ण घटक खेतिहर संकट भी है. किसानों की लामबंदी को संभव बनाने के लिए कांग्रेस ने अवाम के आगे भारत के भविष्य के बारे में एक ब्लूप्रिन्ट रखा. यह काम कांग्रेस के कराची अधिवेशन(1931) में हुआ. इसमें सार्वभौम मताधिकार, हर भारतीय नागरिक को एक सुनिश्चित जीवन-स्तर फराहम करने, अनिवार्य और निशुल्क शिक्षा, जाति-धर्म और लिंग की अपेक्षाओं से परे कानून के समक्ष बराबरी का दर्जा देने और धर्म से राजसत्ता के अलगाव की बात कही गई.’ ( यह अंश पेरी एंडरसन की पुस्तक द इंडियन आयडियालॉजी की ईपीडब्ल्यू में प्रकाशित प्रभात पटनायक कृत समीक्षा में आता है).

प्रेमचंद कांग्रेस के सक्रिय कार्यकर्ता नहीं थे लेकिन कांग्रेस के साथ उनकी सहानुभूति हमेशा रही. वे गांधी-भाव से सदा सन्नद्ध रहे लेकिन आलोचना तो उन्होंने अपने इस महात्मा की भी की है. और, जैसा कि इतिहासकार सुधीरचंद्र ने प्रेमचंद विषयक अपने एक पुराने लेख( प्रेमचंद: ए हिस्ट्रोरियोग्राफिक व्यू, ईपीडब्ल्यू, 11 अप्रैल 1981) में कहा है, वे उन बाध्यताओं को देख सकते थे जिसके भीतर कांग्रेस को उसके नेताओं के वर्गीय हितों की वजहों से काम करना पड़ता था तो भी उन्होंने “कांग्रेस की अपनी आलोचना को ऐसा साज-संवार दिया कि वह कांग्रेस के कार्यक्रमों की संगति में जान पड़े.” अगर इतिहासकार सुधीरचंद्र की बात ठीक है तो फिर प्रभात पटनायक का उपर्युक्त उद्धरण प्रेमाश्रम(1922) में आये किसान-सभा के जिक्र से लेकर कर्मभूमि(1932) के सत्याग्रह तक की व्याख्या में सहायक साबित हो सकता है.

यही बात समीक्ष्य पुस्तक में अस्मितावादी आदोलन की वैचारिकी के दायरे में हुए प्रेमचंद के मूल्यांकन को लेकर उठाये गये प्रश्नों के बारे में भी सोची जा सकती है. अंग्रेजी-राज भारतीयों के लिए स्मृति-नाश और जीवन-नाश दोनों का कारण साबित हुआ और इस दोहरे नाश की शिकार भारत-भूमि का हर समाज हुआ और दलित कहीं और ज्यादा शिकार हुए—समीक्ष्य पुस्तक के लेखक के इस मंतव्य से इनकार नहीं किया जा सकता. अंग्रेजी राज में पौने दो सौ बरसों में जितने अकाल पड़े और भारत-भूमि के आम जन काल-कवलित हुए वैसा मुगलों या उसके पहले के भारत में ना हुआ था. कुछ पुस्तकों (जैसे माइक डेविस की पुस्तक ‘ लेट विक्टोरियन होलोकॉस्ट्सः एल निनो फेमाइन्स ऐंड मेकिंग ऑफ दि थर्ड वर्ल्ड) में दर्ज तथ्य बताते हैं कि 1770 से 1890 के बीच के एक सौ बीस साल के वक्फे में भारत में इकत्तीस बड़े अकाल पड़े थे और उसके पहले के पूरे दो हजार सालों में सत्रह. इन बड़े अकालों का संबंध जितना जलवायु-गत परिस्थितियों से है उससे बहुत-बहुत ज्यादा अंग्रेजी साम्राज्यवाद से. अकेले 1769-1770 में ही, कंपनी की लूट और मौसम के प्रकोप ने मिलकर , बंगाल की एक तिहाई आबादी को भुखमरी और मौत के मुँह में धकेल दिया था. यह सिलसिला दूसरे महायुद्ध के दौरान “प्रगतिशील” अंग्रेजी राज द्वारा पैदा किए गए, ‘बंगाल के अकाल’ तक जारी रहा. खुद अंग्रेजी राज की रिपोर्टों में लिखा मिलता है कि इन अकाल में काल-कवलित होने वालों में 80 प्रतिशत आबादी वंचित वर्ग के लोगों की थी. जाहिर है, आज की राजनीतिक शब्दावली में ‘दलित’ कहलाने वाली जातियों के लिए अपनी नस्ली श्रेष्ठता के पैमाने पर उन्हें ‘हीन से भी हीनतर’ करार देने वाला औपनिवेशिक ज्ञान-कांड मृत्यु के सामूहिक आयोजन से कमतर ना था. लिहाजा, अगर कोई कहे कि ‘अंग्रेज देर से आये और जल्दी चले गये’ तो उसके इस अफसोस पर रोष या अचरज जायज है.

