निकानोर पार्रा उर्फ़ ‘जनता के धैर्य की ऐसी की तैसी’: रॉबर्तो बोलान्यो

रॉबर्तो बोलान्यो, मार्खेज के बाद का सबसे बड़ा अफसानानिगार, और आज की तारीख में उतना ही लोकप्रिय है. कवि के सच्चे अर्थों में वह निकानोर पार्रा को स्पेनिश/लातिनी अमरीकी संसार का एक मात्र महान कवि मानता था. यह अद्भुत संयोग है कि दोनों नोबेल पुरस्कार को डिजर्व करते थे और दोनों को नहीं मिला. पार्रा जीते-जी (क्योंकि शायद ही कोई कवि इतना जी पाया) लीजेंड की छवि को प्राप्त कर लिए थे और इसके लिए उन्हें काफी संघर्ष करना पड़ा, अगर वह सामान्य उम्र पाते तब उसकी लीजेंड छवि बोलान्यो की तरह ही मरने के बाद उभरती. जब बोलान्यो मरा तब पार्रा ने लिखा, “रॉबर्तो हमें पछाड़ गया/ चिली के लिए अभूतपूर्व क्षति/ मेरे स्वयं के लिए अभूतपूर्व क्षति/ हर किसी के लिए अभूतपूर्व क्षति/ शेष मौन हैं/ एक महान ह्रदय विस्फ़ोट कर गया/ मेरे प्यारे राजकुमार, शुभरात्री/ परियों के गान  का समवेत स्वर तुझे लेने बाहर आ गया है.

2003 के पहले से ही रॉबर्तो बोलान्यो निकानोर पार्रा को अपना गुरु मानते हुए उन्हें याद किया करता था, उनके बारे में बोलता था, लिखता था. यहाँ प्रस्तुत बोलान्यो के इस लेख को निकानोर पार्रा के लिए श्रद्धांजली स्वरुप पेश बहुतेरे लेखों में सबसे महत्वपूर्ण मान सकते हैं. इसके हिन्दी अनुवाद के लिए संतोष झा और उदय शंकर के हम आभारी हैं. #तिरछीस्पेल्लिंग

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रॉबर्तो बोलान्यो और निकानोर पार्रा 

निकानोर पार्रा के साथ आठ सेकंड

By रॉबर्तो बोलान्यो

निकानोर पार्रा की कविता के बारे में, इस नई शताब्दी में, मैं निश्चित तौर पर कह सकता हूँ कि यह टिकाऊ होगी। ज़ाहिर है कि यह कहने का कोई ख़ास अर्थ नहीं है; और इस बात से सबसे ज्यादा वाकिफ खुद पार्रा ही हैं। हालांकि, पार्रा की कविताओं का यह टिकाउपन होर्खे लुईस बोर्खेस, फ़ेसर वायेहो, लुईस सरनोदा और कुछ अन्य लोगों की कविताओं के साथ बरकरार रहेगा। लेकिन, हमें यह कहना पड़ेगा कि इससे बहुत ज़्यादा फ़र्क़ नहीं पड़ता है।

पार्रा के दांव, भविष्य की ओर फेंके गए उसके अन्वेषण को यहां समझना काफी जटिल काम है। यह उतना ही ओझलपूर्ण भी है। यह ओझलता गति की ओझलता है। हालांकि बोलता हुआ, अपनी भंगिमाओं को साधता हुआ वह अभिनेता रंगपटल पर पूरी तरह से दृश्यमान है। उसकी खूबी, उसके परिधान, उसके साथ आने वाले प्रतीक, जैसे फोड़े में प्रवाहित विद्युत्-तरंग: वह एक कवि है, जो कुर्सी पर बैठे-बैठे सो जाता है, एक कमांडर, जो क़ब्रिस्तान में खो जाता है, सम्मेलन का एक वक्ता, जो अपने बालों को हाथ से झटकते-झटकते उन्हें खींचने लग जाता है, अपने घुटनों पर टिका एक बहादुर आदमी, जो मूतने की हिम्मत करता है, एक तपस्वी, जो समय को बरसों-बरस गुज़रते देखता है, एक अभिभूत सांख्यिकीविद्; ये सारी छवियाँ दृश्यमान हैं। पार्रा को पढ़ने से पहले इस सवाल पर सोचना ज्यादती नहीं होगी, वही सवाल जो विटिंग्सटाइन हमसे और स्वयं से भी पूछता हैः क्या यह हाथ, एक हाथ है या यह हाथ नहीं है? (किसी के हाथ को देखते हुए यह सवाल पूछना चाहिए।)