लेकिन बात यहीं तक रुक नहीं जाती. अगर ‘अंग्रेजों के देर से आने और जल्दी जाने’ का अफसोस कंपनी-राज की लूट की पहचान के बाद भी मौजूद और मुखर है, उसे स्वीकृति हासिल है तो फिर इसके कारणों की खोज जरुरी है— खासकर यह खोजना कि इस अफसोस का स्रोत नैतिकता की किस वैचारिकी में है और क्या वह वैचारिकी ‘भारतीय आधुनिकता’ की प्रचलित समझ को किन्ही कोण से ज्यादा समग्र बनाने में मददगार हो सकती है ? यहां उदाहरण के तौर पर लाहौर(जात पांत तोड़क मंडल) वाले मशहूर भाषण पर महात्मा गांधी और आंबेडकर के बीच चली बहस की चर्चा की जा सकती है.

महात्मा गांधी ने जाति की संस्था के विरुद्ध आंबेडकर के भाषण की मूल बातों के प्रतिवाद में जो कुछ लिखा उसका सार संक्षेप कुछ यों हो सकता है कि ‘ 1.हिन्दू धर्म विकसनशील है, उसका कोई एक और स्थायी ग्रंथ नहीं. 2.जो तर्क की कसौटी पर खरी ना उतरे और जिसे आध्यात्मिक प्रयोग में ना लाया जा सके उसे ईश्वर की वाणी नहीं माना जा सकता. 3. धर्मग्रंथ का अनिवार्य व्याख्याता कोई विद्वान नहीं हो सकता. धर्म विद्वानों से नहीं साधु-संतों और उनके जीवन एवं कथन पर चलता है. 4.हिन्दू धर्म का सार है कि सत्य ही ईश्वर और अहिंसा मानव-परिवारों का कानून है. 5.धर्म को उसके सबसे बुरे उदाहरणों से नहीं बल्कि सबसे अच्छे उदाहरणों से परखा जाना चाहिए.’ इन बातों के पल्लवन के बाद महात्मा का आंबेडकर से सवाल था कि “क्या चैतन्य, ज्ञानदेव, तुकाराम, तिरुवल्लूर, रामकृष्ण परमहंस, राजा राममोहन राय, महर्षि देवेन्द्रनाथ टैगोर, विवेकानंद और अन्य विद्वानों द्वारा सिखाया धर्म पूरी तरह से गलत है, जैसा कि डा. आंबेडकर ने अपने भाषण में दिखाया है ?

आंबेडकर के भाषण के प्रतिवाद के रुप में दर्ज महात्मा गांधी के ये उपर्युक्त वाक्य महत्वपूर्ण है क्योंकि यही वह ब्लूप्रिन्ट है जिसके दायरे में हिन्दू धर्म-परंपराओं के किसी पक्ष(जैसे कि निर्गुण भक्ति और उससे जुड़ी वैष्णवी परंपरा) को आधुनिक भाव-बोध के अनुकूल बताकर कहा जाता है कि अंग्रेज ना आते तो भी अपनी इतिहास-धारा के अनुकूल भारतीय मनीषा व्यक्ति के सत्य और मुक्ति के इहलौकिक विचार तक पहुंच ही जाती. दरअसल आंबेडकर इस सोच का प्रतिवाद करते हुए उसमें कुछ जोड़ते हैं. गांधी के प्रतिवाद के जवाब में आंबेडकर लिखते हैं महात्मा ने प्रश्न उठाया है कि “चैतन्य, ज्ञानदेव, तुकाराम, तुरुवल्ललुर, रामकृष्ण परमहंस द्वारा ज्ञापित धर्म गुणरहित नहीं हो सकता जैसा कि मैंने बताया है और ये कि किसी भी धर्म को सबसे खराब नमूने से नहीं बल्कि सबसे अच्छे परिणाम से परखना होगा. मैं इस वक्तव्य के प्रत्येक शब्द से सहमत हूं लेकिन मैं इस वक्तव्य से बिल्कुल नहीं समझ पाया कि महात्मा इससे क्या सिद्ध करना चाहते हैं. यह सत्य है कि धर्म को सबसे खराब नमूने से नहीं बल्कि सबसे अच्छे से परखना चाहिए. लेकिन क्या मामला यहीं समाप्त हो जाता है? मै कहता हूं नहीं. प्रश्न अब भी उठता है कि सबसे खराब इतने अधिक क्यों हैं और सबसे अच्छे इतने थोड़े से क्यों.”

आगे महात्मा गांधी के प्रतिवाद के बुनियादी दोष पर अंगुली रखते हुए आंबेडकर लिखते (और इस लिखे से उत्तर मिल जाता हैं कि धर्म के सबसे अच्छे उदाहरण इतने कम क्यों) हैं, “महात्मा ने तर्क दिया है कि संतों के उदाहरण को अपनायें तो हिन्दू धर्म सहनीय हो जाएगा, महात्मा का ये तर्क भी अन्य कारण से गलत सिद्ध होता है. चैतन्य जैसे सुविख्यात संत का नाम लेकर मोटे और सबसे सरल तरीके से महात्मा सुझाव देना चाहते हैं कि ढांचे में मूलभूत परिवर्तन किए बिना हिन्दू समाज सहनीय और खुशहाल हो सकता है. …जो इस बात पर निर्भर हैं कि वह बड़ी जाति के हिन्दू को एक अच्छा इंसान बनायेंगे तथा व्यक्तिगत चरित्र सुधारेंगे, वे मेरे विचार से अपनी शक्ति बरबाद कर रहे हैं और एक भ्रम पाले हुए हैं. क्या व्यक्तिगत चरित्र शस्त्र बनाने वाले को एक अच्छा आदमी बना सकता है, अर्थात जो आदमी गोला बेचता है, वह ऐसा गोला बनाये जो न फटे और गैस जहर ना फैलाएं ? …सच बात तो यह है कि हिन्दू अपनी जाति के बाहर वाले व्यक्ति को पराया मानता है.. कहने का मतलब है कि बेहतर या बदतर हिन्दू मिल सकता है लेकिन एक अच्छा हिन्दू नहीं मिल सकता. ऐसा इसलिए नहीं कि उसके व्यक्तिगत चरित्र में कोई कमी है. असल में, अपने साथियों के साथ उसके संबंध का आधार ही गलत है.”