मैं खुद से पूछता हूं कि पार्रा की वह किताब कौन लिखेगा, जिसके बारे में उसने सोचा और कभी नहीं लिखाः यातनाशिविर-दर-यातनाशिविर, जंग-दर-जंग के विस्तृत आख्यान अथवा रुदाली से भरा द्वितीय विश्व युद्ध का इतिहास; एक कविता जो नेरुदा के कैंटो जनरल के ठीक विपरीत हो। नेरुदा के कैंटो जनरल के ठीक विपरीत वाली कविता की किताब से केवल एक हिस्सा ही पार्रा अपने नाम सुरक्षित कर सके और वह है, मॅनीफेस्टो। इसी मॅनीफेस्टो में वह अपने काव्यात्मक सौंदर्यबोध को प्रस्तुत करता है, हालांकि पार्रा को जब भी जरुरत महसूस हुयी उसने उस सौंदर्यबोध को ख़ुद ही अनदेखा किया। क्योंकि सौंदर्यबोध सच्चे लेखकों के गुहांधकार पर हल्की रौशनी डालता है और एक अस्पष्ट विचार बनाने में मदद करता है; और  अक्सरहां यह संभव भी नहीं हो पाता क्योंकि जोखिम और संकट की ठोस जमीन उभर आने के समय यह लगभग बेकार का अभ्यास बन जाता है।

युवाओं को पार्रा के अनुयायी बनने दीजिए। केवल युवा ही बहादुर होते हैं, उन्हीं की आत्माओं में पवित्रता है। इसके बावजूद, पार्रा जवानी के जोश या होश खोने की कविता नहीं लिखता है, वह पवित्रता के बारे में नहीं लिखता है। वह तो पीड़ा और एकांत के बारे में, निरर्थक और अनिवार्य चुनौतियों के बारे में, आदिवासियों की तरह बिखर जाने को अभिशप्त शब्दों के बारे में लिखता है। पार्रा ऐसे लिखता है जैसे वह कल बिजली के तार को पकड़कर झूलने जा रहा है। जहां तक मुझे याद है, मैक्सिकन कवि मारियो सैंटियागो ही एकमात्र व्यक्ति था जिसने पार्रा की रचनाओं का विषद अध्ययन किया था। हममें से बाक़़ी लोगों ने केवल एक स्याह पुच्छल तारे को देखा है। किसी उत्कृष्ट कृति की पहली अनिवार्यता है, किसी की नज़र की तपिश महसूस किये बिना गुज़र जाना।

एक कवि की यात्रा में ऐसे क्षण आते हैं, जब उसके पास खुद को सुधारते रहने के सिवा कोई दूसरा विकल्प नहीं बचता है। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि वह कवि,  गोन्ज़़ालो दे बर्थ्यो को मुंहज़बानी सुनाने में सक्षम है या वह हेप्टा-सिलेबल्स और गार्थिलासो के 11-सिलेबल् छंदों को किसी के बनिस्पत ज़्यादा अच्छी तरह जानता है। इन सब के बावजूद जीवन में ऐसे क्षण आते हैं, जब केवल एक चीज करने को बचती है और वह यह कि ख़ुद को अतल खाई में झोंक देना है या चिली के संभ्रांत घरानों के सामने नंगे खड़े हो जाना है। बेशक, उसे यह पता होना चाहिए कि सामने आने वाले भयंकर नतीजों का सामना कैसे करें। किसी उत्कृष्ट कृति की पहली अनिवार्यता है, किसी की नज़र की तपिश महसूस किये बिना गुज़र जाना।

एक राजनीतिक टिपण्णी:

पार्रा ज़िन्दा बने रहने में सक्षम है। इसमें ऐसी कोई बड़ी या महान बात नहीं है, लेकिन बात तो है। दक्षिणपंथ की तरफ स्पष्ट झुकाव रखने वाला चिली का वामपंथ उसे हरा नहीं पाया, न ही नव-नाज़ी और चिली का भ्रामक दक्षिणपंथ ही उसका कुछ बिगाड़ पाया। हाल ही में अघोषित मिलीभगत से अंजाम दिए गए दमन और नरसंहार को अपवाद मान लें तो लातिन अमरीकी स्टालिनवाद भी उसे पराजित न कर सका, न ही वैश्वीकृत हो चुका लातिन अमरीकी दक्षिणपंथ। अमरीकी विश्वविद्यालय के कैंपसों के तुच्छ (मीडियाकर) लातिन अमरीकी प्रोफेसर उसे शिकस्त नहीं दे पाए, न ही सैंटियागो के गांवों में भटकने वाले जॉम्बिज़। यहां तक कि पार्रा के चेले भी पार्रा को मात देने में कामयाब नहीं हो सके। इन सबके बावजूद और अपने अति-उत्साह में ही सही मैं कहूँगा कि न सिर्फ पार्रा बल्कि उसके भाई-बहन, प्रसिद्धि की चरम पर विराजमान उसकी बहन वायलेता और उसके विद्रोही माता-पिता सभी ने कविता की सार्वकालिक सर्वश्रेष्ठ महत्वाकांक्षाओं में से एक को अपने-अपने व्यवहार में अपनाया है, और वह है, जनता के धैर्य की ऐसी की तैसी।

“सितारे (स्टार्स) कैंसर का इलाज करने में सक्षम हैं, यह एक ग़लतफ़हमी है”, “तुम बंदूक की बात करते हो, मैं याद दिलाना चाहता हूँ कि आत्मा अमर है” अव्यवस्थित ढंग से चुनी गईं ये काव्य-पंक्तियाँ पार्रा की हैं। वह एक फ़कीर की तरह सच्चा है, और हम, कौन जियेगा और कौन मर गया की परवाह किये बिना, चलते चले जा सकते हैं । पार्रा एक मूर्तिकार और विज़ुअल आर्टिस्ट भी है, इसके बावजूद मैं यह याद दिलाता चलूँ कि ऐसे स्पष्टीकरण निहायत बेहूदा हैं। पार्रा एक साहित्यिक आलोचक भी है। उसने चिली के पूरे साहित्यिक इतिहास को एक बार तीन छंदों में समेट दिया: “चिली के महान कवि चार/ तीन हैं:/ एलोन्सो दे अर्थिया और रुबेन दारियो।’’

जैसा कि कथा-साहित्य में हम पहले से ही देख रहे हैं, 21 वीं सदी के आरंभिक वर्षों की कविता एक हाइब्रिड कविता होगी। नए औपचारिक झटकों की ओर संभवतः हम बढ़ भी चुके हैं लेकिन भयावह सुस्ती से लैस। उस अनिश्चित भविष्य में हमारे बच्चे एक कवि, जो कि कुर्सी पर बैठे-बैठे सो जाता है, के ऑपरेटिंग टेबल पर हुए वैचारिक मुठभेड़ पर चिंतन करेंगे और, रेगिस्तान के उस काले पक्षी पर भी विचार करेंगे, जिसका चारा ऊंट की देह से खून चूसने वाला परजीवी हैं। अपने जीवन के अंतिम क्षणों में किसी समय ब्रेटन ने बताया था कि अवैध और गुप्त कारवाईयों के लिए सर्रियलिज़्म की कितनी आवश्यकता है, ताकि शहरों के नालों और पुस्तकालयों को शरणगाह बनाया जा सके। यह कह चुकने के बावजूद दुबारा इस विषय को उसने अपना शरण नहीं बनाया। यह किसने कहा इससे आज कोई फ़र्क नहीं पड़ता है: वह वक़्त कभी नहीं आएगा, जब आतिश-ए-लब ख़ामोश रहे।

 

यह लेख रॉबर्तो बोलान्यो के लेखों, निबंधों और भाषणों के संकलन की पुस्तक के अंग्रेजी अनुवाद Between Parentheses: Essays, Articles and Speeches, 1998-2003  से लिया गया है.

हिंदी अनुवाद: संतोष झा और उदय शंकर

संतोष झा, हिरावल, पटना से सम्बद्ध मशहूर संस्कृति कर्मी, नाट्यकर्मी और अद्भुत संगीतकार हैं, साहित्य में रूचिवश उन्होंने यह अनुवाद किया है. इनसे आप hirawal@gmail.com के द्वारा संपर्क कर सकते हैं.

उदय शंकर जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय ,नयी दिल्ली से डॉक्टरेट हैं. हिंदी के शोधार्थी और आलोचक हैं. हिंदी के महत्वपूर्ण आलोचक  सुरेंद्र चौधरी की रचनाओं को तीन जिल्दों में संपादित किया है. इनसे  udayshankar151@gmail.com पर बात की जा सकती है.

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