अगर एक पंक्ति में कहें तो आंबेडकर के उपर्युक्त कथन में यह ध्वनि सुनी जा सकती है कि व्यक्तिगत आचरण की सच्चाई और अहिंसा की कुछ उज्ज्वल परंपराओं के कारण भारत-भूमि में प्राक्क्-आधुनिक(प्रोटो-मॉडर्न) संवेदना तो थी लेकिन इस संवेदना को सबके लिए साकार करने वाला ढांचा नहीं था, यह ढांचा तो अंग्रेजों या कह लें पश्चिमी आधुनिकता की यांत्रिकी के एक रुप यानी ‘विधि आधारित सेक्युलर शासन व्यवस्था’ ही ले आयी. सुदीप्तो कविराज जब कहते हैं कि ‘पॉलिटिक्स’ शब्द का ठीक-ठीक समानार्थी शब्द भारतीय भाषाओं में नहीं है तो दरअसल उनके कहे में आंबेडकर द्वारा उठाये गये प्रश्न की ही एक अलग स्तर पर ध्वनि सुनायी देती है. राजनीति, खासकर लोकतांत्रिक राजनीति(चाहे वह जितनी अधूरी हो) प्राक्क-आधुनिक संवेदना वाले पुराने भारत के लिए एकदम ही नया अनुभव थी. सो, समीक्ष्य पुस्तक में आगे यह सोचने के लिए सवाल बनता है कि क्या ‘अंग्रेज देर से आये, जल्दी चले गये’ में जो अफसोस निहित है, वह कहीं परंपरित भारतीय आधुनिकता की प्रकट कमी (विधि आधारित राज-व्यवस्था) का संकेतक तो नहीं, कहीं इस अफसोस में इस बात की स्वीकृति तो नहीं कि आधुनिकता के पश्चिम प्रोजेक्ट में भारत ने अपनी तरफ से कुछ जोड़ा और घटाया तो पश्चिमी प्रोजेक्ट भी भारतीय आधुनिकता की संवेदना को सबके लिए साकार करने में मददगार हुआ. ऐसा सोचने का एक प्रस्थान बिन्दु आनंद कुमारस्वामी की पुस्तक ‘ऐसेज इन नेशनल आयडिलिज्म’ में आया ‘माता भारत’ लेख हो सकता है. नयी-पुरानी आधुनिकता के आंगन में राष्ट्रवाद की भावमूर्ति तैयार होने की कहानी इस लेख में जिस महीनी और मार्मिकता से कही गई है- वह विरल है.

समीक्ष्य पुस्तक निबंधों( कुल तेरह) का संकलन है और सारे लेख प्रेमचंद-विशेषी नहीं लेकिन पुस्तक का एक महत्वपूर्ण हिस्सा(कुल चार लंबे लेख) प्रेमचंद के मूल्यांकन की समस्या से जूझते हैं. चूंकि पुस्तक में भारतीय आधुनिकता को जमीन बनाकर ‘हिन्दी की साहित्यिक संस्कृति’ को समझने-बताने की कामयाब कोशिश की गई है सो पुस्तक की वैचारिकी का दायरा बड़ा हो जाता है. प्रेमचंद, हिन्द-स्वराज, सिविलाइजिंग मिशन, अंग्रेजी की जगह, हिन्दी की शक्ति, हिन्दी का जातीय संगीत, हिन्दी साहित्य का इतिहास और साहित्य, इतिहास तथा स्वाधीनता जैसे विषयों को एक सूत्र में पिरोने की भरपूर गुंजाइश बन जाती है पुस्तक में. और, ठीक इसी गुंजाइश को देखते हुए उम्मीद की जा सकती है समीक्ष्य पुस्तक की संभावनाओं का विस्तार लेखक किसी अन्य पुस्तक में बड़े फलक पर करेंगे.

***

पुस्तक का नाम—हिन्दी की साहित्यिक संस्कृति और प्रेमचंद

लेखक- डा. राजकुमार

पृष्ठ संख्या- 171, मूल्य सजिल्द—400

प्रकाशन—राजकमल प्रकाशन प्रा. लि., नई दिल्ली.

चंदन श्रीवास्तव

चंदन श्रीवास्तव

मूलतया छपरा (बिहार) के निवासी, पिछले पंद्रह सालों से दिल्ली में। आईआईएमसी और जेएनयू में पढ़ाई। “उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध में हिन्दी लोकवृत्त का निर्माण” शीर्षक से पीएचडी, दिल्ली के कॉलेजों में छिटपुट अध्यापन, फिर टीवी चैनल की नौकरी और अब विकासशील समाज अध्ययन पीठ (सीएसडीएस) की एक परियोजना इंक्लूसिव मीडिया फॉर चेंज से जुड़े हैं। इनसे  chandan@csds.in पर संपर्क संभव है। 

 

 

साभार: प्रतिमान

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